लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
३३४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् का अपवाद अतोऽम् (२३४) सूत्र और उस का भी अपवाद अद्ड्डतरादिभ्यः पञ्चभ्यः (२४१) सूत्र पीछे लिख चुके हैं। यह लुक् सुँ और अम् के सम्पूर्ण स्थान पर प्रवृत्त होता है। प्रश्न-आदेः परस्य (७२) परिभाषा द्वारा यह लुक् अम् के आदि अकार के स्थान पर क्यो प्रवृत्त न हो जाये ? उत्तर-प्रत्ययस्य लुक्श्लुलुपः (१८६) सूत्र मे बताया जा चुका है कि लुक् प्रत्यय के अदर्शन को कहते हैं। यहां अम् का लुक् करना है। अम् का अकार या मकार प्रत्यय नहीं, किन्तु सम्पूर्ण समुदाय 'अम्' ही प्रत्यय है। अतः यदि सम्पूर्ण अम् का अदर्शन करेंगे तो तभी लुक् सार्थक होगा, अन्यथा नही। इस से सम्पूर्ण अम् का लुक् होता है, केवल आदि अकार का नहीं। वारि + सु । प्रकृतसूत्र से सकार का लुक् हो 'वारि' प्रयोग बना। प्रथमा के द्विवचन 'वारि+औ' मे नपुंसकाच्च (२३५) मे 'औ' को 'शी' हो अनुबन्धलोप करने से 'वारि+ई'। अब अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है- [लघु०] विधि-सूत्रम्- (२४५) इकोऽचि विभक्तौ । ७।१।७३॥ इगन्तस्य क्लीवस्य नुम् अचि विभक्तौ । वारिणी । वारीणि ॥ अर्थः-अजादि विभक्ति परे हो तो इगन्त नपुंसक को नुँम् का आगम हो। व्याख्या इक् ।६।१। नपुंसकस्य ।६।१। (नपुंसकस्य झलच से)। नुम् ।१।१। (इदितो नुम् धातोः से) । अचि ।७।१। विभक्तौ ।७।१। 'नपुंसकस्य' का विशेषण होने से 'इक्' से तदन्तविधि हो कर 'इगन्तस्य नपुंसकस्य' बन जाता है। 'अचि' मे तदादि- विधि हो कर 'अजादौ विभक्तौ' बन जाता है। अर्थ-(अचि = अजादौ) अजादि (विभक्तौ) विभक्ति परे होने पर (इक् = इगन्तस्य) इगन्त (नपुंसकस्य) नपुंसक का अवयव (नुँम्) नुँम् हो जाता है। मित् होने से नुँम् अन्त्य अच् से परे होता है। 'वारि+ई' यहा 'वारि' यह इगन्त नपुंसक है। इस से परे 'ई' यह अजादि विभक्ति वर्तमान है। अतः प्रकृतसूत्र से इगन्त को नुँम् का आगम हो कर अनुबन्धलोप और नकार को णकार करने मे 'वारिणी' प्रयोग सिद्ध होता है। प्रथमा के बहुवचन मे 'वारि+अस्' (जस्) इस स्थिति मे पूर्ववत् शि आदेश, उस की सर्वनामस्थानसञ्ज्ञा, नुँम् आगम, अनुबन्धलोप, उपधादीर्घ तथा नकार को णकार आदेश हो कर 'वारीणि' प्रयोग सिद्ध होता है२। १. 'इकोऽचि सुंपि' इत्येव सुवचम् इति नागेशो मन्यते । २ वारि+इ (शि) मे नपुंसकस्य झलच (२३६) ओर इकोऽचि विभक्तौ (२४५) दोनों से नुँम् हो सकता है, किस से नुँम् किया जाये ? इस विषय मे वैयाकरण एकमत नही। कुछ वैयाकरणो का कहना है कि यहा परत्व के कारण इकोऽचि विभक्तौ से ही नुँम् करना चाहिये। परन्तु अन्य वैयाकरणो का कथन है कि इको- ऽचि विभक्तौ तो अन्य सब अजादि विभक्तियो में चरितार्थ है यहा शि (इ) मे नपुंसकस्य झलच की ही प्रवृत्ति होनी चाहिये। किञ्च 'झलन्त' न कह कर
अजन्त-नपुंसकलिङ्ग-प्रकरणम् ३३५ हे वारि + स् । यहां स्वमोर्नपुंसकात् (२२४) से सुं का लुक् हो कर 'हे वारि !' हुआ। अब यहां प्रत्ययलोपे प्रत्ययलक्षणम् (१६०) से सम्बुद्धि को निमित्त मान कर ह्रस्वस्य गुणः (१६६) से गुण प्राप्त होता है। परन्तु न लुमताङ्गस्य (१६१) के निषेध के कारण प्रत्ययलक्षण नहीं हो सकता। हमें यहां पाक्षिक गुण करना अभीष्ट है। अतः न लुमताङ्गस्य (१६१) निषेध की अनित्यता सिद्ध करते हैं— [लघु०] न लुमता० (१६१) इत्यस्याऽनित्यत्वात् पक्षे सम्बुद्धिनिमित्तो गुणः —हे वारे !, हे वारि !। आङो ना० (१७१)—वारिणा। घेर्डिति (१७२) इति गुणे प्राप्ते— अर्थः—न लुमताङ्गस्य (१६१) यह निषेध अनित्य है। अतः पक्ष में ह्रस्वस्य गुणः (१६६) से सम्बुद्धिनिमित्तक गुण भी हो जाता है। गुणपक्ष में—हे वारे ! और गुणाभाव में—हे वारि ! । व्याख्या—न लुमताङ्गस्य (१६१) सूत्र अनित्य है। इस में ज्ञापक इकोऽचि विभक्तौ (२४५) सूत्र में 'अचि' पद का ग्रहण है। हम इसे समझाने के लिये पक्षात्मक ढंग से विचार करते हैं। तथाहि— पूर्वपक्षी—इकोऽचि विभक्तौ सूत्र में 'अचि' पद के ग्रहण का क्या प्रयोजन है ? उत्तरपक्षी—'वारि + भ्याम्' इत्यादि रूपों में भ्याम् आदि हलादि विभक्तियों में नुँम् न हो जाये, इसलिये सूत्र में 'अचि' पद का ग्रहण किया गया है। पूर्वपक्षी—'वारिभ्याम्' आदि में यदि नुँम् हो भी जाये तो न लोपः० (१८०) द्वारा लोप हो जाने से कोई दोष नहीं आता। अतः 'अचि' पद का ग्रहण व्यर्थ है। उत्तरपक्षी—तो 'हे वारि!' यहां लुक् हुए सम्बुद्धि को निमित्त मान कर नुँम् न हो जाये, इसलिये 'अचि' पद का ग्रहण किया है। पूर्वपक्षी—सम्बुद्धि में भी न लोपः० (१८०) से नकार का लोप हो जायेगा। उत्तरपक्षी—ऐसा नहीं हो सकता; क्योंकि सम्बुद्धि में न ङिसम्बुद्ध्योः (२८१) सूत्र नकार का लोप नहीं करने देगा। अतः 'हे वारिन्!' आदि अनिष्ट प्रयोगों की निवृत्ति के लिये 'अचि' पद का ग्रहण करना आवश्यक है। पूर्वपक्षी—ओहो! सम्बुद्धि में तो नुँम् प्राप्त ही नहीं हो सकता; क्योंकि विभक्ति का लुक् होने से न लुमताङ्गस्य (१६१) से प्रत्ययलक्षण का निषेध हो जाता है। अतः 'अचि' पद का ग्रहण व्यर्थ है। उत्तरपक्षी—आप का कथन सत्य है। इस प्रकार 'अचि' पद के बिना भी 'झलचः' कथन में अच्प्रत्याहार का ग्रहण भी यही प्रमाणित करता है कि यहां नपुंसकस्य झलचः द्वारा ही नुँम् होना चाहिये। हमारे विचार में दोनों सूत्रों से एक ही कार्य प्राप्त है अतः विरोध या विप्रतिषेध कुछ भी नहीं, इस तरह इन के बलावल का विचार निष्प्रयोजन ही है।
३३६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्
‘वारिभ्याम्, हे वारि’ आदि प्रयोगों के सिद्ध हो जाने पर आचार्य के पुनः ‘अचि’ पद के ग्रहण से न लुमताङ्गस्य (१६१) सूत्र की अनित्यता स्पष्ट प्रतीत होती है। पूर्वपक्षी—‘अचि’ पद के ग्रहण से भला आप कैसे न लुमताङ्गस्य (१६१) सूत्र की अनित्यता का अनुमान करते हैं ? उत्तरपक्षी—यदि न लुमताङ्गस्य (१६१) निषेध नित्य होता, तो सम्बुद्धि में उस का आश्रय कर के नुँम् प्राप्त ही न हो सकता। पुनः उस के निषेध के लिये ‘अचि’ पद की कोई आवश्यकता ही न होती। परन्तु आचार्य का उस के निषेध के लिये यत्न करना सिद्ध करता है कि आचार्य न लुमताङ्गस्य (१६१) निषेध को नित्य नहीं मानते। ‘हे वारि’ यहां सम्बुद्धि में न लुमताङ्गस्य (१६१) निषेध के अनित्य होने से अनित्यपक्ष में ह्रस्वस्य गुण (१६६) से गुण हो कर—‘हे वारे’ और नित्यपक्ष में गुण न होने से—‘हे वारि’ इस प्रकार दो रूप सिद्ध होते हैं। द्वितीया विभक्ति में भी प्रथमावत् प्रक्रिया होती है। तृतीया के एकवचन ‘वारि+आ’ (टा) में शेषो घ्यसखि (१७०) से घिसञ्ज्ञा हो इकोऽचि० (७।१।७३) की अपेक्षा पर होने के कारण आङो नाऽस्त्रियाम् (७।३। १२०) से टा को ना आदेश हो कर नकार को णकार करने से ‘वारिणा’ प्रयोग सिद्ध होता है। वारि+भ्याम् = वारिभ्याम्। वारिभिः। हलादि विभक्ति में नुँम् न होगा। चतुर्थी के एकवचन में ‘वारि+ए’ इस अवस्था में घिसञ्ज्ञा हो कर नुँम् की अपेक्षा पर होने के कारण घेर्ङिति (१७२) द्वारा गुण प्राप्त होता है। परन्तु यहां नुँम् करना ही अभीष्ट है। अतः अग्रिम वार्त्तिक से पूर्वविप्रतिषेध का विधान करते हैं— [लघु०] वा०—(२४) वृद्धधौत्वतृज्वद्भावगुणेभ्यो नुँम् पूर्वविप्रतिषेधेन ॥ वारिणे। वारिणः २। वारिणोः २। नुमचिर० (वा० १६) इति नुँट् —वारीणाम्। वारिणि। हलादौ हरिवत् ॥ अर्थ—वृद्धि, औत्व, तृज्वद्भाव और गुण—इन के साथ विप्रतिषेध होने पर, पूर्व भी नुँम् प्रवृत्त हो जाता है। व्याख्या—अचो ञ्णिति (७।२।११५) में प्राप्त वृद्धि, अच्च घे (७।३।११९)
१ यद्यपि इकोऽचि विभक्तौ (७।१।७२) के भाष्य में ‘हे त्रपो!’ और एङ्ह्रस्वात् सम्बुद्धेः (६।१।६७) के भाष्य में ‘हे त्रपु!’ ऐसे दो प्रयोग पाये जाते हैं, तथापि हमारा मन प्रत्येक इगन्त नपुंसक के सम्बुद्धि में दो दो—रूप बनाना स्वीकार नहीं करता । न लुमताङ्गस्य (१।१।६२) निषेध के अनित्य होने से केवल कहीं कहीं ‘त्रपो!’ आदि पूर्वमहानुभावों के लिखे रूपों में ही गुण का समाधान करना चाहिये, न कि सर्वत्र विकल्प, नहीं तो फिर अव्यवस्था हो जायगी । कैयट ने इकोऽचि विभक्तौ (७।१।७२) सूत्र के प्रदीप में इस का उल्लेख भी किया है।
अजन्त-नपुंसकलिङ्ग-प्रकरणम् ३३७ से प्राप्त औत्व, तृज्वत्क्रोष्टुः (७.१.५५) और विभाषा तृतीयादिष्वचि (७.१.५७) से प्राप्त तृज्वद्भाव तथा घेर्डिति (७.३.१११) से प्राप्त गुण यद्यपि नुँम् (७.१.७३) से परे हैं और विप्रतिषेधे परं कार्यम् (११३) के अनुसार इन की ही प्रवृत्ति उचित है; तथापि नुँम् की प्रवृत्ति पूर्वविप्रतिषेध से हो जाती है। अर्थात् इन के साथ नुँम् का विप्रतिषेध होने पर विप्रतिषेधे परं कार्यम् (११३) का दूसरा अर्थ—'अपरं कार्यम्' मान कर नुँम् की प्रवृत्ति हो जाती है।¹ 'वारि+ए' यहां पूर्वविप्रतिषेध के कारण गुण का बाध कर इकोऽचि विभक्तौ (२४५) से नुँम् हो कर नकार को णकार करने से 'वारिणे' प्रयोग सिद्ध होता है। 'वारि+अस्' (ङसिँ वा ङस्) यहां भी घेर्डिति (१७२) से प्राप्त गुण का पूर्व- विप्रतिषेध के कारण नुँम् बाध कर लेता है—'वारिणः'। 'वारि+ओस्' यहां परत्व के कारण इको यणचि (१५) का बाध कर नुँम् प्रवृत्त हो जाता है—'वारिणोः'। षष्ठी के बहुवचन 'वारि+आम्' में ह्रस्वनद्यापो नुट् (१४८) से आम् को नुट् का और इकोऽचि विभक्तौ (२४५) से अङ्ग को नुँम् का आगम युगपत् प्राप्त हुआ। नुम्चिर० (वा० १६) के द्वारा पूर्वविप्रतिषेध से नुट् हो गया। तब नामि (१८४) से दीर्घ और नकार को णकार करने पर 'वारीणाम्' प्रयोग सिद्ध हुआ। नोट—यदि नुँम् हो जाता तो वह 'वारि' का ही अवयव होता, आम् का नहीं। तब 'नाम्' परे न रहने से नामि (१८४) द्वारा दीर्घ न हो सकता। किञ्च तब अङ्ग के अजन्त न होकर नान्त हो जाने से 'वारिणाम्' ऐसा अनिष्ट प्रयोग बन जाता। सप्तमी के एकवचन 'वारि+इ' (ङि) में अच्च घेः (१७४) से ङि को औत्व और इकोऽचि विभक्तौ (२४५) से अङ्ग को नुँम् प्राप्त होने पर वृद्धौत्व० (वा० २४) से पूर्वविप्रतिषेध के कारण नुँम् हो जाता है। तब नकार को णकार होकर—'वारिणि' प्रयोग सिद्ध होता है। वारिशब्द की रूपमाला यथा— १. इन के उदाहरण भाष्य (७.१.६६) में अतीव सरल उपाय से समझाये गये हैं। तद्यथा— गुणवृद्ध्यौत्वतृज्वद्भावेभ्यो नुम् पूर्वविप्रतिषिद्धम्। तत्र गुणस्यावकाशः— अग्नये, वायवे। नुमोऽवकाशः—त्रपुणी, जतुनी। इहोभयं प्राप्नोति—त्रपुणे, जतुने। वृद्धेरवकाशः—सखायौ, सखायः। नुमः स एव। इहोभयं प्राप्नोति—अतिसखीनि, ब्राह्मणकुलानि। औत्वस्यावकाशः—अग्नौ, वायौ। नुमः स एव। इहोभयं प्राप्नोति —त्रपुणि, जतुनि। तृज्वद्भावस्यावकाशः—क्रोष्ट्रा, क्रोष्टुना। नुमः स एव। इहोभयं प्राप्नोति—कुशक्रोष्टुनेऽरण्याय, हितक्रोष्टुने वृषलकुलाय। नुम् भवति पूर्वविप्रतिषेधेन। ल० प्र० (२२)
३३८ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् प्र० वारि वारिणी वारीणि । प० वारिणः वारिभ्याम् वारिभ्यः द्वि० ,, ,, ,, । ष० ,, वारिणो वारिणाम् तृ० वारिणा वारिभ्याम् वारिभिः । स० वारिणि ,, वारिषु च० वारिणे ,, वारिभ्यः । सं० हे वारि¹, वारे¹ वारिणी¹ वारीणि! नोट—'वारि' शब्द की तरह उच्चारण वाले शब्द संस्कृत-साहित्य में शायद ही कुछ हों। नपुंसक में इदन्त शब्द प्रायः भाषितपुंस्क ही मिलते हैं। उन का उच्चा- रण आगे आने वाले 'सुधि' शब्द की तरह होता है। 'दधि' (दही) शब्द के उच्चारण में वारि की अपेक्षा कुछ अन्तर पड़ता है। प्रथमा और द्वितीया विभक्ति की प्रक्रिया तो वारिशब्द के समान ही होती है। परन्तु तृतीया आदि अजादि विभक्तियों में निम्नप्रकारेण प्रक्रिया का अन्तर है— 'दधि + आ' (टा) यहां घिसञ्ज्ञा होने से आङो नाऽस्त्रियाम् (१७१) द्वारा टा को ना आदेश प्राप्त होता है। इस पर अग्रिम सूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्--(२४६) अस्थिदधिसक्थ्यक्ष्णामनडुदात्तः ।७।१।७५॥ एषामनङ् स्याट् टादावचि (स चोदात्तः) ॥ अर्थः—तृतीयादि अजादि विभक्ति परे होने पर अस्थि, दधि, सक्थि और अक्षि—इन चार शब्दों के स्थान पर उदात्त अनङ् आदेश हो। व्याख्या—अचि ७।१। विभक्तिषु ७।३। (इकोऽचि विभक्तौ से वचनविपरि- णाम कर के)। तृतीयादिषु ७।३। (तृतीयादिषु भाषित० से)। अस्थिदधिसक्थ्यक्ष्णाम् ६।३। अनङ् १।१। उदात्तः १।१। समासः—अस्थि च दधि च सक्थि च अक्षि च = अस्थिदधिसक्थ्यक्षीणि, तेषाम् = अस्थिदधिसक्थ्यक्ष्णाम्। प्रकृतिवदनुकरणं भवति— इति परिभाषयाऽत्राप्यक्षिशब्दस्यानङ्। 'अचि' से तदादिविधि हो कर 'अजादिषु तृतीयादिषु विभक्तिषु' बन जाता है। अर्थ—(अचि) अजादि (तृतीयादिषु) तृतीया आदि (विभक्तिषु) विभक्तियों के परे होने पर (अस्थिदधिसक्थ्यक्ष्णाम्) अस्थि, दधि, सक्थि और अक्षि शब्दों के स्थान पर (अनङ्) अनङ् आदेश हो जाता है और वह (उदात्तः) उदात्त होता है¹। अनङ् में ङकार इत्सञ्ज्ञक है। अतः ङिच्च (४६) सूत्र द्वारा यह अन्त्य इकार के स्थान पर आदेश होगा। अनङ् में नकारोत्तर अकार उच्चारणार्थ है। टा, ङे, ङसिँ, ङस्, ओस्, आम्, ङि और ओस् ये आठ तृतीयादि अजादि विभक्तियां हैं। 'दधि + आ' यहां प्रकृतसूत्र से अन्त्य इकार को अनङ् आदेश होकर—दध् अन् + आ = दधन् + आ। तत्र अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम् (२४७) अल्लोपोऽनः।६।४।१३४॥ अङ्गावयवोऽसर्वनामस्थान-यजादि-स्वादिपरो योऽन्, तस्याकारस्य लोपः। दध्ना। दध्ने। दध्नः २। दध्नोः २॥ १ लघुकौमुदी में स्वरप्रकरण न होने से हम यहां स्वरविचार प्रस्तुत नहीं कर रहे।
अजन्त-नपुंसकलिङ्ग-प्रकरणम् ३३६ अर्थः-अङ्ग के अवयव अन् शब्द के अकार का लोप हो जाता है यदि सर्व- नामस्थान-भिन्न यकारादि वा अजादि स्वादि प्रत्यय परे हो तो। व्याख्या-अत् ।६।१। (यहां सुपां सुलुक्० से षष्ठी का लुक् हुआ है)। लोपः ।१।१। अनः ।६।१। भस्य ।६।१। (यह अधिकृत है)। अङ्गस्य ।६।१। (यह अधिकृत है)। जिस से परे सर्वनामस्थानभिन्न यकारादि वा अजादि स्वादि प्रत्यय हो उसे 'भ' कहते हैं-यह पीछे (१६५) सूत्र पर स्पष्ट कर चुके हैं। अर्थः - (अङ्गस्य) अङ्ग के अवयव, (भस्य) सर्वनामस्थानसञ्ज्ञक प्रत्ययों से भिन्न यकारादि वा अजादि स्वादि प्रत्यय परे वाले (अनः) अन् के (अतः) अत् का (लोपः) लोप हो जाता है।१ 'दधन् + आ' यहां सर्वनामस्थानभिन्न अजादि प्रत्यय आ (टा) के परे होने से अङ्ग के अवयव अन् के अकार का लोप हो कर 'दध्ना' प्रयोग सिद्ध होता है। 'दधि + ए' (ङे) यहां अनङ् आदेश होने पर 'दधन् + ए' इस दशा में प्रकृत- सूत्र से भसञ्ज्ञक अन् के अकार का लोप हो कर 'दध्ने' प्रयोग सिद्ध होता है। 'दधि + अस्' (ङसिं वा ङस्) यहां भी पूर्ववत् अनङ् आदेश हो कर भसञ्ज्ञक अन् के अकार का लोप करने से 'दध्नः' प्रयोग सिद्ध होता है। ओस् में 'दध्नोः' और आम् में 'दध्नाम्' भी पूर्वोक्त-प्रकारेण बनते हैं। ङि में 'दधि + इ' इस अवस्था में अनङ् आदेश होकर 'दधन् + इ' हुआ। अब अल्लोपोऽनः (२४७) से अन् के अकार का नित्यलोप प्राप्त होता है। इस पर अग्रिमसूत्र से विकल्प करते हैं- [लघु०] विधि-सूत्रम्-(२४८) विभाषा ङिइश्योः ।६।४।१३६॥ अङ्गावयवोऽसर्वनामस्थान-यजादि-स्वादिपरो योऽन्, तस्याकारस्य लोपो वा स्याद् ङिइश्योः परयोः। दध्नि, दधनि। शेषं वारिवत्। एवम् अस्थि- सक्थ्यक्षि ॥ अर्थः-अङ्ग के अवयव अन् शब्द के अकार का विकल्प करके लोप हो जाता १. यहां भस्य और अङ्गस्य ये दो अधिकार आ रहे हैं। 'भसञ्ज्ञक अङ्ग के अवयव अन् के अकार का लोप हो' इस प्रकार यदि अर्थ करें तो-अनसा, मनसा आदियों में आदि अकार का भी लोप हो जायेगा। यदि-'अन्नन्त भसञ्ज्ञक अङ्ग के अकार का लोप हो' इस प्रकार अर्थ करें तो-तक्ष्णा आदियों में तकारोत्तर अकार के लोप की भी प्राप्ति आएगी। यदि-'अन्नन्त भसञ्ज्ञक अङ्ग के अन् के अकार का लोप हो' इस प्रकार अर्थ करें तो-'अनस्तक्ष्णा' इत्यादियों में भी आदि अकार का लोप प्राप्त होगा। अतः इन सब दोषों से बचने का उपाय केवल यही है कि उपर्युक्त अर्थ किया जाये। यहां यह ध्यातव्य है कि मूलगत अर्थ और इन अर्थों में केवल यही भेद है कि मूलगत अर्थ में 'भस्य' का सम्बन्ध 'अनः' से किया गया है और इन सब अर्थों में उस का सम्बन्ध 'अङ्गस्य' के साथ किया गया है। इस विषय पर विस्तृत विचार व्याकरण के उच्च ग्रन्थों में देखें।
३४० भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् है यदि सर्वनामस्थानभिन्न यकारादि वा अजादि स्वादि प्रत्ययों म से केवल 'ङि' वा 'शी' परे हो तो । व्याख्या—विभाषा ।१।१। ङिश्यो ।७।२। अत् ।६।१। लोप ।१।१। अन ।६।१। (अल्लोपोऽन स)। भस्य ।६।१। अङ्गस्य ।६।१। (ये दोनो अधिकृत हैं) । समास — ङिश्च शी च = ङिश्यौ, तयो = ङिश्यो । इतरेतरद्वन्द्व । अर्थ—(अङ्गस्य) अङ्ग के अवयव (भस्य) सर्वनामस्थानभिन्न यकारादि वा अजादि स्वादि प्रत्यय परे वाले (अन ) अन् के (अत्) ह्रस्व अकार का (विभाषा) विकल्प करके (लोप ) लोप हो जाता है (ङिश्यो ) ङि अथवा शी परे होने पर । यहा 'शी' यह नपुसकलिङ्ग वाला दीर्घ ही लिया जाता है। ह्रस्व 'शि' तो शि सर्वनामस्थानम् (२३८) से सर्वनामस्थानसञ्ज्ञक होता है, उस के परे होने पर तो भसञ्ज्ञा का होना ही असम्भव है। 'दधन् + ङि' यहा ङि परे है, अत प्रवृत्तसूत्र से अन् के अकार का विकल्प कर के लोप हो गया । लोपपक्ष मे—'दध्नि' और लोपाभावपक्ष म—'दधनि' इस प्रकार दो रूप सिद्ध हुए । दधिशब्द की सम्पूर्ण रूपमाला यथा— प्र० दधि दधिनी दधीनि । प० दध्न दधिभ्याम् दधिभ्य द्वि० ,, ,, ,, । प० ,, दध्नो दध्नाम् तृ० दध्ना दधिभ्याम् दधिभि । स० दध्नि,दधनि ,, दधिषु च० दध्ने ,, दधिभ्य । स० हे दधे',दधि' दधिनी' दधीनि' इसी प्रकार—अस्थि (हड्डी), सक्थि (ऊरु, जङ्घा) और अक्षि (आंख) शब्दो के रूप बनते हैं । (यहाँ इदन्त नपुसकलिङ्ग शब्दों का विवेचन समाप्त होता है।) ॰— [लघु०] सुधि । सुधिनी । सुधीनि । हे सुधे', हे सुधि' ॥ व्याख्या—'सुधी' शब्द विशेष्यलिङ्ग के आश्रित होने से त्रिलिङ्गी है । 'कुलम्' आदि के विशेष्य होने पर यह नपुंसक हो जाता है । नपुंसक म ह्रस्वो नपुंसके प्राति- पदिकस्य (२४३) से ह्रस्व हो कर 'सुधि' शब्द बन जाता है । प्रथमा और द्वितीया विभक्ति म इस की प्रक्रिया वारिशब्दवत् होती है । तृतीयादि अजादि विभक्तिया म कुछ विशेष होता है । वह अग्रिमसूत्र द्वारा बतलाया जाता है— [लघु०] अतिदेश-सूत्रम् (२४६) तृतीयादिषु भाषितपुंस्कं पुंवद् गालवस्य ।७।१।७४॥ प्रवृत्तिनिमित्तैक्ये भाषितपुंस्कम् इगन्तं क्लीबं पुंवद्वा टादावचि । सुधिया, सुधिना--इत्यादि ॥ अर्थ—यदि प्रवृत्तिनिमित्त एक हो तो इगन्त नपुसक भाषितपुंस्क शब्द अजादि तृतीयादि विभक्तियों के परे होने पर विकल्प कर के पुंवत् होता है ।
अजन्त-नपुंसकलिङ्ग-प्रकरणम् ३४१ व्याख्या—तृतीयादिषु ।७।३। अक्षु ।७।३। विभक्तिषु ।७।३। इक् ।१।१। (इकोऽचि विभक्तौ से वचन और विभक्ति का विपरिणाम कर के)। नपुंसकम् ।१।१। (नपुंसकस्य झलचः से)। भाषितपुंस्कम् ।१।१। पुंवत् इत्यव्ययपदम्। गालवस्य ।६।१। 'अक्षु' से तदादिविधि तथा 'इक्' से तदन्तविधि हो जाती है। समासः—भाषितः पुमान् येन प्रवृत्तिनिमित्तेन तत् भाषितपुंस्कम्, बहुव्रीहिसमासः। तद् अस्यास्तीति— भाषितपुंस्कम्। अर्शआदिभ्योऽच् (११६१) इति मत्वर्थीयोऽच्प्रत्ययः। 'शब्दस्वरूपम्' इति विशेष्यमध्याहार्यम्। अर्थः—(तृतीयादिषु) तृतीयादि (अक्षु = अजादौ) अजादि (विभक्तिषु) विभक्तियों के परे होने पर (इक् = इगन्तम्) इगन्त (नपुंसकम्) नपुंसक शब्द (भाषितपुंस्कम्) जो पुंल्लिङ्ग में भी उसी प्रवृत्तिनिमित्त को भाषित कर चुका हो, (गालवस्य) गालव आचार्य के मत में (पुंवत्) पुंल्लिङ्गवत् होता है। गालव के मत में पुंवत् और अन्य आचार्यों के मत में पुंवत् न होने से पुंवद्भाव का विकल्प हो जायेगा। पुंवद्भाव का अभिप्राय यह है कि जो २ कार्य पुंल्लिङ्ग में होते हैं, वे यहां नपुंसक में भी हो जाएं। 'प्रवृत्तिनिमित्त' किसे कहते हैं ? प्रत्येक शब्द का अपने वाच्य को बोधन कराने का कोई न कोई निमित्त अवश्य हुआ करता है। इस निमित्त को ही प्रवृत्तिनिमित्त कहते हैं। यथा—'घट' शब्द का घड़े को बोध कराने का निमित्त 'घटत्व' है, अर्थात् घट को घट इसीलिये कहते हैं क्योंकि इस में घटत्व पाया जाता है। यदि घटत्व न पाया जाये तो उसे कोई भी घट न कहे। तो यहां 'घटत्व' प्रवृत्तिनिमित्त हुआ। शुक्ल को शुक्ल कहने का प्रवृत्तिनिमित्त 'शुक्लत्व' है। यदि शुक्ल में शुक्लत्व न पाया जाये तो उसे कोई भी शुक्ल न कहे। 'पाचक' को पाचक कहने का प्रवृत्तिनिमित्त 'पाककर्तृत्व' अर्थात् पकाने की क्रिया को करना है। यदि रसोइये में पकाना न पाया जाये तो उसे कोई भी पाचक न कहे। इसी प्रकार 'देवदत्त' आदि शब्दों का प्रवृत्तिनिमित्त तत्तद्विशेष आकृति ही है। सार यह है कि जिस विशेषता के कारण कोई शब्द अपने अर्थ को जनाता है; उस शब्द की वह विशेषता ही उस का प्रवृत्तिनिमित्त होती है। तथाहि— (१) 'घट' शब्द की विशेषता घटत्व ही प्रवृत्तिनिमित्त है। (२) 'पट' ,, ,, ,, पटत्व ,, ,, ,,। (३) 'यज्ञदत्त' ,, ,, ,, आकृतिविशेष ,, ,, ,,। (४) 'सुधि' ,, ,, ,, शोभनध्यानवत्त्व ,, ,, ,,। (५) 'सुलु' ,, ,, ,, शोभनलवनकर्तृत्व ,, ,, ,,। (६) 'धातृ' ,, ,, ,, धारणकर्तृत्व ,, ,, ,,। (७) 'अनादि' ,, ,, ,, आदिहीनता ,, ,, ,,। (८) 'ज्ञातृ' ,, ,, ,, ज्ञानकर्तृत्व ,, ,, ,,। (६) 'प्रद्यु' ,, ,, ,, निर्मलाकाशवत्त्व ,, ,, ,,।
३४२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् (१०) 'हरि' शब्द की विशेषता 'प्रकृष्टप्लवनवत्त्व' ही प्रवृत्तिनिमित्त है। (११) सुनु ,, ,, ,, 'शोभननौकावत्त्व' ,, ,, ।१ सूत्र का भावार्थ— जिस इगन्त नपुंसकलिंगी शब्द का जो प्रवृत्तिनिमित्त नपुंसक में हो यदि वही प्रवृत्तिनिमित्त उस का पुंल्लिङ्ग में भी हो तो तृतीयादि अजादि विभक्तियों के पर होने पर उस नपुंसक शब्द में विकल्प कर के पुंवद्भावात् कार्य होते हैं। सुधि शब्द इगन्त नपुंसक है। इस का प्रवृत्तिनिमित्त 'शोभनध्यानवत्तृत्व' है। पुंल्लिङ्ग में भी इस का यही प्रवृत्तिनिमित्त होता है। अतः तृतीयादि अजादि विभक्तियों में इसे विकल्प कर के पुंवत्कार्य होगा। पुंवत्पक्ष में पुनः वही दीर्घान्त 'सुधी' शब्द आ जायेगा। तत्र न भूसुधियो (१०२) से यण् का निषेध हो कर अचि श्नु० (१६६) से इयङ् करने पर 'सुधिया' आदि रूप बनेंगे। जिस पक्ष में पुंवत् न होगा उस पक्ष में वारिशब्दवत् प्रक्रिया हो कर 'सुधिना' आदि रूप सिद्ध होंगे। इस की रूपमाला यथा— प्रथमा सुधि सुधिनी सुधीनि द्वितीया ,, ,, ,, तृतीया सुधिया, सुधिना सुधिभ्याम् सुधिभिः चतुर्थी सुधिये, सुधिने ,, सुधिभ्यः पञ्चमी सुधियः, सुधिनः ,, ,, षष्ठी ,, ,, सुधियोः, सुधिनोः सुधियाम्, सुधीनाम् सप्तमी सुधियि, सुधिनि ,, सुधिषु सम्बोधन हे सुधे!, हे सुधि! हे सुधिनी! हे सुधीनि! इसी प्रकार निम्नस्थ भाषितपुंस्क शब्दों में वैकल्पिक पुंवद्भाव जानना चाहिए। पुंवत्पक्ष में हरिशब्दवत् तथा तदभावपक्ष में वारिशब्दवत् रूप बनेंगे। १ अनादि = जिस का आदि न हो (ब्रह्म)। २ शुचि = पवित्र (कुल)। ३ सादि = जिस का आदि हो (कार्य)। ४ सुकवि = श्रेष्ठ कवियों वाला (कुल)। ५ सुयति = श्रेष्ठ यतियों वाला (धन)। ६ सुशकुनि = अच्छे पक्षियों वाला (वन)। ७ सुमणि = श्रेष्ठ मणियों वाला (भूषण)। ८ सुध्वनि = अच्छी ध्वनि वाला (वाद्य)। ९ सुकपि = अच्छे वानरों वाला (अरण्य)। १० सुभूरि = अच्छे विद्वानों वाला (कुल)। ११ अतिध्वनि = ध्वनि को लांघा हुआ (वायुयान)। १२ निरादि = आदिहीन (ब्रह्म)। (यहां इकारान्त नपुंसक शब्दों का विवेचन समाप्त होता है) ─── ० ─── १ प्रवृत्तिनिमित्तं पदप्रवृत्तावनावच्छेदकम्। यथा घटत्वं घटपदस्य प्रवृत्तिनिमित्तम्। एवं शुक्लादिपदस्य शुक्लत्वम् पाचकस्य पाकः, देवदत्तादिसंज्ञाशब्दादि प्रवृत्तिनिमित्त- म्भवति। प्रवृत्तिनिमित्तशब्दस्य व्युत्पत्तिः — प्रवृत्तेः = शब्दानांमर्थबोधनशक्तेः निमित्तम् = प्रयोजकम् इति। तच्च शक्यतावच्छेदकम्भवतीति ज्ञेयम्। तल्लक्ष- णञ्च प्रकारतया शक्तिग्रहविषयत्वम् — इति तत्त्वचिन्तामणौ श्रीमद्गङ्गेशोपाध्यायाः।
अजन्त-नपुंसकलिङ्ग-प्रकरणम् ३४३ अब उकारान्त नपुंसक शब्दों का वर्णन करते हैं— [लघु०] मधु। मधुनी। मधूनि। हे मधो!, हे मधु! ॥ व्याख्या—'मधु' शब्द पुंन्नपुंसक होता है। पुंलिङ्ग में इस का अर्थ—१. वसन्त ऋतु, २. चैत्रमास, ३. दैत्यविशेष आदि होता है। नपुंसक में इस का अर्थ—१. शहद, २. मद्य आदि होता है। अत एव प्रवृत्तिनिमित्त के एक न होने से यह भाषितपुंस्क नहीं होता। नपुंसक में इस की सम्पूर्ण प्रक्रिया वारिशब्दवत् होती है; किञ्चित् भी अन्तर नहीं होता। रूपमाला यथा— (मधु = शहद) प्र० मधु मधुनी मधूनि | प० मधुनः मधुभ्याम् मधुभ्यः द्वि० ,, ,, ,, | ष० ,, मधुनोः मधूनाम् तृ० मधुना मधुभ्याम् मधुभिः | स० मधुनि ,, मधुषु च० मधुने ,, मधुभ्यः | सं० हे मधो!,मधु! हे मधुनी! हे मधूनि! इसीप्रकार निम्नस्थ शब्दों के रूप होते हैं। [* यह णत्वविधि का चिह्न है।] १. अम्बु = जल। २. अश्रु * = आंसू। ३. उडु¹ = नक्षत्र, तारा। ४. जतु = लाख। ५. जत्रु * = गले के नीचे की दो हड्डियां, स्कन्धसन्धि। ६. तालु = दांतों के पीछे मुख की कठिन छत। ७. त्रपु* = जो अग्नि को पा कर मानो लज्जा से पिघल जाता है—सीसा वा रांगा। ८. दारु ² = लकड़ी। ६. पीलु³ = पीलु का फल। १०. वसु = धन। ११. वस्तु = पदार्थ, चीज़। १२. शिलाजतु = शिलाजीत। १३. श्मश्रु = दाढ़ी-मूंछ। १४. हिङ्गु = हींग। नोट—ध्यान रहे कि विशुद्ध उदन्त नपुंसक शब्द संस्कृतसाहित्य में बहुत थोड़े हैं। हां ! भाषितपुंस्क पर्याप्त मिल सकते हैं। इनका वर्णन आगे देखें। [लघु०] सुलु। सुलुनी। सुलूनि। सुल्वा, सुलुने—इत्यादि॥ व्याख्या—सुष्ठु लुनातीति सुलु (शस्त्रम्)। जो भली प्रकार काटता है उसे १. 'उडु' शब्द स्त्रीलिङ्ग और नपुंसकलिंग दोनों में प्रयुक्त होता है; अतः यह भाषित- पुंस्क नहीं होता। उडु वा स्त्रियाम्—इत्यमरः। २. कुछ लोगों के मत में 'दारु' शब्द पुंलिङ्ग भी माना जाता है। पुंन्नपुंसकयोर्दारु इति त्रिकाण्डशेषः। तब वह भाषितपुंस्क भी हो जायेगा। इसी प्रकार 'देवदारु' शब्द के विषय में भी समझना चाहिये। अमुं पुरः पश्यसि देवदारुम् (रघुवंशे २.३६); सप्त स्युर्देवदारुणि (इत्यमरे)। ३. 'पीलु' शब्द पुंलिङ्ग और नपुंसक दोनों लिङ्गों में प्रयुक्त होता है। परन्तु इस का पुंलिङ्ग में 'पीलु-वृक्ष' और नपुंसक में 'पीलु-फल' अर्थ होता है। अतः प्रवृत्ति- निमित्त के एक न होने के कारण यह भाषितपुंस्क नहीं होता। इस विषय पर एक श्लोक बहुत प्रसिद्ध है— पीलुर्वृक्षः फलं पीलु पीलुने न तु पीलवे। वृक्षे निमित्तं पीलुत्वं तज्जत्वं तत्फले पुनः॥
३४४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् 'सुलू' कहते हैं। विशेष्यलिङ्ग के आश्रित होने से यह शब्द त्रिलिङ्गी है। नपुंसक में पूर्ववत् (२४३) सूत्र से ह्रस्व होकर सुधिशब्दवत् प्रक्रिया होती है। प्रवृत्तिनिमित्त के एक होने से तृतीयादि अजादि विभक्तियों में इसे भी वैकल्पिक पुंवद्भाव हो जाता है। पुंवत्पक्ष में ओः सुपि (२१०) से यण् होता है। रूपमाला यथा— प्रथमा सुलूं सुलुनौ सुलूनि द्वितीया ,, ,, ,, तृतीया सुल्वा, सुलुना सुलुभ्याम् सुलुभिः चतुर्थी सुल्वे, सुलुने ,, सुलुभ्यः पञ्चमी सुल्वः, सुलुनः ,, ,, षष्ठी ,, ,, सुल्वोः, सुलुनोः सुल्वाम्, सुलनाम् सप्तमी सुल्वि, सुलनि ,, ,, सुलुषु सम्बोधन हे सुलो!, हे सुल! हे सुलनी! हे सुलूनि! इसी प्रकार निम्नस्थ शब्द भी भाषितपुंस्क हैं। पुंवत्पक्ष में इनका उच्चारण भानुवत् तथा पुंवद्भाव के अभाव में मधुवत् होता है--[* यह णत्वविधि का चिह्न है] (१) ऋजु = सरल, सीधा (१७) लघु = छोटा, हल्का (२) कटु = तीखा (मरिचवत्) (१८) वन्दारु* = वन्दनशील (३) कमण्डलु¹ = साधुओं का पात्र (१९) वर्तिष्णु = वर्तनशील, होने वाला (४) खम्बु² = शस्त्र (२०) वर्धिष्णु = वृद्धिशील (५) गुरु* = बड़ा, (२१) विजिगीषु* = जीतने का इच्छुक (६) चिकीर्षु* = करने का इच्छुक (२२) विभु = व्यापक (७) जानु = घुटना, जानुशब्दोऽयं क्वचिदि (२३) व्यसु = मरा हुआ, मृत (८) जिज्ञासु = जानने की इच्छा वाला (२४) शीधु = गन्ने से निर्मित मद्य (९) जीवातु³ = जीवन औषध (२५) श्रद्धालु = श्रद्धा रखने वाला (१०) तनु = सूक्ष्म, पतला (२६) सञ्जु = मिले हुए घुटनों वाला (११) दयालु = दया करने वाला (२७) सहिष्णु = सहन करने वाला (१२) दिदृक्षु* = देखने का इच्छुक (२८) संशयालु = संशयशील (१३) पटु = चतुर (२९) साधु = सरल, सीधा (१४) पिपासु = पीने का इच्छुक (३०) सानु⁴ = पहाड की चोटी (१५) प्रज्ञु = टेढ़े घुटनों वाला (३१) स्पृहयालु = इच्छा करने वाला (१६) मृदु = कोमल (३२) स्वादु = स्वादिष्ट १ अस्त्री कमण्डलु कुण्डी—इत्यमरप्रामाण्याद्भाषितपुंस्कोऽयम् । २ शङ्खः स्यात्कम्बुरस्त्रियाम् इत्यमरप्रामाण्याद्भाषितपुंस्कोऽयम् । ३ पुन्नपुंसकयोर्दातु-जीव तु-स्याणु-शौघव..—इति त्रिकाण्डशेष । ४ क्ष्माप्रस्थः सानुरस्त्रियाम्—इत्यमर. ।
अजन्त-नपुंसकलिङ्ग-प्रकरणम् ३४५ इसी प्रकार—सुशिशु, सुतंरु, सुवायु, सुगुरु, सुक्रतु, सुपरशु, सुबाहु, सुवातु, सुबन्धु, सुकेतु, सुजन्तु, सुतन्तु, सुपांशु, सुपटु—प्रभृति शब्द होते हैं । नोट—भाषितपुंस्क शब्द प्रायः विशेषणवाची ही होते हैं; विशुद्ध भाषितपुंस्क शब्द बहुत ही थोड़े हैं। यथा—कमण्डलु, कम्बु, शीधु, जीवातु आदि। विशेष्य के नपुंसक होने पर ही ये विशेषणवाची नपुंसक होते हैं। (यहां उकारान्त नपुंसक शब्दों का विवेचन समाप्त होता है।) -----::०::----- अब ऋकारान्त नपुंसक शब्दों का वर्णन करते हैं— [लघु०] धातृ। धातृणी। धातॄणि। हे धातः!, हे धातृ ! । धात्रा। धातृणा। धातॄणाम्। एवं ज्ञात्रादयः ॥ व्याख्या—दधातीति धातृ (कुलम्)। जो धारण करे उसे 'धातृ' कहते हैं। यह शब्द भी विशेष्यलिङ्ग के आश्रित होने से त्रिलिङ्गी है। विशेष्य के नपुंसक होने पर इस के नपुंसक में रूप बनते हैं। इसकी रूपमाला यथा— प्रथमा धातृ धातृणी धातॄणि द्वितीया ,, ,, ,, तृतीया धात्रा, धातृणा* धातृभ्याम् धातृभिः चतुर्थी धात्रे, धातृणे* ,, धातृभ्यः पञ्चमी धातुः, धातृणः* ,, ,, षष्ठी ,, ,, * धात्रोः, धातृणोः* धातॄणाम्* सप्तमी धातरि, धातृणि* ,, धातृषु सम्बोधन हे धातृ!, हे धातः! हे धातृणी! हे धातॄणि! : * इन तृतीयादि अजादि विभक्तियों में तृतीयादिषु भाषित० (२४६) सूत्र से वैकल्पिक पुंवद्भाव हो जाता है। पुंवत्पक्ष में अजन्तपुंल्लिङ्गान्तर्गत 'धातृ' शब्द के समान प्रक्रिया होती है। पुंवद्भाव के अभाव में 'वारि' शब्दवत् कार्य होते हैं। किन्तु टा में ना आदेश न हो कर नुँम् ही होता है। ध्यान रहे कि 'धातृ' शब्द की घिसञ्ज्ञा नहीं है अतः ङे, ङसिँ, ङस्, ङि विभक्तियों में घेर्डिति (१७२) और अच्च घेः (१७४) के साथ नुँम् को झगड़ना नहीं पड़ता। आम् में यद्यपि दोनों पक्षों में एक जैसे रूप बनते हैं तथापि पुंवद्भाव के अभाव में प्रक्रिया में कुछ अन्तर होता है। अर्थात् नुट् का आगम पूर्वविप्रतिषेध से नुँम् का बाध कर लेता है। 'हे धातृ, हे धातः' में न लुमताङ्गस्य (१६१) की अनित्यता के कारण दो रूप बनते हैं। अनित्यतापक्ष में नपुंसक में सर्वनामस्थानता न होने से ऋतो ङि० (२०४) से गुण न हो कर ह्रस्वस्य गुणः (१६६) से गुण हो जाता है। इसी प्रकार ज्ञातृ आदि शब्दों के नपुंसकलिङ्ग में रूप होते हैं—
३४६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् १ ज्ञातृ = जानने वाला (कुल आदि) | ६ छेत्तृ = काटने वाला (कुल आदि) २ कर्तृ = करने वाला ( ,, ,, ) | ७ दातृ = देने वाला ( ,, ,, ) ३ कथयितृ = कहने वाला ( ,, ,, ) | ८ वक्तृ = बोलने वाला ( ,, ,, ) ४ गणयितृ = गिनने वाला ( ,, ,, ) | ९ श्रोतृ = सुनने वाला ( ,, ,, ) ५ जेतृ = जीतने वाला ( ,, ,, ) | १० हर्तृ = हरने वाला ( ,, ,, ) ध्यातृ, गन्तृ, रचयितृ, प्रभृति शब्दों की स्वयं कल्पना कर लेनी चाहिये। नोट—ऋदन्त विशुद्ध नपुंसक शब्दों का संस्कृत-साहित्य में प्रायः अभाव ही है। सब के सब ऋदन्त शब्द नपुंसक में प्रायः भाषितपुंस्क ही मिलते हैं। (यहाँ ऋदन्त नपुंसक शब्दों का विवेचन समाप्त होता है।) ० अब ओकारान्त 'प्रद्यो' शब्द का वर्णन करते हैं— प्रकृष्टा द्यौर्यस्य यस्मिन् वा तत् = प्रद्यु (दिनम्)। प्रकृष्ट अर्थात् सुन्दर वा निर्मल आकाश वाले दिन को 'प्रद्यो' कहते हैं। प्रद्यो शब्द में 'ह्रस्वो नपुंसके प्रातिपदि- कस्य' (२४३) से ह्रस्व करना है, परन्तु ओकार के स्थान पर स्थानकृत आन्तर्य से अकार और उकार दोनों प्राप्त होते हैं। इन में से कौन सा ह्रस्व किया जाये? इस का निर्णय अग्रिमसूत्र करता है— [लघु०] नियम-सूत्रम्— (२५०) एच इग्घ्रस्वादेशे । १।१।४७॥ आदिश्यमानेषु ह्रस्वेषु (मध्ये¹) एच इगेव स्यात् । प्रद्यु । प्रद्युनी । प्रद्यूनि । प्रद्युना—इत्यादि ॥ अर्थ—जब ह्रस्व आदेश का विधान हो तब एचों के स्थान पर इक् ही ह्रस्व हो। व्याख्या—एचः ६।१। इक् १।१। ह्रस्वादेशे ७।१। समास—ह्रस्वस्य आदेशः = ह्रस्वादेशः, तस्मिन् = ह्रस्वादेशे, षष्ठीतत्पुरुष। अर्थ—(एचः) एच् के स्थान पर (ह्रस्वादेशे) ह्रस्व आदेश विधान करने पर (इक्) इक् ह्रस्व होता है। यद्यपि एच् और इक् दोनों चार-चार हैं, तथापि यहाँ यथासङ्ख्यविधि नहीं होती। यथासङ्ख्य- विधि अपूर्वविधि में ही प्रवृत्त हुआ करती है, नियमविधि में नहीं। अतः स्थानेऽन्तर- तम (१७) से यहाँ एकार और ऐकार के स्थान पर इकार ह्रस्व तथा ओकार और औकार के स्थान पर उकार ह्रस्व हो जायेगा। ध्यान रहे कि एचों के अपने ह्रस्व नहीं होते, 'एचामपि द्वादश, तेषां ह्रस्वाभा- वात्' यह पीछे सञ्ज्ञाप्रकरण में कहा जा चुका है। एच् संयुक्तस्वर हैं अर्थात् दो दो स्वर मिलकर बने हैं। अकार और इकार के संयोग से एकार ऐकार तथा अकार और उकार के संयोग से ओकार औकार की उत्पत्ति हुई है। इस अवस्था में एचों को १. मध्य इत्यपपाठः, तद्योगे षष्ठ्या एवौचित्याद्—इति शेखरे नागेशः।
अजन्त-नपुंसकलिङ्ग-प्रकरणम् ३४७ अकार और इकार तथा उकार प्राप्त होते हैं। अब इस सूत्र के नियम से इकार और उकार ही ह्रस्व होंगे अवर्ण नहीं। 'प्रद्यो' यहां ओकार को उकार ह्रस्व होकर 'प्रद्यु' हुआ। अब इस की समग्र प्रक्रिया तथा रूपमाला मधुशब्दवत् होती है— प्र० प्रद्यु प्रद्युनी प्रद्यूनि । प० प्रद्युनः प्रद्युभ्याम् प्रद्युभ्यः द्वि० ,, ,, ,, । ष० ,, प्रद्युनोः प्रद्यूनाम् तृ० प्रद्युना प्रद्युभ्याम् प्रद्युभिः । स० प्रद्युनि ,, प्रद्युषु च० प्रद्युने ,, प्रद्युभ्यः । सं० हे प्रद्यो!,प्रद्यु! हे प्रद्युनी! हे प्रद्यूनि! यहां पर धातुवृत्तिकार श्रीमाधव लिखते हैं कि तृतीयादि विभक्तियों में पुंव- द्भाव नहीं होता। क्योंकि नपुंसक में—प्रद्यु और पुंलिङ्ग में—प्रद्यो शब्द होने से दोनों इगन्त नहीं रहते। इगन्त शब्दों की ही तृतीयादिषु भाषित० (२४६) सूत्र में भाषित पुंस्कता कही गई है। परन्तु अन्य कई लोग इसे स्वीकार नहीं करते, वे कहते हैं कि पुंलिङ्गगत 'प्रद्यो' शब्द ही नपुंसक में 'प्रद्यु' शब्द बना है अतः एकदेशविकृतन्याय से दोनों एक ही हैं। नपुंसकगत इगन्त प्रद्यु शब्द पुंलिङ्ग में भी वर्त्तमान होने से पुंवद्भाव को प्राप्त हो जायेगा। ऐसा मानने वालों के मत में—प्रद्यवा, प्रद्युना (टा); प्रद्यवे, प्रद्युने(ङे); प्रद्योः, प्रद्युनः(ङसिं वा ङस्); प्रद्यवोः, प्रद्युनोः(ओस्); प्रद्यवाम्, प्रद्यूनाम् (आम्); प्रद्यवि, प्रद्युनि(ङि)—इस प्रकार दो २ रूप बनेंगे। (यहां ओकारान्त नपुंसक शब्दों का विवेचन समाप्त होता है।) ---------:०:--------- अब ऐकारान्त 'प्ररै' शब्द का वर्णन करते हैं— [लघु०] प्ररि। प्ररिणी। प्ररीणि॑। एकदेशविकृतमनन्यवत्—प्रराभ्याम्। प्ररीणाम्॥ व्याख्या—प्रकृष्टो राः = धनं यस्य तत् = प्ररि(कुलम्)। जिसका विपुल धन हो उसे 'प्ररै' कहते हैं। नपुंसक में एच इग्घ्रस्वादेशे (२५०) की सहायता से ह्रस्वो नपुंसके० (२४३) द्वारा ह्रस्व—इकार हो कर 'प्ररि' शब्द बन जाता है। अब इस का उच्चारण प्रायः 'वारि'शब्दवत् होता है। रूपमाला यथा— प्र० प्ररि प्ररिणी प्ररीणि । प० प्ररिणः प्रराभ्याम् प्रराभ्यः द्वि० ,, ,, ,, । ष० ,, प्ररिणोः प्ररीणाम् तृ० प्ररिणा प्रराभ्याम् प्रराभिः । स० प्ररिणि ,, प्ररासु च० प्ररिणे ,, प्रराभ्यः । सं० हे प्ररि!,प्ररे! हे प्ररिणी! हे प्ररीणि! (१) नोट—भ्याम्, भिस्, भ्यस् और सुप् में एकदेशविकृतमनन्यवत् की सहा- यता से पुनः वही रै शब्द माना जाने से रायो हलि (२१५) द्वारा ऐकार को आकार होकर 'प्रराभ्याम्' आदि रूप सिद्ध होते हैं। (२) नोट—यहां भी पूर्वोक्त 'प्रद्यो' शब्द की तरह श्रीमाधव के मत में
३४८ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां पुंवद्भाव नही होता अन्यों के मत मे हो जाता है। पुंवद्भाव मे--प्रराया, प्ररिणा इत्यादिप्रकारेण दो २ रूप बनते हैं। (३) नोट - 'प्ररि+आम्' यहा नुमचिर०(वा० १६) से नुँम् का बाध कर नुट् हो जाता है। पुन नामि (१४६) मे दीर्घ तथा अट्कुप्वाङ्नुम्० (१३८) से णत्व हो कर 'प्ररीणाम्' बनता है। ध्यान रहे कि 'प्ररि+नाम्' यहा नुट् हो चुकने पर रायो हलि (२१५) से आत्व नही होगा, क्योकि तब सन्निपात-परिभाषा विरोध करेगी। नामि (१४६) यह दीर्घ तो आरम्भसामर्थ्य से ही सन्निपात-परिभाषा की सर्वथा अवहेलना किया करता है। (यहा ऐकारान्त नपुंसक शब्दो का विवेचन समाप्त होता है।) -------------------.० ------------------- अब औकारान्त 'सुनौ' शब्द का वर्णन करते है— [लघु०] सुनु। सुनुनी। सुनूनि। सुनुना—इत्यादि ॥ व्याख्या--सु= शोभना नौर्यस्य तत् =सुनु(कुलम्)। जिस की सुन्दर नौका हो उसे 'सुनौ' कहते हैं। नपुंसक मे एच इग्घ्रस्वादेशे(२५०) के अनुसार ह्रस्वो नपुंसके० (२४३) से औकार को उकार ह्रस्व हो कर 'सुनु' शब्द बन जाता है। इसका उच्चा- रण 'मधु' शब्दवत् होता है। रूपमाला यथा— प्र० सुनु सुनुनी सुनूनि | प० सुनुन सुनुभ्याम् सुनुभ्य. द्वि० ,, ,, ,, | ष० ,, सुनुनो सुनूनाम् तृ० सुनुना सुनुभ्याम् सुनुभि | स० सुनुनि ,, सुनुषु च० सुनुने ,, सुनुभ्यः | स० हेसुनो!,सुनु! हेसुनुनी! हेसुनूनि! यहा भी पूर्ववत् श्रीमाधवे के मतानुसारोध से पुवद्भाव नही किया गया। वस्तुत. यहा भी पुंवद्भाव हो जाता है। पुवत्वक्ष मे ह्रस्व का पुन औकार बन जाता है। तब एचोऽयवायाव.(२२) द्वारा आव् आदेश करने से--सुनावा, सुनावे, सुनाव २, सुनावो. २, सुनावाम्, सुनावि—ये रूप भी पक्ष मे बन जाते हैं। (यहां औकारान्त नपुंसक शब्दों का विवेचन समाप्त होता है।) -----------; ० . ----------- [लघु०] इत्यजन्ता नपुसकलिङ्गा. [शब्दा ] ॥ अर्थ.—यहा अजन्तनपुसकलिङ्ग शब्द समाप्त होते हैं। अभ्यास (३७) (१) न लुमताङ्गस्य सूत्र की अनित्यता कैसे और क्यो सिद्ध की जाती है ? (२) 'वारीणाम्' मे नुट् हो वा नुँम् ? दोनो मे अन्तर स्पष्ट करें। (३) 'प्रवृत्तिनिमित्त' किसे कहते हैं ? पीलु शब्द पर उसे घटाए । (४) 'प्रद्यो' शब्द नपुसक मे मापितपुस्क मानना चाहिये या नही ? सहेतुक दोनो पक्षो का प्रतिपादन कर अपनी सम्मति लिखें।
हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ३४६ (५) एच इग्घ्रस्वादेशे सूत्र की व्याख्या करते हुए इस की आवश्यकता पर एक विस्तृत नोट लिखें । (६) निम्नलिखित सूत्र-वार्त्तिकों की विस्तृत व्याख्या करें— १. तृतीयादिषु० । २. अल्लोपोऽनः । ३. अस्थिदधि० । ४. विभाषा ङिश्श्योः । ५. स्वमोर्नपुंसकात् । ६. वृद्धैचौत्व-तृज्वद्भाव-गुणेभ्यो० । (७) सूत्रनिर्देशपूर्वक सिद्धि करें— १. अक्ष्णा । २. प्रराभ्याम् । ३. वारिणे । ४. हे धातः ! । ५. सुल्वा । ६. त्रीणि । ७. दधनि । ८. द्वे । ६. धातॄणि । १०. मधूनाम् । (८) सख्यि, सुनी, पीलु, प्रद्यो, वारि, सुधी—शब्दों का उच्चारण लिखें । ---::०::--- इति भैमीव्याख्योपेतायां लघु-सिद्धान्त- कौमुद्यामजन्त-नपुंसक-लिङ्ग- प्रकरणं समाप्तम् ॥ अथ हलन्त-पुँल्लिङ्ग-प्रकरणम् अब क्रमप्राप्त हलन्तपुंलिङ्ग शब्दों का विवेचन करते हैं। हयवरट् (प्रत्या- हार-सूत्र ५) के क्रमानुसार सर्वप्रथम हकारान्त शब्दों का नम्बर आता है । [लघु०] विधि-सूत्रम्—(२५१) हो ढः ।८।२।३१॥ हस्य ढः स्याज्झलि पदान्ते च । लिट्, लिड् । लिहौ । लिहः । लिड्भ्याम् । लिट्त्सु, लिड्सु ॥ अर्थः—झल् परे होने पर या पदान्त में हकार के स्थान पर ढकार हो । व्याख्या—झलि ।७।१। (झलो झलि से)। पदस्य ।६।१। (यह अधिकृत है) । अन्ते ।७।१। (स्कोः संयोगाद्योरन्ते च से) । हः ।६।१। ढः ।१।१। अर्थः—(झलि) झल् परे होने पर या (पदस्य) पद के (अन्ते) अन्त में (हः) ह के स्थान पर (ढः) ढ् हो जाता है । सूत्र में ढकारोत्तर अकार उच्चारणार्थ है । लेढीति लिट् । चाटने वाले को 'लिह्' कहते हैं। लिहँ आस्वादने (अदा० उभ०) धातु से कर्त्ता में क्विँप् च (८०२) सूत्र द्वारा क्विँप् प्रत्यय हो उस का सर्वापहार लोप¹ करने से 'लिह्' शब्द सिद्ध होता है। लिहू के कृदन्त होने से कृत्तद्धित० (११७) सूत्र से प्रातिपदिकसञ्ज्ञा हो कर सुँ आदि प्रत्यय उत्पन्न होते हैं। १. जो लोप सम्पूर्ण प्रत्यय का अदर्शन करता है उसे 'सर्वापहार' या 'सर्वापहारी' लोप कहते हैं। क्विन्, क्विँप्, विँट्, विँच् आदि प्रत्ययों का सर्वापहार लोप होता है ।
३५० भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां लिहू+स्(सुं)। यहां हल्ङ्याब्भ्यो ० (१७६) से अपृक्त सकार का लोप हो जाता है। तब प्रत्ययलोपे० (१६०) सूत्र की सहायता से सुप्तिङन्तं पदम् (१४) द्वारा 'लिहू' की पदसञ्ज्ञा हो पद के अन्त में हकार को हो ढ (२५१) से ढकार हो जाता है। पुनः झलां जशोऽन्ते (६७) से ढकार को डकार तथा वाऽवसाने (१४६) से वैकल्पिक टकार करने से—'लिट्, लिड्' ये दो रूप बनते हैं। लिहू + औ = लिहौ । लिहू + अस् (जस्) = लिह । लिहू + अम् = लिहम् । लिहू + औ (औट्) = लिहौ। लिहू + अस् (शस्) = लिह । लिहू + आ (टा) = लिहा। 'लिहू + भ्याम्' यहां स्वादिष्वसर्वनामस्थाने (१६४) सूत्र से 'लिहू' की पद- सञ्ज्ञा है, हकार पदान्त में स्थित है। अतः हो ढ (२५१) से हकार को ढकार तथा झलां जशोऽन्ते (६७) से ढकार को डकार हो कर 'लिड्भ्याम्' सिद्ध होता है। भिस् और भ्यस् में भी इसी प्रकार 'लिड्भिः' और 'लिड्भ्यः' रूप बनते हैं। लिहू + ए (ङे) = लिहे । लिहू + अस् (ङसिं वा ङस्) = लिह । लिहू + ओस् – लिहो । लिहू + आम् = लिहाम् । लिहू + इ (ङि) = लिहि । सप्तमी के बहुवचन में 'लिहू+सु' (सुप्) इस स्थिति में हो ढ (२५१) सूत्र से पदान्त हकार को ढकार तथा झलां जशोऽन्ते (६७) से उसे जश्त्व–डकार हो कर 'लिड् + सु' बना। अब खरि च (८ ४ ५४) के असिद्ध होने से ङः सि धुट् (८ ३ २६) द्वारा वैकल्पिक धुट् करने में अनुबन्धों के चले जाने पर—'१ लिड् ध् सु २ लिड् सु' हुआ। अब यहां ष्टुना ष्टुः (६४) सूत्र द्वारा प्रथम रूप में धकार को ढकार और दूसरे रूप में सकार को षकार प्राप्त होता है। इस का न पदान्ताट्टोरनाम् (६५) से निषेध हो जाता है। पुनः खरि च (७४) सूत्र द्वारा प्रथम रूप में धकार को तकार और उस तकार को खर् मान कर डकार को टकार करने से—'लिट्त्सु' । दूसरे रूप से डकार को टकार करने पर—'लिट्सु' । इस प्रकार दो रूप सिद्ध होते हैं। ध्यातव्य—'लिट्त्सु, लिट्सु' इन दोनों रूपों में खरि च (७४) द्वारा किया गया चर्त्व असिद्ध है, अतः चयो द्वितीया० (वा० १४) से प्रथम रूप में तकार को थकार तथा दूसरे रूप में टकार को ठकार नहीं होता। भष् परे होने पर हो ढ (२५१) सूत्र के उदाहरण 'वोढा' आदि हैं, जो आगे मूल में ही स्पष्ट हो जाएंगे। 'लिहू' (चाटने वाला) शब्द की रूपमाला यथा— प्र० लिट्-ड् लिहौ लिह | प० लिह लिड्भ्याम् लिड्भ्य द्वि० लिहम् " " | ष० " लिहोः लिहाम् तृ० लिहा लिड्भ्याम् लिड्भि | स० लिहि " लिट्त्सु, त्सु च० लिहे " लिड्भ्य | सं० हे लिट्, ड्! हे लिहौ! हे लिह ! इसी प्रकार—मधुलिह् (भ्रमर), पुष्पलिह (भ्रमर), कुसुमलिह (भ्रमर), गुडलिह (गुड़ चाटने वाला), शिरोरुह् (केश), भूरुह् (वृक्ष), सरोरुह् (कमल), सर-
हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ३५१ गीर्हूहू (कमल), पर्णहूहू (वसन्त ऋतु)—प्रभृति शब्दों के रूप होते हैं। नोट—हलन्त शब्दों की अजादि विभक्तियों में प्राय: कोई कार्य विशेष नहीं करना पड़ता। व्यञ्जनों को स्वरों के साथ मिलाना मात्र ही कार्य होता है। हलादि विभक्तियों में कुछ कार्य होता है। अर्थात् सुं, भ्याम्, भिस्, भ्यस् और सुँप्, इन पाँच स्थलों में ही रूप बनाने पड़ते हैं। हम आगे प्राय: इन में ही सिद्धि करेंगे। दुह् = दोहने वाला (दोग्धीति धुक्)। दुहँ प्रपूरणे (अदा० उ०) धातु से कर्त्ता में क्विप् च (८०२) से क्विप् प्रत्यय करने पर उस का सर्वापहार लोप हो 'दुह्' शब्द निष्पन्न होता है। अब इस से स्वादियों की उत्पत्ति होती है- 'दुह् + स्' (सुँ) यहां हल्ङ्याब्भ्यः० (१७६) से सकार का लोप हो 'दुह्' इस अवस्था में हो ढः (२५१) सूत्र प्राप्त होता है। इस पर अग्रिम अपवादसूत्र प्रवृत्त होता है - [लघु०] विधि-सूत्रम्—(३५२) दादेर्धातोर्घः ।८।२।३२॥ झलि पदान्ते चोपदेशे दादेर्धातोर्हस्य घः स्यात् ॥ अर्थः-उपदेश में जो दकारादि धातु, उस के हकार को घकार हो जाता है झल् परे होने पर या पदान्त में । व्याख्या-दादेः ।६।१। धातोः ।६।१। हः ।६।१। (हो ढः से) । घः ।१।१। झलि ।७।१। (झलो झलि से) । पदस्य ।६।१। (यह अधिकृत है) । अन्ते ।७।१। (स्कोः० से) । यहां भाष्यकार के व्याख्यान से उपदेश में ही 'दादि' ग्रहण किया जाता है। समासः-दः=दकारः, आदी आदिर्वा यस्य स दादिस्तस्य दादेः, बहुव्रीहिसमासः । अर्थः-(झलि) झल् परे होने पर या (पदस्य) पद के (अन्ते) अन्त में (दादेः) उपदेश में दकार आदि वाली (धातोः) धातु के (हः) हकार के स्थान पर (घः) घ् आदेश हो जाता है। घकार में अकार उच्चारणार्थ है। यह सूत्र यद्यपि हो ढः (८.२.३१) सूत्र की दृष्टि में असिद्ध है; तथापि वचनसामर्थ्य से यह उस का अपवाद है—अपवादो वचनप्रामाण्यात् । 'उपदेश' ग्रहण का यह प्रयोजन है कि 'अधोक्' यहां दुह के अजादि होने पर भी घत्व हो जाये और 'दामलिद्' यहां दादि धातु होने पर भी घत्व न हो। १ १. 'अधोक्' यह 'दुह' धातु के लङ् लकार के प्रथम वा मध्यमपुरुष का एकवचन है। दादेर्धातोर्घः में 'उपदेश' ग्रहण न करने से 'अदोह्' इस स्थिति में हकार को घकार नहीं हो सकता; क्योंकि 'दुह्' धातु को अट् का आगम होने से यदागमास्तद्- गुणीभूतास्तद्ग्रहणेन गृह्यन्ते परिभाषा के अनुसार वह अजादि हो गई है, दादि नहीं रही; पुनः यदि यहां 'उपदेश' ग्रहण करते हैं तो हकार को घकार हो जाता है; क्योंकि उपदेश = आद्योच्चारण में तो यह दादि ही थी, अजादि तो बाद = दूसरे उच्चारण में बनी है। घकार करने पर एकाचः० (२५३) सूत्र से दकार को धकार हो जश्त्व चर्ख करने से- 'अधोक्-ग्' ये दो रूप सिद्ध हो जाते-हैं। इसी
३५२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां 'दुह्' यह उपदेश में दादि धातु१ है। अत इस सूत्र से पदान्त में हकार को घकार हो कर—'धुघ्' हुआ। अब अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(२५३) एकाचो बशो भष् भषन्तस्य स्ध्वोः।८।२।३७॥ धात्ववयवस्यैकाचो भषन्तस्य बशो भष् स्यात्, से ध्वे पदान्ते च। धुक्, धुग्। दुहौ। दुहः। धुग्भ्याम्। धुक्षु॥ अर्थ.—धातु का अवयव जो भषन्त एकाच्, उस के बश् को भष् हो, सकार अथवा ध्व परे होने पर या पदान्त में। व्याख्या—घातोः।६।१। (वादेर्घार्तोर्घं से)। एकाचः।६।१। बशः।६।१। भष् ।१।१। भषन्तस्य।६।१। स्ध्वोः।७।२। पदस्य।६।१। (अधिकृत है)। अन्ते।७।१। (स्कोः संयोगाद्योरन्ते च से)। अन्वय—धातोर् (अवयवस्य) एकाचो भषन्तस्य बशो भष् (स्यात्) स्ध्वोः पदस्य अन्ते (च)। अर्थ—(घातोः) धातु के अवयव (एकाचः) एक अच् वाले (भषन्तस्य) भषन्त भाग के (बशः) बश् अर्थात् ब्, ग्, ड्, द् वर्णों के स्थान पर (भष्) भष् अर्थात् भ्, घ्, ढ्, ध् वर्ण हो जाते हैं (स्ध्वोः) सकार अथवा ध्व शब्द परे हो या (पदस्य) पद के (अन्ते) अन्त में। इस सूत्र के अर्थ में हम ने अनुवृत्तिलब्ध 'घातोः' पद का 'एकाचः भषन्तस्य' के साथ सामानाधिकरण्य नहीं किया। अर्थात् 'एक अच् वाली भषन्त धातु के बश् को भष् हो' इस प्रकार का अर्थ नहीं किया। ऐसा अर्थ करने से यह दोष प्राप्त होता था कि जहाँ एक अच् वाली धातु न होती वहाँ भष् प्राप्त न होता२। यथा—'गर्दभ' शब्द से तत्करोति तदाचष्टे (चुरा० ग० सू०) द्वारा णिच् प्रत्यय करने पर सनाद्यन्ता धातवः (४६८) से धातुसञ्ज्ञा हो कर कर्त्ता में क्विँप् प्रत्यय करने से 'गर्दभ्' शब्द निष्पन्न होता है। यहां एक अच् वाली धातु न होने से भष्भाव प्राप्त नहीं होता। परन्तु हम भष्भाव कर 'गधैप्' रूप बनाना अभीष्ट है। अत यहां 'घातोः' पद का 'एकाचः भषन्तस्य' इस के साथ अवयव-अवयवी सम्बन्ध करना ही युक्त है। अर्थात् 'धातु का अवयव जो एकाच् भषन्त, उस के बश् को भष् हो' ऐसा अर्थ करना प्रत्यु०—'दामलिह्' शब्द में उपदेश में धातु के दादि न होकर लकारादि होने से घत्व नहीं होता। हो ढः (२५१) से ढत्व हो जश्त्व चत्त्वं करने पर—'दामलिट्- ड्' सिद्ध होते हैं। दाम लेढीति दामलिट्, दामलिहमात्मन इच्छतीति-दामलिट्। इस की विशेष प्रक्रिया सिद्धान्तकौमुदी में देखें। १ क्विबन्ता णिङन्ता णिजन्ता शब्दा धातुत्वं न जहाति (क्विबन्त, णिङन्त और णिजन्त शब्दों की धातुसञ्ज्ञा बनी रहती है) इस परिभाषानुसार यहां 'दुह्' की धातुसञ्ज्ञा पूर्ववद् अक्षुण्ण है। २ यदि एकाच् अनेकाच् सब धातुओं में भष्भाव करना है तो—'एकाचः' की क्या आवश्यकता है ? यहां यह शङ्का नहीं करनी चाहिये, क्योंकि 'एकाचः' ग्रहण न करने से ढत्व कर चुकने पर 'दामलिड्' में भी अनिष्ट भष्भाव प्राप्त होगा।
चाहिये। ऐसा करने से—'गर्दभ्' इस धातु का अवयव एकाच् झषन्त 'दभ्' हो जाता है। इस से उस के दकार को धकार सिद्ध हो जाता है। इस सूत्र का स्थूल तात्पर्य यह है कि स् या ध्व परे होने पर या पदान्त में यदि किसी धातु के एकाच् अंश के अन्त में झष् अर्थात् वर्गचतुर्थ वर्ण होगा तो धातु के उसी अंश के अन्तर्गत ब्, ग्, ड्, द् को क्रमशः भ्, घ्, ढ्, ध् वर्ण हो जायेंगे। यथा —बुध् का भुध्, गुह् का घुह्, दुह् का धुह्, गर्दभ् का गधर्भ् हो जायेगा। सकार या ध्व परे होने पर उदाहरण आगे तिङन्तप्रकरण में—भोत्स्यते, घोक्ष्यते, अभुद्ध्वम्, अगुध्वम् आदि आयेंगे। यहां प्रकृत में पदान्त के उदाहरण प्रस्तुत हैं। 'दुह्' यह व्यपदेशिवद्भाव¹ से धातु का अवयव है और एकाच् झषन्त भी है, अतः यहां पदान्त में इस के बश्—दकार को स्थानकृत आन्तर्य से धकार हो कर 'धुह्' हुआ। अब जश्त्व (६७) और वैकल्पिक चर्त्व (१४६) करने से—'धुक्, धुग्' ये दो रूप सिद्ध होते हैं। भ्याम् में—'दुह् + भ्याम्' इस स्थिति में पदान्त में हकार को घकार एकाचः० (२५३) से दकार को धकार तथा जश्त्व—गकार हो कर 'धुग्भ्याम्' रूप सिद्ध होता है। इसी प्रकार भिस् में 'धुग्भिः' और भ्यस् में 'धुग्भ्यः' सिद्ध होते हैं। दुह् + सु (सुप्)। यहां भी पदान्त में घकारादेश, भष्त्व से दकार को धकार तथा झलां जशोऽन्ते (६७) से जश्त्व—गकार और खरि च (७४) से चर्त्व-ककार कर षत्व करने से 'धुक्षु' सिद्ध होता है। रूपमाला यथा— प्र० धुक्,ग् दुहौ दुहः | प० दुहः धुग्भ्याम् धुग्भ्यः द्वि० दुहम् ,, ,, | प० ,, दुहोः दुहाम् तृ० दुहा धुग्भ्याम् धुग्भिः | स० दुहि ,, धुक्षु च० दुहे ,, धुग्भ्यः | सं० हे धुक्,ग्! हे दुहौ! हे दुहः! इसी प्रकार—गोदुह (गौ दोहने वाला =ग्वाला), अजादुह् (बकरी दोहने वाला), दह (जलाने वाली =अग्नि), आश्रयदह (अग्नि), काष्ठदह् (अग्नि) प्रभृति शब्दों के रूप होते हैं। [लघु०] विधि-सूत्रम् (२५४) वा द्रुह-मुह-ष्णुह-ष्णिहाम् ।८।२।३३॥ एषां हस्य वा घो झलि पदान्ते च। ध्रुक्, ध्रुग्, ध्रुट्, ध्रुड्। द्रुहौ। द्रुहः। ध्रुग्भ्याम्, ध्रुड्भ्याम्। ध्रुक्षु, ध्रुट्सु, ध्रुट्सु। एवम्—मुक्, मुग्, मुट्, मुड् इत्यादि ॥ अर्थः—द्रुह्, मुह्, ष्णुह्, ष्णिह्—इन धातुओं के हकार को झल् परे होने पर या पदान्त में विकल्प कर के घकार हो जाता है। व्याख्या—वा इत्यव्ययपदम्। द्रुह-मुह-ष्णुह-ष्णिहाम् ।६।३। हः ।६।१। (हो ढः से)। घः ।१।१। (दादेर्धातोर्घः से)। झलि ।७।१। (झलो झलि से)। पदस्य १. इस का विवेचन आद्यन्तवदेकस्मिन् (२७८) सूत्र पर देखें। ल० प्र० (२३)