महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
महाबली भीमसेन उसे निर्बल एवं अचेत होते देख उसकी छातीपर चढ़ बैठे और बड़े वेगसे उसे रौंदने लगे ॥ ७१ ॥ क्रोधाविष्टो विनिःश्वस्य पुनश्चैनं वृकोदरः । जग्राह जयतां श्रेष्ठः केशेष्वेव तदा भृशम् ॥ ७२ ॥ विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ भीमसेनका क्रोधावेश अभी उतरा नहीं था। उन्होंने पुनः बारंबार उच्छ्वास लेकर कीचकके केश पकड़ लिये ॥ ७२ ॥ गृहीत्वा कीचकं भीमो विरराज महाबलः । शार्दूलः पिशिताकाङ्क्षी गृहीत्वेव महामृगम् ॥ ७३ ॥ जैसे कच्चे मांसकी अभिलाषा रखनेवाला सिंह महान् मृगको पकड़ ले, उसी प्रकार महाबली भीम कीचकको पकड़कर बड़ी शोभा पा रहे थे ॥ ७३ ॥ तत एनं परिश्रान्तमुपलभ्य वृकोदरः । योक्त्रयामास बाहुभ्यां पशुं रशनया यथा ॥ ७४ ॥ तदनन्तर उसे अत्यन्त थका जानकर भीमने अपनी भुजाओंमें इस प्रकार कस लिया, जैसे पशुको रस्सीसे बाँध दिया गया हो ॥ ७४ ॥ नदन्तं च महानादं भिन्नभेरीसमस्वनम् । भ्रामयामास सुचिरं विस्फुरन्तमचेतसम् ॥ ७५ ॥ अब वह फूटे नगारेके समान विकृत स्वरमें जोर-जोरसे सिंहनाद करने तथा बन्धनसे छूटनेके लिये छटपटाने लगा। उसकी चेतना लुप्त हो रही थी। उसी दशामें भीमसेनने बहुत देरतक उसे घुमाया ॥ ७५ ॥ प्रगृह्य तरसा दोर्भ्यां कण्ठं तस्य वृकोदरः । अपीडयत् कृष्णायास्तदा कोपोपशान्तये ॥ ७६ ॥ फिर द्रौपदीका क्रोध शान्त करनेके लिये उन्होंने दोनों हाथोंसे उसका गला पकड़कर बड़े वेगसे दबाया ॥ अथ तं भग्नसर्वाङ्गं व्याविद्धनयनाम्बरम् । आक्रम्य च कटीदेशे जानुना कीचकाधमम् । अपीडयत् बाहुभ्यां पशुमारममारयत् ॥ ७७ ॥ इस प्रकार जब उसके सब अंग भग्न हो गये, आँखकी पुतलियाँ बाहर निकल आयीं और वस्त्र फट गये, तब उन्होंने उस कीचकाधमकी कमरको अपने घुटनोंसे दबाकर दोनों भुजाओंद्वारा उसका गला घोंट दिया और उसे पशुकी तरह मारने लगे ॥ ७७ ॥ तं विषीदन्तमाज्ञाय कीचकं पाण्डुनन्दनः । भूतले भ्रामयामास वाक्यं चेदमुवाच ह ॥ ७८ ॥ मृत्युके समय कीचकको विषाद करते देख पाण्डुनन्दन भीमने उसे धरतीपर घसीटा और इस प्रकार कहा— ॥ ७८ ॥
अद्याहमनृणो भूत्वा भ्रातृभार्यापहारिणम्। शान्तिं लब्धास्मि परमां हत्वा सैरन्ध्रिकण्टकम्॥ ७९॥ ‘जो सैरन्ध्रीके लिये कण्टक था, जिसने मेरे भाईकी पत्नीका अपहरण करनेकी चेष्टा की थी, उस दुष्ट कीचकको मारकर आज मैं उऋण हो जाऊँगा और मुझे बड़ी शान्ति मिलेगी’॥ ७९॥ इत्येवमुक्त्वा पुरुषप्रवीर- स्तं कीचकं क्रोधसरागनेत्रः। आस्रस्तवस्त्राभरणं स्फुरन्त- मुद्भ्रान्तनेत्रं व्यसुमुत्ससर्ज॥ ८०॥ पुरुषोंमें उत्कृष्ट वीर भीमसेनके नेत्र क्रोधसे लाल हो रहे थे। उन्होंने उपर्युक्त बातें कहकर कीचकको नीचे डाल दिया। उस समय उसके गहने-कपड़े इधर-उधर बिखर गये थे। वह छटपटा रहा था। उसकी आँखें ऊपरको चढ़ गयी थीं और उसके प्राणपखेरू निकल रहे थे॥ ८०॥ निष्पिष्य पाणिना पाणिं संदष्टौष्ठपुटं बली। समाक्रम्य च संक्रुद्धो बलेन बलिनां वरः॥ ८१॥ बलवानोंमें श्रेष्ठ भीम अब भी क्रोधमें भरे थे। वे हाथसे हाथ मलते हुए दाँतोंसे ओठ दबाकर पुनः बलपूर्वक कीचकके ऊपर चढ़ गये॥ ८१॥ तस्य पादौ च पाणी च शिरो ग्रीवां च सर्वशः। काये प्रवेशयामास पशोरिव पिनाकधृक्॥ ८२॥ तदनन्तर जैसे महादेवजीने गयासुरके सब अंगोंको उसके शरीरके भीतर घुसेड़ दिया था, उसी प्रकार उन्होंने भी कीचकके हाथ, पैर, सिर और गर्दन आदि सब अंगोंको उसके धड़में ही घुसा दिया॥ ८२॥ तं सम्मथितसर्वाङ्गं मांसपिण्डोपमं कृतम्। कृष्णाया दर्शयामास भीमसेनो महाबलः॥ ८३॥ महाबली भीमने उसका सारा शरीर मथ डाला और उसे मांसका लोंदा-सा बना दिया। इसके बाद उन्होंने द्रौपदीको दिखाया॥ ८३॥ उवाच च महातेजा द्रौपदीं योषितां वराम्। पश्यैनमेहि पाञ्चालि कामुकोऽयं यथा कृतः॥ ८४॥ उस समय महातेजस्वी भीमने युवतियोंमें श्रेष्ठ द्रौपदीसे कहा—‘पांचालि! यहाँ आओ और इसे देखो। इस कामीकी शक्ल कैसी बना दी है!’॥ ८४॥ एवमुक्त्वा महाराज भीमो भीमपराक्रमः। पादेन पीडयामास तस्य कायं दुरात्मनः॥ ८५॥
महाराज! भयंकर पराक्रमी भीमने ऐसा कहकर उस दुरात्माकी लाशको पैरसे दबाया ॥ ८५ ॥
ततोऽग्निं तत्र प्रज्वाल्य दर्शयित्वा तु कीचकम् । पाञ्चालीं स तदा वीर इदं वचनमब्रवीत् ॥ ८६ ॥ फिर वहाँ आग जलाकर उन्होंने कीचकका शव दिखाया। उस समय वीरवर भीमने पांचालीसे यह बात कही— ॥ ८६ ॥
प्रार्थयन्ति सुकेशान्ते ये त्वां शीलगुणान्विताम् । एवं ते भीरु वध्यन्ते कीचकः शोभते यथा ॥ ८७ ॥ ‘सुन्दर केशोंवाली भीरु पांचाली! तुम सुशील और सद्गुणोंसे सम्पन्न हो। जो दुष्ट तुमसे समागमकी याचना करेंगे, वे इसी प्रकार मारे जायेंगे। जैसे आज कीचक शोभा पाता है, वही दशा उनकी भी होगी’ ॥ ८७ ॥
तत् कृत्वा दुष्करं कर्म कृष्णायाः प्रियमुत्तमम् । तथा स कीचकं हत्वा गत्वा रोषस्य वै शमम् ॥ ८८ ॥ आमन्त्र्य द्रौपदीं कृष्णां क्षिप्रमायान्महानसम् । कीचकं घातयित्वा तु द्रौपदी योषितां वरा । प्रहृष्टा गतसंतापा सभापालानुवाच ह ॥ ८९ ॥ द्रौपदीको प्रिय लगनेवाले इस उत्तम एवं दुष्कर कर्मको करके ऊपर बताये अनुसार कीचकको मारकर अपना रोष शान्त करनेके पश्चात् द्रौपदीसे पूछकर भीमसेन पुनः पाकशालामें चले गये। युवतियोंमें श्रेष्ठ द्रौपदी इस प्रकार कीचकको मरवाकर बड़ी प्रसन्न हुई। उसके सब संताप दूर हो गये। फिर वह सभाभवनके रक्षकोंके पास जाकर बोली— ॥ ८८-८९ ॥
कीचकोऽयं हतः शेते गन्धर्वैः पतिभिर्मम । परस्त्रीकामसम्मत्तस्तत्रागच्छत पश्यत ॥ ९० ॥ ‘आओ, देखो, ‘परायी स्त्रीके प्रति कामोन्मत्त रहनेवाला यह कीचक मेरे पति गन्धर्वोंद्वारा मारा जाकर वहाँ नृत्यशालामें पड़ा है’ ॥ ९० ॥
तच्छ्रुत्वा भाषितं तस्या नर्तनागाररक्षिणः । सहसैव समाजग्मुरादायोल्काः सहस्रशः ॥ ९१ ॥ उसका यह कथन सुनकर नृत्यशालाके रक्षक सहस्रोंकी संख्यामें हाथोंमें मसाल लिये सहसा वहाँ आये ॥ ९१ ॥
ततो गत्वाथ तद् वेश्म कीचकं विनिपातितम् । गतासुं ददृशुर्भूमौ रुधिरेण समुक्षितम् ॥ ९२ ॥ और उस घरके भीतर जाकर उन्होंने देखा; कीचकको गन्धर्वने मार गिराया है, उसके प्राण निकल गये हैं और उसकी लाश खूनसे लथपथ होकर धरतीपर पड़ी है ॥ ९२ ॥
पाणिपादविहीनं तु दृष्ट्वा च व्यथिताऽभवन् ।
निरीक्षन्ति ततः सर्वे परं विस्मयमागताः ॥ ९३ ॥
उसे हाथ-पैरसे हीन देख उन सबको बड़ी व्यथा हुई। फिर वे सभी बड़े आश्चर्यमें पड़कर उसे ध्यानसे देखने लगे ॥ ९३ ॥
अमानुषं कृतं कर्म तं दृष्ट्वा विनिपातितम् ।
क्वास्य ग्रीवा क्व चरणौ क्व पाणी क्व शिरस्तथा ।
इति स्म तं परीक्षन्ते गन्धर्वेण हतं तदा ॥ ९४ ॥
कीचकको इस तरह मारा गया देख वे आपसमें बोले—'यह कर्म तो किसी मनुष्यका किया हुआ नहीं हो सकता। देखो न, इसकी गर्दन, हाथ, पैर और सिर आदि अंग कहाँ चले गये?' यों कहकर जब परीक्षा की, तो वे इसी निश्चयपर पहुँचे कि हो-न-हो, इसे गन्धर्वने ही मारा है ॥ ९४ ॥
इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि कीचकवधपर्वणि कीचकवधे द्वाविंशोऽध्यायः ॥ २२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत कीचकवधपर्वमें कीचकवधविषयक बाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २२ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ १/३ श्लोक मिलाकर कुल ९६ १/३ श्लोक हैं।)
अध्याय (पृष्ठ 2294)
त्रयोविंशोऽध्यायः
उपकीचकोंका सैरन्ध्रीको बाँधकर श्मशानभूमिमें ले जाना और भीमसेनका उन सबको मारकर सैरन्ध्रीको छुड़ाना
वैशम्पायन उवाच
तस्मिन् काले समागम्य सर्वे तत्रास्य बान्धवाः ।
रुरुदुः कीचकं दृष्ट्वा परिवार्य समन्ततः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! उसी समय यह समाचार पाकर कीचकके सब बन्धु-बान्धव वहाँ आ गये। वे कीचककी यह दशा देख उसे चारों ओरसे घेरकर विलाप करने लगे ॥ १ ॥
सर्वे संहृष्टरोमाणः संत्रस्ताः प्रेक्ष्य कीचकम् ।
तथा सम्भिन्नसर्वाङ्गं कूर्मं स्थल इवोद्धृतम् ॥ २ ॥
उसके सारे अवयव शरीरमें घुस गये थे, इसलिये वह जलसे निकालकर स्थलमें रखे हुए कछुएके समान जान पड़ता था। कीचकके शवकी वह दुर्गति देखकर वे सब थर्रा उठे, उन सबके रोंगटे खड़े हो गये ॥ २ ॥
पोथितं भीमसेनेन तमिन्द्रेणेव दानवम् । संस्कारयितुमिच्छन्तो बहिर्नेतुं प्रचक्रमुः ॥ ३ ॥ जैसे इन्द्रने दानव वृत्रासुरका वध किया था, उसी प्रकार भीमसेनके हाथसे मारे गये उस कीचकका दाह-संस्कार करनेकी इच्छासे उसके बान्धवगण उसे बाहर (श्मशानभूमिमें) ले जानेकी तैयारी करने लगे ॥ ३ ॥
ददृशुस्ते ततः कृष्णां सूतपुत्राः समागताः । अदूराच्चानवद्याङ्गीं स्तम्भमालिङ्ग्य तिष्ठतीम् ॥ ४ ॥ इसी समय वहाँ आये हुए सूतपुत्रोंने देखा, निर्दोष अंगोंवाली द्रौपदी थोड़ी ही दूरपर एक खंभेका सहारा लिये खड़ी है ॥ ४ ॥
समवेतेषु सर्वेषु तामूचुरुपकीचकाः । हन्यतां शीघ्रमसती यत्कृते कीचको हतः ॥ ५ ॥ जब सब लोग जुट गये, तब उन उपकीचकों (कीचकके भाइयों)-ने द्रौपदीको लक्ष्य करके कहा—'इस दुष्टाको शीघ्र मार डाला जाय, क्योंकि इसीके लिये कीचककी जान गयी है ॥ ५ ॥
अथवा नैव हन्तव्या दह्यतां कामिना सह । मृतस्यापि प्रियं कार्यं सूतपुत्रस्य सर्वथा ॥ ६ ॥ 'अथवा मारा न जाय। कामी कीचककी लाशके साथ ही इसे भी जला दिया जाय। मर जानेपर भी सूतपुत्रका जो प्रिय हो; जिससे उसकी आत्मा प्रसन्न हो, वह कार्य हमें सर्वथा करना चाहिये' ॥ ६ ॥
ततो विराटमूचुस्ते कीचकोऽस्याः कृते हतः । सहानेनाद्य दह्येम तदनुज्ञातुमर्हसि ॥ ७ ॥ तदनन्तर उन्होंने विराटसे कहा—'इस सैरन्ध्रीके लिये ही कीचक मारा गया है, अतः आज हम कीचककी लाशके साथ इसे भी जला देना चाहते हैं, आप इसके लिये आज्ञा दें' ॥ ७ ॥
पराक्रमं तु सूतानां मत्वा राजान्वमोदत । सैरन्ध्र्याः सूतपुत्रेण सह दाहं विशाम्पतिः ॥ ८ ॥ राजाने सूतपुत्रोंके पराक्रमका विचार करके सैरन्ध्रीको कीचकके साथ जला डालनेकी अनुमति दे दी ॥ ८ ॥
तां समासाद्य वित्रस्तां कृष्णां कमलोचनाम् । मोमुह्यमानां ते तत्र जगृहुः कीचका भृशम् ॥ ९ ॥ फिर क्या था, उपकीचकोंने उसके पास जाकर भयभीत एवं मूर्च्छित हुई कमललोचना कृष्णाको बलपूर्वक पकड़ लिया ॥ ९ ॥
ततस्तु तां समारोप्य निबध्य च सुमध्यमाम् ।
जग्मुरुद्यम्य ते सर्वे श्मशानाभिमुखास्तदा ॥ १० ॥ फिर उन्होंने सुन्दर कटिभागवाली उस देवीको टिकटीपर चढ़ाकर लाशके साथ ही बाँध दिया। इसके बाद वे सब लोग मृतकको उठाकर श्मशानभूमिकी ओर ले चले ॥ १० ॥ ह्रियमाणा तु सा राजन् सूतपुत्रैरनिन्दिता । प्राक्रोशन्नाथमिच्छन्ती कृष्णा नाथवती सती ॥ ११ ॥ राजन्! सूतपुत्रोंद्वारा इस प्रकार ले जायी जाती हुई सती द्रौपदी सनाथा होकर भी [अनाथा-सी हो रही थी, वह] नाथ (रक्षक)-की इच्छा करती हुई जोर-जोरसे पुकारने लगी ॥ ११ ॥
द्रौपद्युवाच जयो जयन्तो विजयो जयत्सेनो जयद्वलः । ते मे वाचं विजानन्तु सूतपुत्रा नयन्ति माम् ॥ १२ ॥ **द्रौपदी बोली—**मेरे पति जय, जयन्त, विजय, जयत्सेन और जयद्वल जहाँ भी हों, मेरी यह आर्त वाणी सुनें और समझें। ये सूतपुत्र मुझे श्मशानमें लिये जा रहे हैं ॥ १२ ॥ येषां ज्यातलनिर्घोषो विस्फूर्जितमिवाशनेः । व्यश्रूयत महायुद्धे भीमघोषस्तरस्विनाम् ॥ १३ ॥ रथघोषश्च बलवान् गन्धर्वाणां तरस्विनाम् । ते मे वाचं विजानन्तु सूतपुत्रा नयन्ति माम् ॥ १४ ॥ जिन वेगवान् गन्धर्वोंके धनुषोंकी प्रत्यंचाका भीषण शब्द वज्राघातके समान सुनायी देता है तथा जिनके रथोंकी घर्घरहाटकी आवाज भी बड़े जोरसे उठती और दूरतक फैलती है, वे मेरी आर्त वाणी सुनें और समझें। ये सुतपुत्र मुझे श्मशानमें ले जा रहे हैं ॥ १३-१४ ॥
वैशम्पायन उवाच तस्यास्ताः कृपणा वाचः कृष्णायाः परिदेवितम् । श्रुत्वैवाभ्यापतद् भीमः शयनादविचारयन् ॥ १५ ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! द्रौपदीकी वह दीन वाणी और करुण विलाप सुनते ही भीमसेन बिना कोई विचार किये शय्यासे कूद पड़े ॥ १५ ॥
भीमसेन उवाच अहं शृणोमि ते वाचं त्वया सैरन्ध्रि भाषिताम् । तस्मात् ते सूतपुत्रेभ्यो भयं भीरु न विद्यते ॥ १६ ॥ **भीमसेन बोले—**सैरन्ध्री! तुम जो कुछ कह रही हो, तुम्हारी वह वाणी मैं सुनता हूँ। इसलिये भीरु! अब इन सूतपुत्रोंसे तेरे लिये कोई भय नहीं है ॥ १६ ॥
वैशम्पायन उवाच
इत्युक्त्वा स महाबाहुर्विजजृम्भे जिघांसया । ततः स व्यायतं कृत्वा वेषं विपरिवर्त्य च ॥ १७ ॥ अद्वारेणाभ्यवस्कन्द्य निर्जगाम बहिस्तदा । स भीमसेनः प्राकारादारुह्य तरसा द्रुमम् ॥ १८ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं— राजन्! ऐसा कहकर महाबाहु भीमसेनने उपकीचकोंका वध करनेके लिये अँड़ाई लेते हुए अपने शरीरको बढ़ा लिया और प्रयत्नपूर्वक वेष बदलकर बिना दरवाजेके ही दीवार फाँदकर पाकशालासे बाहर निकल गये। फिर वे नगरका परकोटा लाँघकर बड़े वेगसे एक वृक्षपर चढ़ गये (और वहींसे यह देखने लगे कि उपकीचक द्रौपदीको किधर ले जा रहे हैं) ॥ १७-१८ ॥
श्मशानाभिमुखः प्रायाद् यत्र ते कीचका गताः । स लङ्घयित्वा प्राकारं निःसृत्य च पुरोत्तमात् । जवेन पतितो भीमः सूतानामग्रतस्तदा ॥ १९ ॥ तत्पश्चात् वे उपकीचक जिधर गये थे, उसी ओर भीमसेन भी श्मशानभूमिकी दिशामें चल दिये। चहारदीवारी लाँघनेके पश्चात् उस श्रेष्ठ नगरसे निकलकर भीमसेन इतने वेगसे चले कि सूतपुत्रोंसे पहले ही वहाँ पहुँच गये ॥ १९ ॥
चितासमीपे गत्वा स तत्रापश्यद् वनस्पतिम् । तालमात्रं महास्कन्धं मूर्धशुष्कं विशाम्पते ॥ २० ॥ राजन्! चिताके समीप जाकर उन्होंने वहाँ ताड़के बराबर एक वृक्ष देखा, जिसकी शाखाएँ बहुत बड़ी थीं और जो ऊपरसे सूख गया था ॥ २० ॥
तं नागवदुपक्रम्य बाहुभ्यां परिरभ्य च । स्कन्धमारोपयामास दशव्यामं परंतपः ॥ २१ ॥ उस वृक्षकी ऊँचाई दस व्याम* थी। उसे शत्रुतापन भीमसेनने दोनों भुजाओंमें भरकर हाथीके समान जोर लगाकर उखाड़ा और अपने कंधेपर रख लिया ॥ २१ ॥
स तं वृक्षं दशव्यामं सस्कन्धविटपं बली । प्रगृह्याभ्यद्रवत् सूतान् दण्डपाणिरिवान्तकः ॥ २२ ॥ शाखा-प्रशाखाओंसहित उस दस व्याम ऊँचे वृक्षको लेकर बलवान् भीम दण्डपाणि यमराजके समान उन सूतपुत्रोंकी ओर दौड़े ॥ २२ ॥
ऊरुवेगेन तस्याथ न्यग्रोधाश्वत्थकिंशुकाः । भूमौ निपतिता वृक्षाः सङ्घशस्तत्र शेरते ॥ २३ ॥ उस समय उनकी जंघाओंके वेगसे टकराकर बहुतेरे बरगद, पीपल और ढाकके वृक्ष पृथ्वीपर गिरकर ढेर-के-ढेर बिखर गये ॥ २३ ॥
तं सिंहमिव संक्रुद्धं दृष्ट्वा गन्धर्वमागतम् । वित्रैसुः सर्वशः सूता विषादभयकम्पिताः ॥ २४ ॥
सिंहके समान क्रोधमें भरे हुए गन्धर्वरूपी भीमको अपनी ओर आते देखकर सभी सूतपुत्र डर गये और विषाद एवं भयसे काँपते हुए कहने लगे— ॥ २४ ॥
गन्धर्वो बलवानेति क्रुद्ध उद्यम्य पादपम् ।
सैरन्ध्री मुच्यतां शीघ्रं यतो नो भयमागतम् ॥ २५ ॥
‘अरे! देखो, यह बलवान् गन्धर्व वृक्ष उठाये कुपित हो हमारी ओर आ रहा है। सैरन्ध्रीको शीघ्र छोड़ दो, क्योंकि उसीके कारण हमें यह भय उपस्थित हुआ है’ ॥ २५ ॥
ते तु दृष्ट्वा तदाऽऽविद्धं भीमसेनेन पादपम् ।
विमुच्य द्रौपदीं तत्र प्राद्रवन्नगरं प्रति ॥ २६ ॥
इतनेमें ही भीमसेनके द्वारा घुमाये जाते हुए उस वृक्षको देखकर वे द्रौपदीको वहीं छोड़ नगरकी ओर भागने लगे ॥ २६ ॥
द्रवतस्तांस्तु सम्प्रेक्ष्य स वज्री दानवानिव ।
शतं पञ्चाधिकं भीमः प्राहिणोद् यमसादनम् ॥ २७ ॥
वृक्षेणैतेन राजेन्द्र प्रभञ्जनसुतो बली ।
राजेन्द्र! उन्हें भागते देख वायुपुत्र बलवान् भीमने, वज्रधारी इन्द्र जैसे दानवोंका वध करते हैं, उसी प्रकार उस वृक्षसे एक सौ पाँच उपकीचकोंको यमराजके घर भेज दिया ॥ २७ १/२ ॥
तत आश्वासयत् कृष्णां स विमुच्य विशाम्पते ॥ २८ ॥
महाराज! तदनन्तर उन्होंने द्रौपदीको बन्धनसे मुक्त करके आश्वासन दिया ॥ २८ ॥
उवाच च महाबाहुः पाञ्चालीं तत्र द्रौपदीम् ।
अश्रुपूर्णमुखीं दीनां दुर्धर्षः स वृकोदरः ॥ २९ ॥
उस समय पांचालराजकुमारी द्रौपदी बड़ी दीन एवं दयनीय हो गयी थी। उसके मुखपर आँसुओंकी धारा बह रही थी। दुर्धर्ष वीर महाबाहु वृकोदरने उसे धीरज बँधाते हुए कहा— ॥ २९ ॥
एवं ते भीरु वध्यन्ते ये त्वां क्लिश्यन्त्यनागसम् ।
प्रैहि त्वं नगरं कृष्णे न भयं विद्यते तव ॥ ३० ॥
अन्येनाहं गमिष्यामि विराटस्य महानसम् ॥ ३१ ॥
‘भीरु! जो तुझ निरपराध अबलाको सतायेंगे, वे इसी तरह मारे जायँगे। कृष्णे! नगरको जाओ। अब तुम्हारे लिये कोई भय नहीं है। मैं दूसरे मार्गसे विराटकी पाकशालामें चला जाऊँगा’ ॥ ३०-३१ ॥
वैशम्पायन उवाच
पञ्चाधिकं शतं तच्च निहतं तेन भारत ।
महावनमिवच्छिन्नं शिश्ये विगलितद्रुमम् ॥ ३२ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— भारत! भीमसेनके द्वारा मारे गये वे एक सौ पाँच उपकीचक वहाँ श्मशानभूमिमें इस प्रकार सो रहे थे, मानो काटा हुआ महान् जंगल गिरे हुए पेड़ोंसे भरा हो ॥ ३२ ॥
एवं ते निहता राजञ्छतं पञ्च च कीचकाः ।
स च सेनापतिः पूर्वमित्येतत् सूतषट्शतम् ॥ ३३ ॥
राजन्! इस प्रकार वे एक सौ पाँच उपकीचक और पहले मरा हुआ सेनापति कीचक सब मिलकर एक सौ छः सूतपुत्र मारे गये ॥ ३३ ॥
तद् दृष्ट्वा महदाश्चर्यं नरा नार्यश्च संगताः ।
विस्मयं परमं गत्वा नोचुः किञ्चन भारत ॥ ३४ ॥
भारत! उस समय श्मशानभूमिमें बहुत-से पुरुष और स्त्रियाँ एकत्र हो गयी थीं। उन सबने यह महान् आश्चर्यजनक काण्ड देखा, किंतु भारी विस्मयमें पड़कर किसीने कुछ कहा नहीं ॥ ३४ ॥
इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि कीचकवधपर्वणि त्रयोविंशोऽध्यायः ॥ २३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत कीचकवधपर्वमें तेईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २३ ॥
* दोनों हाथोंको फैलानेपर जितनी लंबाई होती है, उसे एक व्याम कहते हैं।
अध्याय (पृष्ठ 2301)
चतुर्विंशोऽध्यायः
द्रौपदीका राजमहलमें लौटकर आना और बृहन्नला एवं सुदेष्णासे उसकी बातचीत
वैशम्पायन उवाच
ते दृष्ट्वा निहतान् सूतान् राज्ञे गत्वा न्यवेदयन् ।
गन्धर्वैर्निहता राजन् सूतपुत्रा महाबलाः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! नगरवासियोंने सूतपुत्रोंका यह संहार देख राजा विराटके पास जाकर निवेदन किया—'महाराज! गन्धर्वोंने महाबली सूतपुत्रोंको मार डाला ॥ १ ॥
यथा वज्रेण वै दीर्णं पर्वतस्य महच्छिरः ।
व्यतिकीर्णाः प्रदृश्यन्ते तथा सूता महीतले ॥ २ ॥
'जैसे पर्वतका महान् शिखर वज्रसे विदीर्ण हो गया हो, उसी प्रकार वे सूतपुत्र पृथ्वीपर बिखरे दिखायी देते हैं ॥ २ ॥
सैरन्ध्री च विमुक्तासौ पुनरायाति ते गृहम् ।
सर्वं संशयितं राजन् नगरं ते भविष्यति ॥ ३ ॥
'सैरन्ध्री बन्धनमुक्त हो गयी है, अब वह पुनः आपके महलकी ओर आ रही है। उसके रहनेसे आपके सम्पूर्ण नगरका जीवन संकटमें पड़ जायगा ॥ ३ ॥
यथारूपा च सैरन्ध्री गन्धर्वाश्च महाबलाः ।
पुंसामिष्टश्च विषयो मैथुनाय न संशयः ॥ ४ ॥
'सैरन्ध्रीका जैसा अप्रतिम रूप-सौन्दर्य है, वह सबको विदित ही है। उसके पति गन्धर्व भी बड़े बलवान् हैं। पुरुषोंको मैथुनके लिये विषयभोग अभीष्ट है ही; इसमें संशय नहीं है ॥ ४ ॥
यथा सैरन्ध्रिदोषेण न ते राजन्निदं पुरम् ।
विनाशमेति वै क्षिप्रं तथा नीतिर्विधीयताम् ॥ ५ ॥
'अतः राजन्! आप शीघ्र ही कोई ऐसी नीति अपनावें, जिससे सैरन्ध्रीके दोषसे आपका यह नगर नष्ट न हो जाय' ॥ ५ ॥
तेषां तद् वचनं श्रुत्वा विराटो वाहिनीपतिः ।
अब्रवीत् क्रियतामेषां सूतानां परमक्रिया ॥ ६ ॥
उनकी वह बात सुनकर सेनाओंके स्वामी राजा विराटने कहा—'इन सूतपुत्रोंका अन्त्येष्टि-संस्कार किया जाय ॥ ६ ॥
एकस्मिन्नेव ते सर्वे सुसमिद्धे हुताशने । दह्यन्तां कीचकाः शीघ्रं रत्नैर्गन्धैश्च सर्वशः ॥ ७ ॥ ‘एक ही चितामें अग्नि प्रज्वलित करके रत्न और सुगन्धित पदार्थोंके साथ सम्पूर्ण कीचकोंका दाह करना चाहिये' ॥ ७ ॥ सुदेष्णामब्रवीद् राजा महिषीं जातसाध्वसः । सैरन्ध्रीमागतां ब्रूया ममैव वचनादिदम् ॥ ८ ॥ तदनन्तर राजाने भयभीत होकर रानी सुदेष्णाके पास जाकर कहा—‘देवि! जब सैरन्ध्री यहाँ आ जाय, तो मेरी ही ओरसे उससे यों कहो— ॥ ८ ॥ गच्छ सैरन्ध्रि भद्रं ते यथाकामं वरानने । बिभेति राजा सुश्रोणि गन्धर्वेभ्यः पराभवात् ॥ ९ ॥ ‘सैरन्ध्री! तुम्हारा कल्याण हो। वरानने! तुम्हारी जहाँ रुचि हो, चली जाओ। सुश्रोणि! गन्धर्वोंके तिरस्कारसे राजा डरते हैं' ॥ ९ ॥ न हि त्वामुत्सहे वक्तुं स्वयं गन्धर्वरक्षिताम् । स्त्रियास्त्वदोषस्तां वक्तुमतस्त्वां प्रब्रवीम्यहम् ॥ १० ॥ ‘तुम गन्धर्वोंसे सुरक्षित हो। मैं पुरुष होनेके कारण स्वयं तुमसे कोई बात नहीं कह सकता। किंतु स्त्रीके मुखसे तुम्हारे प्रति यह सब कहलानेमें दोष नहीं है; अतः अपनी पत्नीके द्वारा स्वयं ही तुमसे यह बात कह रहा हूँ' ॥ १० ॥
वैशम्पायन उवाच
अथ मुक्ता भयात् कृष्णा सूतपुत्रान् निरस्य च । मोक्षिता भीमसेनेन जगाम नगरं प्रति ॥ ११ ॥ त्रासितेव मृगी बाला शार्दूलेन मनस्विनी । गात्राणि वाससी चैव प्रक्षाल्य सलिलेन सा ॥ १२ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! जब सूतपुत्रोंको मारकर भीमसेनने द्रौपदीका बन्धन खोल दिया और वह भयसे मुक्त हो गयी, तब जलसे स्नान करके अपने शरीर और वस्त्रोंको धोकर सिंहसे डरायी हुई हरिणीकी भाँति वह मनस्विनी बाला नगरकी ओर चली ॥ ११-१२ ॥ तां दृष्ट्वा पुरुषा राजन् प्राद्रवन्त दिशो दश । गन्धर्वाणां भयत्रस्ताः केचिद् दृष्ट्वा न्यमीलयन् ॥ १३ ॥ जनमेजय! उस समय द्रौपदीको देखकर गन्धर्वोंके भयसे डरे हुए पुरुष दसों दिशाओंकी ओर भाग जाते थे और कोई-कोई उसे देखकर आँख मूँद लेते थे ॥ ततो महानसद्वारि भीमसेनमवस्थितम् । ददर्श राजन् पाञ्चाली यथा मत्तं महाद्विपम् ॥ १४ ॥
तदनन्तर पाकशालाके द्वारपर पहुँचकर पांचालीने वहाँ मतवाले गजराजके समान भीमसेनको खड़ा देखा ।। तं विस्मयन्ती शनकैः संज्ञाभिरिदमब्रवीत् । गन्धर्वराजाय नमो येनास्मि परिमोचिता ॥ १५ ॥ और विस्मयविमुग्ध होकर उसने धीरेसे संकेतपूर्वक इस प्रकार कहा—'उन गन्धर्वराजको नमस्कार है, जिन्होंने मुझे भारी संकटसे मुक्त किया है' ॥ १५ ॥
भीमसेन उवाच
ये पुरा विचरन्तीह पुरुषा वशवर्तिनः । तस्यास्ते वचनं श्रुत्वा ह्यनृणा विहरन्त्वतः ॥ १६ ॥ भीमसेन बोले—देवि! जो पुरुष तुम्हारी आज्ञाके अधीन होकर यहाँ पहलेसे विचर रहे हैं, वे तुम्हारी यह बात सुनकर प्रतिज्ञासे उऋण हो इच्छानुसार विहार करें ॥ १६ ॥
वैशम्पायन उवाच
ततः सा नर्तनागारे धनंजयमपश्यत । राज्ञः कन्या विराटस्य नर्तयानं महाभुजम् ॥ १७ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! तत्पश्चात् द्रौपदीने नृत्यशालामें पहुँचकर महाबाहु अर्जुनको देखा, जो राजा विराटकी कन्याओंको नृत्य सिखा रहे थे ॥ १७ ॥ ततस्ता नर्तनागाराद् विनिष्क्रम्य सहार्जुनाः । कन्या ददृशुरायान्तीं क्लिष्टां कृष्णामनागसम् ॥ १८ ॥ उसके आनेका समाचार पाकर अर्जुनसहित वे सब कन्याएँ नृत्यगृहसे बाहर निकल आयीं और वहाँ आती हुई निरपराध सतायी गयी कृष्णाको देखने लगीं ॥ १८ ॥
कन्या ऊचुः
दिष्ट्या सैरन्ध्रि मुक्तासि दिष्ट्यासि पुनरागता । दिष्ट्या विनिहताः सूता ये त्वां क्लिश्यन्त्यनागसम् ॥ १९ ॥ उसे देखकर कन्याओंने कहा—सैरन्ध्री! सौभाग्य-की बात है कि तुम संकटसे मुक्त हो गयीं और सौभाग्यसे यहाँ पुनः लौट आयीं। वे सूतपुत्र जो तुम्हें बिना किसी अपराधके ही कष्ट दे रहे थे, मार दिये गये, यह भी भाग्यवश अच्छा ही हुआ ॥ १९ ॥
बृहन्नलोवाच
कथं सैरन्ध्रि मुक्तासि कथं पापाश्च ते हताः । इच्छामि वै तव श्रोतुं सर्वमेव यथातथम् ॥ २० ॥ बृहन्नलाने पूछा—सैरन्ध्री! तू उन पापियोंके हाथसे कैसे छूटी? और वे पापी कैसे मारे गये? मैं ये सब बातें तेरे मुखसे ज्यों-की-त्यों सुनना चाहती हूँ ॥ २० ॥
सैरन्ध्र्युवाच
बृहन्नले किं नु तव सैरन्ध्र्या कार्यमद्य वै । या त्वं वससि कल्याणि सदा कन्यापुरे सुखम् ॥ २१ ॥ सैरन्ध्री बोली— बृहन्नले! अब तुम्हें सैरन्ध्रीसे क्या काम है? कल्याणी! तुम तो मौजसे इन कन्याओंके अन्तःपुरमें रहती हो ॥ २१ ॥
न हि दुःखं समाप्नोषि सैरन्ध्री यदुपाश्नुते । तेन मां दुःखितामेवं पृच्छसे प्रहसन्निव ॥ २२ ॥ सैरन्ध्री जो दुःख भोग रही है, उसे दूर तो करोगी नहीं या उसका अनुभव तो तुम्हें होता नहीं; इसीलिये मुझ दुखियाकी केवल हँसी उड़ानेके लिये ऐसा प्रश्न कर रही हो? ॥ २२ ॥
बृहन्नलोवाच
बृहन्नलापि कल्याणि दुःखमाप्नोत्यनुत्तमम् । तिर्यग्योनिगता बाले न चैनामवबुध्यसे ॥ २३ ॥ बृहन्नलाने कहा— कल्याणी! पशुओंकी-सी नीच या नपुंसक योनिमें पड़कर बृहन्नला भी महान् दुःख भोग रही है, तू अभी भोली-भाली है; इसीलिये बृहन्नलाको नहीं समझ पाती ॥ २३ ॥
त्वया सहोषिता चास्मि त्वं च सर्वैः सहोषिता ।
क्लिश्यन्त्यां त्वयि सुश्रोणि को नु दुःखं न चिन्तयेत् ॥ २४ ॥
सुश्रोणि! तेरे साथ तो मैं रह चुकी हूँ और तू भी हम सबके साथ रही है; फिर तेरे ऊपर कष्ट पड़नेपर किसको दुःख न होगा? ॥ २४ ॥
न तु केनचिदत्यन्तं कस्यचिद्धृदयं क्वचित् ।
वेदितुं शक्यते नूनं तेन मां नावबुध्यसे ॥ २५ ॥
निश्चय ही, कोई अन्य व्यक्ति किसी दूसरेके हृदयको कभी पूर्णरूपसे नहीं समझ सकता, यही कारण है कि तुम मुझे नहीं समझ पाती; मेरे कष्टका अनुभव नहीं कर पाती ॥ २५ ॥
वैशम्पायन उवाच
ततः सहैव कन्याभिर्द्रौपदी राजवेश्म तत् ।
प्रविवेश सुदेष्णायाः समीपमुपगामिनी ॥ २६ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तदनन्तर उन कन्याओंके साथ ही द्रौपदी राजभवनमें गयी और रानी सुदेष्णाके पास जाकर खड़ी हो गयी ॥ २६ ॥
तामब्रवीद् राजपुत्री विराटवचनादिदम् ।
सैरन्ध्रि गम्यतां शीघ्रं यत्र कामयसे गतिम् ॥ २७ ॥
तब राजपुत्री सुदेष्णाने विराटके कथनानुसार उससे कहा—‘सैरन्ध्री! तुम जहाँ जाना चाहो, शीघ्र चली जाओ ॥
राजा बिभेति ते भद्रे गन्धर्वेभ्यः पराभवात् ।
त्वं चापि तरुणी सुभ्रु रूपेणाप्रतिमा भुवि ।
पुंसामिष्टश्च विषयो गन्धर्वाश्चातिकोपनाः ॥ २८ ॥
‘भद्रे! तुम्हारे गन्धर्वोंद्वारा प्राप्त होनेवाले पराभवसे महाराजको भय हो रहा है। सुभ्रु! तुम अभी तरुणी हो, रूप-सौन्दर्यमें भी तुम्हारी समानता कर सके, ऐसी कोई स्त्री इस भूमण्डलमें नहीं है। पुरुषोंको विषयभोग प्रिय होता ही है; (अतः उनसे प्रमाद होनेकी सम्भावना है।) इधर तुम्हारे गन्धर्व बड़े क्रोधी हैं (वे न जाने कब क्या कर बैठें?)’ ॥ २८ ॥
सैरन्ध्र्युवाच
त्रयोदशाहमात्रं मे राजा क्षाम्यतु भामिनि ।
कृतकृत्या भविष्यन्ति गन्धर्वास्ते न संशयः ॥ २९ ॥
**सैरन्ध्रीने कहा—**भामिनि! मेरे लिये तेरह दिन और महाराज क्षमा करें। निःसंदेह तबतक गन्धर्वों-का अभीष्ट कार्य पूर्ण हो जायगा—वे कृतकृत्य हो जायँगे ॥ २९ ॥
ततो मामुपनेष्यन्ति करिष्यन्ति च ते प्रियम् ।
ध्रुवं च श्रेयसा राजा योक्ष्यते सह बान्धवैः ॥ ३० ॥
इसके बाद वे मुझे तो ले ही जायँगे, आपका भी प्रिय करेंगे। (गन्धर्वोंकी प्रसन्नतासे)
अवश्य ही राजा विराट अपने भाई-बन्धुओंसहित कल्याणके भागी होंगे ।।
(राज्ञा कृतोपकाराश्च कृतज्ञाश्च सदा शुभे ।
साधवश्च बलोत्सिक्ताः कृतप्रतिकृतेप्सवः ।।
अर्थिनी प्रब्रवीम्येषा यद् वा तद् वेति चिन्तय ।
भरस्व तदहर्मात्रं ततः श्रेयो भविष्यति ।।
शुभे! राजा विराटने गन्धर्वोंका बड़ा उपकार किया है; अतः वे सदा उनके प्रति कृतज्ञ
बने रहते हैं। गन्धर्वलोग बलके अभिमानी होते हुए भी साधु स्वभावके पुरुष हैं और अपने
प्रति किये हुए उपकारका बदला चुकानेकी इच्छा रखते हैं। मैं एक प्रयोजनसे यहाँ रहती हूँ;
इसीलिये तुमसे अभी कुछ दिन और यहाँ ठहरने देनेके लिये अनुरोध करती हूँ। तुम अपने
मनमें जो कुछ भी सोच-विचार करो, किंतु कुछ गिने गिनाये दिनोंतक अभी और मेरा
भरण-पोषण करती चलो; इससे तुम्हारा कल्याण होगा।
वैशम्पायन उवाच
तस्यास्तद् वचनं श्रुत्वा कैकेयी दुःखमोहिता ।
उवाच द्रौपदीमार्ता भ्रातृव्यसनकर्शिता ।।
वस भद्रे यथेष्टं त्वं त्वामहं शरणं गता ।
त्रायस्व मम भर्तारं पुत्रांश्चैव विशेषतः ।।)
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! सैरन्ध्रीकी यह बात सुनकर केकयराजकुमारी
सुदेष्णा भाईके शोकसे पीड़ित और दुःखसे मोहित हो आर्त होकर द्रौपदीसे बोली—'भद्रे!
तुम्हारी जबतक इच्छा हो, यहाँ रहो; परंतु मेरे पति और पुत्रोंकी विशेषरूपसे रक्षा करो।
इसके लिये मैं तुम्हारी शरणमें आयी हूँ'।
इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि कीचकवधपर्वणि कीचकदाहे चतुर्विंशोऽध्यायः ।।
२४ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत कीचकवधपर्वमें कीचकोंके दाह-
संस्कारविषयक चौबीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। २४ ।।
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ४ श्लोक मिलाकर कुल ३४ श्लोक हैं।)
(गोहरणपर्व)
(गोहरणपर्व)
पञ्चविंशोऽध्यायः
दुर्योधनके पास उसके गुप्तचरोंका आना और उनका पाण्डवोंके विषयमें कुछ पता न लगा, यह बताकर कीचकवधका वृत्तान्त सुनाना
वैशम्पायन उवाच
(कीचके तु हते राजा विराटः परवीरहा ।
शोकमाहारयत् तीव्रं सामात्यः सपुरोहितः ॥)
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! कीचकके मारे जानेपर शत्रुवीरोंका वध करनेवाले राजा विराट पुरोहित और मन्त्रियोंसहित बहुत दुःखी हुए।
कीचकस्य तु घातेन सानुजस्य विशाम्पते ।
अत्याहितं चिन्तयित्वा व्यस्मयन्त पृथग् जनाः ॥ १ ॥
नरेश्वर! भाइयोंसहित कीचकका वध होनेसे सब लोग इसको बड़ी भारी दुर्घटना या दुःसाहसका काम मानकर अलग-अलग आश्चर्यमें पड़े रहे ॥ १ ॥
तस्मिन् पुरे जनपदे संजल्पोऽभूच्च सङ्घशः ।
शौर्याद्धि वल्लभो राज्ञो महासत्त्वः स कीचकः ॥ २ ॥
उस नगर तथा राष्ट्रमें झुंड-के-झुंड मनुष्य एकत्र हो जाते और उनमें इस तरहकी बातें होने लगती थीं—‘महाबली कीचक अपनी शूरवीरताके कारण राजा विराटको बहुत प्रिय था ॥ २ ॥
आसीत् प्रहर्ता सैन्यानां दारमर्शी च दुर्मतिः ।
स हतः खलु पापात्मा गन्धर्वैर्दुष्टपूरुषः ॥ ३ ॥
‘उसने विपक्षी दलोंकी बहुत-सी सेनाओंका संहार किया था, किंतु उसकी बुद्धि बड़ी खोटी थी। वह परायी स्त्रियोंपर बलात्कार करनेवाला पापात्मा और दुष्ट था; इसीलिये गन्धर्वोंद्वारा मारा गया है ॥ ३ ॥
इत्यजल्पन् महाराज परानीकविनाशनम् ।
देशे देशे मनुष्याश्च कीचकं दुष्प्रधर्षणम् ॥ ४ ॥
महाराज जनमेजय! शत्रुओंकी सेनाका संहार करनेवाले उस दुर्धर्ष वीर कीचकके विषयमें देश-देशके लोग ऐसी ही बातें किया करते थे ।। ४ ।। अथ वै धार्तराष्ट्रेण प्रयुक्ता ये बहिश्चराः । मृगयित्वा बहून् ग्रामान् राष्ट्राणि नगराणि च ।। ५ ।। संविधाय यथादृष्टं यथादेशप्रदर्शनम् । कृतकृत्या न्यवर्तन्त ते चरा नगरं प्रति ।। ६ ।। इधर अज्ञातवासकी अवस्थामें पाण्डवोंका पता लगानेके लिये दुर्योधनने जो बाहरके देशोंमें घूमनेवाले गुप्तचर लगा रखे थे, वे अनेक ग्राम, राष्ट्र और नगरोंमें उन्हें ढूँढ़कर, जैसा वे देख सकते या पता लगा सकते थे अथवा जिन-जिन देशोंमें छान-बीन कर सकते थे, उन सबमें उसी प्रकार देखभाल करके अपना काम पूरा करके पुनः हस्तिनापुरमें लौट आये ।। ५-६ ।। तत्र दृष्ट्वा तु राजानं कौरव्यं धृतराष्ट्रजम् । द्रोणकर्णकृपैः सार्धं भीष्मेण च महात्मना ।। ७ ।। संगतं भ्रातृभिश्चापि त्रिगर्तैश्च महारथैः । दुर्योधनं सभामध्ये आसीनमिदमब्रुवन् ।। ८ ।। वहाँ वे धृतराष्ट्रपुत्र कुरुनन्दन दुर्योधनसे मिले, जो द्रोण, कर्ण, कृपाचार्य, महात्मा भीष्म, अपने सम्पूर्ण भाई तथा महारथी त्रिगतोंके साथ राजसभामें बैठा था। उससे मिलकर उन गुप्तचरोंने यों कहा ।। ७-८ ।।
चरा ऊचुः कृतोऽस्माभिः परो यत्नस्तेषामन्वेषणे सदा । पाण्डवानां मनुष्येन्द्र तस्मिन् महति कानने ।। ९ ।। **गुप्तचर बोले—**नरेन्द्र! हमने उस विशाल वनमें पाण्डवोंकी खोजके लिये सदा महान् प्रयत्न जारी रखा है ।। निर्जने मृगसंकीर्णे नानाद्रुमलताकुले । लताप्रतानबहुले नानागुल्मसमावृते ।। १० ।। न च विद्मो गता येन पार्थाः सुदृढविक्रमाः । मार्गमाणाः पदन्यासं तेषु तेषु तथा तथा ।। ११ ।। मृगोंसे भरे हुए निर्जन वनमें, जो अनेकानेक वृक्षों और लताओंसे व्याप्त, विविध लताओंकी बहुलता एवं विस्तारसे विलसित तथा नाना गुल्मोंसे समावृत है, घूमकर वहाँके विभिन्न स्थानोंमें अनेक प्रकारसे उनके पदचिह्न हम ढूँढ़ते रहे हैं तथापि वे सुदृढ़ पराक्रमी कुन्तीकुमार किस मार्गसे कहाँ गये? यह नहीं जान सके ।। १०-११ ।। गिरिकूटेषु तुङ्गेषु नानाजनपदेषु च ।
जनाकीर्णेषु देशेषु खर्वटेषु पुरेषु च ॥ १२ ॥ नरेन्द्र बहुशोऽन्विष्टा नैव विद्मश्च पाण्डवान् । अत्यन्तं वा विनष्टास्ते भद्रं तुभ्यं नरर्षभ ॥ १३ ॥ महाराज! हमने पर्वतोंके ऊँचे-ऊँचे शिखरोंपर, भिन्न-भिन्न देशोंमें, जनसमूहसे भरे हुए स्थानोंमें तथा तराईके गाँवों, बाजारों और नगरोंमें भी उनकी बहुत खोज की, परंतु कहीं भी पाण्डवोंका पता नहीं लगा। नरश्रेष्ठ! आपका कल्याण हो। सम्भव है, वे सर्वथा नष्ट हो गये हों ॥ १२-१३ ॥
वर्त्मन्यन्वेष्यमाणा वै रथिनां रथिसत्तम । न हि विद्मो गतिं तेषां वासं हि नरसत्तम ॥ १४ ॥ रथियोंमें श्रेष्ठ नरोत्तम! हमने रथियोंके मार्गपर भी उनका अन्वेषण किया है, किंतु वे कहाँ गये और कहाँ रहते हैं? इसका पता हमें नहीं लगा ॥ १४ ॥
किंचित्काले मनुष्येन्द्र सूतानामनुगा वयम् । मृगयित्वा यथान्यायं वेदितार्थाः स्म तत्त्वतः ॥ १५ ॥ मानवेन्द्र! कुछ कालतक हमलोग उनके सारथियोंके पीछे लगे रहे और अच्छी तरह खोज करके हमने एक यथार्थ बातका ठीक-ठीक पता लगा लिया है ॥ १५ ॥
प्राप्ता द्वारवतीं सूता विना पार्थैः परंतप । न तत्र कृष्णा राजेन्द्र पाण्डवाश्च महाव्रताः ॥ १६ ॥ शत्रुओंको संताप देनेवाले राजेश्वर! पाण्डवोंके इन्द्रसेन आदि सारथि उनके बिना ही द्वारकापुरीमें पहुँच गये हैं। वहाँ न तो द्रौपदी है और न महान् व्रतधारी पाण्डव ही हैं ॥ १६ ॥
सर्वथा विप्रणष्टास्ते नमस्ते भरतर्षभ । न हि विद्मो गतिं तेषां वासं वापि महात्मनाम् ॥ १७ ॥ पाण्डवानां प्रवृत्तिं च विद्मः कर्मापि वा कृतम् । स नः शाधि मनुष्येन्द्र अत ऊर्ध्वं विशाम्पते ॥ १८ ॥ जान पड़ता है; वे बिल्कुल नष्ट हो गये। भरतश्रेष्ठ! आपको नमस्कार है। हम महात्मा पाण्डवोंके मार्ग, निवासस्थान, प्रवृत्ति अथवा उनके द्वारा किये हुए कार्यके विषयमें कुछ भी जानकारी नहीं प्राप्त कर सके। प्रजापालक नरेश! इसके बाद हमारे लिये क्या आज्ञा है? ॥ १७-१८ ॥
अन्वेषणे पाण्डवानां भूयः किं करवामहे । इमां च नः प्रियां वीर वाचं भद्रवतीं शृणु ॥ १९ ॥ बताइये, पाण्डवोंको ढूँढ़नेके लिये हम पुनः क्या करें? वीर! हमारी एक बात और सुनिये, यह आपको प्रिय लगेगी। इसमें आपके लिये मंगलजनक समाचार है ॥ १९ ॥ येन त्रिगर्ता निहता बलेन महता नृप ।