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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ
४७८कम्ब रामायण

तीनो लोकों के निवासी ऐसे होते हैं, जो मुनियो के प्रति भी घनी मित्रता रखते हैं, कुछ उनके वैरी होते हैं, तो कुछ तटस्थ स्वभाव रखते हैं।

उपर्युक्त तीनों प्रकार के स्वभाववालो मे से तुम किसी के प्रति अहित कार्य न करना। अपने कर्त्तव्य कार्य पूरा करना। यदि कोई तुम्हारी निंदा करे, तो भी उसके प्रति निंदा-रहित मधुर वचन कहना। दूसरों के धन का अपहरण करने का लोभ न रखना। ये सब धर्म किसी व्यक्ति का, उसके बन्धु-परिवार-सहित, उद्धार करनेवाले होते हैं। अतः, तुम इसी प्रकार के धर्म का आचरण करना।

हे पुष्ट कंधोंवाले! किसी को बलहीन जानकर उसे दुःख न देना। मैं (अपने बाल्यकाल में) इम धर्म-मार्ग की सीमा को पारकर गया था और शरीर से विकृत होकर भी बुद्धि से बढी हुई कुब्जी के कारण राज्यभ्रष्ट हो गया¹ और कठोर दुःख-सागर मे डूबा।

यह निश्चित जानो कि स्त्रियो के कारण पुरुषो को मृत्यु प्राप्त होती है। वाली का जीवन ही इसका प्रमाण है और उन्ही स्त्रियों के कारण दुःख और अपवाद भी उत्पन्न होते हैं। यह तुम मेरे जीवन से जान सकते हो। इस विषय के ज्ञान से बढकर अन्य हित-कारी शिक्षा क्या हो सकती है?

अपनी प्रजा की इस प्रकार रक्षा करना कि वे यह कहे कि, हमारे राजा राजा नहीं हैं, किन्तु हमारा लालन-पालन करनेवाली माता हैं। ऐसा आचरण करते हुए भी यदि कोई व्यक्ति तुम्हारा अहित करे, तो उसे धर्म से स्खलित न होते हुए दड देना।

यथार्थ का विचार करें तो (विदित होगा कि) जन्म और मृत्यु सर्वदा, अपने-अपने कार्यों के परिणामस्वरूप ही होती है। कमलभव ब्रह्मा ही क्यो न हो, धर्म से स्खलित होने पर विनाश को प्राप्त होता है। धर्म का अंत जीवन का अत है—यह बडे लोगो का कथन है, अब अन्यों के बारे में क्या कहा जाय?

परस्पर के आघात से उन्माद उत्पन्न करनेवाले मल्लयुद्ध मे कुशल वीर! सपन्नता और निर्धनता—दोनो जीवो के पुण्य और पाप के फलो के अतिरिक्त और भी कुछ हैं, इसे अनुपम शास्त्रो मे निपुण विद्वान् भी नही जानते (अर्थात्, प्राणियो के पाप-पुण्य के फलस्वरूप ही निर्धनता और सपन्नता होती है)। अतः, पुण्य को छोड़कर क्या पाप को ग्रहण करना कभी उचित हो सकता है?

यही राजाओ के योग्य कर्तव्य है। विधि के अनुसार तुम राज्य करो और समीप आई हुई वर्षा ऋतु के व्यतीत होने के पश्चात् अपनी समुद्र-सदृश विशाल सेना को लेकर मेरे पास आओ। अब तुम जाओ—यों उस सुन्दर (राम) ने कहा। तब सुग्रीव ने कहा—

हे उदार! वृक्षो तथा जलाशयो से भरा हुआ (किष्किन्धा के) पर्वत वानरो का निवास है, केवल यही तो इसमें दोष है। अन्यथा यह स्थान सभा-मडप से विभूषित


१. इस पद्य में उस घटना की ओर सकेत है कि रामचन्द्र बचपन में अपने धनुष से मथरा के पृष्ठड को लक्ष्य करके मिट्टी की गोली मारते थे, जिससे मथरा मन-ही-मन चिढ़ती थी। इसी का बदला लेने के लिए मथरा ने ऐसा उपाय किया, जिससे रामचन्द्र को राज्य-भ्रष्ट होकर वन जाना पड़ा।—अनु०

किष्किन्धाकाण्ड ४७६

स्वर्ग से भी अधिक मनोहर हैं। अतः, तुम कुछ दिन हमारे यहाँ आकर ठहरो, जिससे हम तुम्हारी करुणापूर्ण आज्ञा का पालन कर सकें।

हे अरिंदम ! तुम्हारी शरण मे आकर हम तुम्हारी करुणा के पात्र बने हैं। तुमसे वियुक्त होकर जो ऐश्वर्य्य हम पायेगे, वह दरिद्रता से भी अधिक गर्हित होगा। अतः, जबतक तुम्हारी देवी का अन्वेषण करने का समय न आवे, तबतक तुम हमारे साथ (नगर मे) आकर ठहरने की कृपा करो--यो कहकर सुग्रीव ( राम के ) चरणो पर गिर पड़ा।

यह वचन सुनकर महाभाग ने मधुर मदहास करते हुए कहा--राजाओ के निवास-योग्य नगर, मेरे जैसे व्रतधारियो के लिए योग्य नही है और यदि मै वहाँ आऊँ, तो मेरी सेवा में ही तुम्हारा सारा समय लग जायगा। तुम, विचार कर किये जाने योग्य शासन-कार्य से, स्खलित हो जाओगे।

हे चिरजीव ! मैने यह प्रण किया है कि चौदह वर्ष वन में रहूँगा। अतः, (इस अवधि मे) मै राजाओ के निवास मे नही ठहर सकूँगा। हे दृढ तथा सुन्दर कधोवाले ! वीणा-नाद-सदृश स्वरवाली अपनी देवी के बिना क्या मै सुख भोग सकूँगा ? यह तुमने कदाचित् सोचा नही।

हे तात ! यह अपवाद क्या त्रिभुवनो के विनाश होने पर भी मिट सकेगा कि, राक्षस के द्वारा अपनी पत्नी के बंदी बनाकर रखे जाने पर भी राम, स्वय, अपने प्यारे मित्रो महित, अपार सुखो का भोग करता रहा।

जिन लोगो ने गृहस्थाश्रम का त्याग नही किया है, वैसे लोगो के लिए योग्य धर्म को मैने पूरा नही किया। युद्ध मे धनुष लेकर किये जानेवाले कर्त्तव्य को भी मैने पूर्ण नही किया। यो व्यर्थ जीवन बितानेवाले मुझ-जैसे के लिए सब ( सुग्रीव के साथ नगर मे रहना इत्यादि ) महत्त्वहीन क्षुद्र कार्य हैं। उत्तम गृहस्थ-धर्म को छोड़कर, वानप्रस्थ व्रत का आचरण करके मै अपने पापो का परिहार करूँगा। --यो राम ने कहा।

फिर कहने के लिए सुकर, किंतु करने के लिए दुष्कर सच्चारित्र्य में स्थिर रहने-वाले ( राम ) ने आगे कहा--हे वीर ! शामन के सब कार्यों को यथाविधि पूर्ण करके चार माम व्यतीत होने पर, उत्तुग तरगो से पूर्ण समुद्र-सदृश अपनी सेना को साथ लेकर मेरे निकट आओ। यही तुमसे मेरी प्रार्थना है।

वानरो का नेता इसके विरुद्ध कुछ नही कह सका। यह सोचकर कि गगनोन्नत ( गंभीर ) आकारवाले तथा तपस्वी वेषधारी ( राम ) के मन के अनुसार करना ही दोष-मुक्त बनने का उपाय है, अपने विशाल नयनो से अश्रु बहाता हुआ दडवत् किया और अकथनीय दुःख को मन में भरकर वहाँ से चला।

वाली-पुत्र ( अगद ) गम के चरण-कमलो मे प्रणत हुआ। उसे सकरुण देखकर नीले मेघ-जैसे उन महान् ने कहा--तुम शीलवान् हो। इम ( सुग्रीव ) को अपने पिता का भाई जानकर उसकी आज्ञा मे स्थिर रहो।

इम प्रकार के वचन कहकर सुग्रीव के साथ उसको भेज दिया। तब तुरत ही यशस्वी तथा गुणवान् अगद, उनके उत्तम चरणो को नमस्कार करके विदा हुआ। फिर.

४८०कंब रामायण

प्रभु ने मारुति को देखकर कहा—हे सुन्दर वीर ! तुम भी उस राजा (सुग्रीव) के शासन के योग्य कार्य अपने विवेक से पूरा करते रहो ।

प्रेम से परिपूर्ण तथा असत्य-रहित मनवाले हनुमान् ने यह कहकर कि, यह दास यहीं रहकर (आपकी) आज्ञा के अनुसार योग्य सेवा करता रहेगा, उनके पदयुगल पर गिर पड़ा । तब सत्य में दृढ रहनेवाले प्रभु ने कहा—

एक प्रतापी राजा के द्वारा शासित अपार ऐश्वर्य से युक्त राज्य को जब दूसरा कोई वीर बलात् हस्तगत कर लेता है, तब उससे सदा भलाई ही हो, ऐसी बात नहीं। किन्तु, उससे कभी बुराई भी उत्पन्न हो सकती है। अतः, हे तात ! वैसा राज्य तुम-जैसे बड़े दायित्व का वहन कर सकनेवाले विवेकी पुरुष से ही स्थिर रह सकता है ।

(गुणों से) परिपूर्ण उस (सुग्रीव) के राज्य को स्थिर बनाकर, उसके पश्चात् मेरे कार्य को पूरा कर सकनेवाला (पुरुष) तुमसे बढ़कर और कौन है ? अतः, तुम मेरी इच्छा के अनुसार, साकार धर्म-जैसे उसके पास जाओ ।

चक्रधारी के ये वचन कहने पर मारुति ने नमस्कार करके कहा—हे प्रभु ! आप विजयी हों ! यदि आपकी यही आज्ञा है, तो यह दास वैसा ही करेगा । और, वहाँ से चला गया । पुरातन सृष्टि के नायक (राम) भी मुखपट्टधारी बड़े हाथी के सदृश अपने भाई के साथ एक ऊँचे पर्वत पर चले गये ।

आर्य (राम) की आज्ञा से सुग्रीव विशाल किष्किन्धा में जा पहुँचा और महिमा-वान् मन्त्रियों तथा बंधुजनों से युक्त होकर तारा को प्रणाम किया और उसको अपनी माता तथा अपने अग्रज के उपदेशों को ही अपना पिता मानकर, उत्तम रीति से शासन करता रहा ।

वह अपार ऐश्वर्य को प्राप्त कर, आनन्द से शासन करता रहा । अन्य वानर उसके अनुकूल आचरण करते रहे। उसका शासन-चक्र दिगन्तों में व्याप्त हुआ । अपार पराक्रम-युक्त अंगद को उसने राज्य का युवराज-पद दिया ।

उदार (राम), वहाँ से चलकर मतंग महर्षि के आवासभूत गगनस्पर्शी (ऋष्यमूक) पर्वत पर जाकर ठहरे, जहाँ उनके उस भाई ने, जिसके मन की सच्ची भक्ति को भर-भरकर लिया जा सकता है, प्रेम से पर्णशाला बनाई थी । यों वे विश्राम करते रहे । (१-५४)


अध्याय ६

वर्षाकाल पटल

सूर्य, महिमा-भरी उत्तर दिशा से (दक्षिण दिशा की ओर) चल पड़ा, मानों चित्रप्रतिमा-समान उज्ज्वल तथा लावण्ययुक्त (सीता) देवी का अन्वेषण करने के लिए देवाधिप (राम) के द्वारा पहले भेजा गया दूत हो ।

किष्किन्धाकाण्ड ४८१

सजल मेघ इस प्रकार शोभायमान हो रहे थे, जिस प्रकार अनेक फनवाले सूर्यराज के द्वारा धारण की गई पृथ्वी-रूपी दीपक मे शब्दायमान समुद्र रूपी तैल के मध्य मेरुपर्वत-रूपी बत्ती की सूर्य-रूपी ज्वाला से उत्पन्न अञ्जन हो ।

घने वादलो के छा जाने से अन्धकार-भरा आकाश का रग ऐसा था, जैसे समुद्र से उत्पन्न अति भयंकर हलाहल विष को पीनेवाले ललाट-नेत्र (शिव) का कंठ हो । उससे सूर्य की किरणें भी तापहीन हो शीतल हो गईं ।

नील आकाश, विष के समान, शीतल तथा विशाल सागर के समान, तरुणियों के अञ्जन-लगे नयनो के समान, (उनके) बिखरे केश-पाशों के समान, मायावी राक्षसो के शरीरो के समान, (उनके) पापकर्मों के समान और (उनके) मन के समान ही कालिमा-मय हो गया ।

वे मेघ, जिन्होने अनेक दिनों से शीतल समुद्र के जल को अपनी जिह्वा से अघाकर पिया था और जिनमें बिजलियाँ चमक रही थी, ऐसे लगते थे, जैसे करवालधारी वीरो के युद्ध में करवालों के आघात से घायल होकर मदजलस्रावी गजराज पड़े हों ।

उदर में जल से भरी हुई काली घनी घटाएँ बडे-बडे काले हाथियों की पंक्तियों के समान थीं और उनके उमड़ने से ऐसा घोर शब्द होता था, मानो तरंग-समान काले समुद्र का विशाल जल ही अनन्त आकाश में छा गया हो ।

कौंधनेवाली बिजलियाँ, इन्द्र आदि देवताओ के चमकते हुए आभरणो की जैसी थी, पर्वतों में फैलकर सब वस्तुओं को जलानेवाली अग्नि के समान थी तथा अनिन्दनीय दिशाओं की हंसी की जैसी थी ।

वर्षाकालिक काली घन-घटा एक भट्ठी की समता करती थी, जहाँ दिशा-रूपी लुहार, सब वस्तुओं से अधिक कालिमापूर्ण आकाश-रूपी कोयले की राशि में उत्तर दिशा की अतिवेगवान् पवन-रूपी बड़ी भाथी लगाकर तीक्ष्ण अग्नि-ज्वालाओं को भड़का रहा था ।

आकाश में तथा दिशाओं में बिजलियाँ इस प्रकार कौंध उठीं, जैसे अपने प्रियतम के वियोग में तरुणियाँ तड़प उठी हों, धरती के गर्भ में स्थित सर्प जलकर तड़प उठे हो, या सूर्य-किरणों को काट-काटकर दिशाओं में फेंक दिया गया हो, अथवा वज्र की लपलपाती जिह्वाएँ तड़प उठी हों ।

वे बिजलियाँ ऐसी थीं, जैसे मणिकिरीटधारी मायावी विद्याधरों के द्वारा कोश से निकालकर घुमाये जानेवाले (शत्रुओं के) रक्त-सिंचित करवाल हों, अथवा दिक्पालों के साथ यात्रा करनेवाले दिग्गजों के मुखपट्ट हों, जो हिल-डुलकर चमक रहे हों ।

वे बिजलियाँ यों चमक उठी, मानों अष्ट दिशाओ में धरती को धारण करनेवाले अष्ट महानागों की जिह्वाएँ व्यास हो रही हों। उस समय झंझावात यों वह चला, मानो विष्णु की कांति के समान काली बनी हुई घटाएँ (अपने गर्भ के भार से) निःश्वास भर रही हो ।

वह वर्षाकालिक पवन ऊँच-नीच का भेद किये विना पर्वतों, वृक्षों तथा अन्य सब प्रदेशों मे वारनारियों के उस चञ्चल मन के समान फैल गया, जो (मन) केवल धन की कामना करके धन देनेवाले किसी भी व्यक्ति के समीप जा पहुँचता है ।

४८२ | कंब रामायण

उत्तर दिशा का वात, अपने प्रियतमो के विरह में पीडित रहनेवाली तरुणियो के तप्त स्तन-तटो को और भी तपाता हुआ वह चला और उस प्रकार बढ चला, मानो कोई पिशाच हो, जो ( उन स्तनो को ) पुष्ट मांसखंड समझकर उनको काटकर खा डालने के लिए चल पड़ा हो।

बड़े शब्द के साथ धूलि ऊपर उठकर आकाश को रूँधने लगी, बिजलियाँ तीक्ष्ण तलवारो के समान घूम-घूमकर चमकने लगी। मेघ पुष्प-मालाओ से अलंकृत बडे नगाडों के जैसे गरजने लगे। आकाश एक बड़े युद्ध-रंग के समान दृष्टिगत होने लगा।

मधुर मदहास करनेवाली जानकी से बिछुडे हुए रामचन्द्र पर मन्मथ पुष्प-बाण बरसा रहा हो—उसी प्रकार बिजलियो से पूर्ण मेघ-मण्डल उस स्वर्णमय पर्वत पर जल-धाराएँ बरसाने लगा।

जल-धाराएँ मेघों के मध्य-स्थित धनुष से प्रयुक्त शरो के समान वेग से पहाड़ों पर आकर गिरती थी, मेघों से उत्पन्न रक्तवर्ण वज्राग्नि के कण ऐसे गिरे, जैसे रात्रि के समय अत्युज्ज्वल रत्न-कण बरस रहे हों।

योद्धा लोग शत्रुओं के बडे हाथियों पर चमकते हुए बरछे प्रयुक्त कर रहे हो—ऐसे ही मेघ पर्वत पर जल-धाराएँ बरसा रहे थे। उन अवार्य जल-धाराओ के प्रहार से शिलाखड टूट-टूटकर ऐसे लुढक रहे थे, जैसे लाल बिंदियोंवाले उत्तम लक्षण-सम्पन्न गज आहत होकर लुढक जाते हो।

मेघ, मीनकेतन (मन्मथ) था, इन्द्र-धनुष ईख का कमान था, बरसती जल-धाराएँ पुष्प-शर थी, पर्वत की दीर्घ घाटियाँ विरहीजन थी, उन पर्वत-शिलाओ पर जल-धाराएँ यो गिरती थी, जैसे मांसल शरीर में शर चुभ जाते हों।

देवता, यह कहकर कि पवित्र मूर्त्ति ( श्रीराम ) तथा कपिगण दोनो मिलकर अब हमारे शत्रुओं ( रावणादि राक्षसों ) को शीघ्र ही मिटा देंगे गर्जन कर उठे हों—यों मेघ गरज उठे, जल-विन्दु पुष्प-वर्षा के समान बरस पडे।

सुन्दर धनुष धारण करनेवाला राक्षस रावण, जब करवाल लिये हुए ( सीता को ) उठाकर आकाश-मार्ग से त्वरित गति से ले जा रहा था, तब उस नारी-रत्न, आभरण-भूषित देवी (सीता) के नयन जिस प्रकार अश्रुवर्षा करने लगे थे, उसी प्रकार मेघ बरस पडे।

शिर पर चन्द्र को धारण करनेवाले भगवान् ( शिव ) आकाश-मार्ग में उडनेवाले तीनो पुरों को दग्ध करने के लिए अग्निमुखी शर प्रयुक्त कर रहे हों—ऐसी लगती थी चमकती हुई बिजलियाँ, वे सान पर रगड़कर पैनाये गये और चमकते हुए बरछों के समान ही विरह-तप्त पुरुषों के मन को दग्ध कर रही थी, जिससे विरहीजन तडप उठे।

वे वर्षाकालिक संपत्ति का अर्जन करने के लिए दूर देशों मे गये हुए जनों के वियोग मे निष्प्राण बनी हुई विरहिणियों को उनके प्रियतम-रूपी प्राणों को चक्रवाले रथों-पर शीघ्र ला देने थे, अत मूर्च्छा उत्पन्न करनेवाली विरह-व्याधि-रूपी सर्प के विनाश के लिए वे ( मेघ ) गरुड के समान थे ।¹


¹ वर्षाऋतु में प्रवास में गये हुए प्रेमी अपने घर वापस आ जाते हैं, अतः मेघ विरहिणियों का, वियोग में दुःख को दूर करनेवाला, साथी है।— अनु०

किष्किन्धाकाण्ड ४८३

बड़े मेघ, बारी-बारी से गरज रहे थे. और जल बरसाते हुए एक-दूसरे के निकट आकर टकराते थे, जैसे बड़े-बड़े हाथी गरजते हुए और मदजल को बहाते हुए क्रोध के साथ दौड़कर एक दूसरे से टकरा जाते हों।

हवाएँ बारी-बारी विभिन्न दिशाओं से बहती थी। मेघ अपने चंचल तथा छोटे जल-विन्दुओं को शरो की बौछार के समान अपने लक्ष्य पर प्रयुक्त करते थे। वह दृश्य ऐसा था, जैसे एक दिशा दूसरी दिशा से युद्ध कर रही हो।

अपनी प्रियतमाओं को छोड़कर दूसरे राज्यों पर विजय प्राप्त करने के लिए गये हुए राजा लोग (वर्षा के आगमन पर) लौटकर आ गये हों और उनके आगमन से पहले निष्प्राण बनी हुई (उनकी पत्नियों की) देह में प्राण के लौट आने मे वे तरुणियाँ निःश्वास भर उठी हों—उसी प्रकार वृक्षों की सूखी शाखाएँ वर्षा के आगमन से पल्लवित होकर नव सौन्दर्य के साथ विकसितमुख-सी दिखाई पड़ती थी।

पाटलवृक्ष (पुष्पहीन हो) दरिद्रता प्रकट करते थे। दिनकर शीतल बन गया, श्वेतकुमुद समृद्ध बन गये। कुवलय-पुष्प निर्धन बन गये। मयूर सम्पत्ति पाये हुए व्यक्ति के समान नाच उठे। कोकिल वियुक्त प्रियतमों के जैसे शिथिल हो चुप हो रहे।

उन पर्वत-सानुओं में जहाँ विविध रंगवाले भ्रमर तथा तितलियाँ उत्तम रत्नो के समान विश्राम करती थी, मधु के भार से झुककर हिलनेवाले अर्द्ध-विकसित रक्त कांदल-पुष्प ऐसा दृश्य उपस्थित करते थे, मानों विशाल धरती-रूपी तरुणी वर्षाकाल के सौन्दर्य पर मुग्ध होकर, यह विचार कर कि वसंत को भी इस वर्षाकाल ने जीत लिया है, अपने हाथ हिलाती बसन्त ऋतु का तिरस्कार कर रही हो।

करवाल-समान तीक्ष्ण दंतोंवाले सर्प, दीर्घनाल, श्वेतकुमुद की लताओ से जोडन (सर्पों) के फन के जैसे ही पुष्पों को शिर पर धारण किये हुए थे, प्रेम से लिपट जाते थे और उनसे हटते नही थे। वे श्वेतकुमुद भी उन काममत्त सर्पों के समान ही होकर उनसे उलझे पड़े रहते थे।

इन्द्रगोप इस प्रकार फैले थे कि धरती पर तिल रखने का भी स्थान नही था, वे चिरकाल के प्रवास के उपरात लौटे हुए अपने प्रियतमों से मिलनेवाली अगरु तथा पुष्प-वासित कुतलोंवाली तरुणियों के द्वारा वार-बार थूकी हुई पान की पीक के समान ही बिखरे हुए थे।

उस गगनचुंबी मेरुपर्वत से, जिसपर मधुर जम्बूफलों से भरे हुए वृक्ष होते हैं, स्वर्ण को बहाकर ले चलनेवाली (जम्बू-नामक) नदी जिस प्रकार बहती है, उसी प्रकार जलधाराएँ कर्णिकार, बेंगे आदि पुष्पों को बहाती हुई उस पर्वत से बह रही थी।

सुन्दर तथा दीर्घनाल रक्तकुमुद तथा कर्णिकार मनोहर इन्द्रगोपों से भरे हुए ऐसे लगते थे, जैसे पृथ्वी देवी मधुरगान करनेवाले भ्रमरो को अपने विकसित करों को उठा-कर स्वर्ण तथा रत्न प्रदान कर रही हो।

धैवत स्वर मे गानेवाले भ्रमर 'ताल' के समान थे। बिजली, गर्जन तथा वर्षा से युक्त मेघ चर्म से आवृत 'मर्दल' के समान थे। मयूर, कंकण-धारिणी नायिकाओं के समान थे।

४८४कंब रामायण

रक्तकुमुद नाट्य-रंग पर रखे हुए दीपो की पंक्तियों के समान थे। कोमल 'करुविल' पुष्प दर्शको के नेत्रों के समान थे।

भ्रमर और भ्रमरी के वेग से उड़कर आने से उत्पन्न होनेवाली ध्वनि, उनके टकराने से उत्पन्न होनेवाली ध्वनि—दोनों ध्वनियाँ—देवागनाओ के नृत्य की ध्वनि की समता करती थी। 'कूदाल' के विशाल पुष्प ऐसे विकसित थे, जैसे उन (देवागनाओ) के अमृत-समान आर्यभाषा (सस्कृत) के गीतों के गायन के उपयुक्त बडे भाल हों।

पुन्नाग के वनों से बहनेवाली नदियाँ अपने पुत्रो के लिए पुष्ट पर्वत-रूपी स्तनों से स्रवित धरतीमाता की दुग्ध-धाराओं के समान थी। कर्णिकार वृक्ष ऐसे थे, मानों धन की इच्छा से आकर याचना करनेवालो को सदा दान देने के लिए अपनी शाखाओ में स्वर्ण-खंडों को लटकाये हुए खड़े हों।

पुष्प-भरे वनों में सर्वत्र मधुर गान करनेवाला विविध चित्तियों से युक्त भ्रमर आदि कीडे भरे हुए थे, जो दर्शकों को वड़ा आनन्द देते थे, हरिण अपने मार्ग में पड़नेवाले वृक्षों से रगड़ खाते हुए और उस कारण से (चन्दन, अगरु आदि) विविध सुगंधों से युक्त होकर आते थे और हरिणियाँ उन्हें (उनकी गंध के कारण) कोई दूसरा मृग समझकर उनसे रूठ जाती थी।

अपने प्रियतम के रथारूढ होकर प्रवास में चले जाने पर जिस प्रकार विरहिणी तरुणियों के भाले-सदृश नयन आनन्दहीन हो मुकुलित हो जाते हैं, उसी प्रकार कुवलय-पुष्प बद हो गये। मन्मथ-सदृश अपने प्रियतमों के आगमन पर जिस प्रकार उमंग से भरी उन तरुणियों का किंचित् दत-प्रकाशन से युक्त मदहास छिटक पडता है, उसी प्रकार कुदललताएँ पुष्पित हो उठी।

पर्वत से प्रवहमाण जलधाराएँ स्वर्ण को बहुलता से दोनों ओर बिखेरने लगीं, मानों आनन्द-नृत्य करनेवाले मयूरों को देखकर उन्हें नटवर्ग समझकर राजा लोग उन्हें भूरि-भूरि पुरस्कार दे रहे हों। कमललताएँ जल-मध्य इस प्रकार उठी हुई थी, मानों गगनपथ में आनेवाले मेघो को देखकर उन्हें अतिथि समझकर आनन्दित हुई (गृहस्थ-धर्म मे निरत) तरुणियों के वदन हों।

कामशास्त्र मे निपुण विटों के समान ही भ्रमर सद्योविकसित मधुपूर्ण पुष्पों का आलिंगन करते हुए उनके मधु का संचय करने लगे। वे ऐसे थे, मानों कविगण भरतशास्त्र के अनुसार नाटक का निर्माण करने के उद्देश्य से सफल अर्थ-व्यवस्था के अनुकूल रस-सञ्चय कर रहे हों।

हिरण अत्यन्त आनन्दित हो उठे, मानों यह सोचकर ही वे ऐसे प्रसन्न हुए हों कि हमे अपनी चितवन से परास्त करनेवाली सूक्ष्म कटि-युक्त अति सुन्दरी (सीता) को एक राक्षस ने हमारा ही रूप धारण कर दुःसह दुःख दिया है, इस कारण से उत्पन्न अपने आनन्द को हम शब्दों में व्यक्त नही कर पाते।

हस छोटी नदियों मे गोते लगाकर इस प्रकार आनन्दित होने लगे. मानों

किष्किन्धाकाण्ड ४८५

दीर्घकाल के विरह से पीडित होने के कारण अब अति प्रेम के साथ अपनी प्रियतमाओ से मिलकर भरपूर आनन्द उठा रहे हो ।

अपार सागर से जल भरकर चलनेवाले काले मेघो के निकट ही पक्ति बाँधकर उड़नेवाले अति धवल बगुलों का झुण्ड कृष्ण नामक काले वर्णवाले भगवान् के वक्ष पर शोभायमान मुक्ताहार के सदृश लगता था ।

सारस पक्षी, जो पक्ति बाँधकर एक-दूसरे से सटकर वर्षाकालिक काले मेघ के निकट हो गगन में उड़ रहे थे, वे दिव्य देवों के द्वारा लक्ष्मी के नायक के रूप में वर्णित अनुपम भगवान् के वक्ष पर शोभायमान उत्तरीय वस्त्र की समता करते थे ।

अधिक ताप उत्पन्न करनेवाले धूप-रूपी राजा के हट जाने तथा उत्तम सद्गुणो से भरे वर्षाकाल-रूपी राजा के आगमन के कारण विशाल पृथ्वी देवी अपने महिमामय मन में आनन्दित और शरीर से रोमाञ्चित हो उठी हो—हरियाली इस प्रकार का दृश्य उपस्थित कर रही थी ।

मयूर ऐसे लगते थे, मानो मधुवर्षी कमलपुष्प में उत्पन्न ब्रह्मा अति ज्ञानवान्, (देव) तत्त्व-ज्ञान के नायक (अर्थात्, वेद आदि के द्वारा प्रशंसित विष्णु के अवतार श्रीरामचन्द्र) के दुःख को देखकर उनका उपकार करने के उद्देश्य से कानन में सर्वत्र अपनी आँखें फैलाये हुए देवी सीता का अन्वेषण कर रहे हों ।

कमलपुष्प ऐसे शोभित हो रहे थे, जैसे तरुणियो के वे चरण हो, जिनमें (शत्रुओ के रक्त से) रक्तवर्ण हुए भालों तथा दृढ धनुषों को धारण करनेवाले वीर पुरुषों के केशों को भी नया रंग देनेवाले महावर का रस लगा हुआ हो । (भाव यह है कि तरुणियों के चरण महावर से रंजित थे । प्रणय-कलह के समय वे तरुणियां अपने प्रियतमों के सिर पर पदाघात करती, तो उससे उन पुरुषों के काले केश भी लाल रंगवाले बन जाते थे ।)

कोकिल मौन हो रहे, मानो उनके प्रति राघव के यह आदेश देने पर कि तुम अपनी जैसी ही बोलीवाली देवी को ढूँढ़कर लाओ, पृथ्वी में सर्वत्र घूम-घूमकर (देवी सीता को) बुलाते रहे हों और अब थककर चुप हो गये हों ।

वर्षा-सिंचित भूमि पर उगी हुई हरी घास को अघाकर चरनेवाली गायें यत्र-तत्र उगे हुए ‘मालान’ नामक छोटे पौधों को अपने खुरों से उखाड़ देती थी । वे पौधे, जिनमे सफेद पुष्प लगे थे, बिखरे हुए गाढ़े दही का दृश्य उपस्थित करते थे । ‘पिडव’ नामक पौधे के पुष्प, मधु-सदृश मीठी बोलीवाली कुड्मल-सदृश स्तनोंवाली ग्वालिनों के घटो में से छलकनेवाले दूध के झाग का दृश्य उपस्थित करती थी ।

‘वैंगै’ नामक वृक्ष, भीलनियों के केशों के समान सुरभित थे । पुन्नाग-वृक्ष मछुआ-त्रियों के केशों के समान गध से युक्त थे, जिनसे शीघ्रगामी भ्रमरकुल आकृष्ट हो रहा था । उत्पल-पुष्प अन्त्यज जाति की स्त्रियों के केशों के समान गध से युक्त थे । नवोविकसित कुंदलताएँ ग्वालिनों के केश के समान महक रही थीं ।

श्रीरामचन्द्र ने देवी सीता के वदन को नहीं, किन्तु मरणदायक मन्मथ को असंख्य सहस्र पुष्पबाण प्रदान करनेवाले वर्षाकाल को ही देखा । वे दुःख-सागर का पार नहीं देख पा

४८६ | कंब रामायण

रहे थे। वे मूच्छित हो गये, नहीं तो वे किसको देखकर अपने प्राण को वश में रख सकते थे ?

सीमाहीन वर्षाकाल के आगमन से मनुष्य शिथिलमन हो जाते हैं—यह कथन तपस्या करनेवाले मुनियों के विषय में भी सत्य सिद्ध होता है तब उन प्रभु के दुःखी होने में क्या आश्चर्य हो सकता है, जो मधु तथा अमृत से भी अधिक मधुर बोलीवाली धवल (शंख)-वलयधारिणी सीता की भुजाओं का आलिंगन-सुख प्राप्त करते रहते थे।

नीलोत्पल, नीलकमल, अतसी-पुष्प आदि की समानता करनेवाले वे प्रभु शोकोद्विग्न हुए। वे ऐसी आशंका उत्पन्न करते थे कि कदाचित् इनकी देह में प्राण नहीं हों। इस प्रकार, व्याकुल होकर हंसिनी-सदृश सहज सुन्दरी सीता देवी के संबंध में निम्नलिखित वचन कह उठे—

हे काले मेघ ! राक्षसों ने कंचुकाबद्ध स्तनोंवाली सीता को कहाँ ले जाकर छिपा रखा है ? उन (राक्षसों) का आवास कहाँ है ? यह भी मैं नहीं जान पाया हूँ, तो भी मैं जीवित हूँ। तुम जल से भरे हो, तो भी क्या तुम में दया नहीं है ? मेरे प्राणों को क्यों व्याकुल कर रहे हो ?

तुम विद्युत्-रूपी दंतों से भयंकर हो। अपने काले रूप को गगन में सब ओर फैलाकर तुम बढ़ते हो। पापी तथा मायावी राक्षसों की समता करनेवाले तुम क्या मेरे प्राणों का हरण किये बिना नहीं हटनेवाले हो ?

हे मयूर ! बरछे तथा तीर के समान तीक्ष्ण नयनोंवाली तथा समुद्र में उत्पन्न दिव्य अमृत एवं कोकिल के सदृश बोलीवाली मेरी देवी को ढूँढ़कर नहीं लाते हो। तुम बड़े कठोर हो। मुझ एकाकी तथा निद्राहीन रहनेवाले की मनोव्यथा को जानते हुए भी क्यों अपना बल दिखाकर मुझे सताते हो ?

हे लता ! वर्षाकालिक उत्तरी पवन के अनुसार तुम हिल-डुलकर मेरे प्राणों में घुम जाती हो। तुम अब पुष्पमय हो गई हो और उज्ज्वल ललाटवाली सीता की कटि के समान ही लचक-लचककर क्यों मेरे प्राणों को गला रही हो ?

हे हरिण ! किसी भी स्पृहणीय वस्तु को मैं अब नहीं चाहता हूँ। पराक्रमपूर्ण कार्य भी कुछ नहीं कर पा रहा हूँ। प्रज्ञा के मिट जाने से अब मैं कैसे जीवित रह सकूँगा ? मेरे प्राण-समान देवी मुझसे वियुक्त हो चली गयी हैं। तुम कहो कि वह अब कहाँ हैं ?

हे मेरे प्राण ! पाद-कटक से भूषित तथा रूई के समान मृदुल चरणोंवाली दोषहीन जानकी के साथ ही क्या तुम भी मुझे छोड़कर जाना चाहते हो ? यदि ऐसा करना था, तो जब देवी मुझसे वियुक्त हुई, तभी तुम भी निश्शंक होकर मुझे छोड़ जाते। हे मिटनेवाले, (मेरे प्राण) ! क्या तुम्हें उस देवी के साथ का अपना सम्बन्ध तब ज्ञात नहीं हुआ था ?

हे निष्ठुर ! 'कानरे' वृक्ष, जानकी के केशों के साथ तुम्हारा वैर था, अतः तुम मेरे साथ भी कड़ा वैर निकाल रहे हो ? तुम उस (जानकी) को मुझे नहीं ला देते। उसके बारे में कुछ कहते भी नहीं, भला तुम कब मेरे हितकारी रहे ?

कुरवंड पुष्प-सदृश तीक्ष्ण एवं उज्ज्वल दंतोंवाले घोर सर्प विष के समान ही यह काम्पू पुष्पों से भरित कुन्दलता भी प्राणहारी बन गई है। दुस्सह पीडाग्नि को प्रज्वलित कर

किष्किन्धाकाण्ड ४८७

मुझे निरन्तर सताते रहनेवाले यह (इन्द्रगोप) क्या एक ही हैं ? (अर्थात्, पीडा देनेवाले अनेक हैं)। इस 'रावणकोप' के रहते हुए यह 'इन्द्रगोप'१ भी क्यों मुझे सताने लगा है ?

स्वर्णमय ललाट-पट्ट (ताज) पहनने योग्य ललाटवाली सीता को धोखे से हरण करने के लिए मारीच एक स्वर्णमय हिरण के रूप में आया था। अब यम (मेरे प्राणों का हरण करने के लिए) उत्तरी पवन के रूप में आया है। अहो, अहित करनेवालों को अपने इच्छानुसार रूप धरना भी संभव होता है।

भयंकर कृत्यवाले राक्षसों के समान आकाश में घोर गर्जन करनेवाले हे मेघ ! तुम बार-बार चमककर कमल-पुष्प के आवास को तजकर (मिथिला में) अवतीर्ण हुई उस (लक्ष्मी) देवी को दिखा रहे हो। क्या तुम्हारे मन में मुझपर इतनी दया उत्पन्न हो गई है कि उस सीता को लाकर मुझे देनेवाले हो ?

हे मोर (प्राणियों को पीडा देनेवाला हे मन्मथ) ! विरह-ताप मेरे अन्तर में न समाकर उमड़ रहा है और मेरे प्राणों को जला रहा है। अब (प्राणों के जल जाने के बाद भी) तुम मेरे अन्दर में पुनः-पुनः शर छोड़कर घाव कर रहे हो। यह तुम्हारा कार्य व्यर्थ है। प्रशंसनीय विद्या से युक्त मेरा अनुज यदि तुम्हें एक बार भी देख ले, तो फिर उसके क्रोध को रोकना असंभव होगा।

हे अनंग ! धनुष और तीक्ष्ण बाण इसलिए नहीं है कि भयंकर युद्ध से डरे हुए योद्धाओं पर उनका प्रयोग किया जाय, उनका प्रयोग तो उनपर करना चाहिए, जो (प्रयोग करनेवाले के) पराक्रम का आदर नहीं करते हों। तुम तो निर्दय हो, यह सोचकर कि तुम्हारा बल हम जैसे दुर्बलों पर ही सफल होगा, रात-दिन हमें सताया करते हो। क्या तुम्हारा यह कार्य प्रशंसा के योग्य है ?

इस प्रकार के वचन कहकर शिथिल तथा दुःखित होनेवाले, अपने भाई को, जो अपना उपमान स्वयं ही था, देखकर लक्ष्मण व्याकुल हुआ और अपने सिर पर कर जोड़कर इस प्रकार सांत्वना के वचन कहने लगा—हे महात्मन् ! आपने अपने को क्या समझा है ?

विवेक एवं विद्या से सुसम्पन्न हे सिंह ! हे तपःसंपन्न ! वर्षाकाल का भी अन्त होता है। आप क्यों इस प्रकार दुःखी हो रहे हैं ? क्या आप इसलिए चिंतित हैं कि वर्षा का आगमन हो गया है ? अथवा काले राक्षसों के पराक्रम का विचार करके आप दुःखी हो रहे हैं ? या यह सोच रहे हैं कि वाली के द्वारा निर्मित वानर-सेना अभी तक देवी के अन्वेषण के लिए आई नहीं है ?

वेद भले ही भ्रम में पड़ जाय, चन्द्र अपने स्थान से विचलित हो जाय, गगन तथा गभीर समुद्र से आवृत्त धरती भी हिल उठे, किन्तु तुममें वैसी अस्थिरता (चांचल्य) कभी संभव नहीं है। अनेक चन्द्रकला-समान बड़े दाँतों से युक्त अग्र राक्षसों का प्रभाव क्या तुम्हारे भव्य भ्रुकुटि-रूपी धनुष के वक्र होने मात्र से विनष्ट नहीं हो जायगा ।


१. 'कोप' और 'गोप'—दोनों शब्द तमिल में एक ही जैसे लिखे जाते हैं। अत, तमिल में 'रावणगोप' और 'इन्द्रगोप' शब्दों को 'रावणकोप' और 'इन्द्रकोप' भी पढ़ा जा सकता है।—अनु०

४८८कंब रामायण

हे ज्ञानवान् ! हनुमान् नामक व्यक्ति के ( ज्ञान, शक्ति इत्यादि गुणों के ) परिमाण को हमने जान लिया है । किन्तु, अंगद आदि ५६० समुद्र संख्यावाले वानरों के स्वरूप को हमने देखा नहीं है । पाप के समान दुःखदायक ( वर्षाकाल के ) मास भी शीघ्र बीत रहे हैं, आपकी धनुष-समान भौंहोंवाली देवी सुलभता से आ पहुँचेगी, यह निश्चित है, ( अतः ) आप शोक छोड़ें ।

हे प्रभो ! पहले जब अरण्यवासी वेदों के पारगामी मुनि तुम्हारी शरण में आये थे, तब तुमने प्रतिज्ञा की थी कि 'तुम लोगों को सतानेवाले मायावी राक्षसों को परास्त करके तुम्हारे कष्ट दूर करूँगा।' विधिवश तुम्हारे प्रति भी उन ( राक्षसों ) ने अपराध किया है, अतः उन राक्षसों का विनाश करो और मधुर यश प्राप्त करो तथा और देवों को भी स्वर्गलोक दिलाओ । अब इस प्रकार प्रज्ञाहौन हो रहना उचित नहीं है ।

हे मेरे प्रभु ! शत्रु-विजय करने का श्रेय तुमको ही प्राप्त होगी, अन्यथा यह यश और किसको मिल सकता ? शोक करना वीरता का कार्य नहीं है, वह तो दुर्बलता है । यह उचित है कि हम समय की प्रतीक्षा करें और उसके अनुसार कार्य करें । यदि आप अभी प्रयत्न करना चाहते हो, तो भी आपके लिए असाध्य कार्य कुछ नहीं है । आप शोक से उद्विग्न न हो—इस प्रकार ( लक्ष्मण ने ) कहा ।

शिथिलप्राण हो निश्चेष्ट बैठे हुए आदि भगवान् (के अवतार रामचन्द्र) अनुज के वचनों से सांत्वना पाकर शोक-मुक्त हुए, इस प्रकार अनेक दिन व्यतीत हुए । एक रोग के शान्त होते ही दूसरा रोग उत्पन्न हो गया हो, ऐसे ही अब वर्षाकाल का उत्तरार्ध आरम्भ हुआ ।

बड़े-बड़े जलाशय भर गये । उनमें तरंगें घनी होकर उठने लगीं । काले वर्णवाले कोकिल दुर्बल हुए, ऊँचे पर्वत ठंडे हुए, विशाल दिशाएँ अदृश्य हुईं, अपने प्रियतमों से वियुक्त व्यक्ति दुःखी हुए, क्रौंचों के जोड़े एकप्राण होकर परस्पर गाढ़ालिंगन में बँध गये ।

उत्तरी पवन, स्वर्णमय आभरणों से भूषित अप्सराओं के अनिन्दनीय विशाल जघन-तट के वस्त्रों तथा उनके झूलों का स्पर्श करके उनके प्रेम से पीड़ित हुए व्यक्तियों पर ऐसे जा लगता था, जैसे जले हुए घाव में तीक्ष्ण बाण चुभ गया हो ।

समुद्र भर गये, सूर्य-किरणें अपना ताप तजकर ठंडी हो गईं । जल से आँके जानेवाले घटी-यन्त्र के द्वारा ही समय का ज्ञान संभव था, अन्यथा यह जानना असंभव था कि कब दिन हुआ है और कब रात ।

मयूर-सदृश तरुणियों की कोमल मधुर बोली से पराजित होनेवाले तोते धान के पौधों में जा छिपते थे, जिससे धान की बालियाँ टूट जाती थीं । ( रमणियो के ) धवल तथा मृदु दंतों से पराजित मुक्ताएँ विशाल सागर की लहरों में छिपी पड़ी रहती थीं । 'नेयिदल' प्रदेश ( समुद्री तटों ) की युवतियों के आँगनों में उत्पन्न होनेवाले पुष्पित 'पुन्ने' वृक्ष मानो सोने की गठरी को खोल रहे थे ।

ऊँचे हाथी उज्ज्वल तथा बड़ी बूँदों के गिरते रहने पर भी पर्वत के समान अचल तथा निद्राहीन स्थिर खड़े थे, जैसे काली रात तथा दिन के समय में निरंतर ध्यानरत रहनेवाले दृढचित्त तपस्वी हों ।

किष्किन्धाकाण्डे ४८६

शीत से काँपनेवाले इस, चन्दन-वृक्ष के पत्तों से छायी हुई झोपड़ियों के भीतर, वेदिकाओं के निकट होम-कुण्डों में प्रातः और संध्या को जलाई जानेवाली अगरु की लकड़ियों के धुएँ में घुस-घूमकर अपनी ठंड दूर कर लेते थे। वानरियाँ पर्वत-कंदराओं में सोई पड़ी थी। बलिष्ठ वानर ऐसे सिकुड़े बैठे थे, जैसे अष्टांगयोग की प्रक्रिया के द्वारा अपनी इंद्रियों का दमन करनेवाले अनुपम योगी हों।

मेघ घोर वर्षा कर रहे थे, जिससे निर्मल पर्वत निर्झरों की धाराएँ तरुणियों के केश-पाश की सुगन्धि से सुवासित नहीं हो पाती थी—(अर्थात्, तरुणियाँ उनमें स्नान नहीं करती थी)। रत्नमय स्तम्भों पर डाले गये झूले सूने पड़े थे। मंच, चमकते हुए रत्नों को आकाश में नहीं फेंकते थे (अर्थात्, अनाजों के खेत में बने मंचों पर खड़े होकर अब कोई पक्षियों को उड़ाने के लिए रत्नमय पत्थरों को नहीं फेंकता था।)

केतकी-वृक्षों के काले तथा शीतल पत्तों के मध्य कामोद्दीपक पुष्प पंक्तियों में खिले थे और उनके घेरे के मध्य सारसियाँ अपने विशाल तथा सुन्दर पक्षों को सिकोड़े ऐसे बैठी थीं, जैसे अपने प्रियतम के विरह में पीड़ित स्त्रियाँ हों।

नाना विहग मृदंग के समान नाद कर रहे थे। विविध भ्रमर संगीत कर रहे थे। मयूर नृत्य की विविध भंगियाँ दिखा रहे थे और अनेक प्रकार के नृत्य दिखानेवाली वेश्याओं की समता करते थे। और, हरिण-समुदाय, जो मेघ-गर्जन से भयभीत होकर वृक्षों के नीचे आ ठहरते थे, (उस नृत्य के) दर्शक बने थे।

कोमल पुष्प-शाखा को परास्त करनेवाली कटि से शोभित तरुणियाँ तथा युवक अगरु-धूम से आवृत होनेवाले दीपों के प्रकाश में पर्यन्त पर शयन करते थे। शीत से काँपने-वाले भ्रमर पुष्प का त्याग कर, चन्दन-वृक्ष के कोटरों में विश्राम करते थे।

मनोहर हंसों के जोड़े कमल-शय्या को तजकर बड़े वृक्षों से भरे उद्यानों में आ ठहरे थे। सुगन्धित लकड़ियों से बने हुए झोपड़ों में धवल दंतोंवाली व्याध-स्त्रियों के साथ उनके प्रियपुरुष निद्रा करते थे।

ग्वाले लताओं से आवृत अत्युन्नत तथा छोटे पत्तोंवाले वृक्ष के नीचे बकरियों के बच्चों को गोद में लिये पड़े थे। चोरों के समान छिपकर फिरनेवाले भूत भी भूखे ही दाँत कटकटाते हुए एक स्थान में खड़े थे।

बड़े-बड़े दृढ़चित्तवाले हाथी आकाश के मेघों से बाण-सदृश पानी की बूँदों के अपने शरीर पर गिरने से सिकुड़ जाते थे और पर्वत के सानुओ के ऊपर जहाँ मधु के पुराने तथा असंख्य छत्ते लगे थे, नहीं रह पाते थे और कन्दराओं के भीतर घुस जाते थे।

इस प्रकार के वर्षाकाल में रात्रि का अंधकार भी आ पहुँचा। तब ज्ञानवान (रामचन्द्र) ने अंजन-सदृश आँखोंवाली तथा मंदहास-युक्त जानकी की याद में ज्वाला-सी निःश्वास भरते हुए लक्ष्मण से कहा—

आभरण-भूषिता, पीनस्तनी वह (सीता) मेघ के सदृश काले रंगवाले तथा बिजली के सदृश दाँतोंवाले राक्षस की माया का लक्ष्य बनकर पीड़ित हो अपने प्राण छोड़ेगी। मेरे लिए भी जीवित रहना सर्वथा असम्भव है। आह! यह कैसी अवस्था है।

४१० कंब रामायण

शुभ्र वर्णवाले तथा विनाशकारी शर मेरे तूणीर में सोये पड़े हैं। मैं गगनोन्नत भुजावाला होकर भी इस प्रकार की पीड़ा भोग रहा हूँ। मेरी ऐसी दशा है, मानों मेरे कंठ में बरछा चुभा हो, फिर भी मैं निष्प्राण नहीं हुआ हूँ।

पत्ती जोड़ों के भीतर चमकते हुए जुगनुओं के प्रकाश में अपनी संगिनियों के साथ सो रहे हैं। (मन्मथ के द्वारा) चुनकर फेंके गये पुष्पबाणों से मेरा हृदय छिन्न हो गया है और दुःसह पीडा से पीड़ित हो रहा हूँ। फिर भी, मैं जीवित हूँ।

मेघ में विद्युत् की कौंध को और वज्र के गर्जन को देखता तथा सुनता हुआ मैं विषदंतवाले सर्प के समान पीडित होकर चुप पड़ा हूँ। वनवास में मैंने जो कार्य किये हैं, उनपर स्वर्गवासी (देवता) और धरतीवासी (मनुष्य) हँसेंगे। अब (मेरे अपमान के लिए) और क्या आवश्यक है ?

वेदना से पीड़ित होता हुआ मैं (सीता को) भूलकर जीवित नहीं रह सकता हूँ। यदि वर्षा इसी प्रकार रहेगी, तो मेरा प्राण त्याग कर स्वर्ग पहुँचना निश्चित है। तो क्या मैं इस अपयश को अगले जन्म में ही मिटा सकूँगा। कदाचित् अगले जन्म में भी मैं गृहस्थी से सन्यास लेकर ही यह अपयश मिटा सकूँगा।

हे वीर ! इस स्थान पर रहकर यदि हम राक्षसों का पता लगावें, तो बहुत समय व्यतीत होगा। अतः, यह प्रयत्न (सीता का अन्वेषण) आवश्यक नहीं। मेरे लिए इसी में यश है कि मैं (सीता की) विरह-पीडा में प्राण त्याग दूँ।

मैं शर-सदृश उज्ज्वल कटाक्ष-पूर्ण नयनोंवाली तथा श्रेष्ठ आभरणों से भूषित (सीता) के प्रवाल वर्णयुक्त तथा कुमुद-सदृश अधर का अमृतपान करता रहा। यह वर्षा मानो ताँबे को पिघलाकर बरसा रही है और मेरे शरीर को जला रही है। तो, क्या अब ऐसे ही मरना मेरे लिए उचित है ?

घृत की आहुति देकर प्रज्वलित की हुई अग्नि के समक्ष, जनक ने मुझसे कहा था कि यह (सीता) तुम्हारी शरण में है। उनके उस वचन को मैंने असत्य कर दिया है। ऐसे मुझ अधार्मिक व्यक्ति में सत्य कैसे टिक सकता है ? अतः, अब मुझे मर जाना ही उचित है।

सांत्वना देने के लिए तुम हो। सांत्वना पाकर सहन करने के लिए मैं हूँ। कंकण-धारिणी (सीता) अब यहाँ आ जाय—यह संभव नहीं है। इस पीडा को कौन दूर कर सकता है ? क्या इस पीडा का कभी अन्त भी होनेवाला है ?

मैं श्रेष्ठ शरों को चुन-चुनकर प्रयोग करूँ, तो उनसे जब सत्यलोक जल जाय, देवता प्रभृति सृष्टि के अतिप्राचीन व्यक्ति मिट जायें तथा सभी लोक एवं वहाँ के प्राणी अशेष रूप से ध्वस्त हो जायें, तभी क्या मैं मयूर-सदृश उस (सीता) को देख सकूँगा ?

वज्र-निर्घोष-सदृश टंकार से युक्त धनुष को धारण करनेवाले हे वीर ! इस प्रकार मैं सब लोकों तथा वहाँ के प्राणियों को न मिटाकर पीडा का अनुभव करता हुआ बैठा हूँ, तो यह इसी डर से कि (वैसा करके) मैं धर्म की रक्षा नहीं कर पाऊँगा; अन्यथा शत्रु-राक्षस सब देवताओं के साथ मिलकर मेरे विरुद्ध आवें, तो भी वे मुझसे बच नहीं सकते।—राम ने इस प्रकार कहा।

किष्किन्धाकाण्ड ४११

तब अनुज ने कहा—हे आज्ञा-रूपी चक्र से युक्त प्रभु ! जिस वर्षा ऋतु को हमने यहाँ व्यतीत करना चाहा, वह अब व्यतीत हो चुका है। शरद्-काल भी अब समाप्ति पर आ गया है। अतः, उस चोर (रावण) के आवास को खोजकर पहचानने का समय आ पहुँचा है। अब आप क्यो शिथिलमन हो रहे हैं ?

अरुण नयनवाले विष्णु भगवान् के यह आज्ञा करने पर कि तुम अमृत-तरंगो से पूर्ण विशाल क्षीरसागर से अमृत को दे सकते थे, फिर भी वैसी आज्ञा देना उचित न समझ-कर, पर्वत आदि सभी मथन-उपकरणो के द्वारा उसे मथकर ही अमृत को निकलवाया था।

चक्रधारी भगवान् यदि मन में संकल्प-मात्र कर लें, तो समस्त लोको के टुकड़े-टुकड़े करके उन्हें अपने मुँह में डालकर चबा डालें, तो भी वह वैसा नही करता, परन्तु अनेक बड़े शस्त्रों को लेकर युद्ध करके ही सब (दुर्जनों) को वह विजित करता है।

हे महाभाग ! ललाटनेत्र तथा परशुधारी शिव भगवान्, जब क्रुद्ध होकर, आकाश मे संचरण करनेवाले त्रिपुरो को ध्वस्त करने लगे, तब उन्होने जो-जो उपाय किये थे और जो-जो उपकरण जुटाये, उन्हे कौन जान सकता है ?

यदि हम अपने अनुकूल रहनेवाले सब (मित्रो) को अपना साथी बना लें, मन्त्रणा करने योग्य सब विषयों को भली भाँति विचार कर निर्णय करें, फिर उचित समय को पहचानकर उचित ढंग से कार्य करें, तब 'विजय' नामक वस्तु क्या हमसे दूर रह सकती है ?

बलवान् राक्षसो ने धर्म-मार्ग से विमुख होकर अधर्म-मार्ग को ही अपने लिए ग्राह्य मान लिया है, उचित सन्मार्ग से जब वे (राक्षस) भ्रष्ट हो गये हैं, तब यश और विजय दोनो (तुम्हारे सिवा) अन्य किसके पास होंगे ?

स्वर्ण-आभरण पहननेवाली उन देवी के कष्टो को दूर करने का समय धीरे-धीरे आ पहुँचा है। अब आप दुःख-मुक्त हो जायें । ऋषि-मुनियों की सहायता करनेवाले हम क्या राक्षसो के (शस्त्रो के) लक्ष्य बनेगे ? हे मनोहर धनुष धारण करनेवाले ! आप ही कहिए।—इस प्रकार लक्ष्मण ने कहा।

युगो के अधिपति (विष्णु भगवान् के अवतार रामचन्द्र ने) लक्ष्मण के वचनो को उचित समझा। इसी प्रकार, जब वे यह सोचते हुए कि क्या इस वर्षाकाल का भी कभी अन्त होनेवाला है, कृश हो रहे, तब वर्षाकाल भी समाप्ति पर आ गया।

महान् दान-कार्य मे निरत कोई उदार व्यक्ति, धरती के सभी लोगों को उनके इच्छानुसार सभी पदार्थ का दान देकर निर्धन हो गया हो और फिर, किसी उत्तम याचक के द्वारा कुछ माँगे जाने पर उसे दान देने के लिए अपने पास कुछ न होने से लज्जित हो गया हो। इसी प्रकार सब मेघ श्वेत वर्ण हो गये (अर्थात्, शरत्काल आ गया)।

पाप-पुण्य नामक दो कर्मों के फल को जानने से सद्द्विवेक के प्राप्त होने पर जिस प्रकार अविद्या के तम मिट जाते हैं, उसी प्रकार (शरत्काल के आगमन पर) वर्षाकाल का गाढ अन्धकार मिट गया।

जिस प्रकार घोर युद्ध के समाप्त होने पर युद्ध की भेरी निःशब्द हो जाती है, उसी प्रकार जल-भरे मेघ भी गर्जन करना छोड़कर निःशब्द हो गये। भयंकर बाणो के सदृश

४१२ | कंब रामायणं

वर्षा की बौछार भी थम गई। जैसे करवाळ कोशों मे बंद करके रख दिये गये हो, वैसे ही विद्युत् भी अदृश्य हो गई।

विशाल प्रान्तवाले ऊँचे पर्वत अपने सानुओ के निर्झरो से रहित हो गये। उनके केवल कुछ जल-स्रोत ही बहते रह गये। वे (पर्वत) ऐसे लगते थे, मानो वे यज्ञोपवीत और उत्तरीय के साथ श्वेत वस्त्र भी कटि मे धारण किये हों।

पर्वतो के ऊपर से मेघो के हट जाने से दिगंतों तक प्रवाहित होनेवाली नदियाँ जल-रहित हो गईं। अतः, वे (नदियाँ) सन्मार्ग पर न चलनेवाले उस व्यक्ति के समान थीं, जो उत्तम पुण्य के घट जाने पर निर्धन हो गया हो।

गड-स्थलों से मद-जल बहानेवाले हाथियो के समान स्थित काले मेघ गगन के प्रदेश को उन्मुक्त छोड़कर उड़े जा रहे थे। चन्द्रमा इस प्रकार चमक उठा, जिस प्रकार यवनिका के उठने पर विविध नाट्य-भंगियाँ दिखानेवाली नर्तकी का वदन हो।

उत्तरी पवन पुष्प-मकरन्द को बिखेरता हुआ इस प्रकार प्रवाहित हो उठा, जिससे स्वर्णमय आभरण धारण करनेवाली तरुणियो के विशाल तथा मनोज्ञ स्तनों पर अंकित चन्दन, कस्तूरी, कुंकुम आदि का लेप सूख गया।

हंस गगन मे सभी दिशाओ में मानो यह सोचकर उड़ रहेथे कि दशरथ चक्रवर्ती के कुमार (श्रीराम) के दुःख को दूर करने के लिए उचित समय अब आ गया है। अतः, हम भी (सीता) देवी का अन्वेषण करने चलें।

सरोवरों का जल छल-कपट से रहित तपस्वी जनो के मन के सदृश स्वच्छ हो गया। उन जलाशयो में विचरनेवाले मीन, 'रुई पर चलना है'—इस कथन को सुनने मात्र से जिनके कोमल चरण लाल हो जाते हो, ऐसी सुन्दर युवतियो के अञ्जन-लगे नयनों के समान घूम रहे थे।

नालो पर विकसित कमल-पुष्प रूठी हुई तरुणियो के वदन की समता करते थे। 'किडै' नामक पौधे, जिनमे अतिसुन्दर, सुगन्धित तथा रक्तवर्ण पुष्प भरे थे, सुरत-श्रांत युवतियो के रक्त अधरो का दृश्य उपस्थित करते थे।

अनेक प्रकार के मेढ़क जो (वर्षाकाल मे) शिक्षा देने में चतुर अध्यापकों के पास पाठ सीखनेवाले कोलाहल से पूर्ण वटुकों के समान बोल रहे थे, अब उन बुद्धिमानो के समान ही मौन हो गये, जो अपना वचन जहाँ फलप्रद होता हो, वही बोलते हैं और अन्यत्र मौन रहते हैं।

मेघों की विशाल वर्षा से हीन होकर मयूर अपने पंखो को सिकोड़े हुए दुःखी बने हुए और मन में कोई भी उमंग या फल की कामना से रहित होकर मिथिला-नगर के हंस (अर्थात्, देवी सीता) के समान ही व्याकुल हो दबे पड़े रहे।

समुद्र, मानो अपने तरंग-रूपी करो से नदी-रूपी अपनी पत्नियों के उमड़ते हुए जल-रूपी सुन्दर आँचल को पकड़कर खींच रहे थे और वे नदियाँ मानो अपने बलवान् पति का आलिंगन करके मदहास कर रही थी, जो (मंदहास) मुक्ताजल का दृश्य उपस्थित करते थे।

गुवाक (सुपारी)-वृक्षों के फल, शास्त्रों के ज्ञानमय वचनो का श्रवण करनेवाले

किष्किन्धाकाण्ड ४६३

पुरुषो के समान तथा विरह से पीडित तरुणियो के समान ही धीरे-धीरे अपने पूर्व रंग का त्याग कर अनिन्दनीय सुनहले रंग को प्राप्त करने लगे।

गगर नामक प्राणी, अनेक दिनों तक जल में रहने से शीत की पीडा से व्याकुल होकर जलाशयो से बाहर धूप में ऐसे पडे हुए थे कि सूर्य की कांति उनके शरीर पर बिखर रही थी। इस प्रकार, जलाशयो के तटो पर अनेक स्थानो में अपने मुख को बन्द किये वे सोये पड़े थे।

'वजी' नामक लताएँ, जिनमें (बैठकर) तोते मधुर स्वर मे बोल रहे थे, जिनमें मनोहर पंखोवाले भ्रमर केशों का दृश्य उपस्थित करते हुए उड़ रहे थे, जिनमें अतिसुन्दर पल्लव थे (जो कान की समता करते थे) और जो कटि के समान ही लचक-लचक जाती थी, तरुणियो के समान शोभायमान थी।

घोंघे, जिनकी पीठ झुकी हुई थी, अपने नेत्रो को सिकोड़कर कीचड़ में धँस गये, मानो उनके द्वारा उत्पन्न किये गये मोती के (रमणियों के दाँतो से) पराजित हो जाने से वे हरिण-सदृश रमणियों के सम्मुख प्रकट होना नही चाहते हो।

वर्षा के कारण पुष्ट हुए समतल प्रदेशों के कमल-पुष्पों के विशाल पत्तो की छाया में विश्राम करनेवाले दोषहीन केंकडे अब अपनी स्त्रियों के साथ अपने बिलो में उनके द्वारो को बन्द करके ऐसे पड़े थे, जैसे लोभी व्यक्ति हों। (१-१२१)

अध्याय १०

किष्किन्धा पटल

इस प्रकार शरत् काल जब व्यतीत होने लगा, तब वीर अग्रज राम ने अपने अनुज को देखकर कहा—हे वीर ! निश्चित अवधि व्यतीत हो गई। किन्तु, निद्रा मे पड़ा हुआ वह राजा (सुग्रीव) अभी तक नही आया। उसका यह कैसा कार्य है ?

वह (सुग्रीव) दुर्लभ राज्य-सपत्ति को पाकर हमारे उपकारो को भूल गया है। अतः, उत्तम सदाचार मे वह भ्रष्ट हो गया है, धर्म को भुला दिया है, इसके प्रति किये हमारे स्नेह की बात छोड़ दो, वह हमारे पराक्रम को भी भूल गया है। इस प्रकार वह सुखी जीवन मे मत्त हो गया है।

जो कृतघ्न होकर अपूर्व रूप में प्राप्त स्नेह को भी भुला दे, उचित सत्य को मिटा दे एव अपने प्रण को पूर्ण न करे, उसको मारना दोष नहीं है। अतः, तुम जाओ और उसकी मनोदशा को जानकर लौट आओ।

तुम जाकर यह मेरा संदेश उस (सुग्रीव) को दो कि घोर पापियों को युद्ध में निर्मल करके स्वर्ग भेजने तथा (लोक मे) धर्म को सुरक्षित बनाने के लिए मैने जो धनुष

४६४ | कम्ब रामायण

उठाया है, वह अभी वर्त्तमान है। भयंकर यम भी है। तुमलोगो को मारनेवाला बाण भी मेरे पास है।

विष के समान व्यक्तियो को दण्ड देना पाप नहीं है। मनु का यही विधान है। इस बात को तुम उस (सुग्रीव) के हृदय में बिठा दो, जिसने पाँच वर्ष (की आयु) में कुछ नहीं जाना।

तुम उससे यह सत्य वचन भी कहना कि यदि वह चाहता है कि नगर, प्रजा, राज्य तथा अपने बन्धुजन—इन सबके साथ स्वयं भी राज करता हुआ सुखी रहे, तो अविलंब यहाँ चला आये। यदि वह इस प्रकार नहीं आयगा, तो संसार में वानरी का नाम तक शेष नहीं रहेगा।

यदि सुग्रीव प्रभृति वानर, हमसे भी अधिक बलवान् वीर को खोजने का विचार करें, तो उनसे कहना कि तुमको (अर्थात्, लक्ष्मण को) जीतनेवाला तीनों भुवनों में तुम्हारे अतिरिक्त और कोई नहीं है।

तुम पहले उन्हें नीतिमार्ग को समझाना। यदि उस वचन से उनका मन न बदले, तो तुम क्रुद्ध न होना और वहीं उन्हें मिटा न देना। किन्तु, उनके दिये उत्तरों को मेरे पास आकर कहना।—यों कहकर यशोभूषित (रामचन्द्र) ने लक्ष्मण को विदा किया।

रामचन्द्र की आज्ञा को सिर पर धारण करके, उनके चरणों को नमस्कार करके, किंचित् भी विलंब न करके अपनी विशाल पीठ पर तूणीर बाँध तथा शर-प्रयोग के लिए अतिश्रेष्ठ धनुष को कर में लिये हुए, अनन्यचित्त से वह (लक्ष्मण) दुर्गम मार्ग पर चल पड़ा।

(राम की) आज्ञा से चलनेवाला वह (लक्ष्मण) सुकुमार होते हुए भी (पूर्व में सुग्रीव जिस मार्ग से उन दोनों को किष्किंधा तक ले गया था उसी) पूर्व-प्रसिद्ध मार्ग से नहीं गया, किन्तु वृक्षों और शिलाओं को चूर-चूर करके उन्हें दूर फेंकता हुआ एक नया मार्ग बनाकर उसपर चला। (भाव यह है कि सुग्रीव ने प्रसिद्ध मार्ग में कोई रुकावट अथवा हानिकारक उपाय कर रखा होगा, इस विचार से लक्ष्मण उस मार्ग से नहीं गये।)

वीर-कंकण से भूषित लक्ष्मण के अरुण चरणों की चाप से, स्वर्ग को छूनेवाले मेरु पर्वत-जैसे ऊँचे उठे हुए पर्वत धरती में धँसकर समतल हो गये। पाताल में स्थित कर्ण- नेत्र (अर्थात्, सर्प या आदिशेष) भी लोगों की दृष्टि में आ गया।

बलिष्ठ वाली के भाई के पास जानेवाला मनुकुल श्रेष्ठ का अनुज, भयंकर अरण्य को भेदकर अतिवेग से आगे बढ़ता हुआ, गगन-चुम्बी सालवृक्षों को छेदनेवाले (राम के) बाण की समता करता था।

किसी दिग्गज के बच्चे के खो जाने पर उसे ढूँढ़ता हुआ, उसके पद-चिह्नों का अनुसरण करके दूसरा कोई दिग्गज चल पड़ा हो—सुग्रीव को ढूँढ़ता हुआ जानेवाला वह लक्ष्मण वैसे ही लगता था।

जिस प्रकार सूर्य ऊँचे उदयाचल से अस्ताचल पर जा पहुँचा हो, उसी प्रकार स्वर्ण की कांति से युक्त शरीरवाला लक्ष्मण एक ऊँचे उज्ज्वल पर्वत से (ऋष्यमूक से) दूसरे पर्वत पर (किष्किंधा पर) शीघ्र जा पहुँचा।

किष्किन्धाकाण्ड २६५

अपने रक्षक अग्रज के अनुपम शर के समान वह अत्युन्नत किष्किन्धा-पर्वत पर जा पहुँचा। वह एक पर्वत से दूसरे पर्वत पर फाँदकर जानेवाले स्वर्णरंग केसरी की समता करता था।

उसे देखकर वानर, ऐसे भागे, जैसे यम को देख लिया हो। वे वालिकुमार के निकट जा पहुँचे और उससे कहा—हे प्रभु ! अतिक्रुद्ध रामानुज चंडवेग से यहाँ आ रहा है। यही सुनते ही—

वह कुमार भी, साहसिक कृत्य करनेवाले लक्ष्मण के आगमन का कारण जानने के लिए (लक्ष्मण के) समीप आया और उस चक्रवर्ती कुमार के मन का भाव पहचानकर स्वर्ण का वीर-कंकण धारण करनेवाले अपने पितृव्य (सुग्रीव) के प्रासाद में जा पहुँचा।

नल (नामक वानर-शिल्पी) के द्वारा निर्मित प्रासाद में पुष्प-दलों की शय्या पर पड़े उस सुग्रीव के निकट जा पहुँचा, जो दीर्घ कुंतलों तथा बाल-स्तनोंवाली रमणियों के द्वारा अपने सुन्दर पैरों को सहलाये जाते हुए, निद्रा का अतिथि बनने की इच्छा कर रहा था।

जो स्वच्छ ज्ञानवाले राम-लक्ष्मण के द्वारा प्रदत्त उस विशाल राज्य-सम्पत्ति-रूपी मदिरा का पान करके अतिमत्त हो गया था, जो अति उच्च्वल स्वर्ण-पर्वत के मध्य ठहरे हुए ऊँचे रजत-पर्वत के समान शोभायमान था।

जो, सिंधुवार, साखू, अगरु, चंदन तथा सुगन्धित लताओं तथा सुरभित पुष्पों का स्पर्श करके वहनेवाले बाल-पवन के कारण सुख-निद्रा में मग्न था।

जो मधुर ‘किडे’ (नामक फूल) के समान अधखिली स्त्रियों के, धवल हास करनेवाले मुक्ता-सदृश पैने दंतों से मधु-समान जो रस उत्पन्न होता था, उसका पान करके उन्माद, मूर्च्छा तथा अन्य (तंद्रा, शिथिलता आदि) गुणों के बढ़ जाने से मत्त गज के समान पड़ा था।

जो, मुकुट, कुंडल आदि के कांति-पुंजों के व्याप्त होने से ऐसा उज्ज्वल लगता था, जैसे सूर्य-किरणों से आवृत हिमाचल हो।

वह सुग्रीव लेटा था। तारा के गर्भ से उत्पन्न वीर अंगद पहले उसके समीप गया और अपने विशाल करों को जोड़े, उसे निद्रा से जगाने के लिए मृदु वचन कहने लगा—

हे मेरे पिता ! मेरे वचन सुनिए। उन रामचन्द्र का अनुज, अपने मुख से अपने मन के महान् क्रोध को प्रकट करते हुए अवार्य वेग से आ पहुँचा है। अब आपका विचार क्या है? कहिए।

वह (सुग्रीव) राज्य-सम्पत्ति के मोह से भूला हुआ था और सुगंधित मद्य-रूपी विष भी उसके शिर पर चढ़ा हुआ था। अतएव प्रज्ञा-रहित हो कोमल पर्यङ्क पर पड़ा था; अंगद के वचनों को वह सुन नहीं सका।

यह दशा देखकर कपिशार्दूल एवं केसरी की समता करनेवाला वह युवराज (अंगद), यह सोचकर कि अब सुग्रीव के सम्मुख खड़े रहने से कुछ न होगा, दोषरहित चित्तवाले हनुमान् को बुलाने के लिए उनके पास गया।

४९६ कंब रामायण

इन्द्रपुत्र का सुत (अंगद) मन्त्रणा मे अतिकुशल वायुकुमार को साथ लिये हुए उग्र सेनापतियो के साथ चलकर (सुग्रीव के प्रासाद से) बाहर निकलकर अपनी माता के प्रासाद की ओर चला।

वहाँ पहुँचकर उसने (तारा से) प्रश्न किया कि अब क्या करना चाहिए ? तब तारा ने उत्तर दिया—तुमलोग न करने योग्य पाप-कर्म सुलभता से कर डालते हो, फिर उन कर्मों के परिणाम को अनायास ही दूर करने का उपाय भी करना चाहते हो । क्या उपकार को भूलकर (कृतघ्न होनेवाले) तुमलोग (पाप से) मुक्त हो सकते हो ?

उसने फिर आगे कहा—विजयी (रामचन्द्र) ने तुम्हें सेना-सहित आने की जो अवधि दी है. यदि वह व्यतीत हो जायगी, तो तुम लोगों के जीवन की अवधि भी समाप्त हो जायगी—यो मेरें कहते रहने पर भी तुमलोगों ने कुछ सुना नहीं। अब देखो, तुमलोग कैसे फँस गये हो।

जिन वीर ने अपने धनुष को ऐसा झुकाया कि यम ने बाली के अपूर्व प्राणो का हरण कर लिया और जिन्होने तुमलोगो को अतुलित राज्य-सम्पत्ति प्रदान की, वे भी आज तुम्हारी उपेक्षा-योग्य हो गये हैं। तुम्हारे जैसे स्वभाववाले लोगों के लिए यह कार्य (रामचन्द्र की उपेक्षा करना) ठीक ही तो है।

देवताओ से भी उत्तम वे (राम) अपनी पत्नी के वियोग में निष्प्राण-से हो मूर्च्छित पडे हैं। इधर तुम उनकी उस व्यथा को मन में भी न लाकर सद्योविकसित नीलोत्पल-समान नेत्रवाली रमणियों के प्रेमामृत का पान कर रहे हो।

(तुमलोग) सत्य से मुकर गये हो, कृतघ्न हो गये हो। तुमलोगों के पापों का परिणाम अब दीख रहा है। तुमलोग इस प्रकार गुणहीन हो गये हो। यदि उन महावीर (राम) से युद्ध मोल लोगे, तो विनष्ट हो जाओगे।—जब तारा इस प्रकार उनकी भर्त्सना करती हुई बोल रही थी, तब—

उधर बड़े-बड़े पराक्रमी वानरों ने नगर के विशाल कपाट को, जो बड़ी अर्गला से बद करने योग्य था, बन्द करके भीतर से अर्गला डाल दी और बड़ी शिलाओ को लाकर (उस कपाट के पीछे) चुन दिया।

वे वानर-वीर इस प्रकार नगर-द्वार को सुरक्षित करके और यह विचार कर कि (यदि कदाचित् लक्ष्मण भीतर प्रविष्ट हो जाय तो) उनसे युद्ध करने के लिए सन्नद्ध रहना चाहिए, वृक्षो को तोड़कर एव बड़ी शिलाओ को उखाड़कर हाथ में लिये हुए, प्राकार के समीप खडे रहे।

राजपुगव (लक्ष्मण) ने यह सोचते हुए कि ये हमसे बचना चाहते हैं, क्रोध से मन्दहास करके, लक्ष्मी के निवास कमलपुष्प की समता करनेवाले अपने चरण से, उस नगर के कपाट पर अनायास ही आघात किया।

उनके दिव्यचरण का स्पर्श पाते ही वह नगर-कपाट, सुरक्षा के लिए द्वार पर रखी शिलाएँ तथा दृढ प्राचीर, सब ऐसे विध्वस्त हो गये, जैसे अस्पृश्य पाप-पुज हों।

वह दृढ कपाट, वह पुरातन नगर-द्वार शिलाओ से निर्मित प्राचीर, सब सहज ही

किष्किन्धाकाण्ड ४९७

ढहकर सब दिशाओ मे दस योजन तक बिखर गये । तब वानर भय से विह्वल हो उठे ।

उस दृढ तथा उन्नत प्राचीर और उस विशाल नगर-द्वार के ढहकर गिरने से पत्थरों के प्रहार से शिर मे चोट खाये हुए वानर व्याकुल होकर दीर्घ दिशाओं मे भागकर अपने अपूर्व प्राणो को बचा पाये ।

अकथनीय घोर दुःख पाकर, अपना स्थान छोड़कर भागे हुए दोषहीन वे वानर, भयभीत होकर घोर शब्द करने लगे । उस ध्वनि से वह (किष्किन्धा) नगरी, उन्नत शिखरवाले मन्दर-पर्वत से मथे जानेवाले मीन-भरे तथा शब्दायमान समुद्र की समता करने लगी ।

अनेक वानर, भयभीत होकर, किष्किन्धा पर्वत से हटकर समीपवर्ती वनों में जा छिपे । उससे वह ऊँचा (किष्किन्धा) पर्वत, ऐसा लगने लगा जैसा नक्षत्रपूर्ण आकाश नक्षत्रहीन होने पर दीखता है ।

उस समय प्रतापी (रामचन्द्र) की आज्ञा-रूपी चक्र के जैसे लगनेवाले वे (लक्ष्मण) उस स्वर्णमय नगर की बीथियों म प्रविष्ट हो चलने लगे । तारा को घेरकर खड़े रहनेवाले (अंगद आदि) वानर कह उठे—अहो ! वे आ गये हैं । अब क्या करें ?

हे उत्तम कंकण धारण करनेवाली ! उन (लक्ष्मण) का हृदय पुष्प के समान कोमल है । यदि आप राजप्रासाद के द्वार पर जाकर उन्हें रोक दें, तो वह वीर, जो विचारवान् हैं, उस ओर आँख उठाकर भी नही देखेंगे । यही उत्तम उपाय है ।—यों हनुमान् ने कहा ।

तब तारा ने (उनसे) यह कहकर कि, तुम सब लोग जाओ । मै जाकर उन वीर (लक्ष्मण) के मन को शांत करूँगी—साहस के साथ पुष्पांकृत केशोंवाली अन्य सखियों-सहित चल पड़ी । इधर अन्य वानर उनसे हटकर दूर पर खड़े हो गये ।

कंठ में रस्सी (का आभरण) धारण किये हुए हाथी-जैसे लक्ष्मण, प्रसिद्ध वानरो के आनन्दपूर्ण आवास किष्किन्धा की राजवीथियों को पार कर विशाल राज-सौध में ज्यों ही प्रविष्ट होनेवाले थे, त्यों ही सहज सुगन्ध-भरित केशोंवाली तारा उनके मार्ग के मध्य उन्हें रोककर खड़ी हो गई ।

मनोज्ञ लावण्य, धवल चन्द्र-सदृश मन्दहास, सुन्दर कटि, उत्तम तथा नित्य यौवन-पूर्ण मृदु स्तन—इनसे युक्त उत्तम मयूर-तुल्य रमणियों के साथ वह तारा उस श्रेष्ठमार्ग को रोके खड़ी रही ।

रमणियों की सेना ने दृढता से (लक्ष्मण को) इस प्रकार घेर लिया कि (लक्ष्मण के) धनुष तथा करवाल उनके आभरणों में चमक उठे । उन (रमणियों) के मंजीर, जिनमें छोटे-छोटे कंकड़ भरे थे, बज उठे । मेखलाएँ भी बड़ा कोलाहल कर उठीं । सर्वत्र विविध भ्रू-लताएँ फैल गईं ।

शब्दायमान नूपुर नगाड़े बने थे । रमणियों के जघन बड़े रथ थे । परस्पर अनुरूप नयन-युगल बरछे थे । कठोर भौंहें युद्ध करनेवाले धनुष थीं । इस प्रकार, जब वे रमणियाँ घेरकर खड़ी हो गईं, तब स्वयं गौरव से भी गुरु होनेवाली भुजाओंवाले उन (लक्ष्मण) का