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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

१७

गुरुभाहान्त्य

( १९०७ )

गुरु करे हिय दया त्यागे, मामा चिता व्याकुल अहे । अमर शोभा देख वे गुन, हर्ष जीवन अति अहे ॥

सोरठा-अब जिन लावहु बेर, ठाढ़े सकल अकुलावहीं । प्रभु दयावंत जो होइकै, वे पुरुष दर्श करावहीं ॥

राजाका मोहबचन-चौपाई

राजा रानी कुँवर पचासा । सकल जीव विनती परकाशा ॥ बेग लये चलो हंस पति राजा । वह विनती करे सकल समाजा ॥ चातक स्वाति रटत जिमि जैसे । तृषावंत सबरे जिव तैसे ॥

सुकृत वचन

सत्य सुकृतमें सुरति समानी । होय निशंक करो रजधानी ॥ पुरुष नाम राजाकहँ दीना । संग लोग हंसन सब लीन्हा ॥ राय मोह हम लोक चलि जाई । सत्तर सहस्र हंस सँग लाई ॥ ऐसे सुमति करो जो बंदा । कालत्रास नहीं हो दुखद्वंदा ॥ एकचित होय सुरति जेहि लाग। सत्य शब्द सो तन मन पागा ॥ देखि काल दूरहिते भागे । जो पदपुरुष नाम दृढ़ लागे ॥ राय गए जहाँ हंस समाजा । आए हंस आरती साजा ॥ गावहि मंगल करहि कुलाहल । षोडश शृंगारा अंग भल ॥

राजाका मोह वचन

राजा देखि चकित मन पागा । बार बार सुकृत पद लागा ॥ देखेउ लोक वरन अतिपावन । अब हमपाये निज मनभावन ॥

सुकृत वचन

सुकृतहि चले राय ले साथ। जाय पुरुष कहु नायउ माथा ॥ छंद-दर्श पाय नित जीव वे सब, रूप भयो परकाश हो । अमिय फल जब पाये हंसा, द्रीय द्रीय विलास हो ॥

( १९०८ )

बोधसागर

१८

सुवना सज्य शिर छत्र सोहे, बैठ हंस समाज हो ।

भए हरिपत राय रानी कीन लोक निवास हो ॥

सोरठा--इमि हंसन परसंग, युग बाधे सो हंस होय ।

लोक लाज तज रंग, ते पहुँचे अमरा पुरी ॥

इति श्रीगुरुमाहात्म्य ग्रंथ संपूर्ण

अथ जीवधर्मबोध-प्रारंभः

भारतपथिक कबीर पंथी- स्वामी श्रीयुगलानन्द द्वारा संशोधित

मुद्रक व प्रकाशक

गंगाविष्णु श्रीकृष्णदास, अध्यक्ष-“लक्ष्मीवेङ्कटेश्वर”-प्रेस, कल्याण-बम्बई.


THE UNIVERSITY OF TORONTO LIBRARY

1911-1912

LIBRARY OF THE UNIVERSITY OF TORONTO

सत्यनाम

श्री कबीर साहिब

Figure 10

सत्यसुकृत, आदिअदली, अजर, अचिन्त, पुरुष, मुनीन्द्र, करुणामय, कबीर, सुरति योग, संतान, धनी धर्मदास, सुरामणिनाम, सुदर्शन नाम, कुलपति नाम, प्रबोध गुरुबालापीर, केवल नाम, अमोल नाम, सुरतिसनेही नाम, हक्क नाम, पाकनाम, प्रकट नाम, धीरज नाम, उग्र नाम, दयानामकी दया, वंश- व्यालीसकी दया

अथ श्रीबोधसागरे

एकोनचत्वारिंशस्तरंगः

अथ जीवधर्म बोध

दोहा-कौन धर्म है जीवको, सब धर्मन सरदार । जाते पाव मुक्ति गति, उतरे भवनधि पार॥ धर्मरूप यक वृक्ष है, मूल गुरु विरूपात । ज्ञान फूल फल मुक्ति है, शुभकर्म शाखापात॥ ज्ञान जीवको धर्म है, भ्रम त्रास जो मेट ।

( १९१४ )

बोधसागर

सत्य पंथ पावे परखि, तब तेहि सतगुरु भेंट ॥ जबलों नहि सतगुरु मिले, तबलों ज्ञान न होय । ऋद्धि सिद्धि तपते लहै, मुक्ति न पावै कोय ॥

अथ जीवको सत्यस्वरूपी देह और ज्ञानको लोप होना और स्थूलदेह और संसारको भासना और नानाप्रकार की सृष्टिको फुरना और कर्मधर्मको विस्तार वर्णन ।

चौपाई

जीव धर्म बरनो अब सोई । सब भ्रम भासजाय जिहि खोई ॥ मोह रैन जग सोवन हारा । स्वप्नरूप यह जग विस्तारा ॥ नींद गई कछु दरसै नाही । सबही भर्म भास मिटि जाही ॥ छूटे सकल कालको फंदा । ज्ञान पाय जिव होय अनंदा ॥ जेते धर्म धर्म कोइ माहीं । जीव भर्म सबही ये आही ॥ सत्य असत्य सकल है माया । माया सब मिथ्या बतलाया ॥ मायाते सब काया जागी । तनमनधन उपाधि संगलागी ॥ जब अभाव कायाको होई । माया सबही जाय बिगोई ॥ प्रथहि सत्यरूप जिव रहेऊ । कच्छी देह बहुरि सो गहेऊ ॥ जिहि कारन सतरूप लोपाना । स्वसंवेदमें प्रथम बखाना ॥ अहंकार कर निरखि निकाई । ताते अपने रूप गवाई ॥ अपने रूपसे जब सो भटका । अतिशय दुःखद्वन्द्वमें अटका ॥ काल स्वरूपी है हंकारा । ताते प्रकट काल बरियारा ॥ काल कराल सोई अन्याई । सकल जीवको धरिधरि खाई ॥ यही जीवको बंधन कीने । भवसागरमें गोता दीने ॥ जाको हिय हंकाराते जूटे । निश्चय शीश तासुको टूटे ॥ अहंकार कह तीन प्रकारा । द्वै प्रकार कर अंगीकारा ॥

जीवधर्मबोध

( १९१५ )

जीवन मुक्त केर गुन दोई । त्याग तीसरो कह श्रुति सोई ॥ प्रथम दृश्य जेती जग माहीं । मोते इतर और कछु नाहीं ॥ मैं अद्वैत परमात्म सारा । जीवनमुक्त परम हंकारा ॥ पुनि दुतिया हंकार बखानो । आपको जो अति सूक्ष्म जानो ॥ सर्वा भाग कच तेहैं कीन्हा । दोउ हंकार केर यह चीन्हा ॥ जीवनमुक्तको दोउ हंकारा । पुनि तीजा यहि भांति उचारा ॥ देहको जो आपा करि माना । ऐसी निश्चय तुच्छ बखाना ॥ जाने सत्य जो अपनी देहा । बन्धनको कारण है येहा ॥ शुद्ध आत्मते चित्तको फुरना । ताको नाम अविद्या धरना ॥ दोय भाँतिकी फुरना होई । यक संसार और कह जोई ॥ ताको नाम अविद्या राखा । आत्म और फुर अविद्या भाषा ॥ दोऊ स्पंद रूप उर मद्या । नाश अविद्या करे अविद्या ॥ जो विकल्पको कारण गाई । चित्त शक्ति क्षेत्रज्ञ कहाई ॥ नाम शरीर क्षेत्र सो जाना । तेहि अंतर बाहरको ज्ञाना ॥ नाम तासु क्षेत्रज्ञ कहीजै । सो जब सहित वासना भीजै ॥ आत्मते इतर रूप जो धारे । निश्चय कलना ताहि पुकारे ॥ निश्चय कलना जब सो गहई । बुद्धि नाम ताहीको कहई ॥ अहंभावते निश्चय जोई । पुनि संकल्प ताहिमें होई ॥ ताही कलनाको मन कहिये । चित्तशक्ति मनभाव जो गहिये ॥ घन विकल्प मनमाह जो बंधा । शब्द स्पर्श आदिक भे गंधा ॥ ताते इंद्रियानी फुरि आई । हाथ पांव प्राण आदि बताई ॥ इंद्रिन सहित देह तब भासे । चार खानकी थित कह तासे ॥ अचलते दृश्य दिशा फुरि आवा । तासु नाम संकल्प कहावा ॥ संकल्पहिते सकल पसारा । सबही स्थूल मूल हंकारा ॥ अग्निसवरूपी है हंकारा । ताते तमगुनको बिस्तारा ॥

( १९१६ )

बोधसागर

तमते त्रिगुन तत्त्वको होना । ताते जत्त बीजको बोना ॥ ब्रह्मा बुद्धि रूप तन धारा । बुद्धिते रचित सकल संसारा ॥ अग्निरूप है प्रकटा काला । ताते जत्तकेर जंजाला ॥

सत्यकबीर वचन

तेज रूप गुरु काल उपाया । ताते सकल सृष्टि दुःख पाया ॥

दोहा-मैं करता मैं भोगता, मेरो सकल जहान ।

मैंही जगमें पूज्य हो, सुर मुनि मनुष महान ॥

चौपाई

अहं ब्रह्मास्मी कह ब्रह्मा । ताते रचनाको आरंभा ॥

अहंते सकल सृष्टि यह ठाढ़ी । कथा कहानी जगमें बाढ़ी ॥

यही अहं अज्ञानको मूला । ताते जीव सहे सो शूला ॥

अहं बोलि यह जीव सिधारे । बहुरि नवीन कलेवर धारे ॥

आवा गौन अहंते होई । यक तन तजि दूसर गह सोई ॥

ज्यों ज्यों जीव तुच्छता गहई । त्यों त्यों अधिक अहंसो लहई ॥

ज्यों ज्यों श्रेष्ठ पदनको पावै । त्यों त्यों ताही दीनता आवै ॥

भृगमुनि विष्णुको मारचौ लाता । सोकरि क्षमा कहौ मृदुबाता ॥

देखो दारिद्री कंगाला । धनपाये तेहि गर्व विशाला ॥

गहे न अहंकार हरि प्यारे । जीवहि अहं तुच्छ करि डारे ॥

अहंकारके है षट अंगा । ताते जीव केरि मति भंगा ॥

जव मति भंग जीवकी होई । नाना विधिको तन गह सोई ॥

देह सदा वासना ते पूरी । सुखी होय करि ताको दूरी ॥

जबलों रहै वासना मनमें । तबलों बिचर विषयके बनमें ॥

जीव कहाव देह अभिमानी । ताको मुक्तिपात्र नहिं जानी ॥

निर्वासनिक होय निस्प्रेही । जत्त पूज्य है साधू येही ॥

जिनके हृदयमें अभिमाना । तिनको कबहु उगै न ज्ञाना ॥

जीवधर्मबोध

( १९१७ )

जो कोई कह मैं बड़ा कुलीना । सबसे ताको जाय मलीना ॥ जो कोइ कह मैं हौं बड़ सुन्दर । महाकुरुप सो होय छछूंदर ॥ जो कोइ कह मैं उत्तम जाती । सो बैठे कुकुरनकी पाती ॥ जो कोइ कह मैं पंडित ज्ञानी । होय निरक्षर पुरुष प्रानी ॥ जो कोइ कह मैं बड़ गुनवन्ता । होय सोय विद्याको जन्ता ॥ जो कोइ कह मैं बड़ बलवाना । होय अबल सो कीटसमाना ॥ जाति पांति कुलके अभिमानी । भ्रमत फिरै चौरासी खानी ॥ अभिमानिनकी कहो कहानी । धर्म महम्मद यथा बखानी ॥ त्रिविध तकबुर निर्णय ठानी । प्रथमजो भये ऐसे अभिमानी ॥ जस नमरूद आदि फिर उन्ता । नृप मद आपको ईश्वर गुन्ता ॥ प्रथम तकबुर प्रभुके ऊपर । नबीपै बहुरि तकबुर दूसर ॥ तृतीय तकबुर जग लोगनपै । मैं गड तुच्छ और सब जनहैं ॥ हौं बड़ श्रेष्ठ गुनन मलसही । औरनमें यह गुन कह बस ही ॥ प्रथम कहौं विद्या अभिमानी । दुतिये तपसीतपजिन ठानी ॥ विद्याके अभिमानी जोई । तिनके मत विचार अस होई ॥ हमही मनुष और सब पशु गन । जिनके हृदय न विद्याको धन ॥ विद्या धन सर्वापर गाई । ताते हम ईश्वर लखि पाई ॥ जगमें हम सबके शिर ताजा । हमरे हाथ है काज अकाजा ॥ दुतिये तपसिन केर समाजा । बिना मान नहीं कोई ऋषिराजा ॥ सो ऐसो निज मनहि विचारी । दरश हमार जक्त हितकारी ॥ आपको सुक्त युक्त लख औरा । और तुच्छ हम सब शिरमौरा ॥ ये दोनों पदको मद भारी । रूप गर्व धारत है नारी ॥ धनअभिमानी पुनि अस बोला । मैं चाहों औरहि लेव मोला ॥ बलमदकुलमदकुटुंबअरुचाकर । शिखशाखा बहु मानधरे नर ॥ अभिमानिनकी दशा बखाना । हशरगाह जो न्याय स्थाना ॥

( १९१८ )

बोधसागर

१०

चिउँटी रूप होय हंकारी । तिनहि लताडे सब नर नारी ॥ हशरगाह ते जब सो चाले । हबहब कूप नरकमें डाले ॥ हजरत सुलेमानकी बानी । बूथा सकल तप हो अभिमानी ॥ राई भरि जामें हंकारा । सो विहिंशतको नहिं पग धारा ॥ पुनि रसूल मकबूल बतावे । होय दीन बड़ि पदवी पावे ॥ ऐसो नर जगमें नहिं कोई । जाके शिर लगाम नहिं दोई ॥ गहे लगाम सो दोय फिरिशते । जगजिव तिनहि दीन हो दिस्ते ॥ तब दोउ प्रभुसे विनय उचरना । हे प्रभु याको ऊँचा करना ॥ धरि लगाम तेहि ऊँचा करही । जगमें श्रेष्ठ नाम तब परही ॥ जब जिव ऊँचा शीश उठावै । दोऊ फिरिशते विनय सुनावै ॥ हे प्रभु याको कीजै नीचा । धरि लगाम नीचेको खींचा ॥ अभिमानिनके शिरमें पौना । ताकौ चित्त फलावै तौना ॥ सोई पौन हंकार कहावै । बुरी चाल सब ताते आवै ॥ पढ़ि विद्या जगको भरमावै । आप न शुभकरनी मनलावै ॥ विद्याके अनुसार न करनी । अन्तमें तिनकी यह गति बरनी ॥ नरकमाह प्रभु तिनहै पठै हैं । औरनते दशगुन दुःख पैहैं ॥ गरदन पीठ तासु टुटि जाई । नरकमाह अतिशय दुख पाई ॥ जिमि खर चक्की को भरमावै । तैसे यम ताहि नाच नचावै ॥

दोहा—अग्नि कतरनी करगहे, कतरे तिनको ओठ ।

नरकमाह बड़ दुख भरे, विद्या पढ़िभे खोट ॥

चौपाई

अभिमानिनकी कथा बखानी । ईश्वरको बैरी तेहि जानी ॥ सकल बड़ाई प्रभुको सोहै । और बड़ा जगमें कहु कोहै ॥ जिनके हृदयमें हंकारा । तिनको कोई करे नहिं प्यारा ॥ नृप फिर ऊन महाअभिमानी । आपको जो ईश्वर करि जानी ॥

११

जीवधर्मबोध

( १२१२ )

अबिरहामके जो संताना । निजु गोला गोली करि जाना ॥ मूसायें प्रभु सो गुन खोला । ईश्वर बना तासुको गोला ॥ फिर ऊबर मूसा है जाई । मानमर्दके गर्द मिलाई ॥

सोरठा-एक गृही यक साधु, दोय पक्ष है जीवको । यक संग्रही उपाय, एक रसिक निजु पीवको ॥ निज निज धन सुखहेतु, दोनों उद्यमको करे । होय सजग चित्त चेतु, जेती बुद्धि विवेक जिहि ॥ कृपा जो करे करतार, पूर्ण होय मनकामना । यह धन वह भवपार, जैसो जाके आगमें ॥

दोहा-ग्रहीके धन अधिकात जब, तब तेहि कहे अमीर । अधिक अधिक धन बितलह्यौ, कह्यौ अमीर कबीर ॥ जबहि अमीर कबीरमें, तामें किन्न समाय । यथा दर्ब दिन दिन अधिक, तथा किन्न अधिकाय ॥ किन्न अधिक अधिकान जब, तब लाग्यौ बलकान । बलकत बलकत अंत भो, आप किब्रिया जान ॥ आप किब्रिया जान जब, गह्यौ ज्ञान शब्दाद । भूपर मोहिसम नहीं रहा, हरि ऊपर कर वाद ॥ प्रथम अमीर कबीर भो, पुनि अकबर अछाह । सो कबीर अकबर सोई, कहे किब्रिया ताह ॥ अछह जब बनि बैठिऊ, पहुँची तिनकी मौत । दोजखमें दाखिल भये, सेन सहित भै फौज ॥ जगमें भये कबीर बहु, जो लागे गहि तीर । आप तरे जग तार जो, सोई साच कबीर ॥ जिन जिन धारचो किन्न उर, टूटचौ सबको शीश । जासु किन्न टूटे नहीं, परम पुरुष जगदीश ॥

( १९२० )

बोधसागर

१२

जाको किन्न अघट्ट रह, तीन काल युग चार । ताहीको सब ठट्ट है, हट्ट लगी पन सार ॥ जिन जिन शीश उठायऊ, टूटचो सबको किन्न । सत्यकबीरको किन्न जो, सदा एक रस तिन्न ॥ श्रीमुख सत्यकबीर कह, किन्न जाहिमें दीप । मोड़ा तेहि छोड़ो नहीं, तोड़ो ताको शीश ॥ किन्न सहित जब जोय नर, होय नहीं तब खैर । परे किन्न या संगमें, याहि ढंगते बैर ॥ वैर किन्नियासे भयौ, गयौ नरक जिव सोय । कुशल कौनि विधि तासुकी, रिपु जाको हरि होय ॥ जासु किन्निया नाम है, किन्न ताहिको सोह । और किन्न जो कोइ गहे, ले कबीर सँगलोह ॥ धनवितकों यह अंत है, सत विचारो जाहि । सो धन पर हंकारकर, अहं दुःखद सब आहि ॥ जैसे गृहीकी कथा, कहति निककीरकी आहि । जब फकीर गुनज्ञान गह, तब हकीर कह ताहि ॥ घर घर मांगत भीख जो, दरदर होत हकीर । कोई गालीदे मार कोई, तनक न तन मन पीर ॥ अथ हकीरको तुच्छ है, कुछ रहौ नहीं मान । अधिकते अधिक हकीर भो, तब साहिब पहिचान ॥ तब साहिब पहिनेऊ, फना कियौ तब आप । गना आपके कुछ नहीं, तन मन धन लखि पाप ॥ अंत हकारत जब भयौ, तूही तू तब टेर । जहँ तहँ देखो तूहि तू, मैं नाहीं कहु हेर ॥ मैं नाहीं जब ही रहौ, कहौ तूहि तू सर्व ।

१३

जीवधर्मबोध

( १९.२१ )

जल थल वायू व्योममें, तुही व्याप सब दर्ब ॥ तूही भू जब देखेऊ, रहा कतहुँ नहिं आप । आप आप में रमि गयौ, पुनि दुतियाकिन थाप ॥ दुतिया गयौ गवाय जब, सिंधुमें बूंद समान । गहे गरीबी संत जब, अंत दुःख तब जान ॥ जब हंकार अतिशय बना, धन्य फकीर है सोय । किन्न तकबुरके गहे, गयौ धनिक सब खोय ॥ यथा फकीर हकीर भो, गूही अमीर कबीर । दोहु गुन दोष बिचारके, जीव तरे भवतीर ॥

इति अहंशब्द

अथ कामवर्णन—चौपाई

अहंते तम तमते आकाशा । तमते त्रिगुणतत्त्व परकाशा ॥ गुण प्रकृतमय तत्त्व जो पांचो । जगके अस्तंभन ये सांचो ॥ प्रथम अकाश है पंच प्रकृतमय । काम अरुकोध लोभमोहमय ॥ प्रथम कामको यह गुन जानू । दहन ज्ञान बन कठिन कृशानू ॥ स्वसंवेदमें प्रथमहि कहेऊ । ज्ञान गोप जब जिवको भैऊ ॥ तब निज सम्मुख दृष्टि उठाई । झाँई रूप नजरमें आई ॥ सो झाँई नारी तन गहेऊ । ताके संग भोग जिव कियऊ ॥ पुरुष छाहते प्रकटी नारी । सो भ्रम रूप जक्त विस्तारी ॥ जबलों नारि पुरुषकी चाह । तवलों नहीं कर्म कुल दाहा ॥ अपनी छाहते करे लड़ाई । भ्रम कटि जूनिनमें भरमाई ॥ सोई कहो जक्तकी जननी । परम रूपके ज्ञानकी हननी ॥ वृद्ध जक्तकी कामते आही । बुद्धि विवेक तहां कुछ नाही ॥ कामविश जिव हो जिहिबारा । ताके हृदय न रहौ बिचारा ॥

( १९२२ )

बोधसागर

१४

ताको गुन यह प्रकट देखावो । आवा गौनको लेख लगावो ॥ प्रथमहि दृष्टि दौरि जब जोई । नारि देखि केहि यह हरषाई ॥ जब नर ताहि निकट नियराया । कुचनके ऊपर हाथ चलाया ॥ कुचनको जब निजु करते परसा । अधिक मोद मनमें तब सरसा ॥ कुच नहिं भोजन पात्र पयोधर । अधिक प्रीति मानुष ताते कर ॥ प्रथमहि भोजन पात्र टटोले । आवागौन राह पुनि खोले ॥ तिहि मारगमें जब जिव धसेऊ । पुत्र होय पुनि बाहर खसेऊ ॥ भर्ता है तिहि मारग पैठा । पुत्र होय पुनि बाहर पैठा ॥ भोजन पात्र टटोल जो पहिले । बालक है भाजन सोह गहिले ॥ भोजन भाजन भायां माता । पुरुष पुत्र एकै द्वै बाता ॥ भीतर बाहर पैठे निकलेरे । आवा गौन आपनो सकरे ॥ मनते मनमथ भयौ प्रचंडा । महाकाल सत सो बरिबंडा ॥ पांचवान सो निज कर लीने । सकल जीव अपने बस कीने ॥

दोहा-मोहन मारन बसकरन, उच्चाटन उनमाद । पांच बान ये काम गह, तिहु पुर परा विषाद ॥ भवसागरमें आयके, कोइ न भयौ समरत्थ । यक कंचन यक कुचनपर, को न पसारचौ हत्थ ॥

कुंडलिया

भवसागरमें आनिके, भै कबीर समरत्थ । कंचन कुचन दोहूनपै, सो न पसारचौ हत्थ ॥ सो न पसारचौ हत्थ, आप कमला चलि आई । चित चंचलावनहित, कीन सो विविध उपाई ॥ कीनेसि विविध उपाय, कबीरको मन किमिहाली । है निरास श्री तास, बहुरि बैकुंठहि चाली ॥

१५

जीवधर्मबोध

( १९२३ )

चौपाई

कोई है पती पयोधर पकरे । कोई बनि पुत्र ताहिंते टकरे ॥ भरता पुत्र होय नहिं दोऊ । सत्य कबीरते और न कोऊ ॥ नारिके बसमें सब संसारी । रचना तिहु पुरमाह पसारी ॥ भवसागर भगसागर जानी । भवके करता भव रु भवानी ॥ तीनों पुरको ईश कहाया । जिन भगचौरके राह बनाया ॥ भगके रुधिरते भगवा भेषा । देव निरंजन अकथ अलेपा ॥ उज्ज्वल भेष पुरुषको बाना । भगवा भेष निरंजन राना ॥ अंग पिंड भग माह समाना । सत्य कबीर बचन परमाना ॥ अंतर ज्योति शब्द यक नारी । हरि ब्रह्मा ताके त्रिपुरारी ॥ ताहि तियहि भग लिंग अनंता । तेउ न जाने आदिवो अंता ॥ लिंग रूप यक शंकर कीना । धरती खिला रसातल दीना ॥ भा बालक भग द्वारे आया । भग भोगनको पुरुष कहाया ॥ अबला सम कहुँ बली न कोई । तीन लोक ताकी बस होई ॥ अष्ट प्रकारके मैथुन अहई । ताते न्यारा कोह न रहई ॥

दोहा-श्रौतो सुमिरन कीर्तनो, चितवन बात यकंत ।

हठसंकल्पो रत्न पुनि, प्रापति अष्ट कहंत ॥

चौपाई

मिथुन विकार जीव सब पागा । जरे तीन पुर तिय अनुरागा ॥ जेती जगमें कथा किहानी । नारिप्रताप सकल से जानी ॥ जबलों रहैं देहको खेला । तबलों हो नारी सँग मेला ॥ नारि परे जो जाना चहई । ताकी देह तहां नहि रहई ॥ भग भोगै अरु भक्त कहावै । फिर फिर भगभोगनको आवै ॥ जड़ चेतन दोउ नारि स्वरूपा । कनक कामिनी जिव भ्रमरूपा ॥ विषकी बेल दोहूको जानी । लगे ताहिमें जिव अज्ञानी ॥

( १९२४ )

बोधसागर

१६

महामहाऋषि मुनि छलि मारा । यह मनोज पापी हत्यारा ॥ तप जप सकल अष्ट करि दीने । ज्ञानी ध्यानी निज बस कीने ॥

छंद माधवी

सूखे पत्र अहार अरु पौन भपे । धृत धर्म परासरके सरके । दृग जोहनि मोहनि रूपमहा, मनमोहित नाहरके हरके ॥ विधि नारद चंद स्वच्छंद भये, हृदया बजरोधरके धरके । अस कौतुक भो जो मन दौन कियौ, सब जी भवसागरके गरके ॥

चौपाई

साध सिद्ध चल वनमें भागी । जाय नारि तिनके सँग लागी ॥ मौनी होय बसै गिरकंदर । बसै नारि तिनके डर अंदर ॥ मैथुन अष्ट तबो नहिं जाई । ताते विकल सकल ऋषिराई ॥ बाहरको विकार जो त्यागे । पुनि अंतरको दुःख दौ दागे ॥ इन्द्री मर्दके गर्द मिलाई । तऊ साधुको काम सताई ॥ जतन अनेक करे ऋषिराई । विजय मार पर ताऊ न पाई ॥ जस नट मरकट खेल खिलावै । तथा मनोजभव जीव नचावै ॥ नारिके बसन आभूषन ओरा । साधु कबहु न निजु दृग जोरा ॥ नारि चित्र कागज मूरत गन । ताहि न सन्त लखै निजु नैनन ॥ निरखै ध्यान आव सो मूरत । चढ़ै काम पुनि ताहि विमूरत ॥ नारि पुरुष जिमि घरमें रसहीं । ताके निकट साधु नहिं बसहीं ॥ कामकलोल करे पशुखग जहैं । साधु न कबहुँ दृष्टि डारे तहैं ॥ मदन विकार अनेक विधाना । सो सब त्यागे ज्ञान निधाना ॥ जब लों यह विकार दिल दागे । तब लों ज्ञान किरिन नहिं जागे ॥ कामकरे जिहि औंसर अंधा । करे जीव कछु उलटा अंधा ॥ छन्द-रतिनाथ भाथ जो हाथ गहि, निजु सुमनसरसंधानेऊ ॥ तजि नीति गह बिपरीत रह, नर धर्मबंधन भानेऊ ॥

१७

जीवधर्मबोध

( १९२५ )

चैतन्यमे जड़ रूप जड़, चित चेत निजु उर आनेऊ । शृंगार साजन लाल कहुँ, कुसु कानिकौ मन मानेऊ ।

इति काम

अथ क्रोधवर्णन-चौपाई

द्वितीये क्रोध महा बलवंता । सोसमस्त शुभ गुनको हन्ता ॥ जाको देखि बुद्धिवर कम्पत । रहै न निकट भाजिहो चंपत ॥ महा काल यह क्रोध उचारा । यह खल प्रकट होय जेहिबारा ॥ धर्मको लेश रंच नहीं रहई । यह अपराधी जप तप दहई ॥ प्रलय करे सतगुनहि विडारा । आप दाहि और न दुहि डारा ॥ वर्षहजार जो सुनि तप कीने । पलमें क्रोध अष्ट करि दीने ॥ नरकवास सुनि बरहि पठाई । कतहुँ न रही ज्ञान गहिराई ॥ तप जप कहाँ क्रोध जब होई । जिवको निश्चय नरक विगोई ॥ सकल धर्मकी धूल उडावै । क्रोधको अंधकार जब आवै ॥ अहंकार क्रोधादि विकारा । तुच्छ जीवमें अधिक निहारा ॥ कीडा एक रहे घासनमें । ऐसो क्रोध ताहिके मनमें ॥ जो कोई ताको परसे जाई । महा-क्रोध ताके उर छाई ॥ क्रोधितहै अस मनहि विचारी । छूवन हार को डारो मारी ॥ कूदे उछलै जो रन चलई । आपको अबल जानिके टलई ॥

इति क्रोध

अथ लोभवर्णन-चौपाई

तृतीये लोभकी कथा बखानी । शुभ गति लहै न लोभी प्रानी ॥ लोभी निशदिन माला फेरा । ताको पार होय नहीं बेरा ॥ सूम है नरक केर अधिकारी । जपतप कियहु न जन्म सुधारी ॥ लोभी जीव जेते जग माहीं । नरक हेत सबही सो आहीं ॥ लोभ ते शुभ करनी नहीं भावै । सोई सब अघकर्म करावै ॥

( १९२६ )

बोधसागर

१८

सो नरपर कलियुग को बासा । तेहि प्रिय कीने बुद्धि विनासा ॥ सोई दुष्ट सब करे अकाजा । प्रीछित धर्म-धुरंधर राजा ॥ ताहूको सो बुद्धि बिगारा । कञ्चनपरकलि आसन धारा ॥ धर्म महम्मद करे बखाना । सोरनको भागी शैताना ॥ गहि कर कञ्चनदृग न लगाये । चूमि ताहि पुनि कह गोहराये ॥ कञ्चनसे जो प्रीति लगाई । सो नहिं भगवत भक्ती पाई ॥ सो लोभी इबलीसको बन्द। निश्चय परे ताहिके फन्द। ॥ पुनि ऐसो इबलीस पुकारा । साधु सूम है मित्र हमारा ॥ सूम साधु जो जप तप करई । लोभ समस्त कृपा संहरई ॥ तैसे पापी दाता जोई । परमशत्रु मेरो है सोई ॥ जो कछु पाप करे सो दाता । दान किये सो सकल निपाता ॥ सो शैतानके वश नहिं परई । दाता कोटि पाप जो करई ॥ दोय वृक्ष द्वै ठौरमें देखा । यक औदारता लोभ है एका ॥ दानवृक्ष वैकुण्ठमें बरनी । गड़ी तासु जड़ ताही धरनी ॥ साष तासु दुनियामें आई । नरहित हेत सो दियो झुकाई ॥ जो कोई पकरे साष सखावत । सो निश्चयविहिशतको जावत ॥ साष सखावत पकरि जो रहई । अघ औगुन सब ताको दहई ॥ नवीन प्रसंशिके बचन सुनावै । सखी अवश्य मेरे ढिग आवै ॥ ऐसहि लोभवृक्षकी लड़ है । घोर नरकमें ताकी जड़ है ॥ साष तासु जगमाह झुकाई । जो कोई गहै नरकमें जाई ॥ शुभ करनी सब तासु नशावै । सूमको दौजरमें पहुँचावै ॥ सब धर्मनको मत है एहा । लोभी करे नरकमें गेहा ॥

अथ मोहवर्णन-चौपाई

चौथे मोह महा दुःखदानी । भव भोगनकी यही निशानी ॥ ता पिता सुहृद परिवारा । सगे सहोदर सह सुत दारा ॥