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कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

विनय रत्नावली प्रारम्भः । स्वामी परमानन्दजी विरचित ।

दोहा-सत्य कबीर कृपायतन, तन धरि जिवके काज । मो सम वायस मलिन भव, तव पद नलिन जहाज ॥१॥ भक्ति गरीबी दीजिये, नाथ कीजिये नेह । और दौर मन चूर भय, होस रही यक एह ॥२॥ तुम बिन जिव विलकत फिरे, खिलकत भई विहाल । चिलकत प्रभु जग यम भजे, ढिलकत बन्धन माल ॥३॥

सर्वथा ।

जगमें बहु सूर सती जपिया, तपिया सो पिया पद पावत नीके । हमतो सबही विधि हीन महा, शुभ धर्म कहा गुण ज्ञानन फीके ॥ नहीं उपाय सहाय करो यक, आश किये करुणामय जीके । कछु जोर नहीं दृग कोर लखो, दलिहों दुविधा चलिहों गुरुलीके ॥ १ ॥

मोहिंसो नहिं हीन मलीन कहूँ, गुरु धर्म न जो शुभ कर्महिं जानी । दम संथम नेम न क्षेम किया, भव भोग प्रिया नहिं योग निशानी ॥ पति राखिलियो पति राखिलियो, जगमें मम लाज इलाज लहानी । अब किंकर काल दयाल मिले, निज किंकरको महि किंकर मानी ॥ २ ॥

कोइ माँगत मुक्ति है युक्ति कोई, कोई चाहत है युगही युग जीजै । कोइ देवसे स्वर्गकी ठेव धरे, उधरा धन धान्य धरा धरि लीजै ॥ तव दासन आस वही सबही, पदही सदही लदही रति कीजै । जेहि चाह न अन्य है धन्य वही, गुरु भक्ति अनन्य दया कर दीजै ॥ ३ ॥

(१८६)

कवीरपंथी—

सुख साज घनो गज वाजि घनो, सब शोक समाज घनो जिवकेरो । धन द्रव्य ले नर्कमें गर्क करे, कुल रूप सुजाति कुटुम्ब बडेरो ॥ बर विद्या जहां लंगि चातुरता, जिउँहिं ज्यों जीवमें होय घनेरो । तेवहिंत्यों भक्तिसे दूर करे, मद पूर कहे विषयाबन घेरो ॥४॥

सुख स्वर्ग लहो अपवर्ग लहो, ऋधि सिद्धि सप्तुद्धि जिते जग मांही । जप योग रु युक्ति औ उक्ति सभी, पद इन्द्र उपेन्द्र जहां लंगि आही ॥ जेहि जीव मदे बर वेद वेदे, अभिमान लहे अमकी सब छांही । धन्य धन्य सोई पद लागु जो, गुरु भक्ति समान कहुँ कछु नाहीं ॥ ५ ॥

कर लेकर काह मिले प्रभुसे, कर भेट कहा करदाम न कोई । जहँ झार तपोधनके धनिका, दरबार तुम्हार रहे दग जोई । जिमि हंसनमें बकुला अकुला, देहि देखत मैं अपना सुख जोई । विनती हमरी बुढिया दमरी करुणा कर नाथ कबूलहु सोई ॥ ६ ॥

नहिं सायर हों कुलकायर हों, परि पाय रहो नित नाथ भरोसे । कहुँ मो सम तुच्छ न और कोई, गुण ज्ञान न छूछ बने प्रभु पोसे ॥ करजोरि विनय प्रभु मोर सुनो, जन राखहु पायन पंकज गोसे । यक पूत कपूत प्रसूत प्रसू, जठरा जठरा भरको तजि तोसे ॥७॥

यमदूत कपूत बडे रिसिहा, खिसिहा बसके किसि लीनेहु दण्डी । घिघियात दया किसिबात जिन्हें, अधिको वधिको विधि कूटत मुण्डी ॥ बल वाहन साहस आतुरता, सब चातुरता तहवाँ भइ भुंडी । कोई यार नहीं हथियार नहीं, यक देह रही बिनु शस्त्रके लुण्डी ॥ ८ ॥

नहिं लेश दया हृदया तनिको, जब छेदत है यम बांधि गटैया । इतही उत हेरके टेर सबै, कहु मोर नहीं चहुँ ओर उपैया ॥ परिवार सगे न गोहार लगे, तजि भौन भगे दुख कौन

शब्दावली

(१८७)

घटैया ॥ सुनि आवत वैन पुकारत आय, सहायक राम है बंदि कटैया ॥ ९ ॥

भवपाट महा अतिपीन जहाँ, किमि दीन पपीलहिं पार करीजे। बल भंग मतंग भयो जिहिमें, गुरु संग विना तेहि माँह मरीजे ॥ कह मुक्ति कोई जग युक्ति लोई; नहिं नाथ जो साथ तो पाथमें छीजे। भवसेत अभय पद देत तुही, प्रभु आस यही कर दास गहीजे ॥ १० ॥

भव सिन्धु अगाह न थाह कहैं, मम नाथ तरी यक गाथ निहोरे। झर झोर झकोर न ठौर कहैं, भल भायचरी यक नाथ निहोरे। मद मोह तरंग तुरंग रहे, बड़ भाग भरी यक नाथ निहोरे। महिखेस चले मम केस गहे, कर धाय धरी यक नाथ निहोरे ॥ ११ ॥

जेहि सिन्धुमें पौन प्रचंडचरे, पलमें शतखंड करे तृणतूरी। खगराजहुके बलको दलजो, हमरो बन वाहन पाहन पूरी ॥ हम थूल थरा जहैं झूल नरा, दुर्गम्य दुकूल परा अति दूरी ॥ शरणा- गत हूँ शरणागत हूँ, शरणागत नाथ हरो भय भूरी ॥ १२ ॥

समरत्थने हथ गहीर गही, जल रत्थ मेरी गुरु सत्यतरी है। समवाय वहाय सहाय करी, बल पाय हरी थल धाय धरी है। मम पोत टुटी गुणसो न जुटी, जेहि कोट दरार करार करी है। बिनु सत्यकवीरको पीर हरे, भवभौर भयावन भीर परी है ॥ १३ ॥

कलिकाल विहाल किया जिवको, पिवको पदसो केहि भांति सो पावे। जहैं जाप नहीं जहैं ताप नहीं, जिव पाप महों दिन रैन गमावे ॥ अति बुद्धि मलीन जो लीन विषय, नहिं शुद्ध सतो छण एकहु आवे। यमफन्दपरे नहिं द्रन्दटरै, उबरे जब सत्य कवीर बचावे ॥ १४ ॥

( १८८ )

कवीरपंथी—

अमरावति नग्र बसो जेहिमें, तेहि दर चार सुधार बनाये । वैराग्य विवेकहुँ ज्ञान गनाय, विचार सो चार गुरु बनि आये ॥ तेहि मध्य सिंहासन आसन तौ, जगे ज्योति सोहंगम चौर दुराये । सोइ द्वार ते जाय सो पाय तुम्हे, डुतिये विधिसे पुनि यों कहि गाये ॥ १५ ॥

पद पाडुक और पद त्रान तेरो, पद धूल पदामृत चार विचारे । पद पाडुक ते मुक भर्म सबै, पदकी पनही धनही जिव तारे ॥ पद धूल हरे तिहुँ शूलनको, चरणामृत कर्महिं धोय पैवारे । गुरु- चारहु जल उबार लियो, यम जीतन नाथ प्रताप तुम्हारे ॥ १६ ॥

गुण सिन्धु यथा तुम आगर हो, तिमि औगुण सागर मो सम नाहीं । दोउ मेल मिले यम जेल ढिले, अस खेल खिले करूणा- मय बाहीं ॥ कण तुच्छ मिला मन अम्बर जो, तब रेणु हिरम्बर वेणु कहाहीं । विषयादि समीर सरीरन छै, भवतीर लगे नहि आवहिं जाही ॥ १७ ॥

दिल देवल देव दया दरिया, थरिया भरिया भरि नैन निहारी । दुख दारिद कम्पत चम्पत भो, सुख संपति संपति सो भरभारी ॥ सुखसाज सघट्ट अघट्ट दर्द, फिर आवैं न हट्ट या पनसारी । बयपार करी बयपार करी, बयपारन संगमें ये बयपारी ॥ १८ ॥

हिरअम्बर चीर कवीर कवी, कविता सविता गुण गावत पायो । न टुटे न फटै न कटै कबहुँ, रुचि राउरकी पहिराउर आयो ॥ जो मुनिन्द्र भरे न सो इन्द्रधरे, भगवान कृपा भग बाँन भगायो । सतनाम निकाम ररो सुधरो, उधरो दृग दिव्य दयाल बतायो ॥ १९ ॥

गज ज्ञान अपानकि पीठ चढे, दल दैत विकार विषय विह- राना । गहि वज्र विवेककी टेक हिये, निज नाम निशानको मारूब्याना ॥ सहस्रश प्रतक्ष स्वरूप लखे, तम भक्ष कृपा भ्रम

शब्दावली

(१८९)

कूप बिहाना । जन राउर यद्यपि बाउर है, पद पंकज पास कियो निज थाना ॥ २० ॥ इति ।

कवोर भानु प्रकाशसे ॥

कवित्त ।

पावन पतित जीवनके हित प्रभु, तूही गुरु पुरुष कहलायो घूँ और है । कहत कवीर धर्म धरत न धीर, करे अचल शरीर न लगे हिम जोर है ॥ पशुपंछी तारत है निगम पुकारत है, आरतको देखिके निहार हगको रहै । पीरो पयम्बर है धीर जो दिगम्बर है, वेद वाणी हूँ बिरह बन्दीछोर है ॥ १ ॥

तजत न वानी सुर सुनिन बखानी प्रभु, शरणमें आनी जो करत निहोर है । तीन लोक हूँठ जाये दूसरे कहुँ न पाये, लग सो चरण दुख हरण जो शोर है ॥ नहीं शुभ करनी है बहु दुख भरनी है, उस गुरु शरनी है कलिकाल घोर है । अधम उधारनको जगत सुधारनको, भक्ति मुक्ति धारन कवीर बन्दीछोर है ॥ २ ॥

बूडे बड ज्ञानी सिद्ध साधक जो ध्यानी, बिनु नाम सहिदानी जिन्हें आशा न तोर है । बल बीज चूसत है सिद्ध साधु दूसत है, निसिदिन मूसत है अनचिन्ह चोर है ॥ जीवको है ठौर नहीं सुर सुनी दौर नहीं, परमानन्द पौर नहीं पावन जो दोड है । बन्दीछोर बन्दीछोर एक भजु साहब कवीर टेक सोई बन्दीछोर है ॥ ३ ॥

अर्जोनामा ।

महंत बीजक दास कृत,

ज्ञान सरूप अनूपम पूरन, पूर रहो जडचेतन माहीं । तीरथ वर्त रु कर्म करे बहु, अन्ध भयो शठ सूझत नाही ॥ १ ॥ काल महाबलवंत बडो रिपु, डारत ले भवसागर माहीं । ताहिंते सुदि भयो मोहिको अब, आइ रहो तुव चरनन माहीं ॥२॥ कहा कलु केवल नाम कवीरहि, जीव रटे सब चातिक सोई । सर्वमें व्यापक

(१९०)

कवीरपंथी—

आप कवीरहि स्थावर जंगममें पुनि वोई ॥ ३ ॥ रँग रटना सब लागरही घट, ताहि बिना नहीं औरहि भासे ॥ नित अहे हमरे उर अन्तर, सु तारक बुद्धि सोई प्रकासे ॥ ४ ॥ जौन प्रकार कटे रजनी तम, सोइ उपाय कहो निरधारा । काम रु कोध रु लोभ भ्रमावत, ताहिसे दास जो कीन्ह पुकारा ॥ ५ ॥ आप विना नहीं कोउ हमारे, जो पुत्र कलत्र पितु परिवारा । अब मोहि तुमही सहाय करो प्रभु, बूडतहुँ भवसागर धारा ॥ ६ ॥ मातकूँ बालक जो दुख देत सो, जननी नहीं सोच विचारा ॥ खैंचत केस करे नख घात जो, तोहू न छोडस गोदमें धारा ॥ ७ ॥ त्यों जननी सम गुरु देव कवीरहि, शिष्य समान जो बालक होई । डूबत बांह गहो गुरु देव जु, आप दयाल दयानिधि सोई ॥ ८ ॥ आप कृपा विन भाग जगे नहिं, आप कृपा बिन पातक लागे । आप कृपा बिन शुद्ध हिरदे नहिं, आप कृपा बिन मोक्ष न आगे ॥ ९ ॥ आप कृपाविन डूब मरे भव, जीव अनेक पडे जम त्रासा । ऐसि कृपा जो करा हम ऊपर, पारख बुद्धि सदा जु प्रकाशा ॥ १० ॥ योग रु यज्ञ करे विधि नाना, कायाहु कष्ट करे बहुतेरा । आँखहु मुन्दत कानहु रुंधत, प्रान चढ़ाय गगनहिं घेरा ॥ ११ ॥ नेती धोती कर्म करे बहु, ध्यान धरे पुनि काहु न हेरा । शुद्ध स्वरूपको ज्ञान विना शठ, मेटत नाहिं चोरासीकी फेरा ॥ १२ ॥ मै अपराध कियो बहुते गुरु, सो अपराध कह्यो न जाई । आप दयाल दयानिधि साहब, मम अपराध क्षमा करो साई ॥ १३ ॥ अन्तर्यामी जु जानत हो सब, कहा कहूँ मुख बारम्बारा । भूल मिटाये परखाई दियो सब, संधिक झाई जु काल पसारा ॥ १४ ॥ जा दिन बन्ध छुडाइ दियो सब, ता दिन नाम पडयो बंदीछोरा । तैसेही बन्धन मोर छोडावहु, बारम्बार कहूँ जी निहोरा ॥ १५ ॥ दासको संकट आय

शब्दावली

(१११)

षरे तब, आयके तत्क्षण लीन संभारा । बीजकदास यही बर मांगत, नित्त हृदय मांहि रहु ध्यान तुम्हारा ॥ १६ ॥

इन्द्रविजय ।

आपेही आप गोसाईं सु साहेब, होहु दयाल दया करि हेरो । ऐसी कृपा जो करो हम ऊपर, जे विधि होहुँ तुम्हारो हि चेरो ॥ औरहि व्रत मिटायके साहेब, एकही व्रत तुम्हारो हि प्रेरो । शिष्य कहे गुरुदेव सु साहेब, यहि विधि ध्यान तुम्हारो हि मेरो ॥ १ ॥

भांति अनेक करे यह चित्तसो, कर्म विकर्म करे तेहि काजा । तीरथ व्रत करे बहुते विधि, ताहिके काज लगावत साजा ॥ जो गुरु यज्ञ करे किया तप, करे पुनि ध्यान कहे महाराजा । भारि भरोस हिये गुरु आपसो, आप गुसाईं सु हो शिस्तजा ॥ २ ॥

नानाहि भांति विचार करौं बहु, एकहुँ चित्त न आवत मेरो । जाल अनेकन हाल विहालसो, काल कराल करे घनघेरो ॥ जीवन मारि कियो पिसमानसो, कोईके चित्त न आवत हेरो । मोकहँ तो इक आश तुम्हारिहि, भाँति अनेक कहाँ बहुतेरो ॥ ३ ॥

जादिनसे मोहि आप मिले प्रभु, तादिनसे बहु दुःख निवारा । होय अधीन गह्यो शरणागत, भाजि गयो सब भ्रम पसार ॥ आप पर्खाइके भास मिटाइके, जीव छुटाये कियो निस्तारा । शिष्य कहे गुरु देवसु साहेब, मोकहँ तो एक आप अधारा ॥ ४ ॥

ऐसी कृपा जु करी हम ऊपर, होय अधीन गह्यो जब चरना । जन्म रू मर्ण रहे अब कोनको, ये कहि चित्त तुम्हारोहि शरना ॥ सांझ इक संधिक काल सो आसिक, मीटि गयो सब मनको भरना । शिष्य कहे गुरुदेव सुसाहिब, और उपाय नहीं सुहिं तरना ॥ ५ ॥

करुणानिधि आप बनाइ दियो, सकलो संत विवेक की आथी । मेरे हृदयसे दुःखसाल अनेकन्ह, आप मिटाइ कियो सुख साथी ॥

(१९२)

कवीरपंथी—

भास मिटाइके फाँस छुटाइ दियो, प्रभु कालहि तू अब नाथी ॥ ऐसो दयालको छांडिके रे शठ, तू बहुदेय भुले देह भाथी ॥६॥

जो प्रभु आप सहाय करो नहिं, तो यह जीव रहे भव भीरा । अवगुन बापजि माफ करो अब, मैं कछु शील विचार न थीरा ॥ बाल पुकार करे बहुते सर, हे सुख सिंधु करो मन थीरा । साहेब संत समाज मिले जब, आय लगूँ गुरु ज्ञानके तीरा ॥ ७ ॥

तुमही सब लायक जानत हो सद्, वेद पुरान कुरान अनेका । बुद्धि हीन मलीन पुकारत हों, अबहो प्रभु राखहु वेषको टेका ॥ यद्यपि आप विसारहुगे तब, लोक हँसे नरनारि तरेका । ताहिते शिष्यको भाव धरो अब, शिष्य भरौंस करै गुरु देका ॥ ८ ॥

करसे सुत मात ना छांडत है, शिर दुःख हजार परे मन जोखा । जोपै पूत कपूत सही है, जननी न विचार धरे उर धोखा ॥ कवीर गोसाई मेरे शिरताज, दूजा कहाँ जाये करो तन पोखा । विपति शर बान दहैं अतिसय, तुव दास लडे चढ़ि ज्ञान झरोखा ॥९॥

कवित्त ।

बालक ज्यों बोले बात तोतरी बनाय करी, मात पितु वाके सुख माने प्रेम सानिके । ज्यों पै सुत भूल्यो आय जननी पुकारे धाय, मारे सुख वचन कहत सहुँ आनिके ॥ रोदन करत पूत चले जात दूर धाय, झांझाहीं विलाप धारि लोटे बहु ठानके । हाथही अम्बर लेह पोंछि कर उर देह, पीर सब छीन करी गोद लेवे जानके ॥१॥

दोहा—तैसे तुम गुरुदेव प्रभु, लेहु सकल सुख साज ।

भवबन्धन जाते मिटे, सो चाहत मैं आज ॥ १ ॥

पारख शुद्ध विचार करी, ताहि माँहि सुखधाम ।

ताते कहत हूँ आपसो, मोको राखहु ठाम ॥ २ ॥

शब्दावली

(१९३)

सोरठा ।

खबर लीजिये मोर, परख रूप किरपाल प्रभु । तुम तजी अनत न ठौर, अबतो आश तुमार है ॥ १ ॥ तात मातें मित्रादि, नहिं कोइ मेरो जगतमें । तुम सुहिर्द बर आदि, भवनधि तारो नाथ हम ॥ २ ॥ अवगुन देखहु मोर, नहिं कल्यान जु कल्पसुधि । दया दृष्टि कर तोर, अवगुन चित्त न विचारिये ॥ ३ ॥ साहब परम उदार, सुखसागर सुखरूप घन । ताते करत पुकार, जो गुरु होहु सहाय अब ॥ ४ ॥

कवित्त ।

दीनोंके दयाल आप कियो है निहाल मोहिं, करो प्रतिपाल सुख सागर समान हो। नागर विराजमान आगर कहत सब, जनके दयाल मोहिं हियमें सोहात हो ॥ कहत अगम वेद पार नहिं पावत सो, मन भरमात मेरो आप सुख सार हो । शुद्ध बुद्ध ज्ञानभारी सन्तनके रूपधारी, कहे सहदेव भव पारहुके पार हो ॥

आपही पूरन गुरु साहेब कबीरहीसो, तिनको नम्र होय बन्दनी हमारी है । सुखही सरूप रूप ज्ञानही अनूप भूप, परख प्रकाश जहां नसे अन्धकारी है ॥ दरसही पाप टारी झाईं संधि काल जारी, निजपद आप देहीं, बडे उपकारी है। दीनको दयाल प्रभु सन्तनके उरमाल, कहे सहदेव गुरु ऐसो सुखधारी है ॥

छन्द त्रोटक दुइपदी ।

गुणबन्द निधान सर्वज्ञ प्रभुं । त्रियताप निधारण धीर विभुं ॥ कर्णधार उबारन जीवधनी । स्वयंपारख शोद्धच सुवाक्य मणी ॥१॥ त्रिगुणं रहितं सत भाषण हे । नित परख प्रकास सुसासन हे ॥ सुगिरामृतधार प्रवाह सरी । पुट श्रावण पानको प्यास

कबीरपंथी शब्दावली ७

(१९४)

कबीरपंथी—

हरी ॥२॥ मुझ दासको देव तुहि प्रभु हो । दीननाथके नाथ रखो शर्णु हो ॥ ३ ॥

छन्द मुनगी ।

गुरुजी कृपालो बडो तु दयालो । करो प्रतिपालो मिटी दुःखसालो ॥ कहैँ बिनती मैं शिशु जानि तारो । डरों दुःख देखी भवोंके अपारो ॥ १ ॥

परम सुजान महागुनखान । शीलके निधान सब सुखस्थान । कोईना कोईना कोईना हमारो । डरों दुःख देखी भवोंके अपारो ॥२॥

परं विरागी क्षमा उरपागी । मैं तो हूँ अभागी तेरो पाव लागी ॥ हूँ अनारी अनारी मेरो दुःख टारो । डरों दुःख देखी भवोंके अपारो ॥३॥

गिराहे तुमारी हरे शूल भारी । माया मोह डारी देही सुख सारी ॥ अनाथा अनाथा हियोहे अधारो । डरों दुःख देखी भवोंके अपारो ॥४॥

मेरे तुहीं स्वामी तुहीं अन्तर्यामी । नहिँ काम कामी प्रभुजी अकामी ॥ दयाला दयाला गुरुजी तुं सारों । डरों दुःख देखी भवोंके अपारो ॥ ५ ॥

मेरी बात मानी कहैँ सो तुं जानों । तेरो ज्ञान भानो करे अन्ध हानो ॥ डरो अन्ध जारो उजारो उजारो । डरों दुःख देखी भवोंके अपारो ॥ ६ ॥

मेटो भांतिझारी भुमां शोकफारी । ग्रही टेकयारी करी प्रीति भारी ॥ चहुँ साथ तेरो मेरेकुं उबारो । डरों दुःख देखी भवोंके उपारो ॥७॥

अहो देव देव करुं तेरो सेव । अबे गुरुदेव देहु सुख भेव ॥ प्रकाशी प्रकाशी प्रभुजी पुकारों । डरो दुःख देखी भवोंके अपारो ॥ ८ ॥

अथ विनयशब्दावलिल प्रारम्भः ।

श्रीपूर्ण साहब छत.

शब्द १—देखों अति सुन्दर छबि नीकी । मंगलदायक सुख

शब्दावली

(१९५)

लायक, निरखि सकल छबि लागत पीकी ॥ टे० ॥ कृपा करत लखि दीन दयाकर, भ्रांति मिटाव सकलो जीकी ॥ शरण गये सकलो दुःख मेटत, सुख उपजावत देवत सीकी ॥ निज पद माँहि छेत बैठारी, गांठ छुडावत मैं ममतीकी ॥ गुरु सम को उदार जगमाहीं, पूरन कीन्ह परख अति नीकी ॥ १ ॥

शब्द २-शरण तुम्हारी आयोजी गुरु ॥ टे० ॥ त्रिगुण मायाके फन्द़ा परि; युगन २ जहाँडायो ॥ चाह न योगध्यानकी अब मोहि, नाम जगीरी पायो ॥ १ ॥ लोक परलोक कछु नहि चाहों, सगुण निर्गुण नहि भायो ॥ पूरण ज्ञान ज्ञान विज्ञानको, भयो जब पारख थिति पायो ॥ २ ॥

शब्द ३-हौ प्रभु दीन जनन प्रतिपालक ॥ टे० ॥ हौ मति मन्द छन्द विषयनको, महा अज्ञ इन्द्रिकको चालक ॥ औगुन हरन नाम प्रभु तेरो, मैं औगुणी अधम कुल घालक ॥ मैं अति दीन शरण तुव आयो, छवो अपराध जीवनके पालक ॥ ना मोहि योग भोग मद नाहीं, धन मद नाहि बाँह बल बालक ॥ पूरन दासके तुमहि अधारा; और सकल जगमें यम जालक ॥ ३ ॥

शब्द ४-पतित पावनको सुन्दर ध्याना । निरर्त बदन प्रसन्न सुखदायक, देह आदि बिसरत जग भाना ॥ टे० ॥ चक्रांकित शिर टोप विराजे, ता ऊपर दस्तार बखाना । तिलक लिलाट शुभ अति नीको, तुलसीकी माल गले बिच नाना ॥ १ ॥ ज्ञानको अचला मुक्ति मेखला, अष्ट सिद्ध सेली प्रमाना । दया सिंहासन आई बैठे, पूरणदास चरण लपटाना ॥ ४ ॥

शब्द ५-कहाँलो कहौ गुरुप्रद प्रताप ॥ टे० ॥ जो मुख होय जीव दश लाखा, तऊ न बरनि सकत प्रभुजाप । अनेक जन्मको जीव विहाला, तिनको मिटचो महा भ्रम दाप ॥ सङ्कटमें सन्तनको

(१९६)

कबीरपंथी—

तारा, साधुरूप धरे पुनि आप। बादशाहको कसनी दीन्है; सिंहरूप धरे पुनि आप ॥ भेषकी टेक राखि करुणामय, पूरण कहा कीन धौ पाप ॥ ६ ॥

शब्द ६—तेरा दिल चाहे उधरे देख मैं देखूँगा तुझे ॥ टे० ॥ तुमतो मुखतार यार स्वतः सिद्ध आपी आप, और को न जानें एक आशरा तेरा है मुझे ॥ १ ॥ चाहे तो चन्द्रमा चकोरनको त्याग करे, पर चकोरनकी आग कहु चन्द्र बिन कैसे बुझे ॥२॥ चाहे तो प्रकाश सकल नेत्रको त्याग करे, पर विनु प्रकाश नेत्रनको जगमें कहु कैसे सूझे ॥ ३ ॥ सतगुरु दयाल तेरो सेवकहूँ बाल, बाल पूरणको तुमही एक और कोई नहिं दूजे ॥ ४ ॥ ६ ॥

शब्द ७—तेरी खुशी देख या न देख मैं देखूँ तेरे चरणोंमें ॥ टेक ॥ माय बाप सकल टारे, जाति पांति सकल सब विसारे, सकल आस छाड़ि गुरु ! आन पडा शरणोंमें ॥ १ ॥ त्याग दर्ई सकल लाज, काहूसे न राख्यो काज, घर घरके भिखारी हूँ नाम सुना करनोमें ॥२॥ हरदम तेरा आभास और कछु नाही भास, सबसो हौ गयो निराश जो तनही भरनोमें ॥३॥ नाम तेरा है दयाल पूरण फिरत बिहाल, कबधौं करिहौं निहाल, जावे जबरनोमें ॥ ४ ॥ ७ ॥

शब्द ८—मेरी प्रीतके निवाहन हारे, लीजे खबरिया हंस पियारे ॥ टे० ॥ हौं अनाथ कहलावत तेरो, काहे निकारि बाहिर मोहिं डारे ॥ १ ॥ जो दूरिआव मोहिको सतगुरु तोहू न छोड़ो चरण तिहारे ॥ २ ॥ तुम्हारा नाम सुना प्रभु श्रवणन, कि प्रभु पतित अनेक उबारे ॥३॥ करहु दया निज टेक निबाहो, जो तुम बिरद जगतमें धारे ॥४॥ जो कहो मोहि न जगतसे काजा, रहत अलिम सबनसों न्यारे ॥५॥ तो उपदेश कीन गहि बाहों, अब हम जाब

शब्दावली

(१९७)

कौनके द्वारे॥६॥ धारी देह जीवन हितलागी, दै परचे अनेक उबारे॥७॥ तार भार दीन्ह तोहि पूरण क्षमा करो अपराध हमारे॥८॥८॥

शब्द ९-धन सतगुरु तुमरी बलिहारी ॥ मैं मति हीन छीन निज कर्मनि, दीन उधारन लीन उबारी ॥ टे० ॥ जिमि अंकुर तपे विलु बारी, ताकी अम्बुज सिद्ध खरारी ॥ आनिके वेगहिं लीन जगाई, नहीं तो परते भर्म बिगारी ॥ परम दयाल दयाके सागर, महाकष्ट दुख द्रन्द निवारी ॥ सदा रहत दासनके संगा, पूरण परखावत भर्म विकारी ॥ ४ ॥ ९ ॥

शब्द १०-मम बोहित तुम खेवनहारा । जग समुद्र अज्ञान भरचो जल, तृष्णा तरंग करत ललकारा ॥ टे० ॥ काम कोध जलजन्तु अपरबल, बैठा मगर भरि हंकारा॥१॥ मोह भर्म बिच आनि पराहूँ, सूझिपरे नहीं वारो पारा ॥२॥ बूडत नाव उबारो साहब, आदि अन्तके हो कड़िहारा ॥३॥ अशरण शरण विरद सम्भारो, पूरण आयो शरण तुम्हारा ॥ ४ ॥ १० ॥

शब्द ११-तुमीरहि दरसको बना हूँ भिखारी ॥ मधुकर इव सब फिरत जगतमें, कबधौ मिलौगे कमल सुखारी ॥ टेक ॥ काम कोध मद लोभ अपरबल, तृष्णा उठत लहरि अति भारी ॥ मन रात्यो नाना विषयनमें; इन्द्रिन बाट निपट मोरि पारी ॥ चित्त चंचल को समुझावे, खाँड छाड़ि फांकत है छारी ॥ गुरु विचार पर छिनहु रहत नहिं, जग अनित्य मां भई मतवारी ॥ ई नाना औगुन मोमें रहत है, मांगो दर्शन करि ढिठियारी ॥ जेहि हित मुनि जन योग करत हैं, त्यागि राज कुटुंब धन नारी ॥ पूरन एक भरोसो आवत हो प्रभु जीवनके हितकारी ॥ शरण आयको त्यागत नाही, बन्दीछोर विरद अति भारी ॥ ११ ॥

शब्द १२-मुझ लाचारके तुम रखवारी ॥ टे० ॥ नहिं मोहि

(१९८)

कबीरपंथी-

द्रव्य बाहु बल नाहीं, नहिं मोहि विद्या बल अधिकारी ॥ ना मैं सिद्ध न साधनको बल, ना मैं मन्त्री ना व्रतधारी ॥ तपसी हौं ना मैं, हौं दीन परम गुरु, बाँह गहेकी लाज तुम्हारी ॥ बालकके दुलार निरवाहन, तुम विनु कौन पूर्ण सुखकारी ॥ १२ ॥

शब्द १३-परचो है कष्ट अति भारी मोको कष्ट अतिभारी ॥ ॥ टे० ॥ पारखंडिन पाछो बहु कीन्हो, ताते चोट लगत है कारी ॥ दीन जानि उपहास किय चाहै, मैं लाचार गरीब विचारी ॥ ना मुहि सिद्धि न साधनको बल, सुझ कंगालके तुम रखवारी ॥ सगरी जाल तुम्हारी परमगुरु, पूर्ण तुव पद केर भिखारी ॥ १३ ॥

शब्द १४-तुव चरणांमुख बिशद प्रयोगे ॥ टे० ॥ मय मन कठिन भँवर अतिदारुन, कारन कौन तन्त्र नहिं लागे ॥ अब यह मांगों तोहि दयानिधि, कर जोरे प्रेमन बहु पागे ॥ जो रज पावन करत जगतको, सोइ आई मस्तकपर लागे ॥ और इच्छा होय कबहुँ कछु, निशिदिन रहुँ चरणनके आगे ॥ चरण प्रताप होत ज्ञान गम, बहु जीव जाते होत सुभागे ॥ महिमा तुव चरणनकी साहब, विनु जाने सब जीव अभागे ॥ ताते काया रहै जबलौं जग, तौलौं रहौं मैं चरणन लागे ॥ आखिर चरण होय तैं हौं, जैसे सीप बुन्दसों लागे ॥ साहब कवीर सुखरूप कृपाघन, पूर्णदास यही वर मांगे ॥ १४ ॥

शब्द १५-तुम्हरे नामको भरोसो भारी ॥ हो प्रभु सेवकके सुखकारी ॥ टे० ॥ सिद्ध चौरासी बन्दि परे तब, गुरु गुरु करि कीन्ह पुकारी ॥ तुरतहि जाइ छुडायो तिनको, साह सुलतान कीन्ह सुखारी ॥ एक दिना काशीके माहीं, कुछी साह आयो अतिभारी ॥ पद्मनाभने परचे दीन्हा, नाम प्रतापते कष्ट निवारी ॥ नाम लेत तारे बोहित प्रभु, साह दामोदरकी भयहारी ॥ इन्दुमती

शब्दावली

(११९)

जब टेर कियो है, नाम प्रताप उत्तरचो विषकारी ॥ नाम तुम्हारा अटल प्रभु युग युग, जीवन अधम अनेक उबारी ॥ याहीते निश्चय भयो पूरण अबः करिहौ सुखी सब दुःख विडारी ॥१६॥

शब्द १६-कैसे रहौ जगमाहीं करुणायतन विनु, कैसे रहौ ॥ टे० ॥ जैसे जल विनु मीन दुखित होय, तलफि तलफि मरि जाई ॥ कोइ तो आय ब्रह्म बतावे, सूर प्रभाकी झाई ॥ कोइ तो कहै यह आतम स्वयम्, जल तरंगकी नाई ॥ कोइ तो कहत दूजा है कर्ता, कोइ तो कहत कछु नाई ॥ कोइ तो कहत यह देहही ब्रह्म है, मेरो मन न पतियाई ॥ कोई योग कोई ध्यान बतावे, कोइ कोइ अलख लखाई ॥ कोइ कहै ज्ञान विचार करो फिर, आप ब्रह्म जग भाई ॥ गुरु कवीर पारखकी राशि, सब सुखको सुखदाई ॥ ता पदसे कैसे होय न्यारो, आपहि पूर्ण कहाई ॥१६॥

शब्द १७-क्यों न जपो मन लाई, अक्षर दोष नीको, क्यों न जपो मनलाई ॥ टे० ॥ गुरु गुरु यह महामंत्र है, और मंत्र कछु नाहीं। ब्रह्म जपत अरु विष्णु जपत हैं, और जपत शिवराई ॥ शास्त्र पुराण यह साख बखानत, गुरुते परे कोइ नाहीं ॥ गुरुते सकल सिद्धि रिद्धि होत है, गुरुते परम पद पाई ॥ गुरुते ज्ञान अरु गम्य होत है, गुरु विनु कछु न बसाई ॥ गुरु विनु काहूको काज सेरे नहिं, बहुत भये जगमाहीं ॥ राम कृष्ण तिनहूँ गुरु कीन्हा, सूरख चेतत नाहीं ॥ और मंत्र सब कालस्वरूपी, जीवन देत झुलाई ॥ गुरुमन्त्र यह पूरण कृपा धन, जीवनके सुखदाई ॥१७॥

शब्द १८-गुरुते और नहिं कोई; मन देख विचारि ॥ टेक ॥ ज्ञानी मुनी सब ज्ञान बखानैं, रीते गये सब कोई । गुरुके गुण सब गावहिं, हो गज अन्धकी नाई ॥ टोइ टोइ पार नहिं पावे, मन माने मति भाई ॥ कोइ ब्रह्मा कोइ विष्णु कहै गुरु, कोइ कहै

(२००)

कवीरपंथी—

शिवजोई॥ कोइ कहै सतगुरु पार ब्रह्म है, या विधि गैल बिगोई॥ कोइ तो परमगुरु पुरुष बखाने, ईश कहत कोइ लोई॥ कोइ कहै गुरु अन्तर्यामी, सबमें भरचो है सोई॥ कोइ कर्ता कोइ माया कहै गुरु, मति बुद्धि सब गइ खोई॥ पूरण त्रिपद लांचे नाहीं, कसे गुरु पद होई॥ १८॥

शब्द १९—बक बक सब बौराने, गुरु कोइ न जाने। अंधाधुन्ध मत प्रगट कियो है, सब जीवनको ताने॥ टेक॥ घर घर तो सब गुरुआ बने हैं, कौन्हें बहुत बहुत बन्धाने॥ बन्दीछोर विनु नहीं उबारा, ये सब जग मलताने॥ बन्दी छुडावन जगमें निकसे, आइपरे बन्दीखाने॥ जो पूछौ गुरु कासौ कहिये, तौ कहत आनकी आने॥ कोई कहै गुरु सच्चिदानन्द, कोई कहै पुरुष पुराने॥ कोइ मानुष कोइ देव कहत हैं, यहि विधि भरम झुलाने॥ कोई शब्द कोइ वेद कहत हैं, कोई आतम अनुमाने॥ त्रिपद परखाये विनु पूरन, कैसे परे पहिचाने॥ १९॥

शब्द २०—आप न बूझ कहैं और बुझावे, विनु पारख नर भटक़ा खावे॥ टे०॥ ग्रन्थ पुराण बहुत जग बांचे; याते कहैं आवागमन नसावे। रहनी विना सब कहनी कांची, विनु भोजन कभूभूखन जावे॥ बेटी बेटा चेली चेला, मोह जाल कहैं जानिबढावे। घर छोड़े मठकी करै आशा, पूरण व्याधि कहैं सीस चढावे॥२०॥

शब्द २१—गुरुजी तेरो भजन भरोसो भारी॥ टे०॥ शरणागतकी बाँह गहत हौं, भवसे पार उतारी॥ बडे २ अपराधी तारे, हिंदू तुरुक नर नारी॥ गुण औगुण एकौ नहीं जानत, हौं पशु मूरख अनारी॥ जगसे भागि आये तुम शरणा पूरण दीन भिखारी॥२१॥

शब्द २२—मेरो मन बैरागी आज, बसिये साहब चरन॥ टे०॥ चरण प्रताप महा अघ नाशत, मेटत जनम मरन॥ दुख दारिद्र

शब्दावली

( २०१ )

विनाशक गुरुपद होय रहो अश्रुन श्रुन ॥ परस्व परकाशी सब सुखराशी, जीवन मुक्ति करन । सबहिनके सुखदाई पूरन, सहाइ भवभय रोग हरन ॥ २२ ॥

शब्द २३—होय रहु साहब शरण, मन छाड़ि जगतकी आस ॥ टे० ॥ जग आशा औ स्वर्गकी वासा, यही कालकी फाँस ॥ नर नारी औ माल खजाना, छाड़ि आयुर्बेल गाँस ॥ सुन्दर तन अरु सुन्दर जग यह, सब सपनेको भास ॥ पूरण पारस्व जौलौं नहि पावे, तौलौं भरम विलास ॥ २३ ॥

शब्द २४—भजुरे मन सदगुरु कृपालको नाम ॥ टे० ॥ नामप्रताप अटलि तिहुँ लोकमें, सब विधि मङ्गल धाम ॥ और नहीं कहुँ जाऊँ महा प्रभु, लागि रहौं निशिनाम ॥ नाम रटन जिन जगमें कीना, ते पाये विश्राम ॥ नाम असंग सकल सुखदाता, करिहैं पूरण काम ॥ २४ ॥

शब्द २५—( रागपिस्ता ) जायके सनमसे कहियो मेरी बात । वेगि खबरिया लीजै अब जान निकरी जात । जाय सनमसे ॥ टे० ॥ तेरे विरहके मारे मोहिं नौंद न आवे । नयनोंने झरि लाई जीव चैन नहिं पावे । एक राहके दरियावमें बूडा है मेरा मन । एक वक्त गश आवता जाता बिसर तन ॥ सुरता सहेली जायके तूने कहना अहवाल । वेगिते दर्श दीजै दास होत है विहाल ॥ सुख निधान समरथ सब सुराको बीज है । तेरी शरणमें आयके पूरण अजीज है ॥ २५ ॥

शब्द २६—प्रभु विनु दुख नरकको कौन हरे ॥ टे० ॥ जहँ जहँ कष्ट पडत दासनको, तहँ तहँ साहब होत खरे ॥ गर्व करै तो भरी ढरकावे, होत अधीन तो फेरि भरे ॥ भाव भक्तिके सदा समीपी, दम्भ पारखण्डते रहे परे ॥ दीनदयाल विरह है जाको, ताको पूरण ध्यान धरे ॥ २६ ॥

(२०२)

कबीरपंथी—

शब्द २७—सुनिय दयानिधि अरज दासकी । कृपा किये बहु भर्म मिटाये, शंका रही न गरभवासकी ॥ बडे भाग मैं आपन जान्यो, आय परचो प्रभु चरण खासकी ॥ देह अनित्य कहा अब मानो, नाश होयगी रक्त माँसकी ॥ यहि जगतकी मोह कहाँ बढ़ावई, कहा कथा जड वाम मासकी ॥ रिद्धि सिद्धि और मान बड़ाई, मनमें इच्छा नहीं तासुकी ॥ अमृत भोजन पाय अघाय, पुनि कस इच्छा होत घासकी ॥ यह संशय मेरे मन आई, मेटहु साहब कठिन फाँसकी ॥ परख विलासी सब सुखराशी, जानत हो सब जीव पासकी ॥ काह छिपा तुमसे कहे पूरन, टेक निवाहो मोर आसकी ॥ २७ ॥

शब्द २८—तुम विनु समरथ कौन रखवारा । जीवनको दुख मेटनहारा ॥ टेक ॥ जब जब कष्ट परत दासनपर, होत विहाल जीव करत पुकारा ॥ धारि देह तुरत तहाँ प्रगटत, दुख द्रन्दज सब दूरि विडारा ॥ कियऊ सुखी निज दासन लागि, काहे उपेक्षा कीन्ह हमारा ॥ पूत कपूत लाज जनि ताको, शरण परे निर्वाह बिचारा ॥ करुणामय कवीरगोसाई, दीनदयाल विरद अति धारा ॥ दीन जानि अब दाया कीजै, आनि गह्यो अब शरण तुम्हारा ॥ जगमें कछु न मोर अधिकाई, साहब शिर सेवकको भारा ॥ पूरण दुखित होय जो समरथ, तो लाजत सब विरद तुम्हारा ॥ २८ ॥

शब्द २९—याहीते प्रभु नाम दातारा, सेवक आश पुरावनहारा ॥ ॥ टेक ॥ हीन दीन अति दीन भयो तब, याचक आयके कीन्ह पुकारा ॥ जो नहि आश पुराओ ताको, तो लाजत हैं विरद तुम्हारा ॥ हम ऐसे याचक तुम्हरे घनरे, मेरे तो एक तुमहि आधारा ॥ तजब प्रान जो याचत तुमसों, तब हम जाब कवनके द्वारा ॥ हंसन नायक सब सुखदायक, सुनिके अरज भली चित धारा ॥

शब्दावली

(२०३)

जो नहि हमरी वांछा पुराओ, तो हँसिहैं सकलो संसारा ॥ जाके सेवक होत विकल अति, ताके साहब कस कल धारा ॥ पूरण याहि अन्देशा मोही, जानि बूझिके चहत विसारा ॥ २९ ॥

शब्द ३०-तुम विनु अरज करौं केहि आगे । स्वर्ग मृत्यु पाताल लोक लौं, अस को जो मोहि करत सुभागे ॥ टे० ॥ करुणामय कवीर कृपानिधि, साधु सन्त गावत सब जागे ॥ कि प्रभु अजर अमर अविनाशी, सुमिरत जाहि सकल दुख भागे ॥ यहि ते मोहि भरोसा आवत, औ प्रतीति भई बहु जागे ॥ अबकी बार कस विलम्ब कियो है, यह अचरज मनमें अति लागे ॥ तुम सब लायक हो सुख दायक, अचरज करत मोरे मन पागे ॥ चाहो तो अपने टेक निबाहो, नाहीं तो हम बने हैं नागे ॥ पूरण अचरज करत सुख साई, तुम कीरति मोको हित लागे ॥ इतनी विनय मानहु मोरी, जो मम सुरति निझाना दागे ॥ ३० ॥

शब्द ३१-कृपादृष्टि कब हेरो गुरुजी कृपादृष्टि कब हेरो ॥ टे० ॥ तुम अस समरथ शिर पर राजत, दुख पावत है चेरो ॥ सब लायक प्रभु हो सुख दायक मम अपराध घनेरो ॥ क्षमो अपराध दयाके सागर, आय परे शरणों अब तेरो ॥ पूरनकी यह अरज दयानिधि चरणन देहु बसेरो ॥ ३१ ॥

शब्द ३२-कभी तो भी दरस दिखाओ गुरुजी मोको कभी तोभी ॥ टे० ॥ चातकवत मैं पंथ निहारों स्वाती हूँके जुडावो ॥ जिमि चकोर चन्दा तन चितवत, और नहीं चित भावौ ॥ तुम्हरे दरस विनु अति विहाल जिय, मिलत न परख परभावौ ॥ पूरणके साहब सुख दाता, विनवत हौं गहि पावो ॥ ३२ ॥

शब्द ३३-लीला प्रभु तुम्हारी कही न जाय ॥ टे० ॥ राई सों पर्वत करि डारत, पर्वत राई तुल्य दिखाय ॥ सुर नर मुनि सब

(२०४)

कबीरपंथी—

खोजत हारे, कृपा मात्रमें सो परखाय ॥ जो पद इन्द्रादिक नहीं पावत, सो पद माँहिं दास बैठाय ॥ साहब कबीर जीवन सुखदाता, पूरण निज पद माँहिं रहाय ॥ ३३ ॥

शब्द ३४—मिले हैं दयाल कृतार्थ भये हम ॥ टे० ॥ शब्द लखाये कियो प्रभु मेरे, निज करते डारी उरमाल ॥ धोखा द्वन्द्व सवै मिटि गयऊ, दूटि गयो सब जमको जाल ॥ स्वर्ग मोक्षकी आशा नाहीं, पारख पाय भये है निहाल ॥ पूरण प्रकाश और नहीं आशा, सर्वत्र दयाल बन्दीछोर कृपाल ॥ ३४ ॥

शब्द ३५—मन हर लीन्हो सत्य कबीर ॥ मन० ॥ टेक ॥ लोग कहत जग भई है बावरी, कोई न बूझत पीर ॥ गावन नाचन कछुओ नहीं भावे, व्याकुल भये हैं शरीर ॥ बहु विचार केतिक समझाऊँ, जियरा धारत न धीर ॥ पूरन सुख प्रभु आप विराजे पञ्चकोशके तीर ॥ ३५ ॥

शब्द ३६—मन हर लीन्हो दीन दयाल, जीवनके रक्षपाल ॥ टे० ॥ कहौं कहा मोहि कल न परत है, अन्तर होत बिहाल ॥ सुख सम्पति मोहि कछुवो न सुहावै; लोग कुटुम्ब यमजाल ॥ तनकी सुधि बुधि सबही बिसरी, जब दीन्हीं उरमाल ॥ पूरण सुख जे पूर रह्यो है, कहा करे भर्म काल ॥ ३६ ॥

शब्द ३७—गुनी अगुनी हौं तिहारो प्रभुजी ॥ गुनी० ॥ टे० ॥ पुत्र अजान करतु है औगुण, तोहु पिताको प्यारो ॥ जो मम औगुण लखहू साहब, तो सब विधि हम हारो ॥ मिहर करहु जो दास जानिके, तो हम जग निस्तारो ॥ विरदकी लाज राखु प्रभु मोरी, पूरण दीन विचारो ॥ ३७ ॥

शब्द ३८—हमारी लाज तुम्हारे हाथ गुरु नाथके नाथ ॥ ह० टे० ॥ खर्ची खुट गई वर्षा आइ, देश बुरो गुजरात ॥ तुम बिन