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महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

३१५-

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पञ्चदशाधिकत्रिशततमोऽध्यायः

अज्ञातवासके लिये अनुमति लेते समय शोकाकुल हुए युधिष्ठिरको महर्षि धौम्यका समझाना, भीमसेनका उत्साह देना तथा आश्रमसे दूर जाकर पाण्डवोंका परस्पर परामर्शके लिये बैठना

वैशम्पायन उवाच

धर्मेण तेऽभ्यनुज्ञाताः पाण्डवाः सत्यविक्रमाः ।
अज्ञातवासं वत्स्यन्तश्छन्ना वर्षं त्रयोदशम् ॥ १ ॥
उपोपविष्टा विद्वांसः सहिताः संशितव्रताः ।
ये तद्भक्ता वसन्ति स्म वनवासे तपस्विनः ॥ २ ॥
तानब्रुवन् महात्मानः स्थिताः प्राञ्जलयस्तदा ।
अभ्यनुज्ञापयिष्यन्तस्तं निवासं धृतव्रताः ॥ ३ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! धर्मराजकी अनुमति पाकर सत्यपराक्रमी पाण्डव तेरहवें वर्षमें छिपकर अज्ञातवास करनेकी इच्छासे एकत्र हो विचार-विमर्शके लिये आस-पास बैठे। वे सब-के-सब उत्तम व्रतका पालन करनेवाले और विद्वान् थे। वनवासके समय जो तपस्वी ब्राह्मण पाण्डवोंके प्रति स्नेह होनेके कारण उनके साथ रहते थे, उनसे अज्ञातवासके हेतु आज्ञा लेनेके लिये व्रतधारी महात्मा पाण्डव हाथ जोड़कर खड़े हो इस प्रकार बोले— ॥ १—३ ॥

विदितं भवतां सर्वं धार्तराष्ट्रैर्यथा वयम् ।
छद्मना हृतराज्याश्चान्याश्च बहुशः कृताः ॥ ४ ॥
‘मुनिवरो! धृतराष्ट्रके पुत्रोंने जिस प्रकार छल करके हमारा राज्य हर लिया और हमपर बारंबार अत्याचार किया, वह सब आपलोगोंको विदित ही है ॥ ४ ॥

उषिताश्च वने कृच्छ्रे वयं द्वादश वत्सरान् ।
अज्ञातवाससमयं शेषं वर्षं त्रयोदशम् ।। ५ ।।
‘हमलोग कष्टदायक वनमें बारह वर्षोंतक रह लिये। अब अन्तिम तेरहवाँ वर्ष हमारे अज्ञातवासका समय है ।। ५ ।।

तद् वसामो वयं छन्नास्तदनुज्ञातुमर्हथ ।
सुयोधनश्च दुष्टात्मा कर्णश्च सहसौबलः ।। ६ ।।
जानन्तो विषमं कुर्युुरस्मास्वत्यन्तवैरिणः ।
युक्तचाराश्च युक्ताश्च पौरस्य स्वजनस्य च ।। ७ ।।
‘अतः इस वर्ष हम छिपकर रहना चाहते हैं। इसके लिये आपलोग हमें आज्ञा दें। दुष्टात्मा दुर्योधन, कर्ण और शकुनि हमसे अत्यन्त वैर रखते हैं। वे स्वयं तो हमारा पता लगानेको उद्यत हैं ही, उन्होंने गुप्तचर भी लगा रखे हैं। अतः यदि उन्हें हमारे रहनेका पता चल जायगा, तो वे हमसे सम्बन्ध रखनेवाले पुरजनों तथा स्वजनोंके साथ भी विषम (बुरा) बर्ताव कर सकते हैं ।। ६-७ ।।

अपि नस्तद् भवेद् भूयो यद् वयं ब्राह्मणैः सह ।
समस्ताः स्वेषु राष्ट्रेषु स्वराज्यस्था भवेमहि ।। ८ ।।
‘क्या हमारे सामने फिर कभी ऐसा अवसर आयेगा, जब कि हम सब भाई ब्राह्मणोंके साथ अपने राष्ट्रमें रहेंगे—अपने राज्यपर प्रतिष्ठित होंगे’ ।। ८ ।।

वैशम्पायन उवाच

इत्युक्त्वा दुःखशोकार्तः शुचिर्धर्मसुतस्तदा । सम्मूच्छितोऽभवद् राजा साश्रुकण्ठो युधिष्ठिरः ॥ ९ ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! ऐसा कहकर पवित्र अन्तःकरणवाले धर्मनन्दन राजा युधिष्ठिर दुःख और शोकसे आतुर होकर मूर्च्छित हो गये। उनके नेत्रोंसे आँसुओंकी धारा बह रही थी और कण्ठ अवरुद्ध हो गया था ॥ ९ ॥

तमथाश्वासयन् सर्वे ब्राह्मणा भ्रातृभिः सह । अथ धौम्योऽब्रवीद् वाक्यं महार्थं नृपतिं तदा ॥ १० ॥ उस समय उनके भाइयोंसहित समस्त ब्राह्मणोंने उन्हें आश्वासन दिया। तत्पश्चात् महर्षि धौम्यने राजा युधिष्ठिरसे यह गम्भीर अर्थयुक्त वचन कहा— ॥ १० ॥

राजन् विद्वान् भवान् दान्तः सत्यसंधो जितेन्द्रियः । नैवंविधाः प्रमुह्यन्ते नराः कस्याञ्चिदापदि ॥ ११ ॥ ‘राजन्! आप विद्वान्, मनको वशमें रखनेवाले, सत्यप्रतिज्ञ और जितेन्द्रिय हैं। आप-जैसे मनुष्य किसी भी आपत्तिमें मोहित नहीं होते अर्थात् अपना धैर्य और विवेक नहीं खोते हैं ॥ ११ ॥

देवैरप्यापदः प्राप्ताश्छन्नैश्च बहुशस्तथा । तत्र तत्र सपत्नानां निग्रहार्थं महात्मभिः ॥ १२ ॥ ‘महामना देवताओंको भी जहाँ-तहाँ शत्रुओंके निग्रहके लिये अनेक बार छिपकर रहना और विपत्तियोंको भोगना पड़ा है ॥ १२ ॥

इन्द्रेण निषधान् प्राप्य गिरिप्रस्थाश्रमे तदा । छन्नेनोष्या कृतं कर्म द्विषतां च विनिग्रहे ॥ १३ ॥ ‘देवराज इन्द्र शत्रुओंका दमन करनेके लिये गुप्तरूपसे निषधदेशमें गये और गिरिप्रस्थाश्रममें छिपे रहकर उन्होंने अपना कार्य सिद्ध किया ॥ ५३ ॥

विष्णुनाश्वशिरः प्राप्य तथादित्यां निवत्स्यता । गर्भे वधार्थं दैत्यानामज्ञातेनोषितं चिरम् ॥ १४ ॥ ‘भगवान् विष्णु भी दैत्योंका वध करनेके लिये हयग्रीवस्वरूप धारण करके अज्ञातभावसे अदितिके गर्भमें दीर्घकालतक रहे हैं ॥ १४ ॥

प्राप्य वामनरूपेण प्रच्छन्नं ब्रह्मरूपिणा । बलेर्यथा हृतं राज्यं विक्रमैस्तच्च ते श्रुतम् ॥ १५ ॥ ‘उन्होंने ही ब्राह्मणवेषमें वामनरूप धारण करके अपने तीन पगोंद्वारा जिस प्रकार छिपे तौरपर राजा बलिका राज्य हर लिया था, वह सब तो तुमने सुना ही होगा ॥

हुताशनेन यच्चापः प्रविश्यच्छन्नमासता । विबुधानां कृतं कर्म तच्च सर्वं श्रुतं त्वया ॥ १६ ॥ 'अग्निने जलमें प्रवेश करके वहीं छिपे रहकर देवताओंका कार्य जिस प्रकार सिद्ध किया, वह सब कुछ भी तुम सुन चुके हो ॥ १६ ॥ प्रच्छन्नं चापि धर्मज्ञ हरिणारिविनिग्रहे । वज्रं प्रविश्य शक्रस्य यत् कृतं तच्च ते श्रुतम् ॥ १७ ॥ 'धर्मज्ञ! भगवान् श्रीहरिने शत्रुओंके विनाशके लिये छिपे तौरपर इन्द्रके वज्रमें प्रवेश करके जो कार्य किया, वह भी तुम्हारे कानोंमें पड़ा होगा ॥ १७ ॥ और्वेण वसता छन्नमूरौ ब्रह्मर्षिणा तदा । यत् कृतं तात देवेषु कर्म तत्तेऽनघ श्रुतम् ॥ १८ ॥ 'तात! निष्पाप नरेश! ब्रह्मर्षि और्वने (माताके) ऊरुमें गुप्तरूपसे निवास करते हुए जो देवकार्य सिद्ध किया था, वह भी तुम्हारे सुननेमें आया ही होगा ॥ १८ ॥ एवं विवस्वता तात च्छन्नेनोत्तमतेजसा । निर्दग्धाः शात्रवाः सर्वे वसता भुवि सर्वशः ॥ १९ ॥ 'तात! इसी प्रकार महातेजस्वी भगवान् सूर्यने भी पृथ्वीपर गुप्तरूपसे निवास करके समस्त शत्रुओंको दग्ध किया है ॥ १९ ॥ विष्णुना वसता चापि गृहे दशरथस्य वै । दशग्रीवो हतश्छन्नं संयुगे भीमकर्मणा ॥ २० ॥ 'भयंकर पराक्रमी भगवान् विष्णुने भी श्रीरामरूपसे दशरथके घरमें छिपे रहकर युद्धमें दशमुख रावणका वध किया था ॥ २० ॥ एवमेव महात्मानः प्रच्छन्नास्तत्र तत्र ह । अजयञ्छात्रवान् युद्धे तथा त्वमपि जेष्यसि ॥ २१ ॥ 'इसी प्रकार कितने ही महामना वीर पुरुषोंने यत्र-तत्र छिपे रहकर युद्धमें शत्रुओंपर विजय पायी है। इसी प्रकार तुम भी विजयी होओगे' ॥ २१ ॥ तथा धौम्येन धर्मज्ञो वाक्यैः सम्परितोषितः । शास्त्रबुद्ध्या स्वबुद्ध्या च न चचाल युधिष्ठिरः ॥ २२ ॥ महर्षि धौम्यने जब इस प्रकार युक्तियुक्त वचनोंद्वारा धर्मज्ञ युधिष्ठिरको संतोष प्रदान किया, तब वे शास्त्रज्ञान और अपने बुद्धिबलके कारण (धर्मसे) विचलित नहीं हुए ॥ २२ ॥ अथाब्रवीन्महाबाहुर्भीमसेनो महाबलः । राजानं बलिनां श्रेष्ठो गिरा सम्परिहर्षयन् ॥ २३ ॥ तदनन्तर बलवानोंमें श्रेष्ठ महाबली महाबाहु भीमसेनने अपनी वाणीसे राजा युधिष्ठिरका हर्ष और उत्साह बढ़ाते हुए कहा- ॥ २३ ॥ अवेक्ष्या महाराज तव गाण्डीवधन्वना ।

धर्मानुगतया बुद्ध्या न किञ्चित् साहसं कृतम् ।। २४ ।।

'महाराज! गाण्डीव धनुष धारण करनेवाले अर्जुनने आपके आदेशकी प्रतीक्षा तथा

अपनी धर्मानुगामिनी बुद्धिके कारण ही अबतक कोई साहसका कार्य नहीं किया

है ।। २४ ।।

सहदेवो मया नित्यं नकुलश्च निवारितौ ।

शक्तौ विध्वंसने तेषां शत्रूणां भीमविक्रमौ ।। २५ ।।

'भयंकर पराक्रमी नकुल और सहदेव उन सब शत्रुओंका विध्वंस करनेमें समर्थ हैं। इन

दोनोंको मैं ही सदा रोकता आया हूँ ।। २५ ।।

न वयं तत् प्रहास्यामो यस्मिन् योक्ष्यति नो भवान् ।

भवान् विधत्तां तत् सर्वं क्षिप्रं जेष्यामहे रिपून् ।। २६ ।।

'आप हमें जिस कार्यमें लगा देंगे, उसे हमलोग पूरा किये बिना नहीं छोड़ेंगे। अतः आप

युद्धकी सारी व्यवस्था कीजिये। हम शत्रुओंपर शीघ्र ही विजय पायेंगे' ।। २६ ।।

इत्युक्ते भीमसेनेन ब्राह्मणाः परमाशिषा ।

उक्त्वा चापृच्छ्य भरतान्यथास्वान्स्वान्ययुर्गृहान् ।। २७ ।।

भीमसेनके ऐसा कहनेपर सब ब्राह्मण पाण्डवोंको उत्तम आशीर्वाद देकर और उन

भरतवंशियोंसे अनुमति लेकर अपने-अपने घरोंको चले गये ।। २७ ।।

सर्वे वेदविदो मुख्या यतयो मुनयस्तथा ।

आसेदुस्ते यथान्यायं पुनर्दर्शनकाङ्क्षया ।। २८ ।।

वेदोंके ज्ञाता समस्त प्रधान-प्रधान संन्यासी तथा मुनिलोग पाण्डवोंसे फिर मिलनेकी

इच्छा रखकर न्यायानुसार अपने योग्य स्थानोंमें रहने लगे ।। २८ ।।

सह धौम्येन विद्वांसस्तथा पञ्च च पाण्डवाः ।

उत्थाय प्रययुर्वीराः कृष्णामादाय धन्विनः ।। २९ ।।

धौम्यसहित विद्वान् एवं वीर पाँचों पाण्डव द्रौपदीको साथ लिये धनुष धारण किये

वहाँसे उठकर चल दिये ।। २९ ।।

क्रोशमात्रमुपागम्य तस्माद् देशान्निमित्ततः ।

श्वोभूते मनुजव्याघ्राश्छन्नवासार्थमुद्यताः ।। ३० ।।

पृथक्शास्त्रविदः सर्वे सर्वे मन्त्रविशारदाः ।

संधिविग्रहकालज्ञा मन्त्राय समुपाविशन् ।। ३१ ।।

किसी कारणवश उस स्थानसे एक कोस दूर जाकर वे नरश्रेष्ठ ठहर गये और आगामी

दूसरे दिनसे अज्ञातवास आरम्भ करनेके लिये उद्यत हो परस्पर सलाह करनेके निमित्त

आस-पास बैठ गये। वे सभी पृथक्-पृथक् शास्त्रोंके ज्ञाता, मन्त्रणा करनेमें कुशल तथा

संधि-विग्रह आदिके अवसरको जाननेवाले थे ।। ३०-३१ ।।

इति श्रीमहाभारते शतसाहस्र्यां संहितायां वैयासिक्यां वनपर्वणि आरणेयपर्वणि अज्ञातवासमन्त्रणे पञ्चदशाधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३१५ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत—व्यासनिर्मित शतसाहस्री संहिताके वनपर्वके अन्तर्गत आरणेयपर्वमें अज्ञातवासके लिये मन्त्रणाविषयक तीन सौ पंद्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३१५ ॥


वनपर्वकी श्लोक-संख्या

अनुष्टुप् छन्द(अन्य बड़े छन्द)बड़े छन्दोंका ३२ अक्षरोंके अनुष्टुप् मानकर गिननेपरगद्यकुल योग
उत्तर भारतीय पाठसे लिये गये श्लोक—१०९३७(७८५)१०८० ।=१७१ ॥१२१८८ ॥।=
दक्षिण भारतीय पाठसे लिये गये श्लोक—८२(४)५ ॥८७ ॥

वनपर्वकी सम्पूर्ण श्लोक-संख्या १२२७६ ।=

वनपर्व-श्रवण-महिमा

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वनपर्व-श्रवण-महिमा

इदमारण्यकं श्रुत्वा महापापैः प्रमुच्यते ।
अधनो धनमाप्नोति पुत्रपौत्रसमन्वितः ॥ १ ॥
इस वनपर्वको सुनकर मनुष्य बड़े-बड़े पापोंसे मुक्त हो जाता है, निर्धन धन पाता है और पुत्र-पौत्रोंसे सम्पन्न होता है ॥ १ ॥

यं यं प्रार्थयते कामं तं तं प्राप्नोत्यसंशयम् ।
नारी वा पुरुषो वापि शुचिः प्रयतमानसः ॥ २ ॥
आरण्यके श्रुतेऽधीते ब्राह्मणान् पायसादिभिः ।
भोजयेद् वस्त्रगोस्वर्णदानै रत्नैः प्रपूजितान् ॥ ३ ॥
वह जिस-जिस मनोवाञ्छित वस्तुके लिये प्रार्थना करता है, उसे निश्चय ही पा लेता है। स्त्री हो या पुरुष; शुद्ध एवं एकाग्रचित्त होकर इस वनपर्वका श्रवण अथवा पाठ करनेपर वस्त्र, गौ, सुवर्ण तथा रत्नोंके दानसे ब्राह्मणोंका सम्मान करके उन्हें खीर आदिका भोजन करावे ॥ २-३ ॥

ब्राह्मणेषु च तुष्टेषु संतुष्टाः पाण्डुनन्दनाः ।
ब्रह्मा विष्णुस्तथा रुद्रः शक्रो देवगणास्तथा ॥ ४ ॥
भूतानि मुनयो देव्यस्तथा पितृगणाश्च ये ।
वाचकं पूजयेच्छक्त्या वस्त्रान्न्रैः स्वर्णभूषणैः ॥ ५ ॥
ब्राह्मणोंके संतुष्ट होनेपर पाण्डव, ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, इन्द्र, देवगण, भूतगण, मुनिगण, देवियाँ तथा पितृगण—ये सभी संतुष्ट होते हैं। अपनी शक्तिके अनुसार अन्न-वस्त्र और आभूषण देकर वाचककी पूजा करनी चाहिये ॥ ४-५ ॥

विशेषतस्तु कपिला देया तु जयपाठके ।
कांस्यदोहा रौप्यखुरा स्वर्णशृङ्गी सभूषणा ।
पाण्डूनां परितोषार्थं दद्यादन्नं द्विजातये ॥ ६ ॥
महाभारतके वाचकको विशेषतः एक कपिला गौ देनी चाहिये। उसके साथ काँसेका एक दुग्धपात्र होना चाहिये। गायके खुरोंमें चाँदी और सींगोंमें सोना मढ़ा दे। उसे अन्य आभूषणोंसे भी विभूषित करे। पाण्डवोंके संतोषके लिये ब्राह्मणोंको अन्नदान करे ॥ ६ ॥

आरण्यकाख्यमाख्यानं शृणुयाद् यो नरोत्तमः ।
स सर्वकाममाप्नोति पुनः स्वर्गतिमाप्नुयात् ॥ ७ ॥
जो नरश्रेष्ठ इस वनपर्वकी कथाको सुनता है, वह सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लेता है एवं शरीरका अन्त होनेपर स्वर्गलोकमें जाता है ॥ ७ ॥

।। ॐ श्रीपरमात्मने नमः ।।

महाभारत-सार

मातापितृसहस्राणि पुत्रदारशतानि च ।
संसारेष्वनुभूतानि यान्ति यास्यन्ति चापरे ।।
‘मनुष्य इस जगत्‌में हजारों माता-पिताओं तथा सैकड़ों स्त्री-पुत्रोंके संयोग-वियोगका अनुभव कर चुके हैं, करते हैं और करते रहेंगे।’

हर्षस्थानसहस्राणि भयस्थानशतानि च ।
दिवसे दिवसे मूढमाविशन्ति न पण्डितम् ।।
‘अज्ञानी पुरुषको प्रतिदिन हर्षके हजारों और भयके सैकड़ों अवसर प्राप्त होते रहते हैं; किन्तु विद्वान् पुरुषके मनपर उनका कोई प्रभाव नहीं पड़ता है।’

ऊर्ध्वबाहुर्विरौम्येष न च कश्चिच्छृणोति मे ।
धर्मादर्थश्च कामश्च स किमर्थं न सेव्यते ।।
‘मैं दोनों हाथ ऊपर उठाकर पुकार-पुकारकर कह रहा हूँ, पर मेरी बात कोई नहीं सुनता। धर्मसे मोक्ष तो सिद्ध होता ही है; अर्थ और काम भी सिद्ध होते हैं तो भी लोग उसका सेवन क्यों नहीं करते!’

न जातु कामान्न भयान्न लोभाद्
धर्मं त्यजेज्जीवितस्यापि हेतोः ।
नित्यो धर्मः सुखदुःखे त्वनित्ये
जीवो नित्यो हेतुरस्य त्वनित्यः ।।
‘कामनासे, भयसे, लोभसे अथवा प्राण बचानेके लिये भी धर्मका त्याग न करे। धर्म नित्य है और सुख-दुःख अनित्य। इसी प्रकार जीवात्मा नित्य है और उसके बन्धनका हेतु अनित्य।’

इमां भारतसावित्रीं प्रातरुत्थाय यः पठेत् ।
स भारतफलं प्राप्य परं ब्रह्माधिगच्छति ।।
‘यह महाभारतका सारभूत उपदेश ‘भारत-सावित्री’ के नामसे प्रसिद्ध है। जो प्रतिदिन सबेरे उठकर इसका पाठ करता है, वह सम्पूर्ण महाभारतके अध्ययनका फल पाकर परब्रह्म परमात्माको प्राप्त कर लेता है।’

महाभारत, स्वर्गारोहण० ५/६०–६४

विराटपर्व

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॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥

श्रीमहाभारतम्

विराटपर्व

पाण्डवप्रवेशपर्व

प्रथमोऽध्यायः

विराटनगरमें अज्ञातवास करनेके लिये पाण्डवोंकी गुप्त मन्त्रणा तथा युधिष्ठिरके द्वारा अपने भावी कार्यक्रमका दिग्दर्शन

नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् ।
देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत् ॥ १ ॥
अन्तर्यामी नारायण भगवान् श्रीकृष्ण, (उनके नित्यसखा) नरस्वरूप नरश्रेष्ठ अर्जुन, (उनकी लीला प्रकट करनेवाली) भगवती सरस्वती और (उनकी लीलाओंका संकलन करनेवाले) महर्षि वेदव्यासको नमस्कार करके जय (महाभारत)-का पाठ करना चाहिये ॥ १ ॥

जनमेजय उवाच

कथं विराटनगरे मम पूर्वपितामहाः ।
अज्ञातवासमुषिता दुर्योधनभयार्दिताः ॥ २ ॥
पतिव्रता महाभागा सततं ब्रह्मवादिनी ।
द्रौपदी च कथं ब्रह्मन्नज्ञाता दुःखितावसत् ॥ ३ ॥
जनमेजयने पूछा— ब्रह्मन्! मेरे प्रपितामह पाण्डवोंने दुर्योधनके भयसे कष्ट उठाते हुए विराटनगरमें अपने अज्ञातवासका समय किस प्रकार व्यतीत किया तथा दुःखमें पड़ी हुई सदा ब्रह्मस्वरूप श्रीकृष्णका नामकीर्तन करनेवाली परम सौभाग्यवती पतिव्रता द्रौपदी वहाँ अपनेको अज्ञात रखकर कैसे निवास कर सकी? ॥ २-३ ॥

वैशम्पायन उवाच

यथा विराटनगरे तव पूर्वपितामहाः । अज्ञातवासमुषितास्तच्छृणुष्व नराधिप ॥ ४ ॥ वैशम्पायनजीने कहा— राजन्! तुम्हारे प्रपितामहोंने विराटनगरमें जिस प्रकार अज्ञातवासके दिन पूरे किये थे, वह बताता हूँ; सुनो ॥ ४ ॥ तथा स तु वराँल्लब्ध्वा धर्मो धर्मभृतां वरः । गत्वाऽऽश्रमं ब्राह्मणेभ्य आचख्यौ सर्वमेव तत् ॥ ५ ॥ यक्षरूपधारी धर्मसे इस प्रकार वरदान पानेके अनन्तर धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ धर्मपुत्र युधिष्ठिरने आश्रमपर जाकर वह सब समाचार ब्राह्मणोंको बताया ॥ ५ ॥ कथयित्वा तु तत् सर्वं ब्राह्मणेभ्यो युधिष्ठिरः । अरणीसहितं तस्मै ब्राह्मणाय न्यवेदयत् ॥ ६ ॥ ततो युधिष्ठिरो राजा धर्मपुत्रो महामनाः । संनिवर्त्यानुजान् सर्वानिति होवाच भारत ॥ ७ ॥ भारत! ब्राह्मणोंसे सब कुछ बताकर जब युधिष्ठिरने अरणीसहित मन्थनकाष्ठ पूर्वोक्त ब्राह्मणदेवताको सौंप दिया, तब धर्मपुत्र महामनस्वी उन राजा युधिष्ठिरने अपने सब भाइयोंको एकत्र करके इस प्रकार कहा— ॥ द्वादशेमानि वर्षाणि राज्यविप्रोषिता वयम् । त्रयोदशोऽयं सम्प्राप्तः कृच्छ्रात् परमदुर्वसः ॥ ८ ॥ ‘आज बारह वर्ष बीत गये, हमलोग अपने राज्यसे बाहर आकर वनमें रहते हैं। अब यह तेरहवाँ वर्ष आरम्भ हुआ है। इसमें बड़े कष्टसे कठिनाइयोंका सामना करते हुए अत्यन्त गुप्तरूपसे रहना होगा ॥ ८ ॥ स साधु कौन्तेय इतो वासमर्जुन रोचय । संवत्सरमिमं यत्र वसेमाविदिताः परैः ॥ ९ ॥ ‘कुन्तीनन्दन अर्जुन! तुम अपनी रुचिके अनुसार कोई उत्तम निवासस्थान चुनो, जहाँ यहाँसे चलकर हम एक वर्षतक इस प्रकार रहें कि शत्रुओंको हमारा पता न चल सके’ ॥ ९ ॥

अर्जुन उवाच

तस्यैव वरदानेन धर्मस्य मनुजाधिप । अज्ञाता विचरिष्यामो नराणां नात्र संशयः ॥ १० ॥ तत्र वासाय राष्ट्राणि कीर्तयिष्यामि कानिचित् । रमणीयानि गुप्तानि तेषां किञ्चित् स्म रोचय ॥ ११ ॥ अर्जुन बोले— नरेश्वर! इसमें संदेह नहीं कि उन्हीं भगवान् धर्मके दिये हुए वरके प्रभावसे हमलोग इस पृथ्वीपर विचरते रहेंगे और हमें दूसरे मनुष्य पहचान न सकेंगे तथापि

मैं आपसे निवास करनेयोग्य कुछ रमणीय एवं गुप्त राष्ट्रोंके नाम बतलाऊँगा, उनमेंसे किसीको आप स्वयं ही अपनी रुचिके अनुसार चुन लीजिये ।। १०-११ ।। सन्ति रम्या जनपदा बह्वन्नाः परितः कुरून् । पाञ्चालाश्चेदिमत्स्याश्च शूरसेनाः पटच्चराः ।। १२ ।। दशार्णा नवराष्ट्राश्च मल्लाः शाल्वा युगन्धराः । कुन्तिराष्ट्रं च विपुलं सुराष्ट्रावन्तयस्तथा ।। १३ ।। कुरुदेशके चारों ओर बहुत-से सुरम्य जनपद हैं, जहाँ बहुत अन्न होता है। उनके नाम ये हैं—पांचाल, चेदि, मत्स्य, शूरसेन, पटच्चर, दशार्ण, नवराष्ट्र, मल्ल, शाल्व, युगन्धर, विशाल कुन्तिराष्ट्र, सौराष्ट्र तथा अवन्ती ।। १२-१३ ।। एतेषां कतमो राजन् निवासस्तव रोचते । यत्र वत्स्यामहे राजन् संवत्सरमिमं वयम् ।। १४ ।। राजन्! इनमेंसे कौन-सा राष्ट्र आपको निवास करनेके लिये पसंद है? जिसमें हम सब लोग इस वर्ष निवास करें ।। १४ ।।

युधिष्ठिर उवाच

श्रुतमेतन्महाबाहो यथा स भगवान् प्रभुः । अब्रवीत् सर्वभूतेशस्तत् तथा न तदन्यथा ।। १५ ।। **युधिष्ठिरने कहा—**महाबाहो! तुम्हारी यह बात मैंने ध्यानसे सुनी है। सम्पूर्ण भूतोंके अधीश्वर और प्रभावशाली भगवान् धर्मने हमारे लिये जैसा आदेश दिया है, वह सब वैसा ही होगा। उसके विपरीत कुछ नहीं होगा ।। १५ ।। अवश्यं त्वेव वासार्थं रमणीयं शिवं सुखम् । सम्मन्त्र्य सहितैः सर्वैर्वस्तव्यमकुतोभयैः ।। १६ ।। तथापि हम सब लोगोंको आपसमें सलाह करके अवश्य ही अपने रहनेके लिये कोई परम सुन्दर, कल्याणकारी तथा सुखद स्थान चुन लेना चाहिये, जहाँ हम निर्भय होकर रह सकें ।। १६ ।। मत्स्यो विराटो बलवानभिरक्तोऽथ पाण्डवान् । धर्मशीलो वदान्यश्च वृद्धश्च सततं प्रियः ।। १७ ।। [तुम्हारे बताये हुए देशोंमेंसे] मत्स्यदेशके राजा विराट बहुत बलवान् हैं और पाण्डवोंके प्रति उनका अनुराग भी है; साथ ही वे स्वभावतः धर्मात्मा, वृद्ध, उदार तथा हमें सदैव प्रिय हैं ।। १७ ।। विराटनगरे तात संवत्सरमिमं वयम् । कुर्वन्तस्तस्य कर्माणि विहरिष्याम भारत ।। १८ ।।

भाई अर्जुन! इसलिये इस वर्ष हमलोग राजा विराटके ही नगरमें रहें और उनका कार्यसाधन करते हुए उनके यहाँ विचरण करें॥ १८॥
यानि यानि च कर्माणि तस्य वक्ष्यामहे वयम् ।
आसाद्य मत्स्यं तत् कर्म प्रब्रूत कुरुनन्दनाः ॥ १९॥
किंतु कुरुनन्दनो! तुमलोग यह तो बताओ कि हम मत्स्यराजके पास पहुँचकर किन-किन कार्योंका भार सँभाल सकेंगे? ॥ १९॥

अर्जुन उवाच
नरदेव कथं तस्य राष्ट्रे कर्म करिष्यसि ।
विराटनगरे साधो रंस्यसे केन कर्मणा ॥ २०॥
**अर्जुनने पूछा—**नरदेव! आप उनके राष्ट्रमें किस प्रकार कार्य करेंगे? महात्मन्! विराटनगरमें कौन-सा कर्म करनेसे आपको प्रसन्नता होगी? ॥ २०॥
मृदुर्वदान्यो ह्रीमांश्च धार्मिकः सत्यविक्रमः ।
राजंस्त्वमापदाऽऽकृष्टः किं करिष्यसि पाण्डव ॥ २१॥
राजन्! आपका स्वभाव कोमल है। आप उदार, लज्जाशील, धर्मपरायण तथा सत्यपराक्रमी हैं, तथापि विपत्तिमें पड़ गये हैं। पाण्डुनन्दन! आप वहाँ क्या करेंगे? ॥ २१॥
न दुःखमुचितं किञ्चिद् राजन् वेद यथा जनः ।
स इमामापदं प्राप्य कथं घोरां तरिष्यसि ॥ २२॥
राजन्! साधारण मनुष्योंकी भाँति आपको किसी प्रकारके दुःखका अनुभव हो, यह उचित नहीं है; अतः इस घोर आपत्तिमें पड़कर आप कैसे इसके पार होंगे? ॥ २२॥

युधिष्ठिर उवाच
शृणुध्वं यत् करिष्यामि कर्म वै कुरुनन्दनाः ।
विराटमनुसम्प्राप्य राजानं पुरुषर्षभाः ॥ २३॥
**युधिष्ठिरने कहा—**नरश्रेष्ठ कुरुनन्दनो! मैं राजा विराटके यहाँ चलकर जो कार्य करूँगा, वह बताता हूँ; सुनो ॥ २३॥
सभास्तारो भविष्यामि तस्य राज्ञो महात्मनः ।
कङ्को नाम द्विजो भूत्वा मताक्षः प्रियदेवनः ॥ २४॥
वैदूर्यान् काञ्चनान् दान्तान् फलैर्ज्योतीरसैः सह ।
कृष्णाँल्लोहितवर्णांश्च निर्वर्त्स्यामि मनोरमान् ॥ २५॥
मैं पासा खेलनेकी विद्या जानता हूँ और यह खेल मुझे प्रिय भी है, अतः मैं कंक* नामक ब्राह्मण बनकर महामना राजा विराटकी राजसभाका एक सदस्य हो जाऊँगा और वैदूर्यमणिके समान हरी, सुवर्णके समान पीली तथा हाथीदाँतकी बनी हुई काली और लाल

रंगकी मनोहर गोटियोंको चमकीले बिन्दुओंसे युक्त पासोंके अनुसार चलाता रहूँगा ॥ २४-२५ ॥ विराटराजं रमयन् सामात्यं सहबान्धवम् । न च मां वेत्स्यते कश्चित् तोषयिष्ये च तं नृपम् ॥ २६ ॥ मैं राजा विराटको उनके मन्त्रियों तथा बन्धु-बान्धवोंसहित पासोंके खेलसे प्रसन्न करता रहूँगा। इस रूपमें मुझे कोई पहचान न सकेगा और मैं उन मत्स्यनरेशको भलीभाँति संतुष्ट रखूँगा ॥ २६ ॥ आसं युधिष्ठिरस्याहं पुरा प्राणसमः सखा । इति वक्ष्यामि राजानं यदि मां सोऽनुयोक्ष्यते ॥ २७ ॥ यदि वे राजा मुझसे पूछेंगे कि आप कौन हैं, तो मैं उन्हें बताऊँगा कि मैं पहले महाराज युधिष्ठिरका प्राणोंके समान प्रिय सखा था ॥ २७ ॥ इत्येतद् वो मयाऽऽख्यातं विहरिष्याम्यहं यथा । इस प्रकार मैंने तुमलोगोंको बता दिया कि विराटनगरमें मैं किस प्रकार रहूँगा ॥ २७ ½ ॥

(वैशम्पायन उवाच

एवं निर्दिश्य चात्मानं भीमसेनमुवाच ह ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! इस प्रकार अज्ञातवासमें अपने द्वारा किये जानेवाले कार्यको बतलाकर युधिष्ठिर भीमसेनसे बोले।

युधिष्ठिर उवाच

भीमसेन कथं कर्म मात्स्यराष्ट्रे करिष्यसि ॥ हत्वा क्रोधवशांस्तत्र पर्वते गन्धमादने । यक्षान् क्रोधाभिताम्राक्षान् राक्षसांश्चापि पौरुषान् । प्रादाः पाञ्चालकन्यायै पद्मानि सुबहून्यपि ॥ **युधिष्ठिरने पूछा—**भीमसेन! तुम मत्स्यदेशमें किस प्रकार कोई कार्य कर सकोगे? तुमने गन्धमादन पर्वतपर क्रोधसे सदा लाल आँखें किये रहनेवाले क्रोधवश नामक यक्षों और महापराक्रमी राक्षसोंका वध करके पांचालराजकुमारी द्रौपदीको बहुत-से कमल लाकर दिये थे। बकं राक्षसराजानं भीषणं पुरुषादकम् । जघ्निवानसि कौन्तेय ब्राह्मणार्थमरिंदम ॥ क्षेमा चाभयसंवीता ह्येकचक्रा त्वया कृता ॥ शत्रुहन्ता भीम! ब्राह्मणपरिवारकी रक्षाके लिये तुमने भयानक आकृतिवाले नरभक्षी राक्षसराज बकको भी मार डाला था और इस प्रकार एकचक्रा नगरीको भयरहित एवं

कल्याणयुक्त बनाया था। हिडिम्बं च महावीर्यं किर्मीरं चैव राक्षसम् । त्वया हत्वा महाबाहो वनं निष्कण्टकं कृतम् ।। महाबाहो! तुमने महावीर हिडिम्ब और राक्षस किर्मीरको मारकर वनको निष्कण्टक बनाया था। आपदं चापि सम्प्राप्ता द्रौपदी चारुहासिनी । जटासुरवधं कृत्वा त्वया च परिमोक्षिता ।। मत्स्यराजान्तिके तात वीर्यपूर्णोऽत्यमर्षणः । ) वृकोदर विराटे त्वं रंस्यसे केन हेतुना ।। २८ ।। संकटमें पड़ी हुई मनोहर हास्यवाली द्रौपदीको भी तुमने जटासुरका वध करके छुड़ाया था। तात भीमसेन! तुम अत्यन्त बलवान् एवं अमर्षशाली हो। राजा विराटके यहाँ कौन-सा कार्य करके तुम प्रसन्नतापूर्वक रह सकोगे—यह बतलाओ ।। २८ ।।

इति श्रीमन्महाभारते विराटपर्वणि पाण्डवप्रवेशपर्वणि युधिष्ठिरादिमन्त्रणे प्रथमोऽध्यायः ।। १ ।।

इस प्रकार श्रीमन्महाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत पाण्डवप्रवेशपर्वमें युधिष्ठिर आदिकी परस्पर मन्त्रणासे सम्बन्ध रखनेवाला पहला अध्याय पूरा हुआ ।। १ ।। (दाक्षिणात्य अधिक पाठके ६ १/२ श्लोक मिलाकर कुल ३४ १/२ श्लोक हैं।)


* – विश्वकोषके अनुसार 'कंक' शब्द यमराजका वाचक है। यमराजका ही दूसरा नाम धर्म है और वे ही युधिष्ठिररूपमें अवतीर्ण हुए थे। 'आत्मा वै जायते पुत्रः' इस उक्तिके अनुसार भी धर्म एवं धर्मपुत्र युधिष्ठिरमें कोई अन्तर नहीं है। यह समझकर ही अपनी सत्यवादिताकी रक्षा करते हुए युधिष्ठिरने 'कंक' नामसे अपना परिचय दिया। इसके सिवा उन्होंने जो अपनेको युधिष्ठिरका प्राणोंके समान प्रिय सखा बताया, वह भी असत्य नहीं है। युधिष्ठिर नामक शरीरको ही यहाँ युधिष्ठिर समझना चाहिये। आत्माकी सत्तासे ही शरीरका संचालन होता है। अतः आत्मा उसके साथ रहनेके कारण उसका सखा है। आत्मा सबसे बढ़कर प्रिय है ही; अतः यहाँ युधिष्ठिरका आत्मा युधिष्ठिर-शरीरका प्रिय सखा कहा गया है।

अध्याय (पृष्ठ 2128)

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द्वितीयोऽध्यायः

भीमसेन और अर्जुनद्वारा विराटनगरमें किये जानेवाले अपने अनुकूल कार्योंका निर्देश

भीमसेन उवाच

पौरोगवो ब्रुवाणोऽहं बल्लवो नाम भारत।
उपस्थास्यामि राजानं विराटमिति मे मतिः॥ १॥

**भीमसेनने कहा—**भरतवंशशिरोमणे! मैं पौरोगव³ (पाकशालाका अध्यक्ष) बनकर और बल्लव³ नामसे अपना परिचय देकर राजा विराटके दरबारमें उपस्थित होऊँगा। मेरा यही विचार है॥ १॥

सूपानस्य करिष्यामि कुशलोऽस्मि महानसे।
कृतपूर्वाणि यान्यस्य व्यञ्जनानि सुशिक्षितैः॥ २॥
तान्यप्यभिभविष्यामि प्रीतिं संजनयन्नहम्।

मैं रसोई बनानेके काममें चतुर हूँ। अपने ऊपर राजाके मनमें अत्यन्त प्रेम उत्पन्न करनेके उद्देश्यसे उनके लिये सूप (दाल, कढ़ी एवं साग आदि) तैयार करूँगा और पाककलामें भलीभाँति शिक्षा पाये हुए चतुर रसोइयोंने राजाके लिये पहले जो-जो व्यंजन बनाये होंगे, उन्हें भी अपने बनाये हुए व्यंजनोंसे तुच्छ सिद्ध कर दूँगा॥ २½॥

आहरिष्यामि दारूणां निचयान् महतोऽपि च॥ ३॥
यत् प्रेक्ष्य विपुलं कर्म राजा संयोक्ष्यते स माम्।
अमानुषाणि कुर्वाणस्तानि कर्माणि भारत॥ ४॥

इतना ही नहीं, मैं रसोईके लिये लकड़ियोंके बड़े-से-बड़े गठ्ठोंको भी उठा लाऊँगा, जिस महान् कर्मको देखकर राजा विराट मुझे अवश्य रसोइयेके कामपर नियुक्त कर लेंगे। भारत! मैं वहाँ ऐसे-ऐसे अद्भुत कार्य करता रहूँगा, जो साधारण मनुष्योंकी शक्तिके बाहर है॥ ३-४॥

राज्ञस्तस्य परे प्रेष्या मंस्यन्ते मां यथा नृपम्।
भक्ष्यान्नरसपानानां भविष्यामि तथेश्वरः॥ ५॥

इससे राजा विराटके दूसरे सेवक राजाके ही समान मेरा सम्मान करेंगे और मैं भक्ष्य, भोज्य, रस तथा पेय पदार्थोंका इच्छानुसार उपयोग करनेमें समर्थ होऊँगा॥ ५॥

द्विपा वा बलिनो राजन् वृषभा वा महाबलाः।
विनिग्राह्या यदि मया निग्रहीष्यामि तानपि॥ ६॥

राजन्! बलवान् हाथी अथवा महाबली बैल भी यदि काबूमें करनेके लिये मुझे सौंपे जायँगे तो मैं उन्हें भी बाँधकर अपने वशमें कर लूँगा ॥ ६ ॥

ये च केचिन्नियोत्स्यन्ति समाजेषु नियोधकाः ।
तानहं हि नियोत्स्यामि रतिं तस्य विवर्धयन् ॥ ७ ॥
तथा जो कोई भी मल्लयुद्ध करनेवाले पहलवान जनसमाजमें दंगल करना चाहेंगे, राजाका प्रेम बढ़ानेके, लिये मैं उनसे भी भिड़ जाऊँगा ॥ ७ ॥

न त्वेतान् युद्ध्यमानान् वै हनिष्यामि कथञ्चन ।
तथैतान् पातयिष्यामि यथा यास्यन्ति न क्षयम् ॥ ८ ॥
परंतु कुश्ती करनेवाले इन पहलवानोंको मैं किसी प्रकार जानसे नहीं मारूँगा; अपितु इस प्रकार नीचे गिराऊँगा, जिससे उनकी मृत्यु न हो ॥ ८ ॥

आरालिको गोविकर्ता सूपकर्ता नियोधकः ।
आसं युधिष्ठिरस्याहमिति वक्ष्यामि पृच्छतः ॥ ९ ॥
महाराजके पूछनेपर मैं यह कहूँगा कि मैं राजा युधिष्ठिरके यहाँ आरालिक (मतवाले हाथियोंको भी काबूमें करनेवाला गजशिक्षक), गोविकर्ता (महाबली वृषभोँको भी पछाड़कर उन्हें नाथनेवाला), सूपकर्ता (दाल-साग आदि भाँति-भाँतिके व्यंजन बनानेवाला) तथा नियोधक (दंगली पहलवान) रहा हूँ ॥ ९ ॥

आत्मानमात्मना रक्षंश्चरिष्यामि विशाम्पते ।
इत्येतत् प्रतिजानामि विहरिष्याम्यहं यथा ॥ १० ॥
राजन्! अपने-आप अपनी रक्षा करते हुए मैं विराटके नगरमें विचरूँगा। मुझे विश्वास है कि इस प्रकार मैं वहाँ सुखपूर्वक रह सकूँगा ॥ १० ॥

युधिष्ठिर उवाच

यमग्निर्ब्राह्मणो भूत्वा समागच्छन्नृणां वरम् ।
दिधक्षुः खाण्डवं दावं दाशार्हसहितं पुरा ॥ ११ ॥
महाबलं महाबाहुमजितं कुरुनन्दनम् ।
सोऽयं किं कर्म कौन्तेयः करिष्यति धनंजयः ॥ १२ ॥
**युधिष्ठिर बोले—**जो मनुष्योंमें श्रेष्ठ महाबली और महाबाहु है, पहले भगवान् श्रीकृष्णके साथ बैठे हुए जिस अर्जुनके पास खाण्डववनको जलानेकी इच्छासे ब्राह्मणका रूप धारण करके साक्षात् अग्निदेव पधारे थे, जो कुरुकुलको आनन्द देनेवाला तथा किसीसे भी परास्त न होनेवाला है, वह कुन्तीनन्दन धनंजय विराटनगरमें कौन-सा कार्य करेगा? ॥ ११-१२ ॥

योऽयमासाद्य तं दावं तर्पयामास पावकम् ।
विजित्यैकरथेनेन्द्रं हत्वा पन्नगराक्षसान् ॥ १३ ॥

वासुकेः सर्पराजस्य स्वसारं हृतवांश्च यः । श्रेष्ठो यः प्रतियोधानां सोऽर्जुनः किं करिष्यति ॥ १४ ॥ जिसने खाण्डवदाहके समय वहाँ पहुँचकर एकमात्र रथका आश्रय ले इन्द्रको पराजित कर तथा नागों एवं राक्षसोंको मारकर अग्निदेवको तृप्त किया और अपने अप्रतिम सौन्दर्यसे नागराज वासुकिकी बहिन उलूपीका चित्त चुरा लिया एवं जो सम्मुख युद्ध करनेवाले वीरोंमें सबसे श्रेष्ठ है, वह अर्जुन वहाँ क्या काम करेगा? ॥ १३-१४ ॥ सूर्यः प्रतपतां श्रेष्ठो द्विपदां ब्राह्मणो वरः । आशीविषश्च सर्पाणामग्निस्तेजस्विनां वरः ॥ १५ ॥ आयुधानां वरं वज्रं ककुद्मी च गवां वरः । ह्रदानामुदधिः श्रेष्ठः पर्जन्यो वर्षतां वरः ॥ १६ ॥ धृतराष्ट्रश्च नागानां हस्तिष्वैरावणो वरः । पुत्रः प्रियाणामधिको भार्या च सुहृदां वरा ॥ १७ ॥ (गिरीणां प्रवरो मेरुर्देवानां मधुसूदनः । ग्रहाणां प्रवरश्चन्द्रः सरसां मानसं वरम् ॥) यथैतानि विशिष्ठानि जात्यां जात्यां वृकोदर । एवं युवा गुडाकेशः श्रेष्ठः सर्वधनुष्मताम् ॥ १८ ॥ जैसे तपनेवाले तेजस्वी पदार्थोंमें सूर्य श्रेष्ठ हैं, मनुष्योंमें ब्राह्मणका स्थान ऊँचा है, जैसे सर्पोंमें आशीविष जातिवाले सर्प महान् हैं, तेजस्वियोंमें अग्नि श्रेष्ठ हैं, अस्त्र-शस्त्रोंमें वज्रका स्थान ऊँचा है, गौओंमें ऊँचे कंधेवाला साँड़ बड़ा माना गया है, जलाशयोंमें समुद्र सबसे महान् है, वर्षा करनेवाले मेघोंमें पर्जन्य श्रेष्ठ हैं, नागोंमें धृतराष्ट्र तथा हाथियोंमें ऐरावत बड़ा है, जैसे प्रिय सम्बन्धियोंमें पुत्र सबसे अधिक प्रिय है और अकारण हित चाहनेवाले सुहृदोंमें धर्मपत्नी सबसे बढ़कर है, जैसे पर्वतोंमें मेरु श्रेष्ठ है, देवताओंमें मधुसूदन भगवान् विष्णु श्रेष्ठ हैं, ग्रहोंमें चन्द्रमा श्रेष्ठ हैं और सरोवरोंमें मानसरोवर श्रेष्ठ है। भीमसेन! अपनी-अपनी जातिमें जिस प्रकार ये पूर्वोक्त वस्तुएँ विशिष्ट मानी गयी हैं, वैसे ही सम्पूर्ण धनुर्धारियोंमें युवावस्थासे सम्पन्न यह गुडाकेश (निद्राविजयी) अर्जुन श्रेष्ठ है ॥ १५—१८ ॥ सोऽयमिन्द्रादनवरो वासुदेवान्महाद्युतिः । गाण्डीवधन्वा बीभत्सुः श्वेताश्वः किं करिष्यति ॥ १९ ॥ यह देवराज इन्द्र और भगवान् श्रीकृष्णसे किसी बातमें कम नहीं है। श्वेत घोड़ोंवाले रथपर चलनेवाला यह महातेजस्वी गाण्डीवधारी बीभत्सु (अर्जुन) वहाँ कौन-सा कार्य करेगा? ॥ १९ ॥ उषित्वा पञ्च वर्षाणि सहस्राक्षस्य वेश्मनि । अस्त्रयोगं समासाद्य स्ववीर्यान्मानुषाद्भुतम् । दिव्यान्यस्त्राणि चाप्तानि देवरूपेण भास्वता ॥ २० ॥

इसने पाँच वर्षोंतक देवराज इन्द्रके भवनमें रहकर ऐसे दिव्यास्त्र प्राप्त किये हैं, जिनका मनुष्योंमें होना एक अद्भुत-सी बात है। अपने देवोपम स्वरूपसे प्रकाशित होनेवाले अर्जुनने अनेक दिव्यास्त्र पाये हैं॥ २०॥

यं मन्ये द्वादशं रुद्रमादित्यानां त्रयोदशम् ।
वसूनां नवमं मन्ये ग्रहाणां दशमं तथा ॥ २१ ॥
जिस अर्जुनको मैं बारहवाँ रुद्र और तेरहवाँ आदित्य मानता हूँ, नवम वसु तथा दसवाँ ग्रह स्वीकार करता हूँ॥ २१॥

यस्य बाहू समौ दीर्घौ ज्याघातकठिनत्वचौ ।
दक्षिणे चैव सव्ये च गवामिव वहः कृतः ॥ २२ ॥
जिसकी दोनों भुजाएँ एक-सी विशाल हैं; प्रत्यंचाके आघातसे उनकी त्वचा कठोर हो गयी है। जैसे बैलोंके कंधोंपर जुआठेकी रगड़से चिह्न बन जाता है, उसी प्रकार जिसकी दाहिनी और बायीं भुजाओंपर प्रत्यंचाकी रगड़से चिह्न बन गये हैं॥ २२॥

हिमवानिव शैलानां समुद्रः सरितामिव ।
त्रिदशानां यथा शक्रो वसूनामिव हव्यवाट् ॥ २३ ॥
मृगाणामिव शार्दूलो गरुडः पततामिव ।
वरः संनह्यमानानां सोऽर्जुनः किं करिष्यति ॥ २४ ॥
जैसे पर्वतोंमें हिमालय, सरिताओंमें समुद्र, देवताओंमें इन्द्र, वसुओंमें हव्यवाहक अग्नि, मृगोंमें सिंह तथा पक्षियोंमें गरुड़ श्रेष्ठ हैं, उसी प्रकार कवचधारी वीरोंमें जिसका स्थान सबसे ऊँचा है, वह अर्जुन विराटनगरमें जाकर क्या काम करेगा?॥ २३-२४॥

अर्जुन उवाच
प्रतिज्ञां षण्ढकोऽस्मीति करिष्यामि महीपते ।
ज्याघातौ हि महान्तौ मे संवर्तुं नृप दुष्करौ ॥ २५ ॥
वलयैश्छादयिष्यामि बाहू किणकृताविमौ ।
**अर्जुनने कहा—**महाराज! मैं राजाकी सभामें यह दृढ़तापूर्वक कहूँगा कि मैं षण्ढक (नपुंसक) हूँ। राजन्! यद्यपि मेरी दायीं-बायीं भुजाओंमें धनुषकी डोरीकी रगड़से जो महान् चिह्न बन गये हैं, उन्हें छिपाना बहुत कठिन है तथापि कंगन आदि आभूषणोंसे मैं इन ज्याघातचिह्नित भुजाओंको ढक-लूँगा॥ २५½॥

कर्णयोः प्रतिमुच्याहं कुण्डले ज्वलनप्रभे ॥ २६ ॥
पिनद्धकम्बुः पाणिभ्यां तृतीयां प्रकृतिं गतः ।
वेणीकृतशिरा राजन् नाम्ना चैव बृहन्नला ॥ २७ ॥
मैं दोनों कानोंमें अग्निके समान कान्तिमान् कुण्डल पहनकर हाथोंमें शंखकी चूड़ियाँ धारण कर लूँगा। इस प्रकार तीसरी प्रकृति (नपुंसकभाव)-को अपनाकर सिरपर चोटी गूँथ

लूँगा और अपनेको बृहन्नला नामसे घोषित करूँगा<sup></sup> ॥ २६-२७ ॥
पठन्नाख्यायिकाश्चैव स्त्रीभावेन पुनः पुनः ।
रमयिष्ये महीपालमन्यांश्चान्तःपुरे जनान् ॥ २८ ॥
स्त्रीभावसे अपने स्वरूपको छिपाकर बारंबार पूर्ववर्ती राजाओंके चरित्रोंका गान करके महाराज विराट तथा अन्तःपुरकी अन्यान्य स्त्रियोंका मनोरंजन करूँगा ॥ २८ ॥
गीतं नृत्यं विचित्रं च वादित्रं विविधं तथा ।
शिक्षयिष्याम्यहं राजन् विराटस्य पुरस्त्रियः ॥ २९ ॥
राजन्! मैं विराटनगरकी स्त्रियोंको गीत गाने, विचित्र ढंगसे नृत्य करने तथा भाँति-भाँतिके बाजे बजानेकी शिक्षा दूँगा ॥ २९ ॥
प्रजानां समुदाचारं बहु कर्म कृतं वदन् ।
छादयिष्यामि कौन्तेय माययाऽऽत्मानमात्मना ॥ ३० ॥
कुन्तीनन्दन! प्रजाजनोंके उत्तम आचार-विचार और उनके किये हुए अनेक प्रकारके सत्कर्मोंका वर्णन करता हुआ मैं मायामय नपुंसकवेशसे बुद्धिद्वारा अपने यथार्थ स्वरूपको छिपाये रखूँगा ॥ ३० ॥
युधिष्ठिरस्य गेहे वै द्रौपद्याः परिचारिका ।
उषितास्मीति वक्ष्यामि पृष्टो राज्ञा च पाण्डव ॥ ३१ ॥
पाण्डुनन्दन! यदि राजा विराटने मेरा परिचय पूछा, तो मैं कह दूँगा कि मैं महाराज युधिष्ठिरके घरमें महारानी द्रौपदीकी परिचारिका<sup></sup> रह चुकी हूँ ॥ ३१ ॥
एतेन विधिना छन्नः कृतकेन यथानलः ।
विहरिष्यामि राजेन्द्र विराटभवने सुखम् ॥ ३२ ॥
राजेन्द्र! इस प्रकार कृत्रिम वेशभूषासे राखमें छिपी हुई अग्निके समान अपनेको छिपाकर मैं विराटके महलमें सुखपूर्वक निवास करूँगा ॥ ३२ ॥

इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि पाण्डवप्रवेशपर्वणि युधिष्ठिरादिमन्त्रणे
द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत पाण्डवप्रवेशपर्वमें युधिष्ठिर आदिकी मन्त्रणाविषयक दूसरा अध्याय पूरा हुआ ॥ २ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ३३ श्लोक हैं।)


१. पुरोगु कहते हैं वायुको, उसके पुत्र होनेसे भीमसेनका ‘पौरोगव’ नाम सत्य एवं सार्थक है।
३. बल्लवका अर्थ है सूपकर्ता अर्थात् रसोइया। रसोईके काममें निपुण होनेसे उनका यह नाम यथार्थ ही है।

अध्याय (पृष्ठ 2133)

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तृतीयोऽध्यायः

नकुल, सहदेव तथा द्रौपदीद्वारा अपने-अपने भावी कर्तव्योंका दिग्दर्शन

वैशम्पायन उवाच

इत्येवमुक्त्वा पुरुषप्रवीर-
स्तथार्जुनो धर्मभृतां वरिष्ठः ।
वाक्यं तथासौ विरराम भूयो
नृपोऽपरं भ्रातरमाबभाषे ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ तथा पुरुषोंमें महान् वीर अर्जुन इस प्रकार कहकर चुप हो गये। तब राजा युधिष्ठिर पुनः दूसरे भाईसे बोले ॥ १ ॥

युधिष्ठिर उवाच

किं त्वं नकुल कुर्वाणस्तत्र तात चरिष्यसि ।
कर्म तत् त्वं समाचक्ष्व राज्ये तस्य महीपतेः ।
सुकुमारश्च शूरश्च दर्शनीयः सुखोचितः ॥ २ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**नकुल! तुम राजा विराटके राज्यमें कौन-सा कार्य करते हुए निवास करोगे? वह कार्य बताओ। तात! तुम तो शूरवीर होनेके साथ ही अत्यन्त सुकुमार, परम दर्शनीय और सर्वथा सुख भोगनेके ही योग्य हो ॥ २ ॥

नकुल उवाच

अश्वबन्धो भविष्यामि विराटनृपतेरहम् ।
सर्वथा ज्ञानसम्पन्नः कुशलः परिरक्षणे ॥ ३ ॥
**नकुल बोले—**राजन्! मैं राजा विराटके यहाँ अश्वबन्ध (घोड़ोंको वशमें करनेवाला सवार) होकर रहूँगा। मैं अश्वविज्ञानसे सम्पन्न और घोड़ोंकी रक्षाके कार्यमें कुशल हूँ ॥ ३ ॥
ग्रन्थिको नाम नाम्नाहं कर्मैतत् सुप्रियं मम ।
कुशलोऽस्म्यश्वशिक्षायां तथैवाश्वचिकित्सने ।
प्रियाश्च सततं मेऽश्वाः कुरुराज यथा तव ॥ ४ ॥
मैं राजसभामें ग्रन्थिक नामसे अपना परिचय दूँगा। घोड़ोंकी देखभालका काम मुझे अत्यन्त प्रिय है। उन्हें भाँति-भाँतिकी चालें सिखाने और उनकी चिकित्सा करनेमें भी मैं निपुण हूँ। कुरुराज! आपकी ही भाँति मुझे भी घोड़े सदैव प्रिय रहे हैं* ॥ ४ ॥
ये मामामन्त्रयिष्यन्ति विराटनगरे जनाः ।