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कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished259 पृष्ठ

४०६ ] [ कल्कि पुराण हिणी सेना से पृथिवी को कम्पित कर रहे थे ।३। विशाखयूप-नरेश भी अपनी एक लाख हाथी, एक करोड़ घोड़ो और सात हजार रथो मे सम्पन्न सेना के साथ थे ।४। उनके साथ दो लाख पैदल सैनिक धनुष बाणों से सुसज्जित थे । वायु के झोको से उनके स फे और दुकूल हिल रहे थे ।५। इनके अतिरिक्त पचास हजार लाल वर्ण के अश्व, दस हजार मदमत्त गज एव अनेको महारथी तथा नौ लाख पदाति थे ।६। अक्षौहिणीभिर्दशभि कल्कि परपुरञ्जय । समाबभौस्तथा देवैरेवमिन्द्रो दिवि स्वराट् ।७। भ्रातृपुत्रसुहृद्भिश्च मुदित सैनिकैर्वृत । ययौ दिग्विजयकाङ्क्षा जगतामीश्वर प्रभुः ।८। काले तस्मिन्द्विजो भूत्वा धर्म्मः परिजनैः सह । समाजागान कलिना बलिनापि निराकृत । ६। ऋत प्रसादभय सुख मुदमुथ स्वयम् । योभमर्थं तनोऽदर्प स्मृति क्षेम प्रतिश्रयम् ।१०। नरनारायणो चोभौ हरेरंशौ तपावनौ । धर्म्मस्त्वेतान्समादाय पुत्रान्स्त्रींश्चागतस्त्वरन् ।११। श्रद्धा मैत्री दया शान्तिस्तुष्टिः पुष्टिः क्रियोन्नतिः बुद्धिर्मेधा तितिक्षा च ह्रीमुर्त्तिर्धर्म्मपालकाः ।१२। एतास्तेन सहायता निजबन्धुगणैः सह । कल्किमालोकित तत्र निजकार्य्य निवेदितुम् ।१३। शत्रु पुरो के विजेता कल्किजी स्वर्ग मे सुशोभित सुरपति इन्द्र के समान दस अक्षौहिणी सेना के साथ अत्यन्त शोभा को प्राप्त हुए ।७। इस प्रकार भाई, पुत्र, सुहृद और सैन्य-समूह से सम्पन्न होकर जगदी- श्वर कल्किजी ने दिग्विजय की इच्छा से प्रस्थान किया ।८। तभी कलियुग के द्वारा निग्रह किया हुआ धर्म ब्राह्मण वेश मे वहा उपस्थित हुआ ।६। ऋत, प्रसाद, अभय, सुख प्रसन्नता, योग, अर्थ, अदर्प, स्मृति, क्षेम और प्रतिश्रय नामक उसके सेवक साथ थे ।१०। भगवान् विष्णु

षष्ठ अध्याय-३ ] [ ४०७ के अंश रूप तपोनिष्ठ नर-नारायण को तथा अपने स्त्री पुत्रादि को साथ लेकर धर्म शीघ्रता पूर्वक वहाँ आ गया ।११। श्रद्धा, मैत्री, दया, शान्ति, तुष्टि, पुष्टि, क्रिया, उन्नति, बुद्धि, मेधा, तितिक्षा, ह्री आदि धर्म की रक्षा मे तत्पर यह सभी साकार रूप में अपने बान्धवों से युक्त होकर कल्किजी के दर्शनार्थ और स्वकार्य निवेदनार्थ वहाँ उपस्थित हुए ।१२-१३। कल्किर्द्विजं समासाद्य पूजयित्वा यथाविधि । प्रोवाच विनयापन्नं कस्त्वं कस्मादिहागतः ।१४। स्त्रीभिः पुत्रैश्च सहितः क्षीणपुण्य इव ग्रहः । कस्य वा विषयाद्राजंस्तत्तत्त्वं वद तावतः ।१५। पुत्राः स्त्रियश्च ते दीना हीनस्वबलपौरुषाः । वैष्णवाः साधवो यद्वत्पाखण्डैश्च तिरस्कृताः ।१६। कल्केरिति वचः श्रुत्वा धर्मः शर्म निजं स्मरन् । प्रोवाच कमलानाथमनाथस्त्वतिकातरेः ।१७। पुत्रैः स्त्रीभिर्निजजनैः कृताञ्जलिपुटैर्हरिम् । स्तुत्वा नत्वा पूजयित्वा मुदितं तं दयापरम् ।१८। शृणु कल्के ममाख्यानं धर्मोऽहं ब्रह्मरूपिणः । तव वक्षःस्थलाज्जातः कामदं मवदेहिनाम् ।१९। भगवान् कल्कि ने ब्राह्मण को देखते ही विनय पूर्वक एवं विधिवत् उसका पूजन किया और बोले-आप कौन हैं ? कहाँ से आगमन हुआ ? ।१४। क्षीण पुण्य मनुष्य के समान आप अपने स्त्री पुत्रादि के सहित किस राज्य से यहाँ आये हैं, यह सब मुझे यथार्थ रूप में बताइये ।१५। जैसे वैष्णव साधु पाखण्ड के पराजित हो जाते हैं, वैसे ही आप बल-पौरुष से हीन होकर स्त्री पुत्रादि के सहित अत्यन्त कातर क्यो हो रहे हैं ? ।१६। अत्यन्त कातर और अनाथ रूप में आया हुआ धर्म पद्मा- पति कल्किजी के वचन सुन कर अपने कल्याणार्थ निवेदन करने लगा ।१७। उसने अपने अनुयायियों के सहित हाथ जोड़े और आनन्द-धाम

४०८ ] [ कल्कि पुराण तथा दयावन्त प्रभु का पूजन कर प्रणाम और स्तुति करने लगा ।१९८ धर्म बोला-हे प्रभो ! मैं अपना वृत्तान्त निवेदन करता हूँ, इसे सुनिये ! मैं ब्रह्मस्वरूप धर्म आपके वक्ष स्थल से उत्पन्न हुआ हूँ । मेरे द्वारा सभी प्राणियो के कार्यों की सिद्धि होती है ।१६। देवाना मग्रणीर्हव्यकव्याना कामधुग्विभु । तवाज्ञया चराम्येव साधुकीर्त्तिकृदन्वहम् ।२०। सोऽह कालेन वलिना बालनापि निराकृत. । शककाम्बोजशबरै. सर्वैरावासवासिना ।२१। अधुना तेऽखिलाधार ! पादमूलमुपागता । यथा ससारकालाग्निसतप्ता साधवोऽर्दिता, ।२२। इति वाग्भिरपूर्वाभिर्धर्मेण परितोषित । कल्कि' कलङ्कहर श्रीमानाह सहर्षयञ्छनैः ।२३। धर्मं कृतायुग पश्य नरु चण्डाशुवशजम् । मा जानासि यथा जात धातृप्रार्थितविग्रहम् ।२४। कीटाकँबौद्धदलनमिति मत्वा मुखो भव । अवैष्णवानामन्येषाम् तत्रोपद्रवकारिणाम् । जिघासुर्यामि सेजाभिश्चर गा त्वं निर्विभंरः ।२५। देवताओ मे प्रथम गणना योग्य मे यज्ञाश रूप हव्य-कव्य के अश का आधिकारी हूँ । मैं यज्ञ फल प्रदान करके साधुजन का अभीष्ट पूर्ण करता हूँ। आपकी आज्ञा से मैं सदैव साधुओ का कार्य सिद्ध करता हुआ घूमता हूँ ।२०। इस समय शक, कम्बोज, शबर आदि कलियुग के शासन मे रहते हैं। कालक्रम के कारण मैं उस बलवान् कलि से ही हारा हुआ हूँ ।२१। हे अखिलाधार ! इस समय साधुजन विश्वरूपी कालाग्नि से सतप्त एव पीडित है। इसी लिए मैं आपके चरणो की शरण मे उपस्थित हुआ हूँ ।२२। धर्म के इन अपूर्व वचनो को सुन कर पाप हारी कल्कि जी सब के लिए प्रसन्न करने वाले वचन कहने लगे ।२३। उन्होने कहा--हे धर्म ! इधर देखो, सत्यग का आगमन हो चुका

षष्ठ अध्याय-३ ] [ ४०६ है । यह मरु नामक सूर्यव शी नरेश हैं । तुम्हे यह विदित ही है कि मैंने ब्रह्माजी द्वारा प्रार्थित होकर ही यह देह धारण किया है ।२४। कीटक मे बौद्धो का दलन किया और जो तुम्हारे प्रति अधिक उपद्रव करने मे तत्पर रहते हैं तथा जो वैष्णव नही है, उन्हे नष्ट करने के लिए मैं सना सहित विचार कर रहा हूँ । अब तुम भी भय-रहित होकर पृथिवी पर पनिशील रहो ।२५। का भीतिस्ते क्व मोहोऽस्ति यज्ञदानतपोव्रतै. । सहितै सच्र विभो ! मयि सत्ये व्युपस्थिते ।२६ । अह यामि त्वयागच्छ स्वपुत्रैर्बान्धवै सह । विशा जयार्थं त्व शत्रुनिग्रहार्थं जगत्प्रिय ।२७। इति कल्केर्वच श्रुत्वा धर्म. परमहर्षित । गन्तु कृतमतिस्तेन आधिपत्यममु' स्मरन् ।२८। सिद्धाश्रमे निजनानवस्थाप्य स्त्रियश्च तः ।२६। सन्नद्ध. साधुसत्कारवेदब्रह्ममहारथः। नानाशास्त्रान्वेषणेषु सकलपवरकार्मुक. ।३०। सप्तस्वराश्वो भूदेवसारथिर्वन्हिराश्रयः क्रिय.भेदबलोपेत प्रवयौधर्म्मनायकः ।३१। हे धर्म ! मैं स्वयं उपस्थित हूँ, सत्युग भी आ ही चुका है, तब तुम भयभीत क्यो हो ? तुम व्यर्थ मोहित क्यो हो रहे हो ? अब तुम यज्ञ, दान और व्रत के सहित पृथिवी पर स्वच्छन्द विचरण करो ।२६। हे जगत्प्रिय ! तुम अपने पुत्र एव बाँधवो सहित शत्रुओ के निग्रह और दिग्विजय के उद्देश्य से प्रस्थान करो । मैं भी तुम्हारा साथ दूँगा ।२७। कल्किजी के यह वचन सुन कर धर्म अत्यन्त आनन्दित हुआ और अपने अधिपत्य का स्मरण करता हुआ, कल्किजी के साथ प्रस्थान मे तत्पर हुआ ।२८। उस समय उसने अपनी स्त्री को सिद्धाश्रम मे स्थित किया ।२६। धर्म का युद्ध-वेश साधु-सत्कार था । वेद और ब्रह्म महारथ के रूप मे साकार हुए तथा विविध शास्त्रो के अन्वेषण ने धनुष का रूप धारण किया ।३०। वेद के सात स्वर उसके रथ के अश्व हुए, ब्राह्मण

४१० ] [ कल्कि पुराण सारथि, अग्नि आसन रूप आश्रय हुआ । इस प्रकार धर्म रूप नायक क्रियानुष्ठान रूपी महाबल से समन्वित होकर चल दिया । ३१ । यज्ञदानतप पात्रैयमैश्च नियमैर्वृतः । खशकाम्बोजकान्त्सर्वाञ्छबराञ्बर्व्वरापि ।३२। जेतु कल्किययौ यत्र कलेरावासमीप्सितम् । भूतवासबलोपेत सारमेयवराकुलम् ।।३३।। गोमासपूतिगन्धाढ्य काकोलूकशिवावृतम् । स्त्रीणा दुर्द्यूतक लहविवादव्यसनाश्रयम् .३४। घोर जगद्भूयकर कामिनीस्वामिन गृहम् । कलिः श्रुत्वोद्यमं कल्के पुत्रपौत्रवृत क्रुधा ।३५। पुराद्विशसनात्प्रायात्प्रे चकाक्षरथोपरि : धर्मः कलि समालोक्य ऋषिभि. परिवारितः ।३६। युयुधे तेन सहसा कल्किवाक्यप्रचोदित; । ऋतेन दम्भः सङ्ग्रामे प्रसादो लोभमाह्वयत् ।३७। इस प्रकार यज्ञ, दान, तप, यम, नियम आदि से सम्पन्न हुए भगवान् कल्कि खश, कम्बोज, शबर तथा बर्बर आदि म्लेच्छो की विजय कामना से कलि के आवास वाले स्थान मे पहुचे । वहा भूतो का दृढ आवास होने से उस स्थान मे सब ओर श्वान भूँकते थे । ३२-३३ । इस स्थान मे गो मास की दुर्गंध आ रही थी । कौओ और उल्लुओ से पूर्ण तथा द्यूत का आश्रय एव स्त्रियो के विवाद रूपी क्लेश इसमे भरा हुआ था ।३४। ससार के लिए भयप्रद यह नगरी भय कर प्रतीत होती थी । यहाँ के पुरुष स्त्रियो की आज्ञा के अनुवर्ती थे । वहाँ का अधीश्वर कल्कि जी का आक्रमण सुन कर अपने पुत्र-पौत्रादि के सहित उल्लू की ध्वजा वाले रथ पर आरूढ होकर विशसनपुरी से बाहर आया । उस कलि को देख कर भगवान् कल्कि की आज्ञानुसार ऋषियो के सहित धर्म ने उसके साथ सग्राम प्रारम्भ किया । दभ से ऋत और लोभ से प्रसाद भिड़ गया ।३५-३७।

षष्ठ अध्याय-३ ] [ ४११ समयादभय क्रोधो भयं सुखमुपाययौ । निरयो मुदमासाद्य युयुधे विविधायुधैः ।३८। आधियोगेन च व्याधि क्षेमेण च बलीयसा । प्रश्रयेण तथा ग्लानिर्जरा स्मृतिमुपाह्वयत् ।३६। एव वृत्तो महाघोरो युद्ध परमदारुणः । त द्रष्टुमागता देवा ब्रह्माद्याः खे विभूतिभिः ।४०। मरु खशंश्च काम्बोजैर्युयुधे भीमविक्रमैः । देवापिः समरे चौनैर्बर्बरैस्तद्गणैरपि ।४१। विशाखयूपभूपाल पुलिन्दै श्वपचै सह । युयुधे त्रिविधे शस्त्रैरस्त्रैर्दिव्यैर्महाप्रभैः ।४२। कल्कि कोकविकोकाभ्या वाहिनीभिर्वरायुधै । तौ तु कोकविकोकौ च ब्रह्मणो वरदर्पितौ ।४३। क्रोध के साथ अभय और भय के साथ सुख का युद्ध होने लगा । निरय ने प्रीति के पास आकर उस पर शस्त्रास्त्रो से प्रहार किये ।३८। आधि से योग का, व्याधि से क्षेम का, ग्लानि से प्रश्रय का और जरा से स्मृति का संग्राम होने लगा ।३६। इस प्रकार अत्यन्त घोर एवं दारुण संग्राम उपस्थित हो गया । ब्रह्मादि देवगण अपनी-अपनी विभूतियो के सहित नभमण्डल मे स्थित होकर युद्ध देखने लगे ।४०। भीषण पराक्रमी खश और कम्बोजो से मरु का युद्ध हुआ । देवापि ने चौन और बर्बरों की सेना से संग्राम किया ।४१। विशाखयूप नरेश पुलिन्द और श्वपचादि से महा पराक्रमी विविध अपने दिव्यास्त्रो के सहित भिडे हुए थे ।४२। कोक-विकोक के साथ स्वय भगवान् कल्कि श्रेष्ठ शस्त्रास्त्र लेकर सेना सहित युद्ध मे तत्पर हुए । यह कोक-विकोक ब्रह्मा जी से वर प्राप्त करने के कारण अत्यन्त अहकारी हो गए थे ।४३। भ्रातरौ दानवश्रेष्ठौ मत्तौ युद्धविशारदौ । एकरूपौ महासत्त्वौ देवाना भयवर्द्धनौ ।४४। पदातिकौ गदाहस्तौ वज्राङ्गौ जयिनौ दिशाम् ।

४१२ ] कल्कि पुराण शुम्भैः परिवृतौ मृत्युजितावेकत्र योधनात् ।४५। ताभ्यां स युयुधे कल्कि सेनागणसमन्वितः । शुभाना कल्किसैन्याना समरस्तुमुलोऽभवत् ।४६। ह्रषितैर्बृंहितैर्दन्तशब्दैष्टङ्कारनादितैः । शूरोत्कृष्टैर्बाहुवेगैः सशब्दस्तलताडनैः ।४७। संपूरिता दिशः सर्वा लोका नो शर्म लेभिरे । देवाश्च भयसन्त्रस्ता दिवि व्यस्तपथा ययुः ।४८। पाशैर्दण्डैः खड्गशक्त्यृष्टिशूलैर्गदाघातैर्बाणपातैश्च घोरैः । युद्धे शूराश्छिन्नबाहुद्विमध्याः पेतुः सख्ये शतशः कोटिशश्च दैत्यो मे श्रेष्ठ यह दोनो भाई घोर युद्ध मे प्रवीण, अत्यन्त बली और देवताओ को भयभीत करने मे समर्थ थे। इन दोनो का रूप एक सा था ।४४। यह दोनो दिग्विजयी, वज्र जैसे कठोर शरीर वाले थे। दोनो मिल कर मृत्यु को भी युद्ध मे जीत लेने मे समर्थ थे। अपनी बलवती सेना के सहित यह दोनो गदा धारण कर पैदल ही युद्ध मे तत्पर हुए ।४५। इन कोक-विकोक के साथ कल्कि जी का घोर संग्राम हो रहा था उनकी सेना के प्रमुख वीर भयकर युद्ध कर रहे थे ।४६। अश्वो का हींसना, हाथियो की चिघाड तथा दान्तो का शब्द, धनुषो की टकार, वीरो के भुजाघात आदि से भयप्रद भीषण शब्द होने लगा ।४७। उस शब्द से दसो दिशाएँ गूँज उठीं । कोई भी जीव भय-रहित नही था । देवता भी डर के कारण गगन मण्डल से उल्टे-सीधे मार्गों से भागने लगे ।४८। पाश, दण्ड, खड्ग, शक्ति, शूल, गदा तथा भयकर वाणो के आघात से करोडो शूरो के हाथ, पैर, कटि आदि विभिन्न अग कट-कट कर गिर रहे थे, जिनसे युद्ध भूमि आच्छादित होने लगी थी ।४६। —❀—

तृतीयांश - सप्तम अध्याय एव प्रवृत्ते सङ्ग्रामे धर्मं परमकोपन । कृतेन सहितो घोर युयुधे कलिना सह. ।१। कलिर्दमित्रबाणौधैधर्मस्यापि कृतत्त्य च । पराभूत पुरी प्रायात्त्यक्त्वागर्दभवाहनम् ।२। विच्छिन्नपेचकरथ स्रवद्रक्ताङ्गसञ्चय । च्छुद्भगन्ध करालास्य स्त्रीस्वामिकमगाद्गृहम् ।३। दम्भ सम्भोगरहितनोद्धृतवाणगणाहत । व्याकुल स्वकुलागारो नि मार० प्राविशद्गृहम् ।४। लोभ प्रसादाभिहतो गदया भिन्नमस्तकः । सारमेयरथ च्छिन्न त्यक्त्वागाद्रुधिर वमन् ।५। श्रभयेन जित क्रोध कषायीकृतलोचन । गन्धाखुवाह विच्छिन्न त्यक्त्वा विशमन गत ।६। सूत जी ने कहा—इस प्रकार भयकर युद्ध होता देख कर मन्युग सहित धर्म ने अत्यन्त क्रोधपूर्वक कलि से युद्ध प्रारम्भ किया ।१। तब धर्म और सत्युग की भीषण बाण वर्षा को न सह कर हारा हुआ कलि अपने वाहन गधे को वही छोड़ कर भागता हुआ अपनी पुरी मे घुस गया ।२। उल्लू की ध्वजा वाला उसका रथ चकनाचूर हो गया । उसके देह से रक्त बहने लगा, जिससे छछू दर की गन्ध निकल रही थी । मुख पर भयानकता आ गई थी । इस अवस्था को प्राप्त हुआ कलि अपनी स्वामिनी नारी के भवन मे प्रविष्ट हुआ ।३। इस प्रकार बाण वर्षा से आहत एव व्याकुल हुआ कलि दम्भ सम्भोगादि से रहित होकर ४१३

४१४ ] [ कल्कि पुराण अपने कुल के अग र रूप से सार-हीन होता हुआ अपने गृह मे जा पहुंचा ।४। उधर प्रसाद द्वारा पदाघात को प्राप्त हुए लोभ का शिर कट गया । कुत्तो से युक्त उसका रथ छिन्न भिन्न हो गया । तब वह उसे छोड कर रक्त वमन करता हुआ रण क्षेत्र से भाग खडा हुआ ।५। अभय से युद्ध करता हुआ क्रोध भी हार गया । उसके छ नेत्रो मे लाली छाई थी । चूहो से युक्त दुर्गंध पूर्ण अपने छिन्न-भिन्न रथ को वही पडा छोड कर वह भी विशमनपुरी मे जा घुसा ।६। भय सुखतलाघाताद्गतासु र्यपतद्भुवि । निरयो मुदमुष्टिभ्या पीडितो यममाययौ ७। आधिव्याध्यादय सर्वे त्यक्त्वा वाहमुपाद्रवन् । नानादेशान्भयोद्विग्न कृतवाणाप्रपीडिताः ।८। धर्म. कृतेन सहितो गत्वा विशसन कलेः । नगर बाणदहनैर्ददाह कलिना सह ।६। कलिर्विप्लुष्टसर्वाङ्गो मृतदारो मृतप्रज. । जगामेको रुदन्दीनो वर्षान्तरमलक्षित. ।१०। मरुस्तु शककाम्बोजाञ्जघ्नेदिव्यास्त्रतेजसा । देवापि· शबरांश्चोलान्बर्बरास्तद्गणानपि ।११। दिव्यास्त्रशस्त्रसम्पातैर्दयामास वीर्यवान् । विशाखयूपभूपालः पुलिन्दान्पुक्कसानपि ।१२। सुख के तलाघात से आहत हुआ भय प्राण त्याग कर धराशायी हुआ । प्रीति के मुष्टि प्रहार से पीडित हुआ निरय भी तुरन्त ही यमा- लय को चला गया ।७। सत्युग के बाणो से आहत हुई आधि-व्याधि अपने वाहनो का परित्याग करके इधर-उधर भाग गईं ।८। इसके पश्चात् सत्युग को साथ लेकर धर्म कलि की राजधानी विनशन में प्रविष्ट हुआ और उसने कलि के सहित सम्पूर्ण नगर को अपनी बाणा- ग्नि से जला दिया ।६। कलि के सभी अग जल गये । उसकी संतति और पत्नी भी मरण को प्राप्त हुई और वह स्वय रोता हुआ अप्रकट रूप

सप्तम अध्याय-३ ] [ ४१५ से अन्य वर्ष मे पलायन कर गया ।१०। अपने दिव्यास्त्रो के तेज से राजा मरु ने भी शक और कम्बोजो का सहार कर दिया तथा राजा देवापि ने चोल और बर्वरो को मृत्यु के घाट उतार दिया ।११। महा- बली विशाखयूप नरेश ने अपने दिव्य शस्त्रास्त्रो के द्वारा पुलिन्द और युक्कसो को नष्ट किया ।१२। जघानविमलप्रज्ञ खड्गपातेन भूरिणा । नानास्त्रशस्त्रवर्षैस्ते योधा नेशुरनेकधा ।१३। कल्कि कोकविकोकाभ्या गदापाणियुंधा पतिः । युयुधे विन्याराविज्ञो लोकाना जनयन्भयम् ।१४। वृकासुरस्य पुत्रौ तौ नप्तारौ शकु नेर्हरेः । तयो. कल्कि स युयुधे मधुकैटभयोर्यथा ।१५। तयोर्गंदा प्रहारेण चूर्णितागस्त तत्पते । कराच्च्युतापतद्भूभौ दृष्ट्वोचुर्विस्मयितो जना ।१६। ततः पुन क्रुधा विष्णुर्र्जगालिष्णुरुर्महाभुज । भल्लकेन शिरस्तस्य विकोकस्याच्छिनत्प्रभु ।१७। मृतो विकोकः कोकस्य दर्शनादुत्थितो बली । तद्दृष्ट्वा विस्मिता देवा, कल्किश्च परवीरहा ।१८। उन श्रेष्ठ बुद्धि वाले विशाखयूप-नरेश ने निरन्तर अपने खड्ग एव अनेकानेक शस्त्रास्त्रो के द्वारा शत्रुओ को विनष्ट किया । इस प्रकार पर-पक्ष के बहुत सारे वीर मृत्यु को प्राप्त हुए ।१३। गदा-कुशल कल्कि जी गदा लिये हुए ही कोक विकोक से सग्राम कर रहे थे, जिससे सब लोक भयभीत हो रहे थे ।१४। वे दोनो भाई शकुनि के पौत्र और वृकासुर के पुत्र थे । पुरा- काल में जैसे विष्णु का मधु कैटभ से युद्ध हुआ था, वैसे ही इन दोनो के साथ कल्कि जी घोर सग्राम कर रहे थे ।१५। तभी कोक-विकोक के गदाघात से कल्किजी का देह चूर्ण जैसा हो गया । उनके हाथ से गदा छूट गई । यह दृश्य सभी उपस्थित व्यक्ति आश्चर्य पूर्वक देख

सप्तम-अध्याय-३ ] [ ४१६ रहे थे ।१६। फिर संसार विजेता महाबाहु कल्कि जी ने क्रोध में भर कर भल्लास्त्र के द्वारा विकोक का शिर छेदन कर दिया ।१७। महाबली विकोक मृत्यु को प्राप्त हो गया था । परन्तु जैसे ही उसके भाई कोक ने उसे देखा वैसे ही वह पुनर्जीवित हो गया । यह देखा कर सभी देव- गण और स्वयं कल्कि जी भी आश्चर्य करने लगे ।१८। प्रतिकर्तुर्गदापाणे कोकस्याप्यच्छिनच्छिरः । मृतं कोको विकोकस्य दृष्ट्वातारंसमुत्थित ।१९। पुनस्तौ मिलितौ तेन युयुधाते महाबलौ । कामरूपधरौ वीरौ कालमृत्यू इवापरौ ।२०। खड्गचर्मधरौ कल्कि प्रहरन्तौ पुनः पुनः । कल्किः क्रुधा तयोस्तद्वद्द्वाभ्यांशिरसी हृते ।२१। पुनर्लग्ने समालोक्य हरिश्चिन्तापरोऽभवत् । विसत्त्वत्वमथालोक्य तुरगस्तावताडयत् ।२२। कालकल्पौ दुराधर्षौ तुरगेणार्दितौ भृशम् । कल्केस्त जघ्नतुर्बाणैरमर्षताम्रलोचनौ ।२३। तयोर्भुजान्तर सोऽश्व क्रुधा समदशद्भृशम् । तौ तु प्रभिन्नास्थिभुजौ विशस्ताङ्गदकार्मुकौ ० पुच्छ जगृहतु सप्तेर्गोपुच्छ बालकाविव ॥२४। फिर कल्कि जी ने विकोक को पुनर्जीवित करने वाले गदापाणि कोक का ही रच्छेद कर दिया । इस प्रकार कोक मर गया, परन्तु जैसे ही उसे विकोक ने देखा, वैसे ही वह भी पुनर्जीवित हो उठा ।१९। तब इच्छानुसार रूप धारण मे समर्थ महाबली कोक-विकोक दोनो मिल कर कल्किजी के साथ दूसरे काल के समान घोर युद्ध करने लगे ।२०। वह खड्ग और ढाल धारण कर बारम्बार कल्किजी पर आघात करने लगे । तब कल्किजी ने अत्यन्त क्रोधित होकर उन दोनो के ही अपने बाणो से मस्तक उड़ा दिये ।२१। परन्तु, जब दोनो के ही मस्तक अपने- अपने धड मे स्वय जुड गये, तब तो कल्कि जी को बडी चिन्ता हुई । फिर वे कोक-विकोक द्वारा अपने पर प्रहार होते देख कर स्वयं भी

सप्तम-अध्याय-३ ] [ ४१७ उन पर घोर प्रहार करने लगे। २२। युद्ध मे दुर्धर्ष कोक-विकोक कल्कि जी के अश्व के द्वारा किये गये आघात से अत्यन्त आहत होकर क्रोधित हो उठे और रक्त वर्ण नेत्र करके कल्कि जी पर भीषण बाण- वर्षा मे तत्पर हुए ।२३। तब कल्कि जी के अश्व ने अत्यन्त क्रोध पूर्वक कोक-विकोक के भुजमूल छिन्न कर दिये, उनकी भुजाओ की हड्डियों का चूर्ण हो गया । धनुष भी बाहुओ के सहित कट कर गिर गये । तब जैसे कोई शिशु गौ की पूँछ पकड़ लेता है, वैसे ही उन्होंने अश्व की पूँछ को पकड़ लिया । २४। धृतपुच्छौ तु तौ ज्ञात्वा सप्तिः परमकोपनः । पश्चात्पद्भ्यां दृढं जघ्ने तयोर्वक्षसि वज्रवत् । २५। त्यक्तपुच्छौ मूच्छितौ तौ तत्क्षणात्पुनरुत्थितौ । पुरतः कल्किमालोक्य बभाषाते स्फुटाक्षरौ । २६। ततो ब्रह्मा तमभ्येत्य कृताञ्जलिपुटः शनैः । प्रवाच कल्किं नैवामू शस्त्रास्त्रैर्वधमर्हतः । २७। कराघातादेककाले उभयोर्निर्मितो वधः । उभयोर्दर्शनादेव नोभयोर्मरणं क्वचित् । विदित्वेति कुरुष्वात्मन्युभपञ्चानयोर्वधम् । २८। इति ब्रह्मवचः श्रुत्वा त्यक्तशस्त्रास्त्रवाहनः । तयोः प्रहरतोः स्वैरं कल्किर्दानवयोः क्रुधा । मुष्टिभ्यां वज्रकल्पाभ्यां बभञ्ज शिरसी तयोः । २९। तौ तत्र भग्नमस्तिष्कौ भग्नशृङ्गागाविव । पेततुर्दिवि देवानां भयदौ भुवि बाधकौ । ३०। जैसे ही उन्होंने अश्व की पूँछ पकड़ी वैसे ही अश्व ने अत्यन्त क्रोधित होकर अपने पिछले पैरो के द्वारा कोक-विकोक के वक्षस्थल मे वज्र के समान प्रहार किये ।२५। जिससे वे दोनो राक्षस अश्व की पूँछ को छोड कर पृथिवी पर गिरते हुए मूच्छित हो गए । परन्तु, उन्हे तुरन्त ही चेत हो गया और वे कल्कि जी को सामने देख कर युद्ध के

४१८ ] कल्क-पुराण निमित्त पुन, ललकारने लगे ।२६। तभी ब्रह्मा जी वहा आये और कल्किजी से हाथ जोड कर बोले कि हे प्रभो ! यह कोक-विकोक शस्त्रा- स्त्रो से मृत्यु को प्राप्त नही हो सकते ।२७। इन दोनो को एक समय मे ही थप्पड मार कर इनका वध कर दीजिये । क्योकि जब तक यह दोनो परस्पर एक दूसरे को देखेगे, तब तक इनकी मृत्यु सभव नही है । अत आप इसी प्रकार इनको मारिये ।२८। ब्रह्माजीके वचन सुन कर कल्किजीने शस्त्रास्त्र और वाहन का परित्याग कर दिया और दोनो दानवो के मध्य पहुँच कर दोनो हाथो से एक साथ उन दोनो के वज्र के समान मुष्टिका- प्रहार किया, जिससे उनका मस्तक चूर्ण हो गया ।२६। देवताओ के लिए भयप्रद और सब जीवो का अनिष्ट करने मे तत्पर वे दोनो दानव मस्तको के चूर्ण होने से टूट कर गिरते हुए पर्वत-शिखरो के समान धरती पर आ गिरे ।३०। तद्दृष्ट्वा महदाश्चर्य्यं गन्धर्वाप्सरसा गणा । ननृतुर्जगुस्तुष्टुबुश्च मुनय सिद्धचारणाः । देवाश्च कुसुमासारैर्ववर्षुर्हर्षमानसाः ।३१। दिवि दुन्दुभयो नेदु प्रसन्नाश्चाभवन्दिश. । तयोर्वधप्रमुदितः कविद्दशसहस्रकान् । साश्वान्महारथान्साक्षाद्दहनद्दिव्यसायकै. प्राज्ञः शतसहस्राणा योधना रणमूर्द्धनि । क्षय निन्ये सुमन्त्रस्तु रथिना पञ्चविंशतिः ।३३। एवमन्ये गार्ग्यभर्ग्यविशालाद्या महारथान् । निजघ्नुः समरे क्रुद्धा निषादानम्लेच्छबर्बरान् ।३४। एव विजित्य तान्सर्व्वान्कल्किर्भूपगणैः सह । शय्याकर्णेन भल्लाटनगरञ्जेतुमाययौ ।३५ः नानावाद्यैर्लोकसङ्घैर्वरास्त्रैर्नानावस्त्रैर्भूषणैर्भूषिताङ्गः नानावहेश्चामरैर्वीज्यमानैर्योतियोद्धु कल्किरत्युग्रसेन ३६ यह देख कर अत्यन्त आश्चर्य मे भरे गंधर्व और अप्सराएं

सप्तम अध्याय-३ ] [ ४१६ नृत्य-गान मे तत्पर हुए तथा देवता, मुनिगण, सिद्धगण और चारणादि प्रसन्न हृदय मे पुष्प बरसाने लगे ।३१। कोक-विकोक का सहार हुआ देख कर कवि ने उत्साह पूर्वक अपने दैत्य शत्रु-पक्ष के दस हजार महा- रथियो को नष्ट कर दिया ।३२। प्राज्ञ के द्वारा एक लाख वीर सैनिको और सुतन्त्रक के द्वारा पच्चीस रथी मृत्यु को प्राप्त हुए ।३३। इसी प्रकार गर्ग्य, भर्ग्य और विशालादि ने भी निषाद, म्लेच्छ और बर्बरो का क्रोध पूर्वक सहार कर दिया ।३४। इस प्रकार विजय को प्राप्त हुए कल्किजी अपनी विशाल सेना के सहित युद्ध के निमित्त आगे बढ़े । उस समय अनेक प्रकार के बाजे बजने लगे । श्रेष्ठ शस्त्रास्त्र धारी वीर उनके साथ-साथ चल रहे थे । अनेक प्रकार के वाहन उस सेना मे आ गये थे । सब ओर से कल्किजी पर चमर ढोरे जा रहे थे ।३५-३६।

तृतीयांश — अष्टम अध्याय सेनागणै परिवृतः कल्किर्नारायण प्रभु । भल्लाटनगर प्रायात्खड्ग् धृक्सप्तिवाहन ।१। स भल्लाटेश्वरो योगी ज्ञात्वा विष्णु जगत्पतिम् । निजसेनागणैः पूर्णो योद्धुकामो हरि ययौ ।२। स हर्षोत्पुलक श्रीमान्दीर्घाङ्गः कृष्णभावन । शशिध्वजो महातेजा गजायुतबलः सुधी ।३। तस्य पत्नी महादेवी विष्णुव्रतपरायणा । सुशान्ता स्वामिन प्राह कल्किना योद्धुमुद्ययम् ।४। नाथ कान्त जगन्नाथ सर्वान्तर्यामिन प्रभुम् । कल्कि नारायण साक्षात्कथं त्वं प्रहरिष्यसि ।५। सुशान्ते परमो धर्म्मः प्रजापतिविनिर्मित । युद्धे प्रहार (सर्वत्र गुरौ शिष्ये हरेरिव ।६। सूत जी बोले — तदनन्तर अपने अश्व पर आरूढ हुए कल्कि जी खडग धारण किये हुए, सेना के सहित भल्लाट नगर मे पहुँचे ।१। योगिराज भल्लाट नरेश ने कल्कि जी को साक्षात् जगदीश्वर विष्णु जाना और वह उनसे युद्ध करने के लिए सेना सहित नगर से बाहर चले ।२। उस समय वह दीर्घाग, श्रीमान्, कृष्ण भक्त, महाबली एव महा तेजस्वी राजा शशि ध्वज हर्ष से पुलकित हो रहे थे ।३। उन राजा की पत्नी विष्णु व्रत-परायणा महादेवी सुशान्ता थी । उसने जब अपने पति को कल्कि जी से युद्ध के लिए जाने को उद्यत देखा तब वह कहने लगी ।४। हे नाथ ! हे स्वामिन् ! कल्कि जी तो साक्षात् जगन्नाथ विष्णु ४२०

अष्टम अध्याय-३ ] [ ४२१ और सर्वान्तर्यामी है। आप उन पर प्रहार कैसे कर सकेंगे ? ।५। शशिध्वज बोले—हे सुशान्ते ! प्रजापति ब्रह्माजी ने जो धर्म निश्चित किया है, उसके अनुसार युद्धेच्छुक गुरु, शिष्य अथवा नारायण ही क्यो न हो, उन सब पर प्रहार करना चाहिए ।६। जीवतो राजभोग स्यान्मृत स्वर्गे प्रमोद्ते । युद्धे जयो वा मृत्युर्वा क्षत्रियाणा सुखावह ।७। देवत्व भूपतित्व वा विषयाविष्टकामिनाम् । उम्पदाना भवेदेव न हरे पादसेविनाम् ।८। त्व सेवकः स चापीशस्त्व निष्काम स चाप्युद्म । युवयोर्युद्धमिलन कथ मोहाद्भविष्यति ।६। द्वन्द्वा तीते यदि द्वन्द्वमोध्वरे सेवके तथा । देहावेशाल्लीलयैव सा सेवा स्यात्तथा मम ।१०। देहावेशादीश्वरस्य कमान्या दंहिका गुण । मायाङ्ग यदि जायन्ते विषयाश्च न कि तथा ।११। ब्रह्मात्रो ब्रह्मतेशस्य शरीरित्वे शरीरिता । सेवकस्याभेददृशस्तेवेव जन्मलयोदयाः ।१२। यदि युद्ध भूमि से सकुशल लोट आवे तो वह अखण्ड राज्य का भोगने वाला होता है और यदि मृत्यु हो जाय तो स्वग की प्राप्ति होती है। इस प्रकार क्षत्रियो के लिये विजय और मरण दोनो मे ही सुख की उपलब्धि है ।७। सुशान्ता ने कहा-हे नाथ ! कामी अथवा विषया- सक्त पुरुषो के लिए ही युद्ध मे विजय अखण्ड राज्य के देने वाली और मृत्यु देवत्व प्रदान करने वाली होती है। परन्तु हरि-चरणो के सैदको को उससे क्या प्रयोजन है ? ।८। आप हरि-सेवक है। वह ईश्वर आप निष्काम को फल प्रदान नही करेगे । तब आप दोनो मे मोह पूर्वक युद्ध कैसे सभव है ? ।६। शशिध्वज बोले—परम पुरुष परमात्मा तो सुख दुःख रूपी सब द्वन्दो से परे है। परन्तु उनके देह धारण कर लेने पर उन ईश्वर और सेवक मे युद्ध होने लगे तो उसे

४२२ ] [ कल्कि पुराण सेवा-स्वरूप विलाप लीला मात्र ही समझना चाहिये ॥१०। ईश्वर के अवतार धारण करने पर कामादि माया अंश रूप दैहिक गुणों का समन्वित होना भी अनिवार्य है । जब कामादि विषयों का आरोपित होना देह-धर्म ही है, तो उनके शरीर मे भी वह क्यो नही व्याप्त होगे ? ।१। पूर्ण ब्रह्मभाव सम्पन्न ईश्वर ब्रह्म कहे जाते है और जब वह शरीर धारण कर लेते हैं तब उन्हें शरीरिता कहते है । सेवक की भेद दृष्टि के लय होने अर्थात् अभेद-ज्ञान की उपलब्धि होने पर उसका जन्म लय और उदय भी उसी प्रकार सम्भव है ।१२ । सेव्यसेवकता विष्णोर्माया सेवेति कीर्त्तिता । द्वैताद्वैतस्य चेष्टैषा त्रिवर्गजनिका सताम् ॥१३। अतोऽहं कल्किना योद्धुं यामि कान्ते स्वसेनया । त्वञ्च पूजय कान्तेऽद्य कमलारतिमीश्वरम् ॥१४। कृतार्थोऽहं त्वया विष्णुसेवासम्मिलितात्मना । स्वामिन्निह परत्रापि वैष्णवी प्रथिता गति ॥१५। इति तस्या वल्गुवाग्भिः प्रणतायाः शशिध्वजः । आत्मानं वैष्णवं मेने साश्रुनेत्रो हरिं स्मरन् ॥१६। तामालिङ्ग्य प्रमुदितः शूरैर्बन्धुभिरावृतः । वहन्नाम स्मरन्नूरुं वैष्णवैर्योद्धुम ययौ ॥१७। गत्वा तु कल्किसेनाया विद्राव्य महती चमूम् । शय्याकर्णाग्रणीर्वीरैः सन्नद्धै रुचितायुधैः ॥१८। सेव्य-सेवक भाव ही सेवा है । यह कार्य विष्णु-माया का ही है । इस द्वैताद्वैत चेष्टा के द्वारा ही सत्कर्मी पुरुष त्रिवर्ग को प्राप्त कर लेते हैं ।१३। हे कान्ते ! यही कारण है कि मैं अपनी सेना के सहित कल्किजी से युद्ध करने के लिए प्रस्थान कर रहा हूँ । हे प्रिये ! इधर तुम कमलापति भगवान् विष्णु का पूजन करो ।१४। सुशान्ता ने कहा— हे नाथ ! आप विष्णु सेवा द्वारा उन्हीं मे लीन हो गये, इससे मैं भी धन्य हो गई हूँ । इहलोक और परलोक मे भगवान् विष्णु की सेवा के

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अष्टम अध्याय ] [ ४२३ अतिरिक्त अन्य कोई गति नही ।१५। सुशान्ता के यह विनम्र वचन सुन कर राजा के नेत्रो मे हर्षाश्रु छा गये और वे अपने को परम वैष्णव मानते हुए भगवान् विष्णु का स्मरण करने लगे ।१६। उन्होने अपनी प्रिय पत्नी को हृदय से लगो लिया और फिर अपने वीर वैष्णव सैनिको के सहित विष्णु नाम का स्मरण करते हुए रण भूमि के लिये चल दिये ।१७। उन्होने कलिक-सेना मे प्रविष्ट होकर उनकी विशाल- सेना को द्रवित कर दिया । उस समय महाबली शय्या कर्णगण आयुधो से सुसज्जित हुए उनसे युद्ध मे तत्पर हुए ।१८। शशिध्वजसुतः श्रीमान्सूर्यकेतुर्महाबल । मरुभूपेन युयुधे वैष्णवो धन्विनां वरः ।१९। तस्यानुजो वृहत्केतुः कान्तः कोकिलनिस्वनः । देवापिना स युयुधे गदायुद्ध विशारदः ।२०। विशाखयूपस्तुभूपस्तु शशिध्वजनृपेण च । रुधिराश्वो धनुर्धारी लघुहस्त प्रतापवान् । रजस्यनेन युयुधे भर्ग्य शान्तेन धन्विना ।२२। शूलै प्रासैर्गदाघातैर्बाणशक्त्यष्टितोमरै । भल्लै खड्गैर्भुशुण्डीभि कुन्तै समभवद्रणः ।२३। पताकाभिर्ध्वजैश्चिष्टमैस्तोमरैश्छत्रचामरै प्रौद्धूतधूलिपटलैरन्धकारो महानभूत ।२४। मह बली, धनुर्धारी एव परम वैष्णव राज-पुत्र सूर्य केतु राजा मरु से युद्ध करने लगा ।१९। सूर्यकेतु का छोटा भाई बृहत्केतु कोकिल के समान मधुरवाणी वाला और अत्यन्त कमनीय होते हुए भी गदा युद्ध मे पार गत था, वह राजा देवापि के साथ संग्राम मे तत्पर हुआ ।२०। हाथियो से सम्पन्न और विविध प्रकार के शस्त्रास्त्रो से सुसज्जित विशाखयूप-नरेश राजा शशिध्वज से युद्ध करने लगे ।२१। लाल अश्व पर आरोहण किये हुए हस्त लाघव सम्पन्न धनुर्धारी एवं प्रतापी भर्ग्य धूलिमयो पृथिवी पर धनुर्धारी शान्त से युद्ध मे भिड गया ।२२। इस

४२४ ] [ कल्कि पुराण

प्रकार रणक्षेत्र मे सब ओर से शूल, प्रास, गदा, बाण, शक्ति, यष्टि, तोमर, भाले, खड्ग, भुशु डी और कुन्त आदि अस्त्र-शस्त्र चलने लगे ।२३। उस समय छत्र, चमर, ध्वजा, पताका आदि की छाया और बहुत धूल उडने से रणभूमि मे अन्धकार छा गया ।२४। गगनेऽजुघना देवा केवा वास न चक्रिरे । गन्धर्वे साधुसन्दभैर्गायन्तैरमृतायनै. ।२५। द्रष्टु समागता, सर्वे लोका, समरमद्भुतम् । शखदुन्दुभिसन्नादैरास्फोटैर्बृं हितैरपि ।।२६ ह्रेषितैर्योधनोत्कृष्टैर्लोकावमूका इभवन् । रथिनो रथिभि साक पदात्राश्च पदातिभि ।।२७।। हया हयैरैभाश्चेभै समरोऽमरदानवै । यथामवत्स तु घनो यमराष्ट्रविवर्द्धन २८।। शशिध्वजचमूनाथै कल्किसेनाधिप सह । निपेतु सैनिका भूमौ छिन्नबाह्वङ्घ्रिकन्धराः ।२६।। धावन्तोऽतिब्रुवन्तश्च विकुर्वन्तोऽसृगुक्षिता । उपर्युपरि सच्छन्ना गजाश्वरथमर्दिताः ।।३०।। गगन मण्डल मे स्थित हुए देवगण इस सग्राम को देख रहे थे । गधर्व भी अमृत-ध्वनि मे गाते हुए उस युद्ध को देखने के लिए आ गये थे ।२५। सभी लोक उम अद्भुत सग्राम को देखने के उद्देश्य से वहाँ आ गये थे । शख और नक्कारे बज रहे थे । परस्पर धौल मारने से, हाथियो की चिघाड से, अश्वो के हिनहिनाने से तथा शस्त्रास्त्रो के टक- राने से जो शब्द निकल रहे थे, उनके मिलने से रणभूमि गूँज रही थी । सभी लोक मूक जैसे लग रहे थे, क्योकि किसी को किसी की बात सुनाई नही देती थी, रथी रथी से, पैदल पैदल से, घुडसवार घुडसवार से भिड रहे थे । देवासुर-सग्राम के समान भीषण यह युद्ध यमराष्ट्र की वृद्धि कर रहा था ।२६-२८ । कल्किजी के सेनापतियो से भिडे हुए शंशिध्वज के सेनापति एवं वीरगण शिर कटा कर पृथिवी पर गिर रहे थे ।२६।

अष्टम अध्याय-३ ] [ ४२५ आहत होकर कोई भाग रहा है, कोई चीत्कार कर रहा है, कोई आर्त्त- नाद कर रहा है, किसी पर रक्त की धार पड रही है, कोई एक-दूसरे से गूँथे हुए ही पृथिवी पर गिर रहे हैं तथा कोई हाथी या अश्व के पावो अथवा रथो के पहियो से ही कुचले जा रहे हैं ।३०। निपेतु प्रधरे वीरा. कोटिकोटिसहस्रशः । भूते सानन्दसन्दोहा. स्रवन्तो रुधिरोदकम् ॥३१॥ उष्णीषहंसा सच्छिन्न गजरोघोरथप्लवा. । करोरुमीनाभरणमसिकाच्छानवालुका ३२ एव प्रवृत्ता सग्रामे नद्य सद्योऽतिदारुणा । सूर्यकेतुस्तु मरुणा सहिनो युयुधे बली ॥३३॥ कालकल्पो दुराधर्षा मरु बाणैरताडयत् । मरुस्तु तत्र दशभिर्मार्गणैर्दर्रदयद्भृशम् ॥३४॥ मरुबाणाहतो वीरा सूर्यकेतुरमर्षित । जघान तुरगान्कोत्पापदोद्धातेन तद्रथम् ॥३५॥ चूर्णयित्वाऽथ तेनापि तस्य वक्षस्यताडयत् । गदाघातेन तेनापि मरुमूर्च्छामवापह ॥३६॥ इस प्रकार, इस युद्ध मे हजारों करोड वीर नाश को प्राप्त हुए । रणक्षेत्र मे रक्त की नदी बह चली । इस नदी के प्रवाह को देख कर भूत-पिशाचादि अत्यन्त आनन्दित हुए ।३१। इम लोहित नदी मे बहती हुई पगडिया सरोबरो मे सुशोभित हस के समान प्रतीत होती थी । उसमें गिरे हुए हाथी ऐसे लगते थे जैसे टापू हो । रथ उसमे नावो के समान तैरने लगे और कटे हुए हाथ-पांव मच्छ जैसे लगने लगे । उसमे गिरे हुए खड्ग ऐसे लगते थे मानो स्वर्णिम रेती चमक रही हो ।३२। इस प्रकार रणक्षेत्र मे यह अत्यन्त दारुण नदी बहने लगी । सूर्यकेतु मरु के साथ युद्ध कर रहा था ।३३। काल के समान विकट सूर्यकेतु के बाणो से मरु आहत हो गये तब मरु ने भी दश बाणो से सूर्यकेतु को आहत कर दिया ।३४। मरु के बाणो से आहत हुए सूर्यकेतु ने मरु के सभी अश्व