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महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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१३७-

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सप्तत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः

भरद्वाजका पुत्रशोकसे विलाप करना, रैभ्यमुनिको शाप देना एवं स्वयं अग्निमें प्रवेश करना

लोमश उवाच

भरद्वाजस्तु कौन्तेय कृत्वा स्वाध्यायमाह्निकम् ।
समित्कलापमादाय प्रविवेश स्वमाश्रमम् ॥ १ ॥
तं स्म दृष्ट्वा पुरा सर्वे प्रत्युत्तिष्ठन्ति पावकाः ।
न त्वेनमुपतिष्ठन्ति हतपुत्रं तदाग्नयः ॥ २ ॥
लोमशजी कहते हैं— कुन्तीनन्दन! भरद्वाज मुनि प्रतिदिनका स्वाध्याय पूरा करके बहुत-सी समिधाएँ लिये आश्रममें आये। उस दिनसे पहले सभी अग्नयाँ उनको देखते ही उठकर स्वागत करती थीं, परंतु उस समय उनका पुत्र मारा गया था, इसलिये अशौचयुक्त होनेके कारण उनका अग्नियोंने पूर्ववत् खड़े होकर स्वागत नहीं किया ॥ १२ ॥

वैकृतं त्वग्निहोत्रे स लक्षयित्वा महातपाः ।
तमन्धं शूद्रमासीनं गृहपालमथाब्रवीत् ॥ ३ ॥
अग्निहोत्रगृहमैं यह विकृति देखकर उन महातपस्वी भरद्वाजने वहाँ बैठे हुए अन्धे गृहरक्षक शूद्रसे पूछा— ॥

किं नु मे नाग्नयः शूद्र प्रतिनन्दन्ति दर्शनम् ।
त्वं चापि न यथापूर्वं कच्चित् क्षेममिहाश्रमे ॥ ४ ॥
कच्चिन्न रैभ्यं पुत्रो मे गतवानल्पचेतनः ।
एतदाचक्ष्व मे शीघ्रं न हि शुद्ध्यति मे मनः ॥ ५ ॥
‘दास! क्या कारण है कि आज अग्नयाँ पूर्ववत् मेरा दर्शन करके प्रसन्नता नहीं प्रकट करती हैं। इधर तुम भी पहले-जैसे समादरका भाव नहीं दिखाते हो। इस आश्रममें कुशल तो है न? कहीं मेरा मन्दबुद्धि पुत्र रैभ्यके पास तो नहीं चला गया? यह बात मुझे शीघ्र बताओ; क्योंकि मेरा मन शान्त नहीं हो रहा है’ ॥ ५ ॥

शूद्र उवाच

रैभ्यं यातो नूनमयं पुत्रस्ते मन्दचेतनः ।
तथा हि निहतः शेते राक्षसेन बलीयसा ॥ ६ ॥
शूद्र बोला— भगवन्! अवश्य ही आपका यह मन्दमति पुत्र रैभ्यके यहाँ गया था। उसीका यह फल है कि एक महाबली राक्षसके द्वारा मारा जाकर पृथ्वीपर पड़ा है ॥ ६ ॥

प्रकाल्यमानस्तेनायं शूलहस्तेन रक्षसा ।

अग्न्यागारं प्रति द्वारि मया दोर्भ्यां निवारितः ॥ ७ ॥ राक्षस अपने हाथमें शूल लेकर इसका पीछा कर रहा था और यह अग्निशालामें घुसा जा रहा था। उस समय मैंने दोनों हाथोंसे पकड़कर इसे द्वारपर ही रोक लिया ॥ ७ ॥

ततः स विहताशोऽत्र जलकामोऽशुचिर्ध्रुवम् । निहतः सोऽतिवेगेन शूलहस्तेन रक्षसा ॥ ८ ॥ निश्चय ही अपवित्र होनेके कारण यह शुद्धिके लिये जल लेनेकी इच्छा रखकर यहाँ आया था, परंतु मेरे रोक देनेसे यह हताश हो गया। उस दशामें उस शूलधारी राक्षसने इसके ऊपर बड़े वेगसे प्रहार करके इसे मार डाला ॥ ८ ॥

भरद्वाजस्तु तच्छ्रुत्वा शूद्रस्य विप्रियं महत् । गतासुं पुत्रमादाय विललाप सुदुःखितः ॥ ९ ॥ शूद्रका कहा हुआ यह अत्यन्त अप्रिय वचन सुनकर भरद्वाज बड़े दुखी हो गये और अपने प्राणशून्य पुत्रको लेकर विलाप करने लगे ॥ ९ ॥

भरद्वाज उवाच

ब्राह्मणानां किलार्थाय ननु त्वं तप्तवांस्तपः । द्विजानामनधीता वै वेदाः सम्प्रतिभान्विति ॥ १० ॥ **भरद्वाजने कहा—**बेटा! तुमने ब्राह्मणोंके हितके लिये भारी तपस्या की थी। तुम्हारी तपस्याका यह उद्देश्य था कि द्विजोंको बिना पढ़े ही सब वेदोंका ज्ञान हो जाय ॥ १० ॥

तथा कल्याणशीलस्त्वं ब्राह्मणेषु महात्मसु । अनागाः सर्वभूतेषु कर्कशत्वमुपेयिवान् ॥ ११ ॥ इस प्रकार महात्मा ब्राह्मणोंके प्रति तुम्हारा स्वभाव अत्यन्त कल्याणकारी था। किसी भी प्राणीके प्रति तुम कोई अपराध नहीं करते थे। फिर भी तुम्हारा स्वभाव कुछ कठोर हो गया था ॥ ११ ॥

प्रतिषिद्धो मया तात रैभ्यावसथदर्शनात् । गतवानेव तं द्रष्टुं कालान्तकयमोपमम् ॥ १२ ॥ यः स जानन् महातेजा वृद्धस्यैकं ममात्मजम् । गतवानेव कोपस्य वशं परमदुर्मतिः ॥ १३ ॥ तात! मैंने तुम्हें बार-बार मना किया था कि तुम रैभ्यके आश्रमकी ओर न देखना, परंतु तुम उसे देखने चले ही गये और वह तुम्हारे लिये काल, अन्तक एवं यमराजके समान हो गया। महान् तेजस्वी होनेपर भी उसकी बुद्धि बड़ी खोटी है। वह जानता था कि मुझ बूढ़ेके तुम एक ही पुत्र हो तो भी वह दुष्ट क्रोधके वशीभूत हो ही गया ॥ १२-१३ ॥

पुत्रशोकमनुप्राप्त एष रैभ्यस्य कर्मणा । त्यक्ष्यामि त्वामृते पुत्र प्राणानिष्टतमान् भुवि ॥ १४ ॥

बेटा! आज रैभ्यके इस कठोर कर्मसे मुझे पुत्रशोक प्राप्त हुआ है। तुम्हारे बिना मैं इस पृथ्‍वीपर अपने परम प्रिय प्राणोंका भी परित्याग कर दूँगा ।। १४ ।।

यथाहं पुत्रशोकेन देहं त्यक्ष्यामि किल्बिषी ।
तथा ज्येष्ठः सुतो रैभ्यं हिंस्याच्छीघ्रमनागसम् ।। १५ ।।
जैसे मैं पापी अपने पुत्रके शोकसे व्याकुल हो अपने शरीरका त्याग कर रहा हूँ, उसी प्रकार रैभ्यका ज्येष्ठ पुत्र अपने निरपराध पिताकी शीघ्र हत्या कर डालेगा ।। १५ ।।

सुखिनो वै नरा येषां जात्या पुत्रो न विद्यते ।
ते पुत्रशोकमप्राप्य विचरन्ति यथासुखम् ।। १६ ।।
संसारमें वे मनुष्य सुखी हैं, जिन्हें पुत्र पैदा ही नहीं हुआ है; क्योंकि वे पुत्रशोकका अनुभव न करके सदा सुखपूर्वक विचरते हैं ।। १६ ।।

ये तु पुत्रकृताच्छोकाद् भृशं व्याकुलचेतसः ।
शपन्तीष्टान् सखीनार्तास्तेभ्यः पापतरो नु कः ।। १७ ।।
जो पुत्रशोकसे मन-ही-मन व्याकुल हो गहरी व्यथाका अनुभव करते हुए अपने प्रिय मित्रोंको भी शाप दे डालते हैं, उनसे बढ़कर महापापी दूसरा कौन हो सकता है? ।। १७ ।।

परासुश्च सुतो दृष्टः शप्तश्चेष्टः सखा मया ।
ईदृशीमापदं कोऽत्र द्वितीयोऽनुभविष्यति ।। १८ ।।
मैंने अपने पुत्रकी मृत्यु देखी और प्रिय मित्रको शाप दे दिया। मेरे सिवा संसारमें दूसरा कौन-सा मनुष्य है जो ऐसी विपत्तिका अनुभव करेगा ।। १८ ।।

लोमश उवाच

विलप्यैवं बहुविधं भरद्वाजोऽदहत् सुतम् ।
सुसमिद्धं ततः पश्चात् प्रविवेश हुताशनम् ।। १९ ।।
लोमशजी कहते हैं— युधिष्ठिर! इस तरह भाँति-भाँतिके विलाप करके भरद्वाजने अपने पुत्रका दाह-संस्कार किया। तत्पश्चात् स्वयं भी वे जलती आगमें प्रवेश कर गये ।।

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां यवक्रीतोपाख्याने सप्तत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ।। १३७ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें यवक्रीतोपाख्यानविषयक एक सौ सैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १३७ ।।


१३८-

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अष्टात्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः

अर्वावसुकी तपस्याके प्रभावसे परावसुका ब्रह्महत्यासे मुक्त होना और रैभ्य, भरद्वाज तथा यवक्रीत आदिका पुनर्जीवित होना

लोमश उवाच

एतस्मिन्नेव काले तु बृहद्द्युम्नो महीपतिः ।
सत्रं तेने महाभागो रैभ्ययाज्यः प्रतापवान् ॥ १ ॥
लोमशजी कहते हैं—युधिष्ठिर! इन्हीं दिनों महान् सौभाग्यशाली एवं प्रतापी नरेश बृहद्द्युम्नने एक यज्ञका अनुष्ठान आरम्भ किया। वे रैभ्यके यजमान थे ॥ १ ॥

तेन रैभ्यस्य वै पुत्रावर्वावसुपरावसू ।
वृतौ सहायौ सत्रार्थं बृहद्द्युम्नेन धीमता ॥ २ ॥
बुद्धिमान् बृहद्द्युम्नने यज्ञकी पूर्तिके लिये रैभ्यके दोनों पुत्र अर्वावसु तथा परावसुको सहयोगी बनाया ॥ २ ॥

तत्र तौ समनुज्ञातौ पित्रा कौन्तेय जग्मतुः ।
आश्रमे त्वभवद् रैभ्यो भार्या चैव परावसोः ॥ ३ ॥
अथावलोककोऽगच्छद् गृहानेकः परावसुः ।
कृष्णाजिनेन संवीतं ददर्श पितरं वने ॥ ४ ॥
कुन्तीनन्दन! पिताकी आज्ञा पाकर वे दोनों भाई राजाके यज्ञमें चले गये। आश्रममें केवल रैभ्य मुनि तथा उनके पुत्र परावसुकी पत्नी रह गयी। एक दिन घरकी देख-भाल करनेके लिये परावसु अकेले ही आश्रमपर आये। उस समय उन्होंने काले मृगचर्मसे ढके हुए अपने पिताको वनमें देखा ॥ ३-४ ॥

जघन्यरात्रे निद्रान्धः सावशेषे तमस्यपि ।
चरन्तं गहनेऽरण्ये मेने स पितरं मृगम् ॥ ५ ॥
रातका पिछला पहर बीत रहा था और अभी अन्धकार शेष था। परावसु नींदसे अन्धे हो रहे थे; अतः उन्होंने गहन वनमें विचरते हुए अपने पिताको हिंसक पशु ही समझा ॥ ५ ॥

मृगं तु मन्यमानेन पिता वै तेन हिंसितः ।
अकामयानेन तदा शरीरत्राणमिच्छता ॥ ६ ॥
और उसे हिंसक पशु समझकर धोखेसे ही उन्होंने अपने पिताकी हत्या कर डाली। यद्यपि वे ऐसा करना नहीं चाहते थे, तथापि हिंसक पशुसे अपने शरीरकी रक्षाके लिये

उनके द्वारा यह क्रूरतापूर्ण कार्य बन गया॥ ६॥ तस्य स प्रेतकार्याणि कृत्वा सर्वाणि भारत। पुनरागम्य तत् सत्रमब्रवीद् भ्रातरं वचः॥ ७॥ इदं कर्म न शक्तस्त्वं वोढुमेकः कथंचन। मया तु हिंसितस्तातो मन्यमानेन तं मृगम्॥ ८॥ सोऽस्मदर्थे व्रतं तात चर त्वं ब्रह्महिंसनम्। समर्थोऽप्यहमेकाकी कर्म कर्तुमिदं मुने॥ ९॥ भारत! उसने पिताके समस्त प्रेतकर्म करके पुनः यज्ञमण्डपमें आकर अपने भाई अर्वावसुसे कहा—‘भैया! वह यज्ञकर्म तुम अकेले किसी प्रकार निभा नहीं सकते। इधर मैंने हिंसक पशु समझकर धोखेसे पिताजीकी हत्या कर डाली है; इसलिये तात! तुम तो मेरे लिये ब्रह्महत्यानिवारणके हेतु व्रत करो और मैं राजाका यज्ञ कराऊँगा। मुने! मैं अकेला भी इस कार्यका सम्पादन करनेमें समर्थ हूँ’॥ ७—९॥

अर्वावसुरुवाच करोतु वै भवान् सत्रं बृहद्द्युम्नस्य धीमतः। ब्रह्मवध्यां चरिष्येऽहं त्वदर्थं नियतेन्द्रियः॥ १०॥ अर्वावसु बोले—भाई! आप परम बुद्धिमान् राजा बृहद्द्युम्नका यज्ञकार्य सम्पन्न करें और मैं आपके लिये इन्द्रियसंयमपूर्वक ब्रह्महत्याका प्रायश्चित्त करूँगा॥

लोमश उवाच स तस्य ब्रह्मवध्यायाः पारं गत्वा युधिष्ठिर। अर्वावसुस्तदा सत्रमाजगाम पुनर्मुनिः॥ ११॥ ततः परावसुर्दृष्ट्वा भ्रातरं समुपस्थितम्। बृहद्द्युम्नमुवाचेदं वचनं हर्षगद्गदम्॥ १२॥ एष ते ब्रह्महा यज्ञं मा द्रष्टुं प्रविशेदिति। ब्रह्महा प्रेक्षितेनापि पीडयेत् त्वामसंशयम्॥ १३॥ लोमशजी कहते हैं—युधिष्ठिर! अर्वावसु मुनि भाईके लिये ब्रह्महत्याका प्रायश्चित्त पूरा करके पुनः उस यज्ञमें आये। परावसुने अपने भाईको वहाँ उपस्थित देखकर राजा बृहद्द्युम्नसे हर्षगद्गद वाणीमें कहा—‘राजन्! यह ब्रह्महत्यारा है। अतः इसे आपका यज्ञ देखनेके लिये इस मण्डपमें प्रवेश नहीं करना चाहिये। ब्रह्मघाती मनुष्य अपनी दृष्टिमात्रसे भी आपको महान् कष्टमें डाल सकता है, इसमें संशय नहीं है’॥ ११—१३॥

लोमश उवाच तच्छ्रुत्वैव तदा राजा प्रेष्यानाह स विट्पते।

प्रेष्यैरूत्सार्यमाणस्तु राजन्नर्वावसुस्तदा ॥ १४ ॥
न मया ब्रह्महत्येयं कृतेत्याह पुनः पुनः ।
उच्यमानोऽसकृत्प्रेष्यैर्ब्रह्महन्निति भारत ॥ १५ ॥
**लोमशजी कहते हैं—**प्रजानाथ! परावसुकी यह बात सुनते ही राजाने अपने सेवकोंको यह आज्ञा दी कि ‘अर्वावसुको भीतर न आने दो।’ राजन्! उस समय सेवकोंद्वारा हटाये जानेपर अर्वावसुने बार-बार यह कहा कि ‘मैंने ब्रह्महत्या नहीं की है।’ भारत! तो भी राजाके सेवक उन्हें ब्रह्महत्यारा कहकर ही सम्बोधित करते थे ॥ १४-१५ ॥

नैव स्म प्रतिजानाति ब्रह्मवध्यां स्वयंकृताम् ।
मम भ्रात्रा कृतमिदं मया स परिमोक्षितः ॥ १६ ॥
अर्वावसु किसी तरह उस ब्रह्महत्याको अपनी की हुई स्वीकार नहीं करते थे। उन्होंने बार-बार यही बतानेकी चेष्टा की कि ‘मेरे भाईने ब्रह्महत्या की है। मैंने तो प्रायश्चित्त करके उन्हें पापसे छुड़ाया है’ ॥ १६ ॥

स तथा प्रवदन् क्रोधात् तैश्च प्रेष्यैः प्रभाषितः ।
तूष्णीं जगाम ब्रह्मर्षिर्वनमेव महातपाः ॥ १७ ॥
उनके ऐसा कहनेपर भी राजाके सेवकोंने उन्हें क्रोधपूर्वक फटकार दिया। तब वे महातपस्वी ब्रह्मर्षि चुपचाप वनको ही चले गये ॥ १७ ॥

उग्रं तपः समास्थाय दिवाकरमथाश्रितः ।
रहस्यवेदं कृतवान् सूर्यस्य द्विजसत्तमः ॥ १८ ॥
मूर्तिमांस्तं ददर्शाथ स्वयमग्रभुगव्ययः ।
वहाँ जाकर उन्होंने भगवान् सूर्यकी शरण ली और बड़ी उग्र तपस्या करके उन ब्राह्मणशिरोमणिने सूर्यसम्बन्धी रहस्यमय वैदिक मन्त्रका अनुष्ठान किया। तदनन्तर अग्रभोजी एवं अविनाशी साक्षात् भगवान् सूर्यने साकाररूपमें प्रकट हो अर्वावसुको दर्शन दिया ॥ १८ १/२ ॥

लोमश उवाच

प्रीतास्तस्याभवन् देवाः कर्मणार्ववसोर्नृप ॥ १९ ॥
तं ते प्रवरयामासुर्निरासुश्च परावसुम् ।
ततो देवा वरं तस्मै ददुरग्निपुरोगमाः ॥ २० ॥
**लोमशजी कहते हैं—**राजन्! अर्वावसुके उस कार्यसे सूर्य आदि सब देवता उसपर प्रसन्न हो गये। उन्होंने अर्वावसुका यज्ञमें वरण कराया एवं परावसुको निकलवा दिया। तत्पश्चात् अग्नि-सूर्य आदि देवताओंने उन्हें वर देनेकी इच्छा प्रकट की ॥ १९-२० ॥

स चापि वरयामास पितुरुत्थानमात्मनः ।
अनागस्त्वं ततो भ्रातुः पितुश्चास्मरणं वधे ॥ २१ ॥

तब अर्वावसुने यह वर माँगा कि 'मेरे पिताजी जीवित हो जायें। मेरे भाई निर्दोष हों और उन्हें पिताके वधकी बात भूल जाय' ।। २१ ।।

भरद्वाजस्य चोत्थानं यवक्रीतस्य चोभयोः ।
प्रतिष्ठां चापि वेदस्य सौरस्य द्विजसत्तमः ।
एवमस्त्विति तं देवाः प्रोचुश्चापि वरान् ददुः ।। २२ ।।
साथ ही उन्होंने यह भी माँगा कि 'भरद्वाज तथा यवक्रीत दोनों जी उठें और इस सूर्यदेवतासम्बन्धी रहस्यमय वेदमन्त्रकी प्रतिष्ठा हो।' द्विजश्रेष्ठ अर्वावसुके इस प्रकार वर माँगनेपर देवता बोले—'ऐसा ही हो।' इस प्रकार उन्होंने पूर्वोक्त सभी वर दे दिये ।। २२ ।।

ततः प्रादुर्बभूवुस्ते सर्व एव युधिष्ठिर ।
अथाब्रवीद् यवक्रीतो देवानग्निपुरोगमान् ।। २३ ।।
समधीतं मया ब्रह्म व्रतानि चरितानि च ।
कथं च रैभ्यः शक्तो मामधीयानं तपस्विनम् ।। २४ ।।
तथायुक्तेन विधिना निहन्तुममरोत्तमाः ।
युधिष्ठिर! इसके बाद पूर्वोक्त सभी मुनि जीवित हो गये। उस समय यवक्रीतने अग्नि आदि सम्पूर्ण देवताओंसे पूछा—'देवेश्वरो! मैंने वेदका अध्ययन किया है, वेदोक्त व्रतोंका अनुष्ठान भी किया है। मैं स्वाध्यायशील और तपस्वी भी हूँ, तो भी रैभ्यमुनि इस प्रकार अनुचित रीतिसे मेरा वध करनेमें कैसे समर्थ हो सके' ।। २३-२४ १/२ ।।

देवा ऊचुः
मैवं कृथा यवक्रीत यथा वदसि वै मुने ।
ऋते गुरुमधीता हि सुखं वेदास्त्वया पुरा ।। २५ ।।
अनेन तु गुरून् दुःखान् तोषयित्वाऽऽत्मकर्मणा ।
कालेन महता क्लेशाद् ब्रह्माधिगतमुत्तमम् ।। २६ ।।
देवताओँने कहा—मुनि यवक्रीत! तुम जैसी बात कहते हो, वैसा न समझो। तुमने पूर्वकालमें बिना गुरुके ही सुखपूर्वक सब वेद पढ़े हैं और इन रैभ्यमुनिने बड़े क्लेश उठाकर अपने व्यवहारसे गुरुजनोंको संतुष्ट करके दीर्घकालतक कष्टसहनपूर्वक उत्तम वेदोंका ज्ञान प्राप्त किया है ।। २५-२६ ।।

लोमश उवाच
यवक्रीतमथोक्त्वैवं देवाः साग्निपुरोगमाः ।
संजीवयित्वा तान् सर्वान् पुनर्जग्मुस्त्रिविष्टपम् ।। २७ ।।
लोमशजी कहते हैं—राजन्! अग्नि आदि देवताओँने यवक्रीतसे ऐसा कहकर उन सबको नूतन जीवन प्रदान करके पुनः स्वर्गलोकको प्रस्थान किया ।। २७ ।।
आश्रमस्तस्य पुण्योऽयं सदापुष्पफलद्रुमः ।

अत्रोष्य राजशार्दूल सर्वं पापं प्रमोक्ष्यसि ॥ २८ ॥ नृपश्रेष्ठ! यह उन्हीं रैभ्यमुनिका पवित्र आश्रम है। यहाँके वृक्ष सदा फूल और फलोंसे लदे रहते हैं। यहाँ एक रात निवास करके तुम सब पापोंसे छूट जाओगे ॥ २८ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां यवक्रीतोपाख्याने अष्टात्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३८ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें यवक्रीतोपाख्यानविषयक एक सौ अड़तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १३८ ॥

१३९-

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एकोनचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः

पाण्डवोंकी उत्तराखण्ड-यात्रा और लोमशजीद्वारा उसकी दुर्गमताका कथन

लोमश उवाच

उशीरबीजं मैनाकं गिरिं श्वेतं च भारत ।
समतीतोऽसि कौन्तेय कालशैलं च पार्थिव ॥ १ ॥
लोमशजी कहते हैं— भरतनन्दन युधिष्ठिर! अब तुम उशीरबीज, मैनाक, श्वेत और कालशैल नामक पहाड़ोंको लाँघकर आगे बढ़ आये ॥ १ ॥

एषा गङ्गा सप्तविधा राजते भरतर्षभ ।
स्थानं विरजसं पुण्यं यत्राग्निर्नित्यमिध्यते ॥ २ ॥
भरतश्रेष्ठ! यह देखो गङ्गाजी सात धाराओंसे सुशोभित हो रही हैं। यह रजोगुणरहित पुण्यतीर्थ है, जहाँ सदा अग्निदेव प्रज्वलित रहते हैं ॥ २ ॥

एतद् वै मानुषेणाद्य न शक्यं द्रष्टुमद्भुतम् ।
समाधिं कुरुताव्यग्रास्तीर्थान्येतानि द्रक्ष्यथ ॥ ३ ॥
यह अद्भुत तीर्थ कोई मनुष्य नहीं देख सकता, अतः तुम सब लोग एकाग्रचित्त हो जाओ। व्यग्रताशून्य हृदयसे तुम इन सब तीर्थोंका दर्शन कर सकोगे ॥ ३ ॥

एतद् द्रक्ष्यसि देवानामाक्रीडं चरणाङ्कितम् ।
अतिक्रान्तोऽसि कौन्तेय कालशैलं च पर्वतम् ॥ ४ ॥
श्वेतं गिरिं प्रवेक्ष्यामो मन्दरं चैव पर्वतम् ।
यत्र मणिवरो यक्षः कुबेरश्चैव यक्षराट् ॥ ५ ॥
यह देवताओंकी क्रीडास्थली है, जो उनके चरणचिह्नोंसे अंकित है। एकाग्रचित्त होनेपर तुम्हें इसका भी दर्शन होगा। कुन्तीकुमार! अब तुम कालशैल पर्वतको लाँघकर आगे बढ़ आये। इसके बाद हम श्वेतगिरि (कैलास) तथा मन्दराचल पर्वतमें प्रवेश करेंगे, जहाँ मणिवर यक्ष और यक्षराज कुबेर निवास करते हैं ॥

अष्टाशीतिसहस्राणि गन्धर्वाः शीघ्रगामिनः ।
तथा किंपुरुषा राजन् यक्षाश्चैव चतुर्गुणाः ॥ ६ ॥
अनेकरूपसंस्थाना नानाप्रहरणाश्च ते ।
यक्षेन्द्रं मनुजश्रेष्ठ मणिभद्रमुपासते ॥ ७ ॥
राजन्! वहाँ तीव्रगतिसे चलनेवाले अट्ठासी हजार गन्धर्व और उनसे चौगुने किन्नर तथा यक्ष रहते हैं। उनके रूप एवं आकृति अनेक प्रकारकी हैं। वे भाँति-भाँतिके अस्त्र-शस्त्र

धारण करते हैं और यक्षराज मणिभद्रकी उपासनामें संलग्न रहते हैं ॥ ६-७ ॥
तेषामृद्धिरतीवात्र गतौ वायुसमाश्च ते ।
स्थानात् प्रच्यावयेयुर्ये देवराजमपि ध्रुवम् ॥ ८ ॥
यहाँ उनकी समृद्धि अतिशय बढ़ी हुई है। तीव्रगतिमें वे वायुकी समानता करते हैं। वे चाहें तो देवराज इन्द्रको भी निश्चय ही अपने स्थानसे हटा सकते हैं ॥ ८ ॥
तैस्तात बलिभिर्गुप्ता यातुधानैश्च रक्षिताः ।
दुर्गामाः पर्वताः पार्थ समाधिं परं कुरु ॥ ९ ॥
तात युधिष्ठिर! उन बलवान् यक्ष और राक्षसोंसे सुरक्षित रहनेके कारण ये पर्वत बड़े दुर्गम हैं। अतः तुम विशेषरूपसे एकाग्रचित्त हो जाओ ॥ ९ ॥
कुबेरसचिवाश्चान्ये रौद्रा मैत्राश्च राक्षसाः ।
तैः समेष्याम कौन्तेय संयतो विक्रमेण च ॥ १० ॥
कुबेरके सचिवगण तथा अन्य रौद्र और मैत्र नामक राक्षसोंका हमें सामना करना पड़ेगा; अतः तुम पराक्रमके लिये तैयार रहो ॥ १० ॥
कैलासः पर्वतो राजन् षड्योजनसमुच्छ्रितः ।
यत्र देवा समायान्ति विशाला यत्र भारत ॥ ११ ॥
राजन्! उधर छः योजन ऊँचा कैलासपर्वत दिखायी देता है जहाँ देवता आया करते हैं। भारत! उसीके निकट विशालापुरी (बदरिकाश्रमतीर्थ) है ॥ ११ ॥
असंख्येयास्तु कौन्तेय यक्षराक्षसकिन्नराः ।
नागाः सुपर्णा गन्धर्वाः कुबेरसदनं प्रति ॥ १२ ॥
कुन्तीनन्दन! कुबेरके भवनमें अनेक यक्ष, राक्षस, किन्नर, नाग, सुपर्ण तथा गन्धर्व निवास करते हैं ॥ १२ ॥
तान् विगाहस्व पार्थाद्य तपसा च दमेन च ।
रक्ष्यमाणो मया राजन् भीमसेनबलेन च ॥ १३ ॥
महाराज कुन्तीनन्दन! तुम भीमसेनके बल और मेरी तपस्यासे सुरक्षित हो तप एवं इन्द्रियसंयमपूर्वक रहते हुए आज उन तीर्थोंमें स्नान करो ॥ १३ ॥
स्वस्ति ते वरुणो राजा यमश्च समितंजयः ।
गङ्गा च यमुना चैव पर्वतश्च दधातु ते ॥ १४ ॥
राजा वरुण, युद्धविजयी यमराज, गंगा-यमुना तथा यह पर्वत तुम्हें कल्याण प्रदान करें ॥ १४ ॥
मरुतश्च सहाश्विभ्यां सरितश्च सरांसि च ।
स्वस्ति देवासुरेभ्यश्च वसुभ्यश्च महाद्युते ॥ १५ ॥
महाद्युते! मरुद्गण, अश्विनीकुमार, सरिताएँ और सरोवर भी तुम्हारा मंगल करें। देवताओं, असुरों तथा वसुओंसे भी तुम्हें कल्याणकी प्राप्ति हो ॥ १५ ॥

इन्द्रस्य जाम्बूनदपर्वताद् वै शृणोमि घोषं तव देवि गङ्गे । गोपायैनं त्वं सुभगे गिरिभ्यः सर्वाजमीढापचितं नरेन्द्रम् ॥ १६ ॥ देवि गंगे! मैं इन्द्रके सुवर्णमय मेरुपर्वतसे तुम्हारा कलकलनाद सुन रहा हूँ। सौभाग्यशालिनि! ये राजा युधिष्ठिर अजमीढवंशी क्षत्रियोंके लिये आदरणीय हैं। तुम पर्वतोंसे इनकी रक्षा कराओ ॥ १६ ॥

ददस्व शर्म प्रविविक्षतोऽस्य शैलानिमाञ्छैलसुते नृपस्य । उक्त्वा तथा सागरगां स विप्रो यत्तो भवस्वेति शशास पार्थम् ॥ १७ ॥ ‘शैलपुत्रि! ये इन पर्वतमालाओंमें प्रवेश करना चाहते हैं। तुम इन्हें कल्याण प्रदान करो।’ समुद्रगामिनी गंगानदीसे ऐसा कहकर विप्रवर लोमशने कुन्तीकुमार युधिष्ठिरको यह आदेश दिया कि ‘अब तुम एकाग्रचित्त हो जाओ’ ॥ १७ ॥

युधिष्ठिर उवाच

अपूर्वोऽयं सम्भ्रमो लोमशस्य कृष्णां च सर्वे रक्षत मा प्रमादम् । देशो ह्ययं दुर्गसमो मतोऽस्य तस्मात् परं शौचमिहाचरध्वम् ॥ १८ ॥ युधिष्ठिर बोले—बन्धुओ! आज महर्षि लोमशको बड़ी घबराहट हो रही है। यह एक अभूतपूर्व घटना है। अतः तुम सब लोग सावधान होकर द्रौपदीकी रक्षा करो। प्रमाद न करना। लोमशजीका मत है कि यह प्रदेश अत्यन्त दुर्गम है। अतः यहाँ अत्यन्त शुद्ध आचार-विचारसे रहो ॥ १८ ॥

वैशम्पायन उवाच

ततोऽब्रवीद् भीममुदारवीर्यं कृष्णां यत्तः पालय भीमसेन । शून्येऽर्जुनेऽसंनिहिते च तात त्वामेव कृष्णा भजते भयेषु ॥ १९ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तदनन्तर राजा युधिष्ठिर महाबली भीमसे इस प्रकार बोले—‘भैया भीमसेन! तुम सावधान रहकर द्रौपदीकी रक्षा करो। तात! किसी निर्जन प्रदेशमें जबकि अर्जुन हमारे समीप नहीं हैं भयका अवसर उपस्थित होनेपर द्रौपदी तुम्हारा ही आश्रय लेती है’ ॥ १९ ॥

ततो महात्मा स यमौ समेत्य मूर्ध्न्युपाघ्राय विमृज्य गात्रे । उवाच तौ बाष्पकलं स राजा मा भैष्टमागच्छतमप्रमत्तौ ॥ २० ॥

तत्पश्चात् महात्मा राजा युधिष्ठिरने नकुल-सहदेवके पास जाकर उनका मस्तक सूँघा और शरीरपर हाथ फेरा। फिर नेत्रोंसे आँसू बहाते हुए कहा—'भैया! तुम दोनों भय न करो और सावधान होकर आगे बढ़ो' ॥ २० ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां कैलासादिगिरिप्रवेशे एकोनचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३९ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें पाण्डवोंका कैलास आदि पर्वतमालाओंमें प्रवेशविषयक एक सौ उनतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १३९ ॥

भीमसेनका उत्साह तथा पाण्डवोंका कुलिन्दराज सुबाहुके राज्यमें होते हुए गन्धमादन और हिमालय पर्वतको प्रस्थान

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चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः

भीमसेनका उत्साह तथा पाण्डवोंका कुलिन्दराज सुबाहुके राज्यमें होते हुए गन्धमादन और हिमालय पर्वतको प्रस्थान

युधिष्ठिर उवाच

अन्तर्हितानि भूतानि बलवन्ति महान्ति च ।
अग्निना तपसा चैव शक्यं गन्तुं वृकोदर ॥ १ ॥
**युधिष्ठिर बोले—**भीमसेन! यहाँ बहुत-से बलवान् और विशालकाय राक्षस छिपे रहते हैं; अतः अग्निहोत्र एवं तपस्याके प्रभावसे ही हमलोग यहाँसे आगे बढ़ सकते हैं ॥ १ ॥

संनिवर्तय कौन्तेय क्षुत्पिपासे बलाश्रयात् ।
ततो बलं च दाक्ष्यं च संश्रयस्व वृकोदर ॥ २ ॥
वृकोदर! तुम बलका आश्रय लेकर अपनी भूख-प्यास मिटा दो। फिर शारीरिक शक्ति और चतुरताका सहारा लो ॥ २ ॥

ऋषेस्त्वया श्रुतं वाक्यं कैलासं पर्वतं प्रति ।
बुद्ध्या प्रपश्य कौन्तेय कथं कृष्णा गमिष्यति ॥ ३ ॥
भैया! कैलास पर्वतके विषयमें महर्षिने जो बात कही है, वह तुमने भी सुना ही है; अब स्वयं अपनी बुद्धिसे विचार करके देखो, द्रौपदी इस दुर्गम प्रदेशमें कैसे चल सकेगी? ॥ ३ ॥

अथवा सहदेवेन धौम्येन च समं विभो ।
सूतैः पौरोगवैश्चैव सर्वैश्च परिचारकैः ॥ ४ ॥
रथैरश्वैश्च ये चान्ये विप्राः क्लेशासहाः पथि ।
सर्वैस्त्वं सहितो भीम निवर्तस्वायतेक्षण ॥ ५ ॥
अथवा विशालनेत्रोंवाले भीम! तुम सहदेव, धौम्य, सारथि, रसोइये, समस्त सेवकगण, रथ, घोड़े तथा मार्गके कष्टको सहन न कर सकनेवाले जो अन्य ब्राह्मण हैं, उन सबके साथ यहींसे लौट जाओ ॥ ४-५ ॥

त्रयो वयं गमिष्यामो लघ्वाहारा यतव्रताः ।
अहं च नकुलश्चैव लोमशश्च महातपाः ॥ ६ ॥
ममागमनमाकाङ्क्षन् गङ्गाद्वारे समाहितः ।
वसेह द्रौपदीं रक्षन् यावदागमनं मम ॥ ७ ॥
केवल मैं, नकुल तथा महातपस्वी लोमशजी—ये तीन व्यक्ति ही संयम और व्रतका पालन करते हुए यहाँसे आगेकी यात्रा करेंगे। हम तीनों ही स्वल्पाहारसे जीवन-निर्वाह

करेंगे। तुम गङ्गाद्वार (हरिद्वार)-में एकाग्रचित्त हो मेरे आगमनकी प्रतीक्षा करो और जबतक मैं लौटकर न आऊँ, तबतक द्रौपदीकी रक्षा करते हुए वहीं निवास करो।। ६-७ ।।

भीम उवाच

राजपुत्री श्रमेणार्ता दुःखार्ता चैव भारत । व्रजत्येव हि कल्याणी श्वेतवाहदिदृक्षया ।। ८ ।। **भीमसेनने कहा—**भारत! राजकुमारी द्रौपदी यद्यपि रास्तेकी थकावटसे और मानसिक दुःखसे भी पीड़ित है; तो भी यह कल्याणमयी देवी अर्जुनको देखनेकी इच्छासे उत्साहपूर्वक हमारे साथ चल ही रही है ।। ८ ।। तव चाप्यरतिस्तीव्रा वर्तते तमपश्यतः । गुडाकेशं महात्मानं संग्रामेष्वपलायिनम् ।। ९ ।। संग्राममें कभी पीठ न दिखानेवाले निद्राविजयी महात्मा अर्जुनको न देखनेके कारण आपके मनमें भी अत्यन्त खिन्नता हो रही है ।। ९ ।। किं पुनः सहदेवं च मां च कृष्णां च भारत । द्विजाः कामं निवर्तन्तां सर्वे च परिचारकाः ।। १० ।। सूताः पौरोगवाश्चैव यं च मन्येत नो भवान् । न ह्यहं हातुमिच्छामि भवन्तमिह कर्हिचित् ।। ११ ।। शैलेऽस्मिन् राक्षसाकीर्णे दुर्गेषु विषमेषु च । इयं चापि महाभागा राजपुत्री पतिव्रता ।। १२ ।। त्वामृते पुरुषव्याघ्र नोत्सहेद् विनिवर्तितुम् । तथैव सहदेवोऽयं सततं त्वामनुव्रतः ।। १३ ।। न जातु विनिवर्तेत मनोज्ञो ह्यहमस्य वै । अपि चात्र महाराज सव्यसाचिदिदृक्षया ।। १४ ।। सर्वे लालसभूताः स्म तस्माद् यास्यामहे सह । यद्यशक्यो रथैर्गन्तुं शैलोऽयं बहुकन्दरः ।। १५ ।। पद्भिरैव गमिष्यामो मा राजन् विमना भव । अहं वहिष्ये पाञ्चालीं यत्र यत्र न शक्ष्यति ।। १६ ।। फिर सहदेवके, मेरे तथा द्रौपदीके लिये तो कहना ही क्या है? भारत! ये ब्राह्मणलोग चाहें तो यहाँसे लौट सकते हैं। समस्त सेवक, सारथि, रसोइये तथा हममेंसे और जिस-जिसको आप लौटाना उचित समझें-वे सभी जा सकते हैं। राक्षसोंसे भरे हुए इस पर्वतपर तथा ऊँचे-नीचे दुर्गम प्रदेशोंमें मैं आपको कदापि अकेला छोड़ना नहीं चाहता। नरश्रेष्ठ! यह परम सौभाग्यवती पतिव्रता राजकुमारी कृष्णा भी आपको छोड़कर लौटनेको कभी तैयार न होंगी। इसी प्रकार यह सहदेव भी आपमें सदा अनुराग रखनेवाला है, आपको छोड़कर

कभी नहीं लौटेगा। मैं इसके मनकी बात जानता हूँ। महाराज! सव्यसाची अर्जुनको देखनेकी इच्छासे हम सभी लालायित हो रहे हैं; अतः सब साथ ही चलेंगे। राजन्! अनेक कन्दराओंसे युक्त इस पर्वतपर यदि रथोंके द्वारा यात्रा सम्भव न हो तो हम पैदल ही चलेंगे। आप इसके लिये उदास न हों। जहाँ-जहाँ द्रौपदी नहीं चल सकेगी वहाँ-वहाँ मैं स्वयं इसे कंधेपर चढ़ाकर ले जाऊँगा॥ १०—१६॥

इति मे वर्तते बुद्धिर्मा राजन् विमना भव ।
सुकुमारौ तथा वीरौ माद्रीनन्दिकरावुभौ ।
दुर्गे संतारयिष्यामि यत्राशक्तौ भविष्यतः ॥ १७ ॥

राजन्! मेरा ऐसा ही विचार है, आप उदास न हों। वीर माद्रीकुमार नकुल और सहदेव दोनों सुकुमार हैं। जहाँ कहीं दुर्गम स्थानमें ये असमर्थ हो जायँगे वहाँ मैं इन्हें पार लगाऊँगा ॥ १७ ॥

युधिष्ठिर उवाच

एवं ते भाषमाणस्य बलं भीमाभिवर्धताम् ।
यत् त्वमुत्सहसे वोढुं पाञ्चालीं च यशस्विनीम् ॥ १८ ॥
यमजौ चापि भद्रं ते नैतदन्यत्र विद्यते ।
बलं तव यशश्चैव धर्मः कीर्तिश्च वर्धताम् ॥ १९ ॥
यत् त्वमुत्सहसे नेतुं भ्रातरौ सह कृष्णया ।
मा ते ग्लानिर्महाबाहो मा च तेऽस्तु पराभवः ॥ २० ॥

**युधिष्ठिर बोले—**भीमसेन! इस प्रकार (उत्साहपूर्ण) बातें करते हुए तुम्हारा बल बढ़े, क्योंकि तुम यशस्विनी द्रौपदी तथा नकुल-सहदेवको भी वहन करके ले चलनेका उत्साह रखते हो। तुम्हारा कल्याण हो। यह साहस तुम्हारे सिवा और किसीमें नहीं है। तुम्हारे बल, यश, धर्म और कीर्तिका विस्तार हो। महाबाहो! तुम द्रौपदीसहित दोनों भाई नकुल-सहदेवको भी स्वयं ही ले चलनेकी शक्ति रखते हो, इसलिये कभी तुम्हें ग्लानि न हो तथा किसीसे भी तुम्हें तिरस्कृत न होना पड़े ॥ १८—२० ॥

वैशम्पायन उवाच

ततः कृष्णाब्रवीद् वाक्यं प्रहसन्ती मनोरमा ।
गमिष्यामि न संतापः कार्यो मां प्रति भारत ॥ २१ ॥

**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तब सुन्दरी द्रौपदीने हँसते हुए कहा—'भारत! मैं आपके साथ ही चलूँगी; आप मेरे लिये चिन्ता न करें' ॥ २१ ॥

लोमश उवाच

तपसा शक्यते गन्तुं पर्वतो गन्धमादनः ।

तपसा चैव कौन्तेय सर्वे योक्ष्यामहे वयम् ॥ २२ ॥
नकुलः सहदेवश्च भीमसेनश्च पार्थिव ।
अहं च त्वं च कौन्तेय द्रक्ष्यामः श्वेतवाहनम् ॥ २३ ॥
लोमशजीने कहा— कुन्तीनन्दन! गन्धमादन पर्वतपर तपस्याके बलसे ही जाया जा सकता है। हम सब लोगोंको तपःशक्तिका संचय करना होगा। महाराज! नकुल, सहदेव, भीमसेन, मैं और तुम सभी लोग तपोबलसे ही अर्जुनको देख सकेंगे ॥ २२-२३ ॥

वैशम्पायन उवाच

एवं सम्भाषमाणास्ते सुबाहुविषयं महत् ।
ददृशुर्मुदिता राजन् प्रभूतगजवाजिमत् ॥ २४ ॥
किराततङ्कणाकीर्णं पुलिन्दशतसंकुलम् ।
हिमवत्यमरैर्जुष्टं बह्वाश्चर्यसमाकुलम् ।
सुबाहुश्चापि तान् दृष्ट्वा पूजया प्रत्यगृह्णत ॥ २५ ॥
विषयान्ते कुलिन्दानामीश्वरः प्रीतिपूर्वकम् ।
ततस्ते पूजितास्तेन सर्व एव सुखोषिताः ॥ २६ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! इस प्रकार बातचीत करते हुए वे सब लोग आगे बढ़े। कुछ दूर जानेपर उन्हें कुलिन्दराज सुबाहुका विशाल राज्य दिखायी दिया, जहाँ हाथी-घोड़ोंकी बहुतायत थी, और सैकड़ों किरात, तंगण एवं कुलिन्द आदि जंगली जातियोंके लोग निवास करते थे। वह देवताओंसे सेवित देश हिमालयके अत्यन्त समीप था। वहाँ अनेक प्रकारकी आश्चर्यजनक वस्तुएँ दिखायी देती थीं। सुबाहुका वह राज्य देखकर उन सबको बड़ी प्रसन्नता हुई। कुलिन्दोंके राजा सुबाहुको जब यह पता लगा कि मेरे राज्यमें पाण्डव आये हैं, तब उसने राज्यकी सीमापर जाकर बड़े आदर-सत्कारके साथ उन्हें अपनाया। उसके द्वारा प्रेमसे पूजित होकर वे सब लोग बड़े सुखसे वहाँ रहे ॥ २४—२६ ॥

प्रतस्थुर्विमले सूर्ये हिमवन्तं गिरिं प्रति ।
इन्द्रसेनमुखांश्चापि भृत्यान् पौरोगवांस्तथा ॥ २७ ॥
सूदांश्च पारिबर्हांश्च द्रौपद्याः सर्वशो नृप ।
राज्ञः कुलिन्दाधिपतेः परिदाय महारथाः ॥ २८ ॥
पद्भिरैव महावीर्या ययुः कौरवनन्दनाः ।
ते शनैः प्राद्रवन् सर्वे कृष्णया सह पाण्डवाः ।
तस्माद् देशात् सुसंहृष्टा द्रष्टुकामा धनंजयम् ॥ २९ ॥
दूसरे दिन निर्मल प्रभातकालमें सूर्योदय होनेपर उन सबने हिमालय पर्वतकी ओर प्रस्थान किया। जनमेजय! इन्द्रसेन आदि सेवकों, रसोइयों और पाक-शालाके अध्यक्षको तथा द्रौपदीके सारे सामानोंको कुलिन्दराज सुबाहुके यहाँ सौंपकर वे महापराक्रमी महारथी

कुरुकुलनन्दन पाण्डव द्रौपदीके साथ धीरे-धीरे पैदल ही चल दिये। उनके मनमें अर्जुनको देखनेकी बड़ी उत्कण्ठा थी। अतः वे बड़े हर्ष और उल्लासके साथ उस देशसे प्रस्थित हुए॥ २७—२९॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां गन्धमादनप्रवेशे चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः॥ १४०॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें गन्धमादनप्रवेशविषयक एक सौ चालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १४०॥

युधिष्ठिरका भीमसेनसे अर्जुनको न देखनेके कारण मानसिक चिन्ता प्रकट करना एवं उनके गुणोंका स्मरण करते हुए गन्धमादन पर्वतपर जानेका दृढ़ निश्चय करना

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एकचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः

युधिष्ठिरका भीमसेनसे अर्जुनको न देखनेके कारण मानसिक चिन्ता प्रकट करना एवं उनके गुणोंका स्मरण करते हुए गन्धमादन पर्वतपर जानेका दृढ़ निश्चय करना

युधिष्ठिर उवाच

भीमसेन यमौ चोभौ पाञ्चालि च निबोधत ।
नास्ति भूतस्य नाशो वै पश्यतास्मान् वनेचरान् ॥ १ ॥
युधिष्ठिर बोले— भीमसेन, नकुल-सहदेव और द्रौपदी! तुम सब लोग ध्यान देकर सुनो। यह निश्चय है कि पूर्वकृत कर्मोंका बिना भोगे कभी नाश नहीं होता। देखो, उन्हींके कारण आज हम राजकुमार होकर भी वन-वनमें भटक रहे हैं ॥ १ ॥

दुर्बलाः क्लेशिताः स्मेति यद् ब्रुवामेतरेतरम् ।
अशक्येऽपि व्रजामो यद् धनंजयदिदृक्षया ॥ २ ॥
यद्यपि हमलोग दुर्बल हैं, क्लेशमें पड़े हुए हैं, तथापि जो एक-दूसरेसे उत्साहपूर्वक बातें करते हैं और जहाँ जाना सम्भव नहीं उस मार्गपर भी आगे बढ़ते जा रहे हैं, उसमें एक ही कारण है, हम सबके हृदयमें अर्जुनको देखनेके लिये प्रबल उत्कण्ठा है ॥ २ ॥

तन्मे दहति गात्राणि तूलराशिमिवानलः ।
यच्च वीरं न पश्यामि धनंजयमुपान्तिकात् ॥ ३ ॥
इतना प्रयास करनेपर भी मैं वीर धनंजयको जो अबतक अपने समीप नहीं देख पा रहा हूँ, इसकी चिन्ता मेरे सम्पूर्ण अंगोंको उसी प्रकार दग्ध कर रही है, जैसे आग रूईके ढेरको जलाती रहती है ॥ ३ ॥

तस्य दर्शनतृष्णं मां सानुजं वनमास्थितम् ।
याज्ञसेन्याः परामर्शः स च वीर दहत्युत ॥ ४ ॥
उसीके दर्शनकी प्यास लेकर मैं भाइयोंसहित इस वनमें आया हूँ। वीर भीमसेन! दुःशासनने जो द्रौपदीके केश पकड़ लिये थे, वह घटना याद आकर मुझे और भी शोकसे दग्ध कर देती है ॥ ४ ॥

नकुलात् पूर्वजं पार्थं न पश्याम्यमितौजसम् ।
अजेयमुग्रधन्वानं तेन तप्ये वृकोदर ॥ ५ ॥
वृकोदर! भयंकर धनुष धारण करनेवाले अजेय वीर अमिततेजस्वी अर्जुनको जो नकुलसे पहले उत्पन्न हुआ है, मैं अबतक नहीं देख रहा हूँ, इसके कारण मुझे बड़ा संताप हो रहा है ॥ ५ ॥

तीर्थानि चैव रम्याणि वनानि च सरांसि च । चरामि सह युष्माभिस्तस्य दर्शनकाङ्क्षया ॥ ६ ॥ अर्जुनको देखनेकी ही अभिलाषासे मैं तुमलोगोंके साथ विभिन्न तीर्थोंमें, रमणीय वनोंमें और सुन्दर सरोवरोंके तटपर विचर रहा हूँ ॥ ६ ॥ पञ्चवर्षाण्यहं वीरं सत्यसंधं धनंजयम् । यन्न पश्यामि बीभत्सुं तेन तप्ये वृकोदर ॥ ७ ॥ भीमसेन! आज पाँच वर्ष हो गये, मैं अपने वीर भाई सत्यप्रतिज्ञ अर्जुनके दर्शनसे वंचित हो गया हूँ। इसके कारण मुझे बड़ी चिन्ता हो रही है ॥ ७ ॥ तं वै श्यामं गुडाकेशं सिंहविक्रान्तगामिनम् । न पश्यामि महाबाहुं तेन तप्ये वृकोदर ॥ ८ ॥ वृकोदर! सिंहके समान मस्तानी चालसे चलनेवाले, निद्राविजयी, श्यामवर्ण, महाबाहु अर्जुनको नहीं देख पा रहा हूँ, इसलिये मेरे मनमें बड़ा संताप हो रहा है ॥ ८ ॥ कृतास्त्रं निपुणं युद्धेऽप्रतिमानं धनुष्मताम् । न पश्यामि कुरुश्रेष्ठ तेन तप्ये वृकोदर ॥ ९ ॥ कुरुश्रेष्ठ भीमसेन! अस्त्रविद्यामें प्रवीण, युद्धकुशल और अनुपम धनुर्धर उस अर्जुनको नहीं देखता हूँ, इस कारण मुझे बड़ा कष्ट होता है ॥ ९ ॥ चरन्तमरिसंघेषु काले क्रुद्धमिवान्तकम् । प्रभिन्नमिव मातङ्गं सिंहस्कन्धं धनंजयम् ॥ १० ॥ जो युद्धके समय शत्रुओंके समूहमें कुपित यमराजकी भाँति विचरता है, जिसके कंधे सिंहके समान हैं तथा जो मदकी धारा बहानेवाले मत्त गजराजके समान शोभा पाता है, उस वीर धनंजयसे अबतक भेंट न हो सकी; इसका मुझे बड़ा दुःख है ॥ १० ॥ यः स शक्रादनवरो वीर्येण द्रविणेन च । यमयोः पूर्वजः पार्थः श्वेताश्वोऽमितविक्रमः ॥ ११ ॥ दुःखेन महताविष्टस्तं न पश्यामि फाल्गुनम् । अजेयमुग्रधन्वानं तेन तप्ये वृकोदर ॥ १२ ॥ वृकोदर! जो पराक्रम और सम्पत्तिमें देवराज इन्द्रसे तनिक भी कम नहीं है, जिसके रथके घोड़े श्वेत रंगके हैं, जो नकुल-सहदेवसे अवस्थामें बड़ा है, जिसके पराक्रमकी कोई सीमा नहीं है तथा जो उग्र धनुर्धर एवं अजेय है, उस वीरवर अर्जुनके दर्शनसे मैं वंचित हूँ; इसके लिये मुझे महान कष्ट हो रहा है। मैं चिन्ताकी आगमें जला जा रहा हूँ ॥ ११-१२ ॥ सततं यः क्षमाशीलः क्षिप्यमाणोऽप्यणीयसा । ऋजुमार्गप्रपन्नस्य शर्मदाताभयस्य च ॥ १३ ॥ स तु जिह्मप्रवृत्तस्य माययाभिजिघांसतः । अपि वज्रधरस्यापि भवेत् कालविषोपमः ॥ १४ ॥