कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
( ८२ )
बोधसागर
कष्ट पावता है जो साधुनकी सेवा करे और बड़े भाग उदय हों तो पारखी गुरु मिले और पूर्ण पारख बतायके जीवको भर्म छोड़ावै तब आवागमनसे रहित हो पक्का रूप पायके कन्चेका अभाव करे तब आप पारख रूप हो । पारखी आप पारख रूप-ना कहूं धोखा ना भ्रमकूप ।
दोहा—एक जीव जो स्वतह पद, बुद्धि आंतिसे काल ।
काल होय बहु काल सो, रचनते भयो बिहाल ॥
वेहालीको मतो जो, देव सकल बतलाय ।
ताने परख प्रमान लहि, जीव नष्ट नहिं जाय ॥
करि अनुमान जो सुन्न भो, सूझै कतहुँ नाहिं ।
आप आप बिसरो जबै, विज्ञान देहि कह ताहिं ॥
ज्ञान भयो जाग्यो जबै, करि आपन अनुमान ।
प्रतीर्बिब झाँई लखे, साक्षी रूप बखान ॥
साक्षी है परकाश मो, महाकारन तिहि नाम ।
बिंब मसूर प्रमान भो, नील बरन घनश्याम ॥
बाढि बिंब अर्ध पर्व भो, सुन्नाकार स्वरूप ।
ताको कारन कहत है, महा अँधियारी कूप ॥
कारणते आकार भो, श्वेत अंगुष्ठ प्रमान ।
वेद शास्त्र सब कहत तिहि, सूक्ष्मरूप बखान ॥
सूक्ष्म रूपसे कर्म भो, कर्महिसे अस्थूल ।
परा जीव यहि रहटमें, सहे घनेरी झूल ॥
स्थूलते पुनि सूक्ष्म, सूक्ष्मते कारण होय ।
महाकारण तुरिया करी, ज्ञान देहि कह सोय ॥
सर्वसाक्षि सो ज्ञान है, रहित भयो विज्ञान ।
संतो सबै अनर्थ पद, यामें नहिं कल्यान ॥
स्वसप्तमवेदबोध
( ८३ )
षट् देही वर्णन करो, समझिके त्यागो मित ।
एक एक अब कहत हौं, जिहि प्रकार जिहि मित ॥
इति
अथ स्थूल देही वर्णन--वार्ता
स्थूल देही साढ़े तीन हाथ रक्तवरण ब्रह्मा देवता रजो गुण
ॐकार मात्राका जाग्रत अवस्था बैसरी वाचा त्रिकुटी अस्थान
जल तत्त्व खेचरी मुद्रा पपील मार्ग घटाकाश नेत्रस्थान सत्य-
लोक विश्व अभिमानी गायत्री प्रथम पद क्षर निर्णय बङ्गवाअग्नी
विषयानन्दादिक आपतत्त्व दश इन्द्री रहस मात्रका अर्थ सत्र
ऋग्वेद चौदह देवता पचीस प्रकृति । इति ।
पचीस प्रकृति वर्णन
( १ ) आकाशकी प्रकृति-काम १, कोध २, लोभ ३, मोह
४, भय ५, रंग काला अहार शब्दद्वारा कान इति । ( २ )
वायुकी प्रकृति-चलना १, बोलना २, बल करना ३, पसारना
४, संकोचना ५. रंग हरा अहार गंध द्वारा नासिका इति ।
( ३ ) अग्निकी प्रकृति-नींद १, जमुहार्द २, भ्रूख ३, प्यास
४, आलस ५. रंग लाल अहार देखनो द्वारा आंख । ( ४ )
जलकी प्रकृति-रक्त १, पसीना २, थूक ३, मृत ४, विद ५.
रंग श्वेत अहार मैथुन द्वारा लिंग इति । ( ५ ) पृथ्वी प्रकृति-
हाड १, मांस २, नाडी ३, चाम ४, रोम ५. रंग पीला द्वारा
गुदा इति पचीस प्रकृति ।
चौदह देवताके नाम
मनके देवता चन्द्रमा १, बुद्धिके देवता ब्रह्मा २, चित्तके
देवता नारायण ३, अहंकारके देवता शंकर ४, नेत्रके देवता
सूर्य ५, कानके देवता दिशा ६, वाचाके देवता अग्नि ७, त्व-
( ८४ )
बोधसागर
चाके देवता वायु ८, नाकके देवता अश्वनीकुमार ९, जीभके देवता वरुण १०, हाथके देवता इंद्र ११, पाँवके देवता उपेन्द्र १२, लिंगके देवता प्रजापति १३, गुदाके देवता यम १४ ।
मुक्ति सालोक इति स्थूलदेही विस्तार ।
अथ सूक्ष्म देहीका वर्णन
लिंगदेही अंगुष्ठ बराबर ओंकार मात्रका श्वेत वर्ण विष्णु देवता स्वप्न अवस्था श्रीहटस्थान मध्यमा बाचा उर्ध्व सैन्य दीर्घ-मात्रका यजुर्वेद वैकुण्ठलोक कण्ठस्थान पालनक्रिया आप तत्त्व भूचरी मुद्रा विहंगमार्ग दुतिया पद गायत्री अक्षर निर्णय मन्दा किनी कोहं अहंकार सामीप्य मुक्ति पंचभूत सूक्ष्म प्राण अपान समान उदान व्यान चतुष्टय अन्तःकरण मन बुद्धि चित्त अहंकार शब्द स्पर्श रूप रस गंध ये सूक्ष्म नौ तत्त्व कहिये, पंच ज्ञान इन्द्री पंच कर्म इन्द्री ये सब जड़ हैं; जीव प्रतापते चैतन्य होते हैं तासे जाव कहते हैं इति लिंग ।
अथ कारण देहीका वर्णन--वार्ता
कारण देही अर्ध पर्व श्याम बरण मकार मात्राका गोलहट स्थान वैसन्ती बाचा मध्य शून्य तमो गुणसामवेद चाचरी मुद्रा कपिमार्ग महदाकाश हृदयस्थान पराग्य अभिमान कंठ स्थान निर्णय उदायाग्नि तृतीया पद गायत्री अद्वैतानन्द नवीन इच्छा शक्ति सुषुप्ति अवस्था सारूपमुक्ति इति कारण देही ।
अथ महाकारण देहीका वर्णन
महा कारण देही मसूर बराबर विकार मात्रका नील वरण ईश्वर देवता हुंठ पीठ स्थान पराबाचा शून्य अर्धमात्रका अथर्वण वेद वायुतत्त्व अगोचरी मुद्रा । ज्वाला कालामीनमार्ग चिदाकाश आद्वैलोक नाभी स्थान प्रतिज्ञा विष्णु अभिमानी
स्वसमवेदबोध
( ८५ )
चतुर्थ पद गायत्री आदि शक्ति विदेही नंद सोहं ओहं अहंकार
तुरीया अवस्था प्रकाशिक सायुज्य मुक्ति इति ।
अथ ज्ञानदेहीका वर्णन वार्ता
इन चारोंको साक्षी ज्ञान देही स्वसमवेद उन मुनि बाचा
स्थान भौर गुफा सदाशिव पूर्ण गिरी अनुचरीय मात्रका पूर्ण
बोध अवस्था कालातीत शिष्यमार्ग निराकाश शिष्यस्थान
निराश्रयलोक निरंजन अभिमानी पंचम परमारथ पद गायत्री
ज्ञाननिर्णय ब्रह्मज्ञान मन ब्रह्मानंद अहंकार ज्ञानदेही ज्योति-
स्वरूप कहते हैं मुक्ति में ब्रह्ममय सर्वसाक्षी, इति ज्ञानदेही ।
अथ विज्ञानदेहीका वर्णन-वार्ता
विज्ञानदेही आकाशवद् रूप रेख रहित नहीं आवै नहीं जाय
नहीं उपजे नहीं विनशै नहीं भीतर नहीं बाहर ऐसा है कैसा नहीं
अहंकार रहित मान अपमान रहित रूप अरूप रहित अहम् (मैं)
वम् (तू) रहित वचन और निर बाच रहित इच्छा अनइच्छा
रहित नाहं कर्ता नाहं भुक्ता जैसाको तैसा विज्ञान देही ना कोई
जीव ना कोई मन ना कोई माया ऐसा भास विज्ञान देहीमें रहता
है इति विज्ञानदेही ।
चोपाई
इसके आगे भेद हमारा । जानैगा कोइ जाननहारा ॥
कहैं कबीर जानैगा सोई । जापर दया गुरूकी होई ॥
सोरठा-यहि विधिसे यह जीव, गिरा आपने रूपसे ।
भोगे दुःख सदीव, जबलौं लहे न भूमिका ॥
चोपाई
यहि विधिजिव निजरूप बिसारे । तजि सो भूमि देह गहन्यारे ॥
तजि निजरूप और जब भासा । कहुक दौस तामैं कर बासा ॥
( ८६ )
बोधसागर
सो तन त्यागि और पुनि लेऊ । पुनि कछु काल ताहिमें रहेऊ ॥
पुनि त्याग्यौ पुनि गह्यौ नवीना । क्रम क्रम भयौ ज्ञान गुनछीना ॥
षट प्रकार गह उत्तम अंगा । पुनि पशु पक्षी कीट पतंगा ॥
नर तनमें ज्यौ पारख पावै । तौ यह जीव बहुरि घर आवै ॥
मनुज देह ज्यौ चेतन होई । तौ निश्चय जिव जाय विगोई ॥
धोखे परा जीव यहि लेखा । भांति भांतिको धारे भेषा ॥
भ्रम करि वेद कितेब बनाया । भ्रम करि द्वैताद्वैत बताया ॥
भ्रम करि कर्म धर्म ठहराया । भ्रम करि बड़ बानी कथि गाया ॥
भर्मको धर्म सकल जग माहीं । सब जिव बले भर्मकी छाहीं ॥
भ्रम करिके षट दर्शन थापा । भ्रम करिके जिव लखै न आपा ॥
भ्रम करि ईश्वर दूर बताया । विरही बने सकल जग जाया ॥
भ्रम करि इत उत दूँदन लागे । भ्रम करि प्रेम भक्तिमें पागे ॥
धोखे परा सकल संसारा । बिन सतगुरु भ्रम टरे न टारा ॥
सारशब्द सतगुरुको पावै । सब धोखा भ्रम दूरि बहावै ॥
दोहा-ब्रह्मादिक सनकादिक, भ्रम करि बानी गाय ।
ता बानी भ्रम विष चढ़ा, जीव गये गफिलाय ॥
तिहि कारन आसा लगी, आवा गौनको मूल ।
पछो ताते सात फुटि, जीव सहे बहु शूल ॥
इति
अथ सात बीज वर्णन
ॐ श्रीं रं सौं रौं ह्रीं क्लीं. अ इ उ ए व म ह ।
चोपाई
सात बीज यह कह्यौ बखानी । ताते पुनि अंकुर उत्पानी ॥
क्रम ऊपाछा योग रु ज्ञानी । उत्तपति स्थितिप्रलय विधिनाना ॥
सातो अंकुरे जब चाली । चित्तरूप तब गहौ कुदाली ॥
स्वसम्बन्धवोध
( ८७ )
गोडन लगे नित प्रति वाही । बुद्धिके जलते सींचा ताही ॥
आलबाल हंकार बनाया । मन रूपी तहैं खाद डराया ॥
अंतःकरण भूमिका माही । नित नौ पल्लव फूटै ताही ॥
नाना क्रम उपाछा नाना । नाना योग अरु नाना ज्ञाना ॥
नाना उत्तपति स्थित है नाना । प्रलय अनंत न जाय बखाना ॥
एक एक प्रति नाना बानी । नाममात्र कहि तासु बखानी ॥
सात बीज गुरुवन मिलि बोये । प्रथम सुभेच्छा नाम कहाये ॥
पुनि सुविचार दूसरे कहिये । तनोमानसा तृतिये गहिये ॥
सत्त्वापति चौथे कहि दीजै । असंशक्ति पंचम गनि लीजै ॥
छठे पदार्थ अभावनी भाषा । तुरिया नाम सप्तमे राखा ॥
बोये सात बीज जब येही । अंकुरे निकसे फुटि तेही ॥
प्रथमै सो अब करों बखाना । जाते ज्ञानकेर बंधाना ॥
सोहं बीजको अंकुर ज्ञाना । आलबाल भक्तिमय साना ॥
सींचा ताहि प्रेमकी बारी । ताने नित नौ पल्लव धारी ॥
दोहा-शुभ इच्छादिक सात ये, तिनप्रति बानी भूर ।
पल्लव तिनते बहु फुटी, रही जक्त भर पूर ॥
ज्ञान परोक्ष है फूल तिहि, फल अपरोक्ष जो ज्ञान ।
दो बिधि ज्ञान प्रमानमें, जक्त जीव अरुज्ञान ॥
चौपाई
दुतिये अकार कर्म कहि गावो । ताते क्रम अंकूर उगावो ॥
भय करि आलबाल कर ताही । लोभके जलते सींचा वाही ॥
तामें सात साष कर थापन । यजन याजन अध्यन अध्यापन ॥
दान प्रतिग्रह मैथुन गानी । सातो क्रमकी नाना बानी ॥
बानीते पल्लव बहुतेरो । फूल बासना ताको हेरो ॥
पुण्य पाप द्वै फूल सो आना । कर्म करै यह कीन बखाना ॥
( ८८ )
बोधसागर
पुनि तृतिये अब देहुँ बताई । श्री उपाछा बीज कहाई ॥
तिहि उपाछा अंकुर आया । आलबाल मरजाद बनाया ॥
भावके जलते सींचा ताहीं । सात साख फूटी तिहि माहीं ॥
शिव विष्णू गणपति रवि होई । शक्ती राम कृष्ण सातोई ॥
पल्लव ताहि न फूटी थोरी । महामंत्र जो सात करोरी ॥
दोहा—जारन मारन बसकरन, उच्चाटन, उच्चार ।
आकर्षण अरुंधभनो, मोहन सप्त विचार ॥
तिनमें लागे फल रुचिर, लोकादिक बहु फूल ।
आब चौथो वर्णन करौं, योग धर्मको मूल ॥
बीपाई
योग बीज रंकी न प्रमाना । ताते योग अंकुर बिकसाना ॥
किरिया आलबाल कर ताको । साधन जलते सींचा वाको ॥
शास्त्र पतञ्जल पल्लव गायौ । सात साख तामें फहि आयौ ॥
प्रथमें सो हठयोग बतावो । बहुरि योग लय नाम कहावो ॥
योग कुंडली तीजे बरना । पुनि लंबिका योग चित धरना ॥
पंचम तारक योग बताई । षष्ठ योग अमनसकहि गाई ॥
योग सारुय सप्तम गुणगाहा । फूल समाध बखानो ताहा ॥
अणिमादिक सिद्धी फल अहई । अब उत्तपत्य भेद विधि कहई ॥
ए उत्तपत्य बीज बतलाया । तामें उत्तपति अंकुर आया ॥
विषया आलबाल कर जाही । बानी जलते सींचा वाही ॥
उत्तपति साख सात प्रकटानी । जाते चारो खानि बखानी ॥
शब्द स्पर्श रूप रस गंधा । बहुरि वासना इच्छा बंधा ॥
शब्दते मेघ कीट बहु आही । दाडुर आदिक उत्तपति जाही ॥
बहुरि स्पर्श अरु मैथुन गाया । जीव मैथुनी ताते जाया ॥
तृतिये रूप कि उत्तपति ठाना । अनल विहंग आदि जिव नाना ॥
स्वसमवेतबोध
( ८९ )
जेते दृष्टि भावते जाये । सो सब रूप उत्पन्न कहाये ॥
चौथे रसते जलचर भयऊ । वृक्षके फलते कीड़े कहेऊ ॥
पंचम गंधते उखमज होई । छठे वासना उत्पत्ति जोई ॥
ताते देव योनि प्रकटानी । भूतादिक ताहीते मानी ॥
सप्तम इच्छाते सिध योनी । सात बीज यह उत्पत्ति थूनी ॥
दोहा-नारी ताको फूल है, पुरुष फल बतलाय ।
बहुरि स्थितके बीजको, वर्णन करौं सभाय ॥
चौपाई
ह्रीं स्थिती बीज षष्ठोई । आलबाल तिहि माया होई ॥
मोहके जलते सींचा येही । सात शाख फुटि निकसीतेही ॥
अन्न अरु जल तृण पृथ्वी पत्ता । फल अरु फूल स्थिती गहत्ता ॥
अन्नते नर जलते है जलचर । तृणते तृणचर पात पत्रचर ॥
पुष्पते स्थित पुष्पचर आही । फलचर सदा फलनको खाही ॥
महि अरु मैलते जो उपजाया । महिअरु मैलसों भोग लगाया ॥
अब सप्तम परलयको बरनो । क्लीं है बीज ताहि संहरनो ॥
परलयको अंकुर सों धारा । सात साख तामें परचारा ॥
आलबालकी ना कठिनाई । क्रोध बारिते सो तृप्ताई ॥
सात लाख हैं ताके तीरा । पृथ्वी पानी अग्नि समीरा ॥
लात हाथ अरु दंत भनन्ता । नास करनको शस्त्र अनन्ता ॥
भय है फूल मृत्यु फल जाका । सत्य कबीर वचन परपाका ॥
इति
अथ उत्पत्ति कथाग्रंथ अमर मूल सत्य कबीर वचन-चौपाई
आदि पुरुष जब हतो अकेला । शब्द स्वरूपी पंथ दुहेला ॥
मनसा घटते भिन्न निकारी । उत्पत्ति भई ताहि यक नारी ॥
वह नारी सकलो जग जाया । भग भोगे सो पुरुष कहाया ॥
( ९० )
बोधसागर
भग द्वारे हैं बालक आया । यही भांति सब जग भरमाया ॥
यहि घटमें द्वै रूप सवारी । सूरज पुरुष चंद है नारी ॥
प्रथम हतो जब सुन्न सुभाऊ । काल सुन्न एकै समुझाऊ ॥
काल भेद कोई नहि जाना । धर्मदास तुम सुनियौ ज्ञाना ॥
सुन्नहि माहैं शब्द उच्चाग । धर्मरायको भयौ पसारा ॥
प्रथमहि जिंदरूप यक भैऊ । सत्तर युग सोवत चलि गैऊ ॥
सत्य साहिब मोहि आज्ञादीन्हा । जिंद जीव कह तुम नहि चीन्हा ॥
तब हम जाय शब्द अस बोला । सोवत जिंद नाहिं चितडोला ॥
तब हम जाय जगावन लागे । जिंद न जाग प्रेम अनुरागे ॥
नाहिंन जाग नौंद भ्रम आवा । तब हम शब्द एक उपजावा ॥
काल शब्द कहि टेरि पुकारा । सुनिके जिन्द भयो संभारा ॥
काल शब्द सुनि जिंद डेराना । तब गहि आनि चरण लपटाना ॥
काल शब्द ना होता भाई । तो काहेका भक्ति कराई ॥
कालकी डर तपसी तप साधा । इंद्री पञ्च काल डर बाँधा ॥
इति
अथ उत्पत्ति कथाग्रन्थ कबीर बातो और अनुरागसागरके
अनुसार सत्यकबीर बचन--चौपाई
प्रथमें आदि समर्थते सोई । दूसर अंश हतो नहिं कोई ॥
आदि अंकुरा सुरति जो कीना । सत्य करी गभैं तब लीना ॥
पांच अंड तब भयौ उपानी । तत्त्व एक है भिन्न प्रमानी ॥
धावै अंड करै चौचन्दा । आप देखके सहजानन्दा ॥
फूटे अंड तेज भइ धारा । सबमें देख पांच ततसारा ॥
देखि रूप अंडनको भाई । सोहैं सुरति तबै उपजाई ॥
पुरुष शक्तिमें दोय प्रकारा । ताको सौंपा उत्तपतिसारा ॥
तासों उत्पत्ति भेद बतावो । बचन सुरति एकै संमावो ॥
स्वसमवेदबोध
( ९१ )
जाते ओहं पुरुष भे अंशा । ओहं सोहं भे द्वै अंशा ॥
ताको आज्ञा उत्पत्ति कीना । शब्द संधि उनहूको दीना ॥
मूल सुरति अरु पुरुष पुराना । रचना बाहर कीनो थाना ॥
ओहं सोहं अंडन रहेऊ । सकल सृष्टि के करता भयऊ ॥
प्रथम अँकु दुज इच्छा संगा । तीसर मूल चौथ सोहंगा ॥
ओहं सोहं कीन प्रमानी । आठ अंश भे तिनते उत्पानी ॥
आठ अंश भे एक निधाना । करता सृष्टि भये परमाना ॥
सात अंशके नाम बखानो । जिनते सकल सृष्टि बंधानो ॥
प्रथम मूल अंकूर गनीजै । इच्छा सहज साहंग भनीजै ॥
पुनि अर्वित फिर अक्षर भैऊ । बृद्धि हेत करता निरभैऊ ॥
सातो अंश जीव हितकारी । जिव कल्यान काज तन धारी ॥
यहिविधि रचना करि करतारा । पुनि अपने मनमाहिं विचारा ॥
बिना काल नहिं जीव डेराई । कोइ न भक्ति भजन मन लाई ॥
तिहि औसर प्रभु काल उपाया । जाकी डर सब जीव डेराया ॥
जप तपादि संयम जो करनी । काले के डरतें सो सब बरनी ॥
सात अंश जिव दाया करता । अष्टम काल भयो संहरता ॥
सोरठा-बृद्धि हेत भे सात, अष्टम नास्तिकि हेत है ।
स्वसमवेद विरूपात, तिनते सब रचना भई ॥
चौपाई
द्वीपन द्वीप अंश बैठारा । सातो जहैं तहैं कीन पसारा ॥
अक्षर कीन जहाँ निज थाना । तहैं समूहजल तत्त्व बखाना ॥
अक्षर सुरति पुरुषकी बानी । त्रिगुण तत्त्व घटमाहिं समानी ॥
तब अक्षर को निद्रा आई । सोरह चौकरी सोय सिराई ॥
अक्षर सुरति मोहमें आई । ताते दूसरे अंश उपाई ॥
अंडस्वरूपी जलमहैं दीना । यह अबिगति समरथने कीना ॥
( ९२ )
बोधसागर
अक्षर जागा निद्रा जाई । देखि अंड व्याकुलता आई ॥
चक्रुत भा यह किन निरमाई । अंडदृष्टिने देखो भाई ॥
चहुँदिशि तहाँ रहे जल छाये । अंडा तापर तेरे भाये ॥
अक्षर ढिग अंडा लगि आवा । तामें लिखी हकीकत पावा ॥
ऐसी तामे लिखी निशानी । परमपुरुषकी सो सहिदानी ॥
तुम लगि हम यक अंश पठाई । रचना करो सृष्टिकी भाई ॥
तुमते सो करिहै बरिआई । आवन देहु जहाँ लगि आई ॥
सत्रहसौ युग ऊपर तीसा । तासु महातम कर जगदीशा ॥
बहुरि महातम होय तुमारा । कालजालते जीव उबारा ॥
काल पुरुष तब पुरुष समाई । तासु महातम तब उठि जाई ॥
तब सब जीव मुक्ति पद पैहैं । फेरि न चौरासीमें ऐहैं ॥
ऐसो अंडप लिखा निहारी । अक्षर पढ़ि मनमाहि विचारी ॥
अक्षर दृष्टि अंड विहराना । ताते काल बली प्रकटाना ॥
सोइ ज्योति निरंजन भयऊ । जाको सब जग करता कहेऊ ॥
अक्षर सुरति पुरुषकी बानी । ताते काल भयो अभिमानी ॥
निरंजननाम अक्षरने भाषा । समरथ शब्द हृदयमें राखा ॥
प्रभु निज तेजते काल उपाया । ताते सकल सृष्टि दुख पाया ॥
यकपग काल रहो पुनि ठाढो । युग सत्तर कीनो तप गाढो ॥
तपमें येते काह बिताई । मांगु मांगु वर कह तब साई ॥
कहै काल प्रभु यह वर दीजे । तिहुँ लोकको राज करीजे ॥
भवसागरमें राज हमारा । मुनि समर्थ अस वचन उचारा ॥
पुत्र जाहु पृथ्वीके मूला । जहाँ कूर्म बैठे अस्थूला ॥
सृष्टि भंडार कूर्मको भाई । सोलह माथ चौंसठहाथ पाई ॥
ताते लेहु सृष्टिकी रचना । शीश नाय बोलेहु मृदुवचना ॥
तीन लोकको पायो राजू । धर्मराय तब निज उर गाजू ॥
स्वसमवेदबोध
( ९३ )
चाले धर्म हर्ष हिय वाढ़े । मनमें करत गुनावन गाढ़े ॥
जाय कूर्मके सम्मुख भयञ्ज । नहीं प्रनाम दंडवत कियञ्ज ॥
देखे धर्म कूर्मकी काया । अठानवे कोटि योजन बतलाया
बारह पालंग कूर्म शरीरा । षट पालंग धर्म बलवीरा ॥
धर्मराय तब कूर्मते कहई । मोहि पुरुषकी आज्ञा अहई ॥
सृष्टिकी रचना मोकहँ देहो । ना देहो तो मारिके लेहो ॥
तबहि कूर्म निज मनहि विचारी । यह तो काल भयो हंकारी ।
कहैं कूर्म सुनिये धर्मराया । पुरुष मोहि नहिं कछु फरमाया ॥
हमते मांगे कछु नहिं पावो । जाय पुरुष ढिग वेगि सिधावो ॥
यह सुनि धर्मराय अतिकोपा । कूर्मते युद्ध करण प्रण रोपा ॥
तपबल काल भयो बरियारा । अहंकार करि कूर्म प्रचारा ॥
भिरा जायके सन्मुख धाई । करे यतन किमि रचना पाई ॥
धायकाल अतिबल तिहि डाटा । तासु तीन शिर नखते काटा ॥
शीस तासु जिहि औसर खंडा । उद्भते निकसा पौन प्रचंडा ॥
रणश्रव कूर्म तन उठा पसीना । सो जलतत्त्व पृथ्वीतिहिकीना ॥
पाँचतत्त्व धरती असमाना । सूरज चंद्र नखते प्रकटाना ॥
तनत पौन छूटा जिहि बारा । रचना सकल कीन विस्तारा ॥
जबहि प्रसेव बुन्द जल दीना । महिउनचास कोटि तिहि कीना ॥
दूधपै जैसे परे ढलाई । जलपर तथा जमीन जमाई ॥
कूर्मको तिहुँ सिर भक्षण कियञ्ज । बहुरि निरंजन शून्यमें गयञ्ज ॥
धर्मराय तब कीन विचारा । कहँ लगि तीनों लोक पसारा ॥
स्वर्ग मृत्यु कीनो पाताला । बिना बीज किमि कीजै बाला ॥
करि सेवा मांगो वर सोई । जाते तिहुँ पुर मेरो होई ॥
पूर्वध्यान तब कीन निरंजन । युग चौसठ कर सेवासंजम ॥
एकपाँव पुनि सेवा कियञ्ज । चौसठ युगलों ठाढे रहेञ्ज ॥
( ९४ )
बोधसागर
बहुरि पुरुष दीनो बरदाना । सोइ होई जो तोहि मनमाना ॥
बहुरि निरंजन विनय उचारा । बीज खेत दीजै करतारा ॥
देहु ठौर बैठा जहँ जाई । तबहि पुरुष अस बचन सुनाई ॥
मान सरोवर बैठक लीजै । तीन लोककी रचना कीजै ॥
तब करता मन कीन विचारा । बीज खेत तिहि काल सँवारा ॥
अथ बीजखेत अथवा आदि शक्तिकी
उत्पत्ति वर्णन-चौपाई
अद्याकी उत्पत्ति बखानों । ग्रंथ श्वास गुंजार प्रमानों ॥
निजतन मधि प्रभु मैल निकारी । रची ताहि आदि कुमारी ॥
पुरुष मैलते साँचा कीना । पैठी मैल रंग तिहि दीना ॥
देकर रंग बरन सब फेरा । भीतर मल मोह मद चेरा ॥
पुरुष मैलते पुत्री कीनी । पाँच तत्त्व तिहि भीतर दीनी ॥
उत्पत्ति पारस पुत्री पावा । प्रगटी कला अनंत सुभावा ॥
नख शिष देह सिद्ध प्रभु कीना । पंचह श्वास तिहि भीतर दीना ॥
जब श्वासा कायामें गैऊ । प्रगटी ज्योति जगामग भैऊ ॥
आठो अंग बना बहु रंगा । पारससार ताहिके संगा ॥
निर्मल उदित बतीसो दंता । चमकै बिजुली कला अनंता ॥
उपजी ज्योति अखंडित बानी । बोले बचन पुहुष रससानी ॥
मधुर वचन अरु लीला धारी । देख रूप जब पुरुष दुलारी ॥
उपजी रंग रूपकी खानी । बोले अमी विरहकी बानी ॥
उपजी कन्या कला अनूपा । पुरुषते प्रकट पुरुष स्वरूपा ॥
जिहिया रस सब उत्पत्ति कीना । सोंपा रस कन्याको दीना ॥
उपजी कन्या अगम सुभावा । अष्टंगी कह पुरुष बुलावा ॥
पुत्री जाहु निरञ्जन पाही । तुमकहँ समरथ सदा सहाई ॥
स्वसमवेदबोध
( १५ )
अथ आद्या और निरञ्जनकी कथा वर्णन-चौपाई
परम पुरुषकी आज्ञा पाई । कन्या तबहि कैल ढिग आई ॥
यकपग खड़ी सेवमें लागो । छुटी समाधि निरञ्जन जागो ॥
सम्मुख पलक उचारि निहारी । देखा ठाढ़ी आदि कुमारी ॥
परमरूप शोभा सरसाई । देखतके लहि काम सताई ॥
कहैं कैल सुनु आदि भवानी । मिलि हमतुम जगरचना ठानी ॥
तब आद्या अस उत्तर दीना । यह विचार तुम अनुचित कीना ॥
मैं हौं बहिन तू मेरो भाई । मोहि तोहि ना होय सगाई ॥
यहि करनी तोहि लागै पापा । धर्मराय तब निज पद थापा ॥
पुण्य पापके भय मोहि नाही । पुण्य पाप हमही ते आही ॥
पुण्य पापके हम करतारा । कोई लेय न लेख हमारा ॥
कहैं कैल सुन आदि कुमारी । मोहि कारन तोहि पुरुष सँवारी ॥
मानि लेहु तुम हमरा बचना । मिलि हमतुम करिये जगरचना ॥
कैल वचन आद्या नाहिं माना । उत्तर प्रति उत्तर तोहि ठाना ॥
तब मन रोष निरञ्जन कीना । निज मुखमाहि मेलि तिहि दीना ॥
लीलत कन्या कीन पुकारा । पुरुष पुरुष कहि वचन उचारा ॥
ततक्षण योग जीत प्रकटाने । गहे कमान बान कर ताने ॥
सुरति बानते कैलहि पारा । कन्या मुखते बाहर डारा ॥
जब कन्या मुख बाहर आई । योगजोत तब गयो लोपाई ॥
कन्या भयबश भै तिहि काला । पुरुषकि सुधि बिसरायौ बाला ॥
पिता पिता कहि कैलहि बोले । मदन प्रचंड तासु तन डोले ॥
कियो निरञ्जन सकल पसारा । पुण्य पाप दोउ रचे अपारा ॥
पुण्य पाप दोउ फंदा होई । जामें अरुझि रहे सब कोई ॥
योग यज्ञ संयम व्रत पूजा । सब हमही कोइ और न दूजा ॥
रची छुधा माया बिकरारा । पुरुष लोकको मूँढौ द्वारा ॥
( १६ )
बोधसागर
कहै निरञ्जन कामिनि पाही । पुरुष ढिग अब हम नहीं जाई॥
पुरुष लोक इहाँ रचि लीजे । यकछत राज हमहि तुम कीजे॥
अब तौ पुरुष आस नहीं मोही । गहिके बाह राखि हो तोही ॥
छन्द-भग ना हतो तिहि नारिके नख फारि कीन निरञ्जना ।
यमसाट जिव जेहि बाट विचरे घाट उत्पतिको बना ॥
भग भोग प्रथम सँयोग सोई कैल आद्या सो ठना ।
भे प्रकट ब्रह्मा विष्णु शंकर त्रिगुन भव निधि रंजना॥
अथ त्रिदेवकी जन्मकथा वर्णन-चोपाई
काल कल्लुङ्ग जब गयौ सिराई । रूपरंग कन्या तन छाई ॥
जब भलि भांति रंग तन भीना । कन्या कैल व्याह सँग कीना ॥
कूर्मको तीन शीस जो रहेऊ । कैल काटिके भक्षण कियऊ ॥
ताते तीन अंश प्रकटाने । ब्रह्मा विष्णु महेश बखाने ॥
देव निरंजन आदि कुमारी । केते काल कीनो सुख भारी ॥
कैल अरु कामिनि भोग बिलासा । स्वसमवेद भलिभांति प्रकाशा ॥
तीनो सुत जिहि काल उपाई । धर्मराय तब गयौ लुपाई ॥
राजपाट आद्याको दीना । सुत्रमाहँ निज बासा कीना ॥
कह्यो निरंजन आद्या पासा । मेरो भेद न करहु प्रकाशा ॥
पुत्रनसे जनि बात जनावो । मेरो भेद न तिनहि सुनावो ॥
यतन अनेक ध्यान जौ लैहैं । तो मम दर्श पुत्र नहीं पैहैं ॥
यह कहि शून्यमें गयो समाई । योगसमाधि निरञ्जन लाई ॥
मातासे सुत पूछे बाता । पिता हमार कहाँ है माता ॥
पुत्रनते कह आदि भवानी । पिता तुमार हमहुँ नहीं जानी ॥
रचना सकल हमहिते होई । हम तुम तुम हम और न कोई ॥
तुमहो पुरुष हमहि तोर जोई । हम तुम दूसर और न कोई ॥
हम हैं पिता हम ही हैं माता । हम ही तीन लोकके दाता ॥
स्वसमवेदबोध
( १७ )
जब जननी अस बचन उचारा । सुनि संसै कर तिहूँ कुमारा ॥
माता कपट कीन हमपाहीं । पिताको भेद बतावत नाही ॥
तीनो बालक ताते रूठै । जननी बचन कहैं सब झूठै ॥
तब माता बोली रिसिआई । पिताको दरश करहु तुम जाई ॥
माता कह तुम पुष्प चढ़ाओ । पिताको शीस परसिके आवो ॥
चले जो पुत्र पिताकी आसा । पिता रहै पुत्रनके पास ॥
खोजत खोजत कतहुँ न पाई । रहे निरंजन सुन्न समाई ॥
लगी समाधि निरंजन तारी । निकसे वेद श्वास सँग चारी ॥
ऋग अरु यजुर अथरबन सामा । धरि तन रटहि निरंजननामा ॥
निरंकारकी अस्तुति करही । देव निरंजन गुन उच्चरही ॥
देव निरंजन दृष्टि न आवै । ज्योतिज्योति कहि श्रुतिगुणगावै
तिहिमें वेद निरखै निज नैना । अनुमानहिते भाखे वैना ॥
वेदन प्रति नभ बचन सुनाई । बासा करहु सिंधुमें जाई ॥
आज्ञा दियौ निरंजन राई । बसो वेद सागरमें आई ॥
बहुरि निरंजन सैन लखाई । आद्यासे अस कहौ बुझाई ॥
निज पुत्रनको आज्ञा दीजै । सिंधु मथनको उद्यम कीजै ॥
तब आद्या अस युक्ति बनाई । तीन सुता निज अंग उपाई ॥
पुत्रिन कह अस आज्ञा दीनों । बसहु जाय सागरमें तीनों ॥
माताको अस आयसु पाई । तीनों सिंधुमें गई समाई ॥
यह चरित्र जननी जो ठाना । ब्रह्मा विष्णु शंभु नहि जाना ॥
राखा गुप्त न मर्म बताया । आद्या सुतनसे बचन सुनाया ॥
सागर मथन जाहु मम वारा । पैहो वस्तु महा सुखसारा ॥
माताकी जब आज्ञा पाई । चले तिहूँ तिहि शीस नवाई ॥
मथ्यौ जाय सागरको सोई । कन्या तीन प्रकट तब होई ॥
तीनो कन्या जबही पाये । हर्षसमेत मातु ढिग आये ॥
बो० सा०
( ९८ )
बोधसागर
तब माता पुत्रन कहि टेरा । यह तो काज भयौ सुत तेरा ॥
सावित्री ब्रह्माको दीना । विष्णु लक्ष्मीको बरि लीना ॥
पारवती शंकरको ब्याहा । नारि पाय अतिमनहि उछाहा ॥
काम विवशभे तीनों भाई । देव दनुज सब ही प्रकटाई ॥
जननी पुनि पुत्रन समुझावो । सागर मथन फेरि तुम जावो ॥
जो जिहि मिले लेहु तुम सोई । तीनों पुत्र चलत तब होई ॥
सोरठा-रश्म न लायौ बार, चले तिहुँ सुत सिंधुतट ।
मथ्यौ ताहि चित धार, निकसे चौदह रतन तब ॥
चौपाई
चौदह रत्न निकस जिहि बारी । लै जननीके सम्मुख धारी ॥
माताके जब आगे कीना । ताने बांटि तिहुँको दीना ॥
पायौ वेद सो ब्रह्मा लीनो । पढ़ि गुनिके विचार सो कीनो ॥
ब्रह्मा वेद पढ़न जब लागा । पढ़त वेद तब भौ अनुरागा ॥
कहै वेद पुरुष यक आही । निराकार जिहि रूप न छाही ॥
सत्य माई सो रूप देखावत । चितवत दृष्टि नजर नहि आवत ॥
स्वर्ग सीस पग आहि पताला । यह सब देखो ताको रुयाला ॥
ब्रह्मा विष्णुसे कह समुझाई । तुमहू शंख सुनो चितलाई ॥
आदि पुरुष यक वेद बतावा । वेद कहै हम भेद न पावा ॥
तब ब्रह्मा माता ढिग आये । करि प्रनाम तेहि शीस नवाये ॥
हे माता मोहि वेद बतावा । सिरजनहार और बतलावा ॥
दोहा-ब्रह्मासे माता कहे, सुन सुत मेरी बात ।
सप्त स्वर्ग है शीस जिहि, चरण पताल है तात ॥
जौ इच्छा तोहि दरशकी, पुष्प लेहु तुम हाथ ।
बेगि सिधारो ताहि ढिग, जाय नवावो माथ ॥
चौपाई
ब्रह्मा मातहि शीस नवाई । उत्तर दिशा बेगि चलि जाई ॥
स्वसमवेदबोध
( ९९ )
तिहि अस्थान पहुँचे जाईं । नहिं तिहँ रवि शशि सुत्र रहाईं॥
बहुविधि अस्तुति करे बनाईं । ज्योति प्रभाव ध्यान तहँ लाईं॥
करते ध्यान गये युग चारी । माता शोच पुत्रकर भारी ॥
ब्रह्मा तात दरश नहिं पावा । शून्य ध्यान युग चारि गँवावा ॥
किहि विधि रचना रची बनाईं । ब्रह्मा आवै कौन उपाईं ॥
उषटि शरीर मैल गहि काढ़ी । पुत्रीरूप कीन रचि ठाढ़ी ॥
शक्ति अंशनिज ताहि मिलावा । नाम गायत्री तासु धरावा ॥
गायत्री मातहि शिर नावा । चरन टेकि रज शीस चढ़ावा ॥
गायत्री बिनवै कर जोरी । सुन जननी बिनती यक मोरी ॥
कौन काज मोंकह निरमाईं । कहो वचन लेवैं शीस चढ़ाईं ॥
कह अद्या पुत्री सुन बाता । ब्रह्मा आहि जेठ तव आता ॥
पिता दरश कहँ गये अकाशा । आनहु ताहि वचन प्रकाशा ॥
दरश तातको वह नहिं पावै । खोजत खोजत जन्म सिरावै ॥
जौनी विधि वह ईहां आईं । करहु जाय तुम तौन उपाईं ॥
चलि गायत्री मारग जाईं । जननी बचन प्रीति चित लाईं ॥
गायत्री पहुँची तहँ जाईं । ब्रह्मा जहाँ समाधि लगाईं ॥
लगी समाधि ब्रह्मकी गाढी । गायत्री शोचे तहँ ठाढी ॥
केते धौस रही सो ताहीं । ब्रह्मा पलक उधारे नाहीं ॥
गायत्री तब शोचन लागी । कौन भाँति ब्रह्मा अब जागी ॥
निजु मनमें बहुतै अनुमानी । आद्या ताके ध्यान समानी ॥
आद्या ध्यानमें ताहि सिवाईं । परसो निजकर ब्रह्मा पाईं ॥
गायत्री पुनि कीनेहु तैसो । जननी युक्ति बतायो जैसो ॥
तिहि औसरसो मन चितलाईं । परस्यौ ब्रह्म चरन तब जाईं ॥
ब्रह्मा योग ध्यान चित डोला । व्याकुल भयो ब्रह्म अम बोला ॥
कौन आहि पापिन अपराधी । काहेको मोर छोडाय समाधी ॥
( १०० )
बोधसागर
शाप देब तोको हम जानी । पिता ध्यान खंडेहु मोर आनी॥
कह गायत्री मोहि न पाया । बृक्षि लेव तब देहो आपा ॥
कहौं तोहिते सांची बाता । तोहि लेन पठयौ तो माता ॥
चलहु बेगि जननी पहुँ जाई । तुम बिन रचना होय न भाई ॥
ब्रह्मा कहैं कौन विधि जाई । पिता दरश अजहूं नहि पाई ॥
कह गायत्री दरशन पैहो । चलहु बेगि नहि तो पछितैहो ॥
ब्रह्मा कहैं देहु तुम सार्वी । परस्यौ शीस देखा मैं आँखी ॥
ऐसो कहो मातु समुझाई । तब तुमरे सँग हम चलिजाई ॥
गायत्री कह यह है स्वारथ । कहब जानि मैं पुनि परमारथ ॥
यहि विधि बोलब झूठी बाता । कौनी विधि तौ बूझे माता ॥
पुष्प गायत्री ब्रह्मा तीनी । एकमता तिहि औसर कीनी ॥
तीनों मिलिके चलि भये तहँवा । कन्या आदि कुमारी जहँवा ॥
करि प्रणाम सम्मुख रह जाई । माता सब पूछी कुशलार्ई ॥
कैसे दरश भो पिता सुभाऊ । ब्रह्मा सो सब मोहि सुनाऊ ॥
कहैं ब्रह्म दोनों हैं सार्वी । परस्यौ शीस देखा इन आँखी ॥
तब माता बूझै अनुसारी । कहु गायत्री वचन विचारी ॥
तुम देखा इन दर्शन पावा । कहो सत्य दरशन परभावा ॥
तब गायत्री बचन सुनावा । ब्रह्मा दरश शीस पितु पावा ॥
मैं देखा इन परस्यो शीसा । ब्रह्माही मील्यौ जगदीशा ॥
छंद-ले पुष्प परस्यौ शीस पितु इन दृष्टिमें देखत रही ।
जल ढारि पुष्प चढ़ाय दीनों हे जननि है यह सही ॥
माता कहे पुष्पावतीसे कहो सत्यहि मोसना ।
जो चढ़ेहु शीसपिताके तुम मोसे कहो तुम ततछना ॥
सोरठा-कहु पुष्पावति मोहिं, दरसकथा निरुवारिके ।
यह बूझौं मैं तोहिं, जिमि ब्रह्मा दरशन कियौ ॥
स्वसमवेदबोध
( १०१ )
चौपाई
पुष्पावती वचन अस बोले । माता सत्य वचन नहिं डोले ॥
दरसन शीस लह्यौ चतुरानन । चढ़न शीस यह धरिनिश्चलमन ॥
शाप सुनत आद्या अकुलानी । यह अचरज भो मरम न जानी ॥
अलखनिरंजन असपुनिभाखी । मोकहैं कोइ न देखे आंखी ॥
तीनों बोलैं झूठी बानी । सुनि माता बहुतै अकुलानी ॥
यह सुनि माता कीनेहु दापा । ब्रह्माको पुनि दीनेसु शापा ॥
पूजा तोर करे कोइ नाही । जो मिथ्या बोल्यौ हम पाही ॥
आगे ह्वैहै शाप तुम्हारा । मिथ्या पाप करे बहु भारा ॥
प्रकट नियम बहु करै अचारा । अंतरमैल पाप विस्तारा ॥
विष्णु भक्तसे कर हंकारा । ताते परे नरककी धारा ॥
कथा पुराण औरन समुझावै । चाल बिहीन आप दुख पावै ॥
उनत और सुने जो ज्ञाना । करै भक्ति सो कहो प्रमाना ॥
देवन पूजा, बहुबिधि लावै । दछिना कारन गलाकटावै ॥
जाकह शीस करे पुनि जाई । परमारथ तिहि नाहिं हढ़ाई ॥
अपने स्वारथ ज्ञान सुनैहै । आपन पूजा जगहि हढ़ैहै ॥
परमारथके निकट न जाई । स्वारथ अरथ सबै समुझाई ॥
गायत्री तोर वृषभ भतारा । पाँच सात अरु बहुत पसारा ॥
धरि औतार अखज तुम खाई । बहुत झूठ तुम वचन सुनाई ॥
सुनो पुष्प तुमरो विश्वासा । होय विगंध मध्य तौ बासा ॥
जो तोहि सींच लगावै आनी । ताकर होय वंशकी हानी ॥
अब तुम जाय धरो औतारा । केवडा केतकी नाम तुमारा ॥
छंद-शाप तीनोंको दियो मनमाहैं तब पछितावई ।
कैसे करे मोहि निरंजन पल छमा मोहि न आवई ॥
आकाश बानी तब भई यह कहाँकी नभ बानिया ।
उत्पत्ति कारन तोहि पठयौ कह चरित यह ठानिया ॥