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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

( १६ )

बोधसागर

ताकर सुत देवसि जो भयऊ । अपना सुतहि पढ़ाया लयऊ ॥
उन्ह लै सुत इक्ष्वाकुहि दीन्हा । प्रगट फिर काहू नहि कीन्हा ॥
यतिक दिवस जो रहेउ समाई । अब तुम कहैं मैं आनि सुनाई ॥
और ज्ञान यहि सम नहि होई । सुरति लौरति लै देखहु सोई ॥
तब अर्जुन पूछेउ अस बाता । तुम तौ भये यहि युग उतपाता ॥
सूर्य को आदि युग गयऊ । तुम सो गयउ उन्ह ज्ञान पयऊ ॥

श्रीभगवानुवाच

कहै कृष्ण सुनु वचन प्रमाना । जो मैं तोहि सुनावों ज्ञाना ॥
मैं तो सदा रहों जगमाहीं । तुमहु रहौ हमारे पाहीं ॥
जन्म अनेक तेरो चलि गयऊ । जन्म अनेक मेगे पुनि भयऊ ॥
तैं अचेत माया में बंधा । मैं निर्मल जस पूरण चन्दा ॥
जन्म जन्म के गुण मैं जानौ । अपनो तेरो गुण पहिचानौ ॥
आदि अंत सकलौ मैं जानौ । ताते यतना भेद बखानौ ॥
तै है काम क्रोध अधिकारा । नहि बूझै तैं चरित हमारा ॥

अर्जुन उवाच

पुनि अर्जुन अस पूछन लयऊ । कारण कवन जन्म तुम धरेऊ ॥
निह इच्छा तुम अंतर््यामी । काहे आवागमन समानी ॥
तुम्हारे दुष्ट मित्र नहि कोई । कारण कवन जन्म धर लेई ॥

श्रीभगवानुवाच

कहै कृष्ण सुनु परम पियारे । धरणी माँह पाप होइ भारे ॥
बहुत अधर्म होन जब लागे । वसुधा भार मही उठि लागे ॥
जब जब देखौं महि पर भारा । तब तब आनि लेउं अवतारा ॥
जन्म कर्म लै खेलौं जगमें । करि संहार जो रहौं अलग में ॥
मेरी गति मति कोइ न जानै । महिमा चारौ वेद बखानै ॥
होइ निष्कपट जो मोहक ध्यावै । महा अनंद परम निधि पावै ॥

उग्रगीता

( १७ )

जो मोसों कोइ अंतर राखै । कै २ दंभ भक्ति मन भाखै ॥
ता कई काल बहुत दुख देई । दंभी भार बहुत शिर लेई ॥
मैं हूँ तासों अंतर राखौं । कबही तासों निकट न भाखौं ॥
ताते तुम मोहक पहिचानौ । मेरो कहा सदा तुम मानौ ॥
तब अर्जुन बोले अस बानी । मर्म तुम्हार न काहू जानी ॥
करन करावन तुमही स्वामी । केहि कारण पृथ्वी अकुलानी ॥
तुम काहेको मारण आवौ । केहि कारण तुम भार चढ़ावौ ॥
तब अस बोले कृष्ण सुजाना । मर्म आपनो कहौं बखाना ॥
तीनि लोक जो राज हमारा । ताते रचौं खेले विस्तारा ॥
बहुत भांतिकै ख्याल बनावौं । खेलि ख्याल पुनि ताहि मिटावौं ॥
तीनि लोक मैं आवौं जावौं । निर्गुण सगुण जु नाम धरावौं ॥
जो जन भक्ति हमारी करई । मन वच कर्म मोहि चित धरई ॥
तेहि कह महु सहायक होऊँ । उन्हके दुष्टहि मारि बिगोऊँ ॥
सदा रहौं भक्तन हितकारी । तारण तरण है नाम सुरारी ॥
अर्जुन बहुरि जो पूछन लागे । इंद्री जीति सबै गुण त्यागे ॥
करन करावन कहवौ स्वामी । तुम पूरण हौ अंतर््यामी ॥
काहे सेवा पूजा लावै । देवि देवता बहुत मनावै ॥
देव पितरको पिण्ड जो भरई । केहि कारण बंधनमें परई ॥
तीरथ व्रत बहुतै तुम धावै । केहि कारण तुम नाम धरावै ॥
सुनु अर्जुन मैं कहौं बखानी । मेरी मति गति विरले जानी ॥
जग रचना स्थिर नहि पावै । ब्रह्म अज्ञान विराग उठावै ॥
कोइ काहूकी शंक न मानै । आपु आपुमें ब्रह्म बखानै ॥
सब व्यवहार जगतके चाहौं । राज काजमें वोर निवाहौं ॥
तब यह कर्म दृढावौ आई । तौन सृष्टि तुम कस उरझाई ॥

( १८ )

बोधसागर

चारि चरण तब परकट कीन्हा । कर्म धर्मपुनि ता कह दीन्हा ॥
ताते पूजा हम ही थापो । देवन महाँ हम ही आपो ॥
पूजत मोहि देखै संसारा । बहुते भाँति तब पूजा धारा ॥
तीर्थ व्रत जप तप गहि लीन्हा । ताकर फल संसारहि दीन्हा ॥
फल कारण सब जग अरुझाना । देवी देव रहे लपटाना ॥
जैसा करै तैसा फल पावै । दान पुण्य बहुते मन लावै ॥
ब्रह्म ज्ञान विनु मोहि न जानै । ताते चौरासी अरुझानै ॥
आवै जाई जगत मझारा । पशुवा शूकर श्वान सियारा ॥
चौरासी योनीमें फिरई । बडे भाग नर देही धरई ॥
जो कोइ भक्त मोहि न चितलावै । मोक्ष मुक्ति परम पद पावै ॥
मन संकल्प विकल्प ते त्यागै । तब यह पूरण तंतुहि लागै ॥
यज्ञ कर्म सब विधि व्यवहारा । ताते भव जल उत्तै पारा ॥
द्रादश यज्ञ कर्म है भाई । जेहिते महा परम सुख पाई ॥
सो अब तुमसों कहौ बखानी । यज्ञ कर्म करै जो प्राणी ॥
प्रथमें ब्रह्म यज्ञ है भाई । ब्रह्म सउज लै ब्रह्म अपराई ॥
ब्रह्म अग्नि होम ब्रह्म देई । सब विधि ब्रह्म जानिके लेई ॥
दुतिया यज्ञ देव यज्ञ करावै । देवि देवता बहुत मनावै ॥
सब साउज लै होम करावै । यहि विधि जन्म सफल सो पावै ॥
तीसर यज्ञ संयम करु इंद्री । साधै भूख प्यास औ निंद्री ॥
पांच पचीश गुप्त लिये खेले । मनुवा निशि दिन प्रभु सो मेलै ॥
चौथ यज्ञ संयम औ आतम । अभ्यंतर चीन्है परमातम ॥
आतम परमातम जब जानै । यहि विधि भेटै श्री भगवानै ॥
पँचयें द्रव्य यज्ञ जो होई । करि महि रक्षा साधु रसोई ॥
बहुत भांतिकै साधु जेवावै । तेहि पीछे वह भोजन पावै ॥
जस कीरत होवै संसारा । ताकी गति वैकुंठ सवारा ॥

उग्रगीता

( १९ )

छठये यज्ञ तपस्या भाई । आगिल जन्म राज कर पाई ॥
सतयें यज्ञ योग जो साधै । आसन मूल पवन अपराधै ॥
पूरण योग होइ जो कोई । काल त्रास कह जाने सोई ॥
जब लगि चाहे काया राखै । फिरि जन्मै तो योग अभिलाषै ॥
अठयें योग यज्ञ अधिकाई । गीता कथा पाठ करै भाई ॥
पोथी पढ़ि गुरु मारग गहई । सो भवसागरते निर्वहई ॥
नवयें ज्ञान यज्ञ है भाई । ज्ञान ध्यानमें रहै समाई ॥
दशयें यज्ञ जो प्राण पयाना । यह नारम जो रहै लपटाना ॥
एकादश है संयम सारा । सूक्ष्म भोजन करै जेवनारा ॥
देहीको मिथ्या करि जाने । प्रभु पूरण अन्तर पहिचानै ॥
द्वादश यज्ञ विधि नाम कमावै । योग युक्ति सब जानि जो पावै ॥
यहि विधि द्वादश यज्ञ हैं भाई । जो कोई करै परम हित लाई ॥
सो भावसागरते तरि जाई । विष्णुलोकमें जाइ समाई ॥
अर्जुन तुम तौ भक्त हमारे । बहुत उजागर प्रेम पियारे ॥
माया मोह चितते तुम डारो । धनुष बाण तुम वेगि सम्हारो ॥
चतुर्थाध्याय कहेउ तुम संगा । यज्ञ योग नाम सब अंगा ॥

कबीर उवाच

धर्मदास तुम संत सुजाना । सत्य शब्दका मर्म जो जाना ॥
यह तो धर्म कर्म व्यवहारा । कहा करै जिन शब्द संभारा ॥
शब्द इमार भेद टकसारा । जो बूझै सो उत्तरे पारा ॥
मुक्ति होइ सत्यलोक सिधावै । तीनि लोक बंधन मुक्तावै ॥
तीनि लोक जग आवागवना । अधर लोक है सतगुरु भवना ॥
इच्छा रूप फिरै जन मुक्ता । जहाँ पुरुष समीप संयुक्ता ॥
तहैं कर वर्णन कहा बखानों । गूँगेको सपना सम जानों ॥

( २० )

बोधसागर

छन्द-लोक उपमा कहा दीजै जगतमें कछु नाहिं हो ।
पुरुष पटतर कहा दीजै ससृजियों मन माहिं हो ॥
नदी अठारह गण्डका रेणुका भरिपूर हो ।
पुरुष शोभा अग्र आभा एति सूर्य झूर हो ॥

सोरठा-पुरुष रूप अपार, कहतै शोभा ना बने ।
चीन्हो शब्द हमार, जेहिते पुरुष परसि हो ॥

इति श्रीमदुग्रगीताब्रह्मज्ञानयोगमते कवीरधर्मदाससंवादे

द्वादशयज्ञव्याख्यानो नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥

अथ पञ्चमोऽध्यायः

श्रीकृष्ण उवाच

अर्जुन तुम हो भक्त हमारा । तुम्हरो काज करौ मैं सारा ॥
ज्ञान ध्यानमें मन तन देहू । निशिवासर सुमिरनकै लेहू ॥
ज्ञानवन्त जो है तत्त्वज्ञानी । तिनकी महिमा अवर न जानी ॥
हर्ष शोक जाके नहिं होई । काम क्रोध सो लिप्त न सोई ॥
कर्म करै करता न कहावै । अभ्यन्तर मारग चितलावै ॥
इंद्री आपु आपु सुख चाहै । ताके कबहुँ निकट न बाहै ॥
इंद्री कर्म सदा होय भाई । ताके लिप्त न होवे भाई ॥
तिनसों कर्म करै जो कोई । परमात्म कह लाग न सोई ॥
सम दृष्टी होय सर्व निहारै । सर्व योनिमें ब्रह्म विचारै ॥
ऐसो जो कोइ प्राणी होई । जीवन मुक्त कहावै सोई ॥
काम क्रोधमें यह जग बंदा । ज्ञान न उपजै मूरख अंधा ॥
निशिदिन ताहि मोह भरमावै । बहुरि बहुरि पाछे पछितावै ॥
नारी सुत हित बन्दन लाया । धनसो मन जो बहुत लगाया ॥
अंतकाल कोइ काम न आवै । होइ बिछोह पाछे पछितावै ॥
अन्तकाल जब संकट आवै । कालके हाथ सो कौन बचावै ॥

उग्रगीता

( २१ )

रोवै बहुत भांति तेहि कारण । सुये न जीवै बहुत पुकारण ॥
प्रभु हिरदय नहिं सूरख जाने । मृतक आशा लागि भुलाने ॥
मृतक रोवैं भला न मानै । फिर यमराजा संकट ठानै ॥
लोगन घरतै बाहर कीन्हा । की जारै की माटी दीन्हा ॥
मृतक रूप बनी यह देही । करि ले प्रीतम प्रेम सनेही ॥
जगके बन्धन जगमें छूटै । बहुत त्रास तेहि यम धरि लूटै ॥
इन मों कहा मोह चितलाया । प्रभु इच्छा नहिं सूरख पाया ॥
काकर पिता पुत्रको होई । नारी सुत हित लागे सोई ॥
ता कारण यह दुख सुख मानै । अज्ञानी नहिं प्रभुको जाने ॥
कबहु न सुमिरण प्रभुका करई । निशिदिन ज्ञान ध्यान परिहरई ॥
ताते बहुत भांति दुख पावै । प्रभुकी शरण न कैसेहु आवै ॥
यह तौ लक्षण जग व्यवहारा । ताते बूड़े मूढ गवौरा ॥
अर्जुन कर्म योग है नीका । संशय मेटो सकलौ जीका ॥
कर्म करै शिर अपने लेई । कारण करतामें चित देई ॥
आपन कर्म धर्म नहिं छोडै । दुख सुख प्रभु इच्छा शिर वोडै ॥
सदा अनन्द रहै सुख बासा । अन्तकाल वैकुंठ निवासा ॥
क्षत्रिय धर्म तोहार जौ होई । करौ संहार शत्रु पुनि सोई ॥
तुम्हारे लरे सबै कोइ लगि हैं । ना तो निंदा तुम्हरी करि हैं ॥
धर्म छांड़ि जनि पातक लेहू । युद्ध करनको मन चित देहू ॥
कर्म संन्यास पञ्च अध्यायी । अर्जुन सुनि मन दुविधा आयी ॥
युद्ध करो की ज्ञान विचारौ । केहि विधि अपनो जीव उबारौ ॥

कबीर उवाच

धर्मदास यह काल तमासा । तासो चाहै मुक्ति निवासा ॥
ज्ञानी अज्ञानी भरमावै । धर्म अधर्म दोष ठहरावै ॥
धर्म अधर्म काल की पाशा । ताते न्यारा शब्द प्रकाशा ॥
कर्म अकर्म मध्य है सोई । तुम जाने जाने सब कोई ॥

( २२ )

बोधसागर

सद्गुरु संधि लखै को पारा । निराधार है अधर अधारा ॥

छन्द-गमि अगमि सद्गुरु लखायो निअक्षर सो पास है ।

कली फूलैं बास धावै ऐसो शब्द निवास है ॥

फूल तिल जब संग कीन्हों सुवस बासा तब भई ।

हंस बासा शब्द लीन्हो शब्द रूपी सो सही ॥

सोरठा-शब्द मता है सार, सुर नर सुनि जानैं नहीं ।

अंधा अध अचेत, अंधेरे न सुरति आने नहीं ॥

इति श्रीमदुभगीताब्रह्मज्ञानयोगमते कबीरधर्मदाससंवादे

कर्मसंन्यासग्याख्यानो नाम पंचमोऽध्यायः ॥ ५ ॥

अथ षष्ठोऽध्यायः

श्रीकृष्ण उवाच

छठे अध्याय ध्याय है योगा । सुनु अर्जुन मैं कहौ संयोगा ॥

जब लगि ध्यान योग नहिं करई । तब लगि निर्मल चित नहिं करई ॥

ध्यान योग योग निजु साधै । मन वच कर्म नाम अवराधै ॥

मन संकल्प विकल्प न जाके । दीन वचन कठोर न ताके ॥

निस्तरंग कछु उठै न इच्छा । सबमें पारब्रह्म उत पेच्छा ॥

पांच पचीश न कबहूँ धावै । निशिबासर प्रभु संग रहावै ॥

पांचौ इंद्रिय लिप्त न होई । ऐसे साधु विरले कोई ॥

गृहस्त जीवन में बासा लेई । उत्तम ठौर कुटी कर देई ॥

मानुष तहां दृष्टि नहिं आवै । आसन उत्तम तहां बिछावै ॥

प्रथम धरणी पर धरे मृगछाला । तापर कुश साथरी रसाला ॥

तेहि पर बैठे हठ करि आसन । कैसो भांति न होइ उदासन ॥

खंभा सम आसब हठ आसन । सुरतिनिरति ले नाम संभारन ॥

जो यतने में आतम दरसइ । सो ज्ञानी प्रभु पूर्ण परसइ ॥

ऐसे जो कोई ध्यान लगावे । बहुरि योनि संकट ना आवे ॥

उग्रगीता

( २३ )

साधै निद्रा हार व्यवहारा । बहुत न मूदे नैन उघारा ॥
संयम कै सो साधन करई । सो साधू आपहि निस्तरई ॥
मन कह ज्ञान ध्यान में राखै । सुरति निरति सो अमृत चाखै ॥
जो मन अन्त न धावा चाहे । घेरि घेरि अभ्यन्तर बाहे ॥
तब अर्जुन अस पूछन लागे । यह मन चञ्चल पल पल भागे ॥
यह तौ काहू जाइ न पकरा । कौन उपाय जाइ मन जकरा ॥
गगन वाइ जो गर्जत आवै । कैसे गगरी माहि समावे ॥
यहि विधि मन चञ्चल यह भाई । तौ कैसे यह पकरन पाई ॥

श्रीभगवानुवाच

कृष्ण अर्जुन सो कहेउ बुझाई । ऐसे चञ्चल अस्थिर भाई ॥
जो यह मनको साधन करई । अभ्यन्तर लै फिरि २ धरई ॥
चारों दिशा चलन नहि पावै । जबै चलै तब माह समावे ॥
पारब्रह्म देखै तब नेता । दोई अनन्द परम सुख चैता ॥
दीन दुखित कह दाया करई । अपनासा दुख चितमें धरई ॥
दया भावसो हितकर बोले । तूस करै साधुन कह सो ले ॥
परका दुःख नेवारै सोई । ऐसी भक्ति परम गति होई ॥

अर्जुन उवाच

अर्जुन कहै सुनु कृष्ण सुरारी । तारण तरण भक्त हितकारी ॥
ऐसा साधु कोइ ना देखा । आपनसा दुख सब कहपेखा ॥
आपन सुख चाहे सब कोई । औरन दुःख होय सो होई ॥

श्रीभगवानुवाच

अर्जुन जो है परम सनेही । आप निकरि नहि जानहिदेही ॥
पर सुख कारण आपु निरासा । दुख सुख देखै सकल तमाशा ॥
भक्ति करै जो मन चित लाई । ताते परम पदहि में जाई ॥
निर्गुण साधु जो पूर्ण ज्ञानी । ताकी महिमा वेद बखानी ॥
वेद पुराण ते अधिक है सोई । ताकी पटतर वेद न होई ॥

( २४ )

बोधसागर

वेद भाव संसार पसारा । परमभक्ति है अगम अपारा ॥
तुम हू भक्ति करौ मन लाई । छांड़ौ माया मोहहि भाई ॥
छठौ अध्याय इहां लगु कहिया । आतम संयम योग जो रहिया ॥

कबीर उवाच

कहै कबीर यह आतम जानी । इतने अधिक बखानों ज्ञानी ॥
धर्मदास तुम ज्ञान उजागर । तुम तौ बसि हौ सुखके सागर ॥
यह करनी जो कृष्ण बखानी । यह विधि धरै आतम ज्ञानी ॥
मैं तो ज्ञान अगम तोहि दीन्हा । काल कर्मको पापउ चीन्हा ॥
ताते हंसा हट करि लेऊ । अगम अगोचर दीन्हेट भेऊ ॥
यह मन चञ्चल थिर नहि होई । कैसिहु विधि जो चाहे कोई ॥
ताकी विधि मैं प्रगट सुनाऊँ । मनुवां इस्थिर करि दिखलाऊँ ॥
यह मन पानी रूप सरूपा । बुद्धि धाम पृथ्वी कर रूप ॥
चित जो वाइ सरूपी होई । अहं अज्ञानी रहै समोई ॥
पानी मही बराबरि भाई । चित्त पवन लै आहु उठाई ॥
ज्यों २ पवन चले झक झोलै । त्यों२ मनुवाँ चहुँ दिशि डोलै ॥
ताते यह उपचार सुनाऊँ । मनुवाँ कह अंतर ठहराऊँ ॥
मनु पावना लै त्रिकुटी लेखै । अक्षर सुरति अमीरस चारै ॥
जौ लौ पवन रहित नहि होई । तबलगिमनअस्थिर नहि सोई ॥
गगने पवन रहै पुनि भाई । त्रिकुटी गागरि लेइ समाई ॥
पानी पवन संच जब होई । ब्रह्म अग्नि उपजावै सोई ॥
मन औ पवन होइ जब मेल । परम पुरुष ते होइहि मेल ॥
ना कहुँ आवै ना कहुँ जाई । तब यह मनुवां सहज समाई ॥
छन्द—चलत मनुवाँ अचल कीन्हो पवन अस्थिर जब भई ।
मन पवन जब मला भया अमृत धारा बर्षही ॥

उग्रगीता

( २६ )

जिन्है सतगुरु शब्द मिलिया अमी सो हंसा पिया ।
अजर अमर शरीर पायो बास सुख सागर लिया ॥
सोरठा-संत करो विवेक, शब्द सार गहु बूझिकै ।
सुरति निरति सो देख, सतगुरु शब्द अपार जो ॥

इति श्रीमदुग्रगीताब्रह्मज्ञानयोगमते कबीरधर्मदाससंवादे

आत्मसंयमयोगो नाम षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥

अथ सप्तमोऽध्यायः

श्रीकृष्ण उवाच

कृष्ण कहैं अर्जुन सुनि लीजै । भक्ति हमारी मन चित दीजै ॥
सतये अध्याय जो तुमसों कहउँ । भक्तनमें हितकारी रहउँ ॥
मैं ही करौं करावौं भाई । तीनि लोक जहँ लगि निर्माई ॥
मैं संधारौं मैं प्रतिपारौं । चौदह भुवन पलकमें टारौं ॥
जहँ लगि पशु पक्षी जिव होई । मैं सबही मैं रहौं समोई ॥
दानपुण्य आदिक सब माहीं । बनज व्यापार करै सब पाहीं ॥
देवी देव सकलौं मैं सब ही । भवसागर सकलौं जग हम ही ॥
तीनि लोकमें विजय मैं सारौं । जब चाहौं तब बेर संधारौं ॥
करौं संधार सृष्टि पुनि सोई । रहौं अलेप निरंजन होई ॥
सगुणते निर्गुण मैं होइ जाऊं । फिर चाहौं सगुण होइ जाऊं ॥
सगुण औ निर्गुण रूप हमारा । जहिंते सृष्टि रच्यो व्यवहारा ॥
अर्जुन सबमें मोही जानो । कहा हमारा निजकै मानो ॥
चारि प्रकार भक्ति जो होई । तामें ज्ञानी अधिक सो होई ॥
रोग दुःखमें भक्ति जो करई । दुख कारण जो मोहि सुमिरई ॥
दीन दुखी निशिदिन लव लावै । कब प्रभु मोकहैं भोग भोगावै ॥
द्रव्य चहै जो द्रव्यहि स्वारथ । ज्ञानी चाहै मुक्ति पदारथ ॥

( २६ )

बोधसागर

ज्ञानी सदा मोहि पहिचानै । मेरी भक्ति सदा सुख मानै ॥
ज्ञानी अधिक ताहिते होई । भक्ति हि हेतु अधिक है सोई ॥
अज्ञानी मोहि नर ही जानै । अलख रूप मोहि नहिं पहिचानै ॥
पूर्ण ज्ञान होइ जब भाई । तब ही निर्गुण अलख लखाई ॥
देवी देवा सब नर पूजै । तिनहींको करता करि बूझै ॥
उनकी प्रीति देव होइ जाऊं । उनकी मनकामना पुराऊं ॥
कोइ न बूझै ख्याल हमारा । रहउँ सृष्टि पुनि करें संघारा ॥
ज्ञान विज्ञान योग जो होई । सतवांध्याय सुनायो सोई ॥

कबीर उवाच

कहै कबीर जगकरता आही । धर्मदास तुम चीन्हौ ताही ॥
पुरुष तीन लोक यह दीन्हा । तीनिहुँ लोक राज इन कीन्हा ॥
सब जग माँहि कर यह राजू । मन इच्छा कर सबका काजू ॥
इनते मुक्ति कहौ कस होई । देखहु आतमज्ञान कैसोई ॥
इनते मुक्ति होइ जो साजा । देह धरावै कवने काजा ॥
धर्म अधर्म जीव अरुझाया । आवागमन महा दुख पाया ॥
आवागमन न छूटै भाई । तीनिलोक राखै लपटाई ॥
धरि अवतार जबै जग आवै । सकल सभा ऐसी हि भरमावै ॥
सृष्टि जहां लगि है संसारा । ऐसी भांति सब अवतारा ॥
काहू मुक्ति होइ नहिं भाई । राम कृष्णते को बड आही ॥
उनहू आवागमन न छूटै । धर्मराज फिरि २ जग लूटै ॥
धर्मराज यह खेल पसारा । औघट घाट मूँदि सब द्वारा ॥
तीन लोक ते जाने न पावै । स्वर्ग मृत्यु पाताल रहावै ॥
धर्म कर्म ते स्वर्ग हि जाई । धर्म घटे मृत्यु मंडल आई ॥
जैसे घरिया रहट सुभाऊ । ऊँचे नीचे फिरि २ आऊ ॥
बन्धनते छूटै नहिं पावै । ऐसे जीव सदा भरमावै ॥

उग्रगीता

( २७ )

सद्गुरु चौथे लोक निवासा । मिलै अँकुरी जो निजदासा ॥
सार शब्द है तेहि पहुँचाऊँ । तीनि लोक बन्धन मुक्ताऊँ ॥
पावै सार शब्द निज बीरा । पहुँचै लोक जब छुटै शरीरा ॥
यमराजा तेहि निकट न आवै । चौरासी ते जीव छोडावै ॥
सार शब्द गहै निज डोरी । उतरे हंसा घाट करोरी ॥

छन्द-धर्म सेवा बहुत कीन्हो पुरुष दीन्हो राज हो ।

लोक तीनों राज पायो गर्वते अति गाज हो ॥

घाट अवघट सबै भूँदो कतहुँ नाहिं निकास हो ।

पुरुषते दुइ ठानिकै सब जीव राखो पास हो ॥

सोरठा-ऐसी युक्ति बनाई, पाप पुण्य फंदा रच्यो ।

चले लोक सो जाइ, सद्गुरु शब्द प्रताप जेहि ॥

इति श्रीमदुग्रगीताज्ञानयोगमते कबीरधर्मदाससंवादे

ज्ञानविज्ञानयोगो नाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥

अथ अष्टमोऽध्यायः

अर्जुन उवाच

अर्जुन कहै सुनौ प्रभु मेरे । मैं तो अधीन सदा हौं तेरे ॥

कहौ बखानि ब्रह्मको आही । सो निज भेद कहौ मोहि पाही ॥

अध्यातम तुम कहौ बुझाई । कर्म नाम काहैको रहाई ॥

अदभुत रूप बखानौ सोई । कछु मोसों जनि राखौ गोई ॥

अर्धनाम कहावै सोई । अर्धनाम जग काकर होई ॥

श्रीकृष्ण उवाच

कहैं कृष्ण सुनु अर्जुन भेदा । तुमसों कहौ मैं वेद निषेदा ॥

ब्रह्म सदा जो रहै अविनाशी । और स्मृष्टि सकलौ पुनि नाशी ॥

रहित नाम अविनाशी होई । पूरण ब्रह्म व्यापक है सोई ॥

( २८ )

बोधसागर

ना कहुँ आवै ना कहुँ जाई । सब घट माही रह्यो समाई ॥
नहीं टण्टि देखन महाँ आवै । सकल सृष्टिके माहिँ रहावै ॥
रूप वरण कछु वरणि न जाई । कोटि सूर्य तेहि तेज समाई ॥
तिनका नाम सदा अविनाशी । रहै निरंतर अंतरबासी ॥
अक्षय है सब जक्त पसारा । व्यापक रूप रहा भरभारा ॥
तिनकी भक्ति करे जो कोई । आवागमन कबहुँ नहिँ होई ॥
अध्यात्म आत्म सो ज्ञानी । सबमें ऐकै ब्रह्म समानी ॥
कर्म नाम करता है सोई । दुख सुख कारण करता होई ॥
अद्भुत रूप सरूप है भाई । तेहि समान रूप नहिँ भाई ॥
कोटि सूर्यको तेज समाही । अर्द्धदेव सब देवन माही ॥
रहो समाइ जो सकलौ छाई । अर्द्धनाम सकलौ जग लेई ॥
व्यापक सदा सकलमें सोई । महा प्रलय जब आवै भाई ॥
लै सौ वर्ष अवधी रहई । रेनि दिवस छै मास जो होई ॥
दिवस एक देवन कर सोई । छः मास अवर जब जाई ॥
राति एक ताकर होइ भाई । ऐसे वर्ष दिवस नर होई ॥
दिवस एक देवनकर सोई । तासे मास वर्ष गनि लेई ॥
ऐसे वर्ष देवकर कहिया । अहनिशि एक ब्रह्म पुनि तहिया ॥
दिवस एक ब्रह्माकर होई । चारि पहर चारिउ युग सोई ॥
रातिउ ऐसे जान सुभाऊ । बरतै चारिउ युग पर भाऊ ॥
दिवस औ राति जब ऐसो जाई । पक्षमास पुनि वर्ष कहाई ॥
सात वर्ष ब्रह्मा पर वानी । काल आइ सो करै तब हानी ॥
ब्रह्म प्रलय जब आवइ भाई । रोमस रोम परै खहराई ॥
जब २ प्रलय काल जब आई । एक रोम रोमस गिरिजाई ॥
बहुत प्रलय ऐसे चलि गयऊ । आदि अंत काहुँ नहिँ पयऊ ॥
अष्ट अध्याय जो कहा बखानी । अक्षर ब्रह्म योग है ज्ञानी ॥

उग्रगोत्रा

( २२ )

कहै कबीर सुनु धर्मनि धीरा । ब्रह्म भेद तुम गहिर गभीरा ॥
जो यह कछु प्रभाव बखाना । पै निर अक्षर भेद न जाना ॥
जो निर अक्षर भेद न जानै । कैसे सार शब्द पहिचानै ॥
जो निर अक्षर भेद हि पावै । सो त्रिलोक बंधन मुक्तवै ॥
अक्षर सार अपार जो होई । बिनु सत गुरु पावै नहि सोई ॥
सतगुरु मिलै शिष्यको जबही । सार शब्द पावै पुनि तबही ॥
हंस रूप ताकर पुनि होई । सो तौ हंस निनारा सोई ॥
यह जाने नहि ताकर भेदा । कितनौ पढ़ै नर चारिउ वेदा ॥
सार शब्दका मर्म न पावै । सो कैसे सत्यलोक सिधवै ॥
जो मानै तेहि लोक पठाऊ । सार निरक्षर अलख लखाऊ ॥
खान प्रवान शब्द टकसारा । यमको चीन्है उत्तरे पारा ॥
घटवारा जब पावै चीन्हा । तब हंसन कह आवै दीन्हा ॥

छन्द--सुरतिमंत जो हंस होवै ताहि दीजै पान हो ।
नत दशौ दिशा घाट रोकै मागि शब्द निशानि हो ।
देखि हैं जब शब्द सांचा चीन्ह पावै लोकको ।
अपने कंधे तेहि उतारैं मेटि संशय शोकको ॥

सोरठा--धर्म हमहि सो कौल, कीन्हो अति आधीन हो ।
हंस शब्द सत बोल, निमिष माहि पहुँचाइया ॥

इति श्रीभदुग्रगीताम्बराज्ञानयोगमते कबीरधर्मदाससंवादस्य-

रयोगव्याख्यानोनामाष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥

अथ नवमोऽध्यायः

श्रीभगवानुवाच

अर्जुन शास्त्र मतो है नीका । कर्म धर्म सब कारज जीका ॥
शास्त्र वेद पुरान जो आही । मन वच कर्म अर्जुन गहु ताही॥

( ३० )

बोधसागर

बहुत लोग मानुष मोहि जानै । दुख सुख व्यापक माही सानै ॥
बड़े भाग सो प्रानी होई । अन्तर पवन रहौं मैं सोई ॥
पवन सकल में बतै भाई । बाहर भीतर फिरै सदाई ॥
लित होइ पुनि रहै निनारा । ऐसा अदभुत खेल हमारा ॥
बहुत साधु एक करि पूजे । सर्व मध्य आत्म कहबूझै ॥
बहुतक प्रीति भाव जो जानै । साहेब सेवा हित कै मानै ॥
बहुतक तीनो देवन मानै । अवर सकल मिथ्या करि जानै ॥
मोकहयहि बिधि जो कोइ ध्यावै । तेहि विधि माह परम सुख पावै ॥
सर्व व्यापक मैं हौं भाई । मोहि विन दूजा और न कोई ॥
मेरे मित्र दुष्ट नहिं कोई । जो ध्यावै पावै पुनि सोई ॥
एक भाव मैं सबसो रहेऊ । जैसे अग्नि भाव सो कहेऊ ॥
जबै काल जड़ आवै भाई । बैठे लोग तापन कह आई ॥
चहुँदिशि लोग अग्नि बिच होई । सब तापै काया नर लोई ॥
अग्नि काहु कै मित्र न जानै । और न काहु दुष्ट हि मानै ॥
सब कह लागै एक सम भाई । ऐसे रहौं मैं सहज समाई ॥
जो कोइ पूजा देवन लावै । सो नर देव के लोक सिधावै ॥
जो ऐसा होइ भक्त हमारा । ता कह पठवउँ स्वर्ग दुवारा ॥
जो कोइ मोसे चित्त लगावै । सुख संपति बहु शोभा पावै ॥
ऋद्धि सिद्धि बहुतैं कै देऊं । आपन कै मैं ताकह लेऊं ॥
सदा सर्वदा बात न हेरूं । दुख संताप ताहि कर फेरूं ॥
अर्जुन परम भक्ति मोहि भावै । जो कोइ मोसों मन चितलावै ॥
नौ अध्याय इहां लगु होई । राज योग गून है सोई ॥

कबीर उवाच

कहै कबीर सुनो धर्मदासा । बहुविधिकृणजो करै तमासा ॥
कर्म धर्म कहि जग समुझावै । अलक पुरुष कैसे लखि आवै ॥

उग्रगीता

( ३१ )

ज्ञानवंत तुम धर्म निआगर । सत सुकृत गहु परम उजागर ॥
करौ विचार संतकी रीती । मन वच करु सतगुरु परतीती ॥
इन्ह तौ शास्त्र ज्ञान विचारा । कम फंद जीवनह सब डारा ॥
कोइ भक्ति जो इनकी करई । ऋद्धि सिद्धि सुख संपति लहई ॥
बहुत भांति तेहि देइ बड़ाई । राज पाट इन्द्रासन लाई ॥
आवागवन न मेटा जाई । बहुविधि चीन्हो मन चितलाई ॥
दाता भुक्ता होवे आपै । पै कोऊ नहि छूटा पापै ॥
आवै जाइ सकल जग लोई । कबहुँ न छूटै बंधन सोई ॥
बहुविधि चीन्हो मन चितलाई । आवागवन न मेटा जाई ॥
बंधन सतगुरु तुम्हरो तोरा । तुम कह नहि व्यापै यमचोरा ॥
सतगुरुका है पंथ अपारा । जो बूझैं सो उतरे पारा ॥

छन्द-धर्मदास तुम बूझि देखो भेद सतगुरु अगम है ।

तीनि लोक अरुझाइ कारण वेद शास्तर सो कहै ॥

बूझि देखो अंग सब मैं आयों तोरन फंदको ।

हंसको मुक्ताय यमसो मेटिहौ दूख द्वंदको ॥

सोरठा--सतगुरु शब्द अपार; वार पार कोइ ना लहै ।

हंस शब्द आधार, ताहि मुक्ति पाछे फिरै ॥

इति श्रीमदुग्रगीताब्रह्मज्ञानयोगमते कबीरधर्मदाससंवादे

राजदिवाराजगुणयोगोनाम नवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥

अथ दशमोऽध्यायः

श्रीकृष्ण उवाच

महाबाहु अर्जुन सुतु भाई । दस अध्याय कहेउँ अर्थार्ई ॥
विभूति योग मैं तोहि सुनाऊं । सकलरूप तोहि वरनि सुनाऊं ॥
जल थल पूरण मैं ही व्यापो । कीट पतंग सर्वमें आपो ॥

( ३२ )

बोधसागर

मेरी गति मति कोइ न जाने । सबै सृष्टि नारायण मानै ॥
ऋषि मुनि देव देवता भाई । उनहू मेरी गति नहिं पाई ॥
मैं तो गति मति सबकी जानौं । व्यापि रह्यो मैं सकल जहानौं ॥
देवि देवता आदि जो मैं ही । ऋषि मुनि सृष्टि अवतार जु लेही ॥
मोहिते आदि और नहिं कोई । सबके आदि करा रचि सोई ॥
पिताकी खबरि पुत्र नहिं जाने । कैसे पितुकी आदि बखानै ॥
आदि अन्तको मेरी पावै । जग रचना सब पुत्र कहावै ॥
विभूति रूप संक्षेप जो कहिया । अर्जुन पूछ कृष्ण पुनि कहिया ॥
सब व्यवहार विभूति सुनावौ । रंचक मोसे कछु न दुरावौ ॥
कृष्ण कहै सुनु कुंतिकुमारा । तोसों कहौं सकल विस्तारा ॥
पहिले सकल जोति जग जो है । शाशि सूर्यकी कीरनि मोहै ॥
सूर्य रूप मेरो है भाई । दूजा भाव जनावौ जाई ॥
शीतल पूरण निर्मल चंदा । है मेरो यह रूप अनंदा ॥
बलीदान यज्ञ जो ठानो । बावन रूप मेरो पहिचानो ॥
सिरजा पवन सबै सुखदाई । मैं ही पवन रूप हौं भाई ॥
चारि वेदमें साम जो वेदा । मेरो रूप सुनो तुम भेदा ॥
व्यास रूप मेरो है भाई । नारद भाव धरउं मैं आई ॥
देवन माहिं इन्द्र पुनि मैं हौं । दानी बलिराजा सो मैं हौं ॥
विषधर माहिं वासुकी हम ही । ईश्वर माहिं महेश्वर हम ही ॥
इन्द्रिय भुक्तौ मनसो मैं ही । राजन माहिं राज करौं मैं ही ॥
मिरगन्ह मध्य सिंह गति मेरी । वृक्षनमें पिप्पल मोहिं हेरी ॥
नदी माहिं हम ही हैं गंगा । समुद्र रूपमें लहरि उतंगा ॥
मुनिवर कपिल हमी हैं भाई । परशुराम योधा हौं भाई ॥
नरसिंह रूप जो मेरो होई । रामचन्द्र तन रूप जो सोई ॥
दत्तात्रय आनंदित रहऊं । ऋषिन मध्य पाराशर अहऊं ॥

उग्रगीता

( ३३ )

जल जीवन जलसाइ कहाई । मेरो रूप सुभाव रहाई ॥
ज्वारिन महाँ मैं जुवा कहावा । जुवा रूप मेरो रूप सुभावा ॥
जहाँ लगि जगमें होइ लराई । मेरो रूप लराई भाई ॥
जग परपंच जहां लग होई । परपंच रूपमें रहौं समोई ॥
वाद विवाद करै जो ज्ञानी । वाद रूप मोकहैं पहिचानी ॥
शंकर रूप मोर है भाई । मृत्युकालमें रहौं समाई ॥
पाप पुण्य धारौं दुइ देही । कर्म धर्म रचना है एही ॥
जग रचना विभूति मेरी होई । जल थलमें मैं रहौं समोई ॥
कहैं लगि वणौं वरणि बखानौं । सब वसुधामें मोहीं जानौं ॥
मोहिं छोड़ि कोइ और न दूजा । तीन लोकमें मेरी पूजा ॥
देवी देवता पूजा लावैं । सो सब पूजा मैं कहलावैं ॥
विभूति रूप अध्याय है दशवां । इह लगि भाव बतायउँ दशवां ॥

कबीर उवाच

कहै कबीर सुनौ चितलाई । धर्मदास तुम लेहु अथाईं ॥
तीनि लोक नायक भगवाना । तिन कह पुरुष दीन्ह रजधाना ॥
ताते क्रीडा करै अनंदा । खेल अनेक खेल गोविंदा ॥
तीनि लोक बाजी दइ राखा । परपंची अपने मुख भाखा ॥
सत्य कहइ सत्य भाव लखावै । करि प्रपंच जीवन भरमावै ॥
जीव जो मूल बीजके आही । इन पाया सब पुरुषके पाही ॥
बीज आदि तिहुलोक जो फूला । आपुहि जानै पुरुषहि तूला ॥
करि अभिमान पुरुष विसरावा । आपुहि पूरण पुरुष कहावा ॥
सर्वमें व्यापक आपुहि रहई । पुरुष भेद नहिं काहु सो कहई ॥
भेद कहैं उजरे पुर तीनो । आपन थापन ताते कीनो ॥
चारिहु वेद नेति जो गावैं । सदगुरु रहित पुरुष बतलावैं ॥

नं. ८ कबीरसागर - २

( ३४ )

बोधसागर

जीव जन्तु राखैँ अरुझाईं । बीज पुरुष जो दीन्हो भाई ॥
जब नहिं बीज पुरुषपहँ जाईं । तबै पुरुष हम कहँ उपजाईं ॥
बीज अंकुरी लोक ले आवौ । धर्मराजते हंस छुडावौ ॥
सेवा वसि वहि दीन्हा राजू । अब मेटी तौ सुकृतहि लाजू ॥
सुत हमार भया वरियारा । जेहि दीन्हों तिहुँलोकके भारा ॥
तुम अंकुरी सेवहु जाईं । बार २ मैं कहौं बुझाईं ॥
ताते मैं संसारहि आवा । पुरुष शब्द टारो नहिं जावा ॥
नाहिं तौ तीनौ लोकहि तारौं । धर्मराज ते सबै उबारौं ॥
जो जन अंश पुरुषके आही । सो सब आवै हमरे पाही ॥
अवर सकलजग काल बसेरा । नित २ प्रलय होत झकझेरा ॥
यहि कर काल पुरुष दियो नामा । तीन लोकते न्यारा धामा ॥
अध्याय एकादश आगे होई । काल सरूप बखानो सोई ॥
धर्मदास मन माहिं विचारो । काल रूप सब भाव निहारो ॥
जो तुम कहौ पुरुषकी आशा । सद्गुरु शब्द करौ विश्वासा ॥
छंद-हंस कारण पुरुष पठयो तबै बिनती मैं कहौं ।
धर्म है अति बली तिहुँपुर सोई दुतिया करि रहौं ॥
जाऊं भवसागरहि जो बहु भांति मोसों युधि करै ।
यह सुनि पुरुषसत्य शब्द दीन्हों धर्मराज जेहि ना डरै ॥
सोरठा-सुनतै शब्द संदेश, सुरति निरति हंसा गहो ।
पूरण पुरुष संदेश, बहुरि धरौ जग देह नहिं ॥

इति श्रीमदुग्रगोतात्रब्रह्मज्ञानयोगमते कवीरधर्मदाससंवादे

विभूतियोगव्याख्यानो नाम दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥

उग्रमाता

( ३६ )

अथ एकादशोऽध्यायः

अर्जुन उवाच

अर्जुन कृष्ण सो बिनती ठानी । हे स्वामी तुम अन्तर्यामी ॥
दश अध्याय तुम वरणि सुनायो। ज्ञान विज्ञान जो मोहि बतायो॥
सन्यासकर्म और वाक्य सुनायो। आतम संयम योग बातायो ॥
प्रवृत्ति निवृत्ति जो मारग भाषा । कर्म योग मन हट करि राखा ॥
यह सब सुनिनिर्मल भयो अंगा । अब मोहि दर्शन भयो उमंगा ॥
होउ दयाल विराट देखावौ । मति मोकहैं तुम दूरि बहावौ ॥
जो मोहिं शक्ति न देखत होई । तौ अब शक्ति दीजिये सोई ॥
तुम ठाकुर हौ अंतर्यामी । अब दर्शन बिन रहौं न स्वामी॥
अहो दयाल कृपा-निधि-सारग । दीनबंधु तुम पतित-उजागर ॥
तब हरि बोले चतुर सुजाना । इन नैनन्ह नहीं दर्शन जाना ॥
तुम तौ हौ निज भक्त हमारे । दर्शन तुम कह देउ पियारे ॥
यह सरूप काहू नहीं देखा । इंद्रादिक सुर नर सुनि शेषा ॥
सो दर्शन तुम देखा चैहौ । तीनि लोक हलकंप बढैहौ ॥
देखौ कालरूप जब मोरा । अर्जुन तुम तब रहौं न ठौरा ॥
डरपो बहुत होइ डर भारी । डरपै लोग सकल संसारी ॥
कहैं अर्जुन सुनु कृष्ण सुरारी । प्रथम देहु हटता मोहि भारी ॥
जो मैं डरौं दरसको करई । विनु मारेही मृतक होइ रहई ॥
सोई दृष्टि मोहि देव गुसाईं । जेहि दरशे परसौं तुम पाईं ॥
दिव्य दृष्टि अर्जुन कहैं दीन्हा । अर्जुन है मम दरश अधीना ॥
धारो रूप अकाश पताला । महा स्वरूप भयंकर काला ॥
माथ अनेक अनेकन्ह नयना । कर्ण अनेक बहुत मुख बयना ॥
नाक अनेक रू दंत अनेका । चितवत दृष्टि मारि है वेगा ॥
निकसि दाढ़ बाहे मुख भारी । तिन देखत जिव नाहिं सँभारी॥