महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
समुद्रे बालुकापूर्णे उज्जालक इति स्मृते ।
आगम्य च स दुष्टात्मा तं देशं भरतर्षभ ॥ ७ ॥
बाधते स्म परं शक्त्या तमुत्तङ्काश्रमं विभो ।
अन्तर्भूमिगतस्तत्र बालुकान्तर्हितस्तथा ॥ ८ ॥
भरतश्रेष्ठ! वह दुष्टात्मा बालुकामय प्रसिद्ध उच्चालक समुद्रमें आकर रहने और उस देशके निवासियोंको सताने लगा। राजन्! वह अपनी पूरी शक्ति लगाकर धरतीके भीतर बालूमें छिपकर वहाँ उत्तंकके आश्रममें भी उपद्रव करने लगा ॥ ७-८ ॥
मधुकैटभयोः पुत्रो धुन्धुर्भीमपराक्रमः ।
शेते लोकविनाशाय तपोबलमुपाश्रितः ॥ ९ ॥
उत्तङ्कस्याश्रमाभ्याशे निःश्वसन् पावकार्चिषः ।
मधु और कैटभका वह भयंकर पराक्रमी पुत्र धुन्धु तपोबलका आश्रय ले सम्पूर्ण लोकोंका विनाश करनेके लिये वहाँ मरुप्रदेशमें शयन करता था। उत्तङ्कके आश्रमके पास साँस ले-लेकर वह आगकी चिनगारियाँ फैलाता था ॥ ९ १/२ ॥
एतस्मिन्नेव काले तु राजा सबलवाहनः ॥ १० ॥
उत्तङ्कविप्रसहितः कुवलाश्वो महीपतिः ।
पुत्रैः सह महीपालः प्रययौ भरतर्षभ ॥ ११ ॥
भरतश्रेष्ठ! इसी समय राजा कुवलाश्वने अपनी सेना, सवारी तथा पुत्रोंके साथ प्रस्थान किया। उनके साथ विप्रवर उत्तंक भी थे ॥ १०-११ ॥
सहस्रैरेकविंशत्या पुत्राणामरिमर्दनः ।
कुवलाश्वो नरपतिरन्वितो बलशालिनाम् ॥ १२ ॥
शत्रुमर्दन महाराज कुवलाश्व अपने इक्कीस हजार बलवान् पुत्रोंको साथ लेकर (सेनासहित) चले थे ॥ १२ ॥
तमाविशत् ततो विष्णुर्भगवान्तेजसा प्रभुः ।
उत्तङ्कस्य नियोगेन लोकानां हितकाम्यया ॥ १३ ॥
तदनन्तर उत्तंकके अनुरोधसे सम्पूर्ण जगत्का हित करनेके लिये सर्वसमर्थ भगवान् विष्णुने अपने तेजोमय स्वरूपसे कुवलाश्वमें प्रवेश किया ॥ १३ ॥
तस्मिन् प्रयाते दुर्धर्षे दिवि शब्दो महानभूत् ।
एष श्रीमानवध्योऽद्य धुन्धुमारो भविष्यति ॥ १४ ॥
उन दुर्धर्षवीर कुवलाश्वके यात्रा करनेपर देवलोकमें अत्यन्त हर्षपूर्ण कोलाहल होने लगा। देवता कहने लगे—'ये श्रीमान् नरेश अवध्य हैं, आज धुन्धुको मारकर ये' 'धुन्धुमार' नाम धारण करेंगे ॥ १४ ॥
दिव्यैश्च पुष्पैस्तं देवाः समन्तात् पर्यवारयन् । देवदुन्दुभयश्चापि नेदुः स्वयमनीरिताः ॥ १५ ॥ देवतालोग चारों ओरसे उनपर दिव्य फूलोंकी वर्षा करने लगे। देवताओंकी दुन्दुभियाँ स्वयं बिना किसी प्रेरणाके बज उठीं ॥ १५ ॥ शीतश्च वायुः प्रववौ प्रयाणे तस्य धीमतः । विपांसुलां महीं कुर्वन् ववर्ष च सुरेश्वरः ॥ १६ ॥ उन बुद्धिमान् राजा कुवलाश्वके यात्राकालमें शीतल वायु चलने लगी। देवराज इन्द्र धरतीकी धूल शान्त करनेके लिये वर्षा करने लगे ॥ १६ ॥ अन्तरिक्षे विमानादि देवतानां युधिष्ठिर । तत्रैव समदृश्यन्त धुन्धुर्यत्र महासुरः ॥ १७ ॥ युधिष्ठिर! जहाँ महान् असुर 'धुन्धु' रहता था, वहीं आकाशमें देवताओंके विमान आदि दिखायी देने लगे ॥ कुवलाश्वस्य धुन्धोश्च युद्धकौतूहलान्विताः । देवगन्धर्वसहिताः समवैक्षन् महर्षयः ॥ १८ ॥
कुवलाश्व और धुन्धुका युद्ध देखनेके लिये उत्सुक हो देवताओं और गन्धर्वोंके साथ महर्षि भी आकर डट गये और वहाँकी सारी बातोंपर दृष्टिपात करने लगे ॥ १८ ॥ नारायणेन कौरव्य तेजसाऽऽप्यायितस्तदा । स गतो नृपतिः क्षिप्रं पुत्रैस्तैः सर्वतो दिशम् ॥ १९ ॥ अर्णवं खानयामास कुवलाश्वो महीपतिः । कुरुनन्दन! उस समय भगवान् नारायणके तेजसे परिपुष्ट हो राजा कुवलाश्व अपने उन पुत्रोंके साथ वहाँ जा पहुँचे और शीघ्र ही चारों ओरसे उस बालुकामय समुद्रको खुदवाने लगे ॥ १९ १/२ ॥ कुवलाश्वस्य पुत्रैश्च तस्मिन् वै बालुकार्णवे ॥ २० ॥ सप्तभिर्दिवसैः खात्वा दृष्टो धुन्धुर्महाबलः । कुवलाश्वके पुत्रोंने सात दिनोंतक खुदाई करनेके बाद उस बालुकामय समुद्रमें (छिपे हुए) महाबली धुन्धुको देखा ॥ २० १/२ ॥ आसीद् घोरं वपुस्तस्य बालुकान्तर्हितं महत् ॥ २१ ॥ दीप्यमानं यथा सूर्यस्तेजसा भरतर्षभ । बालूके भीतर छिपा हुआ उसका शरीर विशाल एवं भयंकर था। भरतश्रेष्ठ! वह अपने तेजसे सूर्यके समान उद्दीप्त हो रहा था ॥ २१ १/२ ॥ ततो धुन्धुर्महाराज दिशमावृत्य पश्चिमाम् ॥ २२ ॥ सुप्तोऽभूद् राजशार्दूल कालानलसमद्युतिः । महाराज! तदनन्तर धुन्धु पश्चिम दिशाको घेरकर सो गया। नृपश्रेष्ठ! उसकी कान्ति प्रलयकालीन अग्निके समान जान पड़ती थी ॥ २२ १/२ ॥ कुवलाश्वस्य पुत्रैस्तु सर्वतः परिवारितः ॥ २३ ॥ अभिद्रुतः शरैस्तीक्ष्णैर्गदाभिर्मुसलैरपि । पट्टिशैः परिघैः प्रासैः खड्गैश्च विमलैः शितैः ॥ २४ ॥ स वध्यमानः संक्रुद्धः समुत्तस्थौ महाबलः । क्रुद्धश्चाभक्षयत् तेषां शस्त्राणि विविधानि च ॥ २५ ॥ उस समय राजा कुवलाश्वके पुत्रोंने सब ओरसे घेरकर उसपर आक्रमण किया। तीखे बाण, गदा, मुसल, पट्टिश, परिघ, प्रास और चमचमाते हुए तेज धारवाले खड्ग—इन सबके द्वारा चोट खाकर महाबली धुन्धु क्रोधित हो गया और उनके चलाये हुए नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंको वह क्रोधी असुर खा गया ॥ २३—२५ ॥ आस्याद् वमन् पावकं स संवर्तकसमं तदा । तान् सर्वान् नृपतेः पुत्रानदहत् स्वेन तेजसा ॥ २६ ॥ तत्पश्चात् उसने अपने मुँहसे प्रलयकालीन अग्निके समान आगकी चिनगारियाँ उगलना आरम्भ किया और उन समस्त राजकुमारोंको अपने तेजसे जलाकर भस्म कर
दिया ।। २६ ।।
मुखजेनाग्निना क्रुद्धो लोकानुद्धर्तयन्निव ।
क्षणेन राजशार्दूल पुरेव कपिलः प्रभुः ।। २७ ।।
सगरस्यात्मजान् क्रुद्धस्तदद्भुतमिवाभवत् ।
नृपश्रेष्ठ! जैसे पूर्वकालमें भगवान् कपिलने कुपित होकर राजा सगरके सभी पुत्रोंको
क्षणभरमें दग्ध कर दिया था, उसी प्रकार क्रोधमें भरे हुए धुन्धुने, मानो वह सम्पूर्ण लोकोंको
नष्ट कर देना चाहता हो, अपने मुखसे आग प्रकट करके कुवलाश्वके पुत्रोंको जला दिया।
यह एक अद्भुत-सी घटना घटित हुई ।। २७ १/२ ।।
तेषु क्रोधाग्निदग्धेषु तदा भरतसत्तम ।। २८ ।।
तं प्रबुद्धं महात्मानं कुम्भकर्णमिवापरम् ।
आससाद महातेजाः कुवलाश्वो महीपतिः ।। २९ ।।
भरतश्रेष्ठ! जब सभी राजकुमार धुन्धुकी क्रोधाग्निसे दग्ध हो गये, तब महातेजस्वी
राजा कुवलाश्वने दूसरे कुम्भकर्णके* समान जगे हुए उस महाकाय दानवपर आक्रमण
किया ।। २८-२९ ।।
तस्य वारि महाराज सुस्राव बहु देहतः ।
तदापीय ततस्तेजो राजा वारिमयं नृप ।। ३० ।।
योगी योगेन वह्निं च शमयामास वारिणा ।
महाराज! उस समय धुन्धुके शरीरसे बहुत-सा जल प्रवाहित होने लगा, किंतु राजा
कुवलाश्वने योगी होनेके कारण योगबलसे उस जलमय तेजको पी लिया और जल प्रकट
करके धुन्धुकी मुखाग्निको बुझा दिया ।। ३० १/२ ।।
ब्रह्मास्त्रेण च राजेन्द्र दैत्यं क्रूरपराक्रमम् ।। ३१ ।।
ददाह भरतश्रेष्ठ सर्वलोकभवाय वै ।
सोऽस्त्रेण दग्ध्वा राजर्षिः कुवलाश्वो महासुरम् ।। ३२ ।।
सुरशत्रुममित्रघ्नं त्रैलोक्येश इवापरः ।
राजेन्द्र! भरतश्रेष्ठ! तत्पश्चात् सम्पूर्ण लोकोंके कल्याणके लिये राजर्षि कुवलाश्वने
ब्रह्मास्त्रका प्रयोग करके उस क्रूर पराक्रमी दैत्य धुन्धुको दग्ध कर दिया। इस प्रकार
ब्रह्मास्त्रद्वारा शत्रुनाशक, देववैरी महान् असुर धुन्धुको दग्ध करके राजा कुवलाश्व दूसरे
इन्द्रकी भाँति शोभा पाने लगे ।। ३१-३२ १/२ ।।
धुन्धोर्वधात् तदा राजा कुवलाश्वो महामनाः ।। ३३ ।।
धुन्धुमार इति ख्यातो नाम्नाप्रतिरथोऽभवत् ।
उस समय महामना राजा कुवलाश्व धुन्धुको मारनेके कारण 'धुन्धुमार' नामसे विख्यात
हो गये। उनका सामना करनेवाला वीर कोई नहीं रह गया था ।। ३३ १/२ ।।
प्रीतैश्च त्रिदशैः सर्वैर्महर्षिसहितैस्तदा ॥ ३४ ॥
वरं वृणीष्वेत्युक्तः स प्राञ्जलिः प्रणतस्तदा ।
अतीव मुदितो राजन्निदं वचनमब्रवीत् ॥ ३५ ॥
तदनन्तर महर्षियोंसहित सम्पूर्ण देवता प्रसन्न होकर वहाँ आये और राजासे वर माँगनेका अनुरोध करने लगे। राजन्! उनकी बात सुनकर कुवलाश्व अत्यन्त प्रसन्न हुए और हाथ जोड़ मस्तक झुकाकर इस प्रकार बोले— ॥ ३४-३५ ॥
दद्यां वित्तं द्विजाग्र्येभ्यः शत्रूणां चापि दुर्जयः ।
सख्यं च विष्णुना मे स्याद् भूतेष्वद्रोह एव च ॥ ३६ ॥
‘देवताओं! मैं श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको धन दान करूँ, शत्रुओंके लिये दुर्जय बना रहूँ, भगवान् विष्णुके साथ सख्य भावसे मेरा प्रेम हो और किसी भी प्राणीके प्रति मेरे मनमें द्रोह न रह जाय ॥ ३६ ॥
धर्मे रतिश्च सततं स्वर्गे वासस्तथाक्षयः ।
तथास्त्विति ततो देवैः प्रीतैरुक्तः स पार्थिवः ॥ ३७ ॥
‘धर्ममें मेरा सदा अनुराग हो और अन्तमें मेरा स्वर्गलोकमें नित्य निवास हो।' यह सुनकर देवताओंने बड़ी प्रसन्नताके साथ राजा कुवलाश्वसे कहा—'महाराज! ऐसा ही होगा' ॥ ३७ ॥
ऋषिभिश्च सगन्धर्वैरुत्तङ्केन च धीमता ।
सम्भाष्य चैनं विविधैराशीर्वादैस्ततो नृप ॥ ३८ ॥
राजन्! तदनन्तर ऋषियों, गन्धर्वों और बुद्धिमान् महर्षि उत्तंकने भी नाना प्रकारके आशीर्वाद देते हुए राजासे वार्तालाप किया ॥ ३८ ॥
देवा महर्षयश्चापि स्वानि स्थानानि भेजिरे ।
तस्य पुत्रास्त्रयः शिष्टा युधिष्ठिर तदाभवन् ॥ ३९ ॥
युधिष्ठिर! इसके बाद देवता और महर्षि अपने-अपने स्थानको चले गये। उस युद्धमें राजा कुवलाश्वके तीन ही पुत्र शेष रह गये थे ॥ ३९ ॥
दृढाश्वः कपिलाश्वश्च चन्द्राश्वश्चैव भारत ।
तेभ्यः परम्परा राजन्निक्ष्वाकूणां महात्मनाम् ॥ ४० ॥
वंशस्य सुमहाभाग राज्ञाममिततेजसाम् ।
भारत! उनके नाम थे—दृढाश्व, कपिलाश्व और चन्द्राश्व। राजन्! महाभाग! उन्हींसे अमित तेजस्वी इक्ष्वाकुवंशी महामना नरेशोंकी वंश-परम्परा चालू हुई ॥
एवं स निहतस्तेन कुवलाश्वेन सत्तम ॥ ४१ ॥
धुन्धुर्नाम महादैत्यो मधुकैटभयोः सुतः ।
कुवलाश्वश्च नृपतिर्धुन्धुमार इति स्मृतः ॥ ४२ ॥
सज्जनशिरोमणे! इस प्रकार मधुकैटभ-कुमार महादैत्य धुन्धु कुवलाश्वके हाथसे मारा गया और राजा कुवलाश्वकी धुन्धुमार नामसे प्रसिद्धि हुई ।। ४१-४२ ।।
नाम्ना च गुणसंयुक्तस्तदाप्रभृति सोऽभवत् ।
एतत् ते सर्वमाख्यातं यन्मां त्वं परिपृच्छसि ।। ४३ ।।
धौन्धुमारमुपाख्यानं प्रथितं यस्य कर्मणा ।
तभीसे वे नरेश अपने नामके अनुसार वीरता आदि गुणोंसे युक्त हो भूमण्डलमें विख्यात हो गये। युधिष्ठिर! तुमने मुझसे जो पूछा था, वह सारा धुन्धुमारोपाख्यान मैंने तुमसे कह सुनाया। जिनके पराक्रमसे इस उपाख्यानकी प्रसिद्धि हुई है उन नरेशका भी परिचय दे दिया ।। ४३ १/२ ।।
इदं तु पुण्यमाख्यानं विष्णोः समनुकीर्तनम् ।। ४४ ।।
शृणुयाद् यः स धर्मात्मा पुत्रवांश्च भवेन्नरः ।
आयुष्मान् भूतिमांश्चैव श्रुत्वा भवति पर्वसु ।
न च व्याधिभयं किंचित् प्राप्नोति विगतज्वरः ।। ४५ ।।
जो मनुष्य भगवान् विष्णुके कीर्तनरूप इस पवित्र उपाख्यानको सुनता है वह धर्मात्मा और पुत्रवान् होता है। जो पर्वोंपर इस कथाको सुनता है वह दीर्घायु तथा ऐश्वर्यशाली होता है। उसे रोग आदिका कुछ भी भय नहीं होता। उसकी सारी चिन्ताएँ दूर हो जाती हैं ।।
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमस्यापर्वणि धुन्धुमारोपाख्याने
चतुरधिकद्विशततमोऽध्यायः ।। २०४ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमस्यापर्वमें
धुन्धुमारोपाख्यानविषयक दो सौ चारवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। २०४ ।।
* यह मार्कण्डेयजीका युधिष्ठिरके प्रति द्वापरके समय कहा हुआ वचन है। उन्होंने त्रेतामें हुए कुम्भकर्णकी उपमा दी है।
पतिव्रता स्त्री तथा पिता-माताकी सेवाका माहात्म्य
पञ्चाधिकद्विशततमोऽध्यायः
पतिव्रता स्त्री तथा पिता-माताकी सेवाका माहात्म्य
वैशम्पायन उवाच
ततो युधिष्ठिरो राजा मार्कण्डेयं महाद्युतिम् ।
पप्रच्छ भरतश्रेष्ठ धर्मप्रश्नं सुदुर्विदम् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— भरतश्रेष्ठ जनमेजय! तदनन्तर राजा युधिष्ठिरने महातेजस्वी मार्कण्डेय मुनिसे धर्मविषयक प्रश्न किया, जो समझनेमें अत्यन्त कठिन था ॥ १ ॥
श्रोतुमिच्छामि भगवन् स्त्रीणां माहात्म्यमुत्तमम् ।
कथ्यमानं त्वया विप्र सूक्ष्मं धर्म्यं च तत्त्वतः ॥ २ ॥
वे बोले—‘भगवन्! मैं आपके मुखसे (पतिव्रता) स्त्रियोंके सूक्ष्म, धर्मसम्मत एवं उत्तम माहात्म्यका यथार्थ वर्णन सुनना चाहता हूँ ॥ २ ॥
प्रत्यक्षमिह विप्रर्षे देवा दृश्यन्ति सत्तम् ।
सूर्याचन्द्रमसौ वायुः पृथिवी वह्निरेव च ॥ ३ ॥
पिता माता च भगवन् गुरुरेव च सत्तम् ।
यच्चान्यद् देवविहितं तच्चापि भृगुनन्दन ॥ ४ ॥
‘भगवन्! श्रेष्ठ ब्रह्मर्षे! इस जगत्में सूर्य, चन्द्रमा, वायु, पृथिवी, अग्नि, पिता, माता और गुरु—ये प्रत्यक्ष देवता दिखायी देते हैं। भृगुनन्दन! इसके सिवा अन्य जो देवतारूपसे स्थापित देवविग्रह हैं, वे भी प्रत्यक्ष देवताओंकी ही कोटिमें हैं’ ॥ ३-४ ॥
मान्या हि गुरवः सर्वे एकपत्न्यस्तथा स्त्रियः ।
पतिव्रतानां शुश्रूषा दुष्करा प्रतिभाति मे ॥ ५ ॥
‘समस्त गुरुजन और पतिव्रता नारियाँ भी समादरके योग्य हैं। पतिव्रता स्त्रियाँ अपने पतिकी जैसी सेवा-शुश्रूषा करती हैं; वह दूसरे किसीके लिये मुझे अत्यन्त कठिन प्रतीत होती है ॥ ५ ॥
पतिव्रतानां माहात्म्यं वक्तुमर्हसि नः प्रभो ।
निरुद्ध्य चेन्द्रियग्रामं मनः संरुध्य चानघ ॥ ६ ॥
पतिं दैवतवच्चापि चिन्तयन्त्यः स्थिता हि याः ।
भगवन् दुष्करं त्वेतत् प्रतिभाति मम प्रभो ॥ ७ ॥
‘प्रभो! आप अब हमें पतिव्रता स्त्रियोंकी महिमा सुनावें। निष्पाप सहर्ष! जो अपनी इन्द्रियोंको संयममें रखती हुई मनको वशमें करके अपने पतिका देवताके समान ही चिन्तन करती रहती हैं, वे नारियाँ धन्य हैं। प्रभो! भगवन्! उनका वह त्याग और सेवाभाव मुझे तो अत्यन्त कठिन जान पड़ता है ॥ ६-७ ॥
मातापित्रोश्च शुश्रूषा स्त्रीणां भर्तरि च द्विज ।
स्त्रीणां धर्मात् सुघोराद्धि नान्यं पश्यामि दुष्करम् ॥ ८ ॥
‘ब्रह्मन्! पुत्रोंद्वारा माता-पिताकी सेवा तथा स्त्रियोंद्वारा की हुई पतिकी सेवा बहुत कठिन है। स्त्रियोंके इस कठोर धर्मसे बढ़कर और कोई दुष्कर कार्य मुझे नहीं दिखायी देता है॥ ८॥
साध्वाचाराः स्त्रियो ब्रह्मन् यत् कुर्वन्ति सदाऽऽदृताः ।
दुष्करं खलु कुर्वन्ति पितरं मातरं च वै ॥ ९ ॥
एकपत्न्यश्च या नार्यो याश्च सत्यं वदन्त्युत ।
‘ब्रह्मन्! समाजमें सदा आदर पानेवाली सदाचारिणी स्त्रियाँ जो महान् कार्य करती हैं वह अत्यन्त कठिन है। जो लोग पिता-माताकी सेवा करते हैं उनका कर्म भी बहुत कठिन है। पतिव्रता तथा सत्यवादिनी स्त्रियाँ अत्यन्त कठोर धर्मका पालन करती हैं ॥ ९ १/२ ॥
कुक्षिणा दश मासांश्च गर्भं संधारयन्ति याः ॥ १० ॥
नार्यः कालेन सम्भूय किमद्भुततरं ततः ।
‘स्त्रियाँ अपने उदरमें दस महीनेतक जो गर्भ धारण करती हैं और यथासमय उसको जन्म देती हैं, इससे अद्भुत कार्य और कौन होगा? ॥ १० १/२ ॥
संशयं परमं प्राप्य वेदनामतुलामपि ॥ ११ ॥
प्रजायते सुतान् नार्यो दुःखेन महता विभो ।
पुष्णन्ति चापि महता स्नेहेन द्विजपुङ्गव ॥ १२ ॥
‘भगवन्! अपनेको भारी प्राणसंकटमें डालकर और अतुल वेदनाको सहकर नारियाँ बड़े कष्टसे संतान उत्पन्न करती हैं! विप्रवर! फिर बड़े स्नेहसे उनका पालन भी करती हैं॥ ११-१२॥
याश्च क्रूरेषु सत्त्वेषु वर्तमाना जुगुप्सिताः ।
स्वकर्म कुर्वन्ति सदा दुष्करं तच्च मे मतम् ॥ १३ ॥
‘जो सती-साध्वी स्त्रियाँ क्रूर स्वभावके पतियोंकी सेवामें रहकर उनके तिरस्कारका पात्र बनकर भी सदा अपने सती-धर्मका पालन करती रहती हैं, वह तो मुझे और भी अत्यन्त कठिन प्रतीत होता है॥ १३॥
क्षत्रधर्मसमाचारतत्त्वं व्याख्याहि मे द्विज ।
धर्मः सुदुर्लभो विप्र नृशंसेन महात्मनाम् ॥ १४ ॥
‘ब्रह्मन्! आप मुझे क्षत्रियोंके धर्म और आचारका तत्त्व भी विस्तारपूर्वक बताइये। विप्रवर! जो क्रूर स्वभावके मनुष्य हैं, उनके लिये महात्माओंका धर्म अत्यन्त दुर्लभ है॥ १४॥
एतदिच्छामि भगवन् प्रश्नं प्रश्नविदां वर ।
श्रोतुं भृगुकुलश्रेष्ठ शुश्रूषे तव सुव्रत ॥ १५ ॥
भगवन्! भृगुकुलशिरोमणे! आप उत्तम व्रतके पालक और प्रश्नका समाधान करनेवाले विद्वानोंमें श्रेष्ठ हैं। मैंने जो प्रश्न आपके सम्मुख उपस्थित किया है, उसीका उत्तर मैं आपसे सुनना चाहता हूँ' ॥ १५ ॥
मार्कण्डेय उवाच
हन्त तेऽहं समाख्यास्ये प्रश्नमेतं सुदुर्वचम् ।
तत्त्वेन भरतश्रेष्ठ गदतस्तन्निबोध मे ॥ १६ ॥
मार्कण्डेयजी बोले— भरतश्रेष्ठ! तुम्हारे इस प्रश्नका विवेचन करना यद्यपि बहुत कठिन है, तो भी मैं अब इसका यथावत् समाधान करूँगा। तुम मेरे मुखसे सुनो ॥ १६ ॥
मातृस्तु गौरवादन्ये पितृनन्ये तु मेनिरे ।
दुष्करं कुरुते माता विवर्धयति या प्रजाः ॥ १७ ॥
कुछ लोग माताओंको गौरवकी दृष्टिसे बड़ी मानते हैं। दूसरे लोग पिताको महत्त्व देते हैं। परंतु माता जो अपनी संतानोंको पाल-पोसकर बड़ा बनाती है, वह उसका कठिन कार्य है ॥ १७ ॥
तपसा देवतेज्याभिवन्दनेन तितिक्षया ।
सुप्रशस्तैरुपायैश्चापीहन्ते पितरः सुतान् ॥ १८ ॥
माता-पिता तपस्या, देवपूजा, वन्दना, तितिक्षा तथा अन्य श्रेष्ठ उपायोंद्वारा भी पुत्रोंको प्राप्त करना चाहते हैं ॥ १८ ॥
एवं कृच्छ्रेण महता पुत्रं प्राप्य सुदुर्लभम् ।
चिन्तयन्ति सदा वीर कीदृशोऽयं भविष्यति ॥ १९ ॥
वीर! इस प्रकार बड़ी कठिनाईसे परम दुर्लभ पुत्रको पाकर लोग सदा इस चिन्तामें डूबे रहते हैं कि न जाने यह किस तरहका होगा ॥ १९ ॥
आशंसते हि पुत्रेषु पिता माता च भारत ।
यशः कीर्तिमथैश्वर्यं प्रजा धर्मं तथैव च ॥ २० ॥
भारत! पिता और माता अपने पुत्रोंके लिये यश, कीर्ति और ऐश्वर्य, संतान तथा धर्मकी शुभकामना करते हैं ॥ २० ॥
तयोराशां तु सफलां यः करोति स धर्मवित् ।
पिता माता च राजेन्द्र तुष्यतो यस्य नित्यशः ॥ २१ ॥
इह प्रेत्य च तस्याथ कीर्तिर्धर्मश्च शाश्वतः ।
राजेन्द्र! जो उन दोनोंकी आशाको सफल करता है, वही पुत्र धर्मज्ञ है। जिसके माता-पिता उससे सदा संतुष्ट रहते हैं, उसे इहलोक और परलोकमें भी अक्षय कीर्ति और शाश्वत धर्मकी प्राप्ति होती है ॥ २११/२ ॥
नैव यज्ञक्रियाः काश्चिन्न श्राद्धं नोपवासकम् ॥ २२ ॥
या तु भर्तरि शुश्रूषा तया स्वर्गं जयत्युत ।
नारीके लिये किसी यज्ञकर्म, श्राद्ध और उपवासकी आवश्यकता नहीं है। वह जो पतिकी सेवा करती है, उसीके द्वारा स्वर्गलोकपर विजय प्राप्त कर लेती है ॥
एतत् प्रकरणं राजन्नधिकृत्य युधिष्ठिर ॥ २३ ॥
पतिव्रतानां नियतं धर्मं चावहितः शृणु ॥ २४ ॥
राजा युधिष्ठिर! इसी प्रकरणमें पतिव्रताओंके नियत धर्मका वर्णन किया जायगा। तुम सावधान होकर सुनो ॥ २३-२४ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमस्यापर्वणि पतिव्रतोपाख्याने पञ्चाधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २०५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमस्यापर्वमें पतिव्रतोपाख्यानविषयक दो सौ पाँचवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २०५ ॥
कौशिक ब्राह्मण और पतिव्रताके उपाख्यानके अन्तर्गत ब्राह्मणोंके धर्मका वर्णन
षडधिकद्विशततमोऽध्यायः
कौशिक ब्राह्मण और पतिव्रताके उपाख्यानके अन्तर्गत ब्राह्मणोंके धर्मका वर्णन
मार्कण्डेय उवाच
कश्चिद् द्विजातिप्रवरो वेदाध्यायी तपोधनः ।
तपस्वी धर्मशीलश्च कौशिको नाम भारत ॥ १ ॥
**मार्कण्डेयजी कहते हैं—**भरतनन्दन! कौशिक नामसे प्रसिद्ध एक ब्राह्मण था, जो वेदका अध्ययन करनेवाला, तपस्याका धनी और धर्मात्मा था। वह तपस्वी ब्राह्मण सम्पूर्ण द्विजातियोंमें श्रेष्ठ समझा जाता था ॥ १ ॥
साङ्गोपनिषदो वेदानधीते द्विजसत्तमः ।
स वृक्षमूले कस्मिंश्चिद् वेदानुच्चारयन् स्थितः ॥ २ ॥
द्विजश्रेष्ठ कौशिकने सम्पूर्ण अंगोंसहित वेदों और उपनिषदोंका अध्ययन किया था। एक दिनकी बात है, वह किसी वृक्षके नीचे बैठकर वेदपाठ कर रहा था ॥ २ ॥
उपरिष्टाच्च वृक्षस्य बलाका संन्यलीयत ।
तया पुरीषमुत्सृष्टं ब्राह्मणस्य तदोपरि ॥ ३ ॥
उस समय उस वृक्षके ऊपर एक बगुली छिपी बैठी थी। उसने ब्राह्मण देवताके ऊपर बीट कर दी ॥ ३ ॥
तामवेक्ष्य ततः क्रुद्धः समपध्यायत् द्विजः ।
भृशं क्रोधाभिभूतेन बलाका सा निरीक्षिता ॥ ४ ॥
अपध्याता च विप्रेण न्यपतद् धरणीतले ।
यह देख ब्राह्मण क्रोधित हो गया और उस पक्षीकी ओर दृष्टि डालकर उसका अनिष्टचिन्तन करने लगा। उसने अत्यन्त कुपित होकर उस बगुलीको देखा और उसका अनिष्टचिन्तन किया था, अतः वह पृथ्वीपर गिर पड़ी ॥ ४ १/२ ॥
बलाकां पतितां दृष्ट्वा गतसत्त्वामचेतनाम् ॥ ५ ॥
कारुण्यादभिसंतप्तः पर्यशोचत तां द्विजः ।
अकार्यं कृतवानस्मि रोषरागबलात्कृतः ॥ ६ ॥
उस बगुलीको अचेत एवं निष्प्राण होकर पड़ी देख ब्राह्मणका हृदय दयासे द्रवित हो उठा। उसे अपने इस कुकृत्यपर पश्चात्ताप हुआ। वह इस प्रकार शोक प्रकट करता हुआ बोला—'ओह! आज क्रोध और आसक्तिके वशीभूत होकर मैंने यह अनुचित कार्य कर डाला' ॥ ५-६ ॥
मार्कण्डेय उवाच
इत्युक्त्वा बहुशो विद्वान् ग्रामं भैक्ष्याय संश्रितः ।
ग्रामे शुचीनि प्रचरन् कुलानि भरतर्षभ ।। ७ ।।
प्रविष्टस्तत् कुलं यत्र पूर्वं चरितवांस्तु सः ।
देहीति याचमानोऽसौ तिष्ठेत्युक्तः स्त्रिया ततः ।। ८ ।।
मार्कण्डेयजी कहते हैं— भरतश्रेष्ठ! इस प्रकार बार-बार पछताकर वह विद्वान् ब्राह्मण गाँवमें भिक्षाके लिये गया। उस गाँवमें जो लोग शुद्ध और पवित्र आचरणवाले थे, उन्हींके घरोंपर भिक्षा माँगता हुआ वह एक ऐसे घरपर जा पहुँचा, जहाँ पहले भी कभी भिक्षा प्राप्त कर चुका था। दरवाजेपर पहुँचकर ब्राह्मण बोला—'भिक्षा दें!' भीतरसे किसी स्त्रीने उत्तर दिया—'ठहरो! (अभी लाती हूँ)' ।। ७-८ ।।
शौचं तु यावत् कुरुते भाजनस्य कुटुम्बिनी ।
एतस्मिन्नन्तरे राजन् क्षुधासम्पीडितो भृशम् ।। ९ ।।
भर्ता प्रविष्टः सहसा तस्या भरतसत्तम ।
राजन्! वह घरकी मालकिन थी, जो जूठे बर्तन माँज रही थी। ज्यों ही वह बर्तन साफ करके उधरसे निवृत्त हुई, त्यों ही उसके पतिदेव सहसा घरपर आ गये। भरतश्रेष्ठ! वे भूखसे अत्यन्त पीड़ित थे ।। ९ १/२ ।।
सा तु दृष्ट्वा पतिं साध्वी ब्राह्मणं व्यवहाय तम् ॥ १० ॥
पाद्यमाचमनीयं वै ददौ भर्तुस्तथाऽऽसनम् ।
प्रह्वा पर्यचरच्चापि भर्तारमसितेक्षणा ॥ ११ ॥
पतिको आया देख उस श्याम नेत्रोंवाली पतिव्रताने ब्राह्मणको तो उसी दशामें छोड़ दिया और अत्यन्त विनीतभावसे वह पतिकी सेवामें लग गयी। पानी लाकर उसने पतिके पैर धोये, हाथ-मुँह धुलाये और बैठनेको आसन दिया ॥ १०-११ ॥
आहारेणाथ भक्ष्यैश्च भोज्यैः सुमधुरैस्तथा ।
उच्छिष्टं भाविता भर्तुर्भुङ्क्ते नित्यं युधिष्ठिर ॥ १२ ॥
फिर सुन्दर स्वादिष्ट भक्ष्य-भोज्य पदार्थ परोसकर वह पतिको भोजन कराने लगी। युधिष्ठिर! वह सती स्त्री प्रतिदिन पतिको भोजन कराकर उनके उच्छिष्टको प्रसाद मानकर बड़े आदर और प्रेमसे भोजन करती थी ॥
दैवतं च पतिं मेने भर्तुश्चित्तानुसारिणी ।
कर्मणा मनसा वाचा नान्यचित्ताभ्यगात् पतिम् ॥ १३ ॥
वह पतिको देवता मानती और उनके विचारके अनुकूल ही चलती थी। उसका मन कभी पर पुरुषकी ओर नहीं जाता था। वह मन, वाणी और क्रियासे पतिपरायणा थी ॥ १३ ॥
तं सर्वभावोपगता पतिशुश्रूषणे रता ।
साध्वाचारा शुचिर्दक्षा कुटुम्बस्य हितैषिणी ॥ १४ ॥
अपने हृदयकी समस्त भावनाएँ, सम्पूर्ण प्रेम पतिके चरणोंमें चढ़ाकर वह अनन्यभावसे उन्हींकी सेवामें लगी रहती थी। सदाचारका पालन करती, बाहर-भीतरसे शुद्ध—पवित्र रहती, घरके काम-काजको कुशलतापूर्वक करती और कुटुम्बके सभी लोगोंका हित चाहती थी ॥
भर्तुश्चापि हितं यत् तत् सततं सानुवर्तते ।
देवतातिथिभृत्यानां श्वश्रूश्वशुरयोस्तथा ॥ १५ ॥
शुश्रूषणपरा नित्यं सततं संयतेन्द्रिया ।
पतिके लिये जो हितकर कार्य जान पड़ता उसमें भी वह सदा संलग्न रहती थी। देवताओंकी पूजा, अतिथियोंके सत्कार, भृत्योंके भरण-पोषण और सास-ससुरकी सेवामें भी वह सर्वदा तत्पर रहती थी। अपने मन और इन्द्रियोंपर वह निरन्तर पूर्ण संयम रखती थी ॥
सा ब्राह्मणं तदा दृष्ट्वा संस्थितं भैक्ष्यकाङ्क्षिणम् ।
कुर्वती पतिशुश्रूषां सस्माराथ शुभेक्षणा ॥ १६ ॥
पतिकी सेवा करते-करते उस मंगलमयी दृष्टिवाली देवीको भिक्षाके लिये खड़े हुए ब्राह्मणकी याद आयी ॥
व्रीडिता साभवत् साध्वी तदा भरतसत्तम । भिक्षामादाय विप्राय निर्जगाम यशस्विनी ॥ १७ ॥ भरतवंशविभूषण! अपनी भूलके कारण वह यशस्विनी साध्वी स्त्री बहुत लज्जित हुई और ब्राह्मणके लिये भिक्षा लेकर घरसे बाहर निकली ॥ १७ ॥
ब्राह्मण उवाच किमिदं भवति त्वं मां तिष्ठेत्युक्त्वा वराङ्गने । उपरोधं कृतवती न विसर्जितवत्यसि ॥ १८ ॥ **उसे देखकर ब्राह्मणने कहा—**सुन्दरी! तुम्हारा यह कैसा बर्ताव है? देख! तुम्हें इतना विलम्ब करना था तो 'ठहरो' कहकर मुझे रोक क्यों लिया? मुझे जाने क्यों नहीं दिया? ॥ १८ ॥
मार्कण्डेय उवाच ब्राह्मणं क्रोधसंतप्तं ज्वलन्तमिव तेजसा । दृष्ट्वा साध्वी मनुष्येन्द्र सान्त्वपूर्वं वचोऽब्रवीत् ॥ १९ ॥ **मार्कण्डेयजी कहते हैं—**राजन्! ब्राह्मण क्रोधसे संतप्त हो अपने तेजसे जलता-सा प्रतीत होता था। उसे देखकर उस पतिव्रता देवीने बड़ी शान्तिसे उत्तर दिया ॥
स्त्र्युवाच
क्षन्तुमर्हसि मे विद्वन् भर्ता मे दैवतं महत् ।
स चापि क्षुधितः श्रान्तः प्राप्तः शुश्रूषितो मया ॥ २० ॥
**स्त्री बोली—**विद्वन्! क्षमा करें। मेरे लिये सबसे बड़े देवता पति हैं। वे भूखे और थके हुए घरपर आये थे। (उन्हें छोड़कर कैसे आती?) उन्हींकी सेवामें लग गयी ॥
ब्राह्मण उवाच
ब्राह्मणा न गरीयांसो गरीयांस्ते पतिः कृतः ।
गृहस्थधर्मे वर्तन्ती ब्राह्मणानवमन्यसे ॥ २१ ॥
**तब ब्राह्मण बोला—**क्या ब्राह्मण बड़े नहीं हैं; तुमने पतिको ही सबसे बड़ा बना दिया? गृहस्थधर्ममें रहकर भी तुम ब्राह्मणोंका अपमान करती हो? ॥ २१ ॥
इन्द्रोऽप्येषां प्रणमते किं पुनर्मानवो भुवि ।
अवलिप्ते न जानीषे वृद्धानां न श्रुतं त्वया ॥ २२ ॥
ब्राह्मणा ह्यग्निसदृशा दहेयुः पृथिवीमपि ।
अरी! (स्वर्गलोकके स्वामी) इन्द्र भी इन ब्राह्मणोंके आगे सिर झुकाते हैं, फिर भूतलके मनुष्योंकी तो बात ही क्या है? घमंडमें भरी हुई स्त्री! क्या तुम ब्राह्मणोंका प्रभाव नहीं जानती? कभी बड़े-बूढ़ोंके मुखसे भी नहीं सुना? अरी! ब्राह्मण अग्निके समान तेजस्वी होते हैं। वे चाहें तो इस पृथ्वीको भी जलाकर भस्म कर सकते हैं ॥ २२ १/२ ॥
स्त्र्युवाच
नाहं बलाका विप्रर्षे त्यज क्रोधं तपोधन ॥ २३ ॥
अनया क्रुद्धया दृष्ट्या क्रुद्धः किं मां करिष्यसि ।
नावजानाम्यहं विप्रान् देवैस्तुल्यान् मनस्विनः ॥ २४ ॥
**स्त्री बोली—**तपोधन! क्रोध न करो। ब्रह्मर्षे! मैं बगुली नहीं हूँ जो तुम्हारी इस क्रोधभरी दृष्टिसे जल जाऊँगी। तुम इस तरह कुपित होकर मेरा क्या करोगे? मैं ब्राह्मणोंका अपमान नहीं करती। मनस्वी ब्राह्मण तो देवताके समान होते हैं ॥ २३-२४ ॥
अपराधमिमं विप्र क्षन्तुमर्हसि मेऽनघ ।
जानामि तेजो विप्राणां महाभाग्यं च धीमताम् ॥ २५ ॥
निष्पाप ब्राह्मण! तुम मेरे इस अपराधको क्षमा करो। मैं बुद्धिमान् ब्राह्मणोंके तेज और महत्त्वको जानती हूँ ॥
अपेयः सागरः क्रोधात् कृतो हि लवणोदकः ।
तथैव दीप्ततपसां मुनीनां भावितात्मनाम् ॥ २६ ॥
येषां क्रोधाग्निरद्यापि दण्डके नोपशाम्यति ।
ब्राह्मणोंके ही क्रोधका फल है कि समुद्रका पानी खारा एवं पीनेके अयोग्य बना दिया गया। इसी प्रकार जिनकी तपस्या बहुत बढ़ी-चढ़ी थी और जिनका अन्तःकरण परम पवित्र हो चुका था ऐसे मुनियोंने भी जो क्रोधकी आग प्रज्वलित की थी, वह आज भी दण्डकारण्यमें बुझ नहीं पा रही है ।। २६ १/२ ।।
ब्राह्मणानां परिभवाद् वातापिः सुदुरात्मवान् ।। २७ ।।
अगस्त्यमृषिमासाद्य जीर्णः क्रूरो महासुरः ।
ब्राह्मणोंका तिरस्कार करनेसे ही क्रूर स्वभाववाला महान् असुर अत्यन्त दुरात्मा वातापि अगस्त्य मुनिके पेटमें जाकर पच गया ।। २७ १/२ ।।
बहुप्रभावाः श्रूयन्ते ब्राह्मणानां महात्मनाम् ।। २८ ।।
क्रोधः सुविपुलो ब्रह्मन् प्रसादश्च महात्मनाम् ।
अस्मिंस्त्वतिक्रमे ब्रह्मन् क्षन्तुमर्हसि मेऽनघ ।। २९ ।।
ब्रह्मन्! महात्मा ब्राह्मणोंके प्रभावको बतानेवाले बहुत-से चरित्र सुने जाते हैं। उन महात्माओंका क्रोध और कृपा दोनों ही महान् होते हैं। निष्पाप ब्रह्मन्! मेरेद्वारा जो तुम्हारा अपराध बन गया है, उसे क्षमा करो ।। २८-२९ ।।
पतिशुश्रूषया धर्मो यः स मे रोचते द्विज ।
दैवतेष्वपि सर्वेषु भर्ता मे दैवतं परम् ।। ३० ।।
विप्रवर! मुझे तो पतिकी सेवासे जो धर्म प्राप्त होता है, वही अधिक पसंद है। सम्पूर्ण देवताओंमें भी पति ही मेरे सबसे बड़े देवता हैं ।। ३० ।।
अविशेषेण तस्याहं कुर्यां धर्मं द्विजोत्तम ।
शुश्रूषायाः फलं पश्य पत्युर्ब्राह्मण यादृशम् ।। ३१ ।।
द्विजश्रेष्ठ! मैं साधारणरूपसे ही पतिसेवारूप धर्मका पालन करती हूँ। ब्राह्मणदेवता! इस पतिसेवाका जैसा फल है, उसे प्रत्यक्ष देख लो ।। ३१ ।।
बलाका हि त्वया दग्धा रोषात् तद् विदितं मया ।
क्रोधः शत्रुः शरीरस्थो मनुष्याणां द्विजोत्तम ।। ३२ ।।
तुमने क्रोध करके जो एक बगुलीको जला दिया था वह बात मुझे मालूम हो गयी। द्विजश्रेष्ठ! मनुष्योंका एक बहुत बड़ा शत्रु है, वह उनके शरीरमें ही रहता है। उसका नाम है 'क्रोध' ।। ३२ ।।
यः क्रोधमोहौ त्यजति तं देवा ब्राह्मणं विदुः ।
यो वदेदिह सत्यानि गुरुं संतोषयेत च ।। ३३ ।।
हिंसितश्च न हिंसेत तं देवा ब्राह्मणं विदुः ।
जो क्रोध और मोहको त्याग देता है, उसीको देवतागण ब्राह्मण मानते हैं। जो यहाँ सत्य बोले, गुरुको संतुष्ट रखे, किसीके द्वारा मार खाकर भी बदलेमें उसे न मारे, उसको देवतालोग ब्राह्मण मानते हैं ।। ३३ १/२ ।।
जितेन्द्रियो धर्मपरः स्वाध्यायनिरतः शुचिः ॥ ३४ ॥
कामक्रोधौ वशौ यस्य तं देवा ब्राह्मणं विदुः ।
जो जितेन्द्रिय, धर्मपरायण, स्वाध्यातत्पर और पवित्र है तथा काम और क्रोध जिसके वशमें हैं, उसे देवतालोग ब्राह्मण मानते हैं ॥ ३४ १/२ ॥
यस्य चात्मसमो लोको धर्मज्ञस्य मनस्विनः ॥ ३५ ॥
सर्वधर्मेषु च रतस्तं देवा ब्राह्मणं विदुः ।
जिस धर्मज्ञ एवं मनस्वी पुरुषका सम्पूर्ण जगत्के प्रति आत्मभाव है तथा सभी धर्मोंपर जिसका समान अनुराग है, उसे देवतालोग ब्राह्मण मानते हैं ॥ ३५ १/२ ॥
योऽध्यापयेदधीयीत यजेद् वा याजयीत वा ॥ ३६ ॥
दद्याद् वापि यथाशक्ति तं देवा ब्राह्मणं विदुः ।
जो पढ़े और पढ़ाये, यज्ञ करे और कराये तथा यथाशक्ति दान दे, उसे देवतालोग ब्राह्मण कहते हैं ॥
ब्रह्मचारी वदान्यो योऽधीयीत द्विजपुङ्गवः ॥ ३७ ॥
स्वाध्यायवानमत्तो वै तं देवा ब्राह्मणं विदुः ।
जो द्विजश्रेष्ठ ब्रह्मचर्यका पालन करे, उदार बने, वेदोंका अध्ययन करे और सतत सावधान रहकर स्वाध्यायमें ही लगा रहे, उसे देवतालोग ब्राह्मण मानते हैं ॥ ३७ १/२ ॥
यद् ब्राह्मणानां कुशलं तदेषां परिकीर्तयेत् ॥ ३८ ॥
सत्यं तथा व्याहरतां नानृते रमते मनः ।
ब्राह्मणके लिये जो हितकर कर्म हो, उसीका उनके सामने वर्णन करना चाहिये। सत्य बोलनेवाले लोगोंका मन कभी असत्यमें नहीं लगता ॥ ३८ १/२ ॥
धर्मं तु ब्राह्मणस्याहुः स्वाध्यायं दममार्जवम् ॥ ३९ ॥
इन्द्रियाणां निग्रहं च शाश्वतं द्विजसत्तम ।
द्विजश्रेष्ठ! स्वाध्याय, मनोनिग्रह, सरलता और इन्द्रियनिग्रह—ये ब्राह्मणके लिये सनातनधर्म कहे गये हैं ॥ ३९ १/२ ॥
सत्यार्जवे धर्ममाहुः परं धर्मविदो जनाः ॥ ४० ॥
दुर्ज्ञेयः शाश्वतो धर्मः स च सत्ये प्रतिष्ठितः ।
श्रुतिप्रमाणो धर्मः स्यादिति वृद्धानुशासनम् ॥ ४१ ॥
धर्मज्ञ पुरुष सत्य और सरलताको सर्वोत्तम धर्म बताते हैं। सनातनधर्मके स्वरूपको जानना तो अत्यन्त कठिन है, परंतु वह सत्यमें प्रतिष्ठित है। जो वेदोंके द्वारा प्रमाणित हो, वही धर्म है—यह वृद्ध पुरुषोंका उपदेश है ॥ ४०-४१ ॥
बहुधा दृश्यते धर्मः सूक्ष्म एव द्विजोत्तम ।
भवानपि च धर्मज्ञः स्वाध्यायनिरतः शुचिः ॥ ४२ ॥
द्विजश्रेष्ठ! बहुधा धर्मका स्वरूप सूक्ष्म ही देखा जाता है। तुम भी धर्मज्ञ, स्वाध्यायपरायण और पवित्र हो ॥ ४२ ॥ न तु तत्त्वेन भगवन् धर्मं वेत्सीति मे मतिः । यदि विप्र न जानीषे धर्मं परमकं द्विज ॥ ४३ ॥ धर्मव्याधं ततः पृच्छ गत्वा तु मिथिलां पुरीम् । भगवन्! तो भी मेरा विचार यह है कि तुम्हें धर्मका यथार्थ ज्ञान नहीं है। विप्रवर! यदि तुम परम धर्म क्या है, यह नहीं जानते तो मिथिलापुरीमें धर्मव्याधके पास जाकर पूछो ॥ ४३ ½ ॥ मातापितृभ्यां शुश्रूषुः सत्यवादी जितेन्द्रियः ॥ ४४ ॥ मिथिलायां वसेद् व्याधः स ते धर्मान् प्रवक्ष्यति । तत्र गच्छस्व भद्रं ते यथाकामं द्विजोत्तम ॥ ४५ ॥ मिथिलामें एक व्याध रहता है, जो माता-पिताका सेवक, सत्यवादी और जितेन्द्रिय है, वह तुम्हें धर्मका उपदेश करेगा। द्विजश्रेष्ठ! तुम अपनी रुचिके अनुसार वहीं जाओ, तुम्हारा मंगल हो ॥ ४४-४५ ॥ अत्युक्तमपि मे सर्वं क्षन्तुमर्हस्यनिन्दित । स्त्रियो ह्यवध्याः सर्वेषां ये च धर्मविदो जनाः ॥ ४६ ॥ अनिन्दनीय ब्राह्मण! यदि मेरे मुखसे कोई अनुचित बातें निकल गयी हों तो उन सबके लिये मुझे क्षमा करें; क्योंकि जो धर्मज्ञ पुरुष हैं, उन सबकी दृष्टिमें स्त्रियाँ अदण्डनीय हैं ॥ ४६ ॥
ब्राह्मण उवाच प्रीतोऽस्मि तव भद्रं ते गतः क्रोधश्च शोभने । उपालम्भस्त्वयात्युक्तो मम निःश्रेयसं परम् । स्वस्ति तेऽस्तु गमिष्यामि साधयिष्यामि शोभने ॥ ४७ ॥ (धन्या त्वमसि कल्याणि यस्यास्ते वृत्तमीदृशम् ।) ब्राह्मण बोला—शुभे! तुम्हारा भला हो। मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ। मेरा सारा क्रोध दूर हो गया। तुमने जो उलाहना दिया है, वह अनुचित वचन नहीं, मेरे लिये परम कल्याणकारी है। शोभने! तुम्हारा कल्याण हो। अब मैं जाऊँगा और अपना कार्यसाधन करूँगा। कल्याणि! तुम धन्य हो, जिसका सदाचार इतनी उच्चकोटिका है ॥ ४७ ॥
मार्कण्डेय उवाच तया विसृष्टो निर्गम्य स्वमेव भवनं ययौ । विनिन्दन् स स्वमात्मानं कौशिको द्विजसत्तमः ॥ ४८ ॥
**मार्कण्डेयजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! उस साध्वी स्त्रीसे विदा लेकर वह द्विजश्रेष्ठ कौशिक अपने आत्माकी निन्दा करता हुआ अपने घरको लौट गया ॥ ४८ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि पतिव्रतोपाख्याने षडधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २०६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमें पतिव्रतोपाख्यानविषयक दो सौ छठाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २०६ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १/३ श्लोक मिलाकर कुल ४८ १/३ श्लोक हैं)
कौशिकका धर्मव्याधके पास जाना, धर्मव्याधके द्वारा पतिव्रतासे प्रेषित जान लेनेपर कौशिकको आश्चर्य होना, धर्मव्याधके द्वारा वर्णधर्मका वर्णन, जनकराज्यकी प
सप्ताधिकद्विशततमोऽध्यायः
कौशिकका धर्मव्याधके पास जाना, धर्मव्याधके द्वारा पतिव्रतासे प्रेषित जान लेनेपर कौशिकको आश्चर्य होना, धर्मव्याधके द्वारा वर्णधर्मका वर्णन, जनकराज्यकी प्रशंसा और शिष्टाचारका वर्णन
मार्कण्डेय उवाच
चिन्तयित्वा तदाश्चर्यं स्त्रिया प्रोक्तमशेषतः ।
विनिन्दन् स स्वमात्मानमागस्कृत इवाबभौ ॥ १ ॥
**मार्कण्डेयजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! उस पतिव्रता देवीकी कही हुई सारी बातोंपर विचार करके कौशिक ब्राह्मणको बड़ा आश्चर्य हुआ। वह अपने-आपको धिक्कारता हुआ अपराधी-सा जान पड़ने लगा ॥ १ ॥
चिन्तयानः स्वधर्मस्य सूक्ष्मां गतिमथाब्रवीत् ।
श्रद्दधानेन वै भाव्यं गच्छामि मिथिलामहम् ॥ २ ॥
फिर अपने धर्मकी सूक्ष्म गतिपर विचार करके वह मन-ही-मन बोला—'मुझे (उस सतीके कथनपर) श्रद्धा और विश्वास करना चाहिये; अतः मैं अवश्य मिथिला जाऊँगा ॥ २ ॥
कृतात्मा धर्मवित् तस्यां व्याधो निवसते किल ।
तं गच्छाम्यहमद्यैव धर्मं प्रष्टुं तपोधनम् ॥ ३ ॥
'कहते हैं, वहाँ एक पुण्यात्मा धर्मज्ञ व्याध निवास करता है। मैं उस तपोधन व्याधसे धर्मकी बात पूछनेके लिये आज ही उसके पास जाऊँगा' ॥ ३ ॥
इति संचित्य मनसा श्रद्दधानः स्त्रिया वचः ।
बलाकाप्रत्ययेनासौ धर्म्यैश्च वचनैः शुभैः ॥ ४ ॥
सम्प्रतस्थे स मिथिलां कौतूहलसमन्वितः ।
मन-ही-मन ऐसा निश्चय करके वह कौतूहलवश मिथिलापुरीकी ओर चल दिया। पतिव्रता स्त्री बगुली पक्षीवाली घटना स्वयं जान गयी थी और उसने धर्मानुकूल शुभ वचनोंद्वारा उपदेश दिया था, इन कारणोंसे उसकी बातोंपर कौशिक ब्राह्मणकी बड़ी श्रद्धा हो गयी थी ॥ ४ १/२ ॥
अतिक्रामन्नरण्यानि ग्रामांश्च नगराणि च ॥ ५ ॥
ततो जगाम मिथिलां जनकेन सुरक्षिताम् ।
धर्मसेतुसमाकीर्णां यज्ञोत्सववतीं शुभाम् ॥ ६ ॥