कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
( ६० )
बोधसागर
कटुम मधुर अरु तित्त बखाना । अमल कषाय पंच परमाना ॥ रसके उदय रसीली काया । निजुनिजुप्रकृतिजीवसबपाया ॥ जो प्रकृत जाको उगि आवै । तिमि सो देह रसीली पावै ॥ तेरही प्रकृत गंधमय जाना । दुविधि कुगंध सुगंध बखाना ॥ जो जिव जैसी प्रकृत बंधा । ताके तनमें तैसो गंधा ॥ परसनाम चौदही बर्नीजै । आठ शाख तिहि माहैं गनीजै ॥ चिकनी रूप कोमल कठिनाई । लघुभारी तप शीतलताई ॥ औ चिकनी प्रकृत सुभाया । तब जीव गहै चीकनी काया ॥ रूपी प्रकृति उदयहो जिनकी । रूपी काया देखो तिनकी ॥ कठिनउदयतिन कठिनविहारो । मृदुल उदय मृदु अंग निहारो ॥ तस उदय हो तप तन येही । शीतल उदय शीत सो देही ॥ भारी नाम जो प्रकृत उद्योता । सो जिव भारी तनधरि होता ॥ लघुप्रकृतिजिहिजिवकह परई । हरई काया सो तब धरई ॥ चौदह पिण्ड प्रकृति यह भाषा । कहो बहुरि तिहिपै सठ शाखा ॥ अब अपिंडको वर्णन कीजै । अट्टाइस शाखा गनि लीजै ॥ प्रकृतअगुर लघु जब उगिआवै । जीव अगुर लघु तन तब पावै ॥ जबअपु घावउदय निजअंगा । आपु दुखी नर तासु प्रसंगा ॥ जब परघात प्रकृत परकाशा । तब जिव औरकोप्राणविनाशा ॥ जब उश्वासा प्रकृत निवासा । तब जिव लेत श्वास उश्वासा ॥ आतप उदय यथा इन भानू । उदितउदय तब शशीसमजानू ॥ तिस प्रकृत जब प्रकट निहारी । जंगम तनधरि जीवविहारी ॥ थावर प्रकृति प्रकाश जो होई । थिर तनधरि जिव चलैनकोई ॥ सूक्ष्म प्रकृति जाहिको परई । औरके मारे सो नहिं मरई ॥ बादल उदय न तन पावै । सबके मारे सो मरि जावै ॥ प्रजापति प्रकृति प्रकटाई । पूरी परजापति जिव पाई ॥
जनधर्मबोध
( ६१ )
उदय अपरजा पति जिहिपाही । पूरी देहु तासुकी नाहीं ॥ प्रकृति प्रत्येक उदय जब होई । काय बनस्पति हो जिव सोई ॥ जड़ त्वचकाठ फूल फल पाता । बीज मही तरास कह साता ॥ सातभेद तन जिव तहैं एकू । सो जिव कहिये राम प्रत्येकू ॥ दो विधि प्रत्येक बनस्पति जानो । प्रतिष्ठित अपरतिष्ठित मानो ॥ धार अनंत रास जो कायक । ताहि प्रतिष्ठित कहै सुभायक ॥ जामैं नहिनि गोदको धामा । अप्रतिष्ठित प्रत्येक सो नामा ॥ काय बनस्पति कह साधारण । सूक्ष्म बादर दुविधि विचारण ॥ संग्रह एक एकही देहा । तिहि कारण निगोद कहयेहा ॥ पिंडनिगोद है रास अनंता । पूरित नभको पावै अंता ॥ सूक्ष्म बादर दोय प्रकारा । नित्य अनित्य नाम जो धारा ॥ गोलक रूपी पाँचो धामा । अँडर खँडर इत्यादिकनामा ॥ सो सब नरक पातको जानी । तिनको दुख को सकै बखानी ॥ जीव निगोध एक तन माही । एते जिव कछु वर्ण न जाही ॥ धरे जन्म सब एकै बारी । मरण एकठे मास बिचारी ॥ एक श्वास उच्छ्वासके माहीं । तिनको जन्म भरन असआहीं ॥ जन्म अठारह बारहैं जिनको । मरब अठारह बारहि तिनको ॥ एक श्वास उच्छ्वासहि काला । तिनके जन्म मरणकोख्याला ॥ एक निगोद शरीरके माहीं । एते अमित जीव तहैं आहीं ॥ तीन कालके सिद्ध जो नाना । तिनकै एक अंश परमाना ॥ जीवगोदकी कथा अनंतो । वर्णन इत न होय बुधवंतो ॥ साधारण प्रकृति जब लहई । ताते जिव निगोदतन गहई ॥ साधारण प्रकृत लो बरना । चौदह शाखा तामैं धरना ॥ शेष और जो चौदह रहई । ऐसो ताको व्यौरा कहई ॥ थिरप्रकृत तनमें थिरताई । अथिर उदैते तन अथिराई ॥
( ६२ )
बोधसागर
शुभ प्रकृतिते सब शुभ रीती । अशुभ उदैं ते अशुभ गहीती ॥ जब सुभाग प्रकृत जिव धारा । सो प्रानी हो सबको प्यारा ॥ जब दुरभाग प्रकृति उगि आवै । तिहिलखिसबको जीव घिनावै ॥ जब स्वस्वर प्रकृति प्रकटानी । होय मधुर कोकिल सम बानी ॥ जब दुःस्वर प्रकृति तनधारा । साकी धुनि स्वर मनहुँ पुकारा ॥ जब आदेय प्रकृति संजूता । ताको आदर मान बहुता ॥ अनादेय परप्रकृत जब होई । आदर मान करे नहिं कोई ॥ जब जस नामप्रकृति नर पाहीं । ताको यश कीरति जगमाहीं ॥ अयश नाम परकृत फुरानी । अपयश अपकीरति जगठानी ॥ जब निरमान चितेरा आवै । सुंदर अंग उपंग बनावै ॥ तिरथंकर प्रकृतिके भेवा । सो जिव हो तिरथंकर देवा ॥ नाम प्रकृति अब पूर्ण कीने । पिंड अर्पिंड दोउ कहि दीने ॥ पिंड प्रकृति भाषे दशचारी । ताकी पैसठ शाख उचारी ॥ अट्टठाइस अर्पिंड गति बरनो । ते सब मिलि तिरानमें धरनो ॥ तन संबंधी दश पुनि औरा । यकसौ तीन गनो यक ठौरा ॥
इति
अथ गोत्रकर्मकी दो शाखावर्णन-चौपाई
गोत्र कर्म प्रकृति है दोई । ऊंच नीच कुल ताते होई ॥ ऊंच गोत्र उद्यौत प्रमाना । पावै जिव ऊंचे कुल थाना ॥ नीच गोत्रफल संगत पाई । नीच गोत्रगहि जिव प्रकटाई ॥
इति गोत्र
अथ अंतराय कर्मकी द्वि शाखावर्णन-चौपाई
अब सुन अंतराय निरबारा । अष्टम करम परम ठगहारा ॥ अंतरायकी नौ द्वै धारा । निश्चय एकएक व्यौहारा ॥ प्रथम कहो निश्चयकी बाता । जासु उदय आतम गुणघाता ॥
जैनधर्मबोध
( ६३ )
परगुण त्याग होय नहिं जहँवा । दान कि अंतराय कह तहँवा ॥ आतम तत्त्व लाभकी हानी । लाभ कि अंतराय सो जानी ॥ जबलो आतम योग न होई । योगको अंतराय कह सोई ॥ बार बार नहिं जगि उपयोगा । उपयोग अंतराय सो भोगा ॥ अष्ट कर्मते नहिं बिलगावै । बीरज अंतराय उगि आवै ॥ निश्चय कहीं पंच परकारा । अब सुन अंतराय व्यौहारा ॥ तुच्छ वस्तु कछु देय न सकई । दान कि अंतराय बल ठकई ॥ उद्यम किये न संपति होई । लाभ कि अंतराय कह सोई ॥ विषयभोग सामग्री जाही । जीवभोग करि सकै न ताही ॥ रोग होय कै भोग न जुरई । भोग कि अंतराय बल फुरई ॥ एक भोग सामग्री सारा । भोग ताहिको बारहि बारा ॥ कीजै सो कहिये उपभोगा । ताहूको न जुरै संयोगा ॥ यह उपभोग घात बिरुयाता । बीरज अंतराय सुन बाता ॥ जीवकी शक्ति अंत बताई । सो जग दशामें रही दवाई ॥ जगमें शक्ति कर्म आधीना । कबहुँ सबल कबहु बलहीना ॥ तन इन्द्री बल फुरै न जहँवा । बीरज अंतराय कह तहँवा ॥ ताते जक्त दशा परमाना । जैन धर्मध्वज बैन बखाना ॥ यह व्योहार प्रकृतिकह पंचो । तिहि विचार भ्रम रहै न रंचो ॥ प्रकृति विचार वर्ण यह भयऊ । जन जेष्ठ जस वानी कहेऊ ॥
इति अष्टकम्
अथ अष्ट कर्मकी आयुस्थितिवर्णन—चोपाई
ज्ञानी बर्नीकी स्थिति दीशा । कोडा कोडी सागर तीसा ॥ यह उत्कृष्ट दशा परमाना । एकमुहूर्त जघन्य बखाना ॥ दुतिय दर्शना वरनी कर्मा । थित उत्कृष्ट कहो सुन मर्मा ॥ कोडा कोडी तीस समुद्रा । एक मुहूरतकी थित छुद्रा ॥
( ६४ )
बोधसागर
तीजा कर्मवेदिनी जानी । कोडा कोडी तीस बखानी ॥ यह उत्कृष्ट महाथित सोई । जघन मुहूरत द्वादश होई ॥ चौथे महामोहको मानी । थित उत्कृष्ट जैनपति बानी ॥ सागर सत्तर कोडा कोड़ी । लघु थित एक मुहूरत जोड़ी ॥ पंचम आयू कर्मशरीसा । उत्कृष्टी सागर तैंतीसा ॥ थित जाघन्न मुहूरत एका । जैन ज्येष्ठ कह सहित विवेका ॥ छठये नामकर्म निरुवारी । कोडाकोड़ी बीस विचारी ॥ यह दीरघ आयू थितधारी । जघन मुहूरत कहिये चारी ॥ गोत्र कर्म सातमा कहाये । उत्कृष्टी थित बीश बताये ॥ कोड़ाकोड़ी काल प्रमाना । लघु थित एक मुहूर्त बखाना ॥ अष्टम अंतराय जो उजागर । कोडाकोडी तीस है सागर ॥ लघु थित एक मुहूरत धर्मा । आयू विविधि भांतिसे बर्ना ॥ दीरघ मध्यम लघु कहि भाषा । काल प्रमान भांतिबहुराखा ॥
इति
अथ सागरप्रमाणवर्णन—चौपाई
सागरको अब करों बखाना । जैनधर्मको सुनो प्रमाना ॥ योजन दोय केर चौकोरा । सागर नाम ताहिको शोरा ॥ दोय सहस्र कोश जिहि माहीं । योजन पक्वा कहिये ताही ॥ सोई योजन सुनो प्रमाना । ताका यह चौकोर बखाना ॥ भेडरोमके तहाँ लेआई । ताका यह चौकोर बनाई ॥ रोमखंड अस करे जो कोई । खंड एक पुनि खंडन होई ॥ रोमभाग सब यकठे करिये । सो सब तिहि सागरमें भरिये ॥ रोमखंड जब पूरन कीजै । सागर ऐसो कठिन भरीजै ॥ दाबि दाबिके ऐसे भरना । परमकठिन सो सागर करना ॥ चक्रवर्त सेना समुदाई । तिहि सागरपरसे लंघि जाई ॥
जनधर्मबोध
( ६५ )
दवै न हेठ भारसो पाईं । रोमखण्ड पूरण कठिनाई ॥ ऊपर हेठ रोम तहाँ भाली । रश्मिहु कतहूँ रहै न खाली ॥ अस पूरण चौकोर जो होई । सागर नाम बखानो सोई ॥ जितने खण्ड रोम गनि लीजै । तितने वर्ष प्रमान करीजै ॥ ऐसे कठिन पूर्ण लखि जाको । सागर एक नाम है ताको ॥ कोड कोड पर ताको गुनिये । कोडा कोडी सागर सुनिये ॥ तीस कोड अरु तीसै कोडो । सोलह सुन्न ताहिमें जोड़ो ॥ कोडा कोडी तीस कहीजै । यों सागरको लेखा लीजै ॥ कोडा कोडी सागर बनते । मानुष आयू ताते गनते ॥ एते कोडा कोडी जीये । ता पीछे तन त्याग सो कीये ॥ ऐसहि कूप समुद्र कहानी । जिमि सागरको लेखा जानी ॥ विविधि भांतिसे कीना लेखो । जैन धर्म सो निर्णय देखो ॥ लघु दीर्घ आयू बहुतेरी । यथाकाल बल तैसो हेरी ॥ जबलौं आगे कर्म न टूटै । तबलौं जीव योनिमें जूटै ॥ अष्टकर्म रिपु जो संहारे । तासु नाम अरिहंत पुकारे ॥ जब ये कर्म जीवते टलके । तिमिर विहाय रूप तब झलके ॥
इति
अथ बारह भावनी अथवा आत्मगुण वर्णन
दोहा—प्रथम अथिर अशरण जगत, एआन असुचान । आश्रय संबर निरजुरा, लोकबोध दुलभान ॥
चौपाई
जक्तवस्तु कछु थिर नहिं परसै । देहरूप आदिक जो सरसै ॥ थिर बिन प्रीति कौनते कीजै । अथिर जानि ममता तजिदीजै ॥ अशरण तोहि शरण कोइ नाही । देखो तीन लोकके माहीं ॥
बो० सा० ९
( ६६ )
बोधसागर
तेरो कोइ न राखनहारा । कर्मके वश चेतन निरधारा ॥ यहि संसार भावनी येहा । पर दर्बनसे कीजै नेहा ॥ तू चेतन ये जड सरबंगा । ताते तजो पराया संगा ॥ जीव अकेला आपतकाला । अर्ध मध्य भौन पाताला ॥ दूजा कोइ न तेरे साथा । सदा अकेला फिरै अनाथा ॥ भिन्य सद पुदगलसे रहई । भर्मभाव करि जडता गहई ॥ ये पुदगल रूपीके खंथा । चिदानंद तू सदा अबंधा ॥ अशुचि देखि देहादिक अङ्गा । कौन कुवस्तु लागि तेहि संगा ॥ हाड मांस रुधिरो गदगेहा । निरखि सूत्र मल तजो सनेहा ॥ असै परसे कीजै प्रीती । ताते बन्ध बढै विपरीती ॥ पुदगल तोहि अपन कोइ नाही । तू चेतन ये जड सबआहीं ॥ संवरपर रोकनको भाऊ । सुख होनेको यही उपाऊ ॥ चिदानंद हो निर्मल आपू । मिटै सहज परसंग मिलापू ॥ गहि लीजिये आपनो कर्मा । जाते प्रकट होय निज धर्मा ॥ थिति पूरी हो खिरखिर जाई । निरज्वर भाव बढै अधिकार्ई ॥ लोकमाहैं तेरो कछु नाही । लोक आन तू आन लखाहीं ॥ है यह षट्दर्बनको धामा । चिदानंद तू आतम रामा ॥ धर्म सुभाव आपनो जानो । आप सुभाव धर्म सो मानो ॥ जब तोहि धर्म प्रकट है आवै । तब परमात्म पदै लखि पावै ॥ दुर्लभ पर दर्बनको भाऊ । आपा नहिं दुर्लभ सुन राऊ ॥ जाँ तेरो है ज्ञान अनूपा । तौ नहिं दुर्लभ शुद्ध स्वरूपा ॥
इति
अथ जनयतिके अट्टाईस मूलगुण वर्णन
सोरठा-पञ्च महाव्रत सञ्च, सुमति पञ्च परकार है । इंद्रियाणि दम पञ्च, षट् अचार पृथ्वी शयन ॥
जनधर्मवोध
( ६७ )
तज मज्जन निरधार, बसन त्याग कच लुंचकर । लघुभोजन थित धार, दातन लेपन त्यागकर ॥
चोपाई
सब जीवनपर दाय्या पाला । सत्य वचन बोले तेहि काला ॥ परसे नहिं धन करे ससोई । मदन विकार न व्यापै कोई ॥ सकल परिग्रहको जिन डाले । अधो दृष्टि मारगमें चाले ॥ सूखी भूमि निरखि पद धरही । दयासहित शिवपन्थ विचरही ॥ निरभिमान अनवद्य अदीना । कोमल मधुर दोष दुख हीना ॥ ऐसे सुवचन सदा उचारा । सो जैनेश सुक्तिपद धारा ॥ उत्तम कुल स्नावक आचारा । तासु भौन सूक्ष्म आहारा ॥ दोष बयालिसको सो टाली । भिक्षा भोजनकी यह चाली ॥ धर्मवस्तु कछु संग्रह धारा । सूखी भूमि निरखि मल डारा ॥ सीत उष्ण दोउ यक सम वादा । गंध कुगंधो स्वाद कुस्वादा ॥ शब्द कुशब्द कुरंग सुरंगा । स्तुति निंदा दोउ यक ढंगा ॥ शब्द मित्र दोउ यकसम भाला । सामा यक साधै तिहुँ काला ॥ अरि हंतो सिद्धौ आचारी । उपाध्याय साधूगुण धारी ॥ पंच परम परमेशी बाना । सदा काल तिनका गुण गाना ॥ दोष विचारिके प्राश्रित करही । कृपा कर्ममें निजु चित धरही ॥ जैनेश्वर बानी अनुसारा । द्वादशांग आदर उर धारा ॥ काऊ सम मुद्रा नित धारे । हृदये सुद्ध स्वरूप विचारे ॥ सूखी भूमि शयन हितकारा । त्यागे त्रिविधियोग ममकारा ॥ पश्चिम राति नींद लघु गहई । धर्म ध्यानमहँ पावन रहई ॥ अंतर बाहर परम पुनीता । लेप नहान त्याग सब कीता ॥ नग्र दिगंबर मुद्रा धारी । विगलित लज्जा लोक विहारी ॥ एक बार लघुभोजन लेही । कच लुंचै तजि दातन देही ॥
इति
( ६८ )
बोधसागर
अथ जैन यतिको बाइस परीसा वर्णन
सोरठा-भूख प्यास हिम गर्म, हंस मशक डँस नम्र तन । अरतिकेरे दुख पर्मे, चर्जा आसन शयन कह ॥ खल वध बंधन बाद, जाँचै नहीं अलाभको । रोग परस न विषाद, मलमय आदर मान विन ॥ प्रज्ञा अरु अज्ञान, दरस मलीन दो बीसये । जैन परीसा जान, सहै जाहि रिषि राय नित ॥
चौपाई
एकपक्ष जब दिन बित गैऊ । उन ओदर भोजन तब लैऊ ॥ विधिवत जौं भिक्षा नहिं पाई । अंग शिथिल मनमें हटताई ॥ पर अधीन भिक्षा ऋषि राया । प्रकृति विरुद्ध जो भोजन पाया ॥ ग्रीष्म काल विहाली ठानी । सहै प्यास मांगै नहिं पानी ॥ हिम ऋतुमें कम्पै संसारी । बाहर तबहि खड़े व्रतधारी ॥ वर्षा वायु शीतको जोरा । सहै सकल नहिं तन मन मोरा ॥ भूख प्यास उर अंतर दगै । कोपे पित्त देहज्वर जागै ॥ ग्रीष्म धूप अग्नि सो लागे । सहत सबीसन धीरज त्यागे ॥ दंश मशा माखी डँसै सर्पा । भाल शृगाल केहरी दर्पा ॥ कनखजूर आदिक दुख देहीं । पाड़ा सह हटता गह येहीं ॥ विषय विकार जासु उर भरई । भेष दिगम्बर सो किम धरई ॥ महाकठिन यह नम्र परीसा । सहै शील धर जैन मुनीशा ॥ देश काल कारण को पाई । जक्त जीव मन व्याकुलताई ॥ ऐसी अरति परीसा भारी । सहै जैन सुनिधर्म सँभारी ॥ तियहग तीर शरीर न लागा । जगमें को असजन्म सुभागा ॥ को अस जेहि रतिनाथ न चंपा । मन सुमेर मुनिको नहिं कंपा ॥ चार हाथ देखत महिं चारे । कठिन कंकरी पायँ विदारे ॥
जनधर्मबोध
( ६९ )
चर्जा दुख सहि मुनि व्रत धरहीं । प्रथम स्वादकी सुरति न करहीं॥ सुखी ठौर शयनको हेरे । निश्चल अंग रहै ऋषिकेरे ॥ कठिन पृथ्वीमें शयन कराई । शयन परीसा पर जय पाई ॥ खल निरदोष साधु को मारे । दुख अनंत दे अग्निमें जारे ॥ समरथ होय सहै दुख सारा । रंच क्रोध नहीं निज उरधारा ॥ हाँसी करहि दुष्ट मिलि झारी । कहि कटुबचन देहि बहु गारी ॥ वचन बाण मारै जब तानी । क्षमा ढाल ओटे मुनि ज्ञानी ॥ छीन भये तन पिंजर रहेऊ । दुख अनंत जब देही सहेऊ ॥ काहूकी नहीं चहै सहाई । प्राणहु गये अयाच रहाई ॥ एक बार भोजन की बेरा । मौन साधि नगरी करि फेरा ॥ बहुदिन बीते न भिक्षा पाई । तिहि अलाभ मन खेद न ल्याई ॥ भोग संयोग रोग जब होई । कछु उपचार न चाहै सोई ॥ सहै दुःख नित रहै अदीना । देह विरक्त आत्म लौलीना ॥ कैंकरी कंटा पाँय विदारे । रज तृण आंखिनमें भरि मारे ॥ सहै दुःख निज कर नहीं गाढे । तृणपारस विजई मुनि गाढे ॥ तजि असनान होय दुख भारी । चलै प्रसेव धूल भरिडारी ॥ मलिन आपनी देह निहारी । मलिनभाव नहीं जैनाचारी ॥ चिर तपसीबुधि विद्यासागर । गुणगणअतुलित जक्त उजागर ॥ नर आदर प्रणाम नहीं करहीं । तहैं मुनि मलिनभाव नहीं धरहीं॥ ऐसे बुधि विद्या निधि गहिरे । परबादी नहीं सम्मुख ठहरे ॥ आगम अगम अलंकृत जाना । पै मुनीश मद रंच न आना ॥ पालत धर्म बहुत दिन गेऊ । ज्ञानप्रकाश अजौँ नहीं भेऊ ॥ कछु विकल्प नहीं मनमें गहई । सो अज्ञान विजई मुनि अहई ॥ मैं चिर घोर घोर तप ठानी । तब बलसिद्ध झूठ कछु मानी ॥ यों कदापि मनमें नहीं बाधू । सोई अदरसन विजई साधू ॥
इति बाईस परोक्षा
( ७० )
बोधसागर
अथ बाईस बस्तु अभक्ष्य वर्णन—चौपाई
बैगन बहुबीजा अरु ओला । बटु पीपर पाकर कहि बोला ॥ ऊमर कमऊमर निस भोजन । कदमअयाचतुच्छ फलकोगन॥ विष माटी मद मधु अरु मासा । खार चलो रसघोरव डासा ॥ माखन और अँचार कहावै । बाइस बस्तु अभक्ष्य बतावै ॥ इनते अधिक मूल है जेते । भक्षण योग्य न कोई तेते ॥ जिनमें धाम निगोद कहीजै । जीव अनंत न पार लहीजै ॥
इति
अथ जैनसाधु और गृहीको वर्णन—चौपाई
दोय प्रकारके साधु बखाना । दीगम्बर श्वेतांबर बाना ॥ दीगम्बर मुद्रा कठिनाई । सो नरते अव गही न जाई ॥ ताते लोप दीगम्बर भैऊ । श्वेतांबरी अजो रहि गैऊ ॥ अजहूँ गृही दीगम्बर मतको । जाने अपने धर्मकी गतको ॥ गृहीको गृही करे उपदेसा । जैसो गुरु शिष्य पुनि तैसा ॥ श्वेतांबरी साधु बहु तेरे । नाम दूदिया तिनको ठेरे ॥ जैन धर्मकी बारह पौरी । विविधि रीति देखो सब ठौरी ॥ सबपर श्रेष्ठ दिगम्बर बाना । छुल्लक ताके हेठ बखाना ॥ पुनि दश पौर सरावक आहीं । सेवा पूजा देखो ताहीं ॥ तिरसठ पुरुष शलाका जोई । पूजा तासु जैन घर होई ॥ तिरथंकरकी मूर्ति बनाई । मंदिर माहैं ताहि पधराई ॥ दीगम्बर कर फेची टूटी । श्वेतांबर फेची मुखपट्टी ॥
इति
अथ स्वर्ग और मुक्तिशिलावर्णन—चौपाई
साठि पटल स्वर्गन में सुनिये । सर्वांरज सिध सबपर गुनिये ॥ तापर मुक्ति शिला कहलावै । मुक्त होय सो ताहि समावै ॥
जैनधर्मबोध
( ७१ )
इतर धर्म जो जग विरुध्दाता । कोइ मिथ्या कोइ मिश्रमिथ्याता॥ साठि पटल जो स्वर्गन माहीं । बारहलों मिथ्याती जाहीं ॥ जैनी बिना न ऊपर जावै । बारहलों सबही गम पावै ॥ जैनधर्म बिन मुक्ति न होई । केवल ज्ञान उगे नहीं कोई ॥ स्वर्गनके सुख श्रमित बताई । रहे देवगण सबमहँ छाई ॥ स्वर्गकि थित जब पूरन होई । तब जिव धरणिधरे तन सोई ॥ जैसो भाव स्वर्गमें धरई । तैसी योनिमाह जिव परई ॥ जो सर्वांरज सिद्धको जावै । एकदेह धरि मुक्ति सो पावै ॥ जबलों कर स्वर्गनमें बासा । तबलों देह धरनकी आसा ॥ चौथे काल मुक्ति जिव होई । पंचयें छठएँ लहे न कोई ॥ सुकरम किये स्वर्गको जावै । पंचयें छठयें मुक्ति न पावै ॥ ढाईसहस वर्ष बित गयऊ । पंचम काल लगत जो भयऊ॥ उगे न तबसे केवल ज्ञाना । बिना ज्ञानको मुक्ति लहाना ॥ छ्री कोई मुक्ति न पाई । करि सुकर्म स्वर्गनमें जाई ॥ स्वर्ग भोगि नरतन पुनि पावै । केवल ज्ञान गहि मुक्त कहावै ॥
इति
अथ नर्कको वर्णन—चोपाई
सप्त नरक मत जैन कहाहीं । यम यमगण कतहुँ कोइ नाहीं ॥ औध ज्ञान जस देव गहाही । ज्ञानक औध नारकिनमाहीं ॥ बुरा औध नारकहि फुराना । पूरब वैरभाव सब जाना ॥ पिछला सब औगुन सुधि आवै । एक एकको मारि दुखावै ॥ शस्त्रादिक तहँ अगणित जाती । दंड कि हेत बना बहुभांती ॥ काटे छेदे तन तिन केरे । कोइ कोइ कोल्हुँमें धरि पेरै ॥ एक एकको धरि धरि मारा । मचा चहुँ दिश हाहाकारा ॥ जस पारा तस नारक अंगा । कटि फटि होयसो पहिले ढंगा॥
( ७२ )
बोधसागर
सातो नरक केर व्यौहारा । भिन्न भेद पीडा अधिकारा ॥ महादुःख नारकहि बनाई । आयू परम दीर्घ जिन पाई ॥ दोहा—सुई अग्नि भरि मृत्तिका, नरकसे महि जौ आय । ताकी अति दुर्गंधते, सब तरु पशु मरिजाय ॥ इति ॥
अथ प्रलय वर्णन—चौपाई
प्रलयके प्रथम इन्द्र महि आवै । जोड़े जोड़े जिव ले जावै ॥ वर्गमें सबकी जतन कराई । जबलौ प्रलय पूर्ण ना पाई ॥ निज विमानमें सब जिव धारी । स्वर्ग दिशा जब इन्द्र सिधारी ॥ ताके पीछे परलय आवै । जीव जन्तु सबही विनशावै ॥ अग्निवाषि पुनि जल बरसाई । जीवबीज नहिं कतहूँ पाई ॥ पूर्ण प्रलय होय हरिजाई । जीव इन्द्र गहिमहि पुनि आई ॥ ताते पुनि जग उत्पति होई । एकते बहुरि अनेकन सोई ॥ कबहुँ न होय बीजको नाशा । जक्त अनादि स्वतह परकाशा ॥ क्रमहीक्रम फिर बढै विभूती । सर्व पदार्थ पृथिव प्रसूती ॥
इति प्रलय
अथ स्फुटवार्ता—चौपाई
षटप्रकारकी अस्थि जो कहेऊ । वज्रशरीर प्रथम जिव गहेऊ ॥ वज्रको हाड शीघ्र किमि गलई । कहुँ कहुँ भूमें अजौ न टलई ॥ यूरूप नर जहँ तहँ चलि जावै । वज्र हाड जिव जंतुको पावै ॥ सो निजु मन ऐसे अनुपानो । हाड परा चिरने पथरानो ॥ ताको मर्म न जाने सोई । वज्रहाड जिव प्रथम गहोई ॥ भीम शरीर समस्त वज्र रह । दुयोधन तन अर्ध वज्र कह ॥ लेखा ताहि काल अस रहेऊ । कोइ वज्रकाइ घटि तिहि कहेऊ ॥ ताके प्रथम कठिन सर्वगा । हनुमान आदिक बजरंगा ॥ चिरंजीव जीवे चिरकाल । गहि तन वज्र दोय दुखटाला ॥
इति श्रीजैनधर्म
स्वसमवेदबोध ग्रन्थ
स्वसमवेदबोध प्रारंभ
भारतपथिक कबीरपंथी-
स्वामी श्रीयुगलानन्दद्वारा संशोधित
खेमराज श्रीकृष्णदास बम्बई प्रकाशन
संघ लोकसभा
१
संघ लोकसभा
संघ लोकसभा
•
संघ लोकसभा
सत्यनाम
श्री कबीर साहिब
1917 1918
सत्यमुक्त, आदिअदली, अजर, अचिन्त, पुरुष, मुनीन्द्र, करुणामय, कबीर, सुरति योग, संतान, धनी, धर्मदास, चूरामणिनाम, सुदर्शन नाम, कुलपति नाम, प्रबोध गुरुवालापीर, केवल नाम, अमोल नाम, सुरतिसनेही नाम, हक्कनाम, पाकनाम, प्रकट नाम, धीरज नाम, उग्र नाम, दयानाम की दया, वंश ब्यालीसकी दया ।
अथ श्रीबोधसागरे
एकोनत्रिंशत्तरंगः
अथ स्वसमवेदबोध प्रारम्भ
★
मंगलाचरण—चौपाई
बन्दों गुरपद नख मणि ज्योती । हृदये बसत दिग्विहग होती ॥ कोटि सूर शशि उर उजियारा । तिमिर अविद्या सकल सँहारा ॥ चरणकमल मुनि दलअलिफंदा । धुरपद पाय मधुर मकरंदा ॥
( ७८ )
बोधसागर
पद पराग अनुराग हटाईं । कर बहु अम्बर मणिछबिछाईं॥ चरण सलिल सरि मज्जन पाना । युगयुगको कलिकलुषनसाना ॥ महा प्रसाद प्रसादी पाईं । कोटिन युगकी छुधा बुझाईं ॥ धर्मदास पद प्रथम नमासी । ता पीछे करुणामय स्वामी ॥ वंश बयालिस जगमें जिनको । कोटि प्रनाम हमारा तिनको ॥ चार गुरु निज सतगुरु दासा । जिन्हेंन प्रभु तजि दूरारि आसा ॥ मन क्रम बच गुरु चरनन चेरो । तिनप्रति बहु अभिवंदन मेरो ॥ सतगुरु अंशनको बहु बारी । बदि चरनरज निजसिर धारी ॥ जिन जिन सन्त मोहि उपदेशा । धर्मधामको कह्यो संदेशा ॥ प्रणवों कोटि बार कर जोरी । जिनकी कृपा विमल मति मोरी ॥ जो गुरु पद पंकज प्रिय पागे । बन्दों सबहि सहित अनुरागे ॥ पुनि बन्दों सन्तनके चरना । गुरुस्वरूप कह्यु भेद न बरना ॥ साहिब सन्त एक जिन जाना । तिनको आवागवन नसाना ॥ नमों बहुरि कवि कुल समुदाईं । सत्य कबीर चिन्ह जिन पाईं ॥ भे अरु अहैं भव्य बहुतेरो । तिन प्रति बिनय दीनता मेरो ॥ उमैगि उमैगि जो गुरुगुन गावै । कोटिन जीव लोक पहुँचावै ॥ जड चेतन जहैं लगजगजाया । रचना विविधि विरंचि बनाया ॥ साधु असाधु सूर अरु कूरा । भोजन विविधि एकरस पूरा ॥ सत्य सुकृत सबमाहिं निहारौं । जोरि जुगुल कर सकल जोहारौं ॥ सब मिलि कृपा कीजिये सोईं । भणित मोर मङ्गलमय होईं ॥ कबि न होउ नहिं चतुर सयाना । काव्य भेद रस भेद न जाना ॥ कथ्यौ कथा सतगुरुकी आसा । बुधजन लखि न करै परिहासा ॥ बार बार गुरु पद शिर नाईं । धर्म कबीर मर्म अब गाईं ॥
इति मंगलाचरण
स्वसमवेदबोध
( ७९ )
अथ स्वसमवेद धर्मवर्णन
दोहा—देव कबीर महंत गुरु, स्वसमवेद मत भाष । सार शब्द टकसार जहाँ, सत्यनामकी साष ॥ सार शब्द यक मूल है, टीका चौदह कोर । कोटिन ग्रंथको गनि सके, लहे न ताको ओर ॥ जे ती जगमें बनपती, अस गंगाको रैन । अगम अपार अकथ कथा, सत्य कबीरको बैन ॥
इति
अथ उत्पत्तिकथा—चौपाई
उत्पत्ति प्रलयकि कथा अनंता । बहु विधि सत्य कबीर भनंता ॥ उत्पत्ति प्रलय कोटिन बारा । स्वसमवेद निर्णय निरधारा ॥ कछुक लिखो सो ग्रंथन हेरी । कथा अनूप यथा मति मेरी ॥ प्रथमै आदिमें ऐसो कहेऊ । स्वतह स्वच्छंद जीव यक रहेऊ ॥ रह स्वतंत्र आनंद अकेला । नहिं तब गुरु नहीं तब चेला ॥ पक्की तत्त्वको ताकी अंगा । अंग पिंड दोनों यक ढंगा ॥ माया पुरुषसो जीव उपाना । सत्यस्वरूपी ताको बाना ॥ अपना रूप अनूप निहारी । अहमित भयौ जीव तिहि बारी ॥ मोहित भा लखि रूप निकई । ताहि मोहमें गा गफिलाई ॥ आपा भूलि रहा नहिं चेता । महागमन मन भो ता हेता ॥ परमानंदमें गयो भुलाई । निजस्वरूपकी सुधि बिसराई ॥ तत्त्व प्रकृति पलटि गइ तबहीं । पक्कीसे कच्छी भई जबहीं ॥ कमही कम भै छीन शरीरा । धरिधरि देह पाव बहु पीरा ॥ जब कच्छा भा पक्का साँचा । अंड पिंड दोनों भा काँचा ॥ निज स्वरूपको ज्ञान न राखा । भई योनि चौरासी लाखा ॥ आपै आप रमे जग सारा । भरमे युनि अनंत अपारा ॥
नं. ९ कबीरसागर - ४