महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
विनयेन नताः सर्वे प्रणिपत्य च भारत ॥ ३२ ॥ सान्त्विता धर्मराजेन प्रसेदुः क्षणदाचराः । विदिताश्च कुबेरस्य तत्र ते कुरुपुङ्गवाः ॥ ३३ ॥ ऊषुर्नातिचिरं कालं रममाणाः कुरूद्वहाः । प्रतीक्षमाणा बीभत्सुं गन्धमादनसानुषु ॥ ३४ ॥
‘यदि मेरा प्रिय करना चाहते हो तो फिर ऐसा काम न करना।’ भीमसेनको ऐसा उपदेश देकर उन्होंने पूर्वोक्त सौगन्धिक कमल ले लिये और वे देवोपम पाण्डव उसी सरोवरके तटपर इधर-उधर भ्रमण करने लगे। इसी समय शिलाओंको आयुधरूपमें ग्रहण किये, बहुत-से विशालकाय उद्यानक्षक वहाँ प्रकट हो गये। भारत! उन्होंने धर्मराज युधिष्ठिर, महर्षि लोमश, नकुल-सहदेव तथा अन्यान्य श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको विनयपूर्वक नतमस्तक होकर प्रणाम किया। फिर धर्मराज युधिष्ठिरने उन्हें सान्त्वना दी। इससे वे निशाचर (राक्षस) प्रसन्न हो गये। तदनन्तर वे कुरुप्रवर पाण्डव धनाध्यक्ष कुबेरकी जानकारीमें कुछ कालतक वहाँ आनन्दपूर्वक टिके रहे और गन्धमादन पर्वतके शिखरोंपर अर्जुनके आगमनकी प्रतीक्षा करते रहे ॥ २९—३४ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां सौगन्धिकाहरणे पञ्चपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें सौगन्धिकाहरणविषयक एक सौ पचपनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५५ ॥
१५६-
षट्पञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः
पाण्डवोंका आकाशवाणीके आदेशसे पुनः नर-नारायणाश्रममें लौटना
वैशम्पायन उवाच
तस्मिन् निवसमानोऽथ धर्मराजो युधिष्ठिरः ।
कृष्णया सहितान् भ्रातॄनित्युवाच सहद्विजान् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! उस सौगन्धिक सरोवरके तटपर निवास करते हुए धर्मराज युधिष्ठिरने एक दिन ब्राह्मणों तथा द्रौपदीसहित अपने भाइयोंसे इस प्रकार कहा— ॥ १ ॥
दृष्टानि तीर्थान्यस्माभिः पुण्यानि च शिवानि च ।
मनसो ह्लादनीयानि वनानि च पृथक् पृथक् ॥ २ ॥
'हम लोगोंने अनेक पुण्यदायक एवं कल्याण-स्वरूप तीर्थोंके दर्शन किये। मनको आह्लाद प्रदान करनेवाले भिन्न-भिन्न वनोंका भी अवलोकन किया ॥ २ ॥
देवैः पूर्वं विचीर्णानि मुनिभिश्च महात्मभिः ।
यथाक्रमविशेषेण द्विजैः सम्पूजितानि च ॥ ३ ॥
'वे तीर्थ और वन ऐसे थे, जहाँ पूर्वकालमें देवता और महात्मा, मुनि विचरण कर चुके हैं तथा क्रमशः अनेक द्विजोंने उनका समादर किया है ॥ ३ ॥
ऋषीणां पूर्वचरितं तथा कर्म विचेष्टितम् ।
राजर्षीणां च चरितं कथाश्च विविधाः शुभाः ॥ ४ ॥
शृणवानास्तत्र तत्र स्म आश्रमेषु शिवेषु च ।
अभिषेकं द्विजैः सार्धं कृतवन्तो विशेषतः ॥ ५ ॥
'हमने ऋषियोंके पूर्वचरित्र, कर्म और चेष्टाओंकी कथा सुनी है। राजर्षियोंके भी चरित्र और भाँति-भाँतिकी शुभ कथाएँ सुनते हुए मंगलमय आश्रमोंमें विशेषतः ब्राह्मणोंके साथ तीर्थस्नान किया है ॥ ४-५ ॥
अर्चिताः सततं देवाः पुष्पैर्द्भिः सदा च वः ।
यथालब्धैर्मूलफलैः पितरश्चापि तर्पिताः ॥ ६ ॥
'हमने सदा फूल और जलसे देवताओंकी पूजा की है और यथाप्राप्त फल-मूलसे पितरोंको भी तृप्त किया है ॥ ६ ॥
पर्वतेषु च रम्येषु सर्वेषु च सरस्सु च ।
उदधौ च महापुण्ये सूपस्पृष्टं महात्मभिः ॥ ७ ॥
'रमणीय पर्वतों और समस्त सरोवरोंमें विशेषतः परम पुण्यमय समुद्रके जलमें इन महात्माओंके साथ भलीभाँति स्नान एवं आचमन किया है ।। ७ ।। इला सरस्वती सिन्धुर्यमुना नर्मदा तथा । नानातीर्थेषु रम्येषु सूपस्पृष्टं सह द्विजैः ॥ ८ ॥ 'इला, सरस्वती, सिंधु, यमुना तथा नर्मदा आदि नाना रमणीय तीर्थोंमें भी ब्राह्मणोंके साथ विधिवत् स्नान और आचमन किया है ।। ८ ।। गङ्गाद्वारमतिक्रम्य बहवः पर्वताः शुभाः । हिमवान् पर्वतश्चैव नानाद्विजगणायुतः ॥ ९ ॥ 'गंगाद्वार (हरिद्वार)-को लाँघकर बहुत-से मंगलमय पर्वत देखे तथा बहुसंख्यक ब्राह्मणोंसे युक्त हिमालय पर्वतका भी दर्शन किया ।। ९ ।। विशाला बदरी दृष्टा नरनारायणाश्रमः । दिव्या पुष्करिणी दृष्टा सिद्धदेवर्षिपूजिता ॥ १० ॥ 'विशाल बदरीतीर्थ, भगवान् नर-नारायणके आश्रम तथा सिद्धों और देवर्षियोंसे पूजित इस दिव्य सरोवरका भी दर्शन किया ।। १० ।। यथाक्रमविशेषेण सर्वाण्यायतनानि च । दर्शितानि द्विजश्रेष्ठा लोमशेन महात्मना ॥ ११ ॥ 'विप्रवरो! महात्मा लोमशजीने हमें सभी पुण्य-स्थानोंके क्रमशः दर्शन कराये हैं ।। ११ ।। इमं वैश्रवणावासं पुण्यं सिद्धनिषेवितम् । कथं भीम गमिष्यामो गतिरन्तरधीयताम् ॥ १२ ॥ 'भीमसेन! यह सिद्धसेवित पुण्यप्रदेश कुबेरका निवासस्थान है। अब हम कुबेरके भवनमें कैसे प्रवेश करेंगे? इसका उपाय सोचो' ।। १२ ।।
वैशम्पायन उवाच
एवं ब्रुवति राजेन्द्रे वागुवाचाशरीरिणी । न शक्यो दुर्गमो गन्तुमितो वैश्रवणाश्रमात् ॥ १३ ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**महाराज युधिष्ठिरके ऐसा कहते ही आकाशवाणी बोल उठी—'कुबेरके इस आश्रमसे आगे जाना सम्भव नहीं है। यह मार्ग अत्यन्त दुर्गम है ।। १३ ।। अनेनैव पथा राजन् प्रतिगच्छ यथागतम् । नरनारायणस्थानं बदरीत्यभिविश्रुतम् ॥ १४ ॥ 'राजन्! जिससे तुम आये हो, उसी मार्गसे विशाला बदरीके नामसे विख्यात भगवान् नर-नारायणके स्थानको लौट जाओ ।। १४ ।। तस्माद् यास्यसि कौन्तेय सिद्धचारणसेवितम् ।
बहुपुष्पफलं रम्यमाश्रमं वृषपर्वणः ॥ १५ ॥ ‘कुन्तीकुमार! वहाँसे तुम प्रचुर फल-फूलसे सम्पन्न वृषपर्वाके रमणीय आश्रमपर जाओ, जहाँ सिद्ध और चारण निवास करते हैं ॥ १५ ॥ अतिक्रम्य च तं पार्थ त्वाष्टिषेणाश्रमे वसेः । ततो द्रक्ष्यसि कौन्तेय निवेशं धनदस्य च ॥ १६ ॥ ‘उस आश्रमको भी लाँघकर आर्ष्टिषेणके आश्रमपर जाना और वहीं निवास करना। तदनन्तर तुम्हें धनदाता कुबेरके निवासस्थानका दर्शन होगा’ ॥ १६ ॥ एतस्मिन्नन्तरे वायुर्दिव्यगन्धवहः शुचिः । सुखप्रह्लादनः शीतः पुष्पवर्षं ववर्ष च ॥ १७ ॥ इसी समय दिव्य सुगन्धसे परिपूर्ण पवित्र वायु चलने लगी, जो शीतल तथा सुख और आह्लाद देनेवाली थी। साथ ही वहाँ फूलोंकी वर्षा होने लगी ॥ १७ ॥ श्रुत्वा तु दिव्यमाकाशाद् वाचं सर्वे विसिस्मियुः । ऋषीणां ब्राह्मणानां च पार्थिवानां विशेषतः ॥ १८ ॥ वह दिव्य आकाशवाणी सुनकर सबको बड़ा विस्मय हुआ। ऋषियों, ब्राह्मणों और विशेषतः राजर्षियोंको अधिक आश्चर्य हुआ ॥ १८ ॥ श्रुत्वा तन्महदाश्चर्यं द्विजो धौम्योऽब्रवीत् तदा । न शक्यमुत्तरं वक्तुमेवं भवतु भारत ॥ १९ ॥ वह महान् आश्चर्यजनक बात सुनकर विप्रर्षि धौम्यने कहा—‘भारत! इसका प्रतिवाद नहीं किया जा सकता। ऐसा ही होना चाहिये’ ॥ १९ ॥ ततो युधिष्ठिरो राजा प्रतिजग्राह तद् वचः । प्रत्यागम्य पुनस्तं तु नरनारायणाश्रमम् ॥ २० ॥ भीमसेनादिभिः सर्वैर्भ्रातृभिः परिवारितः । पाञ्चाल्या ब्राह्मणाश्चैव न्यवसन्त सुखं तदा ॥ २१ ॥ तदनन्तर राजा युधिष्ठिरने वह आकाशवाणी स्वीकार कर ली और पुनः नर-नारायणके आश्रममें लौटकर भीमसेन आदि सब भाइयों और द्रौपदीके साथ वहीं रहने लगे। उस समय साथ आये हुए ब्राह्मण लोग भी वहीं सुखपूर्वक निवास करने लगे ॥ २०-२१ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां पुनर्नरनारायणाश्रमागपने षट्पञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५६ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें पाण्डवोंका पुनः नर-नारायणके आश्रममें आगमनविषयक एक सौ छप्पनवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १५६ ॥
(जटासुरवधपर्व)
(जटासुरवधपर्व)
सप्तपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः
जटासुरके द्वारा द्रौपदीसहित युधिष्ठिर, नकुल, सहदेवका हरण तथा भीमसेनद्वारा जटासुरका वध
वैशम्पायन उवाच
ततस्तान् परिविश्वस्तान् वसतस्तत्र पाण्डवान् ।
पर्वतेन्द्रे द्विजैः सार्धं पार्थार्गमनकाङ्क्षया ॥ १ ॥
गतेषु तेषु रक्षःसु भीमसेनात्मजेऽपि च ।
रहितान् भीमसेनेन कदाचित् तान् यदृच्छया ॥ २ ॥
जहार धर्मराजानं यमौ कृष्णां च राक्षसः ।
ब्राह्मणो मन्त्रकुशलः सर्वशास्त्रविदुत्तमः ॥ ३ ॥
इति ब्रुवन् पाण्डवेयान् पर्युपास्ते स्म नित्यदा ।
परीप्समानः पार्थानां कलापानि धनूंषि च ॥ ४ ॥
अन्तरं सम्परिप्रेप्सुर्द्रौपद्या हरणं प्रति ।
दुष्टात्मा पापबुद्धिः स नाम्ना ख्यातो जटासुरः ॥ ५ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तदनन्तर पर्वतराज गन्धमादनपर सब पाण्डव अर्जुनके आनेकी प्रतीक्षा करते हुए ब्राह्मणोंके साथ निःशंक रहने लगे। उन्हें पहुँचानेके लिये आये हुए राक्षस चले गये। भीमसेनका पुत्र घटोत्कच भी विदा हो गया। तत्पश्चात् एक दिनकी बात है, भीमसेनकी अनुपस्थितिमें अकस्मात् एक राक्षसने धर्मराज युधिष्ठिर, नकुल, सहदेव तथा द्रौपदीको हर लिया। वह ब्राह्मणके वेषमें प्रतिदिन उन्हींके साथ रहता था और सब पाण्डवोंसे कहता था कि 'मैं सम्पूर्ण शास्त्रोंमें श्रेष्ठ और मन्त्र-कुशल ब्राह्मण हूँ।' वह कुन्तीकुमारोंके तरकस और धनुषको भी हर लेना चाहता था और द्रौपदीका अपहरण करनेके लिये सदा अवसर ढूँढ़ता रहता था। उस दुष्टात्मा एवं पापबुद्धि राक्षसका नाम जटासुर था ॥
पोषणं तस्य राजेन्द्र चक्रे पाण्डवनन्दनः ।
बुबुधे न च तं पापं भस्मच्छन्नमिवानलम् ॥ ६ ॥
जनमेजय! पाण्डवोंको आनन्द प्रदान करनेवाले युधिष्ठिर अन्य ब्राह्मणोंकी तरह उसका भी पालन-पोषण करते थे। परंतु राखमें छिपी हुई आगकी भाँति उस पापीके
असली स्वरूपको वे नहीं जानते थे ॥ ६ ॥ स भीमसेने निष्क्रान्ते मृगयार्थमरिन्दम । घटोत्कचं सानुचरं दृष्ट्वा विप्रद्रुतं दिशः ॥ ७ ॥ लोमशप्रभृतींस्तांस्तु महर्षींश्च समाहितान् । स्नातुं विनिर्गतान् दृष्ट्वा पुष्पार्थं च तपोधनान् ॥ ८ ॥ रूपमन्यत् समास्थाय विकृतं भैरवं महत् । गृहीत्वा सर्वशस्त्राणि द्रौपदीं परिगृह्य च ॥ ९ ॥ प्रातिष्ठत स दुष्टात्मा त्रीन् गृहीत्वा च पाण्डवान् । सहदेवस्तु यत्नेन ततोऽपक्रम्य पाण्डवः ॥ १० ॥ विक्रम्य कौशिकं खड्गं मोक्षयित्वा ग्रहं रिपोः । आक्रन्दद् भीमसेनं वै येन यातो महाबलः ॥ ११ ॥ शत्रुसूदन! हिंसक पशुओंको मारनेके लिये भीमसेनके आश्रमसे बाहर चले जानेपर उस राक्षसने देखा कि घटोत्कच अपने सेवकोंसहित किसी अज्ञात दिशाको चला गया, लोमश आदि महर्षि ध्यान लगाये बैठे हैं तथा दूसरे तपोधन स्नान करने और फूल लानेके लिये कुटियासे बाहर निकल गये हैं, तब उस दुष्टात्माने विशाल, विकराल एवं भयंकर दूसरा रूप धारण करके पाण्डवोंके सम्पूर्ण अस्त्र-शस्त्र, द्रौपदी तथा तीनों पाण्डवोंको भी लेकर वहाँसे प्रस्थान कर दिया। उस समय पाण्डु-कुमार सहदेव प्रयत्न करके उस राक्षसकी पकड़से छूट गये और पराक्रम करके म्यानसे निकली हुई अपनी तलवारको भी उससे छुड़ा लिया। फिर वे महाबली भीमसेन जिस मार्गसे गये थे, उधर ही जाकर उन्हें जोर-जोरसे पुकारने लगे ॥ ७—११ ॥
तमब्रवीद् धर्मराजो ह्रियमाणो युधिष्ठिरः ।
धर्मस्ते हीयते मूढ न तत्त्वं समवेक्षसे ॥ १२ ॥
इधर जिन्हें वह जटासुर हरकर लिये जा रहा था 'वे धर्मराज युधिष्ठिर उससे इस प्रकार बोले—‘अरे मूर्ख! इस प्रकार (विश्वासघात करनेसे) तो तेरे धर्मका ही नाश हो रहा है। किंतु उधर तेरी दृष्टि नहीं जाती है ।।
येऽन्ये क्वचिन्मनुष्येषु तिर्यग्योनिगताश्च ये ।
धर्मं ते समवेक्षन्ते रक्षांसि च विशेषतः ॥ १३ ॥
‘दूसरे भी जहाँ कहीं मनुष्य अथवा पशु-पक्षीकी योनिमें स्थित प्राणी हैं, वे सभी धर्मपर दृष्टि रखते हैं। राक्षस तो (पशु-पक्षीकी अपेक्षा भी) विशेषरूपसे धर्मका विचार करते हैं ।। १३ ।।
धर्मस्य राक्षसा मूलं धर्मं ते विदुरुत्तमम् ।
एतत् परीक्ष्य सर्वं त्वं समीपे स्थातुमर्हसि ॥ १४ ॥
देवाश्च ऋषयः सिद्धाः पितरश्चापि राक्षस ।
गन्धर्वोरगरक्षांसि वयांसि पशवस्तथा ॥ १५ ॥
तिर्यग्योनिगताश्चैव अपि कीटपिपीलिकाः ।
मनुष्यानुपजीवन्ति ततस्त्वमपि जीवसि ॥ १६ ॥
'राक्षस धर्मके मूल हैं। वे उत्तम धर्मका ज्ञान रखते हैं। इन सब बातोंका विचार करके तुझे हमलोगोंके समीप ही रहना चाहिये। राक्षस! देवता, ऋषि, सिद्ध, पितर, गन्धर्व, नाग, राक्षस, पशु, तिर्यग्योनिके सभी प्राणी और कीड़े-मकोड़े, चींटी आदि भी मनुष्योंके आश्रित हो जीवन-निर्वाह करते हैं। इस दृष्टिसे तू भी मनुष्योंसे ही जीविका चलाता है ।। १४— १६ ।।
समृद्ध्या ह्यस्य लोकस्य लोको युष्माकमृध्यति ।
इमं च लोकं शोचन्तमनुशोचन्ति देवताः ।। १७ ।।
'इस मनुष्यलोककी समृद्धिसे ही तुम सब लोगोंका लोक समृद्धिशाली होता है। यदि इस लोककी दशा शोचनीय हो तो देवता भी शोकमें पड़ जाते हैं ।। १७ ।।
पूज्यमानाश्च वर्धन्ते हव्यकव्यैर्यथाविधि ।
वयं राष्ट्रस्य गोप्तारो रक्षितारश्च राक्षस ।। १८ ।।
'क्योंकि मनुष्यद्वारा हव्य और कव्यसे विधिपूर्वक पूजित होनेपर उनकी वृद्धि होती है। राक्षस! हमलोग राष्ट्रके पालक और संरक्षक हैं ।। १८ ।।
राष्ट्रस्यारक्ष्यमाणस्य कुतो भूतिः कुतः सुखम् ।
न च राजावमन्तव्यो रक्षसा जात्वनागसि ।। १९ ।।
'हमारे द्वारा रक्षित न होनेपर राष्ट्रको कैसे समृद्धि प्राप्त होगी और कैसे उसे सुख मिलेगा? राक्षसको भी उचित है कि वह बिना अपराधके कभी किसी राजाका अपमान न करे ।। १९ ।।
अणुरप्यपचारश्च नास्त्यस्माकं नराशन ।
विघसाशान् यथाशक्त्या कुर्महे देवतादिषु ।। २० ।।
'नरभक्षी निशाचर! तेरे प्रति हमलोगोंकी ओरसे थोड़ा-सा भी अपराध नहीं हुआ है। हम देवता आदिको समर्पित करके बचे हुए प्रसादस्वरूप अन्नका यथाशक्ति गुरुजनों और ब्राह्मणोंको भोजन कराते हैं ।। २० ।।
गुरूंश्च ब्राह्मणांश्चैव प्रणामप्रवणाः सदा ।
द्रोग्धव्यं न च मित्रेषु न विश्वस्तेषु कर्हिचित् ।। २१ ।।
'गुरुजनों तथा ब्राह्मणोंके सम्मुख हमारा मस्तक सदा झुका रहता है। किसी भी पुरुषको कभी अपने मित्रों और विश्वासी पुरुषोंके साथ द्रोह नहीं करना चाहिये ।। २१ ।।
येषां चान्नानि भुञ्जीत यत्र च स्यात् प्रतिश्रयः ।
स त्वं प्रतिश्रयेऽस्माकं पूज्यमानः सुखोषितः ।। २२ ।।
'जिनका अन्न खाये और जहाँ अपनेको आश्रय मिला हो, उनके साथ भी द्रोह या विश्वासघात करना उचित नहीं है। तू हमारे आश्रयमें हमलोगोंसे सम्मानित होकर सुखपूर्वक रहा है ।। २२ ।।
भुक्त्वा चान्नानि दुष्प्रज्ञ कथमस्मान् जिहीर्षसि ।
एवमेव वृथाचारो वृथावृद्धो वृथामतिः ॥ २३ ॥ ‘खोटी बुद्धिवाले राक्षस! तू हमारा अन्न खाकर हमें ही हर ले जानेकी इच्छा कैसे करता है? इस प्रकार तो अबतक तूने ब्राह्मणरूपसे जो आचार दिखाया था, वह सब व्यर्थ ही था। तेरा बढ़ना या वृद्ध होना भी व्यर्थ ही है। तेरी बुद्धि भी व्यर्थ है॥ २३॥ वृथामरणमर्हश्च वृथाद्य न भविष्यसि । अथ चेद् दुष्टबुद्धिस्त्वं सर्वैर्धर्मैर्विवर्जितः ॥ २४ ॥ प्रदाय शस्त्राण्यस्माकं युद्धेन द्रौपदीं हर । अथ चेत् त्वमविज्ञानादिदं कर्म करिष्यसि ॥ २५ ॥ अधर्मं चाप्यकीर्तिं च लोके प्राप्स्यसि केवलम् । एतामद्य परामृश्य स्त्रियं राक्षस मानुषीम् ॥ २६ ॥ विषमेतत् समालोड्य कुम्भेन प्राशितं त्वया । ततो युधिष्ठिरस्तस्य गुरुकः समपद्यत ॥ २७ ॥ ‘ऐसी दशामें तू व्यर्थ मृत्युका ही अधिकारी है और आज व्यर्थ ही तुम्हारे प्राण नष्ट हो जायँगे। यदि तेरी बुद्धि दुष्टतापर ही उतर आयी है और तू सम्पूर्ण धर्मोंको भी छोड़ बैठा है, तो हमें हमारे अस्त्र देकर युद्ध कर तथा उसमें विजयी होनेपर द्रौपदीको ले जा। यदि तू अज्ञानवश यह विश्वासघात या अपहरण कर्म करेगा, तो संसारमें तुझे केवल अधर्म और अकीर्ति ही प्राप्त होगी। निशाचर! आज तूने इस मानवजातिकी स्त्रीका स्पर्श करके जो पाप किया है, यह भयंकर विष है, जिसे तूने घड़ेमें घोलकर पी लिया है।’ इतना कहकर युधिष्ठिर उसके लिये बहुत भारी हो गये ॥ २४—२७ ॥ स तु भाराभिभूतात्मा न तथा शीघ्रगोऽभवत् । अथाब्रवीद् द्रौपदीं च नकुलं च युधिष्ठिरः ॥ २८ ॥ भारसे उसका शरीर दबने लगा, इसलिये अब वह पहलेकी तरह शीघ्रतापूर्वक न चल सका। तब युधिष्ठिरने नकुल और द्रौपदीसे कहा— ॥ २८ ॥ मा भैष्ट राक्षसान्मूढाद् गतिरस्य मया हृता । नातिदूरे महाबाहुर्भविता पवनात्मजः ॥ २९ ॥ ‘तुमलोग इस मूढ़ राक्षससे डरना मत। मैंने इसकी गति कुण्ठित कर दी है। वायुपुत्र महाबाहु भीमसेन यहाँसे अधिक दूर नहीं होंगे ॥ २९ ॥ अस्मिन् मुहूर्ते सम्प्राप्ते न भविष्यति राक्षसः । सहदेवस्तु तं दृष्ट्वा राक्षसं मूढचेतनम् ॥ ३० ॥ उवाच वचनं राजन् कुन्तीपुत्रं युधिष्ठिरम् । राजन् किंनाम सत्कृत्यं क्षत्रियस्यास्त्यतोऽधिकम् ॥ ३१ ॥ यद् युद्धेऽभिमुखः प्राणांस्त्यजेच्छत्रुं जयेत वा । एष चास्मान् वयं चैनं युद्ध्यमानाः परंतप ॥ ३२ ॥
सूदयेम महाबाहो देशकालो ह्ययं नृप । क्षत्रधर्मस्य सम्प्राप्तः कालः सत्यपराक्रमः ॥ ३३ ॥ 'इस आगामी मुहूर्तके आते ही इस राक्षसके प्राण नहीं रहेंगे।' इधर सहदेवने उस मूढ़ राक्षसकी ओर देखते हुए कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरसे कहा—'राजन्! क्षत्रियके लिये इससे अधिक सत्कर्म क्या होगा कि वह युद्धमें शत्रु का सामना करते हुए प्राणोंका त्याग कर दे अथवा शत्रुको ही जीत ले। राजन्! इस प्रकार यह हमें अथवा हम इसे युद्ध करते हुए मार डालें। परंतप महाबाहु नरेश! यह क्षत्रिय धर्मके अनुकूल देश-काल प्राप्त हुआ है। यह समय यथार्थ पराक्रम प्रकट करनेके लिये है ॥ ३०—३३ ॥ जयन्तो हन्यमाना वा प्राप्तुमर्हाम सद्गतिम् । राक्षसे जीवमानेऽद्य रविरस्तमियाद् यदि ॥ ३४ ॥ नाहं ब्रूयां पुनर्जातु क्षत्रियोऽस्मीति भारत । भो भो राक्षस तिष्ठस्व सहदेवोऽस्मि पाण्डवः ॥ ३५ ॥ हत्वा वा मां नयस्वैनां हतो वाद्येह स्वप्स्यसि । तदा ब्रुवति माद्रेये भीमसेनो यदृच्छया ॥ ३६ ॥ प्रत्यदृश्यद् गदाहस्तः सवज्र इव वासवः । सोऽपश्यद् भ्रातरौ तत्र द्रौपदीं च यशस्विनीम् ॥ ३७ ॥ 'भारत! हम विजयी हों या मारे जायँ, सभी दशाओंमें उत्तम गति प्राप्त कर सकते हैं। यदि इस राक्षसके जीते-जी सूर्य डूब गये, तो मैं फिर कभी अपनेको क्षत्रिय नहीं कहूँगा। अरे ओ निशाचर! खड़ा रह, मैं पाण्डुकुमार सहदेव हूँ, या तो तू मुझे मारकर द्रौपदीको ले जा या स्वयं मेरे हाथों मारा जाकर आज यहीं सदाके लिये सो जा।' माद्रीनन्दन सहदेव जब ऐसी बात कह रहे थे, उसी समय अकस्मात् गदा हाथमें लिये भीमसेन दिखायी दिये, मानो वज्रधारी इन्द्र आ पहुँचे हों। उन्होंने वहाँ (राक्षसके अधिकारमें पड़े हुए) अपने दोनों भाइयों तथा यशस्विनी द्रौपदीको देखा ॥ ३४—३७ ॥ क्षितिस्थं सहदेवं च क्षिपन्तं राक्षसं तदा । मार्गाच्च राक्षसं मूढं कालोपहतचेतसम् ॥ ३८ ॥ भ्रमन्तं तत्र तत्रैव देवेन विनिवारितम् । भ्रातॄंस्तान् ह्रियतो दृष्ट्वा द्रौपदीं च महाबलः ॥ ३९ ॥ क्रोधमाहारयद् भीमो राक्षसं चेदमब्रवीत् । विज्ञातोऽसि मया पूर्वं पाप शस्त्रपरीक्षणे ॥ ४० ॥ उस समय सहदेव धरतीपर खड़े होकर राक्षसपर आक्षेप कर रहे थे और वह मूढ़ राक्षस मार्गसे भ्रष्ट होकर वहीं चक्कर काट रहा था। कालसे उसकी बुद्धि मारी गयी थी। दैवने ही उसे वहाँ रोक रखा था। भाइयों और द्रौपदीका अपहरण होता देख महाबली
भीमसेन कुपित हो उठे और जटासुरसे बोले—'ओ पापी! पहले जब तू शस्त्रोंकी परीक्षा कर रहा था, तभी मैंने तुझे पहचान लिया था॥ ३८—४०॥ आस्था तु त्वयि मे नास्ति यतोऽसि न हतस्तदा। ब्रह्मरूपप्रतिच्छन्नो न नो वदसि चाप्रियम्॥ ४१॥ 'तुझपर मेरा विश्वास नहीं रह गया था, तो भी तू ब्राह्मणके रूपमें अपने असली स्वरूपको छिपाये हुए था और हमलोगोंसे कोई अप्रिय बात नहीं कहता था। इसीलिये मैंने तुम्हें तत्काल नहीं मार डाला॥ ४१॥ प्रियेषु रममाणं त्वां न चैवाप्रियकारिणम्। अतिथिं ब्रह्मरूपं च कथं हन्यामनागसम्॥ ४२॥ राक्षसं जानमानोऽपि यो हन्यान्नरकं व्रजेत्। अपक्वस्य च कालेन वधस्तव न विद्यते॥ ४३॥ 'तू हमारे प्रिय कार्योंमें मन लगाता था। जो हमें प्रिय न लगे, ऐसा काम नहीं करता था। ब्राह्मण अतिथिके रूपमें आया था और कभी कोई अपराध नहीं किया था। ऐसी दशामें मैं तुझे कैसे मारता? जो राक्षसको राक्षस जानते हुए भी बिना किसी अपराधके उसका वध करता है, वह नरकमें जाता है। अभी तेरा समय पूरा नहीं हुआ था, इसलिये भी आजसे पहले तेरा वध नहीं किया जा सकता था॥ ४२-४३॥ नूनमद्यासि सम्पक्वो यथा ते मतिरीदृशी। दत्ता कृष्णापहरणे कालेनाद्भुतकर्मणा॥ ४४॥ 'आज निश्चय ही तेरी आयु पूरी हो चुकी है, तभी तो अद्भुत कर्म करनेवाले कालने तुझे इस प्रकार द्रौपदीके अपहरणकी बुद्धि दी है॥ ४४॥ बडिशोऽयं त्वया ग्रस्तः कालसूत्रेण लम्बितः। मत्स्योऽम्भसीव स्यूतास्यः कथमद्य भविष्यसि॥ ४५॥ 'कालरूपी डोरेसे लटकाया हुआ बंसीका काँटा तूने निगल लिया है। तेरा मुँह जलकी मछलीके समान उस काँटेमें गुँथ गया है, अतः अब तू कैसे जीवन धारण करेगा? ॥ ४५॥ यं चासि प्रस्थितो देशं मनः पूर्वं गतं च ते। न तं गन्तासि गन्तासि मार्गं बकहिडिम्बयोः॥ ४६॥ 'जिस देशकी ओर तू प्रस्थित हुआ है और जहाँ तेरा मन पहलेसे ही जा पहुँचा है, वहाँ अब तू न जा सकेगा। तुझे तो बक और हिडिम्बके मार्गपर जाना है,॥ ४६॥ एवमुक्तस्तु भीमेन राक्षसः कालचोदितः। भीत उत्सृज्य तान् सर्वान् युद्धाय समुपस्थितः॥ ४७॥ भीमसेनके ऐसा कहनेपर वह राक्षस भयभीत हो उन सबको छोड़कर कालकी प्रेरणासे युद्धके लिये उद्यत हो गया॥ ४७॥ अब्रवीच्च पुनर्भीमं रोषात् प्रस्फुरिताधरः।
न मे मूढा दिशः पाप त्वदर्थं मे विलम्बितम् ॥ ४८ ॥ उस समय रोषसे उसके ओठ फड़क रहे थे। उसने भीमसेनको उत्तर देते हुए कहा—'ओ पापी! मुझे दिग्भ्रम नहीं हुआ था। मैंने तेरे ही लिये विलम्ब किया था ॥ ४८ ॥
श्रुता मे राक्षसा ये ये त्वया विनिहता रणे । तेषामद्य करिष्यामि तवास्रेणोदकक्रियाम् ॥ ४९ ॥ 'तूने जिन-जिन राक्षसोंको युद्धमें मारा है, उन सबके नाम मैंने सुने हैं। आज तेरे रक्तसे ही मैं उनका तर्पण करूँगा, ॥ ४९ ॥
एवमुक्तस्ततो भीमः सृक्किणी परिसंलिहन् । स्मयमान इव क्रोधात् साक्षात् कालान्तकोपमः ॥ ५० ॥ (ब्रुवन् वै तिष्ठ तिष्ठेति क्रोधसंरक्तलोचनः ।) बाहुसंरम्भमेवैक्षन्नभिदुद्राव राक्षसम् । राक्षसोऽपि तदा भीमं युद्धार्थिनमवस्थितम् ॥ ५१ ॥ मुहुर्मुहुर्व्याददानः सृक्किणी परिसंलिहन् । अभिदुद्राव संरब्धो बलिर्वज्रधरं यथा ॥ ५२ ॥ राक्षसके ऐसा कहनेपर भीमसेन अपने मुखके दोनों कोने चाटते हुए कुछ मुसकराते-से प्रतीत हुए फिर क्रोधसे साक्षात् काल और यमराजके समान जान पड़ने लगे। रोषसे उनकी आँखें लाल हो गयी थीं 'खड़ा रह,' खड़ा रह कहते हुए ताल ठोंककर राक्षसकी ओर दृष्टि गड़ाये उसपर टूट पड़े। राक्षस भी उस समय भीमसेनको युद्धके लिये उपस्थित देख बार-बार मुँह फैलाकर मुँहके दोनों कोने चाटने लगा और जैसे बलिराजा वज्रधारी इन्द्रपर आक्रमण करता है, उसी प्रकार कुपित हो उसने भीमसेनपर धावा किया ॥ ५०—५२ ॥
(भीमसेनोऽप्यवष्टब्धो नियुद्धायाभवत् स्थितः । राक्षसोऽपि च विस्रब्धो बाहुयुद्धमकाङ्क्षत ॥ वर्तमाने तदा ताभ्यां बाहुयुद्धे सुदारुणे । माद्रीपुत्रावतिक्रुद्धावुभावप्यभ्यधावताम् ॥ ५३ ॥ भीमसेन भी स्थिर होकर उससे युद्धके लिये खड़े हो गये और वह राक्षस भी निश्चिन्त हो उनके साथ बाहुयुद्धकी इच्छा करने लगा। उस समय उन दोनोंमें बड़ा भयंकर बाहुयुद्ध होने लगा। यह देख माद्रीपुत्र नकुल और सहदेव अत्यन्त क्रोधमें भरकर उसकी ओर दौड़े ॥ ५३ ॥
न्यवारयत् तौ प्रहसन् कुन्तीपुत्रो वृकोदरः । शक्तोऽहं राक्षसस्येति प्रेक्षध्वमिति चाब्रवीत् ॥ ५४ ॥ परंतु कुन्तीकुमार भीमसेनने हँसकर उन दोनोंको रोक दिया और कहा—'मैं अकेला ही इस राक्षसके लिये पर्याप्त हूँ। तुमलोग चुप-चाप देखते रहो' ॥ ५४ ॥
आत्मना भ्रातृभिश्चैव धर्मेण सुकृतेन च ।
इष्टेन च शपे राजन् सूदयिष्यामि राक्षसम् ॥ ५५ ॥
फिर वे युधिष्ठिरसे बोले—'महाराज! मैं अपनी, सब भाइयोंकी, धर्मकी, पुण्य कर्मोंकी तथा यज्ञकी शपथ खाकर कहता हूँ, इस राक्षसको अवश्य मार डालूँगा ॥ ५५ ॥
इत्येवमुक्त्वा तौ वीरौ स्पर्धमानौ परस्परम् ।
बाहुभ्यां समसज्जेतामुभौ रक्षोवृकोदरौ ॥ ५६ ॥
ऐसा कहकर वे दोनों वीर राक्षस और भीम एक-दूसरेसे स्पर्धा रखते हुए बाँहोंसे बाँहें मिलाकर गुथ गये ॥ ५६ ॥
तयोरासीत् सम्प्रहारः क्रुद्धयोर्भीमरक्षसोः ।
अमृष्यमाणयोः सङ्ख्ये देवदानवयोरिव ॥ ५७ ॥
भीमसेन तथा राक्षस दोनोंमें देवताओं और दानवोंके समान युद्ध होने लगा। दोनों ही रोष और अमर्षमें भरकर एक-दूसरेपर प्रहार करने लगे ॥ ५७ ॥
आरुज्यारुज्य तौ वृक्षानन्योन्यमभिजघ्नतुः ।
जीमूताविव गर्जन्तौ निनदन्तौ महाबलौ ॥ ५८ ॥
दोनोंका बल महान् था। वे गर्जते हुए दो मेघोंकी भाँति सिंहनाद करके वृक्षोंको तोड़-तोड़कर परस्पर चोट करते थे ॥ ५८ ॥
बभञ्जतुर्महावृक्षानूरुभिर्बलिनां वरौ ।
अन्योन्येनाभिसंरब्धौ परस्परवधैषिणौ ॥ ५९ ॥
बलवानोंमें श्रेष्ठ वे दोनों वीर अपनी जाँघोंके धक्केसे बड़े-बड़े वृक्षोंको तोड़ डालते थे और परस्पर कुपित हो एक-दूसरेको मार डालनेकी इच्छा रखते थे ॥ ५९ ॥
तद् वृक्षयुद्धमभवन्महीरुहविनाशनम् ।
बालिसुग्रीवयोर्भ्रात्रोः पुरा स्त्रीकाङ्क्षिणोर्यथा ॥ ६० ॥
जैसे पूर्वकालमें स्त्रीकी इच्छावाले दो भाई बालि और सुग्रीवमें भयंकर संग्राम हुआ था, उसी प्रकार भीमसेन और राक्षसमें होने लगा। उन दोनोंका वह वृक्षयुद्ध उस वनके वृक्षसमूहोंके लिये महान् विनाशकारी सिद्ध हुआ ॥ ६० ॥
आविध्याविध्य तौ वृक्षान् मुहूर्तमितरेतरम् ।
ताडयामासतुरुभौ विनदन्तौ मुहुर्मुहुः ॥ ६१ ॥
वे दोनों बड़े-बड़े वृक्षोंको हिला-हिलाकर बार-बार विकट गर्जना करते हुए दो घड़ीतक एक-दूसरेपर प्रहार करते रहे ॥ ६१ ॥
तस्मिन् देशे यदा वृक्षाः सर्व एव निपातिताः ।
पुञ्जीकृताश्च शतशः परस्परवधेप्सया ॥ ६२ ॥
ततः शिलाः समादाय मुहूर्तमिव भारत ।
महाभैरिव शैलेन्द्रौ युयुधाते महाबलौ ॥ ६३ ॥
शिलाभिरुग्ररूपाभिर्बृहतीभिः परस्परम् ।
वज्रैरिव महावेगैराजघ्नतुरमर्षणौ ॥ ६४ ॥ भारत! जब उस प्रदेशके सारे वृक्ष गिरा दिये गये, तब एक-दूसरेका वध करनेकी इच्छासे उन महाबली वीरोंने वहाँ ढेर-की-ढेर पड़ी हुई सैकड़ों शिलाएँ लेकर दो घड़ीतक इस प्रकार युद्ध किया, मानो दो पर्वतराज बड़े-बड़े मेघखण्डोंद्वारा परस्पर युद्ध कर रहे हों। वहाँकी शिलाएँ विशाल और अत्यन्त भयंकर थीं। वे देखनेमें महान् वेगशाली वज्रोंके समान जान पड़ती थीं। अमर्षमें भरे हुए वे दोनों योद्धा उन्हीं शिलाओंद्वारा एक-दूसरेको मारने लगे ॥ ६२—६४ ॥
अभिद्रुत्य च भूयस्तावन्योन्यं बलदर्पितौ । भुजाभ्यां परिगृह्याथ चकषाते गजाविव ॥ ६५ ॥ तत्पश्चात् अपने-अपने बलके घमण्डमें भरे हुए वे दोनों वीर एक दूसरेकी ओर झपटकर पुनः अपनी भुजाओंसे कसते हुए विपक्षीको उसी प्रकार खींचने लगे, जैसे दो गजराज परस्पर भिड़कर एक-दूसरेको खींच रहे हों ॥ ६५ ॥
मुष्टिभिश्च महाघोरैरन्योन्यमभिजघ्नतुः । ततः कटकटाशब्दो बभूव सुमहात्मनोः ॥ ६६ ॥ अपने अत्यन्त भयानक मुक्कोंद्वारा वे परस्पर चोट करने लगे। तब उन दोनों महाकाय वीरोंमें जोर-जोरसे कटकटानेकी आवाज होने लगी ॥ ६६ ॥
ततः संहृत्य मुष्टिं तु पञ्चशीर्षमिवोरगम् । वेगेनाभ्यहनद् भीमो राक्षसस्य शिरोधराम् ॥ ६७ ॥ तदनन्तर भीमसेनने पाँच सिरवाले सर्पकी भाँति अपने पाँच अंगुलियोंसे युक्त हाथकी मुट्ठी बाँधकर उसे राक्षसकी गर्दनपर बड़े वेगसे दे मारा ॥ ६७ ॥
ततः श्रान्तं तु तद् रक्षो भीमसेनभुजाहतम् । सुपरिश्रान्तमालक्ष्य भीमसेनोऽभ्यवर्तत ॥ ६८ ॥ भीमसेनकी भुजाओंके आघातसे वह राक्षस थक गया था। तदनन्तर उसे अधिक थका हुआ देख भीमसेन आगे बढ़ते गये ॥ ६८ ॥
तत एनं महाबाहुर्बाहुभ्याममरोपमः । समुत्क्षिप्य बलाद् भीमो विनिष्पिष्य महीतले ॥ ६९ ॥ तत्पश्चात् देवताओंके समान तेजस्वी महाबाहु भीमसेनने उस राक्षसको दोनों भुजाओंसे बलपूर्वक उठा लिया और उसे पृथ्वीपर पटककर पीस डाला ॥ ६९ ॥
तस्य गात्राणि सर्वाणि चूर्णयामास पाण्डवः । अरत्निना चाभिहत्य शिरः कायादपाहरत् ॥ ७० ॥ उस समय पाण्डुनन्दन भीमने उसके सारे अंगोंको दबाकर चूर-चूर कर दिया और थप्पड़ मारकर उसके सिरको धड़से अलग कर दिया ॥ ७० ॥
संदष्टौष्ठं विवृत्ताक्षं फलं वृक्षादिव च्युतम् ।
जटासुरस्य तु शिरो भीमसेनबलाद्धृतम् ॥ ७१ ॥ भीमसेनके बलसे कटकर अलग हुआ जटासुरका वह सिर वृक्षसे टूटकर गिरे हुए फलके समान जान पड़ता था। उसका ओठ दाँतोंसे दबा हुआ था और आँखें बहुत फैली हुई थीं ॥ ७१ ॥
पपात रुधिरादिग्धं संदष्टदशनच्छदम् ।
तं निहत्य महेष्वासो युधिष्ठिरमुपागमत् ।
स्तूयमानो द्विजाग्र्यैस्तु मरुद्भिरिव वासवः ॥ ७२ ॥
दाँतोंसे दबे हुए ओठवाला वह मस्तक खूनसे लथपथ होकर गिर पड़ा था। इस प्रकार जटासुरको मारकर महान् धनुर्धर भीमसेन युधिष्ठिरके पास आये। उस समय श्रेष्ठ द्विज उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा कर रहे थे, मानो मरुद्गण देवराज इन्द्रके गुण गा रहे हों ॥ ७२ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि जटासुरवधपर्वणि सप्तपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५७ ॥
इस प्रकार श्रीमद्भारत वनपर्वके अन्तर्गत जटासुरवधपर्वमें एक सौ सत्तावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५७ ॥
॥ समाप्तं जटासुरवधपर्व ॥
(यक्षयुद्धपर्व)
(यक्षयुद्धपर्व)
अष्टपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः
नर-नारायण-आश्रमसे वृषपर्वाके यहाँ होते हुए राजर्षि आर्ष्टिषेणके आश्रमपर जाना
वैशम्पायन उवाच
निहते राक्षसे तस्मिन् पुनर्नारायणाश्रमम् ।
अभ्येत्य राजा कौन्तेयो निवासमकरोत् प्रभुः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—उस राक्षसके मारे जानेपर कुन्तीकुमार शक्तिशाली राजा युधिष्ठिर पुनः नर-नारायण-आश्रममें आकर रहने लगे ॥ १ ॥
स समानीय तान् सर्वान् भ्रातॄनित्यब्रवीद् वचः ।
द्रौपद्या सहितान् काले संस्मरन् भ्रातरं जयम् ॥ २ ॥
एक दिन उन्होंने द्रौपदीसहित सब भाइयोंको एकत्र करके अपने प्रियबन्धु अर्जुनका स्मरण करते हुए कहा— ॥ २ ॥
समाश्चतस्रोऽभिगताः शिवेन चरतां वने ।
कृतोद्देशः स बीभत्सुः पञ्चमीमभितः समाम् ॥ ३ ॥
'हमलोगोंको कुशलपूर्वक वनमें विचरते हुए चार वर्ष हो गये। अर्जुनने यह संकेत किया था कि मैं पाँचवें वर्षमें लौट आऊँगा ॥ ३ ॥
प्राप्य पर्वतराजानं श्वेतं शिखरिणां वरम् ।
पुष्पितैर्द्रुमषण्डैश्च मत्तकोकिलषट्पदैः ॥ ४ ॥
मयूरैश्चातकैश्चापि नित्योत्सवविभूषितम् ।
व्याघ्रैर्वराहैर्महिषैर्गवयैर्हरिणैस्तथा ॥ ५ ॥
श्वापदैर्व्यालरूपैश्च रुरुभिश्च निषेवितम् ।
फुल्लैः सहस्रपत्रैश्च शतपत्रैस्तथोत्पलैः ॥ ६ ॥
प्रफुल्लैः कमलैश्चैव तथा नीलोत्पलैरपि ।
महापुण्यं पवित्रं च सुरासुरनिषेवितम् ॥ ७ ॥
'पर्वतोंमें श्रेष्ठ गिरिराज कैलासपर आकर अर्जुनसे मिलनेके शुभ अवसरकी प्रतीक्षामें हमने यहाँ डेरा डाला है। (क्योंकि वहीं मिलनेका उनकी ओरसे संकेत प्राप्त हुआ था।) वह श्वेत कैलास-शिखर पुष्पित वृक्षावलियोंसे सुशोभित है। वहाँ मतवाले कोकिलोंकी काकली,
भ्रमरोंके गुंजारव तथा मोर और पपीहोंकी मीठी वाणीसे नित्य उत्सव-सा होता रहता है, जो उस पर्वतकी शोभाको बढ़ा देता है। वहाँ व्याघ्र, वराह, महिष, गवय, हरिण, हिंसक जन्तु, सर्प तथा रुरुमृग निवास करते हैं। खिले हुए सहस्रदल, शतदल, उत्पल, प्रफुल्ल कमल तथा नीलोत्पल आदिसे उस पर्वतकी रमणीयता और भी बढ़ गयी है। वह परम पुण्यमय और पवित्र है। देवता और असुर दोनों ही उसका सेवन करते हैं ।। ४—७ ।।
तत्रापि च कृतोद्देशः समागमदिदृक्षुभिः । कृतश्च समयस्तेन पार्थेनामिततेजसा ।। ८ ।। पञ्चवर्षाणि वत्स्यामि विद्यार्थीति पुरा मयि ।
'अमिततेजस्वी अर्जुनने वहाँ भी अपना आगमन देखनेके लिये उत्सुक हुए हमलोगोंके साथ संकेतपूर्वक यह प्रतिज्ञा की थी कि मैं अस्त्रविद्याका अध्ययन करनेके लिये पाँच वर्षोंतक देवलोकमें निवास करूँगा ।।
अत्र गाण्डीवधन्वानमवाप्तास्त्रमरिन्दमम् ।। ९ ।। देवलोकादिमं लोकं द्रक्ष्यामः पुनरागतम् । इत्युक्त्वा ब्राह्मणान् सर्वानामन्त्रयत पाण्डवः ।। १० ।।
'शत्रुओंका दमन करनेवाले गाण्डीवधारी अर्जुन अस्त्रविद्या प्राप्त करके पुनः देवलोकसे इस मनुष्यलोकमें आनेवाले हैं। हमलोग शीघ्र ही उनसे मिलेंगे' ऐसा कहकर पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरने सब ब्राह्मणोंको आमन्त्रित किया ।। ९-१० ।।
कारणं चैव तत् तेषामाचचक्षे तपस्विनाम् । तानुग्रतपसः प्रीतान् कृत्वा पार्थाः प्रदक्षिणाम् ।। ११ ।।
और उन तपस्वियोंके सामने उन्हें बुला भेजनेका कारण बताया। उन कठोर तपस्वियोंको प्रसन्न करके कुन्तीकुमारोंने उनकी परिक्रमा की ।। ११ ।।
ब्राह्मणास्तेऽन्वमोदन्त शिवेन कुशलेन च । सुखोदर्कमिमं क्लेशमचिराद् भरतर्षभ ।। १२ ।।
तब उन ब्राह्मणोंने कुशल-मंगलके साथ उन सबके अभीष्ट मनोरथकी पूर्तिको अनुमोदन किया और कहा—'भरतश्रेष्ठ! आजका यह क्लेश शीघ्र ही सुखद भविष्यके रूपमें परिणत हो जायगा ।। १२ ।।
क्षत्रधर्मेण धर्मज्ञ तीर्त्वा गां पालयिष्यसि । तत् तु राजा वचस्तेषां प्रतिगृह्य तपस्विनाम् ।। १३ ।। प्रतस्थे सह विप्रैस्तैर्भ्रातृभिश्च परन्तपः । राक्षसैरनुयातो वै लोमशेनाभिरक्षितः ।। १४ ।।
'धर्मज्ञ! तुम क्षत्रियधर्मके अनुसार इस संकटसे पार होकर सारी पृथ्वीका पालन करोगे।' राजा युधिष्ठिरने उन तपस्वी ब्राह्मणोंका यह आशीर्वाद शिरोधार्य किया और वे परंतप नरेश उन ब्राह्मणों तथा भाइयोंके साथ वहाँसे प्रस्थित हुए। घटोत्कच आदि राक्षस
भी उनकी सेवाके लिये पीछे-पीछे चले। राजा युधिष्ठिर महर्षि लोमशके द्वारा सर्वथा सुरक्षित थे ॥ १३-१४ ॥ क्वचित् पद्भ्यां ततोऽगच्छद् राक्षसैरुह्यते क्वचित् । तत्र तत्र महातेजा भ्रातृभिः सह सुव्रतः ॥ १५ ॥ उत्तम व्रतका पालन करनेवाले वे महातेजस्वी भूपाल कहीं तो भाइयोंसहित पैदल चलते और कहीं राक्षसलोग उन्हें पीठपर बैठाकर ले जाते थे। इस प्रकार वे अनेक स्थानोंमें गये ॥ १५ ॥ ततो युधिष्ठिरो राजा बहून् क्लेशान् विचिन्तयन् । सिंहव्याघ्रगजाकीर्णामुदीचीं प्रययौ दिशम् ॥ १६ ॥ तदनन्तर राजा युधिष्ठिर अनेक क्लेशोंका चिन्तन करते हुए सिंह, व्याघ्र और हाथियोंसे भरी हुई उत्तर-दिशाकी ओर चल दिये ॥ १६ ॥ अवेक्षमाणः कैलासं मैनाकं चैव पर्वतम् । गन्धमादनपादांश्च श्वेतं चापि शिलोच्चयम् ॥ १७ ॥ उपर्युपरि शैलस्य बह्वीश्च सरितः शिवाः । पृष्ठं हिमवतः पुण्यं ययौ सप्तदशेऽहनि ॥ १८ ॥ कैलास, मैनाकपर्वत, गन्धमादनकी घाटियों और श्वेत (हिमालय) पर्वतका दर्शन करते हुए उन्होंने पर्वतमालाओंके ऊपर-ऊपर बहुत-सी कल्याणमयी सरिताएँ देखीं तथा सत्रहवें दिन वे हिमालयके एक पावन पृष्ठभागपर जा पहुँचे ॥ १७-१८ ॥ ददृशुः पाण्डवा राजन् गन्धमादनमन्तिकात् । पृष्ठे हिमवतः पुण्ये नानाद्रुमलतावृते ॥ १९ ॥ सलिलावर्तसंजातैः पुष्पितैश्च महीरुहैः । समावृतं पुण्यतममाश्रमं वृषपर्वाणः ॥ २० ॥ तमुपागम्य राजर्षिं धर्मात्मानमरिन्दमाः । पाण्डवा वृषपर्वाणमवन्दन्त गतक्लमाः ॥ २१ ॥ राजन्! वहाँ पाण्डवोंने गन्धमादन पर्वतका निकटसे दर्शन किया। हिमालयका वह पावन पृष्ठभाग नाना प्रकारके वृक्षों और लताओंसे आवृत्त था। वहाँ जलके आवर्तोंसे सींचकर उत्पन्न हुए फूलवाले वृक्षोंसे घिरा हुआ वृषपर्वाका परम पवित्र आश्रम था। शत्रुदमन पाण्डवोंने उन धर्मात्मा राजर्षि वृषपर्वाके पास जाकर क्लेशरहित हो उन्हें प्रणाम किया ॥ १९—२१ ॥ अभ्यनन्दत् स राजर्षिः पुत्रवद् भरतर्षभान् । पूजिताश्चावसंस्तत्र सप्तरात्रमरिन्दमाः ॥ २२ ॥ उन राजर्षिने भरतकुलभूषण पाण्डवोंका पुत्रके समान अभिनन्दन किया और उनसे सम्मानित होकर वे शत्रुदमन पाण्डव वहाँ सात रात ठहरे रहे ॥ २२ ॥
अष्टमेऽहनि सम्प्राप्ते तमृषिं लोकविश्रुतम् । आमन्त्र्य वृषपर्वाणं प्रस्थानं प्रत्यरोचयन् ।। २३ ।। आठवें दिन उन विश्वविख्यात राजर्षि वृषपर्वाकी आज्ञा ले उन्होंने वहाँसे प्रस्थान करनेका विचार किया ।। २३ ।।
एकैकशश्च तान् विप्रान् निवेद्य वृषपर्वणि । न्यासभूतान् यथाकालं बन्धूनिव सुसत्कृतान् ।। २४ ।। पारिबर्हं च तं शेषं परिदाय महात्मने । ततस्ते यज्ञपात्राणि रत्नान्याभरणानि च ।। २५ ।। न्यदधुः पाण्डवा राजन्नाश्रमे वृषपर्वणः । अपने साथ आये हुए ब्राह्मणोंको उन्होंने एक-एक करके वृषपर्वाके यहाँ धरोहरकी भाँति सौंपा। उन सबका पाण्डवोंने समय-समयपर सगे बन्धुकी भाँति सत्कार किया था। ब्राह्मणोंको सौंपनेके पश्चात् पाण्डवोंने अपनी शेष सामग्री भी उन्हीं महामनाको दे दी। तदनन्तर पाण्डुपुत्रोंने वृषपर्वाके ही आश्रममें अपने यज्ञपात्र तथा रत्नमय आभूषण भी रख दिये ।। २४-२५ १/२ ।।
अतीतानागते विद्वान् कुशलः सर्वधर्मवित् ।। २६ ।। अन्वशासत् स धर्मज्ञः पुत्रवद् भरतर्षभान् ।
तेऽनुज्ञाता महात्मानः प्रययुर्दिशमुत्तराम् ॥ २७ ॥ वृषपर्वा भूत और भविष्यके ज्ञाता, कार्यकुशल और सम्पूर्ण धर्मोंके मर्मज्ञ थे। उन धर्मज्ञ नरेशने भरतश्रेष्ठ पाण्डवोंको पुत्रकी भाँति उपदेश दिया। उनकी आज्ञा पाकर महामना पाण्डव उत्तरदिशाकी ओर चले ॥ २६-२७ ॥ तान् प्रस्थितानभ्यगच्छद् वृषपर्वा महीपतिः । उपन्यस्य महातेजा विप्रेभ्यः पाण्डवांस्तदा ॥ २८ ॥ अनुसंसार्य कौन्तेयानाशीर्भिरभिनन्द्य च । वृषपर्वा निववृते पन्थानमुपदिश्य च ॥ २९ ॥ उस समय उनके प्रस्थान करनेपर महातेजस्वी राजर्षि वृषपर्वाने पाण्डवोंको (उस देशके जानकार अन्य) ब्राह्मणोंके सुपुर्द कर दिया और कुछ दूर पीछे-पीछे जाकर उन कुन्तीकुमारोंको आशीर्वाद देकर प्रसन्न किया। तत्पश्चात् उन्हें रास्ता बताकर वृषपर्वा लौट आये ॥ २८-२९ ॥ नानामृगगणैर्जुष्टं कौन्तेयः सत्यविक्रमः । पदातिर्भ्रातृभिः सार्धं प्रातिष्ठत युधिष्ठिरः ॥ ३० ॥ फिर सत्यपराक्रमी कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर अपने भाइयोंके साथ पैदल ही (वृषपर्वाके बताये हुए मार्गपर) चले, जो अनेक जातिके मृगोंके झुंडोंसे भरा हुआ था ॥ ३० ॥ नानाद्रुमनिरोधेषु वसन्तः शैलसानुषु । पर्वतं विविशुः श्वेतं चतुर्थेऽहनि पाण्डवाः ॥ ३१ ॥ महाभ्रघनसंकाशं सलिलोपहितं शुभम् । मणिकाञ्चनरूप्यस्य शिलानां च समुच्चयम् ॥ ३२ ॥ (रूपं हिमवतः प्रस्थं बहुकन्दरनिर्झरम् । शिलाविभङ्गविकटं लतापादपसंकुलम् ॥) ते समासाद्य पन्थानं यथोक्तं वृषपर्वणा । अनुसस्र्युर्यथोद्देशं पश्यन्तो विविधान्नगान् ॥ ३३ ॥ वे सभी पाण्डव नाना प्रकारके वृक्षोंसे हरे-भरे पर्वतीय शिखरोंपर डेरा डालते हुए चौथे दिन श्वेत (हिमालय) पर्वतपर जा पहुँचे, जो महामेघके समान शोभा पाता था। वह सुन्दर शैल शीतल सलिलराशिसे सम्पन्न था और मणि सुवर्ण, रजत तथा शिलाखण्डोंका समुदायरूप था। हिमालयका वह रमणीय प्रदेश अनेकानेक कन्दराओं और निर्झरोंसे सुशोभित शिलाखण्डोंके कारण दुर्गम तथा लताओं और वृक्षोंसे व्याप्त था। पाण्डव वृषपर्वाके बताये हुए मार्गका आश्रय ले नाना प्रकारके वृक्षोंका अवलोकन करते हुए अपने अभीष्ट स्थानकी ओर अग्रसर हो रहे थे ॥ ३१—३३ ॥ उपर्युपरि शैलस्य गुहाः परमदुर्गमाः । सुदुर्गामांस्ते सुबहून् सुखेनैवाभिचक्रमुः ॥ ३४ ॥