महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
भूत, भविष्य और वर्तमान—तीनों कालोंमें इनके स्थावर-जंगम बहुत-से रूप स्थित होते हैं; इसलिये इन्हें 'बहुरूप' नाम दिया गया है ।। १२७ ।।
एकाक्षो जाज्वलन्नास्ते सर्वतोऽक्षिमयोऽपि वा ।
क्रोधाद् यश्चाविशल्लोकांस्तस्मात् सर्व इति स्मृतः ।। १२८ ।।
यद्यपि उनके सब ओर नेत्र हैं, तथापि उनका एक विलक्षण अग्निमय नेत्र अलग भी है, जो सदा क्रोधसे प्रज्वलित रहता है; वे सब लोकोंमें समाविष्ट होनेके कारण 'सर्व' कहे गये हैं ।। १२८ ।।
धूम्ररूपं च यत् तस्य धूर्जटिस्तेन चोच्यते ।
विश्वेदेवाश्च यत् तस्मिन् विश्वरूपस्ततः स्मृतः ।। १२९ ।।
उनका रूप धूम्रवर्णका है; इसलिये वे 'धूर्जटि' कहलाते हैं। विश्वेदेव उन्हींमें प्रतिष्ठित हैं, इसलिये उनका एक नाम 'विश्वरूप' है ।। १२९ ।।
तिस्रो देवीर्यदा चैव भजते भुवनेश्वरः ।
द्यामपः पृथिवीं चैव त्र्यम्बकश्च ततः स्मृतः ।। १३० ।।
वे भगवान् भुवनेश्वर आकाश, जल और पृथ्वी इन अम्बास्वरूपा तीन देवियोंको अपनाते, उनकी रक्षा करते हैं, इसलिये त्र्यम्बक कहे गये हैं ।। १३० ।।
समेधयति यन्नित्यं सर्वार्थान् सर्वकर्मसु ।
शिवमिच्छन् मनुष्याणां तस्मादेष शिवः स्मृतः ।। १३१ ।।
ये मनुष्योंका कल्याण चाहते हुए उनके समस्त कर्मोंमें सम्पूर्ण अभिलषित पदार्थोंकी समृद्धि (सिद्धि) करते हैं, इसलिये 'शिव' कहे गये हैं ।। १३१ ।।
सहस्राक्षोऽयुताक्षो वा सर्वतोऽक्षिमयोऽपि वा ।
यच्च विश्वं महत् पाति महादेवस्ततः स्मृतः ।। १३२ ।।
उनके सहस्र अथवा दस हजार नेत्र हैं अथवा वे सब ओरसे नेत्रमय ही हैं। भगवान् शिव महान् विश्वका पालन करते हैं; इसलिये 'महादेव' कहे गये हैं ।। १३२ ।।
महत् पूर्वं स्थितो यच्च प्राणोत्पत्तिस्थितश्च यत् ।
स्थितलिङ्गश्च यन्नित्यं तस्मात् स्थाणुरिति स्मृतः ।। १३३ ।।
वे पूर्वकालसे ही महान् रूपमें स्थित हैं, प्राणोंकी उत्पत्ति और स्थितिके कारण हैं तथा उनका लिंगमय शरीर सदा स्थिर रहता है; इसलिये उन्हें 'स्थाणु' कहते हैं ।। १३३ ।।
सूर्याचन्द्रमसोर्लोके प्रकाशन्ते रुचश्च याः ।
ताः केशसंज्ञितास्त्र्यक्षे व्योमकेशस्ततः स्मृतः ।। १३४ ।।
लोकमें जो सूर्य और चन्द्रमाकी किरणें प्रकाशित होती हैं, वे भगवान् त्रिलोचनके केश कही गयी हैं। वे व्योम (आकाश)-में प्रकाशित होती हैं; इसलिये उनका नाम 'व्योमकेश' है ।। १३४ ।।
भूतं भव्यं भविष्यं च सर्वं जगदशेषतः ।
भव एव ततो यस्माद् भूतभव्यभवोद्भवः ॥ १३५ ॥ भूत, वर्तमान और भविष्य सम्पूर्ण जगत् भगवान् शंकरसे ही विस्तारको प्राप्त हुआ है; इसलिये वे ‘भूतभव्यभवोद्भव’ कहे गये हैं ॥ १३५ ॥
कपिः श्रेष्ठ इति प्रोक्तो धर्मश्च वृष उच्यते । स देवदेवो भगवान् कीर्त्यतेऽतो वृषाकपिः ॥ १३६ ॥ कपि कहते हैं श्रेष्ठको और वृष नाम है धर्मका। वृष और कपि दोनों होनेके कारण देवाधिदेव भगवान् शंकर ‘वृषाकपि’ कहलाते हैं ॥ १३६ ॥
ब्रह्माणमिन्द्रं वरुणं यमं धनदमेव च । निगृह्य हरते यस्मात् तस्माद्धर इति स्मृतः ॥ १३७ ॥ वे ब्रह्मा, इन्द्र, वरुण, यम तथा कुबेरको भी काबूमें करके उनसे उनका ऐश्वर्य हर लेते हैं; इसलिये ‘हर’ कहे गये हैं ॥ १३७ ॥
निमीलिताभ्यां नेत्राभ्यां बलाद् देवो महेश्वरः । ललाटे नेत्रमसृजत् तेन त्र्यक्षः स उच्यते ॥ १३८ ॥ उन भगवान् महेश्वरने दोनों नेत्रोंको बंद करके अपने ललाटमें बलपूर्वक तीसरे नेत्रकी सृष्टि की, इसलिये उन्हें त्रिनेत्र कहते हैं ॥ १३८ ॥
विषमस्थः शरीरेषु समश्च प्राणिनामिह । स वायुर्विषमस्थेषु प्राणोऽपानः शरीरिषु ॥ १३९ ॥ वे प्राणियोंके शरीरोंमें विषम संख्यावाले पाँच प्राणोंके साथ निवास करते हुए सदा समभावसे स्थित रहते हैं। विषम परिस्थितियोंमें पड़े हुए समस्त देहधारियोंके भीतर वे ही प्राणवायु और अपानवायुके रूपमें विराजमान हैं ॥ १३९ ॥
पूजयेद् विग्रहं यस्तु लिङ्गं चापि महात्मनः । लिङ्गं पूजयिता नित्यं महतीं श्रियमश्नुते ॥ १४० ॥ जो कोई भी मनुष्य हो, उसे महात्मा शिवके अर्चाविग्रह अथवा लिंग (प्रतीक)-की पूजा करनी चाहिये। लिंग अथवा प्रतिमाकी पूजा करनेवाला पुरुष बड़ी भारी सम्पत्ति प्राप्त कर लेता है ॥ १४० ॥
ऊरुभ्यामर्धमाग्नेयं सोमर्धं च शिवा तनुः । आत्मनोऽर्धं तथा चाग्निः सोमोऽर्धं पुनरुच्यते ॥ १४१ ॥ दोनों जाँघोंसे नीचे भगवान् शिवका आधा शरीर आग्नेय अथवा घोर है तथा उससे ऊपरका आधा शरीर सोम एवं शिव है। किसी-किसीके मतमें उनके सम्पूर्ण शरीरका आधा भाग ‘अग्नि’ और आधा भाग ‘सोम’ कहलाता है ॥ १४१ ॥
तैजसी महती दीप्ता देवेभ्योऽस्य शिवा तनुः । भास्वती मानुषेष्वस्य तनुर्घोराग्निरुच्यते ॥ १४२ ॥
उनका जो शिव शरीर है, वह तेजोमय और परम कान्तिमान् है। वह देवताओंके उपयोगमें आता है तथा मनुष्यलोकमें उनका प्रकाशमान घोर शरीर 'अग्नि' कहलाता है॥ १४२॥
ब्रह्मचर्यं चरत्येष शिवा यास्य तनुस्तया।
यास्य घोरतरा मूर्तिः सर्वानत्ति तयेश्वरः॥ १४३॥
उनकी जो शिव मूर्ति है, वह जगत्की रक्षाके लिये ब्रह्मचर्यका पालन करती है और उनकी जो घोरतर मूर्ति है, उसके द्वारा भगवान् शंकर सम्पूर्ण जगत्का संहार करते हैं॥ १४३॥
यन्निर्दहति यत् तीक्ष्णो यदुग्रो यत् प्रतापवान्।
मांसशोणितमज्जादो यत् ततो रुद्र उच्यते॥ १४४॥
ये प्रतापी देवता प्रलयकालमें अत्यन्त तीक्ष्ण एवं उग्र रूप धारण करके सबको दग्ध कर डालते हैं और प्राणियोंके रक्त, मांस एवं मज्जाको भी भक्षण करते हैं; अतः रौद्रभावके कारण 'रुद्र' कहलाते हैं॥ १४४॥
एष देवो महादेवो योऽसौ पार्थ तवाग्रतः।
संग्रामे शात्रवान् निघ्नंस्त्वया दृष्टः पिनाकधृक्॥ १४५॥
अर्जुन! संग्रामभूमिमें जो तुम्हारे आगे शत्रुओंका संहार करते हुए दिखायी दिये हैं, वे ये ही पिनाकधारी भगवान् महादेव हैं॥ १४५॥
सिन्धुराजवधार्थाय प्रतिज्ञाते त्वयानघ।
कृष्णेन दर्शितः स्वप्ने यस्तु शैलेन्द्रमूर्धनि॥ १४६॥
एष वै भगवान् देवः संग्रामे याति तेऽग्रतः।
येन दत्तानि तेऽस्त्राणि यैस्त्वया दानवा हताः॥ १४७॥
निष्पाप अर्जुन! जब तुमने सिंधुराजके वधकी प्रतिज्ञा की थी, उस समय स्वप्नमें भगवान् श्रीकृष्णने तुम्हें गिरिराजके शिखरपर जिनका दर्शन कराया था, ये वे ही भगवान् शंकर संग्राममें तुम्हारे आगे-आगे चल रहे हैं। उन्होंने ही तुम्हें वे दिव्यास्त्र प्रदान किये थे, जिनके द्वारा तुमने दानवोंका संहार किया है॥ १४६-१४७॥
धन्यं यशस्यमायुष्यं पुण्यं वेदैश्च सम्मितम्।
देवदेवस्य ते पार्थ व्याख्यातं शतरुद्रियम्॥ १४८॥
पार्थ! यह देवाधिदेव भगवान् शिवके 'शतरुद्रिय' स्तोत्रकी व्याख्या की गयी है। यह स्तोत्र वेदोंके समान परम पवित्र तथा धन, यश और आयुकी वृद्धि करनेवाला है॥ १४८॥
सर्वार्थसाधनं पुण्यं सर्वकिल्बिषनाशनम्।
सर्वपापप्रशमनं सर्वदुःखभयापहम्॥ १४९॥
इसके पाठसे सम्पूर्ण मनोरथोंकी सिद्धि होती है। यह पवित्र स्तोत्र सम्पूर्ण किल्बिषोंका नाशक, सब पापोंका निवारक तथा सब प्रकारके दुःख और भयको दूर करनेवाला
है ।। १४९ ।। चतुर्विधमिदं स्तोत्रं यः शृणोति नरः सदा । विजित्य शत्रून् सर्वान् स रुद्रलोके महीयते ।। १५० ।। जो मनुष्य भगवान् शंकरके ब्रह्मा, विष्णु महेश और निर्गुण निराकार—इन चतुर्विध स्वरूपका प्रतिपादन करनेवाले इस स्तोत्रको सदा सुनता है, वह सम्पूर्ण शत्रुओंको जीतकर रुद्रलोकमें प्रतिष्ठित होता है ।। १५० ।। चरितं महात्मनो नित्यं सांग्रामिकमिदं स्मृतम् । पठन् वै शतरुद्रीयं शृण्वंश्च सततोत्थितः ।। १५१ ।। भक्तो विश्वेश्वरं देवं मानुषेषु च यः सदा । वरान् कामान् स लभते प्रसन्ने त्र्यम्बके नरः ।। १५२ ।। परमात्मा शिवका यह चरित सदा संग्राममें विजय दिलानेवाला है, जो सदा उद्यत रहकर शतरुद्रियको पढ़ता और सुनता है तथा मनुष्योंमें जो कोई भी निरन्तर भगवान् विश्वेश्वरका भक्तिभावसे भजन करता है, वह उन त्रिलोचनके प्रसन्न होनेपर समस्त उत्तम कामनाओंको प्राप्त कर लेता है ।। १५१-१५२ ।। गच्छ युद्ध्यस्व कौन्तेय न तवास्ति पराजयः । यस्य मन्त्री च गोप्ता च पार्श्वस्थो हि जनार्दनः ।। १५३ ।। कुन्तीनन्दन! जाओ, युद्ध करो। तुम्हारी पराजय नहीं हो सकती; क्योंकि तुम्हारे मन्त्री, रक्षक और पार्श्ववर्ती साक्षात् भगवान् श्रीकृष्ण हैं ।। १५३ ।।
संजय उवाच
एवमुक्त्वार्जुनं संख्ये पराशरसुतस्तदा ।
जगाम भरतश्रेष्ठ यथागतमरिंदम ॥ १५४ ॥
**संजय कहते हैं—**शत्रुओंका दमन करने-वाले भरतश्रेष्ठ! युद्धस्थलमें अर्जुनसे ऐसा कहकर पराशरनन्दन व्यासजी जैसे आये थे, वैसे चले गये ॥ १५४ ॥
युद्धं कृत्वा महत् घोरं पञ्चाहानि महाबलः ।
ब्राह्मणो निहतो राजन् ब्रह्मलोकमवाप्तवान् ॥ १५५ ॥
राजन्! पाँच दिनोंतक अत्यन्त घोर युद्ध करके महाबली ब्राह्मण द्रोणाचार्य मारे गये और ब्रह्मलोकमें चले गये ॥ १५५ ॥
स्वधीते यत् फलं वेदे तदस्मिन्नपि पर्वणि ।
क्षत्रियाणामभीरूणां युक्तमत्र महत् यशः ॥ १५६ ॥
वेदोंके स्वाध्यायसे जो फल मिलता है, वही इस पर्वके पाठ और श्रवणसे भी प्राप्त होता है। इसमें निर्भय होकर युद्ध करनेवाले वीर क्षत्रियोंके महान् यशका वर्णन है ॥ १५६ ॥
[द्रोणपर्व सम्पूर्णम्]
य इदं पठते पर्व शृणुयाद् वापि नित्यशः । स मुच्यते महापापैः कृतैर्घोरैश्च कर्मभिः ॥ १५७ ॥ जो प्रतिदिन इस पर्वको पढ़ता अथवा सुनता है, वह पहलेके किये हुए बड़े-बड़े पापों तथा घोर कर्मोंसे मुक्त हो जाता है ।। १५७ ।।
यज्ञावाप्तिर्ब्राह्मणस्येह नित्यं घोरे युद्धे क्षत्रियाणां यशश्च । शेषौ वर्णौ काममिष्टं लभेते पुत्रान् पौत्रान् नित्यमिष्टांस्तथैव ॥ १५८ ॥ इसको प्रतिदिन पढ़ने और सुननेसे ब्राह्मणको यज्ञका फल प्राप्त होता है, क्षत्रियोंको घोर युद्धमें सुयशकी प्राप्ति होती है, शेष दो वर्णके लोगोंको भी पुत्र, पौत्र आदि अभीष्ट एवं प्रिय वस्तुएँ उपलब्ध होती हैं ।। १५८ ।।
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि नारायणास्त्रमोक्षपर्वणि द्व्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २०२ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत नारायणास्त्रमोक्षपर्वमें दो सौ दोवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। २०२ ।।
[द्रोणपर्व सम्पूर्णम्]
| अनुष्टुप् छन्द | (अन्य बड़े छन्द) | बड़े छन्दोंको ३२ अक्षरोंके अनुष्टुप् मानकर गिननेपर | कुलयोग | |
|---|---|---|---|---|
| उत्तर भारतीय पाठसे लिये गये श्लोक— | ९३७९॥ | (२९१॥) | ४००॥।- | ९७८०।- |
| दक्षिण भारतीय पाठसे लिये गये श्लोक— | १३० | (५) | ६॥।= | १३६॥।= |
| द्रोणपर्वकी सम्पूर्ण श्लोक-संख्या | ९९१७≡ |
श्रवण-महिमा
स्वधीते यत् फलं वेदे तदस्मिन्नपि पर्वणि ।
क्षत्रियाणामभीरूणां युक्तमत्र महद् यशः ॥ १ ॥ य इदं पठते पर्व शृणुयाद् वापि नित्यशः । स मुच्यते महापापैः कृतैर्घोरैश्च कर्मभिः ॥ २ ॥ यज्ञावाप्तिर्ब्राह्मणस्येह नित्यं घोरे युद्धे क्षत्रियाणां यशश्च । शेषौ वर्णौ काममिष्टं लभेते पुत्रान् पौत्रान् नित्यमिष्टांस्तथैव ॥ ३ ॥
कर्णपर्व
॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥
श्रीमहाभारतम्
कर्णपर्व
प्रथमोऽध्यायः
कर्णवधका संक्षिप्त वृत्तान्त सुनकर जनमेजयका वैशम्पायनजीसे उसे विस्तारपूर्वक कहनेका अनुरोध
नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् ।
देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत् ॥
‘अन्तर्यामी नारायणस्वरूप भगवान् श्रीकृष्ण, (उनके नित्य सखा) नरस्वरूप नरश्रेष्ठ अर्जुन, (उनकी लीला प्रकट करनेवाली) भगवती सरस्वती और (उन लीलाओंका संकलन करनेवाले) महर्षि वेदव्यासको नमस्कार करके जय (महाभारत)-का पाठ करना चाहिये।’
वैशम्पायन उवाच
ततो द्रोणे हते राजन् दुर्योधनमुखा नृपाः ।
भृशमुद्विग्नमनसो द्रोणपुत्रमुपागमन् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— राजन्! द्रोणाचार्यके मारे जानेपर दुर्योधन आदि राजाओंका मन अत्यन्त उद्विग्न हो गया था। वे सब-के-सब द्रोणपुत्र अश्वत्थामाके पास आये ॥ १ ॥
ते द्रोणमनुशोचन्तः कश्मलाभिहतौजसः ।
पर्युपासन्त शोकार्तास्ततः शारद्वतीसुतम् ॥ २ ॥
मोहवश उनका बल और उत्साह नष्ट-सा हो गया था। वे द्रोणाचार्यके लिये बारंबार चिन्ता करते हुए शोकसे व्याकुल हो कृपीकुमार अश्वत्थामाके पास उसके चारों ओर बैठ गये ॥ २ ॥
ते मुहूर्तं समाश्वस्य हेतुभिः शास्त्रसम्मितैः ।
रात्र्यागमे महीपालाः स्वानि वेश्मानि भेजिरे ॥ ३ ॥
वे शास्त्रानुकूल युक्तियोंद्वारा दो घड़ीतक अश्वत्थामाको सान्त्वना देते रहे। फिर रात हो जानेपर समस्त भूपाल अपने-अपने शिविरमें चले गये ॥ ३ ॥
ते वेश्मस्वपि कौरव्य पृथ्वीशा नाप्नुवन् सुखम् ।
चिन्तयन्तः क्षयं तीव्रं दुःखशोकसमन्विताः ॥ ४ ॥
कुरुनन्दन! शिविरोंमें भी वे भूपगण सुख न पा सके। संग्राममें जो घोर विनाश हुआ था, उसका चिन्तन करते हुए दुःख और शोकमें डूब गये ॥ ४ ॥ विशेषतः सूतपुत्रो राजा चैव सुयोधनः । दुःशासनश्च शकुनिः सौबलश्च महाबलः ॥ ५ ॥ उषितास्ते निशां तां तु दुर्योधननिवेशने । चिन्तयन्तः परिक्लेशान् पाण्डवानां महात्मनाम् ॥ ६ ॥ विशेषतः सूतपुत्र कर्ण, राजा दुर्योधन, दुःशासन तथा महाबली सुबलपुत्र शकुनि—ये चारों उस रातको दुर्योधनके ही शिविरमें रहे और महात्मा पाण्डवोंको जो बड़े-बड़े क्लेश दिये गये थे; उनका चिन्तन करते रहे ॥ ५-६ ॥ यत् तद् द्यूते परिक्लिष्टा कृष्णा चानायिता सभाम् । तत् स्मरन्तोऽनुशोचन्तो भृशमुद्विग्नचेतसः ॥ ७ ॥ द्यूत-क्रीडाके समय जो द्रुपदकुमारी कृष्णाको सभामें लाया गया और उसे सर्वथा क्लेश पहुँचाया गया, उसका बारंबार स्मरण करके वे शोकमग्न हो जाते और मन-ही-मन अत्यन्त उद्विग्न हो उठते थे ॥ ७ ॥ तथा तु संचिन्तयतां तान् क्लेशान् द्यूतकारितान् । दुःखेन क्षणदा राजन् जगामाब्दशतोपमा ॥ ८ ॥ राजन्! इस प्रकार पाण्डवोंको जूएके द्वारा प्राप्त कराये गये उन क्लेशोंका चिन्तन करते-करते उनकी वह रात सौ वर्षोंके समान बड़े कष्टसे व्यतीत हुई ॥ ८ ॥ ततः प्रभाते विमले स्थिता दिष्टस्य शासने । चक्रुरावश्यकं सर्वे विधिदृष्टेन कर्मणा ॥ ९ ॥ तदनन्तर निर्मल प्रभातकाल आनेपर दैवके अधीन हुए समस्त कौरवोंने शास्त्रोक्त विधिके अनुसार शौच, स्नान, संध्या-वन्दन आदि आवश्यक कार्य पूर्ण किया ॥ ९ ॥ ते कृत्वावश्यककार्याणि समाश्वस्य च भारत । योगमाज्ञापयामासुर्युद्धाय च विनिर्ययुः ॥ १० ॥ कर्णं सेनापतिं कृत्वा कृतकौतुकमङ्गलाः । पूजयित्वा द्विजश्रेष्ठान् दधिपात्रघृताक्षतैः ॥ ११ ॥ गोभिरश्वैश्च निष्कैश्च वासोभिश्च महाधनैः । वन्द्यमाना जयाशीर्भिः सूतमागधवन्दिभिः ॥ १२ ॥ भरतनन्दन! प्रतिदिनके आवश्यक कार्य सम्पन्न करके आश्वस्त हो उन्होंने सैनिकोंको कवच आदि धारण करके तैयार हो जानेकी आज्ञा दी तथा कौतुक एवं मांगलिक कृत्य पूर्ण करके कर्णको सेनापति बनाकर वे सब-के-सब दही, पात्र, घृत, अक्षत, गौ, अश्व, कण्ठभूषण तथा बहुमूल्य वस्त्रोंद्वारा श्रेष्ठ ब्राह्मणोंका आदर-सत्कार करके सूत, मागध और
वन्दीजनोंद्वारा विजय-सूचक आशीर्वादोंसे अभिवन्दित हो युद्धके लिये निकले ॥ १०—१२ ॥
तथैव पाण्डवा राजन् कृतपूर्वाह्निकक्रियाः ।
शिबिरान्निर्ययुस्तूर्णं युद्धाय कृतनिश्चयाः ॥ १३ ॥
राजन्! इसी प्रकार पाण्डव भी पूर्वाह्नमें किये जानेवाले नित्य कर्मोंका अनुष्ठान करके तुरंत ही शिविरसे बाहर निकले। उन्होंने युद्धके लिये दृढ़ निश्चय कर लिया था ॥ १३ ॥
ततः प्रवृत्ते युद्धं तुमुलं लोमहर्षणम् ।
कुरूणां पाण्डवानां च परस्परजयैषिणाम् ॥ १४ ॥
तदनन्तर एक-दूसरेको जीतनेकी इच्छावाले कौरवों और पाण्डवोंमें भयंकर रोमांचकारी युद्ध आरम्भ हो गया ॥
तयोर्द्वौ दिवसौ युद्धं कुरुपाण्डवसेनयोः ।
कर्णे सेनापतौ राजन् बभूवाद्भुतदर्शनम् ॥ १५ ॥
राजन्! कर्णके सेनापति हो जानेपर उन कौरव-पाण्डव-सेनाओंमें दो दिनोंतक अद्भुत युद्ध हुआ ॥ १५ ॥
ततः शत्रुक्षयं कृत्वा सुमहान्तं रणे वृषः ।
पश्यतां धार्तराष्ट्राणां फाल्गुनेन निपातितः ॥ १६ ॥
उस युद्धमें शत्रुओंका महान् संहार करके कर्ण धृतराष्ट्रपुत्रोंके देखते-देखते अर्जुनके हाथसे मारा गया ॥
ततस्तु संजयः सर्वं गत्वा नागपुरं द्रुतम् ।
आचष्ट धृतराष्ट्राय यद् वृत्तं कुरुजाङ्गले ॥ १७ ॥
तदनन्तर संजयने तुरंत हस्तिनापुरमें जाकर कुरुक्षेत्रमें जो घटना घटित हुई थी, वह सब धृतराष्ट्रसे कह सुनायी ॥ १७ ॥
जनमेजय उवाच
आपगेयं हतं श्रुत्वा द्रोणं चापि महारथम् ।
आजगाम परामार्तिं वृद्धो राजाम्बिकासुतः ॥ १८ ॥
**जनमेजय बोले—**ब्रह्मन्! गंगानन्दन भीष्म तथा महारथी द्रोणको मारा गया सुनकर ही बूढ़े राजा अम्बिकानन्दन धृतराष्ट्रको बड़ी भारी वेदना हुई थी ॥ १८ ॥
स श्रुत्वा निहतं कर्णं दुर्योधनहितैषिणम् ।
कथं द्विजवर प्राणानधारयत दुःखितः ॥ १९ ॥
द्विजश्रेष्ठ! फिर दुर्योधनके हितैषी कर्णके मारे जानेका समाचार सुनकर अत्यन्त दुःखी हो उन्होंने अपने प्राण कैसे धारण किये? ॥ १९ ॥
यस्मिञ्जयाशां पुत्राणां सममन्यत पार्थिवः ।
तस्मिन् हते स कौरव्यः कथं प्राणानधारयत् ॥ २० ॥ कुरुवंशी राजाने जिसके ऊपर अपने पुत्रोंकी विजयकी आशा बाँध रखी थी, उसके मारे जानेपर उन्होंने कैसे प्राण धारण किये? ॥ २० ॥ दुर्मरं तदहं मन्ये नृणां कृच्छ्रेऽपि वर्तताम् । यत्र कर्णं हतं श्रुत्वा नात्यजज्जीवितं नृपः ॥ २१ ॥ मैं समझता हूँ कि बड़े भारी संकटमें पड़ जानेपर भी मनुष्योंके लिये अपने प्राणोंका परित्याग करना अत्यन्त कठिन है, तभी तो कर्णवधका वृत्तान्त सुनकर भी राजा धृतराष्ट्रने इस जीवनका त्याग नहीं किया ॥ २१ ॥ तथा शान्तनवं वृद्धं ब्रह्मन् बाह्लीकमेव च । द्रोणं च सोमदत्तं च भूरिश्रवसमेव च ॥ २२ ॥ तथैव चान्यान् सुहृदः पुत्रान् पौत्रांश्च पातितान् । श्रुत्वा यन्नाजहात् प्राणांस्तन्मन्ये दुष्करं द्विज ॥ २३ ॥ ब्रह्मन्! उन्होंने वृद्ध शान्तनुनन्दन भीष्म, बाह्लीक, द्रोण, सोमदत्त तथा भूरिश्रवाको और अन्यान्य सुहृदों, पुत्रों एवं पौत्रोंको भी शत्रुओंद्वारा मारा गया सुनकर भी जो अपने प्राण नहीं छोड़े, उससे मुझे यही मालूम होता है कि मनुष्यके लिये स्वेच्छापूर्वक मरना बहुत कठिन है ॥ २२-२३ ॥ एतन्मे सर्वमाचक्ष्व विस्तरेण महामुने । न हि तृप्यामि पूर्वेषां शृण्वानश्चरितं महत् ॥ २४ ॥ महामुने! यह सारा वृत्तान्त आप मुझसे विस्तारपूर्वक कहें। मैं अपने पूर्वजोंका महान् चरित्र सुनकर तृप्त नहीं हो रहा हूँ ॥ २४ ॥
इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि जनमेजयवाक्यं नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें जनमेजयवाक्य नामक पहला अध्याय पूरा हुआ ॥ १ ॥
धृतराष्ट्र और संजयका संवाद
द्वितीयोऽध्यायः
धृतराष्ट्र और संजयका संवाद
वैशम्पायन उवाच
हते कर्णे महाराज निशि गावल्र्गणिस्तदा ।
दीनो ययौ नागपुरमश्वैर्वातसमैर्जवे ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजीने कहा—**महाराज! कर्णके मारे जानेपर गवल्र्गणपुत्र संजय अत्यन्त दुःखी हो वायुके समान वेगशाली घोड़ोंद्वारा उसी रातमें हस्तिनापुर जा पहुँचे ॥ १ ॥
स हास्तिनपुरं गत्वा भृशमुद्विग्नचेतनः ।
जगाम धृतराष्ट्रस्य क्षयं प्रक्षीणबान्धवम् ॥ २ ॥
उस समय उनका चित्त अत्यन्त उद्विग्न हो रहा था। हस्तिनापुरमें पहुँचकर वे धृतराष्ट्रके उस महलमें गये, जहाँ रहनेवाले बन्धु-बान्धव प्रायः नष्ट हो चुके थे ॥ २ ॥
स तमुद्वीक्ष्य राजानं कश्मलाभिहतौजसम् ।
ववन्दे प्राञ्जलिर्भूत्वा मूर्ध्ना पादौ नृपस्य ह ॥ ३ ॥
मोहवश जिनके बल और उत्साह नष्ट हो गये थे, उन राजा धृतराष्ट्रका दर्शन करके संजयने उनके चरणोंमें मस्तक झुकाकर हाथ जोड़ प्रणाम किया ॥ ३ ॥
सम्पूज्य च यथान्यायं धृतराष्ट्रं महीपतिम् ।
हा कष्टमिति चोक्त्वा स ततो वचनमाददे ॥ ४ ॥
राजा धृतराष्ट्रका यथायोग्य सम्मान करके संजयने ‘हाय! बड़े कष्टकी बात है’ ऐसा कहकर फिर इस प्रकार वार्तालाप आरम्भ किया— ॥ ४ ॥
संजयोऽहं क्षितिपते कच्चिदास्ते सुखं भवान् ।
स्वदोषैरापदं प्राप्य कच्चिन्नाद्य विमुह्यसि ॥ ५ ॥
‘पृथ्वीनाथ! मैं संजय हूँ। आप सुखसे तो हैं न? अपने ही अपराधोंसे विपत्तिमें पड़कर आज आप मोहित तो नहीं हो रहे हैं? ॥ ५ ॥
हितान्युक्तानि विदुरद्रोणगाङ्गेयकेशवैः ।
अगृहीतान्यनुस्मृत्य कच्चिन्न कुरुषे व्यथाम् ॥ ६ ॥
‘विदुर, द्रोणाचार्य, भीष्म और श्रीकृष्णके कहे हुए हितकारक वचन आपने स्वीकार नहीं किये थे। अब उन वचनोंको बारंबार याद करके क्या आपको व्यथा नहीं होती है? ॥ ६ ॥
रामनारदकण्वाद्यैर्हितमुक्तं सभातले ।
न गृहीतमनुस्मृत्य कच्चिन्न कुरुषे व्यथाम् ॥ ७ ॥
‘सभामें परशुराम, नारद और महर्षि कण्व आदिकी कही हुई हितकर बातें आपने नहीं मानी थीं। अब उन्हें स्मरण करके क्या आपके मनमें कष्ट नहीं हो रहा है? ॥ ७ ॥ सुहृदस्त्वद्धिते युक्तान् भीष्मद्रोणमुखान् परैः । निहतान् युधि संस्मृत्य कच्चिन्न कुरुषे व्यथाम् ॥ ८ ॥ ‘आपके हितमें लगे हुए भीष्म, द्रोण आदि जो सुहृद् युद्धमें शत्रुओंके हाथसे मारे गये हैं, उन्हें याद करके क्या आप व्यथाका अनुभव नहीं करते हैं?’ ॥ ८ ॥ तमेवंवादिनं राजा सूतपुत्रं कृताञ्जलिम् । सुदीर्घमथ निःश्वस्य दुःखार्त इदमब्रवीत् ॥ ९ ॥ हाथ जोड़कर ऐसी बातें कहनेवाले सूतपुत्र संजयसे दुःखातुर राजा धृतराष्ट्रने लंबी साँस खींचकर इस प्रकार कहा ॥ ९ ॥
धृतराष्ट्र उवाच
आपगेये हते शूरे दिव्यास्त्रवति संजय । द्रोणे च परमेष्वासे भृशं मे व्यथितं मनः ॥ १० ॥ **धृतराष्ट्र बोले—**संजय! दिव्यास्त्रोंके ज्ञाता शूरवीर गंगानन्दन भीष्म तथा महाधनुर्धर द्रोणाचार्यके मारे जानेसे मेरे मनमें बड़ी भारी व्यथा हो रही है ॥ १० ॥ यो रथानां सहस्राणि दंशितानां दशैव तु । अहन्यहनि तेजस्वी निजघ्ने वसुसम्भवः ॥ ११ ॥ तं हतं यज्ञसेनस्य पुत्रेणेह शिखण्डिना । पाण्डवेयाभिगुप्तेन श्रुत्वा मे व्यथितं मनः ॥ १२ ॥ जो तेजस्वी भीष्म साक्षात् वसुके अवतार थे और युद्धमें प्रतिदिन दस हजार कवचधारी रथियोंका संहार करते थे। उन्हींको यहाँ पाण्डुपुत्र अर्जुनसे सुरक्षित द्रुपदकुमार शिखण्डीने मार डाला है, यह सुनकर मेरे मनमें बड़ी व्यथा हो रही है ॥ ११-१२ ॥ भार्गवः प्रददौ यस्मै परमास्त्रं महात्मने । साक्षाद् रामेण यो बाल्ये धनुर्वेद उपाकृतः ॥ १३ ॥ यस्य प्रसादात् कौन्तेया राजपुत्रा महारथाः । महारथत्वं सम्प्राप्तास्तथान्ये वसुधाधिपाः ॥ १४ ॥ तं द्रोणं निहतं श्रुत्वा धृष्टद्युम्नेन संयुगे । सत्यसंधं महेष्वासं भृशं मे व्यथितं मनः ॥ १५ ॥ जिन महात्माको भृगुनन्दन परशुरामने उत्तम अस्त्र प्रदान किया था, जिन्हें बाल्यावस्थामें धनुर्वेदकी शिक्षा देनेके लिये साक्षात् परशुरामजीने अपना शिष्य बनाया था, जिनकी कृपासे कुन्तीके पुत्र राजकुमार पाण्डव महारथी हो गये तथा अन्यान्य नरेशोंने भी महारथी कहलानेकी योग्यता प्राप्त की थी, उन्हीं सत्य-प्रतिज्ञ महाधनुर्धर द्रोणाचार्यको
युद्धस्थलमें धृष्टद्युम्नके हाथसे मारा गया सुनकर मेरे मनमें बड़ी पीड़ा हो रही है ॥ १३—१५ ॥
ययोर्लोके पुमानस्त्रे न समोऽस्ति चतुर्विधे ।
तौ द्रोणभीष्मौ श्रुत्वा तु हतौ मे व्यथितं मनः ॥ १६ ॥
संसारमें चार* प्रकारके अस्त्रोंकी विद्यामें जिनकी समानता करनेवाला दूसरा कोई पुरुष नहीं है, उन्हीं द्रोणाचार्य और भीष्मको मारा गया सुनकर मेरे मनमें बड़ा दुःख हो रहा है ॥ १६ ॥
त्रैलोक्ये यस्य चास्त्रेषु न पुमान् विद्यते समः ।
तं द्रोणं निहतं श्रुत्वा किमकुर्वत मामकाः ॥ १७ ॥
तीनों लोकोंमें दूसरा कोई पुरुष जिनके समान अस्त्रवेत्ता नहीं है, उन द्रोणाचार्यको मारा गया सुनकर मेरे पुत्रोंने क्या किया? ॥ १७ ॥
संशप्तकानां च बले पाण्डवेन महात्मना ।
धनंजयेन विक्रम्य गमिते यमसादनम् ॥ १८ ॥
नारायणास्त्रे च हते द्रोणपुत्रस्य धीमतः ।
विप्रद्रुतेष्वनीकेषु किमकुर्वत मामकाः ॥ १९ ॥
महात्मा पाण्डुपुत्र अर्जुनने पराक्रम करके संशप्तकोंकी सारी सेनाको यमलोक पहुँचा दिया और बुद्धिमान् द्रोणकुमार अश्वत्थामाका नारायणास्त्र भी जब शान्त हो गया, उस समय अपनी सेनाओंमें भगदड़ मच जानेपर मेरे पुत्रोंने क्या किया? ॥ १८-१९ ॥
विप्रद्रुतानहं मन्ये निमग्नान् शोकसागरे ।
प्लवमानान् हते द्रोणे सन्ननौकानिवार्णवे ॥ २० ॥
मैं तो समझता हूँ, द्रोणाचार्यके मारे जानेपर मेरे सारे सैनिक भाग चले होंगे, शोकके समुद्रमें डूब गये होंगे, उनकी दशा समुद्रमें नाव मारी जानेपर वहाँ हाथोंसे तैरनेवाले मनुष्योंके समान संकटपूर्ण हो गयी होगी ॥ २० ॥
दुर्योधनस्य कर्णस्य भोजस्य कृतवर्मणः ।
मद्रराजस्य शल्यस्य द्रौणेश्चैव कृपस्य च ॥ २१ ॥
मत्पुत्रस्य च शेषस्य तथान्येषां च संजय ।
विप्रद्रुतेष्वनीकेषु मुखवर्णोऽभवत् कथम् ॥ २२ ॥
संजय! जब सारी सेनाएँ भाग गयीं, तब दुर्योधन, कर्ण, भोजवंशी कृतवर्मा, मद्रराज शल्य, द्रोणकुमार अश्वत्थामा, कृपाचार्य, मरनेसे बचे हुए मेरे पुत्र तथा अन्य लोगोंके मुखकी कान्ति कैसी हो गयी थी? ॥ २१-२२ ॥
एतत् सर्वं यथावृत्तं तथा गावलगणे मम ।
आचक्ष्व पाण्डवेयानां मामकानां च विक्रमम् ॥ २३ ॥
गवल्गणकुमार! मेरे तथा पाण्डुके पुत्रोंके पराक्रमसे सम्बन्ध रखनेवाला यह सारा वृत्तान्त यथार्थरूपसे मुझे कह सुनाओ ॥ २३ ॥
संजय उवाच
तवापराधाद् यद् वृत्तं कौरवेयेषु मारिष । तच्छ्रुत्वा मा व्यथां कार्षीर्दिष्टे न व्यथते बुधः ॥ २४ ॥ संजयने कहा— माननीय नरेश! आपके अपराधसे कौरवोंपर जो कुछ बीता है, उसे सुनकर दुःख न मानियेगा; क्योंकि दैववश जो दुःख प्राप्त होता है, उससे विद्वान् पुरुष व्यथित नहीं होते हैं ॥ २४ ॥
यस्मादभावी भावी वा भवेदर्थो नरं प्रति । अप्राप्तौ तस्य वा प्राप्तौ न कश्चिद् व्यथते बुधः ॥ २५ ॥ प्रारब्धवश मनुष्यको अभीष्ट वस्तुकी प्राप्ति हो भी जाती है और नहीं भी होती है। अतः उसकी प्राप्ति हो या न हो, किसी भी दशामें कोई ज्ञानी पुरुष (हर्ष या) कष्टका अनुभव नहीं करता है ॥ २५ ॥
धृतराष्ट्र उवाच
न व्यथाभ्यधिका काचिद् विद्यते मम संजय । दिष्टमेतत् पुरा मन्ये कथयस्व यथेच्छकम् ॥ २६ ॥ धृतराष्ट्र बोले— संजय! मुझे इससे अधिक कोई व्यथा नहीं होगी, मैं पहलेसे ही ऐसा मानता हूँ कि यह अवश्यम्भावी दैवका विधान है; अतः तुम इच्छानुसार सारा वृत्तान्त कहो ॥ २६ ॥
इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि धृतराष्ट्रसंजयसंवादे द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें धृतराष्ट्र-संजयसंवादविषयक दूसरा अध्याय पूरा हुआ ॥ २ ॥
* अस्त्रोंके चार भेद इस प्रकार हैं—मुक्त, अमुक्त, यन्त्रमुक्त तथा मुक्तामुक्त। जो धनुष या हाथसे शत्रुपर फेंके जाते हैं, वे मुक्त कहलाते हैं, जैसे बाण आदि। जिन्हें हाथमें लिये हुए ही प्रहार किया जाता है, उन अस्त्रोंको अमुक्त कहते हैं, जैसे तलवार आदि। जो यन्त्रसे फेंके जाते हैं, वे यन्त्रमुक्त कहलाते हैं, जैसे गोला आदि तथा जिस अस्त्रको छोड़कर पुनः उसका उपसंहार किया जाता है, अर्थात् जो शत्रुपर चोट करके पुनः प्रयोग करनेवालेके हाथमें आ जाते हैं, वे मुक्तामुक्त कहलाते हैं, जैसे श्रीकृष्णका सुदर्शन चक्र और इन्द्रका वज्र आदि।
अध्याय (पृष्ठ 1594)
तृतीयोऽध्यायः
दुर्योधनके द्वारा सेनाको आश्वासन देना तथा सेनापति कर्णके युद्ध और वधका संक्षिप्त वृत्तान्त
संजय उवाच
हते द्रोणे महेष्वासे तव पुत्रा महारथाः ।
बभूवुरस्वस्थमुखा विषण्णा गतचेतसः ॥ १ ॥
संजयने कहा— महाराज! महाधनुर्धर द्रोणाचार्यके मारे जानेपर आपके महारथी पुत्र विषादग्रस्त और अचेत-से हो गये। उनके मुखपर अस्वस्थताका चिह्न स्पष्ट दिखायी देने लगा ॥ १ ॥
अवाङ्मुखाः शस्त्रभृतः सर्व एव विशाम्पते ।
अप्रेक्षमाणाः शोकार्ता नाभ्यभाषन् परस्परम् ॥ २ ॥
प्रजानाथ! सभी शस्त्रधारी सैनिक मुँह नीचे किये शोकसे व्याकुल हो गये। वे एक-दूसरेकी ओर न तो देखते थे और न बात ही करते थे ॥ २ ॥
तान् दृष्ट्वा व्यथिताकारान् सैन्यानि तव भारत ।
ऊर्ध्वमेव निरैक्षन्त दुःखत्रस्तान्यनेककः ॥ ३ ॥
भरतनन्दन! उन सबको विषादमें डूबा हुआ देख आपकी अनेक सेनाएँ भी दुःखसे संत्रस्त हो ऊपरकी ओर ही दृष्टिपात करने लगीं ॥ ३ ॥
शस्त्राण्येषां तु राजेन्द्र शोणिताक्तानि सर्वशः ।
प्राभ्रश्यन्त कराग्रेभ्यो दृष्ट्वा द्रोणं हतं युधि ॥ ४ ॥
राजेन्द्र! युद्धमें द्रोणाचार्यको मारा गया देख खूनसे रँगे हुए इन सैनिकोंके शस्त्र हाथोंसे छूटकर गिर पड़े ॥ ४ ॥
तानि बद्धान्यरिशानि लम्बमानानि भारत ।
अदृश्यन्त महाराज नक्षत्राणि यथा दिवि ॥ ५ ॥
भरतवंशी महाराज! कमर आदिमें बँधकर लटकते हुए वे अस्त्र-शस्त्र आकाशसे टूटते हुए नक्षत्रोंके समान दिखायी दे रहे थे ॥ ५ ॥
तथा तु स्तिमितं दृष्ट्वा गतसत्त्वमवस्थितम् ।
बलं तव महाराज राजा दुर्योधनोऽब्रवीत् ॥ ६ ॥
नरेश्वर! इस प्रकार आपकी सेनाको प्राणहीन-सी निश्चल खड़ी देख राजा दुर्योधनने कहा— ॥ ६ ॥
भवतां बाहुवीर्यं हि समाश्रित्य मया युधि ।
पाण्डवेयाः समाहूता युद्धं चेदं प्रवर्तितम् ॥ ७ ॥
‘वीरो! आपलोगोंके बाहुबलका भरोसा करके मैंने युद्धके लिये पाण्डवोंको ललकारा है और यह युद्ध आरम्भ किया है ॥ ७ ॥
तदिदं निहते द्रोणे विषण्णमिव लक्ष्यते ।
युध्यमानाश्च समरे योधा वध्यन्ति सर्वशः ॥ ८ ॥
जयो वापि वधो वापि युध्यमानस्य संयुगे ।
भवेत् किमत्र चित्रं वै युध्यध्वं सर्वतोमुखाः ॥ ९ ॥
‘परंतु द्रोणाचार्यके मारे जानेपर यह सारी सेना विषादमें डूबी हुई-सी दिखायी देती है। समर-भूमिमें युद्ध करनेवाले प्रायः सभी योद्धा शत्रुओंके हाथसे मारे जाते हैं। रणभूमिमें जूझनेवाले वीरको कभी विजय भी प्राप्त होती है और कभी उसका वध भी हो जाता है। इसमें आश्चर्यकी कौन-सी बात है? अतः आपलोग सब ओर मुँह करके उत्साहपूर्वक युद्ध करें ॥ ८-९ ॥
पश्यध्वं च महात्मानं कर्णं वैकर्तनं युधि ।
प्रचरन्तं महेष्वासं दिव्यैरस्त्रैर्महाबलम् ॥ १० ॥
‘देखिये, महामना, महाधनुर्धर और महाबली वैकर्तन कर्ण अपने दिव्यास्त्रोंके साथ किस प्रकार युद्धमें विचर रहा है? ॥ १० ॥
यस्य वै युधि संत्रासात् कुन्तीपुत्रो धनंजयः ।
निवर्तते सदा मन्दः सिंहात् क्षुद्रमृगो यथा ॥ ११ ॥
‘जिसके भयसे वह कुन्तीका मूर्ख पुत्र अर्जुन सदा उसी प्रकार मुँह मोड़ लेता है, जैसे सिंहके सामनेसे क्षुद्र मृग भाग जाता है ॥ ११ ॥
येन नागायुतप्राणो भीमसेनो महाबलः ।
मानुषेणैव युद्धेन तामवस्थां प्रवेशितः ॥ १२ ॥
‘जिसने दस हजार हाथियोंके समान बलवाले महाबली भीमसेनको मानव-युद्धके द्वारा ही वैसी दुरवस्थामें डाल दिया था ॥ १२ ॥
येन दिव्यास्त्रविच्छूरो मायावी स घटोत्कचः ।
अमोघया रणे शक्त्या निहतो भैरवं नदन् ॥ १३ ॥
‘जिसने रणभूमिमें भयंकर गर्जना करनेवाले दिव्यास्त्रवेत्ता, शूरवीर मायावी घटोत्कचको अपनी अमोघ शक्तिसे मार डाला था ॥ १३ ॥
तस्य दुर्वारवीर्यस्य सत्यसंधस्य धीमतः ।
बाह्वोर्द्रविणमक्षय्यमद्य द्रक्ष्यथ संयुगे ॥ १४ ॥
‘जिसके पराक्रमको रोकना अत्यन्त कठिन है, उस सत्यप्रतिज्ञ बुद्धिमान् कर्णके अक्षय बाहुबलको आज आपलोग समरांगणमें देखेंगे ॥ १४ ॥
द्रोणपुत्रस्य विक्रान्तं राधेयस्यैव चोभयोः ।
पश्यन्तु पाण्डुपुत्रास्ते विष्णुवासवयोरिव ॥ १५ ॥ 'आज पाण्डव भगवान् विष्णु और इन्द्रके समान शक्तिशाली द्रोणपुत्र तथा राधापुत्र दोनोंके पराक्रमको देखें' ॥ १५ ॥ सर्व एव भवन्तश्च शक्ताः प्रत्येकशोऽपि वा । पाण्डुपुत्रान् रणे हन्तुं ससैन्यान् किमु संहताः ॥ १६ ॥ वीर्यवन्तः कृतास्त्राश्च द्रक्ष्यथाद्य परस्परम् । 'आप सभी योद्धाओंमेंसे प्रत्येक वीर रणभूमिमें सेनासहित पाण्डवोंको मार डालनेकी शक्ति रखता है। फिर जब आपलोग संगठित होकर युद्ध करें तो क्या नहीं कर सकते हैं? आप पराक्रमी और अस्त्रविद्याके विद्वान् हैं; अतः आज एक-दूसरेको अपना-अपना पुरुषार्थ दिखावें' ॥ १६ १/२ ॥
संजय उवाच एवमुक्त्वा ततः कर्णं चक्रे सेनापतिं तदा । तव पुत्रो महावीर्यो भ्रातृभिः सहितोऽनघ ॥ १७ ॥ संजय कहते हैं—निष्पाप नरेश! ऐसा कहकर आपके महापराक्रमी पुत्र दुर्योधनने अपने भाइयोंके साथ मिलकर कर्णको सेनापति बनाया ॥ १७ ॥ सैनापत्यमथावाप्य कर्णो राजन् महारथः । सिंहनादं विनद्योच्चैः प्रायुध्यत रणोत्कटः ॥ १८ ॥ राजन्! सेनापतिका पद पाकर महारथी कर्ण उच्चस्वरसे सिंहनाद करके रणोन्मत्त होकर युद्ध करने लगा ॥ स सृंजयानां सर्वेषां पञ्चालानां च मारिष । केकयानां विदेहानां चकार कदनं महत् ॥ १९ ॥ मान्यवर! उसने समस्त सृंजयों, पांचालों, केकयों और विदेहोंका महान् संहार किया ॥ १९ ॥ तस्येषुधाराः शतशः प्रादुरासञ्छरासनात् । अग्रे पुङ्खे च संसक्ता यथा भ्रमरपङ्क्तयः ॥ २० ॥ उसके धनुषसे सैकड़ों बाणधाराएँ, जो अग्रभाग और पुच्छभागमें परस्पर सटी हुई थीं, भ्रमरपंक्तियोंके समान प्रकट होने लगीं ॥ २० ॥ स पीडयित्वा पञ्चालान् पाण्डवांश्च तरस्विनः । हत्वा सहस्रशो योधानर्जुनेन निपातितः ॥ २१ ॥ वह पांचालों और वेगशाली पाण्डवोंको पीड़ित करके सहस्रों योद्धाओंको मारकर अन्तमें अर्जुनके हाथसे मारा गया ॥ २१ ॥
इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि संजयवाक्यं नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें संजयवाक्य नामक तीसरा अध्याय पूरा हुआ ।। ३ ।।
अध्याय (पृष्ठ 1598)
चतुर्थोऽध्यायः
धृतराष्ट्रका शोक और समस्त स्त्रियोंकी व्याकुलता
वैशम्पायन उवाच
एतच्छ्रुत्वा महाराज धृतराष्ट्रोऽम्बिकासुतः ।
शोकस्यान्तमपश्यन् वै हतं मेने सुयोधनम् ॥ १ ॥
विह्वलः पतितो भूमौ नष्टचेता इव द्विपः ।
वैशम्पायनजी कहते हैं—महाराज! यह सुनकर अम्बिकानन्दन धृतराष्ट्रने यह मान लिया कि अब दुर्योधन भी मारा ही गया। उन्हें अपने शोकका कहीं अन्त नहीं दिखायी देता था। वे अचेत हुए हाथीके समान व्याकुल होकर पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ १ ½ ॥
तस्मिन् निपतिते भूमौ विह्वले राजसत्तमे ॥ २ ॥
आर्तनादो महानासीत् स्त्रीणां भरतसत्तम ।
भरतश्रेष्ठ जनमेजय! राजाओंमें सर्वश्रेष्ठ धृतराष्ट्रके व्याकुल होकर पृथ्वीपर गिर जानेसे महलमें स्त्रियोंका महान् आर्तनाद गूँज उठा ॥ २ ½ ॥
स शब्दः पृथिवीं कृत्स्नां पूरयामास सर्वशः ॥ ३ ॥
शोकार्णवे महाघोरे निमग्ना भरतस्त्रियः ।
रुरुदुर्दुःखशोकार्ता भृशमुद्विग्नचेतसः ॥ ४ ॥
रोदनका वह शब्द वहाँके समूचे भूमण्डलमें व्याप्त हो गया। भरतकुलकी स्त्रियाँ अत्यन्त घोर शोक-समुद्रमें डूब गयीं, उनका चित्त अत्यन्त उद्विग्न हो गया और वे दुःख-शोकसे कातर हो फूट-फूटकर रोने लगीं ॥ ३-४ ॥
राजानं च समासाद्य गान्धारी भरतर्षभ ।
निःसंज्ञा पतिता भूमौ सर्वाण्यन्तःपुराणि च ॥ ५ ॥
भरतभूषण! गान्धारी देवी राजा धृतराष्ट्रके समीप आकर बेहोश हो भूमिपर गिर गयीं। अन्तःपुरकी सारी स्त्रियोंकी यही दशा हुई ॥ ५ ॥
ततस्ताः संजयो राजन् समाश्वासयदातुराः ।
मुह्यमानाः सुबहुशो मुञ्चन्त्यो वारि नेत्रजम् ॥ ६ ॥
राजन्! तब संजयने नेत्रोंसे आँसुओंकी धारा बहाती हुई राजमहलकी उन बहुसंख्यक महिलाओंको, जो आतुर एवं मूर्च्छित हो रही थीं, धीरे-धीरे धीरज बँधाया ॥ ६ ॥
समाश्वस्ताः स्त्रियस्तास्तु वेपमाना मुहुर्मुहुः ।
कदलय इव वातेन धूयमानाः समन्ततः ॥ ७ ॥
आश्वासन पाकर भी वे स्त्रियाँ चारों ओरसे वायु-द्वारा हिलाये जाते हुए केलेके वृक्षोंकी भाँति बारंबार काँप रही थीं ॥ ७ ॥