काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
५५० काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् पानीयगुणविशेषीयाध्यायः २३]
वक्तव्य—यहां श्लोकों के खण्डित होने से आठो प्रकार के जलों का वर्णन उपलब्ध नहीं है। केवल तीन चार प्रकार के जलों का संक्षेप से वर्णन मिलता है। सुश्रुत सू. अ. ४५ में सात प्रकार के भौम जल दिये हैं—तत्पुनः सप्तविधम् । तद्यथा-कौपं, नादेयं, सारसं, ताडागं, प्राप्रवणं, औद्भिदं, चौण्ट्यमिति । इससे आगे इन भौमजलों के पृथक् २ गुणों का वर्णन भी सुश्रुत में वहीं पर किया गया है ॥
लघु प्रकामं सस्नेहं शीतं सर्वरसान्वितम् । तृष्णापहं मनोल्हादि श्लेष्मघ्नं क्रिमिनाशनम् ।।
रक्षोघ्नं जीवनं वृष्यं मूर्च्छघ्नं ........ । ........................................ ।।
सेवनीय जल—जो जल लघु, ईषत् स्नेहयुक्त, शीतल तथा सब रसों से युक्त हो, जो तृष्णा को शान्त करता हो, मन को आह्लादित करता हो, श्लेष्मा, कृमि तथा जन्तुओं का नाशक हो, जीवन को देनेवाला हो, वृष्य हो तथा मूर्च्छा को नष्ट करता हो—वह जल सेवन करने योग्य होता है ॥
............ सूक्ष्मप्राणिसमाकुलम् । बहलं कलुषं चैव तथा पिच्छिलमाविलम् ।
ग्रामक्षेत्ररसैर्दुष्टं विषमूलोपदूषितम् ।।
शकुन्तक्रिमिशैवालयुक्तमत्युष्णचिक्कणम् ।
त्याज्य जल—जिस जल में सूक्ष्म प्राणी (कृमि कीट आदि) हों, जो बहल (घना-सान्द्र), कलुष (कलुषित या मैला), पिच्छिल (चिपचिपा) तथा आविल (मलयुक्त) हो, जो जल ग्राम, क्षेत्र (खेत) तथा अनेक प्रकार के रसों के कारण दूषित हो, जो विषयुक्त मूलों (कन्दों) से विषैला हो, जिसमें अनेक पक्षी, कृमि तथा शैवाल (काई) पड़ी हुई हो तथा जो अत्यन्त गरम एवं चिकना हो—ऐसे जल का त्याग कर देना चाहिये । चरक सू. अं. २७ में भी इसी प्रकार कहा है ॥
........................................................................... ।।
............................ गुर्विणीषु च वर्जयेत् ।
धात्रीणां च विशेषेण स्वस्थानां रोगिणामपि ।।
पूर्वोक्तगुणबाहुल्यात् पानीयं सेव्यमिष्यते ।
विपाके मधुरं शैत्याद्वारि पित्तघ्नमुच्यते ।।
शीतल जल का निषेध .... गर्भिणी स्त्रियों को (शीतल जल का) प्रयोग नहीं कराना चाहिये । पूर्वोक्त गुणों की अधिकता के कारण स्वस्थ अथवा रुग्ण धात्रियों को शीतल जल का प्रयोग कराना चाहिये । शीतल होने के कारण जल विपाक में मधुर होता है । इसीलिये वह पित्तनाशक होता है ।
वक्तव्य—शीतल जल के निषेध के कारण प्रसङ्गवश हम शीतल जल के प्रयोग का विधान भी लिखते हैं जो इस ग्रन्थ में संभवतः खण्डित हो गया है। सुश्रुत सू. अ. ४५ में कहा है—मूर्च्छापित्तोष्णादाहेषु विषे रक्ते मदात्यये । भ्रमक्लमपरीतेषु तमके वमथौ तथा ।। ऊर्ध्वगे रक्तपित्ते च शीतमम्भः प्रशस्यते ॥
................................................................... ।
............. णशीतमुष्णमथापि वा । भक्तस्य पूर्वं पीतं वा कृशत्वं कुरुते शिशोः ।।
भक्तस्य मध्ये पीतं तन्मध्यमत्वं नियच्छति । भक्तस्योपरि पीतं तु पीनत्वं (संप्रयच्छति) ।।
...... भोजन से पूर्व चाहे उष्ण अथवा शीतल जल पीने से शिशु कृश (कमजोर) हो जाता है । भोजन के मध्य में जल का सेवन करने से मध्य अवस्था रहती है तथा भोजन के अन्त में जल का सेवन करने से शिशु मोटा हो जाता है । तन्त्रान्तर में साधारणतया भोजन के बाद जल का पीना प्रशस्त माना गया है परन्तु कुछ रोगों की अवस्था में उसका निषेध किया गया है । ऐसा चरक सू. अ. २७ में कहा है ॥
पानीयगुणविशेषीयाध्यायः २३] खिलस्थानम् ५५१
.................................... । ............ निष्क्वाथोष्णाम्बु पाचनम् ।।
श्रमे भेदेषु तृष्णासु मूर्च्छास्वतिपिपासिते । निष्क्वाथलाघवादम्बु सलिलं तप्तशीतलम् ।।
निर्दिशेत् सर्वदोषघ्नं बालानां ........................... ।
उष्ण जल के गुण—क्वाथ बनाकर गरम किया हुआ जल पाचक होता है । क्वाथ बनाने के कारण लघु हुआ यह जल श्रम, भेद (मलभेद-अतिसार), तृष्णा, मूर्च्छा तथा अत्यन्त पिपासा में उपयोगी है । गरम करके ठण्डा किया हुआ यह जल बालकों के सब रोगों को नष्ट करने वाला कहा गया है । सुश्रुत सू. अ. ४५ में कहा है—कफमेदोऽनिलामघ्नं दीपनं बस्तिशोधनम् । श्वासकासज्वरहरं पथ्यमुष्णोदकं सदा ।। यहां उष्ण किये हुए अथवा क्वाथ बनाकर तैयार किये हुए हुए जल का क्या अभिप्राय है-इसको भी आचार्य स्वयं वहीं स्पष्ट करते हैं कि—जो जल क्वाथ बनाने के कारण हल्का हो गया हो तथा चतुर्थांश शेष रहा हो-वही गुणकारी होता है ।।२४-२५।।
......................................................... ।।
.............. मुष्णोदकं शिशोः । रक्तपित्तामयं त्यक्त्वा प्रायो वातकफात्मके ।।
रोगे शिशुर्वा धात्री वा गुर्विणी वोष्णकं पिबेत् । क्वचिद्रोगविशेषेण तप्तशीतं हितं बहु ।।
(इति ताडपत्रपुस्तके २६१ तमं पत्रम् ।)
रक्तपित्त रोग को छोड़कर प्रायः सब वात एवं कफ के रोगों में शिशु को उष्ण जल का प्रयोग कराना चाहिये । शिशु, धात्री तथा गर्भिणी स्त्री को उष्ण जल का ही प्रयोग कराना चाहिये । किसी २ रोग में गरम करके ठण्डा किया हुआ जल अधिक हितकर माना गया है । ऐसा सुश्रुत सू. अ. ४५ में कहा है । रक्तपित्त रोग में उष्ण जल का निषेध किया गया है क्योंकि उष्णता से रक्तपित्त प्रकुपित हो जाता है ।।
अथान्तरिक्षं शरदि प्रशस्तं संतप्यमानं च रवेर्मयूखैः ।
पिबेत्सरो वाऽथ नदीं तडागं हेमन्तकाले शिशिरे च बालः ।।
वाप्यौद्भिदं प्रास्रवणं हि तोयं ग्रीष्मे प्रशस्तं कुसुमागमे च ।
वर्षासु कौपं सलिलं प्रशस्तमारोग्यहेतोरथ तप्तशीतलम् ।।
बालकों के लिये शरद् ऋतु में सूर्य की किरणों से सन्तप्त (तपाया हुआ) हुआ आन्तरीक्ष जल (वर्षा जल) प्रशस्त माना गया है । हेमन्त तथा शिशिर ऋतु में सरोवर, नदी तथा तडाग (तालाब) का जल पीना चाहिये । ग्रीष्म तथा वसन्त ऋतु में बाबड़ी, औद्भिद अथवा झरने का जल प्रयोग में लाना चाहिये । तथा वर्षा ऋतु में गरम करके ठण्डा किया हुआ कुंए का पानी आरोग्य के लिये हितकर होता है ।।
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।।
(इति) खिलेषु पानीयगुणविशेषीयाध्यायः ।। (२३)
ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ।
(इति) खिलेषु पानीयगुणविशेषीयाध्यायः ।। (२३)
५५२ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | मांसगुणविशेषीयाध्यायः २४]
अथ मांसगुणविशेषीयाध्यायश्चतुर्विंशः ।
अथातो मांसगुणविशेषीयं व्याख्यास्यामः ।।१।।
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।।२।।
अब हम मांसगुणविशेषीय अध्याय का व्याख्यान करेंगे। ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था। अर्थात् इस अध्याय में मांस के सामान्य तथा विशेष गुणों का वर्णन किया जायेगा ।।१-२।।
मांसं वृष्यं च बल्यं च मांसं प्राणविवर्धनम् । मांसं पुष्टिकं वृद्धकृशानां मांसवर्धनम् ।।३।।
**मांस के सामान्य गुण—**मांस वृष्य, बल्य तथा प्राणों की शक्ति को बढ़ाने वाला है। यह पुष्टिकारक है तथा वृद्ध एवं कृश व्यक्तियों के मांस को बढ़ाता है।
**वक्तव्य—**शरीर के मांस की वृद्धि करने में मांस सबसे बढ़कर माना गया है। 'सर्वदा सर्वभावानां सामान्यं वृद्धिकारणम्' इस सिद्धान्त के अनुसार शरीर के मांस तथा खाद्य मांस में मांसत्व के सामान्य होने से यह शरीर के मांस की वृद्धि करता है ।।३।।
क्षयिणां क्षीणदेहानां मांसमेव परायणम् । न मांसतुल्यमन्यत्त्वारोग्यवीर्यविवर्धनम् ।।४।।
क्षय के रोगी तथा क्षीण देह वाले व्यक्तियों के लिये मांस ही श्रेष्ठ द्रव्य है। उनके आरोग्य तथा वीर्य की वृद्धि के लिये मांस के समान और कोई पदार्थ नहीं है ।।४।।
नराणां क्षीणशुक्राणां मांसं रेतोभिवर्धनम् । बन्ध्यानामपि नारीणां कुमाराणां तथैव च ।।५।।
जिन व्यक्तियों का शुक्र (वीर्य) क्षीण हो गया है उनमें मांस से वीर्य की वृद्धि होती है। तथा बन्ध्या स्त्रियों में एवं बालकों में भी यह शुक्र धातु की वृद्धि करता है ।।५।।
गर्भाधानकरं मांसमन्ते पुष्टिकं तथा । गर्भिणीनां च नारीणां वातप्रशमनं परम् ।।६।।
मांस गर्भाधान (गर्भस्थिति) कराने वाला है तथा अन्त में गर्भ की पुष्टि करता है। गर्भिणी स्त्रियों में मांस का सेवन करने से वायु की शान्ति होती है ।।६।।
स्त्रीणां प्रसवकाले तु मांस ............ मेव च । गर्भकाले च बालानां सरसं परमौषधम् ।।७।।
प्रसव के समय स्त्रियों में मांस (रस) ..... श्रेष्ठ माना गया है। गर्भ के समय (गर्भस्थित) बालकों के लिये रसयुक्त मांस (अर्थात् मांसरस) श्रेष्ठ ओषधि माना गया है ।।७।।
स्त्रीप्रियाणां तथा पुंसां नित्यव्यायामसेविनाम् ।
क्षीणानां यक्ष्मणां चैव ज्वरक्षीणाश्च ये नराः ।।८।।
वाताहतास्तु ये सत्त्वास्तेषां मांसरसो हितः ।
जिन व्यक्तियों को स्त्रियां प्रिय हैं (अर्थात् जो स्त्रियों का सहवास अथवा मैथुन अधिक करते हों), जो नित्य व्यायाम करते हों तथा जो क्षीण एवं क्षय के रोगी हैं, जो ज्वर के कारण क्षीण हुए हैं तथा जो वातरोग से पीडित हैं—ऐसे व्यक्तियों में मांसरस हितकर होता है ।।८।।
सुसंस्कृतो मांसरसो बिडजीरकहिङ्गुभिः ।।९।।
स्नेहे सिद्धश्च पयसा विशेषाद्वातिके स्मृतः ।
मांंसगुणविशेषीयाध्यायः २४] खिलस्थानम् ५५३
विडनमक, जीरा तथा हींग से अच्छी प्रकार संस्कृत किया हुआ तथा दूध डालकर स्नेह के साथ सिद्ध किया हुआ मांस रस विशेषकर वातरोगों में हितकर माना गया है ॥९॥
वातपित्तोत्तरे पुंभिः शर्करामधुरीकृतः ।।१०।। स्निग्धो मांंसरसः पेयस्तथा रक्तामयार्दितैः ।
वात एवं पित्त के प्रकोप तथा रक्त रोगों से पीडित व्यक्तियों में शर्करा के द्वारा किया हुआ स्निग्ध मांंसरस पिलाना चाहिये ॥१०॥
क्षीण(र)सिद्धो मांंसरसो मधुरो लवणोऽपि वा ।।११।। बालानां क्षीणदेहानां गर्भकाले च शस्यते ।
दूध के द्वारा सिद्ध किया हुआ मधुर अथवा लवण मांंसरस क्षीण देह वाले बालकों के लिये तथा गर्भ के समय प्रशस्त होता है ॥११॥
हितं च बा(ब)लकामानां मांंसस्वरससाधितः (म) ।।
बल को चाहने वाले व्यक्तियों के लिये मांंसरस से सिद्ध किये हुए द्रव्य हितकर माने जाते हैं ॥१२॥
सुसिद्धं लवणे सिद्धं मांसं कटुकरोचनम् । कायाग्निदीपनं चैव रसा ....... पो हितः ।।१३।।
अच्छी प्रकार लवण के साथ सिद्ध तथा मरिच आदि कटु पदार्थों के द्वारा रुचिकारक बनाया हुआ मांस कायाग्नि को प्रदीप्त करता है ....... ॥१३॥
वेसवारः समधुरो लावणो वाऽपि रोचनः । पिष्टचूर्णितपक्वं ब्रा प्रकु ...... वापिवाग्न(?)तत् ।।१४।।
रुचिकारक मीठा या नमकीन वेसवार अथवा पिठ्ठी के चूर्ण से पकाया हुआ मांस हितकर होता है। जो मांस अस्थि रहित करके उबाल कर पुनः पत्थर पर पीस लिया जाय । .... उसमें फिर पिप्पली, मरिच, सोंठ, गुड तथा घृत मिलाकर पका लिया जाय उसे 'वेसवार' कहते हैं (सुश्रुत सू. अ. अ. ४६) ॥१४॥
शूल्यमङ्गारतप्तं च मांसं श्लेष्मामये हितम् । साम्लः(म्लं) सलवणश्चै(णं चै)व हितस्त (तं त)स्मात्तु जीवक ! ।।१५।।
लोहे की शलाका पर लेप करके अङ्गारों पर पकाया हुआ मांस श्लेष्म रोगों में हितकर होता है । इसलिये हे जीवक ! अम्ल एवं लवण युक्त करके इसका प्रयोग करना प्रशस्त माना गया है ॥१५॥
पिष्टं वा खण्डशो वाऽपि मांसं पुटकसाधितम् । सहिङ्गुसैन्धवबिडैर्मरिचाम्लसजीरकैः ।।१६।। साङ्कुरैर्धान्यकैश्चैव शृङ्गबेरार्द्रकैरपि । पलाशै भूस्तृणोपेतं मांसं सिद्धं प्रयोजयेत् ।।१७।।
मांस को पीसकर अथवा उसके टुकड़े २ करके हींग, सैन्धव, विडनमक, मरिच, अनार दाना, जीरा, अङ्कुरयुक्त गेहूँ, चने आदि धान्य तथा सोंठ, अदरक एवं भूस्तृण (गन्धतृण) आदि के द्वारा बर्तन में सिद्ध किया जाय । सिद्ध होने पर इसका प्रयोग करे ॥१६-१७॥
अथ मांंसरसं(सः) सर्पिः सिद्धं (द्धः)सक्षीरमि(रइ)ष्यते । रसपाकविशेषेण तद्वल्यं (स बल्यः) तद्व (स र) सायनम् (नः) ।।१८।।
घृत से सिद्ध किये हुए मांस रस में दूध मिलाकर प्रयोग करना चाहिये । इस प्रकार यह मांस-रस एवं पाक की विशेषता के कारण बल्य (Tonic) एवं रसायन (Alterative) माना गया है ॥१८॥
| ५५४ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | मांसगुणविशेषीयाध्यायः २४] |
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अतः परं तु मांसानां रसपाकविशेषणम्। वक्ष्ये गुणविशेषं च वृद्धजीवक ! तच्छृणु ।।१९।।
हे वृद्धजीवक ! अब मैं मांसों के रस एवं पाक की विशेषता तथा उनके विशेष गुणों का वर्णन करूंगा। इसे तुम सुनो ।।
कफपित्तकरं मांसं गवां वाते हितं गुरु। विदाहि बृंहणं चैव, खङ्गमांसं च तत्समम् ।।२०।।
गौ का मांस—गौ का मांस कफ तथा पित्तकारक, वातरोगों में हितकर, गुरु, विदाहि एवं बृंहण होता है। गैंडे का मांस—यह भी गौ के मांस के ही समान होता है ॥२०॥
न्यङ्कूनां विहितं वाते कफपित्तहरं लघु। सक्षारं दान्तिनं मांसं बृंहणं कटुतिक्तकम् ।।२१।।
वीर्येणोष्णं च तद्विद्यात् कफपित्तं करोति च।
शम्बर मृग (बारहसिंगे) का मांस—शम्बर मृग का मांस वातरोगों में हितकर है तथा यह कफ—पित्तहर एवं लघु है। हाथी का मांस-हाथी का मांस क्षारयुक्त, बृंहण, कटु एवं तिक्त होता है। यह वीर्य में उष्ण होता है तथा कफ और पित्त को बढ़ाता है ॥२१॥
गोकर्णमांसं तत्तुल्यं गवयस्थ रुरोरपि ।।२२।।
गोकर्ण (मृगभेद), गवय (गलकम्बल से शून्य गौ के समान पशु-नील गाय) तथा रुरु (मृगभेद) का मांस भी हाथी के मांस के समान ही होता है ॥२२॥
रसे पाके च मधुरं वातपित्तहरं गुरु। उष्णं चैव च्छागमांसमाविकं चापि तद्गुणम् ।।२३।।
अजा का मांस—अजा (बकरे) का मांस रस एवं विपाक में मधुर, वात पित्त नाशक, गुरु तथा उष्ण है। भेड़ का मांस—भेड़ के मांस-भेड़ के मांस के गुण बकरे के मांस के समान ही है ॥२३॥
वृष्यं तु मांस वाराहं मधुरं गुरु पच्यते। तद्गुणं माहिषं विद्धि, शौकरं स्यात्ततो गुरु ।।२४।।
सूअर का मांस—सूअर का मांस वृष्य, मधुर तथा गुरुपाकी होता है। भैंस का मांस—भैंस के मांस के वे ही गुण हैं जो सूअर के मांस के हैं। सूअर का मांस इससे गुरु होता है ।।
गर्दभस्य तथाऽश्वस्य मांसं यत् पृषतस्य च। कफघ्नं वातलं रूक्षं कटुतिक्ताह्वयं लघु ।।२५।।
गदहा, घोड़ा तथा पृषत (जिसके शरीर पर चित्र विचित्र बिन्दु होते हैं ऐसा चित्तल मृग) नामक हरिण का मांस-कफनाशक, वातकारक, रूक्ष, कटु, तिक्त एवं लघु होते हैं ।।
श्वदंष्ट्रो वृषदंष्ट्रश्च ऋष्यः शरभ एव च। वातघ्ना उष्णवीर्याश्च रसत: कटुकान्वया: ।।२६।।
गोलाङ्गूला वानराश्च तत्तुल्या मधुरोत्तराः ।
श्वदंष्ट्र (चार दांत वाला एक मृग), वृषदंष्ट्र (रान का बिलाव), ऋष्य (नीले अण्डकोश वाला रोहू मृग) तथा शरभ (महासिंह नामक काश्मीर देशीय हरिण विशेष—अष्टापद उष्ट्रप्रमाणो महाशृङ्गः पृष्ठगतचतुष्पादः काश्मीरे प्रसिद्ध) का मांस वातनाशक, उष्णवीर्य तथा रस में कटु होता है। गोलाङ्गूल (बन्दर की जाति) तथा वानरों का मांस-इन्हीं के समान है परन्तु इनमें कुछ मधुर रस की अधिकता होती है ॥२६॥
वृकर्क्षकोकजम्बूकाः सिंहा व्याघ्रतरक्षवः ।।२७।।
(इति ताडपत्रपुस्तके २६२ तमं पत्रम्)
मांसगुणविशेषीयाध्यायः २४] खिलस्थानम् ५५५
स्वाद्युमांसास्स्त्विमे वृष्या उष्णाः पित्तविवर्धनाः । कषायतिक्ता रसतो वातघ्नाः कटुपाकिनः ।। २८ ।।
वृक (भेडिया), ऋक्ष (रीछ), कोक (ईहामृग), जम्बूक (गीदड़), सिंह, व्याघ्र, तरक्षु (व्याघ्रविशेष) का मांस स्वादु, वृष्य, उष्ण तथा पित्तवर्धक होता है। इनका रस कषाय एवं तिक्त होता है, ये वातनाशक हैं तथा इनका विपाक कटु होता है ॥२७-२८॥
नकुलो मूषिकः श्वाविद्बभ्रुः शल्यक एव च । कषायमधुराः शीता वृष्या गोधाश्च तद्गुणाः ।। २९ ।।
नेवला, मूषिक (चूहा), श्वावित् (सेही), बभ्रु (नकुल भेद) तथा शल्यक—का मांस कषाय, मधुर, शीत एवं वृष्य होता है। गोधा (गोह) का मांस भी इन्हीं के समान होता है ॥
ये स्युः शशकुरङ्गाद्याः सृमरश्चमराश्च ये । लघवो ........ ष्णाः पित्तला नातिबृंहणाः ।। ३० ।।
शश (खरगोश), कुरंग (हरिण), सृमर (शृङ्ग त्यागी मृग), चमर (चंवर गाय) का मांस-लघु, ... उष्ण, पित्तकारक तथा थोड़े बृंहण होते हैं ॥३०॥
बार्हिणं मधुरोष्णं तु विषघ्नं गुरु बृंहणम् । तुल्यं कौक्कुटजं वन्यं, तत्तुल्यं ग्राम्यकौक्कुटम् ।। ३१ ।।
मोर का मांस—मधुर, उष्ण, विषनाशक, गुरु एवं बृंहण होता है। जंगली तथा ग्राम्य (पालतू) मुर्गे का मांस भी इन्हीं के समान है ॥३१॥
विष्किराः क्रौञ्चवर्तीका मयूरेण समाः स्मृताः ।
तस्माल्लघुस्तु वर्तीरो वर्तीका लघवो लघुः ।। ३२ ।।
विष्किर (पंजों से कुरेद कर चुगने वाले प्राणी—विकीर्य विष्किराश्चेति), क्रौञ्च तथा वर्तीक (बटेर) के मांसों के गुण मोर के मांस के समान होते हैं। वर्तीर (कपिञ्जल के समान पक्षी-घरघरा) उससे लघु होता है वर्तीक (बटेर) उससे भी लघु होता है ॥३२॥
तित्तिरिस्तु कटुः पाके सोष्णास्तु कफवातजित् । कपिञ्जलश्चकोरश्च उपचक्रश्च तत्समाः ।। ३३ ।।
तीतर (काला तीतर) का मांस—विपाक में कटु, उष्ण तथा कफ और वात को शान्त करने वाला है। कपिञ्जल (गोरा तीतर), चकोर तथा उपचक्र (हंस विशेष) के मांस इन्हीं के समान होते हैं ॥३३॥
लोहपृष्ठो रक्तपृष्ठो रक्ताक्षो जीवजीवकः । तथाऽन्ये हिमवज्जाता मधुरा वृष्यबृंहणाः ।। ३४ ।।
गुरवः शीतलाः पाके कषाया रसस्तथा ।
लोहपृष्ठ (कङ्कपक्षी), रक्तपृष्ठ, रक्ताक्ष (पारावत-कबूतर), जीवजीवक (प्लवजातीय चकोर भेद) तथा अन्य हिमालय में उत्पन्न होने वाले प्राणी-मधुर, वृष्य, बृंहण, गुरु, पाक में शीतल तथा रस में कषाय होते हैं ॥३४॥
खञ्जरीटो वपुक्कारः क्रकरो दीर्घपुंसकः ।। ३५ ।।
कोयष्टिकः कपोतश्च रक्तपादो वसन्तकः । भृङ्गराजोऽथ हारीतः कोकिलः शुकसारिकाः ।। ३६ ।।
एते चान्ये च प्रच्छदा (?) शीतमारुतकोपकाः । कषायमधुराः स्वादे कफघ्नाः कटुपाकिनः ।। ३७ ।।
खञ्जरीट (खञ्जन), वपुक्कार, केकड़ा, दीर्घपुंसक, कोयष्टिक (टिटिहरी या क्रौञ्च), कबूतर, रक्तपाद (तोता), वसन्तक, भृङ्गराज (पक्षिविशेष), हारीत (हरिताल पक्षी), कोयल, तोता तथा मैना—इन तथा अन्य भी प्रच्छद पक्षियों के मांस शीत तथा वायु को कुपित करनेवाले हैं। ये स्वाद में कषाय एवं मधुर हैं, कफनाशक हैं तथा इनका विपाक कटु है ॥३५-३७॥
५५६ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् मांसगुणविशेषीयाध्यायः २४]
गृध्रः काकः श्येनचाषौ भासोलूककुलिङ्गकाः । शशन्ता मूषिकाः क्रोडास्तथाऽन्ये मांसभोजनाः ।।
प्रसहास्ते तु मधुरा वातघ्नाः कटुपाकिनः । बृंहणाश्चोष्णवीर्याश्च सततं शोषिणां हिताः ।।३९।।
गृध्र, कौवा, श्येन (बाज), चाष, भास (गोकुलचारी गृध्रविशेष), उल्लू, कुलिङ्गक (चिड़िया), शशन्त, मूषिक, क्रोड-तथा अन्य जो भी प्रसहवर्ग के मांस भोजन करनेवाले हैं वे मधुर, वातनाशक, कटुपाकी, बृंहण तथा उष्णवीर्य हैं एवं शोषरोगियों के लिये निरन्तर सेवन करने से हितकर हैं। प्रसह—अपना भोजन जबरदस्ती पकड़ कर खानेवाले प्राणी 'प्रसह' कहलाते हैं ।।
प्लवा बका बलाकाश्च तीदार्यः कुररास्तथा । ........ रक्ताक्षा मल्लिकाक्षाः सवारटाः ।।४०।।
नदीमुखा मेघरावाः शराख्या जलकुक्कुटाः । समुद्रकाकाः कुहरा गोट्टुभा गण्डमालकाः ।।४१।।
कारण्डवाः सजीमूतास्तथाऽन्ये जलचारिणः । पाके च मधुरा वृष्या गुरवश्च ........ ।।४२।।
............................................ । ............................................ ।।४३।।
प्लव (पानी में तैरनेवाले जीव संघातंचारी पक्षी), बक (बगुला), बलाका (बकभेद), तीदार्य, कुरर, ..... रक्ताश्व, मल्लिकाक्ष (हंस विशेष), वारट (हंसी), नन्दीमुख, मेघराव (मेघनाद या चातक), शर, जलकुक्कुट (जल मुर्गा), समुद्र का, कुहर, गोट्टुभ, गण्डमालक, कारण्डव (सफेद हंस का भेद), जीमूत तथा अन्य जो भी जलचर पक्षी हैं उनका मांस पाक में मधुर, वृष्य एवं गुरु होता है ....... ।।४०-४३।।
हंसस्तु गुरुरत्यर्थं वृष्योऽथ कफपित्तलः । शरारिः पाकहंसश्च चक्रवाकस्तथैव च ।।४४।।
जालपादास्तथाऽन्ये च हंसतुल्या गुणैः स्मृताः ।
हंस का मांस अत्यन्त गुरु, वृष्य तथा कफ एवं पित्तवर्धक हैं। शरारि (आटी), पाकहंस, चक्रवाक, जालपाद तथा अन्य पक्षी गुणों में हंस के समान माने गये हैं ।।४४।।
क्रौञ्चः कुलिङ्गो द्रविडः पद्मपुष्करसादकः ।।४५।।
वार्धीणसः सारसश्च सारङ्गो धामृण्यलिकः (?) ।
एते चान्ये चाम्बुचराः पक्षिणो गुरवः स्मृताः ।।४६।।
रसे पाके च मधुरा उष्णाः सलवणान्वयाः । वृष्या वातहराश्चैव कफपित्तविवर्धनाः ।।४७।।
क्रौञ्च, कुलिङ्ग, द्रविड, पद्मपुष्कर, सादक,, वार्धीणस (नीली ग्रीवा तथा लाल सिर वाला पक्षी विशेष), सारस, सारङ्ग (मृगभेद-चित्रमृग), धामृण्यलिक (?)—इत्यादि तथा अन्य भी जलक्षर पक्षी गुरु माने गये हैं। ये रस तथा विकाप में मधुर होते हैं और ये उष्ण, लवणरसयुक्त, वृष्य, वातनाशक एवं कफ और पित्त को बढ़ाने वाले हैं ।।४५-४७।।
नलमीनो झषश्चैव पाठीनश्चर्मपीवरः । चेलीमः शकुलार्भ(द)श्च शिलीन्ध्रो गर्गरस्तथा ।।४८।।
पुष्करो गोकरो मूचो वारडः शूलपाटलः । कृष्णमत्स्यः श्वेतमत्स्यो गोमत्स्यो रोहितस्तथा ।।४९।।
शकली महाशकली चम्पः कुन्दोऽथ मद्गुरः ।
इल्यः शङ्कुश्चिरणो राजीवः शफरी तथा ।।५०।।
एते चान्ये च बहवो विविधा मत्स्यजातयः । रसे पाके च मधुरा वातघ्ना वृष्यबृंहणाः ।।५१।।
उष्णवीर्याश्च ते ज्ञेया गुरवः कफपित्तलाः । लघ्वाशायास्तेऽन्ये तु किञ्चित्तिक्तान्वयान्तराः ।।५२।।
रोहितो नलमीनश्च ........... लघवः स्मृताः ।
मांसगुणविशेषीयाध्यायः २४] खिलस्थानम् ५५७
नलमीन (चिलिचिम मछली), झष (मत्स्यभेद), पाठीन, चर्सपीवर, चेलीम, शकुलार्भक, शिलीन्द्र, गर्गर, पुष्कर, गोकर, मूच, वारड, शूलपाटल, कृष्णमत्स्य, श्वेतमत्स्य, गोमत्स्य, रोहित, शकली, महाशकली, चम्प, कुन्द, मद्गुर, इल्य, शङ्क (शांकोच), चिचरण, राजीव, शफरी (प्रोष्ठी मत्स्य), इत्यादि तथा अन्य भी कई मछलियों की जातियां रस एवं पाक में मधुर, वातघ्न, वृष्य, बृंहण, उष्णवीर्य, गुरु तथा कफ एवं पित्तवर्धक हैं। इनमें लघु शरीर वाले तथा कुछ तिक्त रस वाले प्राणियों का ग्रहण करना चाहिये। रोहित एवं नलमीन ..... आदि लघु कहे गये हैं॥४८-५२॥
कूर्मो दुटिश्च नक्रश्च मकरोऽवकुशस्तथा ॥५३॥
तिमिः सहस्रदशनस्तथैव च तिमिङ्गिलः । इञ्चकः शुक्तिकः शङ्खोऽवलूको जलसूकरः ॥५४॥
शम्बूकश्चन्द्रिकः शृङ्गी कर्कटः शकुटीपयः । एते चान्ये च जलजा मधुरा रसपाकयोः ॥५५॥
गुरवश्चोष्णवीर्याश्च गुरवः कफपित्तलाः ।।
कूर्म (कछुआ), दुटि, नक्र (नाका), मकर (मगरमच्छ), अवकुश, तिमि, सहस्रदशन, तिमिङ्गिल, इञ्चक, शुक्तिक (सीप), शङ्ख, अवलूक, जलशूकर, शम्बूक (घोंघा), चन्द्रिक, शृङ्गी, कर्कट (केंकड़ा), शकुटीपय आदि तथा अन्य जलचर प्राणी रस तथा पाक में मधुर, गुरु, उष्णवीर्य, गुरु तथा कफ एवं पित्तवर्धक होते हैं ॥५३-५५॥
आनूपे तूत्तमश्छागः, श्रेष्ठो मत्स्येषु रोहितः ॥५६॥
जलजे शुक्तिकूर्मौ च, वारटोऽप्यथ पक्षिषु । एणो मृगेषु प्रवरः, प्रतुदेषु शुको वरः ॥५७॥
(इति ताडपत्रपुस्तके २६२ तमं पत्रम्)
विषयेषु ...... ग्न्यो लावः खगेषु तु ।
तित्तिरो विष्किरेष्वग्न्यः, काकोऽग्न्यः प्रसहेषु तु ॥५८॥
आनूप (जलयुक्त प्रदेश में रहने वाले) प्राणियों में बकरा सबसे श्रेष्ठ माना गया है। मछलियों में रोहित मछली सबसे श्रेष्ठ होती है (रोहितो मत्स्यानां-चरक सू. अ. २५), जलज प्राणियों में शुक्ति और कूर्म (कछुआ), पक्षियों में वारट, मृगों में एण हरिण (ऐणेयं मृगमांसानां-चरक सू. अ. २५), प्रतुद (नोक से कुरेदकर चुगनेवाले) पक्षियों में तोता, विषयों में ........., पक्षियों में लाव (लावः पक्षिणां चरक सू. अ. २५), विष्किर (पंजों से कुरेदकर चुगने वाले) प्राणियों में तीतर, प्रसह (अपना भोजन जबरदस्ती पकड़ कर खाने वाले) प्राणियों में कौवा श्रेष्ठ माना गया है ॥५६-५८॥
लघूक्तं रुधिरं मांसाद् गुरु मेदश्च चर्म च । मज्जावसे गुरुतरे तेभ्यो गुरु शिरः स्मृतम् ॥५९॥
मांस की अपेक्षा रक्त लघु कहा गया है तथा मेद और चर्म (त्वचा) गुरु और मज्जा तथा वसा इनसे गुरु तथा सिर इनसे भी गुरु माना गया है ॥५९॥
लघुः स्कन्धो हि शिरसस्तस्मात् पार्श्वं लघु स्मृतम् ।
पार्श्वात् सक्थि लघु प्रोक्तं पादमांसं गुरु स्मृतम् ॥६०॥
सिर की अपेक्षा कन्धा लघु होता है, कन्धों से पार्श्वभाग तथा पार्श्व से सक्थि लघु होती है तथा पैरों का मांस गुरु होता है ॥६०॥
वसा मेदश्च मज्जा च वातपित्तहिताः स्मृताः । रसे पाके च मधुराः स्नेहाच्छ्लेष्मप्रकोपनाः ॥६१॥
रक्तं रक्तप्रशमनं मांसं मांसविवर्धनम् ।
वसा मेद तथा मज्जा—वात एवं पित्त के लिये हितकर होते हैं। ये रस तथा पाक में मधुर होते हैं, स्नेहयुक्त होते हैं तथा श्लेष्मा को प्रकुपित करते हैं। रक्त रक्त को निर्मल करने वाला है तथा मांस मांस की वृद्धि करता है ॥६१॥
५५८ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् मांसगुणविशेषीयाध्यायः २४]
गुरवः प्राणिनो बाला, युवानो वृष्यबृंहणाः ।।६२।।
वृद्धास्तु वातला रूक्षाः, पुंभ्यस्तु लघवः स्त्रियः ।
मृगाल्लघुतरः पक्षी, पक्षिभ्योऽम्बुचरो गुरुः ।।६३।।
बाल (छोटे) प्राणी गुरु माने गये हैं, युवा प्राणी वृष्य तथा बृंहण होते हैं तथा वृद्धप्राणी वातकारक एवं रूक्ष होते हैं। पुरुषों (Males) की अपेक्षा स्त्रियां (Females) लघु होती हैं। मृगों (पशुओं) की अपेक्षा पक्षी लघु होते हैं तथा पक्षियों से जलचर प्राणी गुरु होते हैं ॥६२-६३॥
महाशरीराश्चल्पकाया लघवो जीवक ! स्मृताः । विज्ञेयाश्चाल्पभुग्भ्योऽपि गुरवो बहुभोजनाः ।।६४।।
हे जीवक ! (नकुल मूषिक आदि) अल्प शरीरवाले प्राणियों में बड़े और मोटे प्राणियों का मांस लघु होता है । अल्पभुक् (थोड़ा खानेवाले) प्राणियों में अधिक भोजन करनेवाले प्राणी गुरु होते हैं ॥६४॥
लघवोऽल्पभूमिचरा, अलसेभ्यो विदूरगाः । लघुदेशचरा अल्पा लघवो लघुभोजनाः ।।६५।।
अल्पभूमिचर (थोड़ा चरने वाले) प्राणी लघु होते हैं । आलसी प्राणियों में बहुत दूर तक जाकर चरने वाले प्राणी लघु होते हैं तथा लघु देश में चरने वाले, अल्प शरीर वाले एवं लघु भोजन करने वाले प्राणी भी लघु होते हैं ॥६५॥
गुरुदेशचराः स्थूला गुरवो गुरुभोजनाः । पाशबद्धं गुरु मांसं रूक्षं क्षुद्व्याधिभिर्हतम् ।।६६।।
गुरु (भारी) देश (स्थान) में विचरने वाले, स्थूल तथा गुरु भोजन करने वाले प्राणी गुरु होते हैं। जाल में पकड़े हुए प्राणियों का मांस गुरु होता है। क्षुधा (भूख) एवं रोग से मरे हुए प्राणी का मांस रूक्ष होता है ॥६६॥
श्वभिर्हतं पीतरक्तं नातिबृंहणमुच्यते । विषैर्हतमभक्ष्यं स्याच्छुष्कं नातिगुणावहम् ।।६७।।
कुत्तों द्वारा मारे हुए तथा जिसका रक्तपान कर लिया गया है ऐसे प्राणियों का मांस अधिक बृंहण नहीं होता है। विष द्वारा मारे हुए प्राणियों का मांस अभक्ष्य होता है। वह शुष्क तथा गुणहीन होता है ॥६७॥
सद्योऽपरिक्लिष्टहतं मांसं धातुं विवर्धयेत् । पूतिमांसं गुर्वसारं तदवृष्यमबृंहणम् ।।६८।।
ताजा मारा हुआ तथा अदूषित मांस-मांस तथा धातु की वृद्धि करता है। जो मांस सड़ा हुआ, गुरु एवं साररहित हो वह अवृष्य तथा अबृंहण होता है ।
**वक्तव्य—**चरक सू. अ. २५ तथा सुश्रुत सू. अ. ४६ में भी अत्यन्त विस्तारपूर्वक देश, काल, अवस्था, लिङ्ग, जाति तथा अङ्गों के भेद से मांस के गुणों का वर्णन किया गया है ॥६८॥
एवं मांसविशेषज्ञः कल्पयेद्भोजने सदा । बालानां गुर्विणीनां वा बालपुत्रासु वा भिषक् ।।६९।।
दुष्प्रजातासु वा स्त्रीषु बाले वा कृशिते सदा । प्रयुञ्जन् सिद्धिमप्नोति तत्त्वविद् वृद्धजीवक ! ।।७०।।
इस प्रकार मांस के गुणों को जानने वाले व्यक्तियों को भोजन में सदा मांस की कल्पना करनी चाहिये । हे वृद्धजीवक ! जो तत्त्ववेत्ता मनुष्य बालक, गर्भिणी, छोटी लड़की, दुष्प्रजाता स्त्री तथा कृश बालकों में इस प्रकार कल्पनानुसार मांस का प्रयोग करता है वह सिद्धि (सफलता) को प्राप्त करता है ॥६९-७०॥
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।।
(इति) खिलेषु मांसगुणविशेषीयाध्यायश्चतुर्विंशतितमोऽध्यायः ॥२४॥ चू (७०)
देशसात्म्याध्यायः २५] खिलस्थानम् ५५९
ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था।
(इति) खिलेषु मांसगुणविशेषीयाध्यायश्चतुर्विंशतितमोऽध्यायः ॥२४॥ चू (७०)
अथ देशसात्म्याध्यायः पञ्चविंशः ।
अथातो देशसात्म्याध्यायं व्याख्यास्यामः ॥१॥
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ॥२॥
अब हम देशसात्म्याध्याय का व्याख्यान करेंगे। ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था।
**वक्तव्य—**इस अध्याय में किस २ देश में कौन २ सा आहार-विहार सात्म्य होता है—इसका वर्णन किया जायगा। यह अध्याय भी अपूर्ण ही मिलता है। इसमें कुरुक्षेत्र को मध्य (Centre) मानकर पहले पूर्व दिशा के देश तथा सात्म्य आहार विहार का वर्णन किया है। उससे आगे दक्षिण दिशा के देश में केवल नामों का ही उल्लेख मिलता है। उससे आगे अध्याय खण्डित हो गया है। उस खण्डित अंश में संभवतः दक्षिण देशों का सात्म्य आहार-विहार तथा पश्चिम एवं उत्तर देशों के नामपूर्वक सात्म्य आहार-विहार आदि का वर्णन किया गया होगा ॥१-२॥
कश्यपाख्यमृषिश्रेष्ठं पृष्टवान् ...... रोचतः । देशसात्म्यमजानन्तः कथं कुर्युश्चिकित्सितम् ॥३॥
कस्य देशस्य मध्ये तु कुरुक्षेत्रं प्रतिष्ठितम् ।
कश्यप नाम वाले श्रेष्ठ ऋषि से जीवन ने प्रश्न किया-देश सात्म्य को जाने बिना हम किस प्रकार चिकित्सा कर सकते हैं तथा कुरुक्षेत्र किस देश के मध्य में स्थित है ॥३॥
इत्येवमुक्तो भगवान् काशिराजो महामुनिः ॥४॥
इदमुत्तरमक्लिष्टं व्याख्यातुमुपचक्रमे । कुरुक्षेत्रं मध्यदेशश्चाद्योजनानां शतं परम् ॥५॥
समस्तान् षड्रसान् प्रायो भुञ्जते मध्यदेशजाः । भक्ष्यभोज्यान्नवीरास्ते तु भुञ्जन्तो वाऽसकृत्तथा ॥६॥
इस प्रकार प्रश्न किये जाने पर महामुनि भगवान् काशीराज ने सरल ढंग से उत्तर देना प्रारंभ किया-देश के मध्यभाग में सौ योजन विस्तार वाला कुरुक्षेत्र प्रदेश है। मध्य देश के निवासी प्रायः सम्पूर्ण छहों रसों (रसों से युक्त आहार) का सेवन करते हैं। वे भक्ष्य, भोज्य एवं अन्न (खान पान) में अत्यन्त वीर होते हैं तथा वे अनेक बार भोजन करते हैं। अर्थात् वे खूब खाने पीने वाले होते हैं ॥४-६॥
पूर्वदिशस्तु विज्ञेयो मधुरः शीतलो गुरुः । कुमारवर्तनीमा(चा)दौ कटीवर्षस्तथैव च ॥७॥
मगधासु महाराष्ट्रऋषभद्वीपमेव च । पौण्ड्रवर्धनकं चापि मृत्तिकावर्धमानकम् ॥८॥
कर्वटं च समातङ्गं ताम्र(प्र)लिप्तं सचीरकम् । प्रियङ्गुमथ कौशल्यं कलिङ्गपृष्ठपूरकम् ॥९॥
पूर्व दिशा के देश मधुर, शीतल तथा गुरु माने गये हैं। वे देश निम्न हैं—सबसे पहले कुमारवर्तनी, फिर कटीवर्ष, मगध में महाराष्ट्र, ऋषभ द्वीप, पौण्ड्रवर्द्धनक, मृत्तिकावर्धमानक, कर्वट, मातङ्ग, ताम्रलिप्त, चीर (चीन), प्रियङ्गु, कौशल्य, कलिङ्ग तथा पृष्ठपूरक ॥७-९॥
एषु प्लीहविनो मर्त्या गलगण्डिकमे(न ए)व च । गुडशाल्योदनप्राया मत्स्यभोजनसेविनः ॥१०॥
प्रायशो मधुराहारा वातश्लेष्मात्मका नराः ।
५६० काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्
इन देशों के लोग प्लीहा एवं गलगण्ड से युक्त होते हैं अर्थात् उनमें प्लीहारोग (Enlargement of Spleen आदि) तथा गलगण्ड (Goitre) रोग अधिक होते हैं। ये प्रायः गुड तथा शालिचावल और मछली का भोजन करते हैं। इनका आहार प्रायः मधुर होता है तथा यहां के लोग वात एवं श्लेष्म प्रकृति के होते हैं ॥१०॥
तेषां कटुकतिक्तं च रूक्षमुष्णं च भोजनम् ।।११।।
यच्चान्यदपि श्लेष्मघ्नं तेषां तत्तत् प्रयोजयेत् ।
इन व्यक्तियों को कटु, तिक्त, रूक्ष एवं उष्ण भोजन कराना चाहिये तथा अन्य जो भी श्लेष्मनाशक आहार-विहार है—उसका सेवन कराना चाहिये ॥११॥
कञ्चीपदा नवध्वाना कावीरास्तुल्ययोरपि ।।१२।।
वानसी कुमुदाराज्यं चिरिपालिस्तथैव च। चीरराज्यञ्च चोराणां पुलिन्द(न्दं)द्रविडेषु च ।।१३।।
करघाटशनानां च विवे(दे)हा मण्डपेषु च। कान्तारं च वराहं च घटास्वाभीरमेव च ।।१४।।
दक्षिणां दिशमाश्रित्य देशा वि ........ ।
(इति ताडपत्रपुस्तके २६४ तमं पत्रम्)
दक्षिण दिशा का आश्रय करके निम्न देश हैं—कञ्चीपद, नवध्वान, कावीर, वानसी, कुमुदाराज्य, चिरिपालि, चोरों का चीरराज्य, द्रविड में पुलिन्द, शनों में करघाट, मण्डपों में विदेह, कान्तार, वाराह तथा घटाओं में आभीर देश हैं।....
(वक्तव्य—इन देशों का यथासंभव परिचय उपोद्धात में दिया गया है। पाठक इन्हें वहीं देखें) ॥१२-१४॥
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खिलस्था¹नस्यैतावानेव भाग उपलब्धः ।
खिलस्थान का इतना ही भाग उपलब्ध होता है।
काश्यपसंहिता वृद्धजीवकीयतन्त्रं च एतावत्येवोपलब्धभागे विश्राम्यति ।
१. खिलान्यशीतिरध्याया इति पूर्वोद्देशानुसारेणाऽस्मादपूर्णपञ्चविंशाध्यायादुत्तरं पञ्चपञ्चाशदध्याया अवशिष्यन्ते, तेनाऽर्धग्राम इवायमकाण्डे विच्छिन्नो ग्रन्थः पूर्त्तये पुनरनुकूलदैवं समीहते। उक्तं चाभियुक्तैः—
द्वीपादन्यस्मादपि मध्यादपि जलनिधेर्दिशोऽप्यन्तात्। आनीय झटिति घटयति विधिरभिमतमभिमुखीभूतः॥ इत्यलम्।
काश्यपसंहिताया विषयानुक्रमणिका
सूत्रस्थानम् ।
| विषय | पृ. | ^१पं. | विषय | पृ. | पं. |
|---|---|---|---|---|---|
| लेहाध्यायः । | शुद्धक्षीरस्य लक्षणम् | १२ | ६ | ||
| लेहनविषये जीवकस्य प्रश्नाः | १ | १ | अशुद्धक्षीरसेवनदोषास्तेषां शान्तिश्च | १३ | १ |
| कश्यपस्योत्तरम् | २ | १ | वज्रस्य (स्तनकीलकस्य) संज्ञाहेतुसंप्राप्ति-लक्षणानि | १३ | ३ |
| गर्भिण्या रसधातोस्त्रिधा विभागः | २ | २ | वज्रस्य चिकित्सा | १४ | ५ |
| देहिनां प्रकृत्यभिनिर्वृत्तौ हेतुः | २ | ४ | नार्याः स्तनोपरि दुष्टदृष्टिपातस्तच्चिकित्सा च | १५ | २ |
| देहप्रकृतेर्भेदाः | २ | ४ | दन्तजन्मिकाध्यायः २० । | ||
| देहप्रकृत्याश्रिता भेषजकल्पना | ४ | १ | दन्तजन्मविषये जीवकस्य प्रश्नाः | १५ | ८ |
| वयोभेदेन बालेषु भेषजमात्रानिर्देशः | ४ | २ | कश्यपस्योत्तरम् | १६ | १ |
| लेहनायोग्या बालाः | ५ | ६ | दन्तानां भेदाः, संज्ञाः, उत्पत्तिकालश्च | १६ | १ |
| बालानां सात्म्यान्येवान्नपानान्युपयोज्यानि | ६ | १ | कुमारीणां कुमाराणां च दन्तजन्मनि विशेषः | १७ | १ |
| लेहनविधिः | ६ | ३ | दन्तानां निषेकोद्भेदादौ हेतुः | १७ | २ |
| बालानां सुवर्णप्राशनगुणाः | ६ | ५ | दन्तानां निषेककालः | १८ | १ |
| बालानां मेधाजनना लेहाः | ७ | २ | अप्रशस्तं दन्तजन्म, तच्छान्तिश्च | १८ | १ |
| बालानां लेहनार्थम् अभयं घृतम् | ७ | ६ | चतुर्विधं दन्तजन्म | १८ | ५ |
| बालानां लेहनार्थम् संवर्धनं घृतम् | ८ | ३ | सामुद्रसंवृतविवृतानां दोषाः | १८ | ५ |
| बालानां लेहनार्थम् ब्राह्मयाद्यं घृतम् | ८ | ५ | मासविशेषेण दन्तनिषेकस्य दोषा गुणाश्च | १८ | ७ |
| क्षीरोत्पत्त्यध्यायः १९ । | दन्तसंपत् | १८ | १० | ||
| स्कन्दादिग्रहदूषितधात्रीदुग्धलक्षणम् | ९ | १ | अप्रशस्ता दन्ताः | १८ | १२ |
| रसवर्णाभ्यां धात्र्याः क्षीरपरीक्षा | ९ | ५ | चूड़ाकरणीयाध्यायः २१ । | ||
| दुष्टक्षीरस्य संशोधनम् | ९ | ६ | कर्णपालीवर्धनोपायाः | २१ | १ |
| क्षीरवर्धनम् | १० | ५ | अभिषजः कर्णवेधननिषेधः | २१ | ४ |
| क्षीरविशोधनो गणः | १० | ८ | स्नेहाध्यायः २२ । | ||
| क्षीरशोधनकालिक आहारः | ११ | २ | स्नेहस्य योनिर्विकल्पाश्च | २३ | ३ |
| क्षीरसंशोधनकाले वर्जनीयानि | ११ | ३ | स्थावरस्नेहाः | २३ | ३ |
| क्षीर-प्रजनन-वर्धनानि | ११ | ४ |
१. अत्र सर्वत्र पङ्क्तिसंख्यागणनायां केवलं संस्कृतमूलश्लोकगद्यस्थितपङ्क्तीनामेव ग्रहणम् ।
५६२ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्
| विषय | पृ. | पं. | विषय | पृ. | पं. |
|---|---|---|---|---|---|
| औद्भिदाः स्नेहाः | २३ | ४ | जीर्णस्नेहलक्षणम् | ३३ | ३ |
| घृततैलवसामज्ज्ञां पूर्वपूर्वस्य श्रेष्ठत्वम् | २३ | ५ | स्नेहावपीडगुणाः | ३३ | ६ |
| घृतगुणाः | २४ | १ | स्नेहापचारजा रोगाः, तच्चिकित्सा च | ३३ | ८ |
| तैलगुणाः | २४ | ३ | स्नेहव्यापद्धेतुस्तच्चिकित्सा च | ३४ | ३ |
| मज्जावसोर्गुणाः | २४ | ४ | स्नेहविचारणायोग्या नराः | ३४ | ५ |
| तिलतैलघृतप्रयोगप्रशंसा | २४ | ५ | प्रमेहादिषु स्नेहने विशेषविधिः | ३४ | ८ |
| ऋतुविशेषेण स्नेहविशेषोपयोगः | २५ | १ | स्नेहनस्वेदनविशोधनक्रमः | ३५ | १ |
| स्नेहविशेषेणानुपानविशेषः | २५ | ३ | स्वेदाध्यायः २३ । | ||
| उष्णोदकानुपानगुणाः | २५ | ५ | स्वेदविषये जीवकस्य प्रश्नाः | ३५ | ४ |
| उष्णोदकनिर्माणविधिः | २५ | ६ | कश्यपस्योत्तरम् | ३५ | ७ |
| उष्णोदकानुपानं येषां निषिद्धम् | २५ | ७ | स्वेद्या नराः | ३५ | १० |
| ओदनादिभिः स्नेहप्रयोगविधानम् | २६ | १ | दोषविशेषेण स्वेदविशेषः | ३५ | ११ |
| प्रकृतिविशेषेण स्नेहप्रयोगकालः, ततोऽन्यथा प्रयोगे दोषाश्च | २६ | ३ | शरीरावयवविशेषे स्वेदविशेषः | ३६ | २ |
| स्नेहाच्छपाने त्रिविधा मात्रा, तद्योग्या नराश्च | २७ | १ | स्वेदनसमये नेत्रादिसंरक्षणविधिः | ३६ | ३ |
| त्रिविधस्नेहमात्राणां गुणाः | २८ | १ | स्वेदनिर्वर्तनकालः | ३७ | ३ |
| घृतपानयोग्या नराः | २८ | ५ | अतिस्विन्नस्य लक्षणं चिकित्सा च | ३७ | ४ |
| तैलपानयोग्याः नराः | २८ | ७ | मन्दस्विन्नस्य लक्षणं चिकित्सा च | ३७ | ८ |
| वसापानयोग्याः नराः | २९ | १ | सम्यक्स्विन्नस्य लक्षणम् | ३८ | १ |
| मज्जपानयोग्याः नराः | २९ | ३ | अस्वेद्या नराः | ३८ | ३ |
| स्नेह्याः नराः | २९ | ५ | स्वेद्या नराः | ३८ | ५ |
| अस्नेह्याः नराः | ३० | १ | स्वेदस्यादौ भेदाः | ३९ | २ |
| अस्नेह्यानामच्छस्नेहपानाद्दोषाः | ३० | ५ | हस्तस्वेदविधिः | ३९ | ३ |
| अस्निग्धस्य लक्षणम् | ३० | ७ | अवहितेन बालेषु स्वेदो योज्यः | ४० | १ |
| स्निग्धस्य लक्षणम् | ३० | ८ | प्रदेहस्वेदविधिः | ४० | ७ |
| अतिस्निग्धस्य लक्षणम् | ३० | ९ | नाडीस्वेदविधिः | ४१ | १ |
| स्नेहपानात् पूर्वदिने कर्तव्यम् | ३१ | १ | प्रस्तरस्वेदविधिः | ४१ | २ |
| स्नेहपीतस्य विहारः | ३१ | ३ | सङ्करस्वेदविधिः | ४२ | १ |
| कोष्ठभेदेन स्नेहनकालः | ३१ | ४ | उपनाहस्वेदविधिः | ४२ | ३ |
| मृदुकोष्ठस्य लक्षणम् | ३१ | ५ | उपकल्पनीयाध्यायः २४ । | ||
| अजीर्णस्नेहलक्षणम् | ३२ | ३ | सम्यक्शुद्धस्यान्नसंसर्जनक्रमः | ४३ | १ |
| स्नेहजीर्णाजीर्णविशङ्कायां चिकित्सा | ३२ | ४ | अन्नसंसर्जनक्रमव्यभिचारजा रोगाः | ४५ | ७ |
| तैलादीनामजीर्णे विशेषलक्षणानि | ३२ | ६ | शुद्धस्य शीतपानान्नादिसेवनजा रोगाः | ४६ | २ |
| स्नेहाजीर्णे चिकित्सा | ३३ | १ | सम्यग्जीर्णान्निलक्षणम् | ४६ | ३ |
विषयानुक्रमणिका
| विषय | पृ. | पं. | विषय | पृ. | पं. |
|---|---|---|---|---|---|
| अजीर्णत्रिलक्षणम् | ४६ | ४ | विषूचिकाया लक्षणानि | ५१ | ६ |
| अजीर्णस्य चत्वारो भेदाः | ४७ | १ | अलसकस्य लक्षणानि | ५१ | ७ |
| आमविदग्धसश्लेष्मरसशेषाजीर्णानां लक्षणानि | ४७ | २ | नेत्रामयानां लक्षणानि | ५२ | १ |
| कण्ड्वाः लक्षणानि | ५२ | २ | |||
| अजीर्णानां सामान्यलक्षणम् | ४७ | ३ | आमस्य पूर्वरूपाणि | ५२ | ४ |
| अजीर्णानां साध्यासाध्यविचारः | ४७ | ४ | पाण्डुरोगस्य लक्षणानि | ५२ | ६ |
| अजीर्णानां चिकित्सा | ४७ | ७ | कामलायाः लक्षणानि | ५२ | ७ |
| सम्यक्कृतसंशोधनगुणाः | ४८ | ३ | मदात्ययस्य लक्षणानि | ५२ | ८ |
| वेदनाध्यायः २५ । | उरोघातस्य लक्षणानि | ५३ | १ | ||
| अवचसां बालानां वेदनाज्ञानविषये जीवकस्य प्रश्नाः | ४८ | ८ | जन्तुकार्दितस्य लक्षणानि | ५३ | ३ |
| ग्रहाबाधायाः पूर्वरूपाणि | ५३ | ४ | |||
| कश्यपस्योत्तरम् | ४९ | १ | बालरोगाणां सामान्यासाध्यत्वलक्षणानि | ५३ | १३ |
| शिरोरुजाया लक्षणम् | ४९ | २ | बालरोगाणामुपक्रमाः | ५४ | ३ |
| कर्णवेदनायाः लक्षणम् | ४९ | ३ | चिकित्सासंपदीयाध्यायः २६ । | ||
| मुखामयस्य लक्षणम् | ४९ | ४ | चिकित्सायाश्चत्वारः पादाः | ५४ | ६ |
| कण्ठवेदनायाः लक्षणम् | ४९ | ५ | भिषजो गुणाः | ५५ | ३ |
| अधिजिह्विकायाः लक्षणम् | ४९ | ६ | भेषजसंपत् | ५५ | ७ |
| गलग्रहस्य लक्षणम् | ४९ | ७ | आतुरसंपत् | ५६ | १ |
| कण्ठश्वयथोः लक्षणम् | ४९ | ७ | परिचारकसंपत् | ५६ | ४ |
| ज्वरपूर्वरूपाणि | ४९ | ८ | चतुःषु पादेषु भिषजः श्रेष्ठत्वम् | ५७ | १ |
| अतिसारस्य पूर्वरूपाणि | ५० | २ | रोगाध्यायः २७ । | ||
| शूलिनो बालस्य लक्षणानि | ५० | ३ | रोगाणां प्रभेदविषये महर्षीणां मतानि | ५८ | ३ |
| छर्देः पूर्वरूपाणि | ५० | ४ | रोगाणां असंख्येयत्वे हेतुः | ५८ | ९ |
| श्वासस्य पूर्वरूपाणि | ५० | ५ | रोगाणां अधिष्ठानद्वयम् | ५८ | १० |
| हिक्कायाः पूर्वरूपाणि | ५० | ५ | व्याधेः प्रकृतेश्च लक्षणम् | ५८ | ११ |
| तृष्णायाः पूर्वरूपाणि | ५० | ६ | रोगाणां द्विविधा प्रकृतिः | ५९ | २ |
| आनाहस्य पूर्वरूपाणि | ५० | ७ | वातादिदोषाणां शरीरे विशिष्टस्थानानि | ५९ | ३ |
| अपस्मारस्य पूर्वरूपाणि | ५० | ८ | निजागन्तुरोगयोर्विशेषः | ६० | १ |
| उन्मादस्य रूपाणि | ५० | ८ | ओजसः स्वरूपम् | ६० | ३ |
| मूत्रकृच्छ्रस्य रूपाणि | ५० | ९ | ओजसो वर्धनानि | ६१ | १ |
| प्रमेहस्य रूपाणि | ५१ | १ | वातादिसाम्यवैषम्ययोः फलम् | ६१ | २ |
| अर्शसां रूपाणि | ५१ | ३ | आविष्कृततमानां व्याधीनां स्थूलतः कथनम् | ६१ | ३ |
| अश्मर्याः रूपाणि | ५१ | ४ | अशीतिवातविकाराणां नामतो निर्देशः | ६१ | ४ |
| विसर्पस्य पूर्वरूपाणि | ५१ | ५ | वायोः स्वरूपं, कर्म, उपक्रमाश्च | ६३ | १ |
५६४ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्
| विषय | पृ. | पं. | विषय | पृ. | पं. |
|---|---|---|---|---|---|
| चत्वारिंशत्पित्तविकाराणां नामतो निर्देशः | ६३ | ५ | शुभाशुभानि स्फिगलक्षणानि | ६९ | १६ |
| पित्तस्य स्वरूपं, कर्म, उपक्रमाश्च | ६४ | १ | शुभाशुभानि कुकुन्दरलक्षणानि | ६९ | १८ |
| कफजविंशतिविकाराणां नामतो निर्देशः | ६५ | १ | शुभाशुभानि जघनलक्षणानि | ६९ | १९ |
| श्लेष्मणः स्वरूपं, कर्माणि, उपक्रमाश्च | ६५ | ४ | शुभाशुभानि वृषणलक्षणानि | ६९ | २० |
| वातपित्तश्लेष्मणां विशिष्टोपक्रमाः | ६६ | १ | शुभाशुभानि प्रजननलक्षणानि | ६९ | २३ |
| एकविधा व्याधयः | ६६ | ३ | शुभाशुभानि मूत्रलक्षणानि | ६९ | २४ |
| द्विविधाः | ६६ | ५ | शुभाशुभानि योनिलक्षणानि | ७० | १ |
| त्रिविधाः | ६६ | ६ | शुभाशुभानि रोमराजिलक्षणानि | ७० | ४ |
| चतुर्विधाः व्याधयः | ६६ | ८ | शुभाशुभानि कुक्षिलक्षणानि | ७० | ६ |
| पञ्चविधाः व्याधयः | ६६ | १० | शुभाशुभानि उदरलक्षणानि | ७० | ७ |
| षड्विधाः व्याधयः | ६६ | १० | शुभाशुभानि नाभिलक्षणानि | ७० | ११ |
| सप्तविधाः व्याधयः | ६६ | ११ | शुभाशुभानि पायुलक्षणानि | ७० | १३ |
| अष्टविधाः व्याधयः | ६६ | १२ | शुभाशुभानि पार्श्वलक्षणानि | ७० | १३ |
| दशविधाः व्याधयः | ६६ | १२ | शुभाशुभानि पृष्ठलक्षणानि | ७० | १४ |
| विंशतिविधाः व्याधयः | ६६ | १२ | शुभाशुभानि अंसलक्षणानि | ७० | १५ |
| उपद्रवलक्षणम् | ६७ | १ | शुभाशुभानि कक्षालक्षणानि | ७० | १७ |
| उपद्रवचिकित्साविचारः | ६७ | २ | शुभाशुभानि बाहुलक्षणानि | ७० | १८ |
| रक्तजविकाराणां हेतुः | ६७ | ६ | शुभाशुभानि मणिबन्धलक्षणानि | ७० | २० |
| रक्तजा रोगाः | ६८ | १ | शुभाशुभानि यवपंक्तिलक्षणानि | ७० | २१ |
| रक्तजानां रोगाणां चिकित्सा | ६८ | ४ | शुभाशुभानि केशभूमिलक्षणानि | ७० | २४ |
| बालोपक्रमे विशेषः | ६८ | ६ | शुभाशुभानि गतिलक्षणानि | ७० | २६ |
| लक्षणाध्यायः २८ । | अप्रशस्तानि शरीराणि | ७० | २७ | ||
| बालानां शुभाशुभदेहलक्ष्णविषये जीवकस्य प्रश्नाः | ६९ | १ | बालानां प्रशस्तानि रुषितादीनि | ७० | २८ |
| कश्यपस्योत्तरम् | ६९ | ३ | वक्त्रचक्षुःस्वररूपैर्वृत्तमनःसारगुणानां परीक्षा | ७४ | १ |
| शुभाशुभानि नखलक्षणानि | ६९ | ४ | सत्त्वानां भेदाः | ७४ | ३ |
| शुभाशुभानि पादलक्षणानि | ६९ | ७ | ब्राह्मसत्त्वस्य लक्षणम् | ७५ | २ |
| शुभाशुभानि अङ्गुलीलक्षणानि | ६९ | ११ | प्राजापत्यसत्त्वस्य लक्षणम् | ७५ | ३ |
| शुभाशुभानि पार्ष्णिलक्षणानि | ६९ | १२ | आर्षसत्त्वस्य लक्षणम् | ७५ | ४ |
| शुभाशुभानि उत्तरपादलक्षणानि | ६९ | १३ | ऐन्द्रसत्त्वस्य लक्षणम् | ७५ | ५ |
| शुभाशुभानि गुल्फलक्षणानि | ६९ | १३ | याम्यसत्त्वस्य लक्षणम् | ७५ | ६ |
| शुभाशुभानि जङ्घालक्षणानि | ६९ | १४ | वारुणसत्त्वस्य लक्षणम् | ७५ | ७ |
| शुभाशुभानि जानुलक्षणानि | ६९ | १५ | कौबेरसत्त्वस्य लक्षणम् | ७६ | १ |
| शुभाशुभानि ऊरुलक्षणानि | ६९ | १६ | गान्धर्वसत्त्वस्य लक्षणम् | ७६ | २ |
| शुद्धसत्त्वस्य सामान्यलक्षणम् | ७६ | ३ |
विषयानुक्रमणिका
५६५
| विषय | पृ. | पं. |
|---|---|---|
| आसुरसत्त्वस्य लक्षणम् | ७६ | ६ |
| राक्षससत्त्वस्य लक्षणम् | ७७ | १ |
| पैशाचसत्त्वस्य लक्षणम् | ७७ | २ |
| सार्पसत्त्वस्य लक्षणम् | ७७ | ३ |
| याक्षसत्त्वस्य लक्षणम् | ७७ | ४ |
| भूतसत्त्वस्य लक्षणम् | ७७ | ५ |
| शाकुनसत्त्वस्य लक्षणम् | ७७ | ६ |
| राजससत्त्वस्य सामान्यलक्षण् | ७८ | १ |
| पाशवसत्त्वस्य लक्षणम् | ७८ | २ |
| मात्स्यसत्त्वस्य लक्षणम् | ७८ | ३ |
| वानस्पत्यसत्त्वस्य लक्षणम् | ७८ | ४ |
| तामससत्त्वस्य सामान्यलक्षणम् | ७८ | ५ |
| सत्त्वरजस्तमसां लक्षणानि | ७८ | ६ |
| सत्त्वानुरूपं देहिनामाचरणं तत्फलं च | ७९ | १ |
| समानसत्त्वाया धात्र्याः प्रशस्तत्वम् | ७९ | २ |
| नवविधसाराणां नामतो निर्देशः | ७९ | ४ |
| त्वक्सारबालस्य लक्षणम् | ७९ | ६ |
| रक्तसारबालस्य लक्षणम् | ७९ | ७ |
विमानस्थानम् ३ ।
कर्णायजयावळीवनं(?)विमानम् ? ।
| विषय | पृ. | पं. |
|---|---|---|
| अवेक्षितगदानां चिकित्सा | ८३ | १ |
शिष्योपक्रमणीयं विमानम् ? ।
| विषय | पृ. | पं. |
|---|---|---|
| शिष्योपनयनयोग्यः कालः | ८३ | ६ |
| शिष्योपनयनविधिः | ८३ | ८ |
| शिष्यगुणाः | ८५ | १ |
| गुरोर्गुणाः | ८५ | ४ |
| शिष्यानुशासनम् | ८६ | १ |
| अध्ययनविधिः | ८७ | १ |
| अनध्ययनकालाः | ८७ | ४ |
| अधीतायुर्वेदस्य कर्तव्यानि | ८७ | ८ |
| तद्विद्यसंभाषाविधिः | ८८ | ७ |
| आयुर्वेदविषये पञ्चदश प्रश्नाः | ८९ | १ |
| आयुषो लक्षणम् | ८९ | ४ |
| आयुर्वेदशब्दस्य निरुक्तिः | ८९ | ६ |
| आयुर्वेदस्याष्टावङ्गानि | ८९ | ८ |
| आयुर्वेदस्योत्पत्तिः | ८९ | १० |
| ब्राह्मणक्षत्रियवैश्यैः किमर्थमायुर्वेदोऽध्येयः | ८९ | १३ |
| कौमारभृत्यतन्त्रस्याष्टस्वङ्गेष्वाद्यत्वम् | ८९ | १८ |
| आयुर्वेदस्य पञ्चमवेदत्वप्रतिपादनम् | ९० | १ |
| आयुर्वेदस्य नित्यत्वप्रतिपादनम् | ९० | ६ |
| आयुर्वेदस्य वातपित्तकफाश्रयत्वप्रतिपादनम् | ९० | ८ |
| वातपित्तश्लेष्मप्रकृतीनां लक्षणानि | ९० | १० |
शारीरस्थानम् ४ ।
| विषय | पृ. | पं. |
|---|---|---|
| ऋतुविभागः | ९५ | १ |
| युगविभागेन कालविभागः | ९५ | ४ |
| *सृष्ट्युत्पत्तिक्रमः | ९७ | १ |
| अष्टौ प्रकृतयः | ९७ | १ |
| पञ्च बुद्धीन्द्रियाणि | ९७ | २ |
| पञ्च कर्मेन्द्रियाणि | ९७ | ३ |
| पञ्च इन्द्रियार्थाः | ९७ | ३ |
| मनसोऽतीन्द्रियत्वम् | ९७ | ३ |
| क्षेत्रक्षेत्रज्ञनिरूपणम् | ९७ | ४ |
| आत्मनो लिङ्गानि | ९७ | ५ |
| मनसो लक्षणम् | ९७ | ६ |
| पञ्चमहाभूतानि | ९७ | ८ |
| महाभूतानां गुणाः | ९७ | ८ |
| नव द्रव्याणि | ९७ | ९ |
| गुणानां द्रव्याश्रितत्वम् | ९७ | ९ |
| खादीनां विशिष्टा गुणाः | ९७ | १० |
| इन्द्रियाणां विप्रकृष्टसन्निकृष्टवृत्तित्वम् | ९७ | १० |
| सर्वेन्द्रियाणां स्पर्शनलक्षणत्वम् | ९७ | ११ |
असमानगोत्रीयशारीराध्यायः ?
| विषय | पृ. | पं. |
|---|---|---|
| गर्भाभिवृद्धिक्रमः, चतुर्थादिमासेषु गर्भिण्या लिङ्गानि च | १०२ | १ |
गर्भावक्रान्तिशारीराध्यायः ? ।
| विषय | पृ. | पं. |
|---|---|---|
| जीवस्य गर्भेऽवक्रमणम् | १०५ | १ |
५६६ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्
| विषय | पृ. | पं. |
|---|---|---|
| गर्भस्य शरीरावयवाभिनिर्वृत्तिविषये जीवकस्य प्रश्नाः | १०५ | ४ |
| कश्यपस्योत्तरम् | १०५ | ७ |
| गर्भस्याकाशादिमहाभूतजाः शरीरावयवाः | १०५ | ८ |
| गर्भस्य मातृजाः | १०५ | १३ |
| गर्भस्य पितृजाः | १०५ | १४ |
| गर्भस्य आत्मजाः शारीरभावाः | १०५ | १५ |
| गर्भस्य सात्म्यजाः शारीरभावाः | १०५ | १७ |
| गर्भस्य रसजाः शारीरभावाः | १०५ | १८ |
| सत्त्वस्यौपपादुकत्वकथनम् | १०५ | १९ |
| हृदययकृत्प्लीहफुप्फुसनिरूपणम् | १०७ | १ |
| गर्भाशय-गुद-बस्तीनां निरूपणम् | १०७ | ३ |
| अष्टावाशयाः गर्भस्य मातृजाः पितृणाश्च धातवः | १०८ | १ |
| देहस्य षट्कोशवत्त्वम् | १०८ | २ |
| शरीरविचयशारीराध्यायः ? । | ||
| अवयवविभागेनास्थां गणना | १०८ | ३ |
| दश प्राणायतनानि | १११ | १ |
| त्रीणि महामर्माणि | १११ | ३ |
| कोष्ठाङ्गानि | ११२ | १ |
| प्रत्यङ्गानि | ११२ | ३ |
| द्विविधानि स्रोतांसि | ११३ | १ |
| दश मातृसिराः | ११३ | ४ |
| देहस्वरूपम् | ११४ | १ |
| धमन्यः | ११४ | ५ |
| रोमकूपानि | ११४ | ७ |
| रोमकूपेभ्यः स्वेदप्रवृत्तिः | ११४ | ९ |
| अञ्जलिप्रमेयाः शरीरधातवः | ११४ | १० |
| शुक्रप्रवृत्तिकालः | ११५ | ८ |
| महाभूतानामन्योऽन्याश्रयत्वम् | ११५ | ९ |
| देहावयवसौक्ष्म्यस्य सुदुर्वाचत्वम् | ११६ | २ |
| जातिसूत्रीयशारीराध्यायः ? । | ||
| स्वभावस्य मनुष्याद्याकृतिभेदनिर्वर्तकत्वम् | ११६ | ६ |
| शरीराभिनिर्वृत्तौ वायुपरमाणूनां कार्यम् | ११६ | ७ |
| स्वभावतः प्रजानिर्वृत्तौ स्त्रीपुंसयोरुपचार | ११६ | ८ |
| शुक्रशोणितयोरभिव्यक्तेः कालावेक्षितवम् | ११७ | १ |
| कदा शुक्रशोणिते पूर्णे भवतः | ११७ | ३ |
| ऋतुकालः | ११७ | ४ |
| पुत्रकामः कन्यार्थी च कदा स्त्रियमुपेयात् | ११८ | १ |
| गर्भाधानविधिः | ११९ | १ |
| पुत्रीया इष्टिः | ११९ | ६ |
| आहारस्य धातुपोषकत्वम् | १२१ | ३ |
| धातूनां धातुपोषकत्वम् | १२१ | ५ |
| धातूनां तत्समगुणैस्तत्पोषणम् | १२१ | ७ |
| गर्भिण्यै हितानि | १२३ | ३ |
| गर्भिण्या हितं वेश्म | १२३ | ४ |
| गर्भिण्या हिता चर्या | १२३ | ७ |
| आसन्नप्रसवाया लक्षणानि | १२३ | ११ |
| तत्र कर्तव्यानि | १२४ | १ |
| शीघ्रप्रसवकरा योगाः | १२६ | २ |
| प्रसवसमये कर्तव्यम् | १२६ | ४ |
| इन्द्रियस्थानम् ५ । | ||
| ओषधभेषजेन्द्रियाध्यायः १२ । | ||
| ओषधभेषजयोर्विशेषः | १३० | ३ |
| औषधभेषजयोर्गुणालाभेऽचिकित्स्यत्वं | १३० | ५ |
| मासान्तिकं रिष्टम् | १३१ | १ |
| मासार्धिकं | १३१ | २ |
| स्कन्दादिग्रहाबाधसूचकानि स्वप्नानि | १३१ | ९ |
| अफलाः स्वप्नाः | १३३ | ५ |
| फलवन्तः स्वप्नाः | १३४ | १ |
| दुःस्वप्नफलम् | १३४ | ३ |
| शुभं स्वप्नदर्शनम् | १३४ | ५ |
| दुःस्वप्नशान्तिः | १३५ | ७ |
| चिकित्सास्थानम् ६ । | ||
| ज्वरचिकित्साध्यायः ? । | ||
| ज्वरनिदानचिकित्साविषये जीवकस्य प्रश्नाः | १३७ | ३ |
विषयानुक्रमणिका
| विषय | पृ. | पं. | विषय | पृ. | पं. |
|---|---|---|---|---|---|
| गर्भिणीचिकित्सिताध्यायः ? । | वातोत्तरे प्लीहरोगे कतिपययोगाः | १५६ | ८ | ||
| परिकर्तिकाहरा योगाः | १४१ | १ | उदावर्तचिकित्सिताध्यायः ? । | ||
| प्रवाहिकाहरा योगाः | १४१ | ३ | आनानोदावर्त्तयोर्निदानपूर्विका संप्राप्तिः | १५८ | ३ |
| कामलाहरा योगाः | १४१ | १० | उदावर्त्तभेदाः | १५८ | ९ |
| हृच्छूलहरा योगाः | १४२ | १ | उदावर्त्तस्य सामान्यलक्षणानि | १५८ | ११ |
| त्वग्वातहरो योगः | १४२ | ५ | उदावर्त्तस्य पूर्वरूपाणि | १५८ | १४ |
| ऊर्ध्वानिलहरो योगः | १४२ | ७ | उदावर्त्तचिकित्सा | १५९ | १ |
| हिक्काश्वासहरो लेहः | १४२ | ८ | राजयक्ष्मचिकित्सिताध्यायः ? । | ||
| दीपनीयो योगः | १४२ | ९ | राजयक्ष्मणि पिप्पलीक्षीरम् | १६१ | १ |
| गर्भिण्याः पथ्यापथ्यम् | १४२ | १० | राजयक्ष्मणि पिप्पलीवर्धमानकम् | १६१ | ५ |
| दुष्प्रजाताचिकित्सिताध्यायः ? । | राजयक्ष्मणि नागबलाप्रयोगः | १६२ | ३ | ||
| दुष्प्रजातायाः सामान्यचिकित्सा | १४३ | ३ | राजयक्ष्मणि मण्डूकपर्णीशुण्टीब्राह्मीमधुकानां प्रयोगाः | १६२ | १० |
| दुष्प्रजाताव्याधीनां निदानम् | १४३ | ४ | राजयक्ष्मणि आजं रसायनम् | १६२ | १४ |
| दुष्प्रजाताव्याधीनां नामतो निर्देशः | १४४ | ३ | राजयक्ष्मणि महाभयारिष्टः | १६३ | १ |
| दुष्प्रजातारोगेषु त्रैवृत्तस्नेहः | १४४ | ८ | राजयक्ष्मणि इन्द्राणीघृतम् | १६३ | ८ |
| बालग्रहचिकित्सताध्यायः ? । | राजयक्ष्मणि लशुनप्रयोगः | १६३ | १० | ||
| रेवत्या वरप्राप्तिः | १४६ | ३ | राजयक्ष्मणि द्राक्षासर्पिः, पीलुघृतं च | १६४ | १ |
| रेवत्या विंशतिनामानि | १४७ | १ | राजयक्ष्मणि दैवव्यपाश्रयचिकित्सा | १६४ | ३ |
| रेवतीपूजनफलम् | १४८ | ४ | गुल्मचिकित्साध्यायः ? । | ||
| रेवतीरोषजनिता रोगाः | १४८ | ९ | गुल्मस्य भेदाः | १६५ | ३ |
| रेवत्याश्चिकित्सा | १४९ | १ | गुल्मस्य सामान्या संप्राप्तिः | १६५ | ४ |
| पूतनाग्रहोत्पत्तिः | १५० | ५ | वातगुल्मस्य निदानपूर्विका संप्राप्तिः | १६५ | ५ |
| पूतनाया नामानि | १५० | १२ | गुल्मानां पूर्वरूपम् | १६६ | १ |
| पूतनाया चिकित्सा | १५० | १४ | वातगुल्मस्य लक्षणम् | १६६ | २ |
| मुखमण्डिकाग्रहोत्पत्तिः | १५३ | १ | पित्तगुल्मस्य लक्षणम् | १६६ | ४ |
| मुखमण्डिकायाश्चिकित्सा | १५३ | ११ | कफगुल्मस्य लक्षणम् | १६६ | ५ |
| शीतपूतनार्दिते बाले चिकित्सा | १५४ | ६ | सान्निपातिकगुल्मस्य लक्षणम् | १६७ | १ |
| सर्वग्रहाणां सामान्य चिकित्सा | १५५ | ३ | रक्तगुल्मस्य निदानसंप्राप्तिलक्षणानि | १६७ | २ |
| प्लीहहलीमकचिकित्सिताध्यायः ? । | गुल्मस्य साध्यासाध्यविचारः | १६८ | १ | ||
| प्लीहवृद्धिलक्षणानि | १५५ | ११ | गुल्मस्य चिकित्सासूत्रम् | १६८ | २ |
| प्लीहवृद्धौ सामान्यचिकित्सा | १५६ | ४ | वातगुल्मे दशाङ्गं घृतम् | १६८ | ४ |
| प्लीहवृद्धौ आमलकीघृतम् | १५६ | ५ |
५६८ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्
| विषयः | पृ. | पं. | विषयः | पृ. | पं. |
|---|---|---|---|---|---|
| वातगुल्मे षट्पलं घृतम् | १६८ | ६ | मूत्रकृच्छ्रचिकित्सिताध्यायः ? । | ||
| वातगुल्मे शैशुकं घृतम् | १६९ | १ | मूत्रकृच्छ्रस्य संप्राप्तिः | १७७ | १ |
| गुल्मे संशोधनं | १६९ | ३ | दोषभेदेन मूत्रकृच्छ्रस्य लक्षणानि | १७७ | २ |
| गुल्मे भोजनम् | १६९ | ४ | मूत्रकृच्छ्रप्रमेहयोर्विशेषः | १७८ | ८ |
| गुल्मे पिप्पल्यादिवटकाः | १६९ | ६ | मूत्रकृच्छ्रे कतिपययोगाः | १७९ | १ |
| वातगुल्मे हितमन्नपानम् | १६९ | १० | मूत्रकृच्छ्रप्रमेहयोश्चिकित्सायां विशेषः | १७९ | ११ |
| वातगुल्मे बस्तिः | १६९ | १२ | सरक्ते मूत्रकृच्छ्रे ऊषकादियोगः | १७९ | १४ |
| वातगुल्मे हरीतकीप्रयोगः | १६९ | १३ | मूत्रकृच्छ्रेऽन्ये कतिपययोगाः | १८० | ३ |
| कुष्ठचिकित्साध्यायः ? । | शर्कराश्मर्योर्लक्षणं चिकित्सा च | १८० | १३ | ||
| कुष्ठपूर्वरूपाणि | १७१ | १ | द्विव्रणीयचिकित्सिताध्यायः ? । | ||
| वातपित्तकफसन्निपातोत्तराणां कुष्ठानां लिङ्गानि | १७२ | १ | व्रणविषये जीवकस्य प्रश्नाः | १८२ | ४ |
| दोषविशेषैः कुष्ठविशेषोत्पत्तिः | १७२ | ५ | कश्यपस्योत्तरम् | १८२ | ५ |
| कुष्ठेषु साध्यासाध्यविभागः | १७२ | ९ | निजागन्तुभेदेन व्रणस्य द्वैविध्यम् | १८३ | १ |
| कुष्ठानामाश्रयभूता धातवः | १७२ | १० | दोषभेदेन व्रणानां लिङ्गानि | १८३ | ४ |
| सिध्मस्य लक्षणम् | १७२ | ११ | व्रणानां नवविध उपक्रमः | १८४ | २ |
| विचर्चिकायाः लक्षणम् | १७२ | १२ | दोषभेदेन व्रणोपक्रमाः | १८४ | ४ |
| पामायाः लक्षणम् | १७२ | १२ | व्रणबन्धनविधिः | १८५ | १ |
| दद्रोः लक्षणम् | १७२ | १२ | व्रणे कल्कदानम् | १८५ | ५ |
| किटिभस्य लक्षणम् | १७२ | १३ | पच्यमानव्रणलक्षणम् | १८६ | ३ |
| कपालस्य लक्षणम् | १७२ | १४ | पक्वव्रणलक्षणम् | १८६ | ३ |
| महारुष्कस्य लक्षणम् | १७२ | १५ | तत्र चिकित्सा | १८६ | ४ |
| मण्डलस्य लक्षणम् | १७२ | १६ | व्रणे सवर्णकरणो योगः | १८७ | १ |
| विषजस्य लक्षणम् | १७२ | १७ | व्रणे रोमसंजननो योगः | १८७ | ३ |
| पौण्डरीकस्य लक्षणम् | १७२ | १७ | बालानामष्टौ पिडकाः | १८७ | ५ |
| श्वित्रस्य लक्षणम् | १७२ | १७ | तासां नामानि | १८७ | ६ |
| ऋष्यजिह्वस्य लक्षणम् | १७२ | १८ | शराविका-कच्छपिका-जालिनी-सर्षपिकाऽ-लजीविनतानां लक्षणानि | १८७ | ७ |
| शतारुष्कस्य लक्षणम् | १७२ | १९ | विद्रध्याः लक्षणानि | १८७ | १० |
| औदुम्बरस्य लक्षणम् | १७२ | १९ | अरुंषिकायाः लक्षणानि | १८७ | ११ |
| काकणस्य लक्षणम् | १७२ | २० | पिडकानां चिकित्सासूत्रम् | १८९ | २ |
| चर्मदलस्य लक्षणम् | १७२ | २० | अरुंषिकाणां चिकित्सा | १८९ | ३ |
| एककुष्ठस्य लक्षणम् | १७२ | २० | अरकीलिकाय लक्षणं चिकित्सा च | १९० | २ |
| विपादिकायाः लक्षणम् | १७२ | २१ | बालानामागन्तुव्रणचिकित्सा | १९१ | ७ |
| कुष्ठेषु दोषविशेषेण चिकित्सा | १७२ | २२ | बालानां दद्रोर्निदानं चिकित्सा च | १९१ | १२ |
विषयानुक्रमणिका
<p align="right">·५६९</p>| विषय | पृ. | पं. | विषय | पृ. | पं. |
|---|---|---|---|---|---|
| बालानां रात्रौ स्नेहमर्दनोपदेशः | १९२ | १ | मदात्यये तर्पणम् | २०५ | १ |
| बालानां दुस्सङ्ग्रहजनितव्रणचिकित्सा | १९२ | ५ | मदात्यये मद्यप्रयोगः | २०५ | २ |
| द्विव्रणीयचिकित्सितोपसंहारः | १९३ | ५ | मदात्यये आहारविधिः | २०५ | ४ |
| प्रतिश्यायचिकित्सिताध्यायः ? । | मदात्यये विहारः | २०६ | ४ | ||
| प्रतिश्यायस्य निदानपूर्विका संप्राप्तिः | १९३ | १० | मदात्यये वर्ज्यानि | २०६ | ६ |
| प्रतिश्यायस्य सामान्यलक्षणम् | १९४ | १ | मदात्यये कतिपययोगाः | २०६ | १० |
| प्रतिश्यायस्य भेदाः | १९४ | ६ | फक्कचिकित्साध्यायः ? । | ||
| प्रतिश्यायस्य वातिकादिभेदेन लक्षणानि | १९४ | ७ | फक्कलक्षणम् | २०८ | १ |
| प्रतिश्यायस्य चिकित्सा | १९५ | २ | फक्कनिदानम् | २०८ | ३ |
| उरोघातचिकित्सिताध्यायः ? । | फक्कभेदाः, तेषां लक्षणानि च | २०८ | ८ | ||
| उरोघातस्य निदानम् | १९७ | ३ | फक्कचिकित्सा | २१० | १ |
| उरोघातस्य चिकित्सा | १९७ | ५ | धात्रीचिकित्सिताध्यायः ? । | ||
| शोथचिकित्सिताध्यायः ? । | धात्रीचिकित्साविषये जीवकस्य प्रश्नाः | २१२ | ३ | ||
| शोथस्य निदानपूर्विका संप्राप्तिः | १९८ | ३ | कश्यपस्योत्तरम् | २१२ | ५ |
| शोथस्य वातिकादिभेदेन लक्षणानि | १९८ | ६ | अग्निभेदेन धात्र्याश्चिकित्सा | २१२ | १० |
| कृमिचिकित्सिताध्यायः ? । | मेदस्विन्याः धात्र्याश्चिकित्सा | २१३ | १० | ||
| बालानां कृमिरोगे विडङ्गघृतम् | २०० | ३ | धात्रीरोगे बलातैलम् | २१३ | १४ |
| बालानां कृमिरोगे पथ्यम् | २०१ | १ | बलातैलातिदेशेनान्येषां तैलानां विधानम् | २१५ | ९ |
| बालानां कृमिरोगे धात्र्या औषधादिसेवनं कर्तव्यं | २०१ | ३ | षष्ठीग्रहस्य निदानं चिकित्सा च | २१७ | १ |
| बालानां कृमिरोगे गुदे कटुतैलप्रयोगः | २०१ | ७ | धात्रीणामजीर्णचिकित्सा | २१७ | १० |
| मदात्ययचिकित्साध्यायः ? । | कौमारभृत्यस्य भिषजः प्रशंसा | २१७ | १६ | ||
| मद्योत्थरोगभेदाः | २०२ | ३ | मातुः प्रशंसा | २१८ | ८ |
| पानात्ययस्य लक्षणम् | २०२ | ४ | सिद्धिस्थानम् ७ । | ||
| पानविभ्रमस्य लक्षणम् | २०२ | ६ | राजपुत्रीया सिद्धिः १ । | ||
| पानापक्रमस्य लक्षणम् | २०२ | ६ | बस्तिकर्मविषये जीवकस्य प्रश्नाः | २१९ | ३ |
| मद्यगुणाः | २०२ | ७ | कश्यपस्योत्तरम् | २१९ | ९ |
| अतिसेवितमद्यदोषाः | २०३ | ५ | बालस्य कदा बस्तिकर्म कार्यमित्यत्र नानामुनीनां मतानि | २२० | १ |
| मदात्ययस्य सामान्यलक्षणम् | २०३ | ९ | बस्तिदानविधिः | २२१ | ५ |
| मदात्ययस्य वाताजादिभेदेन लक्षणानि | २०४ | १ | एकान्तरं बस्तिविधानम् | २२२ | १ |
| मदात्यये लङ्घनम् | २०४ | ५ | निरूहबस्तिगुणाः | २२२ | ५ |
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