काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary
महाकवि दण्डी द्वारा
२४ काव्यादर्श [३।१०-११ नीयते च पुनस्तृप्तिं वसुधा वसुधारया ॥ १० ॥ ८. करोति सहकारस्य कलिकोत्कलिकोत्तरम् । मन्मनो मन्मनोऽप्येष मत्तकोकिलनिस्वनः ॥ ११ ॥ फिर धनकी धारसे तृप्त की जाती है ॥ १० ॥ ८. आमकी बोर मेरे मनको प्रबल उत्कण्ठासे युक्त कर रही है । मत्त कोकिलकी यह अव्यक्त मधुर सुरतालापरूपी कूक भी (मेरे मनको अत्यधिक उत्कण्ठायुक्त कर रही है) ॥ ११ ॥ युद्धवीर और वसुधोपलक्षित प्रजाकी वसुधारासे तृप्तिके वर्णनसे दानवीर स्वरूपकी व्यञ्जना की गई है । कर्ता 'नृप' और एक कर्मकारक 'वसुधा' का भिन्न क्रियाओं 'जीयते' और 'नीयते' से सम्बन्ध होनेसे यहाँ द्रव्य (कारक) दीपक है । तालव्य और दन्त्य वर्णोंकी आवृत्तिसे श्रुत्यनुप्रास माधुर्यकारक है । प्रथम और चतुर्थ पादोंके आदिमें एकेक वर्णसमुदायकी सुकर तथा निर- न्तर आवृत्तिसे अव्यपेत द्विपादद्वयमक है । यह यमक मुख्य भाव द्विविध उत्साहकी अभिव्यक्तिमें कथमपि बाधा नहीं डालता । अतः यह यमक मधुर (रसाविरोधी) है ॥ १० ॥ ८. (१. ख. ४) द्वितीय-तृतीय-पादादि द्विपाद अव्यपेत सुकर यमक-- ग्यारहवें श्लोकमें आम्रमञ्जरी और कोयलकी कूक उद्दीपन विभाव तथा अत्यधिक उत्कण्ठासे युक्त करना अनुभावसे विप्रलम्भरति व्यक्त की गई है । कोकिलकी कूकपर सुरतालापके आरोपसे रूपक भी इसके अत्यधिक अनुकूल है । कण्ठ्य और दन्त्य वर्णोंकी आवृत्तिसे जन्य श्रुत्यनुप्रास माधुर्यका सर्जक है । द्वितीय पादमें कलिकोत् वर्णसमुदायकी तथा तृतीय पादमें मन्मनो वर्ण- समुदायकी निरन्तर सुकर आवृत्तिसे जनित यमक इस माधुर्यको और पुष्ट कर रहा है । इस प्रकार यहाँ यमक विप्रलम्भको उद्दीप्त ही कर रहा है । उसकी शोभाको कम नहीं कर रहा । अतः यमक अङ्ग है और विप्रलम्भरति अङ्गी । तृतीय पादमें आवृत्त 'मन्मनः' को रत्नश्रीज्ञानने 'मत् + मनस्' ही समझा है । वादी जङ्घालदेवने 'अत्यन्त मधुर' अर्थ किया है, १ तो तरुण वाचस्पतिने मथ् + √ मन् से निष्पादित करके 'पीडाकर' अर्थमें पर्यवसित किया है । शब्द- १. रत्नश्री : मत्तस्य कोकिलस्य निस्वनः = शब्दोऽप्येष मधुरो 'मन्मन उत्कलिकोत्तरं करोति' इति प्रकृतम् । वादीटीका : मन्मनोऽत्यन्तमधुरो मधुरतरोऽप्येष मत्तकोकिलनिस्वनः ।
३।१२] १. १ अन्यपेत पादादि ख. द्विपद यमक २५ ६. कथं त्वदुपलम्भाशाविहताविह तादृशी । अवस्था नालमारोढुमङ्गनामङ्गनाशिनी ॥ १२ ॥ ६. तुम्हारी प्राप्तिकी आशाके इस विघातके होनेपर वैसी, अङ्गोंको नष्ट करने वाली (मरण) अवस्था सुन्दर अङ्गों वालीको कैसे न प्राप्त होवे ? ॥ १२ ॥ कल्पद्रुममें उद्धृत त्रिकाण्डशेष कोषके अनुसार 'मन्मन' (अकारान्त पुंल्लिङ्ग) 'गद्गदध्वनि' अर्थ में है । कृष्णमाचार्यने 'यह 'मुणमुण' आदिके समान अनु- करणात्मक शब्द भी हो सकता है', कहा है । रङ्गराजरेड्डी द्वारा उद्धृत विश्व- कोषमें इसे 'रतिभाषित' अर्थमें बताया है । चिन्तामणि (शब्दकल्पद्रुममें उद्धृत) ने भी इसे प्रेमियुगलके सुरतालापका वाचक बताया है ।१ अन्तिम अर्थ अवसरानुकूल तथा प्रमाणपुष्ट होनेसे उचित है । यह शब्द भौवादिक √मण शब्दे (१३।५२) से निष्पन्न है । 'मणित' इसीका पर्याय है ॥ ११ ॥ ६. (१. ख. ५) द्वितीय-चतुर्थ-पादादि द्विपद अव्यपेत सुकर यमक— विरहिणी नायिकाकी सहेली नायकके आगमनके प्रति हताश नायिकाकी कष्टयुक्त अवस्था नायकको बता रही है । इस प्रकार कष्टावस्था अनुभावके प्रतिपादनसे विप्रलम्भ रतिकी व्यञ्जना यहाँ हुई है । इसके लिये अत्यन्त कोमल एवं मधुर रचनाकी अपेक्षा है । दन्त्य वर्णोंकी आवृत्तिसे यहाँ श्रुत्यनु- प्रास इसे उत्पन्न कर रहा है । द्वितीय और चतुर्थ पादोंमें भी कोमल वर्ण- समुदायकी निरन्तर सुकर (अयत्नसाध्य) आवृत्तिसे यमक उस माधुर्यकी सृष्टि करके विप्रलम्भ रतिका उपकारी है । स्वरोंका आरोहावरोह भी मुख्य भावके अनुकूल है । 'इह'को रत्नश्रीज्ञानने 'विहतौ'का विशेषण माना है । वादी जी ने अध्या- हार्य 'अवसरे'का तथा तरुणवाचस्पतिने अपनी तरुणाईके अनुकूल 'वसन्ते'का उपस्थापक माना है । हमें रत्नश्रीज्ञान उचित प्रतीत होते हैं : मेरी सखी तुम्हें पानेकी बड़ी आशा लगाये बैठी है । तुम यदि यों उसकी आस तोड़ोगे, तो यह आशाविघात निश्चय ही उसे तोड़ डालेगा । उसकी हालत पहलेसे ही ऐसी-वैसी है । वह अब धीरे-धीरे मौतकी ओर बढ़ जायेगी । 'अङ्गनाशिनी १. सुरते कर्णमूले तु निजदेशीयभाषया । दम्पत्योः कथनं यत्तु मन्मनं तं विदुर्बुधाः ॥ २. वैयाकरणसिद्धान्तकौमुदी, भ्वादिगण, भवतोषिणी, पृष्ठ ४०१-४०२ ।
२६ काव्यादर्श [३।१३-१४ १०. निगृह्य नेत्रे कर्षन्ति बालपल्लवशोभिना । तरुणा तरुणाकृष्टानलिनो नलिनोन्मुखाः ॥ १३ ॥ (१. १ अव्यपेत पादादि ग. त्रिपाद यमक) ११. विशदा विशदामत्तसारसे सारसे जले । १०. कोंपलोंसे सुशोभित वृक्षके द्वारा आकृष्ट युवाओंको कमलोंपर मँड- राते हुये भ्रमर दोनों आँखें जकड़कर खींच लेते हैं ॥ १३ ॥ ११. अवगाहन करते हुए, खूब मत्त सारसी-सारसों वाले सरोवरके जल अवस्था' प्रेमकी दशवीं अवस्था है ।¹ बाकी नौ दशाएँ तो हो चुकी हैं । दसवीं की कसर है । अतः समय रहते चेत जाओ ! कोमलाङ्गी अबलाके वधका महापाप अपने सिर मत लो ! रत्नश्रीज्ञान और वादीजी द्वारा दिया 'तादृशीम्' पाठभेद 'अङ्गनाम्'का विशेषण है, जो अङ्गनाकी प्रेमपरवशताको व्यक्त करता है ॥ १२ । १०. (१. ख. ६.) तृतीय-चतुर्थपादादि अव्यपेत सुकर द्विपादयमक— तेरहवें श्लोकमें कवि आचार्य दण्डीने रति भावके उद्दीपन विभाव वसन्तमें वृक्षोंके पल्लवित होने तथा कमलोंपर मँडराते भौरोंके द्वारा तरुणोंको आकृष्ट किये जानेका वर्णन किया है । यहाँ बालपल्लवशोभी तरुसे तरुणीका नवयौवन के अङ्कुरोंसे सुशोभित देह व्यक्त होता है तथा नलिनोन्मुख भ्रमरोंसे नलिन (कमल) के सदृश मुखपर स्थित चञ्चल कजरारे नयन अभीष्ट हैं : पहले तरुणीका छरहरा खिलता हुआ शरीर तरुणोंका आकर्षण करता है, फिर उनको जकड़कर खींच लेते हैं मुखकमलपर मँडराते नयनभ्रमर । इस प्रकार यहाँ वस्तुसे रूपक ध्वनित है । श्लोकके पूर्वार्धमें कण्ठ्य और दन्त्य वर्णोंकी आवृत्तिसे श्रुत्यनुप्रास है । उत्तरार्धके दोनों पादोंके आदिमें एकेक वर्णसमुदाय निरन्तर रूपसे आवृत्त है । अर्थावबोधमें क्षणांशकी भी बाधा न होनेसे यह यमक सुकर है ॥ १३ ॥ (१.ग) त्रिपादादि अव्यपेत सुकर यमक—आचार्यने अगले चार (१४- १७) श्लोकोंमें तीन पादोंके आदिमें निरन्तर (अव्यपेत) सुकर यमकके चार उदाहरण प्रस्तुत किये हैं । १. एवंविधैः कामलिङ्गैरप्राप्तसुरतोत्सवा । दशावस्थागतं कामं नानाभावं प्रदर्शयेत् ॥ नाट्य० २२।१६०-१६१ सर्वैः कृतैः प्रतीकारैर्यदि नास्ति समागमः । कामाग्निना प्रदीप्ताया जायते मरणं ततः ॥ १६२
३।१४-१५] १. १ अव्यपेत पादादि ग. त्रिपाद यमक २७
कुरुते कुरुतेनेयं हंसी मामन्तकामिषम् ॥ १४ ॥ १२. विषमं विषमन्वेति मदनं मदनन्दनः । सहेन्दुकलयाऽपोढमलया मलयानिलः¹ ॥ १५ ॥ में यह शुक्लवर्णा हंसी अपनी दुखदायी आवाजसे मुझे मौतका निवाला बना रही है ॥ १४ ॥ १२. मुझे आनन्दरहित (अर्थात् दुःखी) करने वाला मलयमारुत निर्मल चन्द्रकलाके साथ विषम (तीक्ष्ण, दुःसह) विषस्वरूप मदनका अनुचर हो रहा है ॥ १५ ॥ ११(१. ग. १) प्रथम-द्वितीय-तृतीयपादादि त्रिपाद्यमक—आचार्य कवि दण्डीने १४वें श्लोकमें रति भावके उद्दीपन विभावका ही वर्णन पिछले श्लोकके समान सरोवरमें अपने प्रियतमके वियोगमें दुःखी हंसीके करुणरवसे प्रियाकी याद आ जानेके कारण बेचैन प्रेमीके वर्णनके द्वारा किया है । सरोवरके जलमें मस्त सारस तो विहार कर रहे हैं, पर हंसी बेचारी अकेली बैठी रो रही है । उसका यह दुःखपूर्ण होनेसे कुरव वर्ण्य उत्तमपुरुषाभिधेय पुरुषको मृत्युका ग्रास बना रहा है । अर्थात् 'अन्य स्त्रीपुरुष जब चहुँ ओर आनन्दविहार कर रहे हैं, तब उसकी प्रिया उसके वियोगमें इस हंसीके समान रो रही होगी', यह सोचकर उस पुरुषके प्राण मुँहको आ रहे हैं। यहाँ इस आर्थ शोभाके साथ तदनुकूल शब्द शोभा भी दन्त्य वर्णों और ओष्ठ्य मकार की आवृत्तिसे जन्य अनुप्राससे उत्पन्न हो रही है। तब अयत्नसाध्य अतएव सुकर त्रिपादादि अव्यपेत यमक इस माधुर्यको और भी पुष्ट कर रहा है। विशन्तः प्रविशन्तो गाहमानाः, आ समन्ततः = पूर्णतया, मत्ता यौवनेन प्रेम्णा च क्षीबाः, सारस्यश्च सारसाश्चेति सारसा यस्मिन्, तस्मिन् । सरस इदम् सारसम् । तस्मिन्² ॥ १४ ॥ १२. (१. ग. २) प्रथम-द्वितीय-चतुर्थ-पादादि अव्यपेत सुकर त्रिपाद- यमक—पन्द्रहवें श्लोकमें आदियमकके १२वें भेदका उदाहरण दिया है। १. अन्वयः—मत्-अनन्दनः मलयानिलः अपोढ-मलया इन्दु-कलया सह विषमं विषं मदनम् अन्वेति । २. सारसी और सारसके द्वन्द्व समासमें 'पुमान् स्त्रिया' (अष्टा० १।२।६७) से 'सारस'का एकशेष रहता है । 'सरस् + ङस्'से 'तस्येदम्' (अष्टा० ४।३।१२०) से अण्+सप्तमी ए० व०से निष्पन्न 'सारसे' 'जले'का विशेषण है।
२८ काव्यादर्श [३।१६ १३. मानिनी मा निनीषुस्ते निषङ्गत्वमनङ्ग मे । हारिणी हारिणी शर्म तनतां तनुतां यतः ॥ १६ ॥ १३. हे कामदेव, मुझे तुम्हारे बाणोंका तूणीर (भण्डार) बनाना चाहती हुई, (मुझपर) मान किये बैठी, मोतियोंके हारसे सुशोभित, मनोहर (मेरी प्रिया) मुझ दुबला होते हुएका कल्याण करे । अर्थात् मान छोड़कर मुझे अपनाये ॥ १६ ॥ इसमें भी रतिके उद्दीपन विभावका वर्णन है। मलयपवन उत्तमपुरुषवाच्य पुरुष या स्त्रीको यों तो पहले ही दुःखदायी था। पर वसन्त ऋतुकी चाँदनी रातोंके शुरू होते ही कोहरा छँट जानेके कारण निर्मल चन्द्रकलाके साथ मिलकर तो वह अत्यन्त दुस्सह विष, अर्थात् आशु प्राणहारी, अर्थात् उसके समान प्रेमकी पीरको बढ़ाकर प्राणलेवा, मदनका अनुगामी, बन रहा है। इस प्रकार यहाँ उद्दीपन विभावके द्वारा विप्रलम्भ रति प्रतिपादित है। दन्त्य वर्णोंकी बहुलतासे अनुप्रास तो माधुर्यकारक है ही, प्रथम, द्वितीय और चतुर्थ इन तीन पादोंमें एकेक वर्णसमुदायकी निरन्तर एवं सरल आवृत्तिसे भी माधुर्यकी सृष्टि होती है। इस प्रकार यहाँ यमक विप्रलम्भरतिके सर्वथा अनु- कूल है। प्रथम और द्वितीय पादोंमें प्रथम वर्णसमुदायमें नासिक्य ध्वनि अनु- स्वार या परसवर्ण है, तो आवृत्तमें नकार है। नासिक्यत्वकी समानताके कारण ध्वनिप्रभावमें अन्तर नहीं आनेसे निरन्तरतामें बाधा नहीं आती ॥ १५ ॥ १३. (१. ग. ३) प्रथमतृतीय-चतुर्थ-पादादि अव्यपेत सुकर पादादियमक— आदियमकके तेरहवें और त्रिपादयमकके तीसरे भेदके इस (१६वें श्लोकमें दिये) उदाहरणमें कविने मानिनी प्रियाके प्रति नायककी विप्रलम्भ रतिका प्रतिपादन दोनों आलम्बनों तथा तनुत्व अनुभावके वर्णनसे किया है। नायककी प्रियाके स्वाभाविक सौन्दर्यकी अभिव्यक्ति प्रथम 'हारिणी' से तथा आहार्य सौन्दर्यकी द्वितीय 'हारिणी' से की है। नायकके प्रति मानवती स्वाभाविक तथा आहार्य सौन्दर्यसे सम्पन्न नायिकाके प्रति नायकका प्रेम इतना बढ़ गया है कि उसे लगता है जैसे कामदेवके सारे बाण उसके हाथ लग गये हैं, और वह उन सबका प्रयोग नायकपर कर रही है। ऐसा लगता है मानों वह नायकको कामदेवका तूणीर ही बना देना चाहती है। १. अन्वयः—अनङ्ग, मा ते निषङ्गत्वं निनीषुः, मानिनी, हारिणी, हारिणी तनुतां यतः मे शर्म तनुताम् ।
३।१७] १.१ अन्यपेत पादादिज त्रिपाद यमक २६ १४. जयता त्वन्मुखेनास्मानकथं न कथं जितम् ? कमलङ्कमलङ्कुर्वदलिमद्दलि मत्प्रिये ॥ १७ ॥ १४. हे मेरी प्यारी, हमें जीतते हुए तुम्हारे मुखने नहीं बोलने वाला, जलकी शोभा बढ़ाता हुआ, भ्रमरोंसे सुशोभित, पँखुड़ियों वाला कमल कैसे नहीं जीता ? (अर्थात् वह तो जीत ही लिया है) ॥ १७ ॥ इससे नायक बहुत क्षीणता अनुभव कर रहा है । वह कामदेवसे प्रार्थना करता है कि कामदेव ऐसा कुछ करें कि वह मानिनी नायकके लिये कल्याण- कारिणी हो जाये । अर्थात् कामदेव नायिकापर भी अपने शरोंका ऐसे सन्धान करे कि वह मान छोड़नेको बाध्य हो जाए, जिससे कि नायकको नायिकासे मिलनका सुख प्राप्त हो । यहाँ अनुप्राससे तो माधुर्य है ही, त्रिपादादियमक भी मुख्य भावके अनु- कूल माधुर्यकी सृष्टि कर रहा है । 'कामदेवका तूणीर बनाना चाहती हुई' कथनमें 'इव' आदिके बिना उत्प्रेक्षा है । इससे नायककी अत्यन्त प्रेमविह्व- लता वस्तु व्यक्त होती है । प्रथम तनुताम् तनु (विस्तारे), कर्तरि लोट्, आत्मनेपद, प्रथम पुरुष, एक वचन, का रूप है । द्वितीय 'तनुताम्' तनु + तल्, द्वितीया, ए० व०, में 'यतः' (√ इण् गतौ, शतृ, पुंल्लिङ्ग, षष्ठी, ए० व०) का कर्म है ॥ १६ ॥ १४. (१. ग ४) द्वितीय-तृतीय-चतुर्थ-पादादि त्रिपाद्यमक - आदियमकके चौदहवें और पादादियमकके चौथे उदाहरणके रूपमें प्रस्तुत प्रकृत श्लोकमें आचार्य कवि दण्डीने आलम्बन विभाव नायिकाके वर्णनसे रतिको प्रस्तुत किया है । यहाँ 'अस्मान्'का व्यङ्ग्यार्थ यह है कि हम जो कि तेरे मुखकी प्रशंसा में इतने मुखर हैं, उनको तुम्हारे मुखने जीतकर दास बना लिया है, तब इस जड, मूक, जलको शोभित करने वाले इत्यादि प्रकारके कमलकी तो बिसात ही क्या है ! यहाँ कमलके विशेषणोंसे मुखके पानीदार होनेके अतिरिक्त चञ्चल भ्रमरसदृश नयनोंसे और कमलकी पँखुड़ी जैसे ओठोंसे सुशोभित मुखका कमलसे साम्य व्यक्त होता है । कमलको जीतनेसे नायिका के मुखकी कमलसे अधिक शोभा व्यक्त होती है । अतः व्यतिरेक व्यङ्ग्य है । दन्त्य वर्णोंकी अधिकतासे दन्तप्रभासदृश कान्तिमान् अनुप्राससे यहाँ माधुर्य गुण है । कोमल वर्णसमुदायकी तीन पादोंमें आवृत्तिसे पुष्ट हो गया है । १. अन्वयः - मत्प्रिये, अस्मान् जयता त्वन्मुखेन अकथं, कम् अलङ्कुर्वत्, अलिमत्, दलि कमलं कथं न जितम् ?
३० काव्यादर्श [३।१८-१६ (१. १ अव्यपेत पादादि घ. चतुष्पाद यमक) १५. रमणी रमणीया मे पाटला पाटलांशुका । वारुणीवारुणीभूत-सौरभा सौरभास्पदम् १ ॥ १८ ॥ इति पादादियमकमव्यपेतं विकल्पितम् । (१. २ व्यपेत पादादि यमक) व्यपेतस्यापि वर्ण्यन्ते विकल्पास्तस्य केचन ॥ १६ ॥ १५. गुलाबी रेशमी वस्त्रोंवाली, महकता गुलाबका फूल, पश्चिम दिशा- सदृश अरुणवर्ण सूर्यकी कान्तिवाली सुन्दरी मेरे रमणके योग्य है ॥ १८ ॥ इस प्रकार यहाँ पादोंके आदिमें प्रयुक्त अव्यपेत (अन्तररहित) यमकके भेद बताये गये । अब उस (पादादियमक) के व्यवधानमें प्रयुक्तके भी कुछ भेदोंका वर्णन किया जा रहा है ॥ १६ ॥ अकथम्—अविद्यमाना कथा वचनं यस्य, तत् (बहुव्रीहि) । तुम्हारे मुख के आगे कोई कमलकी बात भी नहीं पूछता है, भले ही वह कितना भी पानीको शोभायुक्त करे, या भ्रमर उसपर मँडरायें, या वह सुन्दर पँखुड़ियोंसे युक्त हो । यह आशय भी 'अकथम्'का हो सकता है ॥ १७ ॥ १५. (१. घ.) अव्यपेत सुकर चतुष्पादादियमक—आदियमकके पन्द्रहवें भेदके इस उदाहरणमें नायककी रतिकी आलम्बन नायिकाके सौन्दर्यका वर्णन किया गया है । नायिकापर गुलाबके फूल के धर्मसहित आरोपसे रूपक तथा वारुणीसे सादृश्य बतानेसे उपमा अर्थालङ्कार हैं । चारों पादोंके आदिमें एकैक वर्णसमुदायकी निरन्तर आवृत्तिसे यहाँ अव्यपेत चतुष्पादादि- यमक है । वह असंयुक्त एवं कोमल वर्णोंसे घटित होनेसे वर्ण्य वस्तुके सर्वथा अनुकूल है । क्लिष्ट कल्पनासे रहित है । अतः मधुर है ॥ १८ ॥ इस प्रकार १५ उदाहरणोंमें सुकर अव्यपेत आदियमकके १५ भेदोंके उदाहरण देनेके बाद आचार्यने व्यपेत आदियमकके पन्द्रह भेदोंमेंसे कुछके वर्णनकी प्रतिज्ञा इस (१६वें) श्लोकके उत्तरार्धमें की है । व्यपेत यमकके भी अव्यपेतके समान १५ भेद होते हैं । दिग्दर्शनार्थ उनमें से १३ भेदोंके उदाहरण दिये हैं । इनमें (क) एकपाद यमकके चार तथा (ग) त्रिपादका एक भेद नहीं हैं । (ख)द्विपादके सब (छह)तथा (ग) त्रिपादयमकके १. अन्वयः—पाटलांशुका, सौरभास्पदपाटला, वारुणीव अरुणीभूत-सौरभा रमणी मे रमणीया । २. पाटला पाटली स्त्री स्यादस्याः पुष्पे पुनर्न ना ।
·१२·] १. २. व्यपेत पादादि ख. द्विपाद यमक ३१ १६. मधुरेणदृशां मानं मधुरेण सुगन्धिना । सहकारोद्गमेनैव शब्दशेषं करिष्यति ॥ २० ॥ १६. मधु (वसन्त) मृगनयनियोंके (प्रियके प्रति) मान (रूठने) को मधुर, सुगन्धित आम्रकी बोरसे ही कथाशेष (समाप्त) कर देगा ॥ २० ॥ एकोन (तीन) भेद दिये हैं। (ख) चतुष्पाद्यमकके (१) चारों पादोंमें सजातीय वर्णसंघातकी आवृत्तिसे एक तथा (२) विभिन्न पदोंमें विविधतासे आवृत्तिसे तीन, इस प्रकार चार भेद दिये हैं। इस प्रकार आचार्यने यमककी रचनाकी यह भी एक दिशा अध्येताओंके सामने प्रस्तुत की है। यह प्रकार अन्य भेदोंपर भी लागू हो सकता है ॥ १६ ॥ १६. (२. ख. १.) व्यपेत प्रथम-द्वितीयपादादि सुकर द्विपाद यमक— दण्डीने (२. क) एकपादादि व्यपेत यमकके उदाहरण अत्यन्त सुगम तथा अन्य भेदोंके प्रदर्शनसे गतार्थ हो जानेसे नहीं दिये हैं। २०-२५ श्लोकोंमें (ख) द्विपाद यमकके व्यवधानयुक्त प्रकारके उदाहरण दिये हैं। २०वें श्लोकमें रतिभावके उद्दीपन विभाव वसन्तका वर्णन युवतियोंमें रतिका उद्दीप्त होना बताकर किया है। वसन्तको मृगलोचनाओंका मानभङ्ग करनेके लिए कामदेवके अन्य बाणोंको तैयार करनेकी आवश्यकता ही नहीं पड़ती। केवल आम्रमञ्जरीके प्रकट होते ही वह उनके मानको अतीतकी कहानी बता देगा। यहाँ 'मधुरेण' वर्णसमुदायकी आवृत्ति प्रथम और द्वितीय पादोंके आदिमें हुई है। परन्तु दोनों वर्णसमुदायोंके मध्य चार वर्णोंका व्यवधान है। अतः यहाँ व्यपेत द्विपादादियमक है। यह आवृत्ति सरल, सुखबोध्य और शोभाजनक होनेसे सुकर व्यावृत्ति है। कोमल और कुछ कठोर ध्वनियोंके मिश्रणसे सुश्लिष्ट वर्णविन्यास रतिभावके अनुकूल है। नासिक्य ध्वनियोंके विभवत विन्याससे उत्पन्न गूंज श्लोकको सुश्रव्य बनाती है। एणदृश्— 'एण' (मृग) शब्द पुँल्लिङ्ग है। किन्तु मान रमणियोंका मोहक होता है। अतः उपमेयकी अनुकूलतासे उपमेय 'एणी' है, 'एण' (पुं०) नहीं। एण्या दृशौ = एणदृशौ (षष्ठी तत्पु०)। ते इव दृशौ यस्याः, सा एण- दृक् :१ मृगीकी आँखोंके समान आँखों वाली। काव्यशास्त्रीय दृष्टिसे 'एण'से १. कुक्कुट्यादीनामण्डादिषु (वार्तिक ६।३।४२) से कुक्कुट्यादिगणान्तर्गत 'मृगी'के पर्यायभूत 'एणी'को अण्डादिके समान शेषसम्बन्धसे सम्बद्ध 'दृश्' उत्तरपद रहते पुंवद्भाव होता है। 'एणदृश् + दृश्' स्थितिमें उप- मानभूत 'दृश्'का 'सरूपाणामेकशेष एकविभक्तौ' (अष्टा० २।२।६४) से लोप होनेसे 'एणदृश्' होता है।
३२ काव्यादर्श [३।२१-२२ १७. करोतिताम्रो रामाणां तन्त्रीताडनविभ्रमम् । करोति सेर्षयं कान्ते वा श्रवणोत्पलताडनम् ॥ २१ ॥ १८. सकलापोल्लसनया कलापिन्याऽनुनृत्यते । मेघाली नर्तिता वातैः सकलापो विमुञ्चति ॥ २२ ॥ १७. रमणियोंका अत्यन्त ताम्र (लाल) हाथ (या तो) वीणाके (तारों के) ताडनरूपी विभ्रम (लीला) को करता है, या प्रियतमके प्रति कर्णोत्पल का ईर्ष्यायुक्त प्रहार (करता है) ॥ २१ ॥ १८. हवाओंसे नचाई हुई मेघमाला सारा पानी छोड़ रही है । अपने पिच्छभारको फैलाकर मयूरी उसके अनुकरणमें नृत्य कर रही है ॥ २२ ॥ गृहीत 'एणी'की तत्सम्बद्ध दृष्टिमें लक्षणासे 'एण-दृश्' शब्द निष्पन्न होता है ॥ २० ॥ १७. (२. ख. २.) प्रथम-तृतीयपादत व्यपेत सुकर द्विपादादियमक— इस श्लोकमें रतिकी आलम्बन रमणियोंके कोमल करका तथा ईर्ष्या व्यभि- चारी भावका वर्णन कविने किया है । समूचे श्लोकमें व्याप्त अनुप्रास तो माधुर्यकारक है ही, प्रथम पादके आदिमें स्थित वर्णसमुदायकी आवृत्ति तृतीय पादमें करनेसे भी विशिष्ट शोभा और माधुर्यकी सृष्टि हुई है । इसके अति- रिक्त यहाँ एक 'करोति' क्रियापद दो कर्मोंका एक साथ दीपन करके दो वाक्योंको दीप्त कर रहा है । अतः दीपक अलङ्कार भी है ॥ २१ ॥ १८. (२. ख ३.) प्रथम-चतुर्थपादादिगत व्यपेत सुकर द्विपाद यमक— २२वें श्लोकमें आचार्यने वर्षाकालमे मयूरियोंके अनुनृत्य (किसीके अनुकरणमें किये जा रहे नृत्य) का वर्णन किया है । पुरवैया हवाओंके द्वारा मेघमालाको इधरसे उधर करनेको कविने लाक्षणिक 'नर्तिता'से व्यक्त किया है । 'आली' शब्द भी 'माला', 'पङ्क्ति'के अतिरिक्त 'सखी'का भाव भी देता है । 'वात- नर्तिता'से प्रियतमके सङ्गसुखके कारण झूमती कलापिनी सखीस्वरूपा मेघाली को नाचती देखकर उसके अनुकरणमें नाच उठती है । कर्मवाच्यके प्रयोगसे मेघालीके ऋतुप्रवृत्त नर्तनकी मुख्यता व्यक्त होती है । बरखा बहारमें सुखविभोर होकर अनुनृत्य करती मयूरीके स्वाभाविक वर्णनसे स्वभावोक्ति तो है ही, प्रियसङ्गमें सुखवर्षाका अनुभव करती रमणीका भाव भी व्यक्त होता है । यहाँ भी अनुप्रास तो माधुर्यकारक है ही, द्वितीयपादके आदिमें स्थित वर्णसमुदायकी चौथे पादके आदिमें व्यावृत्तिसे निष्पन्न व्यपेत सुकर यमक इस माधुर्यकी पुष्टि कर रहा है ।
३।२३] १.२ व्यपेत ख. द्विपादादि यमक ३३ १६. स्वयमेव गलन्मानकलि कामिनि ते मनः । कलिकामद्य नीपस्य दृष्ट्वा कां नु स्पृशेद् दशाम् ? ॥ २३ ॥ १६. हे चाहने वाली, अपने आप ही नष्ट होते हुए मानकलह वाला तुम्हारा मन आज कदम्बकी कलीको देखकर किस अवस्थाको स्पर्श करेगा ? (अर्थात् अब कदम्बोंमें पहली कली चटकते ही उस (मन) की क्या हालत होगी ?) ॥ २३ ॥ एक बात यहाँ कविने बहुत उचित नहीं की है : कलाप (पिच्छसमूह) मयूरका ही अधिक भारी अतएव शोभायुक्त होता है । इस लिये कलापियों (नर मोरों) का वर्णन उचित होता, जैसाकि २४वें श्लोकमें है । मोरनियों का वर्णन उतना अच्छा नहीं लगता । कलापस्योल्लसनं कलापोल्लसनम्, तेन सहिता, सकलापोल्लसना, तया सकलापोल्लसनया । सकलाश्च ता आपः, सकलापः । ताः, 'विमुञ्चति'का कर्म होनेसे द्वितीया । उत्तर पद 'अप्'के प्रधान होनेसे नित्यबहुवचनान्तता है । अनु+√नूती गात्रविक्षेपे (दिवादि० १०), कर्मणि लट्, प्रथम पु०, ए० व० । २२ ॥ १६. (२. ख. ४) द्वितीय-तृतीय-पादादिगत व्यपेत सुकर यमक—२३ वें श्लोकमें प्रियासे रूठकर बैठी सुन्दरीके प्रियप्रेमवश मानरक्षा न कर पाने पर उसकी सहेलीकी चुहल इस श्लोकमें व्यक्त की गई है । जो रमणी प्रियके अपराध पर मान करके भी अपने आप ही, बिना प्रियकी चाटुकारिता, या अपराधक्षमाप्रार्थना अथवा अन्य किसी समुचित कारणके ही प्रियके प्रति रूठी न रह सकी, उसका 'कामिनीत्व' तो स्वतः स्पष्ट है । जब बिना कारण के ही उसकी यह हालत है, तो अब जब कदम्बोंमें इक्की-दुक्की कली दिख- लाई देने लगी है, तब उसकी क्या हालत होगी ? यहाँ दन्त्य तथा नासिक्य वर्णोंकी परस्पर व्यवहित अधिकतासे अनुप्रास तो माधुर्यका हेतु है ही, द्वितीय पादके आदिमें स्थित वर्णसमुदायकी पाँच कोमल मधुर वर्णोंके व्यवधानके बाद तृतीय पादके आदिमें आवृत्तिसे द्विपाद- वर्ती व्यपेत यमक भी इस माधुर्यको प्रगुणित कर रहा है । यह यमक झटिति अर्थसमर्पक होनेसे सुकर है, और श्लोकके मुख्य भाव रतिके पूर्णतया अनुकूल है ॥ २३ ॥
३४ काव्यदर्श [३।२४-२५ २०. आरुह्याक्रीडशैलस्य चन्द्रकान्तस्थलीमिमाम् । नृत्येत्येष चलच्चारुचन्द्रकान्तशिखावलः ॥ २४ ॥ २१. उद्धृता राजकादुव्री ध्रियतेऽद्य भुजेन ते । वराहेणोद्धृता१ याऽसौ वराहेरुपार स्थिता ॥ २५ ॥ २०. हिलते हुए सुन्दर चन्दों (पिच्छों) के अन्त भाग वाला यह मयूर क्रीडापर्वतकी इस चन्द्रकान्त मणियोंसे बनी स्थलीपर चढ़कर नाच रहा है ॥ २४ ॥ २१. जिस पृथ्वीका उद्धार वराहने किया था, (जो) श्रेष्ठ नाग (शेष) के ऊपर स्थित थी, आज राजाओंके समूहसे उद्धार की हुई वह पृथ्वी तुम्हारे बाहुके द्वारा धारण की जा रही है ॥ २५ ॥ २०. (२. ख. ५.) द्वितीय-चतुर्थपादादि व्यपेत सुकर यमक—इस श्लोक में चाँदनी रातमें महलके प्रमद वनमें क्रीडाशैलकी जल चुवाती चन्द्रकान्त- मणिनिर्मित अकृत्रिम२ उपत्यकामें उसे बारिस करता मेघ समझकर हर्षविभोर मयूरके नाचनेका वर्णन किया गया है। स्वभावोक्ति अलङ्कार है। मयूर द्रव्यका वर्णन चारुत्वपूर्वक करनेसे यहाँ द्रव्यस्वभावोक्ति है। क्रीडाशैलस्थलीके चन्द्रकान्तमणिनिर्मितताके वर्णनसे ऋद्धिवर्णननिमित्तक (दण्डीका प्रथम और उद्भटका द्वितीय) उदात्त भी यहाँ है। वर्णविन्यास कण्ठ्य, तालव्य एवं दन्त्य वर्णबहुल तथा सुश्लिष्ट है। ह्रस्व, दीर्घ वर्णोंका क्रम भी चुस्ती वाला है। न व्यञ्जनगत शैथिल्य है, न स्वरगत । बीच-बीचमें महाप्राण वर्णोंसे युक्त कोमल अल्पप्राण वर्णोंके प्रयोगसे काव्य सुश्राव्य है। द्वितीय और चतुर्थ पादोंमें समान वर्णसमुदायकी सुकर उपस्थितिसे जनित यमक इस श्लोकको भरपूर माधुर्य प्रदान कर रहा है ॥ २४ ॥ २१. (२. ख. ६.) तृतीय-चतुर्थ-पादादिगत व्यपेत सुकर द्विपाद यमक— प्रकृत (२५वें) श्लोकमें कविने किसी राजाके शौर्यके वर्णनसे उत्साह स्थायी १. तुलना करें अवन्तिसुन्दरी, पृष्ठ ४३, पंक्ति १६ : न खल्वमहावराहो महीं समुद्धरति···। २०५, पंक्ति १५ : निर्गच्छतु वनादयं महावराह इवोद्धरन्धरामवधूताहिमकरमाधा पुरुषोतंस्तमेतम् । 'मकर'के बादके पाठका कोई अर्थ नहीं निकलता है । 'मकरबाधः पुरुषोत्तमः' या 'मकरमादिपुरुषोत्तमः । तमेतम्···' पाठ कदाचित् उचित है । २. मयूरको मणिनिर्मित स्थलकी प्रतीति वास्तविक स्थलके रूपमें हो रही है । अतः 'मणिनिर्मित' और 'अकृत्रिम' कहनेमें विरोध नहीं है ।
३।२५] १.२ व्यपेत ख. द्विपादादि यमक ३५ व्यक्त किया है । इसमें वर्ण्य राजाका सादृश्य वराहावतार विष्णुसे और शत्रु राजाका शेष नागसे व्यक्त किया गया है । तृतीय पादके आदिमें प्रयुक्त वर्णसमुदाय 'वराहे' पाँच अक्षरोंके व्यवधानके बाद चतुर्थ पादके आदिमें आवृत्त है । अतः व्यपेत द्विपादादियमक है । यह यमक शब्द या अर्थ किसी भी दृष्टिसे क्लिष्ट नहीं है । झटिति अर्थसमर्पक है । अतः सुकर है । प्रथम पादमें उद्धारका अपादान 'राजकात्' दिया है । यदि तृतीय पाद में भी 'याऽब्धेः' करके अपादान दे देते, तो राजा और वराहका सादृश्य और अच्छी तरह प्रकट होता । इसके अतिरिक्त, 'वराहने तो पृथ्वीका उद्धार जड जलराशिसे किया था, राजाकी भुजाने चेतन राजसमूहसे किया', इस प्रकारकी अर्थच्छटा प्रकट होनेसे राजाका वराहसे व्यतिरेक व्यक्त होता । 'असौ'से कोई विशेष आशय नहीं व्यक्त होता । राजकम् — 'राज्ञां समूहः' अर्थमें 'राजन् + आम्' प्रकृतिसे वुञ् प्रत्ययसे यह शब्द निष्पन्न होता है ।१ कुछ ऐतिहासिकोंके मतमें प्रकृत श्लोकमें दण्डीने विदिशा (आधुनिक भिलसा, म०प्र०) के निकट उदयगिरिके गुहामन्दिरोंके बाहर स्थित ४०० ई० में चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य द्वारा निर्मापित वराहमूर्तिका वर्णन किया है । इस मूर्तिमें नीचे शेषनागका भी आकार बना है और नारीरूप पृथ्वी वराह की दंष्ट्रापर स्थित है । इस प्रकार नागको कुचलकर पृथ्वीका उद्धार करने वाले वराहका वर्णन दण्डीने पहले भी किया है : हरिणोद्धृता । भूः खुरक्षुण्ण- नागासृग्लोहितादुदधेरिति (१।७३) ।। मही महावराहेण लोहितादुद्धृतोदधेः (७४) । डॉ जयशंकर त्रिपाठीने 'नाग'से 'शेष'को न जाने क्यों नहीं समझा ? अन्यथा वे प्रकृत और १।७३के वर्णनों में वर्ण्यविषयके स्वरूपमें अन्तर न बताते !२ उक्त नारीमूर्तिके निर्माणमें चन्द्रगुप्तका आशय अपने भाई रामगुप्तकी पत्नी ध्रुवस्वामिनीका रामगुप्तसे या शकाधिपतिसे उद्धार करनेकी ओर सङ्केत करना था, यह कुछ ऐतिहासिकोंकी उद्भावना है । प्रकृत श्लोकसे १. अष्टा० ४।२।३६ : गोत्रोक्षोष्ट्रोरभ्र-राज-राजन्य-राजपुत्र-वत्स-मनुष्याजाद् वुञ् । अमरकोष २।८।३-४ : अथ राजकम् ॥ राजन्यकं च नृपतिकक्षत्रि- याणां गणे क्रमात् । २. डॉ० जयशंकर त्रिपाठी, दण्डी एवं संस्कृत काव्यशास्त्रका इतिहासदर्शन, पृष्ठ ४०६ । प्रसादिनी १।७४, पृष्ठ १३६, पादटिप्पणी १ भी देखें ।
३६ काव्यादर्श [३।२६ २२. करेण ते रणेध्वन्तकरेण द्विषतां हताः । करेणवः क्षरद्रक्ता भान्ति सान्ध्यघना इव ॥ २६ ॥ २२. युद्धोंमें शत्रुओंका अन्त करने वाले तुम्हारे हाथसे हत, खून झराते हाथी सन्ध्या कालके मेघोंके समान प्रतीत होते हैं ॥ २६ ॥ भी यह आशय व्यक्त होता है : 'राजकात्' में 'राजन् + क' (कुत्सा अर्थमें 'क' प्रत्यय) से कापुरुष राजा रामगुप्त या कामुक होनेसे निन्दित शकाधि- पति अभिप्रेत हो सकता है । 'उर्वी' ध्रुवस्वामिनीको व्यक्त करता है । 'ध्रुवा', 'अचला', 'उर्वी' पर्याय हैं । 'वराहि' से महावराहसमान चन्द्रगुप्तके द्वारा कुचले हुए रामगुप्त या शकाधिपति अभिप्रेत प्रतीत होते हैं । इस प्रकार यहाँ कवि द्वारा शकारानि चन्द्रगुप्त विक्रमादित्यकी प्रशंसा की गई है । डॉ० कृष्णकुमारका यह कथन उचित नहीं प्रतीत होता कि यहाँ 'वराह' चालुक्य वंशके राजचिह्नकी ओर सङ्केत करता है ।२ दण्डी काञ्चीके पल्लव राजाओंके आश्रित थे, यह सुविदित है । यह डॉ० कृष्णकुमार भी मानते हैं । चालुक्योंका पल्लवोंसे पीढ़ियोंसे वैर था । चालुक्यों द्वारा काञ्चीपर घेरा डालनेके कारण दण्डीको अध्ययनकालमें दर-दर भटकना पड़ा था (प्रथम परिच्छेदकी भूमिका देखें) । ऐसी स्थितिमें वे शत्रु राजाकी प्रसंशामें कसीदे कहें, यह सम्भावित नहीं है ॥ २५ ॥ २२. (२. ग. १.) प्रथम-द्वितीय-तृतीयपादादिगत व्यपेत सुकर त्रिपादादि- यमक - व्यपेत त्रिपादयमकके इस प्रथम उदाहरणमें आचार्य कवि दण्डीने किसी राजाका शौर्य युद्धमें उसके द्वारा मारे गए हाथियोंके३ वर्णनसे बताया है । हाथियों (उपमेय) की समानता सान्ध्य घनोंसे बताई है । सादृश्यका निमित्त उपमेयमेँ तो 'क्षरद्रक्ताः' विशेषणसे दिया है, उपमान घनोंमें वह 'सान्ध्य' विशेषणसे गम्य है । कठोर महाप्राण वर्णोंकी बहुलता तथा बीच- बीचमें कोमल अल्पप्राण वर्णोंसे युक्त रचना उत्साह भावके अनुकूल है । 'करेण' वर्णसमुदायकी आवृत्ति पहले तीन पादोंके आदिमें वर्णान्तरके व्यव- १. अष्टाध्यायी ५।३।७० : प्रागिवात् कः । ७४ : कुत्सिते । २. अलङ्कारशास्त्रका इतिहास, पृष्ठ १०२ । ३. 'करेणुरिभ्यां स्त्री, नेभे ।' (अमरकोष ३।३।५२) तथा 'करेणुर्गजयोषायॉ स्त्रियां, पुंसि मतङ्गजे ।' (मेदिनीकोष १५।४१) के अनुसार 'करेणु' शब्द उभयलिङ्ग है । यहाँ उपमान घनोंके पुंस्त्वके कारण पुंल्लिङ्ग ('हाथी' अर्थ) में अभीष्ट मानना उचित है ।
३२७ ] १.२ व्यपेत ग. त्रिपादादि यमक ३७ २३. परागतरूराजीव वातैर्ध्वस्ता भटैश्चमूः । परागतमिव क्वापि परागततमम्बरम् ॥ २७ ॥ २३. तूफानोंके द्वारा पर्वतके वृक्षोंके समूहके समान सैनिकोंके द्वारा शत्रु- सेना ध्वस्त कर दी गई। धूलसे व्याप्त आकाश मानों कहीं दूर चला गया था ॥ २७ ॥ धानमें होनेसे यहाँ व्यपेत त्रिपादादियमक है। सुखपूर्वक अर्थावबोध तथा सुश्रव्यताके कारण यह सुकर है। आचार्यने प्रथम-द्वितीय-चतुर्थपादादि भेदका उदाहरण नहीं दिया है। इसे अन्य भेदोंसे उपलक्षित समझें ॥ २६ ॥ २३. (२. ग. २) प्रथम-तृतीय-चतुर्थपादादिगत व्यपेत सुकर त्रिपादादि- यमक—सत्ताईसवें श्लोकमें आचार्य दण्डीने सम्भवतः पिछले श्लोकमें प्रकृत राजाके शौर्यका वर्णन उसकी सेनाके द्वारा घमासान लड़ाई करके शत्रुसेनाको ध्वस्त करनेका प्रतिपादन करके किया है। पूर्वार्धमें राजाकी सेनाके द्वारा परा चमू (शत्रुसेना) के ध्वंसकी उपमा प्रथम पादमें अन्धड़के द्वारा अग (पर्वत) पर स्थित, अथवा अग = अडिग मजबूत, तरुओंके ध्वंससे दी है। भट एवं वातमें, परा चमू, और अग-तरु-राजीमें उपमेयोपमान सम्बन्ध है। ‘इव’ वाचक है। ‘ध्वस्ता’ साधारण धर्म है। उत्तरार्धमें धूल द्वारा अम्बरको ढँक लिये जानेकी सम्भावना अम्बरके कहीं भाग जानेमें की है। इससे ‘शत्रुसेनाका अधिष्ठान, परमाश्रय विजिगीषितव्य राजा कहीं जा छुपा है’, यह आशय भी व्यक्त होता है। इस प्रकार उत्तरार्धमें वस्तुकी व्यञ्जना करने वाली उत्प्रेक्षा है। दोनों समकक्ष हैं, इस लिये इनकी द्वितीय संसृष्टि है। इस अर्थच्छायासे संवलित उत्साह भावकी शोभा शब्दगत सुकर यमकसे भी हो रही है। प्रथम पादके आरम्भमें प्रयुक्त ‘पर्गत’ वर्णसमुदायकी आवृत्ति बहुत-से वर्णोंके बाद तृतीय पादके आरम्भमें और फिर चार वर्णोंके व्यवधानके बाद चतुर्थ पादके आरम्भमें की गई है। चतुर्थपादगत ‘पराग’ शब्द यद्यपि प्रसिद्ध तो ‘पुष्परजस्’में है, तथापि १. अन्वय :—वातैः अग-तरु-राजी इव परा चमूः भटैः ध्वस्ता । पराग- ततम् अम्बरम् क्वापि परा-गतम् इव ॥
३८ काव्यादर्श [३।२८ २४. पातु वो भगवान् विष्णुः सदा नवघनद्युतिः । स दानवकुलध्वंसी सदान-वर-दन्ति-हा ॥ २८ ॥ २४. नवीन मेघके समान कान्ति (श्याम वर्ण) वाले, दानवोंके खानदानों को नष्ट करने वाले, मदजलसहित श्रेष्ठ हस्तीको मारने वाले वे (जगत्- प्रसिद्ध) षड्विध ऐश्वर्यसे सम्पन्न² विष्णु तुम्हारी रक्षा सदा करें ॥ २८ ॥ इसका प्रयोग ‘रजस्’, ‘धूलि’के लिये भी शास्त्रसम्मत है ।¹ यहाँ तीनों ‘परागत’में से कोई भी सार्थक शब्द या पद नहीं है । द्वितीय ‘परागत’ भी ‘परागतम्’ पदका एकदेश (अवयव) ही है; सम्पूर्ण अवयवी नहीं । अतः ‘अर्थभिन्न वर्णों, शब्दों या पदोंकी आवृत्ति’ वाला लक्षण इस प्रकारके उदाहरणोंपर ‘अर्थे सति’ परिष्कार होने तक लागू नहीं होता था । जबकि दण्डीका ‘वर्णसंहतिकी आवृत्ति’ वाला लक्षण सदा सर्वत्र अबाधित है ॥ २७ ॥ २४. (२. ग. ३.) द्वि-तृतीय-चतुर्थ व्यपेत त्रिपादादि सुकर यमक—इस उदाहरणमें भगवान् विष्णुके प्रति कविकी रति उनसे श्रोताओंकी रक्षाकी आसीसके साथ व्यक्त की गई है । इन दोनोंमें आशीः (दण्डी २।३५५के मतमें एतन्नामक अलङ्कार) ‘पातु’-शब्दोक्त होनेसे मुख्य है । रति इसकी सिद्धिका अङ्ग बन गई है । यहाँ चार अक्षरोंके समुदाय (सदानव) की आवृत्ति दूसरे, तीसरे और चौथे पादोंके आदिमें चार-चार अक्षरोंके व्यवधान से हुई है । किन्तु अर्थावबोधमें तनिक भी क्लेश नहीं होता । अतः यहाँ त्रिपादादि व्यपेत यमक और सुकर है । ‘स-दान-वर दन्ती’से ‘कुवलयापीड’ नामक गज अभिप्रेत है, जिसे विष्णुने कृष्णावतारमें कंसवधसे पहले यमधाम पठाया था ।³ विधेय क्रियापद ‘पातु’का सबसे पहले प्रयोग आशीःपर बल देने को किया है ॥ २८ ॥ १. अमरकोष २।४।१७ : परागः सुमनोरजः । ३।३।२१ : परागः कौसुमे रेणौ, स्नानीयादौ, रजस्यपि । २. ऐश्वर्यस्य समग्रस्य, वीर्यस्य, यशसः, श्रियः । ज्ञानवैराग्ययोश्चैव षण्णां ‘भग’ इतीङ्गना ॥ ३. हरिवंशपुराण, विष्णुपर्व २६।२४-३८ : सार्त्तनादं महत् कृत्वा विदन्तो दन्तिनां वरः । पपात स महामात्रो वज्रभिन्न इवाचलः ॥ ३८
३।२६] १.२ व्यपेत ग. त्रिपाद आदियमक ३६ २५. कमलेस्समकेशं ते, कमलेर्ष्याकरं मुखम् । कमलेख्यं करोषि त्वं कमलेवोन्मदिष्णुषु¹ ।। २६ ।। २५. तुम्हारा सिर² भौरोंके समान (काले) केशों वाला है; मुख कमल से ईर्ष्या करने वाला है। तू कमला (लक्ष्मी) के समान है। किसे तुम उन्मादशील लोगोंमें नहीं लिखे जाने योग्य करती हो ? अर्थात् तुम्हें देखकर कौन न बौरा जाये ? ।। २६ ।। २५. (२. घ १) एक-जातीय सर्वपादादि व्यपेत सुकर यमक—प्रकृत श्लोकमें आचार्यने किसीके द्वारा उसके सामने स्थित किसी सुन्दरीके सौन्दर्य की प्रशंसा कराई है। प्रथम पादमें अलि उपमान है, केश उपमेय एवं सम वाचक है। साधारण धर्म कृष्णता गम्य है। इस प्रकार उपमा है। द्वितीय पादमें मुखको कमलोंमें भी ईर्ष्या उत्पन्न करने वाला कहकर मुखकी कमलसे समता (उपमा) कही है। √ ईर्ष्य् को २।६२में उपमावाचकोंमें दिया है। अतः दण्डीके अनुसार मुखको कमलोंसे भी सुन्दर बतानेसे व्यतिरेक नहीं है। 'कमलेव' में भी धर्मलुप्ता उपमा है। ये उपमायें समकक्ष हैं। अतः द्वितीय संसृष्टि है। प्रथम पादके आदिमें प्रयुक्त 'कमले' वर्णसमुदाय पाँच- पाँच अक्षरोंके व्यवधानसे अगले तीन पादोंके आदिमें आवृत्त है। एक ही वर्णसमुदायकी व्यवधानसे आवृत्तिके कारण यह एकजातीय चतुष्पादादि व्यपेत सुकर यमक है । उत्तरार्धका यह अर्थ टीकाओंके अनुकरणमें किया है। पाणिनिका अनु- शासन यदि तनिक ढीला किया जा सके,³ तो यह व्याख्या प्रस्तुत है : कमला (समुद्रसे उत्पन्न लक्ष्मी) ने जैसे उसके रूपको देखकर मस्त होने वाले सुरा- सुरोंमें लेखों (देवों⁴) के हितकारी (विष्णु) से इतर कर दिया था, वैसे १. अन्वय :—ते कम् अलेः समकेशम्; मुखं कमलेर्ष्याकरम् । त्वं कमला इव । उन्मदिष्णुषु कम् अलेख्यं करोषि ? २. अमरकोष ३।३।५ : मारुते, वेधसि, ब्रध्ने कः; कं शिरोऽम्बुनोः । ३. लेखेभ्यो हितो लेख्यः 'तस्मै हितम्' (अष्टा० ५।१।५) अर्थमें गवादि- गणान्तर्गत न होते हुए भी 'उ-गवादिभ्यो यत्' (अष्टा० ५।१।२) से 'यत्' यदि किया जा सके । अन्यथा 'प्राक् क्रीताच्छः' (५।१।१) से 'लेखीय' रूप पाणिनिके अनुसार शुद्ध है । ४. अमरकोष १।१।८ : आदितेया, दिविषदो, लेखा, अदितिनन्दनाः ।
४० काव्यदर्श [३।३० २६. मुदा रमणमन्वितमुदारमणिभूषणाः । मदभ्रमद्दृशः कर्तुमदभ्रजघनाः क्षमाः¹ ॥ ३० ॥ २६. (क) बड़ी-बड़ी मणियोंके गहनों वाली, (ख) मदके कारण चञ्चल दृष्टि वाली, (ग) कटिके विशाल पुरोभागवाली, स्त्रियाँ२ (अपने) प्रियतमको प्रमोदसे युक्त करनेमें समर्थ होती हैं ॥ ३० ॥ किसे तुम्हारे रूपको देखकर मस्त होने वाले लोगोंमें लिखे जानेके अयोग्य कर रही हो ? अर्थात् किस एकको अपना कर उसे उन्मदिष्णुओमें अलेख्य बना रही हो ? इस व्याख्यामें 'अलेख्यम्'में श्लेष है : (क) लेखा देवाः । तेभ्यो हितो लेख्यो विष्णुः । न लेख्यः अलेख्यः लेख्याद् भिन्नः । (ख) लेखितुं योग्यो गणनायोग्य इति यावत् । न लेख्यः अलेख्यः, गणनाया अयोग्यः । अलेः समकेशम्—समाः तुल्याः केशा यस्य, तत् समकेशम् (बहुव्रीहि) । यहाँ 'अलि' का सम्बन्ध समुदाय 'समकेश'से सीधे न होकर समुदायके अवयव 'सम'के द्वारा होनेके कारण३ 'अलि' शब्दमें 'सम'के योगमें षष्ठी हुई है४ ॥ २६ ॥ २६. (२. घ. २.) व्यपेत, सुकर, अर्धसम, चतुष्पादादि यमक—आचार्य दण्डीने ३० वें श्लोकमें स्त्रियोंके आहार्य और स्वाभाविक सौन्दर्यका वर्णन किया है । आचार्यका क्रम अर्थपूर्ण है : (क) पहले स्त्रियोंकी समृद्धि बताते हुए उनके बेशकीमती रत्नों वाले गहनोंसे आहार्य सौन्दर्यको बताया है; फिर (ख) यौवनमदमाती चञ्चल अँखियोंका वर्णन किया है; आहार्य रूपके बाद स्वाभाविक रूपके लिये चेहरेपर नज़र पड़ना स्वाभाविक है; (ग) फिर रमणोंके लिये आकर्षणके केन्द्र कटितटका वर्णन किया है; वहाँ तक पहुँचनेके १. अन्वय :—(क) उदारमणिभूषणाः, (ख) मद-भ्रमद्-दृशः, (ग) अदभ्रजघनाः रमणं मुदा अन्वितं कर्तुं क्षमाः । २. जघनं स्यात् स्त्रियाः श्रोणिपुरोभागे, कटावपि । मेदिनीकोष पश्चान्नितम्बः स्त्रीकट्याः, क्लीबे तु जघनं पुरः ॥ अमरकोष २।६।७४ ३. महाभाष्य २।१।१ : समासेऽप्युपसर्जनविशेषणं भवति । तद् यथा— देवदत्तस्य गुरुकुलम्; देवदत्तस्य गुरुपुत्रः; देवदत्तस्य दासभार्येति । वाक्य- पदीय ३।१४।४८ तथा इसपर हेलाराजकी टीका भी देखें : समुदायेन सम्बन्धो येषां गुरुकुलादिना । संस्पृश्यावयवांस्ते च युज्यन्ते तद्वता सह ॥ ४. अष्टाध्यायी २।३।७२ : तुल्यार्थैरतुलोपमाभ्यां तृतीयाऽन्यतरस्याम् ।
३।३१] १.२ व्यपेत घ. चतुष्पाद आदि यमक ४१ २७. उदितैरन्यपुष्टानामारुतैर् मे हृतं मनः । उदितैरपि ते दूति, मारुतैरपि दक्षिणैः ।। ३१ ।। २७. हे दूति, मेरा मन (क) कोयलोंकी उठी तानोंने और (ख) तुम्हारी बातोंने तथा (ग) दक्षिणी बयारोंने हर लिया है ।। ३१ । बाद भला रमण प्रसन्न क्यों न होगा ? 'रमण' का प्रयोग भी अवसरके अनु- कूल किया है । श्लोकके पूर्वार्धके दोनों चरणोंके आदिमें 'सुदारम' चार वर्णोंके समुदाय की और उत्तरार्धके दोनों चरणोंके आदिमें 'मद्रभ्र' (तीन वर्णोंके समुदाय) की व्यवहित आवृत्ति की गई है । इस प्रकार यहाँ यमक चारों पादोंमें है । तथापि पूर्वार्धमें अन्य वर्णसमुदायकी और उत्तरार्धमें अन्य वर्णसमुदायकी आवृत्ति होनेसे यहाँ अर्धसम चतुष्पाद व्यपेत यमक है । ये सब आवृत्ति सुकर हैं । उच्चारण और अवबोध, दोनों स्तरोंपर किसी प्रकारकी क्लिष्टता इनमें नहीं है । अतः कोमल रसोंकी अभिव्यक्तिमें भी साधक है, बाधक नहीं । अन्वीतम्—अनु + √ ई + क्त (भावे) । यह √ ई कुछ आचार्योंके मतमें इट किट कटी गतौ (भ्वा० ६।२६-३१) में प्रश्लिष्ट है ।¹ सेट् अजन्त धातुओंमें अपठित होनेसे यह अनिट् है² ।। ३० ।। २७ (२. घ. ३.) व्यपेत सुकर चतुष्पादादि यमकका एक अन्य (विषम) प्रकार—इस श्लोकमें रतिके उद्दीपन विभावोंका वर्णन किया गया है । (क) वसन्तमें आमोंमें बौर आते ही कोयलोंने मीठी तान छेड़ी ही थी कि मनमें प्रेम अँगड़ाई लेने लगा । (ख) तभी सौभाग्यसे प्रियाका सन्देश लेकर दूती आ गई । उसकी मीठी बातोंसे मन मुग्ध हो ही रहा था कि (ग) तभी दक्षिणी बयार बहने लगी । तब मन कहाँ काबूमें रहने वाला था ! इस प्रकार रतिकी एकके बाद एक उद्दीपन वस्तुओंको इस श्लोकमें प्रस्तुत किया गया है । इसके अतिरिक्त एक नामीभूत क्रियापद 'हृतं' का सम्बन्ध १. सिद्धान्तकौमुदी, भ्वादि : इट, किट, कटी गतौ । केचित्तु... अन्ते च 'इ-ई' इति प्रश्लिष्य 'अयति...अयांचकार' इत्याद्युदाहरन्ति । विशेषार्थ हमारी भवतोषिणी, पृष्ठ ३३४-३३६ देखें । २. ऊदृदन्तैर्यौति-रु-क्ष्णु-शीङ्-स्नु-नु-क्षु-श्वि-डीङ्-श्रिभिः । वृङ्-वृञ्भ्यां च विनैकाचोऽजन्तेषु निहताः स्मृताः ।। भ्वादि, पृष्ठ २०३
४२ काव्यादर्श [३।३२ २८. सुरा-जित-ह्रियो यूनां तनुमध्यासते स्त्रियः । तनु-मध्याः क्षरत्स्वेद-सु-राजित-मुखेन्दवः ॥ ३२ ॥ २८. मदिरा द्वारा जीत ली गई लज्जा वाली, पतली कमर वाली, चूते हुए पसीनेसे सुशोभित मुखचन्द्रवाली स्त्रियाँ युवाओंके शरीरपर विराजमान हैं ।। ३२ ।। तीन कर्ताओं 'आहतैः', 'उदितैः' और 'मारुतै'से बतानेसे क्रियादीपक अर्था- लङ्कार है । यहाँ सार्थक (समानार्थक) 'उदितैः' वर्णसमुदाय प्रथम और तृतीय पादोंमें प्रदत्त है । दोनोंके बीचमें बहुतसे स्वर-व्यञ्जन वर्णोंका व्यवधान है । इसी प्रकार निरर्थक 'मारुतैः' द्वितीय पादके आदिमें है, तो सार्थक 'मारुतैः' चतुर्थपादके आदिमें बहुतसे स्वर-व्यञ्जनोंके व्यवधानसे आवृत्त है । विषम और सम पादोंमें आवृत्तिका यह एक अन्य प्रकार यहाँ आचार्यने दिया है ।। ३१ ।। २८. (२. व. ४) व्यपेत सुकर चतुष्पादादि व्यत्यस्त यमक — इस श्लोक में रसिकशिरोमणि कवि दण्डीने विपरीतरतिमें पुरुषपर अध्यासित रमणियों की सम्भोगकालिक अवस्थाका चित्रण किया है । यहाँ गुणन चिह्न (×) आकारके समान प्रथम पादके आदिमें दत्त वर्णसमुदाय 'सुराजित' की आवृत्ति चौथे पादके आदिमें की गई है और द्वितीय पादके आदिमें स्थित 'तनुमध्या' की आवृत्ति तृतीय पादके आदिमें की गई है । इनमें परस्पर पर्याप्त वर्णोंका व्यवधान है । क्लिष्टकल्पनासे रहित और सुश्राव्य होनेके कारण ये यमक सुकर हैं । पुरुषकर्म करती स्त्रियोंमें पुरुषताकी अभिव्यक्तिके लिये महाप्राण वर्ण, संयुक्त वर्ण तथा विसर्गोंका प्रयोग कविने स्त्रीत्वोचित कोमल वर्णोंके साथ- साथ किया है । तनुमध्यासते — आसु उपवेशने (अदादि ११) का अधिकरण 'तनु' √आस्से 'अधि' के योगके कारण कर्म बन गया है ।१ सुराजितह्रियः — सुरया जिता ह्रीर्यासाम् (बहुव्रीहि), ताः । तनुमध्याः —तनु मध्यं यासां (बहु०) ताः । क्षरत्स्वेदसुराजितमुखेन्दवः—क्षरंश्चासौ स्वेदः = क्षरत्स्वेदः (कर्मधारयतत्पुरुष); सुष्ठु राजितः = सुराजितः (गति- तत्पुरुष); क्षरत्स्वेदेन सुराजितः = क्षरत्स्वेदसुराजितः (तृतीयातत्पु०); मुख- १. अष्टा० १।४।४६ : अधिशीङ्स्थाऽऽसां कर्म ।
३।३३-३४] ३ अव्यपेत-व्यपेत यमक ४३ इति (२) व्यपेतयमकप्रभेदोऽप्येष दर्शितः । (३) अव्यपेत-व्यपेतात्मा विकल्पोऽप्यस्ति, तद् यथा ॥ ३३ ॥ २६. सालं सालम्बकलिकासालं साऽलं न वीक्षितुम् । नालीनालीनबकुलानाली नालीकनीरपि¹ ॥ ३४ ॥ इस प्रकार (२) व्यपेतयमक नामक भेद भी यह दिखला दिया है । (३) अव्यपेत और व्यपेतके मिश्रण वाला भेद भी है । वह जैसे—॥ ३३ ॥ २६ वह (मेरी) सखी (१) न लटकती हुई कलियोंके प्रकार वाली (अर्थात् कुसुमकलिकाच्छादित) वृक्षको नहीं देख सकती है; (२) न मौल- सिरीको छुपाने वाले भौंरोंको; और (३) न (भौंरोंसे छिपी हुई) पद्मिनियों को (देख सकती है) ॥ ३४ ॥ मेवेन्दुः = मुखेन्दुः (उपमिततत्पुरुष²) । क्षरत्स्वेदसुराजितो मुखेन्दुर्यासां, (बहुव्रीहि) ताः स्त्रियः ॥ ३२ ॥ इस प्रकार सुकर आदियमकके (२) व्यपेत नामक भेदके १३ प्रभेद २०- ३२ श्लोकोंमें उपलक्षित किये हैं। इसके (क) एकपाद यमकके चारों तथा (ग) त्रिपादयमकका एक (२) प्रथम-द्वितीय-चतुर्थ-पादादि, कुल पाँच भेद नहीं दिए हैं। इस प्रकार व्यपेत यमकके कुल दस भेदोंके १३ उदाहरण प्रस्तुत किये हैं। पन्द्रहवें भेद (१ घ) चतुष्पादादियमकके (i) सम और (ii) द्विविध अर्धसम तथा (iii) एकविध व्यत्यस्त (क्रॉस्) प्रभेद यमकके अन्य भेदों में भी सम्भव हैं। अतः वे अन्यत्र तादृश विच्छित्तियोंके उप- लक्षणार्थ दिये समझे जाने चाहिये । इसके बाद (३) अव्यपेत और व्यपेतके मिश्रण वाले (१) आदियमक भेदके १५ भेदोंमें से एक चतुष्पाद प्रभेदके १. अर्धसम (३४), २. व्यत्यस्त (३५) एवं ३. सजातीय प्रकार दिए हैं। ये अन्य भेदोंके उपलक्षक हैं ॥३३॥ २६ (३. घ १) अव्यपेत-व्यपेत अर्धसम चतुष्पाद यमक—आचार्यने इस श्लोकमें रतिके उद्दीपन विभाव वसन्तका ओर आलम्बन विभाव आली (सखी) का वर्णन किया है। (१) सखी कलियोंसे पूरी तरह आच्छादित १. अन्वय :—सा आली सालम्ब-कलिका-सालं वीक्षितुं न अलम् । न आलीनबकुलान् अलीन्, नालीकिनीः अपि (वीक्षितुम् अलम्) । २. अष्टा० २।१।५६ : उपमितं व्याघ्रादिभिः सामान्याप्रयोगे ।