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महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

अब मैं धर्मकी पत्नियोंके नाम बता रहा हूँ, सुनो—कीर्ति, लक्ष्मी, धृति, मेधा, पुष्टि, श्रद्धा, क्रिया, बुद्धि, लज्जा और मति—ये धर्मकी दस पत्नियाँ हैं। स्वयम्भू ब्रह्माजीने इन सबको धर्मका द्वार निश्चित किया है अर्थात् इनके द्वारा धर्ममें प्रवेश होता है ॥ १४-१५ ॥

सप्तविंशतिः सोमस्य पत्न्यो लोकस्य विश्रुताः । कालस्य नयने युक्ताः सोमपत्न्यः शुचिव्रताः ॥ १६ ॥ चन्द्रमाकी सत्ताईस स्त्रियाँ समस्त लोकोंमें विख्यात हैं। वे पवित्र व्रत धारण करनेवाली सोमपत्नियॉं काल-विभागका ज्ञापन करनेमें नियुक्त हैं ॥ १६ ॥

सर्वा नक्षत्रयोगिन्यो लोकयात्राविधानतः । पैतामहो मुनिर्देवस्तस्य पुत्रः प्रजापतिः । तस्याष्टौ वसवः पुत्रास्तेषां वक्ष्यामि विस्तरम् ॥ १७ ॥ धरो ध्रुवश्च सोमश्च अहश्चैवानिलोऽनलः । प्रत्यूषश्च प्रभासश्च वसवोऽष्टौ प्रकीर्तिताः ॥ १८ ॥ लोक-व्यवहारका निर्वाह करनेके लिये वे सब-की-सब नक्षत्र-वाचक नामोंसे युक्त हैं। पितामह ब्रह्माजीके स्तनसे उत्पन्न होनेके कारण मुनिवर धर्मदेव उनके पुत्र माने गये हैं। प्रजापति दक्ष भी ब्रह्माजीके ही पुत्र हैं। दक्षकी कन्याओंके गर्भसे धर्मके आठ पुत्र उत्पन्न हुए, जिन्हें वसुगण कहते हैं। अब मैं वसुओंका विस्तारपूर्वक परिचय देता हूँ। धर, ध्रुव, सोम, अह, अनिल, अनल, प्रत्यूष और प्रभास—ये आठ वसु कहे गये हैं ॥ १७-१८ ॥

धूम्नायास्तु धरः पुत्रो ब्रह्मविद्यो ध्रुवस्तथा । चन्द्रमास्तु मनस्विन्याः श्वासायाः श्वसनस्तथा ॥ १९ ॥ रतायाश्चाप्यहः पुत्रः शाण्डिल्याश्च हुताशनः । प्रत्यूषश्च प्रभासश्च प्रभातायाः सुतौ स्मृतौ ॥ २० ॥ धर और ब्रह्मवेत्ता ध्रुव धूम्राके पुत्र हैं। चन्द्रमा मनस्विनीके और अनिल श्वासाके पुत्र हैं। अह रताके और अनल शाण्डिलीके पुत्र हैं तथा प्रत्यूष और प्रभास ये दोनों प्रभाताके पुत्र बताये गये हैं ॥ १९-२० ॥

धरस्य पुत्रो द्रविणो हुतहव्यवहस्तथा । ध्रुवस्य पुत्रो भगवान् कालो लोकप्रकालनः ॥ २१ ॥ धरके दो पुत्र हुए—द्रविण तथा हुतहव्यवह। सब लोकोंको अपना ग्रास बनानेवाले भगवान् काल ध्रुवके पुत्र हैं ॥ २१ ॥

सोमस्य तु सुतो वर्चा वर्चस्वी येन जायते । मनोहरायाः शिशिरः प्राणोऽथ रमणस्तथा ॥ २२ ॥

सोमके मनोहरा नामक स्त्रीके गर्भसे प्रथम तो वर्चा नामक पुत्र हुआ, जिससे लोग वर्चस्वी (तेज, कान्ति और पराक्रमसे सम्पन्न) होते हैं, फिर शिशिर, प्राण तथा रमण नामक पुत्र उत्पन्न हुए ॥ २२ ॥

अह्नः सुतस्तथा ज्योतिः शमः शान्तस्तथा मुनिः ।
अग्नेः पुत्रः कुमारस्तु श्रीमाञ्छरवणालयः ॥ २३ ॥
अहके चार पुत्र हुए—ज्योति, शम, शान्त तथा मुनि। अनलके पुत्र श्रीमान् कुमार (स्कन्द) हुए, जिनका जन्मकालमें सरकंडोंके वनमें निवास था ॥ २३ ॥

तस्य शाखो विशाखश्च नैगमेयश्च पृष्ठजः ।
कृत्तिकाभ्युपपत्तेश्च कार्तिकेय इति स्मृतः ॥ २४ ॥
शाख, विशाख और नैगमेय*—ये तीनों कुमारके छोटे भाई हैं। छः कृत्तिकाओंको मातारूपमें स्वीकार कर लेनेके कारण कुमारका दूसरा नाम कार्तिकेय भी है ॥ २४ ॥

अनिलस्य शिवा भार्या तस्याः पुत्रो मनोजवः ।
अविज्ञातगतिश्चैव द्वौ पुत्रावनिलस्य तु ॥ २५ ॥
अनिलकी भार्याका नाम शिवा है। उसके दो पुत्र हैं—मनोजव तथा अविज्ञातगति। इस प्रकार अनिलके दो पुत्र कहे गये हैं ॥ २५ ॥

प्रत्युषस्य विदुः पुत्रमृषिं नाम्नाथ देवलम् ।
द्वौ पुत्रौ देवलस्यापि क्षमावन्तौ मनीषिणौ ।
बृहस्पतेस्तु भगिनी वरस्त्री ब्रह्मवादिनी ॥ २६ ॥
योगसक्ता जगत् कृत्स्नमसक्ता विचचार ह ।
प्रभासस्य तु भार्या सा वसूनामष्टमस्य ह ॥ २७ ॥
देवल नामक सुप्रसिद्ध मुनिको प्रत्यूषका पुत्र माना जाता है। देवलके भी दो पुत्र हुए। वे दोनों ही क्षमावान् और मनीषी थे। बृहस्पतिकी बहिन स्त्रियोंमें श्रेष्ठ एवं ब्रह्मवादिनी थीं। वे योगमें तत्पर हो सम्पूर्ण जगत्में अनासक्त भावसे विचरती रहीं। वे ही वसुओंमें आठवें वसु प्रभासकी धर्मपत्नी थीं ॥ २६-२७ ॥

विश्वकर्मा महाभागो जज्ञे शिल्पप्रजापतिः ।
कर्ता शिल्पसहस्राणां त्रिदशानां च वर्धकिः ॥ २८ ॥
शिल्पकर्मके ब्रह्मा महाभाग विश्वकर्मा उन्हींसे उत्पन्न हुए हैं। वे सहस्रों शिल्पोंके निर्माता तथा देवताओंके बढ़ई कहे जाते हैं ॥ २८ ॥

भूषणानां च सर्वेषां कर्ता शिल्पवतां वरः ।
यो दिव्यानि विमानानि त्रिदशानां चकार ह ॥ २९ ॥
वे सब प्रकारके भूषणोंको बनानेवाले और शिल्पियोंमें श्रेष्ठ हैं। उन्होंने देवताओंके असंख्य दिव्य विमान बनाये हैं ॥ २९ ॥

मनुष्याश्चोपजीवन्ति यस्य शिल्पं महात्मनः ।
पूजयन्ति च यं नित्यं विश्वकर्माणमव्ययम् ॥ ३० ॥
मनुष्य भी महात्मा विश्वकर्माके शिल्पका आश्रय ले जीवननिर्वाह करते हैं और सदा उन अविनाशी विश्वकर्माकी पूजा करते रहते हैं ॥ ३० ॥

स्तनं तु दक्षिणं भित्त्वा ब्रह्मणो नरविग्रहः ।
निःसृतो भगवान् धर्मः सर्वलोकसुखावहः ॥ ३१ ॥
ब्रह्माजीके दाहिने स्तनको विदीर्ण करके मनुष्यरूपमें भगवान् धर्म प्रकट हुए, जो सम्पूर्ण लोकोंको सुख देनेवाले हैं ॥ ३१ ॥

त्रयस्तस्य वराः पुत्राः सर्वभूतमनोहराः ।
शमः कामश्च हर्षश्च तेजसा लोकधारिणः ॥ ३२ ॥
उनके तीन श्रेष्ठ पुत्र हैं, जो सम्पूर्ण प्राणियोंके मनको हर लेते हैं। उनके नाम हैं—शम, काम और हर्ष। वे अपने तेजसे सम्पूर्ण जगत्‌को धारण करनेवाले हैं ॥ ३२ ॥

कामस्य तु रतिर्भार्या शमस्य प्राप्तिरङ्गना ।
नन्दा तु भार्या हर्षस्य यासु लोकाः प्रतिष्ठिताः ॥ ३३ ॥
कामकी पत्नीका नाम रति है। शमकी भार्या प्राप्ति है। हर्षकी पत्नी नन्दा है। इन्हींमें सम्पूर्ण लोक प्रतिष्ठित हैं ॥ ३३ ॥

मरीचेः कश्यपः पुत्रः कश्यपस्य सुरासुराः ।
जज्ञिरे नृपशार्दूल लोकानां प्रभवस्तु सः ॥ ३४ ॥
मरीचिके पुत्र कश्यप और कश्यपके सम्पूर्ण देवता तथा असुर उत्पन्न हुए। नृपश्रेष्ठ! इस प्रकार कश्यप सम्पूर्ण लोकोंके आदि कारण हैं ॥ ३४ ॥

त्वाष्ट्री तु सवितुर्भार्या वडवारूपधारिणी ।
असूयत महाभागा सान्तरिक्षेऽश्विनावुभौ ॥ ३५ ॥
द्वादशैवादितेः पुत्राः शक्रमुख्या नराधिप ।
तेषामवरजो विष्णुर्यत्र लोकाः प्रतिष्ठिताः ॥ ३६ ॥
त्वष्टाकी पुत्री संज्ञा भगवान् सूर्यकी धर्मपत्नी हैं। वे परम सौभाग्यवती हैं। उन्होंने अश्विनी (घोड़ी)-का रूप धारण करके अन्तरिक्षमें दोनों अश्विनीकुमारोंको जन्म दिया। राजन्! अदितिके इन्द्र आदि बारह पुत्र ही हैं। उनमें भगवान् विष्णु सबसे छोटे हैं, जिनमें ये सम्पूर्ण लोक प्रतिष्ठित हैं ॥ ३५-३६ ॥

त्रयस्त्रिंशत इत्येते देवास्तेषामहं तव ।
अन्वयं सम्प्रवक्ष्यामि पक्षैश्च कुलतो गणान् ॥ ३७ ॥

इस प्रकार आठ वसु, ग्यारह रुद्र, बारह आदित्य तथा प्रजापति और वषट्कार—ये तैंतीस मुख्य देवता हैं। अब मैं तुम्हें इनके पक्ष और कुल आदिके उल्लेखपूर्वक वंश और गण आदिका परिचय देता हूँ ॥ ३७ ॥

रुद्राणामपरः पक्षः साध्यानां मरुतां तथा । वसूनां भार्गवं विद्याद् विश्वेदेवांस्तथैव च ॥ ३८ ॥ रुद्रोंका एक अलग पक्ष या गण है, साध्य, मरुत् तथा वसुओंका भी पृथक्-पृथक् गण है। इसी प्रकार भार्गव तथा विश्वेदेवगणको भी जानना चाहिये ॥ ३८ ॥

वैनतेयस्तु गरुडो बलवानरुणस्तथा । बृहस्पतिश्च भगवानादित्येष्वेव गण्यते ॥ ३९ ॥ विनतानन्दन गरुड, बलवान् अरुण तथा भगवान् बृहस्पतिकी गणना आदित्योंमें ही की जाती है ॥ ३९ ॥

अश्विनौ गुह्यकान् विद्धि सर्वौषध्यस्तथा पशून् । एते देवगणा राजन् कीर्तितास्तेऽनुपूर्वशः ॥ ४० ॥ अश्विनीकुमार, सर्वौषधि तथा पशु—इन सबको गुह्यकसमुदायके भीतर समझो। राजन्! ये देवगण तुम्हें क्रमशः बताये गये हैं ॥ ४० ॥

यान् कीर्तयित्वा मनुजः सर्वपापैः प्रमुच्यते । ब्रह्मणो हृदयं भित्त्वा निःसृतो भगवान् भृगुः ॥ ४१ ॥ मनुष्य इन सबका कीर्तन करके सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। भगवान् भृगु ब्रह्माजीके हृदयका भेदन करके प्रकट हुए थे ॥ ४१ ॥

भृगोः पुत्रः कविर्विद्वाञ्छुक्रः कविसुतो ग्रहः । त्रैलोक्यप्राणयात्रार्थं वर्षावर्षे भयाभये । स्वयम्भुवा नियुक्तः सन् भुवनं परिधावति ॥ ४२ ॥ भृगुके विद्वान् पुत्र कवि हुए और कविके पुत्र शुक्राचार्य हुए, जो ग्रह होकर तीनों लोकोंके जीवनकी रक्षाके लिये वृष्टि, अनावृष्टि तथा भय और अभय उत्पन्न करते हैं। स्वयम्भू ब्रह्माजीकी प्रेरणासे वे समस्त लोकोंका चक्कर लगाते रहते हैं ॥ ४२ ॥

योगाचार्यो महाबुद्धिर्दैत्यानामभवद् गुरुः । सुराणां चापि मेधावी ब्रह्मचारी यतव्रतः ॥ ४३ ॥ महाबुद्धिमान् शुक्र ही योगके आचार्य और दैत्योंके गुरु हुए। वे ही योगबलसे मेधावी, ब्रह्मचारी एवं व्रतपरायण बृहस्पतिके रूपमें प्रकट हो देवताओंके भी गुरु होते हैं ॥ ४३ ॥

तस्मिन् नियुक्ते विधिना योगक्षेमाय भार्गवे ।

अन्यमुत्पादयामास पुत्रं भृगुरनिन्दितम् ॥ ४४ ॥
ब्रह्माजीने जब भृगुपुत्र शुक्रको जगत्‌के योगक्षेमके कार्यमें नियुक्त कर दिया, तब महर्षि भृगुने एक दूसरे निर्दोष पुत्रको जन्म दिया ॥ ४४ ॥
च्यवनं दीप्ततपसं धर्मात्मानं यशस्विनम् ।
यः स रोषाच्च्युतो गर्भान्मातुर्मोक्षाय भारत ॥ ४५ ॥
जिसका नाम था च्यवन। महर्षि च्यवनकी तपस्या सदा उद्दीप्त रहती है। वे धर्मात्मा और यशस्वी हैं। भारत! वे अपनी माताको संकटसे बचानेके लिये रोषपूर्वक गर्भसे च्युत हो गये थे (इसीलिये च्यवन कहलाये) ॥ ४५ ॥
आरुषी तु मनोः कन्या तस्य पत्नी मनीषिणः ।
और्वस्तस्यां समभवदूरूं भित्त्वा महायशाः ॥ ४६ ॥
मनुकी पुत्री आरुषी मनीषी च्यवन मुनिकी पत्नी थी। उससे महायशस्वी और्व मुनिका जन्म हुआ। वे अपनी माताकी ऊरु (जाँघ) फाड़कर प्रकट हुए थे; इसलिये और्व कहलाये ॥ ४६ ॥
महातेजा महावीर्यो बाल एव गुणैर्युतः ।
ऋचीकस्तस्य पुत्रस्तु जमदग्निस्ततोऽभवत् ॥ ४७ ॥
वे महान् तेजस्वी और अत्यन्त शक्तिशाली थे। बचपनमें ही अनेक सद्गुण उनकी शोभा बढ़ाने लगे। और्वके पुत्र ऋचीक तथा ऋचीकके पुत्र जमदग्नि हुए ॥ ४७ ॥
जमदग्नेस्तु चत्वार आसन् पुत्रा महात्मनः ।
रामस्तेषां जघन्योऽभूदजघन्यैर्गुणैर्युतः ।
सर्वशस्त्रेषु कुशलः क्षत्रियान्तकरो वशी ॥ ४८ ॥
महात्मा जमदग्निके चार पुत्र थे, जिनमें परशुरामजी सबसे छोटे थे; किंतु उनके गुण छोटे नहीं थे। वे श्रेष्ठ सद्गुणोंसे विभूषित थे, सम्पूर्ण शस्त्रविद्यामें कुशल, क्षत्रिय-कुलका संहार करनेवाले तथा जितेन्द्रिय थे ॥ ४८ ॥
और्वस्यासीत् पुत्रशतं जमदग्निपुरोगमम् ।
तेषां पुत्रसहस्राणि बभूवुर्भुवि विस्तरः ॥ ४९ ॥
और्व मुनिके जमदग्नि आदि सौ पुत्र थे। फिर उनके भी सहस्रों पुत्र हुए। इस प्रकार इस पृथ्वीपर भृगुवंशका विस्तार हुआ ॥ ४९ ॥
द्वौ पुत्रौ ब्रह्मणस्त्वन्यौ ययोस्तिष्ठति लक्षणम् ।
लोके धाता विधाता च यौ स्थितौ मनुना सह ॥ ५० ॥
ब्रह्माजीके दो पुत्र और थे, जिनका धारण-पोषण और सृष्टिरूप लक्षण लोकमें सदा ही उपलब्ध होता है। उनके नाम हैं धाता और विधाता। ये मनुके साथ रहते हैं ॥ ५० ॥

तयोरेव स्वसा देवी लक्ष्मीः पद्मगृहा शुभा । तस्यास्तु मानसाः पुत्रास्तुरगा व्योमचारिणः ॥ ५१ ॥ वरुणस्य भार्या या ज्येष्ठा शुक्राद् देवी व्यजायत । तस्याः पुत्रं बलं विद्धि सुरां च सुरनन्दिनीम् ॥ ५२ ॥ कमलोंमें निवास करनेवाली शुभस्वरूपा लक्ष्मीदेवी उन दोनोंकी बहिन हैं। आकाशमें विचरनेवाले अश्व लक्ष्मीदेवीके मानस पुत्र हैं। राजन्! वरुणके बीजसे उनकी ज्येष्ठ पत्नी देवीने एक पुत्र और एक पुत्रीको जन्म दिया। उसके पुत्रको तो बल और देवनन्दिनी पुत्रीको सुरा समझो ॥ ५१-५२ ॥

प्रजानामन्नकामानामन्योन्यपरिभक्षणात् । अधर्मस्तत्र संजातः सर्वभूतविनाशकः ॥ ५३ ॥ तदनन्तर एक समय ऐसा आया, जब प्रजा भूखसे पीड़ित हो भोजनकी इच्छासे एक-दूसरेको मारकर खाने लगी, उस समय वहाँ अधर्म प्रकट हुआ, जो समस्त प्राणियोंका नाश करनेवाला है ॥ ५३ ॥

तस्यापि निर्ऋतिर्भार्या नैर्ऋता येन राक्षसाः । घोरास्तस्यास्त्रयः पुत्राः पापकर्मरताः सदा ॥ ५४ ॥ अधर्मकी स्त्री निर्ऋति हुई, जिससे नैर्ऋत नामवाले तीन भयंकर राक्षस पुत्र उत्पन्न हुए, जो सदा पापकर्ममें ही लगे रहनेवाले हैं ॥ ५४ ॥

भयो महाभयश्चैव मृत्युर्भूतान्तकस्तथा । न तस्य भार्या पुत्रो वा कश्चिदस्त्यन्तको हि सः ॥ ५५ ॥ उनके नाम इस प्रकार हैं—भय, महाभय और मृत्यु। उनमें मृत्यु समस्त प्राणियोंका अन्त करनेवाला है। उसके पत्नी या पुत्र कोई नहीं है, क्योंकि वह सबका अन्त करनेवाला है ॥ ५५ ॥

काकीं श्येनीं तथा भासीं धृतराष्ट्रीं तथा शुकीम् । ताम्रा तु सुषुवे देवी पञ्चैता लोकविश्रुताः ॥ ५६ ॥ देवी ताम्राने काकी, श्येनी, भासी, धृतराष्ट्री तथा शुकी—इन पाँच लोकविख्यात कन्याओंको उत्पन्न किया ॥ ५६ ॥

उलूकान् सुषुवे काकी श्येनी श्येनान् व्यजायत । भासी भासानजनयद् गृध्रांश्चैव जनाधिप ॥ ५७ ॥ जनेश्वर! काकीने उल्लुओं और श्येनीने बाजोंको जन्म दिया; भासीने मुर्गों तथा गीधोंको उत्पन्न किया ॥ ५७ ॥

धृतराष्ट्री तु हंसांश्च कलहंसांश्च सर्वशः । चक्रवाकांश्च भद्रा तु जनयामास सैव तु ॥ ५८ ॥ शुकी च जनयामास शुकानेव यशस्विनी ।

कल्याणगुणसम्पन्ना सर्वलक्षणपूजिता ॥ ५९ ॥ कल्याणमयी धृतराष्ट्रीने सब प्रकारके हंसों, कल-हंसों तथा चक्रवाकोंको जन्म दिया। कल्याणमय गुणोंसे सम्पन्न तथा समस्त शुभ लक्षणोंसे युक्त यशस्विनी शुकीने शुकों (तोतों)-को ही उत्पन्न किया ॥ ५८-५९ ॥ नव क्रोधवशा नारीः प्रजज्ञे क्रोधसम्भवाः । मृगी च मृगमन्दा च हरी भद्रमना अपि ॥ ६० ॥ मातङ्गी त्वथ शार्दूली श्वेता सुरभिरेव च । सर्वलक्षणसम्पन्ना सुरसा चैव भामिनी ॥ ६१ ॥ क्रोधवशाने नौ प्रकारकी क्रोधजनित कन्याओंको जन्म दिया। उनके नाम ये हैं—मृगी, मृगमन्दा, हरी, भद्रमना, मातंगी, शार्दूली, श्वेता, सुरभि तथा सम्पूर्ण शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न सुन्दरी सुरसा ॥ ६०-६१ ॥ अपत्यं तु मृगाः सर्वे मृग्या नरवरोत्तम । ऋक्षांश्च मृगमन्दायाः सृमरांश्च परंतप ॥ ६२ ॥ ततस्त्वैरावतं नागं जज्ञे भद्रमनाः सुतम् । ऐरावतः सुतस्तस्या देवनागो महागजः ॥ ६३ ॥ नरश्रेष्ठ! समस्त मृग मृगीकी संतानें हैं। परंतप! मृगमन्दासे रीछ तथा सृमर (छोटी जातिके मृग) उत्पन्न हुए। भद्रमनाने ऐरावत हाथीको अपने पुत्ररूपमें उत्पन्न किया। देवताओंका हाथी महान् गजराज ऐरावत भद्रमनाका ही पुत्र है ॥ ६२-६३ ॥ हर्याश्च हरयोऽपत्यं वानराश्च तरस्विनः । गोलांगूलांश्च भद्रं ते हर्याः पुत्रान् प्रचक्षते ॥ ६४ ॥ प्रजज्ञे त्वथ शार्दूली सिंहान् व्याघ्राननेकशः । द्वीपिनश्च महासत्त्वान् सर्वानैव न संशयः ॥ ६५ ॥ राजन्! तुम्हारा कल्याण हो, वेगवान् घोड़े और वानर हरीके पुत्र हैं। गायके समान पूँछवाले लंगूरोंको भी हरीका ही पुत्र बताया जाता है। शार्दूलीने सिंहों, अनेक प्रकारके बाघों और महान् बलशाली सभी प्रकारके चीतोंको भी जन्म दिया, इसमें संशय नहीं है ॥ ६४-६५ ॥ मातङ्ग्यपि च मातङ्गानपत्यानि नराधिप । दिशां गजं तु श्वेताख्यं श्वेताजनयदाशुगम् ॥ ६६ ॥ तथा दुहितरौ राजन् सुरभिर्वै व्यजायत । रोहिणी चैव भद्रं ते गन्धर्वी तु यशस्विनी ॥ ६७ ॥ नरेश्वर! मातंगीने मतवाले हाथियोंको संतानके रूपमें उत्पन्न किया। श्वेताने शीघ्रगामी दिग्गज श्वेतको जन्म दिया। राजन्! तुम्हारा भला हो, सुरभिने दो

कन्याओंको उत्पन्न किया। उनमेंसे एकका नाम रोहिणी था और दूसरीका गन्धर्वी। गन्धर्वी बड़ी यशस्विनी थी ।। ६६-६७ ।।
विमलामपि भद्रं ते अनलामपि भारत ।
रोहिण्यां जज्ञिरे गावो गन्धर्व्यां वाजिनः सुताः ।
सप्त पिण्डफलान् वृक्षाननलापि व्यजायत ।। ६८ ।।
भारत! तत्पश्चात् रोहिणीने विमला और अनला नामवाली दो कन्याएँ और उत्पन्न कीं। रोहिणीसे गाय-बैल और गन्धर्वीसे घोड़े ही पुत्ररूपमें उत्पन्न हुए। अनलाने सात प्रकारके वृक्षोंको* उत्पन्न किया, जिनमें पिण्डाकार फल लगते हैं ।। ६८ ।।
अनलायाः शुकी पुत्री कङ्कस्तु सुरसासुतः ।
अरुणस्य भार्या श्येनी तु वीर्यवन्तौ महाबलौ ।। ६९ ।।
सम्पातिं जनयामास वीर्यवन्तं जटायुषम् ।
सुरसाजनयन्नागान् कद्रूः पुत्रांस्तु पन्नगान् ।। ७० ।।
द्वौ पुत्रौ विनतायास्तु विख्यातौ गरुडारुणौ ।
अनलाके शुकी नामकी एक कन्या भी हुई। कंक पक्षी सुरसाका पुत्र है। अरुणकी पत्नी श्येनीने दो महाबली और पराक्रमी पुत्र उत्पन्न किये। एकका नाम था सम्पाती और दूसरेका जटायु। जटायु बड़ा शक्तिशाली था। सुरसा और कद्रूने नाग एवं पन्नग जातिके पुत्रोंको उत्पन्न किया। विनताके दो ही पुत्र विख्यात हैं, गरुड और अरुण ।। ६९-७० १/२ ।।
(सुरसाजनयत् सर्पाञ्छतमेकशिरोधरान् ।
सुरसाकन्यका जातास्तिस्रः कमललोचनाः ।।
वनस्पतीनां वृक्षाणां वीरुधां चैव मातरः ।
अनला रुहा च द्वे प्रोक्ते वीरुधां चैव ताः स्मृताः ।।
गृह्णन्ति ये विना पुष्पं फलानि तरवः पृथक् ।
अनलासुतास्ते विज्ञेयाः तानेवाहुर्वनस्पतीन् ।।
पुष्पैः फलग्रहान् वृक्षान् रुहायाः प्रसवान् विभो ।
लतागुल्मानि वल्यश्च त्वक्सारतृणजातयः ।।
वीरुधायाः प्रजास्ताः स्युरत्रवंशः समाप्यते ।)
सुरसाने एक सौ एक सिरवाले सर्पोंको जन्म दिया था। सुरसासे तीन कमलनयनी कन्याएँ उत्पन्न हुईं, जो वनस्पतियों, वृक्षों और लता-गुल्मोंकी जननी हुईं। उनके नाम इस प्रकार हैं—अनला, रुहा और वीरुधा। जो वृक्ष बिना फूलके ही फल ग्रहण करते हैं उन सबको अनलाका पुत्र जानना चाहिये; वे ही

वनस्पति कहलाते हैं। प्रभो! जो फूलसे फल ग्रहण करते हैं उन वृक्षोंको रुहाकी संतान समझो। लता, गुल्म, वल्ली, बाँस और तिनकोंकी जितनी जातियाँ हैं उन सबकी उत्पत्ति वीरुधासे हुई है। यहाँ वंशवर्णन समाप्त होता है।

इत्येष सर्वभूतानां महतां मनुजाधिप ।
प्रभवः कीर्तितः सम्यङ्मया मतिमतां वर ।। ७१ ।।
यं श्रुत्वा पुरुषः सम्यङ्मुक्तो भवति पाप्मनः ।
सर्वज्ञतां च लभते गतिमग्रयां च विन्दति ।। ७२ ।।

बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ राजा जनमेजय! इस प्रकार मैंने सम्पूर्ण महाभूतोंकी उत्पत्तिका भलीभाँति वर्णन किया है। जिसे अच्छी तरह सुनकर मनुष्य सब पापोंसे पूर्णतः मुक्त हो जाता है और सर्वज्ञता तथा उत्तम गति प्राप्त कर लेता है ।। ७१-७२ ।।

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि षट्षष्टितमोऽध्यायः ।। ६६ ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें अंशावतरणविषयक छाछठवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ६६ ।।
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ४ १/३ श्लोक मिलाकर कुल ७६ १/३ श्लोक हैं)


* मनुस्मृतिमें प्रजापति दक्षको ही पुत्रिका-विधिका प्रवर्तक बताकर उसका लक्षण इस प्रकार दिया है—
अपुत्रोऽनेन विधिना सुतां कुर्वीत पुत्रिकाम् । यदपत्यं भवेदस्यां तन्मम स्यात् स्वधाकरम् ।। (९।१२७)
जिसके पुत्र न हों वह निम्नांकित विधिसे अपनी कन्याको पुत्रिका बना ले—यह संकल्प कर ले कि इस कन्याके गर्भसे जो बालक उत्पन्न हो, वह मेरा श्राद्धादि कर्म करनेवाला पुत्ररूप हो।

* किसी-किसीके मतमें शाख, विशाख और नैगमेय—ये तीनों नाम कुमार कार्तिकेयके ही हैं। किन्हींके मतमें कुमार कार्तिकेयके पुत्रोंकी संज्ञा शाख, विशाख और नैगमेय है। कल्पभेदसे सभी ठीक हो सकते हैं।

* खर्जूरं तालहिन्तालौ ताली खर्जूरिका तथा । गुणका नारिकेलश्च सप्त पिण्डफला द्रुमाः ।। (खजूर, ताल, हिन्ताल, ताली, छोटे खजूर, सोपारी और नारियल—ये सात पिण्डाकार फलवाले वृक्ष हैं।)

अध्याय (पृष्ठ 477)

⬅ विषय-सूची (TOC)

सप्तषष्टितमोऽध्यायः

देवता और दैत्य आदिके अंशावतारोंका दिग्दर्शन

जनमेजय उवाच

देवानां दानवानां च गन्धर्वोरगरक्षसाम् ।
सिंहव्याघ्रमृगाणां च पन्नगानां पतत्त्रिणाम् ॥ १ ॥
सर्वेषां चैव भूतानां सम्भवं भगवन्नहम् ।
श्रोतुमिच्छामि तत्त्वेन मानुषेषु महात्मनाम् ।
जन्म कर्म च भूतानामेतेषामनुपूर्वशः ॥ २ ॥
जनमेजयने कहा— भगवन्! मैं मनुष्य-योनिमें अंशतः उत्पन्न हुए देवता, दानव, गन्धर्व, नाग, राक्षस, सिंह, व्याघ्र, हरिण, सर्प, पक्षी एवं सम्पूर्ण भूतोंके जन्मका वृत्तान्त यथार्थरूपसे सुनना चाहता हूँ। मनुष्योंमें जो महात्मा पुरुष हैं, उनके तथा इन सभी प्राणियोंके जन्म-कर्मका क्रमशः वर्णन सुनना चाहता हूँ ॥ १ २ ॥

वैशम्पायन उवाच

मानुषेषु मनुष्येन्द्र सम्भूता ये दिवौकसः ।
प्रथमं दानवांश्चैव तांस्ते वक्ष्यामि सर्वशः ॥ ३ ॥
विप्रचित्तिरिति ख्यातो य आसीद् दानवर्षभः ।
जरासन्ध इति ख्यातः स आसीन्मनुजर्षभः ॥ ४ ॥
दितेः पुत्रस्तु यो राजन् हिरण्यकशिपुः स्मृतः ।
स जज्ञे मानुषे लोके शिशुपालो नरर्षभः ॥ ५ ॥
वैशम्पायनजी बोले— नरेन्द्र! मनुष्योंमें जो देवता और दानव प्रकट हुए थे, उन सबके जन्मका ही पहले तुम्हें परिचय दे रहा हूँ। विप्रचित्ति नामसे विख्यात जो दानवोंका राजा था, वही मनुष्योंमें श्रेष्ठ जरासन्ध नामसे विख्यात हुआ। राजन्! हिरण्यकशिपु नामसे प्रसिद्ध जो दितिका पुत्र था, वही मनुष्यलोकमें नरश्रेष्ठ शिशुपालके रूपमें उत्पन्न हुआ ॥ ३-५ ॥
संहाद इति विख्यातः प्रह्लादस्यानुजस्तु यः ।
स शल्य इति विख्यातो जज्ञे बाह्लीकपुङ्गवः ॥ ६ ॥
अनुह्रादस्तु तेजस्वी योऽभूत् ख्यातो जघन्यजः ।
धृष्टकेतुरिति ख्यातः स बभूव नरेश्वरः ॥ ७ ॥
प्रह्लादका छोटा भाई जो संहादके नामसे विख्यात था, वही बाह्लीक देशका सुप्रसिद्ध राजा शल्य हुआ। प्रह्लादका ही दूसरा छोटा भाई जिसका नाम अनुह्राद था, धृष्टकेतु नामक राजा हुआ ॥ ६-७ ॥

यस्तु राजञ्छिबिर्नाम दैतेयः परिकीर्तितः । द्रुम इत्यभिविख्यातः स आसीद् भुवि पार्थिवः ॥ ८ ॥ राजन्! जो शिबि नामका दैत्य कहा गया है, वही इस पृथ्वीपर द्रुम नामसे विख्यात राजा हुआ ॥ ८ ॥ बाष्कलो नाम यस्तेषामासीदसुरसत्तमः । भगदत्त इति ख्यातः स जज्ञे पुरुषर्षभः ॥ ९ ॥ असुरोंमें श्रेष्ठ जो बाष्कल था, वही नरश्रेष्ठ भगदत्तके नामसे उत्पन्न हुआ ॥ ९ ॥ अयःशिरा अश्वशिरा अयःशङ्कुश्च वीर्यवान् । तथा गगनमूर्धा च वेगवांश्चात्र पञ्चमः ॥ १० ॥ पञ्चैते जज्ञिरे राजन् वीर्यवन्तो महासुराः । केकयेषु महात्मानः पार्थिवर्षभसत्तमाः । केतुमानिति विख्यातो यस्ततोऽन्यः प्रतापवान् ॥ ११ ॥ अमितौजा इति ख्यातः सोग्रकर्मा नराधिपः । स्वर्भानुरिति विख्यातः श्रीमान् यस्तु महासुरः ॥ १२ ॥ उग्रसेन इति ख्यात उग्रकर्मा नराधिपः । यस्त्वश्व इति विख्यातः श्रीमानासीन्महासुरः ॥ १३ ॥ अशोको नाम राजाभून्महावीर्योऽपराजितः । तस्मादवरजो यस्तु राजन्नश्वपतिः स्मृतः ॥ १४ ॥ दैतेयः सोऽभवद् राजा हार्दिक्यो मनुजर्षभः । वृषपर्वेति विख्यातः श्रीमान् यस्तु महासुरः ॥ १५ ॥ दीर्घप्रज्ञ इति ख्यातः पृथिव्यां सोऽभवन्नृपः । अजकस्त्ववरो राजन् य आसीद् वृषपर्वणः ॥ १६ ॥ स शाल्व इति विख्यातः पृथिव्यामभवन्नृपः । अश्वग्रीव इति ख्यातः सत्त्ववान् यो महासुरः ॥ १७ ॥ रोचमान इति ख्यातः पृथिव्यां सोऽभवन्नृपः । सूक्ष्मस्तु मतिमान् राजन् कीर्तिमान् यः प्रकीर्तितः ॥ १८ ॥ बृहद्रथ इति ख्यातः क्षितावासीत् स पार्थिवः । तुहुण्ड इति विख्यातो य आसीदसुरोत्तमः ॥ १९ ॥ सेनाबिन्दुरिति ख्यातः स बभूव नराधिपः । इषुपान्नाम यस्तेषामसुराणां बलाधिकः ॥ २० ॥ नग्नजिन्नाम राजासीद् भुवि विख्यातविक्रमः । एकचक्र इति ख्यात आसीद् यस्तु महासुरः ॥ २१ ॥ प्रतिविन्ध्य इति ख्यातो बभूव प्रथितः क्षितौ ।

विरूपाक्षस्तु दैतेयश्चित्रयोधी महासुरः ।। २२ ।। चित्रधर्मेति विख्यातः क्षितावासीत् स पार्थिवः । हरस्त्वरिहरो वीर आसीद् यो दानवोत्तमः ।। २३ ।। सुबाहुरिति विख्यातः श्रीमानासीत् स पार्थिवः । अहरस्तु महातेजाः शत्रुपक्षक्षयंकरः ।। २४ ।। बाह्लीको नाम राजा स बभूव प्रथितः क्षितौ । निचन्द्रश्चन्द्रवक्त्रस्तु य आसीदसुरोत्तमः ।। २५ ।। मुञ्जकेश इति ख्यातः श्रीमानासीत् स पार्थिवः । निकुम्भस्त्वजितः संख्ये महामतिरजायत ।। २६ ।। भूमौ भूमिपतिः श्रेष्ठो देवाधिप इति स्मृतः । शरभो नाम यस्तेषां दैतेयानां महासुरः ।। २७ ।। पौरवो नाम राजर्षिः स बभूव नरोत्तमः । कुपटस्तु महावीर्यः श्रीमान् राजन् महासुरः ।। २८ ।। सुपार्श्व इति विख्यातः क्षितौ जज्ञे महीपतिः । क्रथस्तु राजन् राजर्षिः क्षितौ जज्ञे महासुरः ।। २९ ।। पार्वतेय इति ख्यातः काञ्चनाचलसंनिभः । द्वितीयः शलभस्तेषामसुराणां बभूव ह ।। ३० ।। प्रह्लादो नाम बाह्लीकः स बभूव नराधिपः । चन्द्रस्तु दितिजश्रेष्ठो लोके ताराधिपोपमः ।। ३१ ।। चन्द्रवर्मेति विख्यातः काम्बोजानां नराधिपः । अर्क इत्यभिविख्यातो यस्तु दानवपुङ्गवः ।। ३२ ।। ऋषिको नाम राजर्षिर्बभूव नृपसत्तमः । मृतपा इति विख्यातो य आसीदसुरोत्तमः ।। ३३ ।। पश्चिमानूपकं विद्धि तं नृपं नृपसत्तम । गविष्ठस्तु महातेजा यः प्रख्यातो महासुरः ।। ३४ ।। द्रुमसेन इति ख्यातः पृथिव्यां सोऽभवन्नृपः । मयूर इति विख्यातः श्रीमान् यस्तु महासुरः ।। ३५ ।। स विश्व इति विख्यातो बभूव पृथिवीपतिः । सुपर्ण इति विख्यातस्तस्मादवरजस्तु यः ।। ३६ ।। कालकीर्तिरिरिति ख्यातः पृथिव्यां सोऽभवन्नृपः । चन्द्रहन्तेति यस्तेषां कीर्तितः प्रवरोऽसुरः ।। ३७ ।। शुनको नाम राजर्षिः स बभूव नराधिपः । विनाशनस्तु चन्द्रस्य य आख्यातो महासुरः ।। ३८ ।।

जानकिर्नाम विख्यातः सोऽभवन्मनुजाधिपः ।

दीर्घजिह्वस्तु कौरव्य य उक्तो दानवर्षभः ॥ ३९ ॥

काशिराजः स विख्यातः पृथिव्यां पृथिवीपते ।

ग्रहं तु सुषुवे यं तु सिंहिकाकेंदुमर्दनम् ।

स क्रथ इति विख्यातो बभूव मनुजाधिपः ॥ ४० ॥

अयःशिरा, अश्वशिरा, वीर्यवान् अयःशंकु, गगनमूर्धा और वेगवान्—राजन्! ये पाँच

पराक्रमी महादैत्य केकय देशके प्रधान-प्रधान महात्मा राजाओंके रूपमें उत्पन्न हुए। उनसे

भिन्न केतुमान् नामसे प्रसिद्ध प्रतापी महान् असुर अमितौजा नामसे विख्यात राजा हुआ,

जो भयानक कर्म करनेवाला था। स्वर्भानु नामवाला जो श्रीसम्पन्न महान् असुर था, वही

भयंकर कर्म करनेवाला राजा उग्रसेन कहलाया। अश्व नामसे विख्यात जो श्रीसम्पन्न महान्

असुर था, वही किसीसे परास्त न होनेवाला महापराक्रमी राजा अशोक हुआ। राजन्!

उसका छोटा भाई जो अश्वपति नामक दैत्य था, वही मनुष्योंमें श्रेष्ठ हार्दक्य नामवाला राजा

हुआ। वृषपर्वा नामसे प्रसिद्ध जो श्रीमान् महादैत्य था, वह पृथ्वीपर दीर्घप्रज्ञ नामक राजा

हुआ। राजन्! वृषपर्वाका छोटा भाई जो अजक था, वही इस भूमण्डलमें शाल्व नामसे

प्रसिद्ध राजा हुआ। अश्वग्रीव नामवाला जो धैर्यवान् महादैत्य था, वह पृथ्वीपर रोचमान

नामसे विख्यात राजा हुआ। राजन्! बुद्धिमान् और यशस्वी सूक्ष्म नामसे प्रसिद्ध जो दैत्य

कहा गया है, वह इस पृथ्वीपर बृहद्रथ नामसे विख्यात राजा हुआ है। असुरोंमें श्रेष्ठ जो

तुहुण्ड नामक दैत्य था, वही यहाँ सेनाबिन्दु नामसे विख्यात राजा हुआ। असुरोंके समाजमें

जो सबसे अधिक बलवान् था, वह इषुप्राद नामक दैत्य इस पृथ्वीपर विख्यात पराक्रमी

नग्नजित् नामक राजा हुआ। एकचक्र नामसे प्रसिद्ध जो महान् असुर था, वही इस पृथ्वीपर

प्रतिविन्ध्य नामसे विख्यात राजा हुआ। विचित्र युद्ध करनेवाला महादैत्य विरूपाक्ष इस

पृथ्वीपर चित्रधर्मा नामसे प्रसिद्ध राजा हुआ। शत्रुओंका संहार करनेवाला जो वीर दानवश्रेष्ठ

हर था, वही सुबाहु नामक श्रीसम्पन्न राजा हुआ। शत्रुपक्षका विनाश करनेवाला महातेजस्वी

अहर इस भूमण्डलमें बाह्लिक नामसे विख्यात राजा हुआ। चन्द्रमाके समान सुन्दर

मुखवाला जो असुरश्रेष्ठ निचन्द्र था, वही मुंजकेश नामसे विख्यात श्रीसम्पन्न राजा हुआ।

परम बुद्धिमान् निकुम्भ जो युद्धमें अजेय था, वह इस भूमिपर भूपालोंमें श्रेष्ठ देवाधिप

कहलाया। दैत्योंमें जो शरभ नामसे प्रसिद्ध महान् असुर था, वही मनुष्योंमें श्रेष्ठ राजर्षि

पौरव हुआ। राजन्! महापराक्रमी महान् असुर कुपट ही इस पृथ्वीपर राजा सुपार्श्वके रूपमें

उत्पन्न हुआ। महाराज! महादैत्य क्रथ इस पृथ्वीपर राजर्षि पार्वतेयके नामसे उत्पन्न हुआ,

उसका शरीर मेरु पर्वतके समान विशाल था। असुरोंमें शलभ नामसे प्रसिद्ध जो दूसरा दैत्य

था, वह बाह्लीकवंशी राजा प्रह्लाद हुआ। दैत्यश्रेष्ठ चन्द्र इस लोकमें चन्द्रमाके समान सुन्दर

और चन्द्रवर्मा नामसे विख्यात काम्बोज देशका राजा हुआ। अर्क नामसे विख्यात जो

दानवोंका सरदार था, वही नरपतियोंमें श्रेष्ठ राजर्षि ऋषिक हुआ। नृपशिरोमणे! मृतपा

नामसे प्रसिद्ध जो श्रेष्ठ असुर था, उसे पश्चिम अनूप देशका राजा समझो। गविष्ठ नामसे प्रसिद्ध जो महातेजस्वी असुर था, वही इस पृथ्वीपर द्रुमसेन नामक राजा हुआ। मयूर नामसे प्रसिद्ध जो श्रीमान् एवं महान् असुर था, वही विश्व नामसे विख्यात राजा हुआ। मयूरका छोटा भाई सुपर्ण ही भूमण्डलमें कालकीर्ति नामसे प्रसिद्ध राजा हुआ। दैत्योंमें जो चन्द्रहन्ता नामसे प्रसिद्ध श्रेष्ठ असुर कहा गया है, वही मनुष्योंका स्वामी राजर्षि शौनक हुआ। इसी प्रकार जो चन्द्रविनाशन नामक महान् असुर बताया गया है, वही जानकि नामसे प्रसिद्ध राजा हुआ। कुरुश्रेष्ठ जनमेजय! दीर्घजिह्व नामसे प्रसिद्ध दानवराज ही इस पृथ्वीपर काशिराजके नामसे विख्यात था। सिंहिकाने सूर्य और चन्द्रमाका मान मर्दन करनेवाले जिस राहु नामक ग्रहको जन्म दिया था, वही यहाँ क्राथ नामसे प्रसिद्ध राजा हुआ ।। १०-४० ।।

दनायुषस्तु पुत्राणां चतुर्णां प्रवरोऽसुरः ।
विक्षरो नाम तेजस्वी वसुमित्रो नृपः स्मृतः ॥ ४१ ॥
दनायुके चार पुत्रोंमें जो सबसे बड़ा है, वह विक्षर नामक तेजस्वी असुर यहाँ राजा वसुमित्र बताया गया है ।। ४१ ।।

द्वितीयो विक्षराद् यस्तु नराधिप महासुरः ।
पाण्ड्यराष्ट्राधिप इति विख्यातः सोऽभवन्नृपः ॥ ४२ ॥
नराधिप! विक्षरसे छोटा उसका दूसरा भाई बल, जो असुरोंका राजा था, पाण्ड्य देशका सुविख्यात राजा हुआ ।। ४२ ।।

बली वीर इति ख्यातो यस्त्वासीदसुरोत्तमः ।
पौण्ड्रमात्स्यक इत्येवं बभूव स नराधिपः ॥ ४३ ॥
महाबली वीर नामसे विख्यात जो श्रेष्ठ असुर (विक्षरका तीसरा भाई) था, पौण्ड्रमात्स्यक नामसे प्रसिद्ध राजा हुआ ।। ४३ ।।

वृत्र इत्यभिविख्यातो यस्तु राजन् महासुरः ।
मणिमान्नाम राजर्षिः स बभूव नराधिपः ॥ ४४ ॥
राजन्! जो वृत्र नामसे विख्यात (और विक्षरका चौथा भाई) महान् असुर था, वही पृथ्वीपर राजर्षि मणिमान्‌के नामसे प्रसिद्ध भूपाल हुआ ।। ४४ ।।

क्रोधहन्तेति यस्तस्य बभूवावरजोऽसुरः ।
दण्ड इत्यभिविख्यातः स आसीन्नृपतिः क्षितौ ॥ ४५ ॥
क्रोधहन्ता नामक असुर जो उसका छोटा भाई (कालाके पुत्रोंमें तीसरा) था, वह इस पृथ्वीपर दण्ड नामसे विख्यात नरेश हुआ ।। ४५ ।।

क्रोधवर्धन इत्येवं यस्त्वन्यः परिकीर्तितः ।
दण्डधार इति ख्यातः सोऽभवन्मनुजर्षभः ॥ ४६ ॥
क्रोधवर्धन नामक जो दूसरा दैत्य कहा गया है, वह मनुष्योंमें श्रेष्ठ दण्डधार नामसे विख्यात हुआ ।। ४६ ।।

कालेयानां तु ये पुत्रास्तेषामष्टौ नराधिपाः ।
जज्ञिरे राजशार्दूल शार्दूलसमविक्रमाः ॥ ४७ ॥
नृपश्रेष्ठ! कालेय नामक दैत्योंके जो पुत्र थे, उनमेंसे आठ इस पृथ्वीपर सिंहके समान पराक्रमी राजा हुए ॥ ४७ ॥
मगधेषु जयत्सेनस्तेषामासीत् स पार्थिवः ।
अष्टानां प्रवरस्तेषां कालेयानां महासुरः ॥ ४८ ॥
उन आठों कालेयोंमें श्रेष्ठ जो महान् असुर था, वही मगध देशमें जयत्सेन नामक राजा हुआ ॥ ४८ ॥
द्वितीयस्तु ततस्तेषां श्रीमान् हरिहयोपमः ।
अपराजित इत्येवं स बभूव नराधिपः ॥ ४९ ॥
उन कालेयोंमेंसे जो दूसरा इन्द्रके समान श्रीसम्पन्न था, वही अपराजित नामक राजा हुआ ॥ ४९ ॥
तृतीयस्तु महातेजा महामायो महासुरः ।
निषादाधिपतिर्जज्ञे भुवि भीमपराक्रमः ॥ ५० ॥
तीसरा जो महान् तेजस्वी और महामायावी महादैत्य था, वह इस पृथ्वीपर भयंकर पराक्रमी निषादनरेशके रूपमें उत्पन्न हुआ ॥ ५० ॥
तेषामन्यतमो यस्तु चतुर्थः परिकीर्तितः ।
श्रेणिमानिति विख्यातः क्षितौ राजर्षिसत्तमः ॥ ५१ ॥
कालेयोंमेंसे ही एक जो चौथा बताया गया है, वह इस भूमण्डलमें राजर्षिप्रवर श्रेणिमान्‌के नामसे विख्यात हुआ ॥ ५१ ॥
पञ्चमस्त्वभवत् तेषां प्रवरो यो महासुरः ।
महौजा इति विख्यातो बभूवेह परंतपः ॥ ५२ ॥
कालेयोंमें जो पाँचवाँ श्रेष्ठ महादैत्य था, वही इस लोकमें शत्रुतापन महौजाके नामसे विख्यात हुआ ॥ ५२ ॥
षष्ठस्तु मतिमान् यो वै तेषामासीन्महासुरः ।
अभीरुरिति विख्यातः क्षितौ राजर्षिसत्तमः ॥ ५३ ॥
उन कालेयोंमें जो छठा महान् असुर था, वह भूमण्डलमें राजर्षिशिरोमणि अभीरुके नामसे प्रसिद्ध हुआ ॥ ५३ ॥
समुद्रसेनस्तु नृपस्तेषामेवाभवद् गणात् ।
विश्रुतः सागरान्तायां क्षितौ धर्मार्थतत्त्ववित् ॥ ५४ ॥
उन्हींमेंसे सातवाँ असुर राजा समुद्रसेन हुआ, जो समुद्रपर्यन्त पृथ्वीपर सब ओर विख्यात और धर्म एवं अर्थतत्त्वका ज्ञाता था ॥ ५४ ॥
बृहन्नामाष्टमस्तेषां कालेयानां नराधिप ।

बभूव राजा धर्मात्मा सर्वभूतहिते रतः॥ ५५॥ राजन्! कालेयोंमें जो आठवाँ था, वह बृहत् नामसे प्रसिद्ध सर्वभूतहितकारी धर्मात्मा राजा हुआ॥ ५५॥ कुक्षिस्तु राजन् विख्यातो दानवानां महाबलः। पार्वतीय इति ख्यातः काञ्चनाचलसंनिभः॥ ५६॥ महाराज! दानवोंमें कुक्षि नामसे प्रसिद्ध जो महाबली राजा था, वह पार्वतीय नामक राजा हुआ; जो मेरुगिरिके समान तेजस्वी एवं विशाल था॥ ५६॥ क्रथनश्च महावीर्यः श्रीमान् राजा महासुरः। सूर्याक्ष इति विख्यातः क्षितौ जज्ञे महीपतिः॥ ५७॥ महापराक्रमी क्रथन नामक जो श्रीसम्पन्न महान् असुर था, वह भूमण्डलमें पृथ्वीपति राजा सूर्याक्ष नामसे उत्पन्न हुआ॥ ५७॥ असुराणां तु यः सूर्यः श्रीमांश्चैव महासुरः। दरदो नाम बाह्लीको वरः सर्वमहीक्षिताम्॥ ५८॥ असुरोंमें जो सूर्य नामक श्रीसम्पन्न महान् असुर था, वही पृथ्वीपर सब राजाओंमें श्रेष्ठ दरद नामक बाह्लीकराज हुआ॥ ५८॥ गणः क्रोधवशो नाम यस्ते राजन् प्रकीर्तितः। ततः संजज्ञिरे वीराः क्षिताविह नराधिपाः॥ ५९॥ राजन्! क्रोधवश नामक जिन असुरगणोंका तुम्हें परिचय दिया है, उन्हींमेंसे कुछ लोग इस पृथ्वीपर निम्नांकित वीर राजाओंके रूपमें उत्पन्न हुए॥ ५९॥ मद्रकः कर्णवेष्टश्च सिद्धार्थः कीटकस्तथा। सुवीरश्च सुबाहुश्च महावीरोऽथ बाह्लिकः॥ ६०॥ क्रथो विचित्रः सुरथः श्रीमान् नीलश्च भूमिपः। चीरवासाश्च कौरव्य भूमिपालश्च नामतः॥ ६१॥ दन्तवक्त्रश्च नामासीद् दुर्जयश्चैव दानवः। रुक्मी च नृपशार्दूलो राजा च जनमेजयः॥ ६२॥ आषाढो वायुवेगश्च भूरितेजास्तथैव च। एकलव्यः सुमित्रश्च वाटधानोऽथ गोमुखः॥ ६३॥ कारूषकाश्च राजानः क्षेमधूर्तिस्तथैव च। श्रुतायुरुद्दहश्चैव बृहत्सेनस्तथैव च॥ ६४॥ क्षेमोग्रतीर्थः कुहरः कलिङ्गेषु नराधिपः। मतिमांश्च मनुष्येन्द्र ईश्वरश्चेति विश्रुतः॥ ६५॥ मद्रक, कर्णवेष्ट, सिद्धार्थ, कीटक, सुवीर, सुबाहु, महावीर, बाह्लिक, क्रथ, विचित्र, सुरथ, श्रीमान् नील नरेश, चीरवासा, भूमिपाल, दन्तवक्त्र, दानव दुर्जय, नृपश्रेष्ठ रुक्मी,

राजा जनमेजय, आषाढ, वायुवेग, भूरितेजा, एकलव्य, सुमित्र, वाटधान, गोमुख, करूषदेशके अनेक राजा, क्षेमधूर्ति, श्रुतायु, उद्वह, बृहत्सेन, क्षेम, उग्रतीर्थ, कलिंग-नरेश कुहर तथा परम बुद्धिमान् मनुष्योंका राजा ईश्वर ।। ६०—६५ ।। गणात् क्रोधवशादेष राजपूगोऽभवत् क्षितौ । जातः पुरा महाभागो महाकीर्तिर्महाबलः ।। ६६ ।। इतने राजाओंका समुदाय पहले इस पृथ्वीपर क्रोधवश नामक दैत्यगणसे उत्पन्न हुआ था। ये सब राजा परम सौभाग्यशाली, महान् यशस्वी और अत्यन्त बलशाली थे ।। ६६ ।। कालनेमिरिति ख्यातो दानवानां महाबलः । स कंस इति विख्यात उग्रसेनसुतो बली ।। ६७ ।। दानवोंमें जो महाबली कालनेमि था, वही राजा उग्रसेनके पुत्र बलवान् कंसके नामसे विख्यात हुआ ।। ६७ ।। यस्त्वासीद् देवको नाम देवराजसमद्युतिः । स गन्धर्वपतिर्मुख्यः क्षितौ जज्ञे नराधिपः ।। ६८ ।। इन्द्रके समान कान्तिमान् राजा देवकके रूपमें इस पृथ्वीपर श्रेष्ठ गन्धर्वराज ही उत्पन्न हुआ था ।। ६८ ।। बृहस्पतेर्बृहत्कीर्तेर्देवर्षेर्विद्धि भारत । अंशाद् द्रोणं समुत्पन्नं भारद्वाजमयोनिजम् ।। ६९ ।। भारत! महान् कीर्तिशाली देवर्षि बृहस्पतिके अंशसे अयोनिज भरद्वाजनन्दन द्रोण उत्पन्न हुए, यह जान लो ।। ६९ ।। धन्विनां नृपशार्दूल यः सर्वास्त्रविदुत्तमः । महाकीर्तिर्महातेजाः स जज्ञे मनुजेश्वर ।। ७० ।। नृपश्रेष्ठ राजा जनमेजय! आचार्य द्रोण समस्त धनुर्धर वीरोंमें उत्तम और सम्पूर्ण अस्त्रोंके ज्ञाता थे। उनकी कीर्ति बहुत दूरतक फैली हुई थी। वे महान् तेजस्वी थे ।। ७० ।। धनुर्वेदे च वेदे च यं तं वेदविदो विदुः । वरिष्ठं चित्रकर्माणं द्रोणं स्वकुलवर्धनम् ।। ७१ ।। वेदवेत्ता विद्वान् द्रोणको धनुर्वेद और वेद दोनोंमें सर्वश्रेष्ठ मानते थे। वे विचित्र कर्म करनेवाले तथा अपने कुलकी मर्यादाको बढ़ानेवाले थे ।। ७१ ।। महादेवान्तकाभ्यां च कामात् क्रोधाच्च भारत । एकत्वमुपपन्नानां जज्ञे शूरः परंतपः ।। ७२ ।। अश्वत्थामा महावीर्यः शत्रुपक्षभयावहः । वीरः कमलपत्राक्षः क्षितावासीन्नराधिप ।। ७३ ।। भारत! उनके यहाँ महादेव, यम, काम और क्रोधके सम्मिलित अंशसे शत्रुसंतापी शूरवीर अश्वत्थामाका जन्म हुआ, जो इस पृथ्वीपर महापराक्रमी और शत्रुपक्षका संहार

करनेवाला वीर था। राजन्! उसके नेत्र कमलदलके समान विशाल थे ॥ ७२-७३ ॥ जज्ञिरे वसवस्त्वष्टौ गङ्गायां शान्तनोः सुताः । वसिष्ठस्य च शापेन नियोगाद् वासवस्य च ॥ ७४ ॥ महर्षि वसिष्ठके शाप और इन्द्रके आदेशसे आठों वसु गङ्गाजीके गर्भसे राजा शान्तनुके पुत्ररूपमें उत्पन्न हुए ॥ ७४ ॥ तेषामवरजो भीष्मः कुरूणामभयंकरः । मतिमान् वेदविद् वाग्मी शत्रुपक्षक्षयंकरः ॥ ७५ ॥ उनमें सबसे छोटे भीष्म थे, जिन्होंने कौरववंशको निर्भय बना दिया था। वे परम बुद्धिमान्, वेदवेत्ता, वक्ता तथा शत्रुपक्षका संहार करनेवाले थे ॥ ७५ ॥ जामदग्न्येन रामेण सर्वास्त्रविदुषां वरः । योऽयुध्यत महातेजा भार्गवेण महात्मना ॥ ७६ ॥ सम्पूर्ण अस्त्र-शस्त्रोंके विद्वानोंमें श्रेष्ठ महातेजस्वी भीष्मने भृगुवंशी महात्मा जमदग्निनन्दन परशुरामजीके साथ युद्ध किया था ॥ ७६ ॥ यस्तु राजन् कृपो नाम ब्रह्मर्षिरभवत् क्षितौ । रुद्राणां तु गणाद् विद्धि सम्भूतमतिपौरुषम् ॥ ७७ ॥ महाराज! जो कृप नामसे प्रसिद्ध ब्रह्मर्षि इस पृथ्वीपर प्रकट हुए थे, उनका पुरुषार्थ असीम था। उन्हें रुद्रगणके अंशसे उत्पन्न हुआ समझो ॥ ७७ ॥ शकुनिर्नाम यस्त्वासीद् राजा लोके महारथः । द्वापरं विद्धि तं राजन् सम्भूतमरिमर्दनम् ॥ ७८ ॥ राजन्! जो इस जगत्में महारथी राजा शकुनिके नामसे विख्यात था, उसे तुम द्वापरके अंशसे उत्पन्न हुआ मानो। वह शत्रुओंका मान-मर्दन करनेवाला था ॥ ७८ ॥ सात्यकिः सत्यसन्धश्च योऽसौ वृष्णिकुलोद्वहः । पक्षात् स जज्ञे मरुतां देवानामरिमर्दनः ॥ ७९ ॥ वृष्णिवंशका भार वहन करनेवाले जो सत्यप्रतिज्ञ शत्रुमर्दक सात्यकि थे, वे मरुत्-देवताओंके अंशसे उत्पन्न हुए थे ॥ ७९ ॥ द्रुपदश्चैव राजर्षिस्तत एवाभवद् गणात् । मानुषे नृप लोकेऽस्मिन् सर्वशस्त्रभृतां वरः ॥ ८० ॥ राजा जनमेजय! सम्पूर्ण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ राजर्षि द्रुपद भी इस मनुष्यलोकमें उस मरुद्गणसे ही उत्पन्न हुए थे ॥ ८० ॥ ततश्च कृतवर्माणं विद्धि राजञ्जनाधिपम् । तमप्रतिमकर्माणं क्षत्रियर्षभसत्तमम् ॥ ८१ ॥ महाराज! अनुपम कर्म करनेवाले, क्षत्रियोंमें श्रेष्ठ राजा कृतवर्माको भी तुम मरुद्गणोंसे ही उत्पन्न मानो ॥ ८१ ॥

मरुतां तु गणाद् विद्धि संजातमरिमर्दनम् ।
विराटं नाम राजानं परराष्ट्रप्रतापनम् ॥ ८२ ॥
शत्रुराष्ट्रको संताप देनेवाले शत्रुमर्दन राजा विराटको भी मरुद्गणोंसे ही उत्पन्न समझो ॥ ८२ ॥

अरिष्टायास्तु यः पुत्रो हंस इत्यभिविश्रुतः ।
स गन्धर्वपतिर्जज्ञे कुरुवंशविवर्धनः ॥ ८३ ॥
धृतराष्ट्र इति ख्यातः कृष्णद्वैपायनात्मजः ।
दीर्घबाहुर्महातेजाः प्रज्ञाचक्षुर्नराधिपः ॥ ८४ ॥
मातुर्दोषार्दृषेः कोपादन्ध एव व्यजायत ।
अरिष्टाका पुत्र जो हंस नामसे विख्यात गन्धर्वराज था, वही कुरुवंशकी वृद्धि करनेवाले व्यासनन्दन धृतराष्ट्रके नामसे प्रसिद्ध हुआ। धृतराष्ट्रकी बाँहें बहुत बड़ी थीं। वे महातेजस्वी नरेश प्रज्ञाचक्षु (अन्धे) थे। वे माताके दोष और महर्षिके क्रोधसे अन्धे ही उत्पन्न हुए ॥ ८३-८४ १/२ ॥

तस्यैवावरजो भ्राता महासत्त्वो महाबलः ॥ ८५ ॥
स पाण्डुरिति विख्यातः सत्यधर्मरतः शुचिः ।
अत्रेस्तु* सुमहाभागं पुत्रं पुत्रवतां वरम् ।
विदुरं विद्धि तं लोके जातं बुद्धिमतां वरम् ॥ ८६ ॥
उन्हींके छोटे भाई महान् शक्तिशाली महाबली पाण्डुके नामसे विख्यात हुए। वे सत्य-धर्ममें तत्पर और पवित्र थे। पुत्रवानोंमें श्रेष्ठ और बुद्धिमानोंमें उत्तम परम सौभाग्यशाली विदुरको तुम इस लोकमें सूर्यपुत्र धर्मके अंशसे उत्पन्न हुआ समझो ॥ ८५-८६ ॥

कलेरंशस्तु संजज्ञे भुवि दुर्योधनो नृपः ।
दुर्बुद्धिर्दुर्मतिश्चैव कुरूणामयशस्करः ॥ ८७ ॥
खोटी बुद्धि और दूषित विचारवाले कुरुकुलकलंक राजा दुर्योधनके रूपमें इस पृथ्वीपर कलिको अंश ही उत्पन्न हुआ था ॥ ८७ ॥

जगतो यस्तु सर्वस्य विद्विष्टः कलिपूरुषः ।
यः सर्वां घातयामास पृथिवीं पृथिवीपते ॥ ८८ ॥
राजन्! वह कलिस्वरूप पुरुष सबका द्वेषपात्र था। उसने सारी पृथ्वीके वीरोंको लड़ाकर मरवा दिया था ॥ ८८ ॥

उद्दीपितं येन वैरं भूतान्तकरणं महत् ।
पौलस्त्या भ्रातरश्चास्य जज्ञिरे मनुजेष्विह ॥ ८९ ॥
उसके द्वारा प्रज्वलित की हुई वैरकी भारी आग असंख्य प्राणियोंके विनाशका कारण बन गयी। पुलस्त्य-कुलके राक्षस भी मनुष्योंमें दुर्योधनके भाइयोंके रूपमें उत्पन्न हुए

थे ।। ८९ ।। शतं दुःशासनादीनां सर्वेषां क्रूरकर्मणाम् । दुर्मुखो दुःसहश्चैव ये चान्ये नानुकीर्तिताः ।। ९० ।। दुर्योधनसहायास्ते पौलस्त्या भरतर्षभ । वैश्यापुत्रो युयुत्सुश्च धार्तराष्ट्रः शताधिकः ।। ९१ ।। उसके दुःशासन आदि सौ भाई थे। वे सभी क्रूरतापूर्ण कर्म किया करते थे। दुर्मुख, दुःसह तथा अन्य कौरव जिनका नाम यहाँ नहीं लिया गया है, दुर्योधनके सहायक थे। भरतश्रेष्ठ! धृतराष्ट्रके वे सब पुत्र पूर्वजन्मके राक्षस थे। धृतराष्ट्रपुत्र युयुत्सु वैश्य-जातीय स्त्रीसे उत्पन्न हुआ था। वह दुर्योधन आदि सौ भाइयोंके अतिरिक्त था ।। ९०-९१ ।।

जनमेजय उवाच

ज्येष्ठानुज्येष्ठतामेषां नामधेयानि वा विभो । धृतराष्ट्रस्य पुत्राणामानुपूर्व्येण कीर्तय ।। ९२ ।। जनमेजयने कहा—प्रभो! धृतराष्ट्रके जो सौ पुत्र थे, उनके नाम मुझे बड़े-छोटेके क्रमसे एक-एक करके बताइये ।। ९२ ।।

वैशम्पायन उवाच

दुर्योधनो युयुत्सुश्च राजन् दुःशासनस्तथा । दुःसहो दुःशलश्चैव दुर्मुखश्च तथापरः ।। ९३ ।। विविंशतिर्विकर्णश्च जलसन्धः सुलोचनः । विन्दानुविन्दौ दुर्धर्षः सुबाहुर्दुष्प्रधर्षणः ।। ९४ ।। दुर्मर्षणो दुर्मुखश्च दुष्कर्णः कर्ण एव च । चित्रोपचित्रौ चित्राक्षश्चारुचित्राङ्गदश्च ह ।। ९५ ।। दुर्मदो दुष्प्रधर्षश्च विवित्सुर्विकटः समः । ऊर्णनाभः पद्मनाभस्तथा नन्दोपनन्दकौ ।। ९६ ।। सेनापतिः सुषेणश्च कुण्डोदरमहोदरौ । चित्रबाहुश्चित्रवर्मा सुवर्मा दुर्विरोचनः ।। ९७ ।। अयोबाहुर्महाबाहुश्चित्रचापसुकुण्डलौ । भीमवेगो भीमबलो बलाकी भीमविक्रमौ ।। ९८ ।। उग्रायुधो भीमशरः कनकायुर्दृढायुधः । दृढवर्मा दृढक्षत्रः सोमकीर्तिरनूदरः ।। ९९ ।। जरासन्धो दृढसन्धः सत्यसन्धः सहस्रवाक् । उग्रश्रवा उग्रसेनः क्षेममूर्तिस्तथैव च ।। १०० ।। अपराजितः पण्डितको विशालाक्षो दुराधनः ।। १०१ ।।