सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
संग्रह पर लौटें

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

१३१

जीवधर्मबोध

( २०३९ )

माया ब्रह्म जीव कह आहीं । मोते इतर और कछु नाहीं ॥
आपै खोजि आपको पैये । और कहा केहि खोजन जैये ॥
पिंड अंड दोनों यक लेखो । बाहर भीतर एकै देखो ॥
पग पाताल कहे सतइ महि । चरण पृष्ठ पाताल छठा कहि ॥
पद अंगुली सो कहे असुरगण । पदके नख असुरनके बाहण ॥
अष्टांलिग महातल पञ्चम । पेडीतलातल चौथ विरञ्चम ॥
ठेघुनी सुतल तीसरे कहिये । जंघको बितल दूसरो गहिये ॥
काल समय अथवा यज्ञ होई । पाव चलनको कहिये सोई ॥
भगसो अतलहै पहिली धरनी । लिंग ताहि प्रजापति बरनी ॥
वर्षा बीज नाम महि भनिये । महिते सो आकाशलो गनिये ॥
चूतर माथ सौ प्रभा प्रभाता । श्वेत रंग जो प्रथम लखाता ॥
मोट मास अथवा कह माया । सौ प्रदोष सन्ध्या बतलाया ॥
नाभी गंभीरता है जोई । क्षीर समुद्र बखानो सोई ॥
इत जठरा उत बडवा आगी । नसा जाल सरितागण जागी ॥
पेट सो भुवलोक पहिचानो । बालभोग लछु पल्लय जानो ॥
तृषा सो लछु पल्लय जग सोवन । हृदया स्वर्ग भूमि ऊपर भन् ॥
इत वैजन्ती माला जोई । उत लम्बादिक जाला सोई ॥
दक्षिण कुच यहि भांति बखाना । मांगनके प्रथम दे दाना ॥
बाम पयोधर ताहि कहीजै । दान याचना पीछे दीजै ॥
मन सोई गुण तीन मिलाना । रज सत तमगुण कीन प्रणामा ॥
मनसंकल्प सोई है ब्रह्मा । जग रचना जिन कीन अरंभा ॥
पोषण गुणसों वदे विष्णुवर । कोधहनन हंकार महेश्वर ॥
हास अनन्द सोई है माया । ज्ञान दुःख दंभ दूर कराया ॥
प्रानसो पौन पिष्ठ अपकर्मा । पीठ अस्थिहिमगिरि कह मर्मा ॥
पसुली इतर अस्थि गिर नामा । जो हिमगिरिके दक्षिण बामा ॥
दहनाहाथ सो दान अस वर्षा । बाम सूम तासुष्को तर्खा ॥

( २०४० )

बोधसागर

१३२

हाथ चीन्ह अप्सरा सुभाती । कर नख सो सुरगण बहु जाती॥
दक्षिण करबंध अरु निजतार्ई । लोकपाल देव अग्नि बनाई ॥
बाम जोड़कर जो अरु निजलो । अहं देव ईसान नामलो ॥
औरनिज सो कल्पद्वुम कहिये । आगे और भेद कछु कहिये ॥
दक्षिण कंध सो दांहना छोरा । वामकंध सो बायो ओरा ॥
गरदन मोठा वरुणदेववर । कंठसो महल्लोकके स्वर्ग ऊपर ॥
शब्दसो अनहद बुद्धि जो नीकी । महल्लोकके ऊपर ठीकी ॥
सो यम लोक बखानों ताहा । चितादुःखसे जगकी चाहा ॥
होटको ओष्ठ लोभको साजू । ऊपरको ओष्ठ हया अरु लाजू ॥
तालू पानी जिह्वा आगी । वचन सोई सरस्वती सुभागी ॥
दंतमोह जग पुनि कह भोजन । सब जग जीव करे जो भक्षण ॥
इतबानी उत चारों वेदा । हास्य सो माया रचना भेदा ॥
कानदो जक्त आठ विधि धारा । नाकपरा सो अश्विनी कुमारा ॥
देहगंध सो पृथ्वी योका । अधोतन दक्षिणपंचमयमलोका॥
अर्धदेह उत्तर जो हेरी । सो तपलोक षष्ठमो टेरी ॥
मस्तक बल सो नूर असलकह । आदि कि उत्पतिको सूरय वह॥
दृष्टि सदा जग उत्पति सारा । पलक मारन दिनरात उचारा ॥
दक्षिण दिशकी भृकुटी जोई । प्रीति देवता महतर सोई ॥
बाम और भृकुटी जो लस्ता । कहर कोध सुर कहे देवस्ता ॥
मस्तक सो तपलोक बखानो । सो जनलोकके ऊपर जानो ॥
शीस खोपड़ी लोकालोकू । सब लोकनते उपर विलोकू ॥
शिर कच महाप्रलय घनकारे । तनरोम नोक वनस्पति भारे ॥
रूप अनूप लक्ष्मी जाना । देहकार्ति रवि प्रभा प्रमाना ॥
महापुरुषको सोहैं गेहा । जगमें जेती मानुष देहा ॥
आतम चिदानंद करि मानी । खास महल पूर यतन ज्ञानी ॥
खास जबही नीचेको जाई । सारी सृष्टि तबै प्रकटार्ई ॥

१३३

जीवधर्मबोध

( २०४१ )

जिहि औसर बिच श्वासा रोका। हरा होय तब सब जग लोका ॥
जबहि श्वास ऊपरको खींचा। महाप्रलयहो सबकी मींचा ॥
दोहा-पिंड और ब्रह्मांडमें, रंच भेद नहीं वाद।
नानक सत्यकबीरको, अब सुनिये संवाद ॥

नानक वचन

तीन लोककी कहो गुसाईं। कैसे जानि परे तन माही ॥
कहीये दयासिंधु मोहि बानी। तुम निज पुरुष पुरातन ज्ञानी ॥

जिंदा वचन

हेठ चरण दैं शीश अकाशा। तीनलोक देही प्रकाशा ॥
शब्द खंड ब्रह्मांडमें सोईं। माया ब्रह्म फैल घट दोईं ॥
हमरे पदको लहै न कोई। भले बूझ तुम पारख होईं ॥

नानक वचन

चार दिशा मोहि कहो गोसाईं। सातद्वीप निज कहो बुझाईं ॥
प्रभु नौरखंड अब कहो बखानी। चंद्रशूर तन कैसी मानी ॥

जिंदा वचन

आगा पीछा दक्षिण बाना। चार दिशा देही प्रमाना ॥
साठे तीन हाथकी देही। उनचास कोटि बिसियाहै पेही ॥
नवो खंड नौ संधी जानो। पिंड अंडको लेखा मानो ॥
परवत यामें हाड लगाया। धड पास ब्रह्मांड रचाया ॥
चंद्र शूर द्वै नेत्र जगावा। देखो पीठ सुमेर बनावा ॥
नसन दिया तन भीतर जानो। पेट गंडार पिंडमें मानो ॥

नानक वचन

तत्त्व प्रकार कही तुम वानी। वाकी शब्द संधि पहिचानी ॥
सातसमुद्र कहो बखानी। तुमही पुरुष पुरातन ज्ञानी ॥

जिंदा वचन

जीभ नासिका नेत्र बखानो। श्रवण नाभ गुद इंद्री मानो ॥

( २०४२ )

बांधसागर

१३४

खार मीठ जल सब पहिचानो । नौसौ नदी पिंडमें मानो ॥
श्वासा नदी नासिका वासा । जिह्वा स्वाद करे रस भाखा ॥
ये समुद्रमें जाय समानो । है गंडार नहीं त्रिसानो ॥

नानक वचन

सात समुद्रकी लहर बखानो । इनकी लहर कौन विधि मानो ॥

जिंदा वचन

काम अरु क्रोध लोभ हंकारा । मनमायाकी लहर अपारा ॥
अग्नि पौन पानी प्रचण्डा । पांच तत्त्व बतैं नौ खण्डा ॥

नानक वचन

बाही लहर हीरा अरु मोती । यामें कहा निकसि है सोती ॥
सभी भेद मोहिं कहु गुरुदेवा । नहिं छोड़ो अब तुमरी सेवा ॥

जिंदा वचन

जब गुरु मिलै भुङ्ग सम रंगा । ब्रह्मज्ञान उपजै सतसंगा ॥
सुमिरन भजन होय परकाशा । अनहद ध्यान पुरुषकी आशा ॥
अर्श गैवमें ध्यान लगावै । तवासिंधु थाह कोइ पावै ॥
जाय हंस तहैं डुबकी मारा । ले निकसे तब वस्तु अपारा ॥
हीरा लाल नाम परकाशा । शब्द सुरति हंसाको बासा ॥
कथा समाज निकसिहै ज्ञाना । सो हीरा मणि माणिक जाना ॥

नानक वचन

खार मीठ जल इहां अपारा । उहां कहाँ गुरुकर निर्धारा ॥

जिंदा वचन

नयन नाक इन्द्री जल खारी । गुदा श्रवण जानौ जलधारी ॥
खार मीठ जल सभी भरा है । जो ब्रह्मांड सो पिंड कहा है ॥

नानक वचन

इहां है काठ लोहकी नौका । कहो स्वामी व्यौहार वहांका ॥

१३५

जीवधर्मबोध

( २०४३ )

जिंदा वचन

नाम पुरुष नौका इहां भाई । खेवट संत गुरु संत मिलाई ॥
पुरुष शब्द सुमिरो लौ लाई । पुरुष प्रताप उतारि चल भाई ॥

नानक वचन

धन्य कबीर परम गुरु ज्ञानी । अमरभेद भाषी निज बानी ॥

साखी-तिलघोटत तारी लगी, दिलदरियाके तीर ।

नानककी संशय मिटी, जो सतगुरु मिले कबीर ॥

चौपाई

बहुरि अर्ब यूनानके ज्ञानी । पिंड अण्ड सम तूल बखानी ॥
जो सबही ब्रह्मांडमें देखो । पिंड केर सोई है लेखो ॥
अस्थि पहाड़ है मेघ पसीना । शिर नभ इंद्री कर्म प्रवीना ॥
सुर नर सुनि ग्रंथव अरु देवा । पिंड अण्डमें एकै भेवा ॥
सकल भांतिके पशु खग नाना । कर्म करंत बसै परधाना ॥
भोजन पावक पौरुष जोई । सोई रसोईदार कहोई ॥
जो बल अंतमें भोजन धरई । गन्धी नामक तासुको परई ॥
जो बल रुधिरको श्वेत बनावै । नारि कुचनमें दूध कहावै ॥
अण्डकोष नर बीरज धोवै । धोबी नाम तासुको होवै ॥
भोजन अंगमें बाटनहारा । नाम बंधानी तासु उचारा ॥
जल जो पसीना रूप निकारी । सो कहिये सक्का पनिहारी ॥
जो भोजन मल बाहर डारे । नाम हलाहलखोर सो धारे ॥
बात पित्त जो अन्तर गहई । सोई न्याय करंता कहई ॥
यह विधि सब पशुखगतनमाही । कोध स्वरूपी बीग सो आही ॥
अंड पिंडकी अकथ कहानी । मैं कछु सूक्ष्म लिखा प्रमानी ॥
दोहा-बूँद समाना सिंधुमें, यह जाने सब कोय ।
सिंधु समाना बूँदमें, जाने बिरला सोय ॥

( २०४४ )

बोधसागर

१३६

कुंडलिया

जाते बिरला सोय होय जब सतगुरु दाय।
मैंहि मैं सब ठौर और सबही भ्रम छाया ॥
भ्रम छाया सब और दौर मन ज्ञान कि टट्टी।
टट्टी जब टुटि जाय आय नहिं पुनि या हट्टी ॥

इति ब्रह्मांड पिंड

अथ सर्वदेशभाषाकी एकता

दोहा-जेते मानुष जत्कमें, हिंदू सबकी आदि।
भाषा सारे जत्ककी, संस्कृत पितु है बादि ॥

चौपाई

संस्कृत कह सोधित जनको। सोई पिता सर्व भाषनको ॥
संस्कृतके जो गुण औगाहा। ताकी नहिं कोई पावे थाहा ॥
वेदकि संस्कृत जो आहीं। अबके पंडित ससुझत नाहीं ॥
एक सूत्रके अर्थ अपारा। कह सब निजु निजु मति अनुसारा।
मर्म न जाने अर्थको सोई। यथा बुद्धि भाषे बुध लोई ॥
गूढ अर्थ जाने ब्रह्म-ज्ञानी। गुप्त वस्तु जेहि कछु न दुरानी ॥
संस्कृतको वर्ण बिचारो। और न कहुँ अस युक्ति निहारो ॥
प्रथम संस्कृतको वर्ण माला। और न कोई भाषामें भाला ॥
आदिके अक्षर बारह स्वरको। ब्रह्मस्वरूप जानिये तिनको ॥
अ आ इ ई उ ऊ ए ऐ ओ कह। औ अं अः रामरमित सब यह ॥
बारह ब्रह्म वसै ब्रह्मंड। कथै कौन सब गुणमय मंडा ॥
एक अकारते बारह स्वर हैं। व्यंजन सकलको परम पितर हैं ॥
सबके आदि है एक अकार। ताते वृद्ध भये पुनि बारा ॥
बारह रूप अकार सो बनेऊ। न्यारे न्यारे कारज ठनेऊ ॥
एक थूल यक सूक्ष्म रूपा। थूल प्रकट सूक्ष्म रह गूपा ॥
थूल अकार जो सूक्ष्म भैऊ। सो सब बरणनमें रमि गैऊ ॥
वासुदेव सब माहि बिहारी। कोई साधुजन सकै निहारी ॥

१३७

जीवधर्मबोध

( २०४५ )

निर्गुणते सरगुण जब भैऊ । ताहीको ककार जग कहेऊ ॥
जब अकार निज रूप गहाया । है ककार दशमें दरसाया ॥
पुत्र पौत्र सही तथा न कर । क ख ग घ ङ दशमें दर ॥
पञ्च ब्रह्म रह दशमें द्वारा । तिनके पुत्र अग्र पग धारा ॥
तालूपर सो कीन बसेरा । च छ ज झ ज सोई टेरा ॥
तिनते पुनि ट ठ ड ढ ण भैऊ । तालू अग्रवास तिन लैऊ ॥
त थ द ध न फिर आगे आये । दंतमूल सो बैठक पाये ॥
प फ ब भ म अधरनपै बैठारी । मुख कपाट सो दीन उचारी ॥
य र ल व श ष स ह क्ष त्र झ अगाहा । बाहरको कर चले उछाहा ॥
खोलि कपाट सो बाहर बिचरे । ब्रह्मवेत्ता बुध बानी उचरे ॥
संस्कृतके हैं अक्षर जोई । सबके पिता जानिये सोई ॥
बारह ब्रह्म सकल व्यंजनमें । धरि लघुरूप रमे सब तनमें ॥
जड़ चेतन सब माह बिहारी । जो चीन्है सो ब्रह्माचारी ॥
वासुदेव है आदि अकारा । सो रमिरहा सकल संसारा ॥
आदि ब्रह्म अकार कहाये । जहँ तहँ सोइ रहा जग छाये ॥
लखोन जाये अलख अविनाशी । सर्व खानिमें स्वतह प्रकाशी ॥
सोई अकार जो भयौ विकारी । रचनासरिसो जक्त पसारी ॥

दोहा-जब अकार ब्रह्मांडसे, भूत मंडलमें आये ।

दशमें दर परथान कर, सोई ककार कहलाये ॥

सो ककार काया रचे, जनक जगत करतार ।

तारण कारण जीवके, गुरु है सो तनधार ॥

चौपाई

अब दुतिये बिधि कहो बखानी । आदि संस्कृत जावे जानी ॥

सर्व वेदकी भाषा जोई । एक मिलान बखानो सोई ॥

सब यूनानके देवी देवा । हिंदूको पूजा अरु सेवा ॥

हिन्दू जाको श्रीकह गाये । सीरिज यूनानी बतलाये ॥

( २०४६ )

बोधसागर

१३८

इत जो देव गणेश बखानी । सो गम्मस रूमी यूनानी ॥
इंद्रको हिन्दू कह देव पितर । उत जु पितर कह लाववप्रधर ॥
हिन्दू अनपूर्णा कह भाषी । अनपूर्णा यूनानी साषी ॥
संस्कृतमें जो पित्र कहावै । सोई पारसी पितर बतावै ॥
अंग्रेजीमें फादर सोई । मातर मादर कहिये जोई ॥
आता प्रादर नाम कहीजै । कृतकार कृतगार भनीजै ॥
अंग्रेजी कृयटार कहावै । हिन्दू सो करताहि बतावै ॥
मिह संस्कृत सूरज भाषा । अरबी मिह नाम सोइ राखा ॥
अब्र संस्कृत बादल बोले । अब्र पारसीमें सोइ खोले ॥
पुत्र संस्कृत सुअन कहावै । अंग्रेजीमें सन बतलावै ॥
पृष्ठ पारसी पुस्त प्रमाना । नैन सो अबीऐन बखाना ॥
सृष्टि संस्कृत कीन बखाना । सो पारसी सरिस्त प्रमाना ॥
दुहिता संस्कृत बेटी होई । सो पारसी दुखतर कह सोई ॥
सो डाटर अंगरेजी माहीं । अस्व अस्य लो हार्स कहाहीं ॥
शब्द अनेक बकी यक ताई । बुधवन्तो सो लेहु मिलाई ॥
भाषा बहुत पढ़े जो कोई । बोलके मेल मिलावै सोई ॥
अब तृतिये दृष्टांत निरेखे । संस्कृत व्याकरण परेखे ॥
जो व्याकरण संस्कृत माहीं । ऐसो शुद्ध और कई नाहीं ॥
संस्कृतसे है अरबी बानी । मिश्री यूनानी अलेनानी ॥
संस्कृतसे सब गुण महि सारी । उक्ति युक्ति कछु भिन्नसवारी ॥
अब चौथे यह भाषो भेदा । सर्व शास्त्रके प्रथमहि वेदा ॥
चारो महा बाल है जोई । संस्कृतमें पुनि उजरी सोई ॥
पुनि पञ्चम अस कहो बखानी । ताते आदि संस्कृत जानी ॥
मुख्य नाम परमेश्वर केरा । संस्कृत की बोलीमें हेरा ॥
और बोलमें आवत नाहीं । संस्कृतमें शुद्ध गहाहीं ॥
अब छठये यहि विधिते सुनिये । ताते आदि संस्कृत गुणिये ॥

१३९

जीवधर्मबोध

( २०४७ )

सत्य कबीरके नाम जो चारो । चहुँयुगमें भिन्न भिन्न उचारो ॥
सत्य सुकृत सुनींद्र कहाये । करूनामय स्वामी बतलाये ॥
कलियुग माह कबीर उचारो । चारों युगके नाम हैं चारो ॥
नाम संस्कृतमें युग तीनी । कलियुग मिश्रीत करि दीनी ॥
अरबी संस्कृत मिश्रीत कबीरा । हिन्दू सुसलमान गुरु पीरा ॥
जेते और कबीरके नाऊ । सबही संस्कृत माह कहाऊ ॥
सतये स्वसंवेद कह येही । अज हरि हर मथुरा धर देही ॥
तीनों देव पिता सब नरके । तीन लोक ब्रह्मा हरि हरके ॥
ब्रह्म श्वासते वेद उपानी । उचरे तीन देव सुख बानी ॥
संस्कृत सुर बानी होई । ताते श्रेष्ठ और नहिं कोई ॥
इति देश

अथ ब्रह्मा और आदमकी एकता—चौपाई

ब्रह्मा आदम एकै अहई । सत्यकबीर बचन अस कहई ॥
ब्रह्मा सावित्री नर नारी । आदम होवा ताहि पुकारी ॥
ब्रह्माको काशीमें वासा । अदनवाग सो नाम प्रकाशा ॥
काशी सम कोइ पुरी न आना । देखो काशी खंड प्रमाना ॥
बन अनंद पथमें कहलाया । वाराणसी बहुरि बतलाया ॥
नाम तासु कहिये पुनि वासी । सब अनंद सब सुखकी रासी ॥
वाराणसी सो भयो बनारस । सुखसे सावित्री ब्रह्मावस ॥
आदिमें कहे जो वन आनंदा । अरबी अदनबाग सुखकंदा ॥
वन है बाग अरबकी भाषा । नाम अनंद अदवसों राखा ॥
उलटि आनंद अदन हो सोई । कहे अरब पारसके लोई ॥
संस्कृतकी बोली बहुतेरी । अरब लोग उलटा कहि टेरी ॥
वन अनंद बाग अदन जो भैऊ । वाराणसी बनारस कहेऊ ॥
अरब न संस्कृत सके उचारी । उलटा सुलटा सो करि डारी ॥
इति आदमब्रह्मा

( २०४८ )

बोधसागर

१४०

अथ मनुशतव्रता और नूहकी एकता-चौपाई

मनुशतव्रता नूहको जानी । पल्लय पयोध जो राख्यौ प्राणी ॥
नाव बहेतरा मनु नृपाला । रच्यौ बचावनजिव तेहिकाला ॥
ताही बहेत्रा सकल चढ़ाई । तेहि औसर जल परलय आई ॥
तब हरि लियौ मीन औतारा । दौय सींग निजु शीशमें धारा ॥
मीन रूप जो विष्णु बनाई । ताहि बहेत्रा शृंग लगाई ॥
भलिबिधि बांधे बहेत्रा ताही । निजु बलते गहि राख्यौ वाही ॥
नाव बाँधि हरि आन्हा दैऊ । मनुजाये तह आसन गहेऊ ॥
लीने सप्तऋषी निजु संगा । आठ जीव बैठे यहि ढंगा ॥
चहुँ दिश तबहि जलामय होई । भे संहार बचा नहिं कोई ॥
तरे बहेत्रा जलके माही । आठो जीव तहां बचि जाही ॥
प्रलैय कीन फिर सृष्टि बसाये । धर्म महम्मद अस बतलाये ॥
प्रलय पिछारी नूह पुकारा । प्रथमें नाम और कछु धारा ॥
आदिको नाम नूह ना होई । बदलि गयौ पीछे ते सोई ॥

इति मनुशतव्रत।

अथ महादेव और महम्मदकी एकता-चौपाई

श्रीमुख सत्यकबीर बखानी । महम्मद महादेव सो जानी ॥
महादेव क्षत्री रन वाके । सोह महम्मदकी है साके ॥
धर्म जासुको शस्त्र प्रहारा । सोई करे सृष्टि संहारा ॥
तमगुण आदिमें वेद बखाना । रुह महम्मद प्रथम उपाना ॥
तमगुण आदि सृष्टिको करता । भवसागर ताते थिर धरता ॥
भव है नाम महादेव केरा । ताते यह भवसागर टेरा ॥
भव भवानी द्वै रूप बनाया । भवसागर सरदारी पाया ॥
शिवके संग नारि द्वै जानी । शीश गंग कटि गौरि भवानी ॥
महम्मदमें मकार द्वै देखो । दोहू नारि तेहि संग विशेषो ॥
दोउ मकार महम्मद नामा । गंग गौरि बरणो वर बामा ॥

१४१

जीवधर्मबोध

( २०४९ )

आप भिखारी अनधन देही । महम्मद महादेव है येही ॥
धन अरु दर्ब चाकरन पाही । आप अलोनो साग जो खाही ॥
महा उदार महम्मद दाता । जत्तमाह सो शिव विख्याता ॥
योग भोग दोनों गुण भीजा । साबर मन्त्रो दोवा तवीजा ॥
योग युक्ति शिववर्त बताया । उत नमाजा रोज ठहराया ॥
ये ऊँकार शब्द गोहरावै । वे भोरे उठि बाग उठावै ॥
खड़ी एक नस महम्मद माथे । दंडाकार तिलक तेहि साथे ॥
प्रकट दोऊ भृकुटीके बीचे । मस्तक अंत प्रजंतलों खींचे ॥
जस कबीरमुनि तिलक कराही । सोई महम्मद मस्तक माही ॥
कोधवंत जब महम्मद बोले । तेहि औसर सोई नस डोले ॥
रोमधार यक उर बिच धारी । सोऊ दंडाकार सँवारी ॥
नाभिते कंठप्रजंतलो सोही । जन कबीर मुनि रूप है ओही ॥
शिवके संग रहे बहु देवी । तिमि बहु तारि महम्मद सेवी ॥
चीन्ह चक्र सब ताके साथ । आदिभक्ति सोई पशुनाथा ॥

इति श्रीमहादेव और भहम्मदकी एकता

अथ हनुमान और अलीकी एकता

छन्द—मूलना

हंक हनुमानते लंकमें शंकभ अलीके हंक गढ बंक टूटे ।
अली हनुमान दोऊ बांहके बली अरि अनी दलमली ज्यौ
सनी कूटे ॥ १ ॥ शूद्र जेहि शत्रुगण वीर्य सामुद्रधन रुद्र शिव
देखि दल दैत फूटे ॥ शूर संग्राममें गुणनके धाम दोऊ अली
हनुमान गुणमाहँ जूटे ॥ २ ॥

इति हनुमान

अथ परशुराम और मूसाकी एकता—चौपाई

परशुराम मूसा यकताई । ऐसे दोहुको मेल मिलाई ॥

( २०५० )

बोधसागर

१४२

विप्र अवज्ञा कीनो हरिकी । क्रोधवन्त कमला तबसरकी ॥
विष्णुकि छाती चरण प्रहारा । सब दुःख द्रन्द्व घेर तिहि बारा ॥
रहे बेहाल काल बहु तेरे । तब प्रभु तिनिहि दयाद्वग हेरे ॥
परशुराम लीनों औतारा । ब्राह्मण कुलको पा ८नहारा ॥
विद्या बुद्धि तपोधन धारी । रूप शील बल वीरज भारी ॥
सो द्विजराज काज चित दीने । क्षत्री मारि निछत्तर कीने ॥
तथा यहूदिन विकल विचारा । तब मूसा लीनो औतारा ॥
सो फिर उनको मारि नसाया । इवरानिनको प्राण बचाया ॥
विद्या बुद्धि निपुण गुणखानी । बल वीरज शोभा सरसानी ॥
परशुराम कर फरसा जोटा । तैसे मूसाके कर सोटा ॥
जैसे ब्राह्मण तथा यहूदी । दोनों माह देखिये खूदी ॥
कुल अभिगान दोहुनमें भारी । अबिरहाम वंश तन धारी ॥
परशुराम मूसा यक सारा । दोनों विष्णु केर औतारा ॥

इति परशुराम और मूसा

अथ कृष्ण और कृष्णकी एकता—चौपाई

कृष्ण कैष्ट दोउ एक समाना । हरि औतार धरे नर बाना ॥
कैष्ट नाम ईसाको आही । अंग्रेजी बोलीके माही ॥
हिंदू कहे कृष्ण जगदीसा । ईसा इनके ईस हैं ईशा ॥
कृष्ण आगमन जबहि जनायौ । सो सुनि कंसराय भय पायौ ॥
इसा जन्म भव्य सुनि काना । तबहि रोद भूपति भय माना ॥
कृष्ण जोजन्म भयौ जेहि बारा । चहुँदिस फैल गयौ उजियारा ॥
कंसकी डर वसुदेव डेराये । मथुरासे गोकुलमें ल्याये ॥
यथा कृष्ण मथुराको त्यागे । तैसे ईसाको ले भागे ॥
गर्भसे जब ईसा प्रकटाने । चहुँदिश तबहि तेज चमकाने ॥
यूसुफ नृप हिरौद भय पाई । ले मसीहको मिश्र सिधार्ई ॥
कृष्ण जन्म सुनि कंस डेरायो । केते बालक मारि नशायो ॥

१४३

जीवधर्मबोध

( २०५१ )

ईसा भय हिरोद भूपाला । हने बहुत बालक तेहि काला ॥
रोग अनेकन कृष्ण घटाये । जीव केर दुःखद्वन्द्व हटाये ॥
मृतकहूको फेरि जिलाये । गुण अनेक कहलों बतलाये ॥
सा सबही गुण ईसा माहीं । देखि द्वैतदल दूर पराहीं ॥
इन असुरनको मारि नशाया । उन भूतन अरु प्रेत भजाया ॥
कुबरी कूबर कृष्ण सुधारा । तिमि ईसा कुबरी सुखसारा ॥
साठि हजार शिष्य संग लयऊ । दुर्वासा ऋषि आवत भयऊ ॥
चावल एक कृष्ण भंडारा । सबको तृप्त कीन तेहि वारा ॥
रोटी पांच मीन द्वै रहई । सो मसीह निज करमें गहई ॥
पांच हजार भीर नरदीसा । सबको पेट भन्यौ तेहि ईसा ॥
ज्वाला कठिन कृष्णकर घाटा । ईसा अंधकारको डाटा ॥
अर्जुन पर हरि कीनी दाय। तिहि निजरूप विराट देखाया ॥
तिमि ईसा शोभा सरसाई । निजशिष्यन निजरूप दिखाई ॥
कृष्णमें केते गुण सरसाई । तिमि कोइ गुण ईसा अधिकाई ॥
कृष्ण किष्ट दूनों यक रूपा । उभय भये भवसागर भूपा ॥
कृष्णमृत्यु जिमिप्रथम बताया । भील तीरते प्राण नसाया ॥
जगमें जगन्नाथ जग मगही । कृष्ण अस्थि हरिमेला लगही ॥
ईसा को तिमि क्रूस चढाये । जिये बहुरि निज पंथ चलाये ॥
इन गीता उत कथा इञ्जीला । दोनों विष्णु स्वरूप सुशीला ॥

इति श्रीकृष्ण और कृष्णकी एकता

अथ राजा और पण्डितकी एकता चौपाई

राजा पंडित एक समाना । जगमें श्रेष्ठ दोहूका जाना ॥
राज पाये इनके मद भारी । विद्या मद उनके अधिकारी ॥
ये बस करे सेन ले लोहा । अमृत वचन ते मेमन मोहा ॥
ये धन हरबे मनको हरते । हुकुम दोहूको जगमें बरते ॥
इन धन अरु दर्प घनेरा । उनके विद्या धन बहुतेरा ॥

( २०५२ )

बोधसागर

१४४

दिग विजयी दोनों तन धारी । विषयानंद अहै संसारी ॥
इनकी तृष्णा न धनते हटई । वह दिन दिन विद्यामें डटई ॥
धन विद्या बन माह भुलाने । ताते नहीं सतपदको जाने ॥
दोना जो विषयनको तजई । है निरद्वंद जो हरि पद भजई ॥
जत्कमें उत्तम देखो जैसे । भक्तमें श्रेष्ठ होहि सो तैसे ॥
विद्या भक्तिको अंग विचारी । तासु दृष्टि पांडितको भारी ॥
ताते बुध नृपते बड़ अहई । वेद प्रमान शास्त्र अस कहई ॥
विद्याधन सब धनन बड़ेरा । अंग सद्ग ताको नित हेरा ॥
राजकर्म पंडित आधीना । बिन पंडित हो महीप मलीना ॥

इति एकता

अथ भवसागर वर्णन

दोहा-भवसागर वर्षा न करो, सुनो सयाने सन्त ।
जामें गोता खात जिव, लहै न कोई अन्त ॥
सोरठा-भाँति भाँतिके जीव, चौरासी लख योनि जग ।
विलग विलग कर पीव, खानि-खानि बिलगायके ॥

चौपाई

यह भव उदधि अपार बखाना । गोता खाहि जीव विधि नाना ॥
चौरासी लख योनि भ्रमावै । बूढ़े उछले पार न पावै ॥
जेते जीव भवनधि तन धारी । मानुष देह मुक्ति अधिकारी ॥
सो मानुष तन दुर्लभ कैसे । जैन धर्म वर्णन कर ऐसे ॥
यह दृष्टांत सुनाये सोई । अस चौड़ा सागर जो होई ॥
कोटिन योजनकी चौड़ाई । भवनधि थूल कहा कहिजाई ॥
बैल केर जूवा गहि लीजै । जूवा डंडा अलग करीजै ॥
तेहि समुद्रके एक किनारे । जूवाको डंडा गहि डारे ॥
जूवा डारे दूजे छोरा । मारे वायूको झकझोरा ॥
बहुत फिरे डंडा अरु जूवा । बहै सदा इत उत सो हूवा ॥

१४५

जीवधर्मबोध

( २०५३ )

जो संयोग कबहु गह सोई । जूवा दंड यकठे होई ॥
आपै आप मिले जो आई । पैठे ताहि छिद्रमें जाई ॥
बिन सहाय जूवामें पैठे । पहिली ठौर ठेकाने बैठे ॥
ऐसी दुर्लभ मानुष देही । चौरासी भ्रम पावै येही ॥
धर्म महम्मद बहुरि बतावै । एक बार मानुष तन पावै ॥
सूसा ईसा मतमें सोई । फेर नहीं मानुष तन होई ॥
वेद करे पुनि ऐसे वर्णन । पुनि पुनि जीव लहै मानुष तन ॥
आठ लक्ष योनी भ्रमि आवै । पुनि गह जीव मनुष तन पावै ॥
सत्यकबीर जो बचन उचारा । अति दुर्लभ मानुष औतारा ॥
नरतनु पाये न भक्ति विचारा । सो पापी आतम हत्यारा ॥
सुरदुर्लभ यह मानुष देही । सो तन लहै भजु परम सनेही ॥
चार खानिके जीव अपारा । जो थावर जंगम तन धारा ॥
कोइ दीर्घ कोइ सूक्ष्म देखो । भारी थूल हरु लघु लेखो ॥
नाना वर्ण और गुणधारी । पूरि रहे भवसागर झारी ॥
युगन प्रजंत काहु थित गाई । अतिसै लघु आयू कोइ पाई ॥
स्वर्ग नर्क चौरासी लाखा । सो सब अंड पिंडकी साखा ॥
भवसागर त्रिदेव भे राजा । सब जिव तिनके देठ विराजा ॥
सोई सुर सुरपति शिरताजा । तिनके हाथ है काज अकाजा ॥
भवसागरमें द्वै तट जानो । एक लोक यक वेद बखानो ॥
वेद कूलपर मन आसीना । लोकछोर माया गहि लीना ॥
मध्यमें तीन देव गुणधारी । महा अपर्बल पाँच शिकारी ॥
भ्रमसागर कहिये भवसागर । दश दिश काल मचायौ झागर ॥
भव पुनि भगको नाम कहावै । तामें सब जिव आवै जावै ॥
भव शिव नाम भवानी पतिको । जीव लखै को ताकी गतिको ॥
तीनों लोक वसै भग माही । बिन गुरु कृपा न बाहर जाही ॥
कोटिन योग युक्ति जो करिये । भग मारग पुनि पुनि पग धरिये ॥

( २०५४ )

बोधसागर

१४६

चौरासी लख मीन बनाये । मन मछुवा सब तिनहि फसाये॥

सत्यकबीर वचन-शब्द

तन झौपडी मन बसै महरवा ।

नान्हेनान्हे डोभवन बीनै महजरवाडारि दिये नियक भरमसगरवा ।

गहिरैमें महरा पैठि न सकै विन बूड़े नहि मिलत सिकरवा ॥

यक ओर महरा यक ओर महरी मारि लिहे नियक मोहमछरवा ।

कहै कबीर सुनो भाई साधो ताकि लिहे नियक अमर सहरवा ॥

चौपाई

तीन देवमें विष्णु बड़ेरे । तिनको हुकुम फिरे चहुँ फेरे ॥

तीन लोक भवसागर माही । तीन देव तहाँ राज कराही ॥

तीन लोकको सूत्र बखानो । जामें सकल जीव भरमानो ॥

प्रथमहि विष्णु सर्व शिरमौरा । तासु हेठ सुरगण सब औरा ॥

दुतिये पौरी विद्याधर है । नहीं देवता नहिं सो नर है ॥

सुर नर माह जान यह सीढी । भाषो बहुरि तीसरी पीढी ॥

नर वानर यक लेखे कहिये । यक व्यौहार दोहमें लहिये ॥

दोनों बीच भेद अति थोरा । पशु अरु मानुषमें यह डोरा ॥

विन दुम नर कपि पूछ समेता । नर वानर यक गुण कह केता ॥

औरैंग औटैंग वानर जोई । नर आकार सर्व सो होई ॥

अंगरेजीके ग्रंथन माहीं । विना पूछ वानर यह आहीं ॥

दोनों पगते नर ज्यों चाले । दोनों हाथ काममें डाले ॥

वानर इतर जाति बहु तेरे । भिन्नभेद क्रम क्रमसे हेरे ॥

अंगरेजी अखबार बखाने । द्वै मानुष दुमदार लखाने ॥

हवशदेशको जंगल जहँवा । द्वै मानुष दुम युत रह तहँवा ॥

डेढ़ हाथकी पूछ सो गहई । मादमें पशु समान सो रहई ॥

एक जाति मानुषको आही । रहे हिमालय पर्वत माही ॥

ऐसो निकट छोड़ तनधारी । पंछिन संग मचावै रारी ॥

१४७

जीवधर्मबोध

( २०५५ )

चील्ह गीध गहि गगन उड़ाही । तेहि मानुषको धरि धरि खाही॥
तब सो नर गण जोरि सहाई । पंछिके संग करे लड़ाई ॥
ऐसे विविधि भांति नरजाती । तिनकी कथा न कथे सिराती ॥
नानारूप बरण गुणधारी । जहाँ तहाँ पृथ्वी माह विहारी ॥
चार लक्ष मानुषकी जाती । तिनकी कथा कथे बहु भांती ॥
जलमानुष थलमानुष देखो । वनमानुष आदिक बहु लेखो ॥
पशुमानुष कहु मिश्रित होई । अकथकथा कहि जात न कोई ॥
बहुरि कहो मानुष पशु ख्याला । सब परिवार जो करे उगाला ॥
भोजन पीछे पागुर करही । बिन उगाल तिनको दुःखधरही ॥
पशु नर नरपशु एक सो हेरी । देखहु कुदरत करता केरी ॥
छायारूपी नर कहु सरसै । चेष्टा दीख रूप नहिं दुरसै ॥
रचना विविधि भांति कहि गार्ई । ताको लेख लिखो नहिं गार्ई ॥
चौथो सूत्र बहुरि कहि गावो । जलचर मानुष मेल मिलावो ॥
रह समुद्रमें गर्गन मच्छी । अर्थ है मीन अर्थ तिय अच्छी ॥
कटिके ऊपर सुन्दर नारी । अर्थहेट मच्छी तनधारी ॥
कबहुके सागर तीर सुरखारी । कबहुके जलमें गोता मारी ॥
भुंगी ऋषि शिर सींग बताई । मुखमें सुण्ड गणेश गोसाई ॥
पंचम पौरी करो बखाना । पशुपंछीको मेल मिलाना ॥
चाम सुन्दरी वाको कहई । दोनों रंग ढंग गुण गहई ॥
सो नहिं खग अंडजकी जाती । चाम गूदरी है बहु भांती ॥
नहिं पशु नहिं खग मध्यम थापू । सुरगी एकसै परसे टापू ॥
वृद्ध नारि सो सुख है जाको । जब कोइ दुःख देत है वाको ॥
रुदन विलाप करे जस नारी । केते पशु खग नरगुण धारी ॥
दाडुर एक अमेरिका देश ! रुदन करे जब लहे कलेशा ॥
छठी पौरी बरणो सोई । जो चेतन रूप जड़ होई ॥

( २०५६ )

बोधसागर

१४८

लजवंयक पौधा चेतन । पशु पंछी सम चेत तासु तन ॥
जड़ चेतन गुण दोहू गहावै । पशु पौधाको मेल मिलावै ॥
सतई पौरीको अर्थावो । जो चेतन जड़ सम स्थिलावो ॥
पलपी तारा दोनों मछरी । सो सम चेतनते अति पछरी ॥
जड़ समान यक ठौर गहाई । हले न चले गहे थिरताई ॥
पलपी देह दाग बहुताई । जो कोइ ताको काटै जाई ॥
जैसे माली कलम लगावै । फूल बेलको काटि बनावै ॥
जेतनो टूक करें कोइ ताको । होहि पालपी सबही वाको ॥
जेतनी दाग रहे तब माही । सो सबही पलपी है जाही ॥
जड़ चेतन दोऊ ता ढंगा । जड़समान चेतनको अंगा ॥
अष्टम पौरी कहो बखानी । जड़मय योनि गोदजिव जानी ॥
नर नारकी लोक जिव पौरी । जड़सम सदा रहै एक ठौरी ॥
नर्कहेत नारकसो नाही । जैन मते दुख देखो नाही ॥
तीन लोकको सत जो भाषा । काया तरुकी पह सब साषा ॥
जैसो कर्म जीव जो कर्ता । तैसो तनधरि जगमें वर्ता ॥
सब जिव पुण्य पापकी आसा । पुनि पुनि कर योगिनमें वासा ॥
इति जीवधर्मबोध समाप्त

This image shows a blank, aged page with a light beige or cream color. The surface has a subtle texture and slight discoloration, characteristic of old paper. There are no markings, text, or illustrations on the page.

The emblem is centered on a red background. It consists of a golden teardrop-shaped frame containing the Devanagari word 'प्रेमी' (Premi). Below this frame is a golden ribbon or banner with the text 'खेमराज श्रीकृष्णदास' (Khemraj Shri Kunnadas) written in Devanagari script. The entire emblem is surrounded by a wide, ornate golden border with a repeating pattern of stylized floral and geometric motifs.

खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई.