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कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

शब्दावली

(४४९)

कपट सब देह बहाई । क्षमा गंगमें पैठि नहाई ॥१॥ विन जाँचे जो कहु आवे । रूखा सुखा ना विलगावे ॥ गृही भक्ति जो सेवा लावे । ताको देखि न मोह बढावे ॥ १० ॥ वर्तमान वरते सो साधा । अधिक चहै तो होय व्याघा ॥ छाड़ि उपाधि रहै लवलीना । कहै कवीर सो हंस परवीना ॥ ११ ॥

सा०-संत सराहिये ताहिको, जाको सतगुरु टेक ।

टेक निवाहे देह भरि, रहै शब्द मिलि एक ॥

रसनी ॥ गुरु शिष्य अविकारी ॥

साहब सेवक एकै होई । सदा बसंत खेले सब कोई ॥ गुरु शिष्य एक जब होई । चिन्ह न परे एककी दोई ॥ १ ॥ साहब सेवक वरण दुहेला । एकै वरण गुरु औ चेला ॥ जैसे फूल बास कहैं तोरी । पाछे तिल संग तेहि जोरी ॥ २ ॥ पाछे फूल सुवासहिं देई । तिल तजि तेल बास गहि लेई ॥ ऐसे गुरु शब्द जो देई । चेला गहे निज हेतु विलोई ॥ ३ ॥ विना प्रेम जिव होय अनेरा । पाछे परे कालके घेरा ॥ गुरु सुवास है फूल सनेही । तिल अनुमान शिष्यकी देही ॥ ४ ॥ प्रेम भक्ति जो गुरु बतावे । करि विश्वास शिष्य तेहि धावे ॥ गुरु शिष्य भेद नहिं ताही । जोइ गुरु सोइ शिष्य निवाही ॥ ५ ॥ गुरु पूरा शिष सूरा होई । तबहि काल रहै मुख गोई ॥ शेष विना गुरु छूटे नाहीं । फिरि फिरि परिहैं भोचक माहीं ॥ ६ ॥ सतगुरु सो सतभाव बतावे । शिष, सोई जो प्रेम लगावे ॥ तीनों लोक एक होय जाई । गुरु शिष अलग होय नहिं भाई ॥ ७ ॥

सा०-गुरु समाना शिष्यमें, शिष कर लीया नेह ।

विलगाये विलगे नहीं, एक प्रान दुइ देह ॥

कर्म बण्डकी रसनी १ ।

कर्म कथा अब कहूँ बखानी । जौन फाँस अटके नर प्रानी ॥

कवीरपंथी शब्दावली १५

(४५०)

कवीरपंथी-

चारों खानि कर्म अधिकाई । चहुँ खानि मिलि कर्म टढाई ॥ कर्महि धरती पवन अकाशा । कर्महि चन्द्र शूर प्रकाशा ॥ कर्महि ब्रह्मा विष्णु महेशा । कर्महिते भौ गौरि गणेशा ॥ सात बार पन्द्रह तिथि साजा । नौग्रह ऊपर कर्म विराजा ॥ कर्महि राम कृष्ण अवतारा । कर्महि रावण कंस संहारा ॥ कर्महि ले वसुदेव घर आवा । कर्महि यमुदा गोद खिलावा ॥ कर्महिते वन गऊ चराई । कर्महि गोपी केलि कराई ॥ कौशिल्या तप कर्म जो करिया । कारण कर्म राम औतरिया ॥ कर्महि दशरथ कीन्ह उदासा । कर्महि राम दीन्ह वनवासा ॥ कर्म जाय जब धनुष चढावा । कर्महि जनकसुता सिर नावा ॥ कर्महि हरचो सीता कई आई । दुख सुख कर्म ताहि भुगताई ॥ कर्म रेखते कोइ न सुकता । लछमन राम करम फल भुगता ॥ कर्मसाग बांधेउ तहिया । कर्महि जल जीवन दुख सहिया ॥ रुद्र राम कर्म कीन्ह लडाई । भला मिलाप हना भेट चढाई ॥ कर्मरेख नहि मिटे मिटाई । जीव पपील लङ्का होय आई ॥ कर्म रेख लंकापति गयो । लंकापति विभीषण भयो ॥ कर्म रेख सबहीं पर छाजा । कहाँ राम कहँ रावण राजा ॥ कर्मरेख सबहिन पर होई । देखो शुद्ध विलोय विलोई ॥ कर्मरेख सागर बँध हीना । बिरला कोई चीन्हे चीन्हा ॥

कर्म रेख सागर बँध्यो, सौ योजन मर्याद ।

विन अक्षर कोइ ना छूटे, अक्षर अगम अगाध ॥ १ ॥

रमनी ॥ २ ॥

सागर है भवसागर धारा । नहि कछु सूझे वार न पारा ॥ तहवाँ बावन अक्षर लेखा । कर्म रेख सबहिन पर देखा ॥ कर्म रेख बंधा सब कोई । खानी बानी देखि विलोई ॥ वेद कितेब कर्महीं गाय। कर्महिको निःकर्म बताया ॥ सद्गुरु मिले तो भेद बतावे ।

शब्दावली

(४५१)

कर्म अकर्म मध्य दिखलावे ॥ कर्म अकर्म मध्य है सोई । सो निःकर्म अकर्म न होई ॥ अक्षरसागर निर्भय वानी । अक्षर कर्म सबन पर जानी ॥ गोरख भरथरि गोपी चन्दा । कर्म फाँस सबही पुनी फन्दा ॥ सौ औ सात चौदह इक्कीसा । ब्रह्माके चौरासी भेसा ॥ कर्म फाँस तहवाँ लग राखा । जहाँ लग वेद व्यास कछु भाषा ॥ दश औ द्वादश कर्म बखाना । जिन जाना तिनहीं पहिचाना ॥ कर्म अकर्म मूल जो करई । गहे मूल सो कर्म न परई ॥ अक्षर सागर मूल भैंडारा । अक्षर मूल भेद उजियारा ॥ अक्षर मूल भेद जो जाने । कर्मी होय निःकर्म बखाने ॥

सा०-कर्महिं डोर चारो युग, सुनो सन्त सब दास ।

तत्त्वभेद निहतत्त्व लहि, जगते रहो उदास ॥ २ ॥

खंनो ॥ ३ ॥

सतयुग तप कीन्हे रघुराजा । कारण कर्म नन्द घर गाजा ॥ एक नारि रघुवर दुख पावा । सोलह सहस गोपी निरमावा ॥ कारण कर्म केलि भव कीन्हा । कुञ्ज कुञ्ज गोपिन सुख दीन्हा ॥ जहाँ तहाँ गोरस जाय चुरावा । जहाँ जहाँ कर्म तहाँ ले खावा ॥ कर्म कंस ठीका आयो जबहीं । मारन कृष्ण विचान्यो तबहीं ॥ कर्म पूतना भेष बनायो । कर्म पयोधर कृष्ण लगायो ॥ कर्महि कारण तहाँ सिधारा । कारण कर्म पिवे विषधारा ॥ मारि ताहि कीन्ही गति चारा । कर्म फाँस बोरचो संसारा ॥ कर्म इन्द्र बरस्यो दिन साता । कर्म कृष्ण गिरि लीन्हो हाथा ॥ कर्महि मारि विध्वंस जो कीन्हा । कर्म फाँस सबही आधीना ॥ कुब्जा कछु कर्म जो कीन्हा । कारण कर्म कृष्ण गति दीन्हा ॥ कर्म पताल कालेश्वर नाथा । साँवर अङ्ग भयो तेहि साथा ॥ यज्ञ अश्वमेध करत बलि राजा । कर्मते जाय पताल विराजा ॥ कर्महि वामन रूप

(४५२)

कबीरपंथी—

बनाया। बलिराजापै दान दिवाया ॥ कर्म अहूठ नापि पग लीन्ह। तीने पग तीनों पुर कीन्ह। ॥ आधा पाँव कर्म अधिकारी। बाँधि नृपति पतालहिं डारी ॥ जहाँ लगि जीव जन्तु उत्पानी। तहाँ लगि कर्म राय परवानी ॥ कर्म फाँसते कोइ न छूटे। कर्म फाँस सबहिन घर लूटे ॥

सा०—कर्म फाँस छूटे नहीं, केतो करो उपाय।

सद्गुरु मिले तो ऊबै, नहिं तो परलय जाय ॥ ३ ॥

रमैनी ४ ॥

जो कुछ कर्म जगतमें करई। करि करि कर्म बहुरि भव परई ॥ एक न होय यज्ञ व्रत ठाना। एक न पाप पुण्य पहिचाना ॥ एक कर्म कुल लीन्ह उठाई। कर्म अकर्म न जाने भाई ॥ एक छापा और तिलक बनावे। पहिरि मेखला साधु कहावे ॥ वैष्णव होय करै षट्कर्म। वेद विचार सदा शुचि धर्मा ॥ कथा पुराण सुनै चित लाई। कर्महि सुमिरे बहु विधि भाई ॥ विष्णु सुमिरि तप बहु विधि कियो। सो निःकर्म विष्णु नहिं भयो ॥ कर्मक डोरि बँधा संसारा। क्यों छूटे उतरे भवपारा ॥ एक अभंग एकादशि करई। तन छूटे वैकुण्ठहिं तरई ॥ यह वैकुण्ठ न इस्थिर होई। अन्त कर्मगति परलय सोई ॥ करै कर्म वैकुण्ठहिं जाई। कर्म घटे भव जल फिरि आई ॥ योगी योग कर्मको साधे। किरिया कर्म पवन आराधे ॥ योगी कर्म पवनको किरिया। भुगतै कर्म देह पुनि धरिया ॥ संन्यासी जो बन बन फिरहीं। होय निःकर्म कर्म फिर परहीं ॥ जीयत दग्ध देहको करई। जटा बढाय व्यसन परिहरई ॥ कोई नम्र कोई वज्र कछोटा। भरमत फिरि सहै पग ठोटा ॥ राजद्वार पावे अवतारा। भुगतै कर्म अकर्म व्यवहारा ॥ पण्डित जन सब कर्म बखाने। नख शिख कर्मफाँस अरुझाने ॥

शब्दावली

(४५३)

कर्म धर्मकी युक्ति बतावै । दान पुण्य बहु विधि अरथावै ॥ वज्र दान लै जन्म गँवावै । होई ऊंट बहु भार लदावै ॥ एक जो करै बरत अवतारा । होइ है सूकर थान सियारा ॥ सूकर थान हो कर्म जो भुगता । विन निःकर्म न होइ हैं सुकता ॥

सा०-बहु बन्धनसे बाँधिया, एक विचारा जीव ।

जीव बेचारा क्या करे, जो न छुडावै पीव ॥

संज्ञी ॥५॥

शब्द भेद निःशब्द बताओं । करि निःकर्म हंस सुकताओं ॥ निरालम्ब अवलम्ब न जानै । शब्द निरन्तर भेद बखानै ॥ पाप पुण्यकी छोड़े आसा । कर्म धर्मते रहे उदासा ॥ रहे उदास नाम लौ लाई । तत्त्वभेद निस्तत्त्व समाई ॥ तीरथ व्रतके निकट न जाई । भरम भूतको देइ भजाई ॥ सुख सम्पति नहिं विपत्ति विचारे । काम क्रोध तृष्णा परजारे ॥ किया कर्म आचार विसारे । होय निःकर्म कर्म निरुवारे ॥ सो ग्रहे जो निग्रह काया । अभिअन्तरकी मेटे माया ॥ शील स्वभाव शरीर बसावे । अन्तर स्थिर ध्यान लगावे ॥ ब्रह्म अग्नि मनमें परजाले । ताको विष्णु चरण परछाले ॥ गहे तत्त्व निस्तत्त्व विचारा । काम क्रोधको करै अहारा ॥ सहज योग सो योगी करई । कर्म योग कबहुँ नहिं परई ॥ धन यौवनकी करै न आशा । कामिनि कनकसे रहे उदासा ॥ चहुँदिशि मंसा पवन कलोलै । ज्ञान लहर अभ्यन्तर डोलै ॥ उनमुनि रहे भेद नहिं कहई । तत्त्वभेद निहतत्त्वहिं लहई ॥ जो कोइ आय अग्नि होय दहई । आप नीर होय नीचा बहई ॥ मन गयन्द गुरुमतसे मारा । गुरुगम लूटे ज्ञान भँडारा ॥ शूरा होय सो सन्मुख जूझै । भोंदू शब्द भेद नहिं बूझै ॥ दुखिया होय रेन दिन रोई । भोगी भोग करै सुख सोई ॥ दुख सुख भोग सोग सम जाने । भली बुगी कछु मन नहिं आने ॥ भली बुरीका करे सो त्यागा । निश्चय

( ४५४ )

कबीररचनी-

पावे वह बैरागा ॥ सींगी अच्छय रैन दिन बाजे । सिद्ध साधु तहँ आसन छाजे ॥

सा०-आसन साथै आपमें, आपा डारे खोय ।

कहैं कवीर सो योगी, सहजै निर्मल होय ॥ ६ ॥

इति कर्मवण्डकी रमनी ।

सत्यनाम ।

अथ पंच' देहकी निर्णय ॥

एक जीवको स्वतः पद, बुद्धि आँति सो काल । काल होइ यह काल रचि, तामें भये बिहाल ॥ १ ॥ बीहालेको मतो जो, देउँ सकल बतलाय । जाते पारख प्रौढ लहि, जीव नष्ट नहिं जाय ॥२॥ करि अनुमान जो शून्य भो, सूझे कतहूँ नाहिं । आपु आप बिसरो जबै, तन विज्ञान कहि ताहि ॥ ३ ॥ ज्ञान भयो जाग्यो जबै, करि आपन अनुमान । प्रतिबिंबित झाई लखै, साक्षी रूप बखान ॥ ४ ॥ साक्षी होय प्रकाश भो, महा कारण त्यहि नाम । मसुर प्रमाण सो विम्ब भो, नील बरण घनइयाम ॥ ५ ॥ बटयो विम्ब अध पर्व भो, शून्याकार स्वरूप । ताको कारण कहत हैं, महाँ अधियारी कूप ॥ ६ ॥ कारण सो आकार भो, श्वेत अँगुष्ठ प्रमान । वेद शास्त्र सब कहत हैं, सूक्ष्म रूप बखान ॥ ७ ॥ सूक्ष्म रूपते कर्म भो, कर्महिते यह अस्थूल । परा जीव या रहटमें, सहे घनेरी शूल ॥ ८ ॥

संतौ षट प्रकारकी देवी ॥

स्थूल सूक्ष्म कारण महाँ कारण केवल हंस कि लेही ॥ साटे तीन हाथ परमाना देह स्थूल बखानी । राता वर्ण बैखरी बाचा जागृत अवस्था जानी ॥ रजो गुणी ओंकार मात्रुका त्रिकुटी है

१ इस प्रन्यमें बटदेहका वर्णन है परन्तु इसका नाम पंचदेहका निर्णय है इसका कारण यह है कि, हंस देहको इसरी बेहोके साथ न मिलाकर अलग माना है । क्योंकि, वह बन्ध और मोक्षते परे मध्यकी भूमिका है ।

शब्दावली

(४५५)

अस्थाना । मुक्ति श्लोक प्रथम पद गायत्री ब्रह्मा वेद बखाना ॥ पृथ्वी तत्त्व खेचरी मुद्रा मग पीपल घट कासा । क्षय निर्णय बङ्गवाग्नि दशेन्द्रि देव चतुर्दश बासा ॥ और अहे ऋग्वेद बतायू अर्द्ध शुक्ति संचारा । सत्यलोक विषयका अभिमानी विषयानंद हंकारा ॥ आदि अंत औ मध्य शब्द या लखे कोइ बुधिवीरा । कहै कवीर सुनो हो संतो इति स्थूल शरीरा ॥ १ ॥

संतौ सूक्ष्म देह प्रमाना ।

सूक्ष्म देह अंगुष्ठ बराबर स्वप्न अवस्था जाना ॥ श्वेत वर्ण ओंकार मात्रुका सतो गुण विष्णु देवा । ऊर्ध्व सुन्न औ यजुर्वेद है कण्ठ स्थान अहेवा ॥ मुक्ति समीप लोक वैकुण्ठ पालन किरिया राखी । मार्ग बिहंग भूचरी मुद्रा अक्षर निर्णय भाखी ॥ आव तत्त्व कोहं हंकारा मंदाअग्नी कहिये । पंच प्राण द्वितीया पद गायत्री मध्यम बाणी लहिये ॥ शब्द स्पर्श रूप रस गंध मन बुद्धि चित हंकारा । कहै कवीर सुनौ भाइ संता यह तन सूक्ष्म सारा ॥ २ ॥

संतौ कारण देह सरेखा ।

आधा पर्व प्रमाण तमोगुण कारा वर्ण परेखा ॥ मध्य शून्य मकार मात्रुका हृदया सो अस्थाना । महदाकाश चाचरी मुद्रा इच्छा शक्ती जाना ॥ उदराग्नि सुषुप्ति अवस्था निर्णय कंठ स्थानी । कपि मारग तृतीय पद गायत्री अहे प्राज्ञ अभिमानी ॥ सामवेद पश्यन्ती वाचा मुक्त स्वरूप बखानी । तेज तत्त्व अद्वैतानन्दं अहंकार निरबानी ॥ अहे विशुद्ध महात्म जामे तामे कछु न समाई । कारण देह इती सम्पूर्ण कहै कवीर बुझाई ॥ ३ ॥

सन्तो महकारण तन जाना ।

नील वरण औ ईश्वर देवा है मसूर परमाना ॥ नाभि स्थान

(४५६)

कबीरपंथी-

विकार मात्रुका चिदाकाश परवानी । मारग मीन अगोचर सुद्व्रा वेद अथर्वन जानी ॥ ज्वाला कल चतुर्थ पद गायत्री आदि शक्ति ततु वायु । आश्रय लोक विदेहानंद मुक्ति साजोजि बतायु ॥ नृणै प्रकरशिक तुरी अवस्था प्रत्यज्ञात्मतु अभिमानी । शीव अहंकार महाकारण तन इहो कवीर बखानी ॥ ४ ॥

संतो सुनौ कैवल देह बखाना ।

केवल सकल देहका साक्षी भ्रमर गुफा अस्थाना ॥ निराकाश औ लोक निराश्रय निर्णय ज्ञान वसेखा । सूक्ष्म वेद है उनमुनि सुद्व्रा उनमुन बाणी लेखा ॥ ब्रह्मानंद कहीं हंकारा ब्रह्मज्ञानको माना । पूर्ण बोध अवस्था कहिये ज्योतिस्वरूपी जाना ॥ पुण्य गिरी अरु चारुमात्रुका निरंजन अभिमानी । परमारथ पंचम पद गायत्री परामुक्ति पहिचानी ॥ सदाशीव औ मार्ग सिखा है लहै संत मत धीरा । कालातीत कला सम्पूर्ण केवल कहै कवीरा ॥ ५ ॥

संतो सुनौ हंस तन व्याना ।

अबरण बरण रूप नहिं रेखा ज्ञान रहित विज्ञाना ॥ नहिं ऊपजै नहिं विनशै कबहुं नहिं आवै नहिं जाहीं । इच्छ अनिच्छ न दृष्ट अदृष्टी नहिं बाहर नहिं माहीं ॥ मै तू रहित न करता भोगता नहीं मान अपमाना । नहीं ब्रह्म नहिं जीव न माया ज्योंका त्यों वह जाना ॥ मन बुधि गुन इन्द्रिय नहिं जाना अलख अकह निर्बाना । अकल अनोह अनादि अभेदा निगम नीति फिरि जाना ॥ तत्त्व रहित रवि चंद्र न तारा नहिं देवी नहिं देवा । स्वयं सिद्धि परकाशक सोई नहिं स्वामी नहिं सेवा ॥ हंस देह विज्ञान भाव यह सकल वासना त्यागे । नहिं आगे नहिं पाछे कोई निज प्रकाशमें पागे ॥ निज प्रकाशमें आप अपनपौ भूलि गये विज्ञानी । उनमत बाल पिशाच मूक जड़ दशा पांच इह लानी ॥ खोये

शब्दावली

(४५७)

आपु अपनपौ सब रस निज स्वरूप नहिं जाने । फिरि कैवल महकारण कारण सूक्ष्म स्थूल समाने ॥ स्थूल सूक्ष्म कारण महाकारण कैवल पुनि विज्ञाना । भये नष्ट ये हेर फेरमें कतौ नहीं कल्याना ॥ कहैं कवीर सुनो हो सन्तो खोज करो गुरु ऐसा । ज्यहिते आप अपनपौ जानो मेटो षटका रैसा ॥ ६ ॥

निरख प्रबोधको रसैनी ॥ २ ॥

अस सतगुर बोले सत बानी । धन धन सत नाम जिन जानी ॥ नाम प्रतीत भई सब संता । एक जानके मिटे अनंता ॥ १ ॥ अनंत नाम जब एक समाना । तब ही साध परमपद जाना ॥ बिरला संत परम गति जानै । एक अनंत सो कहा बखानै ॥ २ ॥ सबते न्यारा सबके माहीं । माहीं सतगुर दूजा नाहीं ॥ सत्तनाम जाके धन होई । धन जीवन ताहीको सोई ॥ ३ ॥

दोहा-जिनके धन सत्तनाम है, तिनका जीवन धन ।

तिनको सतगुरु तारहीं, बहुर न धरई तन्न ॥ १ ॥

सत्तनामकी महिमा जानै । मन बच करमै सरना आनै ॥ एक नाम मन बच कर लेई । बहुर न या भवजल पग देई ॥ ४ ॥ योग यज्ञ जप तप क्या करई । दान पुत्रतैं काज न सरई ॥ देवी देवा भूत परेता । नाम लेत भागैं तज खेता ॥ ५ ॥ टोना टामन पूजा पाती । नाम लेत सहजै तर जाती ॥ जो इच्छा आवै मन माहीं । पुरवै तुरत बिलम्ब कछु नाहीं ॥ ६ ॥ सो सत्तनाम हृदय अनुरागी । सो कहिये साँचा बैरागी ॥ जब लग नाम प्रतीत न करई । तब लग जनम जनम दुःख भरई ॥ ७ ॥

दोहा-कविरा महिमा नामकी, कहता कही न जाय ।

चार मुक्ति औ चार फल, और परमपद पाय ॥ २ ॥

निरख प्रबोधको पहली रसैनी पृष्ठ ५०८ में आ गयी है ।

(४५८)

कवीरपंथी-

सत्तनाम है सबतें न्यारा । निर्गुन सर्गुन शब्द पसारा ॥ निर्गुन बीज सर्गुन फल फूला । साखा ज्ञान नाम है मूला ॥ ८ ॥ मूल गहेते सब सुख पावै । डाल पातमें मूल गँवावै ॥ सतगुरु कही नाम पहिचानी । निर्गुन सर्गुन भेद बखानी ॥ ९ ॥

दोहा-नाम सत्त संसारमें, और सकल है पोच ।

कहना सुनना देखना, करना सोच असोच ॥ ३ ॥

सबही झूठ झूठ कर जाना । सत्त नामको सत कर माना ॥ निस बासर इक पल नहिं न्यारा । जाने सतगुरु जानन हारा ॥ १० ॥ सुरत निरत ले राखै जहवाँ । पहुँचै अजर अमर घर तहवाँ ॥ सत्तलोकको देय पयाना । चार मुक्ति पावै निर्वाना ॥ ११ ॥

दोहा-सत्तलोकै सब लोक पति, सदा समीप प्रमान ।

परमजोतसो जोत मिलि, प्रेम सरूप समान ॥ ५ ॥

अंस नामतें फिर फिर आवै । पूरन नाम परमपद पावै ॥ नहिं आवै नहिं जाय सो प्रानी । सत्यनामकी जेहि गति जानी ॥ १२ ॥ सत्तनाममें रहै समाई । जुग जुग राज करै अधिकाई ॥ सत्तलोकमें जाय समाना । सत्त पुरुषसों भया मिलाना ॥ १३ ॥ हंस सुजान हंसही पावा । जोग संतायन भया मिलावा ॥ हंस सुघर दरस दिखलावा । जनम जनमकी भूख मिटावा ॥ १४ ॥ सुरत सुहागिन भइ आगे ठाढी । प्रेम सुभाव प्रीति अति बाढी ॥ पुहुपदीपमें जाय समाना । बास सुवास चहुँ दिस आना ॥ १५ ॥

दोहा-सुख सागर सुख बिलसई, मानसरोवर न्हाय ।

कोट काम-सी कामिनी, देखत नैन अघाय ॥ ६ ॥

सुरति नाम सुनै जब काना । हंसा पावै पद निर्वाना ॥ अब तो कृपा करी गुरु देवा । तातें सुफल भई सब सेवा ॥ १६ ॥ नाम दान अब लेय सुभागी । सत्त नाम पावै बड़ भागी ॥ मन बच

कर्म चित्त निश्चय राखै । गुरुके शब्द अमीरस चाखै ॥ १७ ॥ आदि अंत वहाँ भेदै पावै । पवन आड़में ले बैठावै ॥ सब जग झूठ नाम इक साँचा । श्वास श्वासमें साचा राचा ॥ १८ ॥ झूठा जान जगत सुख भोगा । साँचा साधू नाम सँजोगा ॥ यह तन माटी इन्द्री छारी । सत्तनाम साँचा अधिकारी ॥ १९ ॥ नाम प्रताप जुगे जुग भाखी । साध संत ले हिरदे राखी ॥ कहैं कवीर सुन धर्मनि नागर । सत्यनाम है जगत उजागर ॥ २० ॥

दोहा-महिमा बड़ी जो साध की, जाके नाम अधार ।

सतगुर केरी दया ते, उतरे भव जल पार ॥ ७ ॥

निरख प्रबोधको रत्ननी ॥ ३ ॥

प्रथम एक जो आपै आप । निराकार निर्गुन निर्जाप ॥ नहिं तब भूमि पवन अकासा । नहिं तब पावक नीर निवासा ॥ १ ॥ नहिं तब पांच तत्त्व गुन तीनी । नहिं तब सृष्टी माया कीनी ॥ नहिं तब आदि अंत मध धारा । नहिं तब अंध धुंध उजियारा ॥ २ ॥ नहिं तब ब्रह्मा विष्णु महेसा । नहिं तब सूरज चाँद गनेशा ॥ नहिं तब मच्छ कच्छ बाराहा । नहिं तब भादों फागुन माहा ॥ ३ ॥ नहिं तब कंस कृष्ण बलि बावन । नहिं तब रघुपति नहिं तब रावन ॥ नहिं तब सरगुन सकल पसारा । नहिं तब धारे दस औतारा ॥ ४ ॥ नहिं तब सरसृति जमुना गंगा । नहिं तब सागर समुद्र तरंगा ॥ नहिं तब तीरथ व्रत जग पूजा । नहिं तब देव दैत अरु दूजा ॥ ५ ॥ नहिं तब पाप पुत्र गुर सीखा । नहिं तब पठना गुनना लीखा ॥ नहिं तब विद्या वेद पुराना । नहिं तब हते कितेब कुराना ॥ ६ ॥

दोहा-कहैं कवीर विचारके, तब कुछ किरतम नाहिं ।

परमपुरुष तहैं आपही, अगम अगोचर माहिं ॥ १ ॥ करता एक अगम है आप । वाके कोई माय न बाप ॥ करताके

(४६०)

कवीरपंथी-

नहि बंधु औ नारी । सदा अखंडित अगम अपारी ॥७॥ करता कछु खावै नहि पीवै । करता कबहुँ मरे न जीवै ॥ करताके कुछ रूप न रेषा । करताके कुछ बरन न भेषा ॥ ८ ॥ जाके जात गोत कछु नाही । महिमा बरनि न जाय मो पाहीं ॥ रूप अरूप नहीं तेहि नाँव । बर्न अबर्न नहीं तेहि ठाँव ॥ ९ ॥

दोहा-कहै कवीर बिचार के, जाके बरन न गाँव ।

निराकार और निर्गुना, है पूरन सब ठाँव ॥ २ ॥

करता कृत्रिम बाजी लाई । ओंकार तैं सृष्टि उपाई ॥ पांच तत्त्व तीन गुन साजा । ताते सब कृत्रिम उपराजा ॥ १० ॥ कृत्रिम धर्ती कृत्रिम अकाश । कृत्रिम चंदूर परकाश ॥ कृत्रिम पांच तत्त्व गुन तीनी । कृत्रिम सृष्टि जो माया कीनी ॥ ११ ॥ कृत्रिम आदि अंत मध तारा । कृत्रिम अंध रूप उजियारा ॥ कृत्रिम सर्गुन सकल पसारा ॥ कृत्रिम कहिये दस औतारा ॥ ॥१२॥ कृत्रिम कंस कृत्रिम बलि बावन । कृत्रिम रघुपति कृत्रिम रावन ॥ कृत्रिम कच्छ मच्छ बाराहा । कृत्रिम भादों फागुन माहा ॥ ॥ १३ ॥ कृत्रिम सहर समुद्र तरंगा । कृत्रिम सरसुति जमुना गंगा ॥ कृत्रिम स्मृति वेद पुराना । कृत्रिम काजी कितेब कुराना ॥ ॥ १४ ॥ कृत्रिम जोग जोगावत पूजा । कृत्रिम देवी देव जो दूजा ॥ कृत्रिम पाप पुत्र गुर सीखा । कृत्रिम पढना गुनना लीखा ॥१५॥

दोहा-कहैं कवीर बिचारके, कृत्रिम करता नहि होय ।

यह बाजी सब कृत्रिम है, साँच सुनो सब कोय ॥

करता एक और सब बाजी । ना कोई पीर मसायख काजी ॥ बाजी ब्रह्मा विष्णु महेसा । बाजी इन्द्र औ चन्द्र गनेसा ॥१६॥ बाजी जल थल सकल जहाना । बाजी जानो जर्मों असमाना ॥ बाजी बरनो स्मृति वेदा । बाजीगरका लखै न भेदा ॥ १७ ॥ बाजी सिद्ध साधक गुर सीखा । जहाँ तहाँ यह बाजी दीखा ॥

शब्दावली

(४६१)

बाजी जोग यज्ञ व्रत पूजा । बाजी देवी देवल दूजा ॥१८॥ बाजी तीरथ व्रत आचारा । बाजी जोग यज्ञ व्योहरा ॥ बाजी जल थल सकल किवाई । बाजीसों बाजी लिपटाई ॥१९॥ बाजीका यह सकल पसारा । बाजी माहिं रहै संसारा ॥ कहैं कवीर सब बाजी माहीं । बाजीगरको चीन्है नाहीं ॥२०॥

अथ बीजककी रमैनी ।

प्रथम रमैनी १ ॥

अंतर ज्योति शब्द यक नारी । हरि ब्रह्मा ताके त्रिपुरारी ॥१॥ ते तिरिये भग लिंग अनंता । तेउ न जाने आदिउ अंता ॥२॥ बाखरि एक विधातै कीन्हा । चौदह ठहर पाटि सो लीन्हा ॥३॥ हरि हर ब्रह्मा महंतौ नाऊँ । ते पुनि तीन बसाबल गाऊँ ॥४॥ ते पुनि रचनि खंड ब्रह्मंडा । छा दर्शन छानवे परखंडा ॥५॥ पेटहि काहु न वेद पढ़ाया । सुनति कराय तुरुक नहि आया ॥६॥ नारी मो चित गर्भप्रसूती । स्वांग धरै बहुतै करतूती ॥७॥ तहिया हम तुम एकै लोहू । एकै प्राण वियापल मोहू ॥८॥ एकै जनी जना संसारा । कौन ज्ञानते भयो निनारा ॥९॥ भा बालक भगद्वारे आया । भग भोगेते पुरुष कहाया ॥१०॥ अविगतिकी गति काहु न जानी । एक जीभ कित कहाँ बखानी ॥११॥ जो सुख होइ जीभ दश लाखा । तौ कोइ आय महंतौ भाखा ॥१२॥

सा०-कहहिं कवीर पुकारिकै, ई लेऊ व्यवहार ।

एक रामनाम जाने विना, भव बूडि मुआ संसार ॥१॥

दूसरी रमैनी २ ॥

जीवरूप यक अन्तर बासा । अन्तर ज्योति कीन परगासा ॥१॥ इच्छारूप नारि अवतरी । तासु नाम गायत्री धरी ॥२॥ तेहि नारीके पुत्र तिन भाऊ । ब्रह्मा विष्णु महेश नाऊ ॥३॥ तब ब्रह्मा

१ काई,

(४६२)

कवीरपंथी—

पूँछल महतारी । को तोर पुरुष तू काकरि नारी ॥४॥ तुम हम हम तुम और न कोई । तुमहिं मोर पुरुष हमहिं तोर जोई ॥२॥

सा०-बाप पूतकी एकै नारी, एकै माय बिआय ।

ऐसा पूत सपूत न देख्यो, बापै चीन्है धाय ॥ २ ॥

तीसरो रमैनी ३ ॥

प्रथम अरंभ कौनके भयऊ । दूसर प्रकट कौन सो ठयऊ ॥१॥

प्रकटे ब्रह्मा विष्णु शिव शक्ती । प्रथमै भक्ति कीन जिव उक्ती ॥२॥

प्रकटे पवन पानी औ छाया । बहु बिस्तारकै प्रकटी माया ॥३॥

प्रकटे अंड पिंड ब्रह्मण्डा । पृथिवी प्रकट कीन नवरंढा ॥४॥

प्रकटे सिध साधक संन्यासी । ये सब लागि रहे अविनासी ॥५॥

प्रकटे सुरनर सुनि सब झारी । तेऊ खोजि परे सब हारी ॥६॥

सा०-जीव सीव प्रकटे सबै, वे ठाकुर सब दास ।

कविर और जाने नहीं, एक रामनामकी आस ॥ ३ ॥

चौथी रमैनी ४॥

प्रथम चरण गुरु कीन बिचारा । करता गावै सिरजनहारा ॥१॥

कहै करिकै जग बौराया । शक्ति भक्ति लै बांधिनि माया ॥२॥

अद्भुत रूप जातिकी वानी । उपजी प्रीति रमैनी ठानी ॥३॥

गुणि अनगुणी अर्थ नहिं आया । बहुतक जने चीन्ह नहिं पाया

॥४॥ जो चीन्है तेहि निर्मल अंगा । अनचीन्है नल भये पतंगा ॥४॥

सा०-चीन्हि चीन्हि कह गावहू, बानी परी न चीन्हि ।

आदि अंत उत्पति प्रलय, सब आपुहि कहि दीन्हि ॥४॥

पांचवी रमैनी ५॥

कहैलौ कहौ जुगनकी बाता । भूले ब्रह्म न चीन्है ज्ञाता ॥१॥

हरिहर ब्रह्माके मन भाई । बिबि अक्षर लै जुगति बनाई ॥२॥

बिबि अच्छरका कीन बैधाना । अनहद शब्द ज्योति परमाना ॥३॥

अच्छर पठि गुनि राह चलाई । सनक सनन्दनके मन भाई ॥४॥

शब्दावली

(४६३)

वेद किताब कीन्ह विस्तारा । फैल गैल मन अगम अपारा ॥५॥ चहुँ जुग भगत बांधल बाटी । समुझि न परी मोटरी फाटी ॥६॥ भैभै पृथ्वी चहुँ दिसि धावै । अस्थिर होय न औषध पावै ॥७॥ होय भिस्त जो चित न डोलावै । खसमहि छोड़ि दोजखको धावै ॥८॥ पूरुब दिशा हंस गति होई । है समीप सँधि बूझै कोई ॥९॥ भगता भगतिन कीन सिगारा । बूड़ि गयल सब माँझहिं धारा ॥ ५ ॥

सा०-विन गुरु ज्ञाने दुन्द भो, खसम कही मिलि बात । जुग जुग कहवैया कहै, काहु न मानी जात ॥ ५ ॥

छठी रमैनी ६ ॥

वर्णहुँ कौन रूप औ रेखा । दूसर कौन आहि जो देखा ॥१॥ ओ ओंकार आदि नहि बेदा । ताकर कहौ कौन कुल भेदा ॥२॥ नहि तारागण नहि रवि चंदा । नहि कछु होत पिताके बिदा ॥३॥ नहि जल नहि थल नहि थिर पवना । को धरै नाम हुकुम को बरना ॥ ४ ॥ नहि कछु होत दिवस अरु राती । ताकर कहहु कौन कुल जाती ॥ ५ ॥

सा०-शून्य सहज मन स्मृतिते, प्रकट भई यक ज्योति । बलिहारी ता पुरुष छवि, निरालंब जो होति ॥ ६ ॥

सातवी रमैनी ७ ।

जहिया होत पवन नहि पानी । तहिया सृष्टि कौन उत्पानी ॥ १ ॥ तहिया होत कली नहि फूला । तहिया होत गर्भ नहि मूला ॥ २ ॥ तहिया होत न विद्या वेदा । तहिया होत शब्द नहि खेदा ॥ ३ ॥ तहिया होत पिंड नहि बासू । ना धर धरणि न गगन अकासू ॥ ४ ॥ तहिया होत गुरु नहि चेला । गम्य अगम्य न पंथ दुहेला ॥ ५ ॥

(४६४)

कवीरपंथी-

सा०-अविगतिकी गति का कहौं, जाके गाँव न ठाँव । गुण विहीना पेखना, का कहि लीजै नाँउ ॥ ७ ॥

आठवीं रसनी । (बेदांत विचार) ८ ।

तत्त्व मसी इनके उपदेशा । ई उपनिषद कहै संदेशा ॥ १ ॥ ऊ निश्चय उनके बड़ भारी । वाहिको वर्ण करे अधिकारी ॥२॥ परमतत्त्वका निज परमाना । सनकादिक नारद सुख माना ॥३॥ याज्ञवल्क्य औ जनक संवादा । दत्तात्रय वहे रसस्वादा ॥४॥ वहे वसिष्ठ राम मिलि गाई । वहे कृष्ण ऊधव ससुझाई ॥५॥ वहे बात जो जनक दिढाई । देहै धरे विदेह कहाई ॥ ८ ॥

सा०-कुल अभिमाना खोयकै, जियत सुवा नहि होय । देखत जो नहि देखिया, अदृष्ट कहावै सोय ॥ ८ ॥

नवीं रसनी ९ ।

बांधे अष्ट कष्ट नौ सुता । यम बांधे अंजनिके पूता ॥ १ ॥ यमके बाहन बांधिनि जनी । बांधे सृष्टि कहालौं गनी ॥२॥ बांधे व तेंतीस करोरी । सुमिरत बँदि लोह गौ तोरी ॥३॥ राजा सुमिरैदे तुरिया चढी । पंथी सुमिरि नाम ले बढी ॥ ४ ॥ अर्थ बिहीना सुमिरे नारी । परजा सुमिरे पुहुमी झारी ॥ ९ ॥

सा०-बँदि मनाय फल पावहीं, बँदि दिया सो देव ।

कह कवीर ते ऊबरे, निसि दिन नामहि लेव ॥ ९ ॥

रसनी दशवीं १० ।

राही ले पिपराही बही । करगी आवत काहु न कही ॥ आई करगी भो अजगूता । जन्म जन्म जम पहिरे बूता ॥ बूता पहिर जम करे पयाना । तीन लोकमें कीन्ह समाना ॥ बांधेउ ब्रह्मा विष्णु महेश्वर । सुर नर सुनि औ बांध गणेश्वर ॥ बांधे पवन पावक औ नीरू । चन्द्र सूर बांधे दोउ बीरू ॥ सांच मंत्र बांधे सब झारी । अमृत वस्तु न जाने नारी ॥

शब्दावली

(४६५)

सा०-अमृत वस्तु जाने नहीं, मगन भये कित लोय । कहहि कवीर कामो नहीं, जीवहिं मरण न होय ॥११॥

रत्नो ग्यारहवीं ११ ।

आंधरी गुष्ठि सृष्टि भई बौरी । तीन लोक महाँ लागि ठगौरी ॥ ब्रह्महिं ठग्यो नाग संहारी । देवन सहित ठग्यो त्रिपुरारी ॥ राज ठगौरी विष्णुहिं परी । चौदह भुवन केर चौधरी ॥ आदि अन्त जेहि काहु न जानी । ताको डर तुम काहेक मानी ॥ ऊ उतंग तुम जाति पतंगा । यम घर किहेउ जीवको संगा ॥ नीम कीट जस नीम पियारा । विषको अमृत (मान) कहत गवारा ॥ विषके संग कौन गुण होई । किंचित लाभ मूल गौ खोई ॥ विष अमृत गौ एकै सानी । जिन जाना तिन विष के मानी ॥ कंहा भये नर सुय बेसुद्धा । बिन परचय जग बूढ़ न बुद्धा ॥ मतिके हीन कौन गुण कहई । लालच लागे आशा रहई ॥

सा०-भुवा है मरी जाहुगे, भुये कि बाजी ढोल ।

स्वप्न सनेही जग भया, सहिदानी रहिगो बोल ॥ ११ ॥

रत्नो नारहवीं १२ ।

माटिक कोट पषानक ताला । सोई बन सोई रखवाला ॥ सो बन देखत जीव डेराना । ब्राह्मण वैष्णव एक करि जाना ॥ (जोरी) ज्यों किसान किसानी करई । उपजे खेत बीज नहिं परई ॥ छाड़ि देहु नर झोलिक झेला । बूड़े दोऊ गुरु औ चेला ॥ तीसर बूड़े पारथभाई । जिन बन दाहे दवा लगाई ॥ भूंकि भूंकि कूकर मरि गयऊ । काज न एक सियारसे भयऊ ॥

साखी-मूस विलारी एक संग, कहु कैसे रहि जाय ।

अचरज यक देखो हो सन्तो, हस्ती सिंहहि खाय ॥१२॥

१ कहां भये नल स्रक्ष बेस्रक्ष । बिन परिचय जग मूढ न बूझा ॥

(४६६)

कवीरपंथी—

रमनी तेरहवीं १३ ॥

नहिं परतीति जो यह संसारा । द्रव्यक चोट कठिन को मारा ॥ सो तो शेषै जाय लुकाई । काहूके परतीति न आई ॥ चले लोग सब मूल गँवाई । यमकी बाढ़ि काटि नहिं जाई ॥ आजु काज जिय काल्हि अकाजा । चले लादि दिरगंतर राजा ॥ सहज बिचारत मूल गँवाई । लाभ ते हानि होय रे भाई ॥ ओछी मती चन्द्र गो अथई । त्रिकुटी संगम स्वामी बसई ॥ तबहीं विष्णु कहा समुझाई । मैथुन अष्ट तुम जीतहु जाई ॥ तब सनकादिक तत्त्व बिचारा । जैसे रंक धन पाव अपारा ॥ भौ मय्यादि बहुत सुख लाग। यहि लेखे सब संशय भागा ॥ देखत उत्पति लागु न बारा । एक मरे यक करै विचारा ॥ सुये गयेकी काहु न कही । झूठी आश लागि जग रही ॥

सा०-जरत जरतसे बाचहू, काहे न करहु गोहार ।

विष विष्याकै खायहू, राति दिवस मिलि झारि ॥ १३ ॥

रमनी चौदहवीं १४ ।

बड सो पापी आहि गुमानी । पाखण्ड रूप छल्यो नर जानी ॥ बावन रूप छल्यो वलि राजा । ब्राह्मण कीन्ह कौनको काजा ॥ ब्राह्मणही सब कीन्हो चोरी । ब्राह्मणही को लागी खोरी ॥ ब्राह्मण कीन्हो वेद ( ग्रन्थ ) पुराना । कैसेहु कै मोहि मानुष जाना ॥ यकसे ब्रह्महि पंथ चलाया । यकसे हंस गोपालहिं गाया ॥ यकसे शम्भू पंथ चलाया । यकसे भूत प्रेत मन लाया ॥ यकसे पूजा जैन विचारा । एकसे निहुरि निमाज गुजारा ॥ कोइ काहुको हटा न माना । झूठा खसम कविर न जाना ॥ तन मन भजि रहू मोरे भगता । सत्य कवीर सत्य है वक्ता ॥ आपुहि देव आपुही पाती । आपुहि कुल आपुहि है जाती ॥ सर्व भूत संसार निवासी ।

शब्दावली

(४६७)

आपुहि खसम आप सुखरासो ॥ कहते मोहि भयल युगचारी । काके आगे कहौं पुकारी ॥

सा०-सांचे कोइ न मानई, झूठेके संग जाय ।

झूठे झूठा मिलि रहा, अहमक खेहा खाय ॥ १४ ॥

रमैनी फन्तहवीं १५ ॥

उनई बदरिया परिगौ सँझा । अगुवा भूले बन खंड मंझा ॥ पिय अन्ते धन अन्ते रहई । चौपरि कामरि माथे गहई ॥

सा०-कुलवा भार न ले सकै, कहै सखिनसों रोऽ ।

ज्यों २ भौजै कामरी, त्यों २ भारी होइ ॥ १५ ॥

रमैनी सोलहवीं १६ ॥

चलत चलत अति चरण पिराने । हारि परे तहँ अति खिसि- याने ॥ गण गन्धर्व मुनि अन्त न पाया । हरि अलोप जग धन्धे लाया ॥ गहनी बन्धन बंध न सूझा । थाकि परे तहँ कछुन न बूझा ॥ भूलि परे तब अधिक डेराई । रजनी अंध कूप है जाई ॥ माया मोह उहां भर भूरी । दादुर दामिनि पवनहु पूरी ॥ वरवै तपै अखंडित धारा । रौने भयावनि कछु न अधारा ॥

सा०-सबै लोग जहँ डाइया, अन्धा सबै भुलान ।

कहा कोइ नहि मानही, (सब) एकै माहि समान ॥ १६ ॥

रमैनी सत्रहवीं १७ ॥

जस जीव आपु मिलै अस कोई । बहुत धर्म सुख हृदया होई ॥ जासुं बात रामकी कही । प्रीति न काहुसों निर्वही ॥ एकै भाव सकल जग देखी । बाहर परे सो होय विवेखी ॥ विषय मोहके फंद छोड़ाई । जहां जाय तहँ काटु कसाई ॥ है कसाई छूरी हाथा । कैसेहु आवै काटों माथा ॥ मानुष बड़े बड़े है आये । एकै पंडित सबै पढाये ॥ पढ़ना पढ़उ धरहु जनि गोई । नहिं तो निश्चय जाहु विगोई ॥

(४६८)

कवीरपंथी—

सा०—सुमिरन करहु रामको, छाडहु दुखकी आस । तर ऊपर धरि चापि है, जस कोल्हू कोटि पचास ॥१७॥

रमैनी मठारहवीं १८ ॥

अद्वुत पंथ बरणि नहिं जाई । भूले राम भूली दुनिआई ॥ जो चेतहु तो चेतु रे भाई । नहिं तो जीव यमै ले जाई ॥ शब्द न माने कथै विज्ञाना । ताते यम दीन्हों है थाना ॥ संशय सावज बसै शरीरा । ते खायल अनवेधल हीरा ॥

सा०—संशय सावज शरीरमें, संगहि खेले जुहारि । ऐसा घायल बापुरा, जीवन मारे झारि ॥१८॥

रमैनी उन्नीसवीं १९ ॥

अनहद अनुभवकी करि आशा । देखो यह बिपरीति तमाशा ॥ इहै तमाशा देखहु भाई । जहाँ है शुन्य तहाँ चलि जाई ॥ शुन्यहि बाँछा शुन्यहिं गयऊ । हाथा छोड़ि बे हाथा भयऊ ॥ संशय सावज सब संसारा । काल अहेरी साँझ सकारा ॥

सा०—सुमिरण करहु रामको, काल गहे है केश । ना जानों कब मारिहै, क्या घर क्या परदेश ॥१९॥

रमैनी बीसवीं २० ॥

अब कहु राम नाम अविनासी । हरि तजि जियरा कतहु न जासी ॥ जहाँ जाहु तहैं होहु पतंगा । अब जनि जरहु समुझि बिष संग ॥ राम नाम लौलाय सो लीन्हा । भुङ्गी कीट समुझि मन दीन्हा ॥ भौ अति गुरुवा दुख के भारी । करु जिय जतन सो देखु विचारी ॥ मनकी बात है लहरि विकारा । तोहि नहिं सूझे वार न पारा ॥

सा०—इच्छाके भव सागरे, वोहित राम अधार । कहैं कवीर हरि शरण गहु, गो बछ सुर विस्तार ॥२०॥