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महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

रथोंपर बैठकर पाण्डवोंपर चढ़ आये और रणक्षेत्रमें उनकी सेनाको कँपाने लगे ॥ ५-६ ॥
सा वध्यमाना समरे पाण्डुसेना महात्मभिः ।
भ्राम्यते बहुधा राजन् मारुतेनेव नौर्जले ॥ ७ ॥
राजन्! जैसे वायुके थपेड़े खाकर नौका जलमें चक्कर काटने लगती है, उसी प्रकार उन महामनस्वी वीरोंद्वारा समरांगणमें मारी जाती हुई पाण्डवसेना बहुधा इधर-उधर भटक रही थी ॥ ७ ॥
यथा हि शैशिरः कालो गवां मर्माणि कृन्तति ।
तथा पाण्डुसुतानां वै भीष्मो मर्माणि कृन्तति ॥ ८ ॥
जैसे शिशिरकाल गौओंके मर्मस्थानोंका उच्छेद करने लगता है, उसी प्रकार भीष्म पाण्डवोंके मर्मस्थानोंको विदीर्ण करने लगे ॥ ८ ॥
तथैव तव सैन्यस्य पार्थेन च महात्मना ।
नवमेघप्रतीकाशाः पातिता बहुधा गजाः ॥ ९ ॥
इसी प्रकार महात्मा अर्जुनने आपकी सेनाके नूतन मेघके समान काले रंगवाले बहुत-से हाथी मार गिराये ॥ ९ ॥
मृद्यमानाश्च दृश्यन्ते पार्थेन नरयूथपाः ।
इषुभिस्ताड्यमानाश्च नाराचैश्च सहस्रशः ॥ १० ॥
पेतुरार्तस्वरं घोरं कृत्वा तत्र महागजाः ।
अर्जुनके द्वारा बहुत-से पैदलोंके यूथपति मिट्टीमें मिलते दिखायी दे रहे थे। नाराचों और बाणोंसे पीड़ित हुए सहस्रों महान् गज घोर आर्तनाद करके पृथ्वीपर गिर रहे थे ॥ १० १/२ ॥
आनद्धाभरणैः कायैर्निहतानां महात्मनाम् ॥ ११ ॥
छन्नमायोधनं रेजे शिरोभिश्च सकुण्डलैः ।
मारे गये महामनस्वी वीरोंके आभूषणभूषित शरीरों और कुण्डलमण्डित मस्तकोंसे आच्छादित हुई वह रणभूमि बड़ी शोभा पा रही थी ॥ ११ १/२ ॥
तस्मिन्नेव महाराज महावीरवरक्षये ॥ १२ ॥
भीष्मे च युधि विक्रान्ते पाण्डवे च धनंजये ।
ते पराक्रान्तमालोक्य राजन् युधि पितामहम् ॥ १३ ॥
अभ्यवर्तन्त ते पुत्राः सर्वे सैन्यपुरस्कृताः ।
इच्छन्तो निधनं युद्धे स्वर्गं कृत्वा परायणम् ॥ १४ ॥
पाण्डवानभ्यवर्तन्त तस्मिन् वीरवरक्षये ।
महाराज! बड़े-बड़े वीरोंका विनाश करनेवाले उस महायुद्धमें जब एक ओर भीष्म और दूसरी ओर पाण्डुनन्दन धनंजय पराक्रम प्रकट कर रहे थे, उस समय पितामह भीष्मको महान् पराक्रममें प्रवृत्त देख आपके सभी पुत्र सेनाओंके साथ स्वर्गको अपना परम लक्ष्य बनाकर युद्धमें मृत्यु चाहते हुए पाण्डवोंपर चढ़ आये ॥ १२—१४ १/२ ॥

पाण्डवाऽपि महाराज स्मरन्तो विविधान् बहून् ॥ १५ ॥
क्लेशान् कृतान् सपुत्रेण त्वया पूर्वं नराधिप ।
भयं त्यक्त्वा रणे शूरा ब्रह्मलोकाय तत्पराः ॥ १६ ॥
तावकांस्तव पुत्रांश्च योधयन्ति प्रहृष्टवत् ।
राजन्! नरेश्वर! शूरवीर पाण्डव भी पुत्रोंसहित आपके दिये हुए नाना प्रकारके अनेक क्लेशोंका स्मरण करके युद्धमें भय छोड़कर ब्रह्मलोक जानेके लिये उत्सुक हो बड़ी प्रसन्नताके साथ आपके सैनिकों और पुत्रोंके साथ युद्ध करने लगे ॥ १५-१६ १/२ ॥

सेनापतिस्तु समरे प्राह सेनां महारथः ॥ १७ ॥
अभिद्रवत गाङ्गेयं सोमकाः सृञ्जयैः सह ।
उस समय समरभूमिमें पाण्डव-सेनापति महारथी धृष्टद्युम्नने अपनी सेनासे कहा—'सोमको! तुम सृंजय वीरोंको साथ लेकर गङ्गानन्दन भीष्मपर टूट पड़ो' ॥

सेनापतिवचः श्रुत्वा सोमकाः सृञ्जयाश्च ते ॥ १८ ॥
अभ्यद्रवन्त गाङ्गेयं शरवृष्ट्या समाहताः ।
सेनापतिकी यह बात सुनकर सोमक और सृंजय वीर बाणोंकी भारी वर्षासे घायल होनेपर भी गङ्गानन्दन भीष्मकी ओर दौड़े ॥ १८ १/२ ॥

वध्यमानस्ततो राजन् पिता शान्तनवस्तव ॥ १९ ॥
अमर्षवशमापन्नो योधयामास सृञ्जयान् ।
राजन्! तब आपके पितृतुल्य शान्तनुनन्दन भीष्म बाणोंकी मार खाकर अमर्षमें भर गये और सृंजयोंके साथ युद्ध करने लगे ॥ १९ १/२ ॥

तस्य कीर्तिमत्तस्तात पुरा रामेण धीमता ॥ २० ॥
सम्प्रदत्तास्त्रशिक्षा वै परानीकविनाशिनी ।
स तां शिक्षामधिष्ठाय कुर्वन् परबलक्षयम् ॥ २१ ॥
अहन्यहनि पार्थानां वृद्धः कुरुपितामहः ।
भीष्मो दश सहस्राणि जघान परवीरहा ॥ २२ ॥
तात! पूर्वकालमें परम बुद्धिमान् परशुरामजीने उन यशस्वी भीष्मको शत्रु-सेनाका विनाश करनेवाली जो अस्त्रशिक्षा प्रदान की थी, उसका आश्रय लेकर पाण्डवपक्षीय शत्रु-सेनाका संहार करते हुए कुरुकुलके वृद्ध पितामह एवं शत्रुवीरोंका नाश करनेवाले भीष्म नित्यप्रति दस हजार मुख्य योद्धाओंका वध करते आ रहे थे ॥ २०—२२ ॥

तस्मिंस्तु दशमे प्राप्ते दिवसे भरतर्षभ ।
भीष्मेणैकेन मत्स्येषु पञ्चालेषु च संयुगे ॥ २३ ॥
गजाश्वममितं हत्वा हताः सप्त महारथाः ।
हत्वा पञ्च सहस्राणि रथानां प्रपितामहः ॥ २४ ॥
नराणां च महायुद्धे सहस्राणि चतुर्दश ।

दन्तिनां च सहस्राणि हयानामयुतं पुनः ॥ २५ ॥ शिक्षाबलेन निहतं पित्रा तव विशाम्पते । भरतश्रेष्ठ! उस दसवें दिनके आनेपर एकमात्र भीष्मने युद्धमें मत्स्य और पांचालदेशकी सेनाओंके अगणित हाथी, घोड़ोंको मारकर सात महारथियोंका वध कर डाला। प्रजानाथ! फिर पाँच हजार रथियोंका वध करके आपके पितृतुल्य भीष्मने अपने अस्त्र-शिक्षाबलसे उस महायुद्धमें चौदह हजार पैदल सिपाहियों, एक हजार हाथियों और दस हजार घोड़ोंका संहार कर डाला ॥ २३—२५ १/२ ॥

ततः सर्वमहीपानां क्षपयित्वा वरूथिनीम् ॥ २६ ॥ विराटस्य प्रियो भ्राता शतानीको निपातितः । शतानीकं च समरे हत्वा भीष्मः प्रतापवान् ॥ २७ ॥ सहस्राणि महाराज राज्ञां भल्लैरपातयत् । तदनन्तर समस्त भूमिपालोंकी सेनाका उच्छेद करके राजा विराटके प्रिय भाई शतानीकको मार गिराया। महाराज! शतानीकको रणक्षेत्रमें मारकर प्रतापी भीष्मने भल्ल नामक बाणोंद्वारा एक हजार नरेशोंको धराशायी कर दिया ॥ २६-२७ १/२ ॥

उद्विग्नाः समरे योधा विक्रोशन्ति धनंजयम् ॥ २८ ॥ ये च केचन पार्थानामभियाता धनंजयम् । राजानो भीष्ममासाद्य गतास्ते यमसादनम् ॥ २९ ॥ उस रणक्षेत्रमें समस्त योद्धा भीष्मके भयसे उद्विग्न हो अर्जुनको पुकारने लगे। पाण्डवपक्षके जो कोई नरेश अर्जुनके साथ गये थे, वे भीष्मके सामने पहुँचते ही यमलोकके पथिक हो गये ॥ २८-२९ ॥

एवं दश दिशो भीष्मः शरजालैः समन्ततः । अतीत्य सेनां पार्थानामवतस्थे चमूमुखे ॥ ३० ॥ इस प्रकार भीष्मने दसों दिशाओंमें सब ओर अपने बाणोंका जाल-सा बिछा दिया और कुन्तीकुमारोंकी सेनाको परास्त करके वे सेनाके प्रमुख भागमें स्थित हो गये ॥ ३० ॥

स कृत्वा सुमहत् कर्म तस्मिन् वै दशमेऽहनि । सेनयोरन्तरे तिष्ठन् प्रगृहीतशरासनः ॥ ३१ ॥ दसवें दिन यह महान् पराक्रम करके हाथमें धनुष लिये वे दोनों सेनाओंके बीचमें खड़े हो गये ॥ ३१ ॥

न चैनं पार्थिवाः केचिच्छक्ता राजन् निरीक्षितुम् । मध्यं प्राप्तं यथा ग्रीष्मे तपन्तं भास्करं दिवि ॥ ३२ ॥ राजन्! जैसे ग्रीष्म-ऋतुमें आकाशके मध्यभागमें पहुँचे हुए दोपहरके तपते हुए सूर्यकी ओर देखना कठिन होता है, उसी प्रकार उस समय कोई राजा भीष्मकी ओर आँख उठाकर देखनेका भी साहस न कर सके ॥ ३२ ॥

यथा दैत्यचमूं शक्रस्तापयामास संयुगे । तथा भीष्मः पाण्डवेयांस्तापयामास भारत ॥ ३३ ॥ भारत! जैसे पूर्वकालमें देवराज इन्द्रने संग्रामभूमिमें दैत्योंकी सेनाको संतप्त किया था, उसी प्रकार भीष्मजी पाण्डवयोध्दाओंको संताप दे रहे थे ॥ ३३ ॥

तथा चैनं पराक्रान्तमालोक्य मधुसूदनः । उवाच देवकीपुत्रः प्रीयमाणो धनंजयम् ॥ ३४ ॥ उन्हें इस प्रकार पराक्रम करते देख मधु दैत्यको मारनेवाले देवकीनन्दन भगवान् श्रीकृष्णने अर्जुनसे प्रसन्नतापूर्वक कहा— ॥ ३४ ॥

एष शान्तनवो भीष्मः सेनयोरन्तरे स्थितः । संनिहत्य बलादेनं विजयस्ते भविष्यति ॥ ३५ ॥ ‘अर्जुन! ये शान्तनुनन्दन भीष्म दोनों सेनाओंके बीचमें खड़े हैं। यदि तुम बलपूर्वक इन्हें मार सको तो तुम्हारी विजय हो जायगी ॥ ३५ ॥

बलात् संस्तम्भयस्वैनं यत्रैषा भिद्यते चमूः । न हि भीष्मशरानन्यः सोढुमुत्सहते विभो ॥ ३६ ॥ ‘जहाँ ये इस सेनाका संहार कर रहे हैं, वहीं पहुँचकर इन्हें बलपूर्वक स्तम्भित कर दो (जिससे ये आगे या पीछे किसी ओर हट न सकें)। विभो! तुम्हारे सिवा दूसरा कोई ऐसा नहीं है, जो भीष्मके बाणोंकी चोट सह सके’ ॥ ३६ ॥

ततस्तस्मिन् क्षणे राजंश्चोदितो वानरध्वजः । सध्वजं सरथं साश्वं भीष्ममन्तर्दधे शरैः ॥ ३७ ॥ राजन्! इस प्रकार भगवान्‌से प्रेरित होकर कपिध्वज अर्जुनने उसी क्षण अपने बाणोंद्वारा ध्वज, रथ और घोड़ोंसहित भीष्मको आच्छादित कर दिया ॥ ३७ ॥

स चापि कुरुमुख्यानामृषभः पाण्डवेरितान् । शरव्रातैः शरव्रातान् बहुधा विदुधाव तान् ॥ ३८ ॥ कुरुश्रेष्ठ वीरोंमें प्रधान भीष्मने भी अपने बाणसमूहोंद्वारा अर्जुनके चलाये हुए बाणसमुदायके टुकड़े-टुकड़े कर दिये ॥ ३८ ॥

(तथा पुनर्जघानाशु पाण्डवानां महारथान् । शरैरशनिकल्पैश्च शिताग्रैश्च सुपर्वभिः ॥) तत्पश्चात् उत्तम गाँठ और तीखी धारवाले वज्रतुल्य बाणोंद्वारा वे पुनः पाण्डव महारथियोंका शीघ्रतापूर्वक वध करने लगे।

ततः पञ्चालराजश्च धृष्टकेतुश्च वीर्यवान् । पाण्डवो भीमसेनश्च धृष्टद्युम्नश्च पार्षतः ॥ ३९ ॥ यमौ च चेकितानश्च केकयाः पञ्च चैव ह । सात्यकिश्च महाबाहुः सौभद्रोऽथ घटोत्कचः ॥ ४० ॥

द्रौपदेयाः शिखण्डी च कुन्तिभोजश्च वीर्यवान् । सुशर्मा च विराटश्च पाण्डवेया महाबलाः ॥ ४१ ॥ एते चान्ये च बहवः पीडिता भीष्मसायकैः । समुद्धृताः फाल्गुनेन निमग्नाः शोकसागरे ॥ ४२ ॥ इसी समय पांचालराज द्रुपद, पराक्रमी धृष्टकेतु, पाण्डुनन्दन भीमसेन, द्रुपदकुमार धृष्टद्युम्न, नकुल-सहदेव, चेकितान, पाँच केकयराजकुमार, महाबाहु सात्यकि, सुभद्राकुमार अभिमन्यु, घटोत्कच, द्रौपदीके पाँचों पुत्र, शिखण्डी, पराक्रमी कुन्तिभोज, सुशर्मा तथा विराट—ये और दूसरे भी बहुत-से महाबली पाण्डव-सैनिक भीष्मके बाणोंसे पीड़ित हो शोकके समुद्रमें डूब रहे थे; परंतु अर्जुनने उन सबका उद्धार कर दिया ॥ ३९—४२ ॥

ततः शिखण्डी वेगेन प्रगृह्य परमायुधम् । भीष्ममेवाभिदुद्राव रक्ष्यमाणः किरीटिना ॥ ४३ ॥ तब शिखण्डी अपने उत्तम अस्त्र-शस्त्रोंको लेकर बड़े वेगसे भीष्मकी ही ओर दौड़ा। उस समय किरीटधारी अर्जुन उसकी रक्षा कर रहे थे ॥ ४३ ॥

ततोऽस्यानुचरान् हत्वा सर्वान् रणविभागवित् । भीष्ममेवाभिदुद्राव बीभत्सुरपराजितः ॥ ४४ ॥ तत्पश्चात् युद्धविभागके अच्छे ज्ञाता और किसीसे भी परास्त न होनेवाले अर्जुनने भीष्मके पीछे चलनेवाले समस्त योद्धाओंको मारकर स्वयं भी भीष्मपर ही धावा किया ॥ ४४ ॥

सात्यकिश्चेकितानश्च धृष्टद्युम्नश्च पार्षतः । विराटो द्रुपदश्चैव माद्रीपुत्रौ च पाण्डवौ ॥ ४५ ॥ दुद्रुवुर्भीष्ममेवाजौ रक्षिता दृढधन्वना । इनके साथ सात्यकि, चेकितान, द्रुपदकुमार धृष्टद्युम्न, विराट, द्रुपद, माद्रीकुमार पाण्डुपुत्र नकुल-सहदेवने भी युद्धमें भीष्मपर ही आक्रमण किया। ये सब-के-सब सुदृढ़ धनुष धारण करनेवाले अर्जुनसे सुरक्षित थे ॥

अभिमन्युश्च समरे द्रौपद्याः पञ्च चात्मजाः ॥ ४६ ॥ दुद्रुवुः समरे भीष्मं समुद्यतमहायुधाः । द्रौपदीके पाँचों पुत्र और अभिमन्यु भी महान् अस्त्र-शस्त्र लिये उस समरांगणमें भीष्मकी ही ओर दौड़े ॥

ते सर्वे दृढधन्वानः संयुगेष्वपलायिनः ॥ ४७ ॥ बहुधा भीष्ममानर्च्छन्मार्गणेः क्षतमार्गणैः । ये सभी वीर सुदृढ़ धनुष धारण करनेवाले और युद्धसे कभी पीछे न हटनेवाले थे। इन्होंने शत्रुओंके बाणोंको नष्ट करनेवाले सायकोंद्वारा भीष्मको बारंबार पीड़ित किया ॥ ४७ १/२ ॥

विधूय तान् बाणगणान् ये मुक्ताः पार्थिवोत्तमैः ॥ ४८ ॥ पाण्डवानामदीनात्मा व्यगाहत वरूथिनीम् । परंतु उदारचेता भीष्म उन श्रेष्ठ राजाओंके छोड़े हुए समस्त बाणसमूहोंका नाश करके पाण्डवोंकी विशाल सेनामें घुस गये ॥ ४८ १/२ ॥ चक्रे शरविघातं च क्रीडन्निव पितामहः ॥ ४९ ॥ नाभिसंधत्त पाञ्चाल्ये स्मयमानो मुहुर्मुहुः । स्त्रीत्वं तस्यानुसंस्कृत्य भीष्मो बाणात् शिखण्डिने ॥ ५० ॥ वहाँ पितामह भीष्म खेल-सा करते हुए अपने बाणोंद्वारा पाण्डवसैनिकोंके अस्त्र-शस्त्रोंका विनाश करने लगे। परंतु शिखण्डीके स्त्रीत्वका स्मरण करके वे बारंबार मुसकराकर रह जाते थे; उसपर बाण नहीं चलाते थे ॥ ४९-५० ॥ जघान द्रुपदानीके रथान् सप्त महारथः । ततः किलकिलाशब्दः क्षणेन समभूत् तदा ॥ ५१ ॥ मत्स्यपाञ्चालचेदीनां तमेकमभिधावताम् । महारथी भीष्मने द्रुपदकी सेनाके सात रथियोंको मार डाला। तब एकमात्र भीष्मपर धावा करनेवाले मत्स्य, पांचाल और चेदिदेशके योद्धाओंका महान् कोलाहल क्षणभरमें वहाँ गूँज उठा ॥ ५१ १/२ ॥ ते नराश्वरथव्रातैर्मार्गणैश्च परंतप ॥ ५२ ॥ तमेकं छादयामासुर्मेघा इव दिवाकरम् । भीष्मं भागीरथीपुत्रं प्रतपन्तं रणे रिपून् ॥ ५३ ॥ परंतप! जैसे बादल सूर्यको ढक लेते हैं, उसी प्रकार उन वीरोंने पैदल, घुड़सवार तथा रथियोंके समुदायसे एवं बहुसंख्यक बाणोंद्वारा भीष्मको आच्छादित कर दिया। उस समय गंगानन्दन भीष्म अकेले युद्धके मैदानमें शत्रुओंको अत्यन्त संतप्त कर रहे थे ॥ ५२-५३ ॥ ततस्तस्य च तेषां च युद्धे देवासुरोपमे । किरीटी भीष्ममागच्छत् पुरस्कृत्य शिखण्डिनम् ॥ ५४ ॥ तदनन्तर भीष्म तथा उन योद्धाओंमें देवासुर-संग्रामके समान भयंकर युद्ध होने लगा। इसी बीचमें किरीटधारी अर्जुन शिखण्डीको आगे करके भीष्मके समीप जा पहुँचे ॥ ५४ ॥

इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि भीष्मपराक्रमे अष्टादशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११८ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वमें भीष्मपराक्रमविषयक एक सौ अठारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११८ ॥ [दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ५५ श्लोक हैं।]

११९-

⬅ विषय-सूची (TOC)

एकोनविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः

कौरवपक्षके प्रमुख महारथियोंद्वारा सुरक्षित होनेपर भी अर्जुनका भीष्मको रथसे गिराना, शरशय्यापर स्थित भीष्मके समीप हंसरूपधारी ऋषियोंका आगमन एवं उनके कथनसे भीष्मका उत्तरायणकी प्रतीक्षा करते हुए प्राण धारण करना

संजय उवाच

एवं ते पाण्डवाः सर्वे पुरस्कृत्य शिखण्डिनम् ।
विव्यधुः समरे भीष्मं परिवार्य समन्ततः ॥ १ ॥
**संजय कहते हैं—**राजन्! इस प्रकार शिखण्डीको आगे करके सभी पाण्डवोंने समरभूमिमें भीष्मको सब ओरसे घेरकर बींधना आरम्भ किया ॥ १ ॥
शतघ्नीभिः सुघोराभिः परिघैश्च परश्वधैः ।
मुद्गरैर्मुसलैः प्रासैः क्षेपणीयैश्च सर्वशः ॥ २ ॥
शरैः कनकपुङ्खैश्च शक्तितोमरकम्पनैः ।
नाराचैर्वत्ससन्तैश्च भुशुण्डीभिश्च सर्वशः ॥ ३ ॥
अताडयन् रणे भीष्मं सहिताः सर्वसृञ्जयाः ।
समस्त सृंजय वीर एक साथ संगठित हो भयंकर शतघ्नी, परिघ, फरसे, मुद्गर, मुसल, प्रास, गोफन, स्वर्णमय पंखवाले बाण, शक्ति, तोमर, कम्पन, नाराच, वत्ससन्त और भुशुण्डी आदि अस्त्र-शस्त्रोंद्वारा रणभूमिमें भीष्मको सब ओरसे पीड़ा देने लगे ॥ २-३ ½ ॥
स विशीर्णतनुत्राणः पीडितो बहुभिस्तदा ॥ ४ ॥
न विव्यथे तदा भीष्मो भिद्यमानेषु मर्मसु ।
उस समय बहुसंख्यक योद्धाओंके द्वारा अनेक प्रकारके अस्त्रोंसे पीड़ित होनेके कारण भीष्मका कवच छिन्न-भिन्न हो गया। उनके मर्मस्थान विदीर्ण होने लगे, तो भी उनके मनमें व्यथा नहीं हुई ॥ ४ ½ ॥
संदीप्तशरचापाग्निरस्त्रप्रसृतमारुतः ॥ ५ ॥
नेमिनिर्ह्रादसंतापो महास्त्रोदयपावकः ।
चित्रचापमहाज्वालो वीरक्षयमहेन्धनः ॥ ६ ॥
युगान्ताग्निसमप्रख्यः परेषां समपद्यत ।
वे शत्रुओंके लिये प्रलयकालकी अग्निके समान अद्भुत तेजसे प्रज्वलित हो उठे। धनुष और बाण ही धधकती हुई आग थे। अस्त्रोंका प्रसार ही वायुका सहारा था। रथोंके

पहियोंकी घरघराहट उस आगकी आँच थी। बड़े-बड़े अस्त्रोंका प्राकट्य अंगारके समान था। विचित्र चाप ही उस आगकी प्रचण्ड ज्वालाओंके समान था। बड़े-बड़े वीर ही ईंधनके समान उसमें गिरकर भस्म हो रहे थे ॥ विवृत्य रथसङ्घानामन्तरेण विनिःसृतः ॥ ७ ॥ दृश्यते स्म नरेन्द्रणां पुनर्मध्यगतश्चरन् । पितामह भीष्म एक ही क्षणमें रथकी पंक्ति तोड़कर घेरेसे बाहर निकल आते और पुनः राजाओंकी सेनाके मध्यभागमें प्रवेश करके वहाँ विचरते दिखायी देते थे ॥ ततः पञ्चालराजं च धृष्टकेतुमचिन्त्य च ॥ ८ ॥ पाण्डवानीकिनीमध्यमाससाद विशाम्पते । प्रजानाथ! तत्पश्चात् पांचालराज द्रुपद तथा धृष्टकेतुकी कुछ भी परवा न करके वे पाण्डव-सेनाके भीतर घुस आये ॥ ८ ½ ॥ ततः सात्यकिभीमौ च पाण्डवं च धनंजयम् ॥ ९ ॥ द्रुपदं च विराटं च धृष्टद्युम्नं च पार्षतम् । भीमघोषैर्महावेगैर्मर्मावरणभेदिभिः ॥ १० ॥ षडेतान् निशितैर्भीष्मः प्रविव्याधोत्तमैः शरैः । फिर भयंकर शब्द करनेवाले, महान् वेगशाली, मर्मस्थानों और कवचोंको भी विदीर्ण कर देनेवाले, तीखे एवं उत्तम बाणोंद्वारा उन्होंने सात्यकि, भीमसेन, पाण्डुपुत्र अर्जुन, विराट, द्रुपद तथा उनके पुत्र धृष्टद्युम्न—इन छः महारथियोंको अत्यन्त घायल कर दिया ॥ ९-१० ½ ॥ तस्य ते निशितान् बाणान् संनिवार्य महारथाः ॥ ११ ॥ दशभिर्दशभिर्भीष्ममर्दयामासुरोजसा । तब उन महारथी वीरोंने भीष्मके उन तीखे बाणोंका निवारण करके पुनः दस-दस बाणोंद्वारा भीष्मको बलपूर्वक पीड़ित किया ॥ ११ ½ ॥ शिखण्डी तु महाबाणान् यान् मुमोच महारथः ॥ १२ ॥ न चक्रुस्ते रुजं तस्य स्वर्णपुङ्खाः शिलाशिताः । महारथी शिखण्डीने जिन महान् बाणोंका प्रयोग किया था, वे सब सुवर्णमय पंखसे युक्त और शिलापर रगड़कर तेज किये गये थे, तो भी भीष्मजीके शरीरमें घाव या पीड़ा नहीं उत्पन्न कर सके ॥ १२ ½ ॥ ततः किरीटी संरब्धो भीष्ममेवाभ्यधावत ॥ १३ ॥ शिखण्डिनं पुरस्कृत्य धनुश्चास्य समाच्छिनत् । तब किरीटधारी अर्जुनने कुपित हो शिखण्डीको आगे किये हुए ही भीष्मपर धावा किया और उनके धनुषको काट डाला ॥ १३ ½ ॥ भीष्मस्य धनुषश्छेदं नामृष्यन्त महारथाः ॥ १४ ॥

द्रोणश्च कृतवर्मा च सैन्धवश्च जयद्रथः । भूरिश्रवाः शलः शल्यो भगदत्तस्तथैव च ।। १५ ।। सप्तैते परमक्रुद्धाः किरीटिनमभिद्रुताः । तत्र शस्त्राणि दिव्यानि दर्शयन्तो महारथाः ।। १६ ।। अभिपेतुर्भृशं क्रुद्धाश्छादयन्तश्च पाण्डवम् । भीष्मके धनुषका काटा जाना कौरव महारथियोंको सहन नहीं हुआ। द्रोण, कृतवर्मा, सिन्धुराज जयद्रथ, भूरिश्रवा, शल, शल्य और भगदत्त—ये सात महारथी अत्यन्त क्रुद्ध हो किरीटधारी अर्जुनकी ओर दौड़े तथा अपने दिव्य अस्त्र-शस्त्रोंका प्रदर्शन करते हुए पाण्डुनन्दन अर्जुनको अत्यन्त क्रोधपूर्वक बाणोंसे आच्छादित करने लगे ।। १४—१६ १/२ ।। तेषामापततां शब्दः शुश्रुवे फाल्गुनं प्रति ।। १७ ।। उद्वृत्तानां यथा शब्दः समुद्राणां युगक्षये । अर्जुनके प्रति आक्रमण करते हुए उन वीरोंका सिंहनाद उसी प्रकार सुनायी पड़ा, जैसे प्रलयकालमें अपनी मर्यादा छोड़कर बढ़नेवाले समुद्रोंकी भीषण गर्जना सुनायी पड़ती है ।। १७ १/२ ।। घ्नतानयत गृह्णीत विद्ध्यध्वमवकर्तत ।। १८ ।। इत्यासीत् तुमुलः शब्दः फाल्गुनस्य रथं प्रति । अर्जुनके रथके समीप ‘मार डालो, ले आओ, पकड़ लो, बींध डालो, टुकड़े-टुकड़े कर दो’ इस प्रकार भयंकर शब्द गूँजने लगा ।। १८ १/२ ।। तं शब्दं तुमुलं श्रुत्वा पाण्डवानां महारथाः ।। १९ ।। अभ्यधावन् परीप्सन्तः फाल्गुनं भरतर्षभ । भरतश्रेष्ठ! उस भयानक शब्दको सुनकर पाण्डव महारथी अर्जुनकी रक्षाके लिये दौड़े ।। १९ १/२ ।। सात्यकिर्भीमसेनश्च धृष्टद्युम्नश्च पार्षतः ।। २० ।। विराटद्रुपदौ चोभौ राक्षसश्च घटोत्कचः । अभिमन्युश्च संक्रुद्धः सप्तैते क्रोधमूर्च्छिताः ।। २१ ।। समभ्यधावंस्त्वरिताश्चित्रकार्मुकधारिणः । सात्यकि, भीमसेन, द्रुपदकुमार धृष्टद्युम्न, विराट, द्रुपद, राक्षस घटोत्कच और अभिमन्यु—ये सात वीर क्रोधसे मूर्च्छित हो तुरंत ही विचित्र धनुष धारण किये वहाँ दौड़े आये ।। २०-२१ १/२ ।। तेषां समभवद् युद्धं तुमुलं लोमहर्षणम् ।। २२ ।। संग्रामे भरतश्रेष्ठ देवानां दानवैरिव । भरतभूषण! उनका वह भयंकर युद्ध देवासुरसंग्रामके समान रोंगटे खड़े कर देनेवाला था ।। २२ १/२ ।।

शिखण्डी तु रणे श्रेष्ठो रक्ष्यमाणः किरीटिना ॥ २३ ॥ अविध्यद् दशभिर्भीष्मं छिन्नधन्वानमाहवे । सारथिं दशभिश्चास्य ध्वजं चैकेन चिच्छिदे ॥ २४ ॥ सोऽन्यत् कार्मुकमादाय गाङ्गेयो वेगवत्तरम् । (जघान निशितैर्बाणैरर्जुनं परवीरहा ।) तदप्यस्य शितैर्बाणैस्त्रिभिश्चिच्छेद फाल्गुनः ॥ २५ ॥ भीष्मजीका धनुष कट गया था। उसी अवस्थामें अर्जुनसे सुरक्षित शिखण्डीने दस बाणोंसे उन्हें और दस बाणोंसे उनके सारथिको भी घायल कर दिया। तत्पश्चात् एक बाणसे ध्वजको काट गिराया। तब शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले गंगानन्दन भीष्मने दूसरा अत्यन्त वेगशाली धनुष लेकर तीखे बाणोंसे अर्जुनको घायल करना आरम्भ किया। यह देख अर्जुनने उस धनुषको भी तीन पैने बाणोंद्वारा काट डाला ॥ २३—२५ ॥

एवं स पाण्डवः क्रुद्ध आत्तमात्तं पुनः पुनः । धनुश्चिच्छेद भीष्मस्य सव्यसाची परंतपः ॥ २६ ॥ इस प्रकार क्रोधमें भरे हुए शत्रुसंतापी, सव्यसाची पाण्डुनन्दन अर्जुन जो-जो धनुष भीष्म लेते, उसी-उसीको काट डालते थे ॥ २६ ॥

स छिन्नधन्वा संक्रुद्धः सृक्किणी परिसंलिहन् । शक्तिं जग्राह तरसा गिरीणामपि दारणीम् ॥ २७ ॥ धनुष कट जानेपर क्रोधपूर्वक अपने मुँहके दोनों कोनोंको चाटते हुए भीष्मने बलपूर्वक एक शक्ति हाथमें ली, जो पर्वतोंको भी विदीर्ण करनेवाली थी ॥ २७ ॥

तां च चिक्षेप संक्रुद्धः फाल्गुनस्य रथं प्रति । तामापतन्तीं सम्प्रेक्ष्य ज्वलन्तीमशनीमिव ॥ २८ ॥ समादत्त शितान् भल्लान् पञ्च पाण्डवनन्दनः । तस्य चिच्छेद तां शक्तिं पञ्चधा पञ्चभिः शरैः ॥ २९ ॥ संक्रुद्धो भरतश्रेष्ठ भीष्मबाहुप्रवेरिताम् । भरतश्रेष्ठ! फिर उसे क्रोधपूर्वक उन्होंने अर्जुनके रथकी ओर चला दिया। प्रज्वलित वज्रके समान उस शक्तिको आती देख पाण्डवोंको आनन्दित करनेवाले अर्जुनने अपने हाथमें भल्ल नामक पाँच तीखे बाण लिये और कुपित हो उन पाँच बाणोंद्वारा भीष्मकी भुजाओंसे प्रेषित हुई उस शक्तिके पाँच टुकड़े कर दिये ॥ २८-२९ १/२ ॥

सा पपात तथा छिन्ना संक्रुद्धेन किरीटिना ॥ ३० ॥ मेघवृन्दपरिभ्रष्टा विच्छिन्नेव शतह्रदा । क्रोधमें भरे हुए अर्जुनद्वारा काटी हुई वह शक्ति मेघोंके समूहसे निर्मुक्त होकर गिरी हुई बिजलीके समान पृथ्वीपर गिर पड़ी ॥ ३० १/२ ॥

छिन्नां तां शक्तिमालोक्य भीष्मः क्रोधसमन्वितः ॥ ३१ ॥

अचिन्तयद् रणे वीरो बुद्ध्या परपुरंजयः । अपनी उस शक्तिको छिन्न-भिन्न हुई देख भीष्मजी क्रोधमें निमग्न हो गये और शत्रुनगरविजयी उन वीर-शिरोमणिने रणक्षेत्रमें अपनी बुद्धिके द्वारा इस प्रकार विचार किया—॥ ३११/२ ॥

शक्तोऽहं धनुषैकेन निहन्तुं सर्वपाण्डवान् ॥ ३२ ॥ यद्येषां न भवेद् गोप्ता विष्वक्सेनो महाबलः । 'यदि महाबली भगवान् श्रीकृष्ण उन पाण्डवोंकी रक्षा न करते तो मैं इन सबको केवल एक धनुषके ही द्वारा मार सकता था ॥ ३२१/२ ॥

(अजय्यश्चैव लोकानां सर्वेषामिति मे मतिः ।) कारणद्वयमास्थाय नाहं योत्स्यामि पाण्डवान् ॥ ३३ ॥ अवध्यत्वाच्च पाण्डूनां स्त्रीभावाच्च शिखण्डिनः । 'भगवान् सम्पूर्ण लोकोंके लिये अजेय हैं; ऐसा मेरा विश्वास है। इस समय मैं दो कारणोंका आश्रय लेकर पाण्डवोंसे युद्ध नहीं करूँगा। एक तो ये पाण्डुकी संतान होनेके कारण मेरे लिये अवध्य हैं और दूसरे मेरे सामने शिखण्डी आ गया है, जो पहले स्त्री था ॥ ३३१/२ ॥

पित्रा तुष्टेन मे पूर्वं यदा कालीमुदावहम् ॥ ३४ ॥ स्वच्छन्दमरणं दत्तमवध्यत्वं रणे तथा । तस्मान्मृत्युमहं मन्ये प्राप्तकालमिवात्मनः ॥ ३५ ॥ 'पूर्वकालमें जब मैंने माता सत्यवतीका विवाह पिताजीके साथ कराया था, उस समय मेरे पिताने संतुष्ट होकर मुझे दो वर दिये थे—'जब तुम्हारी इच्छा होगी, तभी तुम मरोगे तथा युद्धमें कोई भी तुम्हें मार न सकेगा।' ऐसी दशामें मुझे स्वेच्छासे ही मृत्यु स्वीकार कर लेनी चाहिये। मैं समझता हूँ कि अब उसका अवसर आ गया है' ॥ ३४-३५ ॥

एवं ज्ञात्वा व्यवसितं भीष्मस्यामिततेजसः । ऋषयो वसवश्चैव वियत्स्था भीष्ममब्रुवन् ॥ ३६ ॥ अमिततेजस्वी भीष्मके इस निश्चयको जानकर आकाशमें खड़े हुए ऋषियों और वसुओंने उनसे इस प्रकार कहा— ॥ ३६ ॥

यत् ते व्यवसितं तात तदस्माकमपि प्रियम् । तत् कुरुष्व महाराज युद्धे बुद्धिं निवर्तय ॥ ३७ ॥ 'तात! तुमने जो निश्चय किया है, वह हमलोगोंको भी बहुत प्रिय है। महाराज! अब तुम वही करो। युद्धकी ओरसे अपनी चित्तवृत्ति हटा लो' ॥ ३७ ॥

अस्य वाक्यस्य निधने प्रादुरासीच्छिवोऽनिलः । अनुलोमः सुगन्धी च पृषतैश्च समन्वितः ॥ ३८ ॥

यह बात समाप्त होते ही जलकी बूँदोंके साथ सुखद, शीतल, सुगन्धित एवं मनके अनुकूल वायु चलने लगी ॥ ३८ ॥ देवदुन्दुभयश्चैव सम्प्रणेदुर्महास्वनाः । पपात पुष्पवृष्टिश्च भीष्मस्योपरि मारिष ॥ ३९ ॥ आर्य! देवताओंकी दुन्दुभियाँ जोर-जोरसे बज उठीं। भीष्मके ऊपर फूलोंकी वर्षा होने लगी ॥ ३९ ॥ न च तच्छुश्रुवे कश्चित् तेषां संवदतां नृप । ऋते भीष्मं महाबाहुं मां चापि मुनितेजसा ॥ ४० ॥ राजन्! उस समय उपर्युक्त बातें कहनेवाले ऋषियोंका शब्द महाबाहु भीष्म तथा मुझको छोड़कर और कोई नहीं सुन सका। मुझे तो महर्षि व्यासके प्रभावसे ही वह बात सुनायी पड़ी ॥ ४० ॥ सम्भ्रमश्च महानासीत् त्रिदशानां विशाम्पते । पतिष्यति रथाद् भीष्मे सर्वलोकप्रिये तदा ॥ ४१ ॥ प्रजानाथ! सम्पूर्ण लोकोंके प्रिय भीष्म रथसे गिरना चाहते हैं, यह जानकर उस समय सम्पूर्ण देवताओंको भी महान् आश्चर्य हुआ ॥ ४१ ॥ इति देवगणानां च वाक्यं श्रुत्वा महातपाः । ततः शान्तनवो भीष्मो बीभत्सुं नात्यवर्तत ॥ ४२ ॥ भिद्यमानः शितैर्बाणैः सर्वावरणभेदिभिः । देवताओंकी वह बात सुनकर महातपस्वी शान्तनुनन्दन भीष्म समस्त आवरणोंका भेदन करनेवाले तीखे बाणोंद्वारा विदीर्ण होनेपर भी अर्जुनको जीतनेका प्रयत्न न कर सके ॥ ४२ १/२ ॥ शिखण्डी तु महाराज भरतानां पितामहम् ॥ ४३ ॥ आजघानोरसि क्रुद्धो नवभिर्निशितैः शरैः । महाराज! उस समय शिखण्डीने कुपित होकर भरतवंशियोंके पितामह भीष्मजीकी छातीमें नौ पैने बाण मारे ॥ ४३ १/२ ॥ स तेनाभिहतः संख्ये भीष्मः कुरुपितामहः ॥ ४४ ॥ नाकम्पत महाराज क्षितिकम्पे यथाचलः । नरेश्वर! युद्धमें शिखण्डीके द्वारा आहत होकर भी कुरुवंशियोंके पितामह भीष्म उसी प्रकार कम्पित नहीं हुए, जैसे भूकम्प होनेपर भी पर्वत नहीं हिलता ॥ ४४ १/२ ॥ ततः प्रहस्य बीभत्सुर्व्याक्षिपन् गाण्डिवं धनुः ॥ ४५ ॥ गाङ्गेयं पञ्चविंशत्या क्षुद्रकाणां समर्पयत् । तदनन्तर अर्जुनने हँसकर गाण्डीव धनुषकी टंकार करते हुए गंगानन्दन भीष्मको पचीस बाण मारे ॥ ४५ १/२ ॥

पुनः पुनः शतैरेनं त्वरमाणो धनंजयः ।। ४६ ।।
सर्वगात्रेषु संक्रुद्धः सर्वमर्मस्वताडयत् ।
तत्पश्चात् पुनः उन्होंने अत्यन्त कुपित हो शीघ्रतापूर्वक सौ बाणोंद्वारा भीष्मके सम्पूर्ण अंगों और सभी मर्मस्थानोंमें आघात किया ।। ४६ १/२ ।।
एवमन्यैरपि भृशं विद्धयमानः सहस्रशः ।। ४७ ।।
तानप्याशु शरैर्भीष्मः प्रविव्याध महारथः ।
इसी प्रकार दूसरे लोगोंने भी सहस्रों बाणोंद्वारा भीष्मजीको घायल किया। तब महारथी भीष्मने भी तुरंत ही अपने बाणोंद्वारा उन सबको बींध डाला ।। ४७ १/२ ।।
तैश्च मुक्ताञ्छरान् भीष्मो युधि सत्यपराक्रमः ।। ४८ ।।
निवारयामास शरैः समं संनतपर्वभिः ।
सत्यपराक्रमी भीष्म युद्धस्थलमें अन्य सब राजाओं-द्वारा छोड़े हुए बाणोंका झुकी हुई गाँठवाले अपने बाणोंद्वारा तुरंत ही निवारण कर देते थे ।। ४८ १/२ ।।
शिखण्डी तु रणे बाणान् यान् मुमोच महारथः ।। ४९ ।।
न चक्रुस्ते रुजं तस्य रुक्मपुङ्खाः शिलाशिताः ।
महारथी शिखण्डीने रणक्षेत्रमें जिनका प्रयोग किया था, वे शानपर चढ़ाकर तेज किये हुए सुवर्णमय पंखयुक्त बाण भीष्मजीके शरीरमें कोई घाव या पीड़ा नहीं उत्पन्न कर सके ।। ४९ १/२ ।।
ततः किरीटी संक्रुद्धो भीष्ममेवाभ्यवर्तत ।। ५० ।।
शिखण्डिनं पुरस्कृत्य धनुश्चास्य समाच्छिनत् ।
तत्पश्चात् क्रोधमें भरे हुए अर्जुन शिखण्डीको आगे रखकर पुनः भीष्मकी ही ओर बढ़े। उन्होंने भीष्मजीके धनुषको काट दिया ।। ५० १/२ ।।
अथैनं नवभिर्विद्ध्वा ध्वजमेकेन चिच्छिदे ।। ५१ ।।
सारथिं विशिखैश्चास्य दशभिः समकम्पयत् ।
तदनन्तर नौ बाणोंसे उन्हें घायल करके एक बाणसे उनके ध्वजको भी काट डाला। फिर दस बाणोंद्वारा उनके सारथिको कम्पित कर दिया ।। ५१ १/२ ।।
सोऽन्यत् कार्मुकमादाय गाङ्गेयो बलवत्तरम् ।। ५२ ।।
तदप्यस्य शितैर्भल्लैस्त्रिधा त्रिभिरघातयत् ।
तब गंगानन्दन भीष्मने दूसरा अत्यन्त प्रबल धनुष हाथमें लिया; परंतु अर्जुनने तीन तीखे भल्लोंद्वारा मारकर उसे भी तीन जगहसे खण्डित कर दिया ।। ५२ १/२ ।।
निमेषार्धेन कौन्तेय आत्तमात्तं महारणे ।। ५३ ।।
एवमस्य धनूंष्याजौ चिच्छेद सुबहून्यथ ।

उस महायुद्धमें भीष्म जो-जो धनुष हाथमें लेते थे कुन्तीकुमार अर्जुन उसे आधे निमेषमें काट डालते थे। इस प्रकार उन्होंने रणक्षेत्रमें उनके बहुत-से धनुष खण्डित कर दिये॥ ५३ १/२ ॥

ततः शान्तनवो भीष्मो बीभत्सुं नात्यवर्तत ॥ ५४ ॥
अथैनं पञ्चविंशत्या क्षुद्रकाणां समर्पयत् ।
तब शान्तनुनन्दन भीष्मने अर्जुनपर हाथ उठाना बंद कर दिया। फिर भी अर्जुनने उन्हें पचीस बाण मारे॥ ५४ १/२ ॥

सोऽतिविद्धो महेष्वासो दुःशासनमभाषत ॥ ५५ ॥
एष पार्थो रणे क्रुद्धः पाण्डवानां महारथः ।
शरैरनेकसाहस्रैर्मर्मेवाभ्यहनद् रणे ॥ ५६ ॥
इस प्रकार अत्यन्त घायल होनेपर महाधनुर्धर भीष्मने दुःशासनसे कहा—'ये पाण्डव महारथी अर्जुन युद्धमें क्रुद्ध होकर अनेक सहस्र बाणोंद्वारा मुझे घायल कर चुके हैं॥ ५५-५६॥

न चैष समरे शक्यो जेतुं वज्रभृता अपि ।
न चापि सहिता वीरा देवदानवराक्षसाः ॥ ५७ ॥
मां चापि शक्ता निर्जेतुं किमु मर्त्या महारथाः ।
‘इन्हें वज्रधारी इन्द्र भी युद्धमें जीत नहीं सकते। इसी प्रकार समस्त देवता, दानव तथा राक्षस वीर एक साथ आ जायँ तो मुझे भी वे युद्धमें परास्त नहीं कर सकते; फिर दूसरे मानव महारथियोंकी तो बात ही क्या है?'॥ ५७ १/२ ॥

एवं तयोः संवदतोः फाल्गुनो निशितैः शरैः ॥ ५८ ॥
शिखण्डिनं पुरस्कृत्य भीष्मं विव्याध संयुगे ।
इस प्रकार दुःशासन और भीष्ममें जब बातचीत हो रही थी, उसी समय अर्जुनने अपने तीखे बाणोंद्वारा युद्धस्थलमें शिखण्डीको आगे करके भीष्मको क्षत-विक्षत कर दिया॥ ५८ १/२ ॥

ततो दुःशासनं भूयः स्मयमान इवाब्रवीत् ॥ ५९ ॥
अतिविद्धः शितैर्बाणैर्भृशं गाण्डीवधन्वना ।
वज्राशनिसमस्पर्शा अर्जुनेन शरा युधि ॥ ६० ॥
मुक्ताः सर्वेऽव्यवच्छिन्ना नेमे बाणाः शिखण्डिनः ।
तब वे पुनः दुःशासनसे मुसकराते हुए-से बोले—'गाण्डीवधारी अर्जुनने युद्धस्थलमें ऐसे बाण छोड़े हैं, जिनका स्पर्श वज्र और विद्युत्‌के समान असह्य है। उनके तीखे बाणोंसे मैं अत्यन्त घायल हो गया हूँ। ये अविच्छिन्न रूपसे छूटनेवाले समस्त बाण शिखण्डीके नहीं हो सकते; ॥ ५९-६० १/२ ॥

निकृन्तमाना मर्माणि दृढावरणभेदिनः ॥ ६१ ॥

मुसला इव मे घ्नन्ति नेमे बाणाः शिखण्डिनः । वज्रदण्डसमस्पर्शा वज्रवेगदुरासदाः ॥ ६२ ॥ ‘क्योंकि ये मेरे सुदृढ़ कवचको छेदकर मर्मस्थानोंमें आघात कर रहे हैं, ये बाण मेरे शरीरपर मुसलके समान चोट करते हैं। इनका स्पर्श वज्र और यमदण्डके समान असह्य है। इनका वेग वज्रके समान होनेके कारण निवारण करना कठिन है। ये शिखण्डीके बाण कदापि नहीं ॥ ६१-६२ ॥ मम प्राणानारुजन्ति नेमे बाणाः शिखण्डिनः । नाशयन्तीव मे प्राणान् यमदूता इवाहिताः ॥ ६३ ॥ ‘ये मेरे प्राणोंमें व्यथा उत्पन्न कर देते हैं। अहितकारी यमदूतोंके समान मेरे प्राणोंका विनाश-सा कर रहे हैं। ये शिखण्डीके बाण कदापि नहीं हो सकते ॥ गदापरिघसंस्पर्शा नेमे बाणाः शिखण्डिनः । भुजगा इव संक्रुद्धा लेलिहाना विषोल्बणाः ॥ ६४ ॥ ‘इनका स्पर्श गदा और परिघकी चोटके समान प्रतीत होता है, ये क्रोधमें भरे हुए प्रचण्ड विषवाले सर्पोंके समान डसे लेते हैं। ये शिखण्डीके बाण नहीं हैं ॥ ६४ ॥ समाविशन्ति मर्माणि नेमे बाणाः शिखण्डिनः । अर्जुनस्य इमे बाणा नेमे बाणाः शिखण्डिनः ॥ ६५ ॥ कृन्तन्ति मम गात्राणि माघमां सेगवा इव । ‘ये बाण मेरे मर्मस्थानोंमें प्रवेश कर रहे हैं, अतः शिखण्डीके नहीं हैं। ये अर्जुनके बाण हैं। ये शिखण्डीके बाण नहीं हैं। जैसे केंकड़ीके बच्चे अपनी माताका उदर विदीर्ण करके बाहर निकलते हैं, उसी प्रकार ये बाण मेरे सम्पूर्ण अंगोंको छेदे डालते हैं ॥ ६५ १/२ ॥ सर्वे ह्यपि न मे दुःखं कुर्युुरन्ये नराधिपाः ॥ ६६ ॥ वीरं गाण्डीवधन्वानमृते जिष्णुं कपिध्वजम् । ‘गाण्डीवधारी वीर कपिध्वज अर्जुनको छोड़कर अन्य सभी नरेश अपने प्रहारोंद्वारा मुझे इतनी पीड़ा नहीं दे सकते’ ॥ ६६ १/२ ॥ इति ब्रुवञ्छान्तनवो दिधक्षुरिव पाण्डवान् ॥ ६७ ॥ शक्तिं भीष्मः स पार्थाय ततश्चिक्षेप भारत । तामस्य विशिखैश्छित्त्वा त्रिधा त्रिभिरपातयत् ॥ ६८ ॥ भारत! ऐसा कहते हुए शान्तनुनन्दन भीष्मने पाण्डवोंकी ओर इस प्रकार देखा, मानो उन्हें भस्म कर डालेंगे। फिर उन्होंने अर्जुनपर एक शक्ति चलायी; परंतु अर्जुनने तीन बाणोंद्वारा उनकी उस शक्तिको तीन जगहसे काट गिराया ॥ ६७-६८ ॥ पश्यतां कुरुवीराणां सर्वेषां तव भारत । चर्माथादत्त गाङ्गेयो जातरूपपरिष्कृतम् ॥ ६९ ॥ खड्गं चान्यतरप्रेप्सुर्मृत्योरग्रे जयाय वा ।

भरतनन्दन! समस्त कौरव वीरोंके देखते-देखते गंगानन्दन भीष्मने मृत्यु अथवा विजय इन दोमेंसे किसी एकका वरण करनेके लिये अपने हाथमें सुवर्णभूषित ढाल और तलवार ले ली॥ ६९ १/२॥ तस्य तच्छतधा चर्म व्यधमत् सायकैस्तथा ॥ ७० ॥ रथादनवरूढस्य तदद्भुतमिवाभवत् । परंतु वे अभी अपने रथसे उतर भी नहीं पाये थे कि अर्जुनने अपने बाणोंद्वारा उनकी ढालके सौ टुकड़े कर दिये, वह एक अद्भुत-सी बात हुई॥ ७० १/२॥ ततो युधिष्ठिरो राजा स्वान्यनीकान्यचोदयत् ॥ ७१ ॥ अभिद्रवत गाङ्गेयं मा वोऽस्तु भयमण्वपि । इसी समय राजा युधिष्ठिरने अपने सैनिकोंको आज्ञा दी—'वीरो! गंगानन्दन भीष्मपर आक्रमण करो। उनकी ओरसे तुम्हारे मनमें तनिक भी भय नहीं होना चाहिये'॥ ७१ १/२॥ अथ ते तोमरैः प्रासैर्बाणौघैश्च समन्ततः ॥ ७२ ॥ पट्टिशैश्च सुनिस्त्रिंशैर्नाराचैश्च तथा शितैः । वत्सदनैश्च भल्लैश्च तमेकमभिदुद्रुवुः ॥ ७३ ॥ तदनन्तर वे पाण्डव-सैनिक सब ओरसे तोमर, प्रास, बाणसमुदाय, पट्टिश, खड्ग, तीखे नाराच, वत्सदन्त तथा भल्लोंका प्रहार करते हुए एकमात्र भीष्मकी ओर दौड़े॥ ७२-७३॥ सिंहनादस्ततो घोरः पाण्डवानामभूत् तदा । तथैव तव पुत्राश्च नेदुर्भीष्मजयैषिणः ॥ ७४ ॥ तदनन्तर पाण्डवोंकी सेनामें घोर सिंहनाद हुआ। इसी प्रकार भीष्मकी विजय चाहनेवाले आपके पुत्र भी उस समय गर्जना करने लगे॥ ७४॥ तमेकमभ्यरक्षन्त सिंहनादांश्च चक्रिरे । तत्रासीत् तुमुलं युद्धं तावकानां परैः सह ॥ ७५ ॥ आपके सैनिक एकमात्र भीष्मकी रक्षा और सिंहनाद करने लगे। वहाँ आपके योद्धाओंका शत्रुओंके साथ भयंकर युद्ध हुआ॥ ७५॥ दशमेऽहनि राजेन्द्र भीष्मार्जुनसमागमे । आसीद् गाङ्ग इवावर्तो मुहूर्तमुदधेरिव ॥ ७६ ॥ राजेन्द्र! दसवें दिन भीष्म और अर्जुनके संघर्षमें दो घड़ीतक ऐसा दृश्य दिखायी दिया, मानो समुद्रमें गंगाजीके गिरते समय उनके जलमें भारी भँवर उठ रही हो॥ ७६॥ सैन्यानां युध्यमानानां निघ्नतामितरेतरम् । असौम्यरूपा पृथिवी शोणिताक्ताभवत् तदा ॥ ७७ ॥ उस समय एक-दूसरेको मारनेवाले युद्धपरायण सैनिकोंके रक्तसे रंजित हो वहाँकी सारी पृथ्वी भयानक हो गयी थी॥ ७७॥

समं च विषमं चैव न प्राज्ञायत किंचन । योधानामयुतं हत्वा तस्मिन् स दशमेऽहनि ।। ७८ ।। अतिष्ठदाहवे भीष्मो भिद्यमानेषु मर्मसु । वहाँ ऊँची और नीची भूमिका भी कुछ ज्ञान नहीं हो पाता था, दसवें दिनके उस युद्धमें अपने मर्मस्थानोंके विदीर्ण होते रहनेपर भी भीष्मजी दस हजार योद्धाओंको मारकर वहाँ खड़े हुए थे ।। ७८ १/२ ।। ततः सेनामुखे तस्मिन् स्थितः पार्थो धनुर्धरः ।। ७९ ।। मध्येन कुरुसैन्यानां द्रावयामास वाहिनीम् । उस समय सेनाके अग्रभागमें खड़े हुए धनुर्धर अर्जुनने कौरव-सेनाके भीतर प्रवेश करके आपके सैनिकोंको खदेड़ना आरम्भ किया ।। ७९ १/२ ।। (तथा च तव सैन्यानि तापयामासुरोजसा । शरैरशनिसंकाशैः पाण्डवाश्चेतरे नृपाः ।। तत्राद्भुतमपश्याम पाण्डवानां पराक्रमम् । द्रावयामासुरिषुभिः सर्वान् भीष्मपदानुगान् ।।) पाण्डवों तथा अन्य राजाओंने वज्रके समान बाणोंद्वारा आपकी सेनाओंको बलपूर्वक पीड़ित किया। वहाँ हमने पाण्डवोंका यह अद्भुत पराक्रम देखा कि उन्होंने अपने बाणोंकी वर्षासे भीष्मका अनुगमन करनेवाले समस्त योद्धाओंको मार भगाया। वयं श्वेतहयाद् भीताः कुन्तीपुत्राद् धनंजयात् ।। ८० ।। पीड्यमानाः शितैः शस्त्रैः प्राद्रवाम रणे तदा । राजन्! उस समय श्वेतवाहन कुन्तीपुत्र धनंजयसे डरकर उनके तीखे अस्त्र-शस्त्रोंसे पीड़ित हो हम सभी लोग रणभूमिसे भागने लगे थे ।। ८० १/२ ।। सौवीराः कितवाः प्राच्याः प्रतीच्योदीच्यमालवाः ।। ८१ ।। अभीषाहाः शूरसेनाः शिबयोऽथ वसातयः । शाल्वाश्रयास्त्रिगर्ताश्च अम्बष्ठाः केकयैः सह ।। ८२ ।। सर्व एते महात्मानः शरार्ता व्रणपीडिताः । संग्रामे न जहुर्भीष्मं युध्यमानं किरीटिना ।। ८३ ।। सौवीर, कितव, प्राच्य, प्रतीच्य, उदीच्य, मालव, अभीषाह, शूरसेन, शिबि, वसाति, शाल्वाश्रय, त्रिगर्त, अम्बष्ठ और केकय—इन सभी देशोंके ये सारे महामनस्वी वीर बाणोंसे घायल और घावोंसे पीड़ित होनेपर भी अर्जुनके साथ युद्ध करनेवाले भीष्मको संग्रामभूमिमें छोड़ न सके ।। ८१—८३ ।। ततस्तमेकं बहवः परिवार्य समन्ततः । परिकाल्य कुरून् सर्वान् शरवर्षैरवाकिरन् ।। ८४ ।।

तदनन्तर एकमात्र भीष्मको पाण्डव-पक्षीय बहुत-से योद्धाओंने चारों ओरसे घेर लिया और समस्त कौरवोंको सब ओर खदेड़कर उनके ऊपर बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी ॥ ८४ ॥

निपातयत गृह्णीत युध्यध्वमवकृन्तत ।
इत्यासीत् तुमुलः शब्दो राजन् भीष्मरथं प्रति ॥ ८५ ॥
राजन्! उस समय भीष्मके रथके समीप ‘मार गिराओ, पकड़ लो, युद्ध करो, टुकड़े-टुकड़े कर डालो’ इत्यादि भयंकर शब्द गूँज रहे थे ॥ ८५ ॥

निहत्य समरे राजन् शतशोऽथ सहस्रशः ।
न तस्यासीदनिर्भिन्नं गात्रे द्व्यङ्गुलमन्तरम् ॥ ८६ ॥
महाराज! समरमें भीष्म सैकड़ों और हजारों वीरोंका वध करके स्वयं इस स्थितिमें पहुँच गये थे कि उनके शरीरमें दो अंगुल भी ऐसा स्थान नहीं रह गया था, जो बाणोंसे विद्ध न हुआ हो ॥ ८६ ॥

एवंभूतस्तव पिता शरैर्विशकलीकृतः ।
शिताग्रैः फाल्गुनेनाजौ प्राक्शिराः प्रापतद् रथात् ॥ ८७ ॥
किंचिच्छेषे दिनकरे पुत्राणां तव पश्यताम् ।
इस प्रकार आपके ताऊ भीष्म युद्धस्थलमें अर्जुनके तीखे बाणोंसे अत्यन्त विद्ध हो गये थे—उनका शरीर छिदकर छलनी हो रहा था। वे उसी अवस्थामें, जब कि दिन थोड़ा ही शेष था, आपके पुत्रोंके देखते-देखते पूर्व दिशाकी ओर मस्तक किये रथसे नीचे गिर पड़े ॥ ८७ ½ ॥

हाहेति दिवि देवानां पार्थिवानां च भारत ॥ ८८ ॥
पतमाने रथाद् भीष्मे बभूव सुमहान्स्वनः ।
भारत! रथसे भीष्मके गिरते समय आकाशमें खड़े हुए देवताओं तथा भूतलवर्ती राजाओंमें बड़े जोरसे हाहाकार मच गया ॥ ८८ ½ ॥

सम्पतन्तमभिप्रेक्ष्य महात्मानं पितामहम् ॥ ८९ ॥
सह भीष्मेण सर्वेषां प्रापतन् हृदयानि नः ।
महाराज! महात्मा पितामह भीष्मको रथसे नीचे गिरते देखकर हम सब लोगोंके हृदय भी उनके साथ ही गिर पड़े ॥ ८९ ½ ॥

स पपात महाबाहुर्वसुधामनुनादयन् ॥ ९० ॥
इन्द्रध्वज इवोत्सृष्टः केतुः सर्वधनुष्मताम् ।
धरणीं न स पस्पर्श शरसंघैः समावृतः ॥ ९१ ॥
वे महाबाहु भीष्म सम्पूर्ण धनुर्धरोंमें श्रेष्ठ थे। वे कटी हुई इन्द्रकी ध्वजाके समान पृथ्वीको शब्दायमान करते हुए गिर पड़े। उनके सारे अंगोंमें सब ओर बाण बिंधे हुए थे। इसलिये गिरनेपर भी उनका धरतीसे स्पर्श नहीं हुआ ॥ ९०-९१ ॥

शरत्तल्पे महेष्वासं शयानं पुरुषर्षभम् । रथात् प्रपतितं चैनं दिव्यो भावः समाविशत् ॥ ९२ ॥ रथसे गिरकर बाणशय्यापर सोये हुए पुरुषप्रवर महाधनुर्धर भीष्मके भीतर दिव्यभावका आवेश हुआ ॥ ९२ ॥

अभ्यवर्षच्च पर्जन्यः प्राकम्पत च मेदिनी । पतन् स ददृशे चापि दक्षिणेन दिवाकरम् ॥ ९३ ॥ आकाशसे मेघ वर्षा करने लगा, धरती काँपने लगी, गिरते-गिरते उन्होंने देखा, अभी सूर्य दक्षिणायनमें हैं (यह मृत्युके लिये उत्तम समय नहीं है) ॥ ९३ ॥

संज्ञां चोपालभद् वीरः कालं संचिन्त्य भारत । अन्तरिक्षे च शुश्राव दिव्या वाचः समन्ततः ॥ ९४ ॥ भारत! समयका विचार करके वीरवर भीष्मने अपने होश-हवाशको ठीक रखा। उस समय आकाशमें सब ओरसे दिव्य वाणी सुनायी दी ॥ ९४ ॥

कथं महात्मा गाङ्गेयः सर्वशस्त्रभृतां वरः । कालकर्ता नरव्याघ्रः सम्प्राप्ते दक्षिणायने ॥ ९५ ॥ महात्मा गंगानन्दन भीष्म सम्पूर्ण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ, मनुष्योंमें सिंहके समान पराक्रमी तथा कालपर भी प्रभुत्व रखनेवाले थे। इन्होंने दक्षिणायनमें मृत्यु क्यों स्वीकार की? ॥ ९५ ॥

स्थितोऽस्मीति च गाङ्गेयस्तच्छ्रुत्वा वाक्यमब्रवीत् । धारयामास च प्राणान् पतितोऽपि महीतले ॥ ९६ ॥ उत्तरायणमन्विच्छन् भीष्मः कुरुपितामहः । तस्य तन्मतमाज्ञाय गंगा हिमवतः सुता ॥ ९७ ॥ महर्षीन् हंसरूपेण प्रेषयामास तत्र वै । उनकी वह बात सुनकर गंगानन्दन भीष्मने कहा—'मैं अभी जीवित हूँ।' कुरुकुलके वृद्ध पितामह भीष्म पृथ्वीपर गिरकर भी उत्तरायणकी प्रतीक्षा करते हुए अपने प्राणोंको रोके हुए हैं। उनके इस अभिप्रायको जानकर हिमालयनन्दिनी गंगादेवीने महर्षियोंको हंसरूपसे वहाँ भेजा ॥ ९६-९७ १/२ ॥

ततः सम्पातिनो हंसास्त्वरिता मानसौकसः ॥ ९८ ॥ आजग्मुः सहिता द्रष्टुं भीष्मं कुरुपितामहम् । यत्र शेते नरश्रेष्ठः शरतल्पे पितामहः ॥ ९९ ॥ वे मानसरोवरमें निवास करनेवाले हंसरूपधारी महर्षि एक साथ उड़ते हुए बड़ी उतावलीके साथ कुरुकुलके वृद्धपितामह भीष्मका दर्शन करनेके लिये उस स्थानपर आये, जहाँ वे नरश्रेष्ठ बाणशय्यापर सो रहे थे ॥

ते तु भीष्मं समासाद्य ऋषयो हंसरूपिणः ।

अपश्यञ्छरतल्पस्थं भीष्मं कुरुकुलोद्वहम् ॥ १०० ॥
उन हंसरूपधारी ऋषियोंने वहाँ पहुँचकर कुरुकुल-धुरन्धर वीर भीष्मको बाणशय्यापर सोये हुए देखा ॥ १०० ॥
ते तं दृष्ट्वा महात्मानं कृत्वा चापि प्रदक्षिणम् ।
गाङ्गेयं भरतश्रेष्ठं दक्षिणेन च भास्करम् ॥ १०१ ॥
इतरेतरमामन्त्र्य प्राहुस्तत्र मनीषिणः ।
उन भरतश्रेष्ठ महात्मा गंगानन्दन भीष्मका दर्शन करके ऋषियोंने उनकी प्रदक्षिणा की। फिर दक्षिणायन-युक्त सूर्यके सम्बन्धमें परस्पर सलाह करके वे मनीषी मुनि इस प्रकार बोले— ॥ १०१ १/२ ॥
भीष्मः कथं महात्मा सन् संस्थाता दक्षिणायने ॥ १०२ ॥
इत्युक्त्वा प्रस्थिता हंसा दक्षिणामभितो दिशम् ।
‘भीष्मजी महात्मा होकर दक्षिणायनमें कैसे अपनी मृत्यु स्वीकार करेंगे’ ऐसा कहकर वे हंसगण दक्षिणदिशाकी ओर चले गये ॥ १०२ १/२ ॥
सम्प्रेक्ष्य वै महाबुद्धिश्चिन्तयित्वा च भारत ॥ १०३ ॥
तानब्रवीच्छान्तनवो नाहं गन्ता कथंचन ।
दक्षिणावर्त आदित्ये एतन्मे मनसि स्थितम् ॥ १०४ ॥
भारत! हंसोंके जाते समय उन्हें देखकर परम बुद्धिमान् भीष्मने कुछ चिन्तन करके उनसे कहा—‘मैं सूर्यके दक्षिणायन रहते किसी प्रकार यहाँसे प्रस्थान नहीं करूँगा। यह मेरे मनका निश्चित विचार है ॥ १०३-१०४ ॥
गमिष्यामि स्वकं स्थानमासीद् यन्मे पुरातनम् ।
उदगायन आदित्ये हंसाः सत्यं ब्रवीमि वः ॥ १०५ ॥
‘हंसो! सूर्यके उत्तरायण होनेपर ही मैं उस लोककी यात्रा करूँगा, जो मेरा पुरातन स्थान है। यह मैं आपलोगोंसे सच्ची बात कह रहा हूँ ॥ १०५ ॥
धारयिष्याम्यहं प्राणानुत्तरायणकाङ्क्षया ।
ऐश्वर्यभूतः प्राणानामुत्सर्गो हि यतो मम ॥ १०६ ॥
‘मैं उत्तरायणकी प्रतीक्षामें अपने प्राणोंको धारण किये रहूँगा; क्योंकि मैं जब इच्छा करूँ, तभी अपने प्राणोंको छोड़ूँ, यह शक्ति मुझे प्राप्त है ॥ १०६ ॥
तस्मात् प्राणान् धारयिष्ये मुमूर्षुरुदगायने ।
यश्च दत्तो वरो मह्यं पित्रा तेन महात्मना ॥ १०७ ॥
छन्दतो मृत्युरित्येवं तस्य चास्तु वरस्तथा ।
धारयिष्ये ततः प्राणानुत्सर्गे नियते सति ॥ १०८ ॥
‘अतः उत्तरायणमें मृत्यु प्राप्त करनेकी इच्छासे मैं अपने प्राणोंको धारण करूँगा। मेरे महात्मा पिताने मुझे जो वर दिया था कि तुम्हें अपनी इच्छा होनेपर ही मृत्यु प्राप्त होगी,