कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)
ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ २०३ वह गंगा के जल की राशि से संसिक्त शिखा और मूल सम्पूर्ण मध्य भाग से समन्वित थी, जो निरन्तर अनेक मुनियों और तपस्वियों के द्वारा उपासना की गई थी । वह स्थान सभी प्रकार से परम शुभ था और नाना मृगों के समुदाय से संयुक्त था जिसके जल में विकसित कमल थे, वह परमाधिक रमणीक था । उस स्थान में प्रवेश करके लोकों के भावन करने वाले मुनि ने तपश्चर्या करने के लिए यत्न किया था । वे वहाँ पर नियत आहार वाले परम समाधि से संयुत हो गये थे । वहाँ पर उन्होंने भगवान हरि की समाराधना की थी जो जगत् के कारण के भी कारण हैं तथा समस्त जगतों के नाथ हैं और नीले मेघ तथा अञ्जन की प्रभा के समान से युक्त थे । मनु ने जिस भगवान के स्वरूप का ध्यान किया था उसी का वर्णन किया जाता है । वे शंख, चक्र, गदा और पद्म के धारण करने वाले हैं, कमल के सदृश लोचनों से युक्त हैं, पीत वर्ण के वस्त्र के धारण करने वाले हैं जो देव गरुड़ के ऊपर विराजमान हैं । जो जगत् से परिपूर्ण हैं, लोकों के नाथ हैं तथा व्यक्त और अव्यक्त स्वरूप वाले हैं, जो इस जगत् के बीज हैं और सहस्र नेत्रों वाले तथा सहस्र शिरों से समन्वित प्रभु हैं, जो सबमें व्यापी, सबके आधार, अज, विभु और नारायण हैं । मनु ने सर्व वेदों से परिपूर्ण इस परम मन्त्र का जाप किया । उस मन्त्र का अर्थ यह है-हिरण्यगर्भ पुरुष, प्रधान अव्यक्त रूप वाले, शुद्ध ज्ञान के स्वरूप वाले भगवान वासुदेव के लिए नमस्कार है । इस प्रकार के मन्त्र का जाप करने वाले स्वायम्भुव मनु के ऊपर जगत् के स्वामी भगवान केशव शीघ्र ही प्रसन्न हो गए थे । अब जिस रूप से भगवान ने मनु को दर्शन दिया था उसका वर्णन किया जाता है, फिर एक क्षुद्रझष (मत्स्य) होकर वे सामने प्राप्त हुए थे जो दुर्बादल के समान प्रभा से युक्त थे, जो कर्पूर कलिका के जोड़े के तुल्य नेत्रों से युगल से युक्त परम उज्ज्वल थे । उस समय में एक बहुत छोटे मत्स्य के स्वरूप से युक्त भगवान जनार्दन तपस्या करते हुए स्वायम्भुव मुनि मनु के सामने आये थे जो मनु महान आत्मा वाले थे ।
२०४ ੴ श्रीकालिका पुराण ੴ वे प्रभु उस समय में महान् आत्मा वाले, कारुण्य से युक्त, सुमन्त्रस्त अर्थात् भययुक्त गद्गदता से समन्वित उन स्वायम्भुव मनु से बोले-हे तपोनिधि! हे महाभाग! आप डरे हुए मेरी रक्षा करने के योग्य होते हैं। विशाल मत्स्यों से मैं परमभीत (डरा हुआ) हूँ जो मुझे कहीं खा न जावें इसीलिए मैं नित्य ही उद्वेग वाला रहता है। हे महाभाग! प्रतिदिन की बड़े-बड़े मत्स्य मुझे खाने के लिए मेरे पीछे दौड़ लगाया करते हैं। सभी ओर से बड़ी संख्या में बड़े मत्स्य मुझे खाने के लिए आया करते हैं। हे नाथ! आप मेरी रक्षा करने के लिए समर्थ हैं। आज बड़े-बड़े रोमों वालो से, बड़े और बहुतों के द्वारा मैं विदारित किया गया हूँ। सबसे छोटा थक गया हूँ और भागने में परम असमर्थ हूँ। मैं अपने प्राणों के रक्षित करने की इच्छा वाला हूँ। आप महान आत्मा वाले हैं ऐसे मुनि मैं आपकी शरणागति मैं प्राप्त हुआ हूँ। यह आपका परम अनुग्रह हैं। आप मेरी रक्षा कीजिए। भय से उद्भ्रान्त मन वाला मैं चंचल तरंगों वाली परम चंचल इस वृक्षों की छाया का अवलोकन करके मत्स्य की ही भाँति डर रहा हूँ। मार्कण्डेय मुन ने कहा-इसके अनन्तर इस अनेक वचन का श्रवण करके स्वायम्भुव मनु परमाधिक कृपा से समन्वित होकर उनसे बोले थे कि मैं आपकी रक्षा करने वाला हूँ। फिर हाथ में जल लेकर उस मत्स्य को उसमें निधापति करके समक्ष में उस परमक्षुद्र मत्स्य के विहार का अवलोकन करने लगे थे। इसके अनन्तर परम दयालु मनु ने सुन्दर स्वरूप वाले उस मत्स्य को जल से पूर्ण विपुल योग वाले अलिञ्जर में रखा दिया था। वह मत्स्य उन मणिक में दिन-दिन में बढ़ता हुआ सामान्य रोहित के शरीर वाला शीघ्र ही हो गया। वह महात्मा प्रतिदिन दश घट जल से पूरिपूर्ण उस मणिक को बढ़ाते रहे थे और मत्स्य को वर्धित कर दिया था। अर्थात् वह मत्स्य बड़ा होता चला गया था और बड़े-बड़े नेत्रों वाला एक बालक मत्स्य थोड़े ही समय में उस मणिक के जल के मध्य में लोमों से युक्त पीन देह वाला हो गया था। मार्कण्डेय मुनि ने कहा-स्वायम्भुव मनु ने उस प्रकार से स्थूल
ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ २०५ शरीर वाले उस मत्स्य का अवलोकन स्वयं करके उसको अपने हाथ से ग्रहण करके वे विकसित कमलों से संयुक्त सरोवर को चले गये थे। वह सरोवर वहाँ पर परम पुण्य नर नारायण के आश्रम में बहुत विस्तृत था। वह एक योजन के विस्तार वाला तथा डेढ़ योजन आयताकार था। उसमें उनके भीत गण थे। उस सरोवर में उस मत्स्य को डाल करके उस समय में मनु ने वहाँ पर निर्धारित कर दिया था। उस मत्स्य का उन्होंने अपने पुत्र की ही भाँति परम अनुग्रह से युक्त होकर पालन किया था। वह मत्स्य बहुत ही थोड़े समय में परमाधिक स्थूल और विस्तृत हो गया था। हे श्रेष्ठ द्विजोँ! वह मत्स्य उस सरोवर में भी समाया नहीं था। क्योंकि बहुत ही बड़ा हो गया था। वह मत्स्य एक बार पूर्व और उत्तर दोनों किनारों पर अपना शिर और पूँछ रखकर ऊँचे शरीर वाला हो गया था फिर वह स्वायम्भुव महात्मा से चिल्लाकर बोला-मेरी रक्षा करो। मनु ने उसको स्थूल पूँछ वाला समझकर वह उस समय में उस महामत्स्य के समीप पहुँचे और अपने हाथ के द्वारा उसको उन्होंने ग्रहण किया था। मैं विपुल रोमों वाले अतीव अद्भुत आपका उद्धार करने के लिए समर्थ नहीं होता हूँ, ऐसा भली चिन्तन करते हुए भी उन्होंने हाथ से उसको धारण कर लिया था। विश्व के आत्मा भगवान् जनार्दन भी जिन्होंने मत्स्य का स्वरूप धारण कर रखा था स्वायम्भुव मनु के कर को प्राप्त करके फिर छोटे स्वरूप का उपाश्रय ग्रहण कर लिया। फिर मनु ने करों से उसको उठाकर अपने कन्धे पर धारण किया था और शीघ्र ही उसे सागर में ले गये थे और वहाँ जल में उसको रख दिया था। उन्होंने उस मत्स्य को कहा था-वहाँ आप अपनी इच्छा के अनुसार बढ़िये यहाँ पर कोई भी आपका वध नहीं करेगा और आप शीघ्र ही सम्पूर्ण देह की प्राप्त करिए। यह कहकर समस्त प्राणधारियों में परमश्रेष्ठ वह महान भाग वाले ने उसकी लघुता (छोटेपन) का चिन्तन करते हुए ही परमाधिक विस्मय को प्राप्त हो गये थे। वह मत्स्य भी तुरन्त ही उस समय में महान् पूर्ण शरीरवाले हो गये थे और अपने
देहादिक के द्वारा सभी ओर से उस महासागर को उन्होंने भर दिया था । तात्पर्य यह है कि उन्होंने इतना अधिक अपने शरीर को बढ़ा लिया था कि वह पूरा सागर उससे भी गया था । उस महासागर के जल को भी अतिक्रमण करके अत्यन्त उन्नतपूर्ण शरीर वाले का अवलोकन करके जो कि शिलाओं से घिरे हुए, लम्बा चौड़ा मानसाचल के तुल्य था । सम्पूर्ण सागर को रोकने वाले और अपने देह के विस्तार से अचल करके श्रीमान् स्वायम्भुव मनु ने उस समय उनको मत्स्य नहीं माना था । उस अवसर पर स्वायम्भुव मनु ने उस मत्स्य से फिर शान्तिपूर्वक पूछा था जबकि उनकी अद्भुत मूर्ति का दर्शन किया था और उनके छोटेपन को देखा था। मनु ने कहा-हे परमश्रेष्ठ! मैं केवल आपको मत्स्य ही नहीं मानता हूँ। आप कौन हो, यह मुझे स्पष्ट बतलाने की कृपा करिए ? हे सुमहत्तप! मैं आपके महत्व को और छोटेपन कर चिन्तन करते हुए ही आपको सामान्य मत्स्य ही नहीं मानता हूँ। आप ब्रह्मा हैं अथवा विष्णु हैं या आप शम्भु हैं जिन्होंने यह मत्स्य का स्वरूप धारण किया है। यदि इसमें कुछ गोपनीयता न हो तो, हे महाभाग! हे महामते! मुझे यह स्पष्ट बतलाने की कृपा करिए । मत्स्य भगवान ने कहा-आपके द्वारा मेरी नित्य ही आराधना करनी चाहिए जो सनातन हरि भगवान हैं वही मैं हूँ। इस समय आपकी कामना की सिद्धि के ही लिए में समादित होकर प्रकट हुआ हूँ। हे भूतों के स्वामिन्! आप जो भी मुझ मीन की मूर्ति वाले से जो भी कुछ चाहते हैं वही आज करूँगा। मेरी इस मूर्ति को मन ही समझिए। मार्कण्डेय महर्षि ने कहा-अपरिमित तेज के धारण करने वाले भगवान विष्णु के इस वचन का श्रवण करके और प्रत्यक्ष रूप के केवल भगवान् विष्णु का ज्ञान प्राप्त करके मनु प्रसन्न हुए थे । स्वायम्भुव मनु ने कहा-हे हरे! इस जगत के पर और अपर के आप स्वामी हैं। आप अविनाशी हैं तथा अग्नि, सूर्य और चन्द्र इनको ही तीन नेत्रों को धारण करने वाले हैं। आपकी सेवा में मेरा प्रतिपात निवेदित है। हे सर्वज्ञ! आप जगत के कारण हैं, जगत के धाम हैं, हे
ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ २०७ हरे! आप पर हैं। आप पर और अपर स्वरूप वाले तथा जो पार जाने वाले हैं उनको पार पहुँचाने के कारणरूप हैं। अपनी आत्मा से ही आत्मा को धारण करके हे हरे! आप धरा का रूप धारण करनेवाले हैं। हे त्रिविक्रमू! आप आधार स्वरूप वाले हैं और आप समस्त लोकों का भरण किया करते हैं। हे सुरेश्वर! आप समस्त वेदों से परिपूर्ण एवं श्रेष्ठ हैं। धाम के कारण के भी आप कारण हैं। आप देवों के समुदाय के परम ईशान हैं और नारायण हैं। आपका कोई भी जन्मदाता नहीं है और आप इस जगत की योनि अर्थात् उत्पादक हैं। आप पादरहित हैं तो सदा गति वाले हैं। आप तेज और स्पर्श से रहित हैं। हे ईश्वर! आप सभी के स्वामी हैं। आपका कोई भी आदिकाल नहीं है और आप ही सबके आदि हैं। आप नित्य अनन्तर हैं जो हेम का अण्ड है और इन सब जगतों का बीज हैं और ब्रह्माण्ड की संज्ञा से युक्त है। उस ब्राह्मण्ड के बीज आपका ही तेज होता है। आप ही सबके आधार रूप हैं और आप स्वयं बिना आधार वाले हैं। आप स्वयं तो बिना हेतु वाले हैं किन्तु सबके कारण स्वरूप हैं। हे विश्व के स्वामिन्! हे प्रभो! आप ही समस्त लोकों के प्रभाव अर्थात् जन्म स्थान हैं अथवा जन्म देने वाले हैं। आप सृष्टि, स्थिति और संहार के हेतु हैं। आप विधाता, विष्णु और आत्मा के धारण करने वाले हैं। आपकी सेवा में बारम्बार नमस्कार है। आपकी मूर्ति दस प्रकार की है और वह मूर्ति ऊर्मि षट्क आदि से रहित है। आप ज्योति के स्वामी हैं आप ही अम्भोधि अर्थात् सागर हैं उन आपके किए बारम्बार प्रणाम समर्पित हैं। हे परेश! कौन हैं जो आपके भाव का वर्णन करने में समर्थ हो अर्थात् ऐसा कोई भी नहीं है। जो आप स्थूल से भी स्थूल हैं, अर्थ वर्ग से भी अणु रूप वाले हैं। जो नभ से परे आदित्य के वर्ण वाले थे आज उनके ही मिले मेरा नमस्कार है। जो पुरुष सहस्त्र शीर्षों वाले हैं तथा सहस्त्र चरणों वाले हैं, सहस्त्र चक्षुओं से युक्त हैं और इस पृथ्वी के सभी ओर हैं, जो दश अंगुल के समान परिमाण वाले स्थित थे वही उग्र भगवान् विष्णु यहाँ मेरे ऊपर प्रसन्न
होवें। हे भगवन्! आप तीन की मूर्ति धारण करने वाले हैं। हे हरे! आपको नमस्कार है। हे जगत् के आनन्द स्वरूप वाले आपको नमस्कार है। हे भक्तों के ऊपर प्रेम करने वाले! आपकी सेवा में मेरा प्रणाम है। मार्कण्डेय महर्षि ने कहा-स्वायम्भुव मनु के द्वारा वे भगवान् मत्स्य के स्वरूप धारण करने वाले प्रभु की इस रीति से भली-भाँति स्तुति की गई थी। उस अवसर पर भगवान वासुदेव मेघों के सदृश परम गम्भीर ध्वनि से संयुत होकर बोले थे। श्री भगवान ने कहा-आज मैं आपकी इस तपश्चर्या से परम प्रसन्न हूँ और आपके द्वारा बड़ी ही भक्ति की भावना से बारम्बार मेरी स्तुति भी की गयी है। मुझे आपकी पूजा से और दान से भी परम सन्तोष हुआ है। हे सुव्रत! अब आप वरदान माँग लो। आपका जो भी अभीष्ट अर्थ होगा आपको मैं दूँगा। इसमें कुछ भी विचार करने की आवश्यकता नहीं है। स्वायम्भुव मनु ने कहा-हे विष्णो! आज यदि मुझे कोई वरदान देना है जो कि तीनों लोकों की भलाई करने वाला ही हो तो आप मुझे वरदान देवें। उसको मैं बतलाऊँगा उसमें आप मुझसे श्रवण कीजिए। पूर्व में कपिल मुनि ने मेरे लिए शाप दिया था कि सम्पूर्ण जगत अर्थात् तीनों भुवन हत-प्रहत और विध्वंस हो जायेंगे। जिसने इस पृथ्वी को उद्धृत किया है और जिसके द्वारा यह पृथ्वी प्रतिपालित की गई है और जो इसका संहार करेंगे उन्हीं के द्वारा इसका इस समय में प्लावन होवे। इसके उपरान्त मैं दीन हृदय वाला आपकी ही शरणागति में प्राप्त हुआ हूँ। जिस रीति से यह त्रिभुवन जल से प्लुत (डुबा हुआ) न होवे एवं हत-प्रहत और विध्वंस्त न होवे आप वही वरदान मुझे प्रदान कीजिए। श्री भगवान् ने कहा-हे मनुदेव! मुझसे कपिल कोई भिन्न नहीं है और उसी भाँति मेरे द्वारा ही कहा हुआ समझिए। इस कारण से उन्होंने जो भी कुछ कहा है वह सर्वथा सत्य है। मैं आपकी सहायता करूँगा। हे स्वायम्भुव! इसको आप समझ लीजिए। इस तीनों भुवनों के हत, प्रहत और विध्वंस होने पर एवं जल में निमग्न हो जाने पर मैं श्यामल शृंग समन्वित होऊँगा और आप उस
ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ २०९ समय में मुझको जान लेंगे अर्थात् आपको मेरा ज्ञान प्राप्त हो जायेगा। हे मनुदेव ! जब तक यह जल का प्लवन रहे तभी तक जो भी कुछ आपको करना चाहिए वह अब आप परम सावधान होकर श्रवण कीजिए जो कि परम पथ्य अर्थात् हितकर है वहीं मैं कह रहा हूँ। सब यज्ञ सम्बन्धी कोष्ठों के समूह के द्वारा एक नौका निर्माण कराइये। उस नौका को मैं ऐसी परम बना दूँगा जिससे कि जलों से वह भिदी हुई न होवे। नौका ऐसी होनी चाहिए कि वह दश योजनों के विस्तार से युक्त होवे और तीस योजन पर्यन्त आयत अर्थात् चौड़ी होवे, जो सम्पूर्ण बीजों के अर्थात् बीज के स्वरूप में रहने वालों के धारण करने वाली हो और तीनों भुवनों के वर्धन करने वाली होवे। समस्त यज्ञों से सम्बन्ध रखने वाले वृक्षों के तन्तुओं से निर्मित की जावे। जो नौ योजन तक दीर्घ होने तथा व्यास त्रय तक विस्तृत होवे अर्थात् तीन व्योमों के विस्तार से युक्त होवे। हे मनुदेव! आप शीघ्र ही वृहती वरीरिका बटी करिए जो जगत की धात्री जगत की माया, लोकों की माता और जगतों से परिपूर्ण वह उस रज्जु (रस्सी) को सुदृढ़ कर देंगी जो किसी प्रकार से भी त्रुटित न होवे। इस वर्तमान जल के प्लवन होने के समय उस नौका में सब बीजों को अर्थात् बीज स्वरूपों को रखकर तथा समस्त वेदों को और सात ऋषियों को बिठाकर आप भी उसमें निष्णण हो जाइए। हे मनुदेव! आप दक्ष के साथ मिलाकर मेरा स्मरण करेंगे उसी समय में स्मरण किया हुआ मैं आपके समीप में आ जाऊँगा। मैं श्यामल शृंग से समन्वित होऊँगा। उसी समय में आपको मेरा ज्ञान प्राप्त हो जायेगा। जिस समय पर्यन्त यह तीनों भुवन हत, प्रहत, विध्वंस रहेंगे तभी तक मैं अपने पृष्ठ भाग के द्वारा उस नौका के वहन करने वाला रहूँगा। इसमें लेशमात्र भी संशय का अवसर नहीं है। मेरे शृंग के जल में प्लवित हो जाने पर उस नौका को उस समय में आप वरीरिका से दृढ़ता के साथ सन्धन करेंगे। मेरे शृंग में नौका के निबद्ध हो जाने पर देवों के परिमाण से एक सहस्र वर्षों तक जल का शोषण
२१० ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ करते हुए उस नौका को प्रेरित करूँगा। हे मनुदेव! फिर जलों के शुष्क हो जाने पर हिमालय पर्वत के बहुत ऊँचे शिखर पर उसमें नाव को बाँधकर जिस जाप के योग्य मन्त्र के द्वारा आपने मेरी आराधना की है उस मन्त्र के द्वारा जो मुझे सन्तुष्ट करता है उसको सभी प्रकार की सिद्धियाँ होती हैं। मार्कण्डेय महर्षि ने कहा-इस प्रकार के वरदान देकर वह मत्स्य उनके द्वारा नमस्कृत हुए थे अर्थात् उसने मत्स्य को प्रणाम किया था। फिर वह जगत् के स्वामी लोकों पर अनुग्रह करने वाले अन्तर्धान हो गये थे। स्वायम्भुव मनु भी भगवान हरि के अन्तर्धान हो जाने पर भगवान हरि ने जैसा कहा वैसी ही नौका और रज्जु का निर्माण कराया था। उस समय में स्वायम्भुव मनु ने समस्त यज्ञों से सम्बन्धित वृक्षों को छेदन कराकर उनको उद्धृत करके वस्यादि के द्वारा नौका का निर्माण कराया था। उन वृक्षों के वल्कल (छाल) से समुद्भूत सूत्रों के समूहों से पूर्व में कथित परिमाण से मनु ने वरीरिका की रचना कराई थी। उसके अनन्तर बहुत अधिक काल तक भगवान यज्ञ वाराह विष्णु का, शम्भ का और हर का महान अद्भुत युद्ध हुआ था। इसके उपरान्त जल से प्लावन होने पर तथा तीनों के विध्वंस हो जाने पर उसी समय में रज्जु से नौका को बाँध करके बीजों का आदान करके मनु ने वेदों को और ऋषियों को लाकर उस नौका में रखकर चराचर सबके जल में मग्न हो जाने पर उसी सवार पर मनुदेव ने नाव में स्थित होते हुए मत्स्य मूर्ति भगवान् हरि का स्मरण किया था। इसके अनन्तर शिखर से संयुक्त पर्वत के ही सदृश जलों के ऊपर भगवान् मत्स्य समागत हो गये थे। मत्स्य का स्वरूप धारण करने वाले भगवान् विष्णु एक शृंग से समन्वित वहीं पर समागत हो गये थे और तनिक भी विलम्ब नहीं किया था जहाँ पर नाव से मनुदेव संस्थित हो रहे थे। उस महान भयंकर और बहुत ही विस्तृत जल के समुदाय में नौका पर समारूढ़ होकर जब तक जल चलाचल था तभी तक उस जल के पृष्ठ भाग पर नौका को
൵ श्रीकालिका पुराण ൵ २११ निधापित कर दिया था। जल के प्रकृति में समापन्न होने पर वरीरिका को शृंग में बाँधकर एक सहस्त्र देवों ने वर्षों तक उस नौका को सम्प्रेरित किया था। परमेश्वर प्रभु ने अपनी नाव को अवष्टन्ध करके धारण किया था। जगत् की धात्री योगनिद्रा उस बटीरिका में समासीन हो गयी थी। फिर धीरे-धीरे चिरकाल में जल के शोषण हो जाने पर उस जल के मध्य में पश्चिम हिमालय पर्वत का शिखर सुमग्न हो गया था। हिमालय प्रभु के जो दो सहस्त्र योजन ऊंचा था उसके पचास सहस्त्र उच्छिष्ट (ऊँचा) शृंग था। फिर उस शृंग में उस नाव को बाँधकर मत्स्य के स्वरूप को धारण करने वाले हरि जो जगतों के स्वामी थे उन जलों शोषण करने के लिए तुरन्त गये थे। इसी रीति से भगवान् शार्गधारी विष्णु ने मत्स्य के स्वरूप के द्वारा वेदों की रक्षा की थी। मार्कण्डेय महर्षि ने कहा-कपिल मुनि के शाप से यह आकालिक लय किया गया था। क्योंकि यह अकालिक लय भगवान् के द्वारा ही किया गया था। हे द्विज सप्तमों! यह जैसा हुआ था वैसा ही हमने आपको वर्णन करके बतला दिया है।
श्रीकूर्म अवतार कथा
मार्कण्डेय महर्षि ने कहा-इस अकाल प्रलय के होने के पश्चात् पुनः जिस प्रकार से सृष्टि की रचना हुई थी। हे द्विजसत्तमो! जिसने इस पृथ्वी का उद्धार किया था उसका अब आप लोग श्रवण कीजिए। उस प्रलय के व्यतीत हो जाने पर उस महान बलवान कूर्म के स्वरूप वाले विष्णु भगवान् ने पर्वतों के सहित पृथ्वी को उद्धृत करके अपने पृष्ठ भाग पर धारण कर लिया था और परमेश्वर ने पूर्व की ही भाँति सम्पूर्ण पृथ्वी को समान कर लिया था। शरभ और वाराह का और उनके पुत्रों से पदक्रम से जो भी भूमि विशीर्ण हो गई थी कर्मठ देव ने उसको भी सम कर दिया था। परमेश्वर ने पूर्व की भाँति पृथ्वी को सम करके फिर पृथ्वी के तल में संस्थित अनन्त भगवान् को धारण किया था। इसके अनन्तर ब्रह्मा, विष्णु और हर परमेश्वर ने वहाँ पर
समागत होकर नौका के बीच में विराजमान सात मुनियों को स्वायम्भुव मनु की और दोनों पर नारायणों को और दक्ष को कहने लगे थे-समस्त मुनिगण, पर नारायण, दक्ष और स्वायम्भुव मनु आप सब लोग श्रवण करिए कि जो भी कुछ इस समय में हम बतलाते हैं। वाराह और शरभ के युद्ध से परिपूर्ण सृष्टि विनष्ट हो गई है। अतएव हमको जिस रीति से सृष्टि की रचना करनी चाहिए उसे आप लोग श्रवण करिए। ये दोनों नर और नारायण सृष्टि की रचना करने के ही लिए समुपस्थित हो गये हैं। देवों की संस्थापना करने के लिए परम तप का तपना करें। जनलोक में रहने वाले देवों को ये दोनों आप्यापित करके अपरों को यहाँ समानीत करें और निरन्तर बहुत से गणों का भली-भाँति सृजन करें। हे मुने! नक्षत्रों की, ग्रहों की और उनके स्थानों का सृजन करें। इन दोनों की तपश्चर्या से पूर्व की ही भाँति स्थिरता को प्राप्त होवें। यह महाभाग जनार्दन प्रभु सूर्य के रथ का संस्थान तथा चन्द्रमा के रथ की संस्थत को स्वयं ही करें। हे स्वायम्भुवन मनु! आप पृथ्वी में सब चीजों का चयन करें और पृथ्वी सभी ओर सैशस्यों से परिपूर्ण हो जावे। समस्त औषधियाँ वृक्ष-लता और बल्लियों का सभी ओर आप पुरोहण करें। प्रजापति दक्ष सप्त मुनीन्द्रों के साथ यज्ञ के द्वारा भगवान हरि का अभ्यर्चन करें और वाराह के पुत्रों से समुत्थित इन तीनों अग्नियों का भी यजन करें। आह्वनीय आदि तीन अग्नियाँ होती हैं। यह यज्ञ सृष्टि की रचना के ही लिए वाराह भगवान् के देह से समुद्भूत हुआ था। इसी यज्ञ के द्वारा दक्ष इस सृष्टि की रचना का विस्तार करें। नर और नारायण से तथा सात मुनियों से, दक्ष और आप से भी, यज्ञ से तथा दोनों अग्नियों से इस सृष्टि को स्वर्ग, पाताल और भूमि में सम्पूर्णता को प्राप्त होवे और सृष्टि को आप्यापित करके जिस प्रकार से भी यह सुसम्पन्न हो जावे, यत्न उसी भाँति का करेंगे। आप नित्य ही सृजन का कार्य करिये। इस अनन्तर यह सृष्टि जैसे पहले थी ठीक वैसी ही सुसम्पन्न हो जावे। हे मनु देव! सबसे प्रथम आप इस समय में बीजों का प्ररोहण करें। मार्कण्डेय महर्षि ने कहा-इस रीति
ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ २१३ ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ से महाभाग विधाता विष्णु और वृषभध्वज समस्त पर्वतों को यथास्थान पर स्थापित करने के लिए यह आदेश देकर फिर चले गये थे। उन्होंने मेरु, मन्दर, कैलाश और हिमवान् आदि पर्वतों में समस्त देवों के पुरों को पृथक्-पृथक् कर दिया था। इसके अनन्तर उस नौका या परित्याग करके और वसुन्धरा को अवधूत करके स्वायम्भुव मनु ने सम्पूर्ण सम्पदा के लाभ के लिए भूमि में बीजों का वपन किया था। इसके अनन्तर वृक्ष, लता, बल्ली, गुल्म और वन, शस्य धान्य उसी भाँति औषधियों, बीजकाण्ड, प्ररोह, घ्रतान और जलज अर्थात् कमल, प्रफुल्ल, अशोक और फल, कन्द तथा बल एवं सबके प्राणों की वृद्धि के लिए शाद्वल ही हुए थे। सम्पूर्ण पृथ्वी शस्यों से सम्पन्न थी। वे वृक्ष और शुभ शाद्वल जिस प्रकार के पहले देखे थे जो कि चित्त में हर्ष करने वाले मनु ने अवलोकन पहले किया था। इसके उपरान्त महायोगी नर से महत्तम तप का तपन किया था और महामति वाले नारायण ने देवों के भावन के लिए तपश्चर्या की थी। नारायण और नर ये दोनों ही परम ऋषियों के समान थे। इन्होंने अनामय अर्थात् आमय से रहित तेज से परिपूर्ण परमेश की तप के द्वारा आराधना की थी। वे जनगणों को, वेदों को और देवर्षियों व श्रेष्ठों को लाये थे जो पूर्व में मृत हुए अमर थे। उनके गणों को पृथक-पृथक उन दोनों मुनियों ने महान तप के बल से सृजन किया था। सूर्य और चन्द्र दोनों देवों को तथा दश दिक्पालों को और पाताल तल में निवास करने वालों को भगवान जनार्दन ने स्वयं ही उत्पन्न किया था। भगवान अच्युत ने सूर्य और चन्द्रमा को यथास्थान किया था अर्थात् रचना की थी। पूर्व की ही भाँति इनको योजित कर दिया था और उन दोनों को दिन और रात्रि में स्थित किया था। औषधियों से समुद्गत हो जाने पर और देवों में पृथक्-पृथक् होने पर दक्ष प्रजापति ने महान अध्वर (यज्ञ) करने के लिए प्रारम्भ कर दिया था। कश्यप, अत्रि, वशिष्ठ, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और भारद्वाज ये अमूल सात ऋषि थे। ब्रह्मा के पुत्र दक्ष प्रजापति ने इन पूर्वोक्त सप्त ऋषियों
२१४ श्रीकालिका पुराणे के द्वारा द्वादश वर्ष पर्यन्त महायज्ञ करने का समाचरण किया था। हे द्विजोत्तमो! वहाँ पर ही तीनों अग्नियों में बारम्बार हवन किये जाने पर और उस समय में द्विज के द्वारा यज्ञ स्वरूप वाले वाराह के अभ्यर्चन किए जाने पर उस यज्ञ से ही चार प्रकार की प्रजा पुत्रियाँ समुत्पन्न हुईं थीं जो रूप लावण्य से सुसम्पन्न थीं और सृष्टि के रचना करने के लिए अमित प्रजावली थीं। दक्ष ने उन तेरह पुत्रियों को महान् आत्मा वाले कश्यप मुनि के लिए प्रदान कर दिया था। उससे बहुत-सी सन्ततियाँ समुद्भूत हुई थीं जिनसे यह सम्पूर्ण जगत् व्याप्त हो गया था। उन समस्त प्रजाओं को कश्यप मुनि ही जन्म प्रदान करने वाले अर्थात् जनक हुए थे। हे द्विज शार्दूलो! यह निश्चित है कि कश्यप मुनि ने ही यह सम्पूर्ण जगत समुत्पन्न हुआ था। उनके नाम और उनसे समुत्पन्न होकर पृथक्-पृथक् सब प्रजाओं की आप समस्त मुनिगण सब अब श्रवण कीजिए जिनको मैं भली-भाँति कह रहा हूँ, मुझसे ही आप उनका ज्ञान प्राप्त करिए। अब उन तेरह कन्याओं के नामों को बतलाया जाता है-अदिति, दिति, काला, दतायु, सिंहिका, मुनि, क्रोध, प्रथा, वरिष्ठा, विनता, कपिला और कद्रू ये दक्ष प्रजापति की तेरह पुत्रियाँ कीर्त्तित की गयी थीं। ध्यान करने वाले विधाता के दक्षिण अंगुष्ठा से मुन से यह सम्पन्न हुआ था इसी कारण से देवों और मनुष्यों में यह दक्ष इस नाम से कहा जाता है। ब्रह्माजी के मानस अर्थात् मन से उत्पन्न हुए दश पुत्र पूर्व में वर्णित किए गये हैं। उनमें छः सृष्टि रचना करने वाले हुए थे। उनके नाम ये हैं-मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलय, क्रतु। मरीचि का पुत्र लोकमानव कश्यप उत्पन्न हुआ था। इसकी ही दक्ष की कन्याओं से बहुत-सी प्रजा उत्पन्न हुई थी। इसकी जाया से समुत्पन्न हुई प्रजाओं के अब आप नामों का ज्ञान प्राप्त कर लो। धाता, मित्र, अर्यमा, शक्र, वरुण, सोम, भर्ग, विवस्वान्, पूषा, सविता, त्वष्टा, विष्णु हुए। अदिति के ये द्वादश सुत हुए थे। जो आदित्य इस नाम से कीर्तित हुए थे इनमें जो कनियान् अर्थात् छोटा था
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[Main Text] वह गुणवान था जो सदा प्रजाओं को तप देता है। वह ही आपका मुख्य वंश के करने वाला कहा जाता है जो कि दिवाकर है। दिति का एक पुत्र था वह गुणवान था जो सदा प्रजाओं को तप देता है। वह ही आपका मुख्य वंश के करने वाला कहा जाता है जो कि दिवाकर है। दिति का एक पुत्र था जो महान बलवान हिरण्यकशिपु नाम वाला हुआ था। उस हिरण्यकशिपु के चार पुत्र थे जो परम हृष्ट और मद तथा बल से समन्वित थे। उनके नाम प्रह्लाद, सलुयाद, वाष्क और शिव थे। प्रह्लाद के तीन पुत्र हुए थे उनमें जो सबसे आदि में हुआ था उनका नाम विरोचन था। कुम्भ, निकुम्भ, बलवान ये तीनों ही प्रह्लादि कहे गये थे। विरोचन के एक सुत समुद्भूत हुआ था जो दान देने में परम श्रेष्ठ एवं विख्यात था उस महान् का नाम बलि था और जो बलि का पुत्र हुआ था वह महान बल वाला बाण नाम से कहा गया था। वह श्रीमान् शम्भु का अनुचर हुआ था और वह महाकाल नाम वाला था। उस बाण के एक सौ पुत्र हुए थे जो कुसुम्भ, मकर आदि नाम वाले थे। दनु के चालीस पुत्र हुए थे उनके नाम बतलाये जाते हैं—शम्बर, नमुचि, प्रलोमा, असिलोमा, केशी, दुर्जय, अप, शिर अश्वशीर्ष, क्षय, शंकु, वियन्मूर्धामहा, बल, वेगवान, केतुमान, स्वर्भानु, अश्व, पति, कुण्ड, वृष, पर्वाजक, अश्वग्रीवा, सूक्ष्म, तरुण्ड, माण्डल, उर्ध्वबाहु, एकचक्र, विरूपाक्ष, हर, आहर, नियन्त्र, निकुम्भ, सूर्य, चन्द्रमा, अन्य ये तीनों पुत्रों के पुत्र थे तथा सूर्य और चन्द्रमा, (दिवाकर, निशानाथ) दोनों देवपुंगव थे। उनके पुत्र और पौत्र तथा उनके पुत्र बहुत से थे। इस सबसे यह जगत् व्याप्त हो रहा है जो कि ये सब बल और वीर्य से समन्वित थे। दनायु के विशेष बलवान चार पुत्र हुए थे। उनके नाम ये हैं—वीरभद्र, विक्षर, वत्स और वृत्त। हे द्विजोत्तमों! इन चारों के बहुत से पुत्र समुद्भूत हुए थे जो सब ही रूप एवं बल से समन्वित थे और इन एक-एक के सौ-सौ पुत्र समुत्पन्न हुए थे। वे चारों दानवों के स्वामी महान् वीर्य, पराक्रम वाले और परम विख्यात हुए। विनाश, क्रोध तथा
२१६ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ क्रोधहन्ता और क्रोधशक्र ये काला के पुत्र बताये गए हैं। सिंहिका का पुत्र राहु उत्पन्न हुआ था जो चन्द्र और सूर्य का मर्दन करने वाला है। सुचन्द्र, चन्द्रहन्ता, चन्द्रविमर्दन, वेगवान्, केतुमान, अयः, सुर्भानु, अश्जोद्यपति, क्रष्टु, अष्टपर्वा, जरु ये सब पुत्र हुए थे। क्रोधा के जो पुत्र हुए थे वे क्रूर कर्मों के करनेवाले थे। सिंहिका और क्रोधा ये दो पुत्रियाँ हुई थीं जो सदा ही क्रूरिकायें थीं। उन दोनों से जो वंश समुद्भूत हुआ था इसलिए वह क्रूरतर कहा गया है। एक ही मुनि का पुत्र उत्पन्न हुआ था जो शुक्र नाम वाला था और महान् कवि हुआ था। यह दैत्य, दानव और कालेय आदि का वह सदा ही गुरु था। उसके चार सुत समुत्पन्न हुए थे जो असुरों को यजन कराने वाले थे। उनके नाम त्वष्टाचार, अत्रि, सौकल और वाग्मी थे। ये तेज में सूर्य के ही सदृश हुए थे। क्रोधात्माओं के तथा सिंहिका के पुत्र की सूति और प्रसूतियों के द्वारा यह सम्पूर्ण चराचर जगत व्याप्त हो रहा है। अर्थात् इनके पौत्र प्रपौत्र आदि इतने अधिक थे कि यह सब जगत उनसे व्याप्त हो गया था। हे द्विजो! उनके जो सन्ततियां क्रम से बढ़ी थीं उनकी अत्यधिक संख्या थी कि बहुत समय लगाकर भी उसकी गणना नहीं की जा सकती है। विनता के पुत्र तार्थ्य, अरिष्टनेमि, अनूप, गरुड़, आरुणि, वारुणि ये सब समुत्पन्न हुए थे। शेष वासुकिराज, तक्षक कुलिन, कर्म, सुमना ये सभी काद्रवेय नाम कहे गये हैं। भीमसेन, उग्रसेन, सुवर्ण, गरुड़, गोपति, धृतराष्ट्र, सूर्य, वर्चर्चा, वीर्यवान्, अर्क, दृष्ट, प्रयुक्त, विश्रुत, सुश्र, भीम, चित्र, रथ, विख्यात, सर्वविद्, वली, शालिशीर्ष, पर्जन्य, कलि, नारद ये सब देव, गन्धर्व देव और मुनि पुत्र कीर्त्तिक किये गए हैं। अनवधा, सानुरागा, संवरा, मार्गणा, प्रिया, असूया, सुभगा और भीमा इस कन्याओं को प्रसूत किया था। समस्त गुणों के समुत्थान स्वरूप तप के ही धन वाले कश्यप मुनि से प्राधा ने विश्वावसु, सुचन्द्र, सुवर्ण, सिद्ध, वह्नि, पूर्ण, पूर्णांक, ब्रह्मचारी, रतिप्रिय और भानु ये दश पुत्रों को जन्म दिया था जो कि प्राधापुत्र कहे गए हैं। ये सब देव गन्धर्व थे जो निरन्तर पुण्य लक्षणों वाले थे।
ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ २१७ अलम्बुषा, मिश्रकेशी, गामिनी, मनोरमा, विद्युतपन्ना, पनघा, रम्भा, अरुणा, रक्षिता, अतुला, सुबाहु, सुरता, मुरजा, सुप्रिया, वपु, तिलोत्तमा ये सब प्रमुख अप्सरायें कही गयी हैं । अति, बाहु, तुम्बरु, हाहा, हूहू, ये सब गन्धर्वों में मुख्य हुए हैं जो देवों के ही तुल्य कीर्तित किये गये हैं । अमृत, ब्राह्मण, गौऐं, मुनिगण, अप्सरायें ये कपिलातनय कहे गये हैं जो महान् भागों वाले और महान उत्सवों वाले हैं । इस प्रकार से ये दक्ष प्रजापति की सुताओं के पुत्र कश्यप ऋषि से समुद्भूत हुए बताये गये हैं । उनके द्वारा ही यह सम्पूर्ण स्थावर, जंगम अर्थात् जड़-चेतन व्याप्त हो रहा है । इस प्रकार से यज्ञ के स्वरूप वाले यज्ञ वाराह के पतन से तीन अग्नियों से उन महात्मा मनु स्वायम्भुव उत्पन्न हुए थे । सात मुनियों से ओर कश्यप आदि से नर नारायण से अकालिक लय से व्यतीत हो आने पर पुनः पहले अनेक रूप वाले हरि के द्वारा प्रजा का सृजन किया गया था । उन नर नारायण के स्वरूप वाले तथा सृष्टि-स्थिति और संहार के करने वाले भगवान हरि के प्रसाद से पुनः यह सृष्टि हुई थी । शरभ काया त्याग का वर्णन मार्कण्डेय महर्षि ने कहा- हे द्विजश्रेष्ठों! ईश्वर ने शरभ शरीर को यत्नपूर्वक जिस तरह से परित्याग किया था उसे कहने वाले मुझसे पुनः आप लोग श्रवण कीजिए। यज्ञ वाराह के निहित हो जाने पर लोकों के पितामह ब्रह्माजी ने शरभ के समीप में जाकर साम से युक्त अर्थात् परमशान्तिपूर्वक जगत् के हित की बात कही। ब्रह्माजी ने कहा था कि आपके देह के उपभोग अर्थात् विस्तार से बहुत से योजन तक यह स्थल पूरित हो गया है । इस कारण से आप लोकों को भय देने वाले शरीर का उससे हरण कीजिए । आपके युद्ध से ही यह सम्पूर्ण तीनों भुवन नष्ट हो गये । आज भगवान जनार्दन भयभीत हो रहे हैं । इस कारण से आप ऊपर के लोकों की भलाई के लिए इस शरीर का परित्याग कर दीजिए ।
२१८ 𑁍 श्रीकालिका पुराण 𑁍 मार्कण्डेय महर्षि ने कहा—सुरों में सबसे बड़े ब्रह्माजी के इस वचन का श्रवण करके भगवान शंकर ने उसी क्षण से जल के ऊपर ही शरभ शरीर को त्याग दिया था। महात्मा शंकर ने त्याग किये हुए उस देह के आठ पद अष्ट मूर्ति के आठों में सेवित किए थे। सबसे आदि में होने वाला दक्षिणपाद शीघ्र ही आकाश को चला गया था। उसके वाम पाद को मिहिर ने सेवित किया था और पीछे दक्षिणज विधि में रहा था। वाम पाद ने ज्वलन का सेवन किया था। पदगत पृष्ठाग्र ने क्षिति का सेवन किया था जो पृष्ठ का अग्र वाम था उसने सलिल का सेवन किया था। इसके पश्चात् वह दक्षिण को गया था। वामपाद ने सर्वतोमुख होता का सेवन किया था। इस प्रकार से उन अष्टमूर्तियों ने उसी क्षण में आठ पादों में उसी भाँति सेवन किया था और अपने-अपने तेज ने पद को प्राप्त किया था। मध्य जो शरभकाय का था वह महात्मा शंकर चण्ड स्वरूप वाला परम दुरापद कपाली भैरव हो गया था। वे अग्नि में मस्तिष्क भेद से युक्त माँस का हवन करते हैं। ब्रह्मकपाल के पात्र में स्थित सुराओं से देव पूजन किया करते हैं। मनुष्य के माँस के बलि देते हैं और सदा रुधिर का पान किया करते हैं। यज्ञ में सुरा से पारण करते हैं तथा कपालोद्भर को धारण करते हैं। व्याघ्रचर्म का परिधान और त्रिवली वृत धारण करते हैं। जो कपाल वृत के धारण करने वाले हैं। उनका कपाली भैरव देव नित्य ही पूज्य हुआ करता है। जो यह श्मशान भैरव है और महाभैरव के नाम वाला है। वह भैरव कैसे स्वरूप वाले हैं, यह भी बतलाते हैं। उनका बालसूर्य के समान प्रकाश होता है, सदा अठारह बाहुओं को विभ्राजमान रहते हैं, उनके नेत्र रक्तवर्ण वाले हैं, वे सर्वदा नायिकाओं के समूहों के साथ नित्य क्रीड़ा किया करते हैं जिनमें काली और प्रचण्डा मुख्य हैं। वे तुरन्त ही दग्ध करके माँस का प्रश्न किया करते हैं। लोहित आहार करने वाले और सदा प्रेत के आसन पर विराजमान रहा करते हैं। उनका मुख स्थूल तथा ओष्ठास्र्व हैं और ह्रस्व स्थल पद के आलय वाले हैं। वे परम विनोद करने वाले तथा लोक में वादन वाले
௬ श्रीकालिका पुराण ௬ २१९ और अट्टहास से युक्त भैरव हुआ करते हैं और वे महादेव इस प्रकार से भैरव के स्वरूप को धारण करने वाले हैं । महान् भुजाओं वाले वे मध्य शरम्भ काय के द्वारा काम को धारण करते थे । वह देव फिर हर के प्रथमों की ओर गये थे । वह भैरव अपने गणों के साथ आकाश में क्रीड़ा किया करते हैं ।
कामाख्या देवी वर्णन
मार्कण्डेय महर्षि ने कहा- वह श्रीमान् राजा नरक जो चिरंजीवी और महान् भुजाओं वाला था । मानुष भाव से ही चिरकाल पर्यन्त राज्य किया था । त्रेता युग के व्यतीत हो जाने पर द्वापर के शेष में शोणितपुर में वाण नाम वाला महान् असुर हुआ करता था । उसका अग्नि दुर्ग नगर तथा और वह बलवान् शम्भु का सखा था । उसकी एक सहस्त्र बाहु थीं और वह बहुत दुर्धर्ष था तथा राजा बलि का प्रिय पुत्र था । उसकी नरक के साथ बड़ी मित्रता हो गई थी । नित्य ही गमन और आगमन से तथा परस्पर अनुग्रह से उन दोनों में पवन और अनल की भाँति महती प्रीति हो गई थी । उस बाण ने जगत के प्रभु भगवान् शम्भु की समाराधना की थी और वह बिना भय वाला होकर असुर भाव से विचरण किया करता था । हे द्विजो! वह फिर ब्राह्मणों का पूजन नहीं करता था जैसे कि पहले भी नहीं किया करता था और वह यज्ञों और दान देने में भी पूर्व भी भाँति प्रसन्न नहीं होता था । पूर्व की तरह भगवान् विष्णु के समीप गमन नहीं किया करता था और वह पृथ्वी का भी अर्चन नहीं करता था । उस अवसर पर कामाख्या में उस भाँति की भक्ति उसकी नहीं हुई थी । इस बीच में विधाता के पुत्र मुनियों में श्रेष्ठ वसिष्ठ कामाख्या का दर्शन करने के लिए प्राग्ज्योतिष पुर में गये थे । दुर्ग के अन्दर व्यवस्थित उस नीलकूट देवी का दर्शन करने के लिए जाने को वसिष्ठ मुनि को नरक की निन्दा करते हुए कठोर वचन बोले । वसिष्ठ मुनि ने कहा- कैसे पृथ्वी का पुत्र और वराह का सुत अचानक ही ब्राह्मण
[Header] २२० ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ को देवी के दर्शन करने के लिए स्वागत नहीं करता है। हे धरा के पुत्र! तेरे कुल में उचित कर्म क्या है ? जिसको तू कर रहा है । प्राग्ज्योतिष पुर में जाकर मैं देवी का पूजन करूँगा । मार्कण्डेय मुनि ने कहा-इसके उपरान्त उस मुनि ने कुपित होकर राजा नरक को शाप दिया था। वशिष्ठ मुनि ने कहा-हे वराह के कुल को कलंकित करने वाले! हे पापी! जिससे अभी उत्पन्न हुआ है। उसी मानुष रूप से मारण को प्राप्त होगा। तेरे मृत हो जाने पर जगतों की प्रभु महादेवी कामाख्या को मैं पूजित करूँगा। हे पापी! तुम यहाँ स्थित रहो मैं अपने निवास स्थान को चला जाऊँगा। हे पापी! जब तक जीवित रहेगा तब तक जगत् की स्वामिनी यह कामाख्या देवी भी सब परिकरों के साथ अन्तर्धान हो जावे । मार्कण्डेय मुनि ने कहा-वह ब्रह्माजी के पुत्र मुनि इतना कहकर अपने स्थान को चले गये थे। उस भूमि के पुत्र के द्वारा निरस्त किए हुए मुनि वसिष्ठ बहुत ही अधिक कुपित हो गये थे। वसिष्ठ मुनि के चले जाने पर नरक शीघ्र ही विस्मय से संयुक्त होकर नीलकूट महान् गिरि पर देवी के भवन में चला गया था। वहाँ जाकर उसने कामरूप वाली कामाख्या देवी को नहीं देखा था। उसके योनिमण्डल को और सब परिकारों को भी नहीं देखा था। इसके उपरान्त वह बहुत ही उदार हो गया था और माता पृथ्वी का उसने स्मरण किया था। नरक ने अविनाशी जगत् के नाथ प्रभु पिता का भी स्मरण किया था। हे द्विजो! उस समय वे दोनों ही उसके सामने प्रत्यक्ष रूप से प्रकट नहीं हुए क्योंकि वह समय का व्युत्क्रमण करने वाले और शम्भु के लिए नीति से विहीन हो गया था। उस समय वज्रध्वज वह विष्णु भगवान् और पृथ्वी को न प्राप्त करने वाला होकर शोक से युक्त हो अपने घर में चला गया था। अपने घर को जाते हुए भूमि के पुत्र ने अपनी पुरी को देखा था जो अपनी पूर्व की श्री से परित्यक्त थी और मलिन वनिता के ही समान हो रही थी। उस देवी के अन्तर्धान हो जाने पर उस पुर को उसने वेद-वाद से रहित और पवित्र दाराजनों के स्वल्प रह जाने वाला ही पाया था। वहाँ पर न तो देवगण जाते हैं और न
൘൘ श्रीकालिका पुराण ൘൘ २२१ प्रिय तथा महर्षि गण की जाया करते हैं। उसका नगर बहुत ही कम यज्ञों की क्रिया तथा उत्सवों वाला हो गया था। बहुत सी ईतियाँ उस समय हो गई थीं (विनाश करने वाली ६ प्रकार की ईतियाँ होती हैं) और बहुत से जन मर गये थे। उस समय में लौहित्य नदों का राजा भी बहुत कम जल वाला हो गया। उस समय बहुत से विपरीत होने वाले कार्यों को देखकर वह नरक ब्राह्मण के पुत्र के शाप से आपने आप का मरण भी आया हुआ मानने लगा था। इसके अनन्तर प्राग्ज्योतिष नगर का स्वामी नरक शोक से विह्वल चेतना वाला होकर मन से चिन्तन करता हुआ बलि के पुत्र अपने मित्र बाण के समीप में चला गया था। वह इसको प्राणों के समान रखा था। ये दोनों निरन्तर परस्पर एक दूसरे की रक्षा करने में तत्पर रहा करते थे। ये दोनों बाण और नरक स्वर्ग के वैद्य अश्विनी कुमारों के ही सदृश थे। इसी बीच शम्भु का सखा बलवान् मित्र बाण महान् बुध था और मन्त्र प्रदान के द्वारा अनुकूल रहने वाला था। इस वज्रकेतु की उस समय से ऐसी अचल मति हुई थी। उसने बाण ने नरक की ओर दीप्ति दूत को प्रेषित किया था। वह शीघ्र गमन करने वाले रथ का वृन्तात शीघ्र ही बाण के लिए निवेदन कर दिया था। जिस प्रकार से वसिष्ठ मुनि ने शाप दिया था और जैसे अम्बिका अन्तर्धान हो गई थी और जैसे प्राग्ज्योतिष नाम वाले पुर में विघ्न उत्पन्न हो गया था। भूमि और माधव का समय जिस तरह से व्यतिक्रान्त हुआ था अर्थात् समय का अतिक्रमण दिया गया था-यह सब भूमिपुत्र के उस दूत ने बलि के पुत्र बाण से कह दिया था। उसके समान आकार वाले मित्र का यह पराभव जो दैव के ही द्वारा हुआ था उसे भली भाँति जानकर वह ईश्वर नरक को समझने अर्थात् सान्त्वना देने के लिए वहाँ स्वयं ही गया। वह सुवर्ण से रचित विचित्र अंगों वाले, तीन सौ अश्वों से युक्त, लोहे के पहियों वाले, व्याघ्र, मधुर ध्वज से भूषित, सुवर्ण के दण्ड वाले सितछत्र से समाच्छादित, किंकिणी गणों से समन्वित, अनेक रत्नों से समूह से
२२२ ॐ श्रीकालिका पुराणे ॐ निर्मित महान् रथ पर वह समारूढ़ हुआ था। वह एक सहस्त्र भुजाओं वाला-श्रीमान् चतुरंगिणी सेनाओं से युक्त होकर भौम (नरक) के पुर प्राग्ज्योतिष में शीघ्र आ पहुँचा। उसके समीप पहुँचकर महाबाहु बाण ने प्राग्ज्योतिष में शीघ्र आ पहुँचा। उसके समीप पहुँचकर महाबाहु बाण ने प्राग्ज्योतिष नगर के स्वामी को पूर्व श्री से हीन मित्र को और उस नगर को देखा था। पृथ्वी के सुत द्वारा यथा उचित रीति से वह पूजित किया गया था अर्थात् उसका समुचित सत्कार किया था। और उसने पूछा था कि किस कारण से तुम्हारा यह पुर श्रीहीन हो गया था। बाण ने कहा-आपका यह शरीर भी जैसा पहले था वैसा शोभित नहीं हो रहा था। आपका मन भी पहले के समान प्रसन्न नहीं है-इसमें क्या कारण है, वही मुझे कृपा कर बतलाइये।
नरकासुर उपाख्यान
मार्कण्डेय मुनि ने कहा-इस प्रकार से बहुत से प्रश्न पूछे गये। भूमि के पुत्र उस नरक को जिस तरह से वशिष्ठ मुनि ने शाप दिया था वह सभी उसको कह दिया था। भूमि के पुत्र से जो भी सुना था वह पहले ही दूत के द्वारा आवेदित था। भूमि के पुत्र से जो भी सुना था वह उस वज्रध्वज से पुनः बोला। वाण ने कहा-आपको क्रोध नहीं करना चाहिए। शरीरधारियों को सुख और दुःख चक्र की ही भाँति परिवर्तित हुआ करते हैं अर्थात् सुख के बाद दुःख से कोई भी हीन हुआ करता है। परन्तु धीर पुरुषों को विभूति के लिए उसमें प्रतिकार करना ही चाहिए। आपको भी अब उसका प्रतिकार करना योग्य हे अर्थात् आपको भी प्रतिकार करना ही चाहिए। पृथ्वी में यह मनुष्य असाधारण विभूतियों से वर्धित होता है। ऐसा सभी को होता है चाहे कोई दानव हो दैत्य हो अथवा असुर हो, राक्षस हो अथवा किन्नर हो। इन्द्र भी उसको सहन नहीं किया करता है और जिस किसी भी प्रकार से उसकी श्री को भ्रष्ट करके उसे विनष्ट कर दिया करता है। उसके परम इष्टतम देव सनातन विष्णु भगवान् हैं। वे इन्द्र का थोड़ा सा भी अनिष्ट कभी नहीं किया करते हैं।