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किरातार्जुनीयम् (घण्टापथ व सुधा टीका सहित)

Kiratarjuniyam of Bharavi Hindi

महाकवि भारवि द्वारा

स्रोत: Kiratarjuniyam with Ghantapath & Sudha Hindi Commentary by Sheshraj Sharma (उद्गम)

DevanagariHindipublished707 पृष्ठ

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र्जुनस्य धैर्येण दृढतया च प्रसन्नः शिवः प्रत्यक्षीभूय तस्मै धनुर्वेदशिक्षणपूर्वकं पाशुपतास्त्रं च ददाति। इन्द्रादिभ्यो देवेभ्यश्च शस्त्रास्त्रप्राप्त्या कृतार्थोऽर्जुनो भ्रातृसकाशं गच्छति। परिमितमेतद्वृत्तमुपजीव्याऽष्टादशसर्गसंमितं-नीति-सुभाषितादिसमलंकृतं पूर्वकविभिरक्षुण्णे चित्रकाव्ये चाद्भुतनैपुण्यं समाविश्य भारविर्महाकविः चित्ताकर्षकं किरातार्जुनीयं महाकाव्यं प्रणिनाय।

किरातार्जुनीयस्य नायकरसादिविवरणम्।

किरातार्जुनीयस्य नायको धीरोदात्तोऽर्जुनः। प्रतिनायकश्च किरातपतिः शंकरः। उभावालम्बनविभावौ। दूतमुखोच्चारितानि वाक्यान्युद्दीपनानि। नायक-प्रतिनायकयोः धनुराकर्षणादयोऽनुभावाः। धृत्यादयो व्यभिचारिभावाः। उत्साहः स्थायी भावः। वीररसोऽङ्गी। शृङ्गारादिरसा अङ्गरसाः। रीतिः पाञ्चाली वैदर्भी च। गुणः प्रसादो माधुर्यं च। किरातप्रहितो दूतो निसृष्टार्थः। दिव्यास्त्रलाभः प्रयोजनम्।

किरातार्जुनीयस्य कथासारः।

प्रथमसर्गे—युधिष्ठिरसमीपे द्वैतवने वणिग्वेषधारिणो वनेचरस्य मुखाद् दुर्योधनस्य शासनकौशलं श्रुत्वा युधिष्ठिरं युद्धार्थं उत्तेजयितुं द्रौपद्या ओजोगुणपूर्णमुपालम्भनं च।

द्वितीयसर्गे—भीमसेनस्य प्रशंसापूर्वकं द्रौपदीवचसः समर्थनम्। युधिष्ठिरस्य सान्त्वनापूर्वकं तयोः प्रबोधनम्। अत्रान्तरे महामुनेर्व्यासस्यागमनम्।

तृतीयसर्गे—युद्धे जयलाभार्थमिन्द्रकीलशैलेऽर्जुनस्य तपश्चरणार्थं व्यासस्योपदेशः। तस्य शिवाराधनार्थं सविध्यर्जुनं प्रति विशेषोपदेशः, मार्गप्रदर्शनार्थमेकस्य गुह्यकस्योपस्थापनं च। गमनकाले द्रौपद्या अर्जुनं प्रत्युपदेशवाक्यानि। यक्षेण सहाऽर्जुनस्येन्द्रकीलपर्वतं प्रति प्रस्थानं च।

चतुर्थसर्गे—शरदागमेन क्षेत्रादीनां शोभासंवर्धनम्। अर्जुनस्य हिमालयवर्णनम्।

पञ्चमसर्गे—हिमालयस्य रुचिरशोभावर्णनम्।

षष्ठसर्गे—अर्जुनस्येन्द्रकीलपर्वत आरोहणवर्णनम् तस्य तपश्चरणं च। तत्तपो-

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भङ्गायेन्द्रस्य गन्धर्वाणां सविधेऽप्सरसां प्रेषणम् ।

सप्तमसर्गे—गन्धर्वैः सहाऽप्सरसामिन्द्रकीलपर्वते विलासपूर्वकं गमनम् ।

अष्टमसर्गे—गन्धर्वाणामप्सरसां च कुसुमावचायादिललितकेलिवर्णनम् ।

नवमसर्गे—सन्ध्या-चन्द्रोदय-सुरतक्रीडा-प्रभातवर्णनम् ।

दशमसर्गे—अर्जुनस्य प्रलोभनायाऽप्सरसां विलासप्रदर्शनम्, तस्य नैष्फल्यं च ।

एकादशसर्गे—वृद्धविप्रवेषिणेन्द्रेण सहाऽर्जुनस्य संवादः । परीक्षानन्तरमर्जुनस्य तपसि दृढनिष्ठादर्शनेन प्रसन्नेन्द्रस्य स्वस्वरूपदर्शनानन्तरं शिवारराधनायार्जुनं प्रत्युपदेशः ।

द्वादशसर्गे—अर्जुनस्य कठोरतपसा शिवारोधनम् । तापसैः शिवं प्रति तद्वर्णनम् । किरातवेषिणः शिवस्य शूकररूपस्य मूकदानवस्य चार्जुनसमीपे प्रयाणम् ।

त्रयोदशसर्गे—शिवस्याऽर्जुनस्य च युगपच्छरप्रक्षेपेणाऽर्जुनहननार्थमागतस्य मूकदानवस्य वधः । तच्छरीराच्छरग्रहणार्थमुद्यतमर्जुनं प्रति शिवदूतकिरातस्याभिक्षेपवचः ।

चतुर्दशसर्गे—अर्जुनस्य च तत्प्रत्युत्तरप्रदानम् । ततः कार्तिकेयाधिष्ठितया किरातसेनयाऽन्तः किरातपतिना शिवेन च सममर्जुनस्य भीषणयुद्धवर्णनम् ।

पञ्चदशसर्गे—किराताऽर्जुनयोश्चित्रयुद्धवर्णनम् ।

षोडशसर्गे—किरातपतेः समरकौशलमवेक्ष्याऽर्जुनस्य चेतसि नानाविधा वितर्काः । द्वयोरसाधारणभीषणयुद्धवर्णनम् ।

सप्तदशसर्गे—किरातसेनया सममर्जुनस्य युद्धवर्णनम् । शङ्करार्जुनयोस्तुमुलसंग्रामवर्णनम् ।

अष्टादशसर्गे—पराजितस्याऽप्यर्जुनस्य दृढनिष्ठादर्शनेन प्रीतस्य शिवस्य तं प्रति स्वस्वरूपसंदर्शनम् । एवं च तस्य अर्जुनाय पाशुपतास्त्रप्रदानं धनुर्वेदप्रदानं च । तस्मै इन्द्रादिदेवानाञ्च स्वस्वास्त्रप्रदानम् । लब्धतः सफलमनोरथस्यार्जुनस्य युधिष्ठिरसमीपे गमनञ्च ।

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महाकवि भारवि और किरातार्जुनीय

संस्कृतसाहित्यमें कवि प्रचुर परिमाणमें देखे गये हैं, परन्तु सहृदय निकषार्थ-में सम्मान पानेके लिए दो-चार ही कवि समर्थ हुए हैं। कविकृतियोंमें भारविकी कृति किरातार्जुनीय बृहत्त्रयी और पञ्च काव्योंमें भी अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। बृहत्त्रयीमें तीन महाकाव्य परिगणित हैं, उनमें भारविका किरातार्जुनीय, माघका शिशुपालवध और श्रीहर्षका नैषधीयचरित चर्चित हैं। इसी तरह पञ्च काव्योंमें भी कालिदासके रघुवंश और कुमारसंभव, भारविका किरातार्जुनीय, माघका शिशुपालवध और श्रीहर्षका नैषधीयचरित महाकाव्य गणित हुए हैं। दोनों स्थलोंमें भारविकी कृति और उनके नामका निर्देश विशिष्ट लोक-प्रियता और कालक्रमके अनुरूप हैं।

महाभारतके वनपर्वमें वर्णित पाण्डवचरितके आधारपर किरातार्जुनीय महाकाव्यका प्रणयन हुआ है। 'उपमा कालिदासस्य, भारवेरर्थगौरवम्।' इस सूक्तिके अनुसार उपमामें कालिदास बेजोड़ हैं तो अर्थगौरवमें भारविका अप्रतिम स्थान है। अर्थात् परिमित शब्दोंमें अर्थोंकी गूढताके प्रदर्शनमें भारवि अपनी सानी नहीं रखते हैं। अत एव प्रसिद्ध है—

'भारवेरर्थगौरवम्' और 'नारिकेलफलसम्मितं वचः'

अर्थात् नारियल फलके समान भारविके वचन गूढ़ हैं, ऐसी लोकप्रसिद्धि है। उनकी रचना एकमात्र किरातार्जुनीयके होनेपर भी 'एकश्चन्द्रस्तमो हन्ति, न च तारागणोऽपि च।' इस उक्तिके अनुसार एकमात्र किरातार्जुनीय महाकाव्य ही उनके यशको चिरस्थायी करनेमें पर्याप्त है।

कालिदासके समान माधुर्य न होनेपर भी उनका महाकाव्य अन्तरंगवत् और बहिर्जगतके मनोहर वर्णनसे सहृदयोंका हृदयाकर्षण करनेके लिए परिपूर्ण है। किरातार्जुनीयमें रस, भाव, ध्वनि, गुण, शब्दालङ्कार और अर्थालङ्कार प्रचुर परिमाणमें प्रदर्शित हैं। ऐहोल शिलालेखके अनुसार ६३४ ई० के ही भारवि कालिदासके साथ परिगणित हैं। भारविका संस्कृतजगत्में वंशपरम्परागत अधिकार है। उनकी रचनामें च्युतसंस्कृति कहीं भी नहीं पायी जाती है। इसी प्रकारसे शब्दोंके प्रयोगमें भी वे परिनिष्ठित हैं। परवर्ती कवियोंने उनका उपकार लिया

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गया है, जैसे काव्यके सर्गान्तमें उन्होंने 'श्री' शब्दका प्रयोग किया है। उसी तरह माघकविने अपने शिशुपालवध महाकाव्यमें 'लक्ष्मी' शब्दका प्रदर्शन किया है और श्रीहर्षने अपने नैषधीयचरितमें 'आनन्द' शब्द प्रयुक्त किया है।

इतना ही क्यों, कलापक्षमें भी उन्होंने असामान्य कौशल दिखाया है, अर्थात् चित्रकाव्यके अनेकानेक प्रयोगोंसे अपनी रचना चित्रित की है। जैसे—एकाक्षर-पद, निरोष्ठ्य, पादान्तादियमक, पादादियमक, गोमूत्रिकाबन्ध, एकाक्षर, समुद्गक, प्रतिलोमानुलोमपाद, प्रतिलोमानुलोमाऽर्द्ध, प्रतिलोमानुलोमसे दो श्लोक, सर्वतोभद्र, अर्धभ्रमिक, निरोष्ठ्य, पादाद्यन्तयमक, त्रिचतुर्थयमक, आद्यन्तयमक, द्व्यक्षर, शृङ्खलायमक, गूढचतुर्थपाद, अर्थत्रयवाची (श्लोक) और महायमक।

भारविके परवर्ती कवि माघने इनका अनुकरण किया। महाकवि रत्नाकरने भी इसका अनुसरण किया है।

इसी प्रकार जैसे महाकवि कालिदास एक पद्यकी विचित्रतासे 'दीपशिखा' विशेषणवाले हुए हैं, वैसे ही महाकवि भारवि भी— 'उत्फुल्लस्थलनलिनीवनादमुष्मादुद्धूतः सरसिजसंभवः परागः । वात्याभिर्विर्यात विवर्त्तितः समन्तादाधत्ते कनकमयातपत्रलक्ष्मीम् ॥ ५-३९ ॥

इस पद्यकी विचित्रतासे 'आतपत्रभारवि' ऐसी प्रसिद्धिसे मण्डित हुए हैं। शारदातनयने अपने 'भावप्रकाशन' में— "अथैनाऽयं 'छत्रम्भारवि' ख्यातिं च गतः ।' तादात्म्यं प्रावरस्योभरिबिः स्पष्टमूहिवान्"। ऐसा निर्देश कर भारविकी प्रशंसा की है। इसी प्रकार भारविके परवर्ती महाकवि माघ भी एक पद्यरचनाकी विचित्रतासे 'घण्टामाघ' ऐसी उक्तिसे अलङ्कृत हुए हैं।

'किरातार्जुनीय' पर १९ टीकाएँ लिखी गयी हैं, पर उन सबमें मल्लिनाथकी घण्टापथटीका श्रेष्ठ है।

भारविका देश और समय

किरातार्जुनीयके कर्त्ता प्रौढकवि भारवि उत्तरदेशीय, दाक्षिणात्य या आन्ध्रदेशीय थे इस विषयमें अनेक मत हैं।

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सन् ६३४ ई० के ऐहोलस्थानस्थित शिलालेखके 'स विजयतां रविकीर्त्तिः कविताश्रितकालिदासभारविकीर्त्तिः' इस पद्यार्धके अनुसार सन् ६३४ ई० से पूर्ववर्ती भारवि थे ऐसा ज्ञात होता है ।

भारविकी कुछ प्रशंसा और नीतिविषयक सूक्तियाँ

महाकवि क्षेमेन्द्रने भारविके वंशस्थवृत्तकी अतिशय प्रशंसा की है, जैसे— वृत्तस्फुरणस्य सा काऽपि वंशस्थस्य विचित्रता । प्रतिभा भारवेर्येन सच्छायेनाऽधिकीकृता ॥

कितनी मर्मस्पर्शिनी उक्तियां उनकी रचनामें मिलती हैं, जैसे— 'विविक्तिसङ्कथसेतुमधितताम्' । 'वसन्ति हि प्रेम्णि गुणा न वस्तुनि' ।

एकावली अलङ्कारमे अलङ्कृत यह पद्य कितना मनोहर है— 'हितं मनोहारि च दुर्लभं वचः' । ( १-४ ) 'शुचि भूषयति श्रुतं वपुः प्रशमस्तस्य भवत्यलङ्क्रिया । प्रशमाभरणं पराक्रमः, स नयापादितसिद्धिमुद्वहन्' । ( २-३२ )

इसी तरह यह पद्य भी कैसा हृदयस्पर्शी है— जीर्यन्तो दुर्जया देहे रिपवश्चक्षुरादयः । जितेषु तनु लोकोऽयं तेषु क्रान्तस्तथा जितः ॥ ( ११-३२ )

किरातार्जुनीयका कथासार

द्यूतक्रीडामें पराजित होकर युधिष्ठिरके अपने भाइयों और द्रौपदीके साथ द्वैतवनमें निवासकालमें व्यासके उपदेशसे अर्जुन इन्द्रकील पर्वतपर तपस्या कर आराधनासे प्रसन्न शिवजीसे पाशुपत अस्त्र और इन्द्र आदि देवताओंसे अनेकानेक अस्त्र प्राप्तकर द्वैतवनमें अपने भाइयोंके पास आते हैं, इतनी छोटीसी घटनाका अवलम्बक कर भारविने १८ सर्गोंके किरातार्जुनीय महाकाव्यकी रचना कर अपनी अद्भुत कल्पना-कुशलता दरसाई है । किरातार्जुनीय शब्दकी व्युत्पत्ति है—किरातश्च अर्जुनश्च किरातार्जुनौ (द्वन्द्वसमास) । किरातार्जुनौ अधिकृत्य कृतो ग्रन्थः किरातार्जुनीयम् । किरातार्जुन शब्दसे 'शिशुक्रन्दयमसभाद्वन्द्वेन्द्राज्जननादिभ्यश्च' इस सूत्रसे छ (-ईय) प्रत्ययसे किरातार्जुनीयः शब्द

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बनता है। अर्थात् किरातपतिके वेषधारी शिवजी और अर्जुनके युद्धको अधिकार कर किये गये ग्रन्थको 'किरातार्जुनीय' कहते हैं।

किरातार्जुनीयके प्रत्येक सर्गका संक्षिप्त विवरण

प्रथमसर्ग—कौरवोंसे द्यूतक्रीडामें पराजित होकर युधिष्ठिर अपने भाइयों और द्रौपदीके साथ द्वैतवनमें निवास करते थे। उस समय दुर्योधनकी शासन-पद्धतिके परिज्ञानके लिए उनसे प्रेषित ब्रह्मचारिवेषधारी वनेचर आकर दुर्योधन-की नीतिकुशलताका सविस्तर वर्णन करता है। उसके जानेके बाद शत्रुके उत्कर्षसे पीडित द्रौपदी युद्ध करनेके लिए अनेक उत्तेजक वाक्योंसे युधिष्ठिरको उपालम्भ करती है।

द्वितीय सर्ग—भीमसेन द्रौपदीके वचन सुनकर उनका प्रशंसापूर्वक अनु-मोदन कर युद्धके लिए युधिष्ठिरको प्रेरणा देते हैं। तब युधिष्ठिर नीतिमार्गका अवलम्बन कर शान्तिपूर्ण वचनोंसे उनको समझाते हैं। इसी बीच वेदव्यास वहाँ आते हैं और पाण्डवलोग उनका स्वागत-सत्कार करते हैं।

तृतीय सर्ग—व्यासजी अपने आगमनसे कृतार्थ युधिष्ठिरको कहते हैं 'हे राजन् ! मेरे लिए कौरव और पाण्डवोंमें समभाव उचित होनेपर भी भरी सभामें कौरवोंके धर्ममार्गसे च्युत होनेपर भी तुम्हारे धैर्य और तितिक्षासे 'भवन्ति भव्येषु हि पक्षपाताः' अर्थात् सभीको सज्जनोंमें पक्षपात होता है। इस न्यायसे मैं तुम्हें उपदेश देता हूँ कि तुम पराक्रमसे ही अपना राज्य प्राप्त करोगे। परन्तु तुम्हारा शत्रु वीर्य, अस्त्र और सैन्योंसे तुमसे जबर्दस्त है, इस कारण तुम्हें जयके लिए उत्कर्ष प्राप्त करना है। कहा भी गया है—'प्रकर्षतन्त्रा हि रणे जयश्रीः' अर्थात् युद्धमें विजयलक्ष्मी उत्कर्षके अधीन है। परन्तु अपने गुरु परशुराम को निष्फल बनानेवाले इच्छामरण भीष्म पितामह, अयत्क्षको हव्य करनेके लिए तत्पर अग्निके समान तेजस्वी द्रोणाचार्य और क्रोधसे सबके धैर्यको च्युत करनेवाले परशुरामके उपासक कर्ण ये सब शत्रुके पक्षमें हैं। हे धर्मराज ! जिस विद्यासे इन्द्रकील पर्वतपर तपस्या कर अर्जुन दुर्लभ अस्त्रप्राप्तिसे विक्रमसंपन्न होकर इन सब विरोधियोंको उन्मूलित कर सकेंगे, मैं उस विद्याको देनेके लिए आया हूँ। ऐसा कहकर व्यासजीने विधिपूर्वक उस विद्याको अर्जुनको प्रदान किया,

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और उस पर्वतके मार्गदर्शक एक गुह्यकको वहाँ उपस्थित कर व्यासजी अन्तर्हित हो गये ।

प्रस्थानकालमें अश्रुओंका संवरण कर द्रौपदीने अर्जुनको अनेक उपदेश-वाक्य कहा। अनन्तर पुरोहितसे पहनाये गये शर और कवचसे युक्त होकर अर्जुन इन्द्रकील पर्वतकी ओर प्रस्थान करते हैं ।

चतुर्थ सर्ग—तब यक्षके साथ इन्द्रकील पर्वतकी ओर जाते हुए अर्जुनने शरत् ऋतुकी शोभासे सम्पन्न पृथिवीको देखा । तब यक्ष भी शरत्की सुषमासे युक्त वनभूमिको देखनेमें तत्पर अर्जुनको शरत्‌की शोभाका वर्णन करने लगा । अर्जुन भी हिमालय पर्वतका अवलोकन करने लगे ।

पञ्चम सर्ग—यक्षके साथ इन्द्रकील पर्वतपर चढ़ते हुए अर्जुन हिमालय पर्वतकी अनेक मनोहर शोभाको देखने लगे । उनको हिमालयदर्शनमें आसक्त देखकर यक्ष भी इन्द्रकील पर्वतका वर्णन करने लगा, अनन्तर यक्ष अर्जुनको आशीर्वाद देकर चला जाता है । कुछ क्षण अर्जुनको उसके वियोगसे खेदका अनुभव हुआ ।

षष्ठ सर्ग—अर्जुन इन्द्रकील पर्वतपर आरोहण करते हैं । तब अनेक सुन्दर वृक्षोंसे परिपूरित इन्द्रकील शैलपर निवास कर अर्जुन कठोर तपस्या करने लगे । उनकी तपस्याके प्रभावसे हिंस्रजन्तु भी हिंसा छोड़कर परस्पर वैरत्याग कर विचरण करने लगे । अर्जुनकी तपस्याके प्रभावसे खिन्न होकर सप्तर्षियोंने इन्द्रके पास जाकर उसका वर्णन किया । तब इन्द्रने अर्जुनकी तपस्याकी परीक्षाके लिए विघ्नकारक अप्सराओं और गन्धर्वोंको वहाँ भेजा ।

सप्तम सर्ग—गन्धर्वोसे संरक्षित अप्सराएँ इन्द्रकी आज्ञाके अनुसार रथ और हाथी आदि यात्राके उपकरणोंके साथ इन्द्रकील पर्वतपर स्थित अर्जुनके पास पहुँच गयीं ।

अष्टम सर्ग—अप्सरा और गन्धर्व आदिके अर्जुनका मनोहरण करनेके लिए अनेक प्रकारके आमोद प्रमोदोंका वर्णन एवम् प्रातःकालका सुहावना वर्णन है।

नवम सर्ग—सन्ध्या और चन्द्रोदयका मनोहर वर्णन । कामकी क्रीड़ा, अप्सराओंके अनेक आमोद-प्रमोदोंका वर्णन तथा प्रातःकालका मनोहर वर्णन ।

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दशम सर्ग--नृत्य, गीत और वाद्य आदि प्रयोगोंसे अविचलित अर्जुनकी तपस्याको भङ्ग करनेके प्रयासके असफल होनेसे वे अप्सराएँ और गन्धर्व इन्द्रके पास लौट गये।

एकादश सर्ग--यह सब वृत्तान्त सुनकर इन्द्र वृद्ध ब्राह्मणका रूप लेकर यात्रासे परिश्रान्त-से होकर अर्जुनके पास पहुँचते हैं और बाण आदि धारण कर तपस्या करनेका कारण पूछते हैं। तब अर्जुनके अपने उद्देश्यको सूचित करनेपर इन्द्र अहिंसा और शान्तिके महत्त्वका प्रतिपादन करते हैं। तब अर्जुन अपने वर्ण और आश्रमके अनुसार अपने कर्त्तव्यका समर्थन करते हैं। अनन्तर प्रसन्न होकर इन्द्र अपने रूपमें प्रकट होकर अर्जुनको आलिङ्गन कर उन्हें शिवजीकी उपासना करनेका उपदेश देकर अन्तर्हित हो जाते हैं।

द्वादश सर्ग--तब अर्जुन शिवजीकी आराधना करनेके लिए कठोर तपस्या करने लगे। तपस्या करते हुए तेजस्वी अर्जुनको दर्शक लोग शिवजी, इन्द्र और अग्निके समान देखने लगे तथा उनके तपःप्रभावके सहन करनेमें असमर्थ होकर शिवजीकी स्तुति करने लगे। तब शिवजीने प्रत्यक्ष होकर उनको 'ये बदरिका-श्रमवासी नारायण हैं'—ऐसा कहकर अर्जुनका परिचय दिया और फिर कहा कि 'अर्जुनकी तपस्याको देवकार्य समझकर मूक नामका दानव शूकरका रूप लेकर उन्हें मारनेके लिए आयेगा। मैं भी किरातका वेष धारण कर उसे शरप्रहारसे मार डालूँगा। उसी समय अर्जुन भी उसपर शरप्रहार करेंगे। अनन्तर दोनोंके बाणोंसे गिरे हुए उसके शरीरसे बाण लेनेके विषयमें मेरे भृत्यसे अर्जुनका कलह होगा।' ऐसा कहकर उन्हें सान्त्वना देकर शिवजी किरातपतिका वेष लेकर और उनके प्रमथसैन्यगण भी किरातका वेष लेकर अर्जुनसे युद्ध करनेके लिए सन्नद्ध हो गये।

त्रयोदश सर्ग--तब अर्जुन विशाल शरीरवाले शूकरको अपनी ओर आते हुए देखकर अनेक तर्कणा करने लगे और उसपर गाण्डीव धनुपर शर लेकर प्रहार करनेके लिए तत्पर हुए। यह देखकर शिवजीने भी उसपर शरप्रहार किया। एक साथ दोनोंके बाणप्रहारसे वह शूकर निष्प्राण होकर भूतलपर गिर पड़ा। तब प्रचुर बाणोंसे रहते हुए भी अर्जुन उसके शरीरसे बाण लेनेके लिए तत्पर हुए। उसी समय उन्होंने किरातपति शिवजीके भृत्य एक किरातको आते देखा।

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अर्जुनको प्रणाम कर प्रशंसापूर्वक कहा कि 'आपको हमारे स्वामी के बाणको इसतरह लेना उचित नहीं। आप उनसे माँगकर ले लें। निकट ही हैं, उनके साथ मैत्री कर लें। आपको सब कुछ अभीष्ट प्राप्त होगा।'

चतुर्दश सर्ग--अर्जुनने वनेचरका उपदेश सुनकर उसके भाषणकी प्रशंसा कर कहा कि 'तुम्हारे स्वामीका बाण कहीं गुम हो गया होगा, उसे ढूंढो। उसके लिए तुम्हे मुझे उलाहना देना उचित नहीं। खाण्डववनके दाहके समय अग्निदेवने मुझे असंख्य बाण दिये हैं। उसके लिए पर्वतीय किरातके बाणमें मेरी आस्था नहीं है। वर्णाश्रमधर्मके रक्षक मेरी आखेट क्रीडा करनेवाले तुम्हारे स्वामी पर्वतीय किरातके साथ मैत्रीका कुछ भी औचित्य नहीं है।' ऐसा कहनेवाले अर्जुन से यह वनेचर तर्जनकर सेनाके पास स्थित प्रसन्नस्वरूप शिवजीके पास गया। तब विशाल किरातसेनाके साथ जिसके अधिपति कार्त्तिकेय थे, राजकुमार अर्जुनका भीषण युद्ध होता है।

पञ्चदश सर्ग--कोपाक्रान्त अर्जुनके बाणप्रहारसे सारी किरातसेना भया-विष्ट होकर भागने लगी। तब अर्जुन उनके सेनापति कार्त्तिकेयसे युद्ध करने लगे। कार्त्तिकेय अपनी सेनाको साहस और धैर्य देनेके लिए समझाने लगे। तब शिवजी और अर्जुनका तुमुल संग्राम होने लगा। शिवजीके प्रचण्ड बाणोंसे विद्ध होकर भी अर्जुनने अपना धैर्य नहीं छोड़ा। इसे देख सब चकित हुए।

षोडश सर्ग - अर्जुन किरातपतिको असामान्य रणकौशल और अपनी शक्तिहीनता देखकर अनेक तर्क-वितर्क करने लगे। तब उन्होंने शिवसेना-पर प्रस्वापनास्त्रका प्रयोग किया। फलस्वरूप शिवसेना मूर्च्छित हो गई। तब शिवजीके ललाट (लिलार) से पीला तेज उत्पन्न हुआ, जिससे किरातसेना पूर्ववत् युद्धके लिए सन्नद्ध हुई। अनन्तर अर्जुनने नागपाशोंका प्रयोग किया। उनके प्रभावसे आकाशचारी पक्षी इधर-उधर भागने लगे। तब शिवजीने नागपाशोंको हटानेके लिए गरुडास्त्रका प्रक्षेप किया, जिससे नागपाश निरस्त हो गये। तब अर्जुनने आग्नेयास्त्रका प्रहार किया जिससे ज्वालामाली अग्निदेवके प्रकट होनेसे सर्वत्र उष्णताका प्रादुर्भाव हुआ। शिवजीने उसे हटानेके लिए वरुणास्त्रका प्रक्षेप किया जिससे मेघमण्डलसे करासम्पातमय वृष्टिसे अग्निका प्रचण्ड तेज दूर हो गया। अर्जुनसे किये गये समस्त दिव्यास्त्रोंका प्रयोग

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भाग्यहीन पुरुषके कर्मके समान शिवजीने अपने अस्त्रोंसे विफल कर डाला। इस प्रकार अस्त्रप्रयोगोंमें निष्फल होकर भी अर्जुन युद्ध करनेसे विरत नहीं हुए।

सप्तदश सर्ग--'ऐसा युद्ध कभी नहीं हुआ था' ऐसा सोचकर अर्जुन क्रुद्ध होकर, जैसे सर्प विषवमन करता है, उसी तरह आँखोंसे आंसू गिराने लगे, तथाऽपि बाणवृष्टिसे किरातसेनाको पीड़ित करने लगे। किरातपति शिवजीने उनके समस्त बाणोंको नष्ट कर दिया और उनके मर्मस्थलोंको बाणप्रहारसे अत्यन्त पीड़ित कर दिया। उन्होंने अर्जुनके समस्त शरोंको समाप्त कर कवचका भी अपहरण कर डाला। कवच और बाणोंसे रहित होकर भी अर्जुन धैर्यपूर्वक किरातपतिके ऊपर शिलावृष्टि करने लगे। शिवजीके द्वारा उसका निवारण करनेपर अर्जुन मल्लयुद्ध करनेके लिए सन्नद्ध हुए।

अष्टादश सर्ग--तब किरातपति और अर्जुनका भीषण बाहुयुद्ध होने लगा। परस्परके आघातसे दोनों रक्ताक्त हो गये। 'किरातपति कौन है और अर्जुन कौन है' यह पहचानना भी कठिन हुआ। उस समय अन्तरिक्षमें उछले हुए शिवजीके चरणोंको अर्जुनने पकड़ लिया। तब भगवान् शिवजीने विस्मित होकर अर्जुनका हृदयसे आलिङ्गन किया और उन्हें अपने स्वरूपका दर्शन दिया। अर्जुनने अष्टमूर्ति शिवजीकी स्तुति की। शिवजीने उनको पाशुपतास्त्र देकर धनुर्वेद पढ़ाया। इन्द्र आदि देवताओंने भी अपने अस्त्रोंको प्रदान कर अर्जुनको प्रोत्साहित किया। अनन्तर शिवजीकी आज्ञासे सफलमनोरथ अर्जुन द्वैतवनमें अपने भाइयोंके पास पहुँच गये।

महाकवि भारविके विषयमें किंवदन्तियाँ

महाकवि भारविके विषयमें दो किंवदन्तियाँ प्रचलित हैं। उनका ऐतिहासिक महत्व न होने पर भी "न ह्यमूला जनश्रुतिः" इस उक्ति के अनुसार मनोरञ्जनके लिए भी यहाँ दी जाती हैं।

एक किंवदन्ती इस प्रकारकी है—

भारतवर्षकी उत्तरदिशामें अवस्थित हिमालय पर्वत और उसका एक विशेष इन्द्रकील शैलका किरातार्जुनीयमें विशद वर्णन देखनेसे महाकवि भारवि हिमालय-के किसी प्रदेशके निवासी थे कुछ विद्वान् ऐसा अनुमान करते हैं।

अध्ययनके लिए गुरुकुलमें निवास करते हुए भारविको हिमालय पर्वत और इन्द्रकील शैलकी अधित्यका और उपत्यकामें गायोंको चरानेके अवसरपर वहाँके निवासी वनेचरोंको देखनेका अवसर मिला। अनन्तर अर्जुनके इन्द्रकील पर्वतमें तपश्चरण और किरातपतिका रूप लिये हुए शिवजीसे और किरातोंसे युद्धका वर्णन समाविष्ट कर उन्होंने मनोरम दृश्योंके वर्णनसे परिपूर्ण किरातार्जुनीय महा-काव्यकी रचना की।

दूसरी किंवदन्ती पूर्वोक्त किंवदन्तीसे अधिक प्रसिद्ध और प्रचलित है, वह यों दी जाती है। भारवि स्वल्प अठ्ठारह वर्षकी उम्रमें ही व्याकरण, काव्य और कोष आदिका अध्ययन कर कुछ पद्योंकी भी रचना कर सामाजिक बन्धुवर्गका मनोरञ्जन करने लग गये थे।

एकबार भारविके पिताके बन्धुगण उनके पास आकर "आप भाग्यवान् हैं जो कि अल्पवयमें ही आपका पुत्र भारवि प्रतिभाशाली होकर काव्यरचना करने लगा है" ऐसा कहने लगे। तब भारविके पिताने कहा कि 'आप लोगोंको उसकी इस तरह प्रशंसा करना उचित नहीं है। वह क्या जानता है? अभी वह पढ़ रहा है।' इतना ही नहीं, भारविके पिता उसका तिरोभाव भी करते थे। तब भारवि अपने पिताको अपनी यशःप्राप्तिमें बाधक समझकर उनपर प्रस्तर-प्रहार करनेके लिए तत्पर हुए। एक बार रातको जब भारविके पिता केवल भारविकी ही प्रशंसा

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भारविको माता उनको भोजन परोस रही थी उस समय उन दोनोंकी बातचीत भारवि सुनने लगे।

भारविकी माता अपने पतिको कहने लगी—

'प्राणनाथ ! आप अपने होनहार पुत्रको क्यों बार-बार पराभूत कर रहे हैं ? जबकि सब लोग उसके प्रशंसक हैं।'

तब भारविके पिताने कहा—'प्रिये ! ज्यादा संमान होनेसे उसकी उन्नतिका मार्ग अभिमानके कारण अवरुद्ध होगा। कालान्तरमें भारवि रविके समान हमारे कुलको प्रकाशपूर्ण कर देगा'।

माता और पिताका ऐसा संवाद सुनकर भारविको पश्चात्ताप हुआ और पिताजीके चरणोंपर गिरकर उन्होंने अपने दुर्भावका प्रायश्चित पूछा। तब उनके दयालु पिताने कहा कि "वत्स ! छः माह तक श्वशुरके गृहमें निवास करना ही तुम्हारे पापका पर्याप्त प्रायश्चित होगा"।

तब भारवि अपनी पत्नीके साथ दूरस्थित श्वशुरके गृहमें पहुँचे। पहले तो उनका खूब सम्मान हुआ, पर बहुत समय तक उनका निवास होनेसे उनका अपमान होने लगा। होते-होते उन्हें मवेशियोंको चराने और उन्हें साना देनेका काम भी सौंपा गया।

भारवि कर्मफलके भोगके लिए दृढसङ्कल्प होकर प्रतिदिन पद्योंकी रचनाकर उन्हें भूर्जपत्रोंमें अङ्कित करने लगे। एक दिन उन्होंने एक पद्यकी रचनाकी जो इस प्रकार है—

"सहसा विदधीत न क्रियामविवेकः परमापदां पदम् ।
वृणते हि विमृश्यकारिणं गुणलुब्धाः स्वयमेव सम्पदः" ॥ (२-३०) ।

अर्थात् कोई कर्म सहसा (बिना विचारे) नहीं करना चाहिए, क्योंकि अविवेक विपत्तिका मुख्य स्थान है। विचारपूर्वक काम करनेवालेको सम्पत्ति गुणोंसे लुब्ध होकर स्वयम् वरण करती है।

भारवि जब इस पद्यको ताड़पत्रपर लिख रहे थे तब उनकी पत्नी संक्लेशवश कारण कर अपने और अपने पतिकी दुर्दशापर आंसू गिराने लगीं। तब भारविने "अभिमानी जनको छः महीनेतक इस प्रकार श्वसुरालयमें रहना नित्य-मरणके समान है" ऐसा सोचकर अपनी पत्नीसे कहा—

[ १५ ]

‘भद्रे ! तुम इस पद्यको किसी धनी व्यापारीके हाथ बेच डालो और उससे वस्त्र आदि आवश्यक पदार्थ खरीद लो’। ऐसा कहकर उस पद्यको उन्हें दे दिया। उनकी पत्नीने उस पद्यको एक धनी व्यापारीको दिखलाया। उसने उसे पढ़कर प्रसन्न होकर उन्हें सौ अशर्फियां दे दीं, और अपने घरमें चित्ररूपमें सज्जित कर उसे टांग दिया। प्रसङ्गवश वह व्यापारी व्यापारके लिए दूसरे द्वीपमें चला गया था। कई वर्षोंके बाद व्यापारी रातमें जब घर आया और अपनी पत्नीको एक कुमारके साथ सोई हुई देखा तो उसे व्यभिचारिणी समझकर खड्गसे प्रहार करनेके लिए तत्पर हुआ। संयोगवश भारविके उसी पद्य पर जो कि दीवारमें टाँगा गया था, उसकी दृष्टि पड़ी और उसने पत्नी को जगाया। उसने पतिको देखकर प्रसन्न होकर कहा—‘यह तुम्हारा पुत्र है’। तब उस व्यापारीको सन्तोष हुआ।

उधर भारवि छः महीने तक क्लेशपूर्ण प्रायश्चित्त भोगकर सप्तममासके प्रथम दिनमें श्वशुरगृहसे पत्नीके साथ प्रस्थानकर अपने घर आ गये एवम् माता-पिता-की सेवा करते हुए रहने लगे और प्रवासमें आरब्ध किरातार्जुनीयको पूर्ण करके उसके प्रचारसे यश और सम्पत्तिका उपार्जन कर सुखपूर्वक समय व्यतीत करने लगे।

पहलेकी किंवदन्तीकी अपेक्षा इसकी ज्यादा प्रसिद्धि है।

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॥ श्रीः ॥ काशी संस्कृत ग्रन्थमाला ७४

महाकवि-भारविविरचितं

किरातार्जुनीयम्

महोपाध्यायश्रीमल्लिनाथसूरिकृतया 'घण्टापथ'-व्याख्यया
पण्डितश्रीगङ्गाधरशर्मकृतया 'सुधा'-व्याख्यया च
समलङ्कृतम् ।

( सर्ग )

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ISBN : 978-93-86735-66-9

© Chaukhambha Prakashan, Varanasi
Edition : Eighth, 2018


Chaukhambha Prakashan
Registration No. A-77639

मुद्रक : मित्तल ऑफसेट, जौहरी प्रोसेस, वाराणसी

THE KASHI SANSKRIT SERIES 74 ❦

KIRĀTĀRJUNĪYAM

OF MAHĀKAVI BHĀRAVI

With
Gaṇṭāpatha Sanskrit Commentary of Mallinātha
Sūri and Sudhā Hindi Commentary of
Pt. Gaṅgadhara Śarmā

Cantos

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संस्कृत-कथासारः

प्रथमसर्गे

युधिष्ठिरं प्रति वनेचरस्योक्तिः

हे राजन ! चारचक्षुषो राजानो नानुयायिभिर्वञ्चनीयाः, अतो मदुक्तं युक्तमयुक्तं वा त्वया क्षन्तव्यम्, यतो हितकरं प्रियं च वचो दुर्लभम्भवति। अधिपत्याशासकः सुहृद् हितवचनाश्रोताऽधिपश्च निन्द्यौ । यतोऽन्योऽन्यानुरागिष्वेवामात्यनृपेषु सर्वसम्पदस्तित्ष्ठन्ति । रामचरितं स्वभावतो दुर्ज्ञेयं जन्तवश्चाज्ञानिनो भवन्त्युभयोर्महद्वैषम्यम्, अथापि त्वत्प्रभावादेवास्याकमरिगूढनीतिमार्गज्ञानम् ।

वनेचरस्य वक्तव्योक्तिः

सिंहासनस्थोऽपि दुर्योधनो भवतः पराजयभीत्या विमलं यशो विस्तारयति। षड्वर्गविजयी नीत्यनुसरणशीलो दुर्योधनों नक्तन्दिवं विभज्य नीत्या पौरुषं करोति। निरभिमानो दुर्योधनो भृत्येषु मित्रभावं, मित्रेषु बन्धुभावं, बन्धुषु च स्वामिभावं लोकान्दर्शयते । समविभक्तधर्मार्थकामसेवकस्य दुर्योधनस्य ते गुणानुरागात्सख्यं प्राप्तवन्त इव परस्परं न बाधन्ते, अपि तु वर्धन्त एव। वशी दुर्योधनो धनलोभात् क्रोधाद्वा न दण्डधारी, किन्तु 'राज्ञो ममायं धर्मः' इति बुद्ध्या गुरुशिक्षया शत्रौ पुत्रे वा दण्डयिता। कीर्तिमतो दुर्योधनेन सर्वतो रक्षिता मही भूरि वसूत्पादयति। कीर्तिमन्तस्तेजस्विनो मानिनो धनादृता धनुर्भृतो राजानो दुर्योधनस्य प्राणैः प्रियं कर्तुमिच्छन्ति । अशेषितक्रियो दुर्योधनोऽवञ्चकचरद्वाराऽन्यनृपकार्यं वेत्ति । अस्योद्योगस्तु फलैर्ज्ञायते नान्यथा । अक्रुद्धस्यापि दुर्योधनस्यस्यानुशासनं गुणानुरागिणो राजानः शिरसा वहन्ति। यौवराज्ये दुःशासनं नियुज्य दुर्योधनो मखेषु वह्निं प्रीणयति। यथोच्चरितमन्त्रश्रवणादुरगो व्यथते तथा जनोदीरितभवन्नामाकर्णनादयं व्यथते । हे राजन् ! शत्रुप्रतिकारविधाने तत्परो भव, चरोक्तिषु प्रवृत्तिसारैव वेदितव्या।

युधिष्ठिरं प्रति द्रौपद्युक्तिः

हे स्वामिन् ! विज्ञेषु स्त्रीजनोक्तमनुशासनमनादर इव भवति, अथापि दुष्टा मनोव्यथा वक्तुं मां प्रेरयन्ति । हे स्वामिन् ! स्ववंशजे राजभिरुपार्जिता मही मत्तगजेन मालेव त्वया विनाशिता । हे राजन् ! ये मायिषु मायां न कुर्वन्ति ते पराभवं भजन्ते। तीक्ष्णबाणा अनावृतशरीरान् घ्नन्ति । हे राजन् ! कोऽन्यः कुलाभिमानी राजा निजवधूमिव लक्ष्मीं त्वामन्तरेणापहारयति । हे राजन् ! अग्निः शुष्कं शमीवृक्षमिव निन्दितमार्गस्थं त्वा मन्युः कुतो न ज्वलति । सकलमन्योरपद्विनाशकस्य पुंसः सर्वे च प्राणिनो वश्या भवन्ति, स्नेहिनो निष्कोपात्पुंसो न कस्यचिद्भयं भवति। हे

किरातार्जुनीयम्

प्रथम सर्गः

अर्धाङ्गीकृत-दाम्पत्यमपि गाढानुरागि यत् । पितृभ्यां जगतस्तस्मै कस्मैचिन्महसे नमः॥ आलम्बे जगदालम्बं हेरम्बचरणाम्बुजम् । शुष्यन्ति यद्रजास्यस्पर्शात्सद्यः प्रत्यूहवार्धयः तद्दिव्यमव्ययं धाम सारस्वतमुपास्महे । यत्प्रकाशात्प्रलीयन्ते मोहान्धतमसच्छटाः॥

वाणीं काणभुजीमजीगणदवाशासीच्च वैयासकी- मन्तस्तन्त्रमरंस्त पन्नगगवीगुम्फेषु चाजागरीत् । वाचामाकलयद्रहस्यमखिलं यश्चाक्षपादस्फुरां लोकेऽभूददुपज्ञमेव विदुषां सौजन्यजन्यं यशः॥

मल्लिनाथकविः सोऽयं मन्दात्मानुजिघृक्षया । तत्किरातार्जुनीयाख्यं काव्यं व्याख्यातुमिच्छति ॥

नारिकेलफलसम्मितं वचो भारवेः सपदि तद्विभज्यते । स्वादयन्तु रसगर्भनिर्भरं सारमस्य रसिका यथेप्सितम् ॥

नानानिबन्धविषमैकपदैर्नितान्तं साशङ्कचङ्क्रमणखिन्नधियामसङ्घम् । कर्तुं प्रवेशमिह भारविकाव्यबन्धे घण्टापथं कमपि नूतनमातनिष्ये । इहान्वयमुखेनैव सर्वं व्याख्यायते मया । नामूलं लिख्यते किञ्चिन्नानपेक्षितमुच्यते ॥

अथ तत्रभवान् भारविनामा कविः 'काव्यं यशसेऽर्थकृते व्यवहारविदे शिवेतरक्षतये । सद्यः परनिर्वृतये कान्तासम्मिततयोपदेशयुजे' ।। इत्याद्यालङ्कारिकवचनप्रमाण्यात्काव्यस्यानेकश्रेयःसाधनताम् 'काव्यालापांश्च वर्जयेत्' इति निषेधन्त्वाशास्त्रस्यासत्काव्यविषयतां च पश्यन्किरातार्जुनीयाख्यां महाकाव्यं चिकीर्षुश्चिकीर्षितार्थाविघ्नपरिसमाप्तिसम्प्रदायाविच्छेदलक्षणफलसाधनत्वात् 'आशीर्नमस्क्रिया वस्तु निर्देशो वाऽपि तन्मुखम्' इत्याद्याशीर्वादद्यन्यतमस्तं प्रबन्धमुखलक्षणत्वाच्च वनेचरस्य युधिष्ठिरप्राप्तिरूपं वस्तु निर्दिशन्कथामुपक्षिपति—