महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
(राजसूयारम्भपर्व)
(राजसूयारम्भपर्व)
त्रयोदशोऽध्यायः
युधिष्ठिरका राजसूयविषयक संकल्प और उसके विषयमें भाइयों, मन्त्रियों, मुनियों तथा श्रीकृष्णसे सलाह लेना
वैशम्पायन उवाच
ऋषेस्तद् वचनं श्रुत्वा निशश्वास युधिष्ठिरः ।
चिन्तयन् राजसूयेष्टिं न लेभे शर्म भारत ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! देवर्षि नारदका वह वचन सुनकर युधिष्ठिरने लंबी साँस खींची। राजसूययज्ञके सम्बन्धमें चिन्तन करते हुए उन्हें शान्ति नहीं मिली ॥ १ ॥
राजर्षीणां च तं श्रुत्वा महिमानं महात्मनाम् ।
यज्वनां कर्मभिः पुण्यैर्लोकप्राप्तिं समीक्ष्य च ॥ २ ॥
हरिश्चन्द्रं च राजर्षिं रोचमानं विशेषतः ।
यज्वानं यज्ञमाहर्तुं राजसूयमिषेष सः ॥ ३ ॥
राजसूययज्ञ करनेवाले महात्मा राजर्षियोंकी वैसी महिमा सुनकर तथा पुण्यकर्मोंद्वारा उत्तम लोकोंकी प्राप्ति होती देखकर एवं यज्ञ करनेवाले राजर्षि हरिश्चन्द्रका महान् तेज (तथा विशेष वैभव एवं आदर-सत्कार) सुनकर उनके मनमें राजसूययज्ञ करनेकी इच्छा हुई ॥ २-३ ॥
युधिष्ठिरस्ततः सर्वानर्चयित्वा सभासदः ।
प्रत्यर्चितश्च तैः सर्वैर्यज्ञायैव मनो दधे ॥ ४ ॥
तदनन्तर युधिष्ठिरने अपने समस्त सभासदोंका सत्कार किया और उन सब सदस्योंने भी उनका बड़ा सम्मान किया। अन्तमें (सबकी सम्मतिसे) उनका मन यज्ञ करनेके ही संकल्पपर दृढ़ हो गया ॥ ४ ॥
स राजसूयं राजेन्द्र कुरूणामृषभस्तदा ।
आहर्तुं प्रवणं चक्रे मनः संचिन्त्य चासकृत् ॥ ५ ॥
राजेन्द्र! कुरुश्रेष्ठ युधिष्ठिरने उस समय बार-बार विचार करके राजसूययज्ञके अनुष्ठानमें ही मन लगाया ॥ ५ ॥
भूयश्चाद्भुतवीर्यौजा धर्ममेवानुचिन्तयन् ।
किं हितं सर्वलोकानां भवेदिति मनो दधे ॥ ६ ॥ अद्भुत बल और पराक्रमवाले धर्मराजने पुनः अपने धर्मका ही चिन्तन किया और सम्पूर्ण लोकोंका हित कैसे हो, इसी ओर वे ध्यान देने लगे ॥ ६ ॥
अनुगृह्णन् प्रजाः सर्वाः सर्वधर्मभृतां वरः । अविशेषेण सर्वेषां हितं चक्रे युधिष्ठिरः ॥ ७ ॥ युधिष्ठिर समस्त धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ थे। वे सारी प्रजापर अनुग्रह करके सबका समानरूपसे हितसाधन करने लगे ॥ ७ ॥
सर्वेषां दीयतां देयं मुञ्चन् कोपमदावुभौ । साधु धर्मेति धर्मेति नान्यच्छ्रूयेत भाषितम् ॥ ८ ॥ क्रोध और अभिमानसे रहित होकर राजा युधिष्ठिरने अपने सेवकोंसे कह दिया कि 'देनेयोग्य वस्तुएँ सबको दी जायँ अथवा सारी जनताका पावना (ऋण) चुका दिया जाय।' उनके राज्यमें 'धर्मराज! आप धन्य हैं। धर्मस्वरूप युधिष्ठिर आपको साधुवाद!' इसके सिवा और कोई बात नहीं सुनी जाती थी ॥ ८ ॥
एवंगते ततस्तस्मिन् पितरीवाश्वसज्जनाः । न तस्य विद्यते द्वेष्टा ततोऽस्याजातशत्रुता ॥ ९ ॥ उनका ऐसा व्यवहार देख सारी प्रजा उनके ऊपर पिताके समान भरोसा रखने लगी। उनके प्रति द्वेष रखनेवाला कोई नहीं रहा। इसीलिये वे 'अजातशत्रु' नामसे प्रसिद्ध हुए ॥ ९ ॥
परिग्रहान्नरेन्द्रस्य भीमस्य परिपालनात् । शत्रूणां क्षपणाच्चैव बीभत्सोः सव्यसाचिनः ॥ १० ॥ धीमतः सहदेवस्य धर्माणामनुशासनात् । वैनत्यात् सर्वतश्चैव नकुलस्य स्वभावतः । अविग्रहा वीतभयाः स्वधर्मनिरताः सदा ॥ ११ ॥ निकामवर्षाः स्फीताश्च आसञ्जनपदास्तथा । महाराज युधिष्ठिर सबको आत्मीयजनोंकी भाँति अपनाते, भीमसेन सबकी रक्षा करते, सव्यसाची अर्जुन शत्रुओंके संहारमें लगे रहते, बुद्धिमान् सहदेव सबको धर्मका उपदेश दिया करते और नकुल स्वभावसे ही सबके साथ विनयपूर्ण बर्ताव करते थे। इससे उनके राज्यके सभी जनपद कलहशून्य, निर्भय, स्वधर्मपरायण तथा उन्नतिशील थे। वहाँ उनकी इच्छाके अनुसार समयपर वर्षा होती थी ॥ १०-११ ½ ॥
वार्धुषी यज्ञसत्त्वानि गोरक्षं कर्षणं वणिक् ॥ १२ ॥ विशेषात् सर्वमेवैतत् संजज्ञे राजकर्मणा । अनुकर्षं च निष्कर्षं व्याधिपावकमूर्च्छनम् ॥ १३ ॥ सर्वमेव न तत्रासीद् धर्मनित्ये युधिष्ठिरे ।
उन दिनों राजाके सुप्रबन्धसे ब्याजकी आजीविका, यज्ञकी सामग्री, गोरक्षा, खेती और व्यापार—इन सबकी विशेष उन्नति होने लगी। निर्धन प्रजाजनोंसे पिछले वर्षका बाकी कर नहीं लिया जाता था तथा चालू वर्षका कर वसूल करनेके लिये किसीको पीड़ा नहीं दी जाती थी। सदा धर्ममें तत्पर रहनेवाले युधिष्ठिरके शासनकालमें रोग तथा अग्निका प्रकोप आदि कोई भी उपद्रव नहीं था ।। १२-१३ ½ ।।
दस्युभ्यो वञ्चकेभ्यश्च राज्ञः प्रति परस्परम् ।। १४ ।। राजवल्लभतश्चैव नाश्रूयत मृषा कृतम् ।
लुटेरोंसे, ठगोंसे, राजासे तथा राजाके प्रिय व्यक्तियोंसे प्रजाके प्रति अत्याचार या मिथ्या व्यवहार कभी नहीं सुना जाता था और आपसमें भी सारी प्रजा एक-दूसरेसे मिथ्या व्यवहार नहीं करती थी ।। १४ ½ ।।
प्रियं कर्तुमुपस्थातुं बलिकर्म स्वकर्मजम् ।। १५ ।। अभिहर्तुं नृपाः षट्सु पृथग् जात्यैश्च नैगमैः । ववृधे विषयस्तत्र धर्मनित्ये युधिष्ठिरे ।। १६ ।। कामतोऽप्युपयुञ्जानै राजसैर्लोभजैर्जनैः ।
दूसरे राजालोग विभिन्न देशके कुलीन वैश्योंके साथ धर्मराज युधिष्ठिरका प्रिय करने, उन्हें कर देने, अपने उपार्जित धन-रत्न आदिकी भेंट देने तथा संधि-विग्रहादि छः कार्योंमें राजाको सहयोग देनेके लिये उनके पास आते थे। सदा धर्ममें ही लगे रहनेवाले राजा युधिष्ठिरके शासनकालमें राजस स्वभाववाले तथा लोभी मनुष्योंद्वारा इच्छानुसार धन आदिका उपभोग किये जानेपर भी उनका देश दिनोदिन उन्नति करने लगा ।। १५-१६ ½ ।।
सर्वव्यापी सर्वगुणी सर्वसाहः स सर्वराट् ।। १७ ।।
राजा युधिष्ठिरकी ख्याति सर्वत्र फैल रही थी। सभी सद्गुण उनकी शोभा बढ़ा रहे थे। वे शीत एवं उष्ण आदि सभी द्वन्द्वोंको सहनेमें समर्थ तथा अपने राजोचित गुणोंसे सर्वत्र सुशोभित होते थे ।। १७ ।।
यस्मिन्नधिकृतः सम्राड् भ्राजमानो महायशाः । यत्र राजन् दश दिशः पितृतो मातृतस्तथा । अनुरक्ताः प्रजा आसन्नागोपाला द्विजातयः ।। १८ ।।
राजन्! दसों दिशाओंमें प्रकाशित होनेवाले वे महायशस्वी सम्राट् जिस देशपर अधिकार जमाते, वहाँ ग्वालोंसे लेकर ब्राह्मणोंतक सारी प्रजा उनके प्रति पिता-माताके समान भाव रखकर प्रेम करने लगती थी ।। १८ ।।
वैशम्पायन उवाच
स मन्त्रिणः समानाय्य भ्रातॄंश्च वदतां वरः । राजसूयं प्रति तदा पुनः पुनरपृच्छत ।। १९ ।।
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! वक्ताओंमें श्रेष्ठ राजा युधिष्ठिरने उस समय अपने मन्त्रियों और भाइयोंको बुलाकर उनसे बार-बार पूछा—‘राजसूययज्ञके सम्बन्धमें आपलोगोंकी क्या सम्मति है?’॥ १९॥
ते पृच्छमानाः सहिता वचोऽर्थ्यं मन्त्रिणस्तदा।
युधिष्ठिरं महाप्राज्ञं यियक्षुमिदमब्रुवन्॥ २०॥
इस प्रकार पूछे जानेपर उन सब मन्त्रियोंने एक साथ यज्ञकी इच्छावाले परम बुद्धिमान् युधिष्ठिरसे उस समय यह अर्थयुक्त बात कही—॥ २०॥
येनाभिषिक्तो नृपतिर्वारुणं गुणमृच्छति।
तेन राजापि तं कृत्स्नं सम्राड्गुणमभीप्सति॥ २१॥
‘महाराज! राजसूययज्ञके द्वारा अभिषिक्त होनेपर राजा वरुणके गुणोंको प्राप्त कर लेता है; इसलिये प्रत्येक नरेश उस यज्ञके द्वारा सम्राट्के समस्त गुणोंको पानेकी अभिलाषा रखता है॥ २१॥
तस्य सम्राड्गुणार्हस्य भवतः कुरुनन्दन।
राजसूयस्य समयं मन्यन्ते सुहृदस्तव॥ २२॥
‘कुरुनन्दन! आप तो सम्राट्के गुणोंको पानेके सर्वथा योग्य हैं; अतः आपके हितैषी सुहृद् आपके द्वारा राजसूययज्ञके अनुष्ठानका यह उचित अवसर प्राप्त हुआ मानते हैं॥ २२॥
तस्य यज्ञस्य समयः स्वाधीनः क्षत्रसम्पदा।
साम्ना षडग्नयो यस्मिंछ्रीयन्ते शंसितव्रतैः॥ २३॥
‘उस यज्ञका समय क्षत्रसम्पत्ति यानी सेना आदिके अधीन है। उसमें उत्तम व्रतका आचरण करनेवाले ब्राह्मण सामवेदके मन्त्रोंद्वारा अग्निकी स्थापनाके लिये छः अग्निवेदियोंका निर्माण करते हैं॥ २३॥
दर्वीहोमानुपादाय सर्वान् यः प्राप्नुते क्रतून्।
अभिषेकं च यस्यान्ते सर्वजित् तेन चोच्यते॥ २४॥
‘जो उस यज्ञका अनुष्ठान करता है, वह ‘दर्वीहोम’ (अग्निहोत्र आदि)-से लेकर समस्त यज्ञोंके फलको प्राप्त कर लेता है एवं यज्ञके अन्तमें जो अभिषेक होता है, उससे वह यज्ञकर्ता नरेश ‘सर्वजित् सम्राट्’ कहलाने लगता है॥ २४॥
समर्थोऽसि महाबाहो सर्वे ते वशगा वयम्।
अचिरात् त्वं महाराज राजसूयमवाप्स्यसि॥ २५॥
‘महाबाहो! आप उस यज्ञके सम्पादनमें समर्थ हैं। हम सब लोग आपकी आज्ञाके अधीन हैं। महाराज! आप शीघ्र ही राजसूययज्ञ पूर्ण कर सकेंगे॥ २५॥
अविचार्य महाराज राजसूये मनः कुरु।
इत्येवं सुहृदः सर्वे पृथक् च सह चाब्रुवन्॥ २६॥
‘अतः किसी प्रकारका सोच-विचार न करके आप राजसूयके अनुष्ठानमें मन लगाइये।’ इस प्रकार उनके सभी सुहृदोंने अलग-अलग और सम्मिलित होकर अपनी यही सम्मति प्रकट की॥ २६॥
स धर्म्यं पाण्डवस्तेषां वचः श्रुत्वा विशाम्पते।
धृष्टमिष्टं वरिष्ठं च जग्राह मनसारिहा॥ २७॥
प्रजानाथ! शत्रुसूदन पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरने उनका यह साहसपूर्ण, प्रिय एवं श्रेष्ठ वचन सुनकर उसे मन-ही-मन ग्रहण किया॥ २७॥
श्रुत्वा सुहृद्वचस्तच्च जानंश्चाप्यात्मनः क्षमम्।
पुनः पुनर्मनो दध्रे राजसूयाय भारत॥ २८॥
भारत! उन्होंने सुहृदोंका वह सम्मतिसूचक वचन सुनकर तथा यह भी जानते हुए कि राजसूययज्ञ अपने लिये साध्य है, उसके विषयमें बारम्बार मन-ही-मन विचार किया॥ २८॥
स भ्रातृभिः पुनर्धीमानृत्विग्भिश्च महात्मभिः।
मन्त्रिभिश्चापि सहितो धर्मराजो युधिष्ठिरः।
धौम्यद्वैपायनाद्यैश्च मन्त्रयामास मन्त्रवित्॥ २९॥
फिर मन्त्रणाका महत्त्व जाननेवाले बुद्धिमान् धर्मराज युधिष्ठिर अपने भाइयों, महात्मा ऋत्विजों, मन्त्रियों तथा धौम्य एवं व्यास आदि महर्षियोंके साथ इस विषयपर पुनः विचार करने लगे॥ २९॥
युधिष्ठिर उवाच
इयं या राजसूयस्य सम्राडर्हस्य सुक्रतोः।
श्रद्दधानस्य वदतः स्पृहा मे सा कथं भवेत्॥ ३०॥
**युधिष्ठिरने कहा—**महात्माओ! राजसूय नामक उत्तम यज्ञ किसी सम्राट्के ही योग्य है, तो भी मैं उसके प्रति श्रद्धा रखने लगा हूँ; अतः आपलोग बताइये, मेरे मनमें जो यह राजसूययज्ञ करनेकी अभिलाषा हुई है, कैसी है?॥ ३०॥
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्तास्तु ते तेन राज्ञा राजीवलोचन।
इदमूचुर्वचः काले धर्मराजं युधिष्ठिरम्॥ ३१॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**कमलनयन जनमेजय! राजाके इस प्रकार पूछनेपर वे सब लोग उस समय धर्मराज युधिष्ठिरसे यों बोले—॥ ३१॥
अर्हस्त्वमसि धर्मज्ञ राजसूयं महाक्रतुम्।
अथैवमुक्ते नृपतावृत्विग्भिर्ऋषिभिस्तथा॥ ३२॥
मन्त्रिणो भ्रातरश्चान्ये तद्वचः प्रत्यपूजयन्।
‘धर्मज्ञ! आप राजसूय महायज्ञ करनेके सर्वथा योग्य हैं।’ ऋत्विजों तथा महर्षियोंने जब राजा युधिष्ठिरसे इस प्रकार कहा, तब उनके मन्त्रियों और भाइयोंने उन महात्माओंके वचनका बड़ा आदर किया ।। ३२१/२ ।।
स तु राजा महाप्राज्ञः पुनरेवात्मनाऽऽत्मवान् ।। ३३ ।। भूयो विममृशे पार्थो लोकानां हितकाम्यया । सामर्थ्ययोगं सम्प्रेक्ष्य देशकालौ व्ययागमौ ।। ३४ ।। विमृश्य सम्यक् च धिया कुर्वन् प्राज्ञो न सीदति । न हि यज्ञसमारम्भः केवल आत्मविनिश्चयात् ।। ३५ ।। भवतीति समाज्ञाय यत्नतः कार्यमुद्वहन् । स निश्चयार्थं कार्यस्य कृष्णमेव जनार्दनम् ।। ३६ ।। सर्वलोकात् परं मत्वा जगाम मनसा हरिम् । अप्रमेयं महाबाहुं कामाज्जातमजं नृषु ।। ३७ ।।
तदनन्तर मनको वशमें रखनेवाले महाबुद्धिमान् राजा युधिष्ठिरने सम्पूर्ण लोकोंके हितकी इच्छासे पुनः इस विषयपर मन-ही-मन विचार किया—‘जो बुद्धिमान् अपनी शक्ति और साधनोंको देखकर तथा देश, काल, आय और व्ययको बुद्धिके द्वारा भलीभाँति समझ करके कार्य आरम्भ करता है, वह कष्टमें नहीं पड़ता। केवल अपने ही निश्चयसे यज्ञका आरम्भ नहीं किया जाता।’ ऐसा समझकर यत्नपूर्वक कार्यभार वहन करनेवाले युधिष्ठिरने उस कार्यके विषयमें पूर्ण निश्चय करनेके लिये जनार्दन भगवान् श्रीकृष्णको ही सब लोगोंसे उत्तम माना और वे मन-ही-मन उन अप्रमेय महाबाहु श्रीहरिकी शरणमें गये, जो अजन्मा होते हुए भी धर्म एवं साधु पुरुषोंकी रक्षा आदिकी इच्छासे मनुष्यलोकमें अवतीर्ण हुए थे ।। ३३-३७ ।।
पाण्डवस्तर्कयामास कर्मभिर्देवसम्मतैः । नास्य किंचिदविज्ञातं नास्य किंचिदकर्मजम् ।। ३८ ।।
पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरने श्रीकृष्णके देवपूजित अलौकिक कर्मोंद्वारा यह अनुमान किया कि श्रीकृष्णके लिये कुछ भी अज्ञात नहीं है तथा कोई भी ऐसा कार्य नहीं है, जिसे वे कर न सकें ।। ३८ ।।
न स किंचिन्न विषहेदिति कृष्णममन्यत । स तु तां नैष्ठिकीं बुद्धिं कृत्वा पार्थो युधिष्ठिरः ।। ३९ ।। गुरुवद् भूतगुरवे प्राहिणोद् दूतमञ्जसा । शीघ्रगेन रथेनाशु स दूतः प्राप्य यादवान् ।। ४० ।। द्वारकावासिनं कृष्णं द्वारवत्यां समासदत् ।
उनके लिये कुछ भी असह्य नहीं है। इस तरह उन्होंने उन्हें सर्वशक्तिमान् एवं सर्वज्ञ माना। ऐसी निश्चयात्मक बुद्धि करके कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरने गुरुजनोंके प्रति निवेदन करनेकी भाँति समस्त प्राणियोंके गुरु श्रीकृष्णके पास शीघ्र ही एक दूत भेजा। वह दूत शीघ्रगामी रथके द्वारा तुरंत यादवोंके यहाँ पहुँचकर द्वारकावासी श्रीकृष्णसे द्वारकामें ही मिला ।। ३९-४० १/३ ।।
(स प्रह्वः प्राञ्जलिर्भूत्वा व्यज्ञापयत माधवम् ।।
उसने विनयपूर्वक हाथ जोड़ भगवान् श्रीकृष्णसे इस प्रकार निवेदन किया।
दूत उवाच
धर्मराजो हृषीकेश धौम्यव्यासादिभिः सह ।
पाञ्चालमात्स्यसहितैर्भ्रातृभिश्चैव सर्वशः ।।
त्वद्दर्शनं महाबाहो काङ्क्षते स युधिष्ठिरः ।
दूतने कहा—महाबाहु हृषीकेश! धर्मराज युधिष्ठिर धौम्य एवं व्यास आदि महर्षियों, द्रुपद और विराट आदि नरेशों तथा अपने समस्त भाइयोंके साथ आपका दर्शन करना चाहते हैं।
वैशम्पायन उवाच
इन्द्रसेनवचः श्रुत्वा यादवप्रवरो बली ।)
दर्शनाकाङ्क्षिणं पार्थं दर्शनाकाङ्क्षयाच्युतः ।। ४१ ।।
इन्द्रसेनेन सहित इन्द्रप्रस्थमगात् तदा ।
वैशम्पायनजी कहते हैं—दूत इन्द्रसेनकी यह बात सुनकर यदुवंशशिरोमणि महाबली भगवान् श्रीकृष्ण दर्शनाभिलाषी युधिष्ठिरके पास स्वयं भी उनके दर्शनकी अभिलाषासे दूत इन्द्रसेनके साथ इन्द्रप्रस्थ नगरमें आये ।। ४१ १/३ ।।
व्यतीत्य विविधान् देशांस्त्वरावान् क्षिप्रवाहनः ।। ४२ ।।
मार्गमें अनेक देशोंको लाँघते हुए वे बड़ी उतावलीके साथ आगे बढ़ रहे थे। उनके रथके घोड़े बहुत तेज चलनेवाले थे ।। ४२ ।।
इन्द्रप्रस्थगतं पार्थमभ्यगच्छज्जनार्दनः ।
स गृहे पितृवद् भ्रात्रा धर्मराजेन पूजितः ।
भीमेन च ततोऽपश्यत् स्वसारं प्रीतिमान् पितुः ।। ४३ ।।
भगवान् जनार्दन इन्द्रप्रस्थमें आकर राजा युधिष्ठिरसे मिले। फुफेरे भाई धर्मराज युधिष्ठिर तथा भीमसेनने अपने घरमें श्रीकृष्णका पिताकी भाँति पूजन किया। तत्पश्चात् श्रीकृष्ण अपनी बुआ कुन्तीसे प्रसन्नतापूर्वक मिले ।। ४३ ।।
प्रीत: प्रीतेन सुहृदा रेमे स सहितस्तदा ।
अर्जुनेन यमाभ्यां च गुरुवत् पर्युपासितः ।। ४४ ।।
तदनन्तर प्रेमी सुहृद् अर्जुनसे मिलकर वे बहुत प्रसन्न हुए। फिर नकुल-सहदेवने गुरुकी भाँति उनकी सेवा-पूजा की॥ ४४॥ तं विश्रान्तं शुभे देशे क्षणिनं कल्पमच्युतम् । धर्मराजः समागम्याज्ञापयत् स्वप्रयोजनम् ॥ ४५ ॥ इसके बाद उन्होंने एक उत्तम भवनमें विश्राम किया। थोड़ी देर बाद जब वे मिलनेके योग्य हुए और इसके लिये उन्होंने अवसर निकाल लिया, तब धर्मराज युधिष्ठिरने आकर उनसे अपना सारा प्रयोजन बतलाया ॥ ४५ ॥
युधिष्ठिर उवाच
प्रार्थितो राजसूयो मे न चासौ केवलिप्सया । प्राप्यते येन तत् ते हि विदितं कृष्ण सर्वशः ॥ ४६ ॥ युधिष्ठिर बोले—श्रीकृष्ण! मैं राजसूययज्ञ करना चाहता हूँ; परंतु वह केवल चाहनेभरसे ही पूरा नहीं हो सकता। जिस उपायसे उस यज्ञकी पूर्ति हो सकती है, वह सब आपको ही ज्ञात है॥ ४६॥ यस्मिन् सर्वं सम्भवति यश्च सर्वत्र पूज्यते । यश्च सर्वेश्वरो राजा राजसूयं स विन्दति ॥ ४७ ॥ जिसमें सब कुछ सम्भव है अर्थात् जो सब कुछ कर सकता है, जिसकी सर्वत्र पूजा होती है तथा जो सर्वेश्वर होता है, वही राजा राजसूययज्ञ सम्पन्न कर सकता है॥ ४७॥ तं राजसूयं सुहृदः कार्यमाहुः समेत्य मे । तत्र मे निश्चिततमं तव कृष्ण गिरा भवेत् ॥ ४८ ॥ मेरे सब सुहृद् एकत्र होकर मुझसे वही राजसूययज्ञ करनेके लिये कहते हैं; परंतु इसके विषयमें अन्तिम निश्चय तो आपके कहनेसे ही होगा ॥ ४८ ॥ केचिद्धि सौहृदादेव न दोषं परिचक्षते । स्वार्थहेतोस्तथैवान्ये प्रियमैव वदन्त्युत ॥ ४९ ॥ कुछ लोग प्रेम-सम्बन्धके नाते ही मेरे दोषों या त्रुटियोंको नहीं बताते हैं। दूसरे लोग स्वार्थवश वही बात कहते हैं, जो मुझे प्रिय लगे ॥ ४९ ॥ प्रियमेव परीप्सन्ते केचिदात्मनि यद्धितम् । एवंप्रायाश्च दृश्यन्ते जनवादाः प्रयोजने ॥ ५० ॥ कुछ लोग जो अपने लिये हितकर है, उसीको मेरे लिये भी प्रिय एवं हितकर समझ बैठते हैं। इस प्रकार अपने-अपने प्रयोजनको लेकर प्रायः लोगोंकी भिन्न-भिन्न बातें देखी जाती हैं॥ ५० ॥ त्वं तु हेतूनतीत्यैतान् कामक्रोधौ व्युदस्य च । परमं यत् क्षमं लोके यथावद् वक्तुमर्हसि ॥ ५१ ॥
परंतु आप उपर्युक्त सभी हेतुओंसे एवं काम-क्रोधसे रहित होकर (अपने स्वरूपमें स्थित हैं। अतः) इस लोकमें मेरे लिये जो उत्तम एवं करनेयोग्य हो, उसको ठीक-ठीक बतानेकी कृपा करें।। ५१ ।।
इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि राजसूयारम्भपर्वणि वासुदेवागमने त्रयोदशोऽध्यायः ।। १३ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत राजसूयारम्भपर्वमें वासुदेवागमनविषयक तेरहवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १३ ।।
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ १/३ श्लोक मिलाकर कुल ५३ १/३ श्लोक हैं)
अध्याय (पृष्ठ 1698)
चतुर्दशोऽध्यायः
श्रीकृष्णकी राजसूययज्ञके लिये सम्मति
श्रीकृष्ण उवाच
सर्वैर्गुणैर्महाराज राजसूयं त्वमर्हसि ।
जानतस्त्वेव ते सर्वं किंचिद् वक्ष्यामि भारत ॥ १ ॥
**श्रीकृष्णने कहा—**महाराज! आपमें सभी सद्गुण विद्यमान हैं; अतः आप राजसूययज्ञ करनेके लिये योग्य हैं। भारत! आप सब कुछ जानते हैं, तो भी आपके पूछनेपर मैं इस विषयमें कुछ निवेदन करता हूँ ॥ १ ॥
जामदग्न्येन रामेण क्षत्रं यदवशेषितम् ।
तस्मादवरजं लोके यदिदं क्षत्रसंज्ञितम् ॥ २ ॥
जमदग्निनन्दन परशुरामने पूर्वकालमें जब क्षत्रियोंका संहार किया था, उस समय लुक-छिपकर जो क्षत्रिय शेष रह गये, वे पूर्ववर्ती क्षत्रियोंकी अपेक्षा निम्नकोटिके हैं। इस प्रकार इस समय संसारमें नाम-मात्रके क्षत्रिय रह गये हैं ॥ २ ॥
कृतोऽयं कुलसंकल्पः क्षत्रियैर्वसुधाधिप ।
निदेशवाग्भिस्तत् ते ह विदितं भरतर्षभ ॥ ३ ॥
पृथ्वीपते! इन क्षत्रियोंने पूर्वजोंके कथनानुसार सामूहिकरूपसे यह नियम बना लिया है कि हममेंसे जो समस्त क्षत्रियोंको जीत लेगा, वही सम्राट् होगा। भरतश्रेष्ठ! यह बात
आपको भी मालूम ही होगी ॥ ३ ॥
ऐलस्येक्ष्वाकुवंशस्य प्रकृतिं परिचक्षते ।
राजानः श्रेणिबद्धाश्च तथान्ये क्षत्रिया भुवि ॥ ४ ॥
इस समय श्रेणिबद्ध (सब-के-सब) राजा तथा भूमण्डलके दूसरे क्षत्रिय भी अपनेको सम्राट् पुरूरवा तथा इक्ष्वाकुकी संतान कहते हैं ॥ ४ ॥
ऐलवंशाश्च ये राजंस्तथैवेक्ष्वाकवो नृपाः ।
तानि चैकशतं विद्धि कुलानि भरतर्षभ ॥ ५ ॥
भरतश्रेष्ठ राजन्! पुरूरवा तथा इक्ष्वाकुके वंशमें जो नरेश आजकल हैं, उनके एक सौ कुल विद्यमान हैं; यह बात आप अच्छी तरह जान लें ॥ ५ ॥
ययातेस्त्वेव भोजानां विस्तरो गुणतो महान् ।
भजतेऽद्य महाराज विस्तरं स चतुर्दिशम् ॥ ६ ॥
तेषां तथैव तां लक्ष्मीं सर्वक्षत्रमुपासते ।
महाराज! आजकल राजा ययातिके कुलमें गुणकी दृष्टिसे भोजवंशियोंका ही अधिक विस्तार हुआ है। भोजवंशी बढ़कर चारों दिशाओंमें फैल गये हैं तथा आजके सभी क्षत्रिय उन्हींकी धन-सम्पत्तिका आश्रय ले रहे हैं ॥ ६ १/२ ॥
इदानीमेव वै राजन् जरासंधो महीपतिः ॥ ७ ॥
अभिभूय श्रियं तेषां कुलानामाभिषेचितः ।
स्थितो मूर्ध्नि नरेन्द्रणामोजसाऽऽक्रम्य सर्वशः ॥ ८ ॥
राजन्! अभी-अभी भूपाल जरासंध उन समस्त क्षत्रियकुलोंकी राजलक्ष्मीको लाँघकर राजाओंद्वारा सम्राट्के पदपर अभिषिक्त हुआ है और वह अपने बल-पराक्रमसे सबपर आक्रमण करके समस्त राजाओंका सिरमौर हो रहा है ॥ ७-८ ॥
सोऽवनिं मध्यमां भुक्त्वा मिथोभेदममन्यत ।
प्रभुर्यस्तु परो राजा यस्मिन्नेकवशे जगत् ॥ ९ ॥
जरासंध मध्यभूमिका उपभोग करते हुए समस्त राजाओंमें परस्पर फूट डालनेकी नीतिको पसंद करता है। इस समय वही सबसे प्रबल एवं उत्कृष्ट राजा है। यह सारा जगत् एकमात्र उसीके वशमें है ॥ ९ ॥
स साम्राज्यं महाराज प्राप्तो भवति योगतः ।
तं स राजा जरासंधं संश्रित्य किल सर्वशः ॥ १० ॥
राजन् सेनापतिर्जातः शिशुपालः प्रतापवान् ।
महाराज! वह अपनी राजनीतिक युक्तियोंसे इस समय सम्राट् बन बैठा है। राजन्! कहते हैं, प्रतापी राजा शिशुपाल सब प्रकारसे जरासंधका आश्रय लेकर ही उसका प्रधान सेनापति हो गया है ॥ १० १/२ ॥
तमेव च महाराज शिष्यवत् समुपस्थितः ॥ ११ ॥
वक्रः करूषाधिपतिर्मायायोधी महाबलः ।
युधिष्ठिर! मायायुद्ध करनेवाला महाबली करूषराज दन्तवक्र भी जरासंधके सामने शिष्यकी भाँति हाथ जोड़े खड़ा रहता है ।। ११ १/२ ।।
अपरौ च महावीर्यौ महात्मानौ समाश्रितौ ।। १२ ।।
जरासंधं महावीर्यं तौ हंसडिम्भकावुभौ ।
विशालकाय अन्य दो महापराक्रमी योद्धा सुप्रसिद्ध हंस और डिम्भक भी महाबली जरासंधकी शरण ले चुके थे ।। १२ १/२ ।।
दन्तवक्रः करूषश्च करभो मेघवाहनः ।
मूर्ध्ना दिव्यमणिं बिभ्रद् यमद्भुतमणिं विदुः ।। १३ ।।
करूषदेशका राजा दन्तवक्र, करभ और मेघवाहन—ये सभी सिरपर दिव्य मणिमय मुकुट धारण करते हुए भी जरासंधको अपने मस्तककी अद्भुत मणि मानते हैं (अर्थात् उसके चरणोंमें सिर झुकाते रहते हैं) ।। १३ ।।
मुरं च नरकं चैव शास्ति यो यवनाधिपः ।
अपर्यन्तबलो राजा प्रतीच्यां वरुणो यथा ।। १४ ।।
भगदत्तो महाराज वृद्धस्तव पितुः सखा ।
स वाचा प्रणतस्तस्य कर्मणा च विशेषतः ।। १५ ।।
स्नेहबद्धश्च मनसा पितृवद् भक्तिमांस्त्वयि ।
महाराज! जो मुर और नरक नामक देशका शासन करते हैं, जिनकी सेना अनन्त है, जो वरुणके समान पश्चिम दिशाके अधिपति कहे जाते हैं, जिनकी वृद्धावस्था हो चली है तथा जो आपके पिताके मित्र रहे हैं, वे यवनाधिपति राजा भगदत्त भी वाणी तथा क्रियाद्वारा भी जरासंधके सामने विशेषरूपसे नतमस्तक रहते हैं; फिर वे मन-ही-मन तुम्हारे स्नेहपाशमें बँधे हैं और जैसे पिता अपने पुत्रपर प्रेम रखता है, वैसे ही उनका तुम्हारे ऊपर वात्सल्यभाव बना हुआ है ।। १४-१५ १/२ ।।
प्रतीच्यां दक्षिणं चान्तं पृथिव्याः प्रति यो नृपः ।। १६ ।।
मातुलो भवतः शूरः पुरुजित् कुन्तिवर्धनः ।
स ते सन्नतिमानेकः स्नेहतः शत्रुसूदनः ।। १७ ।।
जो भारतभूमिके पश्चिमसे लेकर दक्षिणतकके भागपर शासन करते हैं, आपके मामा वे शत्रुसंहारक शूरवीर कुन्तिभोजकुलवर्द्धक पुरुजित् अकेले ही स्नेहवश आपके प्रति प्रेम और आदरका भाव रखते हैं ।। १६-१७ ।।
जरासंधं गतस्त्वेव पुरा यो न मया हतः ।
पुरुषोत्तमविज्ञातो योऽसौ चेदिषु दुर्मतिः ।। १८ ।।
आत्मानं प्रतिजानाति लोकेऽस्मिन् पुरुषोत्तमम् ।
आदत्ते सततं मोहाद् यः स चिह्नं च मामकम् ।। १९ ।।
वङ्गपुण्ड्रकिरातेषु राजा बलसमन्वितः । पौण्ड्रको वासुदेवेति योऽसौ लोकेऽभिविश्रुतः ॥ २० ॥ जिसे मैंने पहले मारा नहीं, उपेक्षावश छोड़ रखा है, जिसकी बुद्धि बड़ी खोटी है, जो चेदिदेशमें पुरुषोत्तम समझा जाता है, इस जगत्में जो अपने-आपको पुरुषोतम ही कहकर बताया करता है और मोहवश सदा मेरे शंख-चक्र आदि चिह्नोंको धारण करता है; वंग, पुण्ड्र तथा किरातदेशका जो राजा है तथा लोकमें वासुदेवके नामसे जिसकी प्रसिद्धि हो रही है, वह बलवान् राजा पौण्ड्रक भी जरासंधसे ही मिला हुआ है ॥ १८—२० ॥
चतुर्थभाग् महाराज भोज इन्द्रसखो बली । विद्याबलाद् यो व्यजयत् सपाण्ड्यक्रथकैशिकान् ॥ २१ ॥ भ्राता यस्याकृतिः शूरो जामदग्न्यसमोऽभवत् । स भक्तो मागधं राजा भीष्मकः परवीरहा ॥ २२ ॥ राजन्! जो पृथ्वीके एक चौथाई भागके स्वामी हैं, इन्द्रके सखा हैं, बलवान् हैं, जिन्होंने अस्त्र-विद्याके बलसे पाण्ड्य, क्रथ और कैशिक देशोंपर विजय पायी है, जिनका भाई आकृति जमदग्निनन्दन परशुरामके समान शौर्यसम्पन्न है, वे भोजवंशी शत्रुहन्ता राजा भीष्मक (मेरे श्वशुर होते हुए) भी मगधराज जरासंधके भक्त हैं ॥ २१-२२ ॥
प्रियाण्याचरतः प्रह्वान् सदा सम्बन्धिनस्ततः । भजतो न भजत्यस्मानप्रियेषु व्यवस्थितः ॥ २३ ॥ हम सदा उनका प्रिय करते रहते हैं, उनके प्रति नम्रता दिखाते हैं और उनके सगे-सम्बन्धी हैं; तो भी वे हम-जैसे अपने भक्तोंको तो नहीं अपनाते हैं और हमारे शत्रुओंसे मिलते-जुलते हैं ॥ २३ ॥
न कुलं स बलं राजन्नभ्यजानात् तथाऽऽत्मनः । पश्यमानो यशो दीप्तं जरासंधमुपस्थितः ॥ २४ ॥ राजन्! वे अपने बल और कुलकी ओर भी ध्यान नहीं देते, केवल जरासंधके उज्ज्वल यशकी ओर देखकर उसके आश्रित बन गये हैं ॥ २४ ॥
उदीच्याश्च तथा भोजाः कुलान्यष्टादश प्रभो । जरासंधभयादेव प्रतीचीं दिशमास्थिताः ॥ २५ ॥ प्रभो! इसी प्रकार उत्तर दिशामें निवास करनेवाले भोजवंशियोंके अठारह कुल जरासंधके ही भयसे भागकर पश्चिम दिशामें रहने लगे हैं ॥ २५ ॥
शूरसेना भद्रकारा बोधाः शाल्वाः पटच्चराः । सुस्थलाश्च सुकुट्टाश्च कुलिन्दाः कुन्तिभिः सह ॥ २६ ॥ शाल्वायनाश्च राजानः सोदर्यानुचरैः सह । दक्षिणा ये च पञ्चालाः पूर्वाः कुन्तिषु कोशलाः ॥ २७ ॥ तथोत्तरां दिशं चापि परित्यज्य भयार्दिताः ।
मत्स्याः संन्यस्तपादाश्च दक्षिणां दिशमाश्रिताः ॥ २८ ॥ शूरसेन, भद्रकार, बोध, शाल्व, पटच्चर, सुस्थल, सुकुट्ट, कुलिन्द, कुन्ति तथा शाल्वायन आदि राजा भी अपने भाइयों तथा सेवकोंके साथ दक्षिण दिशामें भाग गये हैं। जो लोग दक्षिण पंचाल एवं पूर्वी कुन्तिप्रदेशमें रहते थे, वे सभी क्षत्रिय तथा कोशल, मत्स्य, संन्यस्तपाद आदि राजपूत भी जरासंधके भयसे पीड़ित हो उत्तर दिशाको छोड़कर दक्षिण दिशाका ही आश्रय ले चुके हैं ॥ २६—२८ ॥
तथैव सर्वपञ्चाला जरासंधभयार्दिताः । स्वराज्यं सम्परित्यज्य विद्रुताः सर्वतो दिशम् ॥ २९ ॥ उसी प्रकार समस्त पंचालदेशीय क्षत्रिय जरासंधके भयसे दुःखी हो अपना राज्य छोड़कर चारों दिशाओंमें भाग गये हैं ॥ २९ ॥
कस्यचित् त्वथ कालस्य कंसो निर्मथ्य यादवान् । बार्हद्रथसुते देव्यावुपागच्छद् वृथामतिः ॥ ३० ॥ कुछ समय पहलेकी बात है, व्यर्थ बुद्धिवाले कंसने समस्त यादवोंको कुचलकर जरासंधकी दो पुत्रियोंके साथ विवाह किया ॥ ३० ॥
अस्तिः प्राप्तिश्च नाम्ना ते सहदेवानुजेऽबले । बलेन तेन स्वज्ञातीनभिभूय वृथामतिः ॥ ३१ ॥ श्रैष्ठ्यं प्राप्तः स तस्यासीदतीवापनयो महान् । उनके नाम थे अस्ति और प्राप्ति। वे दोनों अबलाएँ सहदेवकी छोटी बहिनें थीं। निःसार बुद्धिवाला कंस जरासंधके ही बलसे अपने जाति-भाइयोंको अपमानित करके सबका प्रधान बन बैठा था। यह उसका बहुत बड़ा अत्याचार था ॥ ३१ १/२ ॥
भोजराजन्यवृद्धैश्च पीड्यमानैर्दुरात्मना ॥ ३२ ॥ ज्ञातित्राणमभीप्सद्भिरस्मत्सम्भावना कृता । उस दुरात्मासे पीड़ित हो भोजराजवंशके बड़े-बूढ़े लोगोंने जाति-भाइयोंकी रक्षाके लिये हमसे प्रार्थना की ॥ ३२ १/२ ॥
दत्त्वाक्रूराय सुतनुं तामाहुकसुतां तदा ॥ ३३ ॥ संकर्षणद्वितीयेन ज्ञातिकार्यं मया कृतम् । हतौ कंससुनामानौ मया रामेण चाप्युत ॥ ३४ ॥ तब मैंने आहुककी पुत्री सुतनुका विवाह अक्रूरसे करा दिया और बलरामजीको साथी बनाकर जाति-भाइयोंका कार्य सिद्ध किया। मैंने और बलरामजीने कंस और सुनामाको मार डाला ॥ ३३-३४ ॥
भये तु समतिक्रान्ते जरासंधे समुद्यते । मन्त्रोऽयं मन्त्रितो राजन् कुलैरष्टादशावरैः ॥ ३५ ॥
इससे कंसका भय तो जाता रहा; परंतु जरासंध कुपित हो हमसे बदला लेनेको उद्यत हो गया। राजन्! उस समय भोजवंशके अठारह कुलों (मन्त्री-पुरोहित आदि)-ने मिलकर इस प्रकार विचार-विमर्श किया— ॥ ३५ ॥ अनारभन्तो निघ्नन्तो महास्त्रैः शत्रुघातिभिः । न हन्यामो वयं तस्य त्रिभिर्वर्षशतैर्बलम् ॥ ३६ ॥ 'यदि हमलोग शत्रुओंका अन्त करनेवाले बड़े-बड़े अस्त्रोंद्वारा निरन्तर आघात करते रहें, तो भी तीन सौ वर्षोंमें भी उसकी सेनाका नाश नहीं कर सकते ॥ ३६ ॥ तस्य ह्यमरसंकाशौ बलेन बलिनां वरौ । नामभ्यां हंसडिम्भकावशस्त्रनिधनावुभौ ॥ ३७ ॥ 'क्योंकि बलवानोंमें श्रेष्ठ हंस और डिम्भक उसके सहायक हैं, जो बलमें देवताओंके समान हैं। उन दोनोंको यह वरदान प्राप्त है कि वे किसी अस्त्र-शस्त्रसे नहीं मारे जा सकते' ॥ ३७ ॥ तावुभौ सहितौ वीरौ जरासंधश्च वीर्यवान् । त्रयस्त्रयाणां लोकानां पर्याप्ता इति मे मतिः ॥ ३८ ॥ भैया युधिष्ठिर! मेरा तो ऐसा विश्वास है कि एक साथ रहनेवाले वे दोनों वीर हंस और डिम्भक तथा पराक्रमी जरासंध—ये तीनों मिलकर तीनों लोकोंका सामना करनेके लिये पर्याप्त थे ॥ ३८ ॥ न हि केवलमस्माकं यावन्तोऽन्ये च पार्थिवाः । तथैव तेषामासीच्च बुद्धिर्बुद्धिमतां वर ॥ ३९ ॥ बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ नरेश! यह केवल मेरा ही मत नहीं है, दूसरे भी जितने भूमिपाल हैं, उन सबका यही विचार रहा है ॥ ३९ ॥ अथ हंस इति ख्यातः कश्चिदासीन्महान् नृपः । रामेण स हतस्तत्र संग्रामेऽष्टादशावरे ॥ ४० ॥ जरासंधके साथ जब सत्रहवीं बार युद्ध हो रहा था, उसमें हंस नामसे प्रसिद्ध कोई दूसरा राजा भी लड़ने आया था, वह उस युद्धमें बलरामजीके हाथसे मारा गया ॥ ४० ॥ हतो हंस इति प्रोक्तमथ केनापि भारत । तच्छ्रुत्वा डिम्भको राजन् यमुनाम्भस्यमज्जत ॥ ४१ ॥ भारत! यह देख किसी सैनिकने चिल्लाकर कहा—'हंस मारा गया।' राजन्! उसकी वह बात कानमें पड़ते ही डिम्भक अपने भाईको मरा हुआ जान यमुनाजीमें कूद पड़ा ॥ ४१ ॥ विना हंसेन लोकेऽस्मिन् नाहं जीवितुमुत्सहे । इत्येतां मतिमास्थाय डिम्भको निधनं गतः ॥ ४२ ॥
'मैं हंसके बिना इस संसारमें जीवित नहीं रह सकता।' ऐसा निश्चय करके डिम्भकने अपनी जान दे दी ॥ ४२ ॥ तथा तु डिम्भकं श्रुत्वा हंसः परपुरंजयः । प्रपेदे यमुनामेव सोऽपि तस्यां न्यमज्जत ॥ ४३ ॥ डिम्भककी इस प्रकार मृत्यु हुई सुनकर शत्रु-नगरीको जीतनेवाला हंस भी भाईके शोकसे यमुनामें ही कूद पड़ा और उसीमें डूबकर मर गया ॥ ४३ ॥ तौ स राजा जरासंधः श्रुत्वा च निधनं गतौ । पुरं शून्येन मनसा प्रययौ भरतर्षभ ॥ ४४ ॥ भरतश्रेष्ठ! उन दोनोंकी मृत्यु हुई सुनकर राजा जरासंध हताश हो गया और उत्साहशून्य हृदयसे अपनी राजधानीको लौट गया ॥ ४४ ॥ ततो वयममित्रघ्न तस्मिन् प्रतिगते नृपे । पुनरानन्दिनः सर्वे मथुरायां वसामहे ॥ ४५ ॥ शत्रुसूदन! उसके इस प्रकार लौट जानेपर हम सब लोग पुनः मथुरामें आनन्दपूर्वक रहने लगे ॥ ४५ ॥ यदा त्वभ्येत्य पितरं सा वै राजीवलोचना । कंसभार्या जरासंधं दुहिता मागधं नृपम् । चोदयत्येव राजेन्द्र पतिव्यसनदुःखिता ॥ ४६ ॥ पतिघ्नं मे जहीत्येवं पुनः पुनररिंदम । शत्रुदमन राजेन्द्र! फिर जब पतिके शोकसे पीड़ित हुई कंसकी कमललोचना भार्या अपने पिता मगधनरेश जरासंधके पास जाकर उसे बार-बार उकसाने लगी कि मेरे पतिके घातकको मार डालो ॥ ४६ १/२ ॥ ततो वयं महाराज तं मन्त्रं पूर्वमन्त्रितम् ॥ ४७ ॥ संस्मरन्तो विमनसो व्यपयाता नराधिप । तब हमलोग भी पहले की हुई गुप्त मन्त्रणाको स्मरण करके उदास हो गये। महाराज! फिर तो हम मथुरासे भाग खड़े हुए ॥ ४७ १/२ ॥ पृथक्त्वेन महाराज संक्षिप्य महतीं श्रियम् ॥ ४८ ॥ पलायामो भयात् तस्य ससुतज्ञातिबान्धवाः । इति संचिन्त्य सर्वे स्म प्रतीचीं दिशमाश्रिताः ॥ ४९ ॥ राजन्! उस समय हमने यही निश्चय किया कि 'यहाँकी विशाल सम्पत्तिको पृथक्-पृथक् बाँटकर थोड़ी-थोड़ी करके पुत्र एवं भाई-बन्धुओंके साथ शत्रुके भयसे भाग चलें।' ऐसा विचार करके हम सबने पश्चिम दिशाकी शरण ली ॥ ४८-४९ ॥ कुशस्थलीं पुरीं रम्यां रैवतेनोपशोभिताम् । ततो निवेशं तस्यां च कृतवन्तो वयं नृप ॥ ५० ॥
और राजन्! रैवतक पर्वतसे सुशोभित रमणीय कुशस्थली पुरीमें जाकर हमलोग निवास करने लगे ॥ ५० ॥ तथैव दुर्गसंस्कारं देवैरपि दुरासदम् । स्त्रियोऽपि यस्यां युध्येयुः किमु वृष्णिमहारथाः ॥ ५१ ॥ हमने कुशस्थली दुर्गकी ऐसी मरम्मत करायी कि देवताओंके लिये भी उसमें प्रवेश करना कठिन हो गया। अब तो उस दुर्गमें रहकर स्त्रियाँ भी युद्ध कर सकती हैं, फिर वृष्णिकुलके महारथियोंकी तो बात ही क्या है? ॥ ५१ ॥ तस्यां वयममित्रघ्न निवसामोऽकुतोभयाः । आलोच्य गिरिमुख्यं तं मागधं तीर्णमेव च ॥ ५२ ॥ माधवाः कुरुशार्दूल परां मुदमवाप्नुवन् । शत्रुसूदन! हमलोग द्वारकापुरीमें सब ओरसे निर्भय होकर रहते हैं। कुरुश्रेष्ठ! गिरिराज रैवतककी दुर्गमताका विचार करके अपनेको जरासंधके संकटसे पार हुआ मानकर हम सभी मधुवंशियोंको बड़ी प्रसन्नता प्राप्त हुई है ॥ ५२ १/२ ॥ एवं वयं जरासंधादभितः कृतकिल्बिषाः ॥ ५३ ॥ सामर्थ्यवन्तः सम्बन्धाद् गोमन्तं समुपाश्रिताः । राजन्! हम जरासंधके अपराधी हैं, अतः शक्तिशाली होते हुए भी जिस स्थानसे हमारा सम्बन्ध था, उसे छोड़कर गोमान् (रैवतक) पर्वतके आश्रयमें आ गये हैं ॥ ५३ १/२ ॥ त्रियोजनायतं सद्य त्रिस्कन्धं योजनावधि ॥ ५४ ॥ योजनान्ते शतद्वारं वीरविक्रमतोरणम् । अष्टादशावरैर्नद्धं क्षत्रियैर्युद्धदुर्मदैः ॥ ५५ ॥ रैवतककी दुर्गकी लम्बाई तीन योजनकी है। एक-एक योजनपर सेनाओंके तीन-तीन दलोंकी छावनी है। प्रत्येक योजनके अन्तमें सौ-सौ द्वार हैं, जो सेनाओंसे सुरक्षित हैं। वीरोंका पराक्रम ही उस गढ़का प्रधान फाटक है। युद्धमें उन्मत्त होकर पराक्रम दिखानेवाले अठारह यादववंशी क्षत्रियोंसे वह दुर्ग सुरक्षित है ॥ ५४-५५ ॥ अष्टादश सहस्राणि भ्रातॄणां सन्ति नः कुले । आहुकस्य शतं पुत्रा एकैकस्त्रिदशावरः ॥ ५६ ॥ हमारे कुलमें अठारह हजार भाई हैं। आहुकके सौ पुत्र हैं, जिनमेंसे एक-एक देवताओंके समान पराक्रमी हैं ॥ ५६ ॥ चारुदेष्णः सह भ्रात्रा चक्रदेवोऽथ सात्यकिः । अहं च रौहिणेयश्च साम्बः प्रद्युम्न एव च ॥ ५७ ॥ एवमतिरथाः सप्त राजन्नन्यान् निबोध मे । कृतवर्मा ह्यनाधृष्टिः समीकः समितिंजयः ॥ ५८ ॥ कङ्कः शङ्कुश्च कुन्तिश्च सप्तैते वै महारथाः ।
पुत्रौ चान्धकभोजस्य वृद्धो राजा च ते दश ॥ ५९ ॥
अपने भाईके साथ चारुदेष्ण, चक्रदेव, सात्यकि, मैं, बलरामजी, साम्ब और प्रद्युम्न—ये सात अतिरथी वीर हैं। राजन्! अब मुझसे दूसरोंका परिचय सुनिये। कृतवर्मा, अनाधृष्टि, समीक, समितिंजय, कंक, शंकु और कुन्ति—ये सात महारथी हैं। अन्धक भोजके दो पुत्र और बूढ़े राजा उग्रसेनको भी गिन लेनेपर उन महारथियोंकी संख्या दस हो जाती है ॥ ५७—५९ ॥
वज्रसंहनना वीरा वीर्यवन्तो महारथाः ।
स्मरन्तो मध्यमं देशं वृष्णिमध्ये व्यवस्थिताः ॥ ६० ॥
ये सभी वीर वज्रके समान सुदृढ़ शरीरवाले, पराक्रमी और महारथी हैं, जो मध्यदेशका स्मरण करते हुए वृष्णिकुलमें निवास करते हैं ॥ ६० ॥
(वितद्रुर्झल्लिबभ्रू च उद्धवोऽथ विदूरथः ।
वसुदेवोग्रसेनौ च सप्तैते मन्त्रिपुङ्गवाः ॥
प्रसेनजिच्च यमलो राजराजगुणान्वितः ।
स्यमन्तको मणैर्यस्य रुक्मं निस्रवते बहु ॥)
वितद्रु, झल्लि, बभ्रु, उद्धव, विदूरथ, वसुदेव तथा उग्रसेन—ये सात मुख्य मन्त्री हैं। प्रसेनजित् और सत्राजित्—ये दोनों जुड़वें बन्धु कुबेरोपम सद्गुणोंसे सुशोभित हैं। उनके पास जो 'स्यमन्तक' नामक मणि है, उससे प्रचुरमात्रामें सुवर्ण झरता रहता है।
स त्वं सम्राड्गुणैर्युक्तः सदा भरतसत्तम ।
क्षत्रे सम्राजमात्मानं कर्तुमर्हसि भारत ॥ ६१ ॥
भरतवंशशिरोमणे! आप सदा ही सम्राट्के गुणोंसे युक्त हैं। अतः भारत! आपको क्षत्रियसमाजमें अपनेको सम्राट् बना लेना चाहिये ॥ ६१ ॥
(दुर्योधनं शान्तनवं द्रोणं द्रौणायनिं कृपम् ।
कर्णं च शिशुपालं च रुक्मिणं च धनुर्धरम् ॥
एकलव्यं द्रुमं श्वेतं शैब्यं शकुनिमेव च ।
एतानजित्वा संग्रामे कथं शक्नोषि तं क्रतुम् ॥
अथैते गौरवेणैव न योत्स्यन्ति नराधिपाः ।)
दुर्योधन, भीष्म, द्रोण, अश्वत्थामा, कृपाचार्य, कर्ण, शिशुपाल, रुक्मी, धनुर्धर एकलव्य, द्रुम, श्वेत, शैब्य तथा शकुनि—इन सब वीरोंको संग्राममें जीते बिना आप कैसे वह यज्ञ कर सकते हैं? परंतु ये नरश्रेष्ठ आपका गौरव मानकर युद्ध नहीं करेंगे।
न तु शक्यं जरासंधे जीवमाने महाबले ।
राजसूयस्त्वयावाप्तुमेषा राजन् मतिर्मम ॥ ६२ ॥
किंतु राजन्! मेरी सम्मति यह है कि जबतक महाबली जरासंध जीवित है, तबतक आप राजसूययज्ञ पूर्ण नहीं कर सकते ॥ ६२ ॥
तेन रुद्धा हि राजानः सर्वे जित्वा गिरिव्रजे । कन्दरे पर्वतेन्द्रस्य सिंहेनेव महाद्विपाः ॥ ६३ ॥ उसने सब राजाओंको जीतकर गिरिव्रजमें इस प्रकार कैद कर रखा है, मानो सिंहने किसी महान् पर्वतकी गुफामें बड़े-बड़े गजराजोंको रोक रखा हो ॥ ६३ ॥
स हि राजा जरासंधो यियक्षुर्वसुधाधिपैः । महादेवं महात्मानमुमापतिमरिंदम ॥ ६४ ॥ आराध्य तपसोग्रेण निर्जितास्तेन पार्थिवाः । प्रतिज्ञायाश्च पारं स गतः पार्थिवसत्तम ॥ ६५ ॥ शत्रुदमन! राजा जरासंधने उमावल्लभ महात्मा महादेवजीकी उग्र तपस्याके द्वारा आराधना करके एक विशेष प्रकारकी शक्ति प्राप्त कर ली है; इसीलिये वे सभी राजा उससे परास्त हो गये हैं। वह राजाओंकी बलि देकर एक यज्ञ करना चाहता है। नृपश्रेष्ठ! वह अपनी प्रतिज्ञा प्रायः पूरी कर चुका है ॥ ६४-६५ ॥
स हि निर्जित्य निर्जित्य पार्थिवान् पृतनागतान् । पुरमानीय बद्ध्वा च चकार पुरुषव्रजम् ॥ ६६ ॥ क्योंकि उसने सेनाके साथ आये हुए राजाओंको एक-एक करके जीता है और अपनी राजधानीमें लाकर उन्हें कैद करके राजाओंका बहुत बड़ा समुदाय एकत्र कर लिया है ॥ ६६ ॥
वयं चैव महाराज जरासंधभयात् तदा । मथुरां सम्परित्यज्य गता द्वारवतीं पुरीम् ॥ ६७ ॥ महाराज! उस समय हम भी जरासंधके भयसे ही पीड़ित हो मथुराको छोड़कर द्वारकापुरीमें चले गये (और अबतक वहीं निवास करते हैं) ॥ ६७ ॥
यदि त्वेनं महाराज यज्ञं प्राप्तुमभीप्ससि । यतस्व तेषां मोक्षाय जरासंधवधाय च ॥ ६८ ॥ राजन्! यदि आप इस यज्ञको पूर्णरूपसे सम्पन्न करना चाहते हैं तो उन कैदी राजाओंको छुड़ाने और जरासंधको मारनेका प्रयत्न कीजिये ॥ ६८ ॥
समारम्भो न शक्योऽयमन्यथा कुरुनन्दन । राजसूयश्च कार्त्स्न्येन कर्तुं मतिमतां वर ॥ ६९ ॥ बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ कुरुनन्दन! ऐसा किये बिना राजसूययज्ञका आयोजन पूर्णरूपसे सफल न हो सकेगा ॥ ६९ ॥
(जरासंधवधोपायश्चिन्त्यतां भरतर्षभ । तस्मिन् जिते जितं सर्वं सकलं पार्थिवं बलम् ॥) भरतश्रेष्ठ! आप जरासंधके वधका उपाय सोचिये। उसके जीत लिये जानेपर समस्त भूपालोंकी सेनाओंपर विजय प्राप्त हो जायगी।
इत्येषा मे मती राजन् यथा वा मन्यसेऽनघ । एवंगते ममाचक्ष्व स्वयं निश्चित्य हेतुभिः ॥ ७० ॥ निष्पाप नरेश! मेरा मत तो यही है, फिर आप जैसा उचित समझें, करें। ऐसी दशामें स्वयं हेतु और युक्तियोंद्वारा कुछ निश्चय करके मुझे बताइये ॥ ७० ॥
इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि राजसूयारम्भपर्वणि कृष्णवाक्ये चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत राजसूयारम्भपर्वमें श्रीकृष्णवाक्य-विषयक चौदहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १४ ॥ (दाक्षिणात्य अधिक पाठके ५ १/३ श्लोक मिलाकर कुल ७५ १/३ श्लोक हैं)