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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

षष्ठ लम्बक ७५७

षष्ठ लम्बक ७५७ मन्त्री यौगन्धरायण का राजनीतिक प्रपञ्च (चालू) अतः यदि तुमने कलिङ्गसेना का परिणय किया तो वासवदत्ता अवश्य प्राण-त्याग क्रमशः कर देगी इसमें संदेह नहीं ॥७६॥ रानी पद्मावती भी इसी प्रकार प्राण त्याग देगी क्योंकि दोनों एक प्राण हैं। ऐसी स्थिति में तुम्हारे पुत्र नरवाहनदत्त की क्या स्थिति होगी ? ॥७७॥ यह सब अनर्थ आपका हृदय सहन कर सकेगा या नहीं यह मैं नहीं जानता किन्तु यह सब एक बार में ही नष्ट हो जायगा ॥७८॥ दोनों रानियों की बातों में जो गम्भीरता है वह इस बात की ओर स्पष्ट इंगित करती है कि उनका जीवन प्राण-त्याग के दृढ़ निश्चय से निःस्पृह है। जो भी हो तुम्हें अपने स्वार्थ की रक्षा करनी चाहिए यह बात तो पशु-पक्षी भी जानते हैं फिर आपके ऐसे बुद्धिमानों की बात ही क्या है ॥७९-८०॥ मन्त्रिश्रेष्ठ यौगन्धरायण से इस प्रकार सुनकर भली भाँति विचार-विमर्श करके वत्सेश्वर ने कहा—॥८१॥ 'ठीक है इसमें सन्देह नहीं कि इस प्रकार मेरा सारा संसार ही नष्ट हो जायगा। इसलिए अब कलिङ्गसेना के परिणय से मेरा कोई प्रयोजन नहीं ॥८२॥ गणकों (ज्योतिषियों) ने भी लग्न का दूर समय देकर अच्छा ही किया। स्वयंवरा स्त्री का त्याग करने से ही इतना अभय होगा' ॥८३॥ वत्सराज के इस प्रकार कहने पर प्रसन्न हुए यौगन्धरायण ने सोचा कि कार्य तो जैसा हम चाहते थे वैसा सिद्ध हो गया। उपाय-रूपी जल से सींची हुई और देश-काल के अनुसार बढ़ी हुई नीति-रूपी यह लता समय पर फल क्यों न देगी ? ॥८४-८५॥ ऐसा सोचकर और देश-काल का ध्यान करता हुआ मन्त्री राजा को प्रणाम करता हुआ घर चला गया ॥८६॥ राजा भी कृत्रिम शिष्टाचार से अपने भाव को छिपाते हुए रानी वासवदत्ता को सान्त्वना देता हुआ कहने लगा—॥८७॥ 'हे मृगनयने मैं किसलिए कह रहा हूँ यह तुम जानती हो ? कमल के लिए जल के समान तुम्हारा प्रेम ही मेरा जीवन है ॥८८॥ मैं किसी दूसरी स्त्री का नाम लेने का भी साहस नहीं करता। किन्तु कलिङ्गसेना तो हठ- पूर्वक मेरे घर आ गई ॥८९॥

७५८ कथासरित्सागर

७५८ कथासरित्सागर प्रसिद्धं भ्राम मद्गम्भा तपःस्थेन निराकृता। पार्थेन षण्ढताशापं ददौ तस्यै रुष्टागता ॥९०॥ स शापस्तिष्ठता तेन वर्षे वैराटवेश्मनि। स्त्रीवेषेण महाश्चर्यरूपेणाप्यतिवाहितः ॥९१॥ अत कलिङ्गसेनापा निषिद्धा न तदा मया। विना स्वदिच्छयाह सु न किञ्चिद् वक्तुमुत्सहे ॥९२॥ इत्याश्वास्योपसङ्गम्याथ हृदयेनेव रागिणा। मुखार्पितेन मद्येन सत्यं नूनं सवाद्ययम् ॥९३॥ तयैव सह रात्रि तां राज्ञा वासभवसया। मधिमुख्यमतिप्रीतिदुष्टो वत्सेश्वरोऽवसत् ॥९४॥ अत्रान्तरे च य पूर्व दिवारात्रौ प्रयुक्तवान्। कलिङ्गसेनावृत्तान्तमपश्यं योगन्धरयणः ॥९५॥ स ब्रह्मराक्षसोऽभ्येत्य सहूद्यागेश्वराभिधः। तस्यामेव निशि स्वैरं तं मन्त्रिवरमम्यभात् ॥९६॥ कलिङ्गसेगासदने स्थितोऽस्म्यन्तर्धहि सदा। दिव्यानां मानुषाणां वा पश्यामि न समागमम् ॥९७॥ अद्याभ्यस्तो मया कश्च धूतोऽकस्मात्नभस्तले। प्रच्छन्नेनात्र हर्म्याग्रसन्निकर्षे निशामुखे ॥९८॥ प्रभावं तस्य विज्ञातु प्रयुक्तापि तदा मम। विद्या न प्राभवत्तेन विमुद्याहमचिन्तयम् ॥९९॥ अय दिव्यप्रभावस्य कस्य कस्यापि निश्चितम्। कलिङ्गसेनाभावव्यालुब्धस्य भ्रमतोऽम्बरे ॥१००॥ येन न गम्यते विद्या तद्वीक्षे किञ्चिदन्तरम्। न दुष्प्रापं परच्छिद्रं जाग्रद्भिर्निपुणैर्येस ॥१०१॥ दिव्यानां नान्तिछुतैरपि प्रोक्तं मन्त्रिवरेण च। सोमप्रभा सखी याम्या वदन्त्येतन्मया श्रुता ॥१०२॥ इति निश्चित्य तत्तुभ्यमिहाहं वक्तुमागतः। इदं प्रमन्तात्पृच्छामि तन्मे तावत्ख्याप्यताम् ॥१०३॥ सिद्ध्यन्तोऽपि हि शंसन्ति स्यात्मानमिति यद्वथा। उक्तो राजा तदर्थोप योगादहमुपस्थित ॥१०४॥

षष्ठ लम्बक ७५९

षष्ठ लम्बक ७५९ यह बात प्रसिद्ध है कि तपस्या में बैठे हुए अर्जुन ने हठपूर्वक आई हुई रम्भा को दूर कर दिया था और उसने अर्जुन को षण्ढ (नपुंसक) होने का शाप दिया था ॥९१॥ उस शाप के समय को अर्जुन ने आश्चर्यमय रूप से स्त्रीवेष धारण करके विराट् के भवन में व्यतीत किया था ॥९२॥ इसीलिए मैंने उसी समय कलिङ्गसेना का निषेध नहीं किया क्योंकि तुम्हारी इच्छा के बिना कुछ भी कहने का साहस नहीं कर सकता' ॥९२॥ इस प्रकार आश्वासन देकर मानो प्रेमपूर्ण हृदय के समान उसके मुंह में लगाये हुए मद्य से उसके दृष्ट भाव को समझकर मुख्यमन्त्री की प्रौढ़ बुद्धि से सन्तुष्ट राजा उस दिन रात को वासवदत्ता के साथ वहीं रह गया ॥९३-९४॥ इसी बीच यौगन्धरायण ने कलिङ्गसेना का समाचार जानने के लिए जिसे दिन-रात के लिए नियुक्त किया था वह योगेश्वर नाम का ब्रह्मराक्षस उसी रात को यौगन्धरायण के पास आया और कहने लगा— मैं कलिङ्गसेना के भवन में बाहर और भीतर सदा उपस्थित रहता हूँ किन्तु वहाँ दिव्य या मानव किसी भी व्यक्ति का आगमन मैंने नहीं देखा ॥९५-९७॥ आज छिपे हुए मैंने भवन की ऊपरी छत के पास सायंकाल के समय आकाश में अकस्मात् शब्द सुना ॥९८॥ उस शब्द की उत्पत्ति का स्थान जानने के लिए मैंने अपनी विद्या का प्रयोग भी किया किन्तु विद्या का कुछ प्रभाव न देखकर मैंने सोचा कि निश्चय ही कलिङ्गसेना के लावण्यलोभी किसी दिव्य प्रभाववाले आकाशचारी व्यक्ति का यह शब्द है ॥ ९९ ॥ इसीलिए मेरी विद्या काम नहीं कर रही है क्योंकि सावधान और चतुर व्यक्ति के लिए दूसरे का छिद्र दुष्प्राप्य नहीं होता ॥१००॥ यह कलिङ्गसेना दिव्य व्यक्तियों में चाही जा रही है यह बात (मन्त्रिवर) आपने भी कही थी और मैंने भी उसकी सखी सोमप्रभा को ऐसा कहते हुए सुना है ॥१०१॥ ऐसा निश्चय करके मैं आपको कहने के लिए यहाँ आया हूँ और प्रसंगवश मैं यह पूछता हूँ बताइए ॥१०२॥ आपकी आज्ञा से यह कहते हुए मैंने छिपकर सुन लिया कि पद्मावती भी अपनी रक्षा करके ॥१०३॥

४६० कथासरित्सागर

४६० कथासरित्सागर निदर्शनं चेदत्रास्ति तन्मे कथय सम्मते। इति योगेश्वरेणोक्त स्माह यौगन्धरायणः ॥१०५॥ उत्सन्ननकुलमूषकमार्जारणां कथा अस्ति मित्र तथा चात्र कथामाख्यामि ते श्रृणु। विदिशानगरीबाह्ये न्यग्रोधोऽभूत्पुरा महान् ॥१०६॥ चत्वारः प्राणिनस्तत्र वसन्ति स्म महातरौ। नकुलालूकमार्जारमूषकाः पृथगालयाः ॥१०७॥ भिन्ने भिन्ने बिले मूल आस्तां नकुलमूषकौ। मार्जारो मध्यभागस्थे तरोर्महति कोटरे ॥१०८॥ उलूकस्तु शिरोभागे नान्यलभ्ये लतास्ये। मूषकोऽत्र त्रिभिर्वध्यो मार्जारिण त्रयोऽपरे ॥१०९॥ अभ्याय मार्जारभयान्मूषको नकुलस्तथा। स्वभावेनाप्युलूकश्च परिभ्रेमुर्निशि त्रयः ॥११०॥ मार्जारश्च दिवारात्रौ निर्भयः प्रभ्रमन्मसौ। तत्रासन्ने यवक्षेत्रे सदा मूषकलिप्सया ॥१११॥ येऽप्येऽपि युवतया जग्मुस्तत्स्वकालेऽन्नाभिवाञ्छया। एकदा लुब्धकस्तत्र चण्डालः कश्चिदाययौ ॥११२॥ स मार्जारपदश्रेणिं दृष्ट्वा तत्क्षेत्रगामिनीम्। तद्वधायामितः क्षेत्रं पाशान् वत्त्वा ततो ययौ ॥११३॥ तत्र रात्रौ च मार्जारः स मूषकजिघांसया। एत्य प्रविष्टस्तत्पाशैः क्षेत्रे तस्मिन्नबध्यत ॥११४॥ मूषकोऽपि ततोऽन्नार्थी स तत्र निभृतागतः। बद्धं तं वीक्ष्य मार्जारं जहर्ष च ननर्त च ॥११५॥ यावद् विशति तत्क्षेत्रं दूरादेवैष तर्र्तमा। तत्र तौ तावदायातावृलूकनकुलावपि ॥११६॥ दृष्टमार्जारबन्धौ च मूषकं लब्धुमैच्छताम्। मूषकोऽपि च तद्दृष्ट्वा दूराद् खिन्नो व्यचिन्तयत् ॥११७॥ नकुलोलूकभयदं मार्जारं सन्धये यदि। बद्धोऽप्येकप्रहारेण शत्रुममिमं मारयेत् ॥११८॥

दीप्तप्रसन्न ने कहा—'मित्र इसका उदाहरण है। सुनो इस विषय की एक कथा

षष्ठ स्तबक ७६१ इस विषय में कोई उदाहरण है तो मुझे बताइए। मोयोद्धर के इस प्रकार कहने पर दीप्तप्रसन्न ने कहा—'मित्र इसका उदाहरण है। सुनो इस विषय की एक कथा कहता हूँ॥१५॥

उल्लू, नेवला, बिल्ली और चूहे की कथा

प्राचीन समय में विदिशा नगरी के बाहर बहुत विशाल एक वटवृक्ष था॥१६॥ उस वृक्ष में नेवला, उल्लू, बिल्ली और चूहा ये चार प्राणी अपना पृथक्-पृथक् स्थान बनाकर रहते थे। वृक्ष की जड़ में पृथक्-पृथक् बिलों में चूहा और नेवला रहा करते तथा बिल्ली वृक्ष के बीच के एक कोटर (खोलसे) में और उल्लू सबसे ऊपर लता से घिरी हुई डाली में रहता था जहाँ किसी की पहुँच न थी। इनमें चूहा तीनों के लिए बध्य था और शेष तीनों बिल्ली के लिए बध्य थे॥१७-१९॥

उनमें चूहा और नेवला बिल्ली से भयभीत होकर अन्न के लिए तथा उल्लू स्वभाव से भोजन के लिए, ये तीनों ही रात में घूमा करते थे॥११॥ और बिल्ली निर्भय होकर दिन-रात चूहे की खोज में जौ के खेत में चक्कर लगाया करती थी॥१२१॥

एक बार जबकि भोजन की खोज में वन्य जानवर भी इधर-उधर गये हुए थे तब इसी पर वहाँ एक बहेलिया चांडाल आ गया॥१२२॥ वह वहाँ पर बिलाव (बिल्ली) के पैरों के चिह्नों को खेत की ओर जाते देखकर, खेत में चारों ओर जाल बाँधकर चला गया॥११३॥ उस खेत में रात को बिलाव चूहे को मारने की इच्छा से घुसा और वहीं वह जाल में फँस गया॥११४॥ अन्न खाने के लालच से धीरे-धीरे और चुपचाप चूहा भी उस खेत में आया और वहाँ बिलाव को बँधा देखकर प्रसन्न होकर नाचने लगा॥११५॥ जब चूहा एक मार्ग से उस खेत में घुसा तभी नेवला और उल्लू भी दूसरे मार्ग से उसी स्थान पर आ गये॥११६॥ बिलाव को बँधा देखकर वे दोनों चूहे को ढूंढने लगे। चूहा दूर से ही उनकी गतिविधि को देखकर घबराकर सोचने लगा—॥११७॥ 'यदि मैं नेवले और उल्लू को भय देनेवाला बिलाव का आश्रय (शरण) लूँ तो जाल में बँधा हुआ भी यह शत्रु मुझे एक ही प्रहार में मार देगा॥११८॥ ९६

७६२ कथासरित्सागर

७६२ कथासरित्सागर मार्जाराद्दूरगं हन्यादुलूको नकुलश्च माम्। तच्छत्रुसङ्कटगतः क्व गच्छामि करोमि किम् ॥११९॥ हन्त ! मार्जारमेवेह श्रयाम्यापद्गतो ह्ययम्। आत्मत्राणाय मां रक्षोत्पाशच्छेदोपयोगिनम् ॥१२०॥ इत्यालोच्य शनैर्गत्वा मार्जारं मूषकोऽब्रवीत्। बदे त्वम्ववितुर्श मे तत्ते पाशं छिनद्म्यहम् ॥१२१॥ ऋजूनां जायते स्नेहः सहवासाद्विपुष्वपि। किं तु मे नास्ति विश्वासस्तव चित्तमजानतः ॥१२२॥ तच्छ्रुत्वोवाच मार्जारो भद्र विश्वस्यतां मया। अद्य प्रभृति मे मित्रं भवान् प्राणप्रदायकः ॥१२३॥ इति श्रुत्वैव मार्जारातस्योत्सङ्गे स शिश्रिये। तद्दृष्ट्वा नकुलोलूकौ निराशौ ययतुस्ततः ॥१२४॥ ततो जगाद मार्जारो मूषकं पाशपीडितः। गतप्राया निशा मित्र ! तत्पाशाच्छिन्धि मे द्रुतम् ॥१२५॥ मूषकोऽपि शनैश्छिन्दल्लुब्धकागमनोन्मुखः। मुधा कटकटायद्भिर्दशनैरकरोद्चिरम् ॥१२६॥ क्षणान्नात्रौ प्रभातायां लुब्धके निकटमागते। मार्जारैर्दूर्यमाने द्राक्पाशांश्छिच्छेद मूषकः ॥१२७॥ छिन्नपाशोऽथ मार्जारे रभ्यस्त्रासविद्रुते। मूषको मृत्युमुक्तः सम्प्लाव्य प्राविशद् बिलम् ॥१२८॥ नावसत् पुनराहूतो मार्जारेण जगाद च। कालयुक्त्या ह्यरिर्मित्रं जायते न च सर्वदा ॥१२९॥ एवं बहुभ्यः शत्रुभ्यः प्रज्ञयात्माभिरक्षितः। मूषकेन तिरश्चापि किं पुनर्मानुषेषु यत् ॥१३०॥ एतदुक्तस्तदा राजा मया यत्तन्मया श्रुतम्। धृत्या कार्यं निजं रक्षेद्वेबीसरक्षणादिति ॥१३१॥ बुद्धिनां च सर्वत्र मुख्यं मित्रं न पीड्यम्। योगेश्वर तथा चैतामत्रापि त्वं कथां शृणु ॥१३२॥ १ इयं कथा महाभारतस्य शान्त्य पर्वणि पञ्च तन्त्र चोपलभ्यते।

पञ्च स्तबक ७६१ बिलाव से दूर रहने पर तो उल्लू और नवला दोनों ही मुझे मार देंगे। इसलिए इस प्रकार शत्रुओं के संकट में पड़ा हुआ मैं कहाँ जाऊँ ॥११०॥ अच्छा हो कि विपत्ति में पड़ा हुआ मैं बिलाव की ही शरण में जाऊँ। मुझे जाल काटने में ज्ञानी जानकर सम्भव है वह अपनी रक्षा के लिए मेरी भी रक्षा करे ॥११२ ॥ ऐसा सोचकर और धीरे-२ उसके पास जाकर चूहा उससे कहने लगा — तुम्हारे बंधन से मुझे अत्यन्त दुःख है। इसलिए मैं तुम्हारा जाल काटता हूँ ॥१२१॥ सरस व्यक्तियों का साथ रहने के कारण शत्रुओं पर भी प्रेम हो जाता है। किन्तु, तुम्हारे प्रेम को न जाननेवाले मुझे तुम पर विश्वास नहीं है ॥१२२॥ यह सुनकर बिलाव कहने लगा 'भद्र ! तुम्हें मुझ पर विश्वास करना चाहिए। आज से मेरे प्राण बचानेवाले तुम मेरे मित्र हुए ॥१२३॥ बिलाव से ऐसा सुनकर चूहा उसकी गोद में जा छिपा। यह देखकर उल्लू और नेवला दोनों निराश होकर वहाँ से चल गये ॥१२४॥ तब जाल से बँधा हुआ बिलाव चूहे से कहने लगा 'मित्र ! रात बीतती गई है। इसलिए मेरे बंधनों को शीघ्र काटो ॥१२५॥ बहेलिये के आने की उत्सुकता से प्रतीक्षा करता हुआ चूहा झूठे ही दाँत फटफटाता हुआ बन्धनों को काटने में विलम्ब करने लगा ॥१२६॥ प्रातःकाल होने और बहेलिये के निकट आ जाने पर और बिलाव के दीनतापूर्वक प्रार्थना करने पर, चूहे ने तुरन्त जाल के बंधन काट डाले ॥१२७॥ जाल काटने के पश्चात् बहेलिये के भय से बिल्ली के भाग जाने पर मृत्यु से छूटा हुआ चूहा भी भागकर बिल में घुस गया ॥१२८॥ बिलाव द्वारा फिर विश्वास दिलाकर बुलाने पर भी उसने उसका विश्वास नहीं किया और कहने लगा— 'समय आने पर ही शत्रु मित्र बनता है सदा नहीं ॥१२९॥ इस प्रकार चूहे ने और भी बहुत-से पशुओं ने अपने शत्रुओं से बुद्धिमानी के साथ आत्म रक्षा की मनुष्यों की तो बात ही क्या है ॥१३ ० ॥ जो तुमने मुझसे सुना है वही मुझसे कहा गया राजा अपनी बुद्धि से महारानी की रक्षा करते हुए अपने कार्य की भी रक्षा कर सकता है ॥१३१॥ बुद्धि ही सर्वत्र प्रधान मित्र है पुरुषार्थ नहीं। हे योगेश्वर ! इस कथा को भी सुनो ॥१३२। १ यह कथा महाभारत के १२वें पर्व में तथा पंचतंत्र में भी मिलती है।—अनु

श्रावस्तीत्यस्ति नगरी तस्यां पूर्वं प्रसेनजित्। राजाभूत्तत्र चाभ्यागात्कोऽप्यपूर्वो द्विजः पुरि॥१३३॥ सोऽशूद्राश्रमगुप्तेन धनिना गुणवानिति। ब्राह्मणस्य गृहे तत्र कस्यचित्स्थापितो द्विजः॥१३४॥ तत्रैव तेन शुष्कान्नदक्षिणादिभिरन्वहम्। आपूर्यत ततोऽन्यैश्च धनेर्वृद्ध्वा वणिग्वरैः॥१३५॥ तेनासौ हेमदीनारसहस्रं कृपणः क्रमात्। सञ्चित्य गत्वारण्ये तन्निखत्य क्षिप्तवान् भुवि॥१३६॥ एकाकी प्रत्यहं गत्वा तच्च स्थानमवैक्षत। एकदा हेमशून्यं तत्खातं व्यक्तं च दृष्टवान्॥१३७॥ शून्यं तत्खातकं तस्य पश्यतो हृतचेतसः। न परं हृदि संक्रान्ता चित्रं दिक्ष्वपि शून्यता॥१३८॥ अथोपागाच्च विलपंस्तं विप्रं यद्गृहे स्थितः। पृष्टस्तं च स्ववृत्तान्तं तस्मै सर्वं न्यवेदयत्॥१३९॥ गत्वा तीर्थमभुञ्जानः प्राणांस्त्यक्तुमियेय च। बुबुध्वा च सोऽन्नदातास्य वणिगन्यै सहायिनौ॥१४०॥ स तं जगाद किं ब्रह्मन् ! वित्तहेतोर्मुमूर्षसि। अकारुणेभवद् वित्तमकस्मादेति याति च॥१४१॥ इत्यायुक्तोऽपि तेनासौ न जहौ मरणग्रहम्। प्राणेभ्योऽप्यर्थमात्रा हि कृपणस्य गरीयसी॥१४२॥ ततश्च मृत्यवे तीर्थं गच्छतोऽस्य द्विजन्मनः। स्वयं प्रसेनजिद्राजा तद्बुद्धवान्तिकमाययौ॥१४३॥ पप्रच्छ चैनं किं किञ्चिद्वेत्सि तत्राप्तसंज्ञकम्। यत्र भूमौ निखातस्ते दीनारा ब्राह्मण! त्वया॥१४४॥ तच्छ्रुत्वा स द्विजोऽवादीदस्ति क्षुद्रोऽत्र पादपः। अटव्यां देव तन्मूले निखातं तन्मया धनम्॥१४५॥ इत्याकर्ण्याब्रवीद्राजा दास्याम्यन्विष्य तत्तव। धनं स्वकोषादथवा मा त्याक्षीर्जीवितं द्विज॥१४६॥ इत्युक्त्वा मरणोद्योगात्निवार्य विनिधाय च। द्विजं तं वणिजो हस्ते स राजाभ्यन्तरं ययौ॥१४७॥

षष्ठ लम्बक ७६५

षष्ठ लम्बक ७६५ श्रावस्ती नाम की एक नगरी है। उसमें पहले प्रसेनजित् नाम का राजा राज्य करता था। वहाँ एक बार एक कोई अनूक्त ब्राह्मण आया ॥१३३॥ वह शूद्र का अन्न नहीं खाता था। इसलिए एक वैश्य ने उसे तपस्वी समझकर किसी ब्राह्मण के घर ठहरा दिया ॥१३४॥ धीरे-धीरे उसकी प्रसिद्धि होने पर उस ब्राह्मण के घर को अन्यान्य वैश्यों ने मूले अन्न और धन से भरपूर कर दिया ॥१३५॥ उस संग्रह से उस कंजूस ब्राह्मण ने एक सहस्र मुद्राएँ एकत्र कर लीं और जङ्गल में जाकर भूमि खोदकर उन्हें गाड़ दिया ॥१३६॥ और, प्रतिदिन वहाँ अकेला जाकर उस स्थान को वह देख आता था। एक दिन उसने उस स्थान को खुदा हुआ और मुद्रारून्य पाया ॥१३७॥ उस गड्ढे को मुद्रा-रहित देखकर हताश उस ब्राह्मण के हृदय में ही नहीं प्रत्युत दिशाओं में भी शून्यता फैल गई अर्थात् उसे सभी ओर अँधेरा दीखने लगा ॥१३८॥ तदनन्तर रोता विलाप करता हुआ वह ब्राह्मण वहाँ आया जहाँ ठहरा हुआ था। वहाँ के गृहस्वामी ब्राह्मण द्वारा पूछे जाने पर अपना सारा वृत्तान्त उसे सुना दिया ॥१३९॥ और, वह अनशन करके तीर्थ में प्राण देने की इच्छा प्रकट करने लगा। यह जानकर वह उसका अन्नदाता वैश्य भी अन्य बनियों के साथ वहाँ आया ॥१४०॥ आकर उस ब्राह्मण से वह कहने लगा हे ब्रह्मन् ! धन के लिए क्या मरना चाहता है ? बलाहक-मेघ के समान धन आता है और चला जाता है ॥१४१॥ इस प्रकार अनेक बातों से सान्त्वना देने पर भी उस ब्राह्मण ने मरने का आग्रह न छोड़ा क्योंकि कंजूस के लिए धन की माया प्राणों से भी प्यारी और भारी होती है ॥१४२॥ तदनन्तर मरने के लिए तीर्थयात्रा करनेवाले उस ब्राह्मण को सुनकर प्रसेनजित् स्वयं उसके पास आया ॥१४३॥ और पूछा कि 'जहाँ तुमने मुहरें गाड़ी थीं वहाँ पर कोई चिह्न भी है' १४४॥ यह सुनकर उस ब्राह्मण ने कहा—'वहाँ पर एक छोटा-सा स्तूप (पेड़) है सम्भवत उसी की जड़ में मैंने वह धन गाड़ दिया था ॥१४५॥ यह सुनकर राजा ने उससे कहा—'मैं उस दैववश मुहरें दे दूंगा अथवा अपने कोष से तुम्हें दे दूंगा। इसलिए तुम प्राण न छोड़ो ॥१४६॥ ऐसा कहकर ब्राह्मण को मरने के प्रयत्न से रोककर और उस वैश्य के हाथ सौंपकर राजा अपने महल को चला गया ॥१४७॥

४६६ कथासरित्सागर

४६६ कथासरित्सागर तत्रादिश्य प्रतीहारं शिरोऽर्त्तिव्यपदेशतः । वैद्यानानाययत्सर्वान् दत्त्वा पटहघोषणाम् ॥१४८॥ आतुरास्ते कियन्तोऽत्र कस्यादः किं स्वमौषधम् । इत्युपानीय पप्रच्छ तानेकैकं विविक्तगः ॥१४९॥ तत्रेपि तस्म त्त्वेकैकं सर्वमूचुर्महीपते । एकाऽथ वैद्यस्तन्मध्यात् क्रमपृष्टोऽब्रवीदिदम् ॥१५०॥ वणिजो मातुलत्तस्य देव नागबला गया। अस्वस्थस्योपदिष्टाद्य द्वितीय दिनमोषधिः ॥१५१॥ तच्छ्रुत्वा स तमाहूय राजा वणिजमभ्यधात्। ननु नागबला केन तवानीतोच्यतामिति ॥१५२॥ देव कर्मकरेणेति तेनोक्ते वणिजा ततः। क्षिप्रमानाय्य तं राजा स कर्मकरमब्रवीत् ॥१५३॥ त्वया नागबलाहेतोः खनता क्षितितस्तलम् । दीनारजातं यल्लब्धं ब्रह्मस्वं तत्समर्पय ॥१५४॥ इत्युक्तो भूभृता भीतः प्रतिपद्यैव तत्क्षणम् । स तानानीय दीनारांस्तत्र कर्मकरो जहौ ॥१५५॥ राजाऽप्युपोषितायास्मै द्विजायहूय तान् ददौ । दीनारान् हारितप्राप्तान् प्राणानिव बहिश्चरान् ॥१५६॥ एवं स लब्धवान् बुद्ध्या भीत मुक्तात्तातरो । द्विजार्थ भूपतिर्ज्ञान्नोपधिं तां तदुद्भवम् ॥१५७॥ तदेवं सर्वदा बुद्धेः प्राधान्यं जितपौरुषम्। ईदृशेषु च कार्येषु किं विदध्यात् पराक्रमः ॥१५८॥ तद्योगेश्वर कुर्वीथास्त्वमपि प्रज्ञया तथा। यथा कलिङ्गसेनाया दोषो ज्ञायेत कश्चन ॥१५९॥ अस्ति चैतद्यथा तस्यां लम्पन्तीह सुरासुराः । तथा च दिवि कन्यापि निशि द्याभ्यः श्रुतस्त्वया ॥१६०॥ सम्प्रेक्ष्य दोषे कस्याञ्च भवेदङ्कुशता न न । नोपयच्छेत तां राजा न चाधर्म कृतो भवेत् ॥१६१॥ इत्युदारधियः श्रुत्वा सर्वं यौगन्धरायणात् । योगेश्वरस्तं सन्तुष्य जगाद प्रह्वराक्षसः ॥१६२॥

षष्ठ लम्बक ४१७

षष्ठ लम्बक ४१७ यहाँ आकर शिरःपीड़ा का बहाना करके द्वारपाल द्वारा नगाड़े पर घोषणा कराकर राजा ने नगर के सभी वैद्यों को बुलवाया ॥१४८॥ और, एक-एक वैद्य को अलग-अलग बुलवाकर पूछने लगा कि तुम्हारे कितने रोगी हैं और तुमने किसे-किसे कौन-कौन-सी दवा दी है? ॥१४९॥ उन वैद्यों ने भी एक-एक करके अपना-अपना विवरण राजा को सुनाया। उनमें से एक वैद्य ने क्रमशः अपनी बारी आने पर राजा से यह कहा ॥१५०॥ 'महाराज रोगी मातुलत्त नामक वैश्य को मैंने नागबला नाम की औषधि बताई थी आज दूसरा दिन है। यह सुनकर राजा ने मातुलत्त वैश्य को बुलवाकर कहा-'तुम्हारे लिए नागबला कौन लाया था? बताओ' ॥१५१-१५२॥ 'महाराज मेरा भृत्य (नौकर) लाया था। बनिये के ऐसा उत्तर देने पर राजा ने उस भृत्य को बुलवाकर कहा 'तू ने नागबला के लिए भूमि खोदते हुए जो मुहरों की राशि प्राप्त की है वह ब्राह्मण का धन है, उसे दे दे' ॥१५३-१५४॥ राजा के ऐसा कहने पर भयभीत नौकर ने उसी समय मुहरें लाकर वहीं रख दीं ॥१५५॥ तदनन्तर राजा ने अनुग्रह करते हुए ब्राह्मण को बुलवाकर, उस कंजूस ब्राह्मण के बाहरी प्राणों के समान चोरी होकर मिली हुई मुहरें उसे दे दीं ॥१५६॥ इस प्रकार राजा ने वृक्ष के नीचे से ले जाये गये धन को बुद्धिबल से ब्राह्मण को प्राप्त करा दिया, क्योंकि वहाँ उत्पन्न हुई ओषधि का वह जानता था ॥१५७॥ अतएव पुरुषार्थ के ऊपर सदा बुद्धि की प्रधानता रहती है। शुभ कार्यों में पौरुष क्या कर सकता है? ॥१५८॥ इसलिए हे प्राणेश्वर ! तुम भी बुद्धिबल से कुछ ऐसा करना जिससे कलिङ्गसेना का सोच दोष टाला जा सके ॥१५९॥ यह बात तो है कि उस कलिङ्गसेना पर दया और मधुर संगीतकला दोनों हैं और रात में तुमने ऐसा कुछ शब्द भी सुना है ॥१६०॥ उसका दोष मिलने पर उसका और हमारा कल्याण न होगा। राजा आगे विवाह न करेगा इसलिए अधर्म भी नहीं होगा ॥१६१॥ उधर बन्दिवाले यौगन्धरायण के पद सुनकर वत्सनरेश दोषदण्ड उत्तप्त होकर बोला-॥१६२॥

७६८ कथासरित्सागर

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कस्त्वया सदृशो नीतावन्यो देवाद् बृहस्पते। अमृतसेकोऽप्य रक्षन्मन्त्रो राज्यशासिनः॥१६३॥ सोऽहं कलिङ्गसेनाया जिज्ञासिष्ये गतिं सदा। बुद्ध्या शक्त्यापि चेत्युक्त्वा ततो योगेश्वरो ययौ॥१६४॥ तत्कालं सा च हर्म्याग्रं पर्यटन्तं स्वहर्म्यगा। कलिङ्गसेना वत्सशं दृष्ट्वा दृष्ट्वा स्म साम्यति॥१६५॥ तन्मनाः स्मरसन्तप्ता मृणालाङ्कुरहारिणी। सा श्रीखण्डाङ्गरागा च न लेभे निर्वृतिं क्वचित्॥१६६॥ अत्रान्तरे स सो पूर्वं दृष्ट्वा विद्याधराधिपः। तस्थौ मदनवेगाख्यो गाढानङ्गशरादितः॥१६७॥ सम्प्राप्तमे तपः कृत्वा वरे शम्भोर्निशाचरात्। सान्यासक्ताप्यवेक्षस्था सुतं प्राप्स्यस्य नामवत्॥१६८॥ यतस्तेनान्तरं लब्धुमसो विद्याधराधिपः। रजनीषु दिवि भ्राम्यन्नासीत्तन्मन्दिरोपरि॥१६९॥ संस्मृत्य तु तमादेशं तपस्तुष्टस्य धूर्जटेः। एकस्या निशि वत्सेशरुपं चक्रे स्वविद्यया॥१७०॥ तद्रूपश्च विवेशास्य मन्दिरं द्राग्यवन्तिनः। कालक्षेपाक्षमो गुप्तं मन्त्रिणां स इवागतः॥१७१॥ कलिङ्गसेनाप्युत्तस्थौ तं दृष्ट्वोत्कम्पविह्वला। न सोऽयमिति सा रात्रेर्वार्यमाणेव भूयणे॥१७२॥ ततो वत्सेशरूपेण क्रमाद् विश्वास्य तेन सा। भार्या मदनवेगेन गान्धर्वेविधिना कृता॥१७३॥ सत्कार्ल च प्रविष्टस्तद्दृष्ट्वा योगावलक्षितः। योगेश्वरो विषण्णोऽभूद् वत्सेशालोकनभ्रमात्॥१७४॥ योगन्धरायणाद्येषाद् गत्वोक्तवा तन्निवेशतं। युक्त्या कामव्यवस्थाया वत्सशं वीक्ष्य पार्श्वगम्॥१७५॥ बुञ्जे मन्त्रिवरोक्त्यैव रूपं सुप्तस्य भेदितुम्। कलिङ्गसेना प्रच्छन्नशायिनं सोऽन्यमत्युत॥१७६॥ गत्वा कलिङ्गसेनायाः सुप्तायाः शयनीयके। सुप्तं मदनवेगं तं स्वरूपे स्थितमैक्षत॥१७७॥

'नीति में बृहस्पति के सिवा तुम्हारे समान और कौन है। तुम्हारी सम्मति राज्य-रूपी वृक्ष के लिए अमृत-सिंचन के समान है' ॥१६३॥ अब मैं कलिङ्गसेना की गतिविधि का बुद्धि और शक्ति दोनों से ही जानने का प्रयत्न करूंगा। ऐसा कहकर योगेश्वर चला गया ॥१६४॥ उस समय अपने भवन में बैठी हुई कलिङ्गसेना राजमहल, उद्यान आदि में भ्रमण करते हुए वत्सराज को देख-देखकर तड़प रही थी ॥१६५॥ वत्सममय हृदयवाली कलिङ्गसेना मृणाल (कमलनाल) के अंगद (भुजा के आभूषण) से मनाहार लगा रही थी और चन्दन का लेप करने पर भी विरहाग्नि से शान्ति प्राप्त नहीं कर पा रही थी ॥१६६॥ इसी बीच मदनवेग नाम का वह विद्याधरों का राजा पहले से ही कलिङ्गसेना को देखकर कामबाणों की गम्भीर वेदना का अनुभव कर रहा था ॥१६७॥ उसकी प्राप्ति के लिए तप करके शिवजी से वर लाभ कर लेने पर भी दूसरे पर आसक्त और दूसरे वेश में गई हुई कलिङ्गसेना अब उसके लिए सहज में ही पान योग्य नहीं रह गई थी ॥१६८॥ इसीलिए अवसर की प्रतीक्षा में विद्याधरों का वह राजा रात्रियों में आकाश में विचरण करता हुआ एक बार कलिङ्गसेना के निवास भवन के ऊपर आया ॥१६९॥ और तपस्या से सन्तुष्ट शिवजी के उस आदेश का स्मरण करके एक बार रात के समय अपनी विद्या के बल से वत्सराज का रूप और वेष बनाकर द्वारपाल से प्रणाम किया जाता हुआ कलिङ्गसेना के मन्दिर में गया। मानों मन्त्रियों द्वारा किए गए कालक्षेप को सहन न करके राजा गुप्त रूप में स्वयं ही आ गया हो ॥१७०-१७१॥ उसे देखकर कामव्यथा से व्याकुल कलिङ्गसेना उठी। उसके उठने पर झनझनाते उसके आभूषण मानों यह कह रहे थे कि यह वह (वत्सराज) नहीं है ॥१७२॥ तदनन्तर वत्सराज का रूप धारण किए हुए उस विद्याधर ने धीरे-धीरे उसे विश्वास दिलाकर गान्धर्व विधान से अपनी पत्नी बना लिया ॥१७३॥ उसी समय अन्दर घुसा हुआ और अपनी विद्या के प्रभाव से अलक्षित योगेश्वर वत्सराज को देखकर भ्रम से चकित रह गया ॥१७४॥ और, वत्सराज को यौगन्धरायण के पास बैठा हुआ देखकर उनके आदेश से उसे यह सब वृत्तान्त कहने के लिए उसके पास गया ॥१७५॥ मन्त्री के कहने से कलिङ्गसेना के गुप्त प्रेमी का वास्तविक रूप देखने के लिए वह पुनः लौट आया ॥१७६॥ और सोई हुई कलिङ्गसेना के पास आकर उस पर सोये हुए मदनवेग के वास्तविक रूप को उसने देखा ॥१७७॥ ९७

७४ कथासरित्सागर

७४ कथासरित्सागर छत्रध्वजाङ्कनिर्मूलिपादाब्जं दिव्यमानुषम्। स्वापान्तहिततद्विद्यावीतरूपविवर्तनम् ॥१७८॥ तत्र गत्वा यथादृष्टं निवेद्य परितोषवान्। योगेश्वरो जगादासौ हृष्टो यौगन्धरायणम् ॥१७९॥ न वेत्ति मानुषः किञ्चिद् वेत्सि त्वं नीतिचक्षुषा। तव मन्त्रेण दुसाध्यं सिद्धं कार्यमिदं प्रभो ॥१८०॥ किं वा व्योम विमार्केण किं तोयेन विना सरः। किं मन्त्रेण विना राज्यं किं सत्येन विना वच ॥१८१॥ इत्युक्तवन्तमामन्त्र्य प्रीतो योगेश्वरं ततः। प्रातर्वत्सेश्वरं द्रष्टुमगाद्यौगन्धरायणः ॥१८२॥ समुपेत्य यथावच्च कथा प्रस्तावतोऽब्रवीत्। नृपं कलिङ्गसेनार्थं पृष्टकार्यविनिश्चयम् ॥१८३॥ स्वच्छन्दवासी न ते राजन् पाणिस्पर्शमिहार्हति। एषा हि स्वेच्छया द्रष्टुं प्रसेनजितमागता ॥१८४॥ विरक्ता वीक्ष्य तं वृद्धं त्वां प्राप्ता रूपलोभतः। तवन्त्यपुरवासङ्गमपि स्वेच्छं करोत्यसौ ॥१८५॥ तच्छ्रुत्वा कुरुतन्व्येवं कथमेवं समाचरेत्। शक्तिः कस्य प्रवेष्टुं वा मदीयान्तपुरान्तरे ॥१८६॥ इति राज्ञोदितेऽभाणीद्धीमान्यौगन्धरायणः। अद्यैव दर्शयाम्यक्षप्रत्यक्षं निशि देव ते ॥१८७॥ दिव्यास्तामभिवाञ्छन्ति विद्याध्रा मानुषोऽत्र कः। दिव्यानां च गती रोद्धुं राजन्नेकेह शक्यते ॥१८८॥ तदेहि साक्षात्पश्येति वादिना तेन मन्त्रिणा। सह गन्तुं मतिं चक्रे तत्र रात्रौ स भूपतिः ॥१८९॥ पद्मावत्याः कृते राज्ञा न विवाहादपरति यत्। प्रोक्तं देवि प्रतिज्ञातं मया मिथ्यैतदद्य तत् ॥१९०॥ इत्यपाम्येत्य तां देवीमुक्त्वा यौगन्धरायणः। कलिङ्गसेना वृत्तान्तं हं तस्यै सर्वमुक्तवान् ॥१९१॥ स्वदीयविद्यानुष्ठानफलमेतन्ममेति सा। देवी वासवदत्तापि प्रणताभिननन्द तम् ॥१९२॥

षष्ठ लम्बक ७७१

षष्ठ लम्बक ७७१ उस दिव्य मनुष्य के छत्र और ध्वजा से चिह्नित तथा निष्पंक कोमल चरणकमल थे। सो जाने पर छिपी हुई विद्या के कारण उसका बदला हुआ रूप समाप्त हो गया और वह स्पष्टतया अपने वास्तविक रूप में दीख रहा था॥१७८॥ इस स्थिति को देखकर परम सन्तुष्ट योगेश्वर न जो कुछ देखा उसे मन्त्री यौगन्धरायण को बताते हुए उसने कहा—॥१७९॥ हे स्वामी ! मैं कुछ भी नहीं जानता तुम नीति की माँखा से सब कुछ जानते हो। तुम्हारे ही उपाय से यह दुःसाध्य कार्य भी सिद्ध हो गया ॥१८०॥ बिना सूर्य के आकाश क्या है और बिना जल के सरोवर क्या है ? बिना मन्त्री के राज्य क्या है और बिना सत्य के वचन क्या है ? ॥१८१॥ इस प्रकार कहते हुए योगेश्वर का विदा करके यौगन्धरायण प्रातःकाल ही वत्सराज से मिलने गया ॥१८२॥ उसके पास जाकर वार्तालाप के प्रसंग में अवसर पाकर राजा से कलिंगसेना-सम्बन्धी कार्य के लिए सम्मति पूछता हुआ मन्त्री यौगन्धरायण कहने लगा ॥१८३॥ वह कलिंगसेना स्वैरिणी (स्वतन्त्र स्त्री) है। यह आपके हाथों से स्पर्श करने योग्य नहीं है। अपनी इच्छा से यह प्रसेनजित् राजा को देखने आई थी किन्तु उसे वृद्ध देखकर रूप के लोभ से तुम्हारे पास आ गयी। यह दूसरे पुरुष का संग भी अपनी इच्छा से करती है॥१८४-१८५॥ यौगन्धरायण से ऐसा सुनकर, 'एक अच्छे कुल की कन्या ऐसा कैसे कर सकती है और मेरे रनिवास में पर-पुरुष को घुसने की शक्ति कैसे हुई ? ॥१८६॥ राजा के इस प्रकार प्रश्न करने पर बुद्धिमान् यौगन्धरायण कहने लगा—'महाराज ! आज ही रात में आपको सब प्रत्यक्ष दिखा दूँगा' ॥१८७॥ जिस विद्याधर आदि देवता उसे चाहते हैं, तो मनुष्यों की क्या ही कथा है। और, राजन् ! दिव्य व्यक्तियों की गति को कौन रोक सकता है ? ॥१८८॥ अतः आइए और प्रत्यक्ष देखिए। ऐसा कहते हुए मन्त्री के साथ राजा ने रात्रि के समय कलिंगसेना के रनिवास में जाने की इच्छा प्रकट की॥१८९॥ 'पद्मावती के अतिरिक्त अन्य किसी स्त्री का विवाह राजा से नहीं होगा यह जो मैंने तुमसे प्रतिज्ञा की थी उसे आज मैंने पूर्ण कर दिया' ॥१९०॥ यौगन्धरायण ने रानी वासवदत्ता के पास जाकर ऐसा कहा और कलिंगसेना का सारा वृत्तान्त उसे विस्तारपूर्वक सुना दिया ॥१९१॥ प्रणाम करती हुई वासवदत्ता ने भी 'तुम्हारी शिक्षा के अनुसार कार्य करने का यह परिणाम है'—ऐसा कहकर मन्त्री का अभिनन्दन किया ॥१९२॥

ततो निशीथे संसुप्ते जने वत्सेश्वरो ययौ। गृहं कलिङ्गसेनायाः स च यौगन्धरायणः ॥१९३॥ अदृष्टश्च प्रविष्टोऽत्र तस्या निद्राजुषोऽन्तिके। सुप्तं मदनवेगं तं स्वरूपस्थं ददर्श सः ॥१९४॥ हन्तुमिच्छति यावच्च स स साहसिको नृपः। तावत्स विद्यया विद्याधरोऽभूत्प्रतिबोधितः ॥१९५॥ प्रबुद्धश्च स निर्गत्य झगित्युदपतन्नभः। क्षणात्कलिङ्गसेनाऽपि सा प्रबुद्धाभवत्ततः ॥१९६॥ शून्यं शयनमालोक्य जगाद च कथं हि माम्। पूर्वं प्रबुध्य वत्सेशः सुप्तां मुक्त्वाव गच्छति ॥१९७॥ तदाकर्ण्य स वत्सेशमाह यौगन्धरायणः। एषा विश्वसितानेन शृणु त्वद्रूपधारिणा ॥१९८॥ सैष योगबलाज्ज्ञात्वा साक्षात्ते दर्शितो मया। किं तु दिव्यप्रभावत्वादसौ हन्तुं न शक्यते ॥१९९॥ इत्युक्त्वा स च राजा च सह तामुपजग्मतुः। कलिङ्गसेना साप्यात्तौ दृष्ट्वा तस्थौ कृतादरा ॥२००॥ अद्युनेव क्व गत्वा त्वं राजन् प्राप्तः समन्त्रिकः। इति ब्रुवाणामवदत्तां स यौगन्धरायणः ॥२०१॥ कलिङ्गसेने ! केनापि मायावत्सेशरूपिणी। संमोह्य परिणीतासि न त्वं मत्स्वामिनाधुना ॥२०२॥ तच्छ्रुत्वा सातिसम्भ्रान्ता विद्धेव हृदि पत्रिणा। कलिङ्गसेना नरपं जगादोदश्रुलोचना ॥२०३॥ गान्धर्वविधिनाहं ते परिणीतापि विस्मृता। किं स्विद्राजन् यथापूर्वं दुष्पन्तस्य शकुन्तला ॥२०४॥ इत्युक्तः स तया राजा तामुवाचामलाननः। सत्यं न परिणीतासि मयाद्यैवागतो ह्यहम् ॥२०५॥ इत्युक्तवन्तं नरपं मन्त्री यौगन्धरायणः। एहीत्युक्त्वा ततः स्वैरमनैषीद्राजमन्दिरम् ॥२०६॥

षष्ठ लम्बक ४७३

षष्ठ लम्बक ४७३ तदनन्तर रात में सभी मनुष्यों के सो जाने पर वत्सराज और यौगन्धरायण कलिङ्गसेना के निवास-भवन में गये। और असंकित रूप से सोए हुए मदनवेग के वास्तविक स्वरूप को उन्होंने देखा ॥१९३ १९४॥ जबतक राजा उस साहसी मदनवेग को मारने के लिए तलवार खींचता है, तबतक वह जगकर अपनी विद्या के प्रभाव से विद्याधर बन गया ॥१९५॥ और शीघ्र ही उठकर एवं भवन से बाहर निकलकर आकाश में उड़ गया। इतने में ही कलिङ्गसेना भी सहसा उठ गई ॥१९६॥ वह अपने पर्यङ्क को सूना देखकर बोली—'मुझे बिना जगाये ही स्वयं पहले जाकर आज वत्सराज क्यों चले गये ? ॥१९७॥ यह सुनकर यौगन्धरायण ने वत्सराज से कहा—'सुनो ! इस विद्याधर ने तुम्हारा रूप धारण करके इसे भ्रष्ट कर दिया है। यह मैंने योगबल से जानकर तुम्हें प्रत्यक्ष दिखा दिया किन्तु वह दिव्यशक्तिशाली है। तुम उसे मार नहीं सकते। ऐसा कहकर राजा और मन्त्री दोनों प्रत्यक्ष होकर कलिङ्गसेना के पास पहुँचे। कलिङ्गसेना भी उन्हें देखकर उनका समुचित सत्कार करती हुई उठकर खड़ी हुई ॥१९८-२ ॥ और कहने लगी 'राजन् ! अभी ही जाकर फिर आप मन्त्री के साथ कैसे पधारे !' ऐसा कहती हुई कलिङ्गसेना से मन्त्री यौगन्धरायण बोला—॥२ १॥ हे कलिङ्गसेना ! तुझे किसी शठ व्यक्ति ने वत्सराज का रूप धारण करके भ्रम में डालकर विवाहित कर लिया। तेरे इस स्वामी से तू विवाहित नहीं हुई है ॥२ २॥ यह सुनते ही मानों तीर से विदीर्ण हृदय अतएव अत्यन्त व्याकुल कलिङ्गसेना आँसू बहाती हुई वत्सराज से कहने लगी—॥२ ३॥ गान्धर्व विधि से विवाहितकर कल पर आपने मुझे वैसे ही भुला दिया जैसे दुष्यन्त ने शकुन्तला को भुला दिया था। यह क्या है ? ॥२ ४॥ कलिङ्गसेना के इस प्रकार कहने पर राजा ने नीचे मुँह किये हुए कहा—'सत्य है, मैंने तुझे विवाहित नहीं किया। मैं तो आज ही यहाँ आया हूँ' ॥२ ५॥ ऐसा कहते हुए राजा को मन्त्री यौगन्धरायण 'आइए' तथा कहकर राजभवन में ले गया ॥२ ६॥

७०४ कथासरित्सागर

७०४ कथासरित्सागर ततः समन्त्रिके राज्ञि गते सात्र विवेशगा । मृगीव यूथविभ्रष्टा परित्यक्तस्वबान्धवा ॥२०७॥ सम्भोगविस्त्रस्तपत्रमुक्ता वा गजपीडिता । पद्मिनीव परिक्षिप्तकवरीभ्रमरावलिः ॥२०८॥ विनष्टकन्यकाभावा निरुपायक्रमा सती । कलिङ्गसेना गगनं वीक्षमाणेदमब्रवीत् ॥२०९॥ वत्सेशरूपिणा येन परिणीतास्मि केनचित् । प्रकाशं सोऽस्तु कौमारः स एव हि पतिर्मम ॥२१०॥ एवं तयोक्ते गगनात्सोऽत्र विद्याधराधिपः । अवतारदिव्यरूपो हारकेयूरराजितः ॥२११॥ को भवानिति पृष्टश्च तयैवं स जगाद ताम् । अह मदनवेगाख्यस्तन्वि विद्याधराधिपः ॥२१२॥ मया च प्राग्विलोक्य त्वां पुरा पितृगृहे स्थिताम् । त्वत्प्राप्तिदस्तपं कृत्वा वरः प्राप्तो महेश्वरात् ॥२१३॥ वत्सेश्वरानुरक्ता च तद्रूपेण मया द्रुतम् । प्रवृत्तद्विवाहैव परिणीतासि युक्तितः ॥२१४॥ इति वाक्सुधया तस्य श्रुतिमार्गप्रविष्टया । किञ्चित्कलिङ्गसेनाभूदुच्छ्वासितहृदम्बुजा ॥२१५॥ अथ स मदनवेगस्तां समाश्वास्य कान्तां विहितधृतिवितीर्णस्वर्णराशिं च तस्मै । उषित इति तथान्तर्वेश्मसद्मसु भक्तितः पुनरुपगमनाय द्यां तदैवोत्पपात ॥२१६॥ दिव्याम्प्य स्वपतिमथ न मरणगम्यं धामात्पितृभवनमुज्झितमित्यवेक्ष्य । तत्रैव वस्तुमथ सापि कलिङ्गसेना चक्रे मतिं मदनवेगकृताभ्यनुज्ञा ॥२१७॥ इति महाकविश्रीसोमदेवभट्टविरचिते कथासरित्सागरे मदनमञ्चुकालम्बके सप्तमस्तरङ्गः ।

षष्ठ लम्बक ४७५

षष्ठ लम्बक ४७५ इस प्रकार मन्त्री के राजा के साथ चले जाने पर अपने बन्धु-बान्धवों से छूटी हुई और वियोग में पड़ी हुई कलिङ्गसेना झुंड से बिछुड़ी हुई हरिणी के समान हाथी के पैरों से रौंदी हुई कमलिनी के समान मलिन मुखवाली भ्रमरों से घिरी हुई कमलिनी के समान बिखरे हुए केशोंवाली और कौमार के नष्ट होने से मलिन एवं निष्प्रभा कलिङ्गसेना आकाश की ओर देखती हुई यह कहने लगी—॥२०७-२१०॥ 'वत्सराज का रूप धारण करके जिसने मुझे विवाहित किया है वह मेरे कौमार का हरण करनेवाला प्रकट हो। वही मेरा पति है' ॥२११ ॥ उसके ऐसा कहते ही वह विद्याधरों का राजा मदनवेग हार और केयूर पहने हुए दिव्य रूप से उतरकर आया ॥२११॥ 'तुम कौन हो ?' कलिङ्गसेना के इस प्रकार पूछने पर मदनवेग ने उससे कहा— 'हे सुन्दरि ! मैं मदनवेग नाम का विद्याधरों का राजा हूँ। मैंने तुझे पहले ही तेरे पिता के घर में देखा था और तुम्हें प्राप्त करने के लिए तपस्या करके शिवजी से वर पाया है ॥२१२-२१३॥ तू वत्सराज पर आसक्त थी इसलिए मैंने शीघ्र ही उससे विवाह होने के पूर्व उपाय करके तुझे विवाहित कर लिया है ॥२१४॥ मदनवेग की ऐसी वाणी-रूपी अमृतधारा ने कानों के मार्ग से कलिङ्गसेना के हृदय में प्रवेश कर उसके हृदय-कमल को प्रफुल्लित और विकसित कर दिया ॥२१५॥ तदनन्तर वह मदनवेग उस अपनी प्यारी पत्नी को धीरज बँधाकर और उसे स्वर्ण की प्रचुर राशि प्रदान कर, 'यह भी अच्छा ही हुआ ऐसा सोचती हुई और हृदय में पति भक्ति को प्रतिष्ठित करती हुई कलिङ्गसेना से पूछकर वह आकाश में उड़ गया ॥२१६॥ [L21: अपने पति का स्थान दैवी है मनुष्य द्वारा जानने योग्य नहीं है अपने पिता का घर कल का छोड़ दिया'—ऐसा सोचकर कलिङ्गसेना ने मन्दनवेग की अनुमति प्राप्त कर उसी के पास रहने का विचार स्थिर किया ॥२१७॥ सप्तम तरङ्ग समाप्त ।

४७६ कथासरित्सागर

४७६ कथासरित्सागर

अष्टमस्तरङ्गः

वत्सराजस्य कथा (पूर्वानुवृत्ता)

ततः कलिङ्गसेनायाः स्मरन्ननुपमं वपुः। एकदा मन्मथाविष्टो निशि वत्सेश्वरोऽभवत् ॥१॥ उत्थाय सङ्गहृस्तः सन् गत्वैव प्रविवेश सः। एकाकी मन्दिरं तस्याः कृताखिम्ब्यादरस्तया ॥२॥ तत्र प्रार्थयमानस्तां भार्यार्थे स महीपतिः। परपत्न्यहमस्मीति प्रत्याख्यातस्तयाब्रवीत् ॥३॥ तृतीयं पुरुषं प्राप्ता यतस्त्वमसि बन्धकी। परवारगतो दोषो न मे त्वद्गमने ततः ॥४॥ एव कलिङ्गसेना सा राज्ञोक्ता प्रत्युवाच तम्। स्वधर्ममागता राजन्नहं विद्याधरेण हि ॥५॥ व्यूढा मदनवेगेन स्वैरं त्वद्रूपधारिणा। स एवैकश्च भर्ता मे तत्कस्मादस्मि बन्धकी ॥६॥ किं वातिलङ्घन्तबन्धूनां स्वेच्छाजातधृतात्मनाम्। इमास्ता विपदः स्त्रीणां कुमारीणां कथैव का ॥७॥ दृष्टाशकुनया सख्या निषिद्धापि व्यसर्जंयम्। त्वत्पार्श्वे यदहं दूतं तस्य खेदः फलं मम ॥८॥ तत्स्पृशसि बलान्मां चेत् प्राणांस्त्यक्ष्याम्यहं ततः। का नाम कुलजा हि स्त्री भर्तृद्रोहं करिष्यति ॥९॥

पतिव्रताया वेश्यपरम्पा कथा

तथा च कथयाम्यत्र तव राजन्कथां शृणु। पुराभूदिन्द्रदत्ताख्यश्चेतिविद्देशमहीपतिः ॥१०॥ स पापशोधने तीर्थे कीर्त्यै देवकुलं महत्। चक्रे यशशरीरार्थी शरीरं वीक्ष्य भङ्गुरम् ॥११॥ तच्च मन्दिरमाच्छश्वद् वीक्षितुं स ययौ नृपः। सर्वेश्च तीर्थस्नानाय सङ्ग तत्राभवज्जनः ॥१२॥ एकदा च ददर्शात तीर्थस्नानार्थमागताम्। स राजात्र वणिग्भार्या प्रभासस्थितभर्तृकाम् ॥१३॥