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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

षष्ठ लम्बक १७३

षष्ठ लम्बक १७३ यदि वस्त्रों का हरण होने पर मेरे स्त्रीत्व का ज्ञान लोगों को हो गया तो इससे मेरी मृत्यु अच्छी होगी। चरित्र का नाश अच्छा नहीं ॥११३॥ इसलिए मुझे अपने चरित्र की ही रक्षा करनी चाहिए। इस वैश्यमित्र की नहीं। सतीत्व रक्षा ही स्त्रियों का मुख्य धर्म है मित्र आदि नहीं ॥११४॥ ऐसा निश्चय करके अपने बचने के लिए स्थान ढूँढ़ते हुए उसने एक वृक्ष के बीच बना हुआ गुफा के समान एक गड्ढा देखा मानो कृपाकर पृथ्वी ने उसे छिपने के लिए स्थान दिया हो ॥११५॥ उसमें घुसकर और घास-पातों आदि से शरीर को ढँककर, पति मिलन की अभिलाषा रखती हुई वह वहाँ छिप गई ॥११६॥ तब आधी रात के समय शस्त्र-सज्जित डाकुओं की बड़ी सेना ने व्यापारियों के दल को घेर लिया ॥११७॥ फलतः वहाँ घोर वर्षाकाल के समान घमासान युद्ध छिड़ गया जिसमें चिल्लाते हुए डाक काले बादलों के समान थे शस्त्रों के संघर्ष से निकली हुई अग्नि विद्युत् का काम कर रही थी और रुधिर की घोर वर्षा हो रही थी ॥११८॥ पश्चात् डाक रक्षकों के साथ समुद्रसेन व्यापारी को मारकर उसका सारा धन और सामान लूटकर ले गये ॥११९॥ उस घमासान युद्ध के समय भीषण चीत्कार सुनकर भी कीर्तिसेना जो मरी नहीं उसमें केवल उसका भाग्य ही कारण था ॥१२०॥ तब रात बीतने और सूर्य के उदय होने पर वह कीर्तिसेना वृक्ष के बीच के गड्ढे से बाहर निकली ॥१२१॥ पति की एकमात्र भक्ति और अपने सतीत्व के तेज की दृढ़ता से अपनी रक्षा करनेवाली पतिव्रताओं की आपत्ति में देवता अवश्य उनकी रक्षा करते हैं ॥१२२॥ क्योंकि उस निर्जन वन में चोर ने भी उसे देखकर छोड़ दिया किन्तु कहीं से आते हुए किसी तपस्वी ने उसे नहीं छोड़ा ॥१२३॥ तपस्वी ने उसका वृत्तान्त जानकर और उसे धैर्य प्रदान कर कमण्डल से जल पिलाया तथा उसे आगे जाने का मार्ग बताकर वह कहीं अन्तर्हित हो गया ॥१२४॥ तब मानो अमृत-पान करके तृप्त हुई-सी पतिव्रता कीर्तिसेना भूख और प्यास से रहित हो गई और तपस्वी द्वारा प्रदर्शित पथ से आगे बढ़ चली ॥१२५॥ कुछ मार्ग चलने पर 'एक रात और क्षमा करो' मानों कर (हाथ और किरण) फैला- कर इस प्रकार कहते हुए सूर्य के अस्त हो जाने पर वह एक विशाल जंबुकी वृक्ष में घर के समान बने हुए कोटर भाग में घुस गई और सूखी लकड़ियों से उसका द्वार बन्द कर दिया ॥१२६-१२७॥ ८५

६७४ कथासरित्सागर

६७४ कथासरित्सागर प्रदापे च ददर्शात्र द्वारच्छिद्रान्तरेण सा । राक्षसीमागतो घोरां बालकैर्न्विता सुतैः ॥१२८॥ तीर्णान्यविपदद्याहमनया भक्षितेति सा । त्रस्ता यावत्तरो तावदारूढा सत्र राक्षसी ॥१२९॥ अन्वारुढाश्च तत्पुत्रास्तत्र तां किल राक्षसीम् । अब्रुवन्म्व न किञ्चिद् भक्ष्यं देहीति तत्क्षणम् ॥१३०॥ ततः सा राक्षसी बालांस्तानुवाचाथ पुत्रकाः । महाश्मशानं गत्वापि भक्ष्यं नासादितं मया ॥१३१॥ याचितो डाकिनीसङ्घपाश्च्यत्र भागमदान् मे । तत्सेनादप विज्ञप्य याचितो भैरवो मया ॥१३२॥ स च मामान्वयो पृष्ट्वा दमो मामेषमादिशत् । भयङ्करि कुगेनासि तरदूपणर्यपजा ॥१३३॥ तन्निंतो मानिदूरम्य वसुदत्तपुरं व्रज । तत्रास्त बम्मसाग्यो राजा धर्मपरो महान् ॥१३४॥ य क्रूरस्माटवीमेतां पर्यन्तस्थोऽभिरक्षति । स्वयं गृह्णाति गुख्य च निगृह्णाति च तस्करान् ॥१३५॥ तस्याभ्या च मृग्याधममृजस्य भूपते । अधामद्य प्रविष्टाम्त कर्णे शतपदी ल्पु ॥१३६॥ सा च बाल्न बहुश प्रसूतास्य शिरस्तरे । तेन रोगेण सद्रामो म्वायुनेषा च यक्षत ॥१३७॥ वैद्याश्चाम्य न तं व्याधि विद्म्यन्योऽपि कोऽपि चेत् । स शास्यति मत्रम्भंग दिनैरस्त्रैर्विपत्स्यत ॥१३८॥ तस्य मांसानि भुङ्क्ष्वीषा विगतस्य त्वमायया । मशिर्तम्मश्चि षण्मागापर्णिमृजा भविष्यसि ॥१३९॥ इत्य स भैरवणादि गरिभाग गतः । बालवाम्बाद्य तिहितस्तत्पुत्रा किं ददाम्यहम् ॥१४०॥ इय नयाक्या गराश्या पुत्रास्त सामयाब्रुवन् । शाशारनाडे गन्टर्निरि न राजाम्ब जीवति ॥१४१॥ कथ च शास्ता रोगा द्य तस्यारनीयाः । एवमवत्ताऽगाया शन्शान् गपशी व्रयो ॥१४२॥ शाशारनाड गन्तव्यम्भारदेव न भार्ता । धूत्वा च यथा शास्त्रं महागेगात्प्रतीया ॥१४३॥

षष्ठ लम्बक १६५

षष्ठ लम्बक १६५ प्रदोषकाल में उसने द्वार के छिद्र से झाँककर देखा कि एक भीषण राक्षसी छोटे-छोटे बच्चों के साथ आई ॥ १२८॥ उसे देखकर कीत्तिसेना जैसे ही यह सोचने लगी कि अन्यान्य सभी विपत्तियों से पार हो मात्र मैं इससे खाई जाऊँगी इतने में ही वह राक्षसी वृक्ष पर चढ़ गई ॥ १२९॥ उसके बच्चे भी उसके पीछे चढ़ गये और माँ से कहने लगे— 'हम लोगों को कुछ भोजन दो' ॥ १३० ॥ तब वह राक्षसी उन छोटे बच्चों से बोली— 'बेटा ! मैंने महाश्मशान में जाकर भी आज कुछ भोजन नहीं पाया। डाकिनियों के दल से भी माँगा। इस दुःख से मैंने भैरव से भी प्रार्थना की ॥ १३१ १३२॥ उस भैरव ने मेरा नाम-गोत्र पूछकर यह आज्ञा दी कि 'हे भयंकरि, तू करङ्कषण के वंश में उत्पन्न हुई और कुलीन है। अतः यहाँ से समीप-स्थित वसुदत्तपुर को जा। वहाँ वसुदत्त नाम का महा धार्मिक राजा है, जो इस जंगल के पास रहकर इस सारे जंगल की रक्षा करता है, मार्ग-शुल्क लेता है और चोरों को पकड़ता है ॥ १३३-१३५॥ एक बार शिकार खेलने की थकावट से वह जंगल में सो गया। उस समय अज्ञात अवस्था में एक गोजर (कनखजूरा मादा) उसके कान में शीघ्रता से घुस गया ॥ १३६॥ उसने बहुत दिनों के बाद राजा के सिर के भीतर प्रसव किया। इस रोग से गलते-गलते उस राजा की केवल हड्डियाँ और नसें ही शेष रह गई हैं, अर्थात् शीघ्र ही मरने वाला है ॥ १३७॥ वैद्य उसके रोग को नहीं जानते। यदि और भी कोई उसे न जानेगा तो राजा शीघ्र ही मर जायगा ॥ १३८॥ तुम उस मरे हुए राजा का मांस अपनी माया से प्राप्त करके खाना। उसके खाने से छह महीनों तक तृप्त रहोगी भूख न लगेगी ॥ १३९॥ इस प्रकार भैरव ने भी मुझे शाप दिया। लेकिन वह लम्बी अवधि का है। तो बताओ बेटा आज मैं क्या करूँ ? ॥ १४० ॥ राक्षसी के इस प्रकार कहने पर वे बच्चे कहने लगे— 'माता ! क्या उस रोग को जान लेने पर और उसके दूर हो जाने पर राजा जीवित रहेगा ? ॥ १४१॥ और यह भी बताओ कि राजा का ऐसा रोग कैसे दूर हो सकता है। तब वह राक्षसी बच्चों से कहने लगी— 'रोग को जानकर उसे दूर कर देने पर राजा अवश्य जी जायगा। यह भी सुनो कि यह महारोग कैसे दूर होगा ॥ १४२-१४३॥

६७८ कथासरित्सागर

६७८ कथासरित्सागर

तथेत्युक्तवतीं तां च कीर्तिसेनां तदैव सः। वसुदत्तपुरं गोपः पुंवेषां नयति स्म ताम् ॥१६०॥ तच्च तत्र यथावस्तु निवेद्यार्त्याय तत्क्षणात्। प्रतीहाराय कल्याणलक्षणां तां समर्पयत् ॥१६१॥ प्रतीहारोऽपि राजानं विज्ञप्यैव तदाज्ञया। प्रवेशयामास स तां तस्यान्तःपुरमनिन्दिताम् ॥१६२॥ राजा च सोऽत्र रोगातंस्तां दृष्ट्वैवामृतदृष्टिम। आश्वस्तो वसुदत्तोऽभूद्वेधेत्यात्मेव हिवाहितम् ॥१६३॥ उवाच चैतां पुंवेषां यदिमामपनेष्यसि। रुजमेतत्प्रदास्यामि राज्यार्धं ते सुलक्षण ॥१६४॥ जाने जहार पृष्ठात्मे स्वप्ने स्त्री कृष्णकम्बलम्। सन्निश्चितमिमं रोगं हरिष्यति भवानमम् ॥१६५॥ तच्छ्रुत्वा कीर्तिसेना तं जगादाथ दिनम् गतः। देव ध्वस्तेऽपनेष्यामि रोगं मा स्मार्षृछिं कृथाः ॥१६६॥ इत्यक्त्वा मूर्ध्नि राज्ञोऽस्य गव्यं घृतमवापयत्। तेन तस्याययौ निद्रा ययौ सा चातियेदना ॥१६७॥ भिषग्रूपेण देवोऽयं पुण्यैर्नः कोऽप्युपागतः। इति तत्र च तां सर्वे कीर्तिसेनां ततोऽस्तुवन् ॥१६८॥ महादेवी च तैस्तैस्तामुपचारैरुपचरत्। नक्तं वेश्म पृथक्चास्याः सवासीकमकल्पयत् ॥१६९॥ अथापरेद्युर्मध्याह्ने मन्त्रिश्वन्तःपुरेषु च। पश्यत्सु तस्य भूपस्य कीर्तिसेना चकार सा ॥१७०॥ शिरसः कर्णमार्गेण सार्धं शतपदीशतम्। राक्षस्युदितया पूर्वं युक्त्याभ्यवहृतया तया ॥१७१॥ स्नापयित्वा च घटके सा ताः शतपदीस्ततः। घृतक्षीराभिषेकेण च नृपं समतर्पयत् ॥१७२॥ क्रमात्तस्मिन्समाश्वस्ते रोगमुक्ते महीपतौ। घटे तान्राजिमो दृष्ट्वा को न तत्र विसिस्मये ॥१७३॥

कीर्तिसेना न कहा—'ठीक है। तब वह ग्वाला पुरुष-वेषधारिणी कीर्तिसेना को वसुदत्त पुर में ले गया ॥१६०॥ ग्वाले ने वहाँ जाकर दुःखित द्वारपाल से सब कुछ निवेदन किया और उस शुभलक्षणा को उसे सौंप दिया ॥१६१॥ द्वारपाल ने भी राजा से निवेदन किया और उसकी आज्ञा से उस सर्वाङ्गसुन्दरी को वह राजा के पास ले गया ॥१६२॥ रोगाक्रान्त राजा वसुदत्त भी उस अद्भुत वैद्य को देखकर प्रसन्न और विश्वस्त हो गया ॥१६३॥ 'यदि तुम मेरे इस रोग को दूर करोगे तो मैं तुम्हें इस राज्य का आधा भाग दे दूंगा ॥१६४॥ स्वप्न में मैंने देखा है कि एक स्त्री मेरे शरीर पर से काला कम्बल हटा रही है। इससे समझता हूँ कि तुम निश्चय ही मेरी बीमारी दूर करोगी' ॥१६५॥ यह सुनकर कीर्तिसेना कहने लगी—'राजन् आज तो दिन चला गया। कल प्रातः तुम्हारा रोग दूर करूँगा अधीर न होना' ॥१६६॥ ऐसा कहकर उसने राजा के सिर पर गाय का घी मलवाया उससे उसे नींद आ गई और तीव्र वेदना कम हो गई ॥१६७॥ 'वैद्य के रूप में यह कोई देवता आया है'—इस प्रकार कहकर सभी राजपुरुष उसकी प्रशंसा करने लगे ॥१६८॥ महारानी ने भी अनेक प्रकार से उसका स्वागत-सम्मान किया और रात को उस वैद्य के लिए पृथक गेह का प्रबन्ध कर दिया ॥१६९॥ दूसरे दिन मध्याह्न में मन्त्रियों और राजाओं के सामने ही दासी से सुनी हुई उस आश्चर्यजनक युक्ति से कीर्तिसेना ने कान के मार्ग से सभी गांडरों या कनखजूरों को बाहर निकाल दिया और घी-दूध आदि से राजा को हृष्ट-पुष्ट बना दिया ॥१७०-१७२॥ क्रमशः राजा के रोगमुक्त और स्वस्थ होने पर और घड़े में उन जीवों को देखकर किसे आश्चर्य नहीं हुआ? ॥१७३॥

६०६ कथासरित्सागर

६०६ कथासरित्सागर शिरःपूर्वं भृशाम्यक्तं तस्य न्यस्तोष्णसर्पिषा। कृत्वा मध्याह्नकटिने स्थापितस्यातपे शिरम्॥१४४॥ निवेश्य कर्णकुहरे सुषिरा वंशनालिकाम्। शीताम्बुघटपृष्ठस्थशरावच्छिद्रसङ्गिनीम् ॥१४५॥ तेन स्वेदातपक्लान्ता निर्गत्यास्य शिरान्तरात्। कर्णरन्ध्रेण रोमथ वंशनाडीं प्रविश्य ताम्॥१४६॥ घटे शीताभिलाषिण्यः शतपद्यः पतन्ति ताः। एवं स नृपतिस्तस्मान् महारोगाद् विमुच्यते॥१४७॥ इत्युक्त्वा राक्षसी पुत्रान् वृक्षस्थान् विरराम सा॥ कीर्तिसेना च तत्सर्वमशृणोत्कोटरस्थिता॥१४८॥ श्रुत्वा च चिन्तयामास निस्तरिष्यामि खेदितः। तद्गत्वा चैतया युक्त्या जीवयिष्यामि तं नृपम्॥१४९॥ एतामेवाटवीं सोऽप्यशुल्कं प्रान्तस्थितोज्झति। तत्सौकर्याच्च वणिजः सर्वे यान्त्यमुना पथा॥१५०॥ एतत्समुद्रसेनोऽपि स्वर्गमी सोऽब्रवीद् वणिक्। तदेतेनैव मार्गेण स मे भर्तागमिष्यति॥१५१॥ अतो गत्वाटवीप्रान्ते वसुदत्तपुरे नृपम्। रोगादुत्तार्य तत्रस्था प्रतीक्षे भर्तुरागसम्॥१५२॥ एव विचिन्तयन्ती सा कृच्छ्रात्तामनयन्निशाम्। प्रातर्नष्टेषु रक्षःसु निरगात् कोटरात्ततः॥१५३॥ क्रमात्ततोऽटवीमध्ये यान्ती पुरुषवेषभृत्॥ प्राप्तेऽपराह्णे गोपालमेकं साधु ददर्श सा॥१५४॥ तत्सौकुमार्यदूराच्चदर्शनादङ्गीकृतं च तम्। पप्रच्छोपेत्य सा कोऽयं प्रदेशः कथ्यतामिति॥१५५॥ सोऽपि गोपालकोऽब्रवीद् वसुदत्तस्य भूपतेः। वसुदत्तपुरं नाम पुरमेतत्पुरः स्थितम्॥१५६॥ राजापि स महाश्मात्र मुमूर्षुर्व्याधितः स्थितः। तच्छ्रुत्वा कीर्तिसमा स गोपालकमभाषत॥१५७॥ यदि मां नयते कश्चिद्राजस्तस्यान्तिकं ततः। अहं तं तस्य जानामि निवारयितुमामयम्॥१५८॥ तच्छ्रुत्वैवाबदद् गोपः पुरेऽत्रैव व्रजाम्यहम्। तदायाहि मया साकं यावद्यत्नं करोमि ते॥१५९॥

षष्ठ लम्बक १७७

षष्ठ लम्बक १७७ पहले उसके सिर को गर्म घी से चुपड़कर दोपहर की कड़ी गर्मी में बहुत देर तक उसे सुखाना चाहिए। तब उसके कान में बाँस की पोली नली समाकर और दूसरा सिरा जल से भरे घड़े के ऊपर रखे हुए मिट्टी के पात्र में लगा देना चाहिए। तब पसीना और धूप की गर्मी से व्याकुल अतएव ठण्डक चाहते हुए वे कीड़े कान के मार्ग से बाँस की नली में होकर ठंडे घड़े में गिर जायेंगे। इस प्रकार वह राजा महारोग से छुटकारा पा जायगा' ॥१४४-१४७॥ राक्षसी बच्चों को इस प्रकार कहकर चुप हो गई और उसी वृक्ष के खोखले में बैठी हुई कीर्तिसेना ने सब सुन लिया॥१४८॥ यह सुनकर वह सोचने लगी कि 'यदि मैं इस विपत्ति से बच गई तो जाते ही इस युक्ति से राजा को बचा लूँगी' ॥१४९॥ वह इस जंगल के किनारे रहकर बहुत कम मार्ग-शुल्क लेकर जंगल से जानेवालों की रक्षा करता है। इसी सुविधा के कारण सभी व्यापारी इसी मार्ग से आते-जाते हैं॥१५०॥ मृत समुद्रसेन ने भी कहा था कि मेरा पति इसी मार्ग से आवेगा॥१५१॥ इसलिए जंगल के किनारे वसुदत्तपुर को जाती हूँ और वहाँ राजा को नीरोग करके पति के आगमन की प्रतीक्षा करती हूँ ॥१५२॥ ऐसा सोचते हुए उसने कठिनाई से वह रात व्यतीत की। प्रातःकाल राक्षसी के चले जाने पर वह खोखले से बाहर निकली॥१५३॥ पुरुष-वेष धारण करके जंगल के मध्य से जाती हुई उसने अपराह्न में एक ग्वाले को देखा॥१५४॥ एक ओर उसकी सुकुमारता और दूसरी ओर लम्बे और बीहड़ जगली मार्ग को देखकर दयार्द्र होते हुए ग्वाले से कीर्तिसेना ने पूछा—'बताओ यह कौन-सा देश है? ॥१५५॥ ग्वाले ने कहा—'यह राजा वसुदत्त का वसुदत्तपुर है जो सामने दीख रहा है॥१५६॥ यहाँ का राजा भी रुग्ण है और मरणासन्न है। यह सुनकर कीर्तिसेना ने कहा—'यदि मुझे कोई उस राजा के पास ले जावे तो मैं उसकी बीमारी दूर करना जानता हूँ ॥१५७-१५८॥ यह सुनकर ग्वाला बोला—मैं उसी नगर में जा रहा हूँ। तुम मेरे साथ आओ मैं तुम्हारे लिए यत्न करता हूँ ॥१५९॥

१७८ कथासरित्सागर

१७८ कथासरित्सागर तथेत्युक्तवतीं तां च कीर्तिसेनां तदैव सः। वसुदत्तपुरं गोपः पुंवेषां नयति स्म ताम्॥१६०॥ तच्च सत्रं यथावस्तु निवेद्यार्ताय तत्क्षणात्। प्रतीहाराय कल्याणलक्षणां तां समर्पयत्॥१६१॥ प्रतीहारोऽपि राजानं विज्ञप्यैव तदाज्ञया। प्रवेशयामास स तां तस्यान्तिकमनिन्दिताम्॥१६२॥ राजा च सोऽत्र रोगातंस्तां दृष्ट्वैवाद्भुताकृतिम्। आश्वस्तो वसुदत्तोऽभूद्वेत्स्यात्मैव हिताहितम्॥१६३॥ उवाच चैतां पुंवेषां यदिमामपनेष्यसि। रुजमेतत्प्रदास्यामि राज्यार्धं ते सुलक्षण॥१६४॥ जाने जहार पृष्ठा मे स्वप्ने स्त्री कृष्णकम्बलम्। तन्निश्चितमिमं रोगं हरिष्यसि ममामयम्॥१६५॥ तच्छ्रुत्वा कीर्तिसेना तं जगादाद्य दिनम् गतः। देव श्वस्तेऽपनेष्यामि रोगं मा स्माधृतिं कृथाः॥१६६॥ इत्युक्त्वा मूर्ध्नि राज्ञोऽस्य गव्यं घृतमवापयत्। तेन तस्याययौ निद्रा ययौ सा चातिवेदना॥१६७॥ भिषग्रूपेण देवोऽयं पुंमर्त्यैः कोऽप्युपागतः। इति सत्रं च तां सर्वे कीर्तिसेनां ततोऽस्तुवन्॥१६८॥ महादेवी च तैस्तैस्तामुपचारैरूपाचरत्। नक्तं वेश्म पृथक्चास्याः सवासीकमकल्पयत्॥१६९॥ अथापरेद्युर्मध्याह्ने मन्त्रिष्वन्तःपुरेषु च। पश्यत्सु तस्य भूपस्य कीर्तिसेना चकार सा॥१७०॥ शिरसः कर्णमार्गेण सार्धं शतपदीशतम्। राज्ञस्मुदितया पूर्वं युक्त्यात्यवभृतया तया॥१७१॥ स्थापयित्वा च घटके सा ताः शतपदीस्ततः। घृतक्षीरादिसेकेन च नृपं समतर्पयत्॥१७२॥ क्रमात्तस्मिन्समाश्वस्ते रोगमुक्ते महीपतौ। घटे तानुप्राजिनो दृष्ट्वा को न तत्र विसिस्मये॥१७३॥

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कीर्तिसेना ने कहा—'ठीक है।' तब वह ग्वाला पुरुष-वेशधारिणी कीर्तिसेना को वसुदत्त पुर में ले गया॥१६१॥ ग्वाले ने वहाँ जाकर दुःखित द्वारपाल से सब कुछ निवेदन किया और उस शुभलक्षणा को उसे सौंप दिया॥१६१॥ द्वारपाल ने भी राजा से निवेदन किया और उसकी आज्ञा से उस सर्वांगसुन्दरी को वह राजा के पास ले गया॥१६२॥ रोगाक्रान्त राजा वसुदत्त भी उस अद्भुत वैद्य को देखकर प्रसन्न और विश्वस्त हो गया॥१६३॥ 'यदि तुम मेरे इस रोग को दूर करोगे तो मैं तुम्हें इस राज्य का आधा भाग दे दूँगा॥१६४॥ स्वप्न में मैंने देखा है कि एक स्त्री मेरे शरीर पर से काला कम्बल हटा रही है। इससे समझता हूँ कि तुम निश्चय ही मेरी बीमारी दूर करोगे'॥१६५॥ यह सुनकर कीर्तिसेना कहने लगी—'राजन् आज तो दिन चला गया। अतः कल तुम्हारा रोग दूर करूँगा अधीर न होना'॥१६६॥ ऐसा कहकर उसने राजा के सिर पर गाय का घी मलवाया उससे उसे नींद आ गई और तीव्र वेदना कम हो गई॥१६७॥ 'वैद्य के रूप में यह कोई देवता आया है'—इस प्रकार कहकर सभी राजपुरुष उसकी प्रशंसा करने लगे॥१६८॥ महारानी ने भी अनेक प्रकार से उसका स्वागत-सम्मान किया और रात को उस वैद्य के लिए पृथक् सोने का प्रबन्ध कर दिया॥१६९॥ दूसरे दिन मध्याह्न में मन्त्रियों और राजाओं के सामने ही रादासी से भुनी हुई उस आश्चर्यजनक युक्ति से कीर्तिसेना ने कान के मार्ग से सभी चोचरों या कनखजूरों को बाहर निकाल दिया और घी-दूध आदि से राजा को हृष्ट-पुष्ट बना दिया॥१७०-१७२॥ समग्र राजा के रोगमुक्त और स्वस्थ होने पर और घड़े में उन जीवों को देखकर किसे आश्चर्य नहीं हुआ? ॥१७३॥

कथासरित्सागर

कथासरित्सागर राजा च स विलोक्यैतान्कृमीन्मूर्धनिर्गतान् । सत्रास दध्यौ मुमुदे मेने जन्म निजं पुनः ॥१७४॥ कृतोत्सवश्च स स्नातः कीर्त्तिसेनांमपूजयत् । तामनादृतराज्यार्धां ग्रामहस्त्यश्वकाञ्चनैः ॥१७५॥ देवी च मन्त्रिणश्चैतां हेम्ना वस्त्रैरपूरयन् । प्रभुप्राणप्रदोऽस्माकं पूज्यो भिषगसाविति ॥१७६॥ सा च तस्यैव राज्ञस्तान् हस्तेऽर्प्यान्सम्प्रति न्यधात् । कञ्चित्कालं व्रतस्थोऽहमित्युक्त्वा भर्त्रपेक्षिणी ॥१७७॥ ततः सम्भाव्यमानात्र सर्वैः कान्यप्यहानि सा । यावत्पुरुपवनेन कीर्त्तिसेनावतिष्ठते ॥१७८॥ तावच्छश्राव लोकात्तं वल्लभीतः समागतम् । सार्थवाहं पथा तेन देवसेनं निजं पतिम् ॥१७९॥ पुरि सत्राष तं सार्थं प्राप्तं बुद्ध्वैव सान्त्वनात् । भर्त्तरि तमपश्यच्च मयूरीव नवाम्बुदम् ॥१८० ॥ क्लिन्नेनेव चिरोत्सुक्यसन्तापप्रविलायिना । दत्तानन्दवाष्पेण पादयोस्तस्य चापतत् ॥१८१॥ सोऽपि प्रत्यभ्यजानाच्च वेषच्छन्नां निरूप्य ताम् । भर्त्ता भास्करकरांकश्यां दिवा मूर्त्तिमिवैन्दवीम् ॥१८२॥ तस्य तद्वदनेन्दु च चन्द्रकान्तस्य पद्वतः । देवसेनस्य हृदयं चित्रं न गलति स्म यत् ॥१८३॥ अथास्यां कीर्त्तिसेनायामेवं प्रकटीतात्मनि । किमेतदिति साश्चर्य स्थिते तस्मिंश्च तत्पतौ ॥१८४॥ विस्मिते च वणिग्ग्रामे तद्बुद्ध्वैव सविस्मयः । स राजा वसुदत्तांश्च स्वयमेव किलाययौ ॥१८५॥ तत पृष्टा च सा कीर्त्तिसेना पत्युः पुरार्यविप्रम् । स्वश्वश्रूद्भवशिश्रोतान्तं स्ववृत्तान्तमवर्णयत् ॥१८६॥ देवसेनश्च तच्छ्रुत्वा तद्गतां स स्वमातरि । पराङ्मुखो भवतक्रोधशमाविष्मयपर्हुवान् ॥१८७॥ भर्तृभक्तिरपारण्डा धीर्महाद्भूतशिता । धर्मगारययः साध्व्या जयन्ति मतिहेतयः ॥१८८॥

षष्ठ लम्बक १८१

[Page Header] षष्ठ लम्बक १८१

[Text] राजा भी अपने मस्तक से निकले हुए उन कीड़ों को देखकर स्वस्थ हुआ-सा सोचने लगा और प्रसन्न हुआ। उसने अपना पुनर्जन्म माना ॥१७४॥ तदनन्तर उत्सव करके स्नान किये हुए राजा ने कीर्तिसेना की पूजा की। भेंट में आधा राज्य लेने से इन्कार कर देने पर कीर्तिसेना को राजा ने गाँव हाथी घोड़े और सोने आदि से सन्तुष्ट किया ॥१७५॥ महारानी और मन्त्रियों ने अपनी-अपनी ओर से स्वर्ण और वस्त्रों के उपहारों के ढेर लगा दिये क्योंकि वह उनके प्रभु को प्राणदान करनेवाला पूज्य वैद्य था ॥१७६॥ पति की प्रतीक्षा करती हुई कीर्तिसेना ने उनके दिए हुए उपहारों को उन्हें ही लौटाते हुए कहा कि मैं अभी व्रत में हूँ इसलिए अभी न लूँगी ॥१७७॥ इस प्रकार सभी से सम्मानित वह कीर्तिसेना पुरुष के वेष में कुछ समय तक वहीं ठहर गई ॥१७८॥ वहाँ ठहरे हुए उसने लोगों से सुना कि उसका पति व्यापारी देवसेन बल्भी से उसी मार्ग होकर आ गया ॥१७९॥ उस व्यापारिक-दल को नगरी में आया हुआ जानकर वह दल की ओर गई। मयूरी जैसे मेघ को देखती है, उसी प्रकार उसने उस दल में अपने पति को देखा ॥१८०॥ चिरकालीन उत्कण्ठा के मन्मथ से गिरते हुए आँसुओं का अर्घ्य देकर वह पति के चरणों में गिर पड़ी ॥१८१॥ उस (पति) ने भी उसे देखा और पुरुष के वेष में छिपी हुई उसे उसी प्रकार पहचाना जिस प्रकार चन्द्रमा दिन में सूर्य की किरणों से दृष्टिगोचर होता है ॥१८२॥ कीर्तिसेना के मुखचन्द्र को देखकर चन्द्रकान्त के समान देवसेन का हृदय पिघल नहीं गया यही आश्चर्य है ॥१८३॥ तदनन्तर कीर्तिसेना के इस प्रकार स्वरूप को प्रकट कर देने पर उसके पतिदेव देवसेन के आश्चर्य-चकित हो जाने पर और व्यापारियों के दल के भी यह जानकर विस्मित हो जाने पर सहित राजा बहुदल भी नृत्य करने सा लगा ॥१८४-१८५॥ राजा से पूछी गई कीर्तिसेना ने पति के सामने ही सास की दुश्चरित्रता के अपने सारे वृत्तान्त को कह सुनाया ॥१८६॥ उधर पति देवसेन यह सब सुनकर क्रोध आश्चर्य तथा विस्मय और हर्ष से भरा हुआ अपनी भार्या से लिपट गया ॥१८७॥ जिसने पतिव्रत-रूपी रक्षा कर रखी हुई शक्ति रूपी कलत्र में गुण एवं धर्म-रूपी रत्नों के भण्डारे कीर्तिसेना रूप में स्थित प्राप्त करली ॥१८८॥ २४

१८२ कथासरित्सागर

१८२ कथासरित्सागर इति तत्र मिथोऽवादीदाकर्ण्य तदद्भुतम्। चरितं कीर्तिसेनायाः सानन्दः सकलो जनः ॥१८९॥ राजाप्युवाच पत्यर्थमायितक्लेशयानया। सीतादेव्यपि रामस्य परिक्लेदावहा जिता ॥१९०॥ तत्सा धर्मभगिनी मम प्राणप्रदायिनी। इत्युक्तवन्तं तं भूपं कीर्तिसेनाथ चाब्रवीत् ॥१९१॥ देव त्वत्प्रीतिदायो यस्तव हस्ते मम स्थितः। ग्रामहस्त्यश्वरत्नादिः स मे भर्त्रे समर्प्यताम् ॥१९२॥ एवमुक्तस्तया राजा दत्वा ग्रामादि तस्य तत्। तद्भर्तुर्देवसेनस्य प्रीतः पट्टं बबन्ध सः ॥१९३॥ अथ नरपतिदत्तसर्वणिन्याजिताैध प्रसभभरितकोपो देवसेनो धनाद्यैः। परिवृतजननीकः संस्तुवन् कीर्तिसेनां कृतवसतिरमुष्मिन्नेव तस्थौ पुरे सः ॥१९४॥ मुदितमपगतपापदवधुकं कीर्तिसेना- व्यसमचरितकथ्यख्यातिरासाध तत्र। न्यवसत्सिसभोगैश्वर्यभागान्तिकस्था मुक्कतफलसमृद्धिर्देवदेव भर्तुः ॥१९५॥ एवं विपत्सु विधुरस्य विधेर्नियोग मापत्सु रक्षितचरित्रधना हि साध्यः। गुप्ताः स्वसत्वविभवेन महत्सनेन कल्याणमादधति पत्युरथारमनश्च ॥१९६॥ इत्थं च पार्थिवकुमारि भवन्ति दोषा- श्वश्रूननान्दृविहिता बहवो वधूनाम्। तद्भर्तृवेश्म तव तावदधर्मयेद्ध्वं श्वश्रूर्न यत्र न च यत्र शठा ननान्दा ॥१९७॥ इतीवमानन्दिकमाद्भुतं सा मुक्ताश्रितम्पासुरराजपुत्र्या। सोमप्रभाया मनुजेन्द्रपुत्री कलिङ्गसेना परितुष्यति स्म ॥१९८॥ ततो विचित्नार्थकथावसानं दृष्ट्वैव गन्तुं मिहिरे प्रवृत्ते। सोत्कां समालिङ्ग्य कलिङ्गसेना सोमप्रभा स्वं भवनं जगाम ॥१९९॥ इति महाकविश्रीसोमदेवेनभट्टविरचिते कथासरित्सागरे मदनमञ्चकालम्बके तृतीयस्तरङ्गः।

षष्ठ लम्बक १६३

षष्ठ लम्बक १६३ वहाँ एकत्र सभी जन इस अद्भुत रहस्य को जानकर आनन्द से इस प्रकार कहने लगे ॥१८९॥ राजा ने भी कहा—'इसने पति के लिए इतना कष्ट उठानेवाली सीतादेवी को भी जीत किया ॥१९०॥ इसलिए मुझे प्राणदान देनेवाली यह मेरी धर्म-बहिन है। इस प्रकार कहते हुए राजा से कीर्तिसेना कहने लगी—॥१९१॥ 'महाराज आप द्वारा दिया गया जो प्रमोपहार गाँव हाथी आदि आपके हाथ मेरा है, यह सब आप मेरे पति को दे दें। राजा ने भी प्रसन्न होकर देवसेन का पट्ट बन्धन किया ॥१९२ १९३॥ तदनन्तर वह देवसेन राजा द्वारा दिये हुए और व्यापार द्वारा अर्जित धनराशि से धनी होकर, अपनी माता को छोड़कर कीर्तिसेना की प्रशंसा करता हुआ उसी वसुदत्तपुर में रहने लगा ॥१९४॥ कीर्तिसेना अपने असाधारण चरित्र से प्रसिद्ध होकर अपने पति के पुण्य फलों की शरीर धारिणी मूर्ति के समान विपुल ऐश्वर्य का उपभोग करती हुई सास के दुःख से छूटकर, सुखपूर्वक रहने लगी ॥१९५॥ इस प्रकार विधि के भीषण विधानों को सहन करके आपत्ति-काल में भी अपने चरित्र-बल की रक्षा करनेवाली सच्चरित्र स्त्रियाँ अपने आत्मबल से रक्षित होकर अपना तथा अपने पति दोनों का कल्याण करती हैं॥१९६॥ इसलिए हे राजकुमारी सास और ननद के कारण स्त्रियों को ऐसी-ऐसी दुर्घटनाओं का लक्ष्य (शिकार) होना पड़ता है। इसलिए मैं तुम्हारे लिए ऐसा पतिगृह चाहती हूँ जहाँ पापिन सास और दुष्टा ननद न हों ॥१९७॥ असुरराज मयासुर की पुत्री सोमप्रभा के मुँह से इस ज्ञान रसायक अद्भुत कथा को सुनकर मनुजेन्द्रपुत्री कलिङ्गसेना अत्यन्त प्रसन्न हुई ॥१९८॥ इस प्रकार विचित्र कथा का अन्त देखकर ही मानों सूर्य भगवान् के अस्ताचल पर चले जाने पर, सोमप्रभा भी उत्कण्ठिता कलिङ्गसेना का आलिङ्गन करके अपने भवन को गई ॥१९९॥ तृतीय तरंग समाप्त

३८४ कथासरित्सागर

३८४ कथासरित्सागर

चतुस्त्रिंशस्तरङ्गः मदनवेगनाम्नो विद्याधरस्य कथा अथ स्वसद्म यातायाः पदव्यां मार्गमवेक्षितुम् । सोमप्रभायाः स्नेहेन मार्गहर्म्याग्रमास्थिताम् ॥१॥ कलिङ्गसेनामारक्तां ददर्श गगनागतः । दैवान्मदनवेगाख्यो युवा विद्याधराधिपः ॥२॥ स तां दृष्ट्वैव रूपेण जगत्त्रितयमोहिनीम् । क्षोभं जगाम कामेन्द्रजालिकस्येव पिच्छिकाम् ॥३॥ अलं विद्याधरस्त्रीभिः का कथाप्सरसामपि । यत्रेदृशमेतस्या मानुष्या रूपमद्भुतम् ॥४॥ तदेषा यदि मे न स्याद् भार्या किं जीवितेन तत् । कथं च मानुषीसङ्गं कुर्यां विद्याधरोऽपि सन् ॥५॥ इत्यालोच्य स दध्यौ च विद्यां प्रज्ञप्तिसञ्ज्ञिकाम् । सा चाविर्भूय साकारा तमेवमवदत्तदा ॥६॥ तत्त्वतो मानुषी नैवैषा शापच्युताप्सराः । जाता कलिङ्गदत्तस्य गृहे सुभग ! भूपतेः ॥७॥ इत्युक्ते विद्यया सोऽथ हृष्टो गत्वा स्वधामनि । विद्याधरोऽन्यविमुखः कामार्तः समचिन्तयत् ॥८॥ हठाद्यदि हराम्‍येतां तदेतन्मे न युज्यते । स्त्रीणां हठोपभोगे हि मम शापोऽस्ति मृत्युदः ॥९॥ तदेतत्प्राप्तये शम्भुराराध्यस्तपसा मया । तपोऽधीनानि हि श्रेयांस्युपायोऽन्यो न विद्यते ॥१०॥ इति निश्चित्य चान्येद्युर्गत्वा ऋष्यमपर्वतम् । एकपादस्थितस्तप्ते निराहारस्तपांसि सः ॥११॥ अथ तुष्टोऽचिरात्तीव्रैस्तपोभिर्वत्सदर्शनः । एवं मदनवेगं तमादिदेशाम्बिकापतिः ॥१२॥ एषा कलिङ्गसेनाख्या ख्याता रूपेण भूतले । कन्या नास्याश्च भर्त्तापि सदृशो रूपसम्पदा ॥१३॥ एकस्तु वत्सराजोऽस्ति स चैतामभिवाञ्छति । किं तु बान्धववशाया भीत्या प्रार्थयते स्फुटम् ॥१४॥

षष्ठ लम्बक | १४५

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चौथा तरंग मदनवेग विद्याधर की कथा

तदनन्तर अपने घर को गई हुई सोमप्रभा को पीछे की ओर से देखने के लिए, राजमार्ग के किनारे, अपने भवन की छत पर खड़ी कलिङ्गसेना को दैवयोग से समीप-स्थित मदनवेग नामक विद्याधरों के युवक सरदार ने देखा ॥१२॥ अपने अनुपम रूप से तीनों लोकों को जीतनेवाली कामरूपी ऐन्द्रजालिक की जादुई छड़ी के समान उस कलिङ्गसेना के रूप को देखकर मदनवेग स्तब्ध हो गया ॥१३॥ जहाँ मानव कन्या का ऐसा रूप है, वहाँ विद्याधरियों और अप्सराओं की क्या कथा ॥१४॥ अतः यदि वह मेरी स्त्री न हुई, तो मेरे जीवन से क्या लाभ ? किन्तु मैं विद्याधर होकर मानवी का संग कैसे कर सकता हूँ ॥१५॥ ऐसा सोचकर उसने प्रज्ञप्ति नामक विद्या का ध्यान किया। वह विद्या मूर्तीव उपस्थित होकर मदनवेग से इस प्रकार कहने लगी- ॥१६॥ 'वास्तव में यह कन्या मानुषी नहीं है। यह शापच्युत अप्सरा है, जो राजा कलिङ्गसेन के यहाँ उत्पन्न हुई है ॥१७॥ ऐसा सुनकर मदनवेग अपने घर गया और सब कार्यों से विरक्त होकर काम-पीड़ित हो सोचने लगा ॥१८॥ यदि मैं इसका स्वेच्छापूर्वक अपहरण करूँ तो यह मेरे लिए उचित नहीं है। प्रच्छन्नरूप स्त्रियों का हरण करना यश-मृत्यु कहलाता है यह शास्त्र-मत मिला है ॥१९॥ अतः इसकी प्राप्ति के लिए मुझे शिवजी की आराधना करनी चाहिए क्योंकि कल्याण शिव के अधीन होता है और दूसरा कोई उपाय नहीं ॥२०॥ ऐसा निश्चय करके वह दूर स्थित आश्रम पर्वत पर जाकर एक पैर से खड़े होकर और निराहार रहकर तप करने लगा ॥२१॥ तदनन्तर शीघ्र ही उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर और रूप देकर शिवजी मदनवेग से इस प्रकार कहने लगे- ॥२२॥ 'यह कलिङ्गसेना मेरी पत्नी के अर्थी वत्सराज के लिए नियत है। इसके पूर्व भी अन्यजन्मान्तर में इसने मन्दिर से राजा... ॥२३॥ यह कन्या देव का राजा उत्पन्न करने के वर इसे बताया है। किन्तु उस वरदानकी अन्यत्र रूप के वर में नष्ट कर के दूर कभी होगा ॥२४॥

१८६ कथासरित्सागर

१८६ कथासरित्सागर एषापि रूपरुचा तं श्रुत्वा सोमप्रमामुखात् । स्वयंवराय वत्सेशं राजपुत्र्यभिवाञ्छति ॥१५॥ तत्र यावद्विवाहोऽस्या न भवस्तावदन्तरम् । कृत्वा कामासहस्यथ रूपं वत्सेश्वरस्य तत् ॥१६॥ गत्वा गान्धर्वविधिना भार्या कुर्याद् भवानिमाम् । एवं कलिङ्गसेनासौ तव सत्येति सुन्दरी ॥१७॥ इत्यादिष्टः स राज्ञेन प्रणिपत्याथ तं ययौ । गृहं मन्मथवेगः स्वं काञ्चनगिरेस्तटम् ॥१८॥ अत्रान्तरे प्रतिदिनं गच्छन्त्या निजमन्दिरम् । प्रतिप्रभातमायान्त्या यन्त्रेण व्योमगामिना ॥१९॥ तया तक्षशिलापुर्यां सा सोमप्रभया सह । कलिङ्गसेना क्रीडन्ती तां जगादैकां रहः ॥२०॥ सखि वाच्यं न कस्यापि त्वया यत्ते ब्रवीम्यहम् । विवाहो मम सम्प्राप्त इति जाने यत शृणु ॥२१॥ इह मां याचितुं दूता प्रेषिता बहुभिर्नृपैः । ते च तातेन सङ्गत्य तथैव प्रेषिता इतः ॥२२॥ यस्तु प्रसनजिन्नाम श्रावस्त्यामस्ति भूपतिः । तदीयः केवलं दूतः सादरं तेन सत्कृतः ॥२३॥ मन्निमित्तं चान्बधाय्यैतत्तमन्वे मङ्गलं नृपः । स तावस्य वयाम्बायाः कुलीन इति सम्मतः ॥२४॥ स हि तत्र कुले जातो यत्राम्बाम्बालिकात्रिकाः । पितामह्याः कुरुणां च पाण्डवानां च जज्ञिरे ॥२५॥ तत्प्रसेनजिते तस्मै सखि दत्तास्मि साम्प्रतम् । तातेन राज्ञे श्रावस्त्यां नगर्यामिति निश्चयः ॥२६॥ एतत्कलिङ्गसेनायाः श्रुत्वा सोमप्रभा शुचा । मुञ्चन्तीबाष्प हारं सद्यो धारायुपाऽपतत् ॥२७॥ जगाद चैतां पृच्छन्तीं वयस्यामश्रुकारणम् । दृष्टनिक्षेपभूलोका सा मयासुरपुत्रिका ॥२८॥ वरो रूपं कुलं शीलं वित्तं चेति वरस्य यत् । मुख्यं सखि तदार्थं वयोवर्णादिकं तत ॥२९॥

षष्ठ लम्बक १८७

षष्ठ लम्बक १८७ सौन्दर्य की शोभिन यह कलिङ्गसेना भी सोमप्रभा के मुख से वत्सराज की रूप प्रशंसा सुनकर उसे स्वय वरण करना चाहती है॥१५॥ इसलिए जब तक इसका विवाह नहीं होता इसी बीच शीघ्रता करते हुए तुम वत्सराज का रूप बनाकर इससे गांधर्व विवाह कर लो। 'इस प्रकार सुन्दरी कलिङ्गसेना तुम्हारी हो जायगी' ॥१६-१७॥ शिवजी से ऐसा आदेश पाकर और उन्हें प्रणाम करके मदनवेग कालकूट पर्वत पर, अपने घर, चला गया॥१८॥ इसी बीच प्रतिदिन यन्त्रचालित वायुयान से रात को अपने घर आती हुई और प्रातःकाल उज्जयिनी आती हुई और खेलती हुई सोमप्रभा से कलिङ्गसेना ने एकबार कहा॥१९-२०॥ कलिङ्गसेना के विवाह की कथा 'सखि ! मैं तुमसे जो कहती हूँ वह किसी से कहना नहीं। मैंने सुना है कि मेरे विवाह का समय आ गया है। मुझ माँगने के लिए अनेक राजाओं ने दूत भेजे हैं। किन्तु, मेरे पिता ने उन्हें वहाँ से लौटा दिया है॥२१-२२॥ किन्तु श्रावस्ती नगरी का राजा प्रसेनजित् है। केवल उसी के दूत को मेरे पिता ने विशेष रूप से सत्कृत किया ॥२३॥ मेरी माता से भी सम्मति कर ली है। कुलीन होने के कारण वह मेरे माता-पिता को सम्मत है॥२४॥ वह उस कुल में उत्पन्न हुआ है जिसमें कौरवों और पांडवों की अम्बा अम्बालिका आदि दादियाँ उत्पन्न हुईं ॥२५॥ हे सखि इस समय मुझे पिता ने श्रावस्ती नगरी में उस प्रसेनजित् को ही दे दिया है ॥२६॥ कलिङ्गसेना से यह सुनकर सोमप्रभा आँसुओं का हार बनाती हुई रोने लगी ॥२७॥ सखी के रोने का क रण पूछने पर समस्तभूलोक को देखती हुई सोमप्रभा कहने लगी-॥२८॥ अवस्था रूप कुल चरित्र आदि जो वर में ढूँढे जाते हैं, उनमें सर्वप्रथम अवस्था ही है। वंश आदि उसके बाद की गिनती में किये जाते हैं ॥२९॥

१८८ कथासरित्सागर

१८८ कथासरित्सागर प्रसेनजिच्च प्रवया स दृष्टो नृपतिर्मया। जातीपुष्पस्य जात्येव जीर्णस्यास्य कुलेन किम् ॥३०॥ हिमशुभ्रेण तेन त्व हेमन्तेनेव पद्मिनी। परिम्लानाम्बुजमुखी युक्त्त्या शाष्या भविष्यसि ॥३१॥ अतो जातो विषादो मे प्रहर्षस्तु भवेन्मम। यदि स्याद् वत्सराजस्ते कल्याण्युदयन पति ॥३२॥ तस्य नास्ति हि रूपेण लावण्येन कुलेन च। शौर्येण च विभूत्या च तुल्योऽन्यो नृपतिर्भुवि ॥३३॥ तेन चेद्युज्यसे भर्त्रा सदृशेन कृशोदरि। धातु फलति लावण्यनिर्माणं तदिदं त्वयि ॥३४॥ इति सोमप्रभाक्ॢप्तैर्वाक्यैम्र्मैन्त्रैरिवेरितम्। ययौ कलिङ्गसेनाया मनो वत्सेश्वर प्रति ॥३५॥ ततश्च सा तां पप्रच्छ राजकन्या समारमजाम्। कथं स वत्सराजाख्य सखि किं वंशसम्भवः ॥३६॥ कथं चोदयनो नाम्ना त्वया मे कथ्यतामिति। साथ सोमप्रभावादीच्छृणु तत्सखि वच्मि ते ॥३७॥ वत्स इत्यस्ति विख्यातो देशो भूमेर्विभूषणम्। पुरी तत्रास्ति कौशाम्बी द्वितीयेवामरावती ॥३८॥ तस्यां स कुरुते राज्य यतो वत्सेश्वरस्ततः। वंश च तस्य कल्याणि कीर्त्यमानं मया शृणु ॥३९॥ पाण्डवस्यार्जुनस्याभूदभिमन्युः किलात्मजः। चक्रव्यूहभिदा येन नीता कुरुचमू क्षयम् ॥४०॥ तस्मात्परीक्षिदभवद्राजा भरतवंशभृत्। सर्पसत्रप्रणेताभूत्ततोऽपि जनमेजयः ॥४१॥ ततोऽभवच्छतानीकः कौशाम्बीमप्युवास सः। यश्च देवासुररणे दैत्यान्हत्वा व्यपद्यत ॥४२॥ तस्माद्राजा जगद्धाता सहस्रानीक इत्यभूत्। यः पात्रेणेवितरमो दिवि चक्रे गतागतम् ॥४३॥ तस्य देव्यां मृगावत्यामसाबुदयनोऽजनि। भूषणं धतिनो वंशे जगन्नेत्रोत्सवो नृपः ॥४४॥

षष्ठ लम्बक १८९

षष्ठ लम्बक १८९ राजा प्रगतजित् को मैंने देखा है। वह वृद्ध है। मरप्राय हुए जाती (मालती) के पुष्प के समान उस वृद्ध की जाति या कुल से क्या करना है ॥३१॥ हिम के समान श्वेत उस वृद्ध के संसर्ग मलिन मुखवाली तू ऐसी लगेगी जैसे हेमन्त में हिम से मारी हुई कमलिनी शोचनीय हो जाती है ॥३२॥ इसलिए सब गए हुआ। प्रसन्नता तो तब हो जब हे कल्याणि वस्सराज उदयन तेरा पति हो ॥३३॥ रूप से लावण्य से कुल से शौर्य से और ऐश्वर्य से उनके समान पृथ्वी पर दूसरा राजा नहीं है ॥३३॥ हे पुत्रक! कमलनाक्षी यदि तू अपने समान उस पति से युक्त हो जाय तो विधाता का तुझमें सौन्दर्य उत्पन्न करना सफल हो जाय' ॥३४॥ इस प्रकार सोमप्रभा के यन्त्रों के समान वाक्यों से प्रेरित कलिंगसेना का मन वत्सेश्वर पर चला गया ॥३५॥ तब राजकन्या ने सोमप्रभा से पूछा— सखि वह वत्सराज किस वंश में उत्पन्न हुआ है और उसका नाम उदयन कैसे हुआ ? तब सोमप्रभा बोली— सखि कहती हूँ सुनो' ॥३६–३७॥ वत्सराज की संक्षिप्त कथा इस भूमि का भूषण वत्स नाम का देश है। उसमें दूसरी इन्द्रपुरी के समान कौशाम्बी नाम की नगरी है ॥३८॥ उस नगरी में वत्सेश्वर राज्य करता है। अब मैं उसके वंश का वर्णन करती हूँ सुनो ॥३९॥ पाण्डु के पुत्र अर्जुन का लड़का अभिमन्यु हुआ। चक्रव्यूह का भेदन करनेवाले जिस अभिमन्यु ने कौरवों की सेना का संहार किया था ॥४०॥ उस अभिमन्यु द्वारा भरत-वंश को चलानेवाला परीक्षित नाम का पुत्र उत्पन्न हुआ। परीक्षित् से सर्पसत्र (नागयज्ञ) करनेवाला पुत्र राजा जनमेजय हुआ। जनमेजय से शतानीक नाम का राजा हुआ जिसने कौशाम्बी को अपनी राजधानी बनाया और जो देवासुर-संग्राम में दैत्यों को मारता हुआ स्वयं भी मारा गया ॥४१ ४२॥ उस शतानीक से संसार में प्रशंसनीय सहस्रानीक नाम का राजा हुआ जो इन्द्र के रथ भेजने पर भूमि से स्वर्ग में यातायात किया करता था ॥४३॥ उस सहस्रानीक की रानी मृगावती के गर्भ से उदयन नाम का कुलभूषण और संसार की आँखों को आनन्द देनेवाला राजा हुआ ॥४४॥ ८७

६२ कथासरित्सागर

६२ कथासरित्सागर नाम्नो निमित्तमप्यस्य शृणु सा हि मृगावती। अन्तर्वत्नी सती राज्ञो जनन्यस्य सजन्मना ॥४५॥ उत्पन्नरुधिरस्नानदोहदा पापभीरुणा। भर्त्रा रचितलाक्षादिरसवापीकृताप्लवा ॥४६॥ पक्षिणा तार्क्ष्यवंश्येन निपतत्यामिषक्षुधया। नीत्वा विधिवशात्त्यक्ता जीवन्त्येवोदयाचले ॥४७॥ तत्र चाश्वासिता भूयो भर्तृसङ्गमवादिना। जमदग्न्यर्षिणा दृष्टा स्थितासौ तत्र चाश्रमे ॥४८॥ अवज्ञाजनितैर्ष्यायाः कश्चित्काल हि तादृशः। शापस्तिलोत्तमातोऽभूत्तद्भर्तुस्तद्वियोगकृत् ॥४९॥ दिवसे सा च तत्रैव जमदग्न्याश्रमे सुतम्। उदयाद्रौ प्रसूते स्म द्यौरिन्दुमिव नूतनम् ॥५०॥ असावदमनो जात सार्वभौमो महीपतिः। जनिष्यते च पुत्रोऽस्य सर्वविद्याधराधिपः ॥५१॥ इत्युच्चार्याम्बराद् वाणीमशरीरां तदा सुखम्। प्रागोदयन इत्यस्य देवैरुदयजं कृतम् ॥५२॥ सोऽपि शापान्तबद्ध्याशः काल मात्रस्थितोधितः। कृच्छ्रात् सहस्रानीकस्तां विनानेपीन्मृगावतीम् ॥५३॥ प्राप्ते शापावसाने तु शबराद् विधियोगतः। उदयाद्रेश्रपायातात् प्राप्याभिज्ञानमात्मनः ॥५४॥ आवेदितार्थस्तत्पाल गगनोद्भूतया गिरा। दावरं तं पुरस्कृत्य जगामेवोद्याश्रमम् ॥५५॥ तत्र वाञ्छितमसिद्धिमिव प्राप्य मृगावतीम्। भार्यामुदयनं तं च मनोरथमिवात्मजम् ॥५६॥ तौ गृहीत्वाय कौशाम्बीमागत्यैवाभिपिञ्चतान्। यौवराज्ये तनूजं सं तद्गुणोत्कषतोषितः ॥५७॥ योगंधरायणादींश्च तस्मै मन्त्रिसुतान् ददौ। तेनाप्तभागे शुशुभे भोगा भार्यामिवस्थिरम् ॥५८॥ आत्मारराज्यं राज्यं च तमवान्यनं सुतम्। शुद्धं स भार्यागच्छित्वा ययौ राजा महापथम् ॥५९॥