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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

१५२ कथासरित्सागरे

१५२ कथासरित्सागरे तत्र च स्थापिता गेहे स्थविरस्य द्विजन्मनः । विश्वदत्ताभिधानस्य न्यासीकृत्य सगौरवम् ॥१५८॥ ततश्चाहमिहायातो वुबुद्ध्वा त्वन्नाम तन्मुखात् । तामन्वेष्टुं ततो गच्छ शीघ्रं नागस्थलं प्रति ॥१५९॥ इत्युक्तो लुब्धकेनाथ स श्रीदत्तस्ततो ययौ । तं च नागस्थलं प्रापवपरेद्युर्विनात्यये ॥१६० ॥ भवनं विश्वदत्तस्य प्रविश्याथ विलोक्य तम् । ययाचे देहि मे भार्या लुब्धकस्थापितामिति ॥१६१॥ तच्छ्रुत्वा विश्वदत्तस्तं श्रीदत्तं निजगाद सः । मथुरायां सुहृन्मेऽस्ति ब्राह्मणो गुणिनां प्रियः ॥१६२॥ उपाध्यायश्च मन्त्री च शूरसेनस्य भूपतेः । तस्य हस्ते त्वदीया सा गृहिणी स्थापिता मया १६३॥ अयं हि विजनो ग्रामो न तत्रक्षाक्षमा भवेत् । तत्प्रातस्तत्र गच्छ त्वमद्य क्षम्यतामिह ॥१६४॥ इत्युक्तो विश्वदत्तेन स नीत्वाथ तां निशाम् । प्रातः प्रतस्थे प्रापञ्च मथुरामपरे दिने ॥१६५॥ दीर्घाध्वम्लानस्तस्मिन्नगरे बहिरेव सः । स्नानं चक्रे परिश्रान्तो निर्मले दीर्घिकाजले ॥१६६॥ सत एषाम्बुमध्याच्च वस्त्रं चौरनिवेष्टितम् । प्राप्तवानञ्चलप्रन्थिबद्धहारमसञ्जितम् ॥१६७॥ अथ तद्वस्त्रमादाय स तं हारमलक्षयन् । प्रियां दिवृक्षुः श्रीदत्तो विवेश मथुरां पुरीम् ॥१६८॥ तत्र तत्प्रत्यभिज्ञाय वस्त्रं हारमवाप्य च । स चौर इत्यवष्टभ्य निग्ये नगररक्षिभिः ॥१६९॥ दर्शितश्च तथाभूतो नगराधिपतेश्च तैः । तेनाप्यावदिता राजे राजाप्यस्याविदधाद् वधम् ॥१७०॥ ततो वध्यभुवं हन्तुं नीयमानं ददर्श तम् । सा मृगाङ्कवती दूरात् पश्चादाहतडिण्डिमम् ॥१७१॥ योऽयं मे नीयते भर्ता वधायेति ससम्भ्रमम् । सा गत्वा मन्त्रिमुख्यं तमब्रवीद्गृह स्थिता ॥१७२॥

द्वितीय लम्बक १५३

द्वितीय लम्बक १५३ वहाँ (नागस्थल में) मैंने उसे विश्वदत्त नामक वृद्ध ब्राह्मण के घर में गौरव के साथ धरोहर के रूप में रख दिया है। उसी से तुम्हारा नाम जानकर मैं तुम्हें ढूँढ़ने के लिए यहाँ आया हूँ ॥१५८-१५९॥ बहेलिये से इस प्रकार कहा गया धीरदत्त शीघ्र ही वहाँ से चल पड़ा और दूसरे दिन सायंकाल नागस्थल पहुँच गया ॥१६०॥ वहाँ विश्वदत्त के घर आकर और उससे मिलकर धीरदत्त ने कहा कि 'बहेलिये द्वारा रखी गई मेरी भार्या मुझे दे दो' ॥१६१॥ यह सुनकर विश्वदत्त ने धीरदत्त से कहा— मथुरा में मेरा एक मित्र गुणग्राही ब्राह्मण है। वह उपाध्याय है और राजा शूरसेन का मन्त्री भी है। मैंने उसी के पास तुम्हारी पत्नी को रख दिया है ॥१६२-१६३॥ यह ग्राम निर्जन है अतः यहाँ उसकी रक्षा सम्भव न थी। अब तुम प्रातःकाल वहाँ जाओ। आज यहीं विश्राम करो ॥१६४॥ विश्वदत्त से इस प्रकार कथित धीरदत्त उस रात को वहीं बिताकर दूसरे दिन प्रातःकाल मथुरा पहुँचा ॥१६५॥ लम्बे रास्ते के कारण मैला-कुचैला तथा थका हुआ धीरदत्त नगर के बाहर ही ठहर गया और निर्मल बावली के जल में स्नान करने लगा ॥१६६॥ स्नान करते हुए उसे चोरों द्वारा बावली में छिपाये हुए कुछ वस्त्र मिले जिनकी गाँठ में एक बहुमूल्य हार बँधा हुआ था। उसे धीरदत्त ने वहीं देखा ॥१६७॥ उन कपड़ों को लेकर मृगांकवती से मिलने की इच्छा से धीरदत्त ने मथुरा में प्रवेश किया ॥१६८॥ नगर में जाने पर सिपाहियों ने उन कपड़ों और उसकी गाँठ में बँधे हुए चोरी के हार को पाकर धीरदत्त को पकड़ लिया और उसे सामान के सहित नगराधिपति के सामने उपस्थित किया ॥१६९॥ इसने (नगराधिपति ने) राजा से निवेदन किया और राजा ने उसे (धीरदत्त को) फाँसी के लिए सिपाहियों को आदेश दे दिया ॥१७०॥ पीछे-पीछे बज रही ढग-ढगी के साथ फाँसी के स्थान पर ले जाये जाते हुए धीरदत्त को देखकर मृगांकवती ने राज्य के उस दूसरे मुख्यमन्त्री से जिसके घर में वह ठहरी थी, जाकर कहा कि 'मेरा पति फाँसी पर लटकाने के लिए ले जाया जा रहा है' ॥१७१-१७२॥ २

निवार्य वधकान्सोऽथ मन्त्री विज्ञाप्य भूपतिम्। श्रीदत्तं मोचयित्वा तं वधादानाययद् गृहम्॥१७३॥ कथं सोऽयं पितृव्यो मे गत्वा देशान्तरं पुरा। इहैव दवाद्द्विगसमयं प्राप्तोऽथ मन्त्रिताम्॥१७४॥ इति तं मन्त्रिणं सोऽथ श्रीदत्तस्तद्गृहागतः। प्रत्यभिज्ञातवान्पृष्ट्वा पपातास्य च पादयोः॥१७५॥ सोऽपि तं प्रत्यभिज्ञाय भ्रातुः पुत्रं सविस्मयः। कण्ठे जग्राह सर्वं च वृत्तान्तं परिपृष्टवान्॥१७६॥ ततस्तस्मै स निखिलं श्रीदत्तः स्वपितुर्वधात्। आरभ्य निजवृत्तान्तं पितृव्याय न्यवेदयत्॥१७७॥ सोऽपि मुक्त्वाश्रु विजनं भ्रातुः पुत्रं तमभ्यधात्। अधृतिं मा कृथाः पुत्र! मम सिद्धा हि यक्षिणी॥१७८॥ पञ्च वाजिसहस्राणि हेमकोटीश्च सप्त सा। प्रादाम्मह्यमपुत्राय तत्तवेशाखिलं धनम्॥१७९॥ इत्युक्त्वा स पितृव्यस्तां श्रीदत्तायार्पयत् प्रियाम्। श्रीदत्तोऽप्यात्तविभवस्तत्र तां परिणीतवान्॥१८०॥ ततश्च तस्मो तत्रैव सङ्गतः कान्तया तया। मृगाङ्कवत्या सानन्दो राज्येव कुमुदाकरः॥१८१॥ बाहुशाल्यादिरचिन्ता तु तस्याभूत्पूर्णसम्पदः। इन्द्बोः कलङ्कलेखेव हृदि मात्सर्यदायिनी॥१८२॥ एकदा स पितृव्यस्तं रहः श्रीदत्तमभ्यधात्। पुत्र! राज्ञः सुताराख्यस्य शूरसेनस्य कन्यका॥१८३॥ मया चावन्तिवेशं सा नेया दातुं सदाज्ञया। तत्तैनैवापदेशेन कृत्वा तुभ्यं ददामि ताम्॥१८४॥ ततस्तदनुगे प्राप्ते बले सति च मामके। यद् राज्यं ते धियाविष्टं तत्प्राप्स्यस्यचिरादिति॥१८५॥ निश्चित्यैतच्च तां कन्यां गृहीत्वा मयतुस्ततः। श्रीदत्तस्तत्पितृव्यश्च ससैन्याः सपरिग्रहो॥१८६॥ ततो विन्ध्याटवीमेतौ प्राप्तमात्राववस्थितौ। चौरसेनातिमहती रुरोध सरसत्त्विणी॥१८७॥

द्वितीय लम्बक १५५

द्वितीय लम्बक १५५

उस मुख्यमंत्री ने अपनी आज्ञा से वधिकों को रोककर और राजा को सूचित करके उस धीरदत्त को दंड से छुड़ाकर अपने घर बुला लिया॥१७३॥ ये मेरे चाचा विगतभय किसी समय घर से विदेश चले गये थे व ही आज दैवयोग से मथुरा-नरेश के मन्त्री हो गये हैं ऐसा समझकर और उनसे पूछकर धीरदत्त उनके चरणों पर गिर पड़ा॥१७४॥ वह मन्त्री भी अपने भतीजे को पहचानकर आश्चर्यचकित रह गया और उसे गले से लगा लिया। इसके पश्चात् उसने सारा समाचार पूछा॥१७५॥ चाचा के पूछने पर धीरदत्त ने पिता के वध से उस समय तक का सारा वृत्तान्त अपने चाचा को सुना दिया॥१७६॥ चाचा ने अपने भाई की मृत्यु के समाचार पर आंसू बहाकर एकान्त में धीरदत्त से कहा—'बेटा! अधीर न हो। मुझे धनदा यक्षिणी सिद्ध है। उसने मुझे पाँच सहस्र घोड़े और सात करोड़ सोने की मोहरें दी हैं। मैं पुत्रहीन हूँ अतः यह सब धन तुम्हारा ही है'॥१७७-१७९॥ ऐसा कहकर चाचा ने भतीज धीरदत्त को वह सारा धन दे दिया। धीरदत्त ने भी धन पाकर उसी मृगांकवती के साथ विवाह कर लिया॥१८०॥ धीरदत्त उस मृगाङ्कवती पत्नी के साथ वहीं ठहर गया और रात्रि में कुमुदाकर के समान आनन्दित तथा प्रफुल्लित होने लगा॥१८१॥ पूर्ण सम्पत्तिशाली धीरदत्त के हृदय को बाहुशाली आदि मित्रों की चिन्ता चन्द्रमा में कलङ्करोग के समान मलिन करती थी॥१८२॥ एक बार चाचा ने एकान्त में धीरदत्त से कहा—'बेटा! राजा शूरसेन की एक कन्या है। वह राजा की आज्ञा से मेरे द्वारा दान करने के लिए अवन्तिदेश (उज्जयिनी) में ले जायी जायगी। सो मैं उसी बहाने से उसका हरण करके तुझे दे दूँगा'॥१८३-१८४॥ ऐसा निश्चय करके चाचा विगतभय और भतीजे धीरदत्त ने सेना और दहेज का सामान साथ लेकर उज्जयिनी को प्रस्थान किया॥१८५॥ चाचा ने धीरदत्त से कहा—'इस प्रकार उस राजा की सेना और मेरी सेना के अन्त होने पर गुप्त राज्य को प्राप्त करोगे जैसा कि लक्ष्मी के स्वरूपने तिल आदेश दिया है'॥१८६॥ जब ये दोनों विन्ध्य पर्वत के प्रान्तों में पहुँचे तब वहाँ म्लेच्छों की एक बड़ी सेना ने डाकाजनी करके उन्हें मार्ग में ही रास्ता रोक लिया॥१८७॥

१५६ कथासरित्सागर

१५६ कथासरित्सागर प्रहारमूर्च्छितं बद्ध्वा श्रीदत्तं भग्नसैनिकम्। निन्युश्चोरा स्वपल्लीं ते स्वीकृत्य सकलं धनम् ॥१८८॥ ते च तं प्रापयामासुश्चण्डिकासद्म भीषणम्। उपहाराय घण्टानां नाधमृत्युरिहाह्वयत् ॥१८९॥ तत्रापश्यच्च तं पत्नी सा पल्लीपतिपुत्रिका। सुन्दरी द्रष्टुमायाता देवीं बालसुतान्विता ॥१९०॥ निषिद्धहत्या मध्यस्थान्दस्यूनानन्दपूर्णया। स श्रीदत्तस्तया साकं सन्मन्दिरमथाविशत् ॥१९१॥ सद्यश्च पल्लीराज्यं तत्प्राप पित्रा यदर्पितम्। प्रागेवानन्यपुत्रेण सुन्दर्या गच्छता दिवम् ॥१९२॥ स च घोरसमाक्रान्तं सपितृव्यपरिच्छदम्। सकलत्रं च लब्धैतौ तं सङ्गं च मृगाङ्ककम् ॥१९३॥ तत्रैव शूरसेनस्य सुतां तां परिणीय च। श्रीदत्तोऽपि महान् राजा नगरे समपद्यत ॥१९४॥ प्रजिघाय स दूतांश्च ततः श्वशुरयोस्तयोः। विम्बकस्तस्य तस्यापि शूरसेनस्य भूपतेः ॥१९५॥ समुपाजग्मतुस्तौ च सेनासमुदयान्वितौ। तं विज्ञाय च सम्बन्धं मुदा दुहितृवत्सलौ ॥१९६॥ तेऽपि स्वव्रणाः स्वस्थास्तद्वियुक्ता वयस्यकाः। बाहुशालिप्रभृतयस्तद्बुद्ध्यैव तमुपाययुः ॥१९७॥ अथ श्वशुरसंयुक्तो गत्वा तं पितृघातिनम्। चक्रे विक्रमशक्तिं स वीरः क्षेमानलाहुतिम् ॥१९८॥ ततश्च साब्धिवसयां धीमत्तः प्राप्य मेदिनीम्। ननन्द विरहोत्तीर्णः स मृगाङ्कवतीसखः ॥१९९॥ इत्थं नरपत दीर्घवियोगव्यसनार्णवम्। तरन्ति च लभन्ते च कल्याणं धीरचेतसः ॥२००॥ इति संश्रुतवाञ्छ्रुत्वा कथां स दयितोत्सुकः। तां निनाय निशां मार्गे सहस्रानीकभूपतिः ॥२०१॥ ततो मनोरथारूढ पुरः प्रहितमानसः। प्रात सहस्रानीकोऽसौ प्रतस्थे स्वां प्रियां प्रति ॥२०२॥

द्वितीय लम्बक १९७

द्वितीय लम्बक १९७ घोरतम आघात से बेहोश और भागे हुए सैनिकोंवाले अकेले श्रीदत्त को हाथ-पाँव बाँध कर सारे दल के साथ अपने गाँव ले गये ॥१८४॥ उस गाँव में ले जाकर उसे चंडी के एक भीषण मन्दिर में पहुँचा दिया गया जहाँ घंटे अपने शब्दों से मानों उसकी मृत्यु का आह्वान कर रहे थे ॥१८९॥ वहाँ पर भिल्लराज की पुत्री सुन्दरी भी छोटे बच्चों को गोद में लेकर उस बलिदान का दृश्य देखने आई थी। जो पिता की मृत्यु के बाद वहाँ का शासन करती थी ॥१९०॥ मानन्द-भरी सुन्दरी ने उन डाकुओं को बलिदान करने से रोक दिया और श्रीदत्त भी आनन्दपूर्वक उस सुन्दरी के घर चला गया ॥१९१॥ वहाँ जाकर उसने उस भिल्लपल्ली का राज्य प्राप्त किया जिसे सुन्दरी के पिता ने अपनी मृत्यु के समय अन्य संतान न होने के कारण एकमात्र उत्तराधिकारिणी अपनी कन्या सुन्दरी को दिया था ॥१९२॥ चोरों से आक्रान्त चण्डाल और सेना-सामग्री सं युक्त सपत्नीक श्रीदत्त ने वहाँ पर अपने मृगांक नामक खड्ग को भी प्राप्त कर लिया ॥१९३॥ श्रीदत्त वहीं (भिल्लपल्ली में) शूरसेन की उस कन्या से विवाह करके उस नगर में महान् राजा बन गया ॥१९४॥ श्रीदत्त ने राजा बिम्बकि और राजा शूरसेन दोनों ने अपने श्वसुरों के पास दूत भेज दिये। फलतः अपनी-अपनी कन्याओं के स्नेह के कारण वे दोनों राजा अपनी-अपनी सेना-सामग्री के साथ विवाह-संबंध के लिए वहीं आये ॥१९५ १९६॥ उधर युद्ध के कारण बिछुड़े हुए बाहुशाली आदि उसके मित्र भी घावों के भर जाने पर स्वस्थ होकर उसके समीप आ गये थे ॥१९७॥ तदनन्तर श्वसुरों और उनकी सेनाओं के सहित श्रीदत्त ने अपने पिता के हत्यारे एवं विरोधी पाटलिपुत्र के राजा विक्रमशक्ति को अपनी कोपाग्नि की आहुति बना डाला। अर्थात् उसे मारकर अपना बदला चुका लिया ॥१९८॥ इसके पश्चात् मृगांकवती के साथ आसमुद्र पृथ्वी का राज्य प्राप्त कर श्रीदत्त सम्राट् बन गया और आनन्द-भोग करने लगा ॥१९९॥ राजा सहस्रानीक को कहानी सुनानेवाले संगठक ने इस कथा को सुनाकर कहा— 'राजन् ! धैर्यशाली व्यक्ति इस प्रकार वियोगजन्य कष्ट के समुद्र को पार करते हुए अभीष्ट को प्राप्त करते हैं ॥२० ॥ प्रिया-समागम के लिए उत्सुक राजा सहस्रानीक ने उस रात को अत्यन्त उत्सुकता के साथ बिताया ॥२०१॥ प्रातःकाल ही मनोरथ पर चढ़े हुए और मन को आगे से ही भेजे हुए राजा सहस्रानीक ने अपनी प्रिया के प्रति प्रस्थान किया ॥२०२॥

१५६ कथासरित्सागर

१५६ कथासरित्सागर प्रहारमूर्च्छितं बद्ध्वा श्रीदत्तं भग्नसैनिकम्। निन्युश्चोरा स्वपल्लीं ते स्वीकृत्य सकलं धनम्॥१९८॥ ते च तं प्रापयामासुश्चण्डिकासद्म भीषणम्। उपहाराय चण्डानां नादेयस्थुरिवाद्रयम्॥१९९॥ समापश्यच्च तं पल्ली सा पल्लीपतिपुत्रिका। सुन्दरी द्रष्टुमायाता देवीं बालसुतान्विता॥१९ ॥ निषिद्धवत्या मध्यस्थान्दस्यूनामन्दपूर्णया। स श्रीदत्तस्तया साकं तन्मन्दिरमबाविशत्॥१९१॥ तदन्न पल्लीराज्यं तत्राप पित्रा यदर्पितम्। प्रायेणानन्यपुत्रेण सुन्दर्यै गच्छता दिवम्॥१९२॥ तं च घोरसमाक्रान्तं सपितृभ्यपरिच्छदम्। सकलं च रेमेऽसौ स खड्गं च मृगाङ्ककम्॥१९३॥ समेव शूरसेनस्य सुतां तां परिणीय च। धीवतोऽपि महान् राजा नगरे समपद्यत॥१९४॥ प्रजिघाय स दूतांश्च ततः श्वशुरयोस्तयोः। दिव्यकेतस्य तस्यापि शूरसेनस्य भूपते॥१९५॥ तमुपाजग्मतुस्तौ च समासमुवयान्वितौ। तं विज्ञायैक सम्बन्धं मुदा दुहितृवत्सलौ॥१९६॥ तेऽपि स्वव्रणा स्वस्थखास्तद्वियुक्ता वयस्यकाः। बाहुशालिप्रभृतयस्सवुबुद्ध्या तमुपाययुः॥१९७॥ अथ स्वसुतसंयुक्तो गत्वा तं पितृमातिनम्। चक्रे विश्रमशक्तिं स धीर प्रधानराष्ट्रतिम्॥१९८॥ ततश्च साम्बिबल्यां श्रीदत्त प्राप्य मेदिनीम्। मनन्द विरहोत्तीर्णः स मृगाङ्कवतीसमः॥१९९॥ इत्थं नरपते दीर्घवियोगव्यसनार्णवम्। तरन्ति च लभन्ते च कल्याणं धीरचेतसः॥२००॥ इति सङ्केतकाच्छ्रुत्वा कथां स दयितोत्सुकः। तां निनाय निशां मार्गे सहस्रानीकभूपतिः॥२०१॥ ततो मनोरथारूढः पुरं प्रहितमानसं। प्रात सहस्रानीकोऽसौ प्रतस्थे स्वां प्रियां प्रति॥२०२॥

द्वितीय लम्बक १५९

द्वितीय लम्बक १५९ कुछ दिनों बाद वह शान्त मृगोंवाले प्रशान्त पावन जमदग्नि ऋषि के आश्रम में पहुँचा ॥२३॥ वहाँ उसने सस्नेह अतिथि-सत्कार करते हुए, तपस्या के मूर्तिमान् आकार, एवं पवित्र दर्शन जमदग्नि ऋषि के प्रणामपूर्वक दर्शन किये ॥२४॥ आश्रम में मुनि जमदग्नि ने पुत्री-सहित आनन्दित एवं सुख की मूर्ति रानी मृगावती को राजा के लिए अर्पण कर दिया ॥२५॥ शाप का अन्त होने पर (चौदह वर्षों के पश्चात्) उन दोनों राजा और रानी का परस्पर दर्शन आनन्द के आँसुओं से छलछलाती आँखों में मानों अमृत-वर्षा कर रहा था ॥२६॥ प्रथम दर्शन के कारण उदयन को हृदय से लगाये हुए राजा रोमांच के कारण शरीर से बड़े हुए के समान उसे कठिनता से दूर कर सका ॥२७॥ तपोवन के अन्त तक आँसू बहाते हुए मृगों से अनुसरण किया गया राजा उदयन और मृगावती को साथ लेकर जमदग्नि ऋषि से आज्ञा प्राप्त कर अपनी नगरी की ओर चला। आश्रम से चलकर प्रिया को अपनी विरह-व्यथा सुनाता हुआ राजा मानों नागरिक लोगों के विकसित नेत्रों से पान किया जाता हुआ क्रमशः कौशाम्बी नगरी में पहुँचा ॥२८-२९॥ राजधानी में पहुँचते ही सर्वप्रथम उसने उदयन को युवराज-पद पर अभिषिक्त किया। अपने मन्त्रियों के पुत्रों को उसने सम्मतिकार के रूप में नियुक्त कर दिया। उस समय उदयन के अभिषेक के समय आकाश से पुष्पवृष्टि के साथ यह वाणी हुई कि 'वसन्तक, रुरुम्मान् और यौगन्धरायण—इन मुख्य मंत्रियों की सहायता से सम्पूर्ण पृथ्वी का राज्य करेंगे' ॥२११-२१४॥ तदनन्तर युवराज उदयन पर राज्य का भार देकर राजा चिरकाल से अभिलषित सांसारिक सुखों का मृगावती के साथ उपभोग करने लगा ॥२१५॥ कुछ समय आनन्द का उपभोग कर लेने पर शान्ति की दूती वृद्धावस्था के कान के समीप आ जाने पर, उसे देखकर राजा की विषय-वासना मानों शोषित¹ होकर उससे दूर हो गई ॥२१६॥ १. पत्नी स्त्री अपने पति को अन्य स्त्री में अनुरक्त देखकर जो ईर्ष्या करती है, उसे मान, प्रणयरुष या सौतियाडाह कहते हैं।—अनु.

१६० कथासरित्सागर

१६० कथासरित्सागर ततस्तं बह्याश्च तनयमनुरक्तप्रकृतिष्विव निवेश्य स्वे राज्ये जगदुदयहेतोरुदयनम् । सहस्रानीकोऽसौ सचिवसहितः सप्रियतमो महाप्रस्थानाय क्षितिपतिरगच्छद्धिमगिरिम् ॥२१७॥ इति महाकविश्रीसोमदेवभट्टविरचिते कथासरित्सागरे कथामुखलम्बके द्वितीयस्तरङ्गः तृतीयस्तरङ्गः ततः स वत्सराज्यं च प्राप्य पित्रा समर्पितम् । कौशाम्ब्यवस्थितः सम्यक्छशासोदयनः प्रजाः ॥१॥ यौगन्धरायणाद्येषु भरं विन्यस्य मन्त्रिषु । बभूव स शनै राजा सुखैकान्ततत्परः ॥२॥ सदा सिषेवे मृगयां वीणां घोषवतीं च ताम् । दत्तां वासुकिना पूर्वं भक्तस्दिनमवादयत् ॥३॥ तत्तन्त्रीक्वणनिर्ह्लादमोहमन्यवशीकृतान् । आनिनाय च संयम्य सदा मत्तान् वनद्विपान् ॥४॥ स वारनारीवक्त्रेन्दुप्रतिमालङ्कृतां सुराम् । मन्त्रिणां च मुखच्छायां वत्सराजः समं पपौ ॥५॥ कुरूपस्यानुरूपा मे भार्या क्वापि न विद्यते । एका वासवदत्ताख्या कन्यका श्रूयते परम् ॥६॥ कथं प्राप्येत सा चेति चिन्तामेकामुवाह सः । सोऽपि चण्डमहासेन उज्जयिन्यामचिन्तयत् ॥७॥ तुल्यो मदुहितुर्भर्त्ता जगत्यस्मिन्न विद्यते । अस्ति चोदयनो नाम विपक्षः स च मे सदा ॥८॥ तत्कथं माम जामाता वश्यश्च स भवेन्मम । उपायस्त्वक एवास्ति यदटव्यां भ्रमत्यसौ ॥९॥ एकाकी द्विरदान्वेषी मृगयाव्यसनी नृपः । तेन च्छिद्रेण तं युक्त्यावष्टभ्यानाययाम्यहम् ॥१०॥ गान्धर्वशास्त्रं तस्यैतां सुतां शिक्षीकरोमि च । ततश्चास्यां स्वयं तस्य चक्षुः स्निह्यत्यसंशयम् ॥११॥ एवं स मम जामाता वश्यश्च नियतं भवेत् । मान्योऽस्त्युपायः कोऽप्यत्र येन वश्यो भवेन्न सः ॥१२॥

द्वितीय लम्बक १६१

द्वितीय लम्बक १६१ तदनन्तर कल्याणकारी एवं अनुरक्त प्रजावाले संसार के उदय के लिए उत्पन्न अपने पुत्र उदयन को राज्य पर बैठाकर राजा सहस्रानीक सचिवों और महारानी के साथ महाप्रस्थान के लिए हिमाचल की ओर चला गया ॥२१७॥ द्वितीय तरंग समाप्त तृतीय तरंग राजा उदयन की कथा सहस्रानीक के महाप्रस्थान के लिए हिमाचल की ओर चले जाने पर, राजा उदयन वत्स प्रदेश का शासन प्राप्त करके राजधानी कौशाम्बी में रहकर सुखपूर्वक प्रजा का शासन करने लगा ॥१॥ राजा उदयन यौगन्धरायण रुमण्वान् आदि मन्त्रियों पर शासन भार छोड़कर एकमात्र आनन्द लेने में तल्लीन हो गया ॥२॥ राजा के सुख-साधनों में वासुकि द्वारा बाल्यकाल में दी हुई घोषवती वीणा ही प्रमुख साधन के रूप में थी जिसे वह दिनरात बजाया करता था ॥३॥ राजा उदयन वीणा के तारों के मधुर स्वर-रूपी मोहन-मन्त्र से मदोन्मत्त जंगली हाथियों को वश में कर और बाँधकर ले आता था यही उसका एक विनोद था ॥४॥ वह वत्सराज उदयन वेश्याओं की मुखचन्द्र की प्रतिमाओं से सुशोभित मदिरा और मन्त्रियों की मुखकान्ति को साथ-साथ पान करता था ॥५॥ राजा उदयन को केवल एकमात्र यही चिन्ता थी कि मेरे वंश के अनुसार उच्च वंश की कन्या कहीं नहीं दीखती केवल वासवदत्ता नाम की एक प्रसिद्ध कन्या सुनी जाती है ॥६॥ 'वह कैसे मिले'—बस यही एक मात्र चिन्ता उसके मन में थी। उधर वासवदत्ता के पिता उज्जैन के राजा चण्डमहासेन को भी यह चिन्ता सता रही थी ॥७॥ कि मेरी अनुपम सुन्दरी और गुणवती कन्या के योग्य वर संसार में मिलेगा नहीं। केवल एक योग्य वर उदयन है किन्तु वह मेरा सदा का विरोधी है ॥८॥ उसके लिये एक उपाय हो कि जिससे वह मेरे वश में आ जाय और मेरा जामाता भी बन जाय। उदयन प्रायः अकेला ही जंगलों में वीणा बजाकर हाथियों को पकड़ता फिरता है ॥९॥ वह शिकार का व्यसनी है, अतः अवसर ढूँढ़कर किसी युक्ति से उसे जंगल से पकड़वाकर वश में किया जाय और यहाँ लाया जाय ॥१० ॥ वह संगीत-शास्त्र का विशेषज्ञ है। अतः अपनी कन्या वासवदत्ता को उसकी संगीत शिष्या बना दूँगा। इस प्रकार, वासवदत्ता को देखकर वह निस्सन्देह उसका अनुरागी बन जायगा। फलतः वह मेरा वशीभूत और जामाता बन जायगा ॥११ १२॥ २१

इति सञ्चिन्त्य तत्सिद्धयै स गत्वा चण्डिकागृहम्। चण्डीमभ्यर्च्य तुष्टाव चक्रेऽप्या उपयाचितम् ॥१३॥ एतत्समत्स्यते राजन्नचिराद् वाञ्छितं तव। इति शुश्राव सत्रासावशरीरां सरस्वतीम् ॥१४॥ ततस्तुष्टः समागत्य बुद्धवत्तेन मन्त्रिणा। सह चण्डमहासेनस्तमेवार्थमचिन्तयत् ॥१५॥ मानोद्धतो वीतलोभो रक्तभृत्यो महाबलः। असाध्योऽपि स सामाद्यैः साम्ना तावन्निरूप्यताम् ॥१६॥ इति सम्मन्त्र्य स नृपो दूतमेकं समादिशत्। गच्छ मद्द्वचनाद् ब्रूहि वत्सराजमिदं वचः ॥१७॥ मत्पुत्री तव गान्धर्वे शिष्या भवितुमिच्छति। स्नेहस्त्वस्मासु धत्तस्व तामिहैवैत्य शिक्षय ॥१८॥ इत्युक्त्वा प्रेषितस्तेन दूतो गत्वा न्यवेदयत्। कौशाम्ब्यां वत्सराजाय सन्देशं तं तथैव सः ॥१९॥ वत्सराजोऽपि तच्छ्रुत्वा दूतानूचित वचः। यौगन्धरायणस्यैवमेकान्ते मन्त्रिणोऽब्रवीत् ॥२०॥ किमतत्तेन सन्दिष्टं सदर्पं मम भूपुजा। एवं सन्दिष्टतस्तस्य कोऽभिप्रायो दुरात्मनः ॥२१॥ इत्युक्तो वत्सराजेन तदा यौगन्धरायणः। उवाचेनं महामन्त्री स स्वामीहितनिष्ठुरः १ ॥२२॥ भुवि व्यसनिताख्यातिः प्ररूढा त रुतेव या। इह तस्या महाराज! कषायकटुकं फलम् ॥२३॥ स हि त्वां रागिणं मत्वा कन्यारत्नेन लोभयन्। नीत्वा चण्डमहासेनो बद्ध्वा स्वीकर्तुमिच्छति ॥२४॥ तमुञ्छ व्यसनानि त्वं सूक्ष्नं हि परैर्नृपाः। सीदन्तस्तेषु गृह्यन्ते खातेष्विव वनद्विपाः ॥२५॥ इत्युक्तो मन्त्रिणा धीरः प्रतिदूतं व्यसर्जयेत्। स वत्सराजस्तं चण्डमहासननृपं प्रति ॥२६॥ सन्दिदेश च यद्यस्ति वाञ्छा मच्छिष्यतां प्रति। स्वत्पुत्र्यास्तदिहैवेषा भवता प्रेष्यतामिति ॥२७॥


१ स्वामिनः हिते कथ्याने निष्ठुरः कठिनः, सुदृढ इति भावः, यौगन्धरायणविशेष- णिदम्।

द्वितीय लम्बक १६३

द्वितीय लम्बक १६३ ऐसा सोचकर चंडमहासेन उस कार्य की सिद्धि के लिए चंडिका के मन्दिर में गया और वहाँ उसने पूजा तथा स्तुति करके मन्नत मानी ॥१३॥ चंडिका-मन्दिर में राजा ने आकाशवाणी सुनी कि 'हे राजन्! तुम्हारी यह अभिलाषा पूर्ण होगी ॥१४॥ प्रसन्नचित राजा ने चंडिका-मन्दिर से लौटकर बुद्धिला नामक मन्त्री से इस विषय पर विचार-विमर्श किया ॥१५॥ राजा ने कहा—'राजा उदयन उच्च आत्माभिमानी निर्भीक अनुगत अनुचरोंवाला और महाबल (सेना) वान् है! वह साम दाम भेद दंड आदि नीतियों के वश में आनेवाला नहीं है, उसे शान्ति से ही वश में करना चाहिए ॥१६॥ मन्त्री के साथ इस प्रकार विचार करके राजा ने एक दूत को राजा उदयन के पास भेजा और यह सन्देश दिया कि तुम मेरे वचनानुसार वत्सराज के पास जाकर यह कहो कि मेरी पुत्री तुझसे संगीत-विद्या सीखना चाहती है। यदि तुम्हें हमारे प्रति स्नेह है तो तुम उसे यहाँ आकर शिक्षा दो ॥१७-१८॥ इस प्रकार उस सन्देश के साथ भेजे हुए दूत ने कौशाम्बी नगरी में जाकर अपने स्वामी का सन्देश वत्सराज उदयन से कह सुनाया ॥१९॥ उदयन ने दूत से उज्जयिनी-नरेश के इस अनुचित सन्देश को सुनकर एकान्त में मन्त्री यौगन्धरायण से कहा ॥२०॥ 'इस कहने में मुझे यह कैसा साभिमान सन्देश भेजा है। तथा सन्देश देते हुए उस दूत का क्या अभिप्राय है। वत्सराज के ऐसा कहने पर स्वामी के हित में सुदृढ़ और सतर्क यौगन्धरायण मन्त्री ने राजा से कहा॥ १२१॥

१६४ कथासरित्सागर

१६४ कथासरित्सागर एव कृत्वा च सन्निमान् वत्सराजो जगाद सः । यामि चण्डमहासनमिह बद्धवानयामि तम् ॥२८॥ तच्छ्रुत्वा तमुवाचाप्तो मन्त्री योगन्धरायणः । न चैतच्छक्यते राजन् कर्तुं नैव च युज्यते ॥२९॥ स हि प्रभाववान् राजा स्वीकायश्च सव प्रभो । तथा च तद्गतं सर्वं शृण्विदं कथयामि ते ॥३०॥ राज्ञश्चण्डमहासेनस्य कथा अस्तीहोज्जयिनी नाम नगरी भूषणं भुवः । हसन्तीव सुधाधौतैः प्रासादैरमरावतीम् ॥३१॥ यस्यां वसति विश्वेशो महाकालवपुः स्वयम् । शिथिलीकृतकैलासनिवासव्यसनो हरः ॥३२॥ तस्यां महेन्द्रवर्माख्यो राजाभूद्भूभृतां वरः । जयसेनाभिधानोऽस्य बभूव सदृशः सुतः ॥३३॥ जनमेजयस्य तस्याथ पुत्रोऽप्रतिमदोर्बलः । समुत्पन्नो महासेननामा नृपतिकुञ्जरः ॥३४॥ सोऽथ राजा स्वराज्यं तत्पालयन्समचिन्तयत् । न मे खड्गोऽनुरूपोऽस्ति न च भार्या कुलोद्गता ॥३५॥ इति सञ्चिन्त्य स नृपश्चण्डिकागृहमागमत् । तत्रातिष्ठन्निराहारो देवीमाराधयंश्चिरम् ॥३६॥ उत्कृत्याथ स्वमांसानि होमकर्म च चाकरोत् । ततः प्रसन्ना साक्षात्सा देवी चण्डी तमभ्यधात् ॥३७॥ प्रीतास्मि ते गृहाणेमं पुत्र ! खड्गोत्तमं मम । एतत्प्रभावाच्छत्रूणामजयस्त्वं भविष्यसि ॥३८॥ अपि चाङ्गारवती नाम कन्यां त्रैलोक्यसुन्दरीम् । अङ्गारकासुरसुतां शीघ्रं भार्यामवाप्स्यसि ॥३९॥ अतीव चण्डकर्मेदं कृतं चैतद्यतस्त्वया । अतश्चण्डमहासेन इत्याख्या ते भविष्यति ॥४०॥ इत्युक्त्वा दत्तखड्गा सा देवी तस्य तिरोऽभवत् । राज्ञः सङ्कल्पसम्पत्तिवृष्टिरविर्बभूवुन ॥४१॥

द्वितीय लम्बक १९५

द्वितीय लम्बक १९५ इस प्रकार सन्देश भेजकर राजा उदयन ने मन्त्रियों से कहा—'मैं अभी जाता हूँ और चंडमहासेन को बाँधकर लाता हूँ' ॥२८॥ राजा के विचार सुनकर मुख्यमन्त्री यौगन्धरायण बोला—'ऐसा करना न तो सम्भव है और न उचित ही है। वह राजा प्रभावशाली है और उसे तुम्हें अपनाना भी चाहिए। इसके सम्बन्ध में विस्तार से कहता हूँ सुनो' ॥२९ १/२ ॥ राजा चंडमहासेन की कथा इस भूलोक में उज्जयिनी नाम की नगरी है जो भूलोक का भूषण है और सुधा-धवल प्रासाद-पंक्तियों से वह इन्द्रपुरी अमरावती को मानों हँसती है ॥३१॥ जिस नगरी में महाकाल भगवान् शिव कैलास का निवास छोड़कर रहा करते हैं ॥३२॥ इस नगरी में राजाओं में श्रेष्ठ महेन्द्रवर्मा नाम का राजा था और जयसेन नामक उसी के समान उसका पुत्र हुआ ॥३३॥ उस जयसेन का अनुपम बलशाली पुत्र महासेन हुआ ॥३४॥ उस महासेन ने बहुत दिनों तक शासन करते हुए सोचा कि न तो मेरे पास मेरे योग्य खड्ग है और न उच्चकुलप्रसूत पत्नी ही है ॥३५॥ ऐसा सोचकर वह राजा महासेन चंडिका के मन्दिर में गया और निराहार रहकर चिरकाल तक उसकी (चंडिका की) आराधना करने लगा ॥३६॥ अपना मांस काटकर जब उसने देवी के लिए हवन किया तब देवी ने प्रसन्न होकर कहा— 'पुत्र ! मैं तेरी आराधना से प्रसन्न हूँ। यह उत्तम खड्ग लो, इसके प्रभाव से शत्रु तुम्हें जीत न सकेंगे। तुम उनके लिए अजय हो जाओगे और अंगारकासुर की अङ्गारवती नाम की कन्या है जो त्रैलोक्य में ललाम सुन्दरी है वह शीघ्र ही तुम्हारी पत्नी बनेगी। तुमने अपना मांस काटकर बलि देते हुए भयङ्कर यह (उग्र) कार्य किया है अतः तुम्हारा नाम चण्डमहासेन होगा। इतना कहकर और खड्ग को देकर देवी अन्तर्धान हो गईं और राजा भी मानसिक सङ्कल्प की सफलता होने का अनुभव करने लगा ॥३७-४१॥

स खङ्गो मत्तहस्तीन्द्रो नडागिरिरिति प्रभो। द्वे तस्य रत्न शक्रस्य कुलिशैरावणाविव ॥४२॥ तयो प्रभावात् सुसित कदाचित्सोऽथ भूपति। अगाच्चण्डमहासेनो मृगयायै महाटवीम् ॥४३॥ अतिप्रमाण सत्राक वराह घोरमैक्षत। मैदा सम इवाकाण्डे दिवा पिण्डत्वमागतम् ॥४४॥ स वराह शरैरस्य तीक्ष्णैरप्यकृतव्रण ! आहृत्य स्यन्दन राज्ञ पराम्य विवरमाविशत् ॥४५॥ राजापि रथमुत्सृज्य तमेवानुसरन् रुधा। धनुर्द्वितीयस्तत्प्रव प्राविशत्स बिलान्तरम् ॥४६॥ दूर प्रविश्य चापश्यत् कान्त पुरवर महत्। सविस्मयो न्यवीवच्च तदन्तर्वीधिकातटे ॥४७॥ तत्रस्थ कन्यकामेकामपश्यत् स्त्रीशतान्विताम्। सञ्चरन्तीं स्मरस्येव धैर्येनिर्मेदिनीमिपुम् ॥४८॥ सापि प्रेमरसामार्वपिणा चक्षुषा मुहु । स्नपयन्तीव राजानं शनकैस्तमुपागमत् ॥४९॥ कस्त्व सुभग ! कस्माच्च प्रविष्टोऽसीह साम्प्रतम्। इत्युक्त स तया राजा यथातथ्यमवर्णयत् ॥५०॥ तच्छ्रुत्वा नेत्रयुगलात् सरागादश्रुसन्ततिम्। हृदयादीरतां चापि सम कन्या मुमोच सा ॥५१॥ बा रव रोदिषि कस्माच्च पृष्टा तनति भूभृता। सा त प्रत्यब्रवीद्ब मन्मथाज्ञानुवर्तिनी ॥५२॥ यो वराह प्रविष्टोऽत्र स दैत्योऽङ्गारकाभिधः। अहं चैतस्य तनया नामाङ्गारवती नृप ॥५३॥ वयमाग्मयदक्षासौ राजपुत्रीरिमा धनम्। आच्छिद्य गर्ता गहूभ्यः परिवार व्यधायम ॥५४॥ वि चैष राक्षसीभूत पापदोषा महासुरः। शृप्ताथमात्रदृष्टाच रक्षां प्राप्यापि त्यक्तवानयम् ॥५५॥ इदानीं शान्तबागाहल्पो विधास्यति स्वयम्। गुप्तोधिगच्छ नियत त्वयि पाप ममाचरेत् ॥५६॥

द्वितीय लम्बकः १६७

द्वितीय लम्बकः १६७ महाराज ! वह खड्ग और महागिरि नाम का हाथी—ये दो उस राजा के उसी प्रकार के अमूल्य रत्न हैं जिस प्रकार इन्द्र के पास वज्र और ऐरावत हाथी। इन दोनों के प्रभाव से अत्यन्त सुखी राजा चंडमहासेन एक बार शिकार खेलने के लिए घोर जंगल में गया। वहाँ उसने सहसा बहुत लम्बा-चौड़ा एक भीषण शूकर को देखा जो दिन में सिमटे हुए रात के अन्धकार के गोले के समान प्रतीत हो रहा था ॥४२-४४॥ वह शूकर, राजा के तीक्ष्ण बाणों से विद्ध होकर भी आहत न हुआ और राजा के रथ को टक्कर मारकर एक बिल में जा घुसा ॥४५॥ राजा क्रोध से भरकर और रथ को छोड़कर उसका पीछा करता हुए धनुष के साथ उसी बिल में चला गया ॥४६॥ बिल में दूर तक जाकर राजा ने एक सुन्दर सजा हुआ नगर देखा। थका हुआ राजा विश्राम के लिए वहाँ एक बावली के तट पर जा बैठा। राजा ने उस बापी में अनेक सहेलियों के साथ स्नान करती हुई एक सुन्दरी कन्या को देखा जो धैर्य को नष्ट कर देनेवाले कामदेव के एक बाण के समान थी ॥४७-४८॥ वह सुन्दरी अपनी दृष्टि से प्रेम-रस बरसाकर मानों राजा को स्नान कराती हुई और रोती हुई राजा के पास आई और बोली—'हे सौभाग्यशालिन् ! तुम कौन हो ? और इस समय यहाँ किसलिए आये हो ? यह सुनकर राजा ने उससे सारी सच्ची बात कह दी। राजा की बातें सुनकर, उस सुन्दरी ने आँखों से अविरल अश्रु-धारा और हृदय से धैर्य को एक साथ ही छोड़ दिया। 'तुम कौन हो और क्यों रो रही हो ? राजा के इस प्रकार पूछने पर कामदेव से प्रेरित वह बाला बोली— 'जो शूकर इस बिल में घुसा है, वह अंगारकसुर नाम का दैत्य है और मैं अंगारवती नाम की उसकी कन्या हूँ। यह अंगारकसुर, वज्र के समान बना हुआ अत्यन्त बलवान् है। जिन राजकुमारियों को तुम यहाँ देख रहे हो इन्हें यह दैत्य राजाओं के महलों से बलपूर्वक छीनकर लाया है। इन्हीं से इसने मेरा परिवार बनाया है ॥४९-५४॥ यह असुर शाप के कारण राक्षस बन गया है। शाप के कारण ही प्यासा और थका हुआ इसने तुम्हें देखकर भी छोड़ दिया है। इस समय वह शूकर-रूप को त्याग कर सो रहा है। सोकर उठते ही वह अवश्य तुम्हें मार डालेगा ॥५५-५६॥ १. कृत्रिम रूपवाले निद्रावस्था में अपने वास्तविक रूप में हो जाते हैं। यह प्राकृतिक नियम है। —अनु.

इति मे तव कल्याणमपश्यन्त्या गलन्त्यमी। सन्तापक्वथिताः प्राणा इव बाष्पाम्बुबिन्दवः ॥५७॥ इत्यङ्गारवतीवाक्यं श्रुत्वा राजा जगाद ताम्। यदि मय्यस्ति ते स्नेहस्तदिदं मद्वचः कुरु ॥५८॥ प्रबुद्धस्यास्य गत्वा त्वं रोदिहि स्वपितुः पुरः। ततश्च नियतं स त्वां पृच्छेद्बुद्वेगकारणम् ॥५९॥ त्वां सन्निपातयेत्कश्चित्ततो मे का गतिर्भवेत्। एतद्दुःखं ममेत्येवं स च वाच्यस्त्वया ततः ॥६०॥ एवं कृतेऽस्ति कल्याणं तवापि च ममापि च। इत्युक्ता तेन सा राज्ञा तथत्यङ्गीचकार तम् ॥६१॥ तं च प्रच्छन्नमवस्थाप्य राजानं पापशङ्किनी। जगामासुरकन्या सा प्रसुप्तस्यान्तिकं पितुः ॥६२॥ सोऽपि दैत्यः प्रबुबुधे प्रारम्भे सा च रोदितुम्। किं पुत्रि ! रोदिषीत्येवं स च तामब्रवीत्ततः ॥६३॥ 'हन्त्यास्त्वां कोऽपि चेत्तात ! तदा मे का गतिर्भवेत्। इत्याख्यां तमवादीत्सा स विहस्य ततोऽब्रवीत् ॥६४॥ को मां व्यापादयेत्पुत्रि ! सर्वो वध्यमयो ह्यहम्। वामहस्तेऽस्ति मे छिद्रं सञ्च चापेन रक्ष्यते ॥६५॥ इत्थमाश्वासयामास स दैत्यस्तां निजां सुताम्। एतच्च निखिलं तत्र राजा छन्नः शुश्राव ॥६६॥ ततः क्षणादिवोत्थाय कृत्वा स्नानं स दानवः। कृतमौनः प्रववृते देवं पूजयितुं हरम् ॥६७॥ तत्कालं प्रकटीभूय स राजाकृष्टकार्मुकः। उपेत्य प्रसमं दैत्यं रणायाह्वयते स्म तम् ॥६८॥ सोऽप्युत्क्षिप्य करं वामं मौनस्थस्तस्य भूपतेः। प्रतीक्षस्व क्षणं तावदिति संज्ञां तदाकरोत् ॥६९॥ राजापि लघुहस्तत्वात्करं तमेव तत्क्षणम्। तस्मिन्मर्मणि तं दैत्यं पृषत्केन जघान सः ॥७०॥ स च मर्माहतो घोरं रावं कृत्वा महासुरः। अगारकोश्याप्तद् भूमौ न्यञ्जीबो जगाद च ॥७१॥ सुषितोऽहं हतो येन स मामवृभिर्न तर्पयेत्। प्रत्यब्दं यदि तत्तस्य नश्येयुः पञ्च मन्त्रिणः ॥७२॥

द्वितीय लम्बक १९९

द्वितीय लम्बक १९९ इसी कारण आँखों से ये आँसू तुम्हारा कल्याण न देखकर शरीर में प्राणों के समान निकल रहे हैं' ॥५७॥ राजा अंगारवती की बात सुनकर उससे बोला—"यदि तुम्हें मुझ पर स्नेह है तो तुम मेरी एक बात मानो ॥५८॥ वह यह कि जब अंगारकासुर सोकर उठे तब तुम उस अपने पिता के सामने खूब रोओ तब वह अवश्य ही तुम्हारे रोने का कारण पूछेगा ॥५९॥ तब तुम उससे कहना मुझे यह दुःख हो रहा है कि यदि तुम्हें कोई मार डाले तो मेरी क्या गति होगी ? यही दुःख मेरे रोने का कारण है' ॥६०॥ तुम्हारे ऐसा करने पर मेरा और तुम्हारा दोनों का कल्याण होगा। राजा से यह सुनकर अंगारवती ने उसी प्रकार करना स्वीकार कर लिया ॥६१॥ अंगारवती ने पिता के भय से राजा को पास ही कहीं छिपा दिया और स्वयं सोये हुए पिता के निकट चली गई ॥६२॥ वह दैत्य जब जागा तब कन्या रोने लगी। तब दैत्य ने पूछा—'बेटी ! क्यों रो रही हो ? तब अंगारवती ने कहा—'पिता ! यदि तुम्हे कोई मार डाले तो मेरी क्या गति होगी। इसी वेदना से मैं रो रही हूँ। उसके ऐसा कहने पर वह दैत्य हँसकर कहने लगा—॥६३ ६४॥ 'बेटी मुझे कौन मारेगा। मेरा सारा शरीर वज्र से बना है। केवल बाईं हथेली में एक छिद्र (दुर्बलता) है उसकी रक्षा धनुष से हो जाती है। इस प्रकार दैत्य ने पुत्री को धीरज बँधाया और यह सब पास ही छिपे हुए राजा ने सुन लिया ॥६५ ६६॥ तदनन्तर कुछ ही समय बाद वह दानव उठा और स्नान करके शिवजी की पूजा-स्तुति करने लगा ॥६७॥ राजा ने भी उस समय प्रकट होकर दानव को युद्ध के लिए ललकारा ॥६८॥ मौन मुद्रा में बैठा हुआ वह दैत्य बायें हाथ को ऊपर उठाकर 'जरा ठहरो' इस प्रकार राजा से संकेत करने लगा। राजा बाण-विद्या में सिद्धहस्त तो था ही उसी समय उसने एक बाण दैत्य के मर्मस्थान (बाईं हथेली) पर मारा। वह दैत्य मर्मस्थान पर आघात होने के कारण भीषण चीत्कार के साथ प्राणों को त्यागता हुआ बोला—॥६९-७१॥ 'मुझ प्यासे को जिसने मारा है, वह यदि प्रतिवर्ष पानी से मेरा तर्पण न करेगा तो उसके पाँच मन्त्री मर जायेंगे' ॥७२॥ २२

१७० कथासरित्सागर

१७० कथासरित्सागर इत्युक्त्वा पञ्चतां प्राप स दैत्यः सोऽपि तत्सुताम्। तामङ्गारवतीं राजा गृहीत्वान्धमयीं ययौ ॥७३॥ परिणीतवतस्तस्य तत्र तां दैत्यकन्यकाम्। जातौ द्वौ तनयौ चण्डमहासेनस्य भूपतेः ॥७४॥ एको गोपालको नाम द्वितीयः पालकस्तथा। तयोरिन्द्रोत्सव आसी जातयोरकरोन्नृपः ॥७५॥ ततस्तं नृपतिं स्वप्ने तुष्टो वक्ति स्म वासवः। प्राप्स्यस्यन यसपुत्रीं मत्प्रसादात्सुतामिति ॥७६॥ ततः कालेन जातास्य राज्ञः कन्या तु तन्मया। अपूर्वा निर्मिता धात्रा चन्द्रस्येवापरा तनुः ॥७७॥ कामदेवावतारोऽस्याः पुत्रो विद्याधराधिपः। भविष्यतीति तत्कालमुदभूद् भारती दिवः ॥७८॥ दत्ता मे वासवेनैषा तुष्टेनेति स भूपतिः। नाम्ना वासवदत्तां तां तनयामकरोत्तदा ॥७९॥ सा च तस्य पितुर्गृहे प्रदेया सम्प्रति स्थिता। प्राङ् मन्थादूर्णवस्येव कमला कुक्षिकोटरे ॥८०॥ एवम्बिधप्रभावश्चण्डमहासेनभूपतिः स किल। देव ! न शक्यो जेतुं यथा तथा दुर्गवेश्मस्थः ॥८१॥ किं च स राजन्वाञ्छति दातुं तुभ्यं सदृशं तनयां ताम्। प्रार्थ्यते तु स राजा निजपक्ष महोदय मानी ॥८२॥ सा चावश्यं मन्ये वासवदत्ता त्वयैव परिणेया। स सपदि वासवदत्ताहृतहृदयो वत्सराजोऽभूत् ॥८३॥ इति महाकवि श्रीसोमदेवभट्टविरचिते कथासरित्सागरे कथामुखलम्बके तृतीयस्तरङ्गः। चतुर्थस्तरङ्गः अत्रान्तरे स वत्सेशप्रवृत्तस्तदब्रवीत्। गत्वा प्रतिपदश्चण्डमहासेनाय भूपते ॥१॥

द्वितीय लम्बक १७१

द्वितीय लम्बक १७१ इस प्रकार कहते हुए अंगारकासुर ने प्राण छोड़ दिये और राजा भी उसकी पुत्री अंगारवती को लेकर उज्जैन चला गया ॥७३॥ उज्जैन में जाकर उस अंगारवती से विवाह करने पर चंडमहासेन राजा के दो पुत्र उत्पन्न हुए, एक गोपालक और दूसरा पालक ! राजा ने दोनों का जन्मोत्सव खूब धूमधाम के साथ मनाया ॥७४-७५॥ एक बार सोये हुए राजा को स्वप्न में इन्द्र ने कहा—'राजन् ! तुम मेरी कृपा से अपूर्व सुन्दरी कन्या प्राप्त करोगे' ॥७६॥ इस प्रकार इन्द्र की कृपा से राजा को नवीन चन्द्रमा के समान सुन्दरी कन्या उत्पन्न हुई। उसके उत्पन्न होते ही आकाशवाणी हुई कि इस कन्या के गर्भ से कामदेव का अवतार होगा जो सब विद्याधरों का चक्रवर्ती होगा ॥७७-७८॥ राजा ने प्रसन्न होकर उस कन्या का नाम इसीलिए वासवदत्ता रखा कि उसे वह वासव अर्थात् इन्द्र के प्रसाद से प्राप्त हुई थी ॥७९॥ वह कन्या इस समय राजा के भवन में उसी प्रकार निवास कर रही है जिस प्रकार मन्थन से पहले समुद्र-गर्भ में लक्ष्मी निवास करती थी ॥८० ॥ यौगन्धरायण ने कहा—'महाराज ! वह उज्जैन का महाराजा चंडमहासेन इस प्रकार सुदृढ़ दुर्ग में स्थित महाबलवान् है। वह सहज में ही नहीं जीता जा सकता। साथ ही राजन् ! वह स्वयं ही तुम्हें कन्या देना चाहता है, किन्तु अत्यन्त आत्माभिमानी होने के कारण अपने पक्ष को ऊँचा रखना भी चाहता है ॥८१-८२॥ इसलिए उस वासवदत्ता से तुम्हें अवश्य ही विवाह करना चाहिए। राजा उदयन मन्त्री यौगन्धरायण की बातें सुनकर वासवदत्ता के प्रति अत्यन्त आकृष्ट होकर आत्मविस्मृत-सा हो गया ॥८३॥ महाकवि श्रीसोमदेवभट्ट-विरचित कथासरित्सागर के कथामुखलम्बक का तृतीय तरंग समाप्त चतुर्थ तरंग वत्सराज उदयन की कथा (क्रमशः) इसी बीच कच्छराज के भेजे हुए दूत ने उसका प्रतिसन्देश चंडमहासेन के पास पहुँचा दिया ॥१॥