खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
४८४ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ
जिज्ञासायां तस्य तस्यापि ज्ञेयत्वे तद्बुद्धीनां भेदबुद्धित्वात् तदर्थेष्वनुगतत्व- स्याप्यनुपपत्त्या तेष्वेकजात्याद्यभ्युपगमे तद्भेदेऽपि तदङ्गीकारे परस्पराश्रयाश्रयि- भावप्रसङ्गात् । एवं सत्तादीनामानन्त्यस्वीकारे द्रष्टव्यम् । किञ्च घटत्वादेर्भेदत्वेऽवधिभूतपटत्वादिसापेक्षप्रतिपत्तिकतायां घटत्ववत् पटत्वस्यापि भेदरूपस्य भेदावधिप्रतिपत्तिसापेक्षतयाऽवधेश्च घटत्वादित्वेन घटत्वादिप्रतीत्यपेक्षायामन्योन्याश्रयत्वप्रसङ्गः । भेदस्वरूपत्वे घटत्वादेरवध्यपेक्षा, न तु स्वरूपमात्रप्रतिपत्तौ । स्वरूपमात्रेण चावधित्वम् तत्कृत एवमिति चेन्न । भेदरूपता यदि तस्य स्वात्मैव तदा
समर्थन—उस काल में किन्हीं भेदों का ज्ञान न होने पर भी जिज्ञासा होने पर क्रमशः भेदों का ज्ञान होता ही है। भाव यह है कि जो कभी भी उपलब्ध नहीं होता, वह असत् होता है । अनन्त भेद नियमतः उपलब्ध नहीं होते, ऐसी बात नहीं । किन्तु जब यद्विषयक जिज्ञासा हो, तब वह भेद प्रतीत होता है, ऐसा नियम मानेंगे । एवञ्च भेद का भान हो जाने से मूलपर्यन्त अभेद नहीं होगा। खण्डन—उन सब भेद- बुद्धियों के भेदबुद्धि होने से उनके विषय भेदों में अनुगत एक धर्म न मानने पर एकाकार बुद्धि न होगी । अतः एक धर्म या जाति अवश्य माननी होगी । फिर उस जाति में भी भेद मानेंगे और उस भेद में उस जाति को मानेंगे—इस तरह परस्पर भेद और जाति में आधाराधेयभाव हो जायगा । इसी प्रकार सत्ता में सत्ता मानने में अनवस्था तथा उन सत्ताओं के क्रमशः ज्ञेयत्व में प्रतीति का अपर्यवसान और युगपद् ज्ञेयत्व में सत्ताज्ञान में प्रामाण्य का अविश्वास आदि दोषों को जानना चाहिए । किंच—यदि घटत्वादि को भेदरूप मानें, तो पटत्वादि का ज्ञान घटत्वादिरूप जो अवधि उसकी अपेक्षा से होगा। एवञ्च घटत्व के तुल्य पटत्व भी भेदरूप होने से उसका ज्ञान भी पटत्वरूप अवधि के ज्ञान की अपेक्षा से होगा । अतः भेदरूप होने से पटत्वादि अवधि को घटत्वादिरूप से घटत्वादि की अपेक्षा होने से अन्योन्या- श्रय हो जायगा । समर्थन—घटत्वादि को जिस काल में भेदरूप मानते हैं, उस काल में अवधि की प्रतीति की अपेक्षा होती है । स्वरूपतः घटत्वादि अवधि में सापेक्ष नहीं हैं और स्वरूप से ही अवधि है, अतः अन्योन्याश्रय नहीं है । खण्डन—घटत्व का स्वरूप ही भेद है, तो यह कथन कि 'स्वरूपमात्र की प्रतिपत्ति के काल में अवधि की अपेक्षा नहीं
परिच्छेद ] भेद-लक्षण का खण्डन ४८५ स्वरूपमात्रप्रतिपत्तौ नावध्यपेक्षेति शून्यं वचनम् । अथ धर्मान्तरं तदा स एव भेदोऽस्तु, कृतं तद्वत्तया घटत्वादेर्भेदरूपतेति प्रक्रियाकल्पनया । अस्तु स एव धर्मान्तरं भेद इति चेन्न । दूष्यत्वात् । अथापि स्वरूपादित्रयमिदं भेद इति कथं सङ्गच्छते, तद्व्यवहारस्यैकाकारस्य नानानिमित्तत्वे गोत्वाद्यनुगताकारप्रतीतेरपि कथमेकनिमित्तत्वसिद्धौ प्रामाण्यं व्यभिचारात् । सामान्यविशेषैरेव परसामान्यबुद्धिव्यवहारोपपत्तौ तत्कल्पनानुपपत्तेः । किञ्च भेदे भेदान्तरमस्ति न वा ? आद्येऽनवस्था । द्वितीये तदभाव एव स्यात्, धर्मिण्येव तत्प्रवेशात् । भेदस्वभावत्वात् स्वात्मन्यपि स्वयमेव तद्व्यवहारमयं करोति, सत्तेव सद्- व्यवहारमिति चेन्न । यदि स्वस्मादभिन्नः स्वस्य भेद इति स्वस्मादित्यवधेयावधि- होती' युक्ति से शून्य है । यदि 'घटत्वादिनिष्ठ अन्य धर्म ही भेद है, घटत्वादि रूप भेद नहीं है' ऐसा कहें, तो उसी धर्म को भेद मानिये । उस धर्म के होने से घटत्वादि भेदरूप हैं' इस प्रक्रिया की कल्पना व्यर्थ है । वही धर्म भेद है, यह नहीं कह सकते, क्योंकि अन्योन्याश्रय दोष होने से वह दूषित है । जबतक तीनों में अनुगतभेदत्वरूप अनुगत धर्म न मानें, तबतक स्वरूप, वैधर्म्य और अन्योन्याभाव यथास्थान तीनों भेद हैं— यह कथन नहीं जँचता । यदि इन तीनों में अनुगत एकरूप न होने पर भी एकाकार व्यवहार मान लें, तो अनुगत गोत्वादि न होने पर भी 'गौः' इत्याकारक गोमात्र में एकाकार व्यवहार हो जाने से गोत्वादि जातियों का स्वीकार भी व्यर्थ है । इसी प्रकार गोत्व, अश्वत्व आदि अपर जातियों से 'द्रव्यम्' इत्याकारक अनुगत प्रतीति का निर्वाह हो जाने से द्रव्यत्वरूप परजाति का तथा द्रव्यत्व, गुणत्व, कर्मत्वरूप अपर सामान्य से 'सन्' इत्याकारक अनुगत प्रतीति हो जाने से भेद का सत्तारूप पर सामान्य का स्वीकार व्यर्थ हो जायगा । किंच— भेद में अन्य भेद रहता है या नहीं ? यदि रहता है, तो अनवस्था हो जायगी । यदि नहीं रहता तो उसका धर्म के साथ भेद न होने से धर्मी में प्रवेश होने से भेद का अभाव हो जायगा । समर्थन—भेद में भेद न होने पर भी स्वभाव से ही भेद अपने में भेद-व्यवहार कर लेता है । जैसे सत्ता में सत्ता के न होने पर 'सत्ता अस्ति' ऐसा व्यवहार होता है । खंडन—यदि ऐसा मानें, तो 'स्वस्मात् अभिन्नः स्वस्य भेदः' इस प्रतीति
४८६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ भावस्वरूपः स्वयम्, भेदोऽन्यस्माच्च स्वस्य, तदाऽस्य भेदस्य स्वात्मप्रतियोगिक- त्वेन स्वाश्रयत्वेन चाङ्गीकारे स्वस्मादपि स्वयं भिन्नः किं नाङ्गीक्रियते, विरोधाभावात् । स्वीक्रियेताप्येवं यदि तथा प्रतीतिर्व्यवहारो वा स्यादिति चेन्न । अस्त्यपि शब्दाभासादेस्तथा प्रतीतिराभासशब्दव्यवहारश्च । सत्यौ प्रतीतिव्यवहारौ स्वीकारकारणम् । न च तौ स्वात्मन एव स्वस्माद् भेद- विषयौ स्त इति चेन्न । स्वात्मा स्वस्यैवाधिकरणमवधिश्चेत्यपि तर्हि न सत्या प्रतीतिः सम्भवति, न वा व्यवहारः । तत्कथमित्थमङ्गीकुरुषे ? ननु न वयं स्वात्मा स्वाधिकरणं स्वावधिर्वेत्यभ्युपगच्छामः ; किन्तु धर्मा- न्तरे तत्प्रतियोगिके तदाधारे वा स्वीकृते यौ बुद्धिव्यवहारावुपपद्येते तावनवस्था- भयाद्धर्मान्तरमन्तरेणैव स्वभावाद्भेदः करोतीति ब्रूम इति चेत् । तर्ह्यन्यत्र यादृशी के अनुरोध से वही भेद स्व का प्रतियोगी और स्व का आश्रय ( अवधि ) भी हुआ । यदि घटादि से स्व का भेद स्वस्वरूप मान लिया जाय, तो भेद के स्वप्रतियोगिक और स्वाश्रय मानने से 'स्वस्मादपि स्वयं भिन्नः' ऐसी प्रतीति होने लगेगी, कारण इसमें कोई विरोध नहीं रहा । समर्थन--ऐसा स्वीकार करते, यदि स्व से स्व में भेदावगाही व्यवहार या बुद्धि होती । किन्तु वैसा व्यवहार या बुद्धि नहीं होती । अतः स्व से स्व में भेद नहीं मानते । खंडन--शब्दाभासरूप व्यवहार तथा शब्दाभास से स्व से स्व में भेदबुद्धि भी होती ही है । समर्थन--सत्य व्यवहार तथा सत्य बुद्धि उक्त स्वीकार के कारण मानेंगे । स्व से स्व में भेदावगाही सत्यबुद्धि या सत्य व्यवहार नहीं होता । अतः स्व से स्व में भेद सत्य सिद्ध नहीं होता । खण्डन--तब तो भेद स्वयं स्व का अधिकरण है और स्व का प्रतियोगी है ऐसी सत्य प्रतीति या सत्य व्यवहार नहीं होता । फिर आप भेद को स्व ( भेद ) का अधिकरण तथा प्रतियोगी कैसे मानते हैं ? समर्थन--'भेद स्व ( भेद ) का अधिकरण और प्रतियोगी है' ऐसा हम नहीं मानते । किन्तु यदि भेद में अन्य भेद को मान लें, तो उसमें जैसे भेदप्रतियोगिकत्व तथा भेदाश्रयत्व का व्यवहार या बुद्धि होती है, वैसे ही अनवस्था के भय से स्व में अन्य भेद को न मानकर भेद स्वभाव से ही भेद-व्यवहार करता है, ऐसा हम कहते हैं ।
परिच्छेद ] भेद-लक्षण का खण्डन ४८७
प्रतीतिर्धर्मान्तरविषया तादृश्येवात्र विना धर्मान्तरमुत्पद्यत इति भ्रान्ता स्यात् । यस्य च स्वभावस्य वलेनेदृशी सा जायते स दोषः स्यात् । यथा सत्यरजते रजतप्रतीतो रजतत्वादुत्पन्नाऽन्यत्र विना रजतत्वं जायमाना भ्रान्ता सा भवति, यस्य च सामर्थ्यात् सा तादृशी जायते स दोष इत्युच्यते । तत्र रजतत्वं नास्ति, अत्र धर्मिरूपोऽपि भेद एव सन्नवलम्बनमिति चेत् । मैवम् ; भिन्नप्रतीतिर्विशिष्टविषया भेदतदाश्रयरूपोभयवस्तुविषया अन्यत्र यादृशी सत्याऽङ्गीकृता ततो मात्रयाऽप्यन्यूनाथांया इह जायमानाया यदि द्वयं विषयं नाङ्गीकुरुषे, तदा शक्रेणापि भ्रान्तत्वं दुर्वारम् । अथाङ्गीकुरुषे, तदाऽनवस्थाप्रसङ्गः । अथ तदुभयविषयव्यतिरेकेणैव साऽत्र सत्याऽन्यत्र, तर्हि इतोऽन्यादृशविषया मिथ्या स्यादित्यलं पल्लवेन । यत्तु सत्तेवेत्युक्तम् ; तत् कटकर्गवोदाहरणमनुहरति, यतः सत्ताऽप्यमुना दूषणेनास्माभिः खण्डनीया । खंडन—तब तो भेदविषयक बुद्धि जैसे यहाँ होती है, वैसे ही भेद के बिना अन्य स्थल में भी हो जायगी। अतः वह बुद्धि भ्रम और जिस स्वभाव के बल से वैसी होती है, वह स्वभाव दोष कहलायेगा । जैसे सत्यरजत स्थल में रजतत्व के होने से रजतत्व- बुद्धि होती है, वैसे ही यदि अन्यत्र रजतत्व के बिना रजतत्व-बुद्धि भ्रम कहलाती है और जिसके बल से वह होती है, वह दोष कहलाता है । समर्थन—वहाँ रजत नहीं है और यहाँ तो धर्मिरूप भेद विद्यमान ही अवलम्ब है, अतः दोनों स्थलों में महान् अन्तर है । खण्डन—भेद और भेदाश्रय को विषय करनेवाली विशिष्टविषयक भिन्न बुद्धि अन्यत्र जैसे सत्य होती है, उससे किञ्चित् अन्यून विषयवाली यहाँ जायमान बुद्धि का विषय दोनों को न मानें, तो इन्द्र भी उस बुद्धि के भ्रान्तत्व का निवारण नहीं कर सकता । यदि दोनों को विषय मान लें, तो अनवस्था हो जायगी । यहाँ उभय के विषय न होने पर भी यदि उक्त बुद्धि को सत्य मानें, तो अन्यत्र जहां उभय विषय हैं, वहाँ वह बुद्धि मिथ्या हो जायगी । बस, इतना ही खण्डन पर्याप्त है, विस्तार व्यर्थ है । फिर, आप जिस सत्ता का दृष्टान्त देते हैं, वह दृष्टान्त भी इसी युक्ति से खण्डित होने से शिविर की गौके सादृश्य का अनुकरण करता है । अर्थात् जैसे शिविर में बन्धन से रहित उन्मत्त वृषभ जहाँ-जहाँ दौड़ता हुआ जाता है, वहीं पीटा जाता है, वैसे ही यहाँ भी सत्ता को खण्डित ही जानिये ।
४८८ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ
यत्पुनरभिधीयते किमेतैर्भेदखण्डनवादिभिरभिहितं भवति — किं भेदज्ञानमेव नास्ति, सदपि नित्यम्, अनित्यमपि वा निर्हेतुकम्, सहेतुकमपि वा निर्वि- षयम्, सविषयमपि वा बाध्यमानविषयम् ? तत्र प्रथमः सर्वतो विरोधादनुत्तरः । द्वितीयः सुषुप्त्यवस्थानुरोधादुपेक्षणीयः । तृतीयोऽपि विरोद्धाद्धेयः । चतुर्थस्तु भेदोल्लेखादेव त्याज्यः । पञ्चमश्चिन्त्यते । किमेतेष्वन्यतमो विषयः तदन्यो वा ? द्वितीये किमेताभि- र्व्यधिकरणाानुपपत्तिभिस्तस्य बाध्यते । एवं हि चौरापराधेन व्यक्तमयं माण्डव्य- निग्रहः । अथान्यतमात्मा, तत्रापि यदि धर्मान्तरमेवेति तत्त्वं तदाऽनवस्थाभिया तदधिकः प्रवाहस्त्यज्यताम् । तस्य कुतस्त्यागः, न ह्यनवस्था प्रतिभासमानमर्थं
समर्थन —उदयनाचार्य कहते हैं कि भेद का खण्डन करनेवाले का क्या अभि- प्राय है ? क्या भेद का ज्ञान ही नहीं होता या भेद का ज्ञान तो होता है, पर वह नित्य है, अथवा अनित्य होता हुआ भी हेतु से रहित है, किंवा सहेतुक होकर भी विषय से रहित है, या सविषय होता हुआ भी बाधित-विषयक है ? इनमें प्रथम पक्ष युक्त नहीं है, कारण यदि भेद-ज्ञान नहीं है, तो आपका भेद-खण्डन तथा 'भेदो नास्ति' इत्यादि सभी प्रयोग असङ्गत हो जायेंगे । द्वितीय भी सुषुप्ति-अवस्था के अनुरोध से त्याज्य है । अर्थात् जिस अवस्था में ज्ञान न हो, वह अवस्था सुषुप्ति है । सुषुप्ति अनुभवसिद्ध है, अतः उसके अनुरोध से ज्ञान अनित्य है । 'अनित्य निश्चय ही हेतुजन्य होता है' इस अनुभव से विरोध होने के कारण तृतीय पक्ष भी हेय है । भेदरूप विषय का उल्लेख अनुभव सिद्ध है, अतः चतुर्थ पक्ष भी त्याज्य है । 'भेदज्ञान सविषय होता है, परन्तु बाधित-विषय है' यह पञ्चम पक्ष अवश्य विचारणीय है । क्या भेदज्ञान का विषय स्वरूप, अन्योन्याभाव या वैधर्म्य इन तीनों में से कोई एक है या इनसे अन्य ? यदि इनसे अन्य विषय है, तो इन स्वरूपादि के खण्डन की युक्तियों से उसका खण्डन क्या हुआ ? ऐसा करने पर स्पष्ट ही यह चोर के अपराध में माण्डव्य को ही दण्ड हुआ¹। यदि स्वरूपादि में से एक को विषय मानें, तो उसमें धर्मान्तर (वैधर्म्य) को मानें तो अनवस्था-भय से उस प्रथम वैधर्म्य से अधिक वैधर्म्य-परम्परा का त्याग कीजिये, उस प्रथम वैधर्म्य का त्याग कैसे होगा; कारण
१. पुराणों में यह कथा प्रसिद्ध है कि माण्डव्य मुनि चोर न होते हुए भी उन्हें चोर मानकर शूली पर चढ़ा दिया गया ।
परिच्छेद ] भेद-लक्षण का खण्डन ४८६ निवर्तयति, किन्तु प्रवाहं परिहारयति गन्धे गन्धान्तरवत् । अथेतरेतराभावमेव भेदज्ञानमालम्बते तदाऽपि काऽऽत्माश्रयः, तेन हि भेदज्ञानमेव न स्यात् । अस्ति च तत्, ततो हेत्वन्तरमाक्षिपेत् , न तु स्वात्मनि स्वयमहेतुत्वे स्वयमेव निवर्तेत । अविद्यावशादिति चेत् ; किञ्चातः ? न ह्यविद्येत्येव आत्माश्रयनिवृत्तिः; तथा सति घटादयोऽपि कुलालादिनिरपेक्षाः स्वयमेव भवेयुः । अथाऽऽत्माश्रयादिदोषोपहततया तन्न तस्यैव कारणम् । अतो यतः कुतश्चि- त्तस्य जन्म, तच्च दुर्निरूपमतोऽविद्येत्युच्यत इति विचारार्थः ; नाम्नि तर्हि विवादः । न च तदपि दुर्निरूपम् , प्रतियोगित्वेन अप्रतीतावधिकरणस्वभावत्वेन अधि- करणप्रतीतिः, अधिकरणस्वभावत्वेनास्मृतौ प्रतियोगिस्मृतिश्च इतरेतराभावग्रहण- कारणमिति निरूपणात् । अनवस्था अनुभव के विषय अर्थ की निवृत्ति नहीं कराती, किन्तु प्रवाह रुकवाती है, जैसे कि गन्ध में अन्य गन्ध का । फिर यदि भेदज्ञान अन्योन्याभावरूप भेद का अवलम्बन करे, तब भी आत्माश्रय कहाँ है ? यदि आत्माश्रय हो, तो भेदज्ञान ही नहीं होगा । किन्तु भेदज्ञान होता है, अतः वह स्व से अन्य हेतु की कल्पना करेगा, कारण स्व में स्वयं हेतु न होने से स्वयं निवृत्त नहीं होता । यदि कहें कि अविद्या से भेद-ज्ञान होता है, तो वह भी ठीक नहीं । कारण अविद्या से क्या होता है ? अविद्या से ही आत्माश्रय की निवृत्ति तो होगी नहीं । कारण यदि अविद्या से आत्माश्रय की निवृत्ति होती हो, तो घटादि भी कुलालादि की अपेक्षा के बिना स्वतः अविद्या से ही उत्पन्न होने लगेंगे । फिर कुलालादि को घटादि का कारण क्यों माना जाय ? यदि कहें कि 'आत्माश्रय दोष होने से घट स्वयं अपना ही कारण नहीं होता, किन्तु अन्य किसीसे जन्य होता है । उस कारण का निरूपण अशक्य है, अतः उसे अविद्या कहते हैं—यही हमारे कथन का आशय है' तब तो केवल दोनों के नामों में ही विवाद रहा । भेद-प्रतीति के कारण को आप 'अविद्या' कहते हैं, तो हम नामान्तर से कहते हैं । फिर, उसके कारण का निरूपण भी अशक्य नहीं है, कारण प्रतियोगित्वरूप से प्रतियोगी के अप्रतीति-काल में अधिकरणत्वरूप से अधिकरण का ज्ञान तथा अधिकरण- ६२
४६० सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ ... अथ स्वरूपमेव भेदप्रतिभासस्य विषय इति तत्त्वम्; तथापि सहप्रयोग एवानुपपन्नः परिहीयताम्, भेदेन तु किमपराद्धम् ? सोऽपि दृश्यत इति चेत् । सत्यम्; नैमित्तिकस्तु स्यात्, न स्वरूपतः । न हि 'घटमानय, पटमवलोकय' इत्यादौ भेदपदमपि प्रेक्षावानुपादत्ते । व्याख्यायान्तु मूढप्रबोधनार्थं 'घटः कुम्भः' इतिवत् सहप्रयोगेऽपि न दोषः । तथापि कः परमार्थः ? यथायथं त्रयमपि । घटस्य हि घटाद्यात्मना प्रतीतिः, अपटाद्यात्मना च प्रतीतिः, ततो वैशिष्ट्यप्रतीतिश्चेत्यनुभवसिद्धम् । तत्राभावस्य प्रथममात्रम्, अभावान्तरधर्मान्तराभावात् । सामान्यादिषु त्रिषु द्वयम्, धर्मान्तराभावात् । द्रव्यादित्रिषु त्रयम्, त्रयस्यापि सम्भवात् । भवति हि 'पटोऽयं न घटः, तन्तुमयश्चे'ति, 'गन्धोऽयं न रूपं सुरभिश्चे'ति, 'गतिरियं नोत्क्षेपणं तिर्यक् चे'ति । स्वरूप से अधिकरण के अज्ञानकाल में प्रतियोगी की स्मृति अन्योन्याभाव के ग्रहण की कारण है, इस तरह निरूपण हो ही सकता है । फिर, स्वरूपरूप भेद को ही भेद-ज्ञान का विषय मान लीजिये । इससे 'घटो भिन्नः' यह सहप्रयोग अनुपपन्न होता हो, तो उसे ही त्यागिये; भेद का क्या अपराध है कि उसका त्याग हो ? यदि कहें कि 'घटो भिन्नः' ऐसा सहप्रयोग भी देखा जाता है, अतः उसका त्याग नहीं हो सकता; तो ठीक है । सहप्रयोग दीखता है, किन्तु स्वभाव से नहीं, किसी निमित्त से । कारण 'घटमानय, पटमवलोकय' इत्यादि प्रयोगस्थलों में कोई भी बुद्धिमान् 'भिन्नं घटमानय' ऐसा प्रायः नहीं कहता । कहीं-कहीं व्याख्यान-काल में मूढ़ों को समझाने के लिए 'घटः कुम्भः' की तरह 'घटः भिन्नः' ऐसा जो सहप्रयोग होता है, वह दोषाधायक नहीं है । प्रश्न—तब भी इन स्वरूपादि त्रय में मुख्यार्थ कौन है ? उत्तर—यथास्थान तीनों ही ठीक हैं । घट की घट, मृत्कार्य आदि रूप से प्रतीति होती है, अपटादिरूप से प्रतीति होती है तथा उस पट से वैधर्म्यरूप धर्म से भी प्रतीति होती है, यह अनुभव- सिद्ध है । उन तीनों में से प्रथम (स्वरूपभेद) अभावमात्र में रहता है, कारण अभाव में अन्य अभाव या गुण, जाति आदि अन्य धर्म नहीं रहते । सामान्य, विशेष और समवाय इन तीनों में स्वरूपभेद और इतरेतराभाव दोनों रहते हैं । कारण इनमें अन्य धर्म नहीं रहते । द्रव्य, गुण और कर्म तीनों में तीनों अभाव रहते हैं, कारण तीनों का सम्भव है । 'यह
परिच्छेद ] भेद-लक्षण का खण्डन ४६१ लक्षणन्तु स्वरूपभेदस्य ताद्रूप्येणाप्रतीतौ प्रतीतिः। इतरेतराभावस्य त्वबाधितः समानाधिकरणो निषेधप्रत्ययः। वैधर्म्यस्य तु विरोधः, स चैकधर्मसमावेश इत्येषा दिगिति। अत्रोच्यते। तथाहि यत्तावत् पृष्टं किमेतेष्वन्यतमात्माऽस्य विषयः तदन्यो वेति तन्निर्वचनवादिनि शोभते, नास्मासु। प्रतिभासमानोऽयं भेदः स्वरूपादि- पक्षान्तर्भावानन्तर्भावाभ्यां वा सदसत्त्वाभ्यां वा अन्येनापि धर्मेण येन केनचिन्निरू- प्यमानोऽन्वयेन च व्यतिरेकेण वा बाध्यतामिति तेन सर्वेणानिर्वचनीय इति ब्रूमः। एतच्च न केवलं भेदस्यापि, तर्हि जगत एव। अनिर्वचनीयवादश्चायं यथा तथोदितं प्राक्। यदप्युक्तम् अथान्यतमेत्यादि गन्धे गन्धान्तरवदित्यन्तम्। तदपि न साधु; यया युक्त्यैकस्वीकारस्तयैव प्रवाहस्वीकारस्य दुर्वारत्वात्। तत्र यदि प्रवाह- 'पट है, घट नहीं है, तन्तुमय है', 'यह गन्ध है, रूप नहीं, सुरभि है'—'यह गति है, उत्क्षेपण नहीं है, तिर्यक् है' ऐसी प्रतीतियाँ होती हैं। 'तादात्म्य के प्रतियोगित्वरूप से अप्रतीति-काल में जो प्रतीति हो, उसका विषय' स्वरूपभेद का लक्षण है। 'समानाधिकरण और अबाधित निषेधप्रत्यय' इतरेतराभाव का लक्षण है। विरोध ही वैधर्म्य का लक्षण है। यह विरोध एकधर्मी में असमावेश है। भेद-समर्थन की यह दिक् ( संकेतमात्र ) है। खण्डन—अब समाधान करते हैं। श्रवण कीजिये, जो आपने यह प्रश्न किया है कि 'भेद-प्रतीति का विषय भेद स्वरूपादि रूप है या अन्यरूप ? यह निर्वचन- वादी के लिए ही फबता है, हम अनिर्वचनवादी के लिए नहीं। "प्रति- भासमान भी यह भेद स्वरूपादि तीनों पक्षों में अन्तर्भाव-अनन्तर्भाव से, सत्त्व-असत्त्व से या अन्य किसी धर्म से निरूपित होने पर अन्वय या व्यतिरेक से बाधित होता है, अतः उन सभी रूपों से वह अनिर्वचनीय है"—यही हम कहते हैं। हमारे मत से यह अनिर्वचनीयत्व केवल भेद का ही नहीं, अपितु सम्पूर्ण जगत् का ही है। यह अनिर्वचनीयतावाद जिस प्रकार सिद्ध होता है, वह पीछे कह ही आये हैं। जो आपने 'अथ अन्यतमेत्यादि' से 'गन्धे गन्धान्तरवत्' तक कहा है, वह ठीक नहीं है। कारण जिस भेदप्रतीति की अन्यथानुपपत्तिरूप युक्ति से एक का स्वीकार आप करते हैं, उसी युक्ति से प्रवाह का भी स्वीकार करना होगा। यदि भेद-प्रतीति
४६२ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ स्वीकारे तस्या असाधकत्वं स्वीक्रियते, एकस्वीकारेऽपि स्यात्, अविशिष्ट- लक्षणत्वात् । अत एव प्रतिभासमानत्वादेकस्वीकार इत्यप्ययुक्तम् । एकप्रतिभासिकाया युक्तेः सर्वसाधारण्यात् । न हि प्रत्यक्षादेव जायमानः प्रतिभासः प्रमाणं नानुमानादेरित्यत्र युक्तिरभ्युपगमो वा ? न चानवस्थाप्रसञ्जिका युक्तिरनुमानादेरन्या नाम । तर्कस्यापि व्याप्तिमूलत्वम्, सर्वश्वानुमानच्छायामापद्य दूषणमपि प्रवर्तत इति भवतैव व्युत्पादनात् । अतोऽनवस्थाप्रसञ्जिकाया युक्तेर्दोषो वा वक्तव्यः, त्यक्तव्यो वा स्वपक्षः । प्रवाहस्वीकारवदेकस्वीकारे नानवस्थेति चेत्; तत्किमनवस्थाभावविशिष्टा यास्तस्या युक्तेः साधकत्वं मन्यसे ? एवं तर्हि द्वितीयमात्रस्वीकारे नानवस्थेति की अन्यथानुपपत्तिरूप युक्ति भेदप्रवाह की असाधक (आभास) हो, तो वह एक की भी साधक नहीं होगी। कारण भेद-प्रतीति की अन्यथानुपपत्ति जैसे एक में है, वैसे ही प्रवाह में भी है; दोनों स्थलों की युक्ति में कोई भेद नहीं है। समर्थन—प्राथमिक भेद में युक्ति नहीं, प्रत्युत 'घटः पटो न' यह प्रत्यक्ष-प्रमाण है। प्रवाह में ऐसा प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं है, अतः उसका स्वीकार नहीं किया जा सकता। खण्डन—उस प्रत्यक्ष को आभास माननेवाले को आपको युक्ति अवश्य देनी होगी। वह युक्ति सर्वसाधारण है, अर्थात् प्रवाह की भी साधक है। समर्थन—द्विती- यादि भेदगोचर प्रत्यक्ष में आभासता का सन्देह भी नहीं होगा। खण्डन—केवल प्रत्यक्ष से जायमान प्रतिभास ही प्रमाण है, अनुमानादि से जायमान प्रतिभास प्रमाण नहीं; इसमें आप कोई युक्ति या वचन प्रमाण नहीं दे सकते। समर्थन—भेद-प्रवाह में भी कोई युक्ति नहीं है। यदि कोई अनवस्था की प्रसंजिका युक्ति भी हो तो वह अनुमान है, इसमें प्रमाण नहीं है। खंडन—यदि भेद में अन्य भेद न हो, तो वह प्राप्त भेद भी स्वाश्रय से अभिन्न होकर नष्ट हो जायगा, यह अभेद-प्रवाह के स्वीकार की साधक युक्ति भी अनुमानरूप ही है। समर्थन—यह युक्ति तर्करूप है, अनुमानरूप नहीं। खंडन—तर्क का मूल भी व्याप्ति ही है, अतः तर्क भी प्रमा का जनक है तथा उसका पर्यवसान विपर्यय में ही होता है और वह विपर्यय-पर्यवसान अनुमानरूप ही है। अनवस्था आदि सभी दूषण
परिच्छेद ] भेद-लक्षण का खण्डन ४६३ द्वितीयस्वीकारप्रसङ्गः । ओमिति चेत् ; परार्धपर्यन्तं प्रवाहस्वीकारं को वारयिता ? नैतावन्मात्रेण तुष्यति भवान्, परार्धादप्यधिकमेकादिकं किं नाभ्युपगम्यत इत्यपि भवता वक्तव्यमेव । तथाच सैवानवस्थेति चेत् ; सत्यं तस्यास्तु भयात् कीदृशमभ्युपगम्यतामिति निपुणं मन्त्रयामहे । द्वचादिकं परित्यज्यतामिति चेत् ; एकस्मिन्नाम कीदृशोऽनुग्रहः, येनान- वस्थाप्रवाहनिवेशविशेषेऽपि द्वयादिकमुपेक्षितम्, एकं तु रक्षितम् ? द्वितीयमादा- यानवस्थेति चेत् ; द्वितीयेऽपि यदि भवतोऽनुग्रहः स्यात् , 'तृतीयमादायानवस्थे'- अनुमान की छाया से युक्त होकर ही प्रवृत्त होते हैं, यह आपने ही कहा है । अतः अनवस्था-प्रसञ्जक युक्ति में दोष कहिये या प्रवाह के तुल्य एक का भी स्वीकार न करिये । समर्थन—प्रवाह के स्वीकार के तुल्य एक के स्वीकार में अनवस्था नहीं है, अतः एक का स्वीकार करते हैं। खण्डन—तो क्या अनवस्था के अभाव से विशिष्ट भेद-प्रतीति की अन्यथानुपपत्तिरूप युक्ति भेद की साधक है, ऐसा मानते हैं, तब तो केवल द्वितीय के स्वीकार में भी अनवस्था नहीं है। अतः द्वितीय का स्वीकार भी करना चाहिए । यदि आप द्वितीय का भी स्वीकार कर लें, तो इसी तरह तृतीय-चतुर्थ के स्वीकार में भी अनवस्था के न होने से तृतीय-चतुर्थ का भी स्वीकार करेंगे। फिर इसी प्रकार परार्धपर्यन्त के स्वीकार का वारण कौन कर सकेगा ? किञ्च—यदि परार्धपर्यन्त से ही आपको संतोष न हुआ, तो परार्ध से अधिक का भी आप स्वीकार क्यों नहीं करेंगे, यह भी आपको कहना चाहिए । यदि कहें कि ऐसा मानने में वही अनवस्था होगी, अतः ऐसा नहीं मानते, तो सत्य है । किन्तु उस अनवस्था के भय से कैसा मानना चाहिए, इसी बात को हम दोनों भलीभाँति विचारें । समर्थन—अनवस्था के भय से द्वितीय आदि को ही छोड़ दीजिये । खंडन— एक के प्रति ही आपका यह कैसा अनुराग है, जिससे अनवस्था के प्रवाह-निवेश में विशेष न होने पर भी द्वितीय आदि की उपेक्षा और एक की रक्षा करते हैं ? समर्थन—प्रथममात्र के स्वीकार में अनवस्था नहीं है और द्वितीय आदि के स्वीकार में अनवस्था है । खण्डन—इसी तरह यदि द्वितीय पर भी आपका अनुग्रह हो, तो 'तृतीय के स्वीकार में अनवस्था है' ऐसा कहकर आप द्वितीय की भी रक्षा
त्यभिधाय सोऽपि रञ्जितः स्यात् । तावेतौ भवतो रागद्वेषौ निःश्रेयसाय यतमानस्य मानसमास्कन्दमानौ न कल्याणोदर्कौ तर्कयामि । गन्धे गन्धान्तरप्रसञ्जिका न च युक्तिरस्ति । तदस्तित्वे वा का नो हानिः, तस्या अप्यस्माभिः खण्डनीयत्वात् । यदपि अथेतेरे'त्यादि 'निरूपणादि'त्यन्तम् । तदप्ययुक्तम् ; तथाहि— इतरेतराभावज्ञानं भेदव्यवहारहेतुं मन्यते यस्तस्य पक्षो नोपपन्न आत्माश्रय- प्रसङ्गादित्येवं ब्रुवाणस्य न किञ्चिद् बाधकमुक्तं स्यात् । प्रतियोगिरूपत्वेनेत्यादि समाधानं च प्रागेव दूषितम् । अथ 'स्वरूपमेवे'त्यादि 'न दोषः' इत्यन्तं यदुक्तम्; तदप्यस्मदनुक्तदोष- दूषणमित्युपेक्षितम् । करेंगे। मोक्ष के लिए यत्नशील आपके लिए ये पूर्वोक्त राग-द्वेष कल्याणकारी नहीं हैं, ऐसा हमारा अनुमान है । फिर, आपने जो यह दृष्टान्त दिया कि 'अनवस्था से जैसे गन्ध में अन्य गन्ध नहीं होता' इत्यादि, सो भी युक्त नहीं है । कारण गन्ध में अन्य गन्ध की साधक कोई युक्ति नहीं है । यदि युक्ति हो, तो उसे मानने में हानि ही क्या है ? इस प्रकार अनवस्था के भय से गन्ध में गन्ध के तुल्य प्रथम गन्ध भी सिद्ध नहीं होगा—यह दोष अनिर्वचनवादी को आप दे नहीं सकते । कारण इसी अनवस्थारूप युक्ति से प्रथम गन्ध का भी हम खण्डन करते ही हैं । आपने 'इतरेतराभाव' आदि से 'निरूपणात्' तक जो कुछ कहा, वह भी अयुक्त है । देखिये—'इतरेतराभाव भेद-व्यवहार का हेतु है' ऐसा कहनेवाले का पक्ष आत्माश्रय होने से अयुक्त है, इस कथन पर आपने कोई बाधक युक्ति तो दी नहीं । 'प्रतियोगित्वरूप से प्रतियोगी के अस्मृतिकाल में अधिकरणत्वरूप से अधिकरण की प्रतीति तथा अधिकरणत्वरूप से अधिकरण की अप्रतीति-काल में प्रतियोगित्वरूप से प्रतियोगी की स्मृति, भेदज्ञान में कारण है, अतः आत्माश्रय नहीं है,' इस युक्ति का खण्डन तो हम पहले ही कर आये हैं । अर्थात् निषेध्य-निषेध का सांकर्य हो जायगा, यह सब कह ही आये हैं । 'अथ स्वरूप एव' इत्यादि से 'न दोषः' यहाँ तक जो कहा है, वह भी हमारे द्वारा अनुक्त दोष का दूषण (खण्डन) है । अतः हम उसकी उपेक्षा करते हैं ।
परिच्छेद ] भेद लक्षण का खण्डन ४६५ यदपि 'तथाऽपि क' इत्यादि 'तिर्यक् चे'त्यन्तम्; तदपि गर्तवर्तिगोधामसांस- विभजनन्यायमनुहरति । पक्षत्रयस्याऽप्युक्तयुक्त्या आच्छादितस्य दर्शयितुम- शक्यत्वेन तद्विभागव्यवस्थितेरनवसरनिरस्तत्वात् । यच्च स्वरूपभेदस्य लक्षणमुक्तम्—ताद्रूप्येणाप्रतीतौ प्रतीतिरिति । तदप्य- वद्यम्; यदेकमेव वस्तु भ्रान्त्या भिन्नमिति प्रतीयते, तत्र ताद्रूप्येणैकस्यैकरूपतया प्रतीतिर्नास्ति । अस्ति च प्रतीतिः, न च स्वरूपभेद इत्यतिव्याप्तिः । ताद्रूप्येणेत्यस्य धर्मान्तररूपभेदासङ्कीर्णोदाहरणार्थत्वात् प्रतीतिरभ्रान्ता विवक्षितेति चेत्; स्वरूपप्रतीतेस्तत्राप्यभ्रान्तत्वात् । यच्च स्वरूपमात्रेण प्रतीयते वस्तु, न तत्ताद्रूप्येण, न च नानात्म- तया, वस्तुगत्या चैकमेव तत्, तत्रापि स्वरूपलक्षणो भेदः स्यात् । नास्त्येवेदृशमुदाहरणम्, ताद्रूप्याताद्रूप्याभ्यामेकस्यावश्यं प्रतीतेरिति चेन्न । 'तथापि कः परमार्थः' इत्यादि से 'तिर्यक् च' यहाँ तक जो ग्रन्थ है, वह भी बिल में स्थित गोधा (गिरगिट) का मांस व्याधों द्वारा बाँटने की तरह है । अर्थात् अप्राप्त विषय होने से उसकी तरह भेद का वह विभागीकरण उपहासास्पद है । उक्त युक्तियों से तीनों प्रकार के भेद खण्डित हैं। एवञ्च उन भेदों को आप दिखा नहीं सकते । इसलिए उनके विभाग का खण्डन अवसरप्राप्त नहीं (अप्रासंगिक) है । फिर, स्वरूप-भेद का आपने जो यह लक्षण किया कि 'ताद्रूप्य से अप्रतीति-काल में प्रतीति स्वरूप-भेद है', वह भी सदोष है । देखिये—जो चन्द्र आदि एक वस्तुरूप है, पर भ्रान्ति से दो (भिन्न) प्रतीत होता है, वहाँ ताद्रूप्य (एकरूप) से एक की एक- रूपेण प्रतीति नहीं है, अतः वह स्वरूप-भेद नहीं है। एवञ्च वहाँ अतिव्याप्ति हो जायगी । समर्थन—'ताद्रूप्य' शब्द 'वैधर्म्य' और 'अन्योन्याभाव' इन दो भेदों से असंकीर्ण उदाहरण के प्रदर्शनार्थ है और लक्षणघटक प्रतीति यथार्थ ही विवक्षित है । अतः वहाँ अतिव्याप्ति नहीं होगी । खंडन—वहाँ भी स्वरूप की प्रतीति यथार्थ ही है । किञ्च—जो वस्तु स्वरूपमात्र से प्रतीत हो, एकत्वरूप से या नानारूप से प्रतीत न हो, पर वस्तुतः एकरूप ही वह हो, वहाँ भी स्वरूप-भेद हो जायगा । यदि कहें कि ऐसा उदाहरण नहीं है, कारण ताद्रूप्य या अताद्रूप्य दोनों में से एकरूप से अवश्य प्रतीति होती है, तो 'ऐसी प्रतीति नहीं होती' इस कलह का अवकाश ही नहीं है । कारण 'जो तुमने देखा है, वह एक है या अनेक ?' ऐसा प्रश्न
४६६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ प्रतीतिकलहानवकाशात् । भवति हि यद्यथा तत्र दृष्टम्, तत् किमेकमनेकं वेत्य- न्युक्तो नायं विशेषो मया शङ्कितो जिज्ञासितो वा । स्वरूपमात्रन्तु प्रतीत्याह- मुदासीनोऽभूवमित्यभिधत्त इति । ननु तदपि स्वरूपं भेद एव कस्मादपि, तत् कथमुक्तदोषावतार इति । मैवम्; एवं हि ताद्रूप्येणाप्रतीताविति व्यर्थं स्यात् । प्रतीतिमात्रं लक्षणं वक्तव्यम् । यत्प्रमेयं तत् कस्मादप्यवश्यं भिन्नमिति एकस्यैव स्वस्माद्भेदप्रसङ्गनिराकरणार्थमपि ताद्रू- प्येणाप्रतीतावित्युक्तम्, तच्च खण्डितमिति । ताद्रूप्यमन्यरूपत्वं विवक्षितमिति चेन्न । तदा हि तदाऽनुपस्थापितपरामर्श- होने पर 'इस विशेष विषय में मुझे न तो शङ्का हुई, न जिज्ञासा, केवल स्वरूप को देखकर ही मैं उदासीन हो गया था' ऐसा उत्तर कहा जाता है । समर्थन—वह भी स्वरूप किसीसे भिन्न ही है, अतः लक्ष्य होने से लक्षण का जाना भूषण ही है। खण्डन — यदि ऐसा है, तो प्रतीतिमात्र को ही लक्षण कहिये । ताद्रूप्य से अप्रतीति विशेषण व्यर्थ है, कारण जो प्रमेय है, वह अवश्य किसीसे भिन्न है, अतः प्रमेयमात्र लक्ष्य ही है। स्व से स्व में भेद-व्यवहार न हो, इसीलिए ताद्रूप्य से अप्रतीति यह विशेषण है, पर वह उक्त दोष से खण्डित ही है। समर्थन—लक्षण-घटक ताद्रूप्य के एकदेश तद्रूपशब्द से स्वरूप-भेद से अन्य का परामर्श होने से 'स्वरूप-भेद से अन्यत्वरूप से अप्रतीति-काल में जो प्रतीति, वह स्वरूपरूप भेद है,' ऐसा कहेंगे। खण्डन— इस लक्षण के घटक 'अन्य' शब्द से यदि स्वरूपभेद का ग्रहण करें, तो स्वरूप-भेद के लक्षण में स्वरूप-भेद का प्रवेश होने से आत्माश्रय हो जायगा। जैसे अन्य शब्द से अनुपस्थापित अन्यत्व का ताद्रूप्यघटक तद्रूपशब्द के परामर्श से आत्माश्रय होता है। लक्षणघटक अन्य स्वरूप-भेद है और लक्ष्य अन्य है, यह भी नहीं कह सकते, कारण स्वरूप-भेदमात्र लक्ष्य है। यदि लक्षण-घटक 'अन्य'-शब्द अन्योन्याभावपरक मानें, तो अन्योन्याभाव से स्वरूप-भेद का और स्वरूपभेद के प्रतियोगिरूप होने से स्वरूपभेद से अन्योन्याभाव का ज्ञान होने से अन्योन्याश्रय हो जायगा। यदि लक्षण में वैधर्म्यरूप भेद का प्रवेश करें, तो तदन्योन्याभावसमानाधि- करण धर्म ही तद्वैधर्म्य है, अतः अन्योन्याभाव से वैधर्म्य का और वैधर्म्य
यत् अन्यत्वस्यं स्वरूपभेदत्वे आत्माश्रयः, सर्वस्वरूपाणां लक्ष्यत्वात् । अन्यो- न्याभावत्वे चान्योन्याश्रयः, वैधर्म्ये च चक्रकम् । यदपि—इतरेतराभावस्य लक्षणमबाधितः समानाधिकरणो निषेधप्रत्ययः । एतदप्यशोभनम् ; समानाधिकरण इत्यादि भाषायाः कथं कथमपि तात्पर्यं- गवेषणेऽपि समानाधिकरणो यो निषेधस्तत्प्रत्ययविषयोऽन्योन्याभाव इति पर्यवसाने समानाधिकरण इति किं तुल्याश्रयः , उतैकाश्रयः, उत तादात्म्यप्रति- योगिकः, उत अधिकरणभूतपदार्थवाचिशब्दविशेषणविशेष्यभावव्यवस्थितपदा- भिधेयः , उत अन्यदेव ? तत्र न प्रथमः ; तुहिनमयूखे प्रियामुखे च न दूषणकणस्यापि सम्भव इति प्रत्ययस्यापि दर्शनात् । तत्र मुखचन्द्रयोरन्योन्याभावोऽस्तीति चेन्न । तस्य सत्त्वेऽप्युक्तप्रत्ययस्य तदविषयत्वात् । माऽस्तु तद्विषयो लक्षणं त्वस्यैतत्, तच्च तद्विषयत्वेऽप्यदुष्टमिति चेत्; कीदृशं से स्वरूप-भेद का और स्वरूप-भेद से अन्योन्याभाव का निरूपण होने से चक्रक हो जायगा । ‘इतरेतराभाव’ का जो ‘अबाधित और समानाधिकरण निषेधप्रत्यय’ यह लक्षण है, वह भी अशोभन है। ‘समानाधिकरण’ इत्यादि शब्दों के अभिप्राय का किसी प्रकार अन्वेषण करने पर ‘समानाधिकरण जो निषेध, उसकी प्रतीति का विषय अन्योन्याभाव है’ ऐसा लक्षणार्थ निश्चित होता है। वहाँ ‘समानाधिकरण’ शब्द का अर्थ क्या तुल्याश्रय है, एकाश्रय है, तादात्म्य-प्रतियोगिकत्व है, अधिकरणभूत जो पदार्थ तद्वाचक शब्द के विशेष्य-विशेषणभाव से स्थित पद से अभिधेयत्व है या अन्य ही कुछ अर्थ है ? इनमें प्रथम पक्ष युक्त नहीं है, कारण ‘चन्द्रे स्त्रीमुखे च दोषकणोऽपि नास्ति’ इस प्रतीति के विषय अत्यन्ताभाव में अतिव्याप्ति हो जायगी। ‘वहाँ मुख और चन्द्र में परस्पर भेद ही है, अतः वह लक्ष्य ही है’ ऐसा नहीं कह सकते, कारण मुख और चन्द्र का भेद होने पर भी वह ‘चन्द्रे मुखे च दोषकणोऽपि नास्ति’ इस प्रतीति का विषय नहीं है । समर्थन—‘चन्द्रे मुखे च दोषकणोऽपि नास्ति’ इस प्रतीति का विषय भेद न हो, तो हानि क्या है, कारण यह अन्योन्याभाव का लक्षण है। वह लक्षण ‘मुखं न चन्द्रः’ इस प्रतीति को ग्रहण कर उक्त भेद में समन्वित होने से दुष्ट नहीं है। खण्डन— कैसा वह लक्षण है ? ‘समानाधिकरण जो निषेध, तत् प्रतीतिविषय अन्योन्याभाव है’ ६३
४६८ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ तर्हीदं लक्षणम् ? न तावत्समानाधिकरणो यो निषेधस्तत्प्रत्ययो यस्तस्य यो विषयः, सोऽन्योन्याभाव इति । नापि स एवान्योन्याभाव इति । नापि यत्र समानाधिकरणो निषेधप्रत्ययस्तत्र योऽस्ति सोऽन्योन्याभाव इत्यस्तु, तद्धर्मस्य सर्वस्यान्योन्याभावत्वापातात्, समानाधिकरणवैयर्थ्यप्रसङ्गाच्च। एतेनैकमुदाहरणमादाय द्वितीयोऽपि निरस्तः । नापि तृतीयः ; तादात्म्यप्रतिसन्धानव्यतिरेकेण तत्प्रतियोगिकत्वस्य प्रत्येतु- मशक्यतया तन्निर्वचनप्रसङ्गात् । तच्चाशक्यम् । तथाहि—तदेकत्वं वा भेदाभावो वा ? स्वरूपं त्वसम्भावितम्, तस्य भेदत्वोपगमात्, तस्मिन् दृष्टेऽपि तन्न वेति तादात्म्यसंशयानवकाशापत्तेः । आद्येऽपि संख्याविशेषो वा धर्मान्तरं वा ? नाद्यः ; गुणादौ तदभावप्रसङ्गात् । यह लक्षण तो ‘चन्द्रे मुखे च दोषकणोऽपि नास्ति’ इस प्रतीति के विषय अत्यन्ताभाव में अतिव्याप्त होने से असङ्गत है । ‘उक्त प्रतीति ही अन्योन्याभाव है’, यह लक्षण भी उक्त प्रतीति के अविषय अन्योन्याभाव में अव्याप्त होने से असङ्गत है । ‘समानाधिकरण निषेध-प्रत्यय जिसमें हो, उसका धर्म अन्योन्याभाव है’, यह लक्षण भी युक्त नहीं । कारण घटादिनिष्ठ धर्ममात्र अन्योन्याभाव हो जायगा । किञ्च— पटनिष्ठ अत्यन्ताभाव में समन्वय होने से उसकी व्यावृत्ति के लिए दिया गया ‘समाना- धिकरण’ पद व्यर्थ हो जायगा । ‘समानाधिकरण’ पद का अर्थ एकाश्रयं है, यह द्वितीय कल्प भी युक्त नहीं । कारण ‘चन्द्रे मुखे च दोषकणोऽपि नास्ति’ यहाँ अत्यन्ताभाव में अतिव्याप्ति हो जायगी । ‘तादात्म्य है प्रतियोगी जिसका, वह अन्योन्याभाव है’ यह तृतीय कल्प भी युक्त नहीं है, कारण जबतक तादात्म्य का ज्ञान न हो, तबतक तत्प्रतियोगिक अभाव का ज्ञान अशक्य है । अतः प्रथम तादात्म्य का निर्वचन करना होगा, किन्तु वह असंभव है । देखिये—क्या तादात्म्य एकत्व है या भेदाभाव है ? स्वरूपरूप तो तादात्म्य हो नहीं सकता, कारण स्वरूप भेद है और तादात्म्य भेद का अभावरूप है । किंच यदि तादात्म्य को स्वरूपरूप मानें, तो स्वरूप के प्रत्यक्ष होने पर ‘तत् न वा’ ऐसा तादात्म्य-भ्रम नहीं होना चाहिए । फिर, तादात्म्य एकत्वरूप है, इस प्रथम कल्प में भी वह एकत्व संख्यारूप है या अन्य धर्मरूप है ? संख्यारूप नहीं हो सकता, कारण ‘गुणे गुणानङ्गीकारः’ इस
रिच्छेद ] भेद-लक्षण का खण्डन ४६६ थमे क्षणे कार्यद्रव्यस्यैकस्यापि स्वातादात्म्यप्रसङ्गात् । वैशेषिकमते व्युत्थाने वैकत्वे तदभावप्रसङ्गात् । उपाधिभिन्नाववलम्बि च तादात्म्यं कथं स्वरूप- मात्रावलम्बेनैकत्वीकर्तुं शक्यम्, विचित्रप्रतिपत्तिकत्वात् । नापि द्वितीयः ; तस्यापि धर्मान्तरापेक्षयाऽनवस्थापातात्, अनपेक्षायां स्वातादात्म्यप्रसङ्गात् । नापि द्वितीयः ; स हि भेदस्याभावो भवन्नप्यन्योन्याभावस्यैव स्यात्, अन्योन्याभावस्य च तत्प्रतिषेधात्मकत्वात् तेनाप्यन्योन्याभावप्रतिषेधात्मना भवितव्यम् ; परस्परप्रतिषेधात्मकत्वान्निषेध्यनिषेधयोः । तथाच सति अन्योन्या- भावप्रतीतिमन्तरेण तन्निरूपणमशक्यं निषेध्यप्रतीतिसापेक्षत्वान्निषेधबुद्धे- रित्यन्योन्याश्रयः । नापि तुरीयः ; 'निर्घटं भूतलमित्यत्रापि प्रसङ्गात् । सिद्धान्त के अनुसार गुण में संख्या के तादात्म्य का अभाव हो जायगा । प्रथम क्षण में एक कार्यद्रव्य में भी स्व का अतादात्म्य हो जायगा । यदि 'गुणे गुणानङ्गीकारः' इस वैशेषिक सिद्धान्त को न भी मानें, तो भी अनवस्था के भय से एकत्व में एकत्व न होने से एकत्व में तादात्म्य का अभाव हो जायगा । किंच-भिन्न-भिन्न धर्मों में स्थित नानारूप तादात्म्य का, एकत्व में एक अनुगमकरूप न होने से, स्वरूपमात्र के प्रतिपादक एकत्व-शब्द से कथन कैसे होगा ? कारण अनुगमक एकरूप न होने से एकत्व की प्रतिपत्ति विभिन्नविषयक है । एकत्व धर्मरूप है, यह द्वितीय कल्प भी अयुक्त है, कारण धर्म में धर्म मानें, तो अनवस्था हो जायगी । यदि धर्म में धर्म न मानें, तो उस धर्म का अतादात्म्य हो जायगा । भेद का अभाव तादात्म्य है, यह द्वितीय कल्प भी अयुक्त है। कारण तादात्म्य भेद का अभाव होनेपर भी स्वरूपरूप या वैधर्म्यरूप भेद का अभाव नहीं है, किन्तु अन्योन्याभावरूप भेद का ही अभाव है। कारण अन्योन्याभाव तादात्म्य का निषेध- रूप है, इसलिए तादात्म्य भी अन्योन्याभाव का निषेधरूप है; क्योंकि निषेध्य-निषेध दोनों परस्पर प्रतिक्षेपरूप होते हैं । तब तो अन्योन्याभाव की प्रतीति के बिना तादात्म्य का ज्ञान अशक्य है, कारण निषेधबुद्धि निषेध्यबुद्धि की अपेक्षा करके ही होती है, अतः अन्योन्याश्रय हो जायगा । 'अधिकरणरूप अर्थ के वाचक पद के साथ विशेष्य-विशेषणभाव से व्यवस्थित पद से.अभिधेय अन्योन्याभाव है' यह चतुर्थ कल्प भी 'निर्घटं भूतलं' इस प्रतीति से सिद्ध अत्यन्ताभाव में अतिव्याप्त होने से असङ्गत है ।
५४८ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ
नापि पञ्चमः ; समानाधिकरण इति प्रतियोगिसमानाधिकरणो विवक्षितः, तादृशश्च निषेधोऽन्योन्याभावः, तत्प्रत्ययश्च तल्लक्षणमित्यस्याप्ययुक्तत्वात् । भावसमानाधिकरणास्यान्योन्याभावस्य 'कुम्भः पटत्वं न भवती'त्यादेरव्यापनात् । तज्जातीयतथात्वं च यं विशेषमन्योन्याभावगतमादाय स्यात्तदेव लक्षणी- भवनसमर्थमुपजीव्यमानमस्य लक्षणस्योपन्यासं प्रत्यादिशति । न च तदपि सम्भवति, अन्योन्याभावसंसर्गाभावभेदखण्डनप्रस्तावे निरस्तत्वात् । प्रकारान्तरस्य चासम्भवात् । न च पटत्वं न भवतीत्ययमेवाभावो घटः पटत्वं न भवतीत्येक एव । एवं प्रतियो- ग्यैक्येन मयाऽत्र तथाऽभ्युपगमादिति क्वचित् प्रतियोगिसमानदेशत्वादपि लक्षण- सिद्धिरिति वाच्यम् । तथापि प्रतियोग्यैक्येन तदत्यन्ताभावस्यैक्यापत्तेः, तादात्म्य- वत्संयोगस्यापि द्विष्टत्वाविशेषादतिव्याप्तेः ।
पञ्चम कल्प भी असङ्गत है । देखिये—यदि 'समानाधिकरण' से प्रतियोगी से समानाधिकरण विवक्षित हो, तो 'प्रतियोगी से समानाधिकरण जो निषेध, तत्प्रतीति' लक्षण हुआ । पर यह असङ्गत है, कारण प्रतियोगी के असमानाधिकरण 'कुम्भः पटत्वं न भवति' इत्याकारक प्रतीतिसिद्ध अन्योन्याभाव में अव्याप्ति हो जायगी । समर्थन—'प्रतियोगी का समानाधिकरण जो निषेध, तत्प्रतीति-विषयवृत्ति जातीयत्व अन्योन्याभाव है,' ऐसा लक्षण करेंगे । खण्डन—अन्योन्याभाव में स्थित जिस धर्म का ग्रहण कर उक्त लक्षण करेंगे, उपजीव्य होने से उसी धर्म को लक्षण मानिये । वह लक्षण ही उक्त लक्षण का प्रत्याख्यान कर देगा । फिर, अन्योन्याभाव- संसर्गाभाव के भेद-खण्डन के प्रस्ताव में खण्डित होने से अन्योन्याभावनिष्ठ वैसे किसी धर्म का सम्भव भी नहीं है । इनके अतिरिक्त प्रकारान्तर हो ही नहीं सकता । समर्थन—'पटः पटत्वं न', 'घटः पटत्वं न' इन दो प्रतीतियों के विषय, भेदप्रति- योगियों के एक होने से, एक ही हैं और वह भेद कहीं ( पट में ) प्रतियोगी से समान- धिकरण है । अतः समन्वय होने से यह लक्षण युक्त ही है । खण्डन—यदि प्रतियोगी के एक होने से अभाव एक हो, तो अन्योन्याभाव और संसर्गाभाव भी एक हो जायेंगे । यदि कहें कि 'अन्योन्याभाव का प्रतियोगी तादात्म्य है और वह ( तादात्म्य ) दो में है, अतः दोनों अभाव एक नहीं हैं, तो संसर्ग भी संसर्गाभाव का प्रतियोगी है और वह भी दो में रहता है, अतः दोनों तुल्य ही हैं ।
परिच्छेद ] भेद-लक्षण का खण्डन ५०१ कालभेदेन च प्रागभावादेरपि प्रतियोगिसमानाधिकरणतयाऽतिव्याप्तेः, कालैक्येन च विशेषणे च तदन्योन्यव्यतिरेकाव्याप्तेरिति । यदपि धर्मान्तरस्य लक्षणमवादि वैधर्म्यस्य विरोधः, स चैकधर्म्यसमावेश इति । तदप्युद्भ्रान्तमनसो भाषितम्; तथाहि-प्रमाणप्रमेययोर्भेदोऽस्ति न वा ? न चेत्तदभिधानस्य पर्यायत्वप्रसङ्गः, किं प्रामाणिका बुद्धिरित्युक्ते बुद्धिविषयेणो- त्तरप्रसङ्गश्च । नापि प्रथमः ; स हि न तावत्स्वरूपलक्षणः, तुलादिद्रव्यस्य एकस्याप्युभय- भावदर्शनात् । अत एव नान्योन्याभावोऽपि । धर्मान्तरं तु तयोर्भेदः परिशिष्यते, यतोऽन्येन रूपेण तत्प्रमाणमन्येन च तदेव प्रमेयमित्युच्यते । तथाच सत्येकधर्म्य- समावेशो लक्षणमव्यापकम् । सोऽयं 'प्रमेयता च तुलाप्रामाण्यवदि'ति पारमर्षमपि परामर्शं व्यस्मार्षीदित्यास्तां विस्तरः । किञ्च—काल-भेद से प्रागभाव और ध्वंसाभाव भी प्रतियोगी के समानाधिकरण हैं, अतः उनमें अतिव्याप्ति हो जायगी । यदि 'एक काल में जो प्रतियोगी के साथ समानाधिकरण हो' ऐसा निवेश करें, तो 'कालो न' इत्याकारक प्रतीतिसिद्ध अन्योन्याभाव- में अव्याप्ति हो जायगी । कारण काल में काल न होने से कालान्योन्याभाव कालरूप प्रतियोगी से समानाधिकरण नहीं है । आपने यह जो कहा कि “धर्मान्तर' का लक्षण 'वैधर्म्य का विरोध' है और वह विरोध एकधर्मी में असमावेशरूप है” यह भी भ्रान्त पुरुष का भाषण है । देखिये— प्रमाण, प्रमेय में परस्पर भेद है या नहीं ? यदि नहीं है, तो दोनों पर्याय हो जायेंगे । किञ्च—'बुद्धि में क्या प्रमाण है ?' यह पूछने पर चक्षुरादि को न कहकर प्रमेय का ही अभिधान होने लगेगा । प्रमाण, प्रमेय में भेद है, यह प्रथम पक्ष भी अयुक्त है; कारण तुलादि एक ही द्रव्य प्रमाण और प्रमेय उभयरूप है । अतः उन दोनों में स्वरूप-भेद नहीं हो सकता । प्रमाण और प्रमेय दोनों के एकरूप होने से अन्योन्याभावरूप भेद भी नहीं हो सकता, किन्तु वैधर्म्यरूप में भेद हो सकता है। कारण प्रमितिकरणस्वरूप धर्म से वह (तुलादि) प्रमाण है और प्रमितिविषयत्वरूप धर्म से प्रमेय है। यदि ऐसा है, तो उस वैधर्म्यभेद के उदाहरण-स्थल में एकधर्मी में दोनों का समावेश होने से लक्षण की अव्याप्ति हो जायगी । इस तरह आपने 'प्रमेयता च तुलाप्रामाण्यवत्' इस परम ऋषि गौतम के परामर्श को भी भुला दिया ! अतः इस सम्बन्धमें अधिक विस्तार बस हो ।
५०२ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ
ननु भेदप्रतिपत्तेस्तावत् प्रत्यक्षफलस्यार्थेन्द्रियसन्निकर्षः कारणमसाधारणं वक्तव्यम् । तत्र य एवेन्द्रियसन्निकर्षस्य भेदप्रतिपत्तिहेतोर्द्वितीयः सम्बन्धी, स एव भेदोऽस्तु । न; उक्तबाधकैर्बाधितायाः प्रतीतेरर्थसन्निकर्षकारणत्वाभावादिति । कारणत्व-लक्षण-खण्डनम् किं पुनस्तत्कारणत्वम् ? पूर्वभावित्वमिति चेन्न । चिरपध्वस्तानामपि कारणत्वप्रसङ्गात् । अव्यवहित- पूर्वभावित्वमिति चेन्न । व्यापारस्यैव कारणत्वप्रसङ्गात् । व्यापारेण न व्यवधानमिति चेन्न । कारणकारणस्यापि कारणत्वप्रसङ्गात् । कारणस्यातद्व्यापारत्वात् नैवमिति चेन्न । विना विशेषोक्तिं तस्य दुर्विषेकत्वात् । समर्थन—प्रत्यक्ष है फल जिसका, ऐसी जो भेद-प्रतिपत्ति, उसका अर्थ और इन्द्रिय-सन्निकर्ष कारण कहना ही होगा । 'भेद-प्रतिपत्तिजनक उसी सन्निकर्ष का इन्द्रिय से भिन्न जो सम्बन्धी है, वह भेद है', ऐसा लक्षण करेंगे । खण्डन—पूर्वोक्त युक्तियों से बाधित उक्त प्रतीति को अर्थ-इन्द्रिय-सन्निकर्ष से जन्य मानने में कुछ प्रमाण नहीं है । कारणत्व-लक्षण का खण्डन फिर वह कारणत्व भी क्या वस्तु है, अर्थात् लक्षण न होने से वह अनिर्वचनीय है । समर्थन—कार्य से पूर्ववर्ती कारण है । खंडन—जो पूर्वभावी होता हुआ भी चिर-नष्ट है, अतएव कार्य से सम्बन्धरहित है, उसमें अतिव्याप्ति हो जायगी । समर्थन—'कार्य से अव्यवहित पूर्ववर्ती कारण है' ऐसा कहेंगे । खण्डन—स्वर्ग से अव्यवहित पूर्ववर्ती होने से अदृष्ट ही स्वर्ग का कारण होगा । अर्थात् यागरूप क्रिया, व्यवधान होने से, कारण न हो सकेगी । समर्थन—अपूर्व यागरूप क्रिया का व्यापार है और व्यापार से व्यापारी का व्यवधान नहीं होता, अतः याग में अव्याप्ति नहीं होगी । खंडन—घट के कारण (कुलाल) का कारण (कुलाल का पिता) भी घट का कारण हो जायगा । समर्थन— घटरूप कार्य में कुलाल अपने पिता का व्यापार नहीं है । खंडन—जबतक व्यापार का लक्षण न हो, तबतक अपूर्व याग का व्यापार है और कुलाल अपने पिता का व्यापार नहीं है, यह कैसे कह सकते हैं ?
परिच्छेद ] कारणत्व-लक्षण का खण्डन ५०३ यद्विना यद्यन्न जनयति, तत् तस्यावान्तरव्यापार इति चेन्न । सहकारिणामपि तथात्वप्रसङ्गात् । तज्जन्यमिति चेन्न । तथापि कारणत्वाव्यवस्थितौ विशेषोक्तेरति- प्रसक्तेः । कथमपि विशेषोक्तौ गगनादेः सर्वत्र कार्ये हेतुत्वप्रसङ्गात् । अनन्यथासिद्धपूर्वभावित्वमिति चेन्न । वक्तव्यं हि कस्मादन्येन प्रकारेण विना, का च सिद्धिरिति ? यदि हि कार्यादन्येन प्रकारेण न निष्पत्तिः, तदा- ऽसिद्धिः, नहि कार्येण कारणस्योत्पादनम् । नापि कार्याद्-येन प्रकारेण न ज्ञप्तिः, प्रत्यक्षादेरपि कारणत्वज्ञप्तेः, न खलु सर्वा कार्यलिङ्गजा कारणस्य ज्ञप्तिः । नापि कारणत्वात् व्यतिरिक्तेन प्रकारेण न निष्पत्तिर्ज्ञप्तिर्वा, ज्ञप्तावात्मा- श्रयात् । प्रकारान्तरवत्तयाऽपि च तदुपगमात् । समर्थन---'जो जिसके बिना जिसे उत्पन्न न कर सके, उस कार्य में वह उसका व्यापार है।' कुलाल के बिना भी उसका पिता घट का उत्पादन कर सकता है, अतः कुलाल व्यापार नहीं है। खण्डन - व्यापार का ऐसा लक्षण करने पर चक्ररूप सहकारी कारण भी दण्ड का व्यापार हो जायगा। कारण चक्र के बिना भी दण्ड घट का उत्पादन नहीं कर सकता । समर्थन-जो जिस स्वजन्यके बिना जिसे उत्पन्न न कर सके, उस कार्य में वह उसका व्यापार है। चक्र दण्डजन्य नहीं है, अतः वह व्यापार नहीं होगा। खण्डन - जबतक कारणत्व का लक्षण न हो, तबतक जन्यत्वघटित व्यापार का लक्षण ही हो नहीं सकता। किसी प्रकार व्यापार का लक्षण करें भी, तो कार्यमात्र के अव्यवहित पूर्ववर्ती होने से गगन भी कारण हो जायगा। समर्थन-'अनन्यथासिद्ध पूर्वभावी कारण है' ऐसा लक्षण करेंगे । खंडन-कहिये कि किससे अन्य प्रकार के बिना और सिद्धि क्या वस्तु है, अर्थात् सिद्धि शब्द का क्या अर्थ है ? 'कार्य से अन्य प्रकार से निष्पत्ति का अभाव' यह अर्थ हो, तो वह ठीक नहीं । कारण कार्य से कारण की उत्पत्ति नहीं होती । 'कार्य से अन्य प्रकार से ज्ञान का अभाव' यह अर्थ भी नहीं हो सकता; कारण प्रत्यक्ष से भी कारणत्व का ज्ञान होने से सभी कारणों का कार्यों से ज्ञानं होता हो, ऐसा नियम नहीं है। 'कारणत्व से अन्य प्रकार से निष्पत्ति का अभाव या ज्ञान का अभाव' भी अर्थ नहीं हो सकता । कारण स्व में स्व की उत्पत्ति या ज्ञान न होने से आत्माश्रय हो जायगा । किञ्च - दण्डत्वरूप से भी दण्ड का ज्ञान हो सकने से 'कारणत्व से ही कारण का ज्ञान हो' यह कोई नियम नहीं है।