कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
आत्मबोध
( ३७ )
एक पग बांधिके अद्द झूलत रहै, एक ठादेश्वरी कष्ट कारी ।
एकगर्भमरते रहे पञ्चाग्निपतारहे, एक बैठिजलसेज आसनआरी ॥
कहाँ लौं कहूँ बहु रूपकोपेखनो, आप आपनपौ सवनेपिसारी ।
एक अन्न भोजन तजै दूबरंगनरहै, एकदूध भोजनकरै दूधाहारी ॥
एक लूनछोड़िके भये अलूनिया, एक बैठिके गुफामैलायतारी ।
एकतिलकमालादियेटोपचोलालिये, एकगुदढीपहरिकरिडिम्भधारी ।
एक पूजिकै मूर्तीगर्भ भारिधरी, एक शंखधुनिआरतीजोति वारी ।
सेव कीन्ही सहीदेवचीन्हानही, आत्माछोड़िभये जड़के पुजारी ॥
पूजिपाषान अभिमान अंधाफिरै, सतचेतनसूं बीच यारी ।
योगी पण्डित बडे सर्वगीता पढे, भर्मकी भीति नहिं टरतटारी ॥
कहै कबीर कोइ सन्त जन जौहरी, मेटि यमफन्द उठे संभारी ।
इतने विटम्ब सो वस्तु न्यारी रही, ज्ञानकीसुरतिसोल्योविचारी ॥
अगमकोगमकरोध्यानहृदयधरो, चढशून्यकीशिखरकरजिकिरभाई ।
फिक्रकोत्यागिनिजनामसो लागिकरि, सुषुप्ता ताँत तूतू बजाई ॥
गगनअरुधरनिबिचरुयाल अद्वुतरचा, गैवकीकलासतगुरुलखाई ।
कहै कबीर अब भोग पूरन भाया, ज्ञानके मौज वैराग पाई ॥
दौडदौडरेबालकाखबरिकरदर्बारमें, अलमस्तअवधूतफकीरआया ।
जाकेछाप अरुतिलकगलमालमस्तकवना, सत्तकी एकआवाज आया ।
खोलिपटदेखले जगमगीजोतिहै, नादअरु बिन्दुगठजीतकाया ।
कहै कबीर सर्वांग अविगत मिला, भर्मको छाड़िगुरुज्ञानपाया ॥
उलटि यंत्र धरो शिखरआसनकरो, देखसो देव दर्गाह माहीं ।
जहाँ तेल बाती बिनाअधरदीपकबलै, युक्तिकी जोतसो घटैनाहीं ॥
जहाँ तालतांतीबिना रागरमतासुना, पावैबिन निरत झंकारखाहीं ।
हाथबिनपांवबिनशीसमस्तकबिना, हुकुमहथियारबिन फौजधाई ॥
जहाँ जत्रतेजी नहीं गैद छाजे नहीं, युद्धमंडा तहाँ घाव नाहीं ।
( ३८ )
बोधसागर
पातबिन पेड बिन वागडम्बररहे, पालिबिनसर्वहिलोलखाहीं ॥
नीरबिनकमलतहैफूलिनर्मलरहै, पोखबिनभैवरगुंजार खाही ।
नैवबिनमहलकेदशोछाजाबना, रूपबिन देव जहाँ मौज पाई ॥
कहैं कबीर कोइनिरतिलोनिरखियो, पपिलके पंथमें गयंदजाई ।
दरसबिनदीदपरतीति आवै नहीं, पार की कहैं नब झूठ झाई ॥
हकार सकार झनकार लागि रहै, बैठमनतख्त जहाँ तत्त पाई ।
रूपबिन रेख जहाँ राग रमतासुना, तालमृदंगपर टेर खाई ॥
अजरअरुअमरका अगम बासाबसे, नादअरुबिन्दकीखबरपाई ।
सोधि अस्थूलरहमान जबभैटिया, नामकी छापजबजायखाई ॥
जहाँ फूहिरि परबोकै अमीझरबोकै, प्रेमकी पुरीसो घटैनाई ।
आपकी तापधरि काललागै नहीं, कालकौमारि जंजालखाई ॥
शून्यकी ध्वजा जहाँ फरकखाबोकै, सेतही गगन गुंजारखाई ।
अगम अरु निगमका खूबछाजा बना, रूपबिनदेवजहाँगमपाई ॥
अखंड अपार जहाँ तारलागारहै, तारमें मिलै सो पार होई ।
भर्मको छेकि परब्रह्मको भैटिकरि, सुरतिको कोटिब्रह्मांड मोई ॥
कोटके कंगुरे ज्योति झलमलकरै, माझरी शून्यमें फरकखाई ।
दासकबीर निर्वानपद परसिया, मिटिगया झूठ झकझोर आई ॥
सतकबीरका सेतही घर रहै, श्वेतही शून्यमें रमै भाई ।
जहाँ यती औ सतीतो निरतकरबोकै, प्रेमरस पीवे सोघटै नाई ॥
ताल मृदंग अनहद लागा रहे, सुषुम्नासाधि संतोष पाई ।
विहंगमशब्दजहाँ फरक खावो करै, शब्दकीखोजकोइसंतलाई ॥
जहानकी टेक अस्मान लागी रहै, सहजमें भैवरगुंजार खाई ।
उलटिकरिपवनतहाँ गगनलागीरहै, लूमझरलाल आकाशलाई ॥
देखिधरिध्यान जहाँ इंद्र गवनीकरै, अमीका कुंड हिलोलखाई ।
शब्दका चांदना अगम लागारहै, उठै झनकार ब्रह्माण्डमाई ॥
आत्मबोध
( ३९ )
दासकबीर लौलीन लंका चढे, पलककी दरसमें झलक पाई ॥
शून्यकी शिखरपर जिकर ऐसी, घटा चंघोर संजोर बाजे ।
शब्दकी आवाज जहांगाजबानीकहै, भँवर गुँजारनिशिदिनगाजे ॥
हीरा अरु लाल अवेध मोती पड़े, श्वेतही शून्यजहाँ सन्तजूझै ।
कहैं कबीर ये पन्थहै अगमका, सोहंगमें सुरति सतलोक सूझै ॥
वाहवाहसिदकेजाऊँमैमुर्शिदकेकदमोंपर, एकहीस्वात्ममेंनिहालमनकिया है ।
पीरमेराखासामैं सुरीदहुंताका, करिकेमिहरदस्तपंजाशिरदिया है ॥
ज्ञानकेकमानबानमारतेहैंतानि२सोइजनजानैजाकीसुरतिकरिवारवारहुआहै ।
अकिलकीगिलोलकरनिजमनठहरायदेस, वैतोरहमानयारमुवाहैनजियाहै ।
साईसर्वज्ञहराओर वेकैववेऐब, कहैंकबीर वैतोसाहिबमहबूबमियाहै ॥
बदन विकशत खुशालआनंदमें, अधरमेंमधुरसुस्कात बानी ।
सतडोलैनहीं झूठबोलैनहीं, सुरति औ सुमतिसोसत्यज्ञानी ॥
कहतहुँ मैं ज्ञान उपदेश सबनसुँ, देत उपदेश दिलदई जानी ।
ज्ञानकेपूर है रहनिके सूर है, दयाकी भक्तिदिलमाहिं ठानी ॥
और सो तोडिलैएकसोरत रहै, ऐसे जन जगतमें बिरलाप्रानी ।
ठगवटपार संसार भरपूर है, संत इसकी चाल कहाकागजानी ॥
चञ्चल चपल चित्त रङ्ग हैं चीकने, बातमें दूरस दिलकपटजानी ।
पेटमें कतरनी दया जिनके नहीं, कहतमें सुध मन बगध्यानी ॥
जीवकी दुर्मती भर्म छूटे नहीं, जन्म जन्मात्र पड़े नर्कखानी ।
कौवा कुबुधि सुबुधि पावै नहीं, कठिन कठोरविकरालबानी ॥
अग्निके पुञ्ज है शील शीतल नहीं, विष अमृत लिये एकसानी ।
कहा भयोसाखीकटो दृष्टि उभरी नहीं, सत्कीचालविनुधूरधानी ॥
सत सुकृतकी साँची रहनी सही, कागबुग अधमकीकौनबानी ।
कहैं कबीरकोइबिरलाजनसुघइहै, सदाशब्दध्यानसुनैनिशानी ॥
छाडिघोखादियाआपनिश्रयकिया, आदिअरुअंतसाहबएकजानी ।
( ४० )
बोधसागर
सुरतिके थाकते निरतभी थाकिया, निरतके थाकते शेषकंपा ॥
शेषके कंपते धरनिभी धसमसी, धरनिके धसमसे मेरुडोला ।
मेरुके डोलता शब्दसायर मिला, उर्द्धमें शब्द घनघोर गाजा ॥
बखत बखतीमिली कर्मयारी जुरी, बांधिपाताल आकाशफेरा ।
सत कबीर तहां ब्रह्म चौरी रचा, सत साहब तहां लिया फेरा ॥
अथर दरियाव दरगाहकुछअजबहै, निर्मली ज्योतिजहांखूबसाई ।
ज्योतिके ओट यम चोट लागे नहीं, तत झँकार ब्रह्माण्डमाहीं॥
ज्ञानका बाग जहांगैवका चांदना, वेद कितेबकी गम्म नाहीं ।
खुल गयेचश्मजवहश्मसब पशमहै, दीनअरुदुनीका कामनाहीं ॥
कहैं कबीर यह भेद बिरलालहै, झलमलैज्योतिजहांझूलेझाई ।
इति आत्मबोध रेखता प्रथम भाग समाप्त
जैनधर्मबोध ग्रन्थ
जैनधर्मबोधप्रारंभः
भारतपथिक कबीरपंथी-
स्वामी श्रीयुगलानन्दद्वारा संशोधित
खेमराज श्रीकृष्णदास बम्बई प्रकाशन
This image shows a blank page with a light beige or off-white background. There are very faint, illegible impressions of text scattered across the page, which appear to be bleed-through from the reverse side. A small, dark, irregular smudge is visible in the bottom left corner. The overall texture of the paper is slightly grainy.
सत्यनाम
श्री कबीर साहिब
A faint, light-colored illustration of a seated figure, possibly a deity or a person in traditional attire, centered on the page. The figure is depicted in a meditative or formal pose, wearing a long robe and a headpiece. The background is plain and light-colored.
सत्यमुकृत, आदिअदली, अजर, अचिन्त, पुरुष
मुनीन्द्र, करुणामय, कबीर, सुरति योग संतायन,
धनी धर्मदास चूरामणिनाम, सुदर्शन नाम, कु-
लपति नाम, प्रमोध गुरुवालापीर, केवल नाम,
अमोल नाम, सुरतिसनेही नाम, हक्क नाम,
पाकनाम, प्रकट नाम, धीरज नाम, उग्र
नाम, दयानामकी दया वंश-
व्यालीसकी दया ।
अथ श्रीबोधसागरे
अष्टाविंशतिस्तरंगः ।
अथ जैनधर्मबोधप्रारम्भ ।
★
दोहा-तीर्थकर जहँ देवकह, गुरुजतिहैं जो जैन ।
जैनेश्वर मुख भाख जो, ग्रन्थ है केवल बैन ॥
उत्पत्ति कथावर्णन
भागकट षट जैन मत, तामैं द्वे विधि कीन ।
तीनकाल औ सर्पिणी, उपसर्पिणी है तीन ॥
( ४६ )
बोधसागर
आदि काल तिहुँ प्रथमके, तामें उत्पति होय ।
नामजुगलिया नारि नर, प्रकटहोय द्वै दोय ॥
जगत अनादि निधन कहै, तासु न कबहुँ नाश ।
बीजते रचना सकल हो, यह जगत स्वयमप्रकाश ॥
याको कर्तानाहिं कोई, यह जग आपे आप ।
कर्म प्रेरि करवाव सब, कर्महि रचना थाप ॥
ईश बसे वैकुंठमें, अलग कर्मते सोय ।
निर्विकार निलैप सो, नाम निरञ्जन होय ॥
चौपाई
सो प्रभु करे करावे नाहीं । जिवस्वच्छन्दनिजवशमें आही ॥
जीव जनतु जग नाना जाती । जेते जड चैतन ते पांती ॥
कर्म जनित फल भोगें सारे । आतम सबके न्यारे न्यारे ॥
जस कछु कर्म करै जो कोई । उग्र छुद्रता के वश होई ॥
विश्वमाहिं जड़ चेतन केते । जेते जीव आतमा तेते ॥
निर्विकार जो ईश्वर होई । जग विकार ताते नहिं कोई ॥
सो नहिं कर्मके बंधन पड़ता । राग द्वेष ता हृदय न बर्ता ॥
नहिं उपजाव न पालै कोई । नहिं संहार सृष्टि कर सोई ॥
सकल विकारते सो प्रभु न्यारा । जीव कर्म निजु भोग निहारा ॥
यहि षट्कालमेंदुख सुखठाटा । तीनमें वृद्धि तीनमें घाटा ॥
तीन काल सुख स्वर्ग समाना । उगै धरनि कल्पद्वुम नाना ॥
पाम रहित मानुष तब सारे । नर सुर दूनों संग विहारे ॥
द्वै द्वै प्रकट होय तब सोई । नाम जुगलिया तिनको होई ॥
आयू परम दीर्घ रह जाको । सब सुख छाय रहा महिताको ॥
कर्म कृपा कछु सो नहिं जाना । राव रंक सब एक समाना ॥
सदा काल यक सम उजियारा । कल्पद्वुमकी ज्योति अपारा ॥
जनधर्मबोध
( ४७ )
दिन औ राति कोइ जाने । रवि शशि उड्डुगण सकल डुराने॥
चन्द सूर नूर प्रचण्डा । पारिजात आमा नौ खंडा ॥
दरदर पर सुरतरु वर लागे । सकल नारि नर सुखमें पागे ॥
पूरबी बोल-छन्द बरवै
दमक देव डुम बमकै महि शशि सूर ।
गममि रहल चहुँ ओरवा चमकै नूर ॥
पूरन धरनि अकसवा जोति अपार ।
यक समान दिन रतिया नहिँ अँधियार ॥
छपे सुरतरुकी जोतिया लगनमें मन्द ।
एक न दीख नखतिया नहिँ रवि चन्द ॥
नर तिय सकल जुगलिया सब निस पाप ।
पुण्य पाप कछु नाहीं कर्म न थाप ॥
तब नहिँ बोध बिचरवा नहिँ गुरु शिष्य ।
कतहुँ न वरणाश्रम वासव सम दिष्य ॥
कतहुँ उग्र न सदवों रंक न राव ।
नर सुर विचर धरनिया कछु न बराव ॥
हिल मिल दोउ दल रहते जनु सँग भाय ।
भोग भूरि कल्पडुम काम पुराय ॥
महि सुख छाय स्वरगवा छबि सरसाय ।
हीरा लाल कि स्वनियां कविको गाय ॥
नहिँ कछु वेदन बानी नहिँ श्रुति छंद ।
धर्म न कछु अधरमवा सहजानन्द ॥
इति
अथ चौथा कालवर्णन
सोरठा-लागत चौथा काल, सुरतरुजबही लोप हो ।
नर गह न्यारी चाल, कृत चली कृतकाल तिहि ॥
नं. ९ कबीरसागर - ३
( ४८ )
बोधसागर
चौपाई
चौथा काल लगे जब आई । तबसे रात्रि द्यौस बिलगाई ॥
कल्पवृक्ष तब जाहि लुपाई । चन्द्र सूर तारे दरशाई ॥
जिहि औसर निशदिन बिलगाना । भिन्नभाव तब जगको जाना ॥
तब मानुष ऊपरको देखे । चकिंत होय सब कहैं विशेषे ॥
यह क्या हमरी नजरमें आयो । जो हम काहू देखि न पायो ॥
तब कुलकर ब्यौरा कहि देही । चन्द्र सूर तारे हैं येही ॥
कुलकर सोई नाम धरावै । जो मानुष कुलको बिलगावै ॥
जाति वर्ण कुल न्यारा करही । तिहि अनुसार धर्म आचरही ॥
राजनीति सब भाषै ओई । खेती कर्म सिखावै सोई ॥
जब मानुष सुरतरु नहि राखै । कुलकर तबहि कूसानी भाषै ॥
तबते कृतक रही सब लोगू । अन्न उपायके भोजन भोगू ॥
जबहि देव दुम गयो दुगई । ईश्व उगी मानुष सुखदाई ॥
भांति भांतिके ऊख गन्ना । जिवको दुख दरिद्र सबभन्ना ॥
कल्पवृक्षके बदले ईखा । प्रथमहि जाको मानुष चीखा ॥
ताकी खेती प्रथमहि चाला । कुलकरकी आज्ञा सबपाली ॥
कुलकर अनुभव ज्ञान गहाई । सब जीवनको राह बताई ॥
कुलकर आदि भूप इक्ष्वाका । प्रथम चली जग जाकीशाका ॥
इक्ष्वाकू कुलकर कहलाये । प्रथम जो नरको ईश्व चुसाये ॥
अर्थ सहित यह नाम कहाया । इक्ष्वाकू जिन ईश्व चुसाया ॥
तिहि अवसर गुणदोष विभागा । पुण्यपाप मानुषको लागा ॥
कर्म दोष गुण तबते पागे । प्रकट करे कुल करके आगे ॥
कछु औगुन जब नरमें पावै । निहि कुलकर धिक वचन सुनावै ॥
सो धिक वचन सुने नर नारी । निजुमनमें अति होहि दुखारी ॥
यतनमें अस लज्जा माना । तजे तुरंत आपनो प्राना ॥
जनधर्मबोध
( ४९ )
अस कहि नर छोडे निजचोला । आज हमें कुलकर धिकबोला ॥
कछु दिस बीते मनुष दिठाई । धिक बोलीसे सो मल जाई ॥
जब धिक वचनसे राह न धरही । बहुरिधिकाधिककुलकर करही ॥
यतनेहु पर जब शर्म न माने । अधिक दंड तब कुलकर ठाने ॥
कमही क्रम औगुन अधिकाई । बेडी बांसके दे ठहराई ॥
झूली फासो दण्ड प्रचंडा । लगा होन पृथ्वी नौ खंडा ॥
इति
अथ वर्णविभाग वर्णन—चौपाई
चौथा काल आनि जब लागा । तबते मानुष जाति विभागा ॥
तीन वर्ण प्रथमहि तब कीने । छत्री वैश्य शूद्र कहि दीने ॥
दोय प्रकार शूद्र पुनि कीना । एक लीन भौ दुतिय मलीना ॥
तबते जाति बरन ठहराई । कुलकर भिन्न २ बिलगाई ॥
दोय प्रकारके लोग कहाये । यक नर यक विद्याधर गाये ॥
मानुष भू गोचरी बखानो । विद्याधर खगोचरी मानो ॥
भूगोचरी भूमि पग डाले । उडि अकाश विद्याधर चाले ॥
जाति वर्ण दोनोमें कीना । नर विद्याधर धर्म धुरीना ॥
नर विद्याधर जैनी सारे । तिरथंकर सेवा चित थारे ॥
पंचम काल लगे जब आई । तब मिथ्यात्र फैल अधिकाई ॥
जबते मिथ्या मत सरसाने । तबते विद्याधर बिलगाने ॥
चौथे काल माहँ परिपाका । प्रकटे तिरसठ पुरुष शलाका ॥
एक सौ उनहत्तर जिव सारा । चौथे काल माहँ औतारा ॥
मुक्तिपात्र कहिये नर जोई । चौथे काल प्रकटे सब सोई ॥
प्रकटे तबहि तिरथंकर देवा । सुर नर मुनि कर जाकी सेवा ॥
सुर सुरपति पृथ्वीपर आवे । तिरथंकरकी अस्तुति गावै ॥
बो० सा० ९
( ५० )
बोधसागर
ऋषभनाथ है आदि तिर्यंकर । तिनके पुत्रभे भरथ भूपवर ॥
चक्रवर्ति थे भरथ भुवाला । चौथा वर्ण कीन तिहि काला ॥
सब मानुषकी पारख लीन्हें । दायावंत अधिंक जिहि चीन्हे ॥
ब्रह्म चीन्हि जिन दाया धारा । तिनको भिन्न कियो तिहि बारा ॥
ब्रह्मन तिनको नाम पुकारी । जिनके हृदये दाया भारी ॥
चौथा वर्ण भरथ नृप थापा । तबते चार बरणकी छापा ॥
ऋषभनाथकी केवल बानी । तिहि औसर असकहैं बखानी ॥
भरथ विप्र थापे हैं जाको । चलै जगतमें तिनकी साको ॥
पञ्चम काल जाहि दिन ऐहै । ब्रह्मन जैन विरोधी ह्वैहै ॥
जैन विरुद्ध कर्म सब करिहैं । द्रोह सदा जैनीसे धरिहैं ॥
कछुदिन यहिविधि गयोसिराई । मन मत ब्रह्म न वेद बनाई ॥
जैन विरुद्ध कर्म सब ठाना । हिंसा कर्म करहिं विधि नाना ॥
अश्वमेध गोमेध रचाई । अजामेध नरमेध बनाई ॥
ब्राह्मणजातिकी अधिक प्रशंसा । लिख्यो ताहि ब्रह्माको वंसा ॥
अपने मन सब शास्त्र बनाये । सबते आपको श्रेष्ठ बताये ॥
करि प्रपंच सब थाप अचारा । जैन विरुद्ध पाखंड पसारा ॥
चौथा काल बहुरि जब ऐहै । फेर न ब्राह्मण वर्ण थपैहै ॥
बहुरि प्रतिष्ठा देय न ओही । थपै न जैन धर्मको द्रोही ॥
जाति वर्णकी बात बखानी । अब पुरुषनकी कहो कहानी ॥
छंद त्रिभंगी
चौबिस तीर्थकर जैनी शंकर बस कम कंकर धूल कियौ ।
गुण ज्ञान गहंत मुक्ति लहंत अरि हंतअतिचूल कियौ ॥
दाया उपदेशं रहित कलेशं मोह न लेशं धर्मधनी ।
कुल पद बत्तीशं बानी दीशं जैन मुनीशं भर्म भनी ॥
जनधर्मबोध
( ५१ )
अथ चौबीस तीर्थकरके नाम वर्णन
दोहा-ऋषभ नाथ प्रथमै कहो, अजित नाथ कह फेर ।
शंभो अभिनंदन कहो, सुमतिनाथजी टेर ॥
पदम प्रभू क्षुपारसो, चंद्र प्रभू बखान ।
पुष्पदंत शीतल श्रेयस, वासपुञ्ज पुनि जान ॥
बिमल अनन्तो धर्मनाथ, शांतिकुन्थ नाथोय ।
अर्हनाथ अरु मल्लजी, मुनि सुवृत्त कह जोय ॥
निमनाथो नेमनाथ कह, पारसनाथ कहोय ।
महावीर नाथो कहो, अन्त तिर्थकर सोय ॥
इति
अथ बारह चक्रवर्तियोंके नाम
दोहा-भरथ सगर मघवा कहो, सनतकुमार गनाय ।
सांतिनगधकुंथनाथजी, अर्हनाथ कहवाय ॥
पुनि सुभूमि पञ्चो विजय, हरिखेनो ब्रह्मदत्त ।
सारी पृथ्वी बश करे, कर निज्ज चक्र गहत्त ॥
अथ नौ बलिभद्रके नाम
दोहा-विजय अचलजी धर्मधर, बहुरि सुप्रभुजी होइ ।
फेर सुदर्शन जानिये अरु सुनन्द कहै जोइ ॥
नन्दमित्र पुनि लेखिये, रामचंद्र पुनि जान ।
पञ्च फेर कहि मानिये, नौ बलिभद्र प्रमान ॥
अथ नौ नारायणके नाम
दोहा-प्रथम दुपिष्ट तृपिष्टजी, बहुरि स्वयंभू गाय ।
पुरुषोत्तम नरसिंहजी, पुण्डरीक बतलाय ॥
केवल दत्त बखानिये, फेर लक्ष्मण मान ।
कृष्णचन्द्र नौमैं कहो, यदुकुल दीपक जान ॥
( ५२ )
बोधसागर
अथ नौ प्रतिनारायणके नाम
दोहा-अश्वग्रीव तारक मेरक, मधु निशुम्भ प्रहलाद ।
बलि रावण जरासंध नव, प्रतिनारायण बाद ॥
इति
अथ तिरसठ शलाकापुरुषके नाम-चौपाई
तिरसठ पुरुष शलाका येही । जन जान अति उत्तम तेही ॥
मात पिता तिरथंकर करो । अरतालीस जीव सो हेरो ॥
चौबिस कामदेव नौ नारद । चौदह कुलकर बुद्धिविशारद ॥
ग्यारह रुद्र यक सौ उनहतर । मुक्तिपात्र अवश्य येते नर ॥
इतने इतर और अधिकाई । केवल ज्ञान गहि मुक्त कहाई ॥
अथ जैनशास्त्र संख्या प्रमाण-चौपाई
जैन शास्त्र संख्या परमाना । ऐसे ताको सुनो बखाना ॥
बत्तिस पद सब शास्त्र कहावै । ऐसे ताको लेख लगावै ॥
प्रतिपद ढाई सौ मन स्याही । यक पद पूरन लिखिये ताही ॥
यक चावल कजल जौं लीजै । यकश्लोक पूरण तिहि कीजै ॥
बत्तिस पद यह लेख लगाई । सर्व शास्त्र ताते लिखि पाई ॥
कजल आठ सहस मन लागे । केवल वैन जैनपति जागे ॥
केवल वानी जैनको जोई । अंथ प्रमाणिक इनमें सोई ॥
अथ अष्टकर्म विधान वर्णन
दोहा-अष्टकर्म जो जैन कह, ताके बंधन जीव ।
भवसागर भोगे सदा, पावे नहिं निजु पीव ॥
ज्ञानी बरनी प्रथम कह, दर्शना बरनी फेर ।
बहुरि बेदनी जानिये, महा मोह पुनि टेर ॥
जैनधर्मबोध
( ५३ )
आयू कर्म बहुरि कहो, नाम कर्म पुनि भाष ।
गोत कर्म अंतराय कर्म, बरनौ तिनकी शास्त्र ॥
कर्म एकही जानिये, आठभांति सो दीस ।
प्रकृत जैन बानी कहै, एक सौ अरतालीस ॥
इति
अथ ज्ञानावर्नी कर्मकी पंच प्रकृति वर्णन--चौपाई
मति ज्ञानावर्नी जो कर्मा । सो आवरि राख्यो मतिधर्मा ॥
श्रुति ज्ञानी वरनी जब होई । शुभश्रुति ज्ञान फुरे नहिं कोई ॥
औध ज्ञान आवर्नी जबही । औध ज्ञान हिय होय न तबही ॥
मन पर्जय अबरन उगि आवै । सो मन पर्जय ज्ञान छपावै ॥
प्रकटे केवल ज्ञाना वरनी । केवल ज्ञान गोप तिह करनी ॥
मतिश्रुति औधअरुमनपरजाई । केवल ज्ञान पंच विधि गाई ॥
मति ज्ञान सो नाम बताई । मति बुधिते जेती चतुराई ॥
कारीगरी अरु गुन गन जेते । मति ज्ञान करि ल्हिये तेते ॥
द्वितिये श्रुति ज्ञानजिहि कहई । सर्व शास्त्र मुख पाठ जो रहई ॥
तीन काल देखे श्रुति द्वारा । जाने सकल अचार विचारा ॥
श्रुति केवल ज्ञानी कह सोई । पूरन जो श्रुति ज्ञान ते होई ॥
श्रुतिके बली जो पंडित पूरा । श्रुति द्वारे संशय कर दूरा ॥
तृतिये औध ज्ञान जब होई । मनकी बात जाने सब सोई ॥
जाके मनमें जो कछु भासा । सब औधते होय प्रकाशा ॥
चौथे कह मन परजय ज्ञाना । जो मनकी परजायको जाना ॥
जहाँ जहाँ मन छन २ करदौरा । जो कछु फुरै जाय जिहि ठौरा ॥
मन परजय सो सबही जानो । सूक्ष्म गति मन कछु नदुरानो ॥
पंचम केवल ज्ञान कहावै । ताकी उदय मुक्ति जिव पावै ॥
केवल ज्ञान जो हृदय प्रकाशा । सकल भर्म भयकेर विनाशा ॥
( ५४ )
बोधसागर
केवल ज्ञानी साधू जोई । गुप्त बस्तु तिनते नहीं कोई ॥
पंच पौरि जो ज्ञानको कहिया । ताको ऐसो लेखा लहिया ॥
मति ज्ञान जिहि पूरन होई । श्रुतिज्ञान अधिकारी सोई ॥
श्रुति ज्ञानते औध गहावै । औधते मन पर्जय जगिश्नावै ॥
मन परजयते केवल ज्ञाना । मतिश्रुतिऔधजोप्रथमबखाना ।
तीन पौरि लो भ्रम नहीं दूटै । चौथ पौरिते पंचम जूटै ॥
तीन ज्ञान लो हो अरु जाई । मन पर्जय नहीं फिर बिनशाई ॥
मन परजय अरु केवल ज्ञाना । होके बहुरि न कबहुँ लुपाना ॥
याहुमें विधि बहुत बखाना । पौरिहुको नहीं कछु बंधाना ॥
अकसमात कबहुँ अस होई । बिना औध केवल लह लोई ॥
बिन मन पर जयकेवल ज्ञाना । निर्णय जैन धर्मपर माना ॥
ज्ञानावर्ण ते ज्ञान न होई । अवरन भंजि लाभ हो सोई ॥
ज्ञानावरनी पंच बताओ । बहुरि दर्शना वरनी गावो ॥
इति
अथ दर्शना वरनी कर्मकोना प्रकृति वर्णन--चौपाई
द्वितिय दर्शना वरनी पहारा । जाके ओट अलख कर तारा ॥
चक्षु दर्शना वरनी जो बंध । जोजिव करै होयसो अंधा ॥
अक्षर दर्शना वरनी जाही । शब्द परसरस व्यौरा नाही ॥
औध दर्शना वरनी उदोता । विमल औध दर्शन नहीं होता ॥
केवल दर्शना वरनी जाहा । केवल दर्शन होय न ताहा ॥
ध्यान अरुझि निद्रामें परई । सो प्रानी विशेष बल करई ॥
उठि उठि चले करे कछु बाता । करे प्रचंड कर्म उत्तपाता ॥
निद्रा निद्रा उदय पुकारी । सके न सो जिव पलकउघारी ॥
प्रचला प्रचला जबलो गहई । चंचल अंग लार मुख बहई ॥
निद्रा उदय जीव दुःख भरता । उठै चले बैठै गिर परता ॥
जनधर्मबोध
( ५५ )
रहै आँखि प्रचलाते बांधी । आधी बंद खुली रह आधी ॥
सोवत माहँ सुरति कछु रहई । बार बार लछु निद्रा गहई ॥
इति
अथ वेदिनी कर्म द्विविधिवर्णन--चोपाई
कर्म वेदिनी द्वे विधि हुवा । साता एक असाता दूवा ॥
साता कर्म उदय जब होई । जीव विषय सुखवेदक होई ॥
कर्म असाता उदय जो होई । जिव वेदै दुख खेदत होई ॥
इति
अथ मोहनी कर्म द्विविधि वर्णन--चोपाई
दो विधि मोहनी कर्म बखानी । यक दर्शन यक चारित हानी ॥
दर्शन मोह दुविध उच्चार । चारित मोह पचीस प्रकारा ॥
प्रथम मोह मिथ्या ती होई । जिव जब और कि और गहोई ॥
दूजे मोह मिश्रकी चाला । सत् असत् गहै समकाला ॥
तृतीय मोह समकित कहीदीनी । जिन मलीन सम कितकह कीनी ॥
दर्शन मोह त्रिविध यह भाषा । सुन पचीस अबचारितशाखा ॥
प्रथमै सोलह कहो कषाई । फिर नौविधिको लेखलखाई ॥
प्रथम कषाय क्रोध कहि दीजै । जाकी उदय क्षमा गुन छीजै ॥
द्वितीय कषाय मान परचण्डा । बिनय बिनाश करे सतखण्डा ॥
द्वितीय कषाय है माया रूपी । जाकी उदय सरलता गूपी ॥
चौथे लोभ कषाय प्रकाशा । जासु उदय संतोष बिनाशा ॥
येही चार कषाय कहीजै । अनुक्रम सूक्ष्म थूल गहीजै ॥
सो चारो चौगुना करीजै । ताते सोलह भेद भनीजै ॥
अनन्ता अनबाँधिया कषाई । तासु उदै नहिं समकित थाई ॥
जाको कहिये प्रत्याख्यान । तहां सर्व संयमकी हानी ॥
उदय अप्रत्याख्यान होई । सो पञ्चम गुन थान करखोई ॥
जोत ज्वलन नाम कहलावै । यथा ख्यात चारित विनशावै ॥
( ५६ )
बोधसागर
क्रोध मान माया अरु लोभा । चारो चार चार विधि शोभा ॥
यह कषाय षोडश विधि बाना । नौकषाय अबनिज चितधरना ॥
राग द्वेषकै हासी होई । हास्य कषाय कहावै सोई ॥
मगन होय जबजिव सुखमाही । रति कषाय रस बरनौ ताही ॥
कछु न सोहाय जीवको जहवाँ । अरति कषाय बोलिये तहवाँ ॥
थर हर जहाँ जीव कँपाई । भय कषाय सो नाम धराई ॥
रुदन विलाप वियोग दुखारी । जहाँ होय सो सोग विचारी ॥
जहँ गलानि उपजै मनमाही । सो दुग्धा रोग कहाही ॥
त्रिविधि वेद स्थिति वर्णों सोई । नर अरु नारि नपुंसक जोई ॥
प्रथमैं सोई करिये वर्णन । जीव पुरुष वेदीको लक्षण ॥
यथा अग्नि तृण मूला केरी । शिखा उत्तंग तासुकी हेरी ॥
अल्पकाल अति आतप ताई । अल्पै काल माह विनसाई ॥
पुरुष वेद धारी जिव ऐसे । धर्म कर्ममें रह नित जैसे ॥
महा मगन तप संयम माहीं । तन तावै तनको दुःख नाहीं ॥
चित औदार उद्भूत परमाना । पुरुष वेद धर आतमरामा ॥
बनिता वेदी बहुरि कहींजै । जिमि कोइलाकी अग्नि गहीजै ॥
जिमि कोइलाकी अग्निहोतीखी । परकट धुवाँ न तामैं दीखी ॥
सिलिगिसिलिगि उरअंतरदाहा । रहै निरन्तर अति अवगाहा ॥
तिमि बनिता वदी नर होई । मीठी बोल बोलता सोई ॥
बाहर ताकी मधुरी बानी । भीतर कपट छिद्रछल सानी ॥
कपटलपट करिके अधिकारी । निजगलकुगतिको बंधन डारी ॥
पापकर्म औरनको सिखई । सबको अंध करे सो विषई ॥
आपा हनि औरनको हनता । निज कुमंत्र बहुतनते भणता ॥
बनिमा वेदी ऐसो गुनिये । तृतीय नपुंसक वेदी सुनिये ॥
नगनदाह सम प्रकट न दीसा । गुप्त पजावा अग्नि सरीसा ॥