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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

२९४ कथासरित्सागर

२९४ कथासरित्सागर तत साचीकृतवध्वा मुखेन वस्मितभ्रुवा। दृष्ट्वा निवार्य वामेन करेण तमूवाच सा॥१२८॥ हुं शान्तमेतदर्थोऽय वपस्तत्र च मा स्म गाः। किं सया मामुपैहि त्वमहं हि तव गेहिनी॥१२९॥ इत्युक्तः पुल्कोत्कम्पसलोभाकुलया तया। आविष्टयेव तन्मन्त्रदूतदुद्रुह्यापि सः॥१३०॥ प्रविश्य वासक सञ्चस्तयश्च सममन्वभूत्। मर्त्योऽपि दिव्यसम्भोगमसस्पृष्ट मनोरथः॥१३१॥ इत्थ तां प्राप्य सप्रेमां मन्त्रसिद्धिप्रसाधिताम्। त्यक्तदिव्यस्थितिं तस्थौ गृह्यन्त्रो यथासुखम्॥१३२॥ एवं यागप्रदानादिसुकृतेः शुभकर्मणाम्। दिव्याः शापच्युता नायस्तिष्ठन्ति गृहिणीपदे॥१३३॥ देवद्विजसपर्या हि कामधेनुर्मता सताम्। किं हि न प्राप्यते तस्याः कृपा सामानिबन्धनम्॥१३४॥ भुङ्क्त रवयि दिव्यानामप्युच्चपदजं मनाम्। प्रवातमिक पुष्यानामधःपातक्तकारणम्॥१३५॥ इत्युक्त्वा राजपुत्र्याः स पुमराह् वसन्तकः। किं चात्र यहसत्याया वृत्तं तच्छ्रूयतामिदम्॥१३६॥ अहल्याकथा पुरामूद् गौतमो नाम त्रिकालज्ञो महामुनिः। अहल्याति च तस्यासीद् भार्या रूपजिताप्सराः॥१३७॥ एकदा रूपमुग्धस्तामिन्द्रः प्रार्थितवान् रहः। प्रभूणां हि विभूत्यन्धा भ्रावन्त्यविषय मतिः॥१३८॥ सानुमेग च स मूढा रूपस्यन्ती शचीपतिम्। तच्च प्रभावतो बुद्धवा तत्रागाद् गौतमो मुनिः॥१३९॥ मार्जाररूप चक्रे च मयादिन्द्रोऽपि तत्क्षणम्। कः स्थितोऽत्रेति सोऽपृच्छदहल्यामथ गौतमः॥१४०॥ एसो' ठिओ सु मज्जारो इत्यपभ्रष्टवक्तया। गिरा सत्यानुरोधिन्या सा तं प्रत्यब्रवीत्त्वविम्॥१४१॥ १ 'एषस्थितः खलु मार्जार' इतिच्छाया।

तृतीय लम्बक २९५

तृतीय लम्बक २९५ तब भौंहें चढ़ाकर आँखें तिरछी करके और बायें हाथ से उसे रोक कर सोमप्रभा ने कहा—'हूँ! अब मैंने समझा वेश्या के यहाँ जाने के लिए तुमने यह रूप पहना है, अब तुम वहाँ न जाओ मेरे पास आओ मैं तुम्हारी पत्नी हूँ' ॥१२८-१२९॥ रोमांच कंपन और व्याकुलता से भरी एवं मन्तरूपी दूत द्वारा प्रेरित उस सोमप्रभा के ये वचन सुनकर गुहचन्द्र उसके कमरे में जाकर मन से भी दुर्लभ दिव्य मानकर सुख अनुभव करने लगा ॥१३०-१३१॥ इस प्रकार मन्त्र-द्वारा सिद्ध की गई सप्रेम और दिव्य स्थिति को छोड़कर रहती हुई सोमप्रभा को उसे प्राप्त कर गुहचन्द्र सुखपूर्वक रहने लगा ॥१३२॥ इस प्रकार यज्ञ दान आदि शुभ कर्मों के प्रभाव से दिव्यता को प्राप्त कर शाप-भ्रष्ट होने के कारण स्त्रियाँ गृहिणी का पद प्राप्त करती हैं ॥१३३॥ देवता और ब्राह्मणों की पूजा सज्जनों के लिए कामधेनु के समान है। उससे क्या प्राप्त नहीं होता ? अर्थात् सब कुछ प्राप्त होता है। जिस प्रकार आँधी अत्यन्त ऊँचे दिव्य स्थान पर जन्म लेनेवाले पुष्पों के अधःपात का कारण होती है, उसी प्रकार तुम्हारे लिए पाप-कर्म अधःपात के कारण होते हैं॥१३४-१३५॥ राजकुमारी से इस प्रकार कहा गया विदूषक वसन्तक बोला—इस प्रसंग में मैंने अहल्या की कथा सुनी है सुनो ॥१३६॥ इन्द्र और अहल्या की कथा प्राचीन युग में त्रिकालज्ञ गौतम नामक एक महामुनि थे। अप्सराओं से भी अधिक रूपवती अहल्या नाम की उनकी पत्नी थी ॥१३७॥ एक बार उसकी सुन्दरता पर मोहित हो इन्द्र ने उससे एकान्त की प्रार्थना की क्योंकि वैभव से अन्धे राजाओं की बुद्धि अनुचित कार्यों की ओर दौड़ जाती है। इन्द्र को चाहती हुई उस मूर्खा ने उसके प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया तप के प्रभाव से इस बात को जानकर गौतम मुनि उसी समय वहाँ आ गये। उनके भय से इन्द्र ने उसी समय मार्जार (बिल्ली) का रूप धारण कर लिया तदनन्तर गौतम ने अहल्या से पूछा कि यहाँ कौन है? उसने अपभ्रंश भाषा में सत्य का ध्यान रखते हुए कहा यह 'मज्जार' है। हँसते हुए मुनि ने कहा कि सचमुच यह तुम्हारा जार है ऐसा कहकर मुनि ने उसे शाप दिया परन्तु उसने सत्य का ध्यान रखते हुए छल से कहा था इसलिए मुनि ने उसके शाप का अन्त भी कहा ॥१३८-१४१॥ १ अपभ्रंश भाषा में मार्जार (बिल्ली) का रूप 'मज्जार' होता है और संस्कृत में उसका अर्थ; 'मत् = मेरा, जार = यार यह अर्थ होता है। अतः अहल्याने अपभ्रंश भाषा में जो असत्य कहा था संस्कृत भाषा में वह सत्य होगया कि 'मेरा जार' है ॥

२१६ कथासरित्सागर

२१६ कथासरित्सागर सत्यं त्वज्जार इत्युक्त्वा विहसन्स ततो मुनिः । सत्यानुरोधक्लृप्तान्तं शापं तस्यामपातयत् ॥१४२॥ पापशीले ! शिलाभावं भूरिकालमवाप्नुहि ! आ वनान्तरसञ्चारिरामवालोकनादिति ॥१४३॥ वराङ्गलुब्धस्याङ्गं १ ते तत्सहस्रं भविष्यति । दिव्यं स्त्रीं विश्वकर्मा यां निर्मास्यति तिलोत्तमाम् ॥१४४॥ तां विलोक्य तदैवाक्ष्णां सहस्रं भविता च तत् । इतीन्द्रमपि तत्कालं शपति स्म स गौतमः ॥१४५॥ दत्तशापो यथाकामं तपसे स मुनिर्ययौ । अहल्यापि शिलाभावं दारुणं प्रत्यपद्यत ॥१४६॥ इन्द्रोऽप्यावृतसर्वाङ्गो वराङ्गैरभवत्ततः । अशील कस्य नाम स्यान्न खलीकारकारणम् ॥१४७॥ एवं कुकर्म सर्वस्य फलत्यात्मनि सर्वदा । यो यद् वपति बीजं हि लभते सोऽपि तत्फलम् ॥१४८॥ तस्मात्परविरुद्धेषु नोत्सहन्ते महाशयाः । एतदुत्तमसत्त्वानां विधिसिद्धं हि सव्रतम् ॥१४९॥ युवां पूर्वभगिन्यौ च देव्यौ शापच्युते उभे । तद्वदस्योन्यहितकृन्निर्गूढं हृदयं हि वाम् ॥ १५० ॥ एतद्वसन्तकाच्छ्रुत्वा मिथो वासवदत्तया । पद्मावत्या च सुतरामीर्ष्यालिशोच्यमुज्झितम् ॥१५१॥ देवी वासवदत्ता च कृत्वा साधारणं पतिम् । आत्मनीव प्रियं चक्रे पद्मावत्यां हितोन्मुखी ॥१५२॥ तस्या महानुभावत्वं तत्तादृङ्मगधेश्वरः । श्रुत्वा पद्मावतीसृष्टदूतेभ्योऽपि सुतोष सः ॥१५३॥ अभ्युपेत्य वत्सेशं मन्त्री यौगन्धरायणः । उपेत्य सन्निधौ देव्याः स्थितेऽन्यदवभाषत ॥१५४॥ उद्योगायाधुना देव कौशाम्बीं किं न गम्यते । नाशङ्का मगधेशाच्च विद्यते वञ्चितादपि ॥१५५॥ १ वराङ्ग—स्त्रियः प्रजननेन्द्रियम् । २ भग सहस्रमित्यर्थः।

'हे दुराचारिणी! वन में घूमते हुए रामचन्द्र के दर्शन पर्यन्त तू पत्थर हो जा' साथ ही इन्द्र को भी शाप दिया कि 'जिस स्त्री-वरांग¹ के लोभ से तूने पाप किया है, उस अंग के तेरे शरीर में हजारों चिह्न हो जायेंगे। इस प्रकार दोनों को शाप दे कर मुनि स्वेच्छा से तपस्या करने चले गये। अहल्या भी कठोर शिला बन गई, इन्द्र का शरीर, भी चारों ओर से स्त्री-योनि के चिह्नों से भर गया। दुश्चरित्रता किसकी दुर्गति का कारण नहीं होती॥१४२-१४७॥

इसी प्रकार मनुष्य जीवन में जो भी कुकर्म करता है, उसका फल उसे जीवन में ही भोगना है। जो जैसा बीज बोता है, वैसा ही फल प्राप्त करता है॥१४८॥

इसलिए उदार चित्तवाले व्यक्ति दूसरों के विरुद्ध कार्यों में प्रवृत्त नहीं होते। उच्च कोटि के व्यक्तियों का यह स्वाभाविक नियम है॥१४९॥

तुम दोनों महारानियां पूर्वजन्म की दिव्य बहिनें या किसी शाप के कारण मर्त्यलोक में आ गई हो, उसी प्रकार तुम दोनों के हृदय परस्पर सन्देह-रहित एवं शुद्ध हैं॥१५०॥

वसन्तक से इस प्रकार सुनकर दोनों रानियां के हृदय में जो थोड़ी ईर्ष्या की क्षीण रेखा-सी थी वह भी उन्होंने मिटा दी॥१५१॥

महारानी वासवदत्ता भी पति को दोनों के लिए समान मानकर पद्मावती को इसमें उसी प्रकार उद्यत रखती थी जैसे आत्महित में॥१५२॥

मन में कुछ शंकित मगध-नरेश ने भी रानी की महानुभावता का परिचय उसके भेजे हुए दूतों से जानकर सन्तोष प्रकट किया॥१५३॥

किसी दिन महामन्त्री यौगन्धरायण महारानियां तथा अन्य स्नेही मित्रों के साथ बैठे हुए नरराज के समीप आकर बोला—'महाराज ! अब कौशाम्बी क्यों नहीं चलते ? अब तो डरे हुए भी मगध-नरेश से किसी प्रकार की शंका नहीं है॥१५४-१५५॥


१. वर = उत्तम, अंग स्त्री की जननेन्द्रिय। १८

२१८ कथासरित्सागर

२१८ कथासरित्सागर कन्या सम्बन्धनाम्ना हि साम्ना सम्यक्स भाषितः । विगृह्य च कथं जह्याज्जीवितादधिकां सुताम् ॥ १५६ ॥ सत्यं तस्यानुपाल्यं च त्वया च स न वञ्चितः । मया स्वयं कृतं ह्येतन्न च तस्यासुखावहम् ॥ १५७॥ पारेभ्यश्च मया ज्ञातं यथा विक्रुष्टं न सः । तदर्थमेव चास्माभिः स्थितं च दिवसानमून ॥ १५८॥ एवं वदति निर्व्यूढकार्ये यौगन्धरायणे । मगधेश्वरसम्बन्धी दूतोऽत्र समुपाययौ ॥ १५९॥ तत्क्षणं स प्रविष्टोऽत्र प्रतीहारनिवेदितः । प्रणामान्तरमासीनो वत्सराजं व्यजिज्ञपत् ॥ १६० ॥ देवीपद्मावतीवृत्तसन्देशपरिशोधिना । मगधेशेन निर्दिष्टमिदं देवस्य साम्प्रतम् ॥ १६१॥ बहुना किं मया सर्वं ज्ञातं प्रीतोऽस्मि च त्वयि । तद्यदर्थोऽयमारम्भस्तत्कुरु प्रणता वयम् ॥ १६२॥ एतद्दूतवचः श्रुत्वा वत्सराजोऽभिननन्द सः । यौगन्धरायणीयस्य पुष्य नयतरोगिर ॥ १६३॥ ततः पद्मावतीं राज्ञ्या समानाय्य समं तया । तं दत्तप्राभृतं दूतं स सम्मान्य व्यसर्जयत् ॥ १६४॥ अथ चण्डमहासेनदूतोऽप्यत्र समाययौ । प्रविश्य स यथावच्च राजानं प्रणतोऽब्रवीत् ॥ १६५॥ देव ! चण्डमहासेनभूपतिः कार्यतत्त्ववित् । तव विज्ञात-वृत्तान्तो हृष्टः सन्दिष्टवानिदम् ॥ १६६॥ प्राशस्त्यं भवतस्तावदियत्तैवोयवर्णितम् । यौगन्धरायणो यत्त मन्त्री किमधिकोक्तिभिः ॥ १६७॥ धन्या वासवदत्ता तु त्वद्भक्त्या तत्कृतं तया । येनास्माभिः सतां मध्ये चिरमुन्नमितं शिरः ॥ १६८॥ न च वासवदत्तातो भिन्ना पद्मावती मम । द्वयोरेकं हि हृदयं तच्छीघ्रं कुरुतोद्यमम् ॥ १६९॥

तृतीय लम्बक २९९

तृतीय लम्बक २९९ कन्या-सम्बन्ध नामक सन्धि से मगधेश बाधित हो गया है अतः विरोध करके प्राणों से भी अधिक प्यारी पुत्री से कैसे हाथ धो लेगा॥१५६॥ उसे अपने सत्य का पालन करना चाहिए और तुम्हें भी। वास्तव में तुमने तो उसे ठगा नहीं। उसके लिए जो कुछ किया मैंने किया किन्तु यह भी उसके लिए दुःखकारक नहीं है॥१५७॥ इतने दिनों तक मैं गुप्तचरों से यह जानने का यत्न कर रहा था कि वह इस घटना के कारण विरुद्ध-क्रिया तो नहीं कर रहा है। इसीलिए हम इतने दिनों तक यहाँ ठहरे भी रहे॥१५८॥ इस प्रकार उत्तरदायित्व की रक्षा करनेवाले यौगन्धरायण के कहते ही मगधराज का दूत वहाँ आ पहुँचा॥१५९॥ पहरेदार के द्वारा सूचना प्राप्त होने पर उसी समय अन्दर बुलाये गये और प्रणाम करके बैठे हुए मगध दूत ने निवेदन किया॥१६०॥ रानी पद्मावती द्वारा भेजे गये जवाबी सन्देश से सन्तोष प्रकट करते हुए मगधेश ने महाराज को यह कहा है—अधिक कहने की आवश्यकता नहीं मैंने सब कुछ जान लिया है, तुम पर प्रसन्न हूँ जिस कार्य के लिए यह सब प्रयत्न किया गया है उसे प्रारम्भ करो। मैं तो तुम्हारे लिए सब हूँ अर्थात् अब तुम्हारा साथी हूँ॥१६१-१६२॥ उदयन ने मगधेश के इस स्पष्ट निर्देश का अभिनन्दन किया। यह सन्देश मानों यौगन्धरायण के नीति-वृक्ष के उगे हुए पुष्प के समान था॥१६३॥ तब यौगन्धरायण ने उदयन के द्वारा पद्मावती को वहीं बुलाकर उसके साथ ही दूत को उपहार, पुरस्कार आदि के द्वारा सन्तुष्ट करके विदा किया॥१६४॥ इसके अनन्तर ही उज्जयिनी से चण्डमहासेन का भी दूत आ गया, नियमानुसार राजा के सामने पेश होकर और प्रणाम करके बोला-महाराज! तुम्हारी वास्तविक स्थिति को जानते हुए राजा चण्डमहासेन ने प्रसन्नता के साथ सन्देश दिया है कि तुम्हारा महत्व इसी से विदित होता है कि तुम्हारा मन्त्री यौगन्धरायण है। इससे अधिक और क्या कहा जाय। देवी वासवदत्ता भी धन्य है, जिसके कारण सज्जन-समाज में हमारा सिर ऊँचा हुआ है। मेरे लिए पद्मावती वासवदत्ता से दूसरी नहीं है। उन दोनों का हृदय एक ही है इसलिए शीघ्र अपने उद्योग का प्रारम्भ करो॥१६५-१६९॥

एतन्निजश्वशुरदूतवचो निशम्य वत्सेश्वरस्य हृदये सपदि प्रमोदः। देव्यां च कोऽपि ववृधे प्रणयप्रकर्षो भूयांश्च मन्त्रिवृषम प्रजयानुबन्धः॥१७०॥ ततस्त देवीभ्यां सममुचितसत्कारविधिना कृतातिथ्य दूत सरभसमनाः प्रेष्य मुदितम्। विधास्यन्नुद्योग त्वरितमथ समन्त्र्य सचिवैः स चक्रे कौशाम्बीं प्रति गमनबुद्धि नरपतिः ॥१७१॥ इति महाकवि श्रीसोमदेवभट्ट-विरचिते कथासरित्सागरे लावणक लम्बके तृतीयस्तरङ्गः।

चतुर्थस्तरङ्गः वत्सराजस्य कौशाम्बींप्रति प्रत्यावर्तनम् ततोऽ लावणकात्तस्माद्ययौ सचिवै सह। वत्सराजः स कौशाम्बीं प्रतस्थे दयितान्वितः ॥१॥ प्रसस्र च मरुद्भावैस्तस्यापूरितभूतलः । वत्सरत्नमपोद्वेलसङ्कराशिजलधिरिव ॥२॥ उपमा¹ नृपतस्तस्य गजेन्द्रस्थस्य गच्छतः। भवेद्यदि रवियर्यायाद् गगने सोदयाचलः ॥३॥ स सितेनातपत्रेण कृतच्छायो बभौ नृपः। जिताकृतज्ञः प्रीत्या सम्यमान इवेन्दुना ॥४॥ तेजस्विनः स्वकक्षाभिस्त सर्वोपरिवर्तिनम्। सामन्ता परितो भ्रमुर्भुवं ग्रहगणा इव ॥५॥ पश्चात्करेणुकारूढे देव्यौ द्वे तस्य रेजतुः। श्रीभूषावनुरागेण साक्षादनुगते इव ॥६॥

१ यत्र अद्भुतौपमालंकारः। यथा च काव्यादर्शे-यदि शुभ्रूः ! भवेत् किञ्चिद् विश्रान्त लोचनम्। ततेमुखश्रियं धत्तामित्यतावद्भुतोपमा-इति।

तृतीय लम्बक १०१

तृतीय लम्बक १०१ अपने श्वसुर के इस प्रकार के वचन सुनकर वत्सराज का हृदय आनन्द से भर गया। महारानी वासवदत्ता पर प्रेम बढ़ गया और मन्त्री यौगन्धरायण पर भी स्नेह दृढ़ हो गया ॥१७॥ तदनन्तर दोनों महारानियों के साथ उस दूत को सम्मान-सहित विदा करके उत्साहित- हृदय वत्सराज ने मन्त्रियों से परामर्श करके दिग्विजय-यात्रा के प्रबन्ध में कौशाम्बी जाने का निश्चय किया ॥१७१॥ महाकवि श्री सोमदेव भट्ट-रचित कथा सरित्सागर के लावानक लम्बक का तृतीय तरंग समाप्त चतुर्थ तरंग वत्सराज का कौशाम्बी में पुनरागमन तदनन्तर एक दिन वत्सराज ने अपनी पत्नियों तथा मन्त्रियों के साथ लावाणक से कौशाम्बी की ओर प्रस्थान किया ॥१॥ असमय में उछलती हुई समुद्र की लहरों के समान कोलाहल से दिशाओं को गुंजित करती हुई उमड़ी सेनाओं ने साथ ही प्रस्थान किया ॥२॥ यदि सूर्य उदयाचल पर्वत के साथ आकाश में गमन करे तो हाथी पर बैठे हुए राजा उदयन की उपमा उससे दी जा सके' ॥३॥ सिर पर लगे हुए श्वेत छत्र से ऐसा मालूम होता था कि राजा ने सूर्य के तेज को जीत लिया था इसलिए प्रसन्न होकर चन्द्रमा मानो छत्र के व्याज से राजा की सेवा कर रहा था ॥४॥ उस मत्तोरति विराजमान (हाथी पर बैठ हुए) तेजस्वी उदयन के चारों ओर सामन्तगण इस प्रकार चक्कर लगा रहे थे जैसे अन्य ग्रह ध्रुव-नक्षत्र के चारों ओर भ्रमण करते हैं ॥५॥ राजा के पीछे हथिनिया पर बैठी हुई दोनो रानियां लक्ष्मी और पृथ्वी के समान राजा का अनुगमन कर रही थी ॥६॥ १ इसका नाम अभूतोपमा है। इसका उदाहरण दण्डी के काव्यादर्श में इस प्रकार है—हे मुग्ध ! यदि सुन्दर नेत्रों वाला कमल हो तो तेरे मुंह की शोभा धारण कर सके। काव्य प्रकाशकार ने इस अलंकार को अतिशयोक्ति का एकभेद माना है।

१२ कथासरित्सागर

१२ कथासरित्सागर स्पृङ्ग्गस्तुरङ्गसङ्घातत्तुराकृष्टनसङ्गता । पथि तस्यामवद्भूमिरेषमुक्तेव भूपतेः ॥७॥ एव वत्सेश्वरो गच्छन् स्तूयमानः स वन्दिभिः । दिन कतिपय प्राप कौशाम्बीं विततोत्सवाम् ॥८॥ ध्वजरक्तांशुकच्छन्ना गवाक्षोत्फुल्ललोचना । प्रद्वारवर्त्तिसोत्तङ्गपूर्णकुम्भकुचद्वया ॥९॥ जनकोलाहलानन्दस्लापा सौभहासिनी । सा प्रवासागते पत्यौ सत्वरं शुशुभे पुरी ॥१०॥ देवीद्वयानुयातश्च स राजा प्रविशंस्ताम् । पौरस्त्रीणां न कोप्य् आसीन्न तद्दर्शनोत्सवः ॥११॥ अपूरि हारिहर्म्यस्थरामाननशतैर्नभः । देवीमुक्तसितस्येन्दोः सर्वैः सभागतरिव ॥१२॥ वातायनगताश्चान्याः पश्यन्त्योऽनिमिषेक्षणाः । चक्रुः सकौतुकामातविमानस्थाप्सरोग्रमम् ॥१३॥ काश्चिद् गवाक्षजालाग्रलग्नपक्ष्मललोचनाः । असृजन्निव नाराचपञ्जराणि मनोभुवः ॥१४॥ एकस्याः सोत्सुका दृष्टिम् पालोकविकस्वरा । श्रुते पार्श्वमपश्यन्त्यास्तदाक्रमातुमियाय यौ ॥१५॥ द्रुतागतायाः कस्याश्चिन्मुहुरुच्छ्वसितौ स्तनौ । कञ्चुकादिव निर्गन्तुमीपतुस्तद्विधुक्षया ॥१६॥ अन्यस्याः संभ्रमच्छिन्नहारमुक्तामणा बभुः । गलन्तो हृदयस्येव हर्षवाष्पाम्बुसीकराः ॥१७॥ यद्यस्यामाचरेत् पापमग्निसंज्ञाणके ततः । प्रकाशकोऽप्यसावन्धः तमो जगति पालयेत् ॥१८॥ इति वासवदत्तां च दृष्ट्वा स्मृत्वा च तत्कथा । बाहप्रबाष सोत्कण्ठा इव क्यश्चिद् बभाषिरे ॥१९॥

१ हर्षश्च शीतो शोकाञ्च स्वेदश्चा भवति। तथा च कालिदासः— "नलिन्यो- शोकजमश्रु वाष्प स्तन्योरधोतं शिशिरो बिभेद। पदङ्गा सरप्सोर्जमभुन्ध तत्पं दिवाभि विध्य- डशक्तीर्णः॥ रघु १४-२१

तृतीय लम्बक ३३

तृतीय लम्बक ३३ मार्ग में ऊँचे-ऊँचे घोड़ों के खुरों के आघात से शत-विक्षत भूमि राजा के द्वारा उपभोग की हुई नायिका-सी मालूम होती थी ॥७॥ इस प्रकार बन्दिगणों से स्तुति किया जाता हुआ उदयन कुछ दिनों के अनन्तर कौशाम्बी पहुँच गया ॥८॥ जिस प्रकार पति के प्रवास से लौटने पर पत्नी प्रसन्नता का प्रदर्शन करती हुई, शोभित हो रही थी उसी प्रकार स्वामी के लौटकर आने पर कौशाम्बी-नगरी शोभित हो रही थी। नगरी नायिका खंडों में छाये हुए खास वस्त्रों से ढँकी हुई थी भवनों के झरोखे मानों उसके खिले हुए नेत्र थे। गुप्त द्वारों पर रखे हुए पूर्ण कुम्भ नगरों के पीन स्तनों के समान दीखते थे। जन-समाज के कोलाहल के बहाने मानों नगरी स्वामी के आगमन पर प्रसन्नता-सूचक शब्द बोल रही थी। सुधा-धवल स्वच्छ भवन नगरी-नायिका के हास-स्वरूप मालूम होते थे ॥९॥ राजा के प्रवास से लौटने पर प्रसन्न कौशाम्बी नगरी ऐसी प्रसन्न थी जैसे पति के प्रवास से लौटने पर पत्नी प्रसन्न होती है ॥१ ॥ दोनों पत्नियों से अनुगमन किया जाता हुआ वह राजा नगरवासिनी स्त्रियों के लिए अत्यन्त उल्लास और प्रसन्नता का विषय रहा ॥११॥ सुन्दर भवनों से देखती हुई सहस्रों नारियों के मुखचन्द्रों से आकाश भर गया मानों वासवदत्ता के मुखचन्द्र से पराजित चन्द्रों की सेना उसकी सेवा के लिए एकत्र हो रही थी ॥१२॥ मकानों के झरोखों (खिड़कियों) से अपलक देखती हुई नागरिक रमणियां राजा को देखने के लिए स्वर्ग से उतरी हुई विमानस्थ अप्सराओ का भ्रम उत्पन्न करती थी॥ झरोखों के आगे लगी हुई सपक्ष्म आँखोवाली कुछ स्त्रियां मानों कामदेव के पत्रयुक्त बाणों के बाण (कटाक्ष) छोड़ रही थी ॥ किसी सुन्दरी की बड़ी आँखें राजा को देखकर प्रसन्नता से फैलकर न देखते हुए कानों को मानों समाचार देने के लिए उसके पास दौड़कर चली गई थीं ॥१३ १५॥ दौड़कर आई हुई किसी सुन्दरी के हाँफने से उछलते हुए स्तन राज-दर्शन के लिए मानों चोली से बाहर निकलना चाहते थे ॥१६॥ घबराहट से दौड़कर खिड़की पर आती हुई किसी सुन्दरी का मुक्ताहार मानो हर्ष के आँसुओं की लड़ी-सा टूटकर बिखर गया¹ ॥ कुछ महिलाएँ, लावानक मे वासवदत्ता के जल जाने के समाचार पर टीका-टिप्पणी करती हुई आपस में कहने लगीं कि यदि लावानक में आग ने इसे सचमुच जला दिया होता तो सचमुच वह जगत् प्रकाशक अग्नि संसार का अन्धरे में डाल देती ॥१७-१९॥ १.आनन्दाश्रु शीतल और शोकाश्रु गरम होते हैं। देखिए कालिदास—आनन्दजः शोकश्रुनुवाष्पस्तयोरशीतं शिशिरो बिभेद। गङ्गा-सरय्वोर्जलमुष्ण तप्तं हिमाद्रिनिष्यन्द इवा- वतीर्ण.-रघुवंश १४-३।

३४ कथासरित्सागर

३४ कथासरित्सागर दिष्ट्या न रुज्जिता देवी सपत्न्या सदृशीतया । इति पद्मावतीं वीक्ष्य वयस्या जगदेऽन्यया ॥२०॥ नूनं हरमुरारिभ्यां न दृष्टं रूपमेतयोः । किमन्यथा भजेतां तौ बहुमानमुमाभ्रियोः ॥२१॥ इत्यूचुरापरास्तं द्वे दृष्ट्वा देव्यौ परस्परम् । क्षिपन्त्यः प्रमदोत्फुल्ललोचनेन्दीवरस्रजः ॥२२॥ एवं वत्सेश्वरः कुर्वञ्जनतानयनोत्सवम् । स्वमन्दिरं सदेवीकः प्राविशत्कृतमङ्गलः ॥२३॥ प्रभाते याम्यसरसो याम्येरिन्दूदये सभा । तत्कालं तस्य सा कापि शोभामूद्राजवेश्मनः ॥२४॥ क्षणादपूरि सामन्तसङ्घोपायनैश्च तत् । सूर्य्यमद्भिर्बहिर्बाधेय-भूपालोपायनागमम् ॥२५॥ समान्य राजलोकं च वत्सराजः कृतोत्सवः । चित्तं सयजनस्येव विवेशान्तःपुरं ततः ॥२६॥ देव्योर्मध्यस्थितस्तत्र रतिप्रीत्योरिव स्मरः । पानादिलीलया राजा दिनशेषं निनाय सः ॥२७॥ अपरेद्युश्च तस्यैको नृपस्यास्थानवर्त्तिनः । मन्त्रिणां सन्निधौ विप्रो द्वारि चक्रन्द कश्चन ॥२८॥ गोपालककथा अद्याह्यास्मदटव्यां मे पापैर्गोपालकैः प्रभो । पुत्रस्य चरणोच्छेदो विहितः कारणं विना ॥२९॥ तच्छ्रुत्वा तत्क्षणं विप्रान्वष्टभ्यानाय्य भूपतिः । गोपालकांस्त पप्रच्छ ततस्तेऽप्येवमब्रुवन् ॥३०॥ देव ! गोपालका भूत्वा क्रीडामो विजने वयम् । तत्रैको देवसेनाख्यो मध्ये गोपालकोऽस्ति नः ॥३१॥ एकवृक्षे च सोऽटव्यामुपविष्टः शिलासने । राजा युष्माकमस्तीति बबरत्यस्माननुशास्ति च ॥३२॥ अस्मन्मध्ये च केनापि तस्याज्ञा न विलङ्घ्यते । एवं गोपालकोऽरण्ये राज्यं स कुरुते प्रभो ॥३३॥ अथ चैतस्य विप्रस्य तनयस्तेन वर्त्मना । गच्छन् गोपालराजस्य प्रणामं तस्य नाकरोत् ॥३४॥ मा गास्त्वमप्रणम्येति राजादेशेन जल्पतः । अस्मान्विधूय सोऽप्यासीच्छासितोऽपि हसन्वटुः ॥३५॥

तृतीय लम्बक ५५

तृतीय लम्बक ५५ पद्मावती को देखकर एक सहेली दूसरी से बोली कि सहेली के समान अपनी सौत से लज्जित नहीं हुई ॥२१॥ सचमुच शिव और कृष्ण ने इन दोनों (वासवदत्ता और पद्मावती) का रूप नहीं देखा। यदि वे देख लेते तो पार्वती और लक्ष्मी को कदापि प्यार न करते ॥२२॥ सुगन्धित और नवविकसित नीलकमल के समान लोचनवाली नगर रमणियाँ दोनों रानियों को देखकर इसी प्रकार की चर्चा करती रहीं ॥२३॥ इस प्रकार जनता की आँखों को राजा रानियों के साथ मंगलयुक्त आनन्द देता हुआ उदयन मंगलाचरण करके अपने राज-मन्दिर में गया ॥२४॥ राजा के भवन में प्रवेश करने पर उस भवन की शोभा ऐसी हुई जैसे प्रभात के समय कमल- सरोवर की और चन्द्रोदय होने पर समुद्र की होती है ॥२५॥ क्षण-भर में ही राजभवन सामन्त-नरेशों के मांगलिक उपहारों से ऐसा भर गया मानों पृथ्वी के समस्त राजाओं ने उपहार भेजे हों ॥२५॥ राजा उदयन ने सभी समागत सामन्त-नरेशों का सम्मान करके जनता के चित्त के समान उस राज-भवन में प्रवेश किया ॥२६॥ अपने भवन में रति और प्रीति के मध्य कामदेव के समान बैठे हुए, राजा उदयन ने पान-गोष्ठी (मद्यपान) में उस बचे हुए दिन को व्यतीत किया ॥२७॥ ग्वालों की कथा दूसरे दिन राज-सभा में मन्त्रियों के साथ बैठे हुए राजा के सभी द्वार पर एक ब्राह्मण चिल्लाने लगा। महाराज ! महान् अनर्थ है कि जंगल में ग्वालों ने बिना कारण ही मेरे पुत्र के पैर काट डाले ॥२८-२९॥ यह सुनकर राजा ने दो-तीन ग्वालों को पकड़वा कर बुलाया और पूछने पर वे बोले—महा- राज! हमलोग गौएँ चराते और निर्जन वन में खेलते हैं हमलोगों के बीच देवसेन नामक एक ग्वाला है। वह जंगल के एक स्थान पर पत्थर की चट्टान पर बैठकर कहता है कि मैं तुम्हारा राजा हूँ और हमारा शासन भी करता है। हमलोगों में कोई भी उसकी आज्ञा का उल्लंघन नहीं करता। इस प्रकार वह गोपालक जंगल में राज्य करता है। आज इस ब्राह्मण के लड़के ने उस रास्ते से जाते हुए उस ग्वाले राजा को प्रणाम नहीं किया। हमलोगों ने उससे कहा भी कि तुम बिना प्रणाम किये न जाओ फिर भी हँसते हुए उस बालक ने हमलोगों की बात न मानी ॥३०-३५॥ १९

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तृतीय लम्बक १०७

तृतीय लम्बक १०७ तब उस ग्वालराज ने हमलोगों को आज्ञा दी कि इसके पैर काटकर इसे दंड दो। तब हमलोगों ने दौड़कर इसके पैर काट दिये। राजा की आज्ञा का उल्लंघन कौन कर सकता है॥३६-३७॥ इस प्रकार ग्वालों के निवेदन करने पर उसका रहस्य समझकर बुद्धिमान् यौगन्धरायण ने राजा से एकान्त में कहा—महाराज ! अवश्य ही उस स्थान में खजाना आदि है। उसी के प्रभाव से ग्वाला भी वहाँ राजा बनने की सोचता है। अतः आप वहाँ चलें। मंत्री के ऐसा कहने पर राजा सेना और सामान के साथ वहाँ गया॥३८-४०॥ वत्सराज को खजाना और सिंहासन की प्राप्ति जंगल में जाकर और भूमि की परीक्षा करके जब कर्मकर (मजदूर) भूमि को खोदने लगे तब उस गड्ढे के नीचे से एक पर्वताकार यक्ष निकला। और राजा से बोला कि 'राजन् ! तुम्हारे दादा का रखा हुआ यह खजाना है। मैंने बहुत समय तक उसकी रक्षा की। अब तुम इसे सम्हालो'॥४१-४२॥ वत्सराज को इस प्रकार कहकर और उसके दिये हुए उपहारों को स्वीकार कर यक्ष अन्तर्धान हो गया और राजा का उस गड़े में बहुत बड़ा खजाना मिला॥४३॥ राजा ने उसकी प्रसन्नता में उत्सव मनाया और उस धन को एवं बहुमूल्य रत्न-सिंहासन को लेकर तथा उन ग्वालों को समुचित दंड देकर वह अपनी राजधानी कौशाम्बी को लौट आया॥४४॥ उन्नति का समय आने पर अनेक प्रकार की शुभ बातें होती हैं। कौशाम्बी में राजा द्वारा लाकर राजभवन में रखे गये उस सिंहासन को नागरिक जनता देखने लगी। और बजते हुए वाद्य के समान सुन्दर आनन्द-शब्द 'वाह-वाह' करने लगे॥४५॥ वह सिंहासन जड़ी हुई लाल मणियों की किरणों के प्रसार से मानों राजा उदयन चारों दिशाओं में फैलनेवाले अभ्युदय की सूचना दे रहा था॥४६॥ चाँदी के तारों से पिरोये हुए मोतियों की शुभ्र कड़ियों की उज्ज्वल प्रभा से वह सिंहासन पन्ना के मणियों के अत्यन्त आश्चर्य पर मानों हँस रहा था॥४७॥ उस सिंहासन के प्रभाव को देखकर मन्त्रियों को राजा के दिग्विजय का निश्चय हो गया। अतः वे भी उत्सव मनाने लगे॥४८॥ १. सिंहासन बत्तीसी की कथा में भोजराज के विषय में इसी ढंग की कथा मिलती है। उसे भी उसी प्रकार सिंहासन की प्राप्ति हुई थी।

५८ कथासरित्सागर

५८ कथासरित्सागर मन्त्रिणोऽप्युत्सवं चक्रुर्जयं निर्दिश्य भूपतेः। आमुखापातिकल्याणं कार्यसिद्धिं हि शंसति॥४९॥ यतश्च पताकाविशुद्धैभिराकीर्णे गगनान्तरे। ववर्षे राजजलदः कनकं सोऽनुजीविषु॥५०॥ उत्सवेन च नीतेऽस्मिन्दिने यौगन्धरायणः। चित्तं जिज्ञासुरन्येद्युर्वत्सेश्वरमभाषत॥५१॥ एतत्कुलक्रमायातं महासिंहासनं रवम्। यत्प्राप्तं तत्समारुह्य देवामङ्क्रियतामिति॥५२॥ विजित्य पृथ्वीमास्ना यत्र मे प्रपितामहाः। सत्राभित्वा दिशः सर्वाः का समारोहतः प्रथा॥५३॥ वत्सराजस्य दिग्विजयः [L13: जित्वैवेमां समुद्रान्तां पृथ्वीं पृथुविभूषणाम्। अलङ्करोमि : पूर्वतो रत्नसिंहासनं महत्॥५४॥ इत्यूचिवाश्नरपतिर्नारुरोह स सम्प्रति। सम्भवत्यभिजातानामभिमानो ह्यकृत्रिमः॥५५॥ ततः प्रीतस्तमाह स्म नृपं यौगन्धरायणः। साधु देव! कुरु प्राच्यां तर्हि पूर्वं जयोद्यमम्॥५६॥ तच्छ्रुत्वैव प्रसङ्गात्तं राजा पप्रच्छ मन्त्रिणम्। स्थितास्वप्युत्तराद्यासु प्राक्प्रार्थी यान्ति किं नृपाः॥५७॥ एतच्छ्रुत्वा जगादेनं पुनर्यौगन्धरायणः। स्फीतापि राजन्कौबेरी म्लेच्छसंसर्गगर्हिता॥५८॥ अर्वधिस्तमये हेतुः पश्चिमापि न पूज्यते। प्रासन्नराक्षसा दुष्टा दक्षिणाप्यन्तकाधिता॥५९॥ प्राच्यामुदेति सूर्यस्तु प्राचीमिन्द्रोऽधितिष्ठति। जाह्नवी याति च प्राचीं तेन प्राची प्रशस्यते॥६०॥ देशेष्वपि च विन्ध्याद्रिहिमवन्मध्यवर्तिषु। जाह्नवीजलपूतो यः स प्रशस्यतमो मतः॥६१॥ तस्मात्प्राचीं प्रयान्त्याशो राजानो मङ्गलैषिणः। निवसन्ति च देशेऽपि सुरर्षिषुषमाभृत॥६२॥

तृतीय लम्बक १०९

तृतीय लम्बक १०९ तदनन्तर सिंहासन और खजाना मिलने की प्रसन्नता में राजा रूपी मेघ पताका-रूपी बिजली-से चमकते हुए नगरी के आकाश से सेवकों पर सोने की वृष्टि करने लगे। (राजा ने खूब धन लुटाया) ॥४९-५०॥ इस प्रकार उत्सव पुरस्कार-वितरण आदि में उस दिन के व्यतीत हो जाने पर दूसरे दिन राजा का मन टोहने (जाँचने) की इच्छा से यौगन्धरायण ने कहा—'महाराज! तुमने अपनी कुल-परम्परा से आये हुए सिंहासन को प्राप्त किया है, अतः अब उसपर बैठो ॥५१-५२॥ वत्सराज का दिग्विजय के लिए विचार राजा ने कहा—'मेरे परदादा सारी पृथ्वी को जीतकर जिस सिंहासन पर बैठे थे उसपर बिना चारों दिशाओं की विजय किये बैठने से मेरा क्या महत्त्व है ? ऐसा कहकर राजा सिंहासन पर नहीं बैठा कारण यह कि कुलीनों को आत्माभिमान स्वाभाविक होता है ॥५३-५५॥ तब प्रसन्न यौगन्धरायण ने कहा—'ठीक है, महाराज ! तब पहले पूर्व दिशा में विजय का उद्यम कीजिए।' ॥५६॥ यह सुनकर राजा ने यौगन्धरायण से प्रसंगवश पूछा कि 'उत्तर आदि अनेक दिशाओं के रहते हुए राजा लोग पहले पूर्व दिशा की ओर क्यों जाते हैं ? यौगन्धरायण ने कहा—'महाराज ! उत्तर दिशा यद्यपि प्रशस्त है, किन्तु म्लेच्छों के संपर्क से दूषित है। सूर्य का अस्त होने के कारण पश्चिम को भी अच्छा नहीं माना जाता और दक्षिण दिशा यमराज की दिशा होने तथा उसमें राक्षसों का निवास होने के कारण उसे भी अच्छा नहीं समझा जाता ॥५७-५९॥ पूर्व में सूर्य का उदय होता है। उसमें इन्द्र का निवास है। गंगा नदी भी पूर्व की ओर जाती है, इसलिए पूर्व दिशा पवित्र और प्रशस्त मानी जाती है ॥६०॥ भारतीय प्रदेशों में भी विन्ध्याचल और हिमाचल के मध्य का देश जो गंगा-जल से पवित्र है, सर्वश्रेष्ठ माना जाता है ॥६१॥ इसलिए मंगलार्थी राजा लोग पहले पूर्व की ओर प्रयाण करते हैं और गंगा-तटवर्ती देशों में निवास भी करते हैं ॥६२॥

११७ कथासरित्सागर

११७ कथासरित्सागर

पूर्वजैरपि हि प्राचीप्रक्रमणं जित्वा दिशः। गङ्गोपकण्ठे वासश्च विहितो हस्तिनापुरे ॥६३॥ शतानीकस्तु कौशाम्बीं रम्यभावन शिश्रिये। साम्राज्ये पौरुषाधीने पश्यन्देशमकारणम् ॥६४॥ इत्युक्त्वा विरते तत्र तस्मिन्यौगन्धरायणे। राजा पुरुषकारैकबहुमानादभाषत ॥६५॥ सत्यं न देशनियमः साम्राज्यस्येह कारणम्। संपत्सु हि सुसत्त्वानामर्थहेतुः स्वपौरुषम् ॥६६॥ एकोऽप्याश्रयहीनोऽपि लक्ष्मीं प्राप्नोति सत्त्ववान्। श्रुता किं नात्र युष्माभिः पुरा सत्त्ववतः कथा ॥६७॥ एवमुक्त्वा स नरेशः सचिबानभ्यधित पृच्छतः। विचित्रां सन्निधौ देव्योरिमामकथयत्कथाम् ॥६८॥ अथ आदित्यसेनस्य तेजस्वत्याश्च कथा अस्ति भूतलविख्याता येयमुज्जयिनी पुरी। तस्यामादित्यसेनाख्यः पूर्वमासीन्महीपतिः ॥६९॥ आदित्यस्येव यस्याह्वं न ध्वास्तांस किञ्च क्वचित्। प्रतापमिलयस्यैकश्चक्रवर्तितया रयः ॥७०॥ भासत्युच्छ्रिते व्योम्नि यच्छत्रे तुहिनत्विषि। न्यवर्तन्तातपत्राणि राज्ञामपगतोष्मणाम् ॥७१॥ समस्तभूतकाभोगसम्भवानां बभूव सः। भाजनं सर्वरत्नानामम्बुराशिरिवाम्भसाम् ॥७२॥ स कदाचन कस्यापि हेतोर्यात्रागतो नृपः। ससैन्यो जाह्नवीकूलमासाद्यावस्थितोऽभवत् ॥७३॥ तत्र स गुणवर्माख्यः क्षोभ्याख्यस्तत्प्रदेशजः। अभ्यगाद्रूपमादाय कन्यारत्नमुपायनम् ॥७४॥ रत्नं त्रिभुवनेऽप्येषा कन्योत्पन्ना गृहे मम। नान्यत्र दातुं शक्या च देवो हि प्रमुरीदृशः ॥७५॥ इत्याख्या प्रतीहारमुखेनाद्य प्रविश्य सः। गुणवर्मा निजां तस्मै राज्ञे कन्यामवर्धयत् ॥७६॥ स तां तेजस्वतीं नाम दीप्तिद्योतित-दिङ्मुखाम्। अनङ्गमङ्गलावास-रत्न-दीपशिखामिव ॥७७॥ पश्यन्स्नेहमयो राजा क्लिष्टस्तत्कान्तितेजसा। कामाग्निनेव सन्तप्तः स्विन्नो विगलति स्म सः ॥७८॥

तृतीय लम्बक ३११

तृतीय लम्बक ३११ तुम्हारे पूर्वज पांडवों ने भी पूर्व की दिशा से ही विजय प्रारम्भ की थी और गंगातटवर्ती हस्तिनापुर को राजधानी बनाया था क्योंकि साम्राज्य पौरुष के अधीन है, उसमें किसी देश- विशेष का कोई महत्त्व नहीं है॥६३-६४॥ यौगन्धरायण के इस प्रकार कहकर चुप हो जाने पर राजा उदयन पुरुषार्थ को बहुमान देने के कारण बोला—यह सत्य है कि देश-विशेष साम्राज्य का कारण नहीं होता। उच्च कोटि के व्यक्तियों के सम्पत्ति प्राप्त करने में अपना पुरुषार्थ ही एकमात्र कारण है॥६५-६६॥ किन्तु बलवान् उच्च व्यक्ति आश्रयहीन होकर भी लक्ष्मी प्राप्त करता है। क्या आपलोगों ने सत्त्ववान् (जीवनवाले) व्यक्ति की कथा नहीं सुनी है ? ॥६७॥ इतना कहकर मन्त्रियों से प्रार्थित वत्सराज ने महारानियों के सामने ही कथा कहना प्रारम्भ किया॥६८॥ वीर विदूषक ब्राह्मण की कथा समस्त भूतल में प्रसिद्ध उज्जयिनी नाम की नगरी है। पूर्व समय में उसमें आदित्यसेन नाम का राजा राज्य करता था ॥६९॥ आदित्य के ही समान महाप्रतापी आदित्यसेन का रथ भी कभी कहीं रुकता न था॥७०॥ चन्द्रमा के समान उस राजा का छत्र ऊँचा होने पर अन्य सभी राजाओं के छत्र दूर हो जाते थे क्योंकि उन (राजाओं) की गर्मी शान्त हो जाती थी। वह राजा भूतल में प्राप्त हो सकनेवाले सभी भोगों का वैसे ही आश्रय-स्थान था जैसे समस्त रत्नों का आश्रय समुद्र होता है। वह राजा किसी समय यात्रा के लिए निकला और सेना के साथ गंगा के तट पर आकर ठहर गया। वहाँ ठहरे हुए राजा के समीप वहाँ का रहनेवाला गुप्तवर्मा नाम का कोई धनी साहूकार कन्यारत्न को उपहार-स्वरूप लेकर राजद्वार में उपस्थित हुआ॥७१-७४॥ वह द्वारपाल से बोला—देव ! यह तीनों लोकों की रत्न-स्वरूपा कन्या मेरे घर में उत्पन्न हुई है। इसे मैं अन्य कहीं प्रदान नहीं कर सकता। आप ही इस उपहार के योग्य हैं। द्वारपाल से इस प्रकार निवेदन कराकर गुप्तवर्मा ने राजा को अपनी कन्या दिखाई। स्नेहापूर्ण राजा उसके कामाग्नि के समान सौन्दर्य-प्रभाव में पिघलकर पानी-पानी हो गया॥७५-७८॥

३१२ कथासरित्सागर

३१२ कथासरित्सागर स्वीकुर्वतो च तत्पाल महाब्धोपशोभिताम्। चकार गुणवर्माणं परितुष्यात्मनः समम् ॥७९॥ अतस्तां परिणीय प्रियां तेजस्वतीं भूपः। श्लाघमानी स तया मायमुज्जयिनीं ययौ ॥८०॥ तत्र तन्मुखसक्तैकदृष्टी राजा ह्यभूतया। न्ददर्श राजकार्याणि न यथा सुमहाम्यपि ॥८१॥ तजस्वतीदृशलापकीलितेव त्रिल धृतिः। माघमप्रप्रजानन्दस्तस्यात्राङ्गुतमशक्यत ॥८२॥ धिरप्रविष्टो निर्गान्ध मोन्त'पुरान्नृपः। निरगादरिवर्गस्य हृदयातु रुजाम्बरः ॥८३॥ कालेन तस्य जज्ञे च राज्ञः सर्वानिनन्दिता। कन्या तेजस्वती देव्यां बुद्धौ च विजिगीषुता ॥८४॥ परमाद्भुतरूपा सा तृणीकृत्य जगत्त्रयम्। हृपं तस्याकरोत्कन्या प्रताप च जिगीषुता ॥८५॥ अथाभियोक्तुमुत्सिक्तः सामन्त कश्चिदेकदा। आदित्यसेनः प्रययावुज्जयिन्याः स भूपतिः ॥८६॥ तां च तेजस्वतीं राज्ञीं समास्कन्दकरेणुकाम्। सहप्रयायिनीं चक्रे सम्यक्स्याश्चिदेवताम् ॥८७॥ आरुरोह वराश्वं च दर्पोद्यमंनिश्ररम्। जङ्गमाद्रिनिभं शृङ्गं स श्रीवृक्षं समेखलम् ॥८८॥ आसुत्कोत्थितपादाभ्यामभ्यस्यन्तमिवान्बर । गति गरुत्मतो दृष्ट्वा वेगसद्ब्रह्मचारिणः ॥८९॥ जवस्य मम पर्याप्ता कि नु स्यादिति मेदिनीम्। कथयन्तमिवोन्नम्य कन्धरां धीरया दृशा ॥९०॥ किंचिद् गत्वा च सम्प्राप्य समां भूमि स भूपतिः। अश्वमुत्तजयामास तेजस्वत्याः प्रवक्षयन् ॥९१॥ सोऽश्वस्तत्पाणिघातेन यन्त्रेणेवैरित शरः। जगाम क्ष्वाप्यतिजवादलक्ष्यो लोकलोचनै ॥९२॥ १ श्रीवृक्ष-इत्यश्वजातिः। पर्वत पक्षे श्री वृक्षो विश्वद्रुमः, अन्य पक्षेण रोमावली।

तृतीय लम्बक ११५

तृतीय लम्बक ११५ वह तेजस्वती नाम की कन्या अपनी उज्ज्वल कान्ति से दिशाओं को ऐसे प्रकाशित कर रही थी मानों कामदेव के मंगल-भवन की रत्नदीप-शिखा हो। आदित्यसेन ने महारानी-पद के योग्य उस कन्या को ग्रहण कर और प्रसन्न होकर गुणवर्मा को अपने समान राजा बना दिया ॥७९॥

राजा ने उसके साथ विवाह करके अपने को कृत-कृत्य समझा और उसे लेकर उज्जयिनी आया ॥८० ॥

उज्जयिनी आकर राजा रात-दिन उसका मुंह निहारने में ही लगा रहता था। इसी कारण राज्य-सम्बन्धी बड़े-बड़े कार्यों को भी देखता न था ॥८१॥

तेजस्वती के मधुर वचनों से कीलित राजा के कानों को दुःखित प्रजा का चीत्कार-शब्द अपनी ओर आकृष्ट न कर सका ॥८२॥

बहुत काल से अन्तःपुर में गया हुआ राजा बाहर न निकला किन्तु उसकी इस स्थिति से शत्रुओं के हृदय का भय निकल गया ॥८३॥

कुछ समय के अनन्तर उस राजा से महादेवी में अति सुन्दरी कन्या और बुद्धि में विजय करने की इच्छा उत्पन्न हुई ॥८४॥

तदनन्तर राजा किसी विद्रोही सामन्त-राजा पर चढ़ाई करने के लिए उज्जयिनी से बाहर निकला। उसके साथ हथनी पर चढ़ी हुई महारानी तेजस्वती भी सेना के देवता के समान चली। राजा हर्ष से पसीने के झरने बहाते हुए, जंगम पर्वत के समान शीघ्रजङ्घ नाम के घोड़े पर सवार हुआ। कुछ दूर जाकर समतल भूमि मिलने पर राजा ने तेजस्वती को अपना कोशल दिखाने के लिए घोड़े को तेज कर दिया। जिस प्रकार यन्त्र से फेंका हुआ बाण सरसराकर वेग से जाता है, उसी प्रकार राजा की जाँघों से प्रेरित वह घोड़ा तीर के समान उड़ चला और लोगों की आँखों से ओझल हो गया ॥८५ २॥ ४