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खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

५४ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम भावमासादयन्त्यां श्रुतिस्तत्र तत्राऽप्रतिद्वन्द्वित्वाऽसङ्कुचितस्वतःप्रामाण्यबललब्ध- तत्तदर्थैक्यान्यथानुपपत्तिसहायसम्पदजय्या तयोरप्यभेदं बोधयन्ती न प्रतिहन्तुं शक्येति न क्वचिदपि प्रतिहतप्रसरा सती सर्वाद्वैतप्रमापिकेति । भेदप्रमान्यथानुपपत्त्या च वैपरीत्यमशक्यम्, तत्राद्वैतश्रुत्या सन्दिह्यमानस्य प्रमात्वस्यैवासिद्धेः, भेदधीमात्रस्य च द्विचन्द्रादिवोधवदन्यथोपपत्तेः । 'एकम्' इत्युपादाय यद् एवकारमप्युपादत्ते श्रुतिः 'एकमेवेदम्' इतिरूपा, तदैकान्तिकमैक्यं बोधयतीति भेदाभेदेनाप्यशक्यसमर्थनं घटपटादिभेदग्राहि प्रत्य- क्षादिप्रामाण्यमिति । बुद्धेर्विरम्य व्यापाराभावात् कथमित्थमिति चेन्न । श्रुतितो द्रागेव जातायाः सर्वविषयाया अद्वैतधियोऽस्मद्बुद्धय एवंविधविचारसोपानपरम्परामारोहन्त्यो नानाविषयेषु तत्प्रामाण्यविषयाः क्रमेण परिनितिष्ठन्तीत्युच्यमानत्वात् । में प्रतिद्वन्द्वी के न होने से असङ्कुचित और स्वप्रामाण्य के बल से लब्ध जो स्व ( श्रौत-बुद्धि ) से घट-पट आदि अर्थों का ऐक्य, उसकी जो अन्यथानुपपत्ति है, उसकी सहायता से अजेय—घट-पट के भी अभेद का बोधन करती हुई—बोधन के अयोग्य कहीं भी न रुकनेवाली—अद्वैत श्रुति, सब पदार्थों के अद्वैत की प्रमा करायेगी । प्रश्न—'घटः पटाद् भिन्नः' इत्याकारक घट-पट के भेद की प्रमा ही अनुपपन्न होकर अद्वैत-श्रुति का सर्वत्र बाध क्यों नहीं कर देती ? उत्तर—अद्वैत-श्रुति से भेद- प्रत्यक्ष में सन्देह होता है, अतः उसमें प्रमात्व की सिद्धि ही नहीं होगी । फलतः भेद- प्रत्यक्षमात्र द्वि-चन्द्रादि-ज्ञानसदृश भ्रम में ही पर्यवसित होगा¹। प्रश्न—श्रुति से अभेद बोधित होता है, तो प्रत्यक्ष से भेद । दोनों प्रमाण माननीय हैं, अतः भेद और अभेद दोनों रहें । उत्तर—'एकमेवाद्वितीयम्' यह श्रुति 'एक' शब्द कहकर 'एव'कार का भी उपादान करती है, फलतः श्रुति का अत्यन्त अभेद में तात्पर्य है । अतः भेदाभेद भी असङ्गत ही है । प्रश्न—आपातः प्रत्यक्ष-विरोध होने से श्रुति द्वारा जायमान बुद्धि प्रथम अपने से ही प्रत्यक्ष-बुद्धि और उसके विषयों के अभेद का बोध कराती है, पश्चात् स्व ( बुद्धि ) से अर्थों के ऐक्य की अन्यथानुपपत्तिरूप अर्थापत्ति की सहायता से विषयों ¹ जैसे नेत्र-कनीनिका ( आँख की पुतली ) के सामने तृण रखकर देखने से 'द्वौ 'चन्द्रौ' ऐसा भ्रमरूप ज्ञान होता है, 'वितस्तिपरिमितः सूर्यः' ऐसा भ्रम होता है; वैसे ही भेद-प्रत्यक्ष भी भ्रम ही है, प्रमा नहीं ।

परिच्छेद ] अद्वैत में प्रमाण-विचार ५५ ननु यदि नाम प्रत्यक्षधिया तया घटपटभेदोल्लेखिन्या स्वात्मना सह घटपटयोर्भेदो न गोचरीक्रियते । तावता कथं तस्याः स्वविषयेण सहाऽद्वैते श्रुतिः प्रामाण्यमासादयितुमीष्टे, बुद्धयन्तरेण तया सार्धं घटपटयोरपि भेदमुल्लिखता तत्राद्वैतश्रुतेर्बाधादेव । मैवम् ; तर्हि तस्या अपि विषयमापातः परित्यज्य ययैवाऽपरया बुद्ध्या घटपटभेदबुद्धेर्घटाच्च पटाच्च भेदो विषयीक्रियते, तस्याः स्वविषयेण सहाद्वैते श्रुतिः प्रामाण्यमवलम्ब्य लब्धपदा घटपटतद्भेदबुद्धिभिः सह द्वितीयाया बुद्धेरभेदे पर्यवस्यन्ती सर्वेषामेव तेषामभेदे विश्राम्यति । एवं च सति यत्रैव गत्वा बाधबुद्धिपरम्पराविच्छेदो विषयान्तरसंचारोच्छेद- भयाद् अनवस्थाभयाच्चाभ्युपेयः, तस्यामेव बुद्धौ पदमारोप्याद्वैतश्रुतिः सर्वं के भी परस्पर अभेद का बोध कराती है—यह कथन युक्तिविरुद्ध है; क्योंकि शब्द, बुद्धि तथा कर्म के व्यापार विरम्य ( क्रम से ) नहीं होते, किन्तु एक बार ही होते हैं । उत्तर—श्रुति से सर्वविषयक अद्वैत-बुद्धि झटिति ( एक ही काल में ) हो जाती है, परन्तु नाना विषयों में उस श्रुतिज बोध के प्रामाण्य को विषय करनेवाली, एवं- विध प्रश्न में उक्त क्रम से जात विचाररूप सोपान की परम्परा पर आरोहण करनेवाली हम लोगों की बुद्धियाँ क्रम से परिनिष्ठित ( सुस्थिर ) होती हैं । शङ्का—यद्यपि ‘घट-पटौ भिन्नौ’ यह प्रत्यक्ष—घट-पट के भेदरूप स्वविषय के साथ—स्व के भेद को विषय नहीं करता । फिर भी उस प्रत्यक्ष के स्व-विषय के साथ अद्वैत में श्रुति प्रमाण कैसे होगी, क्योंकि ‘घट-पट-भेदग्राहि प्रत्यक्षंघटपटौ न भवति’ यह अन्य बुद्धि घट-पटभेद के साथ उस प्रत्यक्ष के भी भेद को ग्रहण करती है । अतः श्रुति का बाध होगा । खण्डन—प्रथम ‘घट-पटौ भिन्नौ’ इस बुद्धि का घट-पटभेदरूप स्वविषय के साथ अद्वैत-बोध को त्यागकर ‘घट-पट-भेदग्राहिप्रत्यक्षं घटपटौ न भवति’ इस बुद्धि का ही स्व-विषय घट-पट-भेदग्राहि प्रत्यक्ष तथा घट-पटभेद के साथ अभेद में श्रुतिप्रामाण्य को अवलम्बन कर, पश्चात् सर्ववस्तुओं के अद्वैत में पर्यवसित होगी । शङ्का—उस द्वितीय बुद्धि का भी स्व-विषय के साथ भेद का बोध तृतीय बुद्धि करेगी । अतः वहाँ भी अद्वैत-श्रुति का अवकाश नहीं है । खण्डन—विषयान्तर के

५६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम तद्विषय-विषयिप्रवाहमद्वैते स्थापयन्ती न केनापि प्रमाणेन क्वचिदपि विषये बाधितुं शक्या । तस्मात्— सुदूरधावनश्रान्ता बाधबुद्धिपरम्परा । विनिवृत्ताऽद्वयाम्नायैः पाष्णिग्राहैर्विजीयते ॥'—इति । न च यत्र तस्य प्रतिपत्तुर्बुद्धिधाराविश्रान्तिस्तत्र पुरुषान्तरबुद्धिर्भेदे प्रमाणं स्यात् । तथापि पुरुषान्तरेण भिन्नतया सा प्रतीयते इत्यत्र प्रमाणं त्वया वाच्यम् । नहि तदपि पुरुषान्तरेणैव, न च संभाव्यमानम्, श्रौतेन निश्चयेन तन्निवर्तनात्; तथाप्यनवस्थानादिति । सञ्चार (ज्ञान) के 'उच्छेद और अनवस्था के भय से जहाँ जाकर आप अद्वैत-बुद्धि की बाध-बुद्धि-धारा की समाप्ति मानेंगे, 'उसी बुद्धि में श्रुति अवकाश पाकर सम्पूर्ण उस बुद्धि के विषय ज्ञान-प्रवाह को अद्वैत में स्थापन करती हुई किसी प्रमाण से किसी भी विषय में बाधित नहीं हो सकती । अतः दूर दौड़ने से श्रान्त—अतएव विनिवृत्त—बाधपरम्परा पृष्ठ-भावी (पीछे दौड़नेवाले) शत्रु के सदृश अद्वैत-श्रुति से जीती जाती है। दूर दौड़ने से थकी, बाध-बुद्धि की धार । लौटी अद्वय-बोधने, घेर दबाई नार ॥ भेद-समर्थन—विषयान्तर के सञ्चार का उच्छेदन न हो, इसलिए उस पुरुष की बुद्धि-धारा तो समाप्त हो जाती है। परन्तु अन्य पुरुष की बुद्धि से उस चरमबुद्धि (अन्तिम भेद-बुद्धि) के भेद का भी ग्रहण होता है। भेद-खंडन—अन्य पुरुष की बुद्धि से उस चरम बुद्धि के भेद का ज्ञान होता है—इसमें यदि प्रमाण न दे, तो आपका इष्ट भेद सिद्ध नहीं हुआ। यदि कोई बुद्धि प्रमाण दें, तो उसी बुद्धि में अवकाश पाकर अद्वैत-श्रुति भेद-बुद्धि का बाध करेगी। यदि आप प्रमाणों (भेद-ज्ञानों) की धारा मानें, तो अनवस्था हो जायगी। समर्थन—पुरुषान्तर की बुद्धि से भेद का ज्ञान होगा, इसमें भी प्रमाण अन्य पुरुष देगा। खंडन—अद्वैत-श्रुति पुरुषान्तर से प्रदर्शित प्रमाण-बुद्धि में ही अवकाश पाकर सर्वत्र भेद का बाध करेगी अथवा अनवस्था का प्रसंग हो जायगा। समर्थन—'पुरुषान्तर-बुद्धिः भेद प्रमाणं भविष्यति' इस सम्भावना से अद्वैत-बुद्धि का बाध होगा । खण्डन—'यदि वह्निविरहिण्यपि धूमः स्यात् तदा न स्यात् अकारणः सहेतुको वा स्यात्' इस तर्क से 'यदि वह्निविरहिण्यपि धूमः स्यात्'

परिच्छेद ] अद्वैत में प्रमाण-विचार ५७ अथ ब्रूषे—'यदा कियद्दूरं बुद्धिपरम्परया सा बाधिता भवत्यद्वैतश्रुतिस्तदा तन्न्यायाद् याऽपि बुद्धिः शेषं गत्वा नाऽनुव्यवसीयते, तत्रापि तद्बाधोऽवगम्यते; यत्र सा बाध्यते, तत्तुल्यन्यायत्वादन्तिमबुद्धेरपीति । मैवम्; किं कियतीषु बुद्धिषु व्याप्यव्यापकौ कावप्यवलम्ब्य व्याप्तिग्रहरूपयैव धिया शेषबुद्धौ बाधं व्युत्पादयसीत्थमद्वैतश्रुतेः, किं वा बुद्धयन्तरदृष्टव्याप्तिसनाथया पक्षधर्महेतुमुल्लिखन्त्या बुद्ध्याऽन्तिमबुद्धिविषयया ? नाद्यः, व्याप्तिबुद्धिर्यदि विषयविशेषेऽपि स्वातन्त्र्येण बाधात्मिकोपेयते, तदा सैव विशेषबुद्धिरपि स्यादिति गतमनुमानकथा। अथानुमितिमभ्युपैषि, तदा सा नाऽऽत्मानमपि धर्मीकृत्य प्रवर्तते इति तत्रैव दत्तपदा सर्वामद्वैतश्रुतिः परम्परामालम्बते इत्युक्तमावर्तते । इस व्यभिचार की सम्भावना ( शङ्का ) की जैसे निवृत्ति होती है, वैसे ही श्रुतिजन्य बुद्धि ( ज्ञान ) से उक्त सम्भावना का भी बाध होगा। किञ्च, सम्भावित बुद्धि में जो प्रमाण-सम्भावना है, उसी से उसके विषय के साथ अभेद के बोध में अवकाश पाकर अद्वैत-श्रुति सब वस्तुओं के अभेद का ग्रहण करायेगी । यदि उसके भेद में कुछ प्रमाण कहें, तो अनवस्था हो जायगी । प्रश्न—जब कुछ दूर तक प्रत्यक्ष-बुद्धि की परम्परा से वह ( अद्वैत-श्रुति ) बाधित होती है, तब उसी दृष्टान्त से जो बुद्धि ज्ञात नहीं होती, उसमें भी बाध का ज्ञान होगा । क्योंकि अन्तिम बुद्धि भी उसके तुल्य ही है। अर्थात् 'जो-जो बुद्धि है, वह स्व-विषय ( अपने विषय ) से भिन्न है, जैसे घट से पट भिन्न है यह बुद्धि' इस रीति से, ज्ञान-धारा की तीन-चार कक्षाओं में व्याप्ति का निश्चय होगा । पश्चात् उसी के बल से अन्तिम बुद्धि में भी स्व-विषय के साथ भेद की सिद्धि होगी । फिर अद्वैत श्रुति को अवकाश ही कहाँ है ? उत्तर—क्या जो जो बुद्धियाँ हैं, वे स्व-विषय से भिन्न हैं' यह व्याप्तिग्रह ही अन्तिम बुद्धि के ( स्व-विषय के साथ ) भेद-ग्रह में प्रमाण है अथवा व्याप्ति से युक्त— पक्षधर्मताविशिष्ट हेतु का ज्ञान ? यदि व्याप्ति का ज्ञान कहा जाय, तो पृथक् अनुमान को प्रमाण मानना व्यर्थ है । क्योंकि सर्वत्र व्याप्तिग्रह से ही विशेष ( अनुमेय ) का ज्ञान हो जायगा । यदि अनु- मिति कही जाय, तो श्रुति उसी अनुमिति में स्व-विषय के साथ अद्वैत-बोध में अवकाश पाकर सर्वत्र अद्वैत का बोध करायेगी । ८

५८ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम अथ 'सर्वा विवादाध्यासिता बुद्धयः स्वविषयेभ्यो भिन्नाः, बुद्धित्वात्, घटपट- बुद्धिवत्' इति सामान्याकारेणाऽऽत्मानमपि धर्मीकृत्य आत्मनोऽपि स्वविषयाद्भेदं साधयिष्यत्यनुमेति मन्यसे । मैवम्; एवमपि विषयिणो विषयस्याऽभेदं बोधयन्ती श्रुतिरनुमानमप्यनवकाशयति । विषयिविषययोर्मिथो भेदेऽपि साध्ये अस्तु हेत्वनुयोगः । परबुद्धिस्तद्विषयांश्च प्रति निराबाधा सती श्रुतिरेकस्या बुद्धेर्विषयाद्-परानपरस्याश्च विषयात् परामभेद- बोधाय धावन्ती सर्वाद्धैते एव पर्यवस्यतीति । न च शक्यमनुमातुं सर्वस्या बुद्धेर्विषया सर्वा बुद्धिविंभेति, माभूदन्यबुद्धि- विषयादात्मनोऽपि बुद्धिर्भिनेति । न चाऽऽत्मव्यतिरिक्तादित्युक्ते निस्तारः स्यात्, अद्वैतवादिना सर्वाभेदमिच्छता क्वचिदपि तदसिद्धया विशेषणाप्रसिद्धेरिति । प्रश्न -'सब बुद्धियाँ अपने विषय से भिन्न हैं, बुद्धि होने से, घट-पटविषयक बुद्धि के तुल्य', स्व को भी धाम दल में प्रवेश कर प्रवृत्त इस अनुमिति से, स्व (बुद्धि) में भी स्व-विषय के भेद की सिद्धि होगी । उत्तर—इस अनुमिति सेभी बुद्धि में विषय का भेद सिद्ध हुआ, बुद्धि का भेद विषय में नहीं । ऐसा होने से बुद्धि और विषय। के अभेद-बोध में बाधक न होने से श्रुति अवकाश पाकर सर्वाद्धैत का बोध करा देगी । प्रश्न—'बुद्धिविषयौ परस्परं भिन्नौ' ऐसी अनुमिति क्यों न हो ? उत्तर-इसमें यदि बुद्धित्व को हेतु कहें, तो विषय-भाग में असिद्धि है और यदि विषयत्व को हेतु कहें, तो बुद्धि-अंश में असिद्धि ( पक्ष में हेतु का अभाव ) है । उभय-साधारण प्रमेयत्व हेतु व्यभिचरित है। बुद्धि-विषयान्तरत्व आदि कोई उभयसाधारण हेतु मान भी लें; तथापि पर-बुद्धि और उस बुद्धि के विषय के प्रति बाध से रहित होकर श्रुति ( एक बुद्धि के विषय से अन्य बुद्धि का और अन्य बुद्धि से एक बुद्धि के विषय का अभेद-बोध कराती हुई क्रम से सर्वा- द्वैत का बोध करा देगी । प्रश्न -'सब बुद्धियाँ, सब बुद्धियों के विषय से भिन्न हैं' यह अनुमिति ही भेद में प्रमाण क्यों नहीं ? उत्तर - अन्त्यबुद्धि का विषय उपान्त्य-बुद्धि भी स्व से भिन्न हो जायगी । क्योंकि वह बुद्धि है और अन्त्यबुद्धि का विषय भी हैं।

परिच्छेद ] अद्वैत में प्रमाण-विचार ५६ एतेन ‘सर्वं भिन्नम्’ इति वाक्येन विना बाधं स्वतःप्रमाणेन सत्प्रतिशब्दा सेयमद्वैतश्रुतिरित्त्यप्यनवकाशं प्रत्यवस्थानं मन्तव्यम् । यस्मात् कस्मादपि भेदे मिथ्यातः सत्यभेदोपगमेन सिद्धसाधनात्, सर्वस्मादिति स्वतोऽप्यापत्तेः ; स्वव्यति- रिक्तादिति चाद्वैतवाद्यन्यव्यवच्छेदकम् । तदेवम्— ‘हेत्वाद्यभावसार्द्धैये सर्वं पक्षतयाऽऽस्थिते । किञ्चित्तु त्यजता दत्ता सैव द्वारद्वयश्रुतेः ॥’ अत एव च— ‘आद्यधीवेद्यभेदीयाऽप्यन्यथानुपपन्नता । स्वज्ञानापेक्षणादन्ते बाधते नाद्वयश्रुतिम् ॥’ प्रश्न—‘सब बुद्धियों के आत्म-भिन्न विषयों से सब बुद्धियां भिन्न हैं ऐसा निवेश करने पर कोई दोष नहीं है । उत्तर—आपका यह अनुमान स्वार्थ है या परार्थ ? यदि स्वार्थ कहें, तो स्व ( भेदवादी ) के प्रति भेद सिद्ध ही होने से सिद्ध-साधन होगा । यदि परार्थ कहें, तो पर ( अभेदवादी ) के प्रति आत्म-व्यतिरिक्त पदार्थ का अभाव होने से विशेषण असिद्ध होगा । प्रश्न—बाधक के विना स्वतःप्रमाण ‘सब भिन्न हैं’ इस वाक्य से अद्वैत का बाध क्यों न हो ? उत्तर—यदि इस वाक्यसे ‘जिस किसीसे भी भिन्न ऐसा बोध अभिप्रेत हो, तो मिथ्या से सत्य में भेद सिद्ध ही होने से सिद्धसाधन है । यदि ‘सर्व’ से भिन्न इष्ट हो, तो अपने आत्मा से भी आत्मा भिन्न सिद्ध हो जायगा । यदि ‘आत्म-भिन्न जो ‘सर्व’ उससे भिन्न’ ऐसा कहें, तो वचन परार्थ है और पर अद्वैतवादी के प्रति आत्म-व्यतिरिक्त अप्रसिद्ध होने से विशेषण की असिद्धि है । किञ्च—‘सर्वस्मात् सर्वं भिन्नम्’ इस पूर्वोक्त अनुमिति के प्रतिज्ञावाक्य में ‘सर्व’ को आप पक्ष मानते हैं । अतः पक्ष से भिन्न हेतु, साध्य तथा दृष्टान्त का अभाव हो जायगा । पक्ष प्रमाण-सिद्ध ही होता है, अतः सर्ववस्तुओं को ज्ञात ही मानना होगा । वह सर्वज्ञता के बिना दुर्लभ है । यदि पक्ष में कुछ अंश छोड़ दें, तो उसी स्थल में अवकाश पाकर श्रुति सर्वत्र अद्वैत की स्थापना कर देगी । सर्व-पक्ष यदि होत तब, हेतु निदर्शन नास । सबको हो सर्वज्ञता, छोड़े श्रुति-अवकास ॥ प्रश्न—‘घटपटौ भिन्नौ’ इस बुद्धि का विषय भेद ‘सर्वमभिन्नम’ इत्याकारक

६० सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम न च संस्कारारूढदृढान्वयव्यतिरेकान्वयव्यतिरेकान्वयप्रतिपत्त्युत्पत्तिप्रतिबन्धः शक्यशङ्कः । यतः— 'अत्यन्तासत्यपि ज्ञानमर्थे शब्दः करोति हि । अबाधात्तु प्रमामत्र स्वतःप्रामाण्यनिश्चलाम् ॥ असंसर्गाग्रहस्यापि मन्ता शंसत्यबाधिते । अत्यन्ताऽसदसंसर्गाग्रहं संसर्गलयमक्रम् ॥ श्रुतिज बोध के बाध के बिना अनुपपन्न है । अतः भेद की अन्यथानुपपत्ति से श्रुतिज बोध का बाध होगा । उत्तर—अन्यथानुपपत्ति भी ज्ञात होकर ही उपपादक होती है तथा च अन्यथानुपपत्ति का ज्ञान ( उसका विषय भी ) और अन्यथानुपपत्ति इन दोनों के अभेद के बाध के बिना भी घट-पटभेद उपपन्न है । अतः वह उन दोनों के अभेद को नहीं बाधेगा । तब श्रुति उन दोनों के अभेद में ही अवकाश प क्रम से सर्वा- भेद का बोध करा देगी । अनुपपत्ति जो भेद की, ज्ञान-भेद बिनु मित्र । वह भी चाहत ज्ञान निज, बाधक सहि श्रुति-मित्र ॥ प्रश्न—सब मनुष्यों के बार-बार ज्ञान से स्थिर संस्कार का विषय, अतएव दृढान्वय ( दृढपद=बाधितुमशक्य ) जो भेद, उसका जो अन्वय-व्यतिरेक अर्थात् 'घटाद् भिन्नः पटः' अथवा 'नीलाद् अभिन्नः पटः' इत्याका उससे जो अन्वय ( अभेद ) की प्रतिपत्ति ( अयोग्यता का ज्ञान ) उससे श्रुतिज अद्वैत-बोध की उत्पत्ति का प्रतिबन्ध क्यों नहीं ? उत्तर—'अङ्गुल्यग्रे करिशतं विहरति', 'मम कर्णकुहरं प्रविश्यः सिंहः क्रीडति' इत्यादि वाक्यों से अत्यन्त असत् अर्थ का भी बोध अनुभवसिद्ध है । अतः शाब्दबोध में न तो योग्यता का ज्ञान कारण है और न अयोग्यता-ज्ञान प्रतिबन्धक ही है । किन्तु बाध होने के पश्चात् स्वतःप्रामाण्य का निश्चय होता है । 'एकमेवा-द्वितीयम्' इस श्रौतस्थल में प्रत्यक्षादि-बाध का निरास तो पहले कर ही चुके हैं। अतः स्वतः- प्रामाण्य सिद्ध हुआ । असंसर्गाग्रह के माननेवाले मीमांसक भी अबाधस्थल में संसर्ग- का ज्ञान ही मानते हैं । प्रकृत में प्रत्यक्षादि-बाध का निरास हो चुका है, अतः संसर्ग का ग्रह सर्वसम्मत है ।

परिच्छेद ] अद्वैत में प्रमाण-विचार ६१ अनौचित्याऽपि तर्केण दुर्वाधैवाऽद्वयश्रुतिः । अनारोपितमूलत्वाद् बलवत्त्वादतादृशा ॥ प्रवृत्तेनाप्यनौचित्यमूलं येन न लूयते । तत्राऽनौचित्यसाम्राज्यं वैपरीत्यात्तु नात्र तत् ॥' ननु, यद्यदेवोदाह्रियते त्वया---'नेत इतोऽस्य भेदो गृहीतः इति ततोऽस्याऽद्वैता- म्नायैरभेदबोधने तद्द्वारा सर्वाऽभेदे पर्यवसातव्यमिति, ततस्ततस्तस्य भेदस्तवै असत् अर्थ का बोध भी शब्द से होता आत । पीछे बाध-अभाव से, होत प्रमात्व का नाते ॥ बाधस्थल में जो कहें असम्बन्ध-अज्ञान । वे अबाध-स्थल विषे, करें सम्बन्धहि मान ॥ प्रश्न—सर्वलोकसिद्ध भेद का बाध अनुचित है। फिर अनौचिती रूप तर्क से श्रुति का बाध क्यों न हो ? उत्तर—तर्क आरोपस्वरूप होता है, अतः अनारोपित रूप होने से बलवती श्रुति का उससे बाध नहीं हो सकता । प्रश्न—ऐसा मानने पर अनौचिती रूप तर्क का अवकाश ही कहाँ होगा ? उत्तर—स्वार्थसिद्धि में प्रवृत्त भी बाध्य प्रमाण, जहाँ अनौचित्य की मूलभूता आपाद्य- आपादक-व्याप्ति का खण्डन न कर सकें, उस स्थल में अनौचित्य का साम्राज्य है। प्रकृत में अद्वैत-श्रुति से भेद का बाध तथा व्याप्ति का खण्डन होने से अनौचित्य का साम्राज्य नहीं है। अनौचिती जो तर्क है, वह आरोप-सरूप । अनारोप श्रुति-बोध के, सन्मुख बैठे चूप ॥ जहाँ अनौचित तर्क के, मूल मान बलवान् । वहाँ तू उसद्य खोल हिय, बहुरि करो सन्मान ॥ प्रश्न—'घटपटौ भिन्नौ' इस बुद्धि से घट-पट का तथा अन्तिम बुद्धि का स्व-विषय से भेद किसी प्रमाण से गृहीत नहीं है । अतः श्रुति का घट-पट से 'घटपटौ भिन्नौ' इस बुद्धि के अभेद-बोधन द्वारा सर्वाभेद-बोध में पर्यवसान है—इस प्रकार जिस वस्तु का कथन आप करेंगे, तो उससे उसका भेद उसी काल में गृहीत हो जायगा । इस कारण यदि आप किसी वस्तु का कथन ही न करें, तो स्थल के

६२ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम

गृह्यते मया । तस्मादुदाह्रियमाणायामनुदाह्रियमाणायां च कस्यचिदेतत् प्रत्यवस्थानमस्थाने इति । मैवम् ; अन्तिमबुद्धेरद्वैतश्रुतिजबुद्ध्यादितो भेदो न त्वया प्रमित इति मयोच्यमाने यस्तदीयस्ततो भेदः प्रमातव्यः, स न तावत् प्रत्यक्षेण, तत्कालमन्तिमबुद्धेरनुपस्थितेः । यदि च केनचिद्धेतुना वा कयाचिदनुपपत्त्या वा तथा स्यात्, तदानीमद्वैतवादिनं प्रति हेतोः साध्याविशिष्टतया अनुपपत्तेश्च, येन विना सा तद्विशिष्टतया, ततः कथमाभासात् प्रमोदयः स्यात् । न च वाच्यं स्वयं मया स भेदो ज्ञायते इति नास्ति पाक्षिकोऽपि मां प्रत्यसिद्ध्यादिरिति । यतोऽस्य अभाव में श्रुति का अवकाश नहीं है। यदि किसी वस्तु का कथन करें, तो उसी काल में भेद-ग्राह होने से श्रुति का बाध होगा । उत्तर—अन्तिम बुद्धि का अद्वैत श्रुतिज बुद्धि से जो भेद उसका ज्ञान आपको ज्ञात नहीं है, यह कहने पर उक्त भेद का ज्ञान आपको कैसे होगा ? प्रत्यक्ष से हो नहीं सकता, क्योंकि उस काल में अन्तिमबुद्धि के न होने से सन्निकर्ष नहीं है । प्रश्न—'अन्त्य बुद्धि श्रुतिज बुद्धि से भिन्न है, भिन्नसामग्रीजन्य होने से अथवा भिन्न शब्द-जन्य होने से अथवा जन्म-नाश आदि विरुद्ध धर्मों के होने से; जो-जो भिन्न-सामग्री से जन्य है वह भिन्न है, जैसे घटादि'—इस अनुमान से ही भेद सिद्ध होगा । उत्तर—अद्वैतवादी के मत में भेद के न होने से, भिन्नसामग्रीजन्यत्व आदि हेतु साध्यसम ( असिद्ध ) हैं। अतः आभास-हेतु से भेद की प्रमा का उदय नहीं हो सकता । प्रश्न—'अन्त्यबुद्धि और श्रुतिज बुद्धि में परस्पर भेद के बिना, आपामर-प्रसिद्ध द्वैत (भेद) के ज्ञान की अनुपत्ति है। अतः द्वैत (भेद) के ज्ञान से अन्त्यबुद्धि और श्रुतिज बुद्धि में परस्पर भेद की कल्पना क्यों न हो ? उत्तर—अद्वैत-मत में भेद के न होने से उपपादक द्वैत-ज्ञान ही असिद्ध है । अतः उसके द्वारा अन्त्य बुद्धि से श्रुतिज-बुद्धि के भेद की कल्पना कैसे होगी । किञ्च— अद्वैत-मत में उपपाद्य-उपपादक का भेद भी परमार्थ में नहीं है। और अपारमार्थिक द्वैत १—अस्थाने = अयुक्तमित्यर्थः । अत्र ‘इति मैवमि’त्यपपाठः, अस्थाने इत्यनेन पुनरुक्तेः । मत इति शेषः ।

परिच्छेद ] अद्वैत में प्रमाण-विचार ६३ त्वद्वचनस्य वैयर्थ्यापत्तिः, वचनस्य परार्थत्वात् । मौनमवलम्ब्याप्रतिष्ठमानश्च भवानप्रतिभातो न मुच्यते । न च स्वयं मया प्रमितो भेदः परं प्रति वचसा केवलं बोध्यते इति वाच्यम्; त्वद्वचसि परस्याप्रत्ययात् । विजिगीषुं परं प्रति विजि- गीष्वन्तरवचनं हि तत्रार्थे तज्जिज्ञासोत्पादनद्वारेण तस्य स्वतस्तदर्थप्रमित्युत्पादन- पर्यवसायितयोपयुक्तम् । न चाद्वैतवादिनं प्रति तथा कर्तुं शक्यते, तं प्रत्यन्यतरा- सिद्धेरुक्तत्वात् । न च वाच्यं मम वचनात्संदेहेनापि श्रुत्या तत्र संदिग्धबाधितभावया नाभैद- प्रतिपादनं ते घटते इति, यस्मादद्वैतं मन्यमानेन भेदासिद्ध्या सर्वत्र साध्याविशे- पादिदोषप्रतिसंधायिना संशयस्यानवकाशीकरणमेव स्यात् । ( भेद ) शुक्ति-रजत के तुल्य उपपन्न ही है, अनुपपन्न नहीं । फिर उससे अन्त्य- बुद्धि के श्रुतिज-बुद्धि के साथ भेद की कल्पना कैसे हो ? प्रश्न——यह अनुमान परार्थ नहीं, किन्तु स्वार्थ है और हम द्वैत-वादी हैं, अतः हमारे प्रति असिद्ध नहीं । उत्तर—यदि आपका अनुमान स्वार्थ है, तो पञ्चावयव का प्रयोग व्यर्थ है, क्योंकि शब्द का प्रयोग परार्थ होता है । प्रश्न—अस्तु, हम पञ्चावयव रूप शब्द का प्रयोग नहीं करेंगे ? उत्तर—कथा में यदि आप मौन का अवलम्बन करेंगे, तो अप्रतिभा नामक निग्रहस्थान से नहीं छूटेंगे । प्रश्न—हम भेद का स्वयं अनुमानकर दूसरे के प्रति वचन से केवल बोधमात्र कराते हैं। उत्तर--तुम्हारे वचन में दूसरे को विश्वास ही नहीं होगा । प्रश्न—जैसे वाद में एक विजिगीषु के प्रति अन्य विजिगीषु का वचन आप्तशब्दत्वरूप से प्रमिति का कारण नहीं है, परन्तु उस अर्थ में प्रमाण की जिज्ञासा के उत्पादन द्वारा स्वतः जायमान उस पुरुष के ज्ञान का कारण है; वैसे ही हमारे शब्द भी आपके ज्ञान में कारण होंगे । उत्तर—अद्वैत-मत में भेद के न होने, भेद-घटित हेतु के असिद्ध होने तथा द्वैत-ज्ञानरूप उपपादक के न होने से आपके वचन अनुमान या अर्थापत्ति में अद्वैतवादी की जिज्ञासा का उत्पादन भी नहीं कर सकते । प्रश्न—'सर्वं भिन्नम्' इस मेरे वचन से आपको भेदविषयक संदेह अवश्य होगा । अतः संदिग्ध या बाधितविषयक श्रुति से अभेदविषयक बोध आपको नहीं होना चाहिए ।

६४ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम तस्मात्— एकं ब्रह्मास्त्रमादाय नान्यं गणयतः क्वचित् । आस्ते न धीरवीरस्य भङ्गः सङ्गरकेलिषु ॥' अपि च—प्रतीयते तावदिदं सामान्यतो यन्नाम किञ्चित्परश्चेतसा चिन्त- यन्नस्तीति, किञ्चिद्वा विवक्षुरित्यादि । तत्र परस्य बुद्धिविषयो विवक्षाविषयो वा विशेषतो विनिगमनं विना नैव प्रतीयते । ततोऽन्तिमबुद्ध्यादिभेदो न भवता शक्यप्रमः, परेण तच्चिन्तनादेरपि संभवात् । स्वस्मात्स्वस्य भेदस्याभावात् । ततस्तत्र लब्धपदा कथमद्वैतश्रुतिर्विश्वाभेदे पर्यवस्यन्ती त्वया शक्यबाधा स्यात् । तस्मात्— 'कथं सामान्यतो ज्ञाते नैव ज्ञाते विशेषतः । पदरोधस्त्वया कर्तुं शक्यः स्यादद्वयश्रुतेः ॥' उत्तर—जो अद्वैत को मानते हैं, उनके मत में भेद की असिद्धि होने से भेद का उपस्थापक हेतु (भेद-घटित होने से) साध्य के समान है । अतः भेद की उपस्थिति न होने से भेद-विषयक सन्देह का भी अवकाश नहीं है । इसलिए एक (अद्वैत) ब्रह्मरूप अस्त्र को अर्थात् अभेदरूप युक्ति को ग्रहणकर संग्राम (शास्त्रार्थ) रूप क्रीड़ा में अन्य भेदवादियोंकी गणना न करनेवाले, धीर-वीर अद्वैतवादी का भङ्ग (पराजय) कदापि नहीं हो सकता । ब्रह्मज्ञान ब्रह्मास्त्र को, कर में कर विद्वान । दुसरे को नहिं देखते, किससे हो अपमान ॥ किञ्च—जहाँ 'यह पर पुरुष चित्त में कुछ चिन्तन करता है या कुछ कहना चाहता है' ऐसी सामान्यतः प्रतीति होती है, वहाँ उसकी चिन्ता या विवक्षा का विषय प्रमाण के बिना विशेष रूप से ज्ञात नहीं होता । उस सामान्य रूप से ज्ञात वस्तु द्वारा अन्तिम बुद्धि के भेद की प्रमा (यथार्थ ज्ञान) आपको अशक्य है, अर्थात् नहीं हो सकती । क्योंकि संभव है कि परपुरुष अन्त्यबुद्धि का ही चिन्तन करता हो और अन्त्य-बुद्धि का स्व में भेद नहीं हो सकता । उस सामान्यतः चिन्तित से अन्तिम बुद्धि के अभेद-बोधन में आप अद्वैत- श्रुति के पद (प्राप्ति) का रोध (बाधं) नहीं कर सकते । अतः उस * स्थल में अवकाश पाकर श्रुति सर्वाद्वैत में पर्यवसित हो जायगी ।

परिच्छेद ] भेद-खण्डन का अनुवाद ६५ ननु भेदमनङ्गीकुर्वतो भवतः कथं तत्तत्पदार्थवैचित्रीव्यवहारो न व्याहन्यते ? कथं व्याहन्यते, प्रतिवध्यते हि तत् । किं च योऽयं त्वया व्याघात आपादनीयः, सोऽपि कस्माच्चिदापादकात् । न च आपाद्यापादकमभिद्यमानमापत्त्यै प्रभवेदिति । तस्मात्— 'नानात्वमवलम्ब्यापि वदत्यद्वैतवादिनि । असिद्धभेदाद्व्याघातः पतेदापादकात् कुतः ॥' अथ भेदखण्डनानुवादः इदमपि च विचारमर्हति—यदद्वैतश्रुतीनां बाधकसमुपन्यस्यते प्रत्यक्षादिघट- पटप्रभृतिभेदग्राहि, तदपि कीदृशमर्थे पर्यवस्यति ? तथाहि, प्रत्यक्षेण योऽसौ भेदो गृह्यते स किं स्वरूपभेदः, किमन्योन्याभावः, किं वैधर्म्यम्, किमन्यदेव वा ? जो सामान्य से ज्ञात अह, नहि विशेष से त । उनमें अद्वय-श्रुतिन का, रोध होत कस तात ॥ प्रश्न—पदार्थ की वैचित्री ( भेद ) का व्यवहार भी भेद के अङ्गीकार के बिना नहीं हो सकता । अतः आप पद-पदार्थ का भेद अवश्य मानेंगे । तब तो आप अभेदवादी को भेद और अभेद दोनों विरुद्ध धर्मों का स्वीकाररूप व्याघात हुआ । उत्तर—पद-पदार्थ की वैचित्री का व्यवहार अपारमार्थिक भेद से भी उपपन्न है । अतः पारमार्थिक अभेद के साथ व्याघात नहीं होगा । किञ्च—व्याघात का भी आगे खण्डन करेंगे । फिर व्याघात आपाद्य है, अतः भेदरूप आपादक कैसे होगा ? अभेदवादी के मत में आपाद्य-आपादक में अभेद है । उसमें आत्माश्रय दोष होने से उपपाद्य-उपपादकभाव नहीं होता और भेद तो है नहीं । फिर व्याघात कैसे होगा ? परमारथ अद्वैत में, कैसे होवे तात । आपादक-आपाद्य में, भेद बिना व्याघात ॥ भेद-खण्डन का अनुवाद यहाँ यह भी विचारना चाहिए कि जिन घट-पट आदि के भेदग्राही प्रत्यक्ष आदि को अद्वैत-श्रुति का बाधक कहते हैं, वे प्रत्यक्षादि किस तरह के भेद को विषय करते हैं—क्या स्वरूप भेद को ? अन्योन्याभाव को, वैधर्म्य को या इनसे अन्य ही ( पृथक्त्व ) को ? ६

६६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम यदि तावत् स्वरूपभेदः, १स नाम घटपटयोर्हि स्वरूपं यत् परस्परस्माद् भेदः, तत्परस्परमनन्तर्भाव्य न सम्भवति । भेदो हि भवन् कस्मादपि भवति । अन्यथा स्वरूपं भेद इति पारिभाषिकं नाम स्यात् । यदा च 'घटाद् भेदः पटस्य' इत्येतावानेवार्थः पटादेः स्वरूपं प्रत्यक्षेण गृह्यते, तदा घटोऽपि पटात्मन्येव प्रविष्ट इति पटघटयोरैक्यात्म्यमेव भेदग्राहिणा प्रत्यक्षेणाऽवगाहितमिति विपरीतमपद्यते । ननु यथेयं प्रतीतिरभेदोल्लेखितया व्याख्यायते, तथा भेदोल्लेखित्वेऽपि दीयतामस्यां दृष्टिः । अभेदे हि 'घटः' इत्येव 'पटः' इत्येव वा बुद्धिः स्यात्, न तु 'घटाद्भिन्नः पटः' इति चेत् । स्यादप्येष पर्यनुयोगो यद्यविद्यविद्यमानमार्थं भेदं पारमार्थिकमभेद- मिच्छन्तोऽपि प्रत्यादिशामः । तस्मात्- प्रथम विकल्प-खण्डन—इनमें प्रत्यक्षादि स्वरूप भेद को विषय नहीं करते । क्योंकि घट और पट का स्वरूप है परस्पर से भेद; वह परस्पर के अन्तर्भाव के बिना हो नहीं सकता । किसीसे ही किसीमें भेद होता है । यदि प्रतियोगी से अनिरूपित ही (केवल स्वरूप) को भेद कहें, तो वह भेद की केवल परिभाषा (संकेत) हुई, शब्दार्थ नहीं । यदि घटप्रतियोगिक भेद पट का स्वरूप है और वह प्रत्यक्ष का विषय है, तो घट भी पट के स्वरूप में ही प्रविष्ट हुआ । इस रीति से भेदग्राही प्रत्यक्ष घट-पट के ऐक्य को ही विषय करेगा; इसलिए विपरीत ही हुआ । समर्थन—आपने इस प्रतीति का जैसे अभेद-विषयकत्वरूप से कथन किया है, वैसे ही इस प्रतीति के भेद के उल्लेख पर भी दृष्टि दीजिये । अभेद के उल्लेख में 'घटः', 'पटः' ऐसा ही आकार होता, 'घटात् भिन्नः पटः' ऐसा नहीं । खण्डन—हम परमार्थ में ही भेद नहीं मानते, व्यवहार में तो भेद मानते ही हैं । अतः व्यावहारिक भेद से इस प्रतीति का निर्वाह हो जायगा । प्रश्न—परमार्थ में भेद नहीं, अभेद ही है, इसमें क्या प्रमाण ? उत्तर—अभेद (स्वरूप) के उल्लेख (अवगाहन) बिना घट-पट के भेद का उल्लेख नहीं होता और भेद के उल्लेख के बिना भी अभेद का उल्लेख हो जाता है । अतः उपजीव्य होने से अभेद में उक्त प्रतीति प्रमा है, भेद नहीं । . १ 'स नाम' यह पाठ अधिक ज्ञात होता है । विद्यासागरी में 'स न' ऐसा पाठ है ।

परिच्छेद ] भेद-खण्डन का अनुवाद ६७ 'अभेदं नोल्लिखन्ती धीर्न भेदोल्लेखनक्षमा । तथा चाद्ये प्रमा सा स्यान्नान्त्ये स्वापेक्ष्यवैशसात् ॥' अथ भेदः इत्येतावन्मात्रं पटस्य स्वरूपं घटादिति च तद्घटेन प्रतियोगिना १अन्येनैव निरूप्यते; तदपि नोपपद्यते, निष्प्रतियोगिकस्य भेदस्य प्रमाणागोचरत्वात् । नित्यं प्रतियोगिघटित एव तस्मिन् प्रमाणप्रसरात् । का चेयं वाचो युक्तिर्यदन्या- साकाङ्क्षं पटस्य स्वरूपमन्येन प्रतियोगिना निरूप्यमाणं ततो भेदो भवतीति । न हि यत् स्वरूपेणैव नीलं तत्पीतेन निरूप्यमाणं २नीलं भवति । यदपि चोक्तम्—'प्रतियोगिना घटेन निरूप्यमाणं पटस्य स्वरूपं भेदः' इति । तत्रापि पटं प्रति प्रतियोगित्वं घटस्य किं स्वरूपं किं वा धर्मः कश्चित् ? यदि प्रथमः; तदा पटं प्रति प्रतियोगित्वमित्येतावानेवार्थो घटस्य स्वरूपं भवन् आत्मन्येव पटमपि प्रक्षिपतीति कथं नाद्वैतमेव पर्यवस्यति । बिनु अभेद के भान के, होत न भेद क भान । अत अभेद के भान में, होत प्रतीति प्रमाण ॥ निज उपजीव्य अभेद की, मति बाधन से भीत । भेद-प्रतीति प्रमाण कस, होय सकेगी मीत ॥ समर्थन—केवल भेद ही पट का स्वरूप है और वह स्वरूप में अप्रविष्ट घट से निरूपित होता है । खण्डन—प्रतियोगी से रहित भेद की प्रतीति कहीं भी नहीं होती, नियमतः प्रतियोगी से विशिष्ट ही भेदप्रतीति होती है । अतः घट भी भेद के स्वरूप में हीं अन्तर्भूत है । यह कौन-सी युक्ति है कि जो स्वभावतः अन्य से निराकाङ्क्ष पट का स्वरूप है, वह अन्य ( प्रतियोगी ) से निरूपित होकर घट का भेद हो जाय । स्वभाव से जो नील है, वह पीत से निरूपित होकर उसका भेद है—यह नहीं है । फिर आप जो कहते हैं कि प्रतियोगी ( घट ) से निरूपित पट का स्वरूप भेद है, वहाँ पट के स्वरूपरूपी भेद का जो प्रतियोगित्व है, वह घट का स्वरूप है; या धर्म ? यदि घट का स्वरूप है, तो पटनिष्ठ भेदीय प्रतियोगित्व घट का स्वरूप हुआ; अतः पट भी घट का स्वरूप हुआ । तब अद्वैत में ही भेद-प्रतीति का पर्यवसान क्यों न माना जाय ? १ — 'अन्येन' इससे पीछे 'तत्' यह शेष है । २—'नीलम्' के स्थान में 'ततो भेदः' ऐसा पाठ ठीक ज्ञात होता है ।

६८ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्ये [ प्रथम

तत्रापि यदि प्रतियोगित्वमात्रं घटस्याऽऽत्मा, 'पटं प्रति' इति च पटापेक्षित्वा- मन्यदेव । तदप्यनुपपन्नम्; अकिञ्चिदपेक्षस्य प्रतियोगित्वस्य प्रमाणाविषयत्वात् । 'पटं प्रति' इत्यत्रापि च स्वरूपतदन्यविकल्पे दोष एव । नापि द्वितीयः; योऽसौ धर्मः पटं प्रति प्रतियोगित्वं तस्याऽऽत्मनि पटोऽपि प्रविशतीति तेन सह पटस्याद्वैतं स्यात् । यदा च पटो घटस्य धर्मतामापन्नस्तदा घटोऽपि पटस्य धर्मतामनेनैव न्यायेन गच्छेत् । न हि पटप्रतियोगित्वस्य घटेन प्रतियोगिना निरूप्यमाणत्वे घटस्याऽन्या गतिरस्तीति परस्परमाश्रितत्वमाश्रयत्वं च स्यात् । न च कस्यचित् प्रमाणस्य विषयो घटारूढः पटस्तत्पटारूढश्च स एव घट इति । समर्थन—केवल प्रतियोगित्व घट का स्वरूप है । वह स्वरूप में अप्रविष्ट जो पट का स्वरूपरूपी भेद है, उससे निरूपित होता है । खण्डन—यह ठीक नहीं है, क्योंकि केवल प्रतियोगित्व की कभी प्रतीति नहीं होती, नियमतः भेदनिरूपित ही प्रतियोगित्व की प्रतीति होती है । अतः भेद-विशिष्ट प्रतियोगित्व के घटस्वरूप होने से पट भी घट का स्वरूप हुआ । प्रतियोगित्व के घटरूप होने से प्रतियोगित्व में वर्तमान पटनिरूपितत्व भी घट में ही है । वह पटनिरूपितत्व भी घट का स्वरूप है या धर्म ? ऐसा विकल्प करने पर उक्त और वक्ष्यमाण रीति से दोष ही है । पट के स्वरूप-रूप भेद से निरूपित प्रतियोगित्व घट का धर्म है—यह द्वितीय पक्ष भी उचित नहीं है । क्योंकि पट का स्वरूप जो भेद, उसके प्रतियोगित्व के स्वरूप में पट का प्रवेश होने से प्रतियोगित्व के साथ पट का अभेद हो जायगा । तब जैसे प्रतियोगित्व घट का धर्म है, वैसे ही पट भी घट का धर्म हो जायगा; क्योंकि दोनों का अभेद है । जब उक्त रीति से पट घट का धर्म हुआ, तब उसी रीति से घट भी पट का धर्म हुआ । क्योंकि 'पटात् घटो भिन्नः' इत्याकारक प्रतीतिसिद्ध प्रतियोगित्व का घट से निरूपण करने पर घट की अन्य गति नहीं है । अतः घट पट का आश्रय और धर्म होगा तथा पट भी घट का धर्म और आश्रय होगा किन्तु इस तरह घट पर आरूढ पट तथा उसी पट पर आरूढ वही घट—किसी प्रमाण का विषय नहीं होता ।

परिच्छेद ] भेद खण्डन का अनुवाद ६६ किञ्च धर्मस्य तस्य धर्मिणा सममसंबन्धेऽतिप्रसङ्गः, सम्बन्धानन्त्येऽनवस्था, प्रथमोतोऽन्ततो गत्वा वा स्वभावसम्बन्धाभ्युपगमे सम्बन्ध्यन्तरस्यापि तत्स्वभाव- प्रवेशादभेद एव पर्यवसानं स्यादिति । एवमन्यस्मिन्नपि धर्मविकल्प इति । तस्मात् स्वरूपभेदे प्रमाणं भवत् प्रत्यक्षमद्वैत एव प्रमाणं भवति । ननु घटादिकमेव यदाऽन्यानपेक्षं वीक्ष्यते, तदा घटादिकमित्येव प्रतीयते । यदा पुनः पटादिना निरूप्यते, तदा ततो भेद इति प्रतीयते । मैवम्; घटादिक- मित्येवंभूतप्रतीतेस्तावद्भेदप्रतीतिर्विलक्षणा, सा च न घटादिमात्रेण स्वविषयेण अन्यथाकारा भवितुमर्हति । न च पटादिकमधिकं तदा प्रकाशत इति विशेषः स्यात् ; घटपटविषय- प्रतीतितोऽपि वैलक्षण्यात् । न हि 'घटः पटश्च' इति 'घटात् पटो भिन्नः' इति प्रतीत्योरेकार्थकत्वं कश्चित् प्रत्येति । तत् कस्य हेतोः ? पञ्चम्या प्रथमया च वैकल्पिकं निर्देशमसहमानयैव प्रतीतिकलहनिरासात् । न हि घटः पटश्चेति फिर उस धर्म का धर्मी के साथ असम्बन्ध मानें, तो सब धर्मों को सर्वत्र रहना चाहिए, क्योंकि सम्बन्ध आदि कोई नियामक है ही नहीं । यदि कोई सम्बन्ध मानें; तो उस सम्बन्ध का सम्बन्ध, पुनः उसका अन्य सम्बन्ध, इस तरह अनवस्था हो जायगी । आरंभ या अन्त में यदि स्वरूपसम्बन्ध मानें, तो एक सम्बन्धी के स्वरूपसम्बन्ध में अन्य सम्बन्धी का प्रवेश होने से दोनों का ऐक्य हो जायगा । इसी रीति से घटत्वादि का भी घट से अभेद हो जायगा । अतः आप स्वरूपरूपी भेद में जो प्रत्यक्ष प्रमाण देते हैं, वह प्रत्यक्ष अद्वैत में ही प्रमाण हो गया । समर्थन—जब अन्य से अनिरूपित केवल घट प्रतीति का विषय होता है, तब 'घटः' इत्याकारक ही प्रतीति होती है । किन्तु जब वह पटादिरूप प्रतियोगी से निरूपित होकर विषय होता है, तब 'पटात् भिन्नो घटः' यह प्रतीति होती है । खण्डन—'घटः' इस प्रतीति से 'पटाद् भिन्नः घटः' यह प्रतीति विलक्षण है, 'घटः' यह प्रतीति केवल घटविषयक होने से विलक्षण नहीं हो सकती । समर्थन—'पटात् भिन्नः घटः' इस प्रतीति में पट अधिक भासता है, यही विशेष है ? खण्डन—घट-पट को विषय करनेवाली प्रतीति से भी 'पटाद् भिन्नः घटः' इस प्रतीति की विलक्षणता है । कोई भी विद्वान् 'घटः पटश्च' और 'घटाद् पटो भिन्नः' इन दो प्रतीतियों का विषय एक नहीं मान सकता; क्योंकि प्रथमा और पञ्चमी का अर्थ अधिक भासता है । 'घटः पटश्च' ऐसे ज्ञान के लिए 'घटाद् पटो भिन्नः' ऐसे वाक्य

७८ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्यं [ प्रथम प्रत्येतव्ये कश्चित् घटात् पटो भिन्न इति प्रत्येति । तस्माद् घटस्य न स्वरूप- निरूपणे पटप्रतीत्यपेक्षा । न च यत्प्रतीतिर्यत्प्रतीतेः कारणं स्यात्, तत्र तस्याः कारणभूतायाः प्रतीतेर्योऽर्थः तस्मात् 'अयम्' इति कृत्वा कार्यभूतायाः प्रतीतेरर्थः प्रतीयते । मा भून्निर्विकल्पकार्थादेवं सविकल्पकार्थस्य प्रतीतिः । मा च सादृश्यादेरेवं स्मर्यमाणादेः स्यात् । तस्मात् 'पटो घटाद्भिन्नः' इत्याद्याकारेण घटादेर्भेद एव भेदावधिभूतपटादिसंघटितः स्फुटं सर्वलोकसाक्षिकः प्रतीयमानो नैकप्रतीतेरन्य- प्रतीत्यपेक्षामान्रेण समर्थयितुं शक्योऽतिप्रसङ्गादिति । अत एवान्योन्याभावं भेदमवगाहमानं प्रत्यक्षमाद्वैतश्रुतिबाधकमित्यपि निरस्तम् । अन्योन्याभावोऽपि यस्माद्भेद एष्टव्यस्तमात्मन्येवान्तर्भावयेदुक्त- युक्तिभिः । किञ्च घटपटयोस्तद्वद्वन्द्योश्च तादात्म्यमन्योन्याभावस्य प्रतियोगि मन्तव्यम् । तद्यदि सर्वथा नेष्यते, तदा तद्विशिष्टस्तदुपलक्षितो वाऽन्योन्याभावोऽपि न प्रमाणेन प्रत्येतुं शक्यः । न हि शशविषाणविशिष्टस्तदुपलक्षितो वा कश्चित् का प्रयोग कोई भी नहीं करता । अतः घट के स्वरूप के निरूपण में पटप्रतीति की अपेक्षा ही नहीं है । समर्थन—घट-स्वरूप के भान में कदाचित् प्रतियोगी पट की प्रतीति अपेक्षित है। अतः ज्ञाननिष्ठ हेतुत्व का विषय में आरोपकर 'पटाद् भिन्नः घटः' यह प्रयोग होता है, जैसे धूम-ज्ञाननिष्ठ हेतुत्व का धूम में आरोपकर 'वह्निमान् धूमात्' यह प्रयोग होता है । खंडन—निर्विकल्पक ज्ञान सविकल्पक ज्ञान का तथा सादृश्य-ज्ञान स्मरण का हेतु है । फलतः आरोप से 'गोत्वात् गौः' और 'सादृश्यात् स्मरणम्' यह प्रयोग हो जायगा । अतः 'पटः घटाद् भिन्नः' इस आकार से पटनिष्ठ सर्व-लोक-साक्षिक और स्फुट प्रतीयमान घट के भेद का समर्थन, अन्य प्रतीति के एक प्रतीति का कारण होने मात्र से, नहीं हो सकता । समर्थन—भेद-प्रतीति अन्योन्याभाव को विषय करती है। खंडन—अन्योन्याभाव भी जिसका होगा, उसको अपने स्वरूप में ही उक्त रीति से अन्तर्भूत करेगा । किञ्च—घट-पट के तादात्म्य को अन्योन्याभाव का प्रतियोगी मानेंगे और वह (घट-पट का तादात्म्य) यदि सर्वथा असत् है, तो उससे उपलक्षित या विशिष्ट अन्यो-

परिच्छेद ] भेद-खण्डन का अनुवाद ७१ प्रामाणिको भवितुमर्हति । तत् कस्य हेतोः ? तस्मिँस्तद्विशिष्टरूपेऽर्थे तादृशि चोपलक्षणव्यवच्छिद्यमानात्मनि प्रमाणं निविशमानं विशेषणमपि तदीयं तदुपलक्षणमपि वा नानुल्लिखद्भवितुं प्रभवति । तस्मिंश्च अत्यन्तमसत्येवावलम्बने न तत्प्रामाण्यं शक्यसमर्थनम् । न च वाच्यं घटप्रतियोगिको पटमाश्रितोऽसौ अभावोऽभ्युपगम्यमानो नात्यन्तासत्प्रतियोगिकतादोषमावहतीति । तथा सति संसर्गाभावादन्योन्या- भावस्य को विशेषः स्यात् ? न हि यथा घटाभावः पटसंसर्गीति घटसंसर्गाभावं पटे समर्थयसे, तथा घटाभावः पटात्मक इति तत्तादात्म्याभावं पटस्य स्वीकरिष्यसि । तस्मात्तादात्म्यं संसर्गं च प्रतियोगिकोटावन्तर्भाव्य अन्योन्या- भावसंसर्गाभावयोर्वैलक्षण्यमभ्युपेयम् । तथा सति चात्यन्तासत्प्रतियोगिता दुर्वारा । न्याभाव भी असत् होने से प्रमाण का विषय नहीं हो सकता । शश-विषाण से विशिष्ट या उपलक्षित कोई वस्तु प्रमाण का विषय नहीं होती, क्योंकि शश- विषाणविशिष्ट वस्तु में या शश-विषाणरूप उपलक्षण से व्यवच्छिद्यमान वस्तु में प्रवृत्त प्रमाण, विशेषण या उपलक्षण को विषय किये बिना हो ही नहीं सकता । उस असत् विशेषण या उपलक्षणरूप विषय में ज्ञान के प्रामाण्य का समर्थन अशक्य है । समर्थन—अन्योन्याभाव का घट-पटतादात्म्य प्रतियोगी नहीं है, किन्तु घटनिष्ठ अन्योन्याभाव का प्रतियोगी पट है और पटनिष्ठ अन्योन्याभाव का प्रतियोगी घट । इसलिए असत्-प्रतियोगिकत्व दोष नहीं है । खंडन—ऐसा मानने पर संसर्गाभाव से अन्योन्याभाव में विशेषता ही क्या होगी ? अर्थात् अन्योन्याभाव और संसर्गाभाव में स्वभावकृत तो कोई विशेष है नहीं; प्रतियोगी तथा अनुयोगी-कृत ही विशेष है, सो आपके मत में रहा नहीं । जैसे घट-प्रतियोगिक पटसंसर्गी घट-संसर्गाभाव है, वैसे ही घट-प्रतियोगिक पटात्मक घटान्योन्‍याभाव है—यह भेद दोनों अभावों में नहीं कर सकते, क्योंकि पटात्मक अन्योन्याभाव मानने में आपको अपसिद्धान्त हो जायगा । आप अभाव को भावरूप नहीं मानते । अतः तादात्म्य और संसर्ग का प्रतियोगी-दल में अन्तर्भाव करके ही अन्योन्याभाव तथा संसर्गाभाव में परस्पर विशेष स्वीकार कर सकते हैं । ऐसा होने पर अन्योन्याभाव का असत्-प्रतियोगित्व दुर्वार ही है ।

७२ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम न च वाच्यं 'घटे पटत्वं नास्ति, पटे च घटत्वं नास्ती'त्येतावन्मात्रपर्यव- सितैव अन्योन्याभावस्य व्यवस्था मन्तव्येति । यतस्तथा सति घटत्वे पटत्वे च न कश्चित्तादृशो धर्मोऽभ्युपगम्यते, योऽन्योन्यस्मिन्निषेद्धुं योग्य इति तयोस्तादात्म्या- पत्तौ सत्यां घटे पटत्वं पटे घटत्वं च निषेधत् प्रमाणं घटत्वपटत्वशून्यत्व द्वयमप्या- वेदयतीति वैधर्म्यस्य स्वरूपभेदस्य चासंभवेन किं 'प्रतियोगिनं किं वाऽऽलम्बनं विधाय पटघटान्योन्याभावः प्रमाणपथमवतरेदिति । अत एव न वैधर्म्यमपि भेदमावेदयत् प्रत्यक्षमद्वैतश्रुतिबाधकमुपपद्यते । वैधर्म्येऽपि हि घटत्वपटत्वादौ वैधर्म्यमन्यदस्तीत्यभ्युपगमे वैधर्म्ये वैधर्म्याविश्रा- न्त्यनवस्थयोरेकमनुंभवश्च कथं प्रत्युत्तरणीयः । वैधर्म्ये च वैधर्म्यास्वीकारे वैधर्म्ययोरेक्यापत्त्या कथमात्माश्रयभेदत्वेन तयोः पर्यवसानं स्यात् । समर्थन—यदि कहें कि घट में पटत्व का तथा पट में घटत्व का अभाव ही घट- पट का अन्योन्याभाव है ? खंडन—ऐसा होने पर घटत्व तथा पटत्व में ऐसा कोई धर्म नहीं, जिसका अभाव पटत्व-घटत्व में माना जाय । अतः उन दोनों में तादात्म्य होने पर घट में पटत्व तथा पट में घटत्व के अभाव को विषय करनेवाला प्रमाण घटत्व तथा पटत्व से शून्य दोनों को सिद्ध करेगा । इसलिए घट तथा पट में वैधर्म्य तथा स्वरूपभेद के न होने से अन्योन्याभाव किसे प्रतियोगी या आलम्बन मानकर प्रमाण का विषय होगा ? समर्थन--घटनिष्ठ अभाव-प्रतियोगी पटत्वरूप धर्मवत्त्वरूप पट का तथा पटनिष्ठ अभाव-प्रतियोगी घटत्वरूप धर्मवत्त्व घट का जो वैधर्म्य है, वही भेद है । उसीका अवलम्बनकर भेद-प्रत्यक्ष श्रुति का बाधक हो सकता है ? खण्डन—वैधर्म्य में वैधर्म्य रहता है या नहीं ? यदि नहीं, तो वैधर्म्य की विश्रान्ति ही दोष हुआ । फिर जिस वैधर्म्य में वैधर्म्यान्तर नहीं मानेंगे, तो उन दोनों का ऐक्य भी हो जायगा । यदि वैधर्म्यों की अनादि-अनन्त धारा मानें, तो अनवस्था दोष होगा । यदि बीजाङ्कुर के तुल्य अनवस्था को इष्टापत्ति मानें तो वैधम्य में वैधर्म्य, उसमें अन्य वैधर्म्य—इस रीति से वैधर्म्य की अविश्रान्त धारा अनुभव की अविषय होने से अननुभवरूप दोष हो जायगा । यदि कहें कि वैधर्म्य में वैधर्म्य नहीं रहता, तो उन दोनों में ऐक्य होने से वे अपने अधिकरण के भेद कैसे कहलायेंगे ? १. 'कं प्रतियोगिनम्, किं प्रतियोगि वा' इति साधु पाठः ।

परिच्छेद ] भेद-खण्डन का अनुवाद ७३ किं च ये ते वैधर्म्ये भेदौ ते किं घटादितो भिन्ने धर्मिणि निविशेते, किमभिन्ने, परस्परविरुद्धयोरनयोः पृथग्भूतस्य प्रकारस्यासंभवात् । आद्ये येन भेदेन भिन्नत्वं वैधर्म्याश्रयोर्मन्तव्यं तत्रापि पर्यनुयोग इत्यनवस्थायां पर्यवसानं स्यात् । सन्त्वनन्ता एव भेदा इति चेन्न । क्रमेण तेषामा- श्रयसम्बन्धे, सावधिसत्त्वे वस्तुनि तदन्वयासंगतिरेव । अथ जायमानं वस्तु युगपदेव ते भेदाः परिश्रमन्ते । तदा किं भेदविशेषिते किं भेदव्यवस्थितिरिति किं विनिगमकम् ? विशेषाभावादन्योन्यकलहं तेषां कः समाधातुमीष्टे ? चरमचरमस्वीकार्येण च भेदेन प्रथमप्रथमस्वीकृतभेदोपयोगसिद्धेः, अग्रे धावन् पश्चाल्लुप्यमानो विस्मरणशीलश्रुतवत् स भेदप्रवाहः किमालम्बेत ? एवमेवंविधे विषयेऽन्यत्रापि । फिर जो वैधर्म्य भेद हैं, क्या वे घटादि से भिन्न धर्मी पटादि में रहते हैं या अभिन्न धर्मी में ? परस्पर विरुद्ध इन दोनों से पृथग्भूत ( भेदाभेद या भेदाभेद से रहित ) अन्य प्रकार असम्भव है; क्योंकि परस्पर विरोध में प्रकारान्तर नहीं होता । यदि भिन्न धर्मी में भेद मानें, तो जिस भेद से वैधर्म्य और आश्रय को भिन्न मानेंगे, वह भेद भी भिन्न धर्मी में मानना होगा—इस रीति से भेद की परम्परा मानने पर अनवस्था होगी । प्रश्न—यदि धर्मी में अनन्त भेद रहें, तो क्या दोष है ? उत्तर—यदि क्रमशः उनका आश्रय से सम्बन्ध मानें, तो सान्त वस्तु ( कार्य ) में उन दोनों का सम्बन्ध नहीं होगा । यदि कहें कि जायमान वस्तु को एक काल में ही वे भेद प्राप्त होते हैं, तो किस भेद से विशिष्ट में कौन-सा भेद रहता है—इसमें क्या विनिगमक है ? अमुक भेदविशिष्ट में अमुक भेद रहता है, इसमें कोई विशेष प्रमाण तो है नहीं । फिर इन भेदों के आश्रय से सम्बन्ध की व्यवस्था कौन करेगा ? साथ ही चरम-चरम स्वीकार्य भेद से प्रथम-प्रथम स्वीकृत भद के उपयोग की सिद्धि होगी । इससे आगे दौड़ता और पीछे से नष्ट होता् हुआ वह भेद-प्रवाह श्रुत ( पठित ) को विस्मृत कर जानेवाले छात्र के तुल्य किसे अवलम्बन करेगा ? इसी तरह 'गोत्व-विशिष्ट में गोत्व रहता है या गोत्व-रहित में ?' इत्यादि विकल्पकर गोत्वादि धर्मों का भी निरास करना चाहिए । १०