कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
२४६ कथासरित्सागर
२४६ कथासरित्सागर एवं यथा स हास्यत्वं गतः प्रव्राजकस्तथा । व्याजप्रयोगम्यसिद्धौ वयं गच्छेम जातुचित् ॥५४॥ बहुदोषो हि विरहो राज्ञो वासवदत्तया । एवं रुमण्वतोक्त सन्नाह यौगन्धरायणम् ॥५५॥ नान्यथोद्योगसिद्धिः स्यादनुद्योगे च निश्चितम् । राजनि व्यसनिन्येतत्क्षयेदपि यथास्थितम् ॥५६॥ लब्धापि मन्त्रिताख्यातिरस्माकं चान्यथा भवेत् । स्वामिसम्भावनायाश्च भवेम व्यभिचारिणः ॥५७॥ स्वायत्तसिद्धे¹ राज्ञो हि प्रज्ञोपकरणं मताः । सचिवाः परे भवत्सर्वे कृते वाऽप्यभवत्कृते ॥५८॥ सचिवायत्तसिद्धस्तु तत्प्रभावसाधनम् । त एव चन्निहत्साहाः श्रियो दत्तो जलाञ्जलिः ॥५९॥ अथ देवी पितुश्चण्डमहासनाद् विवक्त्सुसे । स सुपुत्रश्च देवी च वचः कुरुत एव मे ॥६०॥ इत्युक्तवन्तं धीराणां धुर्यं यौगन्धरायणम् । प्रमादशङ्किहृदयो रुमण्वानपुनरब्रवीत् ॥६१॥ अभीष्टस्त्रीवियोगार्त्या सविवेकोऽपि बाध्यते । किं पुनर्वत्सराजोऽयमात्र चैतां कथां शृणु ॥६२॥ पुराभूद्देवसेनाख्यो राजा मतिमतो वरः । श्रावस्तीति पुरी तस्य राजधानी बभूव च ॥६३॥ तस्यां च पुर्यामभवद् वणिगेशो महाधनः । तस्योदपद्यतानन्यसदृशी दुहिता किल ॥६४॥ उन्मादिनीति नाम्ना च मन्यथा सापि पप्रथे । उन्माद्यति गतस्तन्म्या रूपं दृष्ट्वाऽखिलो जनः ॥६५॥ मतयय्मनाबञ्च राने वेषा क्वचिन्न मः । रा हि कुप्येद्गिति पिता तस्या सोऽर्थयत्प्रयद् वणिक ॥६६॥ ततश्च गत्वा राजान दन्तस्तन व्यजिापन् । देवास्ति कन्यारत्न मे गृह्यतामुपयोगि यत् ॥६७॥ १ त्रिविधा हि राजानः— १ स्वायत्तसिद्धिः, २ सचिवायत्तसिद्धि उभयायत्तसिद्धि श्चेति। तत्रायमुद्यमः सचिवायत्तसिद्धिः।
तृतीय लम्बक २४७
तृतीय लम्बक २४७ इसी प्रकार इस क्रूर प्रयोग की असफलता होने पर कहीं हम भी हँसी के पात्र न बनें। राजा के लिए वासवदत्ता का वियोग अत्यन्त असह्य है, इस कारण और कुछ अनर्थ भी सम्भव है। राजा के रहते हुए जो भी है उससे भी हाथ धोना पड़ेगा। रुमण्वान् के इस प्रकार कहने पर यौगन्धरायण ने कहा—'बिना उद्योग के सिद्धि नहीं प्राप्त होगी। यदि उद्योग न किया जायगा तो उस व्यसनी राजा का जो शेष राज्य है, वह भी न रह जायगा' ॥५४-५७॥ जिन राजाओं की सफलता मन्त्रियों के अधीन होती है, उनके लिए मन्त्रियों की बुद्धि ही कार्य-साधन करती है, इसलिए राजा का उपकार न करने के कारण हम दोषी होंगे। स्वायत्त-सिद्धि राजाओं के कर्त्तव्य या अकर्त्तव्य के लिए उनकी निजी बुद्धि ही साधन होती है। उनके लिए कुछ करने या न करने में मन्त्रियों का उत्तरदायित्व नहीं होता। सचिवायत्त सिद्धिवाले राजा यदि निरुत्साह और निष्द्योग रहेंगे तो राजलक्ष्मी को तिलांजलि देनी होगी। यदि तुम महारानी के पिता चंडमहासेन से शंका करते हो तो व्यर्थ है। वह राजा और उसका पुत्र गोपालक मेरी बात मानते ही हैं, ॥५८-६१॥ धीर-धुरन्धर यौगन्धरायण के ऐसा कहने पर प्रमाद से शंकित चित्तवाला रुमण्वान् फिर बोला—बड़े-बड़े विवेकी पुरुष भी अति प्रिय स्त्री के वियोग से पीड़ित होते हैं, फिर वत्सराज की तो बात ही क्या? इस प्रसंग में यह कथा सुनो—॥६१ ६२॥ राजा देवसेन और उन्मादिनी की कथा पूर्व समय में देवसेन नाम का बुद्धिमानों में श्रेष्ठ राजा था। श्रावस्ती नाम की नगरी उसकी राजधानी थी। उस नगरी में एक अत्यन्त धनी बनिया था। उसकी एक अत्यन्त सुन्दरी कन्या थी। वह कन्या उन्मादिनी के नाम से प्रसिद्ध हुई क्योंकि उसे देखकर, देखनेवाले उन्मत्त हो जाते थे ॥६४-६५॥ वैश्य ने सोचा कि राजा को सूचना दिये बिना इस कन्या को कहीं न दूँगा नहीं तो राजा कुपित होगा ॥६६॥ तब उसने राजा देवसेन के पास जाकर निवेदन किया कि राजन् मेरे यहाँ एक कन्यारत्न है। यदि आपके उपयोगी हो तो आप उसे ग्रहण करें ॥६७॥
२४८ कथासरित्सागर
२४८ कथासरित्सागर सच्छल्या व्यसृजद्राजा सोऽथ प्रत्ययितान् द्विजान्। गत्वा सुलक्षणा सा वा न वेत्यालोच्यतामिति ॥६८॥ तथेति ते द्विजा गत्वा तां दृष्ट्वैव वणिक्सुताम्। उन्मादिनीं ययुः क्षोभं सद्यः सञ्जातमन्मथाः ॥६९॥ राजास्यां परिणीतायामवश्यमनास्त्यजेत्। राजकार्याणि नश्येच्च सर्वं तस्मात्किमेतया ॥७०॥ इति च प्रकृतिं प्राप्ता द्विजा सम्मन्त्र्य ते गताः। कुलक्षणा सा कस्येति मिथ्या राजानमब्रुवन् ॥७१॥ ततो राज्ञा परित्यक्तां स सोन्मादिनीं वणिक्। तत्सेनापत्ये प्रादादन्तर्जात्यभिमानिनाम् ॥७२॥ भर्तुःवेश्मनि हर्म्यस्था साथ जातु समागतम्। राजानं येन मार्गेण बुद्ध्वात्मानमदर्शयत् ॥७३॥ दृष्ट्वैव च स तां राजा जगत्सम्मोहनौषधिम्। प्रयुक्तामिव कामेन जातोन्माद इवाभवत् ॥७४॥ गत्वा स्वभवनं ज्ञात्वा तां च पूर्वावधीरिताम्। उन्मना ज्वरसन्तापपीडां गाढमवाप सः ॥७५॥ सा दासी न परस्त्री' ति गृह्यतां यदि वाप्यहम्। त्यजामि तां देवकुले स्वीकरोतु ततः प्रभुः ॥७६॥ इति तेन च तद्भर्त्रा स्वसेनापतिना ततः। अभ्यर्थ्यमानो यत्नेन जगादैव स भूपतिः ॥७७॥ माहुः परस्त्रीभावास्ये त्वं वा त्यक्ष्यसि तां यदि। ततो नङ्क्ष्यति ते धर्मो दण्ड्यो मे च भविष्यसि ॥७८॥ सन्द्रुध्या मन्त्रिणोऽन्यं च तूष्णीमासन्स च क्रमात्। स्मरज्वरेण तेनैव नृपः पञ्चत्वमाययौ ॥७९॥ एव स राजा नष्टोऽभूद्धीरोऽप्युन्मादिनीं विना। विना वासवदत्तां तु वत्सराजः कथं भवेत् ॥८०॥ १. अत्र प्राचीन भारते प्रचलिताया देवदासित्व प्रथाया आभास उपलभ्यते साम्प्रतमपि दक्षिणदेशे उत्कलेऽपि सैषा प्रथा दृश्यते।
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तृतीय लम्बक २४९ यह सुनकर राजा ने विश्वस्त ब्राह्मणों को कन्या को देखने के लिए भेजा कि जाकर देखो कि कन्या सुलक्षणा और विवाह के योग्य है या नहीं। ब्राह्मणों ने वहाँ जाकर जैसे ही उन्मादिनी को देखा वैसे ही वे स्वयं उस पर आसक्त होकर लुब्ध हो गये। उन्होंने सोचा कि इसे पाकर राजा इसपर आसक्त होकर राज्य-कार्य करना भी छोड़ देगा। अतः इससे क्या लाभ ? ॥६८-७०॥ सावधानतापूर्वक ऐसा सोचकर ब्राह्मणों ने राजा से झूठ कह दिया कि 'महाराज! कन्या कुलक्षणा है' ॥७१॥ इस प्रकार राजा ने उसे छोड़ दिया। इस कारण वणिक् ने अपमान से कुपिता कन्या का राजा के सेनापति से विवाह कर दिया ॥७२॥ एक बार अपने घर में बैठी हुई उस कन्या ने ऊपर से जाते हुए राजा को जानकर खिड़की से अपने रूप को दिखा दिया ॥७३॥ राजा विश्व-वशीकरण औषधि के समान उस सुन्दरी को देखकर कामवश से पागल-सा हो गया ॥७४॥ अपने घर जाकर और पहले स्वयं छोड़ी हुई उस वैश्य-कन्या का पता पाकर व्याकुल राजा गहरे कामज्वर से पीड़ित हो गया ॥७५॥ इस वृत्तान्त को जानकर सेनापति ने राजा से कहा कि 'वह आपकी दासी है परस्त्री नहीं है। अतः आप उसे स्वीकार करें। मैं उसे देवमन्दिर में छोड़ देता हूँ। आप उसे वहीं से ग्रहण कर लें।' ॥७६॥ सेनापति के द्वारा इस प्रकार दण्डवत्पूर्वक प्रार्थित राजा बोला—'यदि तू उसे त्याग देगा तो भी मैं परस्त्री को ग्रहण न करूँगा। यदि तू ऐसा करेगा तो तेरा धर्म नष्ट होगा और मैं तुझे स्त्री-परित्याग करने के कारण दण्ड भी दूँगा।' ऐसा सुनकर सभी मंत्री घर गये और राजा कामवेदना से मर गया ॥७७-७९ ॥ वह राजा धैर्यवान् और विवेकी होने पर भी जिस प्रकार उन्मादिनी के बिना मर गया उसी प्रकार कामवेदना के बिना उदयन की क्या स्थिति होगी ? ॥८० ॥ १ प्राचीन काल में मन्दिरों को देवदासी भेंट करने की प्रथा थी। विशेष रूप से कन्याओं को भेंट किया जाता था। कहा जाता है कि गीतगोविन्द के कर्त्ता जयदेव की भार्या पद्मावती भी इसी प्रकार देवताओं को भेंट की गई कन्या थी। दक्षिण के संडोवा मन्दिर में, उड़ीसा के जगन्नाथ के मन्दिर में, गुजरात के बहुचरा तथा कालिका के मन्दिर में अभी कुछ दिन पहले तक यह प्रथा थी। दक्षिण भारत में मात्र मठनायकों को भी कन्याएँ भेंट की जाती थीं, किन्तु यह प्रथा अनर्थकारी होने से अब प्रायः समाप्त सी हो रही है। ३२
२५ कथासरित्सागर
२५ कथासरित्सागर एतद्रुमण्वतः श्रुत्वा पुनर्यौगन्धरायणः। उवाच सह्यते क्लेशो राजभिः कार्यदर्शिभिः ॥८१॥ रावणोच्छित्तये देवीं स्मृत्वा युक्तिं वियोजिताम्। सीतादभ्या न किं रामो विषहे विरहव्यथाम् ॥८२॥ एतच्छ्रुत्वा च भूयोऽपि रुमण्वानभ्यभाषत। ते हि रामादयो देवास्तेषां सर्वसहं मनः ॥८३॥ असह्यं तु मनुष्याणां तथा च श्रूयतां कथा। अस्तीह बहुरत्नाढ्या मधुरेति महापुरी ॥८४॥ तस्यामभूद् वणिक्पुत्रः कोऽपि नाम्ना मङ्खलकः। तस्य चाभूत्प्रिया भार्या सर्वेशानुगमानसा ॥८५॥ तया सह वसन्तोऽयं कदाचित्कार्यगौरवात्। द्वीपान्तरं वणिक्पुत्रो गन्तुं व्यवसितोऽभवत् ॥८६॥ सद्भार्यापि च तेनैव सह गन्तुमियेप सा। स्त्रीणां भावानुरक्तं हि विरहासहनं मनः ॥८७॥ ततः स च वणिक्पुत्रः प्रतस्थे कृतमङ्गलः। न च तां सह जग्राह भार्यां कॢप्तप्रसाधनाम् ॥८८॥ साथ तं प्रस्थितं पश्चात्पश्यन्ती साश्रुलोचना। अतिष्ठत्प्राङ्गणद्वार कपाटान्तविसंज्ञिनी ॥८९॥ गते दृष्टिपथात्तस्मिन्सा वियोगासहा सतः। नियन्तुं नाशकन्मुग्धा प्राणांस्तस्या विनिर्ययुः ॥९०॥ तद्बुद्ध्वा च वणिक्पुत्रः प्रत्यावृत्य च तत्क्षणम्। ददर्श विह्वलां कान्तामेतामुत्क्रान्तजीविताम् ॥९१॥ सुन्दरापाण्डरच्छायां विलोलामलकालञ्छनाम्। भुवि चान्द्रमसीं लक्ष्मीं दिवः सुप्तच्युतामिव ॥९२॥ अङ्के कृत्वा च तां सद्यः क्रन्दतस्तस्य निर्ययुः। शोकाग्निज्वलिताद्देहादुत भीता इवासवः ॥९३॥ एवमन्योन्यविरहाद्दम्यती तौ विनेशतुः। अतोऽन्य राज्ञो देव्याश्च रक्ष्यान्योन्यवियोगिता ॥९४॥ इत्युक्त्वा विरते तस्मिन्बद्धाशङ्के रुमण्वति। जगाद धैर्यजलधिर्धीमान्यौगन्धरायणः ॥९५॥ मयैतन्निश्चितं सर्वं कार्याणि च महीभृताम्। भवन्त्यवधिमान्यत्र तथा चान्यां कथां शृणु ॥९६॥
तृतीय लम्बक १५१
तृतीय लम्बक १५१ दम्भोलि से इस प्रकार का उदाहरण सुनकर यौगन्धरायण फिर बोला कि अपनी कार्यसिद्धि का ध्यान रखते हुए राजा लोग कष्टों को सहन करते हैं। रावण के विनाश के लिए देवताओं द्वारा सीता से वियुक्त किये गये राम ने कितनी भीषण विरह-वेदना सहन की थी। ऐसा सुनकर दम्भोलि फिर भी बोला—वे राम आदि राजा देवता थे मनुष्य नहीं अतः उनका मन वियोग को सहन कर सकता था किन्तु मानव-हृदय उसे सहन नहीं कर सकता इसपर एक कथा सुनो—॥८१-८४॥ यशस्कर सेठ की कथा इस देश में अनेक रत्नों से पूर्ण मथुरा नाम की महानगरी है। उसमें 'यशस्कर' नाम का एक वैश्य-पुत्र था। उसकी स्त्री उसके प्रति अत्यन्त अनुरक्त थी॥८४-८५॥ उसके साथ रहते हुए उसे आवश्यक कार्य के कारण वैश्य-पुत्र दूसरे द्वीप को जाने को उद्यत हुआ। उसकी प्यारी पत्नी भी उसके साथ जाने के लिए तैयार हुई। कारण यह कि प्रेमपूर्ण स्त्रियों का हृदय पति के विरह को सहन नहीं कर सकता॥८६-८७॥ वह वैश्य-पुत्र मंगलाचरण करके यात्रा के लिए चल पड़ा किन्तु जाने के लिए तैयार बैठी हुई पत्नी को साथ न ले गया। उसकी पत्नी जाते हुए पति को आंसुओं से पूर्ण नेत्रों से देखती हुई गृह-द्वार के किवाड़ के सहारे लटककर खड़ी रही। धीरे-धीरे उसके अंगों से ओझल हो जाने पर वियोग को सहन न कर सकने के कारण वह गिर पड़ी और मानों भय से उसके प्राण निकल गये॥८८-९०॥ वैश्य-पुत्र यह जानकर पीछे लौटा और उसने वियोग-व्याकुल अनाथ निर्जीव पत्नी को देखा॥ ९१॥ भूमि पर निर्जीव पड़ी हुई उसके पीले मुख पर सुगन्धा लेप रही थी। इस प्रकार स्थित हुई उसकी सुन्दर कान्ति लटक रही थी। ऐसा मालूम होता था कि मानो चन्द्रमा की समस्त शोभा भी मान के कारण पृथ्वी पर गिर पड़ी हो॥ ॥ वैश्य-पुत्र उसे अपनी गोद में सुला लिया और रोने लगा। जोर-जोर उसकी श्वासानि के तपते हुए शरीर से मानो भयभीत प्राण-पवन निकल भागे कि कहीं हम भी अन्दर ही जलकर भस्म न जायें॥ ३॥ इस प्रकार परस्पर के विरह से वह दम्पती मर गया। इसीलिए सच्चा स्नेही और परस्पर वियोगियों से भी रक्षा करनी होती॥९४॥ मन्त्रिवित् दम्भोलि के इस प्रकार कहने पर धैर्य-भण्डार यौगन्धरायण बोला—वीर पुरुष का स्वभाव निष्ठा है। राजाओं के साथ ऐसा ही होता है। इस प्रसंग में कथा सुनो—॥ ९५-९६॥
२५२ कथासरित्सागर
२५२ कथासरित्सागर राजा पुण्यसेनस्य कथा उज्जयिन्यामभूत्पूर्वं पुण्यसेनाभिधो नृपः। स जातु बलिनान्येन राज्ञा गत्वाभ्ययुज्यत॥१९७॥ अथ तमन्त्रिणो धीरास्तमरिं वीक्ष्य दुर्जयम्। मिथ्या 'राजा मृत' इति प्रवाद्य सर्वतो व्यधुः॥१९८॥ प्रच्छन्नं स्थापयामासुः पुण्यसेनं नृपं च ते। अन्यं कञ्चिदधाक्षुश्च' राजार्हविधिना शवम्॥१९९॥ अराजकानामधुना भव राजा त्वमेव नः। इति दूतमुखेनाथ तमरिं जगदुश्च ते॥२००॥ तथेत्युक्तवतस्तस्य रिपोस्तुष्टस्य ते सतः। मिलित्वा सैन्यसहिताः कटकं बिभिदुः क्रमात्॥१०१॥ भिन्ने च सैन्ये राजानं पुण्यसेनं प्रकाश्य तम्। ते सम्प्राप्तबलाः शत्रुं तं निजघ्नुः स्वमन्त्रिणः॥१०२॥ ईदृशि राजकार्याणि भवन्ति सचिव क्षमम्। देवीदाहप्रवावेन कार्यं धैर्येण कुर्महे॥१०३॥ इत्येतन्निश्चितमते भूत्वा यौगन्धरायणात्। रुमन्वत्तानब्रवीदेवं तर्हि यद्येष निश्चयः॥१०४॥ तद्गोपालकमानीय देव्या भ्रातरमादृतम्। सम्मन्त्र्य च समं तेन सम्यक्सर्वं विधीयताम्॥१०५॥ एवमस्त्विति वक्ति स्म ततो यौगन्धरायणः। तत्क्षणमात्रमन्वाद्यं चक्रे कर्त्तव्यनिश्चयम्॥१०६॥ अन्येद्युर्मन्त्रिमख्यो हि दूतं व्यसृजतां निजम्। गोपालकं समानेतुमुत्कण्ठाभ्यपदेशतः॥१०७॥ कार्यहेतोर्गतं पूर्वं तद्भूरावधनाच्च सः। अगाद् गोपालकस्तत्र स्वयं मूर्त्त इवोत्सवः॥१०८॥ आगतं तमहद्दृष्ट्वा स्वयं यौगन्धरायणः। निनाय सहमन्त्र्यक्तं गृहं गोपालकं निशि॥१०९॥ तत्र चास्मै सवुत्साहं शशंस स्वचिकीर्षितम्। यत्पूर्वं मन्त्रितं तेन समं सह रुमण्वता॥११०॥ १ अधाक्षुः = दाहं चक्रुः।
तृतीय लम्बक २५३
तृतीय लम्बक २५३ राजा पुण्यसेन की कथा प्राचीन काल में उज्जयिनी में पुण्यसेन नाम का राजा था। वह किसी बलवान् शत्रु राजा से आक्रान्त हो गया। उसके धैर्यशाली मन्त्रियों ने शत्रु को अजेय समझकर यह झूठी घोषणा कर दी कि राजा मर गया और अन्य किसी मुर्दे का राजा के समान धूमधाम से संस्कार करा दिया ॥१९॥ तदनन्तर मन्त्रियों ने एक दूत द्वारा शत्रु राजा को यह सन्देश भेजा कि हमलोग बिना राजा के अनाथ हो गये हैं। अब आप ही हमारे राजा बनिए ॥२०॥ सन्देश सुनकर राजा सन्तुष्ट एवं युद्ध के लिए शिथिल हो गया और उसने स्वीकार कर लिया। इस सन्धि के अवसर से लाभ उठाकर मन्त्रियों ने उसकी शिथिल सेना पर छापा मार दिया ॥२१॥ सेना के पैर उखड़ गये और वह भाग गई। तब मन्त्रियों ने अपने राजा पुण्यसेन को प्रकट करके शत्रु-राजा को भी पकड़कर मार दिया। राज्य-संबंधी काम इसी प्रकार छल-कपटों से सिद्ध किये जाते हैं। इसी प्रकार महारानी के जल जाने का हल्ला मचाकर हमलोग धैर्यपूर्वक कार्य करते हैं ॥२२॥ इस कार्य के लिए दृढ़ निश्चय किये हुए यौगन्धरायण से यह सुनकर रुमण्वान् ने कहा कि यदि ऐसी बात है तो मैं तैयार हूँ। महारानी के भाई गोपालक को बाहर बुलाकर उसके साथ भलीभाँति विचार कर लो' ॥२३॥ तब यौगन्धरायण ने 'ऐसा ही हो'—यह कहकर दूसरे ही दिन गोपालक को मिलने के बहाने बुलाने के लिए दूत भेजा ॥२४॥ प्रथम बार विवाह के लिए आया गोपालक इस बार दूत के कहने से मूर्त्तिमान् उत्सव के समान कौशाम्बी आया। उसके आने के दिन ही यौगन्धरायण उसे रात में रुमण्वान् के साथ अपने घर ले गया ॥२५-२६॥ वहाँ ले जाकर यौगन्धरायण ने रुमण्वान् के साथ परामर्श करके जो मन्तव्य निर्धारित किया था वह गोपालक को कह सुनाया ॥२७॥
२६४ कथासरित्सागर
२६४ कथासरित्सागर स च राजहितैषी सन् दुःखावहमपि स्वसुः । गोपालकोऽनुमन् तन्वत्सन्त्य हि सतां वचः ॥१११॥ सर्वमेतत्सुविहितं देवी दग्धामवत्य तु । प्राणैस्त्यजन् मयं रक्ष्यो वत्सेश इति चिन्यताम् ॥११२॥ सदुपायान्सामग्रीसम्भवं किल सत्यपि । गुरुममङ्ग हि मन्त्रस्य विनिपातप्रतिक्रिया ॥११३॥ इति भूयोऽपि तत्कालमुक्ते तत्र रूमण्वता । उवाचालोचिताशेषकार्यो यौगन्धरायणः ॥११४॥ नास्त्यत्र चिन्ता यद्राजपुत्री गोपालकस्य सा । कनीयसी स्वसा देवी प्राणेभ्योऽप्यधिका प्रिया ॥११५॥ एतस्य पाल्पमालोक्य शोकं वत्सेश्वरस्तदा । जीवत्येवाभिहेवेति मत्वा धैर्यमवाप्स्यति ॥११६॥ अपि चोत्तमसत्त्वोऽयं शीघ्रं च परिणीयते । पद्मावती ततो देवी दर्श्यत षाचिरादिति ॥११७॥ एवमेतद् विनिश्चित्य ततो यौगन्धरायणः । गोपालको रूमण्वाञ्च ततो मन्त्रमिति व्यधुः ॥११८॥ युक्त्या लावाणकं याम सह वेष्या नृपेण च । पर्यन्तो मगधासन्नवर्ती हि विषयोऽस्ति सः ॥११९॥ सुभगाखेटभूमित्वाद्राज्ञश्चाशास्यभिधानकृत् । तत्रान्तः पुरमादीप्य क्रियते मन्त्रि चिन्तितम् ॥१२०॥ देवी च स्थाप्यते नीत्वा युक्त्या पद्मावतीगृहे । छन्नस्थिताया येनास्याः सैव स्याच्छीलसाक्षिणी ॥१२१॥ एव रात्रौ मिथः कृत्वा मन्त्रं सर्वेऽपरेऽहनि । यौगन्धरायणाद्यास्ते प्राविशन् राजमन्दिरम् ॥१२२॥ तत्रैषमथ विज्ञप्तो वत्सराजो रूमण्वता । देव ! लावाणकेऽस्माकं गतानां वर्ततं शिवम् ॥१२३॥ स चातिरम्यो विषयस्तत्र चाखेटभूमयः । शोभनाः सन्ति हे राजन्प्रमदासाश्च सुग्रहाः ॥१२४॥ बाधते तं च नैकट्यात्सर्वं स मगधेश्वरः । ततत्र रक्षाहतोश्च विनोदाय च गम्यताम् ॥१२५॥
तृतीय लम्बक २५५
तृतीय लम्बक २५५ उस राजा के हितैषी गोपालक ने बहिन के लिए अति कष्टप्रद होने पर भी उस योजना को सुनकर अपनी सहमति प्रकट की क्योंकि हितैषी सज्जनों के वचन तो मानने ही चाहिए। इस योजना में सब बातें तो ठीक हैं, किन्तु देवी को जली जानकर अपने प्राणों को त्यागने की चेष्टा करते हुए वत्सराज की रक्षा कैसे की जाय यह विचारणीय प्रश्न है। अच्छे उपाय आदि सभी सामग्री के रहते हुए भी योजना को नष्ट होने से बचाना योजकों का मुख्य अंग है। अर्थात् यदि राजा का अस्तित्व ही न रहा तो योजना का आधार नष्ट हो जायगा ॥१११–११३॥ रुमण्वान् के उस समय पुनः ऐसा कहने पर सारे कामों पर भलीभाँति सोचे-समझे हुए यौगन्धरायण बोला—‘इस विषय में चिन्ता न करनी चाहिए कि महारानी गोपालक की छोटी बहिन राजा को प्राणों से प्रिय है ॥११४–११५॥ उस समय राजा के शोक के कुछ कम होने पर कदाचित् रानी जीवित हो जाय। ऐसी आशा से राजा धैर्य धारण करेगा। और राजा उच्चतम कोटि का जीव है अतः उसका विवाह भी शीघ्र ही हो जायगा फिर उस बीच ही पद्मावती भी दिखा दी जायगी ॥११६-११७॥ इस प्रकार गोपालक रुमण्वान् और यौगन्धरायण परस्पर विचार-विनिमय करते रहे। अन्त में निश्चय हुआ कि हमलोग कोई बहाना बनाकर राजा और रानी के साथ लावानक गाँव को चलें। वह हमारा स्थान सीमा पर तथा मगध के समीप है। सुन्दर शिकारगाह होने के कारण राजा भी शिकार में लगा रहेगा इसी बीच हमलोग रनिवास में आग लगा देंगे किसी उपाय से महारानी को गुप्त रूप से पद्मावती के पास ही छिपा देंगे जिससे वह वासवदत्ता के स्वभाव और चरित्र से परिचित हो जायगी ॥११८–१२१॥ इस प्रकार रात्रि के समय सम्मति करके दूसरे दिन वे सब राजभवन को गये। वहाँ जाकर रुमण्वान् ने वत्सराज से निवेदन किया कि 'देव ! हमलोग लावानक ग्राम में जायें तो बहुत अच्छा हो। वह अति रमणीय स्थान है। वहाँ अच्छे-अच्छे शिकारगाह हैं और वहाँ मद पान की भी बहुतायत है। समीप होने के कारण मगध-नरेश वहाँ सदा बाधा पहुँचाता रहता है। इसलिए उसकी रक्षा के लिए और मनोरंजन के लिए वहाँ चलिए ॥१२२–१२५॥
२५६ कथासरित्सागर
२५६ कथासरित्सागर एतच्छ्रुत्वा च वत्सेशः समं वासवदत्तया। क्रीडङ्कलारसद्दध्रे गन्तुं लावाणकं मतिम्॥१२६॥ निश्चितं गमनेऽन्येद्युलग्ने च परिकल्पिते। अकस्मान्नारदमुनिः कान्तिद्योतितदिङ्मुखः॥१२७॥ अवतीय नभोमध्यात् प्रदत्तनयनोत्सवः। धात्रीव स्वकुलप्रीत्या च वत्सेश्वरमभ्यगात्॥१२८॥ गृहीतातिथ्यसत्कारः पारिजातमयीं स्रजम्। प्रीतः स च मुनिस्तस्मै ददौ प्रह्लाय भूभृते॥१२९॥ विद्याधराधिपं पुत्रं कामदेवांशमाप्स्यसि। इति वासवदत्तां च सोऽभ्यनन्दत्कृतान्तरः॥१३०॥ ततश्चोवाच वत्सस्य स्थिते यौगन्धरायणे। राजन् वासवदत्तां ते दृष्ट्वा हन्त स्मृतं मया॥१३१॥ युधिष्ठिरादयोऽभूवन्पुरा त प्रपितामहाः। पञ्चानां द्रौपदी सेषामेका पत्नी बभूव च॥१३२॥ सा च वासवदत्तेव रूपेणाप्रतिमाभवत्। ततस्तद्दोषमाशङ्क्य तानवमहमभ्यधाम्॥१३३॥ स्त्रीवैरं रक्षणीयं वस्तद्धि बीजमिहापदाम्। समाहि शृणुतेसां च कथां वः कथयाम्यहम्॥१३४॥ सुन्दोपसुन्दकथा सुन्दोपसुन्दनामानौ भ्रातरौ द्वौ बभूवतुः। असुरौ विक्रमाक्रान्तलोकत्रितयदुर्जयौ॥१३५॥ तयोर्विनाशकामश्च दत्त्वाज्ञां विश्वकर्मणः। ब्रह्मा निर्मापयामास दिव्यनारीं तिलोत्तमाम्॥१३६॥ रूपमालोकितुं यस्याश्चतुर्विक्क चतुर्मुखः। बभूव किल शर्वोऽपि कुर्व्वाणायाः प्रदक्षिणम्॥१३७॥ सा पद्मयोगरावेक्षात्पार्श्वं सुन्दोपसुन्दयोः। प्रलोभनाय प्रययौ कैलासोद्यानवत्तिनोः॥१३८॥ १ महाभारतस्यादियर्ववि कथेयमुपक्रम्यते।
तृतीय लम्बक २५७
तृतीय लम्बक २५७ यह सुनकर एकमात्र क्रीड़ा का लोभी राजा वासवदत्ता के साथ लावणक जाने के लिए उद्यत हो गया ॥१२६॥ किसी दिन जाने का निश्चय होने और यात्रा का शुभ मुहूर्त निकलने पर अपनी कान्ति से दिशाओं को प्रकाशित करते हुए नारद मुनि आकाश से उतरकर दर्शकों की आँखों को आनन्दित करने लगे। मानों चन्द्रमा अपने वंश (चन्द्रवंश) से प्रेम के कारण आकाश से उतर आया हो ॥१२७-१२८॥ राजा के द्वारा आतिथ्य-सत्कार ग्रहण किए हुए नारद मुनि ने नम्रता से झुके हुए राजा उदयन को प्रसन्नता से पारिजात के फूलों की माला प्रदान की ॥१२९॥ ऋषि ने नमस्कार करती हुई वासवदत्ता से कहा—'तुम कामदेव के अंश से उत्पन्न एक पुत्र को प्राप्त करोगी जो विद्याधरों का राजा होगा'॥१३०॥ तब यौगन्धरायण के सामने नारद ने वत्सराज से कहा—हे राजन्! तुम्हारी पत्नी वासवदत्ता को देखकर मुझे स्मरण हो गया कि प्राचीन समय में तुम्हारे पर दादा युधिष्ठिर भीम आदि पाँच भाई थे । उन पाँचों की एक ही पत्नी द्रौपदी थी। वह वासवदत्ता के समान ही अनुपम सुन्दरी थी। इस दोष को देखकर मैंने इन लोगों से कहा कि तुम पाँचों को स्त्री के सम्बन्ध से परस्पर बैर न करना चाहिए । इस प्रसंग में एक कथा कहता हूँ सुनो ॥१३१-१३४॥ सुन्द और उपसुन्द की कथा प्राचीन काल में सुन्द और उपसुन्द नाम के दो असुर थे जो अपने अतुल बल के कारण तीनों लोकों को जीतने के कारण अजेय थे ॥१३५॥ उन दोनों भाइयों के विनाश की इच्छा से ब्रह्मा ने विश्वकर्मा से तिलोत्तमा नामक दिव्य नारी का निर्माण कराया ॥१३६॥ चारों ओर से उसके रूप को देखने के लिए ब्रह्मा चतुर्मुख हो गये। जब वह प्रदक्षिणा कर रही थी तब शिव भी उसे चारों ओर से देखने के लिए ही चतुर्मुख हो गये ॥१३७॥ वह तिलोत्तमा ब्रह्मा की आज्ञा से विन्ध्याचल के तटवर्ती प्रदेश में स्थित उन असुरों के प्रलोभन के लिए गई ॥१३८॥ ३३
५५८ कथासरित्सागर
५५८ कथासरित्सागर तौ चासुरौ जगृहतुस्तां दृष्ट्वैवान्तिकागताम्। उभावप्युभयोर्बाह्वो सुन्दरीं काममोहितौ ॥१३९॥ परस्परविरोधेन हरन्तौ तां च तत्क्षणम्। प्रवृत्तसम्प्रहारत्वादुद्वावपि क्षयमीयतुः ॥१४०॥ एवं स्त्रीनाम विषयो निदानं कस्य नापदाम्। युष्माकं द्रौपदी चैका बहूनामिह वल्लभा ॥१४१॥ तन्निमित्तं समयः संरक्षण्यो भवतां किल। मद्वाक्यादयमस्तस्या समयश्चास्तु वः सदा ॥१४२॥ ज्येष्ठांतिकगता माता मन्तव्य कनीयसा। ज्येष्ठेन च स्नुषा ज्ञेया कनिष्ठान्तिकवर्तिनी ॥१४३॥ इत्येतन्मद्वचो राजंस्तव ते प्रपितामहाः। तथेति प्रत्यपद्यन्त कल्याणकृतबुद्धयः ॥१४४॥ ते च मे सुहृदोऽभूवस्तत्प्रीत्या चाहमागतः। त्वां द्रष्टुमिह वत्सेश¹ तदिदं शृणु वच्मि ते ॥१४५॥ यद्यत्मे कुरु वाक्यं कुर्यांस्त्वं मन्त्रिणां सह। अचिरेण च कालेन महतीमृद्धिमाप्स्यसि ॥१४६॥ किंचित्काल च दुःखं तन्भविष्यति न च त्वया। तत्रातिमोहः कर्त्तव्यः सुखान्तं भविता हि तत् ॥१४७॥ सम्यगेवमभिधाय तत्क्षणं वत्सराजमुवयस्य भाविषु। र्धर्मिसुचनविधौ विशारदो नारदो मुनिरखशन ययौ ॥१४८॥ सर्वे च तस्य वचसा मुनिपुङ्गवस्य योगन्धरायणमुखा सचिवास्त्ववस्ते। सम्भाष्य सिद्धयुवयमारमभिकीर्षितस्य सम्पादनाय सुतरां जगृहु प्रयत्नम् ॥१४९॥ इति महाकविश्रीसोमदेवभट्टविरचिते कथासरित्सागरे लावानक लम्बके प्रथमस्तरङ्गः
तृतीय लम्बक १५९
तृतीय लम्बक १५९ उसे एकान्त में समीप आई हुई देखकर उन काम-मोहित दोनों असुरों ने उसे दोनों बाहुओं से पकड़ा। उसे अपनी-अपनी ओर खींचते हुए वे दोनों परस्पर लड़ पड़े और नष्ट हो गये' ॥१३९-१४०॥ इस प्रकार स्त्री किसके लिए विपत्तियों का कारण नहीं बनती। तुम बहुतों की एक ही प्यारी स्त्री द्रौपदी है॥१४१॥ इसको लेकर होनेवाले आपसी कलह से तुमलोगों को बचना चाहिए। मेरे कहने से आप लोग उसका एक नियम निर्धारण कर लें ॥१४२॥ बड़े भाई के पास गई हुई उसे छोटे भाई, माता के समान समझें और छोटे भाइयों के समीप जाने पर बड़ा भाई उसे बहू (पुत्र-वधू) के समान समझें। हे राजन् ! शुभ बुद्धि वाले तुम्हारे परदादों ने मेरे वचन को उसी प्रकार स्वीकार कर लिया। वे लोग मेरे मित्र थे मैं तुम्हारे पास उसी प्रेम से तुम्हें देखने आया हूँ और यह कहता हूँ सुनो ॥१४३-१४५॥ जैसे तुम मेरी बात को मानते हो उसी प्रकार अपने मंत्रियों की बात को भी मानना। इस प्रकार तुम शीघ्र ही महान् ऐश्वर्य प्राप्त करोगे ॥१४६॥ कुछ समय तक तुम्हें कष्ट होगा उस समय तुम अधिक मोह न करना क्योंकि यह दुःख सुखान्त होगा अर्थात् अन्त में सुख मिलेगा ॥१४७॥ 'आप जो कहते हैं ठीक है' वत्सराज के ऐसा कहने पर भावी अभ्युदय के चिह्नों की सूचना देने में विशारद नारद मुनि अन्तर्धान हो गये ॥१४८॥ यौगन्धरायण आदि सभी राज-मन्त्री मुनिप्रवर नारद के वचनों से अपनी योजना की सफलता समझ कर उसे कार्यान्वित करने का प्रयत्न करने लगे ॥१४९॥ महाकवि सोमदेव भट्ट-विरचित कथा सरित्सागर के लावानक लम्बक का प्रथम तरंग समाप्त।
१ यह कथा महाभारत के आदि पर्व में भी आती है।
२६ कथासरित्सागर
२६ कथासरित्सागर द्वितीयस्तरङ्ग वत्सराज-पद्मावत्योःपरिणयः ततः पूर्वोक्तया युक्त्या वत्सराजं सवल्लभम्। यौगन्धरायणाद्यास्ते निन्युर्लावाणकं प्रति ॥१॥ स राजा प्राप तं देशं स्वयशोपेण मूर्च्छता। अभिवाञ्छितसंसिद्धिं वदन्तमिव मन्त्रिणाम् ॥२॥ तत्र प्राप्तं विदित्वा च वत्सेशं सपरिच्छदम्। अवस्कन्दभयाच्छङ्की चकंपे मगधेश्वरः ॥३॥ यौगन्धरायणोपान्तं स्वबुद्धिविससर्ज च। स दूतं सोऽपि सम्मन्त्र्य कार्यशोऽभिननन्द तम् ॥४॥ वत्सेश्वरोऽपि निवसंस्तस्मिन्देशे दवीयसीम्। आखेटकार्थमटवीमटति स्म दिने दिने ॥५॥ एकस्मिन् दिवसे तस्मिन् राज्ञ्याखेटकं गते। कर्तव्यसविदं कृत्वा गोपालकसमन्वितः ॥६॥ यौगन्धरायणो धीमान् सङ्क्रमय्यवसन्तकः। देव्या वासवदत्ताया विजने निकटं ययौ ॥७॥ तत्र तां राजकार्येऽत्र साहाय्ये तदाद्युक्तिभिः। प्रह्वामभ्यर्थयामास भ्रात्रा पूर्वं प्रबोधिताम् ॥८॥ सानुमेने च विरह-क्लेश-दायितवात्मनः। किं नाम न सहन्ते हि भर्तृभक्ताः कुलाङ्गनाः ॥९॥ ततस्तां ब्राह्मणीरूपां देवीं यौगन्धरायणः। स चकार कृती दत्त्वा योगं रूपविवर्त्तनम् ॥१०॥ वसन्तकं च कृतवान् काणं बटुकरूपिणम्। आत्मना च तथैवाभूत्स्थविर-ब्राह्मणाकृतिः ॥११॥ तथा रूपां गृहीत्वाथ तां देवीं स महामतिः। वसन्तकसखः स्वरं प्रतस्थे मगधान् प्रति ॥१२॥ तथा वासवदत्ता सा स्वगृहाद्विर्गता सती। जगाम्बिपतनं भर्त्तारं पन्थानं वपुषा पुनः ॥१३॥ तन्मन्दिरमथादीप्य दह्यतेन रुमण्वता। हा हा वसन्तकयुता देवी दग्धेत्यघोषयत् ॥१४॥ तया च बहुमात्रन्दो रुमं तत्रोदतिष्ठताम्। शमं शशाम वह्नो न पुन' क्रन्दितध्वनिः ॥१५॥
तृतीय लम्बक २५१
तृतीय लम्बक २५१ द्वितीय सरग राजा उदयन और पद्मावती के विवाह की कथा नारद मुनि के प्रस्थान करने पर यौगन्धरायण आदि मन्त्री पूर्व-निर्धारित राजा को रानी के साथ लावानक ग्राम ले गये ॥१॥ राजा उदयन चारों ओर फैलते हुए सेना के सदस्यों के साथ लावानक पहुँचा। सेना की कलकल ध्वनि से वह स्थान मानो मन्त्रियों की सफलता की घोषणा कर रहा था ॥२॥ सीमा पर सेना के साथ आये हुए उदयन का पता पाकर मगध का राजा आक्रमण के भय से काँप उठा ॥३-४॥ वत्सराज भी वहाँ रहते हुए शिकार के लिए प्रतिदिन गहरे वनों में घूमता था ॥५॥ मगध-नरेश ने सद्भावना-प्रदर्शन के लिए यौगन्धरायण के पास अपना दूत भेजा। उस चतुर मन्त्री ने भी दूत का समुचित रूप से अभिनन्दन किया ॥६॥ वासवदत्ता के जलने की कथा एक दिन राजा उदयन के शिकार के लिए चले जाने पर यौगन्धरायण गोपालक रुमण्वान और वसन्तक के साथ समिति करके एकान्त में वासवदत्ता के समीप गया। भाई द्वारा पहले ही तैयार की गई रानी से उसने राजकार्य में सहायता के लिए भिन्न-भिन्न प्रकार की बातें समझाई ॥७-८॥ वासवदत्ता ने उस अत्यन्त विरह-क्लेश देनेवाली योजना को भी राजा के अभ्युदय के लिए स्वीकार कर लिया। पतिभक्त कुल-रमणियाँ पति के लिए कौन-सा कष्ट सहन नहीं करती ॥९॥ तब राजनीति-कुशल यौगन्धरायण ने वेश बदलने का सामान देकर वासवदत्ता को ब्राह्मणी का रूप धारण कराया ॥१०॥ वसन्तक को काने ब्रह्मचारी शिष्य का रूप धारण कराया और स्वयं बूढे ब्राह्मण का रूप धारण किया ॥११॥ इस प्रकार कृत्रिम वेष से यौगन्धरायण उन दोनों को साथ लेकर धीरे-धीरे मगध देश की ओर चला ॥१२॥ उस रूप में घर से निकली हुई वासवदत्ता मन से पति की ओर और शरीर से मगध-मार्ग की ओर चली ॥१३॥ उन तीनों के चले जाने पर दूसरे मन्त्री रुमण्वान् ने लावानक के राजगृह में आग लगा दी और यह घोषणा कर दी कि वसन्तक के साथ महारानी जल गईं। समूचे लावानक में आग और क्रन्दन की ध्वनि एक साथ ही उठी। आग धीरे-धीरे दब गई, किन्तु क्रन्दन-ध्वनि बन्द न हुई ॥१४-१५॥
२६२ कथासरित्सागर
२६२ कथासरित्सागर यौगन्धरायणः सोऽथ सह वासवदत्तया। वसन्तकेन च प्राप मगधाधिपतेः पुरम्॥१६॥ तत्रोद्यानगतां दृष्ट्वा समं ताभ्यामुपाययौ। पद्मावतीं राजसुतां वार्यमाणोऽपि रक्षिभिः॥१७॥ पद्मावत्याश्च दृष्ट्वैव ब्राह्मणीरूपधारिणीम्। देवीं वासवदत्तां तां वृत्तो प्रीतिरजायत॥१८॥ सा रक्षिणो निषिध्यैव ततो यौगन्धरायणम्। आनाययद्राजकन्या ब्राह्मणाकृतिमन्तिकम्॥१९॥ पप्रच्छ च महाब्रह्मन्! का ते बाला भवत्यसौ। किमर्थमागतोऽसीति सोऽपि तां प्रत्यभाषत॥२०॥ इयमावन्तिका नाम राजपुत्रि सुता मम। अस्याश्च भर्ता व्यसनी त्यक्त्वेमां कुत्रचिद् गतः॥२१॥ तदेतां स्थापयाम्यद्य तव हस्ते यशस्विनि। यावदामानयाम्यस्या गत्वाश्विष्याचिरात् पतिम्॥२२॥ भ्राता काणवटुश्वायमिहैवास्याः समीपगः। तिष्ठत्वेकाकिनीभावदुःखं येन न यात्यसौ॥२३॥ इत्युक्त्या राजतनयामङ्गीकृतवखास्तया। तामामन्त्र्य स सन्मन्त्रिी द्रुतं लावणकं ययौ॥२४॥ ततो वासवदत्तां तां स्थितामावन्तिकाख्यया। वसन्तकं चानुगतं तं काणवटुरूपिणम्॥२५॥ सहादाय कृतोदारसत्कारा स्नेहशालिनी। पद्मावती स्वभवनं विवेश बहुकौतुकम्॥२६॥ तत्र वासवदत्ता च प्रविष्टा चित्रभित्तिषु। पश्यन्ती रामचरिते सीतां सहे निजव्यथाम्॥२७॥ आश्वस्या सोष्ठुमार्येण दायमाद्यनसोष्ठवैः। शरीरसौरभन्तापि नीलोत्पलमुगन्धिना॥२८॥ तामुत्तमां विनिश्चित्य महार्हरत्नमन्त समैः। पद्मावती यथाकाममुपचारैरपाहरत्॥२९॥ अचिन्तयच्च काप्येषा छन्ना नूनमिह स्थिता। गूढा हि द्रौपदीत्यासीद् विराटवसताविति॥३०॥
तृतीय लम्बक २६३
तृतीय लम्बक २६३ उधर यौगन्धरायण उन दोनों को साथ लिए हुए मगध-नरेश की राजधानी में प्रविष्ट हुआ॥१६॥ वहाँ राजकुमारी को उद्यान में घूमते देखकर सिपाहियों के रोकने पर भी यौगन्धरायण उन दोनों के साथ अन्दर घुस गया॥१७-१८॥ पद्मावती ने उधर देखा और वासवदत्ता की ओर उसकी आँखें बरबस उलझ गईं तथा उसके प्रति प्रेम उत्पन्न हो गया। उसने सिपाहियों को मना करके उस ब्राह्मणी के रूप में स्थित राजकन्या को अपने समीप बुलाया। और बूढ़े ब्राह्मण से पूछा कि हे ब्रह्मदेव ! यह बालिका कौन है ? तथा यहाँ मेरे पास किस लिए आये हो ? यौगन्धरायण ने उत्तर दिया। हे राजकुमारी ! यह अवन्तिका नाम की मेरी बेटी है। इसका व्यसनी पति इसे छोड़ कर कहीं चला गया। इसलिए इसे मैं तुम्हारे हाथ सौंपता हूँ। तब तक उस जामाता को शीघ्र ही ढूँढ़ कर लाता हूँ ॥१९-२२॥ इसका भाई यह कानबटु भी जब तक इसके पास ही रहेगा जिससे इसे अकेलेपन का कष्ट-अनुभव न हो ॥२३॥ ऐसा सुनकर पद्मावती ने बूढ़े ब्राह्मण की प्रार्थना स्वीकार कर ली और वह बूढ़ा यौगन्धरायण पद्मावती से आज्ञा लेकर लावणक लौट आया ॥२४॥ उसके जाने पर स्नेहशीला पद्मावती अवन्तिका का उदार हृदय से स्वागत करके काने के साथ कानबटु और वासवदत्ता को अपने आश्चर्यमय भवन में ले गई॥२५-२६॥ राज-भवन में जाकर दीवारों पर लिखे हुए रामचरित के चित्रों को देखकर विरह-वेदना को सीता के समान सहन करने लगी ॥२७॥ स्वरूप से सुकुमारता से उठने-बैठने सोने आदि के सुन्दर ढंग से नील कमल के समान शरीर की सुगन्धि से उसे उच्च श्रेणी की महिला समझकर पद्मावती उसके साथ अपने ऐसे राजोचित व्यवहार करने लगी और मन में सोचती थी कि यह कोई (छिपाई हुई) रमणी है जैसे विराट् के राजभवन में द्रौपदी छिपी थी ॥२८-३०॥
अथ वासवदत्तास्याश्चक्रे देव्याः प्रसङ्गतः। अम्लानमालातिलको वत्सेशात्पूर्वशिक्षितौ ॥३१॥ तद्भूषितां च दृष्ट्वा तां माता पद्मावतीं रहः। पप्रच्छ मालातिलको केनेमौ निर्मिताविति ॥३२॥ ऊचे पद्मावती चेनामत्र मन्मन्दिरे स्थिता। लाविडावन्तिका नाम तया कृतमिदं मम ॥३३॥ तच्छ्रुत्वा सा बभाषे तां मातापुत्रि ! न सा हि सा। मानुषी कापि देवी सा यस्या विज्ञानमीदृशम् ॥३४॥ देवता मुनयश्चापि वञ्चनार्थं सतां गृहं। तिष्ठन्त्येव सथा चैतामत्र पुत्रि ! कथां शृणु ॥३५॥ कुन्तीकथा बभूव कुन्तिभोजाख्यो राजा तस्यापि वेश्मनि। आगत्य तस्थौ दुर्वासा वञ्चनैकरसो मुनिः ॥३६॥ स तस्य परिचर्यार्थं राजा कुन्तीं निजां सुताम्। आदिवेश मुनिं सापि यत्नेनोपचचार तम् ॥३७॥ एकदा स मुनिः कुन्तीं जिज्ञासुः सन्नभाषत। परमान्नं पचे शीघ्रं स्नात्वा यावदुपाम्यहम् ॥३८॥ इत्युक्त्वा त्वरितं स्नात्वा स परिभोक्तुमाययौ। कुन्ती तदन्नपूर्णां च तस्मै पात्रीमढौकयत् ॥३९॥ अतितप्तेन चान्नेन ज्वलन्तीमिव तां मुनिः। मत्वा हस्तप्रहायोग्यां कृत्वा पृष्ठे धृतं वदौ ॥४०॥ सापि पृष्ठेन तां पात्रीं दधौ सम्बाधया मुनेः। ततः स बुभुजे स्वच्छं कुन्तीपृष्ठं त्वदह्यत ॥४१॥ दह्यमानापि गाढं सा यत्तस्याप्यविकारिणी। तेन तुष्टो मुनिर्मुक्त्वा ददौ तस्यास्ततो वरम् ॥४२॥ इत्यासीत्स मुनिस्तत्र तथैषावन्तिकापि ते। तद्भावेन स्थिता कापि तत्त्वमाराधयत्यिमाम् ॥४३॥ इति मातुर्मुखाच्छ्रुत्वा पद्मावत्यन्यरूपिणीम्। तत्र वासवदत्तां तां सुतरां बहुमन्यत ॥४४॥ सापि वासवदत्तात्र निजनामविनाकृता। तस्थौ विधुरबिच्छाया निशीथेनेव पद्मिनी ॥४५॥
तृतीय लम्बक २६५
तृतीय लम्बक २६५ वासवदत्ता भी वत्सराज से सीखी हुई एवं कभी न मुरझाने वाली माला और तिलक- रचना से पद्मावती को प्रसन्न करती थी। उसकी माला और तिलक-रचना को देखकर पद्मावती की माता ने एकान्त में उससे पूछा कि यह माला और तिलक की रचना किसने की है ॥३१-३२॥ पद्मावती ने कहा कि मेरे भवन में अवन्तिका नाम की एक महिला ठहरी है। उसी ने यह मेरी तिलक रचना की है। यह सुनकर माता ने पद्मावती से कहा—बेटी! यदि ऐसा है तो वह मानुषी नहीं है वरन् देवी है, जो ऐसा विज्ञान जानती है। देवता और मुनि भी कभी-कभी ठगने के लिए लोगों के घरों में आ जाते हैं। इस प्रसंग में यह एक कथा सुनो ॥३३-३५॥ कुन्ती और दुर्वासा की कथा प्राचीन समय में कुन्ती भोज नाम का एक राजा था। उसके घर में ठहरने के लिए दुर्वासा ऋषि आकर ठहरे ॥३६॥ राजा ने ऋषि की सेवा के लिए अपनी कन्या कुन्ती को नियुक्त किया। वह भी बड़ी ही सावधानी से ऋषि की सेवा करती थी ॥३७॥ एक बार उस मुनि ने कुन्ती की परीक्षा के लिए कहा—'तू खीर पका मैं स्नान करके आता हूँ। ऐसा कहकर और शीघ्र ही स्नान करके ऋषि आ गये। कुन्ती ने खीर से भरी कड़ाही उनके सम्मुख उपस्थित की। अत्यन्त खौलती हुई (गरम-गरम) खीर को हाथ से खाने योग्य न समझकर ऋषि ने कुन्ती की पीठ पर दृष्टि डाली। कुन्ती ने भी ऋषि का मनोभाव समझकर उस कड़ाही को पीठ पर धारण कर लिया। तब ऋषि तो खीर खाने लगे किन्तु कुन्ती की पीठ जलने लगी। जलती हुई भी कुन्ती बिना हिल-डले अविचल भाव से बैठी रही उसके धैर्य से प्रसन्न होकर दुर्वासा ने उसे वरदान दिया। उसी दुर्वासा के समान यह अवन्तिका भी तेरे समीप देवता-रूप में है, तू इसकी भली-भाँति सेवा कर। माता के मुँह से ऐसा सुनकर पद्मावती वासवदत्ता से बहुत अधिक स्नेह करने लगी और अधिक सम्मान करने लगी। पतिविरहिता वासवदत्ता अर्धरात्रि की कमलिनी के समान दीन और मलिन रहती थी। कभी-कभी विदूषक वसन्तक की बालकों के समान विविध चेष्टाएँ, उस वियोगिनी के मुख पर मुस्कान का अवसर प्रदान करती थीं॥३८-४५॥ ३४