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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,079 पृष्ठ

सप्तम लम्बक ८१

सप्तम लम्बक ८१ राजा ने भी उसके सौन्दर्य सुचाई एवं विनय से आकृष्ट होकर अपने को छिपाये हुए ही उसका समुचित अभिनन्दन किया ॥३०॥ तब मदनमाला ने स्नान बहुमूल्य फूल इत्र वस्त्र भूषण आदि से राजा का सत्कार किया ॥३१॥ राजा के अनुयायियों का भी समुचित भोजन आदि विविध प्रकार से आतिथ्य-सत्कार किया ॥३२॥ उसके वर्तन से वशीभूत मदनमाला ने पान (मद्यपान) संगीत आदि से दिन-भर उसका मनोरंजन किया और अपने को राजा के लिए अर्पित कर दिया ॥३३॥ उस वेश्या द्वारा प्राप्त चक्रवर्ती राजा के योग्य सेवा-सत्कार का इसी प्रकार सेवन करता हुआ राजा कुछ दिनों के लिए वही गुप्त रूप से रहने लगा ॥३४॥ याचकों को प्रतिदिन वह जितना जो कुछ भी देता था मदनमाला वह सब लाकर स्वयं रख देती थी ॥३५॥ मदनमाला राजा पर इस प्रकार आसक्त थी कि अन्य लोगों के संपर्क से दूर रहकर, राजा विक्रम से उपभोग किये जाते धन और शरीर को सफल और धन्य समझती थी। यहाँ तक कि प्रतिष्ठान नगर के राजा नरसिंह को भी विक्रमादित्य के प्रेम के कारण किसी युक्ति से उसने आने से रोक दिया ॥३६-३७॥ इस प्रकार, मदनमाला से सेवित राजा विक्रम ने अपने साथ रहनेवाले मन्त्री बुद्धिवर से एकान्त में कहा—'वेश्या अर्थ-लोलुप होती है। अर्थ के बिना वह कामदेव पर भी प्रसन्न नहीं होती। ब्रह्मा ने भिक्षुका का निर्माण करने और उनसे लोभ को लेकर वेश्याओं को दे दिया ॥३८-३९॥ किन्तु, यह मदनमाला धन का अत्यन्त स्वतन्त्र उपभोग करते हुए भी मुझ पर अत्यन्त स्नेह के कारण विरक्त नहीं है, बल्कि प्रसन्न है ॥४०॥ तो मैं अब इसका प्रत्युपकार कैसे करूँ? जिससे क्रमशः मेरी प्रतिज्ञा भी सिद्ध हो सके' ॥४१॥ यह सुनकर मन्त्री बुद्धिवर राजा विक्रम से बोला—यदि ऐसा ही है, तो प्रपंचवज्र नाम के भिक्षु (तपस्वी) ने जो तुम्हें रत्न दिये थे उन बहुमूल्य रत्नों को इसे भेंट कर दो ॥४२॥ तब राजा ने कहा—उन सब रत्नों के देने पर भी इसका कुछ भी बदला नहीं चुकाया जा सकता। उसने कृतघ्न न समझ उसका प्रत्युपकार करने का और ही उपाय है ॥४३-४४॥

८४ कथासरित्सागर

८४ कथासरित्सागर तच्छ्रुत्वा सोऽब्रवीन्मन्त्री देव किं तेन भिक्षुणा। स्वत्सेवा सा कृतस्यैष तद्वृत्तान्तस्त्वमोच्यताम् ॥४५॥ इत्युक्तो मन्त्रिणा तेन राजा बुद्धिवरण सः। जगाद शृणु तत्रेतां तत्कथां वर्णयामि ते ॥४६॥ प्रपञ्चबुद्धिभिक्षुकथा पूर्व पाटलिपुत्रे मे प्रविष्टस्यास्पदान्वहम्। भिक्षु प्रपञ्चबुद्ध्याख्यः समुद्गकमुपानयत् ॥४७॥ अहं तथैव सतत वर्षमात्रं समर्पयन्। भाण्डागारिकहस्तं तन्मृद्घाटितमव सत् ॥४८॥ एकदा भिक्षुणा तत्र ढौकितं तत्समुद्गकम्। देवात् पाणेर्मम पतद्द्विधामूतमभूद् भुवि ॥४९॥ निरगाच्च महारत्नं तस्मादनलभासुरम्। प्राक्तन्येवाप्यपञ्चिात हृदयं तेन दर्शितम् ॥५०॥ तद्वृष्ट्वादाय चान्यानि तान्यानाय्य विभज्य च। समुद्गकानि सर्वेभ्यो रत्नान्यहमवाप्तवान् ॥५१॥ ततः प्रपञ्चबुद्धिं तमप्राक्षं विस्मयादहम्। किमहो सेवसे रत्नैरैष मामीदृशैरिति ॥५२॥ अथान्त्र विजनं कृत्वा स भिक्षुर्मामवोचत। अस्यां कृष्णचतुर्दश्यामागामिन्यां निशागमे ॥५३॥ श्मशाने साधनीया मे विद्या काचित्सतो बहिः। तत्र साहायके वीर त्वदागमनमर्थये ॥५४॥ वीरसाहाय्यनिर्विघ्ना सुसुलभ्या हि सिद्धयः। इत्युक्तो भिक्षुणा तेन तदहं प्रतिपन्नवान् ॥५५॥ अथ दृष्टे गते तस्मिन् दिने कृष्णचतुर्दशी। चागात्सा श्रमणस्यास्य तस्यास्मार्थमहं वचः ॥५६॥ ततः कृताह्निक्रो भूत्वा प्रबोध्य प्रतिपास्यन्। कृतसन्ध्याविधिर्देवात् क्षिप्रं निद्रामगामहम् ॥५७॥ तत्क्षणं गरुडारूढो भगवान् भक्तवत्सलः। हरिः पद्मार्कितोरस्कः स्वप्ने मामेवमादिशत् ॥५८॥

सप्तम लम्बक ८५

सप्तम लम्बक ८५ यह सुनकर मन्त्री ने कहा- 'महाराज ! उस भिक्षु ने आपका कौन-सा उपकार किया उसे बताइए। राजा ने कहा- 'सुनो उसकी कथा मैं तुम्हें सुनाता हूँ-॥४५-४६॥ प्रपञ्चबुद्धि नामक भिक्षुक की कथा प्राचीन समय में पाटलिपुत्र (पटना) में प्रपंचबुद्धि नाम का भिक्षु (तपस्वी) प्रतिदिन दरबार में आकर मुझे एक बन्द डिब्बा देता था। एक वर्ष तक प्रतिदिन वह डिब्बा देता रहा और मैं उसे उसी प्रकार (बिना खोले ही) भाण्डागार के अधिकारी को दे देता था॥४७-४८॥ एक बार उस भिक्षु से दिया गया रत्न का डिब्बा दैवयोग से मेरे हाथ से गिरकर दो टुकड़े हो गया। उसके अन्दर से आग के समान जलता हुआ चमकीला रत्न निकला मानो उस डिब्बे ने पहले मेरे द्वारा न जाने हुए अपने हृदय का प्रदर्शन किया ॥४९-५०॥ उसे देखकर मैंने सभी पुराने डिब्बे मँगाये और उनके खोलने पर सबमें ऐसे चमकीले बहुमूल्य रत्न निकले ॥५१॥ तब मैंने प्रपंचबुद्धि से पूछा 'आश्चर्य है कि तुम ऐसे अमूल्यरत्नों से मेरी सेवा क्यों कर रहे हो? ॥५२॥ तब वहाँ से सब लोगों को हटाकर वह भिक्षु बोला-'इसी आनेवाली कृष्ण चतुर्दशी को मैं रात के समय एक विद्या की सिद्धि करूँगा। उसमें बाहरी सहायता के लिए तुम्हारे ऐसे वीर की आवश्यकता है। वीर की सहायता से विघ्न दूर होने पर सहज में ही सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं' भिक्षु के ऐसा कहने पर मैंने उसकी सहायता करना स्वीकार कर लिया ॥५३-५५॥ उसके प्रसन्न होकर चले जाने पर और कुछ दिनों के व्यतीत होने पर कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि आई। मैंने उस भिक्षु की बात का स्मरण किया ॥५६॥ तब प्रातःकाल उठकर अपना नित्यकर्म करके सायंकाल की प्रतीक्षा करने लगा। सायंकाल की सन्ध्या-विधि करके मैं रात्रि में जल्दी ही सो गया ॥५७॥ निद्रा आते ही स्वप्न में गरुड़ पर बैठे हुए लक्ष्मी को गोद में लिये भगवान् पद्म- नाभू ने आदेश दिया-॥५८॥

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सप्तम लम्बक ८७

सप्तम लम्बक ८७ वह प्रपंचबुद्धि नाम के अनुसार प्रपंचबुद्धि ही है। हे पुत्र ! वह मण्डल की पूजा में तुम्हें श्मशान में ले जाकर तुम्हारा बलिदान करेगा ॥५९॥ इसलिए, तुम्हें मारने के लिए जो कुछ कहे वह न करना। उससे कहना कि पहले तुम क्रिया करके हमको सिखाओ तो मैं करूँगा ॥६० ॥ जब वह तुम्हें सिखाने के लिए उस प्रकार करे, तब तुम उसकी युक्ति से रखी शस्त्र उसे मार देना। इस प्रकार वह जिस सिद्धि को चाहता है वह तुम्हें मिलेगी' ॥६१॥ विष्णु भगवान् के ऐसा कहकर अन्तर्धान होने पर मैंने उठकर सोचा—मैंने मायावी को भगवान् की कृपा से जाना और मुझ से वह मारा जायगा ॥६२॥ ऐसा सोचकर एक पहर रात बीतने पर नंगी तलवार लिये हुए मैं अकेला श्मशान पहुँचा ॥६३॥ वहाँ मण्डल की पूजा किये हुए उस भिक्षु को देखकर मैं उसके समीप गया। वह भी धूर्त मुझे देखकर प्रसन्नता प्रकट करते हुए बोला—॥६४॥ आँखें बन्द करके अंगों को फैलाकर नीचे मुँह किये हुए पृथ्वी पर प्रणाम करो। राजन् ! इस प्रकार हम दोनों को एक समान सिद्धि प्राप्त होगी' ॥६५॥ तब मैंने उससे कहा—'पहले तुम इस प्रकार प्रणाम करो। पहले मुझे करके दिखाओ तब मैं भी इसी प्रकार करूँगा' ॥६६॥ ऐसा सुनकर वह मूर्ख श्रमण उसी प्रकार करने लगा। मैंने तलवार से उसका सिर काट डाला ॥६७॥ इसके बाद ही आकाश से वाणी हुई 'राजन् ! बहुत अच्छा किया जो इस पापी भिक्षु का बलिदान कर डाला ॥६८॥ इसलिए मैं धनाधिप कुबेर, तुम्हारे धैर्य से प्रसन्न हूँ। इसलिए, मुझसे और जो कुछ चाहता है वह और वर माँग। ऐसा कहकर प्रत्यक्ष रूप से प्रकट होकर सामने आये कुबेर को प्रणाम करके मैंने कहा—'भगवन् ! आवश्यकता पड़ने पर मैं जब भी तुमसे प्रार्थना करूँ तब तुम स्मरण-मात्र से उपस्थित होकर मुझे वर प्रदान करना ॥६९—७१॥ ऐसा ही होगा' मुझ ऐसा कहकर कुबेर अन्तर्धान हो गया और मैं सिद्धि प्राप्त करके शीघ्र अपने भवन में आया ॥७२॥ यह मैंने तुम्हें अपना वृत्तान्त सुना दिया। अब उसी कुबेर देवता के वर से मदनमाला का प्रत्युपकार करता हूँ ॥७३॥

कथासरित्सागर

कथासरित्सागर

प्रविष्टा तत्र नाद्राक्षीत्प्रियं तं नृपतिं क्वचित्। अद्राक्षीत्तु महोच्छायान्¹ सौवर्णान्पञ्च पूरुषान् ॥८८॥ तान्दृष्ट्वा समनासाद्य दुःखिता सा व्यचिन्तयत्। नूनं विद्याधरः कोऽपि गन्धर्वो वा स मे प्रियः ॥८९॥ यः सविभज्य मामेभिः पुंभिरुत्पत्य स गतः। तदेतैर्भर्तृतुल्यैः किं सवियुक्ता करोम्यहम् ॥९०॥ इति सञ्चिन्त्य पृच्छन्ती निजं परिजनं मुहुः। तत्प्रवृत्तिं विनिर्गत्य तत्र बभ्राम सर्वतः ॥९१॥ न च लेभे रतिं क्वापि हर्म्योद्यानगृहादिषु। विलपन्ती वियोगार्त्ता शरीरत्यागसम्मुखी ॥९२॥ मा विषादं कृथा देवि कोऽपि कामचरो हि सः। देवो यदृच्छया भूयो भव्ये त्वामभ्युपैष्यति ॥९३॥ इत्यादिभिः प्रदत्तास्थैर्यवाक्यैः परिजनेन सा। आश्वासिता कथमपि प्रतिज्ञामकरोदिमाम् ॥९४॥ षण्मासमध्ये यदि मे न स दास्यति दर्शनम्। दत्तसर्वस्वया वह्नौ प्रवेष्टव्यं ततो मया ॥९५॥ इति प्रतिज्ञयात्मानं संस्तभ्यामृतपक्षं सा। मन्वहं ददती दानं ध्यायन्ती तं स्ववल्लभम् ॥९६॥ एकदा स्वर्णपुंसां च तेषामेकस्य सा भुजौ। छेदयित्वा द्विजातिभ्यो ददौ दानैकतत्परा ॥९७॥ द्वितीयेऽह्नि च साद्राक्षीत्तादृक्षावेव तस्य तौ। रात्रिमध्ये समुत्पन्नौ भुजौ सञ्जातविस्मया ॥९८॥ ततः क्रमेण सान्येषां भुजौ दानार्थमच्छिनत्। उत्पेदिरे च सर्वेषां पुनस्तेषां तथैव ते ॥९९॥ अथ तानक्षयान् दृष्ट्वा विप्रेभ्यो भेदसत्त्वया। अभ्यर्थिभ्यो ददौ छित्त्वा तद्भुजान् सा शुभान्वहम् ॥१००॥ दिनेष्वल्पैर्गतां दिक्षु श्रुत्वा तां ख्यातिमाययौ। तत्र संग्रामदत्ताख्यो विप्रः पाटलिपुत्रकात् ॥१०१॥


१ मह्युन्नतान्।

सप्तम लम्बक ९१

सप्तम लम्बक ९१ उसमें जाकर उसने कही भी राजा को नहीं देखा प्रत्युत वहाँ बड़े ऊँचे पाँच सोने के पुरुषों को देखा ॥८८॥ उन्हें देखकर और राजा को न देखकर वह (मदनमाला) सोचने लगी कि यह मेरा प्यारा अवश्य कोई विद्याधर है या गन्धर्व है ॥८९॥ जो मेरे हिस्से में ये पाँच सोने के पुरुष देकर आकाश में उड़ गया तो उससे वियुक्त होकर इन व्यर्थ भार-स्वरूप पुरुषों को क्या करूँगी ॥९०॥ ऐसा सोचकर पूजागृह से बाहर निकलकर अपने सेवकों से उसका समाचार बार-बार पूछती हुई मदनमाला पागलों की भाँति इधर-उधर घूमने लगी ॥९१॥ भवन उद्यान आदि कहीं भी उसे शान्ति न मिली। वह राजा के वियोग से पीड़ित होकर अपना शरीर-त्याग करने का प्रयत्न करने लगी ॥९२॥ 'हे देवि ! दुःख न करो। यह अकस्मात् आया हुआ देवता पुनः तुम्हारे पास आयेगा' ॥९३॥ इस प्रकार, आशा और आश्वासन देनेवाले परिजनों के वाक्यों से आश्वासित मदनमाला ने प्रतिज्ञा यह कर ली कि यदि वह मेरा प्यारा छह् महीनों के अन्दर दर्शन न देगा तो मैं अपना सर्वस्व-दान करके आग में जलकर मर जाऊँगी ॥९४-९५॥ ऐसी प्रतिज्ञा करके और अपने को किसी प्रकार रोककर प्रतिदिन दान देती और अपने प्रिय का ध्यान करती हुई वह किसी तरह जीवित रहने लगी ॥९६॥ एक बार परम दानी उसने सोने के पुरुषों में से एक के हाथों को कटवाकर ब्राह्मणों को दान दे दिया ॥९७॥ दूसरे दिन उसने देखा कि उसके हाथ उसी तरह रात भर में फिर से पैदा हो गये हैं। इससे उसे आश्चर्य हुआ ॥९८॥ इसी प्रकार, उसने क्रमशः सभी पुरुषों के हाथ कटवाकर दान कर दिये; किन्तु रात-भर में वे हाथ उसी प्रकार उग गये ॥९९॥ तदनन्तर, उसने उन पुरुषों को अक्षय देखकर ब्राह्मणों को बड़े की संख्या से दान करना प्रारम्भ किया। अर्थात् जो ब्राह्मण जितने लेने जानता था उतने हाथ उसे दान में देने लगी ॥१००॥ कुछ दिनों में उस के दान की प्रसिद्धि चारों ओर फैल गई। उसकी इस प्रसिद्धि को सुनकर गदाधरनामक ब्राह्मण पाटलिपुत्र से आया ॥१०१॥

तद्बुद्धिवर गच्छ त्वं तावत्पाटलिपुत्रकम्। वेषच्छन्नं समादाय राजपुत्रपरिच्छदम् ॥७४॥ अहं च कृत्वा प्रत्यक्षां प्रियायाः प्रत्युपक्रियाम्। पुनरागमनायेह तत्रैवैष्यामि सम्प्रति ॥७५॥ एवमुक्त्वा स सचिवं विक्रमादित्यभूपतिः। दिनकृत्यं स कृत्वा तं व्यसृजत्सपरिच्छदम् ॥७६॥ तथेति च गते तस्मिंस्तां निनाय निशां नृपः। भाविविश्लेषसोत्कण्ठं समं मदनमालया ॥७७॥ सापि दूरीभवन्तं तं शंसतश्चान्तरात्मना। आलिङ्गती मुहुः शोका नास्यां निद्रामगान्निशि ॥७८॥ ततः प्रातः स राजा तु विहितावश्यकक्रियः। नित्यमेवार्चनागारं विवेशैको ऽपरोच्छलात् ॥७९॥ तत्र वैश्रवणं देवं संस्मृतोपस्थितं च सः। वरं प्राक्प्रतिपन्नं तं प्रणम्यैनमयाचत ॥८०॥ प्रयच्छ देव तेनाद्य वरेणाङ्गीकृतेन मे। सौवर्णान्पुरुषान् महतः पुरुषांस्तानीहाक्षयान् ॥८१॥ येषामिष्टोपभोगाय च्छिद्यमानान्यनारतम्। तादृशान्येव जायन्ते तान्यङ्गानि पुनः पुनः ॥८२॥ एवं भवन्तु तद्रूपाः पुरुषास्ते यथेच्छसि। इत्युक्त्वा स धनाध्यक्षो जगामादर्शनं क्षणात् ॥८३॥ राजापि तत्क्षणं सोऽत्र देवागारे ददर्श तान्। स्थितानकस्मात्सौवर्णान्महतः पञ्च पूरुषान् ॥८४॥ ततः प्रविष्टो निरगात्स्वां प्रतिज्ञामविस्मरन्। द्वामुत्पत्य ययौ तावत्पुरं पाटलिपुत्रकम् ॥८५॥ तत्राभिनन्दितोऽमात्यैः पौरैरन्तःपुरैश्च सः। तस्थौ कार्याणि कुर्वाणः प्रतिष्ठानस्थया धिया ॥८६॥ तावच्चात्र प्रतिष्ठाने प्राविशत्तस्य सा प्रिया। चिरप्रविष्टं तं कान्तं वीक्षितुं देवसद्म तत् ॥८७॥

इसलिए, बुद्धिवर ! तुम श्रेष्ठ सो छिपे हुए राजपूतों की सेना लेकर पाटलिपुत्र जाओ। मैं अपनी प्यारी की तुरन्त प्रतिक्रिया (प्रत्युपकार) करके पुनः यहाँ आने के लिए वहीं आता हूँ ॥७४-७५॥ विक्रमादित्य ने मन्त्री को ऐसा कहकर और दिन भर के कार्य करके नौकरों और सिपाहियों के साथ मन्त्री को भेज दिया ॥७६॥ इस प्रकार मन्त्री के चले जाने पर, राजा ने भावी वियोग की उत्कण्ठा में वह रात मदनमाला के साथ व्यतीत की ॥७७॥ वह मदनमाला दूर होनेवाले राजा के वियोग की मानो सूचना देते हुए हृदय से संयुक्त होकर आलिंगन करती हुई उस रात में सोई नहीं ॥७८॥ प्रातःकाल राजा नित्य कृत्य करके जप करने के बहाने अकेला ही देवता के पूजा-घर में गया ॥७९॥ वहाँ उसने स्मरण करने से ही उपस्थित कुबेर देवता को बुलाकर और प्रणाम करके इस प्रकार प्रार्थना की—॥८० ॥ 'हे देव ! पहले स्वीकार किये हुए वर के अनुसार तुम मुझे मांस के ऐसे पाँच अगम पुरुष प्रदान करो जिन्हें प्रतिदिन बार-बार काटकर दान कर देने पर उनके कटे अंग पुनः पूर्ववत् हो जायें ॥८१-८२॥ 'ऐसा ही होगा जैसा पुरुष तुम चाहते हो तुम्हें मिलेगा तथा' कहकर कुबेर देवता अन्तर्धान हो गये ॥८३॥ राजा ने भी उसी समय उस देवमन्दिर में अकस्मात् रखे हुए सोने के पाँच पुरुष देखे। तब राजा भी अपनी प्रतिज्ञा का बिना बताये देवगृह से निकलकर और आकाश से उड़कर पाटलिपुत्र नगर को चला गया ॥८४-८५॥ वहाँ रानियों, मन्त्रियों एवं जनता के द्वारा अभिनन्दित किया गया राजा प्रतिज्ञानन्द की ओर बुद्धि लगाये हुए रहने लगा ॥८६॥ इधर शूरसेन में उसकी प्यारी प्रेयसी मदनमाला आसन्न वियोग देखकर राजा को त्याग देने के लिए उस देवगृह में गई ॥८७॥ १२

प्रविष्टा तत्र नाद्राक्षीत्प्रियं तं नृपतिं क्वचित् । अद्राक्षीत्तु महोच्छायान् सौवर्णान्युच्च पूरुषान् ॥८८॥ सान्दृष्ट्वा तमनासाद्य दुःखिता सा व्यचिन्तयत् । नूनं विद्याधरः कोऽपि गन्धर्वो वा स मे प्रियः ॥८९॥ यः संविभज्य मामेभिः पूमिरुत्पत्य खं गतः । तदेतैरतुलैः किं तद्वियुक्ता करोम्यहम् ॥९०। इति सञ्चिन्त्य पृच्छन्ती निजं परिजनं मुहुः । सत्तद्वृत्तिं विनिर्गत्य तत्र बभ्राम सर्वतः ॥९१॥ न च लेभे रतिं कापि हर्म्योद्यानगुहादिषु । विलपन्ती वियोगार्त्ता शरीरत्यागसम्मुखी ॥९२॥ मा विषादं कृथा देवि कोऽपि कामचरो हि सः । देवो यदृच्छया भूयो भव्यां त्वामभ्युपैष्यति ॥९३। इत्याविधिं प्रवृत्तारुशैवचनैः परिजनेन सा। आश्वासिता कथमपि प्रतिज्ञामकरोदिमाम् ॥९४॥ षण्मासमध्ये यदि मे न स दास्यति दर्शनम्। दत्तसर्वस्वा वह्नौ प्रवेष्टव्यं ततो मया ॥९५॥ इति प्रतिज्ञयात्मानं संस्थाप्याभूततश्च सा । अन्वहं ददती दानं ध्यायन्ती तं स्ववल्लभम् ॥९६॥ एकदा स्वर्णपुंसां च तेषामेकस्य सा भुजौ । छेदयित्वा द्विजातिभ्यो ददौ दानैकतत्परा ॥९७॥ द्वितीयेऽह्नि च साद्राक्षीत्साबुधावेव तस्य तौ । [L22: रात्रिमध्ये समुत्पन्नौ भुजौ सञ्जातविस्मया ॥९८॥ ततः क्रमज सान्येषां भुजौ दानार्थमच्छिनत् । उत्पदिरे च सर्वेषां पुनस्तेषां तथैव ते ॥९९॥ अथ तानक्षयान् दृष्ट्वा विप्रेभ्यो वेदसत्कृया । अभ्येतुभ्यो ददौ छित्वा तद्‌भुजान् सा शुभान्वहम् ॥१०० ॥ दिनेष्वल्पेष्वेवं गता दिक्षु श्रुत्वा तां ख्यातिमाययौ। तत्र संग्रामदत्ताख्या विप्रः पाटलिपुत्रकात् ॥१ १ १॥


१ प्रत्युक्तान् ।

सप्तम स्तम्बक ९१ उसमें जाकर उसने कहीं भी राजा को नहीं देखा प्रत्युत वहाँ वह ऊँच पाँच सोने के पुरुषों को देखा ॥ ८८॥ उन्हें देखकर और राजा को न देखकर वह (मदनमाला) सोचने लगी कि वह मेरा प्यारा अवश्य कोई विद्याधर है या गन्धर्व है ॥८९॥ जो मेरे हिस्से में ये पाँच सोने के पुरुष देकर आकाश में उड़ गया तो उससे वियुक्त होकर इन व्यर्थ भार-स्वरूप पुरुषों को क्या करूंगी ॥९ ० ॥ ऐसा सोचकर पूजागृह से बाहर निकलकर अपने सेवकों से उसका समाचार बार-बार पूछती हुई मदनमाला पागलों की भाँति इधर-उधर घूमने लगी ॥९१॥ भवन उद्यान आदि कहीं भी उसे शान्ति न मिली। वह राजा के वियोग से पीड़ित होकर अपना शरीर-त्याग करने का प्रयत्न करने लगी ॥९२॥ 'हे देवि ! दुःख न करो। वह अकस्मात् आया हुआ देवता पुनः तुम्हारे पास आयगा' ॥९३॥ इस प्रकार, आशा और आश्वासन देनेवाले परिजनों के वाक्यों से आश्वासित मदनमाला ने प्रतिज्ञा यह कर ली कि यदि वह मेरा प्यारा छह महीना के अन्दर दर्शन न देगा तो मैं अपना सर्वस्व-दान करके आग में जलकर मर जाऊँगी ॥९४-९५॥ ऐसी प्रतिज्ञा करके और अपने को किसी प्रकार रखकर प्रतिदिन दान देती और अपने प्रिय का ध्यान करती हुई वह किसी तरह जीवित रहने लगी ॥९६॥ एक बार परम दानी उसने सोने के पुरुषों में से एक के हाथों को कटवाकर ब्राह्मणों को दान दे दिया ॥९७॥ दूसरे दिन उसने देखा कि उसके हाथ उसी तरह रात-भर में फिर से पैदा हो गये हैं ! इससे उसे आश्चर्य हुआ ॥ ९८॥ इसी प्रकार, उसने क्रमशः सभी पुरुषों के हाथ कटवाकर दान कर दिये। किन्तु रात भर में वे हाथ उसी प्रकार उग गये ॥९९॥ तदनन्तर, उसने उन पुरुषों को अक्षय देखकर ब्राह्मणों को सोने की संख्या में दान करना प्रारम्भ किया। अर्थात् जो ब्राह्मण जितने वर मांगता था उतने हाथ उसे दान में दे दी गयीं ॥१ ०० ॥ पृथिवी पर उस के दान की प्रसिद्धि चारो ओर फैल गई। उसकी इस प्रसिद्धि को सुनकर 'शर्मदत्त' नामक ब्राह्मण पर्णनगर से आया ॥१० १॥

९२ कथासरित्सागर

९२ कथासरित्सागर

स दरिद्रश्चतुर्वेदो गुणैर्युक्तस्तदन्तिकम्। प्रतिग्रहार्थी प्राविक्षत्सदा द्वारस्थनिवेदितः ॥१०२॥ सा तस्मै वेदसंख्याकान् प्रदौ सौवर्णपुंगवान्। अर्चिताय व्रतक्षामैरङ्गैर्विरहपाण्डुरैः ॥१०३॥ ततः स विप्रो दुःखात्तच्छ्रुत्वा तत्परिवारितः। तद्वृत्तान्तं महाघोरप्रतिज्ञान्तमशपत् ॥१०४॥ हृष्टो विपणमारोप्य सौवर्णानुष्ट्रयोर्द्वयोः। गुञ्जानेतान्निवासं स्वं ययौ पाटलिपुत्रकम् ॥१०५॥ अराजरक्षिते क्षेमं नास्मिन् मे काञ्चने भवेत्। इति तत्र स सञ्चिन्त्य प्रविश्यास्थानवर्त्तिनम् ॥१०६॥ नृपतिं विक्रमादित्यं ब्राह्मणः स व्यजिज्ञपत्। इहैवास्मि महाराज वास्तव्यो नगरे द्विजः ॥१०७॥ सोऽहं दरिद्रो वित्तार्थी प्रयातो दक्षिणापथम्। प्राप्तः परं प्रतिष्ठां नरसिंहस्य भूपतेः ॥१०८॥ तत्र प्रतिग्रहार्थी सन् प्रख्यातयशसो गृहम्। अहं मदनमञ्च्या गणिकाया गतोऽभवम् ॥१०९॥ तस्याः सकाशे दिव्यो हि कोऽप्युषित्वा चिरं पुमान्। गतः क्वाप्यसंख्यान् दत्त्वा पुरुषान् पञ्च काञ्चनान् ॥११०॥ ततस्तद्विप्रयोगात्सा जीवितं विषवेदनाम्। देहं निष्फलमायासं माहारं घोरयातनाम् ॥१११॥ मन्यमाना गतधृतिः कथञ्चिदनुजीविभिः। आश्वास्यमाना व्यधित प्रतिज्ञां सा मनस्विनी ॥११२॥ यदि षण्मासमध्ये मां न स सम्भावयिष्यति। समयान्ते प्रवेष्टव्यं दीप्ताग्न्योपहतान्मया ॥११३॥ इति बद्धप्रतिज्ञा सा मरणाध्यवसायिनी। यदाप्यनुदिनं दानं सुमहत्सुकृतेषिणी ॥११४॥ सा च दृष्टा मया देव विशुद्धरूपसंस्थितिः। अनाहारकृशेनापि शरीरेणातिशोभिता ॥११५॥ दानतोयार्द्रितकरा मिलितालिकुलाकुला। दुःस्थिता कामवरिणो मदावस्थेव देहिनी ॥११६॥

सप्तम लम्बक ९१

सप्तम लम्बक ९१ वह दरिद्र और गुणी चतुर्वेदी ब्राह्मण दान लेने के लिए द्वारपालों से निवेदन किये जाने पर उसके समीप गया ॥१२॥ उस मदनमाला ने व्रत से कृश और विरह से पीले पड़ गये अंगोंस उस ब्राह्मण की विधिवत् पूजा करके सोने की चार भुजाएँ उसे प्रदान कीं ॥१३॥ उस ब्राह्मणने उसके दुःखी परिवार से उसकी कष्ट-कथा और अन्त में अग्नि-प्रवेश की प्रतिज्ञा सुनकर मन में खेद प्राप्त किया ॥१४॥ विप्र और साथ ही ब्राह्मण सोने की भुजाओं को दो ऊँटों पर लादकर अपने घर पाटलिपुत्र को चला गया ॥१५॥ घर पहुँचकर उसने सोचा कि यदि यह सोना राजा द्वारा रक्षित न किया गया तो मेरा कल्याण नहीं है—ऐसा सोचकर वह ब्राह्मण दरबार में बैठे हुए राजा विक्रमादित्य के पास गया और निवेदन करने लगा— महाराज ! मैं इसी नगर का रहनेवाला ब्राह्मण हूँ। मैं दरिद्र धन के लिए दक्षिण दिशा के महाराज नरसिंह के प्रतिष्ठान नगर में गया था। वहाँ दाताओ में प्रसिद्ध यशस्विनी मदनमाला के घर गया था। उसके पास एक दिव्य पुरुष कुछ दिनों तक रहकर और उस सोने के पाँच अवयव देकर कहीं चला गया। उसके वियोग से पीड़ित मदनमाला जीवन को विडम्बना, देह को निष्फल और आहार को विष रातको शयनकर जीवित है। उसने सबकों के आश्वासन देने पर यह प्रतिज्ञा की है कि यदि वह मेरा प्यारा पति छह महीने के अन्दर आकर मुझे नहीं सँभालेगा तो मैं अभागिन आग में प्रवेश करूँगी ॥१६-११३॥ इस प्रकार प्रतिज्ञाबद्ध मदनमाला मरण के लिए उद्यत होकर अत्यधिक पुण्य-लाभ की इच्छा से प्रतिदिन बहुत दान देती है। ॥११४॥ महाराज ! मैंने उसे देखा है। उसने वैधव्यव्रत लिया है किन्तु अनाहार से दुर्बल होने पर भी उसका शरीर अति मनोहर है। दान के जल से उसके हाथ सदा भीगे रहते हैं। प रूप सौन्दर्य उसके रूप अनुकूल रहता है। वह कामरूपी हाथी की शरीरव्यापिनी मनोरचना के समान प्रतीत होती है ॥११५-११६॥

९४ कथासरित्सागर

९४ कथासरित्सागर न यः निन्द्यश्च वन्द्यश्च स कामी यो जहाति ताम् । कान्तो येन बिना सा च तनुं त्यजति सुन्दरी ॥११७॥ तयात्र मह्यं नरवारः स्वर्णां पुरुषधाह्वयः । चतुर्वेदाय विधिवत् प्रदत्तो पदसंख्यया ॥११८॥ तत्सुसत्रगृहं कृत्वा स्वधर्ममिह सेवितुम् । इच्छाम तत्र भवता साहाय्यं मे विधीयताम् ॥११९॥ इति तस्य मुखाच्छ्रुत्वा प्रियावार्तां द्विजस्य सः । सद्योऽभूद्विक्रमादित्यस्तदाक्षिप्तमना नृपः ॥१२०॥ आदिश्य च प्रतीहारं द्विजस्यास्येष्टसिद्धये । विचिन्त्य दृढरागां च तां तृणीकृतजीविताम् ॥१२१॥ प्रतिज्ञासिद्धिसाहाय्ये सहसोत्कः स्वकामिनीम् । गणयित्वाल्पशेषं च तस्या देहक्षयावधिम् ॥१२२॥ सत्वरं मन्त्रिभिक्षिप्तराज्यो गत्वा विहायसा । प्रतिष्ठानं स नृपतिः प्रियावेश्म विवेश तत् ॥१२३॥ तत्र ज्योत्स्नाच्छवसनां विबुधापितवैभवाम् । कृशामपश्यत् कान्तां तां पर्वणीन्दुकलामिव ॥१२४॥ सापि नेत्रसुधासारमतर्कितमुपस्थितम् । दृष्ट्वा मदनमाला समुद्द्भ्रान्तेवाभवत् क्षणम् ॥१२५॥ आलिङ्गन्ती ततो भूयः पलायनभयादिव । कण्ठे भुजलतापाशमर्पयामास तस्य सा ॥१२६॥ किं मामनागसं त्यक्त्वा गतवानसि निष्कृप । इत्युवाच च तं बाष्पगद्गदाक्षरया गिरा ॥१२७॥ एहि वक्ष्यामि रहसीत्युक्त्वा साभ्यन्तरं रहः । तया सह ययौ राजा परिवाराभिनन्दितः ॥१२८॥ तत्रात्मानं प्रकाश्यास्यै स्ववृत्तान्तमवर्णयत् । नरसिंहनृपं युक्त्या जेतुमत्रागमद्यथा ॥१२९॥ यथा प्रपञ्चबुद्धिं च हत्वा खेचरतां ययौ । यथा नरं धनाध्यक्षात्प्राप्य सम्भज्यच ताम् ॥१३०॥ यथा च ब्राह्मणद्वारात् श्रुत्वा तत्रागतः पुनः । तत्सर्वमाप्रतिज्ञार्थानुक्त्वा भूयो जगाद ताम् ॥१३१॥

सप्तम लम्बक ९५

सप्तम लम्बक ९५ मेरी समझ से वह कामी निन्दनीय और प्रशंसनीय भी है। जिसने उसे छोड़ दिया है वह इतना कमनीय भी है कि वह उसके बिना प्राण देन जा रही है ॥११७॥ उसने चार वेद जाननेवाले मुझे वेदों की संख्यानुसार चार सोने के पुरुष के दान दिये ॥११८॥ उन्हें सत्रगृह बना करके स्वधर्म-सेवा में लगाना चाहता हूँ और चाहता हूँ कि आप उसके संरक्षक बनें ॥११९॥ उस ब्राह्मण के मुख से यह प्रियवार्ता सुनकर राजा विक्रमादित्य का मन मदनमाला ओर खिंच गया ॥१२ ॥ और, ब्राह्मण का कार्य करने के लिए प्रतीहार को आज्ञा देकर मदनमाला को दृढ़ प्रेमवाली और अपने लिए जीवन को तृण समान समझनेवाली जानकर अपनी प्रतिज्ञा पूर्ण करने में उत्कण्ठित राजा ने मदनमाला के जीवन को स्वल्प दिनों का समझकर शीघ्र ही मन्त्रियों पर राज्य-भार डालकर आकाश-मार्ग से राजा प्रतिष्ठान नगर को प्रस्थान किया और अपनी प्रेयसी के घर पहुँचा ॥१२१-१२३॥ वहाँ उसने चाँदनी से स्वच्छ वस्त्र पहने हुई अपने वैभव को ब्राह्मणों के लिए अर्पित की हुई दुर्बल मदनमाला को अमावस्या की चन्द्र-कला के समान देखा ॥१२४॥ वह मदनमाला भी आँखों के लिए अमृत-उत्सव के समान सहसा आए हुये राजा को देखकर क्षण-भर के लिए स्तब्ध एवं चकित-सी हो गई ॥१२५॥ तदनन्तर उसने उठकर राजा को मानों इसलिए बाहुपाश में बाँध लिया कि कहीं फिर भाग न जाय ॥१२६॥ और, 'हे क्रूर ! मुझ निरपराध ? को छोड़कर क्यों चले गये'—इस प्रकार आँसुओं से रुँधे कण्ठ से बोली-॥ १२७॥ 'आओ एकान्त में कहूँगा'—ऐसा कहकर राजा उसे घर के भीतर एकान्त में ले गया। राजा के आ जाने पर मदनमाला के परिवार (सेवक आदि ने) प्रसन्नता मनाई और राजा का अभिनन्दन किया ॥१२८॥ एकान्त में आकर राजा ने अपने को प्रकट करके उसे अपना वृत्तान्त सुनाया—जैसे कि वह राजा नरसिंह को जीतने के लिए पहले आया था ॥ १२९॥ और जैसे प्रपंचबुद्धि भिक्षु को मारकर आकाश में उड़ने की शक्ति प्राप्त की थी और जस कुबेर से वर प्राप्त करके उसे सोन के पुरुष प्रदान किये और जैसे ब्राह्मण द्वारा उसका समाचार सुनकर पुनः यहाँ आया—यह सारा वृत्तान्त राजा ने मदनमाला को विस्तार से सुना दिया ॥१३०-१३१॥

५६ कथासरित्सागर

५६ कथासरित्सागर तन्निमे नरसिंहोऽयमजेयोऽप्रतिमस्ती बलैः । द्वन्द्वयुद्धेन च मया साकमय नियुध्यसे ॥१३२॥ भूचर धुधरो भूत्वा न चैन कृतवानहम्। अधर्मयुद्धेन जय को हीच्छेत्क्षत्रियो भवन् ॥१३३॥ तन्मे प्रतिज्ञासाध्य यद्बन्धिभिर्द्वारवर्तिन । आश्वदन् नृपस्यास्य तत्र साहायक कुरु ॥१३४ एतच्छ्रुत्वैव धन्यास्मीत्युक्त्वा राज्ञामूना सह। समन्त्र्य गणिकाथ स्वानाहूयोवाच बन्दिनः ॥१३५॥ नरसिंहो यदा राजा गृहमेष्यति मे तदा। द्वारसन्निहितैर्भाव्य भवद्भिर्दत्तदृष्टिभिः ॥१३६॥ देव भक्तोऽनुरक्तश्च नरसिंहनृपस्त्वयि। इति वाच्य च युष्माभिस्तस्य प्रविशतो मुहुः ॥१३७॥ कः स्थितोऽत्रति यदि च प्रक्ष्यत्युत्प्रेक्ष्य तत्क्षणम्। स्थितोऽत्र विक्रमादित्य इति वक्तव्य एव सः ॥१३८॥ इत्युक्त्वा तान्विसृज्याथ प्रतीहारी जगाद सा। नरसिंहो न राजात्र निवेश्यः प्रविशन्निति ॥१३९॥ एव कृत्वा पुन प्राप्तप्राणनाथा यथासुखम्। तस्थौ मदनमाला सा नि सस्य वदती यस्तु ॥१४०॥ तत श्रुत्वातिदान तत्सौवर्णपुरुषोद्भवम्। नरसिंहनृपो हित्वाप्यागाद्द्रष्टु स तद्गृहम् ॥१४१॥ प्रतीहारानिषिद्धस्य तस्य प्रविशतोऽत्र च। भा बहिर्द्वारसिस्तारमूबू घर्मेऽपि बन्दिनः ॥१४२॥ नरसिंहो नृपो देव प्रणतो भक्तिमागिति। तच्च शृण्वन्स सामर्ष सशङ्कश्चामवन्नृपः ॥१४३॥ पृष्ट्वा च कः स्थितोऽत्रेति श्रुत्वा तत्र स्थित च तम्। राजानं विक्रमादित्य क्षणमेवमचिन्तयत् ॥१४४॥ तदिद प्राक्प्रतिज्ञात द्वारि मन्त्रिनिवेदनम्। निर्मूढममुना राज्ञा प्रसह्यान्त प्रविश्य मे ॥१४५॥ अहो राजायमोजस्वी येनाद्यैवमह जितः। न च बध्यो बलेनाद्यावेशकी मे गृहागतः ॥१४६॥

सप्तम लम्बक ९७

सप्तम लम्बक ९७ यह कहकर अपनी प्रतिज्ञा सुनाकर फिर बोला—'प्रिये ! यह राजा अत्यन्त बलवान् है अत' अजेय है। यह मेरे साथ द्वन्द्व-युद्ध कर सकता था क्योंकि मैं आकाशचारी होकर भूमि चारी को मारना नहीं चाहता था। कौन व्यक्ति क्षत्रिय होकर अधर्म-युद्ध से विजय प्राप्त करना चाहेगा ? ॥१३२—१३३॥ इसलिए, मेरी प्रतिज्ञा पूरी करने के लिए द्वार पर आये हुए नरसिंह के आगमन की सूचना दिलाने में मेरी सहायता करो ॥१३४॥ यह सुनकर वेश्या बोली—'मैं धन्य हूँ'। तदनन्तर राजा से आवश्यक परामर्श करके वेश्या ने अपने बन्दियों को बुलाकर कहा—'राजा नरसिंह जब मेरे घर पर आवेगा तब तुम लोग उसपर दृष्टि रखते हुए द्वार के पास ही रहना और उसके द्वार में प्रवेश करने के समय कहना— 'महाराज ! राजा नरसिंह आप पर भक्ति और अनुराग रखता है। यदि राजा नरसिंह उस समय यह कहे कि यहाँ कौन ठहरा है तो कहना कि यहाँ राजा विक्रमादित्य है। ऐसा कहकर और उन्हें विदाकर मदनमाला ने द्वारपालिका से कहा—'यहाँ अन्दर आते हुए राजा नरसिंह को रोकना नहीं' ॥१३५–१३९॥ ऐसा प्रबन्ध करके प्राणनाथ को पुनः प्राप्त की हुई मदनमाला भिक्षुओं को असंख्य धन देती हुई राजा के साथ सुख से रहने लगी ॥१४० ॥ तदनन्तर, सोने के पुष्पों द्वारा असंख्य दान करती हुई मदनमाला का समाचार सुनकर चकित राजा नरसिंह उस वेश्या के घर का परित्याग कर बने पर भी सोने के पुष्पों को देखने के लिए उसके यहाँ आया ॥१४१॥ द्वारपालों से न रोके हुए राजा नरसिंह के भीतर आते ही मदनमाला के बन्दीजन बाहरी द्वार से ही जोर से चिल्लाकर बोले—'महाराज राजा नरसिंह आपके प्रति भक्ति रखता है। और भक्त है। यह सुनकर राजा नरसिंह क्षण भर के लिए क्रोध और शंका से भर गया ॥१४२–१४३॥ उसने पूछा कि यहाँ कौन ठहरा है ? राजा विक्रमादित्य को यहाँ ठहरा हुआ जानकर राजा नरसिंह ने एक क्षण के लिए सोचा—॥१४४॥ राजा विक्रम ने पहले ही द्वार पर मेरी सूचना दिलाने की प्रतिज्ञा की थी उस प्रतिज्ञा को राजा ने हठात् मेरे घर में घुसकर ही पूरा किया ॥१४५॥ आश्चर्य है कि यह राजा बहुत तेजस्वी है जिसने आज ही मुझे जीत लिया और एकाकी एवं मेरे घर पर आया हुआ यह मेरे लिए मारण योग्य भी नहीं है ॥१४६॥ १३

कथासरित्सागर

८ कथासरित्सागर

तत्तावत् प्रविशामीति नरसिंहो विचिन्त्य सः। विवेशाभ्यन्तरं राजा बन्दिवृन्दनिवेदितः॥१४७॥ प्रविष्टं तं च दृष्ट्वैव सस्मितं सस्मिताननः। उत्थाय विक्रमादित्यः कण्ठे जग्राह भूपतिम्॥१४८॥ अथोपविष्टौ तौ द्वावप्यन्योन्यकुशलं नृपौ। तस्यां मदनमालायां पार्श्वस्थायामपृच्छताम्॥१४९॥ कथाक्रमाच्च पप्रच्छ विक्रमादित्यमत्र सः। नरसिंहः कुतोऽनेमे सुवर्णपुरुषा इति॥१५०॥ ततोऽथ विक्रमादित्यो निहतश्रमणाधमम्। साधिताकाशगमनं विस्रस्वरवरेण च॥१५१॥ सम्प्राप्ताक्षयसौवर्णमहापुरुषपञ्चकम्। कृत्स्नं कथितवानस्मै स्ववृत्तान्तं समद्भूतम्॥१५२॥ नरसिंहोऽथ मत्वा तं महाशक्तिं नमेश्वरम्। अपापबुद्धिं धृतवान् मित्रत्वाय नृपो नृपम्॥१५३॥ प्रतिपन्नसुहृत्त्वं च कृताचारविधिं तथा। राजधानीं निजां नीत्वा स्वोपचारैरुपञ्चरत्॥१५४॥ सम्मान्य प्रहितस्तेन राज्ञा च स नृपः पुनः। गृहं मदनमालाया विक्रमादित्य आययौ॥१५५॥ अथ स निजौजःप्रतिभासम्पादितदुस्तरप्रतिज्ञार्थः। गन्तुं चकार चेतो निजनगरे विक्रमादित्यः॥१५६॥ तेन समं सा जिगमिषुरसहा विरहस्य मदनमालापि। त्यक्ष्यन्ती तं वेशं शृङ्गारसवाकृतं वसतिं स्वाम्॥१५७॥ ततस्तया साकमनन्यचित्तया तदीयहस्त्यश्वबलात्यनुद्रुतः। स विक्रमादित्यनरेन्द्रचन्द्रमा निजं पुरं पाटलिपुत्रकं ययौ॥१५८॥ तत्र तेन सह बद्धसौहृदस्तस्थिवान् स नरसिंहभूपुतः। मन्वितो मदनमालया तया प्रेममुक्तनिजवेशया सुखम्॥१५९॥ इति देव भवत्युदारसत्त्वे दृढरक्तश्च विलासिनीजनोऽपि। अवरोधसमो महीपतीनां किमुतान्यः कुलजः पुरन्धि्रलोकः॥१६०॥ इत्थं निशम्य मरुभूतिमुखादुदारामेतां कथां स नरवाहनदत्तभूपः। विद्याधरोत्तमहृद्यप्रमदां च तस्यै रत्नप्रभां नववधूम्यैधित प्रमोदम्॥१६१॥ इति महाकविश्रीसोमदेवभट्टविरचिते कथासरित्सागरे रत्नप्रभालम्बके चतुर्थस्तरङ्गः।

सप्तम लम्बक ९९

सप्तम लम्बक ९९ 'अच्छा जो हो मैं अन्दर जाता हूँ। देखा जायगा'। इस प्रकार सोचता और बन्दियों ने सूचित किया जाता हुआ राजा अन्दर गया ॥१४७॥ उसके अन्दर आते ही मुस्कराते हुए राजा विक्रमादित्य ने उठकर उसे गले से लगा लिया ॥१४८॥ तदनन्तर मदनमाला के समीप ही बैठे हुए दोनों ने आपस में कुशल-मंगल पूछा ॥१४९॥ वार्तालाप के सिलसिले में राजा नरसिंह ने विक्रमादित्य से पूछा कि 'ये सोने के मनुष्य कैसे आये ? ॥१५०॥ तब उसी प्रसंग में राजा विक्रम ने प्रचंडबुद्धि भिक्षु का मारना धनपति कुबेर से आकाश- गति और आश्चर्यसुवर्ण के पाँच महापुरुषों की प्राप्ति की वह आश्चर्यभरी समस्त कथा कह सुनाई ॥१५१ १५२॥ विक्रम का वृत्तान्त सुनकर उसे आकाशचारी एवं महाशक्तिशाली जानकर नरसिंह ने मित्रता के लिए प्रस्ताव किया और मित्रता प्राप्त की ॥१५३॥ इस प्रकार, मित्रता प्राप्त करने पर राजा नरसिंह ने विक्रम को अपनी राजसभा में ले जाकर राजोचित स्वागत-सत्कार से सम्मानित किया और उसके द्वारा सम्मानित राजा विक्रम फिर से मदनमाला के घर पर आ गया ॥१५४ १५५॥ इस प्रकार, अपने बल और प्रतिभा प्रकर्ष से अपनी असाधारण प्रतिज्ञा को पूरी करके राजा विक्रमादित्य ने अपने नगर पाटलिपुत्र में जाने का विचार किया ॥१५६॥ राजा के वियोग को सहन न करती हुई मदनमाला भी अपने देश का त्याग कर और अपनी सम्पत्ति ब्राह्मणों को दान करके राजा के साथ पाटलिपुत्र जाने को उद्यत हुई ॥१५७॥ तब राजाओं में चन्द्रमा के समान वह राजा विक्रमादित्य अनन्य चित्तवाली प्राणप्रिया मदनमाला को उसके हाथी घोड़े और मंत्रियों के साथ अपने पाटलिपुत्र नगर में ले आया ॥१५८॥ राजा नरसिंह के दृढ़ स्नेहयुक्त सौहार्द से सन्तुष्ट राजा विक्रम प्रेम के कारण स्वदेश को छोड़कर आई हुई मदनमाला के साथ सुखपूर्वक रहने लगा ॥१५९॥ हे महाराज (नरवाहनदत्त) इस प्रकार वेश्याएँ भी उदारचरित और वैसी ही सदाचारिणी होती हैं—जैसी महानिशिखा। अन्य कुलीन स्त्रियों की तो बात ही क्या ॥१६०॥ इसप्रकार मरुभूति के मुख से उदार कथा को सुनकर राजा नरवाहनदत्त की उनकी उत्तम विद्याधर-कुल के अनुरूप तत्त्वभू रत्नप्रभा ने अत्यधिक आनन्द प्राप्त किया ॥१६१॥ महाकवि श्रीसोमदेवभट्ट-विरचित कथासरित्सागर के रत्नप्रभालम्बक का चौथा तरंग समाप्त

१ कथासरित्सागर

१ कथासरित्सागर पञ्चमस्तरङ्गः राजपुत्रशृङ्गभुजस्य रूपशिखायाश्च कथा एवं कथितवत्यत्र मरुभूतौ चमूपतिः । नरवाहनदत्तस्य पुरो हरिशिखोऽब्रवीत् ॥१॥ सत्यमेव न सुस्त्रीणां भर्तुरन्यत्परायणम् । तथा च श्रूयतामेषाप्यत्र चित्रतरा कथा ॥२॥ वर्धमानपुरं नाम यदस्ति नगरं भुवि । तत्र वीरभुजाख्योऽभूद्राजा धर्मभृतां वरः ॥३॥ अन्तःपुरशते तस्य विद्यमानेऽप्यभूत्प्रभोः । एका गुणवरा नाम राज्ञी प्राणाधिकप्रिया ॥४॥ पत्नीशतस्य मध्य च न तावद् दैवयोगतः । एकस्यामपि कस्याञ्चित्सुतस्तस्योदपद्यत ॥५॥ तेन वैद्यं स पप्रच्छ श्रुतवर्धनसञ्ज्ञकम् । कश्चिदस्त्यौषधं तादृग्येन स्यात्पुत्रसम्भवः ॥६॥ तच्छ्रुत्वा सोऽब्रवीद्वैद्यो देवेनैतत्प्रसाध्यमहम् । वन्यच्छागस्य किन्तु देवेनानाय्यतां गलः ॥७॥ इत्याकर्ण्य भिषग्वाक्यं प्रतीहारं स भूपतिः । आदिश्यानाययामास तस्य च्छागवरं वनात् ॥८॥ तं छागं राजसूनुघ्नं समर्प्य स भिषक्ततः । तन्मांसे साधयामास राज्ञ्यर्थे रसमोत्तमम् ॥९॥ आदिश्यैकत्र राज्ञीनां प्रेष्य देवमर्चितुम् । गते राज्ञि मिलन्ति स्म देव्य एकत्र यत्र ताः ॥१०॥ एका तु मिलिता नासीद्राज्ञो गुणवरात्र सा । राज्ञो देवार्चनरतस्य तत्कालं निकटे स्थिता ॥११॥ मिलिताभ्यश्च ताभ्यस्तत्पानार्थं चूर्णमिश्रितम् । अविभज्यैव रसकं निधाय स ददौ भिषक् ॥१२॥ कृताप्लवार्चनः सोऽथ राजागत्य प्रियायुतः । वीथ्याद्येवोपयुक्तं तद्दृष्ट्वा वैद्यं समभ्यधात् ॥१३॥ अहो न पायितं किञ्चित्त्वया गुणवराकृते । यत्प्रधानोऽयमारम्भस्तन्मेव तव विस्मृतम् ॥१४॥