कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
४२६ ] कल्कि पुराण मार डाले और पदाघात से रथ तोड डाला । फिर मरु के हृदय पर भीषण गदाघात किया, जिससे वह मूच्छित होकर पृथिवी पर गिर पडे ।३५-३६। सारथिस्तमपोवाह रथेनान्येन धर्म्मवित् । बृहत्केतुश्च देवापि बाणै प्राच्छादयद्बली ॥३७॥ धनुर्विकृष्य तरसा नीहारेण यथा रविम् । स तु बाणमय वर्षं परिवार्य्य निजायुधै ॥३८॥ बृहत्केतुं दृढ जघ्ने कङ्क पत्रै शिलाशितै. । भिन्न शूलमथालोक्य धनुर्गृह्य पत्रिभि ॥३६॥ शितधारै स्वर्ण पुखैर्गाद्ध्र्पत्रैरयोमुखै । देवापिमाश्रुगैर्जघ्ने बृहत्केतु ससैनिकम् ॥४०॥ देवापिस्तद्धनुर्दिव्य चिच्छेद निशितै शरै । छिन्नधन्वा बृहत्केतु खड गपाणिजिघासया ॥४१॥ तब मरु का धर्मवित् सारथि उन्हे उठा कर अन्य रथमे ले गया । उधर महाबली बृहत्केतु ने देवापि पर बाण-वर्षा की ।३७। जैसे सूर्य कुहरे से आच्छादित हो जाता है, वैसे ही बाणो से आच्छादित देवापि ने तुरन्त धनुष लेकर शत्रु की बाण वर्षा को अपनी बाण वर्षा से काट दिया ।३८। बृहत्केतु ने शान चढे हुए बाणो से अपने शूल को भी नष्ट हुआ देख कर पुन; धनुष उठाया और उस पर स्वर्ण जटित, गृद्ध पख के समान तथा लोह-मुख वाले तीक्ष्ण बाण चढा कर देवापि पर सैन्य सहित भीषण प्रहार किये । ३६-४०। परन्तु बृहत्केतु के उस दिव्य धनुष को देवापि ने अपने तीक्ष्ण बाणो से काट दिया । तब देवापि को मारने के विचार से वृहत्केतु ने हाथ मे खड्ग ग्रहण किया ।४१। देवापे: सारथि साश्व जघ्ने शूरो महामृधे । स देवापिर्धनुस्त्यक्त्वा तलेनाहत्य त रिपुम् ॥४२॥ भुजयोरन्तरानीय निष्पिपेष स निर्दय: । तं द्वयष्टवर्ण निष्क्रान्तं मूच्छितं शत्रुणुर्दितम् ॥४३॥
अष्टम अध्याय ] [ ४२७ अनुजं वीक्ष्य देवापिमूर्ध्नि सूर्यध्वजोऽवधीत् । मुष्टिना वज्रपातेन सोऽपतन्मूर्च्छितो भुवि । मूच्छितस्थं रिपुं क्रोधासेनागणमताडयत ॥४४॥ शशिध्वज सर्वजगन्निवास कल्कि पुरस्तादभिसूर्यवर्चसम् श्याम पिशङ्गाम्बरमम्बुजेक्षणं । वृहद्भुजं चारुकिरीटभूषितम् ॥४५॥ नानामणिवातचिताङ्गशोभया निरस्तलोकेक्षणहृत्तमोमयम् विशाखयू पादिभिरावृतं प्रभु ददर्श धर्मेण कृतेन पूजितम् ॥४६ फिर उस घोर युद्ध मे बृहत्केतु ने देवापि के घोड़ो और सारथि को मार डाला । तब देवापि ने भी धनुष छोड कर शत्रु पर हथेली का प्रहार किया ।४२। फिर उसे दोनो भुजाओ मे दबा कर मर्दन करने लगा । उस समय अट्ठाईस वर्षीय वह राजपुत्र बृहत्केतु पीडित होता हुआ मूच्छित हो गया ।४३। अपने छोटे भाई की ऐसी दशा देखकर सूर्यकेतु ने देवापि के मस्तक पर वज्र के समान मुष्टिका-प्रहार किया, इससे देवापि मूच्छित होकर गिर पडा । तब शत्रु को मूच्छित जान कर सूर्यकेतु उसकी सेना पर प्रहार करने लगा ।४४। इधर राजा शशिध्वज ने उस रणक्षेत्र में सूर्यके समान तेजोमय, विश्वाधार, कमलाक्ष, पीताम्बर धारी, विशाल भुजा वाले और सुरम्य किरीट से सुशोभित कल्किजी को अपने सामने देखा ।४५। अनेक मणियो से सुसज्जित अङ्ग वाले, प्राणियो के नेत्रो और हृदयोँ के अन्धकार को नष्ट करने वाले कल्किजी के सब ओर विशालयूप नरेश जैसे अनेक राजागण नत-मस्तक खडे हैं तथा सत्य और धर्म उनका पूजन कर रहे हैं ।४६। •••
तृतीयांश— नवम अध्याय हृदि ध्यानास्पद रूपं कल्केर्दृष्ट्वा शशिध्वजः । पूर्णं खड्गधरं चारुतुरगारूढमब्रवीत् ॥१॥ धनुर्बाणधरं चारु-विभूषणावरोङ्कतम् । पापतापविनाशार्थमुद्यतं जगतां परम् ॥२॥ प्राह तं परमात्मानं हृष्टरोमा शशिध्वजः । एह्येहि पुण्डरीकाक्ष ! प्रहारं कुरु मे हृदि ॥३॥ अथवात्मन् बाणभिया तमोऽन्धे हृदि मे विश । निर्गुणस्य गुणज्ञत्वमद्वैतस्यास्त्रताडनम् ॥४॥ निष्कामस्य जयोद्योगसहायं यस्य सैनिकम् । लोकाः पश्यन्तु युद्धे मे द्वैरथे परमात्मनः ॥५॥ परबुद्धिर्यदि दृढा प्रहर्त्ता विभवे त्वयि । शिवविष्णोर्भेदकृते लोकं यास्यामि सयुगे ॥६॥ सूतजी ने कहा—हे ऋषियो ! कल्किजी का हृदय में ध्यान के योग्य, सुन्दर, खड्गधारी एवं तुरंगारूढ पूर्ण स्वरूप देख कर शशि- ध्वज ने विचार किया।१। धनुर्बाणधारी सुन्दर आभूषणों से विभूषित जगदीश्वर भगवान् कल्कि का अवतार संसार के पाप-ताप के निवारणार्थ हुआ है ।२। राजा शशिध्वज ने पुलकित शरीर से परब्रह्म कल्किजी के प्रति निवेदन किया—हे पुण्डरीकाक्ष ! आइये, मेरे हृदय पर प्रहार कीजिये ।३। हे परमात्मन् ! मेरे बाणों की मार से बचने के लिए मेरे तमाच्छादित हृदय में आकर छिप जाओ । जो निर्गुण होकर भी गुणों के ज्ञाता हैं, जो अद्वैत होकर भी अस्त्र प्रहार में तत्पर हैं तथा जो निष्काम होकर भी विजय की इच्छा से सैन्य-संहार कर रहे हैं मैं उन्हीं
नवम-अध्याय ] ४२६ भगवान् के साथ द्वैरथ युद्ध मे तत्पर हो रहा हूँ। सभी लोक इसका अवलोकन करें। ४-५। मैं आप विभु पर प्रहार करूँगा। परन्तु प्रहार करते समय भी यदि मैं आपको ब्रह्म से भिन्न समझने लगूँ तो शिव और विष्णु मे भेद जानने वाले को जिस लोक की प्राप्ति होती है, मुझे उसी लोक की प्राप्ति हो ।६। इति राज्ञो वच श्रुत्वा अक्रोध. क्रुद्धवद्दिभुः । बाणैस्ताडयतस्तस्य धृतायुधमरिन्दमम् ॥७॥ शशिध्वजरतत्प्रहारमगणय्य वरायुधैः । तं जघ्ने बाणवर्षेण धाराभिरिव पर्वतम् ॥८॥ तद्बाणवर्षभिन्नान्तः कल्क परमकोपनः । दिव्यै शस्त्रास्त्रसघातैस्तयोर्युद्धमवर्त्तत ॥६॥ ब्रह्मास्त्रस्य च ब्रह्मास्त्रं वायव्यस्य च पार्वतै. । आग्नेयस्य च पार्जन्यै. पन्नगस्य च गारुडै ॥१०॥ एव नानाविधैरस्त्रै रन्योन्यमभिजघ्नतुः । लोका; सपाला सत्रस्ता युगान्तमिव मेनिरे ॥११॥ देवा बाणाग्निसत्रस्ता अगमन्खगमाः किल । ततोऽतिवितथोद्योगो वासुदेवशशिध्वजौ ॥१२॥ निरस्त्रौ बाहुयुद्धेन युयुधाते परस्परम् । पदाघातैस्तलाघातैर्मुष्टिप्रहर णैस्तथा ॥१३॥ राजा के इन वचनो को सुन कर क्रोध से परे कल्किजी क्रोधित हो उठे । यह देख कर आयुधधारी एव अरिमर्दन राजा शशिध्वज न उन पर बाण-प्रहार प्रारम्भ किया ।७। जब राजा ने अपने उस प्रहार को निष्फल हुआ देखा तो वह पर्वत पर वर्षणशील मेघ के समान घोर बाणो की वर्षा करने लगे ।८। उस बाण-वर्षा से कल्किजी का शरीर आहत हो गया । तब वे अत्यन्त क्रोध करके आगे बढे । इस प्रकार दोनो मे घोर युद्ध होने लगा ।६। ब्रह्मास्त्र के द्वारा ब्रह्मास्त्र काटने लगे । पार्वतास्त्र से वायव्यास्त्र, मेघास्त्र से आग्नेयास्त्र और गारुडास्त्र से
सर्पास्त्र नष्ट होने लगे ।१०। इस प्रकार विविध भाँति के दिव्यास्त्रो के द्वारा वे दोनो भीषण प्रहारमे तन्मय थे । इसमे लोक और लोकपाल सभी यह समझते हुए कि कही आज ही प्रलय न हो जाय, अत्यन्त भयभीत हुए ।११। बाणाग्नि का देख कर युद्ध देखने के लिए गगन मण्डल मे एकत्र हुए देवता भयभीत हो गये । दिव्यास्त्रो को व्यथ हुए देख कर कल्किजी और राजा शशिध्वज दोनो बाहु युद्ध के निमित्त अस्त्र त्याग कर उतर पडे । फिर पदाघात, करतलाघात और मुष्टिका-प्रहार से युद्ध होने लगा ।१२-१३ । नियुद्धकुशलो वारौ मुमुदाते परस्परम् । वराहोद्धूनशब्देन त तलेनाहनद्धरिः ।१४। स मूर्च्छितो नृपः कोपात्समुत्थाय च तत्क्षणात् । मुष्टिभ्या वज्रकल्पाभ्यामवध त्कल्कि मोजसा । स कल्किस्तत्प्रहारेण पपात भुवि मूर्च्छित ।।१५।। धर्म्म. कृतञ्च तं दृष्ट्वा मूर्च्छित जगदीश्वरम् । समागतौ तमानेतु कक्षौ तौ जगृहे नृप ।।१३।। कल्कि वक्षस्युपादाय लब्धार्त्त प्रययौ गृहम् । युद्धेन नृपाणामन्येषा पुत्रौ दृष्ट्व सुदुर्ज्जयौ ।।१७।। दोनो ही रणविद्या मे अत्यन्त कुशल थे और परस्पर एक दूसरे के कौशल को देखते हुए प्रसन्न हो रहे थे । सृष्टि के आरम्भ मे पृथिवी का उद्धार करने के लिए वाराह भगवान् ने जैसा शब्द किया था, कल्किजी द्वारा किये गये करतलाघात से वैसा ही भीषण शब्द हुआ ।१। उस आघात से राजा शशिध्वज मूर्च्छा को प्राप्त हो गए ॰ फिर तुरन्त ही सचेत होकर उन्होने कल्किजी पर वज्र के समान मुष्टि प्रहार किया, जिससे कल्किजी अचेत होकर पृथिवी पर लेट गये ।१५। तब जगत्पति कल्किजी को मूर्च्छित देख कर धर्म और सत्युग, वहाँ आकर उन्हे ले जाने लगे । परन्तु राजा शशिध्वज ने उन दोनो को कांख मे दबा लिया ।१६। और कल्किजी को अङ्क मे उठा कर कृत कृत्य होते हुए
नवम अध्याय ] [ ४३१ उन्हे अपने घर ले गये और सोचने लगे कि मेरे दोनो पुत्रो को भी युद्ध मे कोई राजा जीत नही सकता है ।१७। कल्कि सुराधिपपति पृधने विजित्य धर्म्म कृतञ्च । निजकक्षयुगे निधाय । हर्षोल्लसद्धृदय उत्पुलक । प्रमाथी गत्वा गृह हरिगृहे ददृशे सुशान्ताम् ॥१८॥ दृष्ट्वा तस्या. सुललितमुख वैष्णवीनाञ्च मध्ये गायन्तीना हरिगुणकथारतामथ प्राह राजा । देवानाना विनयवचसा शम्भले जन्मनावा । विद्यालाभ परिणयविधि म्लेच्छपाषण्डनाशम् ॥१६॥ कल्किः स्वय हृदि समायमिहागोऽद्धा मूर्च्छिच्छ- लेन तव सेवनीक्षणार्थम् । धर्म्म कृतञ्च मम कक्षा- युगे सुशान्ते ! कान्ते विलोकय समर्च्यय सविधेहि ॥२०॥ इति नृपवचसाविनोदपूर्णा हरिकृत धम्म युत प्रणम्य नाथम् सह निजसखिभिनंनर्त्त रामा हरिगुणकीर्त्तनवर्त्तना विलज्जा। इस प्रकार देवराज इन्द्र के भी स्वामी कल्किजी को हरा कर और धर्म तथा सत्युग को काँख दवा कर राजा शशिध्वज प्रसन्न हृदय से सेनाओ का मर्दन करता हुआ अपने घर को गया और वहाँ उसने अपनी भार्या सुशान्ता को विष्णु मन्दिर मे स्थित पाया ।१८। उसके चारो ओर वैष्णवी नारियां बैठ कर विष्णु-गुण-गान में तन्मय थी । राजा ने सुशान्ता का सुन्दर मुख देखते हुए कहा—हे सुशान्ते ! देवताओ की प्रार्थना पर जो शम्बल ग्राम मे अवतीर्ण हुए हैं और जिन्होने विद्या प्राप्त कर म्लेच्छो और पाखण्डियो को नष्ट कर दिया है, वही हृदयो मे विहार करने वाले कल्कि भगवान अपनी माया द्वारा मूर्च्छा रूपी छल से आवृत होकर तुम्हारी शक्ति की परीक्षा लेने के निमित्त यहाँ पधारे हैं । मेरी काँखो मे यह धर्म और सत्युग दोनो दबे हुए है, तुम इनका पूजन करो ।१६-२०। राजा के यह विनोदपूर्ण वचन सुन कर रानी बडी प्रसन्न हुई और धर्म तथा सत्युग के सहित कल्किजी को उसने प्रणाम किया । फिर लज्जा को छोड कर सखियो के सहित हरि नाम संकीर्त्तन और नृत्य करने मे तत्पर हुई ।२१।
तृतीयांश — दशम अध्याय जयहरेऽमराधीशसेवित तव पदाम्बुज । भूरिभूषणम् कुरु ममाग्रतः साधुसत्कृत त्यज महामते । मोहमात्मनः ।।१।। तव वपुर्जगद्रूपसम्पदा विरचितं सता मानसे स्थितम् । रतिपतेर्मनोमोहदायक कुरु विचेष्टित कामलम्पटम् ।।२।। तव यशो जगच्छोकनाशन मृदुकथामृतप्रीतिदायकम् । स्मितसुधोक्षित चन्द्रवन्मुख तवकरोत्वल लोकमङ्गलम् ।।३।। मम पतिस्त्वय सर्वदुर्जयो यदि तवाप्रिय कर्मणाचरेत् । जहि तदात्मनः शत्रुमुद्यत कुरु कृपा न चेदोटगीश्वर ।।४।। महदहयुत पञ्चमात्रया प्रकृतिजायया निर्मिंत वपु । तव निरीक्षणल्लीलया जगत्स्थितिलयोदयं ब्रह्मकल्पितम् ।५। सुशान्ता बोली—हे हरे ! आपकी जय हो । महामते ! अब आप अपने इस महोच्छन्न भाव को त्याग कर इन्द्र से भी सेवित, सुन्दर आभूषणों से विभूषित तथा साधुओ के द्वारा सत्कारित अपने चरणारविन्द मेरे समक्ष कीजिये ।१। जगत् की श्रेष्ठ सम्पदा से विर- चित तथा साधुओ के हृदय मे विद्यमान रहने वाला आपका यह देह कामदेव को भी मोहित करने वाला है । अब आप हमारी कामना पूर्ण कीजिये ।२। आपके यशगान से जगत् के शोक नष्ट होते हैं, आपके मुस्कान सुधा सम्पन्न चन्द्र वदन से निकली हुई मधुर वाणी सब को प्रसन्न करती है । हे प्रभो ! आपका यह मुख लोककल्याण के करने
दशम अध्याय ] [ ४३३ वाला है ।३। मेरे सर्व दुर्जेय पति के द्वारा यदि आपका कोई अपराध बन पडा हो तो भी इनके प्रति शत्रु-भाव न रख कर इन पर कृपा करिये, अन्यथा कोई आपको कृपामय ईश्वर नही कहेगा ।४। आपकी पत्नी प्रकृति महत्तत्व, अहकार और पचतन्मात्र के द्वारा देह रचती है । आपके ही निरीक्षण में लीला से ही ब्रह्म कल्पित विश्व में सृष्टि, स्थिति और लय का क्रम चलता है ।५। भूविष्न्मरुद्वारितेजसा राशिभिः शरीरेन्द्रियाश्रितैः ॥ त्रिगुणया स्वया मायया विभो कुरु कृपा भवत्सेवनाथिनाम् तव गुणालय नाम पावन कलिमलापह कीर्तयन्ति ये । भवभयक्षय तापनाशिनो मुहुरहो जनाः ससरन्ति नो । ।७।। तव जन्म सतां मानवर्द्धनं निजकुलक्षय देवपालकम् । कृतयुगार्पकं धर्म्मपूरकं कलिकुलान्तक शन्तनोतु मे ।।८।। मम गृहं पतिपुत्रनप्तृक गजरथैर्ध्वजैश्चामरैर्धनै । मणिवरासनसत्कृतिं विना तवा पदाम्बजयोः शोभयन्ति किम् तव जगद्वपुः सुन्दरम्मिन मुखमनिन्दितं सुन्दरारवम् । यदि नमे प्रिय वल्गुचेष्टिते परिकरोत्यहो मृत्युरस्तिवह ।।१०।। हे देव ! पृथिवी, जल, तेज, वायु और आकाश तत्व से युक्त यह पच भूतात्मक शरीर इन्द्रियो के आश्रित रहते हैं। अपनी त्रिगुणा- त्मिका माया से अपने भक्तो पर कृपा कीजिये ।६। हे प्रभो ! आपके नाम गुण-कीर्तन से कलियुग के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं । आपका वह नाम अनन्त गुणो से युक्त और भवभय का नाश करने वाला है, जो ससार ताप से पीडित प्राणी उसका स्मरण करते हैं, उनका जन्म- मरण रूप बधन कट जाता है ।७। आपका यह अवतार साधुओ का मान बर्द्धक, कलिकुल नाशक, देवताओ का पालक, धर्म पूरक तथा सत्युग का पुनः स्थापक है । आपके इस अवतार से हमारा कल्याण हो ।८। मेरे घर मे पति, पुत्र, पौत्र, गज, रथ, ध्वज, चमर, धन और मणि जटिल श्रेष्ठ आसनादि सब कुछ वर्तमान हैं। परन्तु आपके
तृतीय अंश: अध्याय १-३ (सत्ययुग पुनर्स्थापना व सूर्य-चन्द्रवंश वर्णन)
४३४ ] [ कल्कि पुराण चरणारविन्दो के पूजन किये बिना उनकी शोभा नही हो सकती ।६। हे जगद्रूप ! सुन्दर मुस्कान से सुशोभित, मधुर वाणी से विभूषित, सुरम्य चेष्टा से युक्त आपका यह मुख यदि हमारा प्रिय नही करना चाहेगा तो हमारी तत्काल मृत्यु ही हो जायगी ।१०। हयचरभयहरकरहरशरणाखरतरवरदशबलमदन । जयहतपरभरभवरणनशनशशधरशतसमरसभरवदन ।।११।। इति तस्याः सुशान्ताया गीतेन परितोषित । उत्तस्थौ रणशय्याया. कलिर्युद्धस्थवीरवत् ।।१२।। सुशान्ता पुरतो दृष्ट्वा कृत वामे तु दक्षिणे । धर्मं शशिध्वज पश्चात्प्राहोऽति व्रीडितानन ।।१३।। का त्व पद्मपलाशाक्षि ! मम सेवार्थमुद्यता । कान्ते शशिध्वज. शूरो मम पश्चादुपस्थित ।।१४।। हे धर्म्म ! हे कृतयुग ! कथमत्रागता वयम् । रणाङ्गण विहायास्याः शत्रोरन्त पुरे वद ।।१५।। आप अश्वारोही सब को अभय देते हुए विचरते हैं ? आपके तीक्ष्ण बाणो के प्रहार से जो वीर पुरुष युद्ध मे मृत्यु को प्राप्त होते हैं, उनका आप ही प्रतिपालन करते हैं । आपके मुख मण्डल पर सैकडो चन्द्रमाओ की आभा चमकती है । शिव और ब्रह्मा भी सदा आपके आश्रय की याचना करते रहते हैं ।११। सुशान्ता द्वारा किये गये इस प्रकार के विनय-गान से सन्तुष्ट होकर कलिजी उसी प्रकार उठ पडे, जिस प्रकार रणक्षेत्र मे मूर्च्छित वीर उठ जाता है ।१२। उन्होने अपने सामने रानी शान्ता को, वाम पार्श्व मे सत्युग और दक्षिण पार्श्व मै धर्म को और अपने पीछे राजा शशिध्वज को खडे देखा तो लज्जा से मुख नीचा करके बोले ।१३। हे कमलपत्र जैसे नेत्र वाली ! तुम कौन हो और मेरी सेवा में क्यों तत्पर हुई हो ? यह बलवान् राजा शशिध्वज मेरे पीछे क्यो उपस्थित है ? ।१४। हे धर्म ! हे सत्युग ! हम युद्ध क्षेत्र
दशम अध्याय ] ४३५ को छोड़ कर शत्रु के अन्तःपुर मे क्यो आ गये यह ? सब मुझे बताओ ।१५। शत्रुपत्न्य कथं साधु सेवन्ते मामरिं मुदा । शशिध्वज, शूरमानी मूर्च्छित हन्ति नो कथम् ॥१६॥ पाताले दिवि भूमौवा नरनागसुराऽसुराः । नारायणस्य ते कल्के केवा सेवा न कुर्वते ॥१७॥ यत्सेवकाना जगता मित्राणा दर्शनादपि । निवर्तन्ते शत्रुभावस्तस्य साक्षात्कृतो रिपुः ॥१८ त्वया सार्द्धं मम पतिः शत्रुभावेन संयुगे । यदि योग्यस्तदानेतुं कि समर्थो निजालयम् ॥१९॥ तत दासो मम स्वामी अह दासी निजा तव । आवयो. सप्रसादाय आगतोऽसि महाभुज ॥२०॥ मुझे शत्रु की यह शत्रु-पत्नियाँ प्रसन्न होती हुई क्यो परिचर्या कर रही हैं ? जब मैं मूर्च्छित हो गया था, तब इन शूर एव मानी राजा शशिध्वज ने मेरा सहार क्यो नही कर दिया ? ।१६। रानी बोली- पाताल, स्वर्ग अथवा पृथिवी पर, नाग, सुर और असुर मे ऐसा कौन है जो भगवान् कल्कि की सेवा नही करता ? ।१७। संसार जिनका सेवक और मित्र है तथा जिनके दर्शन मात्र से शत्रु भाव नष्ट हो जाता है, क्या उनका कोई प्रत्यक्ष रूप से कभी शत्रु हो सकता है ? ।१८। मेरे पति यदि आपके प्रति शत्रु-भाव रख कर आपसे युद्ध करते तो क्या वह आपको अपने घर मे इस प्रकार ले आते ? ।१९। हे महाभुज ! मेरे पति आपके दास हैं, इसलिए मैं भी आपकी दासी हूँ । इस प्रकार हम पर प्रसन्न होकर ही आप स्वयं यहाँ पधारे हैं ।२०। अह तवैतयोर्भक्तया नामरूपानुकीर्तनात् । कृतार्थोऽस्मि कृतार्थोऽस्मि कलिकेव ॥२१॥ अधुनाह कृतयुग तव दासस्य दर्शनात् । त्वमोध्वरो जगत्पूज्यसेवकस्यास्य तेजसा ॥२२॥
४३६ ] [ कल्कि पुराण दण्डय मा दण्डय विभो योद्धृन्त्वादुद्यतायुधम् । येन कामादिरागेणत्वय्यात्मन्यपि वैरिना ॥२३॥ इति कल्किर्वचस्तेषा निशम्य हसितानन । त्वया जितोऽस्मीति नृप पुन पुनरुवाच ह ॥२४॥ ततः शशिध्वजो राज युद्धादाहूय पुत्रकान् । सुशान्ताया मति बुद्ध्वा रमा प्रादात्सकल्कये ॥२५॥ धर्म ने कहा — हे कलि का नाश करने वाले कल्किजी ! यह राजा-रानी दम्पति जिस प्रकार आपकी भक्ति करते हुए आपका नाम- संकीर्त्तन एव स्तोत्र करते है, उसे देख कर मैं कृतार्थ हो गया— कृतार्थ हो गया ।२१। सत्युग बोला — हे प्रभो ! आज आपके इस सेवक का दर्शन पाकर तो अवश्य ही मेरा सत्युग नाम यथार्थ हो गया । इस सेवक ने अपने तेज से आपको भी जगत्पूज्यत्व और ईश्वरत्व से परिपूर्ण कर दिया ।२२। राजा शशिध्वज बोले — हे जगदीश्वर ! मैने काम क्रोध आदि विषयो के वशीभूत होकर ही आप ईश्वर एव साक्षात् अपने आत्मा के प्रति शत्रुता करके आपके देह पर अस्त्र प्रहार किया है ।२३। राजा के वचन सुन कर कल्किजी ने मुसकराते हुए बारम्बार कहा— हे राजन् ! आपने मुझे सब प्रकार जीत लिया है ।२४। इसके पश्चात् राजा शशिध्वज ने रणभूमि से अपने पुत्रो को वापिस बुला लिया और फिर रानी सुशान्ता की प्रेरणा से अपनी रमा नाम की कन्या कल्किजी को प्रदान कर दी ।२५। तदैत्य मरुदेवापी शंशिध्वजसमाहृतौ । विशाखयूपभूपश्च रुधिराश्वश्च संयुगात् ॥२६॥ श्याकशांनृपेणापि भल्लाटं पुरमाययुः । सेनागणैरसंख्यातैः सा पुरी मर्दिताभवत् ॥२७॥ गजाश्वरथसबाधैः पत्तिच्छत्ररथध्वजैः । कल्किनापि रमायाश्च विवाहोत्सवसम्पदाम् ॥२८!
दशम-अध्याय ] ४३७ द्रष्टु समीयुस्त्वरिता हर्षात्सबलबाहनाः । शंखभेरी मृदङ्गाना वादित्राणाञ्च निस्वनैः ॥२६॥ नृत्यगीतविधानैश्च पुरस्त्रीकृतमङ्गलैः । विवाहो रमयाकल्केरभूदतिसुखावहः ।३०। उस अवसर पर मरु, देवापि, विशाखयूपनरेश और रुचिरारव आदि सभी कल्कि-पक्ष के राजागण शशिध्वज द्वारा आमन्त्रित किये गये । वे सब राजा शय्याकरण को साथ लेकर रणभूमि से भल्लाट नगरी मे आ पहुँचे । उस समय असंख्य कल्कि-सेना के पाँवो से वह नगरी मर्दित्ता हो गई। २६-२७। गज, अश्व, रथ, पदाति, छत्र और रथ की ध्वजाएँ आदि सभी से सुशोभित विवाह मण्डप मे कल्किजी और रमा का विवाहोत्सव सम्पन्न हुआ ।२८। हर्ष से प्रफुल्लित हुए सभी व्यक्ति अपने दल बल और वाहनो के सहित उस उत्सव को देखने के लिए वहाँ आये । राजकुमारी रमा का विवाह शंख, भेरी, मृदंग आदि वाद्यो की सुमधुर ध्वनि और पुर-नारियो के श्रेष्ठ मङ्गलाचारो तथा नृत्य-गीतादि के सानन्द सम्पन्न हुआ । २६-३०। नृपा नानाविधैर्भोज्यै पूजिता विविशु सभाम् । ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्या शूद्राश्चावरजातयः ॥३१॥ विचित्रभोगाभरणाः कल्कि द्रष्टुमुपाविशन् । तस्या सभाया शुशुभे कल्कि कममलोचनः ॥३२॥ नक्षत्रगणमध्यस्थ पूर्ण शशधरो यथा । रेजे राजगणाधीशो लोकान्सर्वाग्विमोहयन् ।६६। रमापति कल्किमवेक्ष्य भूप सभागत पद्मदलायतेक्षणम् । जामातर भक्तियुतेन कर्मणा विबुध्य मध्ये निषसाद तत्रह ।३४ विविध प्रकार भोज्य एव पान-पदार्थों से सत्कार प्राप्त करते हुए राजागण सभा मे प्रविष्ट हुए । ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्रीदि
४३८ ] कल्कि पुराण सभी वर्ण के लोग अद्भुत आभूषणो और विविध प्रकार की भोग- सामग्रियो को प्राप्त करके उस सभा मे सुशोभित कल्किजी के सब ओर बैठ कर शोभा को प्राप्त होने लगे ।३१-३२। जैसे तारागण के मध्य पूर्ण चन्द्र की अत्यन्त शोभा होती है, वैसे ही सब लोगो के मध्य मे सुशोभित राजाओ के भी स्वामी कल्किजी सब लोको को मोहित करने लगे ।३३। पद्म पलाश जैसे नेत्र वाले कल्किजी ने सभा मे उपस्थित राजाओ आदि के समक्ष रमा का पाणिग्रहण किया। उस समय राजा शशिध्वज भी कल्किजी को जामाता-भाव से देखते हुए भक्ति-युक्त हृदय से सभा मे अत्यन्त शोभा को प्राप्त हुए ।३४।
तृतीयांश— एकादश अध्याय तत्राहूस्ते सभामध्ये वैष्णव त शशिध्वजम् । मुनिभि कथिताशेष-भक्तिव्यासक्तविग्रहम् ॥१॥ सुशान्ताञ्च कृतेनापि धर्मेण विधिद्युताम् । २॥ युंवा नारायणास्यास्य कल्केः श्वशुरता गतौ । वय नृपा इमे लोका ऋषयो ब्राह्मणाश्च ये ॥३॥ प्रेक्ष्य भक्तिवितान वा हरौ विस्मितमानसा. । पृच्छामस्त्वामिय भक्ति क्व लब्धा परमात्मनः ॥४॥ कस्य वा शिक्षिता राजन् ! किंवा नैसर्गिकी तव । श्रोतुमिच्छामहे राजन् ! त्रिजगज्जतपावतीम् । कथा भागवती त्वत्तः संसाराश्रमनाशिनीम् ॥५॥ सूतजी ने कहा—मुनियो के द्वारा अशेष कहे गए भक्तिमय देह वाले, विष्णु भक्त, धर्म और सत्युग के साथ स्थित एव रानी सुशान्ता के सहित शोभायमान् राजा शशिध्वज की ओर देखते हुए आगत राजा आदि व्यक्तियो ने कहा। १-२। राजागण बोले—अब आप साक्षात् नारायण के अवतार भगवान् कल्कि के श्वसुर-पद को प्राप्त हुए हैं। परन्तु हम सब राजागण, ऋषिगण और विप्रगण तथा अन्यान्य सभी उपस्थितजन आपकी भक्ति को ऐसे विस्तृत रूप मे देख कर अत्यन्त आश्चर्य को प्राप्त हुए हैं। हम आपसे यह पूछते है कि परमात्मा की ४३६
४४० ] [ कल्कि-पुराण यह शक्ति आपको किस प्रकार उपलब्ध हो सकी ? ।३४। हे राजन् ! इस भक्ति की क्या आपने किसी से शिक्षा प्राप्त की है ? अथवा यह भक्ति आप मे स्वाभाविक रूप से ही उत्पन्न हो गई है ? हे राजन् ! आपकी इस भगवद्भक्ति का कारण सुनने की हमे जिज्ञासा है। क्योकि भगवद्भक्ति की यह कथा ससार के आवागमन को नाश करने वाली है ।५। स्त्रीपुंसोवयोरेस्तत्तच्छृणुतामोघविक्रमा । वृत्तं यज्जन्मकर्मादि स्मृति तद्भक्तिलक्षणम् ॥६॥ पुरा युगसहस्रान्ते गृध्रोऽह पूतिमासभुक् । गृध्रीय मे प्रियारख्ये कृतनीडो वनस्पतौ ॥७॥ चचार काम सर्वत्र वनोपवनसकुले । मृताना पूतिमांसौधै प्राणिना वृत्तिकल्पकौ ॥८॥ एकादा लुब्धक क्रूरो लुलोभ पिशिताशिनौ । आवा वीक्ष्य गृहे पुष्ट गृध्र तत्राप्ययोजयत् ॥६॥ त वीक्ष्य जातविश्रम्भौ क्षुधया परिपीडितौ । स्त्रीपु सौ पतितौ तत्र मासलोभितचेतसौ ॥१०॥ इस पर राजा शशिध्वज बोले—हे राजाओ ! हम दोनो पति- पत्नी के जो जन्म, कर्म आदि हैं तथा जिस प्रकार हम को भगवद्भक्ति का स्मरण हुआ, वह सब आप सुनिये ।६। एक सहस्र युग पहले की बात है—मैं मांसाहारी गृद्ध था और मेरी यह प्रिया सुशान्ता मेरी पत्नी गृद्धिनी थी । हम दोनो एक विशाल वृक्ष पर नीड बना कर उसमे रहते थे ।७। वन-उपवन आदि स्थानो मे हमारी इच्छानुसार अबाध गति थी । उस समय हम मरे हुए प्राणियो के दुर्गंधित मांस से अपना जीवन-निर्वाह किया करते थे ।८। एक दिन एक क्रूर व्याध ने हमे देख लिया और लोभवश हमे पकडने के लिए उसने अपने पालित गृद्ध को हमारे समक्ष छोड दिया ।६। मैं क्षुधा से व्याकुल था, तभी मैने उसे देखा मांस के लोभ से हम स्त्री-पुरुष दोनो ही उस पर झपट पडे ।१०। बद्धावावां वीक्ष्य तदा हर्षादागत्य लुब्धकः । जग्राह कण्ठे तरसा चञ्च्वाघातात्पीडित ॥११॥
एकादश अध्याय ] [ ४४१ आवां गृहीत्वा गण्डक्याः शिलायां सलिलान्ति के । मस्तिष्कं चूर्णयामास लुब्धकः पिशिताशनः ॥१२॥ चक्राङ्कितशिलागङ्गामरणादपि तत्क्षणात् । ज्योतिर्मयविमानेन सद्यो भूत्वा चतुर्भुजौ ॥१३ प्राप्तौ वैकुण्ठनिलयं सर्वलोकनस्कृतम् । तत्र स्थित्वा युगशतं ब्रह्मणो लोकमागतौ ॥१४॥ ब्रह्मलोके पञ्चशतं युगानामुपभुज्य वै । देवलोके कालवशाद्गतं युगचतुःशतम् ॥१५॥ व्याध ने हम दोनो को अपने जाल मे बँधा हुआ देखा तो वह प्रसन्न होता हुआ शीघ्रता से हमारे पास आया और उसने हमारे कण्ठ पकड लिये । तब हम भी उस पर अपनी चोचो से आघात करने लगे ।११ तदनन्तर मांस के लोभी उस व्याध ने हम दोनो को पकड कर गण्डकी में स्थिति एक शिला पर पछाड-पछाड कर हमारे मस्तको को चूर्ण कर डाला ।१२। गङ्गा का किनारा और चक्राङ्कित शिला— मरण काल् मे इन दोनो क ।सान्निध्यता के प्रभाव से हम उसी समय चतुर्भुज रूप हो गये और तेजस्वी विमान मे चढ कर सब लोको के द्वारा नमस्कृत बैकुण्ठ लोक मे जा पहुँचे । वहाँ सौ युगो तक निवास करने के पश्चात् हमको ब्रह्मलोक की प्राप्ति हुई ।१३-१४। उस ब्रह्मलोक मे पाँच सौ युगो तक सुख भोगने के पश्चात् काल के वश में पड कर देवलोक में गये और चार सौ युगों तक वहाँ सुख भोगते रहे ।१५। ततो भुवि नृपास्तावद्वद्धसूनुरहं स्मरन् । हरेनुगृहं लोकं शालग्रामशिलाश्रमम् ॥१६॥ जातिस्मरत्वं गण्डक्याः किं तस्याः कथयाम्यहम् । यज्जलस्पर्शमात्रेण महात्म्यं महदद्भुतम् ॥१७॥ चक्रांकितशिलास्पर्शमरणस्येदृशं फलम् । न जाने वासुदेवस्य सेवया किं भविष्यति ॥१८॥ इत्यावाहहरिपूजासु सर्षविह्वलचेतसौ ।
नृत्यन्तावगायन्तौ विलुठन्तौ स्थिताविह ॥१६॥ कल्केर्नारायणांशस्य अवतार, कलिकक्षयः । पुरा विदितवीर्यस्य पृष्टो ब्रह्ममुखाच्छ्रुत ॥२०'| हे राजागण ! फिर अब हम इस मर्त्यलोक मे उत्पन्न हुए हैं। परन्तु हमें शालग्राम शिला का वह स्थान और भगवान् विष्णु की कृपा का अभी तक स्मरण है ।१६। क्योंकि गण्डकी नदी के तट पर मरण होने पर जन्मो की स्मृति कभी नष्ट नही होती । यह अद्भुत माहात्म्य उस नदी के जल-स्पर्श का ही है ।१७। यदि उस चक्राङ्कित शिला के स्पर्श मात्र से मृत्यु के पश्चात् ऐसा शुभ फल होता है, तो भगवान् वासु- देव की सेवा के फल का तो कहना ही क्या है ? ।१८। यही सोचते हुए हम कभी हरि-पूजन मे अपने चित्त को एकाग्र करते हैं, कभी हर्ष से विह्वल होकर नृत्य करने लगते हैं, कभी उनका गुण-गान करते और भक्ति भाव मे मग्न हो ज ते हैं ।१९। यह समाचार हमे श्री ब्रह्माजी द्वारा पहिले ही मिल गया था कि कलियुग का क्षय करने के लिए भगवान् नारायण का अंशावतार होगा । इस प्रकार हम इनके पराक्रम को भले प्रकार जानते हैं ।२०। इति राजसभायां स. श्रावयित्वा निजा कथाः । ददौ गजानामयुतमश्वाना लक्षमादरात् ॥२१ रथानां षट्सहस्रन्तु ददौ पूर्णस्य भक्तितः । दासीनां युवतीनाञ्च रमानाथाय षट्शतम् ॥२२॥ रत्नानि च महार्घाणि दत्त्वा राजा शशिध्वजः । मेने कृतार्थमात्मान स्वजनैर्बान्धवैः सह ॥२३॥ सभासद इतिश्रुत्वा पूर्वजन्मोदिताः कथाः । विस्मयाविष्टमनसः पूर्णं त मेनिरे नृपम् ।२४। कल्कि स्तुवन्तो ध्यायन्तो प्रशंसन्त जगज्जना । पुनस्तमाहूराजान लक्ष्या भक्तिभक्तयोः ।२५। इस प्रकार उस सभा में अपना पूर्व प्रसंग कह कर राजा शशि- ध्वज ने भक्ति-भाव पूर्वक कल्किजी को दस सहस्र गज, एक लाख अश्व,
एकादश अध्याय ] [ ४४३ छ सहस्र रथ, छः सो युवती दासियां तथा असख्य रत्नादि प्रदान करके अपने स्वजनो और बांधवो के सहित अपने को धन्य माना। २१-२३। राजा शशिध्वज के मुख से उनके पूर्व जन्म का वृत्तान्त सुन कर सभी सभासद् आश्चर्य चकित होकर उन्हे पूर्ण समझने लगे २४। फिर वहाँ उपस्थित सभी जन कल्किजी का भक्तिपूर्वक ध्यान करने लगे। फिर उन्होने भक्तो के लक्षण विषयक प्रश्न राजा शशिध्वज से किया। २५। भक्तिकाम्यद्भगवतः को वा भक्तो विधानवित् । किं करोति किमश्नाति क्त्वा वसति वक्ति किम् । २६। एतान्वर्गान् राजेन्द्र ! सर्वं त्व वेत्सि सादरात् । जातिस्मरत्वात्कृष्णस्य जगता पावनेच्छया । २७। इति तेषा वच. श्रुत्वा प्रफुल्लवदनो नृप । माधुवादे समामन्त्र्य तानाह ब्रह्मणोदितम् । २८। पुरा ब्रह्मसभामध्ये महर्षिगणसङ्कुले । सनकोनारद प्राह भवद्भिर्यास्तिवहोदिताः । २९। तेषामनुग्रहेणाह तत्रोषित्वा श्रुताः कथाः । यास्ता सकथयामीह शृणुध्व पापनाशना. । ३०। राजागण बोले—भगवद्भक्ति क्या है ? विधान के जानने वाला भक्त कौन कहा जाता है ? भक्त का कार्य क्या है ? वह क्या खाता, क्या वार्तालाप करता और कहाँ रहता है ? । २६। हे राजेन्द्र ! आपको सब कुछ विदित है, इस लिए आप कृपया आदरपूर्वक सब बात हमे बतावे । उनकी बात मुन कर राजा शशिध्वज ने हर्षित मुख से उन्हे साधुवाद दिया । फिर जाति स्मरण होने के कारण श्री कृष्ण चरित्र द्वारा ससार को पवित्र करने के उद्देश से उन्होने वह सब कहना आरम्भ किया, जो उन्होने ब्रह्माजी के मुख से सुना था । २७-२८। शशिध्वज बोले पुराकाल की बात है—ब्रह्माजी की सभा के मध्य महर्षिगण विराजमान थे, उसी अवसर पर जो कुछ सनकादि ने नारदजी से पूछा था, वही आपको बताता हूँ । २६। उस समय मैं भी वहाँ उपस्थित था, इसलिए
४४४ ] [ कल्कि पुराण उनकी कृपा से मैंने उस सब प्रसग को सुना था। हे पापनाशन उप- स्थित सज्जनो ! जो बात मैंने सुनी थी। वही कहता हूँ, आप लोग सुनिये ।३०। का भक्ति संसृतिहरा हरौ लोकनमस्कृता । तामादौ वर्णय मुने नारदावहिता वयम् ।३१। मन षष्ठानीन्द्रियाणि संयम्य परया धिया । गुरावपि न्यसेद्देहं लोकतन्त्रविचक्षणः ।३२। गुरौ प्रसन्ने भगवान्प्रसीदति हरिः स्वयम् । प्रणवाग्निप्रियामध्ये मवरण तन्निदेशतः ।३३। स्मरेदनन्यया बुध्या देशिकं सुसमाहितः । पाद्यार्घ्याचमनीयाद्यैः स्नानवासोविभूषणैः ।३४। पूजयित्वा वासुदेवपादपद्मं समाहितः । सर्वाङ्गसुन्दरं रम्यं स्मरेद्धृत्पद्ममध्यगम् ।३५। सनक ने कहा—हे मुने ! हे नारद ! किस प्रकार की हरि-भक्ति से जन्म नही लेना होता तथा कौन सी भक्ति प्रशसा के योग्य है। आप उसी को पहले कहिये। हम सुनने के इच्छुक हैं ।३१। नारद बोले— लोकतन्त्र के ज्ञाता साधक को श्रेष्ठ बुद्धि के द्वारा पांचो ज्ञानेन्द्रिय और छठवे मन का निग्रह करते हुए ज्ञाना-श्रय पूर्वक गुरु के चरणो मे अपना शरीर अर्पण कर देना चाहिये ।३२। क्योकि गुरु के प्रसन्न होने पर भगवान् श्रीहरि भी प्रसन्न होते हैं । प्रथम प्रणवाग्नि प्रिया के मध्य मे ॐ, का अनन्य हृदय से स्मरण करे । फिर पाद्य, अर्घ्य, आचमनीय आदि तथा स्नान और वस्त्राभूषणो से युक्त होकर सावधान चित्त से नारायण के चरणारविन्दो का पूजन करे । तदनन्तर हृत्पद्म के मध्य में प्रतिष्ठित सुरम्य और सर्वांग सुन्दर श्रीहरि के स्वरूप का चिन्तन करे ।३३-३५। एव ध्यात्वा वाङ्मनोबुद्धीन्द्रियगणैः सह । आत्मानमर्पयेद्विद्वान्हरावेकान्तभाववित् ।३६।
एकादश अध्याय ] ४४५ अङ्गानि देवास्तेषान्तु नामानि विदितान्युत । विष्णो कल्केरन्तस्य तान्येवान्यन्न विद्यते ।३७। सेव्य. कृष्ण सेवकोऽहमन्ये तस्यात्ममूर्त्त य । अविद्योपाधयो ज्ञानद्वदन्ति प्रभावदयः ।३८। भक्तस्यापि हरौ द्वैतं सेव्यसेवकवत्तदा । नान्याद्विना तमित्येव क्वच किञ्चन विद्यते ।३६। भक्त. स्मरति त विष्णु तन्नामानि च गायति । तत्कर्माणि करोत्येव तदानन्दसुखोदय ।४०। इस प्रकार ध्यान करने के पश्चात् वाणी, मन, बुद्धि ओर इन्द्रियो के सहित स्वयं को श्रीहरि मे समर्पित कर दे ।३६। भगवान् कलिक परमदेव एण अनन्त स्वरूप भगवान् विष्णु के अग हैं । जो सब नाम आपको विदित है, वह भगवान् श्रीहरि के अतिरिक्त और कुछ भी नही है ।३७। भगवान् श्री कृष्ण सेव्य और मैं उनका सेवक हूँ तथा ससार भर के सभी प्राणी उन्ही के मूर्त्त रूप हैं । ज्ञानियो का कहना है कि अविद्यारूपी उपाधि के वश मे पड कर ही यह सब उत्पन्न होते हैं ।३८। भक्तो के निमित्त सेव्य-सेवक भाव रूप द्वैत का आवि- र्भाव होता है। इस प्रकार श्रीहरि के अतिरिक्त अन्य कुछ भी नही है ।३६। उन्ही भगवान् विष्णु का भक्त सदा स्मरण करता, नाम-गुण कीर्त्तन करता तथा सभी कर्म उनके ही निमित्त किया करता है । इसी कारण उसके लिए आनन्द और सुख की उत्पत्ति होती है ।४०। नृत्यत्युद्धतवद्रौति हसति प्रैति तन्मन. । विलु ठत्यात्मविस्मृत्या न वेत्ति कियदन्तरम् ।४१। एवविधा भगवतो भक्तिरव्यभिचारिणी । पुनाति सहसा लोकान्सदेवासुरमानुषान् ।४२। भक्तिः सा प्रकृतिर्नित्या ब्रह्मसम्पत्प्रकाशिता । शिवविष्णुब्रह्मरूपा वेदाद्याना वरापि वा ।४३। भक्ताः सत्वगुणाध्यासाद्रजसेन्द्रियलालसा. ।