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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

तत्र सात्यकिपार्थाभ्यां मन्ये शोचन्ति पुत्रकाः ॥ ३७ ॥ सात्यकि और अर्जुनने घोड़ोंको सवारोंसे हीन और मनुष्योंको रथसे वंचित कर दिया है। यह देख-सुनकर मेरे पुत्र शोकमें डूब रहे होंगे ॥ ३७ ॥ ह्यौघान् निहतान् दृष्ट्वा द्रवमाणांस्ततस्ततः । रणे माधवपार्थाभ्यां मन्ये शोचन्ति पुत्रकाः ॥ ३८ ॥ रणक्षेत्रमें सात्यकि और अर्जुनद्वारा मारे गये तथा इधर-उधर भागते हुए अश्वसमूहोंको देखकर मैं मानता हूँ कि मेरे पुत्र शोकदग्ध हो रहे होंगे ॥ ३८ ॥ पत्तिसंघान् रणे दृष्ट्वा धावमानांश्च सर्वशः । निराशा विजये सर्वे मन्ये शोचन्ति पुत्रकाः ॥ ३९ ॥ पैदल सिपाहियोंको रणक्षेत्रमें सब ओर भागते देख मैं समझता हूँ, मेरे सभी पुत्र विजयसे निराश हो शोक कर रहे होंगे ॥ ३९ ॥ द्रोणस्य समतिक्रान्तावनीकमपराजितौ । क्षणेन दृष्ट्वा तौ वीरौ मन्ये शोचन्ति पुत्रकाः ॥ ४० ॥ मेरे मनमें यह बात आती है कि किसीसे पराजित न होनेवाले दोनों वीर अर्जुन और सात्यकिको क्षणभरमें द्रोणाचार्यकी सेनाका उल्लंघन करते देख मेरे पुत्र शोकाकुल हो गये होंगे ॥ ४० ॥ सम्मूढोऽस्मि भृशं तात श्रुत्वा कृष्णधनंजयौ । प्रविष्टौ मामकं सैन्यं सात्वतेन सहाच्युतौ ॥ ४१ ॥ तात! अपनी मर्यादासे कभी च्युत न होनेवाले श्रीकृष्ण और अर्जुनके सात्यकिसहित अपनी सेनामें घुसनेका समाचार सुनकर मैं अत्यन्त मोहित हो रहा हूँ ॥ ४१ ॥ तस्मिन् प्रविष्टे पृतनां शिनीनां प्रवरे रथे । भोजानीकं व्यतिक्रान्ते किमकुर्वत कौरवाः ॥ ४२ ॥ शिनिप्रवर महारथी सात्यकि जब कृतवर्माकी सेनाको लाँघकर कौरवी सेनामें प्रविष्ट हो गये तब कौरवोंने क्या किया? ॥ ४२ ॥ तथा द्रोणेन समरे निगृहीतेषु पाण्डुषु । कथं युद्धमभूत् तत्र तन्ममाचक्ष्व संजय ॥ ४३ ॥ संजय! जब द्रोणाचार्यने समरभूमिमें पूर्वोक्त प्रकारसे पाण्डवोंको रोक दिया, तब वहाँ किस प्रकार युद्ध हुआ? यह सब मुझे बताओ ॥ ४३ ॥ द्रोणो हि बलवान् श्रेष्ठः कृतास्त्रो युद्धदुर्मदः । पञ्चालास्ते महेष्वासं प्रत्यविध्यन् कथं रणे ॥ ४४ ॥ बद्धवैरास्ततो द्रोणे धनंजयजयैषिणः ।

द्रोणाचार्य अस्त्रविद्यामें निपुण, युद्धमें उन्मत्त होकर लड़नेवाले, बलवान् एवं श्रेष्ठ वीर हैं। पांचाल-सैनिकोंने उस समय रणक्षेत्रमें महाधनुर्धर द्रोणको किस प्रकार घायल किया? क्योंकि वे द्रोणाचार्यसे वैर बाँधकर अर्जुनकी विजयकी अभिलाषा रखते थे ॥ ४४ १/२ ॥
भारद्वाजसुतस्तेषु दृढवैरो महारथः ॥ ४५ ॥
अर्जुनश्चापि यच्चक्रे सिन्धुराजवधं प्रति ।
तन्मे सर्वं समाचक्ष्व कुशलो ह्यसि संजय ॥ ४६ ॥
संजय! भरद्वाजके पुत्र महारथी अश्वत्थामा भी पांचालोंसे दृढ़तापूर्वक वैर बाँधे हुए थे। अर्जुनने सिन्धुराज जयद्रथका वध करनेके लिये जो-जो उपाय किया, वह सब मुझसे कहो; क्योंकि तुम कथा कहनेमें कुशल हो ॥

संजय उवाच

आत्मापराधात् सम्भूतं व्यसनं भरतर्षभ ।
प्राप्य प्राकृतवद् वीर न त्वं शोचितुमर्हसि ॥ ४७ ॥
संजयने कहा— भरतश्रेष्ठ! यह सारी विपत्ति आपको अपने ही अपराधसे प्राप्त हुई है। वीर! इसे पाकर निम्न कोटिके मनुष्योंकी भाँति शोक न कीजिये ॥ ४७ ॥
पुरा यदुच्यसे प्राज्ञैः सुहृद्भिर्विदुरादिभिः ।
मा हार्षीः पाण्डवान् राजन्निति तन्न त्वया श्रुतम् ॥ ४८ ॥
पहले जब आपके बुद्धिमान् सुहृद् विदुर आदिने आपसे कहा था कि राजन्! आप पाण्डवोंके राज्यका अपहरण न कीजिये, तब आपने उनकी यह बात नहीं सुनी थी ॥ ४८ ॥
सुहृदां हितकामानां वाक्यं यो न शृणोति ह ।
स महत् व्यसनं प्राप्य शोचते वै यथा भवान् ॥ ४९ ॥
जो हितैषी सुहृदोंकी बात नहीं सुनता है, वह भारी संकटमें पड़कर आपके ही समान शोक करता है ॥ ४९ ॥
याचितोऽसि पुरा राजन् दाशार्हेण शमं प्रति ।
न च तं लब्धवान् कामं त्वत्तः कृष्णो महायशाः ॥ ५० ॥
राजन्! दशार्हनन्दन भगवान् श्रीकृष्णने पहले आपसे शान्तिके लिये याचना की थी; परंतु आपकी ओरसे उन महायशस्वी श्रीकृष्णकी वह इच्छा पूरी नहीं की गयी ॥ ५० ॥
तव निर्गुणतां ज्ञात्वा पक्षपातं सुतेषु च ।
द्वैधीभावं तथा धर्मे पाण्डवेषु च मत्सरम् ॥ ५१ ॥
तव जिह्ममभिप्रायं विदित्वा पाण्डवान् प्रति ।
आर्तप्रलापांश्च बहून् मनुजाधिपसत्तम ॥ ५२ ॥
सर्वलोकस्य तत्त्वज्ञः सर्वलोकेश्वरः प्रभुः ।

वासुदेवस्ततो युद्धं कुरूणामकरोन्महत् ।। ५३ ।। नृपश्रेष्ठ! सम्पूर्ण लोकोंके तत्त्वज्ञ तथा सर्वलोकेश्वर भगवान् श्रीकृष्णने जब यह जान लिया कि आप सर्वथा सद्गुणशून्य हैं, अपने पुत्रोंपर पक्षपात रखते हैं, धर्मके विषयमें आपके मनमें दुविधा बनी हुई है, पाण्डवोंके प्रति आपके हृदयमें डाह है, आप उनके प्रति कुटिलतापूर्ण मनसूबे बाँधते रहते हैं और व्यर्थ ही आर्त मनुष्योंके समान बहुत-सी बातें बनाते हैं, तब उन्होंने कौरव-पाण्डवोंके महान् युद्धका आयोजन किया ।। ५१—५३ ।। आत्मापराधात् सुमहान् प्राप्तस्ते विपुलः क्षयः । नैनं दुर्योधने दोषं कर्तुमर्हसि मानद ।। ५४ ।। मानद! अपने ही अपराधसे आपके सामने यह महान् जनसंहार प्राप्त हुआ है। आपको यह सारा दोष दुर्योधनपर नहीं मढ़ना चाहिये ।। ५४ ।। न हि ते सुकृतं किंचिदादौ मध्ये च भारत । दृश्यते पृष्ठतश्चैव त्वन्मूलो हि पराजयः ।। ५५ ।। भारत! मुझे तो आगे, पीछे या बीचमें आपका कोई भी शुभ कर्म नहीं दिखायी देता। इस पराजयकी जड़ आप ही हैं ।। ५५ ।। तस्मादवस्थितो भूत्वा ज्ञात्वा लोकस्य निर्णयम् । शृणु युद्धं यथावृत्तं घोरं देवासुरोपमम् ।। ५६ ।। इसलिये स्थिर होकर और लोकके नियत स्वभावको जानकर देवासुर-संग्रामके समान भयंकर इस कौरव-पाण्डव-युद्धका यथार्थ वृत्तान्त सुनिये ।। ५६ ।। प्रविष्टे तव सैन्यं तु शैनेये सत्यविक्रमे । भीमसेनमुखाः पार्थाः प्रतियुर्वाहिनीं तव ।। ५७ ।। जब सत्यपराक्रमी सात्यकि कौरव-सेनामें प्रविष्ट हो गये, तब भीमसेन आदि कुन्तीकुमारोंने आपकी विशाल वाहिनीपर आक्रमण किया ।। ५७ ।। आगच्छतस्तान् सहसा क्रुद्धरूपान् सहानुगान् । दधारैको रणे पाण्डून् कृतवर्मा महारथः ।। ५८ ।। सेवकोंसहित कुपित होकर सहसा आक्रमण करनेवाले उन पाण्डववीरोंको रणक्षेत्रमें एकमात्र महारथी कृतवर्माने रोका ।। ५८ ।। यथोद्वृत्तं वारयते वेला वै सलिलार्णवम् । पाण्डुसैन्यं तथा संख्ये हार्दिक्यः समवारयत् ।। ५९ ।। जैसे उद्वेलित हुए महासागरको किनारेकी भूमि आगे बढ़नेसे रोकती है, उसी प्रकार युद्धस्थलमें कृतवर्माने पाण्डव-सेनाको रोक दिया ।। ५९ ।। तत्राद्भुतमपश्याम हार्दिक्यस्य पराक्रमम् । यदेनं सहिताः पार्था नातिचक्रमुराहवे ।। ६० ।।

वहाँ हमने कृतवर्माका अद्भुत पराक्रम देखा। सारे पाण्डव एक साथ मिलकर भी समरांगणमें उसे लाँघ न सके ॥ ६० ॥

ततो भीमस्त्रिभिर्विद्ध्वा कृतवर्माणमाशुगैः ।
शङ्खं दध्मौ महाबाहुर्हर्षयन् सर्वपाण्डवान् ॥ ६१ ॥
तदनन्तर महाबाहु भीमने तीन बाणोंद्वारा कृतवर्माको घायल करके समस्त पाण्डवोंका हर्ष बढ़ाते हुए शंख बजाया ॥ ६१ ॥

सहदेवस्तु विंशत्या धर्मराजश्च पञ्चभिः ।
शतेन नकुलश्चापि हार्दिक्यं समविध्यत ॥ ६२ ॥
सहदेवने बीस, धर्मराजने पाँच और नकुलने सौ बाणोंसे कृतवर्माको बींध डाला ॥ ६२ ॥

द्रौपदेयास्त्रिसप्तत्या सप्तभिश्च घटोत्कचः ।
धृष्टद्युम्नस्त्रिभिश्चापि कृतवर्माणमर्दयत् ॥ ६३ ॥
द्रौपदीके पुत्रोंने तिहत्तर, घटोत्कचने सात और धृष्टद्युम्नने तीन बाणोंद्वारा उसे गहरी चोट पहुँचायी ॥ ६३ ॥

विराटो द्रुपदश्चैव याज्ञसेनिश्च पञ्चभिः ।
शिखण्डी चैव हार्दिक्यं विद्ध्वा पञ्चभिराशुगैः ॥ ६४ ॥
पुनर्विव्याध विंशत्या सायकानां हसन्निव ।
विराट, द्रुपद और उनके पुत्र धृष्टद्युम्नने पाँच-पाँच बाणोंसे उसको घायल किया। फिर शिखण्डीने पहले पाँच बाणोंद्वारा चोट करके फिर हँसते हुए ही बीस बाणोंसे कृतवर्माको बींध डाला ॥ ६४ १/२ ॥

कृतवर्मा ततो राजन् सर्वतस्तान् महारथान् ॥ ६५ ॥
एकैकं पञ्चभिर्विद्ध्वा भीमं विव्याध सप्तभिः ।
धनुर्ध्वजं चास्य तथा रथाद् भूमावपातयत् ॥ ६६ ॥
राजन्! उस समय कृतवर्माने चारों ओर बाण चलाकर उन महारथियोंमेंसे प्रत्येकको पाँच बाणोंद्वारा बींध डाला और भीमसेनको सात बाणोंसे घायल कर दिया। फिर तत्काल ही उनके धनुष और ध्वजको काटकर रथसे पृथ्वीपर गिरा दिया ॥ ६५-६६ ॥

अथैनं छिन्नधन्वानं त्वरमाणो महारथः ।
आजघानोरसि क्रुद्धः सप्तत्या निशितैः शरैः ॥ ६७ ॥
भीमसेनका धनुष कट जानेपर महारथी कृतवर्माने कुपित हो बड़ी उतावलीके साथ सत्तर पैने बाणोंद्वारा उनकी छातीमें गहरा आघात किया ॥ ६७ ॥

स गाढविद्धो बलवान् हार्दिक्यस्य शरोत्तमैः ।
चचाल रथमध्यस्थः क्षितिकम्पे यथाचलः ॥ ६८ ॥

कृतवर्माके श्रेष्ठ बाणोंद्वारा अत्यन्त घायल हुए बलवान् भीमसेन रथके भीतर बैठे हुए ही भूकम्पके समय हिलनेवाले पर्वतके समान काँपने लगे ॥ ६८ ॥ भीमसेनं तथा दृष्ट्वा धर्मराजपुरोगमाः । विसृजन्तः शरान् राजन् कृतवर्माणमर्दयन् ॥ ६९ ॥ राजन्! भीमसेनको वैसी अवस्थामें देखकर धर्मराज आदि महारथियोंने बाणोंकी वर्षा करके कृतवर्माको बड़ी पीड़ा दी ॥ ६९ ॥ तं तथा कोष्ठकीकृत्य रथवंशेन मारिष । विव्यधुः सायकैर्हृष्टा रक्षार्थं मारुतेर्मृधे ॥ ७० ॥ माननीय नरेश! हर्षमें भरे हुए पाण्डव-सैनिक भीमसेनकी रक्षाके लिये अपने रथसमूहद्वारा कृतवर्माको कोष्ठबद्ध-सा करके उसे युद्धस्थलमें अपने बाणोंका निशाना बनाने लगे ॥ ७० ॥ प्रतिलभ्य ततः संज्ञां भीमसेनो महाबलः । शक्तिं जग्राह समरे हेमदण्डामयस्मयीम् ॥ ७१ ॥ इसी बीचमें महाबली भीमसेनने सचेत होकर समरांगणमें सुवर्णमय दण्डसे विभूषित एक लोहेकी शक्ति हाथमें ले ली ॥ ७१ ॥ चिक्षेप च रथात् तूर्णं कृतवर्मरथं प्रति । सा भीमभुजनिर्मुक्ता निर्मुक्तोरगसंनिभा ॥ ७२ ॥ कृतवर्माणमभितः प्रजज्वाल सुदारुणा । और शीघ्र ही उसे अपने रथसे कृतवर्माके रथपर चला दिया। भीमसेनके हाथोंसे छूटी हुई, केंचुलसे निकले हुए सर्पके समान वह भयंकर शक्ति कृतवर्माके समीप जाकर प्रज्वलित हो उठी ॥ ७२ १/२ ॥ तामापतन्तीं सहसा युगान्ताग्निसमप्रभाम् ॥ ७३ ॥ द्वाभ्यां शराभ्यां हार्दिक्यो निजघान द्विधा तदा । उस समय अपने ऊपर आती हुई प्रलयकालकी अग्निके समान उस शक्तिको सहसा दो बाण मारकर कृतवर्माने उसके दो टुकड़े कर दिये ॥ ७३ १/२ ॥ सा छिन्ना पतिता भूमौ शक्तिः कनकभूषणा ॥ ७४ ॥ द्योतयन्ती दिशो राजन् महोल्केव नभश्च्युता । राजन्! सम्पूर्ण दिशाओंको प्रकाशित करती हुई वह सुवर्णभूषित शक्ति कटकर आकाशसे गिरी हुई बड़ी भारी उल्काके समान पृथ्वीपर गिर पड़ी ॥ ७४ १/२ ॥ शक्तिं विनिहतां दृष्ट्वा भीमश्चुक्रोध वै भृशम् ॥ ७५ ॥ ततोऽन्यद् धनुरादाय वेगवत् सुमहास्वनम् । भीमसेनो रणे क्रुद्धो हार्दिक्यं समवारयत् ॥ ७६ ॥

अपनी शक्तिको कटी हुई देख भीमसेनको बड़ा क्रोध हुआ। उन्होंने बड़ी भारी टंकारध्वनि करनेवाले दूसरे वेगशाली धनुषको हाथमें लेकर समरांगणमें कुपित हो कृतवर्माका सामना किया ॥ ७५-७६ ॥ अथैनं पञ्चभिर्बाणैराजघान स्तनान्तरे । भीमो भीमबलो राजंस्तव दुर्मन्त्रितेन च ॥ ७७ ॥ राजन्! आपकी ही कुमन्त्रणासे वहाँ भयंकर बलशाली भीमसेनने कृतवर्माकी छातीमें पाँच बाण मारे ॥ ७७ ॥ भोजस्तु क्षतसर्वाङ्गो भीमसेनेन मारिष । रक्ताशोक इवोत्फुल्लो व्यभ्राजत रणाजिरे ॥ ७८ ॥ माननीय नरेश! भीमसेनने उन बाणोंद्वारा कृतवर्माके सम्पूर्ण अंगोंको क्षत-विक्षत कर दिया। वह रणांगणमें खूनसे लथपथ हो खिले हुए लाल फूलोंवाले अशोकवृक्षके समान सुशोभित होने लगा ॥ ७८ ॥ ततः क्रुद्धस्त्रिभिर्बाणैर्भीमसेनं हसन्निव । अभिहत्य दृढं युद्धे तान् सर्वान् प्रत्यविध्यत ॥ ७९ ॥ त्रिभिस्त्रिभिर्महेष्वासो यतमानान् महारथान् । तदनन्तर उस महाधनुर्धरने क्रोधमें भरकर हँसते हुए ही तीन बाणोंद्वारा भीमसेनको गहरी चोट पहुँचाकर युद्धमें विजयके लिये प्रयत्न करनेवाले उन सभी महारथियोंको तीन-तीन बाणोंसे बींध डाला ॥ ७९ १/२ ॥ तेऽपि तं प्रत्यविध्यन्त सप्तभिः सप्तभिः शरैः ॥ ८० ॥ शिखण्डिनस्ततः क्रुद्धः क्षुरप्रेण महारथः । धनुश्चिच्छेद समरे प्रहसन्निव सात्वतः ॥ ८१ ॥ तब उन महारथियोंने भी कृतवर्माको सात-सात बाण मारे। उस समय क्रोधमें भरे हुए महारथी कृतवर्माने हँसते हुए ही समरांगणमें एक क्षुरप्रद्वारा शिखण्डीका धनुष काट डाला ॥ ८०-८१ ॥ शिखण्डी तु ततः क्रुद्धश्छिन्ने धनुषि सत्वरः । असिं जग्राह समरे शतचन्द्रं च भास्वरम् ॥ ८२ ॥ धनुष कट जानेपर शिखण्डीने तुरंत ही कुपित हो उस युद्धस्थलमें सौ चन्द्रमाओंके चिह्नसे युक्त चमकीली ढाल और तलवार हाथमें ले ली ॥ ८२ ॥ भ्रामयित्वा महच्चर्म चामीकरविभूषितम् । तमसिं प्रेषयामास कृतवर्मरथं प्रति ॥ ८३ ॥ उसने स्वर्णभूषित विशाल ढालको घुमाकर कृतवर्माके रथपर वह तलवार दे मारी ॥ ८३ ॥ स तस्य सशरं चापं छित्त्वा राजन् महानसिः ।

अभ्यगाद् धरणीं राजंश्च्युतं ज्योतिरिवाम्बरात् ॥ ८४ ॥ राजन्! वह महान् खड्ग कृतवर्माके बाणसहित धनुषको काटकर आकाशसे टूटे हुए तारेके समान धरतीमें समा गया ॥ ८४ ॥ एतस्मिन्नेव काले तु त्वरमाणं महारथाः । विव्यधुः सायकैर्गाढं कृतवर्माणमाहवे ॥ ८५ ॥ इसी समय पाण्डव महारथियोंने युद्धमें जल्दी-जल्दी हाथ चलानेवाले कृतवर्माको अपने बाणोंद्वारा भारी चोट पहुँचायी ॥ ८५ ॥ अथान्यद् धनुरादाय त्यक्त्वा तच्च महद् धनुः । विशीर्णं भरतश्रेष्ठः हार्दिक्यः परवीरहा ॥ ८६ ॥ विव्याध पाण्डवान् युद्धे त्रिभिस्त्रिभिरजिह्मगैः । शिखण्डिनं च विव्याध त्रिभिः पञ्चभिरेव च ॥ ८७ ॥ भरतश्रेष्ठ! तदनन्तर शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले कृतवर्माने टूटे हुए उस विशाल धनुषको त्यागकर दूसरा धनुष हाथमें ले लिया और युद्धमें पाण्डवोंको तीन-तीन बाण मारकर घायल कर दिया। साथ ही शिखण्डीको भी तीन और पाँच बाणोंसे बींध डाला ॥ ८६-८७ ॥ धनुरन्यत् समादाय शिखण्डी तु महायशाः । अवारयन् कूर्मनखैराशुगैर्हृदिकामजम् ॥ ८८ ॥ तत्पश्चात् महायशस्वी शिखण्डीने भी दूसरा धनुष लेकर कछुओंके नखोंके समान धारवाले बाणोंद्वारा कृतवर्माका सामना किया ॥ ८८ ॥ ततः क्रुद्धो रणे राजन् हृदिकस्यात्मसम्भवः । अभिदुद्राव वेगेन याज्ञसेनिं महारथम् ॥ ८९ ॥ भीष्मस्य समरे राजन् मृत्योर्हेतुं महात्मनः । विदर्शयन् बलं शूरः शार्दूल इव कुञ्जरम् ॥ ९० ॥ राजन्! जैसे सिंह हाथीपर आक्रमण करता है, उसी प्रकार उस रणक्षेत्रमें कुपित हुए शूरवीर कृतवर्माने समरांगणमें महात्मा भीष्मकी मृत्युका कारण बने हुए महारथी शिखण्डीपर अपने बलका प्रदर्शन करते हुए बड़े वेगसे धावा किया ॥ ८९-९० ॥ तौ दिशां गजसंकाशौ ज्वलिताविव पावकौ । समापेततुरन्योन्यं शरसङ्घैररिंदमौ ॥ ९१ ॥ प्रज्वलित अग्नियोंके समान तेजस्वी तथा शत्रुओंका दमन करनेवाले वे दोनों वीर अपने बाणसमूहोंद्वारा दो दिग्गजोंके समान एक-दूसरेपर टूट पड़े ॥ ९१ ॥ विधुन्वानौ धनुःश्रेष्ठे संदधानौ च सायकान् । विसृजन्तौ च शतशो गभस्तीनिव भास्वरौ ॥ ९२ ॥

जैसे दो सूर्य पृथक्-पृथक् अपनी किरणोंका विस्तार करते हों, उसी प्रकार वे दोनों वीर अपने श्रेष्ठ धनुष हिलाते और उनपर सैकड़ों बाणोंका संधान करके छोड़ते थे ।।
तापयन्तौ शरैस्तीक्ष्णैरन्योन्यं तौ महारथौ ।
युगान्तप्रतिमौ वीरौ रेजतुर्भास्कराविव ।। ९३ ।।
अपने पैने बाणोंद्वारा एक-दूसरेको संताप देते हुए वे दोनों महारथी वीर प्रलयकालके दो सूर्योंके समान शोभा पा रहे थे ।। ९३ ।।
कृतवर्मा च समरे याज्ञसेनिं महारथम् ।
विद्वेषुभिस्त्रिसप्तत्या पुनर्विव्याध सप्तभिः ।। ९४ ।।
कृतवर्मोने समरांगणमें महारथी शिखण्डीको पहले तिहत्तर बाणोंसे घायल करके फिर सात बाणोंसे क्षत-विक्षत कर दिया ।। ९४ ।।
स गाढविद्धो व्यथितो रथोपस्थ उपाविशत् ।
विसृज्य सशरं चापं मूर्च्छयाभिपरिप्लुतः ।। ९५ ।।
उन बाणोंकी गहरी चोट खाकर शिखण्डी व्यथित एवं मूर्च्छित हो धनुष-बाण त्यागकर रथकी बैठकमें बैठ गया ।। ९५ ।।
तं विषण्णं रणे दृष्ट्वा तावकाः पुरुषर्षभ ।
हार्दिक्यं पूजयामासुर्वासांस्यादुधुवुश्च ह ।। ९६ ।।
नरश्रेष्ठ! रणक्षेत्रमें शिखण्डीको विषादग्रस्त देख आपके सैनिक कृतवर्माकी प्रशंसा करने और वस्त्र हिलाने लगे ।। ९६ ।।
शिखण्डिनं तथा ज्ञात्वा हार्दिक्यशरपीडितम् ।
अपोवाह रणाद् यन्ता त्वरमाणो महारथम् ।। ९७ ।।
महारथी शिखण्डीको कृतवर्माके बाणोंसे पीड़ित जान सारथि बड़ी उतावलीके साथ उसे रणभूमिसे बाहर ले गया ।। ९७ ।।
सादितं तु रथोपस्थे दृष्ट्वा पार्थाः शिखण्डिनम् ।
परिवव्रू रथैस्तूर्णं कृतवर्माणमाहवे ।। ९८ ।।
कुन्तीकुमारोंने शिखण्डीको रथके पिछले भागमें बेसुध होकर बैठा देख तुरंत ही कृतवर्माको रणभूमिमें अपने रथोंद्वारा चारों ओरसे घेर लिया ।। ९८ ।।
तत्राद्भुतं परं चक्रे कृतवर्मा महारथः ।
यदेकः समरे पार्थान् वारयामास सानुगान् ।। ९९ ।।
वहाँ महारथी कृतवर्माने अत्यन्त अद्भुत पराक्रम प्रकट किया। उसने अकेले होनेपर भी सेवकोंसहित समस्त पाण्डवोंका समरभूमिमें सामना किया ।। ९९ ।।
पार्थान् जित्वाजयच्चेदीन् पञ्चालान् सृञ्जयानपि ।
केकयांश्च महावीर्यान् कृतवर्मा महारथः ।। १०० ।।

महारथी कृतवर्माने पाण्डवोंको जीतकर चेदिदेशीय सैनिकोंको परास्त किया, फिर पांचालों, सृंजयों और महापराक्रमी केकयोंको भी हरा दिया ॥ १०० ॥

ते वध्यमानाः समरे हार्दिक्येन स्म पाण्डवाः । इतश्चेतश्च धावन्तो नैव चक्रुर्धृतिं रणे ॥ १०१ ॥

समरांगणमें कृतवर्माके बाणोंकी मार खाकर पाण्डव-सैनिक इधर-उधर भागने लगे। वे रणभूमिमें कहीं भी स्थिर न हो सके ॥ १०१ ॥

जित्वा पाण्डुसुतान् युद्धे भीमसेनपुरोगमान् । हार्दिक्यः समरेऽतिष्ठद् विधूम इव पावकः ॥ १०२ ॥

युद्धमें भीमसेन आदि पाण्डवोंको जीतकर कृतवर्मा उस रणक्षेत्रमें धूमरहित अग्निके समान शोभा पाता हुआ खड़ा था ॥ १०२ ॥

ते द्राव्यमाणाः समरे हार्दिक्येन महारथाः । विमुखाः समपद्यन्त शरवृष्टिभिरार्दिताः ॥ १०३ ॥

समरांगणमें कृतवर्माके द्वारा खदेड़े गये और उसकी बाण-वर्षासे पीड़ित हुए पूर्वोक्त सभी महारथियोंने युद्धसे मुँह मोड़ लिया ॥ १०३ ॥

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि जयद्रथवधपर्वणि सात्यकिप्रवेशे कृतवर्मपराक्रमे चतुर्दशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११४ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत जयद्रथवधपर्वमें सात्यकिका कौरव-सेनामें प्रवेश तथा कृतवर्माका पराक्रमविषयक एक सौ चौदहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११४ ॥

११५-

⬅ विषय-सूची (TOC)

पञ्चदशाधिकशततमोऽध्यायः

सात्यकिके द्वारा कृतवर्माकी पराजय, त्रिगर्तोंकी गजसेनाका संहार और जलसंधका वध

संजय उवाच

शृणुष्वैकमना राजन् यन्मां त्वं परिपृच्छसि ।
द्राव्यमाणे बले तस्मिन् हार्दिक्येन महात्मना ॥ १ ॥
लज्जयावनते चापि प्रहृष्टैश्चापि तावकैः ।
द्वीपो य आसीत् पाण्डूनामगाधे गाधमिच्छताम् ॥ २ ॥

संजय कहते हैं—राजन्! आप मुझसे जो कुछ पूछ रहे हैं, उसे एकाग्रचित्त होकर सुनिये। महामना कृतवर्माके द्वारा खदेड़ी जानेके कारण जब पाण्डव-सेना लज्जासे नतमस्तक हो गयी और आपके सैनिक हर्षसे उल्लसित हो उठे, उस समय अथाह सैन्य-समुद्रमें थाह पानेकी इच्छावाले पाण्डव-सैनिकोंके लिये जो द्वीप बनकर आश्रयदाता हुआ (उस सात्यकिका पराक्रम श्रवण कीजिये) ॥ १-२ ॥

श्रुत्वा स निनदं भीमं तावकानां महाहवे ।
शैनेयस्त्वरितो राजन् कृतवर्माणमभ्ययात् ॥ ३ ॥

राजन्! उस महासमरमें आपके सैनिकोंका भयंकर सिंहनाद सुनकर सात्यकिने तुरंत ही कृतवर्मापर आक्रमण किया ॥ ३ ॥

उवाच सारथिं तत्र क्रोधामर्षसमन्वितः ।
हार्दिक्याभिमुखं सूत कुरु मे रथमुत्तमम् ॥ ४ ॥

उन्होंने क्रोध और अमर्षमें भरकर वहाँ सारथिसे कहा—‘सूत! तुम मेरे उत्तम रथको कृतवर्माके सामने ले चलो ॥ ४ ॥

कुरुते कदनं पश्य पाण्डुसैन्ये ह्यमर्षितः ।
एनं जित्वा पुनः सूत यास्यामि विजयं प्रति ॥ ५ ॥

‘देखो, वह अमर्षयुक्त होकर पाण्डव-सेनामें संहार मचा रहा है। सारथे! इसे जीतकर मैं पुनः अर्जुनके पास चलूँगा' ॥ ५ ॥

एवमुक्ते तु वचने सूतस्तस्य महामते ।
निमेषान्तरमात्रेण कृतवर्माणमभ्ययात् ॥ ६ ॥

महामते! सात्यकिके ऐसा कहनेपर सारथि पलक गिरते-गिरते रथ लेकर कृतवर्माके पास जा पहुँचा ॥ ६ ॥

कृतवर्मा तु हार्दिक्यः शैनेयं निशितैः शरैः ।

अवाकिरत् सुसंक्रुद्धस्ततोऽक्रुद्ध्यत् स सात्यकिः ॥ ७ ॥ हृदिकपुत्र कृतवर्माने अत्यन्त कुपित हो सात्यकिपर पैने बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी। इससे सात्यकिका क्रोध भी बहुत बढ़ गया ॥ ७ ॥

अथाशु निशितं भल्लं शैनेयः कृतवर्मणः । प्रेषयामास समरे शरांश्च चतुरोऽपरान् ॥ ८ ॥ उन्होंने तुरंत ही कृतवर्मापर समरभूमिमें एक तीखे भल्लका प्रहार किया। फिर चार बाण और मारे ॥ ८ ॥

ते तस्य जघ्निरे वाहन् भल्लेनास्याच्छिनद् धनुः । पृष्ठरक्षं तथा सूतमविध्यन्निशितैः शरैः ॥ ९ ॥ उन चारों बाणोंने कृतवर्माके चारों घोड़ोंको मार डाला। सात्यकिने भल्ल से उसके धनुषको काट दिया। फिर पैने बाणोंद्वारा उसके पृष्ठरक्षक और सारथिको भी क्षत-विक्षत कर दिया ॥ ९ ॥

ततस्तं विरथं कृत्वा सात्यकिः सत्यविक्रमः । सेनामस्र्दयदामास शरैः संनतपर्वभिः ॥ १० ॥ तदनन्तर सत्यपराक्रमी सात्यकिने कृतवर्माको रथहीन करके झुकी हुई गाँठवाले बाणोंद्वारा उसकी सेनाको पीड़ित करना आरम्भ किया ॥ १० ॥

अभज्यतातथ पृतना शैनेयशरपीडिता । ततः प्रायात् स त्वरितः सात्यकिः सत्यविक्रमः ॥ ११ ॥ सात्यकिके बाणोंसे पीड़ित हो कृतवर्माकी सेना भाग खड़ी हुई। तत्पश्चात् सत्यपराक्रमी सात्यकि तुरंत आगे बढ़ गये ॥ ११ ॥

शृणु राजन् यदकरोत् तव सैन्येषु वीर्यवान् । अतीत्य स महाराज द्रोणानीकमहार्णवम् ॥ १२ ॥ महाराज! पराक्रमी सात्यकिने द्रोणाचार्यके सैन्य-समुद्रको लाँघकर आपकी सेनाओंमें जो पराक्रम किया, उसका वर्णन सुनिये ॥ १२ ॥

पराजित्य तु संहृष्टः कृतवर्माणमाहवे । यन्तारमब्रवीच्छूरः शनैर्याहीत्यसम्भ्रमम् ॥ १३ ॥ उस महासमरमें कृतवर्माको पराजित करके हर्षमें भरे हुए शूरवीर सात्यकि बिना किसी घबराहटके सारथिसे बोले—'सूत! धीरे-धीरे चलो' ॥ १३ ॥

दृष्ट्वा तु तव तत् सैन्यं रथाश्वद्विपसंकुलम् । पदातिजनसम्पूर्णमब्रवीत् सारथिं पुनः ॥ १४ ॥ रथ, घोड़े, हाथी और पैदलोंसे भरी हुई आपकी सेनाको देखकर सात्यकिने पुनः सारथिसे कहा— ॥ १४ ॥

यदेतन्मेघसंकाशं द्रोणानीकस्य सव्यतः ।

सुमहत् कुञ्जरानीकं यस्य रुक्मरथो मुखम् ॥ १५ ॥
एते हि बहवः सूत दुर्निवाराश्च संयुगे ।
दुर्योधनसमादिष्टा मदर्थे त्यक्तजीविताः ॥ १६ ॥
‘सूत! द्रोणाचार्यकी सेनाके बायें भागमें जो यह मेघोंकी घटाके समान विशाल गजसेना दिखायी देती है, इसके मुहानेपर रुक्मरथ खड़ा है। इसमें बहुत-से ऐसे शूरवीर हैं, जिन्हें युद्धमें रोकना अत्यन्त कठिन है। ये दुर्योधनकी आज्ञासे प्राणोंका मोह छोड़कर मेरे साथ युद्ध करनेके लिये खड़े हैं ॥ १५-१६ ॥
(न चाजित्वा रणे ह्येतान् शक्यः प्राप्तुं जयद्रथः ।
नापि पार्थो मया सूत शक्यः प्राप्तुं कथंचन ।।
एते तिष्ठन्ति सहिताः सर्वविद्यासु निष्ठिताः ॥)
‘सूत! इन्हें रणमें परास्त किये बिना न तो जयद्रथको प्राप्त किया जा सकता है और न किसी प्रकार अर्जुन ही मुझे मिल सकते हैं। ये समस्त विद्याओंमें प्रवीण योद्धा एक साथ संगठित होकर खड़े हैं।
राजपुत्रा महेष्वासाः सर्वे विक्रान्तयोधिनः ।
त्रिगर्तानां रथोदाराः सुवर्णविकृतध्वजाः ॥ १७ ॥
‘ये त्रिगर्तदेशके उदार महारथी राजकुमार महान् धनुर्धर हैं और सभी पराक्रमपूर्वक युद्ध करनेवाले हैं। इन सबकी ध्वजा सुवर्णमयी है ।। १७ ।।
मामेवाभिमुखावीरा योत्स्यमाना व्यवस्थिताः ।
अत्र मां प्रापय क्षिप्रमश्वांश्चोदय सारथे ॥ १८ ॥
त्रिगर्तैः सह योत्स्यामि भारद्वाजस्य पश्यतः ।
‘ये समस्त वीर मेरी ही ओर मुँह करके युद्ध करनेके लिये खड़े हैं। सारथे! घोड़ोंको हाँको और मुझे शीघ्र ही इनके पास पहुँचा दो। मैं द्रोणाचार्यके देखते-देखते त्रिगर्तोंके साथ युद्ध करूँगा' ।। १८ १/२ ।।
ततः प्रायाच्छनैः सूतः सात्वतस्य मते स्थितः ॥ १९ ॥
रथेनादित्यवर्णेन भास्वरेण पताकिना ।
तदनन्तर सात्यकिकी सम्मतिके अनुसार सारथि सूर्यके समान तेजस्वी तथा पताकाओंसे विभूषित रथके द्वारा धीरे-धीरे आगे बढ़ा ।। १९ १/२ ।।
तमूहूः सारथेर्वश्या वल्गमाना हयोत्तमाः ॥ २० ॥
वायुवेगसमाः संख्ये कुन्देन्दुरजतप्रभाः ।
उस रथके उत्तम घोड़े कुन्द, चन्द्रमा और चाँदीके समान श्वेत रंगके थे; वे सारथिके अधीन रहनेवाले और वायुके समान वेगशाली थे तथा युद्धमें उछलते हुए उस रथका भार वहन करते थे ॥ २० १/२ ॥
आपतन्तं रणे तं तु शङ्खवर्णैर्हयोत्तमैः ॥ २१ ॥

परिवव्रुस्ततः शूरा गजानीकेन सर्वतः ।
किरन्तो विविधांस्तीक्ष्णान् सायकाँल्लघुवेधिनः ॥ २२ ॥
शंखके समान श्वेत रंगवाले उन उत्तम घोड़ोंद्वारा रणभूमिमें आते हुए सात्यकिको त्रिगर्तदेशीय शूरवीरोंने सब ओरसे गजसेनाद्वारा घेर लिया। शीघ्रतापूर्वक लक्ष्य वेधनेवाले वे समस्त सैनिक नाना प्रकारके तीखे बाणोंकी वर्षा कर रहे थे ॥ २१-२२ ॥

सात्वतो निशितैर्बाणैर्गजानीकमयोधयत् ।
पर्वतानिव वर्षेण तपान्ते जलदो महान् ॥ २३ ॥
सात्यकिने भी पैने बाणोंद्वारा गजसेनाके साथ युद्ध प्रारम्भ किया, मानो वर्षाकालमें महान् मेघ पर्वतोंपर जलकी धारा बरसा रहा हो ॥ २३ ॥

वज्राशनिसमस्पर्शैर्वध्यमानाः शरैर्गजाः ।
प्राद्रवन् रणमुत्सृज्य शिनिवीरसमीरितैः ॥ २४ ॥
शिनिवंशके वीर सात्यकिद्वारा चलाये हुए वज्र और बिजलीके समान स्पर्शवाले उन बाणोंकी मार खाकर उस सेनाके हाथी युद्धका मैदान छोड़कर भागने लगे ॥

शीर्णदन्ता विरुधिरा भिन्नमस्तकपिण्डिकाः ।
विशीर्णकर्णास्यकरा विनियन्तृपताकिनः ॥ २५ ॥

सम्भिन्नमर्मघण्टाश्च विनिकृत्तमहाध्वजाः । हतारोहा दिशो राजन् भेजिरे भ्रष्टकम्बलाः ॥ २६ ॥ उन हाथियोंके दाँत टूट गये, सारे अंगोंसे खूनकी धाराएँ बहने लगीं, कुम्भस्थल और गण्डस्थल फट गये, कान, मुख और शुण्ड छिन्न-भिन्न हो गये, महावत मारे गये और ध्वजा-पताकाएँ टूटकर गिर गयीं। उनके मर्मस्थल विदीर्ण हो गये, घंटे टूट गये और विशाल ध्वज कटकर गिर पड़े। सवार मारे गये तथा झूल खिसककर गिर गये थे। राजन्! ऐसी अवस्थामें उन हाथियोंने भागकर विभिन्न दिशाओंकी शरण ली थी ॥ २५-२६ ॥ रुवन्तो विविधान् नादान् जलदोपमनिःस्वनाः । नाराचैर्वत्ससन्तैश्च भल्लैरञ्जलिकैस्तथा ॥ २७ ॥ क्षुरप्रैरर्धचन्द्रैश्च सात्वतेन विदारिताः । क्षरन्तोऽसृक् तथा मूत्रं पुरीषं च प्रदुद्रुवुः ॥ २८ ॥ उनके चिग्घाड़नेकी ध्वनि मेघोंकी गर्जनाके समान जान पड़ती थी। वे सात्यकिके चलाये हुए नाराच, वत्ससन्त, भल्ल, अंजलिक, क्षुरप्र और अर्द्धचन्द्र नामक बाणोंसे विदीर्ण हो नाना प्रकारसे आर्तनाद करते, रक्त बहाते तथा मल-मूत्र छोड़ते हुए भाग रहे थे ॥ २७-२८ ॥ बभ्रमुश्च स्खलुश्चान्ये पेतुर्मम्लुस्तथापरे । एवं तत् कुञ्जरानीकं युयुधानेन पीडितम् ॥ २९ ॥ शरैरग्न्यर्कसंकाशैः प्रदुद्राव समन्ततः । उनमेंसे कुछ हाथी चक्कर काटने लगे, कुछ लड़खड़ाने लगे, कुछ धराशायी हो गये और कुछ पीड़ाके मारे अत्यन्त शिथिल हो गये थे। इस प्रकार युयुधानके अग्नि और सूर्यके समान तेजस्वी बाणोंद्वारा पीड़ित हुई हाथियोंकी वह सेना सब ओर भाग गयी ॥ २९१/२ ॥ तस्मिन् हते गजानीके जलसंधो महाबलः ॥ ३० ॥ यत्तः सम्प्रापयन्नागं रजताश्वरथं प्रति । उस गजसेनाके नष्ट होनेपर महाबली जलसंध युद्धके लिये उद्यत हो श्वेत घोड़ोंवाले सात्यकिके रथके समीप अपना हाथी ले आया ॥ ३०१/२ ॥ रुक्मवर्मधरः शूरस्तपनीयाङ्गदः शुचिः ॥ ३१ ॥ कुण्डली मुकुटी खड्गी रक्तचन्दनरूषितः । शिरसा धारयन् दीप्तां तपनीयमयीं स्रजम् ॥ ३२ ॥ उरसा धारयन् निष्कं कण्ठसूत्रं च भास्वरम् ।

शूरवीर एवं पवित्र जलसंधने अपने शरीरमें सोनेका कवच धारण कर रखा था। उसकी दोनों भुजाओंमें सोनेके ही बाजूबंद शोभा पा रहे थे। दोनों कानोंमें कुण्डल और मस्तकपर किरीट चमक रहे थे। उसके हाथमें तलवार थी और सम्पूर्ण शरीरमें रक्त चन्दनका लेप लगा हुआ था। उसने अपने सिरपर सोनेकी बनी हुई चमकीली माला और वक्षःस्थलपर प्रकाशमान पदक एवं कण्ठहार धारण कर रखे थे ।। ३१-३२१/२ ।।

चापं च रुक्मविकृतं विधुन्वन् गजमूर्धनि ।। ३३ ।।
अशोभत महाराज सविद्युदिव तोयदः ।
महाराज! हाथीकी पीठपर बैठकर अपने सोनेके बने हुए धनुषको हिलाता हुआ जलसंध बिजलीसहित मेघके समान शोभा पा रहा था ।। ३३१/२ ।।

तमापतन्तं सहसा मागधस्य गजोत्तमम् ।। ३४ ।।
सात्यकिर्वारयामास वेलेव मकरालयम् ।
सहसा अपनी ओर आते हुए मगधराजके उस गजराजको सात्यकिने उसी प्रकार रोक दिया, जैसे तटकी भूमि समुद्रको रोक देती है ।। ३४१/२ ।।

नागं निवारितं दृष्ट्वा शैनेयस्य शरोत्तमैः ।। ३५ ।।
अक्रुध्यत रणे राजन् जलसंधो महाबलः ।
राजन्! सात्यकिके उत्तम बाणोंसे उस हाथीको अवरुद्ध हुआ देख महाबली जलसंध रणक्षेत्रमें कुपित हो उठा ।। ३५१/२ ।।

ततः क्रुद्धो महाराज मार्गणैर्भारसाधनैः ।। ३६ ।।
अविध्यत शिनेः पौत्रं जलसंधो महोरसि ।
महाराज! क्रोधमें भरे हुए जलसंधने भार सहन करनेमें समर्थ बाणोंद्वारा शिनिपौत्र सात्यकिकी विशाल छातीपर गहरा आघात किया ।। ३६१/२ ।।

ततोऽपरेण भल्लेन पीतेन निशितेन च ।। ३७ ।।
अस्यतो वृष्णिवीरस्य निचकर्त शरासनम् ।
तत्पश्चात् दूसरे तीखे, पैने और पानीदार भल्लसे उसने बाण फेंकते हुए वृष्णिवीर सात्यकिके धनुषको काट डाला ।। ३७१/२ ।।

सात्यकिं छिन्नधन्वानं प्रहसन्निव भारत ।। ३८ ।।
अविध्यन्मागधो वीरः पञ्चभिर्निशितैः शरैः ।
भारत! धनुष काटनेके पश्चात् सात्यकिको उस मागध वीरने हँसते हुए ही पाँच तीखे बाणोंद्वारा घायल कर दिया ।। ३८१/२ ।।

स विद्धो बहुभिर्बाणैर्जलसंधेन वीर्यवान् ।। ३९ ।।
नाकम्पत महाबाहुस्तदद्भुतमिवाभवत् ।

जलसंधके बहुत-से बाणोंद्वारा क्षत-विक्षत होनेपर भी पराक्रमी महाबाहु सात्यकि कम्पित नहीं हुए। यह अद्भुत-सी बात थी॥ ३९ १/२ ॥
अचिन्तयन् वै स शरानात्यर्थं सम्भ्रमाद् बली ॥ ४० ॥
धनु रन्यत् समादाय तिष्ठ तिष्ठेत्युवाच ह ।
बलवान् सात्यकिने उसके बाणोंको कुछ भी न गिनते हुए अधिक संभ्रममें न पड़कर दूसरा धनुष हाथमें ले लिया और कहा—‘अरे! खड़ा रह, खड़ा रह’॥ ४० १/२ ॥
एतावदुक्त्वा शैनेयो जलसंधं महोरसि ॥ ४१ ॥
विव्याध षष्ट्या सुभृशं शराणां प्रहसन्निव ।
ऐसा कहकर सात्यकिने हँसते हुए ही साठ बाणोंद्वारा जलसंधकी चौड़ी छातीपर गहरी चोट पहुँचायी॥ ४१ १/२ ॥
क्षुरप्रेण सुतीक्ष्णेन मुष्टिदेशे महद् धनुः ॥ ४२ ॥
जलसंधस्य चिच्छेद विव्याध च त्रिभिः शरैः ।
फिर अत्यन्त तीखे क्षुरप्रसे जलसंधके विशाल धनुषको मुट्ठी पकड़नेकी जगहसे काट दिया और तीन बाण मारकर उसे घायल भी कर दिया॥ ४२ १/२ ॥
जलसंधस्तु तत् त्यक्त्वा सशरं वै शरासनम् ॥ ४३ ॥
तोमरं व्यसृजत् तूर्णं सात्यकिं प्रति मारिष ।
माननीय नरेश! जलसंधने बाणसहित उस धनुषको त्यागकर सात्यकिपर तुरंत ही तोमरका प्रहार किया॥ ४३ १/२ ॥
स निर्भिद्य भुजं सव्यं माधवस्य महारणे ॥ ४४ ॥
अभ्यगाद् धरणीं घोरः श्वसन्निव महोरगः ।
फुफकारते हुए महान् सर्पके समान वह भयंकर तोमर उस महासमरमें सात्यकिकी बायीं भुजाको विदीर्ण करता हुआ धरतीमें समा गया॥ ४४ १/२ ॥
निर्भिन्ने तु भुजे सव्ये सात्यकिः सत्यविक्रमः ॥ ४५ ॥
त्रिंशद्भिर्विशिखैस्तीक्ष्णैर्जलसंधमताडयत् ।
अपनी बायीं भुजाके घायल होनेपर सत्यपराक्रमी सात्यकिने तीस तीखे बाणोंद्वारा जलसंधको आहत कर दिया॥ ४५ १/२ ॥
प्रगृह्य तु ततः खड्गं जलसंधो महाबलः ॥ ४६ ॥
आर्षभं चर्म च महच्छतचन्द्रकसंकुलम् ।
आविध्य च ततः खड्गं सात्वतायोत्ससर्ज ह ॥ ४७ ॥
तब महाबली जलसंधने सौ चन्द्राकार चमकीले चिह्नोंसे युक्त वृषभ-चर्मकी बनी हुई विशाल ढाल और तलवार हाथमें ले ली तथा उस तलवारको घुमाकर सात्यकिपर छोड़ दिया॥ ४६-४७॥

शैनेयस्य धनुश्छित्त्वा स खड्गो न्यपतन्महीम् ।
अलातचक्रवच्चैव व्यरोचत महीं गतः ॥ ४८ ॥
वह खड्ग सात्यकिके धनुषको काटकर पृथ्वीपर गिर पड़ा। धरतीपर पहुँचकर वह अलातचक्रके समान प्रकाशित हो रहा था ॥ ४८ ॥

अथान्यद् धनुरादाय सर्वकायावदारणम् ।
शालस्कन्धप्रतीकाशमिन्द्राशनिसमस्वनम् ॥ ४९ ॥
विस्फार्य विव्यधे क्रुद्धो जलसंधं शरेण ह ।
तब सात्यकिने साखूके तनेके समान विशाल, इन्द्रके वज्रकी भाँति घोर टंकार करनेवाले तथा सबके शरीरको विदीर्ण करनेमें समर्थ दूसरा धनुष हाथमें लेकर उसे कानतक खींचा और कुपित हो एक बाणसे जलसंधको बींध डाला ॥ ४९ १/२ ॥

ततः साभरणौ बाहू क्षुराभ्यां माधवोत्तमः ॥ ५० ॥
सात्यकिर्जलसंधस्य चिच्छेद प्रहसन्निव ।
फिर मधुवंशशिरोमणि सात्यकिने हँसते हुए-से दो छुरोंका प्रहार करके जलसंधकी आभूषणभूषित दोनों भुजाओंको काट दिया ॥ ५० १/२ ॥

तौ बाहू परिघप्रख्यौ पेततुर्गजसत्तमात् ॥ ५१ ॥
वसुंधराधराद् भ्रष्टौ पञ्चशीर्षाविवोरगौ ।
उसकी वे परिघके समान मोटी भुजाएँ उस गजराजकी पीठसे नीचे गिर पड़ीं, मानो पर्वतसे पाँच-पाँच मस्तकोंवाले दो नाग पृथ्वीपर गिरे हों ॥ ५१ १/२ ॥

ततः सुदंष्ट्रं सुमहच्चारुकुण्डलमण्डितम् ॥ ५२ ॥
क्षुरेणास्य तृतीयेन शिरश्चिच्छेद सात्यकिः ।
तदनन्तर सात्यकिने तीसरे छुरेसे उसके सुन्दर दाँतोंवाले मनोहर कुण्डलमण्डित विशाल मस्तकको काट गिराया ॥ ५२ १/२ ॥

तत्पातितशिरोबाहुकबधं भीमदर्शनम् ॥ ५३ ॥
द्विरदं जलसंधस्य रुधिरेणाभ्यषिञ्चत ।
मस्तक और भुजाओंके गिर जानेसे अत्यन्त भयंकर दिखायी देनेवाले जलसंधके उस धड़ने अपने खूनसे उस हाथीको नहला दिया ॥ ५३ १/२ ॥

जलसंधं निहत्याजौ त्वरमाणस्तु सात्वतः ॥ ५४ ॥
विमानं पातयामास गजस्कन्धाद् विशाम्पते ।
प्रजानाथ! युद्धस्थलमें जलसंधको मारकर फुर्ती करनेवाले सात्यकिने हाथीकी पीठसे उसके हौदेको भी गिरा दिया ॥ ५४ १/२ ॥

रुधिरेणावसिक्ताङ्गो जलसंधस्य कुञ्जरः ॥ ५५ ॥
विलम्बमानमवहत् संश्लिष्टं परमासनम् ।

खूनसे भीगे शरीरवाला जलसंधका वह हाथी अपनी पीठसे सटकर लटकते हुए उस हौदेको ढो रहा था ।। ५५ १/३ ।। शरार्दितः सात्वतेन मर्दमानः स्ववाहिनीम् ।। ५६ ।। घोरमार्तस्वरं कृत्वा विदुद्राव महागजाः । सात्यकिके बाणोंसे पीड़ित हो वह महान् गजराज घोर चीत्कार करके अपनी ही सेनाको कुचलता हुआ भाग निकला ।। ५६ १/३ ।। हाहाकारो महानासीत् तव सैन्यस्य मारिष ।। ५७ ।। जलसंधं हतं दृष्ट्वा वृष्णीनामृषभेण तु । आर्य! वृष्णिप्रवर सात्यकिके द्वारा जलसंधको मारा गया देख आपकी सेनामें महान् हाहाकार मच गया ।। ५७ १/३ ।। विमुखाश्चाभ्यधावन्त तव योधाः समन्ततः ।। ५८ ।। पलायनकृतोत्साहा निरुत्साहा द्विषज्जये । आपके योद्धा शत्रुओंपर विजय पानेका उत्साह खो बैठे। अब वे भाग निकलनेमें ही उत्साह दिखाने लगे और युद्धसे मुँह मोड़कर चारों ओर भाग गये ।। ५८ १/३ ।। एतस्मिन्नन्तरे राजन् द्रोणः शस्त्रभृतां वरः ।। ५९ ।। अभ्ययाज्जवनैरश्वैर्युयुधानं महारथम् । राजन्! इसी समय शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ द्रोणाचार्य अपने वेगशाली घोड़ोंद्वारा महारथी युयुधानका सामना करनेके लिये आ पहुँचे ।। ५९ १/३ ।। तमुदीर्णं तथा दृष्ट्वा शैनेयं नरपुङ्गवाः ।। ६० ।। द्रोणेनैव सह क्रुद्धाः सात्यकिं समुपाद्रवन् । शिनिपौत्र सात्यकिको बढ़ते देख नरश्रेष्ठ कौरव महारथी द्रोणाचार्यके साथ ही कुपित हो उनपर टूट पड़े ।। ततः प्रवृत्ते युद्धं कुरूणां सात्वतस्य च । द्रोणस्य च रणे राजन् घोरं देवासुरोपमम् ।। ६१ ।। राजन्! फिर तो उस रणक्षेत्रमें कौरवोंसहित द्रोणाचार्य तथा सात्यकिका देवासुर-संग्रामके समान भयंकर युद्ध होने लगा ।। ६१ ।।

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि जयद्रथवधपर्वणि सात्यकिप्रवेशे जलसंधवधो नाम पञ्चदशाधिकशततमोऽध्यायः ।। ११५ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत जयद्रथवधपर्वमें सात्यकिके कौरव-सेनामें प्रवेशके अवसरपर जलसंधका वध नामक एक सौ पंद्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ११५ ।। (दाक्षिणात्य अधिक पाठके १ १/३ श्लोक मिलाकर कुल ६२ १/३ श्लोक हैं।)

११६-

⬅ विषय-सूची (TOC)

षोडशाधिकशततमोऽध्यायः

सात्यकिका पराक्रम तथा दुर्योधन और कृतवर्माकी पुनः पराजय

संजय उवाच

ते किरन्तः शरव्रातान् सर्वे यत्ताः प्रहारिणः ।
त्वरमाणा महाराज युयुधानमयोधयन् ॥ १ ॥
संजय कहते हैं—महाराज! वे प्रहारकुशल सम्पूर्ण योद्धा सावधान हो बड़ी फुर्तीके साथ बाणसमूहोंकी वर्षा करते हुए वहाँ युयुधानके साथ युद्ध करने लगे ॥ १ ॥

तं द्रोणः सप्तसप्तत्या जघान निशितैः शरैः ।
दुर्मर्षणो द्वादशभिर्दुःसहो दशभिः शरैः ॥ २ ॥
द्रोणाचार्यने सात्यकिको सतहत्तर तीखे बाणोंसे घायल कर दिया। फिर दुर्मर्षणने बारह और दुःसहने दस बाणोंसे उन्हें बींध डाला ॥ २ ॥

विकर्णश्चापि निशितैस्त्रिंशद्भिः कङ्कपत्रिभिः ।
विव्याध सव्ये पार्श्वे तु स्तनाभ्यामन्तरे तथा ॥ ३ ॥
तत्पश्चात् विकर्णने भी कंककी पाँखवाले तीस तीखे बाणोंसे सात्यकिकी बायीं पसली और छाती छेद डाली ॥ ३ ॥

दुर्मुखो दशभिर्बाणैस्तथा दुःशासनोऽष्टभिः ।
चित्रसेनश्च शैनेयं द्वाभ्यां विव्याध मारिष ॥ ४ ॥
आर्य! तदनन्तर दुर्मुखने दस, दुःशासनने आठ और चित्रसेनने दो बाणोंसे सात्यकिको घायल कर दिया ॥ ४ ॥

दुर्योधनश्च महता शरवर्षेण माधवम् ।
अपीडयद् रणे राजन् शूराश्चान्ये महारथाः ॥ ५ ॥
राजन्! उस रणक्षेत्रमें दुर्योधन तथा अन्य शूरवीर महारथियोंने भारी बाण-वर्षा करके सात्यकिको पीड़ित कर दिया ॥ ५ ॥

सर्वतः प्रतिविद्धस्तु तव पुत्रैर्महारथैः ।
तान् प्रत्यविध्यद् वार्ष्णेयः पृथक् पृथगजिह्मगैः ॥ ६ ॥
आपके महारथी पुत्रोंद्वारा सब ओरसे घायल किये जानेपर वृष्णिवंशी वीर सात्यकिने उन सबको पृथक्-पृथक् अपने बाणोंसे बींधकर बदला चुकाया ॥ ६ ॥

भारद्वाजं त्रिभिर्बाणैर्दुःसहं नवभिः शरैः ।
विकर्णं पञ्चविंशत्या चित्रसेनं च सप्तभिः ॥ ७ ॥

दुर्मर्षणं द्वादशभिरष्टाभिश्च विविंशतिम् ।
सत्यव्रतं च नवभिर्विजयं दशभिः शरैः ॥ ८ ॥
उन्होंने द्रोणाचार्यको तीन, दुःसहको नौ, विकर्णको पचीस, चित्रसेनको सात, दुर्मर्षणको बारह, विविंशतिको आठ, सत्यव्रतको नौ तथा विजयको दस बाणोंसे घायल किया ॥ ७-८ ॥

ततो रुक्माङ्गदं चापं विधुन्वानो महारथः ।
अभ्ययात् सात्यकिस्तूर्णं पुत्रं तव महारथम् ॥ ९ ॥
तदनन्तर महारथी सात्यकिने सोनेके अंगदसे विभूषित अपने विशाल धनुषको हिलाते हुए तुरंत ही आपके महारथी पुत्र दुर्योधनपर आक्रमण किया ॥ ९ ॥

राजानं सर्वलोकस्य सर्वलोकमहारथम् ।
शरैरभ्याहनद् गाढं ततो युद्धमभूत् तयोः ॥ १० ॥
सब लोगोंके राजा और समस्त संसारके विख्यात महारथी दुर्योधनको उन्होंने अपने बाणोंद्वारा गहरी चोट पहुँचायी। फिर तो उन दोनोंमें भारी युद्ध छिड़ गया ॥ १० ॥

विमुञ्चन्तौ शरांस्तीक्ष्णान् संदधानौ च सायकान् ।
अदृश्यं समरेऽन्योन्यं चक्रतुस्तौ महारथौ ॥ ११ ॥
उन दोनों महारथियोंने समरभूमिमें बाणोंका संधान और तीखे बाणोंका प्रहार करते हुए एक-दूसरेको अदृश्य कर दिया ॥ ११ ॥

सात्यकिः कुरुराजेन निर्विद्धो बह्वशोभत ।
अस्रवद् रुधिरं भूरि स्वरसं चन्दनो यथा ॥ १२ ॥
सात्यकि कुरुराज दुर्योधनके बाणोंसे बिंधकर अधिक मात्रामें रक्त बहाने लगे। उस समय वे अपना रक्त बहाते हुए लाल चन्दनवृक्षके समान अधिक शोभा पा रहे थे ॥ १२ ॥

सात्वतेन च बाणौघैर्निर्विद्धस्तनयस्तव ।
शातकुम्भमयापीडो बभौ यूप इवोच्छ्रितः ॥ १३ ॥
सात्यकिके बाणसमूहोंसे घायल होकर आपका पुत्र दुर्योधन सुवर्णमय मुकुट धारण किये ऊँचे यूपके समान सुशोभित हो रहा था ॥ १३ ॥

माधवस्तु रणे राजन् कुरुराजस्य धन्विनः ।
धनुश्चिच्छेद समरे क्षुरप्रेण हसन्निव ॥ १४ ॥
राजन्! रणक्षेत्रमें सात्यकिने धनुर्धर दुर्योधनके धनुषको एक क्षुरप्रद्वारा हँसते हुए-से काट दिया ॥ १४ ॥

अथैनं छिन्नधन्वानं शरैर्बहुभिसचिनोत् ।
निर्भिन्नश्च शरैस्तेन द्विषता क्षिप्रकारिणा ॥ १५ ॥
नामृष्यत रणे राजा शत्रोर्विजयलक्षणम् ।