खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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परिच्छेद ] भेद-संसर्गाभाव का भेद-खण्डन १३६ एतेन विलक्षण एवायमभावो भावसहासनाननुवेशी य एवकारसमभिव्या- हारेणोच्यत इति निरस्तम् । तस्यापि वैलक्षण्यं प्रतियोग्याश्रयनिषेधतासाम्येऽपि सामानाधिकरण्यविरहादुन्नेयम्, तच्च तुल्यमभावान्तरेण । सामानाधिकरण्याभावप्रत्ययेनेति चेन्न । प्रत्ययविशेषकस्यार्थस्य स्मृतावपि भावात् । 'अन्योन्याभावव्यतिरिक्तः स्मृतित्वाभावः' इत्युक्तौ च स्मृतिव्यति- रिक्तपक्षोक्त एव दोषः । तदाऽऽस्तां विस्तरः । नापि स्मृतित्वप्रतियोगिकमाश्रयस्य स्वरूपं तद्धीर्वेति पक्षः, अन्योन्याभावेऽपि भवतामभावव्यवस्थायास्तादृशत्वेन उक्तप्रसङ्गस्य समानत्वात् । समर्थन—भाव के साथ एक अधिकरण में न रहनेवाला तथा अन्योन्याभाव से विलक्षण ही यह अत्यन्ताभाव है, जो एवार्थक ‘ही’ शब्द की सन्निधि में प्रतीत होता है । अर्थात् ‘जहाँ स्मृति का अभाव ही हो’ इस वाक्य का यह अर्थ हुआ कि जहाँ स्मृतित्व का अत्यन्ताभाव हो । अतः अन्योन्याभाव का ग्रहणकर स्मृति में अतिव्याप्ति नहीं है । खण्डन—अत्यन्ताभाव का अन्योन्याभाव के साथ प्रतियोगिकृत, अधिकरणकृत या स्वरूप- कृत वैलक्षण्य तो है नहीं । फिर यदि केवल प्रतियोगी के साथ असामानाधिकरण्य होने से ही वैलक्षण्य का अनुमान करें, तो वह हो नहीं सकता; क्योंकि अन्योन्याभाव में भी उक्त रीति से असामानाधिकरण्य दिखाया जा चुका है । अर्थात् ‘भावसामानाधिकरण्यं न अन्योन्याभावः’ इस प्रतीति से सिद्ध अन्योन्याभावरूप असामानाधिकरण्य अन्योन्याभाव में भी है। अतः असामानाधिकरण्यमात्र से अभावों में वैलक्षण्य का ज्ञान नहीं हो सकता । समर्थन—अत्यन्ताभाव में प्रतियोगी के साथ असामानाधिकरण्य की प्रतीति होती है, अतः उक्त प्रतीति से ही वैलक्षण्य की अनुमिति क्यों न हो ? खण्डन—‘असामानाधि- करण्य’रूप विषय के वैलक्षण्य से ही उक्त प्रतीति में वैलक्षण्य है और वह असामाना- धिकरण्य अन्योन्याभाव में भी है। अतः प्रतीति से भी दोनों अभावों में भेद न होने से अन्योन्याभाव का ग्रहणकर स्मृति में अतिव्याप्ति तदवस्थ ही है । समर्थन—‘जिस ज्ञान में अन्योन्याभाव से भिन्न स्मृतित्वाभाव रहता हो, वह ज्ञान अनुभूति है’, ऐसा लक्षण करेंगे, तो अन्योन्याभाव का ग्रहणकर स्मृति में अतिव्याप्ति नहीं होगी । खण्डन—जबतक दोनों अभावों का भेद सिद्ध न हो, तबतक ऐसा लक्षण करने से कुछ लाभ नहीं । किञ्च—यदि ‘यत्किञ्चित् अन्योन्याभाव से भिन्न’ कहें, तो एक अन्योन्याभाव से भिन्न दूसरा अन्योन्याभाव है, अतः उसे ही ग्रहणकर अतिव्याप्ति हो जायगी। यदि ‘सभी अन्योन्याभावों का भेद’ निवेश करें, तो अन्योन्याभाव लेकर दोष तो होगा नहीं, किन्तु हम लोगों को सभी अन्योन्याभावों का ज्ञान न होने से लक्षण ही असिद्ध हो जायगा, कारण सामान्यलक्षणा का तो पहले ही खण्डन हो चुका है । अतः
१४० सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [प्रथम अथान्यदेव किञ्चित्संसर्गाभावनिर्वचनं क्रियते । तथा हि—स्मृतित्वस्य यत्र संसर्गितया निषेधस्तत्र तदभावस्य संसर्गाभावत्वम् । यत्र तु तदात्मत्वेन, तत्र तद- भावस्य न संसर्गाभावता, किन्तु अन्योन्याभावत्वमेव । स च इह न विवक्षितः , पूर्व एव तु संसर्गाभावो विवक्षित इति । नैतद्विचारसहम् । ‘संसर्गितया निषेधः' इति येयं तृतीया सा लक्षणे वा, सहियोगे वा, कारकभेदे वा करणादौ ? नाद्यः ; संसर्गितया लक्षितस्यैवान्योन्या- भावमादाय प्रसङ्गात् । नापि द्वितीयः ; तत्सहितस्यैवान्योन्यनिषेधस्य प्रत्याख्यातु- मशक्यत्वात् । तृतीयस्तु न सम्भवति ; अत्यन्तनिषेधस्यानुत्पत्तिधर्मकत्वात्, तस्य च प्रकृतोदाहरणत्वात् । प्रकारवाचिनीयं तृतीयेति चेन्न । प्रकारशब्दार्थस्याधिकस्य निर्वक्तव्यत्वापातात् । निखिल अन्योन्याभावों की प्रमिति में अब कोई प्रमाण है ही नहीं । तस्मात् विस्तार से कोई इष्टसिद्धि नहीं, इसलिए अब अधिक विस्तार न किया जाय । समर्थन—जिस अधिकरण में स्मृतित्व के अभाव का ज्ञान होता हो, उस अधि- करण का स्वरूप या ज्ञान ही स्मृतित्वाभाव है। वह अनुभूति में ही है, स्मृति में नहीं; अतः अतिव्याप्ति नहीं है । खंडन—तब तो आप स्मृतित्व के अन्योन्याभाव को भी स्मृतित्व का अभेदज्ञान जिस आश्रय में हो, उस आश्रय का स्वरूप या ज्ञान-स्वरूप ही मानेंगे । अतः इन पक्षों में भी स्मृति में अतिव्याप्ति वैसी ही बनी हुई है । समर्थन—हम संसर्गाभाव का अलग ही निर्वचन करेंगे । सुनिये—जहाँ स्मृतित्व का संसर्गितया निषेध हो, वहाँ स्मृतित्व का संसर्गाभाव है । जहाँ स्मृतित्व का तादात्म्येन निषेध हो, वहाँ स्मृतित्व का संसर्गाभाव नहीं, किन्तु अन्योन्याभाव ही है । उक्त लक्षण में अन्योन्याभाव नहीं, संसर्गाभाव ही विवक्षित है । अतः स्मृति में अति- व्याप्ति नहीं है । खंडन—'संसर्गितया निषेधः' इस पद में तृतीया-विभक्ति का क्या अर्थ है--लक्षण, सहयोग, करण या प्रकार ? इनमें प्रथम और द्वितीय पक्ष उचित नहीं हैं, क्योंकि संस- र्गिता से उपलक्षित या संसर्गिता के साहित्य से युक्त स्मृतित्व के अन्योन्याभाव को ग्रहण- कर पूर्ववत् अतिव्याप्ति हो जायगी । तृतीय कल्प भी युक्त नहीं है; क्योंकि अत्यन्ताभाव के नित्य होने से संसर्गिता उसका करण (कारक) नहीं हो सकता । चतुर्थ पक्ष भी उचित नहीं है; क्योंकि यदि संसर्गिता ही प्रकार है, तो उससे युक्त स्मृतित्व का अन्योन्याभाव ग्रहणकर स्मृति में ही अतिव्याप्ति है । यदि संसर्गिता से अन्य कोई प्रकार हो, तो उसका निर्वचन (लक्षण) कीजिये ।
परिच्छेद ] स्मृति-लक्षण-का खण्डन १४१ प्रकारः प्रकार एवेति चेन्न । अविदितलक्ष्यस्य लक्षणमनभिधाय इतरव्य- वच्छेदेन तस्य दर्शयितुमशक्यत्वात् । अन्यथा सर्वत्र प्रष्टारं प्रति लक्षणानभिधा- नापातात् । ‘को घटः’ इत्यादिपृष्टे ‘घट एव घटः’ इत्याद्येवोत्तरं सङ्गच्छेत । ‘प्रकार एवेति पक्षो नोपपन्नः, सदोषत्वादिति वक्ता ‘को दोषः’ इत्यनुयुक्तः ‘दोष एव दोषः’ इत्यभिधायैव च निर्वृतो भवेदिति । स्मृति-लक्षण खण्डनम् स्मृतित्ववत् ‘स्मृतेर्लक्षणान्तरेण रहितत्वमनुभूतित्वमिति प्रत्युक्तं वेदितव्यम् । ‘गृहीतस्य हि ज्ञानं स्मृतिरिति च स्मृतिलक्षणे धारावाहिकज्ञानेऽतिप्रसक्तिः । समर्थन—‘प्रकार’ शब्द का अर्थ प्रसिद्ध है, अतः उसके निर्वचन की आवश्यकता ही नहीं। किन्तु प्रकार ही प्रकार है। खंडन—जो लोग प्रकाररूप लक्ष्य को ही नहीं जानते, उन्हें आप बिना लक्षण किये इतरव्यावृत्तरूप लक्ष्य का स्वरूप ही दिखा नहीं सकते। यदि आप लक्षण न करके भी लक्ष्य को इतर-व्यावृत्त रूप से दिखा सकें, तो प्रष्टा के बोध के लिए सर्वत्र लक्षण करना व्यर्थ ही हो जायगा । किञ्च—यदि कोई प्रश्न करे कि ‘घट क्या है’, तो इस पर ‘घट एवं घटः’ यह उत्तर ही पूर्ण सङ्गत हो जायगा । किञ्च—‘प्रकार-पक्ष युक्त नहीं है, सदोष होने से’ यह कहनेवाला ‘क्या दोष है’ यह पूछे जाने पर ‘दोष ही ‘दोष है’ यह कहकर ही विजय प्राप्तकर प्रसन्न हो जायगा । स्मृति-लक्षण का खण्डन इसी तरह यदि आप ‘स्मृतिलक्षणरहितत्वे सति ज्ञानत्वमनुभूतित्वम्’ यह अनुभूति का लक्षण करें, तो वह भी नहीं हो सकता । कारण जैसे ऊपर ‘स्मृतिरहितत्वे सति ज्ञानत्वम्’ इस लक्षण में स्मृतित्व का अन्योन्याभाव लेकर स्मृति में अतिव्याप्ति दी गयी है, वैसे ही यहाँ भी स्मृति-लक्षण का अन्योन्याभाव लेकर स्मृति में ही अतिव्याप्ति हो जायगी। किञ्च—स्मृति का लक्षण न होने से ‘स्मृतिलक्षणरहितत्वे सति ज्ञानत्वमनुभूतित्वम्’ यह लक्षण भी अयुक्त है। निर्वचन-कर्ता—गृहीत (ज्ञात) का ज्ञान ही स्मृति है। खंडन—ऐसा लक्षण करने पर धारावाहिक ज्ञान में पूर्व-पूर्व ज्ञान से गृहीत विषय उत्तर-उत्तर ज्ञान का विषय होने से उत्तरज्ञान में अतिव्याप्ति हो जायगी।
१४२ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम सापेक्षज्ञानं स्मृतिः, सापेक्षता च स्वविषयनियमे समानविषयज्ञानापेक्षतेति चेन्न । प्रत्यभिज्ञायास्तत्ताभागस्य स्मृतित्वापत्तेः । एवमस्त्विति चेन्न । तर्हि प्रत्य- भिज्ञायां स्मृत्यनुभवभागयोर्भिन्नविषयत्वव्यवस्थितौ तद्भेदः केन गृह्येतेति पूर्व- दोष आवर्तते । संस्कारमात्रजं ज्ञानं स्मृतिरित्यपि न । सामग्रीतः सर्वसम्भवेन लक्षणस्यास- म्भवात् । असाधारणतद्धेतुकधीत्वमिति चेन्न । आत्मप्रत्यभिज्ञानेऽप्यापत्तेः, आत्म- मनोयोगस्य साधारण्यात् । निर्वचन—'स्वविषय के नियम में समानविषयक ज्ञान की अपेक्षा रखनेवाले ज्ञान' को स्मृति कहेंगे। खण्डन—ऐसा लक्षण करने पर 'तद् एव इदम्' इस प्रत्यभिज्ञा में तत्तांश में अतिव्याप्ति हो जायगी; क्योंकि प्रत्यभिज्ञा भी तत्तांश में समानविषयक अनुभव की अपेक्षा करती है । यदि प्रत्यभिज्ञा को तत्तांश में स्मृति मान लें, तो पूर्वदोष की ही आवृत्ति हो जायगी, अर्थात् 'प्रत्यभिज्ञा को 'तत्ता'-अंश में स्मृति और 'इदम्' अंश में अनुभवरूप भिन्न-भिन्न विषयक मान लेने पर उन दोनों का अभेद रूप अंश किससे गृहीत होगा ? निर्वचन—केवल संस्कारजन्य ज्ञान को ही स्मृति कहेंगे । खंडन—सभी कार्य कारणसामग्री से ही उत्पन्न होते हैं, कोई भी कार्य एक कारण से उत्पन्न नहीं होता । अतः स्मृति भी केवल संस्कार से जन्य न होने से उक्त लक्षण में असम्भव हो जायगा । स्मृति में भी आत्म-मनोयोग आदि अनेक कारण हुआ ही करते हैं । निर्वचन—'संस्कार है असाधारण कारण जिसका, वह ज्ञान स्मृति है' ऐसा लक्षण करेंगे । खण्डन—'सोऽहम्' इस आत्मविषयक प्रत्यभिज्ञा का भी संस्कार ही असाधारण कारण है, अतः प्रत्यभिज्ञा में उक्त लक्षण की अतिव्याप्ति हो जायगी । आत्म-मनःसंयोग ज्ञानमात्र के प्रति कारण होने से वह प्रत्यभिज्ञा का असाधारण कारण नहीं हो सकता । यदि कहें कि संस्कार भी स्मृति का कारण होने से प्रत्यभिज्ञा का असाधारण कारण नहीं है, तो हम भी कह सकेंगे कि संस्कार प्रत्यभिज्ञा का कारण होने से स्मृति का भी असाधारण कारण नहीं है । फलतः लक्षण में असम्भव दोष हो जायगा ।
परिच्छेद ] स्मृति-लक्षण का खंडन १४३ कार्यैक्यानवधारणे च कारणत्वानवधारणात् । तदैक्ये च तदेव लक्षणं स्यात् । येन ज्ञानेनार्थो ज्ञाततात्मकः क्रियते, तदनुभवः । येन तु ज्ञानमेव तथा, तत् स्मरणमिति चेन्न । ज्ञातो ज्ञास्यते चेत्यनुमानादावव्याप्तेः । ततश्च विषयतः स्मृतिविवेचनमन्ततो वाक्येनाप्यनुभाव्यत्वात् कार्यकारणाभ्यां चानुगतरूपस्य प्रागसिद्धेः, जातितश्च सङ्करप्रसङ्गादशक्यमिति । किञ्च—'स्मृतिं प्रति संस्कारः कारणम्' इस कार्य-कारणभाव की सिद्धि के बिना उक्त लक्षण संभव नहीं और उक्त कार्यकारणभाव कार्यता के अवच्छेदक स्मृतित्वजाति की सिद्धि के बिना हो नहीं सकता, कारण प्रत्यभिज्ञा में अनुभवत्व के साथ साङ्कर्य होने से स्मृतित्वजाति अद्यावधि सिद्ध ही नहीं हुई है। कथञ्चित् सिद्ध भी हो जाय, तो लाघव या पूर्व उपस्थित होने से स्मृतित्व ही लक्षण होगा, ‘संस्कारासाधारणकारणकत्व’रूप लक्षण में कोई प्रमाण नहीं है । निर्वचन—'जिस ज्ञान से अर्थ ( विषय ) ज्ञाततारूप धर्म से युक्त किया जाय, वह ज्ञान अनुभूति है' और 'जिसमें ज्ञाततायुक्त ही ज्ञाततायुक्त किया जाय, वह स्मृति है' ऐसे लक्षण करेंगे । खंडन—तब तो ज्ञात ( अतीत ) और ज्ञास्यमान ( अनागत ) विषय की अनुमिति के स्थल में ज्ञातता की उत्पत्ति ही नहीं होगी; क्योंकि वहां विषयरूप अधिकरण उस काल में नहीं है । एवञ्च उक्त लक्षण भूत-भविष्यत् स्थल में न जाने से वहां अव्याप्ति हो जायगी। किञ्च--वर्तमान विषयस्थल में अनुमिति में स्मृतिलक्षण की अतिव्याप्ति भी हो जायगी, क्योंकि अनुमिति ज्ञात को ही विषय करती है, अतः वह ज्ञातताविशिष्ट ही है । तस्मात् ‘ज्ञातो घटः’ इस अनुव्यवसाय-स्थल में ज्ञानसम्बन्ध भासता है, ज्ञाततारूप अपूर्व धर्म नहीं । अन्यथा यदि ज्ञान-स्थल में ज्ञातता की उत्पत्ति मानें, तो तुल्ययुक्ति से इच्छा और कृति में इष्टता और कृतता भी माननी पड़ेगी; पर वैसा न मानते । यद्यपि 'गृहीतविषयकं ज्ञानं स्मृतिः' यह वाक्य लक्षण को प्रतिपादन करता है, तथापि लक्षणघटकतया गृहीत अर्थ को भी प्रतिपादन करता ही है। अतः उस अंश में गृहीतविषयक होने से लक्षणवाक्यजन्य बोध में स्मृतिलक्षण की अतिव्याप्ति होगी, विषयकृत तथा अनुगत स्मृतित्वादिरूप के सिद्ध होने से कार्यकारणभावकृत और साङ्कर्य होने से जातिकृत स्मृति का भी निर्वचन सम्भव नहीं ।
१४४ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम अनुभवत्व-विशेष-खण्डनम् नापि चतुर्थः ; यतः कार्यगतवैलक्षण्यानवगमे क्व कारणता क्वासाधारण्यं वा ज्ञेयमिति । तत्त्वानुभवत्व-खण्डनम् न केवलं प्रत्येकं पदार्थस्य तद्व्यवच्छेदकत्वस्य चानुपपत्तिः, मिलितेऽप्यस्मिन् लक्षणे दूषणमुच्यते । तथा हि-'तत्त्वानुभूतिः प्रमे'त्यनेन काकतालीयमपि यथार्थ- ज्ञानं व्याप्यते । तद्यथा—पाणौ पञ्च वराटिकान् विधाय कश्चित् पृच्छति 'कति वराटकाः' इति । पृष्टश्च अजाकृपाणीयन्यायेन ब्रवीति 'पञ्चेति' । ततश्च 'पञ्चे'ति ज्ञान- मस्ति वक्तुः श्रोतुश्च । दृश्यन्ते तावदेवंविधान्युदाहरणानि । तच्च ज्ञानं न तत्त्व- पदेन व्यवच्छेत्तुं शक्यम् । वस्तुतस्तस्य पञ्चमसङ्ख्यावाच्छिन्नत्वेन अतथाभूतत्वा- भावात् । नाप्यनुभवशब्दव्यवच्छेद्यम्, अननुभूतचरत्वेन स्मरणलक्षणापेक्षणात् । अनुभवत्व-विशेष का खण्डन 'जिन ज्ञानों के असाधारण कारण कार्य से अव्यवहित प्राक्क्षण में उत्पन्न होते हों, वे ज्ञान अनुभूति हैं' यह चतुर्थ विकल्प भी युक्त नहीं है; क्योंकि जबतक कार्य- गत किसी धर्म का ज्ञान न हो, तबतक किसके प्रति कारणत्व या असाधारणत्व का ग्रहण होगा ? इनके ग्रहण के बिना यह लक्षण हो ही नहीं सकता । तत्त्वानुभवत्व का खण्डन समुदायलक्षण का खंडन—किञ्च, केवल एक एक तत्त्व-पदार्थ और अनुभूति- पदार्थ की ही अनुपपत्ति तथा व्यवच्छेदकता का अभाव नहीं है। किन्तु समुदायलक्षण में भी दूषण है। सुनिये—'तत्त्वानुभूतिः प्रमा' इस लक्षण से काकतालीय ( अतर्कित ) भी यथार्थ ज्ञान व्याप्त होते हैं। जैसे कोई मनुष्य हाथ में पांच कौड़ियाँ छिपाकर किसी से पूछता है कि कितनी कौड़ियाँ हैं। वह काकतालीय न्याय से ही अकस्मात् उत्तर देता है, कि 'पांच' । ऐसे स्थल में वक्ता और श्रोता दोनों को पञ्च- वराटक का ज्ञान होता है । ऐसे अनेक उदाहरण देखने में आते हैं। किन्तु उन ज्ञानों की तत्त्वपद से व्यावृत्ति नहीं हो सकती; क्योंकि वस्तुतः पञ्चत्वसंख्या से युक्त होने से वराटक भी तत्त्व ही हैं। अनुभूति पद से भी उसकी व्यावृत्ति नहीं हो सकती; क्योंकि पञ्चवराटक के पूर्वकाल में अनुभूत न होने से उसका ज्ञान स्मरण नहीं है ।
[परिच्छेद ] तत्त्वानुभवत्व का खण्डन १४५ न च वक्तुः संशय एव, निश्चायकाभावात्; एकतरकोटिव्यवहारस्तु कृष्यादि- प्रवृत्तिवदिति युक्तम् । तत्राप्याहाररूपैककोटिनिश्चयास्थानात् ; अन्यथा संशयस्य कोटिद्वयनिश्चयसमुच्चयतापत्तेः । न च प्रमैव तदित्युरीकरणीयम् ; मध्येऽप्यक्षादिदुरन्तर्भावत्वात् । अव्यभिचारिकरणजन्यत्वे सतीति विशेषणीयमिति चेन्न । तत्त्वपदवैयर्थ्यापातात् । न च काकतालीयसंवादमपि ज्ञानं व्यभिचारिसाधारणकारणसामग्रीजन्यमास्थातु- मीशिषे; व्यभिचारिणोऽपि कारणविशेषात् यथार्थत्वप्रसङ्गात् । न ह्यहेतुकमेवास्य यथार्थत्वम्; नियमाभावेन अतिप्रसङ्गापातात् । अवश्य- मस्याव्यभिचारित्वे अव्यभिचारिनियतमेव करणं वक्तव्यम् । प्रश्न-- यहां वक्ता को सन्देहात्मक ही ज्ञान होता है, क्योंकि निश्चय की सामग्री ही नहीं है । किन्तु सन्देहात्मक ज्ञान होने पर भी कृषि में प्रवृत्त मनुष्य के तुल्य एक कोटि का व्यवहार हो सकता है। अर्थात् जैसे 'फलं भविष्यति न वा' ऐसा सन्देह होने पर भी कृषक 'अवश्य फल होगा' इसी एक कोटि का व्यवहार करते हैं, वैसे ही वराटक-स्थल में भी सन्देह होने पर एक कोटि का ही व्यवहार होगा । अतः अनुभूति पद से उक्त ज्ञान का व्यवच्छेद क्यों न होगा ? उत्तर--कृषिस्थल में 'सहकारी वृष्टि आदि होने पर फल अवश्य होगा' इत्याकारक ज्ञान होता है । यह उत्प्रेक्षारूप निश्चय ही है, सन्देह नहीं । यदि निश्चय की तरह सन्देह भी व्यवहार का जनक हो, तो उभयकोटिक सन्देह भी निश्चय ही हो जायगा । अथवा यदि एककोटिक उत्प्रेक्षा को निश्चय मानें, तो उभयकोटिक सन्देह भी निश्चय हो जायगा । प्रश्न--'पञ्च वराटकाः' यह ज्ञान प्रमा है, ऐसा क्यों न स्वीकार करें ? उत्तर --यदि उसे प्रमा मानेंगे, तो उसका प्रत्यक्ष आदि में अन्तर्भाव करना पड़ेगा, किन्तु वह हो नहीं सकता । प्रश्न--'तत्त्वानुभूतिः प्रमा' इस लक्षण में 'अव्यभिचारिकरणजन्यत्वे सति' यह निवेश करेंगे । एवञ्च 'पञ्च वराटकाः' यह ज्ञान प्रमा नहीं कहलायेगा । उत्तर --ऐसा निवेश करने पर 'तत्त्व'विशेषण व्यर्थ हो जायगा । किञ्च - काकतालीय यथार्थ ज्ञान को भी व्यभिचारी करण से जन्य मानें, तो शुक्ति में रजतज्ञान भी यथार्थ कहा जायगा । प्रश्न--'पञ्च वराटकाः' यह ज्ञान अहेतुक ही क्यों न माना जाय ? उत्तर - ज्ञान भावकार्य है, अतः वह अहेतुक नहीं हो सकता । फिर, ज्ञान की यथार्थता को भी निर्हेतुक नहीं कह सकते । कारण यदि यथार्थता को निर्हेतुक मानें, तो भ्रम में भी यथार्थता हो जायगी अथवा प्रमा भी अयथार्थ हो जायगी । यदि 'पञ्च वराटकाः' यह ज्ञान अव्यभिचारी है, तो उसका कारण भी निश्चय ही अव्यभिचारी होना चाहिए । १६
१४६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम किं तदिति चेत्; स्वात्मनैवात्र प्रश्ने दीयतामुत्तरं भवता, येन नियतेषु प्रमाराशिष्वेवेदं ज्ञानमन्तर्भाव्यम्, प्रमासामान्यलक्षणेन वा व्यवच्छेत्तव्यम् । एवं लिङ्गाभासादिभ्योऽपि जातं लिङ्गिज्ञानं दैवगत्या स्थितलिङ्गि लिङ्गिनि लिङ्गिन्यत्येव वा यत् स्यात्तत्तु यद्यपि लिङ्गाभासे न प्रमा, न वा तद्वति लिङ्गि- स्वरूपे; तथापि विशिष्टं तथाविधं गोचरयन्त्यास्तस्या बुद्धेर्लिङ्गान्तरवति केवले वा लिङ्गिनि वह्न्यादावप्यंशे विषये प्रामाण्यस्वीकारेण उक्तदोषापरिहारादिति । आभासकरणजत्वात्तद्विषयस्य वस्तुभूतात् लिङ्ग्यादेरन्यत्वमेवेति चेन्न । विशेषस्यान्यत्वेऽपि तज्जातीयमात्रवत्त्वावभासांशे दोषापरिहारात् । प्रश्न—वह कारण क्या है ? अर्थात् जब उसका प्रत्यक्ष ही नहीं होता, तो वह है ही नहीं । उत्तर—जब उसका कार्य यथार्थज्ञान है, तो कारण का अनुमान करना चाहिए । अनुपलब्धि से अभाव का निश्चय करना उचित नहीं है, क्योंकि अयोग्य में अनुपलब्धि से अभाव का निश्चय नहीं हो सकता । अथवा आप ही इस प्रश्न का उत्तर दीजिये, जिससे प्रत्यक्षादि स्वीकृत प्रमासमूह में इसका अन्तर्भाव हो या प्रमा के 'तत्त्वानुभूतिः प्रमा' इस सामान्यलक्षण से व्यावृत्ति हो सके । इसी तरह धूलिपटल में धूमभ्रम के बाद वह्निज्ञान दैववश हेतु-साध्ययुक्त या साध्ययुक्त अधिकरण में ही होता है । यद्यपि वह हेत्वाभास-अंश में प्रमा नहीं है और न हेत्वाभास से विशिष्ट साध्य-अंश में ही प्रमा है, तथापि सभी लोग हेतुविशिष्ट साध्य को विषय करनेवाली उस बुद्धि का अन्य हेतु से विशिष्ट साध्य-अंश में अथवा केवल वह्निरूप साध्य-अंश में प्रामाण्य का स्वीकार करते हैं। अतः वहाँ प्रमालक्षण की अति- व्याप्ति हो जायगी । समर्थन—'आभास-करण से जन्य ज्ञान का विषय वह्नि परमार्थ वह्नि से अन्य है, आभास-करणजन्य होने से, प्रत्यक्ष-भ्रम के विषयवत्' इस अनुमान से उक्त ज्ञान के अतत्त्वविषयक होने के कारण प्रमालक्षण की अतिव्याप्ति नहीं है। खंडन—यदि वह्नि- अंश में वह्नि का ज्ञान अन्यविषयक हो, तो वास्तविक धूम से जो वह्नि का ज्ञान होता है, वह भी अन्यविषयक क्यों न हो ? यदि किसी प्रकार अन्यविषयक मान भी लें, तो भी व्यक्ति-अंश में अन्यविषयक होने पर भी जाति-अंश में सत्त्व-विषयक होने से इस अंश में अतिव्याप्ति बनी ही रहेगी ।
परिच्छेद ] तत्त्वानुभवत्व का खण्डन १४७ सामान्यसम्बन्धकोटिनिविष्टत्वाद् विशेषस्य, तस्य च तत्रानवस्थितस्यैव स्फुरणान्नैक दोष इति चेन्न । विशेषाप्रतिभासे सामान्यतस्तन्मात्रवत्ताप्रतिभासस्यापि अभ्युपेयत्वात्, देवदत्तयज्ञदत्तसम्बन्धितासंशयेऽपि पुरुषसम्बन्धितानिश्चयवत् । सम्बन्धिविशेषस्य निर्लुठितविशेषरूपतया च प्रवेशे व्याप्यादेरननुगमप्रसङ्गात् । सामान्यानुमानाभासे च संवादिनि विशेषान्यवत्ताकल्पनानवकाशात् । सामान्यसमवाययोरप्यन्ययोरेव प्रतिभासे अन्यथाख्यातिं विहाय असत्ख्याति- प्रवेशापातात् । तत्रत्यधर्मान्तरस्य जात्या तादात्म्यारोपस्तत्रेति चेन्न । तथापि धर्मिणि जातौ च प्रमात्वतादवस्थ्यात्; संसर्गरोपनिमित्ताच्च तादात्म्यारोपानुपपत्तेः । प्रश्न—यदि धूलिपटल में ज्ञात धूम से जायमान अनुमिति में परमार्थ वह्नि नहीं भासता, तो सामान्य भी असत् ही भासता है; क्योंकि सामान्य के सम्बन्ध की एक कोटि में विशेष है और वह (विशेष) उक्त ज्ञान में असत् ही भासता है । फिर सामान्य सत् कैसे भासेगा ? उत्तर---विशेषरूप से व्यक्ति का भान न होने पर भी सामान्यरूप से व्यक्ति का भान स्वीकार किया जाता है । वह व्यक्ति सत् भासती है या असत्, यह आग्रह नहीं । यह भी निश्चय (नियम) नहीं कि व्यक्ति असत् भासे, तो सामान्य भी असत् ही भासे । केवल यही नियम है कि निर्विशेष सामान्य नहीं भासता, जैसे कि माला में देवदत्त-निर्मितत्व, यज्ञदत्त-निर्मितत्व के विशेषरूप से अज्ञात होने पर भी पुरुष-निर्मितत्व का ज्ञान होता है । यदि सामान्यमात्र-प्रकारक ज्ञान न हो, केवल विशेष- विषयक ही ज्ञान हो, तो व्याप्ति का अनुगम (ज्ञान) नहीं होगा । किञ्च, जहाँ गौ के गले में बद्ध पट में सास्ना-भ्रम के बाद 'अयं गौः सास्नावत्त्वात्' ऐसी गोत्वानुमिति होती है, वहाँ गोत्व-जाति के एक होने से 'अन्य ही गोत्व भासता है' यह कहा नहीं जा सकता । प्रश्न—यहाँ भी अन्यरूपमें सामान्य (गोत्व) या उसका समवाय ही भासता है, ऐसा क्यों न माना जाय ? उत्तर-गोत्व और समवाय अन्य हैं ही नहीं । अतः यदि उस अलीक अन्यपदार्थ का भी भान मानें, तो अन्यथाख्याति को त्याग असत्ख्याति का स्वीकार होगा, जो आपके लिए अपसिद्धान्त हो जायगा । प्रश्न—'अयं गौः' इस अनुमिति-स्थल में गोनिष्ठ रूपादि में गोत्व का तादात्म्य भासता है, ऐसा ही क्यों न मानें ? उत्तर-यदि ऐसा मान लें, तो भी उक्त अनुमिति तादात्म्यांश-मात्र में भ्रम होगी । धर्मी 'गौ' और जाति 'गोत्व' अंश में प्रमा ही है, अतः
:४८ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम परार्थानुमानाभासे हि प्रतिपादितपदार्थसंसर्गारोपकारणसम्भवात्; तथापि तत्र तादात्म्यारोपकल्पने च तथाभ्रमनियमस्य निष्प्रमाणकत्वात् । कस्यचित्तत्र जातसंवादजातिसंसर्गभ्रमस्य मितौ का गतिः, का वा गतिः सिद्धसाधने ? तत्राप्यन्यत्वकल्पनायां सिद्धत्वव्याघातात् । तथात्वे च हेत्वाभास- स्यापि यथार्थग्राहितया उक्तनिमित्तस्य व्यभिचारेणाप्यन्यत्राभासे अन्यप्रतिभास- कल्पनाया निर्मिमित्तत्वात्; सिद्धसाधनमितेरेव वा व्यवच्छेदात् । याथार्थ्य-खण्डनम् यथार्थानुभवः प्रमेत्यप्यलक्षणम् । यथार्थत्वं हि तत्त्वविषयत्वं वा अर्थसदृशत्वं उक्त अंश में अतिव्याप्ति हो जायगी । किञ्च--उक्त स्थल में जब कि वह सामग्री गौ में गोत्व-समवायरूप सम्बन्ध के आरोप का कारण है, तो तादात्म्य का आरोप कैसे होगा ? कथञ्चित् स्वार्थानुमान-स्थल में 'तादात्म्यारोप की सामग्री है' ऐसा मान भी लें, तो भी परार्थानुमितिस्थल में 'अयं गौः' इस प्रतिज्ञावाक्य से धर्मी तथा धर्म की उपस्थितिरूप संसर्गारोप की सामग्री होने पर वहाँ तादात्म्य का आरोप करें, तो 'कहीं तादात्म्य का आरोप होता है, कहीं संसर्ग का' यह नियम ही निष्प्रमाण हो जायगा । किञ्च-किसी मनुष्य को संसर्गारोप में 'गवि गोत्वसंसर्गमनुमिनोमि' इस अनुव्य- वसाय से जहाँ संवाद-यथार्थत्व का निश्चय हुआ हो, वहाँ क्या गति होगी ? अर्थात् वहाँ तादात्म्यारोप है, यह नहीं कह सकते । किञ्च-सिद्धसाधनस्थल में यथार्थ ही अनुमिति होती है, अतः वहाँ अतिव्याप्ति हो जायगी । यदि कहें कि सिद्धसाधनस्थल में अन्य ही साध्य भासता है, अतः उक्त स्थल में ज्ञान के अयथार्थ होने से अतिव्याप्ति नहीं है, तो असिद्ध होने से उसका साधन हो ही सकता है यह सिद्ध साधनस्थल है इस कथन में व्याघात हो जायगा। यदि उक्त स्थल में ज्ञान के यथार्थ होने से उसको प्रमालक्षण का लक्ष्य ही मान लें, तो सिद्धसाधन के तुल्य अन्य हेत्वाभास से भी प्रमारूप ज्ञान ही उत्पन्न होंगे । फिर धूलिपटल में धूमभ्रम के अनन्तर जात अनुमिति में जो आप अन्य अग्नि का भान मानते हैं, वह निमित्तरहित हो जायगा । यदि कथञ्चित् धूलिपटल में धूमिभ्रम- स्थल में अन्य वह्नि का भान मान लें, तो भी सिद्धसाधनस्थल में ज्ञान के यथार्थ होने से अतिव्याप्ति अवश्य हो जायगी । याथार्थ्य का खण्डन खण्डन-'यथार्थ अनुभव प्रमा है' प्रमा का यह लक्षण भी दोषरहित नहीं है।
परिच्छेद ] | याथार्थ्य का खण्डन | १४६
वा स्यात् ? नाद्यः ; पूर्वं निरस्तत्वात् । नापि द्वितीयः ; व्यभिचारिणोऽपि प्रमेयत्वा- दिना अर्थसादृश्येन प्रमात्वापातात् । ननु ज्ञानविषयीकृतेन रूपेण सादृश्यमिदं विवक्षितम् । न च प्रमेयत्वादि- रूपस्य व्यभिचारिण्यपि प्रकाशनसम्भवेन तथाप्यतिप्रसङ्ग इति वाच्यम् । प्रमेय- त्वाद्यंशे प्रकाशमाने विषयीभूतधर्मान्तरापेक्षया व्यभिचारिणोऽपि प्रमात्वाभ्युपगमा- दिति । नैतद्युक्तम्; प्रकाशमानेन रूपादिसमवायित्वेन रूपेण ज्ञानस्य अर्थसादृश्या- नभ्युपगमेऽपि तत्र तदीयप्रमात्वाङ्गीकारादिति । प्रकाशमानेन रूपेण विशेषणभावादर्थसादृश्यमनुभवस्य विवक्षितम् । अर्थस्य हि यथा समवायाद्रूपं विशेषणीभवति, तथा विषयभावाद् ज्ञानस्यापि तद्विशेषणं
कारण 'अर्थमनतिक्रम्य वर्तते इति यथार्थम्' इस व्युत्पत्ति से 'यथार्थ' शब्द का यदि 'अर्थविषयकत्व' अर्थ करें, तो 'अर्थ' और 'तत्त्व' पर्यायवाची शब्द ह ने से तत्त्वविषय- कत्व के पूर्वोक्त खण्डन से यह भी खण्डित ही है । 'अर्थस्य सादृश्यं यथार्थम्' इस व्युत्पत्ति से 'अर्थसदृश' यह अर्थ करें, तो 'इदं रजतम्' यह भ्रम भी प्रमेयत्व रूप से शुक्ति या रजतत्व के सदृश है, अतः उसमें अतिव्याप्ति हो जायगी । समर्थन—यहाँ सादृश्यज्ञान विषयत्वेन विवक्षित है । एवञ्च 'इदं रजतम्' इस भ्रम के विषय में प्रमेयत्व से सादृश्य होने से वहाँ भी अतिव्याप्ति नहीं होगी । यदि कहें कि ऐसा निवेश करने पर 'इदं रजतं प्रमेयम्' इस भ्रम-ज्ञान के विषय प्रमेयत्व धर्म से सादृश्य का ग्रहणकर पुनः अतिव्याप्ति हो जायगी, तो वह ठीक नहीं । कारण प्रमेयत्व अंश में वह ज्ञान प्रमा ही है और रजतांश में प्रमेयत्वेन सादृश्य का ग्रहण ही नहीं है। अतः वहाँ अतिव्याप्ति नहीं है । खंडन—'रूपसमवायी घटः' इस ज्ञान में रूपसमवायरूप से घट का सादृश्य-ज्ञान न होने पर भी इस ज्ञान को प्रमा मानते हैं, अतः लक्षण की उक्त ज्ञान में अव्याप्ति हो जायगी । समर्थन—ज्ञानविषयतया विशेषणत्वरूप सम्बन्ध से अर्थ का सादृश्य ज्ञान में विवक्षित है । जैसे घटरूप अर्थ में रूप समवाय सम्बन्ध से विशेषण है, वैसे ही ज्ञान में भी विषयता सम्बन्ध से विशेषण है; अतः अव्याप्ति नहीं है। खण्डन—ऐसा करनेपर 'इदं रजतम्' इस ज्ञान में अतिव्याप्ति हो जायगी, कारण पुरोवर्तित्व ( इदन्त्व ) समवाय
१५० सानुवाद-खण्डनखण्डखाद्ये [ प्रथम भवत्येवेति चेन्न । एवं हि पुरोवर्तित्वादिना रूपेण तथाभावसम्भवात् पुरोवर्तिनीं शुक्तिं रजततयाऽवगाहमानं ज्ञानं प्रमा स्यात् । न च वाच्यमिष्यत एव सा प्रमाऽपीति न व्यभिचारचोदनेयं युक्तिमतीति ; यथार्थताविशेषणवैयर्थ्यप्रसङ्गात् । 'अनुभूतिः प्रमे'त्युक्त एव हि तावन्नास्त्यति- प्रसङ्गः ; सर्वस्य व्यभिचार्यनुभवस्य ( अन्ततोऽन्यथाख्यातिवादिनये ) धर्मिण्यपि प्रमात्वसम्भवेन प्रमायामेव अनुभवत्वस्य स्थैर्यात् । यदि तु अंशतोऽपि व्यभिचारिण्यां मा लक्षणं गमदिति चेतसि निधाय यथार्थत्वं विशेषणं प्रयुक्तम् ; तदा न युक्तम्, उक्तदोषात् । अथोच्यते--प्रकाशमानेन रूपेण सर्वेण विशेषणभावात् यस्यानुभवस्यार्थ- सादृश्यं सा प्रमा। न च तावता धर्मिणो धर्म्यविशेषणतया दोषः, तस्यापि तद्विषयान्तरव्यवच्छेदकत्वादिति । या स्वरूप-सम्बन्ध से जैसे इदमंश ( शुक्ति में ) विशेषण है, वैसे ही ज्ञान में भी विषयता सम्बन्ध से विशेषण है । समर्थन—'इदं रजतम्' यह ज्ञान प्रमा भी है; अतः वहाँ लक्षण का जाना भूषण ही है, दूषण नहीं । खंडन —यदि 'इदं रजतम्' यह भ्रम भी लक्ष्य ही मानें, तो यथार्थ विशेषण व्यर्थ हो जायगा । 'अनुभवः प्रमा' यह कहने पर भीकोई दोष नहीं है । कारण अन्यथा- ख्यातिवादी के मत में सम्पूर्ण व्यभिचारी अनुभव (भ्रम) के अन्ततः धर्मी-अंश में प्रमा होने से अनुभवमात्र प्रमा ही है। यदि अंश से भी व्यभिचारी में लक्षण न जाय, इसलिए यथार्थत्व विशेषण दिया है, तो यह भी युक्त नहीं, कारण उक्त विशेषण देने पर भी पुरोवर्तित्वरूपेण अर्थ का साम्य होने से भ्रम में अतिव्याप्ति तदवस्थ ही है । समर्थन—अर्थ के यावत् विशेषण विषयता सम्बन्ध से जिस ज्ञान में हों, वह ज्ञान प्रमा है । भ्रम में विषयता सम्बन्ध से ज्ञान का विशेषण शुक्तिरूप अर्थ का विशेषण नहीं है, अतः अतिव्याप्ति नहीं । यह भी नहीं कह सकते कि विशेष्य रूप अर्थ ज्ञान का विशेषण है और वह 'स्व' का विशेषण नहीं है; क्योंकि विशेष्य भी स्वगत धर्म का विशेषण ( इतर से व्यावर्तक ) होता ही है, अतः अव्याप्ति नहीं है ।
परिच्छेद ] याथार्थ्य का खण्डन १५१ तर्हि व्यभिचारिज्ञानं धर्मिण्यपि प्रमा न स्यात्, सर्वात्मना सादृश्याभावात् । अव्यभिचारिणं चांशमननुरुद्ध्य तदीयाप्रमितिकोटिनिक्षेपसाहसिक्यादबिभ्यता किमव्यभिचार्यांशानुरोधेन व्यभिचार्यांशस्यापि प्रमाकोटिनिवेशनमेव नाध्यवसीयते भवता ? शक्यन्ते ह्यनुभूतित्वज्ञानत्वादयस्तादृशाभिप्रायाविरोधिनो लक्षणीकर्तुम् । यदि च बाध्यार्थांशा धीरबाध्यार्थांशेऽप्यप्रमैव, तदा सौधाग्रकुम्भादिवद् दूरत्वात् तुहिनद्युतिविद्युदादिपरमाणाग्रहणादवयविनं च तावत्परिमाणाग्रहणा- दल्पपरिमाणमुल्लिखत् प्रत्यक्षं प्रमात्वेन लोकप्रसिद्धमप्रमा स्यात् । क्व च लभ्यं देशकालालोकादिव्यक्तिसहितजलादिज्ञानस्य समस्ततावदर्थप्रवृत्तिसामर्थ्योदा- हरणम्, येन तत्प्रामाण्यं मन्यसे । खण्डन -- ऐसा निवेश होने पर व्यभिचारी ज्ञान ( भ्रम ) धर्मी-अंश में भी प्रमा नहीं होगा, कारण सर्वांश में अर्थ सदृश नहीं है । यदि आप अव्यभिचारी अंश का अनुरोध न कर व्यभिचारी अंश के अनुरोध से सर्वांश में भ्रमज्ञान को अयथार्थ कहने के साहस से न डरते हों, तो व्यभिचारी अंश का अनुरोध न कर अव्यभिचारी अंश के अनुरोध से सर्वांश में भ्रम को प्रमा ही मानने का अध्यवसाय क्यों नहीं करते ? इस अभिप्राय से तो प्रमा के ज्ञानत्व, अनुभूतित्व आदि लक्षण हो ही सकते हैं । किञ्च—यदि अंशतः बाधित बुद्धि अबाधित अंश में भी अप्रमा ही हो, तो चन्द्र, विद्युत् आदि अवयवी को अल्पपरिमाण बतलानेवाला प्रत्यक्ष भी अप्रमा होने लगेगा । कारण प्रासाद-शिखर पर स्थित कुम्भ की तरह दूर होने से उनके अन्य भागों का ग्रहण न हो सकेगा और उनका ग्रहण न होनेसे वास्तविक परिमाण का भी ग्रहण न होगा । इसीलिए उक्त अवयवियों की अल्पपरिमाणत्वेन प्रत्यक्षप्रमा ही होती है। एवञ्च लोक में धर्मी-अंश में प्रमात्वरूप से प्रसिद्ध यह ज्ञान भी अप्रमा हो जायगा । किञ्च—ज्ञान के विषय तो देश, काल, आलोक आदि व्यक्ति से युक्त जलादि यावद् वस्तुएँ हैं । किन्तु वे सभी अर्थ की विशेषण हैं, ऐसा कहीं भी नहीं मिलेगा । कारण ज्ञान के संपूर्ण विषय तभी अर्थ के विशेषण हो सकते, जब कि ज्ञान का विषय सब प्रकार से अबाधित होता । यह अबाधितता प्रवृत्ति-संवाद से गम्य है और सब प्रकारों में प्रवृत्ति-संवाद कहीं नहीं होता । अतः लक्षण में असंभव दोष हो जायगा ।
१५२ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम यदि च बाध्यार्थांशे बाधादबाध्येऽप्यंशे तद्बोधमिथ्यात्वं समर्थयसे, तदा यदर्थजातीयं बाध्यं तदर्थजातीयमबाध्यमपि मिथ्येति मन्यमाने किमुत्तरं ते स्यात्, अन्यत्र लोकप्रसिद्धभ्रमोदाहरणत्यागात् । अथोच्यते—प्रकाशमानेन रूपेण विशेषणतया यदर्थसाम्यमनुभवस्य तत्र प्रमात्वमिति विषयविशेषनियमेनैव प्रमात्वं लक्षणीयमित्येतदर्थमेव यथार्थविशेषणोपादानमिति । मैवम्; विशेष्यांशेऽप्यनुभूतिरेवं प्रमा न स्यादिति । व्यवच्छेदकत्वं विशेषणत्वमभिमतं धर्म्यपि च स्वसम्बन्धाद्धर्मं विशिनष्टीति नोक्तदोष इत्युक्तमेवेति चेन्न । विशिष्टे प्रमात्वाभावापत्तेः । अपि च—एवं तर्हि रजतत्वादिकमपि व्यवच्छिनत्त्येव शुक्तिकाम्, या रजततया प्रकाशिता शुक्तिव्यक्तिः सेयमिति । प्रमा-लक्षण के प्रसिद्ध उदाहरण चन्द्रादि-ज्ञान के होते भी एक अंश में बाधित होने से यदि आप अबाधित अंश में भी ज्ञान को अप्रमा नमाते हैं, तो कोई पुरुष यह संदेह करे कि यज्जातीय एक स्थल में बाधित हो, तज्जातीय सर्वत्र बाधित क्यों न हो ? अर्थात् रजतत्व शुक्ति-रजत के ज्ञानस्थल में बाधित है, तो सत्यरजत के ज्ञानस्थल में बाधित क्यों न माना जाय, ऐसा यदि कोई पूछे, तो आप इससे अन्य क्या उत्तर देगे कि ‘प्रसिद्ध उदाहरण को त्यागना पड़ेगा ।’ समर्थन—जिस-ज्ञान का जो विषय अर्थ का विशेषण हो, वह ज्ञान उस विषय में प्रमा है । ज्ञान का विषय रजतत्व शुक्ति में विशेषण नहीं है, अतः उस अंश में ‘इदं रजतम्’ यह ज्ञान अप्रमा है। ज्ञान का विषय इदन्त्व शुक्ति में विशेषण है; अतः उस अंश में प्रमा है । इस तरह विषय-विशेष से नियत प्रमा का लक्षण करने के लिए ही लक्षण में यथार्थत्व का निवेश है । खंडन—ऐसा लक्षण करने पर ज्ञान का विषय विशेष्य अर्थ में विशेषण नहीं है । अतः विशेष्यांश में ज्ञान अप्रमा हो जायगा । समर्थन -- इतरव्यावर्त्तक को ही विशेषण कहते हैं । विशेष्य भी ‘स्व’ में स्थित धर्मी (विशेषणों) का विशेषण है; कारण यदि धर्मी को धर्म का विशेषण न मानें, तो धर्म-अंश में ज्ञानमात्र निर्विकल्पक हो जायँगे । खण्डन—विशिष्ट किसी अर्थ में विशेषण नहीं है, अतः विशिष्ट अंश में ज्ञान अप्रमा हो जायगा ।
परिच्छेद ] याथार्थ्य का खण्डन १५३ ननु साक्षाद्विशेषणत्वं विवक्षितम् । रजतत्वं तु ज्ञानद्वारा शुक्तिविशेषणमिति नातिप्रसङ्गः । मैवम्, तर्हि 'दीर्घदण्डः पुरुषः' इत्यादौ ह्रस्वदण्डादिभ्यो वैलक्षण्ये विशेष्यस्यानुभूयमाने अनुभूतेर्न प्रमात्वं स्यात्, दीर्घत्वादेर्दण्डादिद्वारा विशेषणत्वा- दिति । ज्ञानरूपद्वारानपेक्षतया विशेषणत्वमिष्टमिति चेन्न । 'साक्षात्कृत' इत्याद्यव- गमानामप्रमात्वापातात् । तज्ज्ञानप्रकाशितरूपेण विशेषणत्वमिष्टमिति तु दूरं तुच्छम् ; रूपादेः समवायेन ज्ञानाविशेषकत्वात् । अर्थविशेषणत्वेऽयं नियमो यत्तज्ज्ञानप्रकाशितेन रूपेणेति, न तु ज्ञानेऽपीति चेन्न । तज्ज्ञानव्यक्तेरन्यत्र असम्भवेनासाधारण्यात् अव्यापकत्वादित्यलम् । किञ्च—‘रजतत्वेन शुक्तिं जानामि' इस ज्ञान में रजतत्व भी शुक्ति का विशेषण होता ही है। अतः 'इदं रजतम्' यह ज्ञान रजतत्व अंश में प्रमा होने से सर्वांश में भी प्रमा हो जायगा । समर्थन—‘जिस ज्ञान का जो विषय अर्थ का साक्षात् विशेषण हो' इत्यादि लक्षण करेंगे। एवञ्च उक्त ज्ञान में रजतत्व शुक्ति में साक्षात् विशेषण नहीं है, किन्तु ज्ञान द्वारा विशेषण है; अतः अतिव्याप्ति नहीं है । खंडन—'दीर्घदण्डः पुरुषः' इस ज्ञान के विशेष्य पुरुष में जहाँ ह्रस्वदण्ड से वैलक्षण्य अनुभूयमान है, वहाँ दीर्घत्व अंश में प्रमात्व नहीं होगा, कारण दीर्घत्व दण्ड द्वारा पुरुष का विशेषण है, साक्षात् नहीं है । समर्थन—‘जिस ज्ञान का जो विषय ज्ञानरूप द्वार की अपेक्षा न कर अर्थ का विशेषण हो' इत्यादि निवेश करेंगे, तो अतिप्रसंग नहीं होगा । खंडन—तब तो ‘साक्षात्कृतो घटः’ इस ज्ञान में साक्षात्त्व ज्ञान द्वारा घट में विशेषण होने से वह ज्ञान भी अप्रमा हो जायगा । समर्थन—‘जिस ज्ञान का जो विषय तद्ज्ञानविषयत्व सम्बन्ध से विशेषण हो' ऐसा कहें, तो कोई दोष न होगा। 'इदं रजतम्' इस ज्ञान का विषय रजतत्व समवाय सम्बन्ध से शुक्ति में विशेषण नहीं है। खंडन—तब तो 'रूपवान् घटः' इस ज्ञान में अव्याप्ति हो जायगी, क्योंकि वहाँ ज्ञान में रूप समवाय सम्बन्ध से विशेषण नहीं है। यदि कहें कि 'ज्ञानविषयता संबन्ध से विशेषण हो' यह नियम अर्थ में विशेषण के लिए है, ज्ञान में तो विषयता सम्बन्ध से ही विशेषण अभिप्रेत है, तथापि यह लक्षण निर्दोष नहीं। कारण तब तो 'जिस ज्ञान का जो विषय तद्ज्ञानविषयतासंबन्ध से २०
१५४ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम सम्यक्त्व-खण्डनम् सम्यक्परिच्छेदः प्रमेत्यपि न युक्तम् । न खलु सम्यक्त्वं तत्त्वविषयता, याथार्थ्यं वा सम्भवति ; उक्तदोषात् । ननु सामस्त्यं सम्यक्त्वमिष्टम् । अभिधीयते हि लोके—'न मया सम्यक् दृष्टम्, सामान्याकारेण तु उपलब्धमि'ति । तदिह समीचोऽर्थस्य परिच्छेदः सम्यक्- परिच्छेदः, सम्यगर्थविषयत्वाद्वा सम्यक्शब्दः परिच्छेदसमानाधिकरण एवायमिति । मैवम् । सामस्त्यमर्थस्य किं सर्वावयवसहितत्वम्, अथवा सर्वधर्मसहितत्वम् ? नाद्यः ; अनवयवपदार्थपरिच्छेदस्येव सावयवपदार्थपरिच्छेदस्यापि मध्यभागाद्य- अर्थ का विशेषण हो, वह ज्ञान उस अंश में प्रमा है' यह परिष्कृत लक्षण भी यत्-तत् घटित हो जायगा । अतः यत् शब्द को यदि एक ज्ञानव्यक्तिपरक मानें, तो जिस घटज्ञान व्यक्ति का यत् शब्द से ग्रहण करेंगे, वह पट में न होने से पट से व्यावृत होकर विषयता संबन्ध से केवल घट में ही रहेगी; इसलिए पटज्ञान में अव्याप्ति हो जायगी । यदि यत् शब्द से ज्ञानसामान्य का ग्रहण करें, तो 'रजतत्वेन शुक्तिं जानामि' इस ज्ञान में रजतत्व विशेषण होने से 'इदं रजतम्' यह ज्ञान भी प्रमा हो जायगा । किञ्च—यत् शब्द का निवेश भी व्यर्थ हो जायगा, कारण 'इदं रजतम्' इस ज्ञान में अतिव्याप्ति के वारणार्थ ही उसका निवेश है । किन्तु वह अतिव्याप्ति यत् शब्द का निवेश करने पर भी तदवस्थ ही है । सम्यक्त्व का खण्डन खंडन—'सम्यक्-परिच्छेद प्रमा है' यह लक्षण भी युक्त नहीं, कारण 'तत्त्वविष- यत्व' या 'याथार्थ्य'रूप सम्यक्त्व हो नहीं सकता, क्योंकि वह उक्त दोषों से खण्डित हो जाता है । समर्थन—इस लक्षण में सामस्त्यरूप सम्यक्त्व ही अभिप्रेत है । लोक में भी यही कहा जाता है कि 'मैंने सम्यक् अर्थात् समस्त रूपों से नहीं देखा, सामान्य आकार से देखा ।' तस्मात् समीचीन अर्थ का परिच्छेद ( अनुभव ) अथवा सम्यक् अर्थ को विषय करने से जो सम्यक् अनुभव है, उसी को 'सम्यक्-परिच्छेद' कह सकते हैं । खंडन—अर्थ में सामस्त्य क्या सर्वावयवसहितत्व है या सर्वधर्मसहितत्व ? यदि सर्वावयवसहितत्व कहें, तो निरवयव आकाशादि पदार्थों के परिच्छेदों तथा मध्यभाग को विषय न करनेवाले सावयव पदार्थों के परिच्छेदों में भी अव्याप्ति हो जायगी । यदि
परिच्छेद ] सम्यक्त्व का खण्डन १५५ विषयस्य अप्रमात्वापातात्। नापि द्वितीयः; असर्ववित्परिच्छित्तीनां सर्वासाम- प्रमात्वापत्तेः। अथ मन्यसे— सम्यक्शब्दः सविशेषार्थः। यदपि लोकेऽभिधीयते 'न मया सम्यक् दृष्टम्', तस्यापि न मया विशेषतो दृष्टमित्यर्थः। तस्माद्विशेषसहितधर्मि- परिच्छित्तिः प्रमेत्युक्तं भवति। विभ्रमादयो हि विशेषमपश्यतो जायन्त इति तद्व्यावृत्त्यर्थं विशेषणमिदम्। विशेषाणां च सर्वेषां विशेषान्तरानभ्युपगमेऽपि स्वरूपमेव केषाञ्चिद्विशेष इति। नैतद्युक्तम्; विशेषपदेन विशेषमात्राभिधाने रजतत्वादिना विशेषेण सहैव शुक्तिव्यक्त्यादेर्भ्रमेणावगाहनात् तस्यापि प्रमात्वं स्यात्। प्रत्यर्थं व्यावृत्ताकाराणां च विशेषाणामुपादाने अननुगमप्रसङ्गात्, सामान्यतश्चातिप्रसङ्गात् उभयथाऽप्य- सङ्गततापत्तेः। सर्वधर्मसहितत्व कहें, तो जो परिच्छेद सर्वधर्मों के विषय नहीं होते, उनमें अव्याप्ति हो जायगी। समर्थन—यहाँ 'सम्यक्' शब्द का अर्थ 'विशेष' है। लोक में जो कहा जाता है कि 'मैंने सम्यक् नहीं देखा', उसका भी यही अर्थ होता है कि मैंने 'उसे विशेषरूप से नहीं देखा।' तस्मात् 'विशेष से सहित धर्मी का परिच्छेद प्रमा है' यह लक्षण हुआ। विभ्रम या सन्देह विशेष धर्म की अज्ञानदशा में होते हैं, अतः उनमें अव्याप्ति के वारणार्थ सम्यक्त्व-निवेश है। यद्यपि विशेष धर्मों में अनवस्था-भय से अन्य विशेष धर्म नहीं रहते, तथापि उनका स्वरूप ही विशेष धर्म है; अतः विशेष धर्म की प्रमा में अव्याप्ति नहीं है। खंडन—यदि लक्षण में विशेष का सामान्यरूप से प्रवेश करें, तो 'इदं रजतम्' इस भ्रम में अतिव्याप्ति हो जायगी, क्योंकि यह भ्रम भी रजतत्वरूप विशेष का ही शुक्ति में अवगाहन करता है। यदि विशेषरूप से विशेष का निवेश करें, अर्थात् 'जहाँ जो विशेष हो, वहाँ उस विशेष का अवगाहन करनेवाला ज्ञान प्रमा है' ऐसा कहें, तो यत्-तत् का अर्थविशेष प्रतिव्यक्ति व्यावृत्त होने से जिस विशेष का यत् शब्द से उपादान करेंगे, उसका अवगाहन करनेवाली प्रमा से अन्य ज्ञान में अव्याप्ति हो जायगी। यदि विशेष-भेद से लक्षण का भेद मानें, तो अनेक लक्षण होने से लक्षणों का अननुगम हो जायगा।
१६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम विशेषस्य च भवतु स्वरूपमेव विशेषः ; तथाऽप्यभेदादेव विशेषसहितत्वं नास्तीत्यव्याप्तेरपरिहारात् । यत्तु कश्चिदवोचत्—विशेषशब्देन तेऽभिधीयन्ते, यददर्शने भ्रमसंशयावकाशः, यद्दर्शने च बाधाबाधव्यवस्था तदनभ्युपगमे तत्त्वात्त्वविभागो न स्यात् । भवित- व्यञ्च तेन ; अन्यथा व्याघातादिति । तदयुक्तम् ; न तावदेवंविधो विशेषोऽभिधातुं शक्यो यदवगमस्य न भ्रमत्वादि- सम्भवः, स्वप्नदृशः सर्वविशेषोपलम्भात् । न च व्याघातदण्डभयमात्रादसौ उप- पादयितुमशक्योऽपि अभ्युपगन्तव्य इति युक्तम् । तदुपदर्शनाशक्यत्वेन व्याघात- परिहार एव कश्चिदन्यो निर्वक्तुमशक्योऽस्तीत्येव तदा किं न व्यवस्थाप्यते ? न हि परिदृश्यमानपदार्थगोचरं तदस्ति किञ्चिदनुभूयमानं यत्स्वप्ने वा किञ्च—'यद्यपि विशेष का स्वरूप ही विशेष है, तथापि अभेद होने से ही विशेषसहित विशेष नहीं हैं, अतः विशेष की प्रमा में अव्याप्ति हो जायगी । समर्थन—जिसके न जानने से भ्रम या सन्देह होता हो और जिसके दर्शन से बाध या अबाध की व्यवस्था होती हो, वही विशेष है । उसके न मानने पर तत्त्व- अतत्त्व का विभाग नहीं होगा और वह तो होना ही चाहिए, अन्यथा व्याघात हो जायगा । अर्थात् तत्त्व-अतत्त्व का विभाग न होने पर पूछा जा सकता है कि संपूर्ण ज्ञान प्रमा है या अप्रमा ही; किंवा किञ्चित् ज्ञान प्रमा है और किञ्चित् ज्ञान अप्रमा ? यदि प्रथम पक्ष मानें, तो वादी का ज्ञान भी प्रमा होने से उसके खण्डन में प्रवृत्ति व्यर्थ होगी। यदि सब ज्ञान अप्रमा ही मानें, तो आपका ज्ञान भी अप्रमा हुआ; फलतः उसका समर्थन व्यर्थ है। यदि किञ्चित् ज्ञान प्रमा और किञ्चित् अप्रमा हो, तो वह 'प्रमा-अप्रमा का विभाग नहीं होगा' इस पूर्वोक्त कथन से 'मुख में जिह्वा नहीं है' इस कथन के तुल्य व्याहत होगा । खण्डन—ऐसा कोई विशेष नहीं है, जिसका ज्ञान भ्रम न कहा जाय; कारण स्वप्न में सभी विशेष भासते हैं और स्वप्नज्ञान को सभी भ्रम मानते हैं। जिसका समर्थन ही न हो सके, ऐसे विशेष को एकमात्र व्याघात के भय से मान लेना उचित नहीं, कारण ऐसे विशेष को स्वीकार न कर उक्त व्याघात का ही कोई अनिर्वचनीय परिहार क्यों न मान लिया जाय ? समर्थन—विशेष का प्रतिपादन अशक्य है और व्याघात का अन्य परिहार भी अनिर्वचनीय है, अतः एकादेशी प्रमाण के अभाव में हम विशेष को ही क्यों न
परिच्छेदं ] सम्यक्त्व का खण्डन १५७ वाक्याभासे वा प्रतिपत्तुमशक्यमिति प्रतिपत्त्यारूढतया येयमप्रतीयमानकल्पना, ततो वरमनुपलभ्यमानस्य व्याघातपरिहारस्यैव कल्पना भद्रा । बहुशश्च व्याघातो- द्भावनविभीषिकामुन्मूलयिष्यामः । ननु न ब्रूमो विशेषेण सहोपलम्भो विशेषसहितोपलम्भ इति । किं नाम ? विशेषेण सहितस्य पदार्थस्योपलम्भः । तथा च न शुक्तौ रजतत्वं विशेषोऽस्ति । तत्कथं रजतेऽभ्रमेऽपि तत्प्रसङ्ग इति । मैवम् ; उक्तदोषेणैव निरस्तत्वात् । यदि हि विशेषस्य सामान्यतोऽभिधा- नम्, तदा पुरोवर्तित्वादेः सत्त्वान्न प्रसङ्गनिवारणम् । विशेषेण तदभिधाने तु अननुगम इति । 'बाधाबाधव्यवस्थाहेतुरस्ति विशेषः' इति पक्षं यस्तु जडतरो न जहाति, स मानें । खंडन— स्वप्न में न रहनेवाला ऐसा कोई भी ज्ञान अनुभव में नहीं आता, जिसके दृश्यमान पदार्थ विशेष रूप से विषय न हों । इसलिए इस न्याय से सभी विषय स्वाप्न ज्ञानमें आ जाने के कारण अप्रतीयमानता की कल्पना अनुपलब्भ से बाधित, अतएव विरुद्ध है । उसकी अपेक्षा अनुपलभ्यमान व्याघात-परिहार की कल्पना ही अविरुद्ध होने से उचित होगी । अर्थात् अप्रविषयत्व बाधित है, इस प्रकार विशेष कल्पनाकर व्याघात का परिहार करने की अपेक्षा अनुपलभ्यमान- हेतुक व्याघात-परिहार ही उचित है । व्याघातोद्भावनरूप इस विभीषिका का उन्मूलन तो हम सर्वविरोध-खण्डन के प्रस्ताव में अनेक प्रकार से करेंगे । समर्थन— हम विशेष धर्म के साथ उपलम्भ को 'विशेषसहित उपलम्भ' नहीं कहते, किन्तु विशेष के सहित पदार्थ के उपलम्भ को ही विशेषसहित उपलम्भ कहते हैं । एवञ्च शुक्ति में रजतत्वरूप विशेष नहीं है, अतः रजतभ्रम में अतिव्याप्ति नहीं होगी । खंडन—यदि सामान्यरूप से विशेष का उपादान करे, तो पुरोवर्तित्व ( इदन्त्व ) सहित शुक्ति का अवगाहन करने से 'इदं रजतम्' यह ज्ञान भी प्रमा हो जायगा । यदि विशेष रूप से कहें, अर्थात् जो ज्ञान जिस धर्म से विशिष्ट धर्मी का अवगाहन करता हो, उस धर्मविशिष्ट धर्मी-अंश में वह प्रमा है, तो यत्-तत् से घटित होने से लक्षण का अनुगम ही नहीं होगा । फिर भी जो जडतर मनुष्य अपना यह पक्ष छोड़ना नहीं चाहता कि 'बाध-अबाध की व्यवस्था का हेतु विशेष है', तो उसे यह कहकर समझाना चाहिए कि जब आप्त