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कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

( ७ ) पृष्ठ-संख्या | पृष्ठ-संख्या ९. इन्द्रका प्रजापतिके पास पुनः आगमन और प्रश्न ... ४५६ | ४. याज्ञवल्क्य और चाक्रायण उपस्तका सवाद ... ४७८ १० स्वप्नके दृष्टान्तसे आत्माके स्वरूपका कथन ... ४५६ | ५. याज्ञवल्क्य और कहोलका सवाद, ब्रह्म और आत्माकी व्याख्या ... ४७८ ११. इन्द्र एक सौ एक वर्षके ब्रह्मचर्यके बाद उपदेशके अधिकारी हुए .. ४५७ | ६. याज्ञवल्क्य और गार्गीका संवाद ... ४७९ १२. इन्द्रके प्रति प्रजापतिका उपदेश ... ४५७ | ७. याज्ञवल्क्य तथा आरुणि उद्दालकका सवाद, आत्माके स्वरूपका वर्णन .. ४७९ १३. श्याम ब्रह्मसे शबल ब्रह्मकी प्राप्तिका उपदेश ... ४५८ | ८. याज्ञवल्क्य-गार्गीका संवाद; अक्षरके नाम-से आत्मस्वरूपका वर्णन .. ४८१ १४. आकाशनामक ब्रह्मका उपदेश ... ४५८ | ९. याज्ञवल्क्य-शाकल्यका संवाद और याज्ञवल्क्यकी विजय .. ... ४८२ १५. आत्मज्ञानकी परम्परा, नियम और उसका फल ... ४५८ | ( ४ ) चतुर्थ अध्याय ... ४८६ ६०-बृहदारण्यकोपनिषद् ... ... ४५९ | १. जनक-याज्ञवल्क्य-सवाद .. ४८६ ( १ ) प्रथम अध्याय .. ४५९ | २. याज्ञवल्क्यका जनकको उपदेश .. ४८८ १. यज्ञकी अश्वके रूपमें कल्पना ... ४५९ | ३. याज्ञवल्क्यके द्वारा आत्माके स्वरूपका कथन ... ४८८ २. प्रलयके अनन्तर सृष्टिकी उत्पत्ति .. ४५९ | ४. कामना-नाशसे ब्रह्म-प्राप्ति ... ४९१ ३. प्राण-महिमा ... ४६० | ५. याज्ञवल्क्य-मैत्रेयी-सवाद • ४९४ ४. ब्रह्मकी सर्वरूपता और चातुर्वर्ण्यकी सृष्टि ... ४६३ | ६. याज्ञवल्कीय काण्डकी परम्परा .. ४९५ ५ अन्नकी उत्पत्ति और उपासना; मन, वाणी और प्राणके रूपमे सृष्टिका विभाग ४६५ | ( ५ ) पञ्चम अध्याय ४९७ ६. नाम-रूप और कर्म ... ४६८ | १. आकाशकी ब्रह्मरूपमे उपासना ... ४९७ ( २ ) द्वितीय अध्याय .. ४६९ | २. 'द द द' से दम, दान और दयाका उपदेश ... ४९७ १ गार्ग्य और अजातशत्रुका संवाद; अजात-शत्रुका गार्ग्यको आत्माका स्वरूप समझाना ४६९ | ३. हृदयकी ब्रह्मरूपसे उपासना ... ४९७ २ शिशु नामसे मध्यम प्राणकी उपासना .. ४७० | ४ सत्यकी ब्रह्मरूपसे उपासना .. ४९७ ३. ब्रह्मके दो रूप ... ४७१ | ५. सत्यकी आदित्यरूपमे उपासना ... ४९८ ४. याज्ञवल्क्य-मैत्रेयी-संवाद; याज्ञवल्क्यका मैत्रेयीको अमृतत्वके साधनरूपमे परमात्म-तत्त्वका उपदेश ... ४७१ | ६. मनोमय पुरुषकी उपासना .. ४९८ ५. मधु विद्याका उपदेश, आत्माका विविध रूपोंमें वर्णन .. ४७३ | ७. विद्युत्की ब्रह्मरूपमें उपासना .. ४९८ ६. मधु विद्याकी परम्पराका वर्णन ... ४७४ | ८. वाक्की धेनुरूपमे उपासना ... ४९८ ( ३ ) तृतीय अध्याय .. ४७६ | ९. अन्तरस्थ वैश्वानर अग्नि ... ४९८ १. जनकके यज्ञमें याज्ञवल्क्य और अश्वल-का संवाद ... ४७६ | १०. मरणोत्तर ऊर्ध्वगतिका वर्णन ... ४९९ २. याज्ञवल्क्य और आर्तभागका सवाद .. ४७७ | ११. व्याधिमें और मृतपुरुषके श्मशान-गमन आदिमे तपकी भावनाका फल ... ४९९ ३. याज्ञवल्क्य और लाह्यायनि भुज्युका संवाद ... ४७८ | १२. अन्न एव प्राणकी ब्रह्मरूपसे उपासना ४९९ | १३. प्राणकी विविध रूपोंमें उपासना .. ४९९ | १४. गायत्री-उपासना ... ५०० | १५. अन्तसमयकी प्रार्थना ... ५०१ | ( ६ ) षष्ठ अध्याय .. • ५०२ | १. प्राणकी सर्वश्रेष्ठता .. ... ५०२

( ८ ) पृष्ठ-संख्या | पृष्ठ-संख्या २. पञ्चाग्निविद्या और उसे जाननेका फल, त्रिविध गतिका वर्णन ... ५०३ | ६३-श्रीरामोत्तरतापनीयोपनिषद् .. ५४२ | काशी एव तारक मन्त्रकी महिमा, ॐकार-रूप पुरुषोत्तम रामके चार पाद .. ५४२ ३. मन्थ विद्या और उसकी परम्परा . ५०५ | ६४-गोपालपूर्वतपनीयोपनिषद् .. ५५१ ४. सन्तानोत्पत्ति-विज्ञान ... ५०६ | १ श्रीकृष्णका परब्रह्मत्व, उनका ध्यान करने-योग्य रूप तथा अष्टादशाक्षर मन्त्र . ५५१ ५. समस्त प्रवचनकी परम्पराका वर्णन . ५०९ | २. श्रीकृष्णोपासनाकी विधि तथा यन्त्र-निर्माणका प्रकार .. .. ५५२ ६१-कौषीतकिब्राह्मणोपनिषद् . . ५११ | ३. अष्टादशाक्षरका अर्थ .. .. ५५५ (१) प्रथम अध्याय ५११ | ४. गोपाल-मन्त्रके जपकी महिमा, उसमे गोलोक-धामकी प्राप्ति . ५५६ पर्यङ्क-विद्या . . ५११ | ५. श्रीकृष्णका स्वरूप एवं उनका स्तवन . ५५६ (२) द्वितीय अध्याय ५१५ | ६५-गोपालोत्तरतापनीयोपनिषद् ५५९ प्राणोपासना ... .. ५१५ | राधा आदि गोपियोका दुर्वासासे सवाद, दुर्वासाके द्वारा श्रीकृष्णके स्वरूपका वर्णन . ५५९ आध्यात्मिक अग्निहोत्र ... ५१६ | ६६-नृसिंहपूर्वतपनीयोपनिषद् ... ५६७ विविध उपासनाओंका वर्णन .. ५१७ | १. नरसिंह-मन्त्रराजकी महिमा तथा उसके अङ्गोंका वर्णन . ५६७ दैवपरिमररूपमें प्राणकी उपासना ५१९ | २ मन्त्रराजकी शरण लेनेका फल, उसके अङ्गोका विशद वर्णन, न्यासकी विधि तथा मन्त्रके प्रत्येक पदकी व्याख्या ५६९ मोक्षके लिये सर्वश्रेष्ठ प्राणकी उपासना ५२० | ३ मन्त्रराज आनुष्टुभकी शक्ति तथा बीज ... ५७३ प्राणोपासकका सम्प्रदान-कर्म . ५२१ | ४. मन्त्रराज आनुष्टुभके अङ्गभूत मन्त्र, अप्रत-वाच्यरूप भगवान् नृसिंहदेवके चार पाद, स्तुतिके मन्त्र . ५७३ (३) तृतीय अध्याय . ५२३ | ५. आनुष्टुभ मन्त्रराजके सुदर्शननामक महाचक्रका वर्णन, मन्त्रराजके जपका फल ५७७ इन्द्र-प्रतर्दन-संवाद, प्रज्ञास्वरूप प्राणकी महिमा .. ५२३ | ६७-नृसिंहोत्तरतापनीयोपनिषद् ५८० (४) चतुर्थ अध्याय . ५२७ | १. 'ॐ' नामसे परमात्म तत्त्वका तथा उसके चार पादोंका वर्णन, चौथे पादके चार भेद ५८० अजातशत्रु और गार्ग्यका सवाद .. ५२७ | २. परमात्माके चार पादोंकी ओंकारकी मात्राओंके साथ एकता, मन्त्रराज आनुष्टुभके द्वारा तुरीय परमात्माका ज्ञान ... ५८२ ६२-श्रीरामपूर्वतपनीयोपनिषद् .. ५३१ | ३ अनुष्टुभमन्त्रराजके पादोंके अलग-अलग जप तथा ध्यानकी विधि ... ५८५ १ राम-नामके विविध अर्थ, भगवान्‌के साकार तत्त्वकी व्याख्या; मन्त्र एवं यन्त्रका माहात्म्य ५३१ | ४ अपने आत्माका पहले तुरीय-तुरीयरूपमे और पीछे भगवान् नृसिंहके रूपमें ध्यान करके ब्रह्मके साथ अपने-आपको एकीभूत करनेकी विधि ... ... ... ५९१ २ श्रीरामके स्वरूपका कथन, राम-बीजकी व्याख्या ५३२ | ३ राम-मन्त्रकी व्याख्या, जपकी प्रक्रिया तथा ध्यान ५३२ | ४ षडक्षर-मन्त्रका स्वरूप, भगवान् श्रीरामका स्तवन ५३३ | ५ खरके वधसे लेकर बाली-वधतकका संक्षिप्त चरित्र ५३४ | ६. शेष चरित्रका संक्षिप्त वर्णन; आवरण-पूजाके लिये यन्त्रस्थ देवताओंका निरूपण . ५३४ | ७. पूजा-यन्त्रका विस्तृत वर्णन .. ५३६ | ८. पूजा-यन्त्रके अगले अङ्गोंका वर्णन ५३६ | ९. पूजा-यन्त्रके शेषभागका वर्णन तथा श्रीरामके माला-मन्त्रका स्वरूप एवं माहात्म्य . ५३७ | १०. पूजाकी सविस्तर विधि ... . ५३८ |

( ९ ) पृष्ठ-संख्या पृष्ठ-संख्या ५. अनुष्टुप्-मन्त्रका ओंकारमें अन्तर्भाव करके के सम्बन्धसे ब्रह्मकी जगत्-स्वरूपता और उसीके द्वारा परमात्माके चिन्तनकी विधि ५९२ समाधिका वर्णन . ६४२ ६. अपने-आपको प्रणवके वाच्यार्थ परब्रह्ममें ७६-देव्युपनिषद् .. ६४६ विलीन करनेकी विधि ५९४ देवीकी ब्रह्मस्वरूपता, देवताओं‌द्वारा देवीकी स्तुति, ७ परमात्मा तथा आत्माकी एकताका अनुभव देवी-महिमा और इसके पाठका फल ६४६ एवं चिन्तन करनेका प्रकार ५९५ ७७-बह्वृचोपनिषद् .. ६४९ ८. भयरहित ब्रह्मरूप हो जानेकी विधि .. ५९७ देवीसे सबकी उत्पत्ति और देवीकी ब्रह्मरूपता ६४९ ९. प्रणवके द्वारा आत्माको जानकर साक्षिरूपसे ७८-सौभाग्यलक्ष्म्युपनिषद् . ६५० स्थित होनेकी विधि ५९९ १ श्रीमहालक्ष्मीका श्रीसूक्तके अनुसार ६८-महोपनिषद् . ६०३ ध्यान, न्यास, पूजन और यन्त्रकी विधि ६५० १. सृष्टिकी उत्पत्तिका वर्णन ६०३ २ योगसम्बन्धी उपदेश ६५२ २. शुकदेवजीको आत्माके सम्बन्धमें जनकका ३. नवचक्र-विवेक ६५३ उपदेश, जीवन्मुक्ति और विदेहमुक्तिका स्वरूप ६०४ ४ श्रीसूक्त ६५५ ३. निदाघके वैराग्यपूर्ण उद्‌गार ६०७ ७९-सीतोपनिषद् ... ६५७ ४. निदाघके प्रति उनके पिता ऋभुका उपदेश ६०९ श्रीसीताजीके स्वरूपका तात्त्विक वर्णन ६५७ ५ ऋभुका उपदेश चालू, अज्ञान एवं ज्ञानकी ८०-श्रीराधातापिनीयोपनिषद् .. ६६० सात भूमिकाएँ . ६१४ श्रुतियों‌द्वारा श्रीराधिकाजीकी उपासना और ६ ऋभुका उपदेश चालू ६२० स्तुति ६६० ६९-मुक्तिकोपनिषद् ... ६२३ ८१-श्रीराधोपनिषद् ... .. ६६२ १ श्रीराम और हनुमान्‌का संवाद, वेदान्तकी श्रीराधाजीके स्वरूप तथा नामोंका वर्णन ६६२ महिमा, मुक्तिके भेद, १०८ उपनिषदोंकी ८२-ब्रह्मबिन्दूपनिषद् .. ६६४ नामावली तथा वेदोंके अनुसार विभाग, मनके लयका साधन, आत्माका स्वरूप तथा उपनिषदोंके पाठका माहात्म्य तथा उनके ब्रह्मकी प्राप्तिका उपाय ६६४ श्रवणके अधिकारी ६२३ ८३-ध्यानबिन्दूपनिषद् . ६६६ २. जीवन्मुक्ति एवं विदेहमुक्तिका स्वरूप, उनके ध्यानयोगकी महिमा तथा स्वरूप ६६६ होनेमें प्रमाण, उनकी सिद्धिका उपाय तथा ८४-तेजोबिन्दूपनिषद् . ६६८ प्रयोजन . ६२६ प्रणवस्वरूप तेजोमय बिन्दुके ध्यानकी महिमा ७०-गर्भोपनिषद् . ६३० तथा उसके अधिकारी एवं अनधिकारी ६६८ गर्भकी उत्पत्ति एव वृद्धिके प्रकार ६३० ८५-नादबिन्दूपनिषद् .. ६६९ ७१-कैवल्योपनिषद् . ६३२ ( १ ) प्रथम अध्याय ६६९ आत्माका स्वरूप तथा उसे जाननेका उपाय ६३२ १ ॐकारकी हंसरूपमें उपासना ६६९ ७२-कठरुद्रोपनिषद् .. ६३४ २ ॐकारकी बारह मात्राएँ और उनमें संन्यासकी विधि और आत्मतत्त्वका वर्णन . ६३४ प्राणवियोगका फल . ६६९ ७३-रुद्रहृदयोपनिषद् ... ६३७ ३ योगयुक्त स्थितिका वर्णन ६७० भगवान् रुद्रकी सर्वश्रेष्ठता, सर्वस्वरूपता और ( २ ) द्वितीय अध्याय ६७० ब्रह्मस्वरूपता ६३७ १ ज्ञानीके लिये प्रारब्ध नहीं रह जाता .. ६७० ७४-नीलरुद्रोपनिषद् .. ६४० २ नादके अनेक प्रकार .. ६७१ भगवान् नीलरुद्रकी महिमा और शिव-विष्णुकी ३ नादानुसन्धान .. ६७१ एकता .. ६४० ( ३ ) तृतीय अध्याय ६७१ ७५-सरस्वतीरहस्योपनिषद् .. ६४२ १ नादके द्वारा मन कैसे वशीभूत होता है ६७१ दस बीजमन्त्रोंसे युक्त ऋग्वेदके मन्त्रोंसे २ नादमे मनका लय .. ६७२ सरस्वती देवीकी स्तुति, उसका फल, नाम-रूप- ३ मनके अमन हो जानेकी स्थितिका वर्णन ६७२ आ-

( १२ ) पृष्ठ संख्या | पृष्ठ-संख्या १०-औपनिषद-सिद्धान्त . . १२० | १३-जैन उपनिषदोंका सार (श्रीसूरजचन्दजी सत्यप्रेमी 'डाँगीजी') .. १४६ ११-जाऊँ कैसे ? (श्रीप्रबोध, बी० ए० (आनर्स), साहित्यरत्न, साहित्यालंकार) ... १३१ | १४-अध्यात्मवाद (पं० श्रीरघुनाथप्रसादजी शास्त्री 'साधक') .. ... १५७ १२-उपनिषत्सार (श्रीमवदेवजी झा) १४० | चित्र-सूची पृष्ठ संख्या | पृष्ठ-संख्या रंगीन | इकरंगे १-उपनिषद्-अङ्कका टाइटल 'मुखपृष्ठ | १५-देवताओंके सामने यक्षका प्राकट्य . १७८ २-दिव्यलोकमें श्रीकृष्ण १ | १६-अग्निकी असमर्थता . १७८ ३-प्रार्थना .. १६१ | १७-भगवती उमा और इन्द्र .. १८१ ४-पिप्पलादके आश्रममें सुकेशादि मुनि २६० | १८-नचिकेताको मृत्युके अर्पण करना .. १८८ ५-अङ्गिरस और शौनक . २६० | १९-यमराज और नचिकेता . . १८८ ६-यज्ञशालामें उपस्ति .. ४२७ | २०-वरुण और भृगु . . ३६३ ७-रैक्व और जानश्रुति ४२७ | २१-जगत्कारण-मीमांसा . . ३६३ ८-भगवान् श्रीरामचन्द्र . ५३३ | २२-सत्यकाम और उपकोशल .. . ४३६ ९-भगवान् श्रीगोविन्द .. ५६३ | २३-राजा अश्वपतिके भवनमें उद्दालक ... ४३६ १०-सच्चिदानन्द नारायण ... ५६३ | २४-सनत्कुमार-नारद-संवाद . ४४९ ११-श्रीसरस्वती ... ६४४ | २५-मैत्रेयीको उपदेश ... ४४९ १२-सच्चिदानन्दमयी देवी .. ६४७ | २६-ब्रह्मचारियोंको याज्ञवल्क्यका आदेश .. ४७६ १३-श्रीश्रीमहालक्ष्मी .. ६५१ | २७-जनक-याज्ञवल्क्य . .. ४८८ १४-श्रीगणपति . ६९२ | २८-श्रीराम-यन्त्र . . ५३६ | २९-गोपाल-यन्त्र ... . ५५२ | ३०-सुदर्शनमहाचक्र . ... ५७६ कल्याणके पुराने प्राप्य अङ्क ( इनमें ग्राहकोंको कमीशन नहीं दिया जायगा । डाकखर्च हमारा लगेगा । ) संक्षिप्त पद्मपुराणाङ्क पूरी फाइल, पृष्ठ-संख्या ९७८, रङ्गीन चित्र २१, लाइन चित्र २४१, मूल्य ४=) पुराने वर्षोंके साधारण अङ्क आधे मूल्यमें २१ वें वर्षके साधारण अङ्क २, ३, ४, ५, ९, १०, ११, १२ कुल आठ अङ्क एक साथ मूल्य १।), रजिस्ट्री-खर्च ।) कुल १॥) २२ वें वर्षके साधारण अङ्क ३, ४, ५, ६, ७, ८, ९, १० कुल आठ अङ्क एक साथ मूल्य १।), रजिस्ट्री-खर्च ।) कुल १॥) उपर्युक्त दोनों वर्षोंके कुल १६ अङ्क एक साथ रजिस्ट्री खर्चसहित मूल्य २॥।) व्यवस्थापक - 'कल्याण', पो० गीताप्रेस (गोरखपुर)

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कल्याण दिव्यलोकमें श्रीकृष्ण सत्पुण्डरीकनयनं मेघाभं वैद्युताम्बरम् । द्विभुजं ज्ञानमुद्राढ्यं वनमालिनमीश्वरम् ॥ गोपगोपाङ्गनावीतं सुरद्रुमतलाश्रितम् । दिव्यालेङ्करणोपेतं रत्नपङ्कजमध्यगम् ॥ कालिन्दीजलकल्लोलसङ्गिमारुतसेवितम् । चिन्तयंश्चेतसा कृष्णं मुक्तो भवति संसृतेः ॥ (गो० पू०)

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥ कल्याण वेणुवादनशीलाय गोपालायाहिमर्दिने । कालिन्दीकूललीलाय लोलकुण्डलधारिणे ॥ वल्लवीनयनाम्भोजमालिने नृत्यशालिने । नमः प्रणतपालाय श्रीकृष्णाय नमो नमः ॥ वर्ष २३ } गोरखपुर, सौर माघ २००५, जनवरी १९४९ { संख्या १ पूर्ण संख्या २६६ शरणागति यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वं यो वै वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै । तं ह देवमात्मबुद्धिप्रकाशं मुमुक्षुर्वै शरणमहं प्रपद्ये ॥ (श्वेताश्वतर० ६। १८) जिन परमेश्वरने ब्रह्माको सर्वप्रथम उत्पन्न किया । जिनने उनको अमित ज्ञानका आकर अपना वेद दिया ॥ आत्मबुद्धिके विमल प्रकाशक अखिल विश्वमे रहे विराज । मैं मुमुक्षु उन परम देवकी शरण ग्रहण करता हूँ आज ॥ उ० सं० १—

औपनिषद-ब्रह्मका सर्वातीत और सर्वकारण-स्वरूप तथा उसके जाननेका फल ( १ ) यो योनिं योनिमधितिष्ठत्येको यस्मिन्निदं सं च वि चैति सर्वम् । तमीशानं वरदं देवमीड्यं निचाय्येमां शान्तिमत्यन्तमेति ॥ योनि-योनि—कारण-कारणके जो हैं एक अधिष्ठाता, जिनमें सब विलीन होता जग, जिनसे यह उद्भव पाता । वे आराध्य वरद ईश्वर हैं, वे ही देव—अलौकिक कान्ति, उन्हें तत्त्वसे जान यहाँ मानव पाता है शाश्वत शान्ति ॥ ( २ ) सूक्ष्मातिसूक्ष्मं कलिलस्य मध्ये विश्वस्य स्रष्टारमनेकरूपम् । विश्वस्यैकं परिवेष्टितारं ज्ञात्वा शिवं शान्तिमत्यन्तमेति ॥ परम सूक्ष्म-से-सूक्ष्म, हृदयकी गहन गुफामें छिप जाने, अति महान् वे, घेर विश्वको एकमात्र ही छवि पाते । वे ही एक जगत्-स्रष्टा हैं, विविध रूपमें वे आते, जान उन्हीं मङ्गलमय प्रभुको शान्ति सनातन नर पाते ॥ ( ३ ) स एव काले भुवनस्य गोप्ता विश्वाधिपः सर्वभूतेषु गूढः । यस्मिन् युक्ता ब्रह्मर्षयो देवताश्च तमेवं ज्ञात्वा मृत्युपाशांश्छिनत्ति ॥ वे ही स्थितिके समय भुवनके संरक्षक, जगके स्वामी, सब भूतोंमे छिपे हुए हैं, वे ही बन अन्तर्यामी । उनका ही ब्रह्मर्षि, देवगण एक चित्त हो करते ध्यान, जान उन्हें यों मनुज मृत्युके तोड़ डालता पाश महान ॥ ( ४ ) घृतात्परं मण्डमिवातिसूक्ष्मं ज्ञात्वा शिवं सर्वभूतेषु गूढम् । विश्वस्यैकं परिवेष्टितारं ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः ॥ माखनमें स्थित सारभाग-से परम सूक्ष्म जो अतिशय सार, एकमात्र सब ओर व्याप्त जो घेरे हुए सकल संसार ।

  • औपनिषद्-ब्रह्मका सर्वातीत और सर्वकारण-स्वरूप तथा उसके जाननेका फल * ३ सब भूतोंमें छिपे हुए हैं शिव—कल्याणगुणोंसे युक्त, जान उन्हीं प्रभुको होता नर सब भवके बन्धनसे मुक्त ॥ ( ५ ) एष देवो विश्वकर्मा महात्मा सदा जनानां हृदये संनिविष्टः। हृदा मनीषा मनसाभिक्लृप्तो य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥ ये ही देव विश्वकर्मा हैं परमात्मा सबके स्वामी, सब मनुजोंके सदा हृदयमें बसे हुए अन्तर्यामी । हृदय, बुद्धि, मनसे चिन्तन हो, तब इनका हो साक्षात्कार, इस रहस्यको जान गये जो जन्म-मृत्युसे होते पार ॥ ( ६ ) तमीश्वराणां परमं महेश्वरं तं देवतानां परमं च दैवतम् । पतिं पतीनां परमं परस्ता- द्विद्दाम देवं भुवनेशमीड्यम् ॥ इन्द्र आदि लोकेश्वर जिनको परम महेश्वर जान रहे, अन्य देवगण भी जिनको निज परम देव हैं मान रहे। पतियोंके भी पूज्य परम पति जगदीश्वर जो स्तुत्य महान्, उन प्रकाशमय परमदेवको समझा हमने सर्वप्रधान ॥ ( ७ ) न तस्य कार्यं करणं च विद्यते न तत्समश्चाभ्यधिकश्च दृश्यते । परास्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च ॥ देह और इन्द्रियसे उनका है सम्बन्ध नहीं कोई, अधिक कहाँ, उनके सम भी तो दीख रहा न कहीं कोई । ज्ञानरूप, बलरूप, क्रियामय, उनकी परा शक्ति भारी, विविध रूपमे सुनी गयी है, स्वाभाविक उनमें सारी ॥ ( ८ ) न तस्य कश्चित्पतिरस्ति लोके न चेशिता नैव च तस्य लिङ्गम् । स कारणं करणाधिपाधिपो न चास्य कश्चिज्जनिता न चाधिपः ॥

५ ⁕ महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ⁕ वे ही पति, इस जगमें कोई उनका अधिपति शेष नहीं, शासक भी न, कहींपर उनका कोई चिह्न-विशेष नहीं। वे ही एक परम कारण हैं, इन्द्रिय-देवोंके अधिनाय, जनक न उनका, अधिप न कोई, उनसे ही सब विश्व सनाथ॥ (९) एको देवः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा। कर्माध्यक्षः सर्वभूताधिवासः साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च॥ सब भूतोंमें छिपे हुए वे एक देव हैं परमात्मा, सबमे व्यापक, सब जीवोंके वे अन्तर्यामी आत्मा। कर्मोंके अधिपति, फलदाता, सबके ही आश्रय-आवास, साक्षी हैं, केवल, निर्गुण हैं, चेतन हैं—चैतन्य-प्रकाश॥ (१०) एको वशी निष्क्रियाणां बहूना- मेकं बीजं बहुधा यः करोति। तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरा- स्तेषां सुखं शाश्वतं नेतरेषाम्॥ जो असंख्य निष्क्रिय जीवोंके शासक और नियन्ता एक, एकमात्र इस प्रकृति बीजको देते हैं जो रूप अनेक। उन प्रभुको निज हृदयस्थित जो सदा देखते धीर प्रवीन, उन्हें सनातन सुख मिलता है, नहीं उन्हें जो साधनहीन॥ (११) नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनाना- मेको बहूनां यो विदधाति कामान्। तत्कारणं सांख्ययोगाधिगम्यं ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः॥* चेतन परम चेतनोंमें, नित्योंमें भी जो नित्य महान्, करते एक अनेक जीवके कर्मफलोंका भोग-विधान। वे सबके कारण हैं, होता सांख्ययोगसे उनका ज्ञान, पाता मोक्ष सभी बन्धनसे नर उन परमदेवको जान॥

  • ये सभी मन्त्र श्वेताश्वतर-उपनिषद्के हैं, इनमें पहले मन्त्रकी संख्या ४।१९, दूसरेसे पाचवें- तककी ४।१४ से ४।१७, छठेसे आठवेंतककी ६।७ से ६।९ और नवेंसे ग्यारहवेंतककी मन्त्रसंख्या ६।११ से ६।१३ है।

उपनिषद्

( पूज्य-श्रीमज्जगद्गुरु श्रीशङ्कराचार्य अनन्तश्रीविभूषित श्रीमज्ज्योतिर्पीठाधीश्वर स्वामी श्रीब्रह्मानन्द सरस्वतीजी महाराज ) [बायाँ स्तम्भ] धनुर्गृहीत्वौपनिषदं महास्त्रं शरं ह्युपासानिशितं सन्दधीत । आयम्य तद्भावगतेन चेतसा लक्ष्यं तदेवाक्षरं सोम्य विद्धि ॥ उपनिषद् अध्यात्मविद्या अथवा ब्रह्मविद्याको कहते हैं । वेदका अन्तिम भाग होनेसे इसे वेदान्त भी कहा जाता है और वेदान्तसम्बन्धी श्रुति-सङ्ग्रह-ग्रन्थोंके लिये भी उपनिषच्छब्दका प्रयोग होता है । उपनिषद् वेदका ज्ञानकाण्ड है। यह चिरप्रदीप्त वह ज्ञानदीपक है जो सृष्टिके आदिसे प्रकाश देता चला आ रहा है और लयपर्यन्त पूर्ववत् प्रकाशित रहेगा । इसके प्रकाशमें वह अमरत्व है, जिसने सनातनधर्मके मूलका सिञ्चन किया है। यह जगत्कल्याणकारी भारतकी अपनी निधि है, जिसके सम्मुख विश्वका प्रत्येक स्वाभिमानी सभ्य राष्ट्र श्रद्धासे नतमस्तक रहा है और सदा रहेगा । अपौरुषेय वेदका अन्तिम अध्यायरूप यह उपनिषद्, ज्ञानका आदिस्रोत और विद्याका अक्षय्य भण्डार है । वेद-विद्याके चरम सिद्धान्त— ‘एकमेवाद्वितीयं ब्रह्म नेह नानास्ति किञ्चन ।’ ( त्रिपाद्विभूतिमहाना० ३ । ३ ) —का प्रतिपादन कर उपनिषद् जीवको अल्पज्ञानसे अनन्त ज्ञानकी ओर, अल्पसत्ता और सीमित सामर्थ्यसे अनन्त सत्ता और अनन्त शक्तिकी ओर, जगद्दुःखोंसे अनन्तानन्दकी ओर और जन्म-मृत्यु-बन्धनसे अनन्त स्वातन्त्र्यमय शाश्वती शान्ति- की ओर ले जाती है । उपनिषद् सद्गुरुओंसे प्राप्त करनेकी वस्तु है। वैसे तो अधिकारानधिकारपर विचार न करके स्वेच्छया ग्रन्थरूपमें उपनिषदोंका कोई भी अध्ययन कर सकता है, किंतु इस प्रकारसे किसीको ब्रह्मविद्याकी प्राप्ति नहीं हो सकती । अनधिकारीके साधनसम्पत्तिहीन वासनावासित अन्तःकरणमे ब्रह्मविद्याका प्रकाश नहीं होता । जिस प्रकार मलिन वस्त्रपर रंग ठीक नहीं चढता और जिस प्रकार बंजर भूमिमे, जहाँ लंबी-लंबी जड़ोंवाली घास पहलेसे जमी हुई है, धान्यबीज अङ्कुरित नहीं होता और कुछ अङ्कुरित हो भी जाय तो वृद्धिंगत होकर फलित नहीं होता, उसी प्रकार अनधिकारीके वासनापूर्ण अन्तःकरणमें ब्रह्मविद्याका उपदेशबीज अङ्कुरित [दायाँ स्तम्भ] नही होता और यदि कुछ अङ्कुरित हो भी जाय तो उसमें आत्मनिष्ठारूपी वृद्धि और जीवन्मुक्तिरूपी फलकी प्राप्ति नहीं होती । इसीलिये शास्त्रोंमे सर्वत्र अधिकारीरूपी क्षेत्र- की सम्यक् परीक्षाका विधान है। श्रुतिका आदेश है— नापुत्राय दातव्यं नाशिष्याय दातव्यम् । सम्यक् परीक्ष्य दातव्यं मास षाण्मासवत्सरम् ॥ जिस प्रकार गुरुके लिये शिष्यकी परीक्षाका विधान है, उसी प्रकार शिष्यके लिये भी गुरुके लक्षणोका स्पष्ट निर्देश करते हुए उपनिषद्का उपदेश है— 'तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत् समित्पाणि श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम् ॥' ( मुण्डक० १ । २ । १२ ) भगवद्गीता भी विधान करती है— तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया । उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञान ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिन ॥ श्रोत्रिय अर्थात् वेदवेदार्थके ज्ञाता और ब्रह्मनिष्ठ अपरोक्षज्ञानी तत्त्वदर्शी गुरुको प्रसन्न करके उनसे उपनिषद्का उपदेश श्रवण करनेका विधान है। श्रवणं तु गुरो. पूर्वं मननं तदनन्तरम् । निदिध्यासनमित्येतत्पूर्णबोधस्य कारणम् ॥ ( शुक्लरहस्य० ३ । १३ ) साधनचतुष्टयसम्पन्न जिज्ञासु श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ सद्गुरुके द्वारा उपनिषत्तत्त्वका उपदेश श्रवण कर तार्किक युक्तियोंद्वारा उसपर प्रगाढ मनन करते हुए गुरूपदिष्ट ध्यानादिके अभ्यास- द्वारा निदिध्यासनपूर्वक 'अह ब्रह्मास्मि' आदिका निरन्तर विचार करते हुए उसपर निष्ठाारूढ होकर सम्यक् तत्त्वज्ञान- विज्ञानस्वरूप परब्रह्मसत्तामे प्रवेश करके तद्रूप हो जाता है— 'ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति'

  • उपनिषद्का यह उपदेश जीवके लिये परमसौभाग्यास्पद अमूल्य निर्णय है । उपनिषत्तत्त्वोपदेशके निष्कर्षमे जीव-ब्रह्मैक्यप्रतिपादन करते हुए पूर्वाचार्योंने संक्षेपमे कह दिया है— 'जीवो ब्रह्मैव नापर ' जीव ब्रह्म ही है, ब्रह्मसे पृथक् नहीं है । उपनिषद्का उपदेश है—

६ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' 'तत्त्वमसि' यह समस्त (भासमान द्वैतप्रपञ्च ) वास्तवमें ब्रह्म ही है। वही (ब्रह्म) तू है। यह उपनिषद्‌के तत्त्वज्ञानोपदेशका सारांश है। इसमें निष्ठा न होना ही अज्ञान है। जीव ब्रह्मसे अभिन्न होते हुए भी अविद्याके कारण अपने वास्तविक, अजन्मा, अविनाशी, शुद्ध बुद्ध मुक्त सच्चिदानन्दमय आत्मस्वरूपको विस्मृत कर अपनेको जन्म मरणधर्मा, कर्ता, भोक्ता, सुखदुःखवान् मान बैठा है और मिथ्या जगत्में सत्यबुद्धि करके स्वनिर्मित कर्मपाशमें स्वयं बँधकर जन्म मरण संसृतिमें फँसा हुआ अनन्त दुःख भोग रहा है। जीवके सकल दुःखोंके कारण- इस अविद्याकी निवृत्तिके लिये उपनिषदोंमें जीव-ब्रह्मकी एकताके प्रतिपादनके साथ साथ जगत्‌के मिथ्यात्वका उपदेश भी हुआ है, जिसे पूर्वाचार्योंने- 'ब्रह्म सत्य जगन्मिथ्या' -इन सरल शब्दोंमें स्पष्ट कर दिया है। ब्रह्म सत्य है और जगत् मिथ्या है। जिस प्रकार मन्दान्धकारमें रज्जु ही सर्परूप दिखलायी देती है, उसी प्रकार अविद्यामे निर्गुण निराकार ब्रह्म सत्ता ही सगुण साकार जगद्रूप दिखलायी देती है। जिस प्रकार मन्दान्धकारके कारण वास्तविक रज्जु नहीं दिखलायी पड़ती, प्रत्युत वास्तविक सत्ताहीन सर्प ही प्रतिभासित होता है, उसी प्रकार अविद्याके कारण वास्तविक (पारमार्थिक) सत्तामय ब्रह्म नहीं प्रतीत होता और वास्तविक सत्ताहीन व्यावहारिक जगत् ही प्रत्यक्ष प्रतीत होता है। वस्तु एक ही है-जो रज्जु है, वही (भ्रमावस्थामे ) सर्परूप है। उसी प्रकार (ज्ञानावस्थामें ) जो ब्रह्म है वही ( भ्रमावस्था, अज्ञानकी अवस्थामें ) जगद्रूप है। जगत्‌की सत्य-प्रतीति और ब्रह्मकी अप्रतीति तबतक होती रहती है, जबतक अविद्यान्धकारकी निवृत्ति नहीं होती । विचाररूपी प्रकाशद्वारा अधिष्ठानका निश्चय होते ही स्पष्ट हो जाता है कि सर्वाधिष्ठान ब्रह्मसत्ता ही (पारमार्थिक) सत्य है और रज्जुमे आपन्न सर्पके समान ब्रह्ममे अध्यस्त जगत् मिथ्या है। इस प्रकार सद्‌गुरुओंगे दृष्टान्तादिके द्वारा औपनिषद- ज्ञान भलीप्रकार श्रवण कर जिज्ञासु उसपर मनन करते हुए वैराग्यादि साधन सम्पत्तिके सहयोगमे जगत्‌के मिथ्यात्वकी पुष्टि और निदिध्यासनादि अन्तरङ्ग साधनोके सहयोगसे जीवब्रह्मैक्यनिष्ठा-सम्पादनद्वारा स्वात्मानुभूतिमय ज्ञानदीपक प्रदीप्त कर अनादिकालीन अविद्यान्धकारकी निवृत्तिद्वारा निश्चय कर लेता है कि एकमात्र अद्वितीय स्वगत-सजातीय- विजातीय भेदशून्य त्रिकालाबाधित ब्रह्मसत्ता ही सत्य है। उसके अतिरिक्त अन्य कुछ भी पारमार्थिक सत्य नहीं है । इस प्रकार दृढ बोधवान् ज्ञानीके लिये अन्य कुछ ज्ञातव्य एव प्राप्तव्य शेष नहीं रह जाता । कृतकृत्य होकर वह नित्य- बोधमय निजस्वरूपमे प्रतिष्ठित हो सच्चिदानन्दका सर्वत्र अनुभव करता हुआ जीवन्मुक्तिका परमानन्द लाभ कर ब्रह्मकी अद्वितीय चिन्मय सत्तामें प्रवेश कर जाता है । ऐसे ब्रह्म- स्वरूप विज्ञानीके लिये उपनिषद्‌का निश्चय है कि- 'न तस्य प्राणा उत्क्रामन्ति' 'ब्रह्मैव सन् ब्रह्माप्येति ।' (बृहदा० ४ । ४ । ६) जीव-ब्रह्मैक्य-ज्ञान-निष्ठाकी यह चरम सीमा ही औपनिषद- ज्ञानकी पराकाष्ठा है। उपनिषत्तत्त्व, निर्गुण निराकार ब्रह्म अवाङ्मनसगोचर है । श्रुति उसके लिये कहती है- 'यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह ।' इसी अवाङ्मनसगोचर परमाद्वितीय निर्गुण परम तत्त्वका बोध करानेके लिये उपनिषच्छ्रुतियाँ- 'यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते--' -इत्यादिके द्वारा इस नानागुणधर्मवान् इन्द्रियग्राह्य (शब्द-स्पर्श-रूप-रस-गन्ध आदिमय ) जगत्प्रपञ्चका ब्रह्ममें अध्यारोप करती हैं और फिर इन्हीं इन्द्रियग्राह्य ( एव इन्द्रियानुभवद्वारा परिचित ) गुणधर्मोंके निषेधरूपमें उस निर्गुण निर्व्यपदेश्य निर्विशेष ब्रह्म-सत्ताका परिचय कराती हैं । उदाहरणार्थ कठश्रुति उसे अशब्द, अस्पर्श, अरूप, अव्यय, अरस आदि कहकर उसका उपदेश करती है- 'अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं तथारसं नित्यमगन्धवच्च यत् • • • •' इसी प्रकार माण्डूक्य श्रुति उसके सम्बन्धमे कहती है- 'नान्त प्रज्ञ न बहिःप्रज्ञ नोभयतःप्रज्ञ न प्रज्ञानघन न प्रज्ञ नाप्रज्ञम् ।' 'अदृष्टमव्यवहार्यमग्राह्यमलक्षणमचिन्त्यमव्यपदेश्यमेकात्म- प्रत्ययसार प्रपञ्चोपशम शान्त शिवमद्वैत चतुर्थ मन्यन्ते स आत्मा स विज्ञेय ।' इसी प्रकार अन्यत्र भी उपनिषदोंमे निषेधरूपमें ही उस

  • उपनिषद् * ७ [बायाँ स्तम्भ] निर्गुण निरञ्जनके सम्बन्धमे उपदेश हुआ है और अन्तमे श्रुति 'नेति-नेति' (यह नहीं, यह नहीं) कहकर उसके सम्बन्धमे समस्त उक्तियोंका खण्डन कर उसे सर्वथा निर्गुण निर्विशेष अवाङ्मनसगोचर प्रतिपादन करती है । इस प्रकार अध्यारोपके सहारे ब्रह्मका परिचय कराती हुई श्रुतियाँ अध्यारोपित समस्त जगत्की वास्तविक सत्ताके निरासार्थ ही बार-बार उपदेश करती हैं कि— 'आत्मैवेदं सर्वम्' 'ब्रह्मैवेदं सर्वम्' 'ऐतदात्म्यमिदं सर्वम्' 'नेह नानास्ति किञ्चन' 'मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति'—इत्यादि । इस प्रकार अध्यारोपित जगत्‌का सर्वथा अपवाद करती हुई श्रुतियाँ एक अद्वितीय अखण्ड ब्रह्मसत्ताका प्रतिपादन करती हैं। इससे यह स्पष्ट ही है कि उपनिषदोंमे यत्र तत्र जगत्‌की सृष्टि, स्थिति, लय आदि-सम्बन्धी जो द्वैतबोधक श्रुतियाँ पायी जाती हैं, उनका प्रयोजन द्वैतप्रपञ्चके प्रतिपादनमे नहीं है, किन्तु शुद्ध ब्रह्ममे जगत्‌का अध्यारोप करके उसके अपवादद्वारा एक अखण्ड अद्वितीय निर्गुण ब्रह्मसत्ताकी सिद्धि ही उनका लक्ष्य है। उपनिषद्‌के उपदेशक्रममे— 'अध्यारोपापवादाभ्यां निष्प्रपञ्चं प्रपञ्च्यते ।' यही सिद्धान्त कार्यान्वित हुआ है । इसके अतिरिक्त तत्त्वोपदेशका और कोई प्रकार नहीं है कि जिसके द्वारा (परमार्थदृष्ट्या जीवके अपने ही एक अद्वितीय अखण्डस्वरूपमे अनादि कालसे चला आता हुआ यह ) जगद्भ्रम निवृत्त हो सके और जीव अपने वास्तविक अद्वितीय, अखण्डस्वरूपमे प्रतिष्ठित होकर शाश्वत शान्ति प्राप्त कर सके । ज्ञानस्वरूप नित्यबोधमय निजरूप आत्मामे प्रतिष्ठित होकर शाश्वत शान्तिमय हो जाना ही जीवका परम पुरुषार्थ है । इस परम पुरुषार्थकी प्राप्ति औपनिषद-ज्ञाननिष्ठाद्वारा ही होती है । बिना तत्त्वनिष्ठ हुए कैवल्यकी प्राप्ति नहीं होती, यही उपनिषद्‌का सिद्धान्त है— 'ऋते ज्ञानान्न मुक्तिः ।' उपनिषत्तत्त्वज्ञानकी महिमा वर्णन करते हुए मुण्डक- श्रुति कहती है— वेदान्तविज्ञानसुनिश्चितार्थाः संन्यासयोगाद्यतयः शुद्धसत्त्वाः । [दायाँ स्तम्भ] ते ब्रह्मलोकेषु परान्तकाले परामृताः परिमुच्यन्ति सर्वे ॥ ( ३ । २ । ६ ) इसी प्रकार कठ-श्रुतियाँ अपरोक्ष आत्मज्ञानके लिये ही शाश्वत सुख-शान्तिकी प्राप्तिका निर्देश करती हैं और अन्यके लिये उसका सर्वथा निषेध करती हुई कहती हैं— 'तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरा- स्तेषां सुखं शाश्वतं नेतरेषाम्' '...तेषां शान्तिः शाश्वती नेतरेषाम् ।' इस प्रकार उपनिषद्‌का स्पष्ट उपदेश है कि यदि जीव स्थायी सुख शान्तिकी प्राप्ति करना चाहता है तो उसे आत्मानुभूतिके लिये प्रयत्नशील होना पड़ेगा, अध्यात्मकी ओर बढ़े बिना स्थायी सुख शान्तिकी प्राप्ति असम्भव है। इसीलिये सर्वकल्याणकारी वेद जीवको, कर्म, उपासना और ज्ञानके उपदेशद्वारा अध्यात्म पथपर आगे बढ़ाता है । जो जिस अवस्थामे है, उसे उसी अवस्थामे अध्यात्मकी ओर नियोजित करना ही वेदका लक्ष्य है । वेदके कर्मकाण्ड और उपासनाकाण्डका चरम उद्देश्य है कि जीव अधिकारानुसार कर्मोपासनामे प्रवृत्त होकर अन्तःकरणकी शुद्धिद्वारा तत्त्व- ज्ञानका अधिकारी बने और परमात्मनिष्ठवान् होकर शाश्वत सुख-शान्ति प्राप्त करे । इस सर्वकल्याणकारी वैदिक उद्देश्यकी पूर्तिके लिये ही वेदमूलक वर्णाश्रम व्यवस्था है । वर्णाश्रम- व्यवस्थामे वैदिक सिद्धान्तोका सक्रिय व्यावहारिक रूप निष्पन्न हुआ है। जगतीतल्पर समाज व्यवस्थाका उज्ज्वल आदर्श- रूप भारतीय वर्णाश्रम धर्म-व्यवस्था, सामाजिक व्यवहारको उच्चतमताके उत्कृष्ट शिखरपर रखती हुई उस ही परमार्थका साधन बनाकर जीवको मतनावृतिके पथपर प्रतिष्ठित रखकर उसे पूर्णताकी ओर ले जाती है । वेदमूलक धर्मशास्त्र वर्णाश्रम- धमर्माका इस प्रकारसे विधान करता है कि जो जिस श्रेणीमे, जिस अवस्थामे, जहाँ है, वहीं अपना धर्म पालन करता हुआ स्वाभाविक रूपस अध्यात्मकी ओर बढता जाय । इसीलिये उपनिषन्मूलक भगवद्गीताका उपदेश है कि धर्मशास्त्रके अनुसार— 'स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः ॥' ( १८ । ४५ ) और—

  • महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति *

य शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः । न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम् ॥ तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ । ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि ॥ ( १६ । २३-२४ )

इस प्रकार कर्मक्षेत्रमे, शास्त्रोक्त स्वधर्म-पालन ही समस्त वेदोक्त ज्ञानका सार और सर्वोन्नतिका मूल है । इसीलिये सामान्य धर्म, विशेष धर्म और आपद्धर्म आदिका स्पष्ट वर्णन करता हुआ वेदमूलक सनातन धर्मशास्त्र प्रत्येक जीवको व्यष्टि- रूपमें और समस्त विश्वको समष्टिरूपमें वेदका यह सनातन सन्देश दे रहा है कि यदि सुख शान्ति चाहते हो तो स्वधर्म-पालन करते हुए अध्यात्मपथपर आगे बढ़ो । भगवती श्रुति प्रत्येक जीवको प्रत्येक अवस्थामं अपने पवित्र अङ्कमे उठाकर अध्यात्ममें प्रतिष्ठित करनेको तत्पर है । भारतीयो ! जागो, श्रुति भगवती तुम्हे जगा रही है— 'उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत ।' पवित्र भूखण्ड भारतमे तुम्हारा जन्म हुआ है, अध्यात्म विद्या-ब्रह्मविद्या-तुम्हारे घरकी वस्तु हे, उसका समुचित लाभ उठाकर स्वय शाश्वत सुख-शान्ति प्राप्त करो और दुःख- पङ्कनिमग्न विश्वको सुख शान्तिका परसोज्ज्वल पथ प्रदर्शित करो, अन्यथा तुम्हारे हाथमे उपनिषद्की यह ज्ञानराशि कलङ्कित हो रही है।

उपनिषन्महत्ता ( रचयिता—विद्याभूषण, कविवर, श्रीॐकार मिश्र 'प्रणव', व्या० सा० योगाशास्त्री, सिद्धान्तशास्त्री )

उपनिषद्की साधना श्रुतिगान मङ्गल-माधुरी है ॥ शुचि सत्यताका स्रोत निर्मल मन्द मञ्जुल वह रहा है । कर पान अमृत ज्ञान अविरल, विश्व प्रमुदित हो रहा है ॥ परिपूर्ण पुण्य पवित्रताकी सक्तियाका फल कहा है । जो मौन मुनि-मण्डल महत्ताकी चमकत चातुरी है ॥ १ ॥ यह ध्यानियोंके ध्येय धृतिकी है धवल ध्रुव-धारणा । प्रिय पारदर्शी परम पुरुषोंकी अटल व्रत-पारणा ॥ 'वद केन रचित' प्रश्नकी उत्तरभरी सुख-सारणा । उस ईशके कैवल्य-गृहकी वीथि दुर्गम साँकुरी है ॥ २ ॥ इसकी अनेक विचारणामें एकताका रूप है । सिद्धान्त वैदिक 'तत्त्वमसि' का दर्शनीय अनूप है ॥ चितिचिन्तनाका लक्ष्य केवल जग-अचिन्त्य स्वरूप है । दुर्लभ्य परमानन्दको यह कर रही अति आतुरी है ॥ ३ ॥ सत्यं शिवं सौन्दर्यमय जो श्रेय-प्रेय चितान है । उद्गीथकी है गूँज गुरु-गम्भीर ब्रह्म विधान है ॥ ऋषि याज्ञवल्क्य, उपस्ति, वाजश्रवसके आख्यान है । नृप-अश्वपतिकी कीर्ति-स्वरमें बज रही वर बाँसुरी है ॥ ४ ॥ जिसकी महत्तापर कि दारा, मुग्ध शोपनहार है । मन मूल मानी मूलशंकर हो रहे बलिहार हैं ॥ प्रतिक्षण प्रशंसा में 'प्रणव' हृद्वीण-नादित तार है । वह मुक्ति-नभ-आरोहणाको जीव-खगकी पाँखुरी है ॥ ५ ॥

यहाँ पृष्ठ के पाठ का पूर्ण लिप्यंतरण दिया गया है:

उपनिषदोंका एक अर्थ है, एक परमार्थ है ( लेखक—श्रीकाञ्चीकामकोटिपीठाधीश्वर अनन्तश्रीविभूषित श्रीमज्जगद्गुरु श्रीशङ्कराचार्यजी महाराज )

प्राणियोंके बाह्य अर्थोंका प्रकाश करनेवाली तथा नाना प्रकारसे उपकार करनेवाली अनेक विद्याएँ हैं; परंतु परम पुरुषार्थको प्रकाशित करनेवाली, परमार्थको दिखलानेवाली तथा परम उपकारिणी विद्या उपनिषद् है। जिससे तत्त्व-जिज्ञासु पुरुषोंको परम शान्ति प्राप्त होती है, वह परमार्थ कहलाता है। क्लेशग्रस्त जीवोंके समस्त क्लेशोंका निवारण जिससे हो, वह परम उपकार कहलाता है। ‘तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः।’ यह ईशावास्योपनिषद्वाक्य एकत्वके साक्षात्काररूपी उपनिषद्विद्यासे युक्त पुरुषके समूल शोकनाशको उद्घोषित करता है। ‘मायामात्रमिदं द्वैतमद्वैतं परमार्थतः।’ (गौड० आग० १७) तथा— ‘तत् सत्यं स आत्मा तत्त्वमसि।’ (छान्दोग्य० ६।८।७) —इत्यादि श्रुतियाँ उस उपनिषद्विद्याकी परमार्थताको घोषित करती हैं। फिर यह उपनिषद्विद्या क्लेशोंके पात्र सांसारिक प्राणियोंको हठात् प्राप्त होनेवाले क्लेशोंका उन्मूलन किस प्रकार करती है? इसका उत्तर श्वेताश्वतर उपनिषद् देती है— ‘ज्ञात्वा देवं सर्वपाशापहानिः क्षीणैः क्लेशैर्जन्ममृत्युप्रहाणिः।’ (१।११) ‘परमात्मदेवको जानकर सारे बन्धन कट जाते हैं, क्लेशोंके क्षीण होनेपर जन्म और मृत्युसे छुटकारा मिल जाता है।’ दुःखोंके मूलका नाश हुए बिना दुःखोंका आत्यन्तिक नाश नहीं बनता। यद्यपि कर्म-उपासना आदि धर्म अथवा खेत- घर आदि विषय तत्काल प्राप्त होनेवाले कुछ-न-कुछ दुःखोंकी निवृत्ति तो करते हैं, तथापि जिससे दुःखकी पुनः उत्पत्ति न हो, इस प्रकारकी समस्त दुःखोंकी अत्यन्त निवृत्ति तो त्रिविध दुःखोंके मूलकी निवृत्ति हुए बिना सम्भव नहीं। दुःखका मूल क्या है? विचारक लोग कहते हैं कि दुःखका मूल जन्म है। ‘न ह वै सशरीरस्य सतः प्रियाप्रिययोरपहतिरस्ति।’ (छान्दोग्य० ८।१२।१) ‘निश्चयपूर्वक जबतक यह शरीर बना हुआ है तबतक सुख और दुःखका निवारण नहीं हो सकता।’ इस प्रकार श्रुति मुख्यतः जन्मको ही दुःखका मूल कारण प्रतिपादन करती है। तब फिर जन्मका मूल कारण क्या है? वे ही तत्त्व- परीक्षक उत्तर देते हैं कि जन्मका मूल कर्म है। यदि मनुष्य कर्मसे विराम ले ले, तो उसके लिये अत्यन्त दुःख-निवृत्ति हस्तामलकवत् हो जाय। अतः मुमुक्षुजनोंको दूसरे उपायोंके अनुसरणमें संलग्न नहीं होना चाहिये, परंतु इसमें यह संदेह उठ सकता है कि पूर्वजन्मोंमें और इस जन्ममें अबतक किये जानेवाले कर्मोंका जो मूल है उसका नाश किये बिना कर्मविरामका सङ्कल्प केवल कथनमात्र ही रह जायगा। तब सामान्यतः कर्मका मूल क्या है? इसके उत्तरमें रागका नाम लिया जाता है। राग और उससे उपलक्षित द्वेष, भय आदिको भी दोष शब्दसे ग्रहण करते हैं। जिस किसी वस्तुमें जबतक राग या द्वेष होता है, तबतक उस वस्तुकी प्राप्ति या परित्यागके लिये प्रयत्नरूप कर्म करते हुए ही लोग देखे जाते हैं, जिस प्रकार जबतक भय रहता है, तबतक मनुष्य उस भयसे छुटकारा पानेके लिये प्रयत्न करता ही है। इस दोषका मूल क्या है? अपनेसे अतिरिक्त दूसरेका भान होना ही दोषका मूल है, ऐसा ब्रह्मवेत्ता लोग कहते हैं। जैसा कि बृहदारण्यक उपनिषद्का वाक्य है— ‘द्वितीयाद्वै भयं भवति।’ (१।४।२) ‘निश्चय ही दूसरेसे भय होता है।’ यदि दूसरी वस्तुका भान ही नहीं होगा तो कर्मके मूलभूत भय, द्वेष अथवा रागका कोई आधार न रह जानेके कारण भय आदिका प्रसङ्ग ही नहीं प्राप्त होगा। ‘यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत् तत्केन कं पश्येत्, तत्केन कं जिघ्रेत्, तत्केन कं शृणुयात्, तत्केन कं विजानीयात्।’ (२।४।१४) ‘जिस अवस्थामें इसके लिये सब कुछ आत्मा ही हो जाता है, उस समय किसके द्वारा किसको देखे, किसके द्वारा किसको सूँघे, किसके द्वारा किसको सुने तथा किसके

उ० अं० २-३-

१० -: महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति :-


[बायाँ स्तम्भ]

द्वारा किसको जाने'—यह बात भी वही (बृहदारण्यक) उपनिषद् कहती है। तत्र द्वैतके भानका हेतु क्या है ? तत्त्वपरीक्षक कहते है कि द्वैतभानका हेतु मिथ्या ज्ञान है और वह मिथ्या ज्ञान ही समस्त संसारका बीज है, ऐसा न्यायवेत्ता आचार्योने निश्चय किया है । इसका निवारण एकत्वदर्शनरूपी औपनिषद ज्ञानके द्वारा ही होता है, इसलिये यह उपनिषद्-विद्या प्राणियोंका परम उपकार करती है। ज्ञान ही अज्ञानका विरोधी है । द्वितीय वस्तुकी प्रतीतिमें कारणभूत अज्ञानको दूर करनेवाला एकत्वसाक्षात्काररूप ज्ञान ही है । मनोनिग्रह और भगवदुपासना आदि अन्य सारे ही शास्त्रप्रसिद्ध साधन एकत्वसाक्षात्कारकी उत्पत्तिमें ही प्रयोजक होनेके कारण पहली सीढ़ीमें आते हैं। 'तं त्वौपनिषदं पुरुषं पृच्छामि ।' —इस श्रुतिवाक्यमें जिसकी जिज्ञासा की गयी है; वह उपनिषद् वर्णित ब्रह्मतत्त्व— 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म।' (छान्दोग्य० ३ । १४ । १) 'आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात्।' (तैत्तिरीय० ३ । ६ । १) तथा— 'विज्ञानमानन्दं ब्रह्म।' (बृहदारण्यक० ३ । ९ । २८) —इत्यादि श्रुतियोंद्वारा बारवार गाया जानेवाला परम आनन्दघन ही है, अतः यह प्राणियोंके लिये परम पुरुषार्थ- स्वरूप है। इसका ज्ञान करानेवाली उपनिषद् भी प्राणियोंके लिये सहस्रों माता-पिताओंकी अपेक्षा भी परम प्रिय है, अतएव परम उपकार करनेवाली है। सहस्रों माता पिताकी अपेक्षा भी मनुष्यका परम हित चाहनेवाली उपनिषद् विद्या स्वयं ही औपनिषद ब्रह्मतत्त्वकी नित्यता एव यथार्थतामें इस प्रकार उपपत्ति (युक्ति) प्रदर्शित करती है। कारणसे कार्यमें जो भेद जान पड़ता है, वह केवल नाम और रूपको लेकर ही है। 'घट' यह नाम- भेद है और 'मोटी पेंदी एव पेटवाला' यह आकारभेद है। यही नाम और रूप श्रुतियोंमें भिन्न-भिन्न स्थलोंपर त्याग देने योग्य बताये गये हैं—सर्वत्र इनको त्यागनेके लिये ही सूचित किया गया है। 'आकाशो वै नाम नामरूपयोर्निर्वहिता ते यदन्तरा तद्ब्रह्म।' (छान्दोग्य० ८ । १४ । १) 'निश्चयपूर्वक आकाश ही नाम और रूपका निर्वाह


[दायाँ स्तम्भ]

करनेवाला अर्थात् उनका आधार है, वे दोनो जिसके भीतर है, वह ब्रह्म है।' 'नामरूपे व्याकरवाणि।' (छान्दोग्य० ६ । ३ । २) 'मै नामरूपको विशेषरूपसे व्यक्त करूँ।' तथा— सर्वाणि रूपाणि विचित्य धीरो नामानि कृत्वाभिवदन् यदास्ते। 'बुद्धि-प्रेरक परमेश्वर सब रूपोंकी रचना करके उनके नाम रखकर उन नामोंके द्वारा स्वय ही व्यवहार करता हुआ स्थित है।' मृत्तिका ही घट है, कारण ही कार्य है। नाम भेद अथवा आकार-भेद केवल काल्पनिक है । अतएव श्रुति कहती है— 'वाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम्।' (छान्दोग्य० ६ । १ । ४) 'विकार (कार्य) वाणीका विलासमात्र है, वह नाम मात्र- के लिये है। वास्तवमे वह घटरूप विकार नहीं, केवल मृत्तिका ही है—ऐसा मानना ही सत्य है।' 'मृत्तिकेत्येव' इस पदमें 'एव' शब्दसे समस्त विकारोंका मिथ्यात्व तथा कारणका सत्यत्व स्पष्ट किया गया है। इस प्रकार कारण-परम्पराका विचार करते करते सबका परम कारण ब्रह्म ही है, यह निश्चित होता है । एकमात्र ब्रह्म ही बिना किसी उपचारके परमार्थ सत्य है तथा ब्रह्मके अतिरिक्त समस्त पदार्थ मिथ्या एव कल्पित है। यह बात श्रुतिके द्वारा तात्पर्यनिर्णय करनेवाली युक्तियोंके प्रदर्शनपूर्वक स्पष्टरूपसे कह दी गयी है। परमार्थका ज्ञान और पुरुषार्थका अनुभव करानेके कारण हमपर उपनिषदोंका परम उपकार सिद्ध होता है। सारी विद्याओके ज्ञाता देवर्षि नारदजी भी जन्मजात महासिद्ध योगी सनत्कुमारके पास ब्रह्मविद्याकी प्राप्तिके लिये गये—इस छान्दोग्योपनिषद्की आख्यायिकासे तथा— 'स ब्रह्मविद्या सर्वविद्याप्रतिष्ठाम् ।' —इस मुण्डकोपनिषद्के वाक्यसे भी यह सिद्ध होता है कि परमार्थरूप परम पुरुषार्थका अनुभव करानेके कारण उपनिषद्- विद्या परम उपकारिणी है। बादरायण मुनि श्रीव्यासजीने ब्रह्मसूत्रमें कहा है— 'शास्त्रदृष्ट्या तूपदेशो वामदेववत् ।' पूर्वजन्मके शास्त्राभ्याससे स्वतः प्राप्त हुई ज्ञान- दृष्टिसे भी उपदेश करना सम्भव है, जैसे वामदेव मुनिने

[उपनिषदोंका एक अर्थ है, एक परमार्थ है] ३१


उपदेश किया था । शास्त्रदृष्टिका अर्थ है 'तत्त्वमसि' 'सोऽहमस्मि' आदि महावाक्योंसे उत्पन्न अखण्ड परा बुद्धि । वेदोंके पूर्व भागमे अर्थात् कर्मकाण्डमें ज्ञानसे भिन्न कर्ममात्रका वर्णन है । वे समस्त कर्म क्रियामात्र हैं, उन्हें 'दृष्टि' नहीं कह सकते । सब प्रकारकी उपासनाएँ भी क्रियामात्र ही हैं, 'दृष्टि' नहीं। कर्मकाण्डोक्त क्रियाओंसे ध्यानादि उपासनाओमें इतना ही अन्तर है कि वे मानसिक क्रियाएँ है, इन्हें श्रेष्ठ महात्मा पुरुषोंने दृष्टान्तपूर्वक सिद्ध किया है। वे क्रियाएँ की जा सकती हैं, अन्यथा की जा सकती हैं, और नहीं भी की जा सकती हैं । उनका अनुष्ठान विकल्पयुक्त है, परतु दृष्टि वस्तुके अधीन होती है, अतएव उसमें विकल्प सम्भव नहीं है । उपर्युक्त ब्रह्मसूत्रमें शास्त्रदृष्टिके दृष्टन्तरूपमें वामदेवका नाम आया है । यजुर्वेदीय उपनिषद् ( बृहदारण्यक० १ । ४ । १० ) में वामदेवको ऐसी दृष्टि प्राप्त होनेका वर्णन मिलता है, जो उनके लिये सूर्य और मनुके साथ अपना अत्यन्त अभेद सूचित करनेवाली थी । जिस प्रकार देह-देहीका सम्बन्ध होता है, तदनुसार यह दृष्टि नहीं उत्पन्न होती । वामदेव मुनि सूर्य और मनुके शरीर हैं, ऐसा मानना यहाँ अभिप्रेत नहीं है और न यही अभीष्ट है कि वामदेवके ही ये दोनों शरीर थे । शास्त्ररूप उपनिषद्के यथार्थ ज्ञानसे प्राप्त होनेवाली जो परमार्थदृष्टि है, वह सबमें आत्मदर्शनको लेकर है, यही मानना अभीष्ट है । उस दृष्टिके अनुसार सबका आत्मरूपमें ही बोध होता है । वामदेवके सर्वात्मा होनेपर ही उनकी मनु और सूर्यसे अभिन्नता होनी सम्भव है । 'शास्त्रदृष्ट्या तु' कहनेसे लोकदृष्टिका बाध हो जाता है । देह और देही ( आत्मा ) में अभेद-प्रतीतकी रीतिसे जो कहीं-कहीं ब्रह्म और आत्मामे विशिष्ट-अद्वैतभावका उल्लेख किया जाता है, उस प्रकारके अभेदरूप अर्थका भान तो लोकदृष्टिसे ही सम्भव होता है । इस विषयमें यह दृष्टान्त दिया जाता है— 'जैसे मै मोटा हूँ, मै श्याम हूँ' इत्यादि । ऐसे स्थलोंमें शरीरमें ही आत्मदृष्टि होनेके कारण देहात्मवादका भ्रम होता है, जो सर्वथा हेय है, यह बन्धनका ही हेतु है । यह बात लोकदृष्टिसे भी सिद्ध ही बतायी गयी है । देह-देहीमें अभिन्नताका बोध त्याज्य है, क्योंकि यह मोक्षके लिये उपयोगी नहीं है । शास्त्र शब्दका मुख्य अर्थ साक्षात् उपनिषद् ही है, ऐसा उक्त ब्रह्मसूत्रसे अभिव्यक्त होता है । उससे भिन्न जो शास्त्र है, वह तत्त्व-साक्षात्कार करानेमें समर्थ नहीं है । जिस प्रकार 'अह वै त्वमस्मि' ( मैं ही तुम हो ) यह महावाक्य है, उसी प्रकार 'त्व वा अहमस्मि' यह भी है । ऐसी ही 'भगवो देवता' इत्यादि श्रुति भी है । यह श्रुति परस्पर व्यतिहारसे अर्थात् आत्माके स्थानपर ब्रह्मको और ब्रह्मके स्थानपर आत्माको रखनेसे दोनोंकी एकता सिद्ध करती हुई उनमें देह-देहि-सम्बन्धकी कल्पनाका विरोध करती है, क्योंकि उस देह-देहि-सम्बन्धकी कल्पना करनेपर तो अवश्य ही ईश्वर भी शरीररूप माना जायगा तथा जीवात्मा भी उस ईश्वरमय शरीरका शरीरी ( आत्मा ) माना जाने लगेगा । इस तरहकी अनेकों असङ्गत आपत्तियाँ उठ खड़ी होंगी ।

यदि कहें, तब तो कर्ममार्गकी कोई उपयोगिता नही है, तो यह ठीक नहीं, क्योंकि जैसे मनुष्य पहले असत्य मार्गपर खड़ा होकर ही सत्यको प्राप्त करनेकी चेष्टा करता है, उसी प्रकार पहले कर्ममार्गपर चलनेवाला साधक कर्मद्वारा अन्तःशुद्धिका सम्पादन करके फिर सत्यस्वरूप ज्ञानका आश्रय ले उपनिषद्-गति ( वेदान्तवेद्य ब्रह्म ) को प्राप्त कर लेता है । सारी श्रुतियोंका एक ही तात्पर्य है, यह बात कठोपनिषद्मे यमराजके मुखसे कहलायी है । यथा—

'सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति तत्ते पदं संग्रहेण ब्रवीमि, ओमित्येतत् ।'

'सम्पूर्ण वेद जिस पदका बारम्बार प्रतिपादन करते हैं उस पदको संक्षेपसे तुम्हें बतलाता हूँ । वह ओम् है'—इस वाक्यद्वारा समस्त श्रुतियोंकी एकार्थताका स्पष्टतः प्रतिपादन किया गया है । माण्डूक्योपनिषद्का उद्देश्य एकमात्र ॐकारके अर्थका विवेचन करना ही है । उसमें अ, उ और म—इन तीन मात्राओंके विवेचनके बाद जो चतुर्थ पादका वर्णन आया है, उसका वास्तविक अर्थ इस प्रकार बताया गया है— 'वह ब्रह्म परम शान्त, परम कल्याणमय तथा अद्वैत ( भेदशून्य ) है । वही आत्मा है ।' क्योंकि वह आत्मा सैकड़ों उपनिषदोंके द्वारा भी एक रूपसे ही जानने योग्य है । जो ब्रह्मको जानता है वह निश्चय ब्रह्म ही हो जाता है ।

सारे वेदोंका एक ही तात्पर्य है, जैसा कि 'सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति' इस कठोपनिषद्की श्रुतिसे सिद्ध होता है । कहाँतक कहा जाय, श्रुतिके शीर्ष-स्थानमें अवस्थित समस्त उपनिषदोंका तात्पर्य एक तत्त्वमें ही है । यदि पूछो, वह तात्पर्य कहाँ है ? तो इसका उत्तर यह है कि 'प्रणवमे ही है'—यही भाव कठोपनिषद्का वाक्य भी व्यक्त करता है । जैसे—

'तत्ते पदं संग्रहेण ब्रवीमि, ओमित्येतत् ।'

१२ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * और उस प्रणवका तात्पर्य किसमें है ? अद्वैत शिव-तत्त्वमे । —इस वाक्यद्वारा वृहदारण्यक उपनिषद्मे जिसके लिये क्योंकि एकमात्र प्रणवके अर्थका ही निरूपण करनेवाली प्रस्ताव किया गया है, माण्डूक्योपनिषद् प्रणवके चतुर्थ पादके अर्थका उपसहार करती 'वेदान्तेषु यमाहुरेकपुरुषम् ।' हुई कहती है— —इस श्लोकद्वारा महाकवि कालिदासने जिसका अनुवाद 'शान्त शिवमद्वैतं चतुर्थं मन्यन्ते स आत्मा स विज्ञेय ।' किया है, 'जो शान्त, शिव, अद्वैत ब्रह्म है, उसीको ज्ञानीजन 'स तस्मिन्नेवाकाशे स्त्रियमाजगाम उमा हैमवती तां प्रणवस्वरूप परमात्माका चतुर्थ पाद मानते हैं। वह आत्मा है, होवाच किमेतद् यक्षमिति । सा ब्रह्मेति होवाच ।' और वही जानने योग्य है।' इस केनोपनिषद्के प्रसङ्गमे जिसका 'ब्रह्म' के नामसे इसलिये— उपदेश किया गया है तथा उपर्युक्त माण्डूक्योपनिषद्में 'तं त्वा औपनिषदं पुरुष पृच्छामि ।' जिसका चतुर्थ पादके रूपमें उपसहार किया गया है, उस परम कल्याणमय अद्वैत ब्रह्ममें ही सम्पूर्ण उपनिषदो का परम तात्पर्य है। ज्योति-पुंज वह पाया मैंने ( रचयिता—श्रीभागवतप्रसादसिंहजी ) रक्त, मांस, हड्डीसे निर्मित काया जिसको दुलराया था, समझ रहा था जिसको अपना जीवन तक आश्रय पाया था। था मेरा संसार मनोरम, लघुतम थे जब जीवनके क्षण, कण-कणको चूमा था मैने, उलझा था कुन्तलमे यौवन । कितने बार चला छुप-छुपकर, जब थी तितली रानी मेरी. नेह लगाया निर्मम मिट्टीसे जब थी नादानी मेरी। आज खुलीं आँखें, पाता हूँ दिग-दिगन्तमें अन्धकार घन, समझ सका हूँ आज, नहीं कुछ भी अपना, वे थे स्वप्निल क्षण । दूर हुआ ज्यों ही, भूला वह, जिसको मैने प्यार किया था. उसे देखता नहीं कहीं अब, जिसपर सब कुछ वार दिया था। आज दूर मैं उस मिट्टीसे एकाकी पथपर जाता हूँ, शून्य मार्ग, आधार नहीं कुछ, कहीं न आदि-अन्त पाता हूँ। मेरे पद-तलमें आलोकित हैं ये सारे रवि, शशि, उड्डुगण, दूर व्योमकी किरण-डोरसे सभी बँधे पाते हैं जीवन । डोर पकड़ ली मैने भी वह, अपना मार्ग बनाया मैने, खोज रहा था जिसे तिमिरमे, ज्योति-पुंज वह पाया मैने। १ आपसे उस उपनिषत्प्रतिपाद्य परम पुरुषके विषयमें प्रश्न करता हूँ । २ वेदान्तों ( उपनिषदों ) में जिन्हें एकमात्र अद्वितीय 'पुरुष' कहा गया है। ३ वे इन्द्र उसी आकाशमें, जहाँ यक्ष अन्तर्धान हुआ था, एक स्त्रीके पास जा पहुँचे । वह स्त्री साक्षात् हिमवान्-कुमारी उमा थीं, उनसे इन्द्रने पूछा—'वह यक्ष कौन था ?' उन्होंने कहा—'वे परब्रह्म हैं।'

उपनिषदोंकी श्रेष्ठता (श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्य श्रीद्वारकाशारदापीठाधीश्वर अनन्तश्रीविभूषित श्रीमज्जगद्गुरु श्रीशङ्कराचार्य स्वामी श्रीअभिनव सच्चिदानन्दतीर्थजी महाराज) [स्तम्भ १] धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—इन चार प्रकारके पुरुषार्थोंमें परम निःश्रेयसरूप मोक्ष ही मनुष्यका अन्तिम लक्ष्य है—यह सबके द्वारा सुनिश्चित सिद्धान्त है। चौरासी लाख योनियोंमे बारम्बार जन्म-मरणकी प्राप्तिरूप घोर संसारसे पार होनेके लिये मनुष्यको परम शान्तिस्वरूप मोक्षकी प्राप्तिके निमित्त सतत प्रयत्न करना चाहिये। मोक्ष अमृतरूप है। उसकी प्राप्तिके लिये मानव-जन्म स्वर्ण-सुयोग है, क्योंकि मनुष्यके सिवा और किसी प्राणीको उस योनिमें रहते हुए कैवल्य-मोक्षकी सिद्धि नहीं हो सकती। इसीलिये शास्त्रोमे मानव-जन्मको अत्यन्त दुर्लभ बताया गया है— ‘जन्तूना नरजन्म दुर्लभमतरम्’ - —इत्यादि। अत प्रत्येक मनुष्यको उचित है कि वह अपने जन्मके प्रधानतम लक्ष्य मोक्षकी सिद्धिके लिये दिन रात प्रयत्न करे। यदि वह ऐसा यत्न नहीं करता, विषय-भोगोंमें फँसकर राग-द्वेषके वशीभूत हो उन विषयभोगोंकी प्राप्तिके लिये प्रयत्न करता रहता है तो निश्चय ही उसे दो पैरोंका पशु कहना चाहिये। लब्ध्वा कथञ्चिन्नरजन्म दुर्लभं तत्रापि पुंस्त्वं श्रुतिपारदर्शनम्। यस्त्वात्ममुक्तौ न यतेत मूढधी स ह्यात्महा स्वं विनिहन्त्यसद्ग्रहात्॥ ‘यदि किसी प्रकार (पुण्यविशेषसे) परम दुर्लभ मानव- जन्म पाकर उसमें भी सम्पूर्ण श्रुतियोंका आद्योपान्त अनुशीलन करनेवाले पुरुष-शरीरको पा लेनेपर भी जो मूढचित्त मानव अपनी मुक्तिके लिये प्रयत्न नहीं करता, वह आत्महत्यरा है। वह अनित्य भोगोंमें फँसे रहनेके कारण अपने-आपको विनाशके गर्तमें गिरा रहा है।’ —इत्यादि वचनोंके अनुसार मनुष्य अज्ञानके द्वारा अपनी हत्या ही करता है। अतः अपना कल्याण चाहनेवाले प्रत्येक पुरुषका कर्तव्य है कि वह क्षणमात्र सुख देनेवाले अनित्य सांसारिक विषय-भोगमें न फँसकर आध्यात्मिक साधनमें संलग्न हो सदा आत्मतत्त्वके बोधके लिये ही प्रयत्न- शील बना रहे। ‘श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्य.’ [स्तम्भ २] —इस श्रुतिके द्वारा आत्मज्ञानके लिये श्रवण, मनन और निदिध्यासन—ये तीन साधन बताये गये हैं। पहले— परीक्ष्य लोकान् कर्मचितान् ब्राह्मणो निर्वेदमायान्नास्त्यकृत कृतेन। तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत् समित्पाणि श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठम्॥ ‘कर्मतः प्राप्त हुए लोकोंकी परीक्षा करके (अर्थात् उनकी अनित्यताको भलीभाँति समझकर) ब्राह्मण उनसे विरक्त हो जाय, क्योंकि कृत (अनित्य कर्म) से अकृत (नित्य आत्म- तत्त्व) की प्राप्ति नहीं हो सकती। वह आत्मज्ञानके लिये हाथमें समिधा लेकर ब्रह्मनिष्ठ श्रोत्रिय गुरुकी ही शरणमें जाय।’ —इत्यादि शास्त्रवचनोंके अनुसार ब्रह्मनिष्ठ गुरुकी शरण लेकर और उनके समीप रहकर वेदोक्त आत्मतत्त्वका, जो दम्भ- अहङ्कार आदि विकारोंसे रहित है, श्रवण करे। वेदके चार भाग बताये जाते हैं—सहिता, ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद् । सहिता आदि भागोंमें कर्म, उपासना आदि मार्गोंका उल्लेख हुआ है। उपनिषद्में केवल ज्ञानका ही प्रतिपादन है। अतएव उपनिषद्-विद्या अन्य विद्याओंकी अपेक्षा प्रधानतम एव गौरवमयी है। इसी विद्याको लक्ष्य करके कहा जाता है कि ‘सा विद्या या विमुक्तये’ (वही वास्तविक विद्या है, जो मोक्ष दिलानेमें सहायक हो)। अध्यात्मविद्या विद्यानाम् । (गीता १०। ३२) भगवान् कहते हैं—‘मैं विद्याओंमें अध्यात्मविद्या हूँ।’ अथ परा यया तदक्षरमधिगम्यते। (मुण्डक०) ‘परा विद्या वह है, जिससे उस अविनाशी ब्रह्मका ज्ञान होता है।’ इत्यादि सब श्रुतियोंद्वारा इसीको ‘मोक्ष- दायिनी विद्या’ ‘अध्यात्मविद्या’ तथा ‘परा विद्या’ आदि नाम दिये गये हैं तथा यही विद्या सब अनर्थोंके मूलभूत ससारकी निवृत्ति करती हुई परमानन्दरूप मोक्षकी प्राप्तिका मुख्य कारण बतायी गयी है। इसीलिये इसे सबसे श्रेष्ठ कहा गया है।

१४ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * दार्शनिक विद्वान् 'उपनिषद्' शब्दकी व्युत्पत्ति इस प्रकार बतलाते हैं—'उप + नि' इन दो उपसर्गोंके साथ 'सद्' धातुसे 'क्विप्' प्रत्यय करनेपर 'उपनिषद्' इस रूपकी सिद्धि होती है। सद् धातुके तीन अर्थ हैं—विशरण (विनाश), गति (ज्ञान और प्राप्ति) तथा अवसादन (शिथिल करना)। इन अर्थोंके अनुसार— उपनिषादयति सर्वानर्थकरसंसारं विनाशयति, संसार- कारणभूतामविद्यां च शिथिलयति, ब्रह्म च गमयति इति उपनिषद्। 'जो समस्त अनर्थोंको उत्पन्न करनेवाले संसारका नाश करती, संसारकी कारणभूत अविद्या- को शिथिल करती तथा ब्रह्मकी प्राप्ति कराती है, वह उपनिषद् है।' इस प्रकार ब्रह्मविद्याको ही 'उपनिषद्' नामसे कहा गया है तथा इसका यह 'उपनिषद्' नाम सर्वथा सार्थक है। 'उपनिषद्' का दूसरा नाम 'वेदान्त' भी है। यह वेदके अन्तमें है, इसलिये वेदान्त है अथवा वेदका सिद्धान्त—चरम तात्पर्य उपनिषद्में ही वर्णित हुआ है, इस कारण इसे 'वेदान्त' नाम दिया गया है। रहस्यके अर्थमें भी 'उपनिषद्' शब्दका प्रयोग हुआ है। जैसे 'इत्युपनिषत्' (तै०) अर्थात् यह उपनिषद् है—परम रहस्यभूत आत्मतत्त्वका बोध करानेवाली विद्या है। यह आत्मतत्त्व अन्य सब रहस्योंसे अधिक रहस्य- भूत है, क्योंकि यह हमारे भीतर अत्यन्त निकट है। तथापि मनुष्य मायासे मोहित होनेके कारण इसे नहीं जान पाता। इसके सिवा इस आत्मतत्त्वरूपी रहस्यका ज्ञान हो जानेपर संसारमें दूसरी कोई वस्तु जानने योग्य शेष नहीं रह जाती। जैसा कि श्वेताश्वतर-उपनिषद्में कहा है— 'एतज्ज्ञेयं नित्यमेवात्मसंस्थ नात परं वेदितव्य हि किञ्चित् ।' छान्दोग्यमें भी कहा है—एक आत्माको भलीभाँति जान लेनेपर यहाँ सब कुछ ज्ञात हो जाता है।* ऐसा ही अन्य श्रुतियाँ भी कहती हैं। चारों वेदोंकी प्रत्येक शाखासे सम्बन्ध रखनेवाली एक-एक उपनिषद् है। वेद स्वयं अनन्त हैं, अतः उनकी शाखाएँ भी अनन्त ही होंगी। शाखाओंकी अनन्तताके कारण उपनिषदोंकी भी अनन्तता ही सिद्ध होती है। वेदोंकी अनेक शाखाएँ इस समय विलुप्त हैं तथा उनसे सम्बन्ध रखनेवाली बहुत सी उपनिषदें भी आज उपलब्ध नहीं हैं। इस समय एक सौ आठ उपनिषदें प्रकाशित हैं *। उनमें ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुण्डक, माण्डूक्य, तैत्तिरीय, ऐतरेय, छान्दोग्य और बृहदारण्यक—ये दस उपनिषदें ही गम्भीरतर अर्थका प्रतिपादन करनेवाली हैं तथा इन्हींको सब आचार्योंने ब्रह्म- विद्याके लिये प्रमाणभूत माना है। इन दसोंमें माण्डूक्य उपनिषद् सबसे छोटी और बृहदारण्यकोपनिषद् सबसे बड़ी है। सभी उपनिषदें सरल और रोचक हैं तथा सभी प्रायः अध्यात्म तत्त्वका ही बोध कराती हैं। बृहदारण्यक और छान्दोग्य उपनिषद्में यद्यपि कुछ अन्य उपासनाओंका भी उल्लेख है, तथापि ब्रह्म और आत्माके एकत्वका बोध ही प्रधान रूपसे उनका भी विषय है। सबसे अधिक रहस्यभूत आत्मतत्त्वका बोध करानेके कारण ही उपनिषदोंका स्थान सब शास्त्रोंमें अधिक ऊँचा है। उपनिषदोंमें प्रतिपादित ज्ञान ही सबसे उत्कृष्ट है। उपनिषदोंमें जिस तत्त्व-ज्ञानका विवेचन हुआ है, उससे आगे एक पग भी अबतक कोई तत्त्वज्ञानी नहीं बढ़ सका है। ऐसी उपनिषदोंके अपार ज्ञानकी निधिसे परिपूर्ण होनेके कारण ही 'यह भारतवर्ष आज सब देशोंमें परम श्रेष्ठ है' इस बातको निष्पक्ष बुद्धि रखनेवाले पाश्चात्त्य विद्वान् भी पूर्णतः स्वीकार करते हैं। इस समय संसारमे भौतिकवाद ओर नास्तिकताके भाव बढ़ गये हैं। इससे शान्तिका कहीं दर्शन नहीं होता। यदि वर्तमान समयमे तथा आगे भी जगत्मे पूर्णरूपसे वास्तविक शान्ति अपेक्षित है तो उसके लिये उपनिषदोंकी ही शरण लेनी चाहिये। उनमें बताये हुए साधनोंको ही अपनाना उचित है। जबतक उपनिषदोंके श्रवण, मनन और निदिध्यासन होते थे, तबतक देशमें सर्वत्र सुख-शान्तिमयी संपदा सुशोभित होती थी। जबसे भारतवर्ष उपनिषदोंके उपदेशपर ध्यान न देकर पाश्चात्त्य राष्ट्रोंकी भाँति भौतिकवाद और नास्तिकताका अन्धानुकरण करनेमे तत्पर हुआ, तभीसे यहाँ दरिद्रता, राग द्वेष आदि दोष, अशान्ति तथा दु समय कोलाहल बढ़ने लगे हैं। यदि अब भी भारतके मनुष्य समझसे काम लेकर अपने पूर्वज महर्षियोंके बताये हुए मार्गका आश्रय लें और उपनिषदोंकी शरण ग्रहण करें तो निश्चय ही सब प्रकारकी उन्नति और परम शान्ति उन्हें प्राप्त हो सकती है। उपनिषदोंमें ब्रह्मका स्वरूप इस प्रकार बताया गया है—


  • एकस्मिन् विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञातं भवति ।
  • अडियारसे लगभग १७९ उपनिषदोंका प्रकाशन अबतक हो चुका है—सम्पादक