काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary
महाकवि दण्डी द्वारा
४६ काव्यादर्श [३।३६
३१. याम याम-त्रयाधीनायामया मरणं निशा । यामयाम धियाऽस्वात्यायामया मथितैव सा १ ॥ ३६ ॥ ३१. तीन पहरोंके अधीन विस्तार वाली (अर्थात् तीन पहर बची हुई, अत एव लम्बी) रातके द्वारा (इसके रहते) हम मर जायें, (यह सम्भावित है) । जिसे हम बुद्धिसे पहुँचे थे (जो मनमें बसी हुई है), प्राणपीडाकारी (प्रेम-) रोगवाली वह मर ही चुकी (होगी) ॥ ३६ ॥ यह श्लोकके मुख्य भावके विपरीत है । वादी जङ्घालदेवने रत्नश्रीप्रोक्त व्याख्याके अतिरिक्त अस्म्यता वाली व्याख्या भी दी है । तरुणवाचस्पतिने केवल 'अरम्य' छेद किया है । प्रथम पादके आदिमें दत्त 'काल' की आवृत्ति यहाँ तथा चौथे पादके आदिमें अव्यवहित रूपमें की गई है । प्रथम और चतुर्थ पादोंमें द्वितीय और तृतीय पादोंका व्यवधान भी है । इस प्रकार यह यमक अव्यपेत एवं व्यपेत दोनों प्रकार का है । इसी प्रकार द्वितीय पादके आदिमें प्रयुक्त 'तार' की भी आवृत्ति वहीं और तृतीय पादके आदिमें अव्यवहित रूपमें होनेके अतिरिक्त दोनों पादोंके मध्य चार अक्षरोंका व्यवधान भी है । अतः यह यमक भी अव्यपेत और व्यपेत दोनों प्रकारका है । (क) प्रथम और चतुर्थ, (ख) द्वितीय और तृतीय पादोंमें व्यस्त क्रमके कारण यह यमक विशेष शोभाकारक हो गया है, परन्तु उतना सुकर नहीं है ॥ ३५ ॥ ३१. (३. घ. ३) अव्यपेत-व्यपेत चतुष्पाद सजातीय यमक—इस श्लोक में अत्यधिक प्रेम करने वाली प्रियामें अत्यन्त अनुरक्त विरही पुरुषने मिलन न होनेके कारण अपनी और प्रियाकी अत्यन्त दुःखमय दशाका वर्णन किया है । इस प्रकार विप्रलम्भ रतिकी तीव्रतम पीड़ाका प्रदर्शन यहाँ किया गया है । इसमें विरही नायक कहता है कि अभी तो रातका प्रथम प्रहर ही बीता है, तीन पहर रात बाकी है । पर यह कट नहीं पायेगी । विरहज्वाला इतनी प्रबल है कि रात बीतते-न-बीतते प्राणों की बलि ले लेगी, यह लगता
१. रत्नश्री : याम-त्रयाधीनायामया निशा मरणं याम । याम् अयाम्, अस्वात्यार्या सा अधिया मया मथितैव । वादिजीने यह अन्वय भी किया हैं : स्वात्या धिया याम् अयाम, सा अयामया एव मथिता । तरुणवा०: धिया याम् अयाम, अस्वात्यायामया सा मथितैव । शेष समान है । व्याख्या देखें ।
३।३७] आदियमकका उपसंहार ४७ इत्यादि-पाद-यमक-विकल्पस्येदृशी गतिः । एवमेव विकल्प्यानि यमकानीतराण्यपि ॥ ३७ ॥ पादोंके आदिमें होने वाले यमकके विकल्प (भेद) की गति (स्वरूप) ऐसी है । अन्य यमकोंके भेद भी इसी तरह किये जाने चाहियेँ ॥ ३७ ॥ है । खैर, मेरी तो जो हालत है, सो है; मेरी प्रियाका क्या हाल होगा । शरीरसे तो हम उसके पास जा नहीं सकते; पर उसके बारेमें सोच तो सकते ही हैं । मेरे विरहमें प्राणसङ्कटकारी प्रेमव्याधि वाली वह बेचारी तो मर ही गई होगी । रत्नश्रीज्ञान, और वादिजीके अन्वयों तथा व्याख्याओंमें नायकके लिये एक बार 'याम्' बहुवचन और दो बार 'अयम्' एवं 'मया' में एकवचनका विक्षेपसूचक प्रयोग है । इसके अतिरिक्त 'याम् अयम्' का कोई बहुत औचि- त्यपूर्ण अर्थ इन व्याख्याओंमें नहीं निकलता । 'मुझ मूर्खने प्राणकष्टकारी पीडाको प्राप्त उसे मार ही डाला है', अर्थमें नायकद्वारा नायिकाके परित्याग की कल्पना अपेक्षित है । अतः इन दोनों आचार्योंकी व्याख्याएँ बहुत सङ्गत नहीं है । तरुणवाचस्पति की व्याख्या ठीक है । निशा—'निश्' (रात) प्राचीन प्रकृति है । भागुरि आचार्य 'निशा' को इसीका परिवर्धित रूप मानते हैं । पाणिनिने पश्चात्कालिक 'निशा' को आधार बनाकर प्राचीन रूपको शस् (द्वितीया बहुवचन) आदि विभक्तियोंमें विकल्पसे समाविष्ट किया है ।१ अतः 'निशया', 'निशा' । प्रथमपादादिस्थ 'याम' की चारों पादोंमें अव्यवहित आवृत्ति है और 'यामयाम' की व्यवधानसे । अतः यह मिश्रात्मक यमक है । चारों पादोंमें सजातीय 'याम' और 'यामयाम' वर्णसमुदायोंकी आवृत्ति है, अतः यह चतुष्पादवर्ती सजातीय यमक है । रचनाकी दृष्टिसे यह सुकर नहीं है । ३६वें श्लोकसे तुलना करें ॥ ३६ ॥ इस प्रकार आचार्य दण्डीने पादादि यमकके (१) अव्यपेत भेदके पूरे १५ भेदोंके, (२) व्यपेत यमकके ६ भेदोंके तथा १५वें भेद चतुष्पाद यमकके १. वष्टि भागुरिरल्लोपमवाप्योरुपसर्गयोः । आपं चैव हलन्तानां, यथा वाचा, निशा, दिशा ॥ अष्टाध्यायी ६।१।६३ : पद्दनोमासहृन्निशसन्यूषन्दोषन्यकञ्छकन्नुदन्ना- सञ्छस्प्रभृतिषु ।
४८ काव्यादर्श [३।३८-३६ न प्रपञ्चभयाद् भेदाः कात्स्न्र्य्येनाख्यातुमीप्सिताः । दुष्कराभिमता एव दृश्यन्ते तत्र केचन ॥ ३८ ॥ १. स्थिरायते, यतेन्द्रियो, न हीयते यतेर्भवान् । अमायतेयतेऽप्यभूत् सुखाय तेऽयते क्षयम्' ॥ ३६ ॥ विस्तारभयसे भेद पूरी तरह कहना अभीष्ट नहीं है। उनमेंसे कुछ दुष्करके रूपमें अभिमत (भेद) ही दिखाए जा रहे हैं ॥ ३८ ॥ हे स्थिर भविष्य वाले, इन्द्रियोंपर नियन्त्रण रखने वाले आप (किसी) यतिसे हीन (कम) नहीं हैं। तुम्हारी निश्छलता भी तुम्हें क्षीण न होने वाला इतना सुख देने वाली हो गई है ॥ ३६ ॥ ४ प्रकार और (३) अव्यपेत-व्यपेत भेदके १५वें भेदके ३ प्रकार उदाहरणों से प्रदर्शित किये हैं। इस प्रकार कुल ३१ उदाहरणोंमें पादादियमकका प्रद- र्शन आचार्यने किया है । इसके बाद आचार्यका कहना है कि यह तो दिशा है विकल्पोंके प्रदर्शनकी । अन्य पादमध्य आदि छह विधाओंके भेदोंके उदाहरण भी इसी प्रकार समझ लेने चाहियें । आचार्य रत्नश्रीज्ञानने इनमेंसे ८ भेदोंके उदाहरण प्रदर्शित किये हैं ॥ ३७ ॥ विस्तारभयसे सब भेदोंके उदाहरण देना अभीष्ट नहीं है । इस प्रकार काव्यमें माधुर्योत्पादक (क) सुकर यमकोंका उदाहरणोंसे प्रदर्शन करनेके बाद माधुर्यव्याघातक (ख) दुष्कर यमक अगले ३६ श्लोकोंमें प्रदर्शित किया है। दुष्कर यमकके भी सब भेदोंका प्रदर्शन विस्तारभयसे नहीं दिया है । गिने-चुने भेदोंके उदाहरण दिये हैं ॥ ३८ ॥ दुष्कर यमक : १. (३. घ. २) अव्यपेत-व्यपेत चतुष्पाद सजातीय पादमध्य यमक--इस श्लोकमें किसी इन्द्रियसंयमी निश्छल पुरुषका वर्णन किया गया है। यहाँ एक ही वर्णसमुदाय 'यते' चारों पादोंके मध्यमें अव्यव- वहित रूपसे और 'यतेयते' व्यवहित प्रकारसे आवृत्त है। इसकी तुलना ३६वें श्लोकसे की जा सकती है । यह उसकी अपेक्षा आसान है । रत्नश्रीमें इसे 'अव्यपेत यमक' बताया है । सम्भवतः यह लेखकका प्रमाद है ॥ ३६ ॥ १. अन्वय :--स्थिरायते, यतेन्द्रियो भवान् यतेर्न हीयते । अमायताऽपि ते क्षयम् अ-यते इयते सुखायाभूत् ।
३।४०-४१] दुष्कर यमक ४६ २. सभासु राजन्नसुराहतैर्मुखैर्महीसुराणां वसुराजितैः स्तुताः । न भासुरा यान्ति सुरान्न ते गुणाः प्रजासु रागात्मसु राशितां गताः' ।।४० ३. तव प्रिया सच्चरिता प्रमत्त, या, विभूषणं धार्यमिहांशुमत्तया । रतोत्सवामोदविशेषमत्तया न मे फलं किञ्चन कान्तिमत्तया ।। ४१ ।। २. हे राजन्, सभाओंमें ब्राह्मणोंके मदिरासे अनाहत अर्थात् अदूषित, धनसे दीप्त (अर्थात् दरिद्रतासे म्लान नहीं) मुखोंके द्वारा प्रशंसित, (तुम्हें) प्रेम करनेके स्वभाव वाली प्रजाओंमें राशिके रूपमें विस्तारको प्राप्त तुम्हारे प्रशस्त उज्ज्वल गुण देवताओं तक नहीं पहुँचते, ऐसा नही है ।। ४० ।। ३. हे प्रमादी, जो दुष्ट चरित्र वाली तुम्हारी प्रिया है, किरणोंसे युक्त (जगमग-जगमग करता) यह गहना इस स्थितिमें मिलनोत्सवके अत्यधिक आनन्दके² कारण मस्त उस प्रियाके द्वारा धारण किया जाये । मुझे कान्ति- मती होनेसे (कोई) लाभ नहीं है ।। ४१ ।। २. (२. घ. २) व्यपेत सजातीय चतुष्पाद मध्ययमक—यहाँ कविने किसी राजाके दरबारमें ब्राह्मणों द्वारा वर्णित उसके गुणोंका सुरलोक तक पहुँचना बताया है । चारों पादोंके मध्यमें 'सुरा' वर्णसमुदाय वर्णान्तरके व्यवधानमें आवृत्त हुआ है । दुष्कर यमककी रचना अनुष्टुप्की अपेक्षा बड़े छन्दमें अधिक अच्छी तरहसे हो सकती है । इसलिये आचार्यने दुष्कर यमक के प्रकरणमें बदल-बदलकर छन्दोंका प्रयोग किया है । यहाँ और अगले दो श्लोकोंमें वंशस्थ छन्द है ।³ वर्णसङ्घातकी इस प्रकारकी आवृत्तिसे अर्थावबोधमें सुगमता नहीं रहती । अतः ये सब यमक दुष्कर हैं । चतुष्पाद यमक देनेका कारण इसमें अन्योंकी अपेक्षा आवृत्तिकी मुखरता अधिक होना है । आदियमकके पर्याप्त उदाह- रण पीछे दिये जा चुके हैं । इसलिये दुष्करयमकके प्रदर्शनके लिये उससे भिन्न भेद चुने गए हैं ।। ४० ।। ३. (२. घ. ३) व्यपेत सजातीय चतुष्पादान्तयमक—अन्य किसी रमणी में आसक्त किन्तु अलङ्कार देकर प्रियाको मनानेका यत्न करते किसी पुरुष १. अन्वयः —राजन्, सभासु अ-सुरा-हतैः, वसु-राजितैः महीसुराणां मुखैः स्तुताः, भासुराः, रागात्मसु प्रजासु राशितां गतास्ते गुणाः सुरान् न यान्ति न । २. अमरकोष ३।३।६१ : हर्षेऽप्यामोदवन्मदः । मेदिनी कोष : आमोदो गन्धहर्षयोः । ३. जतौ तु वंशस्थमुदीरितं जरौ । वृत्तरत्नाकर
५० काव्यादर्श [३।४२ ४. भवादृशा नाथ, न जानते नते रसं विरुद्धे खलु सन्नतेनते । ये एव दीनाः शिरसा नतेन ते चरन्त्यलं दैन्यरसेन तेन ते १ ॥४२॥ ४. हे स्वामी, आप जैसे लोग झुकनेके आनन्दसे परिचित नहीं हैं। क्योंकि सन्नता (दीनता, झुकना) और इनता (स्वामित्व) परस्पर विरोधी हैं। जो लोग दीन हैं, वे झुके हुए सिरसे विचरण करते हैं ! इस लिये तुम्हें दीनताके आनन्द (कष्ट) से क्या लेना ? ।। ४२ ।। को उसकी प्रिया उसे उपालम्भसे खेदयुक्त करनेको२ वह आभूषण भी उसी स्त्रीको देनेको कह रही है : यह गहना पहनकर सुन्दर होकर भी मैं क्या फल पा लूँगी ? तुमने जाना तो उस कुलटाके पास ही है ! प्रथम पादके ‘सच्चरिताप्रमत्त’ का अर्थ रत्नश्रीज्ञानने विपरीत लक्षणासे यों माना है : ‘हे सच्चरितों (अच्छे आचरणों) के प्रति अप्रमत्त, अर्थात् दुश्चरित्र, परस्त्रीगामी ।’ पर यह तात्पर्य तो ‘सच्चरिताके प्रति प्रमत्त’ (सच्चरितायां प्रमत्त) व्याख्यासे ही आ जाता । यहाँ चारों पादोंके अन्तमें सजातीय वर्णसमुदाय ‘मत्तया’की व्यवधानयुक्त आवृत्तिसे व्यपेत चतुष्पाद सजातीय अन्तयमक है । इस यमकमें प्रथम पादके ‘असच्चरितेषु अप्रमत्त’, ‘सच्चरितेषु अप्रमत्त’, ‘असच्चरिता प्रमत्त’, ‘सच्चरिता प्रमत्त, अथवा ‘सच्चरिता अप्रमत्त’ आदि विविध पदच्छेदोंकी गुंजाइशके अतिरिक्त कोई दुष्करता नहीं है ।। ४१ ।। ४. (३. घ. ३) अव्यपेत-व्यपेतात्मक चतुष्पाद सजातीय अन्त-यमक —यहाँ एक ही ‘नते’ वर्णसमुदायकी अव्यवहित रूपसे और ‘नतेनते’ की व्यवहितरूपसे चारों पादोंके अन्तमें व्यावृत्ति हुई है । रत्नश्रीमें इसे ‘अव्यपेता- त्मक यमक’ बताया है । चतुष्पादान्त यमकमें व्यवधानके अनिवार्य होनेके कारण सम्भवतः रत्नश्रीज्ञानने प्रत्येक पादके अन्तमें ‘नते’ की अव्यवहित आवृत्तिको ही मुख्यता दी है; ‘नते नते’ की चारों पादोंमें व्यवहित उपस्थिति को नहीं । पर जब व्यवहित आवृत्ति है, तो उसकी उपेक्षा उचित नहीं है । तरुणवाचस्पतिने यहाँ ‘अव्यपेत-व्यपेत’ ही बताया है । यत्नबोध्य होनेके कारण यह दुष्कर है । १. अन्वयः—नाथ, भवादृशाः नतेः रसं न जानते । सन्नतेनते खलु विरुद्धे । ये एव दीनाः, ते नतेन शिरसा चरन्ति । तेन ते दैन्यरसेन अलम् । २. दृष्ट्वा स्थितं प्रियतमं साशङ्कं सापराधमतिलज्जम् । ईर्ष्यावचनसमुत्थैः खेदयितव्यो ह्युपालम्भैः ॥ नाटच० २२।२६४
३।४३-४४] दुष्कर यमक ५१ ५. लीलास्मितेन शुचिना, मृदुनोदितेन, व्यालोकितेन लघुना, गुरुणा गतेन । व्याजृम्भितेन जघनेन च दर्शितेन सा हन्ति, तेन गलितं मम जीवितेन १ ॥ ४३ ॥ ६. श्रीमानमानमरवर्त्मसमानमान-२ ५. खेलतीसी उज्ज्वल मुस्कानसे, कोमल वाणीसे, हल्की (अतएव अस्थिर, अर्थात् चञ्चल) चितवनसे, भारी (अतएव मन्द) चालसे, विस्तीर्ण कटिपुरोभागको दिखाते हुए जो चलती है, तो मानो मुझपर) प्रहार करती है। उस (प्रहार) के कारण मेरे प्राण निकल गये हैं ॥ ४३ ॥ ६. लक्ष्मीसे युक्त, नहीं समाता हुआ, स्थितिसे युक्त जो देवोंके मार्ग सन्नतेनते—(१) षद्लृ विशरण-गत्यवसादनेषु (भ्वादि), कर्तरि क्त, तल् =सन्न-ता, सा च इनता चेति, इतरेतरयोग द्वन्द्व; (२) सम् + नतः= सन्नतः, स च इनश्चेति, सन्नतेनौ, तयोर्भावौ सन्नतेनते ॥ ४२ ॥ ५. (२. घ. ४) व्यपेत चतुष्पादगत सजातीय मध्यान्तगत यमक—प्रकृत श्लोकमें कविने पूर्वश्लोकमें आवृत्त 'नते' वर्णसमुदायको उलटकर 'तेन' की आवृत्तिसे यमक प्रस्तुत किया है। नायककी रतिके आलम्बन विभाव सुन्दरी की चेष्टाओं (उद्दीपन विभावों) का वर्णन करके नायककी प्ररूढ रति प्रद- शित की है। रचना उसके अनुकूल अल्पपदसमास वाली, अनुप्रासयुक्त है। एक ही वर्णसमुदाय 'तेन' प्रत्येक पादके मध्यमें और अन्तमें व्यवधानसे व्यावृत्त हुआ है। केवल मध्य और अन्त नियत स्थानोंमें आवृत्तिके लिये पृथक् प्रयत्न अपेक्षित होनेसे ही यह दुष्कर है। अन्यथा अर्थसमर्पणकी तथा श्रव्यता की दृष्टिसे इसमें किसी प्रकारकी क्लिष्टता नहीं है। अतः यह यमक दुष्कर होते हुए भी माधुर्योत्पादक है। यहाँ 'हन्ति' द्वयर्थक है। यहाँ और अगले श्लोकमें वसन्ततिलका छन्द है ॥ ४३ ॥ ६. (३. घ) अव्यपेत-व्यपेत चतुष्पाद सजातीय आद्यन्त यमक—इस श्लोकमें दुष्कर रचनाके द्वारा जगत्के निमित्तोपादान कारण परम तत्त्वका वर्णन किया गया है। वह परम तत्त्व श्री (माया) से संवलित है; मान (ज्ञान) १. अन्वयः—शुचिना लीलास्मितेन, मृदुना उदितेन, लघुना व्यालोकितेन, गुरुणा गतेन, व्याजृम्भितेन जघनेन दर्शितेन च सा हन्ति । तेन मम जीवितेन गलितम् । २. अन्वयः—श्रीमान् अमान् स्थितिमान् यः अमरवर्त्म-समान-मानम्
५२ काव्यादर्श [३।४४ मात्मानमानत-जगत्प्रथमानमानम् । भूमानमानयति यः स्थितिमानमान- नामानमानम तमप्रतिमानमानम्१ ॥ ४४ ॥ (आकाश) के समान प्रमाण वाले, विनम्र (भक्त) लोगोंमें विस्तृत होते हुए मान (सम्मान, पूजा) वाले अपने आपको भूमा (बहुत्व) को प्राप्त कराता है, अमेय (अनन्त) नामों वाले, अनुपम मान (स्वरूप) वाले उसे प्रणाम कर ॥ ४४ ॥ के साधन इन्द्रियोंसे कालावच्छिन्न ज्ञान नहीं प्राप्त करता, अथवा प्रत्यक्षादि प्रमाणोंसे वस्तुस्वरूपका मान नहीं करता; जगत्की स्थिति तथा तदुपलक्षित सृष्टि एवं संहार वाला है, अर्थात् सृष्टि, स्थिति और प्रलयका कर्ता है; अथवा स्थिर, अनश्वर है। इस प्रकारका वह आकाशके समान सबका अधि- ष्ठान है, वह आकाशके समान सर्व व्यापक है।२ उसका मान भक्त लोगोंमें वृद्धिको प्राप्त होता है। अथवा उपर्युक्त प्रकारसे विभु व्यापक उसका मान भी विनत लोगोंके हृदयमें सिमट जाता है। ऐसा वह (हृदयमें सिमटने वाला) अपने आपको विभु (भूमा) बना लेता है—'मैं एक हूँ, बहुत हो जाऊँ', अपनी इस इच्छाकी पूर्तिके लिये इस समस्त जगत्प्रपञ्चके रूपमें वह स्वयं ही प्रकट होता है। समस्त जगत्प्रपञ्च ही उस परम तत्त्वका स्वरूप होनेके कारण यह सब वही है। अतः जगत्के सारे नाम, सारा वाक्प्रपञ्च, वाग्व्यव- हार, उसीकी अभिव्यक्ति है ।३ ये सब उसीके नाम हैं। देश, काल, पात्रोंकी इयत्ताके परिसीमनके असाध्य होनेके कारण विभुके ये सब नाम भी परिमेय नहीं हैं। विष्णुसहस्रनाम, शिवसहस्रनाम आदि तो उपलक्षण हैं, एक क्षुद्रसा १. आनत-जगत्प्रथमान-मानम् आत्मानं भूमानम् आनयति, अमान-नामानम्, अप्रतिमान-मानं तम् आनम । २. तैत्तिरीयोपनिषद् १।६।२ : आकाशशरीरं ब्रह्म । ३. तै० उ० २।६।१ : सोऽकामयत 'बहु स्याम् प्रजायेय' इति ।...तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत् । बृहदारण्यकोपनिषद् १।४।५ : सोऽवेद्, 'अहं वाव सृष्टिरस्मि; अहं हीदं सर्वमसृक्षि ।' इति । ततः सृष्टिरभवत् । ६ : ब्रह्म वा इदमग्र आसीत् । तदात्मानमेवावेद्, 'अहं ब्रह्मास्मि ।' इति । तस्मात् तत्सर्वमभवत् । १।२।५ : स ऐक्षत...स तया वाचा, तेनात्मनेदं सर्वमसृजत यदिदं कि च—यजूंषि, सामानिच्छन्दांसि, यज्ञान्, प्रजाः, पशून् । छान्दोग्योपनिषद् ६।२।३-४ भी देखें ।
३।४४] दुष्कर यमक ५३ अंश है विभुकी नामावलीका । उसका कोई प्रतिमान ही नहीं है जगत्में । १ उसके स्वरूपकी ईदृक्ता या इयत्ताका मान किस प्रतिमानसे किया जा सकता है । २ हे हृदय, तू उसके आगे विनत हो । अपना आपा उँडेल दे उसीमें । तत् त्वमसि । तू वही है । वही हो जा । अन्यविध अर्थोंके लिये रत्नश्री, वादि और तरुण टीकाएँ देखें । रत्नश्रीमें तृतीय पादमें ‘आनयति’ के स्थानमें ‘आनमत’ पाठभेद बताया है । वादीटीका और तरुणटीकामें उसीकी व्याख्या की है । इस पाठमें चतुर्थपादके मध्यमें ‘आन- मतम्’ पदच्छेद इन लोगोंने किया है : आननन्ति = सम्यक् श्वासोच्छ्वासौ कुर्वन्ति इति ‘आनाः’ प्राणिनः । तैः ३ मतः इति ‘आन-मतः’, तम् । अर्थात् सभी प्राणी जिसे बहुत मानते हैं, उसे आ-नमत भली भाँती प्रणाम करो । आ + √ नम् कर्तरि लोट्, मध्यम बहुवचन । आ-नम—आ + √ नम् कर्तरि लोट्, मध्यम एकवचन । यहाँ समान वर्णसमुदाय ‘मान’ की चारों पादोंके आदिमें एकेक अक्षरके बाद तथा अन्तमें अव्यपेत आवृत्ति है । ‘मान-मान’ समुदायकी भी इसी तरह चारों पादोंके आरम्भमें एकेक अक्षरके बाद और अन्तमें व्यवधानसे आवृत्ति है । इसलिये यहाँ चतुष्पाद आद्यन्त-यमक है । आवृत्त वर्णसमुदायके समान होनेसे यह सजातीय है । रत्नश्रीज्ञान, वादीजी, तरुणवाचस्पति और रङ्गाचार्य रेड्डीने एकेक अक्षरको छोड़नेके बाद स्थित वर्णसमुदायकी आवृत्तिके कारण इसे आदिके स्थानपर मध्य स्थान मानकर ‘मध्यान्तयमक’ का उदाहरण माना है । पर सोलह अक्षर वाले पादमें प्रारम्भिक एक अक्षरको छोड़कर दो अक्षरोंकी आवृत्तिसे ‘पादका मध्य’ कैसे हो गया ? चार अक्षरोंके बाद यदि होता, या मध्यके निकट भी होता, तो ‘मध्य’ कहना उचित होता । १. न तस्य प्रतिमा अस्ति, यस्य नाम महत् यशः ।। वा० सं० ३२।३ २. विष्णोरिवास्यानवधारणीयमीदृक्तया रूपमियत्तया वा ।। रघुवंश १३।३ ३. रत्नश्रीज्ञान और तरुण वाचस्पतिने ‘तेषां मतः’ विग्रह दिया है । पर ‘क्तेन च पूजायाम्’ (अष्टाध्यायी २।२।१२) से षष्ठीसमासनिषेधके कारण यह उचित नहीं है । अतः ‘मत’ में √ मन् से ‘मति-बुद्धि-पूजा- ऽर्थेभ्यश्च’ (अष्टाध्यायी ३।२।१८८) से वर्तमानमें क्त न करके भूत- कालमें ‘निष्ठा’ (अष्टाध्यायी ३।२।१०२) से क्त करके तृतीया तत्पुरुष उचित है । वादीटीका देखें ।
५४ काव्यादर्श [३।४५ ७. सारयन्तमुरसा रमयन्ती सारभूतमुरुसारधरा तम् । सारसानुकृतसारसकाञ्ची सा रसायनमसारमवैति' ॥ ४५ ॥ ७. स्थिर (दृढ) बने हुए (साधन, शिश्न) को प्रवेश कराते हुए उसे (नायकको) वक्षस्थलसे (दबाकर) रमणके लिए प्रेरित करती हुई, प्रबल कामवेगको या स्थूल एवं व्यायत (खूब लम्बे) दृढ (साधन) को (वराङ्गमें) धारण करने वाली, सीत्कार आदि आनन्दध्वनियों वाली, 'सारस' नामक पक्षियोंके समान आवाजसे युक्त करधनी वाली वह (रमणी) रसायनको निस्सार (तुच्छ) समझती है ॥ ४५ ॥ 'आनमत' पाठमें 'मानमानमत' वर्णसमुदायकी तृतीय और चतुर्थ पाद- वर्ती द्विपादादि आवृत्तिसे भी यमक हो जाता है । तब यहाँ चतुष्पादाद्यन्त यमकका द्विपादादियमकसे सङ्कर होनेसे सङ्कीर्ण यमक है ॥ ४४ ॥ ७. (२. घ. ) व्यपेत चतुष्पाद अर्धसम सजातीय आदि-मध्य यमक— रसिकदेशिक आचार्य कवि दण्डीने प्रकृत ४५वें श्लोकमें सम्भोगरत नन्दिनी२ मृगी नायिकाका प्राञ्जल वर्णन तदनुकूल कोमल तथा उछलकूद करते वर्ण- विन्याससे इन्द्रवज्रा छन्दमें किया है । √सृ+णिच्=√सारिका प्रयोग कामशास्त्रमें सम्भोगक्रियामें शिश्नके वराङ्गमें प्रवेश-निर्गमके प्रसङ्गमें होता है । 'सार' शब्द बल, बलवान्, स्थिर, मजबूत अर्थमें है ।३ यहाँ यह हमेशा सार (स्थिर, दृढ़) न रहने वाले, किन्तु सम्भोगावसरपर स्थिर हो जाने वाले शिश्नके लिये 'भूत' के साथ दिया है : कड़े हुए हुएको प्रवेश कराते हुए नायकको । जैसे ही नायकने सम्भोगकी यह प्रथम क्रिया सम्पादित की, मृगी नायिकाने उसे वक्षसे कसकर सटा लिया । इससे नायककी रमणेच्छा और उद्दीप्त हुई । सम्भोग (उपसृप्तक) की अङ्गभूत अवमर्दन क्रियाके निमित्त नायिकाने रत्यानन्दातिरेकवश अपने १. अन्वयः—सारभूतं सारयन्तं तम् उरसा रमयन्ती, उरुसारधरा, सारसा- नुकृतसारसकाञ्ची सा रसायनम् असारम् अवैति ॥ २. विद्वद्भिः पूजितामेनां, खलैरपि सुपूजिताम् । पूजितां गणिकासङ्घैर्नन्दिनीं को न पूजयेत् ॥ कामसूत्र २।१०।५२ नन्दिनी, सुभगा, सिद्धा, सुभगङ्करणीति च । नारी प्रियेति चाचार्यैः शास्त्रेष्वेषा निरुच्यते ॥ ५३ ३. सारो बले स्थिरांशे च, न्याय्ये क्लीबं, वरे त्रिषु । अमर० ३।३।१७१
३।४५] दुष्कर यमक ५५ जघनको ऊँचा किया, तो उसका सार (वराङ्ग) और विशाल उत्फुल्ल हो गया।१ सम्भोग क्रियाकी इस हलचलमें उसकी काञ्ची रहरहंकर बज-बज जाती है । उसकी करधनीकी आवाज़ सारसोंकी कलध्वनिके समान है। इस प्रकारके अयन्त्रित रत्यानन्दमहोदधिमें रससराबोर रागवती मृगी नन्दिनी नायिका आयुर्वेदोक्त तथा कामतन्त्रानुकूल सुभगङ्करण, वशीकरण, और वाजीकरण (वृष्य) रसायनोंको२ निस्सार अत एव व्यर्थ, अनावश्यक समझती है । अर्थात् वह इस प्रकारकी रतिके सुखको ही अपने लिये सुभगङ्करण एवं वशीकरण तथा प्रियके लिये वाजीकरण समझती है । रत्नश्री और वादिटीकामें तृतीयपादके आदिमें 'सारसाऽनु०' पाठ धृत एवं व्याख्यात है । इस पाठसे तृतीय और चतुर्थ पादोंके आदिमें 'सारसा' वर्ण समुदायकी व्यपेत आवृत्तिसे यहाँ द्विपाद व्यपेत यमक भी हो जाता है । सजातीय वर्ण समुदाय 'सार' की चारों पादोंके आदि और मध्यमें व्यपेत और दुष्कर आवृत्ति है । इस प्रकार पूर्वार्धमें शुद्ध व्यपेत पादादिमध्य यमक है और उत्तरार्धमें द्विपादादि व्यपेत यमकसे सङ्कीर्ण पादादिमध्य व्यपेत यमक है । इस प्रकार समूचे श्लोकमें द्विपादादि यमकसे सङ्कीर्ण चतुष्पादादिमध्यगत व्यपेत सजातीय यमक है । तरुणटीकामें तृतीय पादादिमें 'सारवाऽनु' पाठ व्याख्यात है ।३ इस स्थिति में व्याख्या यों होगी : आरवेण सीत्कारादिविरुतेनाष्टविधेन सहिता सारवा सा (नायिका) अनुकृताः सारसाः यया सा च काञ्ची । नायिकाके 'सारव' या 'सारसा' विशेषणसे उपसृप्त नायिकाकी, 'व्रीडानाश' तथा 'समधिक- रतियोजना' अवस्थाएँ सूचित होती हैं । 'आरव' या 'आरस'से प्रहणनोत्तरभावी १. कामसूत्र २।२।१० : प्रयोज्यं नायिका... विजने किञ्चिद् गृह्णती पयोधरेण विध्येत्...। २६ : स्तनाभ्यामुरः प्रविश्य तत्रैव भारमारोपयेदिति स्तनालिङ्गनम् । ६।१ : रागकाले विशालयन्त्येव जघनं मृगी संविशे- दुच्चरते । ८ : शिरो विनिपात्योध्वं जघनमुत्फुल्लकम् । ६ : तत्रापसारं दद्यात् । ८।३ : सा (पुरुषायिता)... स्तनाभ्यामुरः पीडयन्ती...। १५ : तदेव विपरीतम् (उच्चीकृत्य) सरभसमवमर्दनम् । २. कामसूत्र ७।१।१-४८ तथा ४६ देखें : आयुर्वेदाच्च, वेदाच्च, विद्यातन्त्रेभ्य एव च । आप्तेभ्यश्चावबोद्धव्या योगा ये प्रीतिकारकाः ।। ४६ ३. सारवा = सनादा, अत एवानुकृतसारसपक्षिशब्दा काञ्ची यस्याः, सा ।
५६ काव्यादर्श [३।४६ ८. नयानयालोचनयानयानयानयानया१न्धान्विनयानयायते । न यानयासी२र्जिनयानया३नयानयानयास्त्वं जनयानयाश्रितान् ॥ ४६ ॥ ८. हे अचल भविष्य वाले, अय (मार्ग) और अनय (कुमार्ग) के विषयमें अन्धे (विवेकरहित), नीतिविरोधी लोगोंको नीति और अनीति की इस आलोचना (दृष्टि) से विनीत करो । जिनपर तुम नहीं चले हो, (उन) मार्गोंपर बुद्ध या महावीरके मार्गसे गमन करने वाले, बिना यानके (पैदल) चलने वाले तुम (उन्हें) नीतिपर भलीभाँति आश्रित बनाओ ॥४६॥ आनन्दातिरेकसूचक आठ प्रकारके विरुत अभिप्रेत हैं ।५ इस पाठमें चतुष्पा- दादिमध्यवर्ती सजातीय व्यपेत यमक है । अन्यविध व्याख्याओंके लिये रत्नश्री आदि देखें ॥ ४५ ॥ ८ (३. घ. ५.) अव्यपेत-व्यपेत चतुष्पादाद्यन्तवर्ती सजातीय यमक—इस श्लोककी रत्नश्रीज्ञान, वादी जङ्घालदेव और तरुण वाचस्पतिने भिन्न-भिन्न प्रकारकी व्याख्यायें की हैं । रत्नश्रीज्ञान और तरुणवाचस्पतिके फलितार्थमें काफी कुछ समानता है । वादीजीने दो प्रकारसे व्याख्या की है । सजातीय वर्णसमुदाय 'नया' की निरन्तर तथा 'नयानया' की व्यवहित आवृत्ति चारों पादोंके आदि और अन्तमें की गई है । प्रथम और तृतीय पादके रत्नश्रीसम्मत पाठमें तीन बार प्रयुक्त 'नया' ('नयानयानया') की अन्य १. यह रत्नश्रीसम्मत पाठ है । वादी : कृतीन्, तरुणा० : कृतीन् । २. यह रत्नश्री-वादिसम्मत पाठ है । तरुण० : यान्नरा० । ३. यह रत्नश्रीसंमत पाठ है । वादि-तरुण० : नयांस्तान् । ४. अन्वयः—अ-नयायते, अयानयान्धान् अनयान् अनया नयानयालोचनया विनय । यान् न अयासीः, (तान्) नयान् जिन-यान-याः अ-यान-याः त्वम् आनयाश्रितान् जनय । तरुणवाचस्पति : विनयानयायते, कृतीन् यान् अनया नयानयालोचनया न अयासीः, अयानयान्धान्, अयानयान् तान् जिन-यान-यान् जनय । आश्रितान् आनय । ५. कामसूत्र २।८।८ : (१) गात्राणां संसनं, (२) नेत्रनिमीलनं, (३) व्रीडानाशः, (४) समधिका च रतियोजनेति स्त्रीणां भावलक्षणम् । २।७।४-७ : तदुद्भवं च सीत्कृतम् तस्याऽितिरूपत्वात् तदनेकविधम् । विरु- तानि चाष्टौ । हिङ्कार-स्तनित-कूजित-रुदित-सूत्कृत-दूत्कृत-फूत्कृतानि । अम्बाऽर्थाः शब्दा, वारणार्था, मोक्षणार्थाश्चालमर्थाः । ते चार्थयोगात् ।
३।४७] दुष्कर यमक ५७ ६. रवेण भौमो ध्वजवर्तिवीरवे रवेजि संयत्यतुलास्त्रगौरवे । रवेरिवोग्रस्य पुरो हरेरवेरवेत तुल्यं रिपुमस्य भैरवे ॥ ४७ ॥ ६. अनुपम (दिव्य) अस्त्रोंके गौरव वाले भीषण सङ्ग्राममें कृष्णके ध्वजमें विद्यमान वीर पक्षी (गरुड) के रवके द्वारा भूमिपुत्र (नरकासुर) भयाक्रान्त कर दिया गया। सूर्यके समान उग्र (प्रचण्ड, तेजस्वी) इस (कृष्ण) के सामने शत्रुको सिंहके सामने मेषके समान समझो ॥ ४७ ॥ आवृत्तियोंसे विलक्षण प्रकारकी आवृत्तिसे प्रथम-तृतीयपादान्तवर्ती व्यपेत यमक भी निष्पन्न होता है। पूर्वपादके अन्तमें और अगले पादके आदिमें प्रथम और द्वितीय तथा तृतीय और चतुर्थ पादोंमें द्विपादान्तादि अव्यपेत यमक भी है। इसकी दुष्करता तो स्वतः स्पष्ट है। यह तथा अगले तीन श्लोक वंशस्थमें निबद्ध हैं ॥ ४६ ॥ ६. (३. घ. ५) अव्यपेत-व्यपेत चतुष्पादाद्यन्त सजातीय यमक—इस श्लोकमें कविने कृष्णके ध्वजमें विद्यमान गरुडकी ध्वनि सुनकर भौमासुरके भयका वर्णन किया है।² विष्णु 'गरुडध्वज' के रूपमें प्रसिद्ध हैं। अतः कृष्णको भी 'गरुडध्वज' कहा जाता है। विष्णुके पर्याय कृष्णका भी अभिधान करते हैं। 'हरि' यहाँ 'कृष्ण' और 'सिंह' अर्थोंमें है, अतः श्लेष है। कृष्णको रविके समान उग्र (प्रचण्ड) बतानेसे उपमा है। रिपुकी समानता 'अवि' (मेष) से बताई है। इसलिये भी उपमा है। जिसके ध्वजमें विद्यमान पक्षीके रवसे भौम जैसेकी हालत पतली हो गई है, उस कृष्णकी शत्रुभयङ्करताका तो कहना ही क्या है ! यहाँ सजातीय वर्णसमुदाय 'रवे' की आवृत्ति चारों पादोंके आदिमें और अन्तमें व्यपेत रूपसे तथा पूर्व पादके अन्त और अगले पादके आदिमें अव्यपेत रूपसे हुई है। इस द्विपाद अन्तादि यमकके वैचित्र्यके कारण यह यमक और हृदयग्राही बन गया है। अवेजि—√विज् + णिच् से करण रवके कर्तृत्वकी विवक्षामें वेजन क्रियाके कर्म भौमके निमित्तसे लुङ्, प्र० ए० व०। यह धातु भय और चलन १. अन्वयः—अतुलास्त्रगौरवे भैरवे संयति भौमो हरेः ध्वज-वर्ति-वीर-वेः रवेण अवेजि। रवेरिवोग्रस्य अस्य पुरो रिपुं हरेः पुरः अवेः तुल्यम् अवेत। २. भूमिपुत्र नरकासुर प्राग्ज्योतिषपुरका स्वामी था। गरुडवाहन श्रीकृष्ण द्वारा इसके वधके वर्णनके लिये हरिवंशपुराण २।६३ तथा श्रीमद्भागवत पुराण १०।५६ देखें।
५८ काव्यादर्श [३।४८ १०. मयामयालम्ब्ध'-कलामयाम-यामयामयातव्यविरामयामया । मयामयार्तिं निशयाम, यामयामयामसूं करुणामयामया२ ॥ ४८ ॥ १०. मानरहित (अत्यन्त दीर्घ) यामों (प्रहरों) वाली, नियन्त्रित करने वाली निशासे मरणान्तक आमय (प्रेमरोग) की पीडाको प्राप्त हुआ हूँ । हे जाने योग्य स्थानोंमें विराम (निषेध) से रहित, करुणामय (मेरे मित्र), आमय (रोग) को प्राप्त मुझसे क्षय और उसके विपरीत (वृद्धि) के द्वारा आलम्बन किये जाने वाले कलानिधि (चन्द्र) से आमय (कष्ट) पाने वाली उस (प्रिया) को मिला दे ॥ ४८ ॥ अर्थोंमें तुदादि और रुधादि गणोंमें है ।४ अवेत — अव + √ इ (गतौ) कर्तरि लोट्, परस्मैपद, मध्यम, बहु० वचन । हरेः पुरः — पुरस्, पुरतस् आदि 'अतस्' प्रत्ययार्थक प्रत्ययोंसे निष्पन्न शब्दोंके योगमें (युक्त शब्दमें) षष्ठी होती है । अवेः तुल्यम् — तुल्यार्थक पदोंके योगमें उपमानमें तृतीया या षष्ठीका विकल्प है ।५ अतः 'हरेः' में षष्ठी है ॥ ४७ ॥ १०. (३. घ.) पादाद्यन्त तथा अन्तादि चतुष्पाद अव्यपेत-व्यपेत सजातीय यमक — अत्यन्त दुष्कर इस रचनामें कविने क्या कहना चाहा है, यह निश्चित रूपसे तो वही जानते हैं । व्याख्याताओंने अपने-अपने अभिप्रायसे व्याकरणकी लाठीसे इसे हाँककर जो चाहा है, वह कहलाया है । ऊपर किया अनुवाद भी इसी दिशामें एक कदम है : न मा-मानं येषां ते अमाः इयत्ता-रहिताः, तादृशाः यामाः प्रहरा यस्याः, तया अम-यामया; यमनं यामः, सोऽस्त्यस्या इति यामा, तया यामया, निशया रात्र्या; मिनोति हिनस्ति इति मयः मरणकारीति यावत्, स चासौ आमयो रोगः प्रेमाधिरूपो मयामग्रः, तस्य अर्तिः पीडा, तां मयामयार्तिम् प्राणान्तकारिप्रेमरोगपीडामित्यर्थः; अयाम् प्रयातोऽहम् । अस्यां १. तरुण० : लङ्घ्य । वादीजीने 'लङ्घ्य', 'लम्ब्य' में विकल्प बताया है । रत्नश्रीमें 'लम्ब्य' ही धृत और व्याख्यात है । २. वादीटीकामें 'मयाम्' व्याख्यात है । ३. अन्वयः — अम-यामया यामया निशया मयामयार्तिम् अयाम् । अ-यातव्य- विराम, करुणामय, आम-या मया मयामयालम्ब्य-कला-मया-मयाम् अमूम् आमय । ४. ओविजी भयचलनयोः (तुदादि ६, रुधादि २०) । ५. अष्टाध्यायी २।३।३० : षष्ठ्यतसर्थप्रत्ययेन । ७२ : तुल्यार्थैरतुलोपमाभ्यां तृतीयाऽन्यतरस्याम् ।
३।४६] दुष्कर यमक ५६ ११. मतान्धुनानाऽरमतामकामतामताप-लब्धाग्रिमतानुलोमता । मतावयत्युत्तमता-विलोमतामताम्यतस्ते समता, न वामता१ ॥ ४६ ॥ ११. पूर्णतः आनन्दमग्न, अथवा रमते राम विरक्त पुरुषोंको प्रिय, निष्का- मताको पीछे छोड़ती हुई, उत्तमता (श्रेष्ठता) की विपरीतता अर्थात् श्रेष्ठत्व- विघातक वामताको नहीं प्राप्त करने वाली, अथवा नष्ट करने वाली, बिना क्लेशके प्राप्त श्रेष्ठताके अनुकूल स्वभाव वाली समता (सर्वत्र समभाव वाली दृष्टि) श्रेष्ठताके प्रतिकूल भावकी कामना नहीं करते हुए, अथवा ग्लानि-हर्ष आदि भावोंसे रहित, अथवा सांसारिक दुःखोंसे दुःखी न होते हुए तुम्हारी बुद्धिमें गतिशील है, वर्तमान है । वामता नहीं ।। ४६ ।। रजन्यां प्रियाविरहज्वालावलीढस्य मे प्राणा अवश्यं संशयमापन्ना इत्यर्थः । यातव्ये = प्रियां प्रति मच्छासन्देशार्थं गन्तव्ये कर्मणि विरामोऽवसानं 'न' इति निषेधो यस्य न, सोऽयातव्यविरामः तस्य सम्बुद्धौ अयातव्यविराम अवश्य- ङ्गामिन् हे मयि करुणामय मे सखे, 'अम रोगे' (चुरादिः), अमनम् आमो रुजा, तं यातीति आम-याः, तेन आम-या; मया तव सख्याऽनेन जनेन; मयः क्षयः, अमयो वृद्धिः, ताभ्याम् आलम्ब्यः आश्रयितव्यश्चासौ कलामयश्चन्द्रः आमयो रुजाकरो यस्याः सा मयामयालम्व्य-कलामयामया ताम् अमूम् मम प्रेयसीम् मद्विरहे समुद्दीपितकन्दर्पकष्टाम्, आमय गमय, सम्भजय । अम गत्या- दिषु (भ्वादिः), हेतुमण्णिच्, कर्तरि लोट्, मध्यम, ए० व० । यहाँ कविने सजातीय 'मया' वर्णसमुदायकी आवृत्ति समूचे श्लोकमें नियत स्थानपर कुल मिलाकर १६ बार की है । पादके आदि और अन्तमें अव्यवहित और व्यवहित रूपसे होनेके कारण यहाँ अव्यपेत-व्यपेतात्मक आद्यन्त चतुष्पाद यमक है । 'मयामया' सजातीय वर्णसमुदायकी आवृत्ति पादान्त और पादादिमें निरन्तर होनेसे चतुष्पाद अव्यपेत अन्तादि यमक भी है । तृतीय पादके अन्तमें 'याम'की अनुलोम और प्रतिलोम आवृत्ति भी है । इस प्रकार यह श्लोक विविध दृष्टियोंसे दुष्कर यमकोंसे सङ्कीर्ण है ।। ४८ ।। ११. (३. घ.) व्यपेत चतुष्पादादि-मध्यान्त तथा अव्यपेत चतुष्पादान्तादि सजातीय सङ्कीर्ण यमक—इस श्लोकमें कविने किसी पुरुषमें योगियोंसे भी १. अन्वयः— आ-रमतां मताम् अकामतां धुनाना, उत्तमता-विलोमतां धुनाना, अताप-लब्धाग्रिमताऽनुलोमता समता अताम्यतः—(क) अग्ला- यतः, (ख उत्तमताविलोमताम्) अकाङ्क्षतो वा—ते मतौ अयति । (आ- रमतां मताम् अकामतां धुनाना) वामता न (अयति) ।
६० काव्यादर्श [३।४६ अधिक सर्वत्रसमभाव दृष्टि बताई है । यहाँ ‘अताम्यतः’ पद ‘काङ्क्षा’ और ‘ग्लानि’ अर्थ वाली √तम्'से' शतृ, नञ् तत्पुरुषसे पुं०, षष्ठी ए०व०में निष्पन्न है । अतः इसका सम्बन्ध 'उत्तमता-विलोमताम्' से केवल 'काङ्क्षा' अर्थमें होगा । 'ग्लानि' अकर्मक क्रिया है । अतः इस अर्थमें यह स्वतन्त्र ही रहेगा । ग्लान्यर्थक यह पद समतासे अपेक्षित प्रतिद्वन्द्वी 'हर्ष' का भी उपलक्षक है । 'अताम्यतः' की ग्लान्यर्थतामें द्वितीयान्त पदका सम्बन्ध या तो निकटस्थ 'अ- यती' (अगच्छन्ती) से होगा, या 'धुनाना' से । यह अन्तर्हितण्यर्थक 'कम्पन' अर्थमें क्र्यादि गणमें पठित है : धूञ् कम्पने । इससे कर्तरि शानच्, स्त्री० प्रथमा ए० व० में 'धुनाना' निष्पन्न है । अयति—√इ (भ्वा०२) कर्तरि लट्, प्रथम ए० व० । यहाँ सजातीय वर्णसमुदाय 'मता' चारों पादोंके आदि, मध्य और अन्त में नियताक्षर सङ्ख्याके बाद आवृत्त है । अतः सजातीय चतुष्पादाद्यन्त व्यपेत त्रिस्थान यमक है । पादान्तमें पठित सजातीय 'मता' वर्णसमुदायकी आवृत्ति अगले पादके आदिमें बिना व्यवधानके होनेसे यहाँ सजातीय चतुष्पादान्तादि द्विस्थान यमक है । ये दोनों परस्पर सङ्कीर्ण हैं । सभी प्राचीन टीकाकारोंने यहाँ व्यपेत यमक माना है । पर अव्यपेत आवृत्तिका अपलाप करना अशक्य है । भोजराजने इस विशेषताको अन्य भेद व्यपेतका उच्छेद न करते हुए सूक्ष्म अव्यपेत भेद बताया है ।३ आचार्य दण्डीने भी ५१ वें श्लोकमें इन वैचित्र्य-प्रकारोंको 'उक्तान्तर्गत सन्दष्टयमक' कहा है । अतः ये विशेष उपेक्षणीय नहीं हैं । रत्नेश्वर मिश्रने इस श्लोकमें वृत्तका औचित्य बहुत महत्त्वपूर्ण बताया है४ ॥ ४६ ॥ १. आख्यातचन्द्रिका ३।३।१७४ : अथ ग्लानौ च ताम्यति ।। ११७ ।। काङ्क्षायामपि । २. सिद्धान्तकौमुदी, भ्वादि ६।२६-३१ : इट किट कटी गतौ ।...केचित्तु... अन्ते च '√इ + √ई' इति प्रश्लिष्य 'अयति, इयाय, इयतुः....' इत्या- युदाहरन्ति । भवतोषिणी, पृष्ठ ३३३ देखें । ३. सरस्वतीकण्ठाभरण २।१२६ (उदाहरण) : अन्यभेदानुच्छेदेन सूक्ष्मं यथा—'मतां धुनाना...न वामता ।।' अत्र 'व्यपेतानुच्छेदेनैव पादसन्धि- ष्वव्यपेतमुत्पद्यते' इत्यस्थान-यमकमिदं सूक्ष्मावृत्तेः 'सन्धिसूक्ष्माव्यपेतम्' उच्यते । ४. रत्नदर्पण २।१२६ : अत्रापि वृत्तौचिती सर्वस्वायते ।
३।५०] दुष्कर यमक ६१ १२. कालकालगलकालकालमुखकालकाल- कालकालपन कालकालघनकालकाल । कालकालसितकालका ललनिकालकाल- कालका लगतु कालकालकलिकालकाल² ।। ५० ।। १२. काले (नाग) के काल (परम शत्रु), गलेमें काल चिह्नसे युक्त (नीलकण्ठ), काल (वर्ष) के मुख (वर्षा) कालमें बोलने वाले, काली (शिखा) सिरपर धारण करने वाले (शिखी) मयूरोंके बोलनेके काल (वर्षा ऋतु) में काले मेघों वाला काल (वर्षा ऋतु) जिसके लिए मौत जैसा है, इस प्रकारके (तथा) कालोंमें काल (सब समयोंमें श्रेष्ठ ऋतुराज), कलियाँ और उनपर मँडराते भ्रमरोंका समूह जिसके लिये काल (अत्यन्त कष्टदायी) है, इस प्रकारके हे मित्र, कालक (लहसुनिया या तिलचिह्न) से सुशोभित मुखसे भूषित लाडली विलासिनी आ लगे (तुमसे संयुक्त हो) ।। ५० ।। १२. (३. घ.) आदि-मध्यान्तवर्ती चतुष्पाद अव्यपेत-व्यपेत सजातीय त्रिस्थानयमक—इस श्लोकमें कविने ख, घ, प, म, स का एकेक बार त, ग का दो बार और न का तीन बार प्रयोग करके शेष वर्णविन्यासमें क और ल वर्णोंका प्रयोग किया है। ये वर्ण भी प्रथम और तृतीय पादोंमें एकेक बार 'ल' को और चतुर्थ पादमें 'कलि' को छोड़कर समूचे श्लोकमें २४ बार 'काल' वर्णसमुदायके रूपमें अव्यवहित और नियत (दो-दो) वर्णोंके व्यवधान में आवृत्त हुए हैं। स्वर भी 'अ', 'आ', 'इ' और 'उ' ही आये हैं। इस प्रकार यह यमक अत्यन्त दुष्कर है। वामनोक्त अत्यधिक आवृत्तिके कारण दूषित यमकके उदाहरणके रूपमें त्रिपुरहर भूपालने यह श्लोक उचित ही उद्धृत किया है।³ १. रत्नश्री आदि तीनों टीकाओंमें यही पाठ धृत एवं व्याख्यात है। काम- धेनु ४।१।७ में उद्धृत इस श्लोकमें 'पन'की जगह 'घ' एवम् आगे 'घन'की जगह 'पन' पाठ है। २. अन्वयः—कालकाल-गलकाल-कालमुखकालकाल-कालकालपन-काल-काल घनकाल-काल, कालकाल-कलिकाऽऽल-काल, कालकालसित-कालका, आल-कालकालका ललनिकाऽऽलगतु । ३. आरूढं भूयसा यत्तु पदं यमकभूमिकाम् । दुष्येच्चेन्न, न पुनस्तस्य युक्ताऽनुप्रासकल्पना ।। काव्यालङ्कारसूत्रवृत्ति ४।१।७ में छठे श्लोकपर कामधेनु : यथा दण्डिनोक्तम्—'कालकाल...कलिकालकाल ।।' इति
६२ काव्यादर्श [३।५०] इतिहासविदोंके मतमें इस श्लोकमें आवृत्त कालकाल शब्द काव्यादर्श (२।२७७) में राजवर्मणः से सूचित राजसिंह, राजसुन्दरवर्मा और अत्यन्तक विरुदोंसे प्रसिद्ध काञ्चीपति पल्लवनरेश नरसिंहवर्मा द्वितीय (राज्यकाल ७००-७२८ ई०) का ही एक विरुद है।¹ दण्डीने अवन्तिसुन्दरी कथा में भी कालकालका यमक दिया है।² इस दृष्टिसे चतुर्थ पादके अन्तमें पठित कालकाल नरसिंहवर्माका विरुदसे सम्बोधन हो सकता है। कलिकालकाल पद 'कलि (युद्ध) में काल (स्वयं मृत्युका अथवा कालसदृश पराक्रमी शत्रु) का भी काल' अर्थमें विशेषण सम्बोधन हो सकता है। ललनिकासे ललनासे भी अधिक लाडली विजयश्री अभिप्रेत हो सकती है। वह वर्षाकालमें युद्ध न हो पानेके कारण राजाको न पानेसे दुःखी है। उसके बाद शीतकालमें प्रयाण अभियानके चलते भी विर- हिणी ही है। वसन्तके आते-आते कालकाल द्वारा शत्रुविनाश किये जानेपर विजयश्रीरूपी ललनिका (अत्यन्त चहेती ललना) आ लगे, तुम्हारे पास चली आए। इस प्रकार कवि द्वारा आशीः प्रकट की गई है। प्रायः सभी टीकाकारोंने इसकी व्याख्या विविध प्रकारसे की हैं। हमने भी उनमें एक और जोड़ दी है। तत्त्वं त्वस्य कविर्वेत्ति, कल्पनोल्लासिनो वयम्। युक्ताऽर्थाऽक्लिष्टकल्पा च व्याख्या सद्भिः प्रगृह्यताम् ॥ १ ॥ नेयत्ता कविभावानां, दारिद्र्यं तद्बुधेषु न। विविधैर्विविधं तस्मात् काव्यभिप्राय उच्यते ॥ २ ॥ ६५५३६ भेदों³ वाली षोडशाक्षर अष्टि वृत्तजातिके र, न, र, न, र गण और लघु अक्षरविन्यास वाले किसी छन्दका प्रयोग कविने इस श्लोकमें किया है। यति ६, ६, ४ पर अभीष्ट लगती है ॥ ५० ॥ १. डॉ० धर्मेन्द्रकुमार गुप्त काव्यादर्शः, भूमिका, पृष्ठ ३६; श्री नीलकण्ठ शास्त्री, ए हिस्ट्री आफ साउथ इण्डिया, पृष्ठ ४६० ! प्रसादिनी २।२७७; पृष्ठ २३७ भी देखें। २. पृष्ठ १११, पंक्ति २१ : प्रवृत्तकालकालरात्रिभुजलतायमानया...। ३. पञ्चषष्टिसहस्राणि, सहस्रार्धं च सङ्ख्यया ।। नाट्य० १४।६७, षट्त्रिंशच्चैव वृत्तानामष्टौ निगदितानि च । ६८
३५१] यमकके अन्य विशिष्ट भेद ६३ १. सन्दष्ट-यमक-स्थानमन्तादी पादयोर्द्वयोः । उक्तान्तर्गतमप्येतत् स्वातन्त्र्येणात्र कीर्त्यते ।। ५१ ।। (१) दो पादोंमें अन्त और आदि स्थान 'सन्दष्टयमक' का स्थान होता है। यह यद्यपि उक्त उदाहरणोंमें आ चुका है, तथापि यह स्वतन्त्रतासे बताया जा रहा है ।। ५१ ।। यमकके अन्य विशिष्ट भेद—(१) सन्दष्ट यमक : आदिमध्यादि सात स्थानोंके आधारपर अव्यपेत आदि त्रिविध यमकका प्रदर्शन ४२ उदाहरणोंमें करनेके बाद आचार्यने यमककी स्थानगत अन्य विच्छित्तियोंका निरूपण अगले प्रकरणमें किया है। भरतने इस प्रकारकी विच्छित्तियोंको उनके द्वारा लोकमें उपलब्ध आकारविशेष धारण कर लिये जानेके कारण उन आकारों वाले नाम दिये हैं : काञ्ची, समुद्ग, विक्रान्त, चक्रवाल, सन्दष्ट एवम् माला यमक ।¹ भरतका जो चक्रवाल यमक है, उसे ही दण्डीने सन्दष्ट यमक नामसे दिया है। यह संज्ञा 'सम् + √दंश् + क्त' से 'सन्धान' अर्थमें निष्पन्न अभीष्ट है : जहाँ एक पादका अन्त दूसरे पादके आदिसे आवृत्तिके द्वारा जुड़ा हो, वह 'संदंश' यमक होता है। इस प्रकार आवृत्ति अव्यवधानमें ही सम्भव है। यमकका यह स्वरूप भरतके 'चक्रवाल' यमकमें मिलता है।² भरतका 'सन्दष्ट'का स्वरूप स्पष्ट नहीं है : आदिमें दो पाद जहाँ अक्षरोंसे समान हों, वह सन्दष्ट बताया है ।³ परन्तु उदाहरणमें चारोंपादोंके आदिमें दो-दो पद समान हैं एवं द्वितीय पादके आदिके दो पदोंको छोड़कर शेष भागकी आवृत्ति चतुर्थ पादमें १. पादान्तयमकं चैव, काञ्चीयमकमेव च । समुद्गयमकं चैव विक्रान्तयमकं तथा ।। नाट्यशास्त्र १६।६३ यमकं चक्रवालं च, सन्दष्टयमकं तथा । पादादि-यमकं चैव, आम्रेडितमथापि च ।। ६४ चतुर्व्यवसितं चैव, मालायमकमेव च । एतद्दशविधं ज्ञेयं यमकं नाटकाश्रयम् ।। ६५ ।। २. पूर्वस्यान्तेन पादस्य परस्यादिर्यदा समः । चक्रवच् 'चक्रवालं' तद् विज्ञेयं नामतो, यथा ।। नाट्य० १६।७४ शैला यथा शत्रुभिराहता हता, हताश्च भूयोऽप्यनुपुङ्खगैः खगैः । खगैश्च सर्वेर्युधि संचिताश्चिताश्चिताधिरूढा निहताः फलैः फलैः ।। ७५ ३. आदौ द्वौ यत्र पादौ तु भवेतामक्षरैः समौ । 'सन्दष्टयमकं' नाम विज्ञेयं तद् बुधैर्यथा ।। नाट्यशास्त्र १६।७६
६४ काव्यादर्श [३।५१ हुई है ।' यदि यही सन्दष्ट यमक है, तो पादादियमक' क्या होगा ? तब इसमें अन्तर केवल चारों पादोंमें विजातीय (सन्दष्ट) और सजातीय (पादादि) शब्दाभ्यासका होगा, जो अवान्तर भेद है : यह मुख्य भेदका निमित्त नहीं हो सकता । अतः अन्तादि नियत स्थानमें अव्यपेत आवृत्तिके इस भेदको दण्डीने सँडसीके समान दोनों पादोंको पकड़नेके कारण 'सन्दंश' नाम दिया है । रुद्रट ने 'संदंश' और 'सन्दष्टक'को परस्पर भिन्न माना है : प्रथम पाद और तृतीय पादके आदिमें समान वर्ण होनेपर 'संदंश' है एवं द्वितीय पादकी आवृत्ति चौथे पादमें होनेपर 'सन्दष्टक' यमक होता है । रुद्रटकी सन्दष्टक की अवधारणा भरतपर आधारित है। उन्होंने भरतके निरूपणके अन्य भेदोंसे साङ्कर्यका परिहार करके उनके उदाहरणके द्वितीय और चतुर्थ पादोंमें शब्दाभ्यासके आधारपर अपना सन्दष्टक यमक बनाया । रुद्रटके (क) सन्दंश और (ख) सन्दष्टकमें आवृत्तिकी (क) प्रथम-तृतीयपादवर्तिता और (ख) द्वितीय-चतुर्थपादवर्तिता, अर्थात् (क) विषमपादवर्तिता और (ख) समपाद- वर्तिताके अतिरिक्त कोई अन्तर नहीं है । सँडसीके (क) पुच्छभागमें आवृत्ति होनेसे 'संदंश' और (ख) मुखभागमें आवृत्ति होनेसे सन्दष्टक' भेद रुद्रटने माना है । (ग) मध्यभाग - द्वितीय तृतीय पादों में आवृत्तिसे रुद्रटने 'गर्भ- यमक' माना है ।३ दण्डिप्रोक्त सन्दष्ट यमक पीछे ४६-५० श्लोकोंमें अव्यपेत-व्यपेत यमकके विभिन्न भेदोंमें नाना रूपोंमें आ चुका है। तद् यथा - ४६वें श्लोकके रत्नश्री- १. पश्य-पश्य रमणस्य मे गुणान् येन-येन वशगां करोति माम् । येन-येन दिनमेति दर्शनं, तेन-तेन वशगां करोति माम् ।। नाट्य० १६।७७ २. आदौ पादस्य यत्र स्यात् समावेशः समाक्षरः । 'पादादि-यमकं' नाम तद् विज्ञेयं बुधैर्यथा ।। नाट्य० १६।७८ विष्णुः सृजति भूतानि, विष्णुः संहरते प्रजाः । विष्णुप्रसूतं त्रैलोक्यं, विष्णुर्लोकादिदैवतम् ॥ ७६ ३. (क) सन्नारीभरणोमायमाराध्य विधुशेखरम् । सन्नारीभरणोमायस्ततस्त्वं पृथिवीं जय ।। काव्याल० ३।५६ : (ख) इदं च येन स्वयमात्मभोग्यतां समस्तकाञ्चीकमनीयताकुलम् । नितम्बबिम्बं कथमस्तु नो नृणां स समस्तकाञ्चीकमनीयताकुलम् ।। (ग) यो राज्यमासाद्य भवत्यचिन्तः समुद्रतारम्भरतः सदैव । समुद्रतारं भरतः स दैव प्रमाणमारभ्य पयस्युदास्ते ॥ ८
३।५२] १. यमकके विशिष्ट भेद : (१) सन्दष्ट ६५ उपोढरागाऽप्यबला मदेन सा मदेनसा मन्युरसेन योजिता । न योजिताऽऽत्मानमनङ्गतापिताऽङ्गतापि तापाय ममास नेयते ॥५२॥ (यौवनके अथवा मदिराके) मदके कारण बढ़े हुए प्रेमभाव वाली भी वह अबला मेरे अपराधके द्वारा क्रोधके रससे युक्त कर दी गई है । कामदेव के द्वारा तपाये हुए अङ्गोंसे युक्तता वाली होते हुए भी वह अपने आपको (मुझसे) युक्त नहीं कर रही (मानके कारण मुझसे दूर-दूर रह रही) है । मुझे परे करने वाली (रूठी हुई वह प्रिया) मुझे इतना कष्ट देने वाली हो गई है ॥ ५२ ॥ सम्मत पाठमें प्रथम-द्वितीय, तृतीय-चतुर्थ पादोंके बहुवर्णवृत्तिसे सन्धानके रूपमें है । ४७वेंमें चारों पादोंके द्विवर्णवृत्तिसे सन्धानके रूपमें है । ४८वें श्लोकमें चारों पादोंके बहुवर्णवृत्तिसे सन्धानके कारण सन्दष्ट यमक है । ४६वें में आदि-मध्यान्त व्यपेत यमकके साथ चतुष्पादान्तादिके द्विवर्णवृत्तिसे सन्धानके कारण है, तो ५०वेंमें इसी प्रकारके यमकके बहुवर्णवृत्तिसे सन्धानके कारण अव्यपेत सन्दष्ट यमक है । महाराज भोजने दण्डीके इस प्रकारके यमकोंके आधारपर अन्य भेदोंके अनुच्छेद और उच्छेदसे सूक्ष्म, स्थूल भेदोंकी कल्पना की है¹ ॥ ५१ ॥ उदाहरण — ५२वें श्लोकमें प्रदत्त सन्दष्ट यमकके इस उदाहरणमें आचार्यने अन्य स्त्रीके सम्भोगचिह्न आदिसे युक्त होनेके कारण नायिकाके प्रति अपराधी किसी नायककी मानवती नायिकाके मानके कारण होने वाले कष्टका वर्णन किया है । मन्यु-रसेन—मन्यु (क्रोध) रौद्ररस नहीं है, उसका स्थायी भाव है । तथापि शृङ्गाराङ्ग क्रोध अन्य क्रोधोंसे भिन्न है । वह नायकको प्रियाकी अन्य ही शोभाका दर्शक होनेके कारण आनन्ददायी है । इसलिये इसका रसत्व औपचारिक है ।² नायिकाके मानके कारण नायकके तापका आधिक्य प्रेमकी अधिकता सूचित करनेके कारण मन्युकी रसताका पोषक है । १. सरस्वतीकण्ठाभरण २।१२६-१३१ देखें । २. वादी जी ने इसे भिन्न प्रकारसे कहा है : यद्यपि क्रोधो रौद्ररसस्य स्थायिभावो, न रसः, तथाऽप्यभेदोपचारात् कार्यकारणयोः कथञ्चि- देकत्वपरिणामात् क्रोधोऽपि रस एवेति मन्युरसस्य क्रोधव्याख्याने न दोषः ।