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महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

ईति, व्याधि, आलस्य, क्रोध आदि दोष, मानसिक रोग तथा भूख-प्यासका भय—ये सभी उपद्रव बढ़ जाते हैं ।। ३५ ।। युगेष्वावर्तमानेषु धर्मो व्यावर्तते पुनः । धर्मे व्यावर्तमाने तु लोको व्यावर्तते पुनः ॥ ३६ ॥ युगोंके परिवर्तन होनेपर आनेवाले युगोंके अनुसार धर्मका भी ह्रास होता जाता है। इस प्रकार धर्मके क्षीण होनेसे लोक (की सुख-सुविधा)-का भी क्षय होने लगता है ।। ३६ ।। लोके क्षीणे क्षयं यान्ति भावा लोकप्रवर्तकाः । युगक्षयकृता धर्माः प्रार्थनानि विकुर्वते ॥ ३७ ॥ लोकके क्षीण होनेपर उसके प्रवर्तक भावोंका भी क्षय हो जाता है। युग-क्षयजनित धर्म मनुष्यकी अभीष्ट कामनाओंके विपरीत फल देते हैं ।। ३७ ।। एतत् कलियुगं नाम अचिराद् यत् प्रवर्तते । युगानुवर्तनं त्वेतत् कुर्वन्ति चिरजीविनः ॥ ३८ ॥ यह कलियुगका वर्णन किया गया, जो शीघ्र ही आनेवाला है। चिरजीवीलोग भी इस प्रकार युगका अनुसरण करते हैं ।। ३८ ।। यच्च ते मत्परिज्ञाने कौतूहलमरिंदम । अनर्थकेषु को भावः पुरुषस्य विजानतः ॥ ३९ ॥ शत्रुदमन! तुम्हें मेरे पुरातन स्वरूपको देखने या जाननेके लिये जो कौतूहल हुआ है, वह ठीक नहीं है। किसी भी समझदार मनुष्यका निरर्थक विषयोंके लिये आग्रह क्यों होना चाहिये? ।। ३९ ।। एतत् ते सर्वमाख्यातं यन्मां त्वं परिपृच्छसि । युगसंख्यां महाबाहो स्वस्ति प्राप्नुहि गम्यताम् ॥ ४० ॥ महाबाहो! तुमने युगोंकी संख्याके विषयमें मुझसे जो प्रश्न किया है, उसके उत्तरमें मैंने यह सब बातें बतायी हैं। तुम्हारा कल्याण हो, अब तुम लौट जाओ ।। ४० ।।

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां कदलीषण्डे हनुमद्भीमसंवादे एकोनपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १४९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें कदलीवनके भीतर हनुमान्जी और भीमसेनका संवादविषयक एक सौ उनचासवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १४९ ।।


* सत्ययुगके मनुष्य आदि प्राणियोंमें दोषोंका अभाव बतलाया है, उसका यह अभिप्राय समझना चाहिये कि अधिकांशमें उनमें इन दोषोंका अभाव था।

१५०-

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पञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः

श्रीहनुमान्‌जीके द्वारा भीमसेनको अपने विशाल रूपका प्रदर्शन और चारों वर्णोंके धर्मोंका प्रतिपादन

भीमसेन उवाच

पूर्वरूपमदृष्ट्वा ते न यास्यामि कथंचन ।
यदि तेऽहमनुग्राह्यो दर्शयात्मानमात्मना ॥ १ ॥

भीमसेनने कहा— कपिप्रवर! मैं आपका वह पूर्वरूप देखे बिना किसी प्रकार नहीं जाऊँगा। यदि मैं आपका कृपापात्र होऊँ, तो आप स्वयं ही अपने-आपको मेरे सामने प्रकट कर दीजिये ॥ १ ॥

वैशम्पायन उवाच

एवमुक्तस्तु भीमेन स्मितं कृत्वा प्लवंगमः ।
तद् रूपं दर्शयामास यद् वै सागरलङ्घने ॥ २ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! भीमसेनके ऐसा कहनेपर हनुमान्‌जीने मुसकराकर उन्हें अपना वह रूप दिखाया, जो उन्होंने समुद्र-लंघनके समय धारण किया था ॥ २ ॥

भ्रातुः प्रियमभीप्सन् वै चकार सुमहद् वपुः ।
देहस्तस्य ततोऽतीव वर्धतायामविस्तरैः ॥ ३ ॥
सद्रुमं कदलीषण्डं छादयन्नमितद्युतिः ।
गिरेश्चोच्छ्रयमाक्रम्य तस्थौ तत्र च वानरः ॥ ४ ॥

उन्होंने अपने भाईका प्रिय करनेकी इच्छासे अत्यन्त विशाल शरीर धारण किया। उनका शरीर लंबाई, चौड़ाई और ऊँचाईमें बहुत बड़ा हो गया। वे अमित तेजस्वी वानरवीर वृक्षोंसहित समूचे कदलीवनको आच्छादित करते हुए गन्धमादन पर्वतकी ऊँचाईको भी लाँघकर वहाँ खड़े हो गये ॥ ३-४ ॥

समुच्छ्रितमहाकायो द्वितीय इव पर्वत: ।
ताम्रेक्षणस्तीक्ष्णदंष्ट्रो भुकुटीकुटिलाननः ॥ ५ ॥

उनका वह उन्नत विशाल शरीर दूसरे पर्वतके समान प्रतीत होता था। लाल आँखों, तीखी दाढ़ों और टेढ़ी भौंहोंसे युक्त उनका मुख था ॥ ५ ॥

दीर्घलाङ्गूलमाविध्य दिशो व्याप्य स्थितः कपिः । तद् रूपं महदालक्ष्य भ्रातुः कौरवनन्दनः ॥ ६ ॥ विसिष्मिये तदा भीमो जहृषे च पुनः पुनः । तमर्कमिव तेजोभिः सौवर्णमिव पर्वतम् ॥ ७ ॥ प्रदीप्तमिव चाकाशं दृष्ट्वा भीमो न्यमीलयत् । आबभाषे च हनुमान् भीमसेनं स्मयन्निव ॥ ८ ॥ वे वानरवीर अपनी विशाल पूँछको हिलाते हुए सम्पूर्ण दिशाओंको घेरकर खड़े थे। भाईके उस विराट् रूपको देखकर कौरवनन्दन भीमको बड़ा आश्चर्य हुआ। उनके शरीरमें बार-बार हर्षसे रोमांच होने लगा। हनुमान्जी तेजमें सूर्यके समान दिखायी देते थे। उनका शरीर सुवर्णमय मेरुपर्वतके समान था और उनकी प्रभासे सारा आकाशमण्डल प्रज्वलित-सा जान पड़ता था। उनकी ओर देखकर भीमसेनने दोनों आँखें बंद कर लीं। तब हनुमान्जी उनसे मुसकराते हुए-से बोले— ॥ ६—८ ॥ एतावदिह शक्तस्त्वं द्रष्टुं रूपं ममानघ । वर्धेऽहं चाप्यतो भूयो यावन्मे मनसि स्थितम् । भीमशत्रुषु चात्यर्थं वर्धते मूर्तिरोजसा ॥ ९ ॥ ‘अनघ! तुम यहाँ मेरे इतने ही बड़े रूपको देख सकते हो, परंतु मैं इससे भी बड़ा हो सकता हूँ। मेरे मनमें जितने बड़े स्वरूपकी भावना होती है, उतना ही मैं बढ़ सकता हूँ।

भयानक शत्रुओंके समीप मेरी मूर्ति अत्यन्त ओजके साथ बढ़ती है' ॥ ९ ॥
वैशम्पायन उवाच

तदद्भुतं महारौद्रं विन्ध्यपर्वतसंनिभम् ।
दृष्ट्वा हनूमतो वर्ष्म सम्भ्रान्तः पवनात्मजः ॥ १० ॥
प्रत्युवाच ततो भीमः सम्प्रहृष्टतनूरुहः ।
कृताञ्जलिरदीनात्मा हनूमन्तमवस्थितम् ॥ ११ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! हनुमान्‌जीका वह विन्ध्य पर्वतके समान अत्यन्त भयंकर और अद्भुत शरीर देखकर वायुपुत्र भीमसेन घबरा गये। उनके शरीरमें रोंगटे खड़े होने लगे। उस समय उदार-हृदय भीमने हाथ जोड़कर अपने सामने खड़े हुए हनुमान्‌जीसे कहा— ॥ १०-११ ॥

दृष्टं प्रमाणं विपुलं शरीरस्यास्य ते विभो ।
संहरस्व महावीर्य स्वयमात्मानमात्मना ॥ १२ ॥
'प्रभो! आपके इस शरीरका विशाल प्रमाण प्रत्यक्ष देख लिया। महापराक्रमी वीर! अब आप स्वयं ही अपने शरीरको समेट लीजिये ॥ १२ ॥

न हि शक्नोमि त्वां द्रष्टुं दिवाकरमिवोदितम् ।
अप्रमेयमनाधृष्यं मैनाकमिव पर्वतम् ॥ १३ ॥
'आप तो सूर्यके समान उदित हो रहे हैं। मैं आपकी ओर देख नहीं सकता। आप अप्रमेय तथा दुर्धर्ष मैनाक पर्वतके समान खड़े हैं ॥ १३ ॥

विस्मयश्चैव मे वीर सुमहान् मनसोऽद्य वै ।
यद् रामस्त्वयि पार्श्वस्थे स्वयं रावणमभ्यगात् ॥ १४ ॥
'वीर! आज मेरे मनमें इस बातको लेकर बड़ा आश्चर्य हो रहा है कि आपके निकट रहते हुए भी भगवान् श्रीरामने स्वयं ही रावणका सामना किया ॥ १४ ॥

त्वमेव शक्तस्तां लङ्कां सयोधां सहवाहनाम् ।
स्वबाहुबलमाश्रित्य विनाशयितुमञ्जसा ॥ १५ ॥
'आप तो अकेले ही अपने बाहुबलका आश्रय लेकर योद्धाओं और वाहनोंसहित समूची लंकाको अनायास नष्ट कर सकते थे ॥ १५ ॥

न हि ते किंचिदप्राप्यं मारुतात्मज विद्यते ।
तव नैकस्य पर्याप्तो रावणः सगणो युधि ॥ १६ ॥
'मारुतनन्दन! आपके लिये कुछ भी असम्भव नहीं है। समरभूमिमें अपने सैनिकोंसहित रावण अकेले आपका ही सामना करनेमें समर्थ नहीं था' ॥ १६ ॥

वैशम्पायन उवाच

एवमुक्तस्तु भीमेन हनूमान् प्लवगोत्तमः ।

प्रत्युवाच ततो वाक्यं स्निग्धगम्भीरया गिरा ॥ १७ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! भीमके ऐसा कहनेपर कपिश्रेष्ठ हनुमान्‌जीने स्नेहयुक्त गम्भीर वाणीमें इस प्रकार उत्तर दिया— ॥ १७ ॥

हनूमानुवाच

एवमेतन्महाबाहो यथा वदसि भारत ।
भीमसेन न पर्याप्तो ममासौ राक्षसाधमः ॥ १८ ॥
**हनुमान्‌जी बोले—**भारत! महाबाहु भीमसेन! तुम जैसा कहते हो, ठीक ही है। वह अधम राक्षस वास्तवमें मेरा सामना नहीं कर सकता था ॥ १८ ॥
मया तु निहते तस्मिन् रावणे लोककण्टके ।
कीर्तिर्नश्येद् राघवस्य तत एतदुपेक्षितम् ॥ १९ ॥
किंतु सम्पूर्ण लोकोंको काँटेके समान कष्ट देनेवाला रावण यदि मेरे ही हाथों मारा जाता, तो भगवान् श्रीरामचन्द्रजीकी कीर्ति नष्ट हो जाती। इसीलिये मैंने उसकी उपेक्षा कर दी ॥ १९ ॥
तेन वीरेण तं हत्वा सगणं राक्षसाधमम् ।
आनीता स्वपुरं सीता कीर्तिश्चाख्यापिता नृषु ॥ २० ॥
वीरवर श्रीरामचन्द्रजी सेनासहित उस अधम राक्षसका वध करके सीताजीको अपनी अयोध्यापुरीमें ले आये। इससे मनुष्योंमें उनकी कीर्तिका भी विस्तार हुआ ॥ २० ॥
तद् गच्छ विपुलप्रज्ञ भ्रातुः प्रियहिते रतः ।
अरिष्टं क्षेममध्वानं वायुना परिरक्षितः ॥ २१ ॥
अच्छा, महाप्राज्ञ! अब तुम अपने भाईके प्रिय एवं हितमें तत्पर रहकर वायुदेवतासे सुरक्षित हो क्लेशरहित मार्गसे कुशलपूर्वक जाओ ॥ २१ ॥
एष पन्थाः कुरुश्रेष्ठ सौगन्धिकवनाय ते ।
द्रक्ष्यसे धनदोद्यानं रक्षितं यक्षराक्षसैः ॥ २२ ॥
कुरुश्रेष्ठ! यह मार्ग सौगन्धिक वनको जाता है। इससे जानेपर तुम्हें कुबेरका बगीचा दिखायी देगा, जो यक्षों तथा राक्षसोंसे सुरक्षित है ॥ २२ ॥
न च ते तरसा कार्यः कुसुमावचयः स्वयम् ।
दैवतानि हि मान्यानि पुरुषेण विशेषतः ॥ २३ ॥
वहाँ जाकर तुम जल्दीसे स्वयं ही उसके फूल न तोड़ने लगना। मनुष्योंको तो विशेषरूपसे देवताओंका सम्मान ही करना चाहिये ॥ २३ ॥
बलिहोमनमस्कारैर्मन्त्रैश्च भरतर्षभ ।
दैवतानि प्रसादं हि भक्त्या कुर्वन्ति भारत ॥ २४ ॥

भरतश्रेष्ठ! पूजा, होम, नमस्कार, मन्त्रजप तथा भक्तिभावसे देवता प्रसन्न होकर कृपा करते हैं॥ २४॥

मा तात साहसं कार्षीः स्वधर्मं परिपालय।
स्वधर्मस्थः परं धर्मं बुध्यस्व गमयस्व च॥ २५॥
तात! तुम दुःसाहस न कर बैठना, अपने धर्मका पालन करना, स्वधर्ममें स्थित रहकर तुम श्रेष्ठ धर्मको समझो और उसका पालन करो॥ २५॥

न हि धर्ममविज्ञाय वृद्धाननुपसेव्य च।
धर्मार्थौ वेदितुं शक्यौ बृहस्पतिसमैरपि॥ २६॥
क्योंकि धर्मको जाने बिना और वृद्ध पुरुषोंकी सेवा किये बिना बृहस्पति-जैसे विद्वानोंके लिये भी धर्म और अर्थके तत्त्वको समझना सम्भव नहीं है॥ २६॥

अधर्मो यत्र धर्माख्यो धर्मश्चाधर्मसंज्ञितः।
स विज्ञेयो विभागेन यत्र मुह्यन्त्यबुद्धयः॥ २७॥
कहीं अधर्म ही धर्म कहलाता है और कहीं धर्म भी अधर्म कहा जाता है। अतः धर्म और अधर्मके स्वरूपका पृथक्-पृथक् ज्ञान प्राप्त करना चाहिये। बुद्धिहीनलोग इसमें मोहित हो जाते हैं॥ २७॥

आचारसम्भवो धर्मो धर्मे वेदाः प्रतिष्ठिताः।
वेदैर्यज्ञाः समुत्पन्ना यज्ञैर्देवाः प्रतिष्ठिताः॥ २८॥
आचारसे धर्मकी उत्पत्ति होती है। धर्ममें वेदोंकी प्रतिष्ठा है। वेदोंसे यज्ञ प्रकट हुए हैं और यज्ञोंसे देवताओंकी स्थिति है॥ २८॥

वेदाचारविधानोक्तैर्यज्ञैर्धार्यन्ति देवताः।
बृहस्पत्युशनःप्रोक्तैर्नयैर्धार्यन्ति मानवाः॥ २९॥
वेदोक्त आचारके विधानसे बतलाये हुए यज्ञोंद्वारा देवताओंकी आजीविका चलती है और बृहस्पति तथा शुक्राचार्यकी कही हुई नीतियाँ मनुष्योंके जीवन-निर्वाहकी आधारभूमि हैं॥ २९॥

पण्याकरवणिज्याभिः कृष्यागोजाविपोषणैः।
विद्यया धार्यते सर्वं धर्मैरेतैर्द्विजातिभिः॥ ३०॥
हाट-बाजार करना, कर (लगान या टैक्स) लेना, व्यापार, खेती, गोपालन, भेड़ और बकरोंका पोषण तथा विद्या पढ़ना-पढ़ाना—इन धर्मानुकूल वृत्तियोंद्वारा द्विजगण सम्पूर्ण जगत्‌की रक्षा करते हैं॥ ३०॥

त्रयी वार्ता दण्डनीतिस्तिस्रो विद्या विजानताम्।
ताभिः सम्यक् प्रयुक्ताभिर्लोकयात्रा विधीयते॥ ३१॥
वेदत्रयी, वार्ता (कृषि-वाणिज्य आदि) और दण्डनीति—ये तीन विद्याएँ हैं (इनमें वेदाध्ययन ब्राह्मणकी, वार्ता वैश्यकी और दण्डनीति क्षत्रियकी जीविकावृत्ति है)। विज्ञ

पुरुषोंद्वारा इन वृत्तियोंका ठीक-ठीक प्रयोग होनेसे लोकयात्राका निर्वाह होता है ॥ ३१ ॥ सा चेद् धर्मकृता न स्यात् त्रयीधर्ममृते भुवि । दण्डनीतिमृते चापि निर्मर्यादमिदं भवेत् ॥ ३२ ॥ यदि लोकयात्रा धर्मपूर्वक न चलायी जाय, इस पृथ्वीपर वेदोक्त धर्मका पालन न हो और दण्डनीति भी उठा दी जाय तो यह सारा जगत् मर्यादाहीन हो जाय ॥ ३२ ॥ वार्ताधर्मे ह्यवर्तिन्यो विनश्येयुरिमाः प्रजाः । सुप्रवृत्तैस्त्रिभिर्ह्येतैर्धर्मं सूयन्ति वै प्रजाः ॥ ३३ ॥ यदि यह प्रजा वार्ता-धर्म (कृषि, गोरक्षा और वाणिज्य) में प्रवृत्त न हो तो नष्ट हो जायगी। इन तीनोंकी सम्यक् प्रवृत्ति होनेसे प्रजा धर्मका सम्पादन करती है ॥ ३३ ॥ द्विजातीनामृतं धर्मो ह्येकश्चैवकलक्षणः । यज्ञाध्ययनदानानि त्रयः साधारणाः स्मृताः ॥ ३४ ॥ द्विजातियोंका मुख्य धर्म है सत्य (सत्य-भाषण, सत्य-व्यवहार, सद्भाव)। यह धर्मका एक प्रधान लक्षण है। यज्ञ, स्वाध्याय और दान—ये तीन धर्म द्विजमात्रके सामान्य धर्म माने गये हैं ॥ ३४ ॥ याजनाध्यापनं विप्रे धर्मश्चैव प्रतिग्रहः । पालनं क्षत्रियाणां वै वैश्यधर्मश्च पोषणम् ॥ ३५ ॥ यज्ञ कराना, वेद और शास्त्रोंको पढ़ाना तथा दान ग्रहण करना—यह ब्राह्मणका ही आजीविकाप्रधान धर्म है। प्रजा-पालन क्षत्रियोंका और पशु-पालन वैश्योंका धर्म है ॥ ३५ ॥ शुश्रूषा च द्विजातीनां शूद्राणां धर्म उच्यते । भैक्ष्यहोमव्रतैर्हीनास्तथैव गुरुवासिताः ॥ ३६ ॥ ब्राह्मण आदि तीनों वर्णोंकी सेवा करना शूद्रोंका धर्म बताया गया है। तीनों वर्णोंकी सेवामें रहनेवाले शूद्रोंके लिये भिक्षा, होम और व्रत मना है ॥ ३६ ॥ क्षत्रधर्मोऽत्र कौन्तेय तव धर्मोऽत्र रक्षणम् । स्वधर्मं प्रतिपद्यस्व विनीतो नियतेन्द्रियः ॥ ३७ ॥ कुन्तीनन्दन! सबकी रक्षा करना क्षत्रियका धर्म है, अतः तुम्हारा धर्म भी यही है। अपने धर्मका पालन करो। विनयशील बने रहो और इन्द्रियोंको वशमें रखो ॥ ३७ ॥ वृद्धैः सम्मन्त्र्य सद्भिश्च बुद्धिमद्भिः श्रुतान्वितैः । आस्थितः शास्ति दण्डेन व्यसनी परिभूयते ॥ ३८ ॥ वेद-शास्त्रोंके विद्वान्, बुद्धिमान् तथा बड़े-बूढ़े श्रेष्ठ पुरुषोंसे सलाह करके उनका कृपापात्र बना हुआ राजा ही दण्डनीतिके द्वारा शासन कर सकता है। जो राजा दुर्व्यसनोंमें आसक्त होता है, उसका पराभव हो जाता है ॥ ३८ ॥ निग्रहानुग्रहैः सम्यग् यदा राजा प्रवर्तते ।

तदा भवन्ति लोकस्य मर्यादाः सुव्यवस्थिताः ॥ ३९ ॥ जब राजा निग्रह और अनुग्रहके द्वारा प्रजावर्गके साथ यथोचित बर्ताव करता है, तभी लोककी सम्पूर्ण मर्यादाएँ सुरक्षित होती हैं ॥ ३९ ॥ तस्माद् देशे च दुर्गे च शत्रुमित्रबलेषु च । नित्यं चारेण बोद्धव्यं स्थानं वृद्धिः क्षयस्तथा ॥ ४० ॥ इसलिये राजाको उचित है कि वह देश और दुर्गमें अपने शत्रु और मित्रोंके सैनिकोंकी स्थिति, वृद्धि और क्षयका गुप्तचरोंद्वारा सदा पता लगाता रहे ॥ ४० ॥ राज्ञामुपायश्चारश्च बुद्धिमन्त्रपराक्रमाः । निग्रहप्रग्रहौ चैव दाक्ष्यं वै कार्यसाधकम् ॥ ४१ ॥ साम, दान, दण्ड, भेद—ये चार उपाय, गुप्तचर, उत्तम बुद्धि, सुरक्षित मन्त्रणा, पराक्रम, निग्रह, अनुग्रह और चतुरता—ये राजाओंके लिये कार्य-सिद्धिके साधन हैं ॥ साम्ना दानेन भेदेन दण्डेनोपेक्षणेन च । साधनीयानि कर्माणि समासव्यासयोगतः ॥ ४२ ॥ साम, दान, भेद, दण्ड और उपेक्षा—इन नीतियोंमेंसे एक-दोके द्वारा या सबके एक साथ प्रयोगद्वारा राजाओंको अपने कार्य सिद्ध करने चाहिये ॥ ४२ ॥ मन्त्रमूला नयाः सर्वे चाराश्च भरतर्षभ । सुमन्त्रितेन या सिद्धिस्तां द्विजैः सह मन्त्रयेत् ॥ ४३ ॥ भरतश्रेष्ठ! सारी नीतियों और गुप्तचरोंका मूल आधार है मन्त्रणाको गुप्त रखना। उत्तम मन्त्रणा या विचारसे जो सिद्धि प्राप्त होती है, उसके लिये द्विजोंने साथ गुप्त परामर्श करना चाहिये ॥ ४३ ॥ स्त्रिया मूढेन बालेन लुब्धेन लघुनापि वा । न मन्त्रयीत गुह्यानि येषु चोन्मादलक्षणम् ॥ ४४ ॥ स्त्री, मूर्ख, बालक, लोभी और नीच पुरुषोंके साथ तथा जिसमें उन्मादका लक्षण दिखायी दे, उसके साथ भी गुप्त परामर्श न करे ॥ ४४ ॥ मन्त्रयेत् सह विद्वद्भिः शक्तैः कर्माणि कारयेत् । स्निग्धैश्च नीतिविन्यासान् मूर्खान् सर्वत्र वर्जयेत् ॥ ४५ ॥ विद्वानोंके साथ ही गुप्त मन्त्रणा करनी चाहिये। जो शक्तिशाली हों, उन्हींसे कार्य कराने चाहिये। जो स्नेही (सुहृद्) हों उन्हींके द्वारा नीतिके प्रयोगका काम कराना चाहिये। मूर्खोंको तो सभी कार्योंसे अलग रखना चाहिये ॥ ४५ ॥ धार्मिकान् धर्मकार्येषु अर्थकार्येषु पण्डितान् । स्त्रीषु क्लीबान् नियुञ्जीत क्रूरान् क्रूरेषु कर्मसु ॥ ४६ ॥ राजाको चाहिये कि वह धर्मके कार्योंमें धार्मिक पुरुषोंको, अर्थसम्बन्धी कार्योंमें अर्थशास्त्रके पण्डितोंको, स्त्रियोंकी देख-भालके लिये नपुंसकोंको और कठोर कार्योंमें क्रूर

स्वभावके मनुष्योंको लगावे ॥ ४६ ॥ स्वेभ्यश्चैव परेभ्यश्च कार्याकार्यसमुद्भवम् । बुद्धिः कर्मसु विज्ञेया रिपूणां च बलाबलम् ॥ ४७ ॥ बहुत-से कार्योंको आरम्भ करते समय अपने तथा शत्रुपक्षके लोगोंसे भी यह सलाह लेनी चाहिये कि अमुक काम करनेयोग्य है या नहीं। साथ ही, शत्रुकीपर प्रबलता और दुर्बलताको भी जाननेका प्रयत्न करना चाहिये ॥ ४७ ॥ बुद्ध्या स्वप्रतिपन्नेषु कुर्यात् साधुष्वनुग्रहम् । निग्रहं चाप्यशिष्टेषु निर्मर्यादेषु कारयेत् ॥ ४८ ॥ बुद्धिसे सोच-विचारकर अपनी शरणमें आये हुए श्रेष्ठ कर्म करनेवाले पुरुषोंपर अनुग्रह करना चाहिये और मर्यादा भंग करनेवाले दुष्ट पुरुषोंको दण्ड देना चाहिये ॥ ४८ ॥ निग्रहे प्रग्रहे सम्यग् यदा राजा प्रवर्तते । तदा भवति लोकस्य मर्यादा सुव्यवस्थिता ॥ ४९ ॥ जब राजा निग्रह और अनुग्रहमें ठीक तौरसे प्रवृत्त होता है, तभी लोककी मर्यादा सुरक्षित रहती है ॥ ४९ ॥ एष तेऽभिहितः पार्थ घोरो धर्मो दुरन्वयः । तं स्वधर्मविभागेन विनयस्थोऽनुपालय ॥ ५० ॥ कुन्तीनन्दन! यह मैंने तुम्हें कठोर राज्य-धर्मका उपदेश दिया है। इसके मर्मको समझना अत्यन्त कठिन है। तुम अपने धर्मके विभागानुसार विनीतभावसे इसका पालन करो ॥ ५० ॥ तपोधर्मदमेज्याभिर्विप्रा यान्ति यथा दिवम् । दानातिथ्यक्रियाधर्मैर्यान्ति वैश्याश्च सद्गतिम् ॥ ५१ ॥ क्षत्रं याति तथा स्वर्गं भुवि निग्रहपालनैः । सम्यक् प्रणीतदण्डा हि कामद्वेषविवर्जिताः । अलुब्धा विगतक्रोधाः सतां यान्ति सलोकताम् ॥ ५२ ॥ जैसे तपस्या, धर्म, इन्द्रिय-संयम और यज्ञानुष्ठानके द्वारा ब्राह्मण उत्तम लोकमें जाते हैं तथा जिस प्रकार वैश्य दान और आतिथ्यरूप धर्मोंसे उत्तम गति प्राप्त कर लेते हैं, उसी प्रकार इस लोकमें निग्रह और अनुग्रहके यथोचित प्रयोगसे क्षत्रिय स्वर्गलोकमें जाता है। जिनके द्वारा दण्डनीतिका उचित रीतिसे प्रयोग किया जाता है, जो राग-द्वेषसे रहित, लोभशून्य तथा क्रोधहीन हैं; वे क्षत्रिय सत्पुरुषोंको प्राप्त होनेवाले लोकोंमें जाते हैं ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां हनुमद्भीमसेनसंवादे पञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५० ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें हनुमान्‌जी और भीमसेनका संवादविषयक एक सौ पचासवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १५० ।।

१५१-

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एकपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः

श्रीहनुमान्‌जीका भीमसेनको आश्वासन और विदा देकर अन्तर्धान होना

वैशम्पायन उवाच

ततः संहृत्य विपुलं तद् वपुः कामतः कृतम् ।
भीमसेनं पुनर्दोर्भ्यां पर्यष्वजत वानरः ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तदनन्तर अपनी इच्छासे बढ़ाये हुए उस विशाल शरीरका उपसंहार कर वानरराज हनुमान्‌जीने अपनी दोनों भुजाओं‌द्वारा भीमसेनको हृदयसे लगा लिया ॥ १ ॥

परिष्वक्तस्य तस्याशु भ्रात्रा भीमस्य भारत ।
श्रमो नाशमुपागच्छत् सर्वं चासीत् प्रदक्षिणम् ॥ २ ॥
भारत! भाईका आलिंगन प्राप्त होनेपर भीमसेनकी सारी थकावट तत्काल नष्ट हो गयी और सब कुछ उन्हें अनुकूल प्रतीत होने लगा ॥ २ ॥

बलं चातिबलो मेने न मेऽस्ति सदृशो महान् ।
ततः पुनरथोवाच पर्यश्रुनयनो हरिः ॥ ३ ॥
भीममाभाष्य सौहार्दाद् बाष्पगद्गदया गिरा ।
गच्छ वीर स्वमावासं स्मर्तव्योऽस्मि कथान्तरे ॥ ४ ॥
अत्यन्त बलशाली भीमसेनको यह अनुभव हुआ कि मेरा बल बहुत बढ़ गया। अब मेरे समान दूसरा कोई महान् नहीं है। फिर हनुमान्‌जीने अपने नेत्रोंमें आँसू भरकर सौहार्दसे गद्गदवाणीद्वारा भीमसेनको सम्बोधित करके कहा—‘वीर! अब तुम अपने निवास-स्थानपर जाओ। बातचीतके प्रसंगमें कभी मेरा भी स्मरण करते रहना ॥ ३-४ ॥

इहस्थश्च कुरुश्रेष्ठ न निवेद्योऽस्मि कर्हिचित् । धनदस्यालयाच्चापि विसृष्टानां महाबल ।। ५ ।। देशकाल इहायातुं देवगन्धर्वयोषिताम् । ममापि सफलं चक्षुः स्मारितश्चास्मि राघवम् ।। ६ ।। रामाभिधानं विष्णुं हि जगद्धृदयनन्दनम् । सीतावक्त्रारविन्दार्कं दशास्यध्वान्तभास्करम् ।। ७ ।। मानुषं गात्रसंस्पर्शं गत्वा भीम त्वया सह । तदस्मद्दर्शनं वीर कौन्तेयामोघमस्तु ते ।। ८ ।।

‘कुरुश्रेष्ठ! मैं इस स्थानपर रहता हूँ, यह बात कभी किसीसे न कहना। महाबली वीर! अब कुबेरके भवनसे भेजी हुई देवांगनाओं तथा गन्धर्व-सुन्दरीयोंके यहाँ आनेका समय हो गया है। भीम! तुम्हें देखकर मेरी भी आँखें सफल हो गयीं। तुम्हारे साथ मिलकर तुम्हारे मानवशरीरका स्पर्श करके मुझे उन भगवान् रामचन्द्रजीका स्मरण हो आया है, जो श्रीराम-नामसे प्रसिद्ध साक्षात् विष्णु हैं। जगत्के हृदयको आनन्द प्रदान करनेवाले, मिथिलेशनन्दिनी सीताके मुखारविन्दको विकसित करनेके लिये सूर्यके समान तेजस्वी तथा दशमुख रावणरूपी अन्धकारराशिको नष्ट करनेके लिये साक्षात् भुवन-भास्कररूप हैं। वीर कुन्तीकुमार! तुमने जो मेरा दर्शन किया है, वह व्यर्थ नहीं जाना चाहिये ।। ५—८ ।।

भ्रातृत्वं त्वं पुरस्कृत्य वरं वरय भारत । यदि तावन्मया क्षुद्रा गत्वा वारणसाह्वयम् ॥ ९ ॥ धार्तराष्ट्रा निहन्तव्या यावदेतत् करोम्यहम् । शिलया नगरं वापि मर्दितव्यं मया यदि ॥ १० ॥ बद्ध्वा दुर्योधनं चाद्य आनयामि तवान्तिकम् । यावदेतत् करोम्यद्य कामं तव महाबल ॥ ११ ॥ ‘भारत! तुम मुझे अपना बड़ा भाई समझकर कोई वर माँगो। यदि तुम्हारी इच्छा हो कि मैं हस्तिनापुरमें जाकर तुच्छ धृतराष्ट्र-पुत्रोंको मार डालूँ तो मैं यह भी कर सकता हूँ अथवा यदि तुम चाहो कि मैं पत्थरोंकी वर्षासे सारे नगरको रौंदकर धूलमें मिला दूँ अथवा दुर्योधनको बाँधकर अभी तुम्हारे पास ला दूँ तो यह भी कर सकता हूँ। महाबली वीर! तुम्हारी जो इच्छा हो, वही पूर्ण कर दूँगा’ ।। ९—११ ।।

वैशम्पायन उवाच

भीमसेनस्तु तद् वाक्यं श्रुत्वा तस्य महात्मनः । प्रत्युवाच हनूमन्तं प्रहृष्टेनान्तरात्मना ॥ १२ ॥ कृतमेव त्वया सर्वं मम वानरपुङ्गव । स्वस्ति तेऽस्तु महाबाहो कामये त्वां प्रसीद मे ॥ १३ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! महात्मा हनुमान्जीका यह वचन सुनकर भीमसेनने हर्षोल्लासपूर्ण हृदयसे हनुमान्जीको इस प्रकार उत्तर दिया—‘वानरशिरोमणे! आपने मेरा यह सब कार्य कर दिया। आपका कल्याण हो। महाबाहो! अब आपसे मेरी इतनी ही कामना है कि आप मुझपर प्रसन्न रहिये—मुझपर आपकी कृपा बनी रहे ।। १२-१३ ।।

सनाथाः पाण्डवाः सर्वे त्वया नाथेन वीर्यवन् । तवैव तेजसा सर्वान् विजेष्यामो वयं परान् ॥ १४ ॥ ‘शक्तिशाली वीर! आप-जैसे नाथ (संरक्षक) को पाकर सब पाण्डव सनाथ हो गये। आपके ही प्रभावसे हमलोग अपने सब शत्रुओंको जीत लेंगे’ ।। १४ ।।

एवमुक्तस्तु हनुमान् भीमसेनमभाषत । भ्रातृत्वात् सौहृदाच्चैव करिष्यामि प्रियं तव ॥ १५ ॥ भीमसेनके ऐसा कहनेपर हनुमान्जीने उनसे कहा—‘तुम मेरे भाई और सुहृद् हो, इसलिये मैं तुम्हारा प्रिय अवश्य करूँगा’ ।। १५ ।।

चमूं विगाह्य शत्रूणां शरशक्तिसमाकुलाम् । यदा सिंहरवं वीर करिष्यसि महाबल ॥ १६ ॥ तदाहं बृंहयिष्यामि स्वरवेण रवं तव ।

विजयस्य ध्वजस्थश्च नादान् मोक्ष्यामि दारुणान् ॥ १७ ॥
शत्रूणां ये प्राणहराः सुखं येन हनिष्यथ ।
एवमाभाष्य हनुमांस्तदा पाण्डवनन्दनम् ॥ १८ ॥
मार्गमाख्याय भीमाय तत्रैवान्तरधीयत ॥ १९ ॥

‘महाबली वीर! जब तुम बाण और शक्तिके आघातसे व्याकुल हुई शत्रुओंकी सेनामें घुसकर सिंहनाद करोगे, उस समय मैं अपनी गर्जनासे तुम्हारे उस सिंहनादको और बढ़ा दूँगा। उसके सिवा अर्जुनकी ध्वजापर बैठकर मैं ऐसी भीषण गर्जना करूँगा, जो शत्रुओंके प्राणोंको हरनेवाली होगी, जिससे तुमलोग उन्हें सुगमतासे मार सकोगे।’ पाण्डवोंका आनन्द बढ़ानेवाले भीमसेनसे ऐसा कहकर हनुमान्‌जीने उन्हें जानेके लिये मार्ग बता दिया और स्वयं वहीं अन्तर्धान हो गये ॥ १६—१९ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां गन्धमादनप्रवेशे
हनुमद्भीमसंवादे एकपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५१ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें गन्धमादन पर्वतपर हनुमान्‌जी और भीमसेनका संवादविषयक एक सौ इक्यावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५१ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! उन कपिप्रवर हनुमान्‌जीके चले जानेपर बलवानोंमें श्रेष्ठ भीमसेन भी उनके बताये हुए मार्गसे विशाल गन्धमादन पर्वतपर विचरने लगे

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द्विपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः

भीमसेनका सौगन्धिक वनमें पहुँचना

वैशम्पायन उवाच

गते तस्मिन् हरिवरे भीमोऽपि बलिनां वरः ।
तेन मार्गेण विपुलं व्यचरद् गन्धमादनम् ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! उन कपिप्रवर हनुमान्‌जीके चले जानेपर बलवानोंमें श्रेष्ठ भीमसेन भी उनके बताये हुए मार्गसे विशाल गन्धमादन पर्वतपर विचरने लगे ॥ १ ॥

अनुस्मरन् वपुस्तस्य श्रियं चाप्रतिमां भुवि ।
माहात्म्यमनुभावं च स्मरन् दाशरथेर्ययौ ॥ २ ॥
मार्गमें वे हनुमान्‌जीके उस अद्भुत विशाल विग्रह और अनुपम शोभाका तथा दशरथनन्दन श्रीरामचन्द्रजीके अलौकिक माहात्म्य एवं प्रभावका बारंबार स्मरण करते जाते थे ॥ २ ॥

स तानि रमणीयानि वनान्युपवनानि च ।
विलोकयामास तदा सौगन्धिकवनेप्सया ॥ ३ ॥
फुल्लद्रुमविचित्राणि सरांसि सरितस्तथा ।
नानाकुसुमचित्राणि पुष्पितानि वनानि च ॥ ४ ॥
सौगन्धिक वनको प्राप्त करनेकी इच्छासे उन्होंने उस समय वहाँके सभी रमणीय वनों और उपवनोंका अवलोकन किया। विकसित वृक्षोंके कारण विचित्र शोभा धारण करनेवाले कितने ही सरोवर और सरिताओंपर दृष्टिपात किया तथा अनेक प्रकारके कुसुमोंसे अद्भुत प्रतीत होनेवाले खिले फूलोंसे युक्त काननोंका भी निरीक्षण किया ॥ ३-४ ॥

मत्तवारणयूथानि पङ्कक्लिन्नानि भारत ।
वर्षतामिव मेघानां वृन्दानि ददृशे तदा ॥ ५ ॥
भारत! उस समय बहते हुए मदके पंकसे भीगे मतवाले गजराजोंके अनेकानेक यूथ वर्षा करनेवाले मेघोंके समूहके समान दिखलायी देते थे ॥ ५ ॥

हरिणैश्चपलापाङ्गैर्हरिणीसहितैर्वनम् ।
सशष्पकवलैः श्रीमान् पथि दृष्ट्वा द्रुतं ययौ ॥ ६ ॥
शोभाशाली भीमसेन मुँहमें हरी घासका कौर लिये हुए चंचल नेत्रोंवाले हरिणों और हरिणियोंसे युक्त उस वनकी शोभा देखते हुए बड़े वेगसे चले जा रहे थे ॥ ६ ॥

महिषैश्च वराह्रैश्च शार्दूलैश्च निषेवितम् ।
व्यपेतभीर्गिरिं शौर्याद् भीमसेनो व्यगाहत ॥ ७ ॥

उन्होंने अपनी अद्भुत शूरतासे निर्भय होकर भैंसों, वराहों और सिंहोंसे सेवित गहन वनमें प्रवेश किया ।। ७ ।।

कुसुमानन्तगन्धैश्च ताम्रपल्लवकोमलैः ।
याच्यमान इवारण्ये द्रुमैर्मारुतकम्पितैः ।। ८ ।।
फूलोंकी अनन्त सुगन्धसे वासित तथा लाल-लाल पल्लवोंके कारण कोमल प्रतीत होनेवाले वृक्ष हवाके वेगसे हिल-हिलकर मानो उस वनमें भीमसेनसे याचना कर रहे थे ।। ८ ।।

कृतपद्माञ्जलिपुटा मत्तषट्पदसेविताः ।
प्रियतीर्थवना मार्गे पद्मिनीः समतिक्रमन् ।। ९ ।।
मार्गमें उन्हें अनेक ऐसी पुष्करिणियोंको लाँघना पड़ा, जिनके घाट और वन देखनेमें बहुत प्रिय लगते थे। मतवाले भ्रमर उनका सेवन करते थे तथा वे सम्पुटित कमलकोषोंसे अलंकृत हो ऐसी जान पड़ती थीं, मानो उन्होंने कमलोंकी अंजलि बाँध रखी थी ।। ९ ।।

मज्जमानमनोदृष्टिः फुल्लेषु गिरिसानुषु ।
द्रौपदीवाक्यपाथेयो भीमः शीघ्रतरं ययौ ।। १० ।।
भीमसेनका मन और उनके नेत्र कुसुमोंसे अलंकृत पर्वतीय शिखरोंपर लगे थे। द्रौपदीका अनुरोधपूर्ण वचन ही उनके लिये पाथेय था और इस अवस्थामें वे अत्यन्त शीघ्रतापूर्वक चले जा रहे थे ।। १० ।।

परिवृत्तेऽहनि ततः प्रकीर्णहरिणे वने ।
काञ्चनैर्विमलैः पद्मैर्ददर्श विपुलां नदीम् ।। ११ ।।
दिन बीतते-बीतते भीमसेनने एक वनमें जहाँ चारों ओर बहुत-से हरिण विचर रहे थे, सुन्दर सुवर्णमय कमलोंसे सुशोभित विशाल नदी देखी ।। ११ ।।

हंसकारण्डवयुतां चक्रवाकोपशोभिताम् ।
रचितामिव तस्याद्रेर्मालां विमलपङ्कजाम् ।। १२ ।।
उसमें हंस और कारण्डव आदि जलपक्षी निवास करते थे। चक्रवाक उसकी शोभा बढ़ाते थे। वह नदी क्या थी उस पर्वतके लिये स्वच्छ सुन्दर कमलोंकी माला-सी रची गयी थी ।। १२ ।।

तस्यां नद्यां महासत्त्वः सौगन्धिकवनं महत् ।
अपश्यत् प्रीतिजननं बालार्कसदृशद्युति ।। १३ ।।
महान् धैर्य और उत्साहसे सम्पन्न वीरवर भीमसेनने उसी नदीमें विशाल सौगन्धिक वन देखा, जो उनकी प्रसन्नताको बढ़ानेवाला था। उस वनमें प्रभातकालीन सूर्यकी भाँति प्रभा फैल रही थी ।। १३ ।।

तद् दृष्ट्वा लब्धकामः स मनसा पाण्डुनन्दनः ।
वनवासपरिक्लिष्टां जगाम मनसा प्रियाम् ।। १४ ।।

उस वनको देखकर पाण्डुनन्दन भीमने मन-ही-मन यह अनुभव किया कि मेरा मनोरथ पूर्ण हो गया। फिर उन्हें वनवासके क्लेशोंसे पीड़ित अपनी प्रियतमा द्रौपदीकी याद आ गयी ।। १४ ।।

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां सौगन्धिकाहरणे
द्विपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ।। १५२ ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें सौगन्धिक कमलको लानेसे सम्बन्ध रखनेवाला एक सौ बावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १५२ ।।

कुबेरभवनाभ्याशे जातां पर्वतनिर्झरैः ।

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त्रिपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः

क्रोधवश नामक राक्षसोंका भीमसेनसे सरोवरके निकट आनेका कारण पूछना

वैशम्पायन उवाच

स गत्वा नलिनीं रम्यां राक्षसैरभिरक्षिताम् ।
कैलासशिखराभ्याशे ददर्श शुभकाननाम् ॥ १ ॥
कुबेरभवनाभ्याशे जातां पर्वतनिर्झरैः ।
सुरम्यां विपुलच्छायां नानाद्रुमलताकुलाम् ॥ २ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! इस प्रकार आगे बढ़नेपर भीमसेनने कैलास पर्वतके निकट कुबेरभवनके समीप एक रमणीय सरोवर देखा, जिसके आस-पास सुन्दर वनस्थली शोभा पा रही थी। बहुत-से राक्षस उसकी रक्षाके लिये नियुक्त थे। वह सरोवर पर्वतीय झरनोंके जलसे भरा था। वह देखनेमें बहुत ही सुन्दर, घनी छायासे सुशोभित तथा अनेक प्रकारके वृक्षों और लताओंसे व्याप्त था ॥ १-२ ॥

हरिताम्बुजसंच्छन्नां दिव्यां कनकपुष्कराम् ।
नानापक्षिजनाकीर्णां सूपतीर्थामकर्दमाम् ॥ ३ ॥
हरे रंगके कमलोंसे वह दिव्य सरोवर ढका हुआ था। उसमें सुवर्णमय कमल खिले थे। वह नाना प्रकारके पक्षियोंसे युक्त था। उसका किनारा बहुत सुन्दर था और उसमें कीचड़ नहीं था। ॥ ३ ॥

अतीवरम्यां सुजलां जातां पर्वतसानुषु ।
विचित्रभूतां लोकस्य शुभामद्भुतदर्शनाम् ॥ ४ ॥
वह सरोवर अत्यन्त रमणीय, सुन्दर जलसे परिपूर्ण, पर्वतीय शिखरोंके झरनोंसे उत्पन्न, देखनेमें विचित्र, लोकके लिये मंगलकारक तथा अद्भुत दृश्यसे सुशोभित था ॥ ४ ॥

तत्रामृतरसं शीतं लघु कुन्तीसुतः शुभम् ।
ददर्श विमलं तोयं पिबंश्च बहु पाण्डवः ॥ ५ ॥
उस सरोवरमें कुन्तीकुमार पाण्डुपुत्र भीमने अमृतके समान स्वादिष्ट, शीतल, हलका, शुभकारक और निर्मल जल देखा तथा उसे भरपेट पीया ॥ ५ ॥

तां तु पुष्करिणीं रम्यां दिव्यसौगन्धिकावृताम् ।
जातरूपमयैः पद्मैश्छन्नां परमगन्धिभिः ॥ ६ ॥
वैदूर्यवरनालैश्च बहुचित्रैर्मनोरमैः ।
हंसकारण्डवोधूतैः सृजद्भिरमलं रजः ॥ ७ ॥

वह सरोवर दिव्य सौगन्धिक कमलोंसे आवृत तथा रमणीय था। परम सुगन्धित सुवर्णमय कमल उसे ढँके हुए थे। उन कमलोंकी नाल उत्तम वैदूर्यमणिमय थी। वे कमल देखनेमें अत्यन्त विचित्र और मनोरम थे। हंस और कारण्डव आदि पक्षी उन कमलोंको हिलाते रहते थे, जिससे वे निर्मल पराग प्रकट किया करते थे ॥ ६-७ ॥ आक्रीडं राजराजस्य कुबेरस्य महात्मनः । गन्धर्वैरप्सरोभिश्च देवैश्च परमार्चितम् ॥ ८ ॥ वह सरोवर राजाधिराज महाबुद्धिमान् कुबेरका क्रीडास्थल था। गन्धर्व, अप्सरा और देवता भी उसकी बड़ी प्रशंसा करते थे ॥ ८ ॥ सेवितामृषिभिर्दिव्यैर्यक्षैः किम्पुरुषैस्तथा । राक्षसैः किन्नरैश्चापि गुप्तां वैश्रवणेन च ॥ ९ ॥ दिव्य ऋषि-मुनि, यक्ष, किम्पुरुष, राक्षस और किन्नर उसका सेवन करते थे तथा साक्षात् कुबेरके द्वारा उसके संरक्षणकी व्यवस्था की जाती थी ॥ ९ ॥ तां च दृष्ट्वैव कौन्तेयो भीमसेनो महाबलः । बभूव परमप्रीतो दिव्यं सम्प्रेक्ष्य तत् सरः ॥ १० ॥ कुन्तीनन्दन महाबली भीमसेन उस दिव्य सरोवरको देखते ही अत्यन्त प्रसन्न हो गये ॥ १० ॥ तच्च क्रोधवशा नाम राक्षसा राजशासनात् । रक्षन्ति शतसाहस्राश्चित्रायुधपरिच्छदाः ॥ ११ ॥ महाराज कुबेरके आदेशसे क्रोधवश नामक राक्षस, जिनकी संख्या एक लाख थी, विचित्र आयुध और वेशभूषासे सुसज्जित हो उसकी रक्षा करते थे ॥ ११ ॥ ते तु दृष्ट्वैव कौन्तेयमजिनैः प्रतिवासितम् । रुक्माङ्गदधरं वीरं भीमं भीमपराक्रमम् ॥ १२ ॥ सायुधं बद्धनिस्त्रिंशमशङ्कितमरिंदमम् । पुष्करेप्सुमुपायान्तमन्योन्यमभिचुक्रुशुः ॥ १३ ॥ उस समय भयानक पराक्रमी कुन्तीकुमार वीरवर भीम अपने अंगोंमें मृगचर्म लपेटे हुए थे। भुजाओंमें सोनेके अंगद (बाजूबंद) पहन रखे थे। वे धनुष और गदा आदि आयुधोंसे युक्त थे। उन्होंने कमरमें तलवार बाँध रखी थी। वे शत्रुओंका दमन करनेमें समर्थ और निर्भीक थे। उन्हें कमल लेनेकी इच्छासे वहाँ आते देख वे पहरा देनेवाले राक्षस आपसमें कोलाहल करने लगे ॥ अयं पुरुषशार्दूलः सायुधोऽजिनसंवृतः । यच्चिकीर्षुरिह प्राप्तस्तत् सम्प्रष्टुमिहार्हथ ॥ १४ ॥ उनमें परस्पर इस प्रकार बातचीत हुई—'देखो, यह नरश्रेष्ठ मृगचर्मसे आच्छादित होनेपर भी हाथमें आयुध लिये हुए है। यह यहाँ जिस कार्यके लिये आया है, उसे

पूछो' ॥ १४ ॥
ततः सर्वे महाबाहुं समासाद्य वृकोदरम् ।
तेजोयुक्तमपृच्छन्त कस्त्वमाख्यातुमर्हसि ॥ १५ ॥
तब वे सब राक्षस परम तेजस्वी महाबाहु भीमसेनके पास आकर पूछने लगे—'तुम कौन हो?' यह बताओ ॥
मुनिवेषधरश्चैव सायुधश्चैव लक्ष्यसे ।
यदर्थमभिसम्प्राप्तस्तदाचक्ष्व महामते ॥ १६ ॥
'महामते! तुमने वेष तो मुनियोंका-सा धारण कर रखा है; परंतु आयुधोंसे सम्पन्न दिखायी देते हो। तुम किसलिये यहाँ आये हो?' बताओ ॥ १६ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां सौगन्धिकाहरणे
त्रिपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें
सौगन्धिकाहरणविषयक एक सौ तिरपनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५३ ॥