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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

( २४ )

बोधसागर

वेद भाव संसार पसारा । परमभक्ति है अगम अपारा ॥
तुम हू भक्ति करौ मन लाई । छांड़ौ माया मोहहि भाई ॥
छठौ अध्याय इहां लगु कहिया । आतम संयम योग जो रहिया ॥

कबीर उवाच

कहै कबीर यह आतम जानी । इतने अधिक बखानों ज्ञानी ॥
धर्मदास तुम ज्ञान उजागर । तुम तौ बसि हौ सुखके सागर ॥
यह करनी जो कृष्ण बखानी । यह विधि धरै आतम ज्ञानी ॥
मैं तो ज्ञान अगम तोहि दीन्हा । काल कर्मको पापउ चीन्हा ॥
ताते हंसा हट करि लेऊ । अगम अगोचर दीन्हेट भेऊ ॥
यह मन चञ्चल थिर नहि होई । कैसिहु विधि जो चाहे कोई ॥
ताकी विधि मैं प्रगट सुनाऊँ । मनुवां इस्थिर करि दिखलाऊँ ॥
यह मन पानी रूप सरूपा । बुद्धि धाम पृथ्वी कर रूप ॥
चित जो वाइ सरूपी होई । अहं अज्ञानी रहै समोई ॥
पानी मही बराबरि भाई । चित्त पवन लै आहु उठाई ॥
ज्यों २ पवन चले झक झोलै । त्यों२ मनुवाँ चहुँ दिशि डोलै ॥
ताते यह उपचार सुनाऊँ । मनुवाँ कह अंतर ठहराऊँ ॥
मनु पावना लै त्रिकुटी लेखै । अक्षर सुरति अमीरस चारै ॥
जौ लौ पवन रहित नहि होई । तबलगिमनअस्थिर नहि सोई ॥
गगने पवन रहै पुनि भाई । त्रिकुटी गागरि लेइ समाई ॥
पानी पवन संच जब होई । ब्रह्म अग्नि उपजावै सोई ॥
मन औ पवन होइ जब मेल । परम पुरुष ते होइहि मेल ॥
ना कहुँ आवै ना कहुँ जाई । तब यह मनुवां सहज समाई ॥
छन्द—चलत मनुवाँ अचल कीन्हो पवन अस्थिर जब भई ।
मन पवन जब मला भया अमृत धारा बर्षही ॥

उग्रगीता

( २६ )

जिन्है सतगुरु शब्द मिलिया अमी सो हंसा पिया ।
अजर अमर शरीर पायो बास सुख सागर लिया ॥
सोरठा-संत करो विवेक, शब्द सार गहु बूझिकै ।
सुरति निरति सो देख, सतगुरु शब्द अपार जो ॥

इति श्रीमदुग्रगीताब्रह्मज्ञानयोगमते कबीरधर्मदाससंवादे

आत्मसंयमयोगो नाम षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥

अथ सप्तमोऽध्यायः

श्रीकृष्ण उवाच

कृष्ण कहैं अर्जुन सुनि लीजै । भक्ति हमारी मन चित दीजै ॥
सतये अध्याय जो तुमसों कहउँ । भक्तनमें हितकारी रहउँ ॥
मैं ही करौं करावौं भाई । तीनि लोक जहँ लगि निर्माई ॥
मैं संधारौं मैं प्रतिपारौं । चौदह भुवन पलकमें टारौं ॥
जहँ लगि पशु पक्षी जिव होई । मैं सबही मैं रहौं समोई ॥
दानपुण्य आदिक सब माहीं । बनज व्यापार करै सब पाहीं ॥
देवी देव सकलौं मैं सब ही । भवसागर सकलौं जग हम ही ॥
तीनि लोकमें विजय मैं सारौं । जब चाहौं तब बेर संधारौं ॥
करौं संधार सृष्टि पुनि सोई । रहौं अलेप निरंजन होई ॥
सगुणते निर्गुण मैं होइ जाऊं । फिर चाहौं सगुण होइ जाऊं ॥
सगुण औ निर्गुण रूप हमारा । जहिंते सृष्टि रच्यो व्यवहारा ॥
अर्जुन सबमें मोही जानो । कहा हमारा निजकै मानो ॥
चारि प्रकार भक्ति जो होई । तामें ज्ञानी अधिक सो होई ॥
रोग दुःखमें भक्ति जो करई । दुख कारण जो मोहि सुमिरई ॥
दीन दुखी निशिदिन लव लावै । कब प्रभु मोकहैं भोग भोगावै ॥
द्रव्य चहै जो द्रव्यहि स्वारथ । ज्ञानी चाहै मुक्ति पदारथ ॥

( २६ )

बोधसागर

ज्ञानी सदा मोहि पहिचानै । मेरी भक्ति सदा सुख मानै ॥
ज्ञानी अधिक ताहिते होई । भक्ति हि हेतु अधिक है सोई ॥
अज्ञानी मोहि नर ही जानै । अलख रूप मोहि नहिं पहिचानै ॥
पूर्ण ज्ञान होइ जब भाई । तब ही निर्गुण अलख लखाई ॥
देवी देवा सब नर पूजै । तिनहींको करता करि बूझै ॥
उनकी प्रीति देव होइ जाऊं । उनकी मनकामना पुराऊं ॥
कोइ न बूझै ख्याल हमारा । रहउँ सृष्टि पुनि करें संघारा ॥
ज्ञान विज्ञान योग जो होई । सतवांध्याय सुनायो सोई ॥

कबीर उवाच

कहै कबीर जगकरता आही । धर्मदास तुम चीन्हौ ताही ॥
पुरुष तीन लोक यह दीन्हा । तीनिहुँ लोक राज इन कीन्हा ॥
सब जग माँहि कर यह राजू । मन इच्छा कर सबका काजू ॥
इनते मुक्ति कहौ कस होई । देखहु आतमज्ञान कैसोई ॥
इनते मुक्ति होइ जो साजा । देह धरावै कवने काजा ॥
धर्म अधर्म जीव अरुझाया । आवागमन महा दुख पाया ॥
आवागमन न छूटै भाई । तीनिलोक राखै लपटाई ॥
धरि अवतार जबै जग आवै । सकल सभा ऐसी हि भरमावै ॥
सृष्टि जहां लगि है संसारा । ऐसी भांति सब अवतारा ॥
काहू मुक्ति होइ नहिं भाई । राम कृष्णते को बड आही ॥
उनहू आवागमन न छूटै । धर्मराज फिरि २ जग लूटै ॥
धर्मराज यह खेल पसारा । औघट घाट मूँदि सब द्वारा ॥
तीन लोक ते जाने न पावै । स्वर्ग मृत्यु पाताल रहावै ॥
धर्म कर्म ते स्वर्ग हि जाई । धर्म घटे मृत्यु मंडल आई ॥
जैसे घरिया रहट सुभाऊ । ऊँचे नीचे फिरि २ आऊ ॥
बन्धनते छूटै नहिं पावै । ऐसे जीव सदा भरमावै ॥

उग्रगीता

( २७ )

सद्गुरु चौथे लोक निवासा । मिलै अँकुरी जो निजदासा ॥
सार शब्द है तेहि पहुँचाऊँ । तीनि लोक बन्धन मुक्ताऊँ ॥
पावै सार शब्द निज बीरा । पहुँचै लोक जब छुटै शरीरा ॥
यमराजा तेहि निकट न आवै । चौरासी ते जीव छोडावै ॥
सार शब्द गहै निज डोरी । उतरे हंसा घाट करोरी ॥

छन्द-धर्म सेवा बहुत कीन्हो पुरुष दीन्हो राज हो ।

लोक तीनों राज पायो गर्वते अति गाज हो ॥

घाट अवघट सबै भूँदो कतहुँ नाहिं निकास हो ।

पुरुषते दुइ ठानिकै सब जीव राखो पास हो ॥

सोरठा-ऐसी युक्ति बनाई, पाप पुण्य फंदा रच्यो ।

चले लोक सो जाइ, सद्गुरु शब्द प्रताप जेहि ॥

इति श्रीमदुग्रगीताज्ञानयोगमते कबीरधर्मदाससंवादे

ज्ञानविज्ञानयोगो नाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥

अथ अष्टमोऽध्यायः

अर्जुन उवाच

अर्जुन कहै सुनौ प्रभु मेरे । मैं तो अधीन सदा हौं तेरे ॥

कहौ बखानि ब्रह्मको आही । सो निज भेद कहौ मोहि पाही ॥

अध्यातम तुम कहौ बुझाई । कर्म नाम काहैको रहाई ॥

अदभुत रूप बखानौ सोई । कछु मोसों जनि राखौ गोई ॥

अर्धनाम कहावै सोई । अर्धनाम जग काकर होई ॥

श्रीकृष्ण उवाच

कहैं कृष्ण सुनु अर्जुन भेदा । तुमसों कहौ मैं वेद निषेदा ॥

ब्रह्म सदा जो रहै अविनाशी । और स्मृष्टि सकलौ पुनि नाशी ॥

रहित नाम अविनाशी होई । पूरण ब्रह्म व्यापक है सोई ॥

( २८ )

बोधसागर

ना कहुँ आवै ना कहुँ जाई । सब घट माही रह्यो समाई ॥
नहीं टण्टि देखन महाँ आवै । सकल सृष्टिके माहिँ रहावै ॥
रूप वरण कछु वरणि न जाई । कोटि सूर्य तेहि तेज समाई ॥
तिनका नाम सदा अविनाशी । रहै निरंतर अंतरबासी ॥
अक्षय है सब जक्त पसारा । व्यापक रूप रहा भरभारा ॥
तिनकी भक्ति करे जो कोई । आवागमन कबहुँ नहिँ होई ॥
अध्यात्म आत्म सो ज्ञानी । सबमें ऐकै ब्रह्म समानी ॥
कर्म नाम करता है सोई । दुख सुख कारण करता होई ॥
अद्भुत रूप सरूप है भाई । तेहि समान रूप नहिँ भाई ॥
कोटि सूर्यको तेज समाही । अर्द्धदेव सब देवन माही ॥
रहो समाइ जो सकलौ छाई । अर्द्धनाम सकलौ जग लेई ॥
व्यापक सदा सकलमें सोई । महा प्रलय जब आवै भाई ॥
लै सौ वर्ष अवधी रहई । रेनि दिवस छै मास जो होई ॥
दिवस एक देवन कर सोई । छः मास अवर जब जाई ॥
राति एक ताकर होइ भाई । ऐसे वर्ष दिवस नर होई ॥
दिवस एक देवनकर सोई । तासे मास वर्ष गनि लेई ॥
ऐसे वर्ष देवकर कहिया । अहनिशि एक ब्रह्म पुनि तहिया ॥
दिवस एक ब्रह्माकर होई । चारि पहर चारिउ युग सोई ॥
रातिउ ऐसे जान सुभाऊ । बरतै चारिउ युग पर भाऊ ॥
दिवस औ राति जब ऐसो जाई । पक्षमास पुनि वर्ष कहाई ॥
सात वर्ष ब्रह्मा पर वानी । काल आइ सो करै तब हानी ॥
ब्रह्म प्रलय जब आवइ भाई । रोमस रोम परै खहराई ॥
जब २ प्रलय काल जब आई । एक रोम रोमस गिरिजाई ॥
बहुत प्रलय ऐसे चलि गयऊ । आदि अंत काहुँ नहिँ पयऊ ॥
अष्ट अध्याय जो कहा बखानी । अक्षर ब्रह्म योग है ज्ञानी ॥

उग्रगोत्रा

( २२ )

कहै कबीर सुनु धर्मनि धीरा । ब्रह्म भेद तुम गहिर गभीरा ॥
जो यह कछु प्रभाव बखाना । पै निर अक्षर भेद न जाना ॥
जो निर अक्षर भेद न जानै । कैसे सार शब्द पहिचानै ॥
जो निर अक्षर भेद हि पावै । सो त्रिलोक बंधन मुक्तवै ॥
अक्षर सार अपार जो होई । बिनु सत गुरु पावै नहि सोई ॥
सतगुरु मिलै शिष्यको जबही । सार शब्द पावै पुनि तबही ॥
हंस रूप ताकर पुनि होई । सो तौ हंस निनारा सोई ॥
यह जाने नहि ताकर भेदा । कितनौ पढ़ै नर चारिउ वेदा ॥
सार शब्दका मर्म न पावै । सो कैसे सत्यलोक सिधवै ॥
जो मानै तेहि लोक पठाऊ । सार निरक्षर अलख लखाऊ ॥
खान प्रवान शब्द टकसारा । यमको चीन्है उत्तरे पारा ॥
घटवारा जब पावै चीन्हा । तब हंसन कह आवै दीन्हा ॥

छन्द--सुरतिमंत जो हंस होवै ताहि दीजै पान हो ।
नत दशौ दिशा घाट रोकै मागि शब्द निशानि हो ।
देखि हैं जब शब्द सांचा चीन्ह पावै लोकको ।
अपने कंधे तेहि उतारैं मेटि संशय शोकको ॥

सोरठा--धर्म हमहि सो कौल, कीन्हो अति आधीन हो ।
हंस शब्द सत बोल, निमिष माहि पहुँचाइया ॥

इति श्रीभदुग्रगीताम्बराज्ञानयोगमते कबीरधर्मदाससंवादस्य-

रयोगव्याख्यानोनामाष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥

अथ नवमोऽध्यायः

श्रीभगवानुवाच

अर्जुन शास्त्र मतो है नीका । कर्म धर्म सब कारज जीका ॥
शास्त्र वेद पुरान जो आही । मन वच कर्म अर्जुन गहु ताही॥

( ३० )

बोधसागर

बहुत लोग मानुष मोहि जानै । दुख सुख व्यापक माही सानै ॥
बड़े भाग सो प्रानी होई । अन्तर पवन रहौं मैं सोई ॥
पवन सकल में बतै भाई । बाहर भीतर फिरै सदाई ॥
लित होइ पुनि रहै निनारा । ऐसा अदभुत खेल हमारा ॥
बहुत साधु एक करि पूजे । सर्व मध्य आत्म कहबूझै ॥
बहुतक प्रीति भाव जो जानै । साहेब सेवा हित कै मानै ॥
बहुतक तीनो देवन मानै । अवर सकल मिथ्या करि जानै ॥
मोकहयहि बिधि जो कोइ ध्यावै । तेहि विधि माह परम सुख पावै ॥
सर्व व्यापक मैं हौं भाई । मोहि विन दूजा और न कोई ॥
मेरे मित्र दुष्ट नहिं कोई । जो ध्यावै पावै पुनि सोई ॥
एक भाव मैं सबसो रहेऊ । जैसे अग्नि भाव सो कहेऊ ॥
जबै काल जड़ आवै भाई । बैठे लोग तापन कह आई ॥
चहुँदिशि लोग अग्नि बिच होई । सब तापै काया नर लोई ॥
अग्नि काहु कै मित्र न जानै । और न काहु दुष्ट हि मानै ॥
सब कह लागै एक सम भाई । ऐसे रहौं मैं सहज समाई ॥
जो कोइ पूजा देवन लावै । सो नर देव के लोक सिधावै ॥
जो ऐसा होइ भक्त हमारा । ता कह पठवउँ स्वर्ग दुवारा ॥
जो कोइ मोसे चित्त लगावै । सुख संपति बहु शोभा पावै ॥
ऋद्धि सिद्धि बहुतैं कै देऊं । आपन कै मैं ताकह लेऊं ॥
सदा सर्वदा बात न हेरूं । दुख संताप ताहि कर फेरूं ॥
अर्जुन परम भक्ति मोहि भावै । जो कोइ मोसों मन चितलावै ॥
नौ अध्याय इहां लगु होई । राज योग गून है सोई ॥

कबीर उवाच

कहै कबीर सुनो धर्मदासा । बहुविधिकृणजो करै तमासा ॥
कर्म धर्म कहि जग समुझावै । अलक पुरुष कैसे लखि आवै ॥

उग्रगीता

( ३१ )

ज्ञानवंत तुम धर्म निआगर । सत सुकृत गहु परम उजागर ॥
करौ विचार संतकी रीती । मन वच करु सतगुरु परतीती ॥
इन्ह तौ शास्त्र ज्ञान विचारा । कम फंद जीवनह सब डारा ॥
कोइ भक्ति जो इनकी करई । ऋद्धि सिद्धि सुख संपति लहई ॥
बहुत भांति तेहि देइ बड़ाई । राज पाट इन्द्रासन लाई ॥
आवागवन न मेटा जाई । बहुविधि चीन्हो मन चितलाई ॥
दाता भुक्ता होवे आपै । पै कोऊ नहि छूटा पापै ॥
आवै जाइ सकल जग लोई । कबहुँ न छूटै बंधन सोई ॥
बहुविधि चीन्हो मन चितलाई । आवागवन न मेटा जाई ॥
बंधन सतगुरु तुम्हरो तोरा । तुम कह नहि व्यापै यमचोरा ॥
सतगुरुका है पंथ अपारा । जो बूझैं सो उतरे पारा ॥

छन्द-धर्मदास तुम बूझि देखो भेद सतगुरु अगम है ।

तीनि लोक अरुझाइ कारण वेद शास्तर सो कहै ॥

बूझि देखो अंग सब मैं आयों तोरन फंदको ।

हंसको मुक्ताय यमसो मेटिहौ दूख द्वंदको ॥

सोरठा--सतगुरु शब्द अपार; वार पार कोइ ना लहै ।

हंस शब्द आधार, ताहि मुक्ति पाछे फिरै ॥

इति श्रीमदुग्रगीताब्रह्मज्ञानयोगमते कबीरधर्मदाससंवादे

राजदिवाराजगुणयोगोनाम नवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥

अथ दशमोऽध्यायः

श्रीकृष्ण उवाच

महाबाहु अर्जुन सुतु भाई । दस अध्याय कहेउँ अर्थार्ई ॥
विभूति योग मैं तोहि सुनाऊं । सकलरूप तोहि वरनि सुनाऊं ॥
जल थल पूरण मैं ही व्यापो । कीट पतंग सर्वमें आपो ॥

( ३२ )

बोधसागर

मेरी गति मति कोइ न जाने । सबै सृष्टि नारायण मानै ॥
ऋषि मुनि देव देवता भाई । उनहू मेरी गति नहिं पाई ॥
मैं तो गति मति सबकी जानौं । व्यापि रह्यो मैं सकल जहानौं ॥
देवि देवता आदि जो मैं ही । ऋषि मुनि सृष्टि अवतार जु लेही ॥
मोहिते आदि और नहिं कोई । सबके आदि करा रचि सोई ॥
पिताकी खबरि पुत्र नहिं जाने । कैसे पितुकी आदि बखानै ॥
आदि अन्तको मेरी पावै । जग रचना सब पुत्र कहावै ॥
विभूति रूप संक्षेप जो कहिया । अर्जुन पूछ कृष्ण पुनि कहिया ॥
सब व्यवहार विभूति सुनावौ । रंचक मोसे कछु न दुरावौ ॥
कृष्ण कहै सुनु कुंतिकुमारा । तोसों कहौं सकल विस्तारा ॥
पहिले सकल जोति जग जो है । शाशि सूर्यकी कीरनि मोहै ॥
सूर्य रूप मेरो है भाई । दूजा भाव जनावौ जाई ॥
शीतल पूरण निर्मल चंदा । है मेरो यह रूप अनंदा ॥
बलीदान यज्ञ जो ठानो । बावन रूप मेरो पहिचानो ॥
सिरजा पवन सबै सुखदाई । मैं ही पवन रूप हौं भाई ॥
चारि वेदमें साम जो वेदा । मेरो रूप सुनो तुम भेदा ॥
व्यास रूप मेरो है भाई । नारद भाव धरउं मैं आई ॥
देवन माहिं इन्द्र पुनि मैं हौं । दानी बलिराजा सो मैं हौं ॥
विषधर माहिं वासुकी हम ही । ईश्वर माहिं महेश्वर हम ही ॥
इन्द्रिय भुक्तौ मनसो मैं ही । राजन माहिं राज करौं मैं ही ॥
मिरगन्ह मध्य सिंह गति मेरी । वृक्षनमें पिप्पल मोहिं हेरी ॥
नदी माहिं हम ही हैं गंगा । समुद्र रूपमें लहरि उतंगा ॥
मुनिवर कपिल हमी हैं भाई । परशुराम योधा हौं भाई ॥
नरसिंह रूप जो मेरो होई । रामचन्द्र तन रूप जो सोई ॥
दत्तात्रय आनंदित रहऊं । ऋषिन मध्य पाराशर अहऊं ॥

उग्रगीता

( ३३ )

जल जीवन जलसाइ कहाई । मेरो रूप सुभाव रहाई ॥
ज्वारिन महाँ मैं जुवा कहावा । जुवा रूप मेरो रूप सुभावा ॥
जहाँ लगि जगमें होइ लराई । मेरो रूप लराई भाई ॥
जग परपंच जहां लग होई । परपंच रूपमें रहौं समोई ॥
वाद विवाद करै जो ज्ञानी । वाद रूप मोकहैं पहिचानी ॥
शंकर रूप मोर है भाई । मृत्युकालमें रहौं समाई ॥
पाप पुण्य धारौं दुइ देही । कर्म धर्म रचना है एही ॥
जग रचना विभूति मेरी होई । जल थलमें मैं रहौं समोई ॥
कहैं लगि वणौं वरणि बखानौं । सब वसुधामें मोहीं जानौं ॥
मोहिं छोड़ि कोइ और न दूजा । तीन लोकमें मेरी पूजा ॥
देवी देवता पूजा लावैं । सो सब पूजा मैं कहलावैं ॥
विभूति रूप अध्याय है दशवां । इह लगि भाव बतायउँ दशवां ॥

कबीर उवाच

कहै कबीर सुनौ चितलाई । धर्मदास तुम लेहु अथाईं ॥
तीनि लोक नायक भगवाना । तिन कह पुरुष दीन्ह रजधाना ॥
ताते क्रीडा करै अनंदा । खेल अनेक खेल गोविंदा ॥
तीनि लोक बाजी दइ राखा । परपंची अपने मुख भाखा ॥
सत्य कहइ सत्य भाव लखावै । करि प्रपंच जीवन भरमावै ॥
जीव जो मूल बीजके आही । इन पाया सब पुरुषके पाही ॥
बीज आदि तिहुलोक जो फूला । आपुहि जानै पुरुषहि तूला ॥
करि अभिमान पुरुष विसरावा । आपुहि पूरण पुरुष कहावा ॥
सर्वमें व्यापक आपुहि रहई । पुरुष भेद नहिं काहु सो कहई ॥
भेद कहैं उजरे पुर तीनो । आपन थापन ताते कीनो ॥
चारिहु वेद नेति जो गावैं । सदगुरु रहित पुरुष बतलावैं ॥

नं. ८ कबीरसागर - २

( ३४ )

बोधसागर

जीव जन्तु राखैँ अरुझाईं । बीज पुरुष जो दीन्हो भाई ॥
जब नहिं बीज पुरुषपहँ जाईं । तबै पुरुष हम कहँ उपजाईं ॥
बीज अंकुरी लोक ले आवौ । धर्मराजते हंस छुडावौ ॥
सेवा वसि वहि दीन्हा राजू । अब मेटी तौ सुकृतहि लाजू ॥
सुत हमार भया वरियारा । जेहि दीन्हों तिहुँलोकके भारा ॥
तुम अंकुरी सेवहु जाईं । बार २ मैं कहौं बुझाईं ॥
ताते मैं संसारहि आवा । पुरुष शब्द टारो नहिं जावा ॥
नाहिं तौ तीनौ लोकहि तारौं । धर्मराज ते सबै उबारौं ॥
जो जन अंश पुरुषके आही । सो सब आवै हमरे पाही ॥
अवर सकलजग काल बसेरा । नित २ प्रलय होत झकझेरा ॥
यहि कर काल पुरुष दियो नामा । तीन लोकते न्यारा धामा ॥
अध्याय एकादश आगे होई । काल सरूप बखानो सोई ॥
धर्मदास मन माहिं विचारो । काल रूप सब भाव निहारो ॥
जो तुम कहौ पुरुषकी आशा । सद्गुरु शब्द करौ विश्वासा ॥
छंद-हंस कारण पुरुष पठयो तबै बिनती मैं कहौं ।
धर्म है अति बली तिहुँपुर सोई दुतिया करि रहौं ॥
जाऊं भवसागरहि जो बहु भांति मोसों युधि करै ।
यह सुनि पुरुषसत्य शब्द दीन्हों धर्मराज जेहि ना डरै ॥
सोरठा-सुनतै शब्द संदेश, सुरति निरति हंसा गहो ।
पूरण पुरुष संदेश, बहुरि धरौ जग देह नहिं ॥

इति श्रीमदुग्रगोतात्रब्रह्मज्ञानयोगमते कवीरधर्मदाससंवादे

विभूतियोगव्याख्यानो नाम दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥

उग्रमाता

( ३६ )

अथ एकादशोऽध्यायः

अर्जुन उवाच

अर्जुन कृष्ण सो बिनती ठानी । हे स्वामी तुम अन्तर्यामी ॥
दश अध्याय तुम वरणि सुनायो। ज्ञान विज्ञान जो मोहि बतायो॥
सन्यासकर्म और वाक्य सुनायो। आतम संयम योग बातायो ॥
प्रवृत्ति निवृत्ति जो मारग भाषा । कर्म योग मन हट करि राखा ॥
यह सब सुनिनिर्मल भयो अंगा । अब मोहि दर्शन भयो उमंगा ॥
होउ दयाल विराट देखावौ । मति मोकहैं तुम दूरि बहावौ ॥
जो मोहिं शक्ति न देखत होई । तौ अब शक्ति दीजिये सोई ॥
तुम ठाकुर हौ अंतर्यामी । अब दर्शन बिन रहौं न स्वामी॥
अहो दयाल कृपा-निधि-सारग । दीनबंधु तुम पतित-उजागर ॥
तब हरि बोले चतुर सुजाना । इन नैनन्ह नहीं दर्शन जाना ॥
तुम तौ हौ निज भक्त हमारे । दर्शन तुम कह देउ पियारे ॥
यह सरूप काहू नहीं देखा । इंद्रादिक सुर नर सुनि शेषा ॥
सो दर्शन तुम देखा चैहौ । तीनि लोक हलकंप बढैहौ ॥
देखौ कालरूप जब मोरा । अर्जुन तुम तब रहौं न ठौरा ॥
डरपो बहुत होइ डर भारी । डरपै लोग सकल संसारी ॥
कहैं अर्जुन सुनु कृष्ण सुरारी । प्रथम देहु हटता मोहि भारी ॥
जो मैं डरौं दरसको करई । विनु मारेही मृतक होइ रहई ॥
सोई दृष्टि मोहि देव गुसाईं । जेहि दरशे परसौं तुम पाईं ॥
दिव्य दृष्टि अर्जुन कहैं दीन्हा । अर्जुन है मम दरश अधीना ॥
धारो रूप अकाश पताला । महा स्वरूप भयंकर काला ॥
माथ अनेक अनेकन्ह नयना । कर्ण अनेक बहुत मुख बयना ॥
नाक अनेक रू दंत अनेका । चितवत दृष्टि मारि है वेगा ॥
निकसि दाढ़ बाहे मुख भारी । तिन देखत जिव नाहिं सँभारी॥

( ३६ )

बोधसागर

वदन अनेक भरे औ रीते । ऋषिसुनिवर तहाँ भये विपरीते॥
भुजधारी बहु बाहु विराजें । ऐसे कैसो दरशन राजें ॥
पाव पताल रहा जब जाई । शीश अकाश सातये भाई ॥
भूषण भांति २ के छाजें । मुकुट अनेक शीश पर राजें ॥
सूर्य चंद्रमा तहां रहाई । ऋषिसुनिवर तहाँ विनती लाई ॥
जहाँ लगि देवी देवता आहीं । सब देखो तिनके मुख माहीं ॥
अर्जुन देखि अचंभौ कीन्हा । अति डरि भये बहुत अधीना ॥
देवता ठाढ़े अस्तुति करहीं । भौ व्यापैं विलु मारे मरहीं ॥
किन्नर यक्ष गुणी सब ठाढ़े । कैंपैं सबैं देखिके गाढे ॥
राक्षस देखत भागे जाहीं । कोइ नेरे कोइ दूरि पराहीं ॥
कोइ जन अस्तुति करै मनुहारी । अब रक्षा प्रभु करौ हमारी ॥
कोइ एक जन दुरि परिहरहीं । कोइ जन निहुरी दंडवत करहीं॥
ऐसे स्फुट सकल जग देखा । तहवां रहे समाइ विशेषा ॥
औ मुख देखा बहुत भयावन । जानौ अब चाहत है खावन ॥
मुखमें तीन लोक जो देखा । तहवां रहे समाइ विशेषा ॥
जहाँ लगि साधु असाधु कहावै । सो सब ताके मुखमहँ आवै ॥
दुर्योधन देखा मुख माहीं । भीष्म द्रोणाचार्य जो आहीं ॥
योधा चले सबैं मुख माहीं । कौरौ पाण्डव उदर समाहीं ॥
कोस अड़तालिसकटक जोरहिया । सो सब मुखमें देखो तहिया॥
संसारी त्रैलोक पसारा । सो सब मुखके मध्य निहारा ॥
नदी आवै जस एकै धारा । सागर माहिं धसे सब खारा ॥
ऐसे जग सब उदर समावै । मुख माहीं सबही चलि आवै॥
जैसे जोत चांदना होई । जीव जन्तु सब लेइ समोई ॥
केतक डाढ़न माहीं अटके । केतक भागे फिरत जो भटके ॥
कोइ कतहुँ जाने नहीं पावै । बढ़ुरि २ मुख माहिं समावै ॥

उग्रगीता

( ३७ )

देखत अर्जुन बहुत डराये । मनमें धीरज नेक न आये ॥
विनय दंडवत करि बहु भाई । क्षमा करौ अब मोहिं यदुराई ॥
मोकहुँ सँभरन दे यदुराई । चित मेरो विभ्रम होइ आई ॥
तुम तौ पूरण पुरुष हो साई । रूप समेटो चित डेराई ॥
काल रूपते बहुत डेराऊँ । कृपा करो जिय मोर जुड़ाऊँ ॥

श्रीभगवानुवाच

कहैं कृष्ण अर्जुन सुनु वयना । डरपै जनि मूदो दोउ नयना ॥
तुम कारण यह भेष बनावा । और काहु देखो नहिं पावा ॥
तुम तौ क्षत्रिय बहुत पियारे । तुम कारण यह रूप सवॉरे ॥
अस्त्र लेहु तुम हाथ उठाई । इन कह मारौ बहु विधि भाई ॥
जो कोइ युद्ध करन कहैं आवै । राज धर्म तेहि मारि गिरावै ॥
इन सबको हम मारिजो राखो । सो सब देख्यो अपनी आंखों ॥
ए सब हमरे मुखके माहीं । तुम कहैं दूषण एकौ नाहीं ॥
तुम्हरे यश कह कारज कीन्हा । अब लगि राखा तुम्हरे लीन्हा ॥
आगे यही मृतक जो आहीं । तुम जग यश लेते कस नाहीं ॥
जगमें महा बाहु तुम होहु । अब तुम इन कहैं मारि विगोहु ॥
देखै युद्ध सकल संसारा । यश कीरति तब होइ उदारा ॥
अरजुन डरपत बिनती कीन्हा । तुम कर्ता मैं सदा अधीना ॥
अब लगि तुम कहैं मैं नहिं जाना । अब जो कहौ सोइ परमाना ॥
विनय करौ तुम सुनहु गोसाई । बहु अपराध भये मोहिं साई ॥
तुम संग सखा रूप हम डोलै । ऊँच नीच बोल जो बहु बोलै ॥
तुम तौ पिता सकल के होऊ । पालै मात पिता सुत सोऊ ॥
बालक लाख दोष जो करई । मनमें पिता रोष नहिं धरई ॥
तुम सो वैन कठिन मैं भाषा । सारथिकै अपने रथ राखा ॥
कछू चूक हमसे जो होई । सो अपराध क्षमा कर सोई ॥

( ३८ )

बोधसागर

रूप देखावहु श्याम सरूपा । वेगि छिपावहु काल सरूपा ॥
मेरो जीव न धीरज धरई । अबहीं जानौ भक्षण करई ॥
दया रूप अपनो दिखलावो । चित वित मेरो ठौर मिलावो ॥
ना तौ चित वित मेरो जाई । कैसहु धीरज मोहि न आई ॥
कालरूप तब लीन्ह सकेली । कृष्ण रूप धरि तब ही खेली ॥
शंख चक्र गदाधर जानी । मोर मुकुट पीताम्बर तानी ॥
विश्वरूप सम्पूर्ण भयञ्ज । अध्यायएकादश लगि कहञ्ज ॥

कबीर उवाच

कहै कबीर सुनौ धर्मदासा । कर कैसे यह काल तमाशा ॥
यह जग अन्धा उलटी रीती । अंधा मोल न फूटि मसीती ॥
अंधरे पंडित पढ़े पुराना । पढ़ि पढ़ि काहूँ भेद न जाना ॥
कृष्णजो निजमुख गीताभाषा । काल स्वरूप देखायउ आखा ॥
तबहुँ न मूरख कालहि चीन्हे । ज्ञान हीन है मतिके हीने ॥
ज्ञान अगम मैं बहुत पुकारा । सब झूठे मिलि कहै लबारा ॥
मूरख सांच झूठ नहि जाना । कैसे गुरु भेद पहिचाना ॥
भेद विना सो जन्म गवांवा । बार बार भग द्वारे आवा ॥
आवत जात महा दुख होई । जन्म बहुत धरि जाइ विगोई ॥
सतगुरु शब्द चीन्ह जो पावै । अजर अमर घर हंसा पावै ॥
धर्मदास सम हंस सुजाना । झूठो सत्य लेहु पहिचाना ॥
सांच झूठ में रहा छिपाई । चीन्हो ताहि गहौ चित लाई ॥
झूठे त्यागि सांच कह लागो । सत्य सुकृतमें तन मन पागो ॥
सत्यहिते जिव उत्तै पारा । सत्य शब्द जियको कड़हारा ॥
सत्य गहै सत्ये मुख भाखै । अभ्यन्तर सत्यहि गहि राखै ॥
सत्ये कर्म धर्म तुम करहु । कर्म भर्म दोऊ परिहरहु ॥
सत्य व्यवहार सत्य मुख बैना । सत्य है लेन सत्य है देना ॥

उग्रगीता

( ३९ )

सत्य सत्य तुम वर्तहु भाई । यह उपदेश हमारो आई ॥
यह संसार सत्य नहीं सूझे । सत्यहि बूझे झूट अरूझे ॥
जैसे नलिनी सुबना गहई । ऐसे वह जग फंदा रहई ॥
सत संगति ते उठिकै भागे । नाच पवारे मन अनुरागे ॥
विषय वासमें तन मन खोवै । उत्तम देही जानि विगोवै ॥
यह संसार कालकर फन्द। विन सतगुरु नहीं छूटे बंदा ॥
जब अक्षर निरअक्षर जाने । सतगुरु शब्द करै परवानै ॥
सार शब्द मैं आनि पुकारा । जो बूझे सो उतरे पारा ॥

छंद—वहो बहुविधि बूझि देखों धर्म दारुण काल हो ।

वेद पुराणमें सार गीता जस कहौ विकराल हो ॥

विश्व सब भोजन करै यह सर्व वसुधा पाल हो ।

दया जाके ताहि आवै सब जीव राखै हाल हो ॥

सोरठा—ज्योति सरूपी काल, सदा अखंडित लव वरै ।

कबहुँ न होय दयाल, जीवजंतु सब लै जरै ॥

इति श्रीमदुग्रगीताब्रह्मज्ञानयोगमते कच्चीरधर्मदाससंवादे

विरहरूपन्यास्यानो नामैकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥

अथ द्वादशोऽध्यायः

अर्जुन उवाच

कहैं अर्जुन सुनु अन्तर्यामी । पूर्ण पुरुष अगम तुम स्वामी ॥
ज्ञान सृष्टि भक्ति अधिकाई । निर्गुण सगुणमें को अधिकाई ॥
यह संशय उपजे जिव मोरा । कृपा करो तुम करौ निहोरा ॥
अर्जुन जो पूछेउ परभाऊ । सो अब प्रकट बखानौ दोऊ ॥
ज्ञानी अधिक करे जो ज्ञाना । निशि वासर रहै ज्ञान समाना ॥
भक्ति करे जो मन चित लाई । निस दिन सुमिरे हम कहैं भाई ॥
बहुत भांति कै सेवा लावै । प्रेम मम मेरो यश गावै ॥

( ४० )

बोधसागर

सुख संपत्ति सुत भवन न भावै । काम क्रोध मद लोभ बहावै ॥
ऐसा भक्त मेरा मन भावै । मोक्ष मुक्ति परम पद पावै ॥
ज्ञानते अधिक भक्ति है भाई । निसदिन मोमें रहा समाई ॥
निर्गुण सगुण है रूप हमारा । वह निरूप यह खेल पसारा ॥
निर्गुण ब्रह्म सकल घट माहीं । सगुन रूप हमारो आहीं ॥
बहुत साधु निर्गुण कह धावै । कर्म धर्म लै दूरि बहावै ॥
निर्गुण भक्ति बहुत अति भारी । कोइ कोइ विरले हैं व्रतधारी ॥
छौंठै इंद्री तन मनकर्मा । मनसा कबही जाइ न भर्मा ॥
पंच पचीसो को परमोघै । अभ्यन्तर आत्मको शोघै ॥
संकल्प विकल्प जब मनसे छूटै । काल कलेश नाता कहैं लूटै ॥
सदा नाम जो रहै लवलीना । सो साधू पुनि ब्रह्महि चीन्हा ॥
पारब्रह्म है अलख अपारा । हाथ पाउं नहि देह सँवारा ॥
क्षर अक्षर कबही नहि होई । पूरण ब्रह्म व्यापक है सोई ॥
अलख रूप सदा अविनाशी । रहित चित अचित उदासी ॥
ऐसा ब्रह्म जो रहित अकेला । सो साधू है अविगति मेला ॥
ऐसे निर्गुण भक्त पियारे । तिन अपना निज कारज सारे ॥
ताते कठिन भक्ति यह भारी । सगुण भक्ति है मोहि पियारी ॥
शुचि संयम एकादशि करई । मन बच कर्म मोहि चित धरई ॥
अर्पणकै सब प्रभुके नामा । सुफल होइ सब पूरण कामा ॥
सदा सर्वदा मो कहैं ध्यावै । मोक्ष मुक्तिमाहीं फल पावै ॥
और सेवा सुमिरण जो करई । निशि दिन मोकहैं चर्चत रहई ॥
ध्यान धरै जो श्याम सरूपा । मोर मुकुट शिर बनो अनूपा ॥
पीत वसन बेजंती माला । कानन कुंडल नैन रसाला ॥
ऐसी भांति ध्यान जो करई । सो साधू भवसागर तरई ॥
ए अर्जुन मोहि सब विधि भावै । भक्ति करै मेरो यश गावै ॥

उग्रगीता

( ४१ )

हम तो प्रेम प्रीति के भूखे । साधु संत कबही नहीं दूखे ॥
हमरी आज्ञा साधु जो धावै । महा पदार्थ मोक्ष सो पावै ॥
जो तुम सो कछु भक्ति न होई । मानहु मोर कहा निजु सोई ॥
क्षत्री धर्म न छोडिय भाई । एहिंते तुम पुनि पहुँचो जाई ॥
धनुष बाण तुम लेहु उठाई । युद्ध करहु तुम अर्जुन जाई ॥
मनमें मोह कछु नहिं कीजै । कारण करतामें चित दीजै ॥
जो तुम युद्ध जीतिकै आवौ । पदवी अटल परम पद पावौ ॥
द्वादश अध्याय भक्ति जो भाई । कृष्ण बखाना यह अध्याई ॥

कबीर उवाच

कहै कबीर धर्मनि हितकारी । भक्ति कहेउ जो कृष्ण सुरारी ॥
निर्गुण भक्ति सत्य है आदी । सगुण भक्तिहु जन्म न वादी ॥
पै हम अगम बखानी ऐसी । करै विवेक विचारै तैसी ॥
निर्गुण सगुण दोउ उर झेला । बूझेगा कोइ संत सुहेला ॥
क्षर अक्षर माया है भाई । निरअक्षर सद्गुरु समुझाई ॥
ताकर भेद न काहू पाया । मूरख धरि २ जन्म गवाया ॥
सद्गुरु शरण जीव जो आवै । काल फांसते जिव मुक्तावै ॥

छन्द-निर्गुण सगुण दोउ छांडौ संधि सद्गुरु चित धरो ।

सार शब्द अपार अविगति क्षर अक्षर निर अक्षरो ॥

भेद बूझो अगम गमि करि कछु न संशौ घट रहो ।

सोई हंसा अमी पीवै पुरुष को दर्शन लहो ।

सोरठा-सोइ भक्ति निज सार, जेहिंते पुरुषहि परशिहो ॥

बहु विधि कहौं पुकारि, भक्ति हीन दरशै नहीं ।

इति श्रीमदुग्रगीताब्रह्मज्ञानयोगमते कबीरधर्मदाससंवादे भक्ति-

योगन्याख्यानो नाम द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥

( ४२ )

बोधसागर

अथ त्रयोदशोऽध्यायः

श्रीकृष्ण उवाच

अर्जुन सों बोले गोपाला । निर्मल ज्ञान सुनौ यहि काला॥
माया ब्रह्म सदा संयोगा । माया संग जीव पुनि भोगा ॥
तीनिउ गुण मायाते भयङ्ग । रजगुण तमगुण सतगुण भयङ्ग॥
रजगुण ब्रह्मा सृष्टि पसारा । सतगुणपोषण विष्णु विचारा॥
तमोगुण रुद्र सँघारै सोई । तीनिउ पुत्र माया के होई ॥
पृथ्वी तेज वायु आकाशा । जलमिली पांचउ तत्त्व प्रकाशा॥
दश इंद्री कीन्हो बंधाना । कर्म पांच २ है ज्ञाना ॥
मनबुद्धि चित अहंकार जो कीन्हा । इच्छा दोइ यक धीरज चीन्हा
दुख सुख क्षेत्र जो कीन्हा माया । क्षेत्रज्ञ पुरुष अविगति समाया॥
क्षेत्र देह क्षेत्रज्ञ जिव होई । चेतन जीव अचेत समोई ॥
देह धरेते जिव दुख पावै । माया जड़ कछु शोक न आवै॥
आदि अनादि ब्रह्म औ माया । कारण सृष्टि धरे दुह भाया ॥
जैसे वृक्ष २ की छाया । वृक्ष विना छाया नहिं माया॥
ऐसे ब्रह्म सदा यक संगा । कारण सृष्टि रच्यो अर्थज्ञा ॥
अर्जुन व्यापक जीवहि जानो । अतो न न्यारो ब्रह्म पिछानो॥
जीवात्म माया भयो अंगा । परमात्म देखहु सब संगा ॥
पारब्रह्म सो लिप्त न होई । हाथ पांव इंद्री नहिं कोई ॥
सर्वेन्द्री जाके चहुँ ओरा । जहां तहां परकट सब ठौरा ॥
नैन चहुँ दिशि देखै सोई । कानन सर्व गुण सुने है जोई॥
मुख सकलौ जो खाय खवावै । पाव पवनते अधिक जो धावै॥
हाथ ऐसे जो रच संसारा । नासा सकल वास विस्तारा ॥
जो कहिये तौ सकलौ सोई । नाक होई तौ कछु न होई ॥
जाके कोई पुण्य न पापा । अलख रूप सो आपै आपा ॥

उग्रगीता

( ४२ )

ऐसे पारब्रह्म पहिचानौ । ताकी महिमा वेद बखानौ ॥
जो कोइ साधू साधन करई । इंद्री त्यागे गुण परिहरई ॥
काम क्रोध मद लोभ न आवै । तंतु प्रकृति लै दूरि बहावै ॥
माया रहित ब्रह्म है सोई । ताको आवागमन न होई ॥
माया लिप्त रहै संसारी । लोभ मोहमें भूले भारी ॥
कैसहु नहीं ब्रह्म कहैं बूझै । अंध नयन हृदये नहिं सूझै ॥
सुख संपत्ति हित चित्तसो गहई । ता परताप नर्क सो परई ॥
सुकर श्रान जन्म सो धरई । माया लीन सदा सो करई ॥
चौरासी कर्म जेहि गुण होई । निष्कर्महि जाने नहिं कोई ॥
आतम परमात्म नहिं जाने । पारब्रह्म मन कबहिं न आने ॥
रहत समीप सदा सुख सोई । न्यारा कबहीं नाहिं विछोई ॥
जैसे सूर्य जो रहै अकासा । ऐसे क्षेत्र क्षेत्रज्ञ है वासा ॥
कर्म लिप्त जिव नाम धराया । पारब्रह्म संयोग बनाया ॥
माया विना ब्रह्म जो होई । पारब्रह्म पुनि कहिये सोई ॥
आपुन आपा खोइ भुलाना । माया संग सदा सुख माना ॥
ता कारण भ्रम चौरासी । फिरि २ भवसागरके वासी ॥
ताते निर्गुण भक्ति न होई । सगुण भाव बतायो सोई ॥
कर्म करिय करि निर्मल होई । ऐसो तारो सब नर लोई ॥
मन वच कर्म मोहि चित्त राखै । मेरो ध्यान सदा अभिलाषै ॥
यहि प्रकार नर मोकहैं गावै । सुख संपत्ति धन लक्ष्मी आवै ॥
ब्रह्म यज्ञ त्रैदश अध्याई । क्षेत्र क्षेत्रज्ञहि वरणि सुनाई ॥

कबीर उवाच

कहै कबीर सुनो धर्मदासा । ऐसा भेद सो काल प्रकाशा ॥
कहिं २ निर्गुण सगुणे ल्यावै । पारब्रह्मते दूरि बहावै ॥
काह कहौ कहैलंगि गोहरावौ । अंधहि मारग कैसे पावौ ॥