भारतकोश
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कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariBrajpublished228 पृष्ठ

१६३ उत्तरकाण्ड खेती न किसानको, भिखारीको न भीख, बलि, बनिकको बनिज, न चाकरको चाकरी । जीविका विहीन लोग सीद्यमान सोच बस, कहैं एक एकन सों 'कहाँ जाई, का करी ?' वेदहूँ पुरान कही, लोकहूँ बिलोकिअत, साँकरे सबै पै, राम ! रावरें कृपा करी । दारिद-दसानन दबाई दुनी, दीनबंधु ! दुरित-दहन देखि तुलसी हहा करी ॥९७॥ ( तुलसीदासजी कहते हैं ) हे राम ! मैं आपकी बलि जाता हूँ, ( वर्तमान समयमें ) किसानोंकी खेती नहीं होती, भिखारीको भीख नहीं मिलती, बनियोंका व्यापार नहीं चलता और नौकरी करनेवालोंको नौकरी नहीं मिलती । ( इस प्रकार ) जीविकामे हीन होनेके कारण सब लोग दुखी और शोकके वश होकर एक दूसरेसे कहते हैं कि 'कहाँ जायँ और क्या करें ? ( कुछ सूझ नहीं पड़ता ।)' वेद और पुराण भी कहते हैं तथा लोकमें भी देखा जाता है कि सङ्कटमें तो आपहीने सबपर कृपा की है । हे दीनबन्धु ! दारिद्र्य- रूपी रावणने दुनियाको दबा लिया है, और पापरूपी ज्वालाको देखकर तुलसीदास हा हा करता है [ अर्थात् अत्यन्त कातर होकर आपसे सहायताके लिये प्रार्थना करता है ] । कुल-करतूति-भूति-कीरति-सुरूप-गुन जौबन जरत जुर, परै न कल कहीं । राजकाजु कुपथु, कुसाजु भोग रोग ही के, बेद-बुध बिद्या पाइ बिबस बलकहीं ॥

कवितावली १६४ गति तुलसीसकी लखै न कोउ, जो करत पब्बतें छार, छारै पब्बय पलक हीं । कासों कीजै रोषु, दोषु दीजै काहि, पाहि, राम! कियो कलिकाल कुलि खललु खलक हीं ॥९८॥ सब लोग कुल, करनी, ऐश्वर्य, यश, सुन्दर रूप, गुण और यौवनके ज्वरमें जल रहे हैं ( अर्थात् नष्ट हो रहे हैं ); कहीं भी कल नहीं मिलता । इस रोगके लिये राजकार्य कुपथ्य है और नाना प्रकारके भोग इस रोगको बढ़ानेवाली दूषित सामग्री है । और वेदके जाननेवाले विद्या पाकर विवश हो प्रलाप करने लगते हैं । [ तात्पर्य यह कि कुल इत्यादिके अभिमानसे तो जलते ही थे, अब राजकार्य- रूपी कुपथ्य और भोगरूपी कुसमाज तथा वेद, बुद्धि और विद्या पाकर उन्मत्त हो गये हैं, अतएव कुछ सूझता नहीं । इसी कारण ] तुलसीदासके स्वामी ( श्रीरामचन्द्र ) की गतिको कोई नहीं जानता, जो पलमात्रमें पर्वतको खाक और खाकको पर्वत कर देते हैं । ( ऐसी स्थिति देखकर ) किसपर क्रोध किया जाय और किसको दोष दिया जाय । कलिकालने सारे संसारमें उपद्रव मचा दिया है; हे राम ! रक्षा कीजिये । बबुर-बहेरेको बनाइ बागु लाइयत, रूँधिबेको सोई सुरतरु काटियतु है । गारी देत नीच हरिचंदहू दधीचिहू को, आपने चना चबाइ हाथ चाटियतु है ॥ आपु महापातकी, हँसत हरि-हरहू को, आपु है अभागी, भूरिभागी डाटियतु है ।

१४५ उत्तरकाण्ड कलिको कलुष मन मलिन किए महत, मसककी पाँसुरीं पयोधि पाटियतु है ॥९९॥ (कलिके वशीभूत होकर लोग ऐसे हो गये हैं कि) बबूर और बहेड़ेका बाग लगाकर उसकी बाड़ बनानेके लिये कल्पवृक्ष- को काटकर लाते हैं और ऐसे नीच हो गये हैं कि हरिश्चन्द्र और दधीचिको भी गाली देते हैं [जिन्होंने परोपकारार्थ शरीरतक दान कर दिया था] और अपने चने चबाकर भी हाथ चाटते हैं [कि कहीं कुछ लगा तो नहीं है, अर्थात् परम दरिद्री हैं]; अपने तो महापातकी हैं, परन्तु विष्णुभगवान् और शिवजीतकको हँसते हैं; स्वयं भाग्यहीन हैं परन्तु बड़े-बड़े भाग्यवानोंको डाँट देते हैं। कलिके पापोंने सबके मनोंको अत्यन्त मलिन कर दिया है परन्तु [ऐसी अवस्था में भी ये लोक-परलोक सुधारना चाहते हैं।] मानो मच्छरकी पसलियोंसे (अपार) समुद्रको पाटना चाहते हैं। सुनिए कराल कलिकाल भूमिपाल ! तुम्ह जाहि घालो चाहिए, कहौं धौं, राखै ताहि को। हौं तौ दीन दूबरो, बिगारो-ढारो रावरो न, मैंहू तैंहू ताहिको, सकल जगु जाहिको ॥ कामु, कोहु लाइ कै देखाइयत आँखि मोहि, एते मान अकसु कीबेको आपु आहि को। साहेब सुजान, जिन्ह स्वानहू को पच्छु कियो, रामबोला नामु, हौं गुलामु रामसाहिको ॥१००॥ हे कराल कलिकाल महाराज ! सुनो, जिसको तुम नष्ट

कवितावली १६६ करना चाहो उसकी रक्षा, भला, कौन कर सकता है। मैं तो दीन- दुर्बल हूँ, और आपका कुछ भी बिगाड़ा-गिराया नहीं। मैं भी और तुम भी उसी (ईश्वर) के हैं जिसका यह सारा संसार है। तुम जो काम-क्रोधको मेरे पीछे लगाकर मुझे आँखें दिखलाते हो सो तुम इतना विरोध करनेवाले कौन हो ? मेरे स्वामी (श्रीरामचन्द्रजी) बड़े विज्ञ हैं अर्थात् वे सब जानते हैं; उन्होंने श्वानका भी पक्ष किया था* । मैं तो रामशाहका गुलाम हूँ और रामबोला मेरा नाम है। [फिर वे मेरा पक्ष क्यों न करेंगे ?] साँची कहौ, कलिकाल कराल ! मैं ढारो-बिगारो तिहारो कहा है। कामको, कोहको, लोभको, मोहको मोहिसों आनि प्रपंचु रहा है ॥ हौ जगनायकु लायक आजु, पै मेरिऔ टेव कुटेव महा है। जानकीनाथ बिना 'तुलसी' जग दूसरेसों करिहौं न हहा है १०१ हे कराल कलिकाल ! सच कहो, मैंने तुम्हारा क्या ढाला या बिगाड़ा है ? क्या यह काम, क्रोध, लोभ और मोहका जाल रच मुझीपर फैलाना था । तुम आज जगत्‌के स्वामी और बड़े

  • एक दिन श्रीरामजीके राजदरबारमें एक कुत्ता आया और रोता हुआ कहने लगा—'महाराज ! तीर्थसिद्धि नामक ब्राह्मणने बिना ही अपराध लाठीसे मेरा सिर फोड़ दिया, आप मेरा न्याय कर दीजिये ।' भगवान्‌ने ब्राह्मणको बुलाया और उससे पूछा कि 'तुमने निरपराध कुत्तेके सिरमें क्यों लाठी मारी ?' ब्राह्मणने कहा कि 'मैं भीख माँगता फिरता था, इसे मैंने रास्तेसे हटाया; जब यह न हटा, तब मैंने लकड़ी मार दी ।' ब्राह्मणको अदण्डनीय समझकर भगवान् विचार करने लगे । इतनेमें कुत्तेने कहा कि 'भगवन् ! आप इसे कालंजरका महंत बना दीजिये । मैं भी पूर्वजन्ममें एक महंत था। भक्ष्याभक्ष्य खानेसे मुझे कुत्ता होना पड़ा; महंती बहुत बुरी है।' कुत्तेके कहनेपर भगवान्‌ने उसे कालंजरका महंत बना दिया ।

१६७ उत्तरकाण्ड सामर्थ्यवान् हो । परन्तु हे देव ! मेरी भी यह बहुत बुरी आदत है कि जानकीनाथ (श्रीराम) के बिना किसी दूसरेके सामने हाहा नहीं खाता, यानी अपनी रक्षाके लिये प्रार्थना नहीं करता । भागीरथीजलु पान करौं, अरु नाम द्वै रामके लेत नितै हौं। मोको न लेनो, न देनो कछू, कलि! भूलि न रावरी ओर चितैहौं। जानि कै जोरु करौ, परिनाम तुम्हें पछितैहौं, पै मैं न भितैहौं । ब्राह्मन ज्यों उगिल्यो उरगारि, हौं त्यों हीं तिहारें हिएँ न हितैहौं १०२ मैं गङ्गाजल पीता हूँ और नित्य रामके दो नाम लेता हूँ। हे कलिकाल ! मुझे तुमसे कुछ भी लेना-देना (सरोकार) नहीं है और मैं भूलकर भी तुम्हारी ओर नहीं देखूँगा । यदि तुम जान बूझकर मेरे साथ जोर (अत्याचार) करोगे तो परिणाममें तुम्हीं पछताओगे, मैं नहीं डरूँगा । जिस तरह गरुड़ने ब्राह्मणको नहीं पचनेके कारण उगल दिया वैसे मैं भी तुम्हारे पेटमें नहीं पचूँगा* । राजमरालके बालक पेलि कै पालत-लालत खूसरको । सुचि सुंदर सालि सकेलि, सोवारि कै, बीजु बटोरत ऊसरको ॥ गुन-ग्यान-गुमानु, अँधेरि बड़ी, कल्पद्रुमु काटत मूसरको । कलिकाल बिचारु अचारु हरो, नहि सूझै कछू धमधूसरको १०३ लोग राजहंसके बच्चेको ठेलकर उल्लूके बच्चेका लालन- पालन करते हैं; सुन्दर और पवित्र धानको बटोर और जलाकर ऊसर भूमिके लिये बीज बटोरते हैं । गुण और ज्ञानका बड़ा

  • गरुड़जी एक समय धोखेसे एक ब्राह्मणको निगल गये । इससे उनके पेटमें जलन पैदा हुई । अन्तमें उन्हें उसे अपने पेटमेंसे निकाल देना पड़ा ।

कवितावली १६५ अभिमान और सतर्कता है; ( इसलिये ) मूसर बनानेके लिये कल्पवृक्ष काटने हैं । कलिकालने विचार और आचारको हर लिया है, इसीसे बुद्धिहीनोंको कुछ नहीं सूझता । कीबे कहा, पढ़िबेको कहा फलु, बूझि न वेदको भेदु विचारैं । स्वारथको, परमारथको कलि कामद रामको नामु बिसारैं ॥ वाद-विवाद विषादु बढ़ाइकें, छाती पराई औ आपनी जारैं । चारिहुको, छहूको, नवको, दस-आठको पाठु कुकाठु ज्यों फारैं १०४ क्या कर्तव्य है और पढ़नेका क्या फल है—यह समझकर वेदके भेदको नहीं विचारते; [ वेदका सार-तत्त्व और ] कलियुग- में स्वार्थ एवं परमार्थके एकमात्र कल्पवृक्ष रामनामको बिसार दिया; ( ज्ञानाभिमानवश व्यर्थके ) वाद-विवादसे विषादको बढ़ाकर अपनी और दूसरोंकी छाती जलाते हैं और चारों वेद, छहों शास्त्र, नवों व्याकरण* और अठारहों पुराणोंको पढ़कर कुकाठको चीरनेके समान व्यर्थ गवाँ देते हैं [ भाव यह है कि उनका इन सब शास्त्रोंको पढ़ना वैसा ही निष्फल होता है जैसा कुकाठ- को चीरना ] । आगम, वेद, पुरान बखानत मारग कोटिन, जाहिं न जाने । जे मुनि ते पुनि आपुहि आपुको ईसु कहावत सिद्ध सयाने ॥ धर्म सबै कलिकाल ग्रसे, जप, जोग, विरागु लै जीव पराने । को करि सोचु मरै 'तुलसी', हम जानकी नाथके हाथ बिकाने १०५

  • नौ व्याकरण निम्नलिखित आचार्योंके चलाये हुए और उन्हींके नामसे प्रसिद्ध हैं—इन्द्र, चन्द्रमा, काशकृत्स्न, शाकटायन, आपिशलि, पाणिनि, अमर, जैनेन्द्र, सरस्वती ।

१६९ उत्तरकाण्ड वेद, शास्त्र और पुराण करोड़ों मार्गोंका वर्णन करते हैं, परन्तु वे समझमें नहीं आते और जो मुनिलोग हैं वे अपने आपको ही ईश्वर, सिद्ध और चतुर कहलावाने हैं। जितने धर्म थे उन सबको कलियुग लील गया है तथा जप, योग और वैराग्यादि अपनी-अपनी जान लेकर भाग गये हैं। गोसाईंजी कहते हैं कि इनका सोच करके कौन मरे ? हम तो जानकीनाथ श्रीरामचन्द्रके हाथ बिक गये हैं। धूत कहौ, अवधूत कहौ, रजपूत कहौ, जोलहा कहौ कोऊ। काहूकी बेटी सों, बेटा न ब्याहब, काहूकी जाति बिगार न सोऊ॥ तुलसी सरनाम गुलामु है रामको, जाको रुचै सो कहै कछु ओऊ ॥ माँगि कै खैबो, मसीतको सोइबो, लैबेको एकु न दैवे को दोऊ १०६ चाहे कोई धूर्त कहे, अथवा परमहंस कहे, राजपूत कहे या जुलाहा कहे, मुझे किसीकी बेटीसे तो बेटेका ब्याह करना नहीं है; न मैं किसीसे सम्पर्क रखकर उसकी जाति ही बिगाडूंगा। तुलसीदास तो श्रीरामचन्द्रका प्रसिद्ध गुलाम है, जिसको जो रुचे सो कहो। मुझको तो माँगके खाना और मसजिद (देवालय) में सोना है; न किसीसे एक लेना है, न दो देना है। मेरो जाति-पाँति न चहौं काहूकी जाति-पाँति, मेरो कोऊ कामको न हौं काहूके कामको। लोकु परलोकु रघुनाथही के हाथ सब, भारी है भरोसो तुलसीकें एक नामको ॥ अति ही अयाने उपखानो नहिं बूझैं लोग, 'साह ही को गोतु गोतु होत है गुलामको।'

कवितावली १७० साधु कै असाधु, कै भलो कै पोच, सोचु कहा, का काहूके द्वार परों, जो हौं सो हौं रामको ॥१०७॥ मेरी कोई जाति-पाँति नहीं है और न मैं किसीकी जाति-पाँति चाहता हूँ। कोई मेरे कामका नहीं है और न मैं किसीके कामका हूँ। मेरा लोक-परलोक सब श्रीरामचन्द्रके हाथ है। तुलसीको तो एकमात्र रामनामका ही बहुत बड़ा भरोसा है। लोग अत्यन्त गँवार हैं—कहावत भी नहीं समझते कि जो गोत्र स्वामीका होता है वही सेवकका होता है। साधु हूँ अथवा असाधु, भला हूँ अथवा बुरा, इसकी मुझे कोई परवा नहीं है। मैं जैसा कुछ भी हूँ, श्रीरामचन्द्रका हूँ। क्या मैं किसीके दरवाजेपर पड़ा हूँ ? कोऊ कहै, करत कुसाज, दगाबाज बड़ो, कोऊ कहै, रामको गुलामु खरो खूब है। साधु जानै महासाधु, खल जानै महाखल, बानी झूठी-साँची कोटि उठत हबूब है॥ चहत न काहूसों न कहत काहूकी कछु, सबकी सहत, उर अंतर न ऊब है। तुलसीको भलो पोच हाथ रघुनाथ ही के, रामकी भगति-भूमि मेरी मति दूब है ॥१०८॥ कोई कहता है कि (यह तुलसी) कुसाज अर्थात् छल, कपट आदि करता है, कोई कहता है कि यह बड़ा दगाबाज है और कोई कहता है कि यह श्रीरामचन्द्रका खूब सच्चा सेवक है। साधु मुझे परम साधु जानते हैं और दुष्ट महादुष्ट समझते हैं। झूठी-सच्ची करोड़ों प्रकारकी बातोंकी लहरें उठा करती हैं। मैं तो किसीसे कुछ चाहता

१७४ उत्तरकाण्ड नहीं, न किसीके विषयमें कुछ कहता हूँ; सबकी सहता हूँ, चित्तमें कोई घबराहट नहीं है। तुलसीका बुरा-भला तो रघुनाथजीके ही हाथ है; मेरी बुद्धि रामभक्तिरूप भूमिमें दूबके समान है, अर्थात् मेरी बुद्धिका परम आश्रय रामभक्ति ही है। जागैं जोगी-जंगम, जती-जमाती ध्यान धरैं, डरैं उर भारी लोभ, मोह, कोह, कामके। जागैं राजा राजकाज, सेवक-समाज, साज, सोचैं सुनि समाचार बड़े वैरी बामके॥ जागैं बुध विद्या हित पंडित चकित चित, जागैं लोभी लालच धरनि, धन, धामके। जागैं भोगी भोग हीं, वियोगी, रोगी सोगबस, सोवैं सुख तुलसी भरोसे एक रामके ॥१०९॥ योगी, जंगम (परिव्राजक अथवा लिंगायत साधु), संन्यासी और मण्डली बनाकर रहनेवाले साधु इसलिये जागते हैं कि (एक ओर तो वे परमेश्वरका) ध्यान करते हैं और (दूसरी ओर) उनके मनमें काम, क्रोध, मोह, लोभका बड़ा भारी डर बना रहता है। राजालोग राजकाज, सेवकमण्डल तथा अनेकों प्रकारकी सामग्रीके पीछे जागते रहते हैं और बड़े-बड़े प्रतिकूल शत्रुओंके समाचारको सुनकर सोचग्रस्त रहते हैं। बुद्धिमान् पण्डितलोग विद्याके लिये; लोभी पुरुष पृथ्वी, धन और घरके लोभमें जागते हैं; भोगी लोग भोगके लिये और वियोगी और रोगी लोग [विरह

कवितावली १७२ एवं रोगके सन्तापके कारण जागते हैं । किन्तु तुलसीदास तो एक रामजीके भरोसे सुखपूर्वक सोता है । रामु मातु, पितु, बंधु, सुजनु, गुरु, पूज्य, परमहित । साहेबु, सखा, सहाय, नेह-नाते पुनीत चित ॥ देसु, कोसु, कुलु, कर्म, धर्म, धनु, धामु, धरनि, गति । जाति-पाँति सब भाँति लागि रामहि हमारि पति ॥ परमारथु, स्वारथ, सुजसु, सुलभ रामतें सकल फल । कह तुलसिदासु, अब, जब-कबहूँ एक रामतें मोर भल ॥११०॥ हमारे माता, पिता, बन्धु, आत्मीय, गुरु, पूज्य और परम हितकारी राम ही हैं । राम ही हमारे स्वामी, सखा और सहायक हैं तथा पवित्र चित्तसे जितने प्रेमके सम्बन्ध हैं, सब राम ही हैं । हमारे देश, कोश, कुल, धर्म-कर्म, धन, धाम और गति भी राम ही हैं । हमारे जाति-पाँति भी राम ही हैं और हमारी प्रतिष्ठा भी सब प्रकार श्रीरामहीके पीछे हैं । परमार्थ, स्वार्थ, सुयश, सब प्रकारके फल हमें रामहीसे सुलभ हैं । गोसाईंजी कहते हैं कि अभी या जब कभी हो, मेरा भला तो एक रामहीसे होगा । रामगुणगान महाराज, बलि जाउँ, राम ! सेवक-सुखदायक । महाराज, बलि जाउँ, राम ! सुंदर, सब लायक ॥ महाराज, बलि जाउँ, राम ! सब संकट मोचन । महाराज, बलि जाउँ, राम ! राजीवविलोचन ॥

१७३ उत्तरकाण्ड बलि जाउँ, राम ! करुनायनन, प्रनतपाल, पातकहरन । बलि जाउँ, राम! कलि-भय-विकल तुलसिदासु राखिअ सरन १११ हे महाराज ! हे सेवकसुखदायक राम ! मैं आपकी बलि जाता हूँ । हे महाराज ! हे सुन्दर और सर्वसमर्थ राम ! मैं आपकी बलि जाता हूँ । हे महाराज ! हे राम ! आप सब संकटोंसे छुड़ाने- वाले हैं । मैं आपकी बलि जाता हूँ । हे कमलनयन महाराज राम ! मैं आपपर बलिहारी हूँ । आप करुणाके धाम, शरणागत- रक्षक और पापोंको दूर करनेवाले हैं । हे राम ! मैं आपकी बलि जाता हूँ, कलिकालके भयसे व्याकुल तुलसीदासको आप अपनी शरणमें रखिये । जय ताड़का-सुबाहु-मथन मारीच-मानहर ! मुनिमख-रच्छन-दच्छ, सिलातारन, करुनाकर ! नृपगन-बल-मद सहित संभु-कोदंड-विहंडन ! जय कुठारघरदर्पदलन दिनकरकुलमंडन ॥ जय जनकनगर-आनंदप्रद, सुखसागर, सुषमाभवन ! कह तुलसिदासु, सुरमुकुटमनि, जय जय जय जानकिरवन !११२ ताड़का और सुबाहुका नाश करनेवाले, मारीचके मदको तोड़नेवाले, विश्वामित्र मुनिके यज्ञकी रक्षामें दक्ष, शिलारूप अहल्या- को तारनेवाले, करुणाकी खानि, राजाओंके मदसहित शिवजीके धनुषको तोड़नेवाले ! आपकी जय हो । कुठारधर परशुरामके अभिमानको चूर्ण करनेवाले, सूर्यकुलभूषण भगवान् राम ! आपकी जय हो । जनकपुरीको आनन्द देनेवाले, परम सुखसागर, शोभाधाम श्रीरामचन्द्रजी ! आपकी जय हो । तुलसीदासजी कहते हैं कि

कवितावली १७४ देवताओंके मुकुटमणि, जानकीरमण श्रीरामचन्द्रजीकी जय हो ! जय हो !! जय हो !!! जय जयंत-जयकर, अनंत, सज्जनजनरंजन ! जय विराध-वध विदुष, विबुध-मुनिगन-भय-भंजन ! जय निसिचरी-विरूप-करन रघुवंसविभूषन ! सुभट चतुर्दस-सहस दलन त्रिसिरा-खर-दूषन ॥ जय दंडकवन-पावन-करन, तुलसिदास-संसय-समन ! जगविदित, जगतमनि, जयति जय जय जय जय जानकिरमन !॥ जयन्तको जीतनेवाले, अन्तरहित और साधुजनोंको आनन्द देनेवाले रामजी ! आपकी जय हो । विराधके वधमें कुशल तथा देवता और मुनिगणोंका भय दूर करनेवाले प्रभु राम ! आपकी जय हो । राक्षसी ( शूर्पणखा ) को रूपरहित करनेवाले, रघुकुलके भूषण ! आपकी जय हो । चौदह सहस्र वीरों और खर, दूषण, त्रिशिराका नाश करनेवाले ! आपकी जय हो । दण्डकवनको पवित्र करनेवाले तथा तुलसीदासके संशयका नाश करनेवाले ! आपकी जय हो । संसारमें प्रख्यात तथा जगत्‌के प्रकाशक जानकीरमण भगवान् राम ! आपकी जय हो ! जय हो !! जय हो !!! जय मायामृगमथन, गीध-सबरी-उद्धारन ! जय कबंधसूदन बिसाल तरु ताल बिदारन ! दवन बालि बलसालि, थपन सुग्रीव, संतहित ! कपि कराल भट भालु कटक पालन, कृपालचित !

१७५ उत्तरकाण्ड जय सिय-वियोग-दुख हेतु कृत-सेतुबंध-वारिधिदमन ! दसर्मीस विभीषन अभयप्रद, जय जय जय जानकिरमन! ॥११४॥ मायामृगरूप मारीचको मारनेवाले तथा जटायु और शबरीका उद्धार करनेवाले भगवान् राम ! आपकी जय हो । कबन्धको मारनेवाले और बड़े-बड़े ताड़के वृक्षोंको विदीर्ण करनेवाले प्रभु राम ! आपकी जय हो ! बलसम्पन्न बालिका नाश करनेवाले, सुग्रीवको राज्य देनेवाले तथा संतोंका हित करनेवाले ! आपकी जय हो । भयानक भालु और वानर वर्गोंके कटकका पालन करनेवाले दयार्द्रचित्त रघुनाथजी ! आपकी जय हो । जानकीजीके वियोगजनित दुःखके कारण समुद्रका दमन करके उसपर सेतु बाँधनेवाले रामजी ! आपकी जय हो । तथा रावणसे विभीषणको अभय देनेवाले हे जानकीरमण ! आपकी जय हो ! जय हो !! जय हो !! रामप्रेमकी प्रधानता कनकभूधरु केदारु, बीजु सुंदर सुरमनि बर । सींचि कामधुक धेनु सुधामय पय विसुद्धतर ॥ तीरथपति अंकुरसरूप जच्छेस रच्छ तेहि । मरकतमय साखा-सुपत्र, मंजरिय लच्छि जेहि ॥ कैवल्य सकल फल, कलपतरु सुभ सुभाव सब सुख वरिस । कह तुलसिदास, रघुबंसमनि ! तौ कि होइ तुअ कर सरिस॥११५॥ सुमेरु पर्वत थाल्हा हो, सुन्दर चिन्तामणि बीज हो, कामधेनुके अमृतमय अत्यन्त शुद्ध दुग्धसे उसे सींचा जाय, उससे तीर्थराज प्रयाग अंकुररूपसे प्रकट हो, उसकी रक्षा स्वयं कुबेरजी

कवितावली १७६ करें, उसकी मरकतमणिमय शाखा और पत्ते हों और मञ्जरी साक्षात् लक्ष्मीजी हों तथा सब प्रकारकी मुक्तियाँ ही जिसके फल हों, ऐसा वह कल्पतरु स्वभावसे ही सब प्रकारके मङ्गल और सुखोंकी वर्षा करता हो, तो भी, तुलसीदासजी कहते हैं—हे रघुवंशमणि ! वह कल्पवृक्ष क्या कभी आपके हाथोंके बराबर हो सकता है ? अर्थात् नहीं हो सकता। जाय सो सुभटु समर्थ पाइ रन रारि न मंडै । जाय सो जती कहाय विषय-वासना न छंडै ॥ जाय धनिकु बिनु दान, जाय निर्धन बिनु धर्महि । जाय सो पंडित पढ़ि पुरान जो रत न सुकर्महिं ॥ सुत जाय मातु-पितु-भक्ति बिनु, तिय सो जाय जेहि पति न हित। सब जाय दासु तुलसी कहै, जौं न रामपद नेहु नित॥११६॥ वह समर्थ वीर व्यर्थ है जो संग्राम ( का अवसर ) पाकर भी युद्ध नहीं करता । जो यति ( संन्यासी अथवा विरक्त ) कहला- कर विषयकी वासनाको न छोड़े वह विरक्त भी व्यर्थ है । दानशून्य धनी और धर्माचरणशून्य निर्धन भी व्यर्थ है । जो पण्डित पुराण पढ़कर सुकर्ममें रत नहीं है वह भी नष्ट है । जो पुत्र माता-पिताकी भक्तिरहित है वह भी नष्ट है और जिसे पति प्यारा नहीं है वह स्त्री भी व्यर्थ है । तुलसीदासजी कहते हैं—यदि श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंमें नित्य नवीन प्रेम न हो तो सभी कुछ व्यर्थ है । को न क्रोध निरदह्यो, काम बस केहि नहि कीन्हो ? को न लोभ दृढ़ फंद बाँधि त्रासन करि दीन्हो ?

१७७ उत्तरकाण्ड कौन हृदयँ नहि लाग कठिन अति नारि-नयन-सर ? लोचनजुत नहि अंध भयो श्री पाइ कौन नर ? सुर-नाग-लोक महिमंडलहुँ को जु मोह कीन्हो जय न ? कह तुलसिदासु सो ऊबरै, जेहि राख रामु राजिवनयन ॥११७॥ क्रोधने किसको नहीं जलाया ? कामने किसको वशीभूत नहीं किया ? लोभने किसको दृढ़ फाँसीमें बाँधकर त्रस्त नहीं किया ? किसके हृदयमें स्त्रियोंके नेत्ररूपी कठिन बाण नहीं लगे ? और कौन मनुष्य धन पाकर आँखोंके रहते हुए भी अंधा नहीं हुआ ? सुरलोक, पृथ्वीमण्डल ( नरलोक ) तथा नागलोक अर्थात् पाताललोकमें ऐसा कौन है जिसको मोहने न जीता हो । गोसाईं तुलसीदासजी कहते हैं कि इनसे तो वही बच सकता है जिसकी रक्षा कमलनयन श्रीरामजी करते हैं । भौंह-कमान सँधान सुठान जे नारि-बिलोकनि-बानतें बँचे । कोप-कृसानु गुमानु-अवाँ घट ज्यों जिनके मन आव न आँचे ॥ लोभ सबै नटके बस ह्वै कपि-ज्यों जगमें बहु नाच न नाचे । नीके हैं साधु सबै तुलसी, पै तेई रघुवीरके सेवक साँचे ॥ जो लोग भ्रुकुटिरूप कमानपर अच्छी प्रकार चढ़ाये हुए कामिनीकटाक्षरूप बाणसे बचे हुए हैं, अभिमानरूप अवाँमें क्रोधरूप अग्निकी ज्वालासे जिनके मन घड़ेकी भाँति नहीं तपे हों तथा जो लोभरूप नटके अधीन होकर संसारमें बंदरकी तरह अनेक नाच नहीं नाचे-तुलसीदासजी कहते हैं-वे ही भगवान् श्रीरामके सच्चे दास हैं । यों तो सभी साधु अच्छे हैं । क० १२-

कवितावली १७८ वेष सुबनाइ सुचि वचन कहैं चुबाइ जाइ तौ न जरनि धरनि-धन-धामकी । कोटिक उपाय करि लालि पालिअत देह, मुख कहिअत गति रामहीके नामकी ॥ प्रगटैं उपासना, दुरावैं दुरवासनाहि, मानस निवासभूमि लोभ-मोह-कामकी । राग-रोष-ईरिषा-कपट-कुटिलाई भरे तुलसी-से भगत भगति चहैं रामकी ॥११९॥ जो लोग उत्तम (साधुका-सा) वेष बनाकर पवित्र एवं अमृत चूते हुए वचन बोलते हैं, किन्तु जिनके हृदयसे पृथ्वी, धन और घरकी आग (तृष्णा) दूर नहीं होती; जो करोड़ों उपाय करके शरीरका लालन-पालन करते हैं, किन्तु मुखसे कहते हैं कि हमें तो केवल रामनामका ही भरोसा है; जो अपनी उपासनाको तो प्रकट करते हैं; किन्तु अपनी बुरी वासनाओंको छिपाते हैं तथा जिनके चित्त लोभ, मोह और कामके निवास- स्थान बने हुए हैं, तुलसीदास कहते हैं—वे आसक्ति, क्रोध, ईर्ष्या, कपट और कुटिलतासे भरे हुए मेरे-जैसे भक्त भी रामकी भक्ति चाहते हैं ! [अर्थात् जो पुरुष ऐसे कुटिल आचरण करते हुए भी भगवान्‌को रिझानेकी आशा रखते हैं, वे बड़े ही हास्यास्पद हैं ।] कालिहीं तरुन तन, कालिहीं धरनि-धन, कालिहीं जितौंगो रन, कहत कुचालि है । कालिहीं साधौंगो काज, कालिहीं राजा-समाज,

मसक हूँ कहै, 'भार मेरे मेरु हालिहैं' ॥ तुलसी यही कुभाँति घने घर घालि आई, घने घर घालति हैं, घने घर घालिहैं। देखत-सुनत-समुझतहू न सूझै सोई, कबहुँ कह्यो न कालहू को कालु कालि हैं ॥१२०॥ कुचाली लोग कहते हैं—मुझे कल ही तरुण शरीर प्राप्त हो जायगा, कल ही भूमि और धन प्राप्त हो जायेंगे और कल ही मैं युद्धमें विजय प्राप्त कर लूँगा, कल ही मैं अपने सारे कार्य सिद्ध कर लूँगा और कल ही मैं राज-समाज जोड़ दूँगा। मच्छरके समान होकर भी वे कहते हैं, मेरे बोझसे मेरु पर्वत भी हिल जायगा। तुलसीदासजी कहते हैं—इस कुप्रवृत्तिके कारण बहुत-से घर नष्ट हो गये हैं, इस समय भी नष्ट होते हैं तथा आगे भी होंगे। परन्तु यह सब देख, सुन और समझकर भी वह कुप्रवृत्ति लोगोंको दीख नहीं पड़ती और न किसीने कभी यह कहा कि काल (आयु) का भी काल (अन्त) कल ही है।

रामभक्तिकी याचना भयो न त्रिकाल तिहुँ लोक तुलसी-सो मंद निंदैं सब साधु, सुनि मानौं न सकोचु हौं। जानत न जोगु, हियँ हानि मानैं जानकीसु, काहे को परेखो, पापी प्रपंची पोचु हौं॥ पेट भरिबेके काज महाराज-को कहायौ महाराजहूँ कह्यो है प्रनत-बिमोचु हौं।

कवितावली १८० निज अघजाल, कलिकालकी करालता बिलोकि होत व्याकुल, करत सोई सोचु हौं ॥१२१॥ भूत, भविष्यत् और वर्तमान, तीनों कालोंमें त्रिलोकीमें तुलसीदासके समान नीच कोई नहीं हुआ। सभी साधुजन इसकी निन्दा करते हैं, परन्तु मैं सुनकर भी संकोच नहीं मानता। जानकीनाथ भगवान् राम भी इसे योग्य नहीं समझते, इसीसे मुझे अपनानेमें उन्हें अपने चित्तमें हानि जान पड़ती है। मुझे इस बात- की शिकायत भी क्यों होनी चाहिये; क्योंकि वास्तवमें ही मैं बड़ा पापी, पाखण्डी और नीच हूँ। मैं पेट भरनेके लिये ही महाराजका कहलाया और महाराजने भी कहा है कि मैं अपने शरणागतका उद्धार कर देता हूँ। किन्तु अपनी पापराशि और कलिकालकी कुटिलता देखकर मैं व्याकुल हो जाता हूँ और उसी (अपने उद्धारके ही) विषयमें चिन्ता करने लगता हूँ। धर्मकें सेतु जगमंगलके हेतु भूमि- भारु हरिवेको अवतारु लिये नरको। नीति औ प्रतीति-प्रीतिपाल चालि प्रभु, मानु लोक-वेद राखिवेको पनु रघुबरको ॥ बानर-बिभीषनकी ओर के कनावड़े हैं, सो प्रसंगु सुनैं अंगु जरै अनुचरको। राखे रीति आपनी जो होइ सोई कीजै, बलि, तुलसी तिहारो घर जायऊ है घरको ॥१२२॥

१८१ उत्तरकाण्ड धर्मके सेतु भगवान् संसारका कल्याण करनेके लिये और पृथ्वीका भार उतारनेके लिये ही मनुष्यके रूपमें अवतीर्ण हुए; नीति, प्रतीति और प्रीतिका पालन करना प्रभुका स्वभाव ही है तथा लोक और वेदकी मर्यादा रखना यह भी श्रीरघुवीरका प्रण है । आप सुग्रीव और विभीषणके ऋणी हैं, यह बात सुनकर दासका अङ्ग-अङ्ग जलता है [कि मुझपर ऐसी कृपा क्यों नहीं करते ?] । अतः मैं आपकी बलिहारी जाता हूँ, अपने प्रणकी रक्षा करके आपसे जो बने वही कीजिये । यह तुलसीदास तो आपके घरका घर-जाया (पुस्तैनी) सेवक है। नाम महाराजके निबाह नीको कीजै उर सबही सोहात, मैं न लोगनि सोहात हौं । कीजै राम ! बार यहि मेरी ओर चष-कोर, ताहि लागि रंक ज्यों सनेहको ललात हौं ॥ तुलसी बिलोकि कलिकालकी करालता कृपालको सुभाउ समुझत सकुचात हौं । लोक एक भाँतिको, त्रिलोकनाथ लोकवस आपनो न सोचु, स्वामी-सोचहीं सुखात हौं ॥१२३॥ महाराजके नामके साथ अच्छी प्रकार निर्वाह करनेवाला (अर्थात् राम-नाम जपनेवाला) मनसे सबको अच्छा लगता है, परन्तु मैं लोगोंको अच्छा नहीं लगता । अतः हे राम ! इस बार आप मेरी ओर कृपादृष्टि कीजिये, आपके कृपाकटाक्षके लिये मैं लालयित हूँ। जिस प्रकार दरिद्र स्नेहके लिये अथवा स्नेहयुक्त पदार्थों (पकवानों) के लिये लालयित रहता है । तुलसीदासजी कहते हैं—मैं कलिकालकी करालता और कृपालु प्रभुके स्वभावको

कवितावली १८२

समझकर सकुचाता हूँ। इस समय सारा संसार एक-सा हो रहा है [सभी मेरी निन्दा करनेवाले हैं] और आप त्रिलोकीनाथ होकर भी लोकके अधीन हैं। किन्तु मुझे अपनी चिन्ता नहीं है, मैं तो प्रभुके सोचने हीं सूखा जाता हूँ [कि कहीं लोग यह न कहने लगें कि रामजी भी कलियुगमें अपना स्वभाव छोड़कर करुणारहित हो गये]।

प्रभुकी महत्ता और दयालुता

तौलौं लोभ लोलुप ललात लालची लवार, बार-बार लालचु धरनि-धन-धामको। तवलौं वियोग-रोग-सोग, भोग जातनाको जुग सम लागत जीवनु जाम-जामको॥ तौलौं दुख-दारिद दहत अति नित तनु तुलसी हैं किंकरु बिमोह-कोह-कामको। सब दुख आपने, निरापने सकल सुख, जौलौं जनु भयो न बजाइ राजा रामको ॥१२४॥

जबतक तुलसीदास राजा रामका खुल्लमखुल्ला दास नहीं हो जाता तभीतक वह लोभके कारण लोलुप, लालची और वाचाल बना हुआ टुकड़े-टुकड़ेके लिये लालायित रहता है; और पृथ्वी, धन एवं गृह आदिके लिये बार-बार ललचाता रहता है, तभीतक उसे वियोग और रोगका शोक रहता है, तभीतक उसे यातना भोगनी पड़ती है और तभीतक उसे पल-पलका जीवन युगके समान जान पड़ता है; तभीतक उसका शरीर दुःख और दरिद्रताके कारण सर्वदा अत्यन्त जलता रहता है और तभीतक वह मोह, क्रोध और कामका