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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

तृतीय लम्बक १०५

तृतीय लम्बक १०५ तदनन्तर मगधवासियों के साथ मगध-नरेश द्वारा सत्कार किया गया स्नेहवश समस्त वर्गों से अभिनन्दित सेना के भार से समस्त पृथ्वी को वश में किये हुए विजयी सम्राट् उदयन अपने देश गया ॥११८॥ पञ्चम तरंग समाप्त षष्ठ तरंग वत्सराज की कथा (क्रमशः) विजय-यात्रा से थकी हुई सेना का विश्राम कराने के लिए लावानक में ठहरे हुए वत्सराज उदयन ने एक बार एकान्त में यौगन्धरायण से कहा ॥१॥ तुम्हारे बुद्धि-वैभव से मैंने पृथ्वी के सभी राजाओं को जीत लिया। उपाय से वश में किये गये वे राजा कभी विरोधी नहीं हो सकते ॥२॥ किन्तु वाराणसी का यह राजा ब्रह्मदत्त अब भी विरोध करता है। कुटिल मनुष्यों पर क्या विश्वास ? ॥३॥ वत्सराज के इस प्रकार कहने पर यौगन्धरायण ने कहा कि महाराज ! ब्रह्मदत्त अब फिर विरोध न करेगा ॥४॥ आक्रमण करके दबाया हुआ वह तुमसे अत्यधिक सम्मानित हुआ है। कौन ऐसा बुद्धि मान् होगा जो अपना भला करनेवाले के साथ बुरा बर्ताव करेगा ॥५॥ यदि करता भी है तो अपनी ही आत्मा का अकल्याण करता है। इस प्रसंग में एक कथा कहता हूँ सुनो ॥६॥ फलभूति की कथा प्राचीन काल में पद्म प्रदेश में प्रसिद्ध शाम्बवाला अग्निदत्त नाम का ब्राह्मण था जो राजा के द्वारा दान दिये गये अग्रहार¹ (ग्राम) से जीवन-निर्वाह करता था ॥७॥ उसका बड़ा लड़का सोमदत्त और छोटा वैश्वानरदत्त था ॥८॥ १ प्राचीन समय में राजा लोग ब्राह्मणों को जीवन निर्वाह के लिए जल-सिंचाई आदि सुविधावाली भूमि दान देते थे। उसे अग्रहार कहते हैं। दक्षिण-भारत में अब भी ऐसे सहस्रों अग्रहार मिलते हैं।

३७६ कथासरित्सागर

३७६ कथासरित्सागर आद्यस्तयोरभून्मूर्खः स्वाकृतिर्दुर्विनीतकः। अपरश्चाभवद् विद्वान्विनीतोऽध्ययनप्रियः ॥९॥ कृतदारावुभौ तौ च पितर्यस्तङ्गते ततः। तदीयस्याग्रहारावेर्धमर्धं विभेजतुः ॥१०॥ सन्मध्यात्स कनीयांश्च राज्ञा सम्मानितोऽभवत्। ज्येष्ठस्तु सोमदत्तोऽभूच्चपलः क्षत्रकर्मकृत् ॥११॥ एकदा मद्यगोष्ठीके शूद्रैः सह विलोक्य तम्। सोमदत्तं पितृसुहृद्विजः कोऽप्यवमब्रवीत् ॥१२॥ अग्निदत्तसुतो भूत्वा शूद्रवन्मूर्ख ! चेष्टसे। निजमवानुजं दृष्ट्वा राजपूल्यं न लज्जसे ॥१३॥ तच्छ्रुत्वा कुपितः सोऽथ सोमदत्तः प्रधाव्य तम्। विप्रं पादप्रहारेण बधानोज्झितगौरवः ॥१४॥ तत्र विप्रः स कृत्वाऽन्यान् साक्षिणस्तत्क्षणं द्विजान्। गत्वा पादाहतिक्रुद्धो राजानं तं व्यजिज्ञपत् ॥१५॥ राजापि सोमदत्तस्य बन्धाय प्राहिणोद् भटान्। ते च निर्गत्य तन्मित्रैर्जघ्निरे शस्त्रपाणिभिः ॥१६॥ ततो भूयो बलं प्रेष्यावष्टम्भस्याय भूपतिः। क्रोधान्धः सोमदत्तस्य शूलारोपणमादिशत् ॥१७॥ मारोप्यमाणः शूलायामथाकस्मात्स च द्विजः। प्रक्षिप्त इव केनापि निपपात ततः क्षितौ ॥१८॥ रक्षन्ति भाविकल्याणं भाग्यान्यत्र यतोऽस्य ते। अन्वीयुबुर्वधकाः पुनरारोपगोद्यताः ॥१९॥ तत्क्षणं श्रुतवृत्तान्तस्तुष्टो राजा कनीयसा। भ्रात्रास्य कृतविज्ञप्तिर्भयादनममोचयत् ॥२०॥ ततो मरणनिस्तीर्णः सोमदत्तो गृहं सह। गन्तुं राजावमानेन देशास्तरमियेय सः ॥२१॥ यदा च नैच्छन्गमनं समतास्तस्य बान्धवाः। त्यक्तराजाग्रहारार्थं प्रतिपेदे तदा स्थितिम् ॥२२॥ ततो भृत्यन्नराभावात्खतु स पश्ये कृणिम्। तद्योग्यां च भुवं द्रष्टुं सुमेरुञ्चटवीं ययौ ॥२३॥

तृतीय लम्बक १७७

तृतीय लम्बक १७७ उनमें ज्येष्ठ पुत्र सोमदत्त सुन्दर होने पर भी मूर्ख और उद्दण्ड था तथा छोटा पुत्र विद्वान् विनयी और अध्ययनप्रेमी था। दोनों विवाहित थे अतः पिता की मृत्यु हो जाने पर दोनों ने गाँव का आधा-आधा बाँट लिया ।।९-१० ।। दोनों में छोटा वैश्वानरदत्त विद्वान् होने के कारण राजा से सम्मानित था और बड़ा सोमदत्त उद्दण्ड एवं क्षत्रिय कर्म (लड़ने-भिड़ने) करनेवाला था ।।११।। एक बार मूर्ख द्यूतों के साथ गोष्ठी बनाकर बैठे हुए सोमदत्त को उसके पिता के किसी मित्र ने कहा हे मूर्ख ! अग्निदत्त के पुत्र होकर द्यूतों का-सा व्यवहार करते हो। राजा से सम्मानित अपने छोटे भाई को देखकर लज्जित नहीं होते ।।१२-१३।। यह सुनकर क्रुद्ध सोमदत्त ने दौड़कर उस ब्राह्मण को लात मारी ।।१४।। लात खाकर उस ब्राह्मण ने वहाँ बैठे हुए लोगों को गवाह बनाकर राजा के समीप आकर निवेदन किया ।।१५।। तब राजा ने सोमदत्त को बाँधकर लाने के लिए सिपाहियों को भेजा। सोमदत्त के मूर्ख मित्रों ने शस्त्रा से उन सिपाहियों को मारा ।।१६।। यह सुनकर क्रोध में राजा ने सेना के द्वारा पकड़वाकर उसे फाँसी की आज्ञा दे दी ।।१७।। सूली पर चढ़ा हुआ वह ब्राह्मण मानो किसी के द्वारा फेंका हुआ-सा पृथ्वी पर गिर पड़ा ।।१८।। भाग्य ही भविष्य में होनेवाले कल्याण की रक्षा करते हैं। उस फिर सूली पर चढ़ाने के लिए तैयार बधिक अन्धे हो गये। उसी समय उसके छोटे भाई के अनुनय-विनय करने पर राजा ने उसे फाँसी से छुड़ा दिया ।।१ ९ -२० ।। मृत्यु-मुख से छूटे हुए सोमदत्त ने राजा के द्वारा किये गये अपमान के कारण अपनी गृहस्थी के साथ उस देश को छोड़कर दूसरे देश जाने की इच्छा प्रकट की ।।२१।। जब उसके एकत्र हुए बन्धुओं ने उसे देश-त्याग के लिए मना किया तब उसने राजा के आधे ग्राम का अधिकार छोड़ दिया और वहीं रहने लगा ।।२२।। ग्राम छूट जाने न जीवन-निर्वाह का उपाय न देखकर उसने कृषि (खेती) करने का निश्चय किया और कृषि-योग्य भूमि ढूँढ़ने के लिए किसी शुभ दिन जङ्गल में गया ।।२३।। ४८

१७८ कथासरित्सागर

१७८ कथासरित्सागर तत्र लेभे शुभां भूमिं सम्भाव्य फलसम्पदम्। तन्मध्ये च महाभोगमश्वत्थतरुमैक्षत ॥२४॥ स कल्याणघनच्छायाच्छन्नसूर्यांशुशीतलम्। प्रावृट्कालमिवालोक्य कृष्यर्थी तोयमाप स ॥२५॥ योऽधिष्ठाताऽत्र तस्यैव भक्तोऽस्मीत्यभिधाय च। कृतप्रदक्षिणोऽश्वत्थवृक्षं तं प्रननाम स ॥२६॥ सयोग्याश्च बलीवर्दयुगं रचितमङ्गलः। कृत्वा बलिं सम्य तरोरारेभे कृषिमथ स ॥२७॥ तस्थौ तस्यैव चाधस्ताद्द्रुमस्य स दिवानिशम्। भोजनं तस्य चानिन्ये सत्रैव गृहिणी सदा ॥२८॥ काले तत्र च पक्वेषु तस्य सस्येष्वसञ्चितम्। सा भूमिः परराष्ट्रेण दैवादेत्य व्यलुण्ठ्यत ॥२९॥ ततः परबल याते नष्टे सस्ये च सत्त्ववान्। आश्वास्य रुदतीं भार्यां किञ्चिच्छेषे तदाब्रवीत् ॥३०॥ प्राग्वत्कृतबलिस्तस्थौ रात्रावथ तरोरधः। निसर्गः स हि धीराणां यदापद्यधिकं दृढाः ॥३१॥ अथ चिन्तावनिद्रस्य स्थितस्यैकाकिनो निशि। तस्यादश्वत्थतरोस्तस्मादुच्चचार सरस्वती ॥३२॥ भो सोमदत्त ! तुष्टोऽस्मि तव तद्गच्छ भूपतेः। आन्त्यप्रभसञ्ज्ञस्य राष्ट्रं धीरत्वशालिनः ॥३३॥ तत्र सस्थानवरत द्वारेवेशे महीपतेः। ब्रूषे पठित्वा सन्ध्याग्निहोत्रमन्त्रानिदं वचः ॥३४॥ फलभूतिरहं नाम्ना विप्रः शृणुत वच्मि यत्। भद्रकृत्प्राप्नुयाद् भद्रमभद्रं चाप्यभद्रकृत् ॥३५॥ एवं ब्रुवन् तत्र त्वं महतीमृद्धिमाप्स्यसि। सन्ध्याग्निहोत्रमन्त्रांश्च मत्त एव पठाधुना ॥३६॥ महं च यदा इत्युक्त्वा स्वप्रभावेण तत्क्षणम्। समध्याप्य च तान्मन्त्रान् खेटे वाणी तिरोदधे ॥३७॥ प्रातः स सोमदत्तश्च प्रतस्थे भार्यया सह। फलभूतिरिति प्राप्य नाम यदाहूतः श्रुतौ ॥३८॥ अतित्रम्राटवीम्तास्त्वा विषमाः परिवर्त्तिनीः। दुर्गा दृढ गत्प्राप प्रौढवर्णविषयं च सः ॥३९॥

तृतीय लम्बक ३७९

तृतीय लम्बक ३७९ जंगल में उसने अच्छी फसल होने योग्य एक भूमि देखी और उसके मध्य में बड़ी विस्तृत (लम्बी-चौड़ी) घनी छाया के कारण (सूर्य-किरणों को रोकने के कारण) शीतल एक पीपल के वृक्ष को वर्षाकाल के समान देखकर वह कृषक अत्यन्त सन्तुष्ट हुआ ॥२४-२५॥ तब सोमदत्त ने 'इस वृक्ष में रहनेवाला जो भी देवता है, मैं उसका भक्त हूँ' ऐसा कहकर वृक्ष की प्रदक्षिणा कर उसे प्रणाम किया ॥२६॥ तदनन्तर बैलों को जोड़कर मंगल के लिए पूजा-पाठ आदि करके और वृक्ष का प्रसाद चढ़ाकर उसने खेती प्रारम्भ कर दी ॥२७॥ खेती करता हुआ वह सोमदत्त उसी वृक्ष के नीचे दिन-रात रहने लगा। उसकी पत्नी प्रतिदिन उसे वहीं भोजन लाकर देती थी ॥२८॥ कुछ समय के बाद जब उसकी खेती पककर तैयार हुई, तो दूसरे राजा के राष्ट्र पर आक्रमण करने के कारण लूट ली गई। सब-मना के चले जाने पर और धन के नष्ट होने पर उसने रोती हुई पत्नी को समझा-बुझाकर कुछ बचा-खुचा अन्न समेट लिया ॥२९ १/२॥ और पहले के समान पीपल के वृक्ष में रहनेवाले देवता की बलि (प्रसाद) चढ़ाकर धैर्य के साथ वहीं रहन लगा क्योंकि धैर्यशाली जीव विपत्ति के समय स्वभावतः अधिक दृढ़ हो जाते हैं ॥३१॥ तदनन्तर एक दिन रात में चिन्ता से निद्रा न आने के कारण जागते हुए सोमदत्त ने पीपल के वृक्ष से निकली हुई यह वाणी सुनी—'हे सोमदत्त ! मैं तुम से प्रसन्न हूँ। तुम धीरकंट-देश में जादित्यप्रभ नामक राज्य के राष्ट्र में जाओ। उस राजा के द्वार पर निरन्तर सन्ध्या और अग्निहोत्र के मन्त्रों का पाठ करते हुए यह कहना कि मैं फलभूति नामक ब्राह्मण हूँ जो कहता हूँ उसे सुनिए— शुभ कार्य करनेवाला कल्याण प्राप्त करता है और अशुभ कार्यवारी अशुभ प्राप्त करता है। तुम्हें सन्ध्या और अग्निहोत्र के मन्त्र नहीं आते उन्हें अभी मुझसे पढ़ो मैं यक्ष हूँ। ऐसा कहकर यक्ष ने अपने प्रभाव से उसी समय मन्त्र पढ़ा दिये। मन्त्र पढ़ाकर वाणी लीन हो गई ॥३२-३६॥ प्रातःकाल सोमदत्त यक्ष द्वारा दिये गये फलभूति नाम को पाकर अपनी पत्नी के साथ धीरकंट-देश की ओर चल पड़ा। वह अगर बड़े-बड़े भीषण जंगलों को पारकर दुर्देव के साथ धीरकंट-देश में पहुँचा ॥३८ १/२॥

५८ कथासरित्सागर

५८ कथासरित्सागर तत्र सन्ध्याग्निकार्यादि पठित्वा द्वारि भूपतेः। ययावन्नाम सङ्ख्याप्य फलबूतिरिति स्वकम् ॥४०॥ सोऽवादीद् भद्रकृद् भद्रमभद्रं चाप्यभद्रकृत्। प्राप्नुयादिति लोकस्य कौतुकोत्पादकं वचः ॥४१॥ मुहुश्च तद्ब्रुवन्तं स तत्रादित्यप्रभो नृपः। बुद्ध्वा प्रवेशयामास फलबूतिं कुतूहली ॥४२॥ सोऽपि प्रवेद्य तस्याग्रे तदेव मुहुरब्रवीत्। जहास तेन स नृपस्तथा पार्श्वस्थितैः सह ॥४३॥ समान्तश्च वस्त्राणि दत्त्वा चाभरणानि सः। ग्रामान् राजा ददौ तस्मै न तोषो महतां मृषा ॥४४॥ एवं च तत्क्षणं प्राप गुह्यकानुग्रहेण सः। फलबूतिः कृशो भूत्वा विभूतिं भूरिदोषिताम् ॥४५॥ सदा तदेव च वदन् पूर्वोक्तं प्राप भूपतेः। बालक्रम्यमीश्वराणां हि विनोदरसिकं मनः ॥४६॥ क्रमाद्राजगृहे चास्मिन् राष्ट्रम्वन्तःपुरेषु च। राजप्रिय इति प्रीतिं बहुमानामवाप सः ॥४७॥ कदाचिच्च सोऽन्यया कृतकाटङ्कभागसः। आदित्यप्रभभूपाल सहसान्तःपुरं ययौ ॥४८॥ द्वाःस्थसम्भ्रमसाशङ्क प्रविश्यैव ददर्श सः। देवी देवासमम्यर्चा नाम्ना कुवलयावतीम् ॥४९॥ दिगम्बरामुक्तकेशीं निमीलितविलोचनाम्। स्फुरत्सिन्दूरतिलकां जपप्रस्फुटिताधरम् ॥५०॥ विविधवर्णकन्यस्तमहामण्डलमध्यगाम् । अमृक्सुरामहामांसकल्पितोग्रबलिक्रियाम् ॥५१॥ साऽपि प्रविष्टे नृपतौ सम्भ्रमाकम्पितांगुशः। तेन पृष्टा क्षणाद्वस्त्रमवोचद्याचिताभया ॥५२॥ तदेवोदयताभाप कृतवत्यस्मि पूजनम्। अत्र चागमवृत्तान्तं सिद्धिं च शृणु मे प्रभो ! ॥५३॥ कुवलयमालाकल्पिता वार्ता पुराहं पितृवेश्मस्था कन्या मधुमहोत्सवे। एवमुक्त्वा वयस्याभिः समत्प्रमोदानवर्तिनी ॥५४॥ अस्तीह प्रमदोद्याने तरुमण्डलमध्यगः। दृष्टप्रभाबो वरदो देवदेवो विनायकः ॥५५॥

तृतीय लम्बक ३८१

तृतीय लम्बक ३८१ वहाँ राजद्वार पर सन्ध्या अग्निहोत्र आदि के मन्त्र पढ़कर और अपना फलभूर्ति नाम सुनाकर बोला—'कल्याणकारी कल्याण प्राप्त करता है और अशुभकर्ता अशुभ प्राप्त करता है। कानों में आश्चर्य उत्पन्न करनेवाले ये वचन बोलने लगा ॥४०-४१॥ उसे बार-बार ऐसा कहते हुए सुनकर चकित हुए राजा आदित्यप्रभ ने उसे अन्दर बुलवाया ॥४२॥ वह फलभूर्ति भीतर राजा के समीप आकर भी बार-बार वही वाक्य कहने लगा जिसे सुनकर राजा और उसके समीप बैठे हुए व्यक्ति हँसने लगे। इस प्रकार प्रसन्न राजा ने उसे अच्छे-अच्छे वस्त्र गहने और अनेक गाँव पुरस्कार में दिये। बड़ों की प्रसन्नता झूठी (व्यर्थ) नहीं होती ॥४३-४४॥ इस प्रकार यश की कृपा से निर्धन फलभूर्ति ने राजा द्वारा दी गई विभूति प्राप्त की और सदा इसी प्रकार बकता हुआ राजा का प्रेमपात्र बन गया। राजाओं का मन विलास का सदा रसिक होता है। क्रमशः वह फलभूर्ति (सामग्रतः) धीरे-धीरे राज्य में रनिवास में और सर्वत्र ही राजप्रिय होने के कारण सम्मानित हुआ ॥४५-४७॥ किसी समय राजा आदित्यप्रभ वयस में शृंगार खेलकर एकाएक रनिवास में चला गया। द्वारपाल की घबराहट से शंकित राजा ने रानी के भवन में प्रवेश करते ही रानी कुवलयावली को देव-पूजा में संलग्न देखा ॥४८-४९॥ राजा ने वहाँ उठे हुए धूपाकाशी जालें सूँघे हुए, मोटा सिन्दूर का तिलक लगाये हुए, जप से फड़कते हुए ओष्ठावाली रंग-बिरंगे बड़े-से मण्डल के भीतर बैठी हुई तथा रक्त मद्य और नरमांस से उग्र बलि देती हुई नयी रानी को देखा ॥५०-५१॥ रानी भी राजा के सहसा आ जाने पर घबराहट में थोथी बहकने लगी राजा के पूछने पर अभय प्रार्थना करके बोली—'महाराज ! तुम्हारी उन्नति के लिए ही यह पूजन कर रही हूँ। इस पूजा की प्राप्ति और सिद्धि का वृत्तान्त सुनो ॥५२-५३॥ रानी कुवलयावली द्वारा कही गई कथा अपने पिता के घर में जब मैं कन्या (अविवाहिता) थी तब एक बार वसन्तोत्सव के समय कुल-उद्यान में बैठी हुई सखियों ने आकर कहा—'इस हमारे उद्यान में केतकी झुरमुट में सिद्धदाता वरदानी पद्मावती की मूर्ति है। वह भक्तों की मनोकामना पूर्ण करने ॥५४-५५॥

१८२ कथासरित्सागर

१८२ कथासरित्सागर तमुपागम्य भक्त्या स्वं पूजय प्रापितस्तदम् । येन निर्विघ्नमेवानु स्यादिष्टं पतिमाप्स्यसि ॥५६॥ ततस्तस्या यथाख्यात गच्छन्त्या मोदकतो मया । कया लब्धं भर्त्तारं हि विनायकमभूत्तया ॥५७॥ मया सा प्रत्यबोधाम्भो विमनायन्तथावदत् । तस्मिन्प्रवृत्तेन नास्ति सिद्धिः कार्येह कस्यचित् ॥५८॥ तथा भक्त्याथ तं चण्डयामा वधं गृहम् । इत्युक्त्वा स वयस्या मे वयामस्तथयन्निमाम् ॥५९॥ यक्षदत्तकथा पुरा पुरन्दरनये गणाग्य प्रागुदिष्यति । गान्धारवत्य तत तय च बभूवासुर ॥६०॥ प्राच्यवन्तममुष्य गन्धर्वाणां प्रियाम् । सोऽथ कृत्वा प्राप्य प्राय च सवत्स पतिम् ॥६१॥ ग्रामवत् गुणैर्युक्तं मन्दग्य च प्रीतिम् । स च गन्ध्यां निदद्ध्ये या तिल... गुणत्रयम् ॥६२॥ प्रमत्तस्यापिनो मा च कान्ताविष्टा चिद । द्विज प्रवासं पूर्वं मातङ्गाख्येति ददौ ॥६३॥ च सन्तर्पयेति मन्त्रप्रभावतो ददौ च । तत्र सञ्चारयन्मानं स चकार वपुष्मतः ॥६४॥ भीतासीत वधूहं तीर्थस्नानं जगुर्दृशा । ददातु गच्छतो यस्य दूतं दायान्प्रगृह्यते ॥६५॥ इत्थं स वयस्याभिः सन्तापवन्त... त्वा दृष्ट्वा स प्रमत्तश्च मातङ्गाख्यं पुरं गतः। प्रहस्यैतां रहिते च गुणवद्दारदारकः। अथ सा कस्य कन्यासौ मन्दबुद्धे कथं च सा। न्यहं यद वन्दितुं तीर्थं समं मया। भवितास्य सुता दूतं प्रत्याहवदतो जनैः। यद वन्दितुं तीर्थं विजयाख्यममुं सती। तत्र तस्य द्विजेन्द्रस्य सुतं रूपेणानिन्दितम्

कहकर सहेलियों ने मुझे यह कथा सुनाई ॥५८-५९॥

तृतीय स्तबक १८३ उनकी पूजा कर, तो अवश्य ही अपने अनुकूल पति को प्राप्त करेगी' ॥५६॥ यह सुनकर मैंने अपने स्वाभाविक भोलेपन से सखियों से पूछा कि क्या विनायक (गणेश) की पूजा से कुमारियाँ अपने योग्य पति को प्राप्त करती हैं? ॥५७॥ मेरे पूछने पर उन्होंने कहा- 'तुम क्या कह रही हो? उनकी पूजा के बिना किसी को कोई भी सिद्धि प्राप्त नहीं हो सकती। हम गणपति का प्रभाव तुम्हें बतलाती हैं सुनो।' ऐसा कहकर सहेलियों ने मुझे यह कथा सुनाई ॥५८-५९॥ गणपति की कथा प्राचीन काल में देवता लोग सेनापतित्व के लिए शिवजी के पुत्र को चाहते थे तारकासुर ने इन्द्र को भगा दिया और शिवजी ने कामदेव को दग्ध कर दिया। ऊर्ध्वरेता (आजन्म ब्रह्मचारी) अत्यन्त उग्र एवं लम्बी तपस्या में बैठे हुए शिवजी को पति के रूप में प्राप्त करने के लिए पार्वती ने तप किया और पुत्र की प्राप्ति एवं कामदेव का पुनर्जन्म माँगा किन्तु उसने कार्य-सिद्धि के लिए गणेशजी के पूजन का स्मरण नहीं किया ॥६०-६२॥ तब अपना अभीष्ट चाहनेवाली पार्वती से शिव ने कहा- 'प्रिये ! सबसे पहले प्रजापति ब्रह्मा के मन से काम देव उत्पन्न हुआ। वह उत्पन्न होते ही मद से बोला किसे उन्मत्त करूँ? तब प्रजापति ने उसका नाम कन्दर्प रख दिया और उससे बोले- 'बेटा तुम्हें अत्यन्त दर्प हो गया है तो एक त्रिनेत्र शिव से अपनी रक्षा करना। कहीं उनसे तुम्हारी मृत्यु न हो'। ब्रह्मा से इस प्रकार समझाया हुआ भी दुष्ट कामदेव मुझे क्षुब्ध करने के लिए आया और मैंने उसे दग्ध कर दिया। वह पुनः देह के साथ जीवित नहीं हो सकता ॥६३-६६॥ तुम्हें तो मैं अपनी ही शक्ति से पुत्र उत्पन्न कर दूंगा। साधारण सांसारिक जनों के समान मुझे कामदेव की प्रेरणा से प्रजोत्पादन-शक्ति की आवश्यकता नहीं है ॥६७॥ जब शिवजी पार्वती से इस प्रकार कह रहे थे तभी उनके सम्मुख ब्रह्मा इन्द्र के साथ प्रकट हुए। उन्होंने स्तुति करके शिवजी से तारकासुर से शान्ति के लिए प्रार्थना की। शिवजी ने भी पार्वती की कोख से सन्तान उत्पन्न करना स्वीकार किया ॥६८-६९॥

१८४ कथासरित्सागर

१८४ कथासरित्सागर अनुमेने च कामस्य जन्म पत्नि देहिनाम्। सङ्गविच्छेङ्करस्यार्थममूर्त्संन्यैव तद्गिरा ॥७०॥ ददौ च निजचित्तेऽपि सोऽवकाशं मनोभुवः । तेन तुष्टो ययौ धाता मुदं पाप च पार्वती ॥७१॥ ततो यातेषु दिवसेष्वेकदा रहसि स्थितः । सिषेवे सुरतक्रीडामुमया सह शङ्करः ॥७२॥ कुमारसम्भवकथा यदा नाभूद्रतस्तोष्य गतष्वब्दशतेष्वपि । तदा तदुपमर्देन चकम्पे भुवनत्रयम् ॥७३॥ ततो जगन्नाशभयाद्रतविघ्नाय धूर्जतेः । वह्निं स्मरन्ति स्म सुराः पितामहनिदेशतः ॥७४॥ सोऽप्यग्निः स्मृतमात्रः सन्नभ्युपेत्य मदनान्तकम्। मत्वा पलाय्य तैर्भ्यः प्रविवेश जलान्तरम् ॥७५॥ तत्तेजोदह्यमानाश्च तत्र भेका दिवौकसाम् । विचिन्वतां शशंसुस्तमग्निमन्तर्जलस्थितम् ॥७६॥ ततस्ताननभिव्यक्तवाचः शापेन तत्क्षणम् । मकान्कृत्वा तिरोभूय भूयोऽग्निमन्वर ययौ ॥७७॥ तत्र तं कोटरान्तस्थं देवाः शम्बूकरूपिणम् । प्रापुगशकाख्यातं स कयां दर्शनं ददौ ॥७८॥ कृत्वा जिह्वाविपर्यास शापेन शुकदन्तिनाम् । प्रविपेदे च देवानां स कायं तैः कृतस्तुतिः ॥७९॥ गत्वा च स्वोष्मणा सोऽग्निनिवार्य सुरताच्छिवम् । पापभीरया प्रणम्यास्र देवकार्यं व्यबवयत् ॥८०॥ शर्वोऽप्यारूढवेगोऽसौ तस्मिंस्वीयं स्वभावधे । तद्वि धारयितुं शक्तो न वह्निर्नाम्बिकापि वा ॥८१॥ न मया तनयस्त्वत्तः सम्प्राप्त इति भाविनीम् । खेदकोपाकुलां देवीमित्युवाच ततो हरः ॥८२॥ विघ्नोऽत्र तव जातोऽयं विना विघ्नेशपूजनम् । तदद्यम येनाशु बहुलो नो जनिता सुतः ॥८३॥

तृतीय लम्बक १८४

तृतीय लम्बक १८४

और ब्रह्मा के कहने पर प्राणियों के चित्त में कामदेव का जन्म होना भी स्वीकार किया जिससे सृष्टि का विच्छेद न हो। उन्होंने अपने चित्त में भी कामदेव का स्थान दिया। इससे प्रसन्न होकर ब्रह्मा चले गये और पार्वती प्रसन्न हुईं॥७०-७१॥

कुछ दिन व्यतीत होने पर एक बार एकान्त में शिव-पार्वती का समागम हुआ ॥७२॥

स्वामि कार्त्तिकेय की उत्पत्ति

सैंकड़ों वर्ष व्यतीत होने पर भी क्रीड़ा समाप्त न हुई प्रत्युत उससे तीनों लोक काँप गये। संसार के नाश के भय से शिव की क्रीड़ा में विघ्न डालने के लिए देवताओं ने ब्रह्मा की आज्ञा से अग्नि का स्मरण किया। स्मरण करते ही उपस्थित हुआ अग्नि शिवजी के भीषण क्रोध का स्मरण करके देवताओं से भागकर जल में जा छिपा ॥७३-७५॥

जल में अग्नि के ताप से तप्त हुए मेंढकों ने अग्नि को खोजते हुए देवताओं से जल में छिपे अग्नि का पता बता दिया ॥७६॥

अग्नि मेंढकों को अस्पष्ट वाणी-शक्ति हीन का शाप देकर और छिपकर मन्दराचल पर चला गया। वहाँ देवताओं ने वरुण के डर से शम्भूक (घाघा) के रूप में उस अग्नि को देखा। वहाँ उसने मन्दुक नाम से देवताओं को दर्शन दिया ॥७७-७८॥

अग्नि ने शुकों की जिह्वा का उलटा का रूप दिया और देवताओं के स्तुति करने पर अग्नि ने देवताओं के कार्य को स्वीकार कर लिया ॥७९॥

अग्नि ने जाकर अपनी प्रभों से शिवजी को काम-क्रीड़ा से विरत करके और प्रणाम करके देवताओं का कार्य निवेदन किया। प्रसन्न होकर शिवजी ने बहिर् में ही अपना वीर्य स्खलित कर दिया क्योंकि उसे पार्वती और अग्नि दोनों ही धारण करने में असमर्थ थे ॥८०-८१॥

'दैव मुझपर कुपित होकर पुत्र नहीं प्राप्त किया—'यह कहती हुई पार्वती को शिव ने कहा—॥८२॥

'इस वीर्य के बिन्दुओं (कणों) का गुहक के रूप में एक विघ्न-हर्ता उत्पन्न हुआ। इसलिए तपस्या पूरा होने पर भविष्य में हम दोनों का पुत्र उत्पन्न होगा' ॥८३॥ २४

१८६ कथासरित्सागर

१८६ कथासरित्सागर इत्युक्ता शम्भुना देवी चक्रे विघ्नेश्वरार्चनम्। अनलोऽपि सगर्भोऽभूत्तेन वीर्येण धूर्जटे ॥८४॥ ससर्ज शाम्भवं बिभ्रत्स सदा दिवसेष्वपि। अन्तःप्रविष्टतिग्मांशुरिव सप्ताश्विरावभौ ॥८५॥ ऊढवांश्च गङ्गायां सत्तजः सोऽथ दुःसहम्। गङ्गानयज्जन्मेरौ वह्निकुण्डे हराज्ञया ॥८६॥ तत्र संरक्ष्यमाणः सन् स गर्भः शाम्भवोऽग्नौ। निसृत्याब्दमहस्रेण कुमारोऽभूत्षडाननः ॥८७॥ ततो गौरीनियुक्तानां कृतिकानां पयोधरान्। षण्णां षड्भिर्मुखैः पीत्वा स्वल्पैः स ववृधे दिनैः ॥८८॥ अत्रान्तरे देवराजस्तारकासुरनिर्जितः। शिश्रिये मेरुशृङ्गाणि दुर्गाण्युज्झितसङ्गरः ॥८९॥ देवाश्च साकमृषिभिः षण्मुखं शरणं ययुः। षण्मुखोऽपि सुरान् रक्षन्नासीत्तैः परिवारितः ॥९०॥ तद्बुद्ध्वा हारितं मत्वा राज्यमिन्द्रोऽथ चुक्रुधे। योधयामास गत्वा च कुमारं स समत्सरः ॥९१॥ तद्वज्राभिहतस्याङ्गात् षण्मुखस्योद्बभूवतुः। पुंसौ शाखविशाखाख्यावुभावतुलतेजसौ ॥९२॥ सपुत्रं च तमाक्रान्तशास्त्रस्तत्तुपराक्रमम्। उपेत्य तनयं शर्वः स्वयं युद्धादवारयत् ॥९३॥ जातोऽसि तारकं हन्तुं राज्यं चन्द्रस्य रक्षितुम्। तत्कुरुष्व निजं कार्यमिति चनं शशास सः ॥९४॥ ततः प्रणम्य प्रीतेन तत्क्षणं वृत्रवैरिणा। सैनापत्याभिषेकोऽस्य कुमारस्योपचक्रमे ॥९५॥ स्वयमुत्क्षिप्तकलशस्तब्धबाहुरभूत्तदा । ततः शक्रः शुभमगावथेनमवदच्छिवः ॥९६॥ न पूजितो गजमुखः सेनान्यं वाञ्छता त्वया। समैव विघ्नो जातस्ते तत्कुरुष्व तदर्चनम् ॥९७॥ तच्छ्रुत्वा सतथा कृत्वा मुक्तबाहुः शचीपतिः। अभिषेकोत्सवं सम्यक्सेनान्ये निरवर्तयत् ॥९८॥

तृतीय लम्बक १८७

तृतीय लम्बक १८७ शिवजी से इस प्रकार कही गई पार्वती ने विघ्ननाशक गणेश का पूजन किया और उस शिवजी के अमोघ वीर्य से अग्नि को गर्भ रह गया॥८४॥ शिवजी के तेज को धारण किये हुए अग्नि ऐसा चमक रहा था जैसे सूर्य के तेज के अन्दर प्रविष्ट होने से आग चमकती है॥८५॥ कुछ समय के अनन्तर अग्नि ने उस अगाध शिव के तेज को गंगा में वमन करके गिरा दिया और गंगा ने शिव की आज्ञा से उसे सुमेरु पर्वत पर वह्नि-कुंड में छोड़ दिया॥८६॥ वहाँ पर शिवजी के गणों से रक्षा किया जाता हुआ वह तेज एक हजार वर्ष के अनन्तर छह मुखवाले कुमार के रूप में उत्पन्न हुआ॥८७॥ तब गौरी (पार्वती) के द्वारा नियुक्त छह कृत्तिकाओं के स्तनों से छहमुखों द्वारा दूध पीकर वह कुमार कुछ दिनों में बड़ा हो गया॥८८॥ इसी बीच तारकासुर से भगाया हुआ इन्द्र युद्ध छोड़कर सुमेरु पर्वत की घाटियों में छिप रहा था॥८९॥ ध्वनियों के साथ देवगण षङ्मुख कुमार की शरण में गये कुमार ने भी उनकी रक्षा की॥९०॥ यह जानकर और राज्य को हारा हुआ समझकर इन्द्र को क्षोभ हुआ और उसने ईर्ष्या- युक्त होकर कुमार से युद्ध किया॥९१॥ इन्द्र के वज्र के प्रहार से षण्मुख के अंग से शाख और विशाख दो अनुपम तेजस्वी बालक उत्पन्न हुए॥९२॥ पुत्रों के साथ इन्द्र के पराक्रम को दबाते हुए बालक षण्मुख को देखकर शिवजी स्वयं आये और उसे बड़े यत्न से शांत किया और कहा—तुम तारकासुर को मारने और इन्द्र की रक्षा करने के लिए उत्पन्न हुए हो इसलिये उसी अपने यथार्थ कार्य को करो ॥ ९३-९४॥ इसी समय प्रसन्न हुए इन्द्र ने कुमार का सेनाधिपत्य के लिए अभिषेक किया ॥ ९५॥ अभिषेक के लिए कलश उठाते हुए इन्द्र का हाथ जड़ रह गया तब इन्द्र को क्षोभ हुआ। यह देखकर शिवजी ने कहा—'इन्द्र ! तुमने सेनापति का निर्वाचन करते हुए गणेश की पूजा नहीं की थी उसी से यह विघ्न हुआ अब उनका पूजन करो ॥ ९६-९७॥ ऐसा सुनकर गन्ध-पुष्प आदि द्वारा इन्द्र ने गणेश को पूजे और कुमार के सेनापत्य का अभिषेक निर्विघ्न हुआ॥ ९८ ॥

१८८ कथासरित्सागर

१८८ कथासरित्सागर ततो जघान नचिरात् सेनानीस्तारकासुरम्। ननन्दुः सिद्धकार्याश्च देवा गौरी च पुत्रिणी ॥१९९॥ तदेवं देवि धेयानामपि सन्ति न सिद्धयः। हेरम्बेऽनर्चिते तस्मात्पूजयन वराधिनी ॥२००॥ इत्युक्ताऽहं वयस्याभिस्तानेकान्तबसिमम्। आर्यपुत्र पुरा गत्वा विघ्नराजमपूजयम् ॥२०१॥ पूजावसाने चापश्यमकस्माद् गगनाङ्गणे। उत्पत्य विहरन्तीस्ताः स्वसखीर्निजसिद्धितः ॥२०२॥ तद्दृष्ट्वा कौतुकाद् व्योम्नः समाहूयावतार्य च। मया सिद्धिस्वरूपं ताः पृष्टा सद्योऽब्रुवन्निदम् ॥२०३॥ इमा नृमांसाशनजा डाकिनीमन्त्रसिद्धयः। कालरात्रिरिति ख्याता ब्राह्मणी गुरुरत्र नः ॥२०४॥ एवं सखीभिरुक्ताहं खेचरी सिद्धिलोभ्रपा। नृमांसाशनभीता च क्षणमासं संशया ॥२०५॥ अथ तत्सिद्धिलुब्धत्वादवोचं ताः सखीरहम्। उपदेशो ममाप्यद्य युष्माभिर्दाप्यतामिति ॥२०६॥ ततो मद्यभ्यर्थनया गत्वा तत्क्षणमेव ताः। आनिन्युः कालरात्रिं तां तत्रैव विकटाकृतिम् ॥२०७॥ मिलद्भ्रुवं कातराक्षीं व्युच्छिन्नपिष्टनासिकाम्। स्थूलगण्डां कराळोष्ठीं दन्तुरां दीर्घकन्धराम् ॥२०८॥ लम्बस्तनीमुदरिणीं विदीर्णोत्फुल्लपादुकाम्। धात्रा वैरूप्यनिर्माणवैदग्धीं दर्शिनामिव ॥२०९॥ सा मां पादानतां स्नातां कृतविघ्नेश्वरार्चनाम्। विवस्त्रां मण्डले भीमा भैरवार्चामकारयत् ॥२१०॥ अभिषिच्य च सा मह्यं तांस्तान् मन्त्रान्निजाञ् ददौ। भक्षणाय नृमांसं च देवार्चनबलीकृतम् ॥२११॥ जातमन्त्रगणा भुक्तमहामांसा च तत्क्षणम्। निरम्बरेवोत्पतिता समन्तादहमम्बरम् ॥२१२॥ कृतक्रीडावतीर्याथ गगनाद् गुर्वनुज्ञया। गताऽभूवमहं देव कन्यकान्तःपुरं निजम् ॥२१३॥

तृतीय लम्बक १८९

तृतीय लम्बक १८९ तदनन्तर सेनापति षण्मुखकुमार ने शीघ्र ही तारकासुर को मारा। देवतागण प्रसन्न हुए और पार्वती ने अपने को पुत्रवती माना॥९९॥ तो बिना गणेश-पूजन के देवताओं को भी सिद्धि सम्भव नहीं। इसलिए, तू भी उचित पति की प्राप्ति के लिए उनका पूजन कर॥१००॥ सखियों से इस प्रकार कही गई मैंने बगीचे के एकान्त स्थान में स्थित विघ्नराज की पूजा की थी। पूजा के अन्त में मैंने अकस्मात् देखा कि मेरी सखियां अपनी सिद्धि के प्रभाव से उछलकर आकाश में पक्षियों के समान उड़ रही हैं॥१०१-१०२॥ यह देखकर आश्चर्य से मैंने उन्हें बुलाकर और नीचे उतारकर पूछा कि यह क्या है? तब उन्होंने तुरन्त कहा—मनुष्य का मांस खाने से प्राप्त होनेवाली ये डाकिनी-मन्त्रों की सिद्धियां हैं। कालरात्रि नाम की ब्राह्मणी इस विषय में हमारा गुरु है। आकाश में चलने की सिद्धि के लिए साध्य होने पर मानव-मांस खाने से भयभीत मैं कुछ समय तक सोचती रही। किन्तु उस सिद्धि का लोभ न रोक सकी और सखियों से बोली कि मुझपर यह दीक्षा मुझे दिलवाओ॥१०३-१०६॥ तब मेरी प्रार्थना पर वे मेरी सहेलियां उसी समय विकट आकृतिवाली कालरात्रि को बुला लाईं। उस कालरात्रि का विकट रूप था—जैसे भिंची हुई भौंहें, भींची आँखें, धँसी हुई चिपटी नाक, फूले लटके हुए स्तन, फूला हुआ पेट, फटे और फूले पाँव, मानों विधाता ने कुरूपता के निर्माण में अपनी विशेषज्ञता का प्रदर्शन किया हो ॥१०७-१०९॥ पैरों पर झुकी हुई और स्नान करके गणेश का पूजन किये हुए मुझे नंगी करके वह कालरात्रि मंडल के बीच बैठकर भैरव की पूजा करने लगी॥११०॥ तदनन्तर मेरा अभिषेक करके उसने उन मन्त्रों की दीक्षा दी और देवताओं द्वारा भोग लगाया हुआ मनुष्य का मांस मुझे खाने के लिए दिया॥१११॥ मन्त्रों की दीक्षा लेकर और मनुष्य के मांस का भक्षण करके मैं तभी ही सखियों के साथ आकाश में उड़ने लगी॥११२॥ इस प्रकार आकाश में सैर-कूद करके गुरु की आज्ञा से भूमि पर उतरकर मैं अपने निवास- स्थान पर गई॥११३॥

११ कथासरित्सागर

११ कथासरित्सागर एव बाल्येऽपि जाताहं डाकिनीचक्रवर्तिनी। भक्षितास्तत्र चास्माभि समेत्य बहवो नराः ॥११४॥ कालरात्र्याः कथा अस्मिन्कथान्तरे चैतां महाराज ! कथां शृणु। विष्णुस्वामीत्यभूत्तस्याः कालरात्र्याः पतिर्द्विजः ॥११५॥ स च तस्मिन्नुपाध्यायो देशे नानादिगागतान्। शिष्यानध्यापयामास वेदविद्याविशारदः ॥११६॥ शिष्यमध्ये च तस्यैको नाम्ना सुन्दरको युवा। बभूव शिष्यः शीलेन विराजितवपुर्गुणैः ॥११७॥ तमुपाध्यायपत्नी सा कालरात्रिः कदाचन। वव्रे रहसि कामार्ता पत्यौ क्वापि बहिर्गते ॥११८॥ नूनं विस्पर्धिकं हासने क्रीडति स्मरः। यत्सानवेक्ष्य स्वं रूपं चक्रे सुन्दरकस्पृहाम् ॥११९॥ स तु सर्वात्मना नैच्छद्भर्त्स्यमानोऽपि विप्लवम्। स्त्रियो यत्ना विषहन्तां निष्कम्पं तु सतां मनः ॥१२० ॥ ततः साऽपसृते तस्मिन्कालरात्रिः क्रुधा तदा। स्वमङ्गं पाटयामास स्वयं दशननक्षतैः ॥१२१॥ विकीर्णवस्त्रकेशान्ता रुदती तावदास्त च। गृहं यावदुपाध्यायो विष्णुस्वामी विवेश सः ॥१२२॥ प्रविष्टं तमवादीच्च पश्य सुन्दरकेण मे। अवस्था विहिता स्वामिन् बलात्कारामिलाषिणा ॥१२३॥ तच्छ्रुत्वा स उपाध्यायः क्रुधा जज्वल तत्क्षणम्। प्रत्ययः स्त्रीषु मुष्णाति विमर्शं विदुषामपि ॥१२४॥ सायं च तं सुन्दरकं गृहप्राप्तं प्रभाष्य सः। सशिष्यो मुष्टिभिः पादैर्लगुडैश्चाप्यताडयत् ॥१२५॥ किं च प्रहारनिश्चेष्टं शिष्यानादिश्य तं बहिः। त्याजयामास रथ्यायां निरपेक्षतया निशि ॥१२६॥ ततः शनैः सुन्दरकः स निशानिलवीजितः। तमोभिभूतमात्मानं पश्यन्नेवमचिन्तयत् ॥१२७॥

तृतीय लम्बक १२१

तृतीय लम्बक १२१ महाराज ! इस प्रकार डाकिनियों की चक्रवर्तिनी होकर मैंने सहेलियों के साथ बहुत-से मनुष्यों का मांस खाया ॥११४॥ कालरात्रि की कथा महाराज ! इसी कथा के बीच एक और कथा सुनो। हमारी उस गुरुपत्नी कालरात्रि का पति विष्णुदत्त नाम का ब्राह्मण था। वह एक प्रसिद्ध अध्यापक और वेद-विद्या विशारद था और दूर-दूर देश से आते हुए शिष्यों को पढ़ाता था ॥११५-११६॥ विष्णुदत्त के शिष्यों में सुन्दरक नामक एक युवक शिष्य था जो बहुत ही विनयी और सदाचारी था॥११७॥ एक बार विष्णुदत्त की पत्नी उस कालरात्रि ने मोहित कर एकान्त में सुन्दरक से अनुचित प्रस्ताव किया जबकि उसके पति कहीं बाहर चले गये थे ॥११८॥ यह सच है कि हँसने योग्य कुरूप व्यक्तियों से कामदेव क्रीड़ा करता है अर्थात् हास्य करता है। तभी तो कुरूपा कालरात्रि ने अपने रूप को न देखकर सुन्दरक को चाहा ॥११९॥ प्रार्थना करने पर भी सुन्दरक ऐसा कुकृत्य करना नहीं चाहता था। स्त्रियाँ चाहे जितनी चेष्टाएँ करें किन्तु सज्जनों का मन हिलता नहीं ॥१२० ॥ सुन्दरक के हाथ न लगने पर कालरात्रि ने क्रोध से दाँतों और नखों से अपने अंगों को काटा और नोंच-खसोट डाला ॥१२१॥ वह कपड़ों और बालों को बिखेरे हुए रो रही थी। उसी बीच उसका पति विष्णुस्वामी घर आया ॥१२२॥ उसके आते ही उसने पति से कहा—'देखो बलात्कार करने की चेष्टा में सुन्दरक ने मेरी यह हालत बना डाली है' ॥१२३॥ यह सुनकर अध्यापक विष्णुस्वामी क्रोध से जल उठा। सत्य है, स्त्रिया पर विश्वास करना विद्वानों की भी विचार-शक्ति को नष्ट कर देता है ॥१२४॥ सायंकाल सुन्दरक के घर आने पर विष्णुस्वामी ने अपने अन्य शिष्यों के साथ उसे दौड़ा- कर मुक्कों लातों और डंडों से खूब पीटा ॥१२५॥ मार खाकर बेहोश सुन्दरक को गुरु ने रात में बाहर गली में लापरवाही से फेंकवा दिया ॥१२६॥ रात की ठंडी वायु से होश में आये सुन्दरक ने अपनी अवस्था को देखा और वह सोचने लगा ॥१२७॥

१९२ कथासरित्सागर

१९२ कथासरित्सागर अहो स्त्री प्रेरणा नाम रजसा सङ्क्षिपतात्मनाम्। पुंसां वात्येव सरसामाशयक्षोभकारिणी ॥१२८॥ यन्मामविचार्य वृद्धोऽपि विद्वानपि स सत्कथा। अवितक्रोधादुपाध्यायो विरुद्धमवरोधयि ॥१२९॥ अथवा दैवममिहाप्यसृष्टविदुषामपि। कामक्रोधौ हि विप्राणां मोक्षद्वारार्गलावभौ ॥१३०॥ तथा हि किं न मुनयः स्वदारभ्रंशशङ्किनः। ददृशूखल पूर्वमपि शर्वाय शुकृयुः ॥१३१॥ स घनं विविशुर्देवं कृतदारपरिग्रहम्। उमाय दर्शयिष्यन्तमृषीणामप्यशान्तताम् ॥१३२॥ दत्तशापञ्च ते सद्यस्त्रिजगल्लोभकारिणम्। बुद्ध्य स व्यमीनस्तं समयं शरणं ययुः ॥१३३॥ तन्मे वामरोगाशिरिपुप्रदूषणकञ्चितम्। मुनयोऽपि विमुह्यन्ति धोधियेषु वयञ्च काः ॥१३४॥ इति सुन्दरमभ्यस्य ध्यायन्त्युत्थायिनि। आप्तस्य पूज्यगोत्रात् हर्म्यं तस्यो समागम ॥१३५॥ गतास्तं यावस्य शतं तिक्षुष्यन्ति। मानमत्रयं हर्म्यं गा कालशत्रिमपरो ॥१३६॥ आकृष्यवाष्पका मुशातवास्त्रीणा। नयनामतशतान्ता हशिनोपपगङ्गुता ॥१३७॥ तां दृष्ट्वा तान्ता तत्र सान्त्वयितुमुपागतम्। गम्भीरं मयान् शाब्दान् प्राप्तं मृत्युरिवापरः ॥१३८॥ तमन्यमाहिता भाप त दृन्ता न सा ततः। भग्नांगच्छित्रशूलंकेवान् निमूर्च्छिताम् ॥१३९॥ अथान्तिजनस्य गा परिक्ष गासीत्ततः। साऽप्यपि गतोशाय्यैर्येशान्तरम् ॥१४०॥ त च यत्र स उपा० गत्वा गन्तव्यता। साऽपि नक्तं मयणा स्थित्वाऽतीती द्वयोः ॥१४१॥ १ मैथुनम् तथा स्नानं श्रेष्ठतमं ।

तृतीय लम्बक ३२१

तृतीय लम्बक ३२१ जिस प्रकार आँधी निर्मल जलवाले तालाबों को क्षुब्ध और मलिन कर देती है, उसी प्रकार स्त्री की प्रेरणा रजोगुणी पुरुषों के निर्मल हृदय को क्षुब्ध कर डालती है। इसी कारण मूढ़ और विद्वान् गुरु ने बिना विचारे अति क्रोध से मेरे विरुद्ध भयंकर व्यवहार किया ॥१२८-१२९॥ यह भी बात है कि इस सृष्टि के आरम्भ काल से ही मोक्ष-मार्ग के विरोधी काम और क्रोध ब्राह्मणों में दैवयोग से प्रकृति-सिद्ध होते हैं ॥१३० ॥ जैसे पूर्वकाल में अपनी स्त्रियों के नष्ट होने की शंका से देवदारु-वन में मुनिगण शिवके ऊपर क्रुद्ध हो गये थे। उन्होंने पार्वती को ऋषियों की अमान्यता दिखलाते हुए क्षपणक रूप धारी शिव को नहीं पहिचाना। शिवजी के शाप देने पर तीनों जगत् को हिला देनेवाले शिवजी को पहचान करके वे लोग फिर शिवजी की शरण में गये ॥१३१-१३३॥ इस प्रकार काम क्रोध आदि छह शत्रुओं से ठगे हुए ऋषिगण भी जब मोहित हो जाते हैं तब वेदपाठी ब्राह्मणों की तो बात ही क्या ? ॥१३४॥ इस प्रकार सोचता हुआ सुन्दरक रात को चोर डाकुओं के भय से पास की सूनी गोशाला में जाकर ठहरा ॥१३५॥ वह गोशाला के एक कोने में अभी बैठ ही रहा था कि उस मकान में कालरात्रि आ पहुँची ॥१३६॥ वह छुरी लिए हुए भीषण फूत्कार करती हुई आँखों और मुख से आग की ज्वाला फेंक रही थी और अनेक डाकिनियों के झुंड के साथ थी ॥१३७॥ इस प्रकार आई हुई कालरात्रि को देखकर डरा हुआ सुन्दरक राक्षसों का नाश करने- वाले मन्त्रों का जप करने लगा ॥१३८॥ उसके मन्त्र-जप से मोहित कालरात्रि ने भय से एक कोने में छिपुड़े हुए उसे नहीं देखा ॥१३९॥ तदनन्तर डाइन सहेलियों के साथ उस कालरात्रि ने उड़ने का मन्त्र पढ़ा और गौओं के बाड़े के नाल उड़कर आकाश-मार्ग से उज्जयिनी चली गई। उसी समय सुन्दरक ने सुनकर उसके मंत्र को जान लिया ॥१४०-१४१॥ ५

१६४ कथासरित्सागरे

१६४ कथासरित्सागरे तत्रावतार्य हर्म्ये सा मन्त्रत शाकवाटकम्‌१ । गत्वा श्मशाने चिक्रीड डाकिनीचक्रमध्यगा ॥१४२॥ सत्वाण च शुषात्रास्तं शाकवाटेऽवतीय सः । तत्र सुन्दरकदचकं वृत्तिमूलाठमूलकं ॥१४३॥ कृतक्षुत्प्रतिघातेऽस्मिन्प्राग्वद् गोबाटमाथिते । प्रत्ययायौ कालरात्री रात्रिमध्ये निकेतनात् ॥१४४॥ सतोऽधिरूढगोबाटा पूर्ववन्मन्त्रसिद्धितः । आकाशेन सक्षिप्या सा निधि स्वगृहमाययौ ॥१४५॥ स्वापयित्वा यथास्थानं तच्च गोबाटवाहनम् । विसृज्यानुचरीस्ताश्च शय्यावश्म विवेश सा ॥१४६॥ सोऽपि सुन्दरको नीत्वा तां निशां बिघ्नविस्मितः । प्रभाते त्यक्तगोबाटो निकटं सुहृदां ययौ ॥१४७॥ तत्राख्यातस्ववृत्तान्तो विषद्यगमनोन्मुखः । तै समाश्वासितो मित्रैस्तन्मध्य स्थितिमग्रहीत् ॥१४८॥ उपाध्यायागृहं त्यक्त्वा मुञ्जानो सत्रसद्मनि । उवास तत्र विहरन् स्वच्छन्दं सखिभिः सह ॥१४९॥ एकदा निर्गता क्रेतुं गृहोपकरणानि सा । ददर्श स सुन्दरकं कालरात्रिः किलापणे ॥१५०॥ उपेत्य च जगादैनं पुमरेव स्मरातुरा । मज सुन्दरकाद्यापि मां त्वदायत्तजीविताम्‌ ॥१५१॥ एवमुक्तस्तया सोऽय साधु सुन्दरकोऽब्रवीत्‌ । मैव वादीनं धर्मोऽय माता मे गुरुपत्न्यसि ॥१५२॥ ततोऽब्रवीत्कालरात्रिधमं चब्रुवेरिस वेहि तत्‌ । प्राणामे प्राणदानाद्धि धर्मं कोऽम्यधिको भवत् ॥१५३॥ अथ सुन्दरकोऽब्रावीन्मातर्मैव वृथा हृदि । गुरुन्स्याभिगमनं कुत्र धर्मो भविष्यति ॥१५४॥ एव निराकृता तेन तजयन्ती च तं रुषा । पाटयित्वा स्वहस्तेन स्वोत्तरीयमगाद् गृहम् ॥१५५॥ पश्य सुन्दरकेणैव धाविन्जा पाटितं मम । इत्युवाच पतिं तत्र दर्शयित्वोत्तरीयक्म् ॥१५६॥ १ शाकवाटकः = शाकस्थितिस्यानम् ।