कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
(५१४)
कबीरपंथी-
देखि रहहु यहि औसर, अस सुख होई हैं पाई हो ॥ जो खुट- कार बेगि नहिं लागे, हृदय निवारहु कोऊ हो ॥ भुगतिकी डोरी गाठि जनि खैचहु, तब बझिहैं बड रोहू हो ॥ मनु वहि कहहु रहहु मन मारे, खिजुवा खीजि न बोले हो ॥ मानु भीत मितार्ई न छोडे, कबहुँ गांठि न खोले हो । भोगउ भोग मुक्ति जनि भूलहु, जोग जुगति तन साधहु हो ॥ जो यह भांति करहु मतबलिया ता मतके चित बांधहु हो ॥ नहिं तो ठाकुर है अति दारुन करिहैं चाल कुचाली हो ॥ बांधि मारि डंड सब लेहीं, छूटहिं तब मत- वाली हो ॥ जबही सावंत आनि पहुँचे, पीठ सांठि भल दुटिहैं हो ॥ ठाठे लोग कुटुम सब देखे कहे काहुके न छुटिहैं हो ॥ एक तो निहुरि पांव परि विनवे, विनति किये नहिं माने हो ॥ अन- चीन्हे रहेहु न कियेहु चिन्हारी, सो कैसे पहिचनबेउ हो ॥ लीन्ह बुलाय बात नहिं पूछी, केवट गरब तन बोले हो ॥ जाकर गांठि समर कछु नाहीं, सो निर्थनिया है डोले हो ॥ जिन्ह सम युक्ति अगमनकै राखिन, धरिन मच्छ भरि डेहरि हो ॥ जेकर हाथ पांव कछु नाहीं, धरन लाग तेहि सो हरि हो ॥ पेलना अच्छत पेलि चलु वौरे, तीर तीरका टोवहु हो ॥ उथले रहहु परहु जनि गहिरे, मति हाथहुकी खोवहु हो ॥ तरके घाम उपरके भूँभुरि, छाहैं कतहुँ नहिं पायहु हो ॥ ऐसनि जानि पसीझेहु सीझेहु, कस न छतुरिया छायहु हो ॥ जो कछु खेल कियहु सो कीयेहु, बहुरि खेल कस होई हो ॥ सासु ननद दोऊ देत उलाटन, रहहु लाज मुख गोई हो ॥ गुरु भौ ठील गोन भई लचपच, कहा न मानेहु मोरा हो ॥ ताजी तुकी कबहुँ न साधेहु, चढेहु काठको घोरा हो ॥ ताल झांझ भल बाजत आवे, कहरा सब कोइ नाचे हो ॥ जेहि रंग दुलहा ब्याहन आये, दुलहिनि तेहि रंग राचे हो ॥ नौका
शब्दावली
(५१५)
अछत खेवे नहिं जाने, कैसेक लगवेहु तीरा हो ॥ कहहिं कवीर राम रस माते, जोलहा दास कवीरा हो ॥ १ ॥
कहरा २.
मत सुनु मानिक मत सुनु मानिक, हृदय बंद निवारहु हो । अटपट कुम्हरा करे कुम्हरैया, चमरा गांव न बांचे हो ॥ नित उठि कोरिया पेट भरतु है, छिपिया आंगन नाचे हो ॥ नित उठि नौवा नाव चढतु है, बेरहि बेरा बोरे हो ॥ राउरकी कछु खबरि न जानहु, कैसेकै झगरा निबेरहु हो ॥ एक गांवमें पाँच तरुनि बसे, जेहि मा जेठ जेठानी हो ॥ आपन आपन झगरा प्रकासनि, पियासों प्रीति नसाइनि हो ॥ भैंसिन माहिं रहत नित बकुला, तिकुला ताकि न लीन्हा हो ॥ गाइन माहिं बसेउ नहिं कबहुँ, कैसे पद पहिचनबेउ हो ॥ पंथी पंथ बूझ नहिं लीन्हा, मूढहिं मूढ गंवारा हो ॥ घाट छोड़ि कस औघट रेंगहु, कैसेके लगबेहु तीरा हो ॥ जतइनके धन हेरिन ललचिन, कोदइतके मन दौरा हो ॥ दुइ चकरी जनि दरर पसारहु, तब पैहौ ठीक ठौरा हो ॥ प्रेम बाण एक सतगुरु दीन्हो, गाढों तीर कमाना हो ॥ दास कबीर कीन्ह यह कहरा, महरा माहिं समाना हो ॥ २ ॥
कहरा ३.
रामनामको सेवहु बीरा, दूरि नहिं दुरि आसा हो ॥ और देवका सेवहु बौरै, ई सब झूठी आसा हो ॥ ऊपर ऊजरका भौ बौरै, भीतर अजहुं कारो हो ॥ तनके बूद्ध का भौ बौरै, मनुवा अजहुं बारो हो ॥ मुखते दांत गये का बौरै, भीतर दांत लोहेके हो ॥ फिर फिर चना चबाव विषयके, काम कोध मद लोभैके हो ॥ तनकी सकल वासना घटि गयऊ, मनहिं दिलासा दूना हो ॥ कहहिं कवीर सुनो हो संतो, सकल सयानपऊना हो ॥ ३ ॥
(५१६)
कबीरपंथी-
कहरा ४.
ओढन मोर राम नाम, मैं रामहिका बनजारा हो ॥ रामं नामका करहुँ बनिजिया, हरि मोर हटवारा हो ॥ सहस नामका करो पसारा, दिन दिन होत सवाई हो ॥ जाके देव वेद पछ राखा, ताके होत हटवाई हो ॥ कानि तराजू सेर तिन पउवा, तुकिन ढोल बजाई हो ॥ सेर पसेरी पूरा कैले, पासंग कतहुँ न जाई हो ॥ कहहिं कवीर सुनो हो संतो, जोर चला जहंढाई हो ॥ ४ ॥
कहरा ५.
राम नाम भजु राम नाम भजु, चेति देखु मनमांहीं हो ॥ लच्छ करोरि जोरि धन गाडे, चलत डोलावत बांही हो दादा बाबा और प्रपाजा, जिनके यह भुईं भाँडे हो ॥ औंघर भये हियहुकी फूटी, तिन्ह काहे सब छाँडे हो ॥ ई संसार असारको घंथा, अन्तकाल कोइ नाही हो ॥ उपजत बिनसत बार न लागे, ज्यों बादरकी छाई हो ॥ नात गोट कुल कुटुंब सब, इन्हकर कौन बडाई हो ॥ कहहिं कवीर एक राम भजे बिनु, बूड़ी सब चतुराई हो ॥ ५ ॥
कहरा ६.
राम नाम बिनु राम नाम बिनु, मिथ्या जन्म गंवाई हो ॥ सेमर सेइ सुवा ज्यों जहँडे, ऊन परे पछिताई हो ॥ जैसे मदपी गांठी अर्थ दे, घरहुकी अकिल गमाई हो ॥ स्वादे उदर भरे धौं कैसे, औसै प्यास न जाई हो ॥ दबँहीन जैसे पुरुषारथ, मनही मांहि तवाई हो ॥ गांठि रतन मरम नहिं जाने, पारख लीन्हा छोरी हो ॥ कहहिं कवीर यह औसर बीते, रतन न मिले बहोरी हो ॥ ६ ॥
शब्दावली
(५२७)
कहरा ७.
रहहु संभारे राम विचारे, कहता हौं जे पुकारे हो ॥ मूंड मुंडाय फूलिके बैठे, सुद्रा पहिर मंजूसा हो ॥ तेहि ऊपर कछु छार लपेटे, भितर भितर घर मूसा हो ॥ गांव बसतु है गरब भारती, बाम काम हंकारा हो ॥ मोहन जहां तहां ले जहैं, नहिं पत रहल तुम्हारा हो ॥ मांझ मंझरिया बसे सो जाने, जन होइ है सो थोरा हो ॥ निर्भय भये तहां गुरुकी नगरिया, सुख सोवैं दास कवीरा हो ॥ ७ ॥
कहरा ८.
क्षेम कुसल औ सही सलामत, कहहु कौनको दीन्हा हो ॥ आवत जात दोऊ विधि लूटे, सर्वस हरि लीन्हा हो ॥ सुर नर सुनि जति पीर औलिया, मीरा पैदा कीन्हा हो ॥ कहाँ लों गनो अनंत कोटि लों, सकल पयाना कीन्हा हो ॥ पानी पवन अकाश जायँगे, चंद्र जायँगे सूरा हो ॥ ये भी जायँगे वो भी जायँगे, परत न काहुके पूरा हो ॥ कुशल कहत कहत जग बिनसे, कुशल कालकी फांसी हो ॥ कहैं कवीर सारि दुनिया बिनसे, रहै राम अविनासी हो ॥ ८ ॥
कहरा ९ .
ऐसनि देह निरालप बौरै, सुवले छुवे नहिं कोई हो ॥ डंड- वाकी डोरिया तोरिया तोरि लराइनि, जो कोटिन धन होई हो ॥ ऊर्ध निस्वासा उपजि तरासा, कहराइनि परिवारा हो ॥ जो कोई आवे बेगि चलावे, पल एक रहन न पाई हो ॥ चन्दन चीर चतुर सब लेपै, गरे गजमुकताकी हारा हो ॥ चौंसठ गीध मुये तन लूटै, जंबुकन उदर बिदारा हो ॥ कहहिं कवीर सुनो हो संतो, ज्ञानहीन मतिहीना हो ॥ इक इक दिना याहि गति सबकी, कहा राव कह दीना हो ॥ ९ ॥
(५१८)
कवीरपंथी—
कहरा १०.
हौं सबहिनमें हौना हो, मोहि बिलग बिलग बिलगाई हो ॥ ओढन मोरा एक पिछौरा, लोग बोलै एकताई हो ॥ एक निरं- तर अन्तर नाही, ज्यों ससि घटजल झाई हो ॥ एक समान कोई समुन्नत नाही, जाते जरा मरण भ्रम जाई हो ॥ रैन दिवस ये तहवाँ नाही, नारि पुरुष समताई हो ॥ हौं मैं बालक बूढो नाहीं, न मोरे चिलकाई हो ॥ त्रिविध रहौं संभनिमा बरतौं, नाम मोर रसुराई हो ॥ पठये न जाऊँ आने नहिं आवौं, सहज रहौं बुनियाई हो ॥ जोलहा तान बान नहिं जाने, फाटि बिने दश ठाई हो ॥ गुरु परताप जिन्हें जस भाख्यो, जन बिरलै सों पाई हो ॥ अनंत कोटि मन हीरा बेधा, फिटको मोल न पाई हो ॥ सुर नर मुनि जाके खोज परे हैं, कछु कछु कविरन पाई हो ॥ १० ॥
कहरा ११.
ननदीगेतैं विषम सोहागिनि, तैं निदले संसारा गे ॥ आवत देखी एक संग सूती, तैं औ खसम हमारा गे ॥ मोरे बापके दुइ मेहररूवा, मैं अरु मोर जेठानी गे ॥ जब हम रहलि रसिकके जगमें, तबहि बात जग जानी गे ॥ माइ मोरि सुवलि पिताके संगे, सरा रचि सुवल संघाती गे ॥ आपुहि सुवलि और ले सुवली, लोग कुटुब संग साथी गे ॥ जौं लौं स्वास रहे घट भीतर, तौं लौं कुशल परिहै गे ॥ कहहिं कवीर जब थास निकरि गौं, मंदिर अनल जरिहै गे ॥ ११ ॥
कहरा १२.
ई माया रघुनाथकी बौरी, खेलन चली अहेरा हो ॥ चतुर चिकनिया चुनि चुनि मारे, कोई न राखेउ न्यारा हो ॥ मौनी बीर दिगंबर मारे, ध्यान धरंते जोगी हो ॥ जंगलमेके जंगम मारे, माया किनहुं न भोगी हो ॥ वेद पढंते वेदुवा मारे, पूजा करंते
शब्दावली
(५१९)
स्वामी हो ॥ अर्थ विचारत पंडित मारे, बांधेउ सकल लगामी हो ॥ सिंगीत्रुडपि वन भीतर मारे, शिर ब्रह्माका, फोरी हो ॥ नाथ मछंदर चले पीठिदे, सिंचलहुमैं, बोरी हो ॥ साकटक घर कर्ता धरता, हरिभक्ताते चेरी हो ॥ कहहिं कवीर सुनो हो संतो, ज्यों आवे त्यों फेरी हो ॥ १२ ॥
इति कहरा बीजकका सम्पूर्ण ।
अथ चाचरि प्रारंभः
चाचरि पहिला १ ॥
खेलति माया मोहनी, जेर कियो संसार । कटि केहरि गज गामिनी, संशय कियो सिंगार ॥१॥ रचे रंगकी चूनरी, सुन्दरि पहिरे आय । शोभा अद्भुत रूपकी, महिमा बरनि न जाय ॥२॥ चन्द्र बदनी मृगलोचनी, बिडुक दियो उघालि । यती सती सब मोहिया, गज गति वाकी चालि ॥ ३ ॥ नारदके सुख मोडिके, लीन्हों बदन छिपाय । गरब गहेली गरबते, उलटि चली सुसकाय ॥४॥ शिव अरु ब्रह्मा दौरिके, दोनों पकड़े धाय । फगुआ लीन छिनायके, बहुरि दियो छिटकाय ॥ ५ ॥ अनहद धुनि बाजा बजे, सरवन सुनत भो चाव । खेलनिहारी खेलि है, जैसी वाकी दाव ॥ ६ ॥ ज्ञानढाल आगे दियो, टारे टरत न पांव । खेलनिहारी खेलि है, बहुरि न ऐसो दाव ॥ ७ ॥ सुर नर मुनि भू देवता, गोरख दत्ता व्यास । सनक सनन्दन हारिया, औरक केतिक आस ॥८॥ छिलकत थोथे प्रेम सो, धरि पिचकारी गात । करि लीनो बस आपने, फिरि फिरि चितवत जात ॥ ९ ॥ ज्ञान गाडिले रोपिया, तिरगुन लिये है हाथ । शिवसन ब्रह्मा लीनिया, और लिये सब साथ ॥ १० ॥ एक ओर सुर नर मुनि खड़े, एक अकेली आप । दृष्टि परे छोड़ै नहीं, करि लिय
(५२०)
कवीरपंथी—
एकै छाप ॥ ११ ॥ जेते थे तेते लियो, घुंघट माँहिं समाय । कज्जल वाके रेख है, अदृग्ग न कोई जाय ॥ १२ ॥ इन्द्र कृष्ण द्वारे खडे, लोचन निज ललचाय । कहै कवीर ते ऊबरे, जाहि न मोह समाय ॥ १३ ॥
चाचरि दूसरी २ ॥
जारो जगको नेहरा, मन बौरा हो । जाँमे सोग संताप समुझ मन बौरा हो ॥ १ ॥ तन धनसों क्या गरब, समुझ मन बौरा- हो ॥ भसम किरमीको साज, मन बौरा हो ॥ २ ॥ विना नेव- का देवघरा, मन बौरा हो ॥ विन कहगिलकै ईट, समुझ मन बौराहो ॥ ३ ॥ काल बूतकी हस्तिनी, मन बौरा हो ॥ चित्र रच्यो जगदीस, समुझ मन बौरा हो ॥ ४ ॥ काम अंध गज बस परै, मन बौरा हो ॥ अंकुस सहिया सीस, समुझ मन बौरा हो ॥५॥ मर्कट मूठी स्वादकी, मन बौरा हो । लीन्हो भुजा पसारि समुझ मन बौरा हो ॥६॥ छूटनकी संशय परी, मन बौरा हो ॥ घर घर खायो डांग, समुझ मन बौरा हो ॥ ७ ॥ ऊंच नीच जानै नहीं, मन बौरा हो ॥ घर घर नाचेउ द्वार, समुझ मन बौरा हो ॥ ८ ॥ ज्यों सुवना नलनी गह्यो, मन बौरा हो । ऐसो भरम विचार, समुझ मन बौरा हो ॥ ९ ॥ पढे गुनेका कीजिय, मन बौरा हो । अन्त बिलैया खाय, समुझ मन बौरा हो ॥१०॥ सूने घरका पाहुना, मन बौरा हो । ज्यों आवै त्यों जाय, समुझ मन बौरा हो ॥ ११ ॥ नहानेको तीरथ घना, मन बौरा हो । पूजनको बहु देव, समुझ मन बौरा हो ॥ १२ ॥ बिनु पानी नल बूडिया, मन बौरा हो । टेकेउ राम जहाज, समुझ मन बौरा हो ॥१३॥ कहहि कवीर जग भरमिया, मन बौरा हो । छोड़ हरिको सेव, समुझ मन बौरा हो ॥ १४ ॥
इति चाचरि समाप्तम् ।
शब्दावली
(५२१)
अथ वेलि प्रारंभः ।
प्रथम वेलि ।
हंसा सरवर शरिर हो रमैया राम । जागत चोर घर मूसल हो रमैया राम ॥ १ ॥ जो जागे सो भागे हो रमैया राम । सोवत गैल वियोग हो रमैया राम ॥ २ ॥ आज बसेरा नियरे हो रमैया राम । काल्ह बसेरा हरि हो रमैया राम ॥ ३ ॥ परेहु बिराने देश हो रमैया राम । नैन मरेंगे हूँठ हो रमैया राम ॥ ४ ॥ त्रास मथन दधि मथन कियो हो रमैया राम । भवन मध्यो भर पूरि हो रमैया राम ॥ ५ ॥ हंसा पाहन मैल हो रमैया राम । बेधिन पद निर्वाण हो रमैया राम ॥ ६ ॥ तुम हंसा मत माणिक हो रमैया राम । हटल न मानेहु मोर हो रमैया राम ॥ ७ ॥ जसरे कियो तस पायो हो रमैया राम । हमर दोष जनि देहु हो रमैया राम ॥ ८ ॥ अगम काटि गम कीन्हो हो रमैया राम । सहज कियो व्योपार हो रमैया राम ॥ ९ ॥ राम नाम धन बानि- जहु हो रमैया राम । लादहु वस्तु अमोल हो रमैया राम ॥ १० ॥ पांच लदनवा लादि चले हो रमैया राम । नौ बहिया दश गौन हो रमैया राम ॥ ११ ॥ पांच लदनुआ खांगि परे हो रमैया राम । खाखरि डारिन खोर हो रमैया राम ॥ १२ ॥ शिर धुनि हंसा उड़ि चले हो रमैया राम । सरवर मीत जोहरि हो रमैया राम ॥ १३ ॥ आगि लगी सरवरमें हो रमैया राम । सरवर जरि भौ छार हो रमैया राम ॥ १४ ॥ कहैं कवीर सुनु संत हो रमैया राम । परखि लेहु खर खोट हो रमैया राम ॥ १५ ॥
वेलि दूसरी २ ॥
भल सुस्मृति जहँडायहु हो रमैया राम । धोखा कियो विस- वास हो रमैया राम ॥ ११ ॥ सोतो है बंसी कसि हो रमैया राम ।
(५२२)
कवीरपंथी—
सिरके लियो विसवास हो रमैया राम ॥२॥ ई तो है वेद साक्ष हो रमैया राम । गुरु दीन्हो मोहिं थापि हो रमैया राम ॥ ३ ॥ गोबर कोट उठायहु हो रमैया राम । परि हरि जैहो खेत हो रमैया राम ॥ ४ ॥ बुद्धिवल तहाँ न पड़ुंचै हो रमैया राम । खोज कहांति होय हो रमैया राम ॥५॥ सुनिमन धीरज भैल हो रमैया राम । मन बढि रहल लजाय हो रमैया राम ॥६॥ फिरि पाछे जनि हेरो हो रमैया राम । काल बूत सब आय हो रमैया राम ॥ ७ ॥ कह कवीर सुनु संत हो रमैया राम । मति दिगहि फैलाहु हो रमैया राम ॥ ८ ॥
अथ विरहुली प्रारम्भः ।
आदि अन्त नहिं होत विरहुली । नहिं जड़ पल्लव पेड़ विर- हुली ॥ १ ॥ निसि बासर नहिं होत विरहुली । पानी पवन न होत विरहुली ॥ २ ॥ ब्रह्माहि सनकादि विरहुली । कथि गये जोग अपार विरहुली ॥ ३ ॥ मास अषाढहि शीत विरहुली । बोइन सातौ बीज विरहुली ॥४॥ नित गाड़ै नित सिंचै विरहुली । नित नव पल्लव पेड़ विरहुली ॥ ५ ॥ छिछिल विरहुली छिछिल विरहुली । छिछिल रहल तिहुँलोक विरहुली ॥ ६ ॥ फुल एक भल फुलल विरहुली । फूलि रहल संसार विरहुली ॥ ७ ॥ ते फुल बन्दै भगत विरहुली । बांधिके राउर जाय विरहुली ॥८॥ सो फुल लोढहि संत विरहुली । डसि गौ बैतल सांप विरहुली ॥ ९ ॥ विषहर मंत्र न मान विरहुली । गाडुर बोले और विर- हुली ॥ १० ॥ विषकी कयारी बोयो विरहुली । अब लोरत का पछिताय विरहुली ॥ ११ ॥ जनम जनम अवतरेउ विरहुली । फल यक कनइल डार विरहुली ॥ १२ ॥ कह कवीर सचु पाय विरहुली । जो फल चाखहु मोर विरहुली ॥ १३ ॥
शब्दावली
(५२३)
अथ हिंडोला प्रारंभः ।
हिंडोला पहिला १ ॥
भर्म हिंडोला झूले सब जग आय ॥ टेक ॥
जहँ पाप पुण्यके खम्भ दोऊ, मेरू माया नाय । तहँ कर्म पटुकी बैठिकै, को को न झूले आय ॥ १ ॥ लोभ मरूआ विषय भवरा, काम कीला ठानि । शुभ अशुभ बनाय डांडी, गह्यो दूनौ पानि ॥ २ ॥ झूले सो गन गन्धर्व सुनि नर, झूले सुरगन इन्द्र । झूलत सो नारद सारदा, झूलत व्यास फनीन्द्र ॥ ३ ॥ झूलत विरंचि महेस-सुनिहो झूलत सूरज इन्द्र । आप निर्गुन सगुन होयके, झूलिया गोविन्द ॥ ४ ॥ छौ चार चौदह सात इकइस, तीन लोक बनाय चौखानि बानी खोजि देखौ, थिर न कोइ रहाय ॥ ५ ॥ खण्डो ब्रह्मखण्ड खोजि षट् दर्शन, ये छूटे नाहिं । साधु संग बिचारि देखौ, जीव निसतरि जाहिं ॥ ६ ॥ ससि सूर निस दिन संधि, औ तहँ तत्त्व पांचौ नाहिं । काल अकालौ परलय नहीं, तहँ संत बिरले जाहिं ॥ ७ ॥ तहँके विछुरे बहु कल्प बीते, परे भूमि भुलाय । साधु संगति खोजि देखौ, बहुरि उलटि समाय ॥ ८ ॥ तेहि झूलवेको भय नहीं, जो होय संत सुजान । कहहिं कवीर सत सुकृत मिलै तो, फिरि न झूले आन ॥ ९ ॥
हिंडोला दूसरा २ ॥
बहु विधि चित्र बनाइके, हरि रच्यो है क्रीडा रास । जाहि न इच्छा झूलवेको, अस बुद्धि केहि पास ॥ १ ॥ झूलत २ बहु कल्प बीते, मन न छोड़ै आस । रच्यो रहस हिंडोलना, निसि चारिउ जुग चौमास ॥ २ ॥ कबहुक ऊंचे नीचे कबहुंक, सरग भूलौ जाय । अति भरमित भरम हिंडोलना, नेकु नहीं ठहराय ॥ ३ ॥ डरपत हो यहि झूलवेको, राखु जादव राय । कहै कवीर गोपाल विनती, शरन हो तुम पाय ॥ ४ ॥
(५२४)
कवीरपंथी-
हिंडोला तीसरा ३ ॥
लोभ मोहके खम्भ दोऊ, मन रच्यो है हिंडोर । झूलहीं जीव जहान जहँ लगि, कतहुँ नहीं थित ठौर ॥१॥ चतुरा झूले चतु- राइया, झूले राजा सेव । चन्द्र सूर्य दोऊ झूलहीं, नाहि न पायो भेव ॥ २ ॥ चौरासी लच्छ जीव झूले; रवि सुत धरिया धाय । कोटिन कल्प जुग बीतियां, अजहुँ न मानै हाय ॥ ३ ॥ धरनि अकास दोउ झूले, झूले पवनहु नीर । धरी देह हरि आपुहु झूलहीं; लखहिं, हंस कवीर ॥ ४ ॥
इति हिंडोला बीजक ॥
सत्यनाम ।
गुरु महिमा ।
सा०-सतकवीरके चरण रज, धर्मदास शिरनाय ॥
बार बार विनवन लगे, सतगुरु होहु सहाय ॥
रमैनी १-धर्मदास बिनवै कर जोरी । हे साहब इक विन्ती मोरी ॥ बारम्बार आप अस भाषो । गुरु गुरु कहि बहुत अभि- लाषो ॥ १ ॥ मुझ किंकर पर दया सुकीजे । दास जानि यही वर दीजे ॥ निसिदिन रहौं चरन लौलीना । पल इक चित्त न होवे भीना ॥ २ ॥ महिमा गुरु कहो समझाई । सुनत जीव भगती दिठ पाई ॥ विना ज्ञान नर होय अजाना । संग्रह त्याग न विनु पहिचाना ॥ ३ ॥ जब जाने सरधा दिठ होई । विन जाने सरधा नहिं कोई ॥ विन सरधा अनुराग न जामें । विनु अनु- राग भगति नहिं तामें ॥ ४ ॥ विना भगति जिव छुटै न फेरा । विना भगति जिव होय अनेरा ॥ याते सतगुरु देहु बतायी । गुरु महिमा कहिये अरथायी ॥ ५ ॥
सा०-धर्मदासके वचन सुन, हरषे श्री गुरुदेव ।
सुनु धर्मनि अब कहत हौं, गुरु महिमाको भेव ॥
शब्दावली
(५२५)
रमैनी २-गुरुने अधिक और कोउ नहीं। धरमदास परखहु हिय माहीं ॥ गुरु दयाल अस हैं सुखदाई। देहिं सुकतिको पंथ लखाई ॥ १ ॥ गुरुते अधिक कोइ नहिं दूजा। भरम तजि कर सतगुरु पूजा ॥ तीरथ धाम देवल अरु देवा। सीस अरपि जो लावैं सेवा ॥ २ ॥ तौ नहिं वचन कहे हितकारी। भूले भरमे यह संसारी ॥ भवसागर है अगम अपारा। तामें बूझि गयो संसारा ॥ ३ ॥ पार लगनको सब कोइ धावे। विना गुरु कोइ पार न पावे ॥ यह जग जीव थाह नहिं पावे। विना गुरु सब गोता खावे ॥ ४ ॥ जग जीवोंसे कहु गोहराई। सत गुरु खेवट पार लगाई ॥ यह जग बूझि जाय मंझधारा। सतगुरु भक्ति भये भव पारा ॥ ५ ॥
सा०-सतगुरु भक्ति न जानई, कहैं कवीर बखान। यह जग भूले बापुरे, गहे न सतगुरु ज्ञान ॥
रमैनी ३-जग कर आयु अल्प है भाई। अन्त सभै कोइ नाहि सहाई ॥ बहुत पियारि नारि जग माहीं। मातु पिताहु जेहि सर नाही ॥ १ ॥ जेहि कारण नर सीस जु देहीं। अंत समय सो नाहिं सनेही ॥ निज स्वारथ कहैं रोदन करई। तुरतहि नैहरको चित धरई ॥ २ ॥ सुत परिजन धन सुपन सनेहीं। भीर परे कोइ काम न देहीं ॥ निज तनु सम और न आना। सो तन संग न चलत निदाना ॥ ३ ॥ ऐसो को जग दीखे भाई। अंत समयमें लेइ छुड़ाई ॥ अहे एक सो कहौं बखानी। जेहि अनुराग होय सो मानी ॥ ४ ॥ केवल गुरु छुडावन हारा। निश्चय जानो कहा हमारा ॥ कालहि जीत हंस लैजाहीं। अविचल देस पुरुष जहं आहीं ॥ ५ ॥
(५२६)
कवीरपंथी—
सा०—बिना गुरु उतरे नहीं, भवसागरके पार । कहैं कवीर सब जीवसे, गहिलो गुरु अपार ॥
रमैनी ४—सरगुन निरगुन माहिं पिछानो । निगुराको नहिं ठौर ठिकानो ॥ विन गुरु कोई पार न पावे । लोक परलोक महं परगट दिखावे ॥ १ ॥ सुकदेव भये गरभ जोगेसर । उन समान नहिं थाप्यो दोसर ॥ तपके तेज गये हरिधामा । गुरु विनु नाहिं लहे विसरामा ॥ २ ॥ रोक पारषद जान न पाये । कह सुकदेव करहु कस भाये ॥ कह पारषद सुनो सुनि राऊ । विनु हरि आज्ञा जान न पाऊ ॥ ३ ॥ करहु विनती हरिपै जाई । ठाठ द्वार सुकदेव रहाई ॥ जबै पारषद हरिपै गयऊ । जस सुनि कहा तस पुनि कहेऊ ॥ ४ ॥ सुनत विष्णु तब बाहर आये । देखतहीं शुक अति हरषाये ॥ विस्तु कहे रिषि कहवां आये । गुरु विहीन तप तेज झुलाये ॥ ५ ॥
सा०—गुरु बिना जो तप करे, गुरु विन देवे दान । गुरु विनु माला फेरते, सबही निसफल जान ॥
रमैनी ५—गुरु विहीन नर मोहि न भावे । सो कस हरिधाम सिधावे ॥ कह सुकदेव सुनो हरि राऊ । कहि सुपन्थ मोहि राह बताऊ ॥ १ ॥ जाहु पलटि करहु गुरु स्याना । तब पैहो इहवाँ अस्थाना ॥ सुनि सुनि सुकदेव वेगि सिधाये । गुरु विहीन तहँ रहन न पाये ॥ २ ॥ दृढन गुरु चले सुनि राई । व्यास सुनी तब कह्यो बुझाई ॥ मिथला आहि जनक पुर धामा । विदेह जनक तहँ रहत ललामा ॥ ३ ॥ उन सम ज्ञानि न दूसर कोऊ । जाकर शरण गहो तुम सोऊ ॥ चले सुनत सुक सुनि तहवाँ । राजा जनक रहत है जहवाँ ॥ ४ ॥ सिष भावले पहुंचे जबहीं । मिलत जनक हरष भय तबहीं ॥ जनक विदेह कीन्ह गुरु जानी । हरषि मिले तब सारंग पानी ॥ ५ ॥
शब्दावली
(५२७)
सा०-गर्भ जोगेसर गुरु बिना, लागे हरिकी सेव । कह कवीर वैकुंठसे, फेर दियो सुकदेव ॥ जनक विदेही गुरु किया, लागा हरिकी सेव । कह कवीर वैकुंठमें, उलट मिला सुकदेव ॥
रमैनी ६-ब्रह्मा सुत नारद बड ज्ञानी । जिनकर कथा जगत सब जानी ॥ हरि करते चौरासी परिया । गुरु किरपाते तुरत उबरिया ॥१॥ और देव गिषि मुनिवर जेते । जिन गुरु कीन्ह उत्तर सो तेते ॥ बिना गुरु भवसागर डूबे । उब डुब होय पार नहीं ऊबे ॥ २ ॥ जो गुरु मिले तौ पंथ बतावे । सार असार परख दिखलावे ॥ गुरु सोई जो सत्य बतावे । और गुरु कोइ काम न आवे ॥३॥ सत्त पुरुषका कहे संदेशा । जनम जनमका भिटै अंदेशा ॥ पाप पुत्रकी आसा नाही । बैठे अछय वृक्षकी छाँही ॥४॥ भ्रिगी मत होवे जिहि पास । सोई गुरु सत्त सुनौ धर्मदासा ॥ गुरुते अधिक और कोइ नाही । धर्मदास परखहु हिय माहीं ॥५॥
सा०-ऐसे गुरुके मिलनसे, आवा गमन नसाय ।
विन गुरु ज्ञाने दुन्द हो, काल फाँसमें जाय ॥
रमैनी ७-जीवन मुक्ति चाहु जो भाई । सतगुरु शब्द गहे सो आई ॥ जमसे यही छुडावन हारे । निश्चय मानो कहा हमारे ॥१॥ बहुरि न जोनी संकट आवे । जो जिव नाम शरण गति पावे ॥ तजि संसार लोक कई जाई । नाम पान गुरु होय सहाई ॥२॥ गुरुके बचन हिया सुध होई । दीपक ज्ञान परगटे तहँ सोई ॥ धर्मनि यह गुरु पद परतापा । गुरु पद गहे भरम तजि आपा ॥३॥ सिन्धु बुन्द समावे जाई । कहे कवीर मिटी दुचिताई ॥ सरन गहे सब दुख नसाई । विन गुरु शिष्य निरासे जाई ॥४॥ गुरु सम दानी और न भाई । आवत सरन सकलो निधि पाई ॥
(५२८)
कबीरपंथी-
सतगुरु कहैं गुरु व्रतधारी । अगुन सगुन बिच गुरु अधारी ॥५॥ सा०-यह भव अगम अथाह है, काल जाल वह धार ।
पार होनको द्वार इक, गुरु गिरा कडिहार ॥
रमैनी ८-गुरु विना नहि होय अचारा । गुरु विना नहि होय भवपारा ॥ शिष्य सीप गुरु स्वाती जानो । गुरु पारस शिष लोह समानो ॥१॥ गुरु मल्यागिर शिष्य भुजंगा । गुरु परसि शीतल होय अंगा ॥ गुरु समुद्र है शिष्य तरगा । गुरु दीपक है शिष्य पतंगा ॥२॥ शिष चकोर गुरुको शसि जानो । रवि गुरु कमल शिष्य विकसानो ॥ यहि स्नेह सिष निश्चय लहई । गुरु पद परसि दरस हिये गहई ॥३॥ गुरु गुरुमें भेद विचारा । गुरु गुरु कहे सकल संसारा ॥ गुरु सोईं जिन शब्द लखाया । आवा- गमन रहित पद पाया ॥४॥ गुरु सजीवन शब्द लखावे । जाके बल हंसा घर जावे ॥ वा गुरुसो कछु अन्तर नाही । गुरु अरु शिष्य मता इक आही ॥ ५ ॥
सा०-गुरु गुरुमें भेद है, गुरु गुरुमें भाव ।
गुरु सदा सो वन्दिये, सबद बतावे दाव ॥
रमैनी ९-सतगुरुकी बलिहारी जावे । अजर दशा जो आन बतावे ॥ अमि अजरावलि अजरा धामा । सत्य नाम सत्य पुरुष निजनामा ॥१॥ गुरु किरपा करि सो पद पावे । जीवन मुक्त अटल घर जावे ॥ निसिदिन सुरत गुरु सो लावे । साधु सन्तके मनहि समावे ॥२॥ जिनपर दया गुरुकी होई । तिनका फांस करम सब खोई ॥ करनी करके सुरत लगावे । सतगुरु लोक ताहि पहुँचावे ॥३॥ सेवा करि मन रखै न आसा । ताका सत- गुरु काटै फाँसा ॥ गुरु चरणन जो राखे ध्याना । अमर लोक सो करत पयाना ॥४॥ जोगी जोग साधना करई । विना गुरु
शब्दावली
(५२९)
सो भव नहीं तरई ॥ जो शिष्य गुरु आज्ञा धारी । गुरुकी कृपा होय भवपारी ॥ ५ ॥
सा०-गुरु मुख गुरु चितवत रहै, जैसे मनी भुवंग ।
कहै कवीर विसरे नहीं, यह गुरु मुखको अंग ॥
रमैनी १०-गुरु भगता जो जिव आही । साधु गुरु नहीं अन्तर ताही ॥ साँचा शिष्य ताहिको माने । साधु गुरु नहीं अन्तर आने ॥ १ ॥ जो स्वार्थ पागे संसारी । नहीं गुरु सिकख न साधु अचारी ॥ तिनको काल फन्द तुम जानो । दूत अंश काल कर मानो ॥ २ ॥ साधु गुरुको रूप बनायी । बहुते फन्द जीव पर लायी ॥ जिनते होय जीवकर हानी । यह तो अहै काल सहदानी ॥ ३ ॥ सोह गुरु जो प्रेम गति जाने । सत्य शब्दको राह पिछाने ॥ परम पुरुषकी भगति दिढावे । सुरति निरति कर तहैं पहुँचावे ॥ ४ ॥ तासो प्रीति करै मनलाई । छाड़ै डुरमति औ चतुराई ॥ तबहीं निह संशय घर पावे । भव तरिके जग बहुरि न आवे ॥ ५ ॥
सा०-करम भरम जंजाल तजि, गुरु पद कीजे नेह ।
गुरु मुख शब्द प्रतीति करि, निज तन जाने खेह ॥
रमैनी ११-गुरु चरननमें रह लपटाई । तजि भरम औ कपट चतुराई ॥ गुरु आज्ञा जो निरखत रहई । ताकर खूंट काल नहीं गहई ॥ १ ॥ गुरु परतीत दिढकै चित राषै । मोहि समान गुरु कहैं भाषै ॥ गुरु सेवामें सब फल आवै । गुरु विमुख नर पार न पावै ॥ २ ॥ जैसे चन्द्र कुमोदिनि रीती । गहे शिष्य अस गुरु परतीती ॥ गुरुमुख निरखत शिष्य हिय हरषे । शब्द अभी जिमि बादल वरषे ॥ ३ ॥ नृतक होयके खोजहि सन्ता । शब्द विचार गहे मगु अन्ता ॥ धर्मदास जिमि कीटहि भेवा । यहि विधि शिष्य गहै गुरुदेवा ॥ ४ ॥ मिलै कीट भुंगके पास । भ्रिगी गही गुरुगम
(५३०)
कबीरपंथी-
परगासा ॥ भिंगी शब्द कीट जो माने । आपा मेटि गुरु सुरत समाने ॥ ५ ॥
सा०-भिंगी मति गहि कीट जस, भिंगी ही होइ जाय ।
गुरु शब्द गहि शिष्य तस, गुरुही माहिं समाय ॥
रमैनी १२-जबहीं कीट सौप तन देवे । भिंगी गहि आपन करि लेवे ॥ शब्द घात करि महि तिहिं डारे । आपन मंत्र निज तहां विचारे ॥ १ ॥ भिंगी शब्द कीट जो गहई । आपा मेटि भिंगी होय रहई ॥ जाति वरण सब पलटे आई । भिंगी रूप तबै परगटाई ॥ २ ॥ कीट पलटि भिंगी जब होई । ताको कीट कहै नहिं कोई ॥ भिंगी शब्द कीट नहिं गहई । तो पुनि कीट असारे रहई ॥ ३ ॥ धरमदास यह कीटक भेवा । यहि मति शिष्य गहे गुरु देवा ॥ गुरुके वचन सांच कर माने । आपा ओट न बाद बखाने ॥ ४ ॥ तन मन धन अरपे सब ओई । आपा लेश रहै नहिं कोई ॥ मिटै भरम सब दुविधा नासे । गुरु अरु शिष्य एक घर भासे ॥ ५ ॥
छन्द-भिंगी मत दिठके गहे, करौं निज समय ओहिहो । दुतिया भाव न चित व्यापै, सो लहै जिव मोहिहो ॥ गुरु सबद निसचय सत्य माने, भिंग मत तब पावई । तजि सकल आसा सबद वासा, काग हंस कहावई ॥
सोरठा-तजै कागकी चाल, सत्य सबद गहि हंस हो ।
मुकता चुगे रसाल, पुरुष पच्छ गुरु गम गमन ॥
रमैनी १३-गुरु कृपा ते साधु कहावे । गुरुकृपा साधक है आवे ॥ गुरु कृपाते ज्ञान विचारा । गुरुकृपाते भक्ति अनुसारा ॥ १ ॥ गुरु कृपाते सुकर्म कमावे । गुरु कृपा सुकृत कई धावे ॥ गुरु कृपाते पुण्य बटोरे । गुरु न मिले तो पाप बहोरे ॥ २ ॥ गुरु
शब्दावली
(५३१)
मिले वैराग दिदावे । गुरु मिले तो भगति घर पावे ॥ गुरुकी कृपा सकल अंजोरा । गुरु कृपा जिव परे न भोरा ॥ ३ ॥ गुरु मिले तो शब्द लखावे । बिन गुरुके भव भटका खावे । का गिरही वैरागी भाई । गुरु कृपा सकलो तरिजाई ॥४॥ सार नाम सतगुरु सो पावे । नाम डोर गहि लोक सिधावे ॥ धरमराय ताको सिर नाई । जो हंसा सतगुरु पहुँ जाई ॥ ५ ॥
सा०-सतगुरु महिमा अनंत है, अनन्त करै उपकार ।
ई भवसिंधु अगाधते, तुरते उतारे पार ॥ रमैनी १४-सतगुरु चरननकी बलिहारी । करै सुखी सब कष्ट निवारी ॥ चच्छु हीन जिमि पावे नैना । होवै ज्ञान सुनत गुरु वैना ॥ १ ॥ सार शब्द सु विदेह सुरूपा । निअच्छर वहिरूप अनुपा ॥ कहन सुननको शब्द चौधारा । सार शब्द सो जीव उबारा ॥२॥ सो निज शब्द गुरुसो पावे । पाइ शब्द सतलोक सिधावे ॥ धर्मदास तुम हंस अंकुरी । मोहि मिले कीन्ह दुख दूरी ॥३॥ जस तुम कीन्ह मो सन नेहा । तजि धन धाम नारि सुत गेहा ॥ आगे शिष जो यहि विधि करिहैं । गुरु चरनन मन निश्चल धरिहैं ॥४॥ गुरुके चरन प्रीति तन धारे । तन मन धन सतगुरु पर वारे ॥ सो जिव मोहि अधिक प्रिय होई । तो कई रोक सकै नहिं कोई ॥ ५ ॥
सा०-सरवस वारे चरनमें, शरण रहै लपटाय ।
सो जिव पावे मोहिको, रहै काल सुरझाय ॥
रमैनी १५-सिष होय सरवस नहिं वारे । हिये कपट सुख प्रीति उचारे ॥ सो जिव कैसे लोक सिधाई । बिन गुरु मिले मोहि नहिं पाई ॥१॥ गुरुसे करै कपट चतुराई । सो हंसा भव भरमें आई ॥ जो जन गुरुकी निन्दा करई । सूकर स्वान गरभमें परई ॥ २ ॥
(५३२)
कवीरपंथी—
चौरासी भरमें सो जाई । नारद साख कहौ समझाई ॥ नारद ब्रह्मा सुत बड ज्ञानी । अहैं प्रसिद्ध जगत सब जानी ॥ ३ ॥ सो गुरुको छोट बखाना । ताके मन अभिमान समाना ॥ ताते हरि चौरासी दीना । सकलो पुण्य छीन सो लीन्हहा ॥ ४ ॥ छूटन राह कहा करि ओही । विनु गुरु शरण मुक्ति नहिं सोही ॥ ओही गुरु सो करे बचावा । दूसर मारग नाहिं दिखावा ॥ ५ ॥ सा०—वेद किताब शास्त्र अरु, पोथी कहत पुरान ।
गुरु विन भवसागर महा, छूटे नाहिं निदान ॥
रमैनी १६—गुरुकी शरणा लीजै भाई । जाते जीव नरक नहिं जाई ॥ गुरु मुख हो परम पद पावे । चौरासीमें बहुरि न आवे ॥ गुरु पद सेवे विरला कोई । जापर कृपा साहिबकी होई ॥ गुरु विन मुक्त न पावे भाई । नरक उर्द्ध मुख बासा पाई ॥ गुरुकी कृपा कटे यम फाँसी । विलंब न होय मिले अविनासी ॥ गुरु विनु काहु न पाया ज्ञाना । ज्यों थोथा भुस छडे किसाना ॥ गुरु महिमा शुक्रदेव जु पाई । चढि विमान वैकुंठे जाई ॥ गुरु विनु पढै जो वेद पुराना । ताको नाहिं मिले भगवाना ॥ गुरु सेवा जो करे सुभागा । माया मोह सकल भ्रम भागा ॥ गुरुकी नाव चढे जो प्राणी । खेह उतारे सतगुरु ज्ञानी ॥ तीरथ वरत अरु सब पूजा । गुरु विन दाता और न दूजा ॥ नौ नाथ चौरासी सिद्धा । गुरुके चरण सेवे गोविंदा ॥ गुरु विन प्रेत जनम सब पावे । वरष सहस्र गरभ सो रहावे ॥ गुरु विनु दान पुण्य जो करई । मिथ्या होय कबहुँ नहिं फरई ॥ गुरु विनु भरम न छूटे भाई । कोटि उपाय करे चतुराई ॥ गुरु विन होम यज्ञ जो साधे । औरो मन दश पातक लाधे ॥ सतगुरु मिले तौ अगम बतावे । जमकी आँच ताहि नहिं आवे ॥ गुरुके मिले कटे दुख पापा । जनम
शब्दावली
(५३३)
जनमको मिटे संतापा ॥ गुरुके चरण सदा चित दीजे । जीवन जन्म सुफल कर लीजे ॥ गुरुके चरण सदा चित जानो । क्यों भूले तुम चतुर स्यानो ॥ गुरु भगता मम आतम सोई । वाके हिरदे रहो समोई ॥ गुरु सुख ज्ञान ले चेतो भाई । मानुष जन्म बहुरि नहि पाई ॥ सुख संपति आपन नहि प्राणी । समझि देखु तुम निश्चय जानी ॥ चौविस गुरु हरि आपहि करिया । गुरु सेवा हरि आपहि धरिया ॥ गुरुकी निंदा सुने जो काना । ताको निश्चय नरक निदाना ॥ दशवाँ अंश गुरुको दीजे । जीवन जनम सुफल कर लीजे ॥ गुरु सुख प्राणी कोइ न दीजे । ह्रिदय नाम सदा रस पीजे ॥ गुरु सीढी चढ़ि ऊपर जाई । सुखसागरमें रहे समाई ॥ अपने सुख निंदा जो करई । शूकर स्वान जनम सो धरई ॥ निगुरा करे मुक्ति कर आसा । कैसे पावे मुक्ति निवासा ॥ औरो सुकित देइ जो पावे । सतगुरु बिन मुक्ती नहि आवे ॥ गौरी शंकर और गनेशा । सबही लीन्हा गुरु उपदेशा ॥ शिव विरंचि गुरु सेवा कीन्हा । नारद दीक्षा ध्रुवको दीन्हा ॥ सतगुरु मिले परम सुखदायी । जनम जनमका दुख नसायी ॥ जब गुरु किया अटल अविनासी । सुर नर मुनि सब सेवक रासी ॥ भवजल नदिया अगम अपारा । गुरु विनु कैसे उतरे पारा ॥ गुरु विनु आतम कैसे जाने । सुखसागर कैसे पहिचाने ॥ भक्ति पदार्थ कैसे पावे । गुरु विनु कौन जो राह बतावे ॥ गुरु सुख नाम देव रेदासा । गुरु महिमा उनहूँ परकासा ॥ तैतिस कोट देव त्रिपुरारी । गुरु विनु भूले सकल अचारी ॥ गुरु विनु भरमें लख चौरासी । जनम अनेक नरकके वासी ॥ गुरु विनु पसू जनम सो पावे ॥ फिर २ गरभ बासमें आवै ॥ गुरु विमुख सोई दुख पावे । जनम जनम सोई डहकावे ॥ गुरु सेवै जो चतुर स्याना । गुरु पटतर कोइ और