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महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

हनुमत्प्रमुखाश्चापि विश्रान्तास्ते प्लवङ्गमाः । अभिजग्मुर्हरीन्द्रं तं रामलक्ष्मणसंनिधौ ॥ ३१ ॥ हनुमान् आदि श्रेष्ठ वानर विश्राम कर लेनेके पश्चात् श्रीराम और लक्ष्मणके समीप बैठे हुए उन वानरराज सुग्रीवके पास गये ॥ ३१ ॥

गतिं च मुखवर्णं च दृष्ट्वा रामो हनूमतः । अगमत् प्रत्ययं भूयो दृष्टा सीतेति भारत ॥ ३२ ॥ युधिष्ठिर! हनुमान्‌जीकी चाल-ढाल और मुखकी कान्ति देखकर श्रीरामचन्द्रजीको यह विश्वास हो गया कि इन्होंने सीताको देखा है ॥ ३२ ॥

हनुमत्प्रमुखास्ते तु वानराः पूर्णमानसाः । प्रणेमुर्विधिवद् रामं सुग्रीवं लक्ष्मणं तथा ॥ ३३ ॥ सफलमनोरथ हुए हनुमान् आदि प्रमुख वानरोंने श्रीराम, सुग्रीव तथा लक्ष्मणको विधिपूर्वक प्रणाम किया ॥ ३३ ॥

तानुवाचानतान् रामः प्रगृह्य सशरं धनुः । अपि मां जीवयिष्यध्वमपि वः कृतकृत्यता ॥ ३४ ॥ उस समय श्रीरामचन्द्रजी धनुष-बाण लेकर उन प्रणाम करते हुए वानरोंसे पूछा—'क्या तुमलोग सीताका अमृतमय समाचार सुनाकर मुझे जीवनदान दोगे? क्या तुम लोगोंको अपने कार्यमें सफलता मिली है? ॥ ३४ ॥

अपि राज्यमयोध्यायां कारयिष्याम्यहं पुनः । निहत्य समरे शत्रूनाहृत्य जनकात्मजाम् ॥ ३५ ॥ 'क्या मैं युद्धमें शत्रुओंको मारकर जनकनन्दिनी सीताको साथ ले पुनः अयोध्यामें रहकर राज्य करूँगा? ॥

अमोक्षयित्वा वैदेहीमहत्वा च रणे रिपून् । हृतदारोऽवधूतश्च नाहं जीवितुमुत्सहे ॥ ३६ ॥ 'विदेहनन्दिनी सीताको बिना छुड़ाने तथा समरभूमिमें शत्रुओंका बिना संहार किये पत्नीको खोकर और अवधूत बनकर मैं जीवित नहीं रह सकता' ॥ ३६ ॥

इत्युक्तवचनं रामं प्रत्युवाचानिलात्मजः । प्रियमाख्यामि ते राम दृष्टा सा जानकी मया ॥ ३७ ॥ श्रीरामचन्द्रजीके ऐसा कहनेपर वायुपुत्र हनुमान्‌जीने उन्हें इस प्रकार उत्तर दिया—'श्रीराम! मैं आपको प्रिय समाचार सुना रहा हूँ। मैंने जनकनन्दिनी सीताका दर्शन किया है ॥ ३७ ॥

विचित्य दक्षिणामाशां सपर्वतवनाकराम् । श्रान्ताः काले व्यतीते स्म दृष्टवन्तो महागुहाम् ॥ ३८ ॥

'पर्वत, वन तथा आकरोंसहित सम्पूर्ण दक्षिण दिशामें श्रीसीताजीका अनुसंधान करके जब हमलोग थक गये और यहाँ लौटनेका समय व्यतीत हो गया, तब हमें एक बहुत बड़ी गुफा दिखायी दी ।। ३८ ।।

प्रविशामो वयं तां तु बहुयोजनमायताम् ।
सान्धकारां सुविपिनां गहनां कीटसेविताम् ।। ३९ ।।
गत्वा सुमहदध्वानमादित्यस्य प्रभां ततः ।
दृष्टवन्तः स्म तत्रैव भवनं दिव्यमन्तरा ।। ४० ।।
'वह कई योजन लंबी थी। उसमें अन्धकार भरा हुआ था। उसके भीतर घने जंगल थे। उस गहन गुफामें बहुत-से कीड़े रहा करते थे। उसमें प्रवेश करके हमने बहुत दूरतकका रास्ता पार कर लिया। तत्पश्चात् सूर्यके प्रकाशका दर्शन हुआ। उसी गुफाके अंदर एक दिव्य भवन शोभा पा रहा था ।। ३९-४० ।।
मयस्य किल दैत्यस्य तदासीद् वेश्म राघव ।
तत्र प्रभावती नाम तपोऽतप्यत तापसी ।। ४१ ।।
'रघुनन्दन! वह सुन्दर भवन दैत्यराज मयका निवासस्थान बताया जाता है। उसमें प्रभावती नामकी एक तपस्विनी तप कर रही थी ।। ४१ ।।

तया दत्तानि भोज्यानि पानानि विविधानि च । भुक्त्वा लब्धबलाः सन्तस्तयोक्तेन पथा ततः ॥ ४२ ॥ निर्याय तस्मादुद्देशात् पश्यामो लवणाम्भसः । समीपे सह्यमलयौ दर्दुरं च महागिरिम् ॥ ४३ ॥ ‘उसने हमें अनेक प्रकारके भोज्य पदार्थ तथा भाँति-भाँतिके पीने योग्य रस दिये। उन्हें खाकर हमें नूतन बल प्राप्त हुआ। फिर उसीके बताये हुए मार्गसे जब हम गुफासे बाहर निकले, तब हमें लवणसमुद्रके निकटवर्ती सह्य, मलय और दर्दुर नामक महान् पर्वत दिखायी दिये ॥ ४२-४३ ॥

ततो मलयमारुह्य पश्यन्तो वरुणालयम् । विषण्णा व्यथिताः खिन्ना निराशा जीविते भृशम् ॥ ४४ ॥ ‘फिर हमलोग मलयाचलपर चढ़कर समुद्रकी ओर देखने लगे। उसकी विशालता देखकर हमारा हृदय विषादसे भर गया। हम खिन्न और व्यथित हो गये। हमें जीवनकी कोई आशा न रही ॥ ४४ ॥

अनेकशतविस्तीर्णं योजनानां महोदधिम् । तिमिनक्रझषावासं चिन्तयन्तः सुदुःखिताः ॥ ४५ ॥ ‘उस महासागरका विस्तार कई सौ योजनोंमें था। उसमें तिमि, मगर और बड़े-बड़े मत्स्य निवास करते थे। उसके इस स्वरूपका स्मरण करके हम सब लोग बहुत दुःखी हो गये ॥ ४५ ॥

तत्रानशनसंकल्पं कृत्वाऽऽसीना वयं तदा । ततः कथान्ते गृध्रस्य जटायोरभवत् कथा ॥ ४६ ॥ ‘अन्तमें अनशन करके प्राण त्याग देनेका संकल्प लेकर हम सब लोग वहाँ बैठ गये। फिर आपसमें बातचीत होने लगी और बीचमें जटायुका प्रसंग छिड़ गया ॥ ४६ ॥

ततः पर्वतशृङ्गाभं घोररूपं भयावहम् । पक्षिणं दृष्टवन्तः स्म वैनतेयमिवापरम् ॥ ४७ ॥ ‘इतनेमें ही हमने दूसरे गरुड़की भाँति एक भयंकर पक्षीको देखा जो पर्वतशिखरके समान जान पड़ता था। उसका स्वरूप बड़ा डरावना था ॥ ४७ ॥

सोऽस्मानतर्कयद् भोक्तुमथाभ्येत्य वचोऽब्रवीत् । भोः क एष मम भ्रातुर्जटायोः कुरुते कथाम् ॥ ४८ ॥ सम्पातिर्नाम तस्याहं ज्येष्ठो भ्राता खगाधिपः । अन्योन्यस्पर्धयारूढावावामादित्यसत्पदम् ॥ ४९ ॥ ‘वह पक्षी हमें खा जानेकी युक्ति सोचने लगा। फिर हमारे पास आकर बोला—‘अजी! कौन मेरे भाई जटायुकी बात कर रहा था। मैं उसका बड़ा भाई पक्षिराज सम्पाति हूँ। हम

दोनों एक-दूसरेसे होड़ लगाकर आकाशमें सूर्यमण्डलतक पहुँचनेके लिये उड़े थे॥ ४८-४९॥

ततो दग्धाविमौ पक्षौ न दग्धौ तु जटायुषः ।
तदा मे चिरदृष्टः स भ्राता गृध्रपतिः प्रियः ॥ ५० ॥
निर्दग्धपक्षः पतितो ह्यहमस्मिन् महागिरौ ।
‘इससे मेरी ये दोनों पाँखें जल गयीं, परंतु जटायुके पंख नहीं जले। तबसे दीर्घकाल व्यतीत हो गया। उन्हीं दिनों मैंने अपने प्रिय भाई गृध्रराज जटायुको देखा था। पंख जल जानेसे मैं इसी महान् पर्वतपर गिर पड़ा' ॥ ५० १/२ ॥

तस्यैवं वदतोऽस्माभिर्हतो भ्राता निवेदितः ॥ ५१ ॥
व्यसनं भवतश्चेदं संक्षेपाद् वै निवेदितम् ।
‘सम्पाति जब इस तरहकी बातें कर रहा था, उस समय हमलोगोंने बताया कि जटायु मारे गये। साथ ही हमने संक्षेपसे आपके ऊपर आये हुए इस संकटका समाचार भी निवेदन कर दिया॥ ५१ १/२ ॥

स सम्पातिस्तदा राजन् श्रुत्वा सुमहदप्रियम् ॥ ५२ ॥
विषण्णचेताः पप्रच्छ पुनरस्मानरिंदम ।
कः स रामः कथं सीता जटायुश्च कथं हतः ॥ ५३ ॥
इच्छामि सर्वमेवैतच्छ्रोतुं प्लवगसत्तमाः ।
‘राजन्! यह अत्यन्त अप्रिय वृत्तान्त सुनकर उस सम्पातिके मनमें बड़ा खेद हुआ। शत्रुदमन! उसने पुनः हमलोगोंसे पूछा—‘श्रेष्ठ वानरगण! वे श्रीराम कौन हैं, सीता कैसी है और जटायु किस प्रकार मारे गये? ये सब बातें मैं विस्तारपूर्वक सुनना चाहता हूँ’॥ ५२-५३ १/२ ॥

तस्याहं सर्वमेवैतद् भवतो व्यसनागमम् ॥ ५४ ॥
प्रायोपवेशने चैव हेतुं विस्तरशोऽब्रुवम् ।
‘तब मैंने सम्पातिके समक्ष आपपर संकट आनेका यह सारा वृत्तान्त और अपने आमरण अनशनका कारण विस्तारपूर्वक बताया॥ ५४ १/२ ॥

सोऽस्मानुत्थापयामास वाक्येनानेन पक्षिराट् ॥ ५५ ॥
रावणो विदितो मह्यं लङ्का चास्य महापुरी ।
दृष्टा पारे समुद्रस्य त्रिकूटगिरिकन्दरे ॥ ५६ ॥
भवित्री तत्र वैदेही न मेऽस्त्यत्र विचारणा ।

‘तब पक्षिराज सम्पातिने अपने निम्नांकित वचनद्वारा हमें उत्साहित करके उठाया। ‘वानरो! मैं रावणको जानता हूँ। उसकी महापुरी लंका भी मैंने देखी है। वह समुद्रके उस पार त्रिकूटगिरिकी कन्दरामें बसी है। विदेहकुमारी सीता अवश्य वहीं होंगी, इस विषयमें मुझे कोई अन्यथा विचार नहीं हो रहा है’॥ ५५-५६१/२॥

इति तस्य वचः श्रुत्वा वयमुत्थाय सत्वतः ॥ ५७ ॥
सागरक्रमणे मन्त्रं मन्त्रयामः परंतप ।
परंतप! उसकी यह बात सुनकर हमलोग तुरंत उठे और समुद्र पार करनेके विषयमें परस्पर सलाह करने लगे ॥ ५७१/२ ॥

नाध्यवास्यद् यदा कश्चित् सागरस्य विलङ्घनम् ॥ ५८ ॥
ततः पितरमाविश्य पुप्लवेऽहं महार्णवम् ।
शतयोजनविस्तीर्णं निहत्य जलराक्षसीम् ॥ ५९ ॥
‘जब कोई भी समुद्रको लाँघनेका साहस न कर सका, तब मैं अपने पिता वायुके स्वरूपमें प्रविष्ट होकर वह सौ योजन विस्तृत महासागर लाँघ गया। उस समय समुद्रके जलमें एक राक्षसी रहती थी, जिसे अपने मार्गमें विघ्न डालनेपर मैंने मार डाला था॥ ५८-५९॥

तत्र सीता मया दृष्टा रावणान्तःपुरे सती ।
उपवासतपःशीला भर्तृदर्शनलालसा ॥ ६० ॥
लंकामें पहुँचकर रावणके अन्तःपुरमें मैंने सती सीताका दर्शन किया, जो अपने पतिदेवताके दर्शनकी लालसासे निरन्तर उपवास और तपस्या किया करती हैं॥

जटिला मलदिग्धाङ्गी कृशा दीना तपस्विनी ।
निमित्तैस्तामहं सीतामुपलभ्य पृथग्विधैः ॥ ६१ ॥
उपसृत्याब्रुवं चार्यामभिगम्य रहोगताम् ।
सीते रामस्य दूतोऽहं वानरो मारुतात्मजः ॥ ६२ ॥
‘उनके केश जटाके रूपमें परिणत हो गये थे। अंग-अंगमें मैल जम गयी थी। वे दीन, दुर्बल और तपस्विनी दिखायी देती थीं। कई भिन्न-भिन्न कारणोंसे उन्हें आर्या सीताके रूपमें पहचानकर मैं एकान्तमें उनके निकट गया और इस प्रकार बोला—‘देवि सीते! मैं श्रीरामचन्द्रजीका दूत पवनपुत्र हनुमान् नामक वानर हूँ॥ ६१-६२॥

त्वद्दर्शनमभिप्रेप्सुरिह प्राप्तो विहायसा ।
राजपुत्रौ कुशलिनौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ ॥ ६३ ॥
‘आपके दर्शनके लिये मैं आकाशमार्गसे यहाँ आया हूँ। दोनों भाई राजकुमार श्रीराम और लक्ष्मण कुशलसे हैं॥ ६३॥

सर्वशाखामृगेन्द्रेण सुग्रीवेणाभिपालितौ ।
कुशलं त्वाब्रवीद् रामः सीते सौमित्रिणा सह ॥ ६४ ॥

‘सम्पूर्ण वानरोंके अधीश्वर सुग्रीव इस समय उनकी रक्षामें तत्पर हैं। देवि! सुमित्रानन्दन लक्ष्मणके साथ भगवान् श्रीरामने आपको अपने सकुशल होनेका समाचार कहलाया है॥ ६४॥

सखिभावाच्च सुग्रीवः कुशलं त्वानुपृच्छति ।
क्षिप्रमेष्यति ते भर्ता सर्वशाखामृगैः सह ॥ ६५ ॥
प्रत्ययं कुरु मे देवि वानरोऽस्मि न राक्षसः ।
‘उनके मित्र होनेके नाते सुग्रीव भी आपका कुशल-मंगल पूछते हैं। आपके स्वामी भगवान् श्रीराम सम्पूर्ण वानरोंकी सेनाके साथ शीघ्र यहाँ पधारेंगे। देवि! मेरा विश्वास कीजिये। मैं राक्षस नहीं, वानर हूँ’ ॥ ६५ १/२ ॥

मुहूर्तमिव च ध्यात्वा सीता मां प्रत्युवाच ह ॥ ६६ ॥
अवैमि त्वां हनूमन्तमविन्ध्यवचनादहम् ।
अविन्ध्यो हि महाबाहो राक्षसो वृद्धसम्मतः ॥ ६७ ॥
‘तदनन्तर सीताने दो घड़ीतक कुछ सोचकर मुझसे इस प्रकार कहा—‘महाबाहो! मैं अविन्ध्यके कहनेसे यह विश्वास करती हूँ कि तुम हनुमान् हो। अविन्ध्य राक्षसकुलमें उत्पन्न होते हुए भी वृद्ध एवं आदरणीय हैं’ ॥ ६६-६७ ॥

कथितस्तेन सुग्रीवस्त्वद्विधैः सचिवैर्वृतः ।
गम्यतामिति चोक्त्वा मां सीता प्रादादिमं मणिम् ॥ ६८ ॥
धारिता येन वैदेही कालमेतमनिन्दिता ।
प्रत्ययार्थं कथां चेमां कथयामास जानकी ॥ ६९ ॥
‘उन्होंने ही तुम्हारे-जैसे मन्त्रियोंसे युक्त सुग्रीवका परिचय दिया है। वत्स! अब तुम भगवान् श्रीरामके पास जाओ।’ ऐसा कहकर सती साध्वी सीताने अपनी पहचानके लिये यह एक मणि दी, जिसको धारण करके वे अबतक अपने प्राणोंकी रक्षा करती आयी हैं। जानकीने विश्वास दिलानेके लिये यह एक कथा भी सुनायी थी— ॥ ६८-६९ ॥

क्षिप्तामिषीकां काकाय चित्रकूट महागिरौ ।
भवता पुरुषव्याघ्र प्रत्यभिज्ञानकारणात् ॥ ७० ॥
(एकाक्षिविकलः काकः सुदुष्टात्मा कृतश्च वै ।)
‘पुरुषसिंह! उस कथाका मुख्य विषय यह है कि आपने महापर्वत चित्रकूटपर रहते समय किसी कौएके ऊपर एक सींकका बाण चलाया था और उस दुष्टात्मा कौएको एक आँखसे वंचित कर दिया था। यह प्रसंग उन्होंने केवल अपनी पहचान करानेके उद्देश्यसे प्रस्तुत किया था ॥ ७० ॥

ग्राहयित्वाहमात्मानं ततो दग्ध्वा च तां पुरीम् ।
सम्प्राप्त इति तं रामः प्रियवादिनमार्चयत् ॥ ७१ ॥

'तदनन्तर मैंने जान-बूझकर अपने-आपको राक्षसोंद्वारा पकड़वा दिया और लंकापुरीको जलाकर समुद्रके इस पार आ पहुँचा।' यह सब समाचार सुनकर श्रीरामचन्द्रजीने प्रियवादी हनुमान्‌का अत्यन्त आदर-सत्कार किया ॥ ७१ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि रामोपाख्यानपर्वणि हनुमत्प्रत्यागमने
द्व्यशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २८२ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत रामोपाख्यानपर्वमें हनुमान्जीके लंकासे लौटनेसे सम्बन्ध रखनेवाला दो सौ बयासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २८२ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १/३ श्लोक मिलाकर कुल ७१ १/३ श्लोक हैं)

मार्कण्डेयजी कहते हैं—युधिष्ठिर! तदनन्तर सुग्रीवकी आज्ञाके अनुसार बड़े-बड़े वानरवीर माल्यवान् पर्वतपर लक्ष्मण आदिके साथ बैठे हुए भगवान् श्रीरामके पास

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त्र्यशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः

वानर-सेनाका संगठन, सेतुका निर्माण, विभीषणका अभिषेक और लंकाकी सीमामें सेनाका प्रवेश तथा अंगदको रावणके पास दूत बनाकर भेजना

मार्कण्डेय उवाच

ततस्तत्रैव रामस्य समासीनस्य तैः सह ।
समाजग्मुः कपिश्रेष्ठाः सुग्रीववचनात् तदा ॥ १ ॥
मार्कण्डेयजी कहते हैं—युधिष्ठिर! तदनन्तर सुग्रीवकी आज्ञाके अनुसार बड़े-बड़े वानरवीर माल्यवान् पर्वतपर लक्ष्मण आदिके साथ बैठे हुए भगवान् श्रीरामके पास पहुँचने लगे ॥ १ ॥

वृतः कोटिसहस्रेण वानराणां तरस्विनाम् ।
श्वशुरो वालिनः श्रीमान् सुषेणो राममभ्ययात् ॥ २ ॥
सबसे पहले वालीके श्वशुर श्रीमान् सुषेण श्रीरामचन्द्रजीकी सेवामें उपस्थित हुए। उनके साथ वेगशाली वानरोंकी सहस्र कोटि (दस अरब) सेना थी ॥ २ ॥

कोटीशतवृतो वापि गजो गवय एव च ।
वानरेन्द्रौ महावीर्यौ पृथक् पृथगदृश्यताम् ॥ ३ ॥
फिर महापराक्रमी वानरराज 'गज' और 'गवय' पृथक्-पृथक् एक-एक अरब सेनाके साथ आते दिखायी दिये ॥ ३ ॥

षष्टिकोटिसहस्राणि प्रकर्षन् प्रत्यदृश्यत ।
गोलाङ्गूलो महाराज गवाक्षो भीमदर्शनः ॥ ४ ॥
महाराज! गोलांगूल (लंगूर) जातिका वानर गवाक्ष, जो देखनेमें बड़ा भयंकर था, साठ सहस्र कोटि (छः खरब) वानर-सेना साथ लिये दृष्टिगोचर हुआ ॥ ४ ॥

गन्धमादनवासी तु प्रथितो गन्धमादनः ।
कोटीशतसहस्राणि हरीणां समकर्षत ॥ ५ ॥
गन्धमादन पर्वतपर रहनेवाला गन्धमादन नामसे विख्यात वानर वानरोंकी दस खरब सेना साथ लेकर आया ॥ ५ ॥

पनसो नाम मेधावी वानरः सुमहाबलः ।
कोटीर्दश द्वादश च त्रिंशत् पञ्च प्रकर्षति ॥ ६ ॥
पनस नामक बुद्धिमान् तथा महाबली वानर सत्तावन करोड़ सेना साथ लेकर आया ॥ ६ ॥

श्रीमान् दधिमुखो नाम हरिवृद्धोऽतिवीर्यवान् ।
प्रचकर्ष महासैन्यं हरीणां भीमतेजसाम् ॥ ७ ॥
वानरोंमें वृद्ध तथा अत्यन्त पराक्रमी श्रीमान् दधिमुख भयंकर तेजसे सम्पन्न वानरोंकी विशाल सेना साथ लेकर आये ॥ ७ ॥

कृष्णानां मुखपुण्ड्राणामृक्षाणां भीमकर्मणाम् ।
कोटीशतसहस्रेण जाम्बवान् प्रत्यदृश्यत ॥ ८ ॥
जिनके मुख (ललाट)-पर तिलकका चिह्न शोभा पा रहा था तथा जो भयंकर पराक्रम करनेवाले थे, ऐसे काले रंगके शतकोटि सहस्र (दस खरब) रीछोंकी सेनाके साथ वहाँ जाम्बवान् दिखायी दिये ॥ ८ ॥

एते चान्ये च बहवो हरियूथपयूथपाः ।
असंख्येया महाराज समीयू रामकारणात् ॥ ९ ॥
महाराज! ये तथा और भी बहुत-से वानर-यूथपतियोंके भी यूथपति, जिनकी कोई संख्या नहीं थी, श्रीरामचन्द्रजीके कार्यसे वहाँ एकत्र हुए ॥ ९ ॥

गिरिकूटनिभाङ्गानां सिंहानामिव गर्जताम् ।
श्रूयते तुमुलः शब्दस्तत्र तत्र प्रधावताम् ॥ १० ॥
उनके अंग पर्वतोंके शिखरके सदृश जान पड़ते थे। वे सबके सब सिंहोंके समान गरजते और इधर-उधर दौड़ते थे। उन सबका सम्मिलित शब्द बड़ा भयंकर प्रतीत होता था ॥ १० ॥

गिरिकूटनिभाः केचित् केचिन्महिषसंनिभाः ।
शरदभ्रप्रतीकाशाः केचिद्धिङ्गुलकाननाः ॥ ११ ॥
कोई पर्वत-शिखरके समान ऊँचे थे तो कोई भैंसोंके सदृश मोटे और काले। कितने ही वानर शरद्-ऋतुके बादलोंकी तरह सफेद दिखायी देते थे, कितनोंके ही मुख सिन्दूरके समान लाल रंगके थे ॥ ११ ॥

उत्पतन्तः पतन्तश्च प्लवमानाश्च वानराः ।
उद्धुन्वन्तोऽपरे रेणून् समाजग्मुः समन्ततः ॥ १२ ॥
वे वानर सैनिक उछलते, गिरते-पड़ते, कूदते-फाँदते और धूल उड़ाते हुए चारों ओरसे एकत्र हो रहे थे ॥ १२ ॥

स वानरमहासैन्यः पूर्णसागरसंनिभः ।
निवेशमकरोत् तत्र सुग्रीवानुमते तदा ॥ १३ ॥
वानरोंकी वह विशाल सेना भरे-पूरे महासागरके समान दिखायी देती थी। सुग्रीवकी आज्ञासे उस समय माल्यवान् पर्वतके आस-पास ही उस समस्त सेनाका पड़ाव पड़ गया ॥ १३ ॥

ततस्तेषु हरीन्द्रेषु समावृत्तेषु सर्वशः ।

तिथौ प्रशस्ते नक्षत्रे मुहूर्ते चाभिपूजिते ॥ १४ ॥ तेन व्यूढेन सैन्येन लोकानुद्धर्तयन्निव । प्रययौ राघवः श्रीमान् सुग्रीवसहितस्तदा ॥ १५ ॥ तदनन्तर उन समस्त श्रेष्ठ वानरोंके सब ओरसे एकत्र हो जानेपर सुग्रीवसहित भगवान् श्रीरामने एक दिन शुभ तिथि, उत्तम नक्षत्र और शुभ मुहूर्तमें युद्धके लिये प्रस्थान किया। उस समय ऐसा जान पड़ता था, मानो वे उस व्यूहरचनायुक्त सेनाके द्वारा सम्पूर्ण लोकोंका संहार करने जा रहे हैं ॥ १४-१५ ॥

मुखमासीत् तु सैन्यस्य हनूमान् मारुतात्मजः । जघनं पालयामास सौमित्रिरकुतोभयः ॥ १६ ॥ उस सेनाके मुहानेपर वायुपुत्र हनुमान्‌जी विद्यमान थे। किसीसे भी भय न माननेवाले सुमित्रानन्दन लक्ष्मण उसके पृष्ठभागकी रक्षा कर रहे थे ॥ १६ ॥

बद्धगोधाङ्गुलित्राणौ राघवौ तत्र जग्मतुः । वृतौ हरिमहामात्रैश्चन्द्रसूर्यौ ग्रहेरिव ॥ १७ ॥ दोनों रघुवंशी वीर श्रीराम और लक्ष्मण हाथोंमें गोहके चमड़ेके बने हुए दस्ताने पहने हुए थे। वे ग्रहोंसे घिरे हुए चन्द्रमा और सूर्यकी भाँति वानरजातीय मन्त्रियोंके बीचमें होकर चल रहे थे ॥ १७ ॥

प्रबभौ हरिसैन्यं तत् सालतालशिलायुधम् । सुमहच्छालिभवनं यथा सूर्योदयं प्रति ॥ १८ ॥ श्रीरामचन्द्रजीके सम्मुख साल, ताल और शिलारूपी आयुध लिये वे समस्त वानर सैनिक सूर्योदयके समय पके हुए धानके विशाल खेतोंके समान जान पड़ते थे ॥

नलनीलाङ्गदक्राथमैन्दद्विविदपालिता । ययौ सुमहती सेना राघवस्यार्थसिद्धये ॥ १९ ॥ नल, नील, अंगद, क्राथ, मैन्द तथा द्विविदके द्वारा सुरक्षित हुई वह विशाल वानरसेना श्रीरामचन्द्रजीका कार्य सिद्ध करनेके लिये आगे बढ़ती चली जा रही थी ॥ १९ ॥

विविधेषु प्रशस्तेषु बहुमूलफलेषु च । प्रभूतमधुमूलेषु वारिमत्सु शिवेषु च ॥ २० ॥ निवसन्ती निराबाधा तथैव गिरिसानुषु । उपायाद्धरिसेना सा क्षारोदमथ सागरम् ॥ २१ ॥ जहाँ फल-मूलकी बहुतायत होती, मधु और कन्द-मूल प्रचुरमात्रामें उपलब्ध होते तथा जलकी अधिक सुविधा होती, ऐसे कल्याणकारी और उत्तम विविध पर्वतीय शिखरोंपर डेरा डालती हुई वह वानरसेना बिना किसी विघ्न-बाधाके खारे पानीवाले समुद्रके निकट जा पहुँची ॥ २०-२१ ॥

द्वितीयसागरनिभं तद् बलं बहुलध्वजम् ।

वेलावनं समासाद्य निवासमकरोत् तदा ॥ २२ ॥
असंख्य ध्वजा-पताकाओंसे सुशोभित वह विशाल वाहिनी दूसरे महासागरके समान जान पड़ती थी। सागरके तटवर्ती वनमें पहुँचकर उसने अपना पड़ाव डाला ॥ २२ ॥
ततो दाशरथिः श्रीमान् सुग्रीवं प्रत्यभाषत ।
मध्ये वानरमुख्यानां प्राप्तकालमिदं वचः ॥ २३ ॥
तत्पश्चात् मुख्य-मुख्य वानरोंके बीचमें बैठे हुए दशरथनन्दन भगवान् श्रीरामने सुग्रीवसे यह समयोचित बात कही— ॥ २३ ॥
उपायः को नु भवतां मतः सागरलङ्घने ।
इयं हि महती सेना सागरश्चातिदुस्तरः ॥ २४ ॥
‘मित्रो! हमारी यह सेना बहुत बड़ी है और सामने अत्यन्त दुस्तर महासागर लहरें ले रहा है। ऐसी दशामें आपलोग समुद्रके पार जानेके लिये कौन-सा उपाय ठीक समझते हैं?’ ॥ २४ ॥
तत्रान्ये व्याहरन्ति स्म वानरा बहुमानिनः ।
समर्था लङ्घने सिन्धोर्न तु तत् कृत्स्नकारकम् ॥ २५ ॥
तब वहाँ बहुत-से दूसरे-दूसरे वानर, जो बड़े अभिमानी थे, कहने लगे—‘हम तो समुद्रको लाँघ जानेमें समर्थ हैं, परंतु सब नहीं लाँघ सकते’ ॥ २५ ॥
केचिन्नौभिर्व्यवस्यन्ति केचिच्च विविधैः प्लवैः ।
नेति रामस्तु तान् सर्वान् सान्त्वयन् प्रत्यभाषत ॥ २६ ॥
कुछ वानर बड़ी-बड़ी नावोंके द्वारा समुद्रके पार जानेका निश्चय प्रकट करने लगे। कुछने नाव-डोंगी आदि विविध साधनोंद्वारा पार जानेकी बात बतायी। परंतु श्रीरामचन्द्रजीने उनकी यह सलाह माननेसे इनकार कर दिया और सबको सान्त्वना देते हुए कहा— ॥ २६ ॥
शतयोजनविस्तारं न शक्ताः सर्ववानराः ।
क्रान्तुं तोयनिधिं वीरा नैषा वो नैष्ठिकी मतिः ॥ २७ ॥
‘वीरो! सभी वानरोंमें इतनी शक्ति नहीं है कि वे सौ योजन विस्तृत समुद्रको लाँघ सकें; अतः तुम लोगोंका यह निर्णय सर्वमान्य सिद्धान्तके रूपमें ग्राह्य नहीं है ॥ २७ ॥
नावो न सन्ति सेनाया बह्व्यस्तारयितुं तथा ।
वणिजामुपघातं च कथमस्मद्विधश्चरेत् ॥ २८ ॥
‘इतनी बड़ी सेनाको पार उतारनेके लिये हमलोगोंके पास अधिक नौकाएँ भी नहीं हैं। (यदि कहें, व्यापारियोंके जहाजोंसे काम लिया जाय, तो) मेरे-जैसा पुरुष अपने स्वार्थके लिये व्यापारियोंके व्यवसायको हानि कैसे पहुँचा सकता है? ॥ २८ ॥
विस्तीर्णं चैव नः सैन्यं हन्याच्छिद्रेण वै परः ।
प्लवोडुपप्रतारश्च नैवात्र मम रोचते ॥ २९ ॥

'इसके सिवा नौका आदिसे यात्रा करनेपर हमारी सेना छिट-फुट होकर बहुत दूरतक फैल जायगी। उस दशामें अवसर पाकर शत्रु इसका नाश भी कर सकता है। इसीलिये डोंगी और नाव आदिपर बैठकर पार उतरनेकी बात मुझे ठीक नहीं जँचती है ॥ २९ ॥ अहं त्विमं जलनिधिं समारप्स्याम्युपायतः । प्रतिशेष्याम्युपवसन् दर्शयिष्यति मां ततः ॥ ३० ॥ 'मैं तो किसी उपायसे इस समुद्रकी ही आराधना आरम्भ करूँगा। इसके तटपर अन्न-जल छोड़कर धरना दूँगा। इससे यह अवश्य मुझे दर्शन देगा तथा कोई मार्ग दिखायेगा ॥ ३० ॥ न चेद् दर्शयिता मार्गं धक्ष्याम्येनमहं ततः । महास्त्रैरप्रतिहतैरत्यग्निपवनोज्ज्वलैः ॥ ३१ ॥ 'यदि यह स्वयं प्रकट होकर कोई मार्ग नहीं दिखायेगा तो मैं अग्नि और वायुसे भी अधिक तेजस्वी तथा कभी न चूकनेवाले महान् दिव्यास्त्रोंद्वारा इसे जलाकर भस्म कर डालूँगा' ॥ ३१ ॥ इत्युक्त्वा सह सौमित्रिरुपस्पृश्याथ राघवः । प्रतिशिश्ये जलनिधिं विधिवत् कुशसंस्तरे ॥ ३२ ॥ ऐसा कहकर लक्ष्मणसहित श्रीरामचन्द्रजीने आचमन करके समुद्रके तटपर कुशकी चटाई बिछाकर उसपर लेटकर विधिपूर्वक धरना दे दिया ॥ ३२ ॥ सागरस्तु ततः स्वप्ने दर्शयामास राघवम् । देवो नदनदीभर्ता श्रीमान् यादोगणैर्वृतः ॥ ३३ ॥ तब नदों और नदियोंके स्वामी श्रीमान् समुद्रदेवने जल-जन्तुओंके साथ प्रकट होकर स्वप्नमें श्रीरामचन्द्रजीको दर्शन दिया ॥ ३३ ॥ कौसल्यामातरित्येवमाभाष्य मधुरं वचः । इदमित्याह रत्नानामाकरैः शतशो वृतः ॥ ३४ ॥ वह सैकड़ों रत्नके आकरोंसे घिरा हुआ था। उसने 'कौसल्यानन्दन' कहकर श्रीरामको सम्बोधित किया और मधुर वाणीमें इस प्रकार कहा— ॥ ३४ ॥ ब्रूहि किं ते करोम्यत्र साहाय्यं पुरुषर्षभ । ऐक्ष्वाको ह्यस्मि ते ज्ञातिरिति रामस्तमब्रवीत् ॥ ३५ ॥ 'नरश्रेष्ठ! कहो, मैं यहाँ तुम्हारी क्या सहायता करूँ? सगरपुत्रोंसे संवर्धित होनेके कारण मैं भी इक्ष्वाकुवंशीय तथा तुम्हारा भाई-बन्धु हूँ'। यह सुनकर श्रीरामचन्द्रजीने उससे कहा — ॥ ३५ ॥ मार्गामिच्छामि सैन्यस्य दत्तं नदनदीपते । येन गत्वा दशग्रीवं हन्यां पौलस्त्यपांसनम् ॥ ३६ ॥

'नद-नदीश्वर! मैं अपनी सेनाके लिये तुम्हारे द्वारा दिया हुआ मार्ग चाहता हूँ, जिससे जाकर पुलस्त्यकुलांगार दशमुख रावणको मार सकूँ॥ ३६॥
यद्येवं याचतो मार्गं न प्रदास्यति मे भवान् ।
शरैस्त्वां शोषयिष्यामि दिव्यास्त्रप्रतिमन्त्रितैः ॥ ३७ ॥
'यदि इस प्रकार याचना करनेपर तुम मुझे मार्ग न दोगे तो मैं दिव्यास्त्रोंसे अभिमन्त्रित बाणोंद्वारा तुम्हें सुखा दूँगा'॥ ३७॥
इत्येवं ब्रुवतः श्रुत्वा रामस्य वरुणालयः ।
उवाच व्यथितो वाक्यमिति बद्धाञ्जलिः स्थितः ॥ ३८ ॥
श्रीरामचन्द्रजीका यह वचन सुनकर वरुणालय समुद्र व्यथित हो उठा और खड़े हुए हाथ जोड़कर बोला— ॥ ३८ ॥
नेच्छामि प्रतिघातं ते नास्मि विघ्नकरस्तव ।
शृणु चेदं वचो राम श्रुत्वा कर्तव्यमाचर ॥ ३९ ॥
'श्रीराम! मैं तुम्हारा सामना करना नहीं चाहता और न मैं तुम्हारे मार्गमें विघ्न डालनेकी ही इच्छा रखता हूँ। मेरी यह बात सुनो और सुनकर जो कर्तव्य हो, उसे करो॥ ३९॥
यदि दास्यामि ते मार्गं सैन्यस्य व्रजतोऽज्ञया ।
अन्येऽप्याज्ञापयिष्यन्ति मामेवं धनुषो बलात् ॥ ४० ॥
'यदि मैं इस समय तुम्हारी आज्ञासे तुम्हें और लंका जाती हुई तुम्हारी सेनाको मार्ग दे दूँगा तो दूसरे लोग भी इसी प्रकार धनुषके बलसे मुझपर हुक्म चलाया करेंगे॥ ४०॥
अस्ति त्वत्र नलो नाम वानरः शिल्पिसम्मतः ।
त्वष्टुर्देवस्य तनयो बलवान् विश्वकर्मणः ॥ ४१ ॥
'तुम्हारी सेनामें एक नल नामक वानर है जो शिल्पियोंके लिये भी आदरणीय है। बलवान् नल देवशिल्पी विश्वकर्माका पुत्र है॥ ४१॥
स यत् काष्ठं तृणं वापि शिलां वा क्षेप्स्यते मयि ।
सर्वं तद् धारयिष्यामि स ते सेतुर्भविष्यति ॥ ४२ ॥
'वह अपने हाथसे उठाकर जो भी काठ, तिनका या पत्थर मेरे भीतर डाल देगा, वह सब मैं जलके ऊपर-धारण किये रहूँगा। वही तुम्हारे लिये पुल हो जायगा'॥ ४२॥
इत्युक्त्वान्तर्हिते तस्मिन् रामो नलमुवाच ह ।
कुरु सेतुं समुद्रे त्वं शक्तो ह्यसि मतो मम ॥ ४३ ॥
ऐसा कहकर समुद्र अन्तर्धान हो गया। तत्पश्चात् श्रीरामने उठकर नलसे कहा—'तुम समुद्रपर एक पुल तैयार करो। मैं जानता हूँ, तुममें यह कार्य करनेकी शक्ति है'॥ ४३॥
तेनोपायेन काकुत्स्थः सेतुबन्धमकारयत् ।
दशयोजनविस्तारमायतं शतयोजनम् ॥ ४४ ॥

उसी उपायसे रघुनाथजीने समुद्रपर सौ योजन लंबा और दस योजन चौड़ा पुल तैयार कराया ॥ ४४ ॥

नलसेतुरिति ख्यातो योऽद्यापि प्रथितो भुवि ।
रामस्याज्ञां पुरस्कृत्य निर्यातो गिरिसंनिभः ॥ ४५ ॥
वह आज भी भूमण्डलमें 'नलसेतु' के नामसे विख्यात है। श्रीरामजीकी आज्ञा मानकर समुद्रने उस पर्वताकार पुलको अपने ऊपर धारण किया ॥ ४५ ॥

तत्रस्थं स तु धर्मात्मा समागच्छद् विभीषणः ।
भ्राता वै राक्षसेन्द्रस्य चतुर्भिः सचिवैः सह ॥ ४६ ॥
श्रीरामचन्द्रजी अभी समुद्रके किनारे ही थे कि राक्षसराज रावणके भाई धर्मात्मा विभीषण अपने चार मन्त्रियोंके साथ उनसे मिलनेके लिये आये ॥ ४६ ॥

प्रतिजग्राह समस्तं स्वागतेन महामनाः ।
सुग्रीवस्य तु शङ्काभूत् प्रणिधिः स्यादिति स्म ह ॥ ४७ ॥
महामना श्रीरामने स्वागतपूर्वक उन्हें अपनाया। उस समय सुग्रीवके मनमें यह शंका हुई कि 'कहीं यह शत्रु का कोई गुप्तचर न हो' ॥ ४७ ॥

राघवः सत्यचेष्टाभिः सम्यक् च चरितेङ्गितैः ।
यदा तत्त्वेन तुष्टोऽभूत् तत एनमपूजयत् ॥ ४८ ॥

परंतु श्रीरामचन्द्रजीने उनकी सत्य चेष्टाओं, उत्तम आचरणों और मुख-नेत्र आदिके संकेतोंसे सूचित होनेवाले मनोभावोंकी सम्यक् समीक्षा करके जब अच्छी तरह संतोष प्राप्त कर लिया, तब विभीषणका बहुत आदर किया ।। ४८ ।।

सर्वराक्षसराज्ये चाप्यभ्यषिञ्चद् विभीषणम् ।
चक्रे च मन्त्रसचिवं सुहृदं लक्ष्मणस्य च ।। ४९ ।।
साथ ही उन्हें समस्त राक्षसोंके राज्यपर अभिषिक्त कर दिया और लक्ष्मणका सुहृद् तथा अपना सलाहकार बना लिया ।। ४९ ।।

विभीषणमते चैव सोऽत्यक्रामन्महार्णवम् ।
ससैन्यः सेतुना तेन मासेनैव नराधिप ।। ५० ।।
नरेश्वर! विभीषणकी सलाहसे श्रीरामचन्द्रजीने उसी सेतुद्वारा एक ही महीनेमें सेनासहित महासागरको पार कर लिया ।। ५० ।।

ततो गत्वा समासाद्य लङ्कोद्यानान्यनेकशः ।
भेदयामास कपिभिर्महान्ति च बहूनि च ।। ५१ ।।
तत्पश्चात् उन्होंने लंकाकी सीमामें पहुँचकर वानरोंद्वारा वहाँके बहुत-से बड़े-बड़े उद्यानोंको छिन्न-भिन्न करा दिया ।। ५१ ।।

ततस्तौ रावणामात्यौ मन्त्रिणौ शुकसारणौ ।
चरौ वानररूपेण तौ जग्राह विभीषणः ।। ५२ ।।
उस सेनामें वानरोंका रूप धारण करके रावणके दो मन्त्री शुक और सारण गुप्तचरका काम करनेके लिये घुस आये थे। विभीषणने उन दोनोंको पहचानकर कैद कर लिया ।। ५२ ।।

प्रतिपन्नौ यदा रूपं राक्षसं तौ निशाचरौ ।
दर्शयित्वा ततः सैन्यं रामः पश्चादवासृजत् ।। ५३ ।।
जब वे दोनों निशाचर अपने राक्षसरूपमें प्रकट हुए, तब श्रीरामने उन्हें अपनी सेनाका दर्शन कराकर छोड़ दिया ।।

निवेश्योपवने सैन्यं तत् पुरः प्राज्ञवानरम् ।
प्रेषयामास दौत्येन रावणस्य ततोऽङ्गदम् ।। ५४ ।।
लंकापुरीके उपवनमें वानरसेनाको ठहराकर श्रीरघुनाथजीने बुद्धिमान् वानर अंगदको दूतके रूपमें रावणके यहाँ भेजा ।। ५४ ।।

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि रामोपाख्यानपर्वणि सेतुबन्धने
त्र्यशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ।। २८३ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत रामोपाख्यानपर्वमें सेतुबन्धविषयक दो सौ तिरासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। २८३ ।।

२८४-

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चतुरशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः

अंगदका रावणके पास जाकर रामका संदेश सुनाकर लौटना तथा राक्षसों और वानरोंका घोर संग्राम

मार्कण्डेय उवाच
प्रभूतान्नोदके तस्मिन् बहुमूलफले वने ।
सेनां निवेश्य काकुत्स्थो विधिवत् पर्य्यरक्षत ॥ १ ॥
**मार्कण्डेयजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! लंकाके उस वनमें अन्न और जलका बहुत सुभीता था। फल और मूल प्रचुरमात्रामें उपलब्ध थे; अतः वहीं सेनाकी छावनी डालकर श्रीरामचन्द्रजी विधिपूर्वक उसकी रक्षा करते रहे ॥ १ ॥

रावणः संविधं चक्रे लङ्कायां शास्त्रनिर्मिताम् ।
प्रकृत्यैव दुराधर्षा दृढप्राकारतोरणा ॥ २ ॥
इधर रावण लंकामें शास्त्रोक्त प्रकारसे बनी हुई युद्ध-सामग्री (मशीनगन आदि)-का संग्रह करने लगा। लंकाकी चहारदीवारी और नगर-द्वार अत्यन्त सुदृढ़ थे; अतः स्वभावसे ही वह दुर्धर्ष थी—किसी भी आक्रमणकारीका वहाँ पहुँचना अत्यन्त कठिन था ॥ २ ॥

अगाधतोयाः परिखा मीननक्रसमाकुलाः ।
बभूवुः सप्त दुर्धर्षाः खादिराः शङ्कुभिश्चिताः ॥ ३ ॥
नगरके चारों ओर सात गहरी खाइयाँ थीं, जिनमें अगाध जल भरा रहता था और उनमें मत्स्य-मगर आदि जल-जन्तु निवास करते थे। इन खाइयोंमें सब ओर खैरके खूँटे गड़े हुए थे ॥ ३ ॥

कपाटयन्त्रदुर्धर्षा बभूवुः सहुडोपलाः ।
साशीविषघटायोधाः ससर्जरसपांसवः ॥ ४ ॥
'मजबूत किवाड़ लगे थे और गोला बरसानेवाले यन्त्र (मशीनें) यथास्थान लगे थे। इनके सिवा वहाँ बहुत-से शृंग और गोले जमा किये गये थे। इन सब कारणोंसे इन खाइयोंको पार करना बहुत कठिन था। विषधर सर्पोंके समूह, सैनिक, सर्जरस (लाह) और धूल—इन सबसे संयुक्त और सुरक्षित होनेके कारण भी वे खाइयाँ दुर्गम थीं ॥ ४ ॥

मुसलालातनाराचतोमरासिपरश्वधैः ।
अन्विताश्च शतघ्नीभिः समधूच्छिष्टमुद्गराः ॥ ५ ॥
मुसल, अलात (बनैठी), बाण, तोमर, तलवार, फरसे, मोमके मुद्गर तथा तोप आदि अस्त्र-शस्त्रोंके संग्रहके कारण भी वे खाइयाँ दुर्लंघ्य थीं ॥ ५ ॥

पुरद्वारेषु सर्वेषु गुल्माः स्थावरजङ्गमाः ।

बभूवुः पत्तिबहुलाः प्रभूतगजवाजिनः ॥ ६ ॥
नगरके सभी दरवाजोंपर छिपकर बैठनेके लिये बुर्ज बने हुए थे। ये स्थावर गुल्म कहलाते थे और घूम-फिरकर रक्षा करनेवाले जो सैनिक नियुक्त किये गये थे वे जंगम गुल्म कहे जाते थे। इनमें अधिकांश पैदल और बहुत-से हाथीसवार तथा घुड़सवार भी थे ॥ ६ ॥
अङ्गदस्त्वथ लङ्काया द्वारदेशमुपागतः ।
विदितो राक्षसेन्द्रस्य प्रविवेश गतव्यथः ॥ ७ ॥
मध्ये राक्षसकोटीनां बह्वीनां सुमहाबलः ।
शुशुभे मेघमालाभिरादित्य इव संवृतः ॥ ८ ॥
(श्रीरामचन्द्रजीकी आज्ञासे) महाबली अंगद दूत बनकर लंकापुरीके द्वारपर आये। राक्षसराज रावणको उनके आगमनकी सूचना दी गयी। फिर अनुमति मिलनेपर उन्होंने निर्भय होकर पुरीमें प्रवेश किया। अनेक करोड़ राक्षसोंके बीचमें जाते हुए अंगद मेघोंकी घटासे घिरे हुए सूर्यदेवके समान सुशोभित हो रहे थे ॥ ७-८ ॥
स समासाद्य पौलस्त्यममात्यैरभिसंवृतम् ।
रामसंदेशमामन्त्र्य वाग्मी वक्तुं प्रचक्रमे ॥ ९ ॥
मन्त्रियोंसे घिरकर बैठे हुए पुलस्त्यनन्दन रावणके पास पहुँचकर कुशल वक्ता अंगदने रावणको सम्बोधित करके श्रीरामचन्द्रजीका संदेश इस प्रकार कहना आरम्भ किया— ॥ ९ ॥

आह त्वां राघवो राजन् कोसलेन्द्रो महायशाः । प्राप्तकालमिदं वाक्यं तदादत्स्व कुरुष्व च ॥ १० ॥ राजन्! कोसलदेशके महाराज महायशस्वी श्रीरामचन्द्रजीने तुमसे कहनेके लिये जो समयोचित संदेश भेजा है, उसे सुनो और तदनुसार कार्य करो ॥ १० ॥ अकृतात्मानमासाद्य राजानमनये रतम् । विनश्यन्त्यनयाविष्टा देशाश्च नगराणि च ॥ ११ ॥ ‘जो राजा अपने मनको काबूमें न रखकर अन्यायमें तत्पर रहता है, उसका आश्रय लेकर उसके अधीन रहनेवाले नगर और देश भी अनीतिपरायण होकर नष्ट हो जाते हैं’ ॥ ११ ॥ त्वयैकेनापराद्धं मे सीतामाहरता बलात् । वधायानपराद्धानामन्येषां तद् भविष्यति ॥ १२ ॥ ‘सीताका बलपूर्वक अपहरण करके मेरा अपराध तो अकेले तुमने किया है, परंतु इसके कारण अन्य निर्दोष लोग भी मारे जायँगे’ ॥ १२ ॥ ये त्वया बलदर्पाभ्यामविष्टेन वनेचराः । ऋषयो हिंसिताः पूर्वं देवाश्चाप्यवमानिताः ॥ १३ ॥ राजर्षयश्च निहता रुदत्यश्च हृताः स्त्रियः ।

तदिदं समनुप्राप्तं फलं तस्यानयस्य ते ॥ १४ ॥ 'तुमने बल और अहंकारसे उन्मत्त होकर पहले जिन वनवासी ऋषियोंकी हत्या की, देवताओंका अपमान किया, राजर्षियोंके प्राण लिये तथा रोती-बिलखती अबलाओंका भी अपहरण किया था, उन सब अत्याचारोंका फल अब तुम्हें प्राप्त होनेवाला है' ॥ १३-१४ ॥ हन्तास्मि त्वां सहामात्यैर्युध्यस्व पुरुषो भव । पश्य मे धनुषो वीर्यं मानुषस्य निशाचर ॥ १५ ॥ 'मैं मन्त्रियोंसहित तुम्हें मार डालूँगा। साहस हो तो युद्ध करो और पौरुषका परिचय दो। निशाचर! यद्यपि मैं मनुष्य हूँ, तो भी मेरे धनुषका बल देखना ॥ १५ ॥ मुच्यतां जानकी सीता न मे मोक्ष्यसि कर्हिचित् । अराक्षसमिमं लोकं कर्तास्मि निशितैः शरैः ॥ १६ ॥ 'जनकनन्दिनी सीताको छोड़ दो, अन्यथा कभी मेरे हाथसे जीवित नहीं बचोगे। मैं अपने तीखे बाणोंद्वारा इस संसारको राक्षसोंसे सूना कर दूँगा' ॥ १६ ॥ इति तस्य ब्रुवाणस्य दूतस्य परुषं वचः । श्रुत्वा न ममृषे राजा रावणः क्रोधमूर्च्छितः ॥ १७ ॥ श्रीरामचन्द्रजीके दूतके मुखसे ऐसी कठोर बातें सुनकर राजा रावण सहन न कर सका। वह क्रोधसे मूर्च्छित हो उठा ॥ १७ ॥ इङ्गितज्ञास्ततो भर्तुश्चत्वारो रजनीचराः । चतुर्ष्वङ्गेषु जगृहुः शार्दूलमिव पक्षिणः ॥ १८ ॥ तब स्वामीके संकेतको समझनेवाले चार निशाचर अपनी जगहसे उठे और जिस प्रकार पक्षी सिंहको पकड़े, उसी प्रकार वे अंगदके चार अंगोंको पकड़ने लगे ॥ १८ ॥ तांस्तथाङ्गेषु संसक्तानङ्गदो रजनीचरान् । आदायैव खमुत्पत्य प्रासादतलमाविशत् ॥ १९ ॥ अंगद इस प्रकार अपने अंगोंसे सटे हुए उन चारों राक्षसोंको लिये-दिये आकाशमें उछलकर महलकी छतपर जा चढ़े ॥ १९ ॥ वेगेनोत्पततस्तस्य पेतुस्ते रजनीचराः । भुवि सम्भिन्नहृदयाः प्रहारवरपीडिताः ॥ २० ॥ उछलते समय उनके वेगसे छूटकर वे चारों राक्षस पृथ्वीपर जा गिरे। उन राक्षसोंकी छाती फट गयी और अधिक चोट लगनेके कारण उन्हें बड़ी पीड़ा हुई ॥ २० ॥ संसक्तो हर्म्यशिखरात् तस्मात् पुनरवापतत् । लङ्घयित्वा पुरीं लङ्कां सुवेलस्य समीपतः ॥ २१ ॥ छतपर चढ़े हुए अंगद फिर उस महलके कँगूरेसे कूद पड़े और लंकापुरीको लाँघकर सुवेलपर्वतके समीप आ पहुँचे ॥ २१ ॥ कोसलेन्द्रमथागम्य सर्वमावेद्य वानरः ।