महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
परिनिश्चितकालानि आयूंषीह सुरोत्तमाः ॥ ८१ ॥
‘सुरश्रेष्ठगण! तुमलोग प्राणियोंको उनके कर्म, उन कर्मोंके अनुसार प्राप्त होनेवाली गति तथा नियत कालतककी आयु प्रदान करो ॥ ८१ ॥
इदं कृतयुगं नाम कालः श्रेष्ठः प्रवर्तितः ।
अहिंस्या यज्ञपशवो युगेऽस्मिन् न तदन्यथा ॥ ८२ ॥
‘यह सत्ययुग नामक श्रेष्ठ समय चल रहा है। इस युगमें यज्ञ-पशुओंकी हिंसा नहीं की जाती। अहिंसा-धर्मके विपरीत यहाँ कुछ भी नहीं होता है ॥ ८२ ॥
चतुष्पात् सकलो धर्मो भविष्यत्यत्र वै सुराः ।
ततस्त्रेतायुगं नाम त्रयी यत्र भविष्यति ॥ ८३ ॥
‘देवताओ! इस सत्ययुगमें चारों चरणोंसे युक्त सम्पूर्ण धर्मका पालन होगा। तदनन्तर त्रेतायुग आयेगा, जिसमें वेदत्रयीका प्रचार होगा ॥ ८३ ॥
प्रोक्षिता यत्र पशवो वधं प्राप्स्यन्ति वै मखे ।
यत्र पादश्चतुर्थो वै धर्मस्य न भविष्यति ॥ ८४ ॥
‘उस युगमें यज्ञमें मन्त्रोंद्वारा पवित्र किये गये पशुओंका वध किया जायगा* और धर्मका एक पाद—चतुर्थ अंश कम हो जायगा ॥ ८४ ॥
ततो वै द्वापरं नाम मिश्रः कालो भविष्यति ।
द्विपादहीनो धर्मश्च युगे तस्मिन् भविष्यति ॥ ८५ ॥
‘उसके बाद द्वापर युगका आगमन होगा। वह समय धर्म और अधर्मके सम्मिश्रणसे युक्त होगा। उस युगमें धर्मके दो चरण नष्ट हो जायँगे ॥ ८५ ॥
ततस्तिष्येऽथ सम्प्राप्ते युगे कलिपुरस्कृते ।
एकपादस्थितो धर्मो यत्र तत्र भविष्यति ॥ ८६ ॥
‘तदनन्तर पुष्य नक्षत्रमें कलियुगका पदार्पण होगा। उस समय यत्र-तत्र धर्मका एक चरण ही शेष रह जायगा’ ॥ ८६ ॥
देवा देवर्षयश्चोचुस्तमेवंवादिनं गुरुम् ।
एकपादस्थिते धर्मे यत्र क्वचन गामिनि ॥ ८७ ॥
कथं कर्तव्यमस्माभिर्भगवंस्तद् वदस्व नः ।
तब देवताओं और देवर्षियोंने उपर्युक्त बात कहनेवाले गुरुस्वरूप भगवान्से कहा—‘भगवन्! जब कलियुगमें जहाँ-कहीं भी धर्मका एक ही चरण अवशिष्ट रहेगा, तब हमें क्या करना होगा? यह बताइये’ ॥ ८७ १/२ ॥
श्रीभगवानुवाच
यत्र वेदाश्च यज्ञाश्च तपः सत्यं दमस्तथा ॥ ८८ ॥
अहिंसाधर्मसंयुक्ताः प्रचरेयुः सुरोत्तमाः ।
स वो देशः सेवितव्यो मा वोऽधर्मः पदा स्पृशेत् ॥ ८९ ॥ **श्रीभगवान् बोले—**सुरश्रेष्ठगण! जहाँ वेद, यज्ञ, तप, सत्य, इन्द्रियसंयम और अहिंसाधर्म प्रचलित हों, उसी देशका तुम्हें सेवन करना चाहिये। ऐसा करनेसे तुम्हें अधर्म अपने एक पैरसे भी नहीं छू सकेगा ॥
व्यास उवाच
तेऽनुशिष्टा भगवता देवाः सर्षिगणास्तथा । नमस्कृत्या भगवते जग्मुर्देशान् यथेप्सितान् ॥ ९० ॥ **व्यासजी कहते हैं—**शिष्यो! भगवान्का यह उपदेश पाकर ऋषियोंसहित देवता उन्हें नमस्कार करके अपने अभीष्ट देशोंको चले गये ॥ ९० ॥ गतेषु त्रिदिवौकःसु ब्रह्मैकः पर्यवस्थितः । दिदृक्षुर्भगवन्तं तमनिरुद्धतनौ स्थितम् ॥ ९१ ॥ स्वर्गवासी देवताओंके चले जानेपर अकेले ब्रह्माजी ही वहाँ खड़े रहे। वे अनिरुद्धविग्रहमें स्थित भगवान् श्रीहरिका दर्शन करना चाहते थे ॥ ९१ ॥ तं देवो दर्शयामास कृत्वा हयशिरो महत् । साङ्गानावर्तयन् वेदान् कमण्डलुत्रिदण्डधृक् ॥ ९२ ॥ तब भगवान्ने महान् हयग्रीवरूप धारण करके ब्रह्माजीको दर्शन दिया। वे कमण्डलु और त्रिदण्ड धारण करके छहों अंगोंसहित वेदोंकी आवृत्ति कर रहे थे ॥ ९२ ॥ ततोऽश्वशिरसं दृष्ट्वा तं देवममितौजसम् । लोककर्ता प्रभुर्ब्रह्मा लोकानां हितकाम्यया ॥ ९३ ॥ मूर्ध्ना प्रणम्य वरदं तस्थौ प्राञ्जलिरग्रतः । स परिष्वज्य देवेन वचनं श्रावितस्तदा ॥ ९४ ॥ उस समय अमित पराक्रमी भगवान् हयग्रीवका दर्शन करके सम्पूर्ण जगत्के हितकी कामनासे लोककर्ता भगवान् ब्रह्माने उन्हें मस्तक झुकाकर प्रणाम किया और उन वरदायक देवताके सम्मुख वे हाथ जोड़कर खड़े हो गये। तब भगवान्ने उनको हृदयसे लगाकर यह बात सुनायी ॥ ९३-९४ ॥
श्रीभगवानुवाच
लोककार्यगतीः सर्वास्त्वं चिन्तय यथाविधि । धाता त्वं सर्वभूतानां त्वं प्रभुर्जगतो गुरुः ॥ ९५ ॥ **श्रीभगवान् बोले—**ब्रह्मन्! तुम सम्पूर्ण लोकोंके समस्त कर्मों और उनसे मिलनेवाली गतियोंका विधिपूर्वक चिन्तन करो; क्योंकि तुम्हीं सम्पूर्ण प्राणियोंके धाता हो, तुम्हीं सबके प्रभु हो और तुम्हीं इस जगत्के गुरु हो ॥ ९५ ॥ त्वय्यावेशितभारोऽहं धृतिं प्राप्स्याम्यथाञ्जसा ।
यदा च सुरकार्यं ते अविषह्यं भविष्यति ॥ ९६ ॥ प्रादुर्भावं गमिष्यामि तदाऽऽत्मज्ञानदैशिकः । एवमुक्त्वा हयशिरास्तत्रैवान्तरधीयत ॥ ९७ ॥ तुमपर यह भार रखकर मैं अनायास ही धैर्य धारण करूँगा। जब कभी तुम्हारे लिये देवताओंका कार्य असह्य हो जायगा, तब मैं आत्मज्ञानका उपदेश देनेके लिये तुम्हारे सामने प्रकट हो जाऊँगा। ऐसा कहकर भगवान् हयग्रीव वहीं अन्तर्धान हो गये ॥ ९६-९७ ॥ तेनानुशिष्टो ब्रह्मापि स्वलोकमचिराद् गतः । एवमेष महाभागः पद्मनाभः सनातनः ॥ ९८ ॥ यज्ञेष्वग्रहरः प्रोक्तो यज्ञधारी च नित्यदा । निवृत्तिं चास्थितो धर्मं गतिमक्षयधर्मिणाम् । प्रवृत्तिधर्मान् विदधे कृत्वा लोकस्य चित्रताम् ॥ ९९ ॥ भगवान्का यह उपदेश पाकर ब्रह्मा भी शीघ्र ही अपने लोकको चले गये। इस प्रकार ये महाभाग सनातन पुरुष भगवान् पद्मनाभ यज्ञोंमें अग्रभोक्ता और सदा ही यज्ञके पोषक एवं प्रवर्तक बताये गये हैं। वे कभी अक्षयधर्मी महात्माओंके निवृत्तिधर्मका आश्रय लेते हैं और कभी लोककी विचित्र चित्तवृत्ति करके प्रवृत्तिधर्मका विधान करते हैं ॥ ९८-९९ ॥ स आदिः स मध्यः स चान्तः प्रजानां स धाता स धेयं स कर्ता स कार्यम् । युगान्ते प्रसुप्तः सुसंक्षिप्य लोकान् युगादौ प्रबुद्धो जगद्द्युत्ससर्ज ॥ १०० ॥ वे ही भगवान् नारायण प्रजाके आदि, मध्य और अन्त हैं। वे ही धाता, धेय, कर्ता और कार्य हैं। वे ही युगान्तके समय सम्पूर्ण लोकोंका संहार करके सो जाते हैं और वे ही कल्पके आदिमें जाग्रत् हो सम्पूर्ण जगत्की सृष्टि करते हैं ॥ १०० ॥ तस्मै नमध्वं देवाय निर्गुणाय महात्मने । अजाय विश्वरूपाय धाम्ने सर्वदिवौकसाम् ॥ १०१ ॥ शिष्यो! तुम उन्हीं अजन्मा, विश्वरूप, सम्पूर्ण देवताओंके आश्रय निर्गुण परमात्मा नारायणदेवको नमस्कार करो ॥ १०१ ॥ महाभूताधिपतये रुद्राणां पतये तथा । आदित्यपतये चैव वसूनां पतये तथा ॥ १०२ ॥ वे ही महाभूतोंके अधिपति तथा रुद्रों, आदित्यों और वसुओंके स्वामी हैं। उन्हें नमस्कार करो ॥ १०२ ॥ अश्विभ्यां पतये चैव मरुतां पतये तथा । वेदयज्ञाधिपतये वेदाङ्गपतयेऽपि च ॥ १०३ ॥
वे अश्विनीकुमारोंके पति, मरुद्गणोंके पालक, वेद और यज्ञोंके अधिपति तथा वेदांगोंके भी स्वामी हैं। उन्हें प्रणाम करो ।। १०३ ।।
समुद्रवासिने नित्यं हरये मुञ्जकेशिने ।
शान्ताय सर्वभूतानां मोक्षधर्मानुभाषिणे ।। १०४ ।।
जो सदा समुद्रमें निवास करते हैं, जिनका केश मूँजके समान है तथा जो समस्त प्राणियोंको मोक्षधर्मका उपदेश देते हैं, उन शान्तस्वरूप श्रीहरिको नमस्कार करो ।। १०४ ।।
तपसां तेजसां चैव पतये यशसामपि ।
वचसां पतये नित्यं सरितां पतये तथा ।। १०५ ।।
जो तप, तेज, यश, वाणी तथा सरिताओंके स्वामी एवं नित्य संरक्षक हैं, उन श्रीहरिको नमस्कार करो ।। १०५ ।।
कपर्दिने वराहाय एकशृङ्गाय धीमते ।
विवस्वतेऽश्वशिरसे चतुर्मूर्तिधृते सदा ।। १०६ ।।
जो जटाजूटधारी, एक सींगवाले वराह, बुद्धिमान् विवस्वान्, हयग्रीव तथा चतुर्मूर्तिधारी हैं, उन श्रीनारायण-देवको सदा नमस्कार करो ।। १०६ ।।
गुह्याय ज्ञानदृश्याय अक्षराय क्षराय च ।
एष देवः संचरति सर्वत्रगतिरव्ययः ।। १०७ ।।
जिनका स्वरूप गुह्य है, जो ज्ञानरूपी नेत्रसे ही देखे जाते हैं तथा अक्षर और क्षररूप हैं, उन श्रीहरिको प्रणाम करो। ये अविनाशी नारायणदेव सर्वत्र संचरण करते हैं; इनकी सर्वत्र गति है ।। १०७ ।।
एष चैतत् परं ब्रह्म ज्ञेयो विज्ञानचक्षुषा ।
एवमेतत् पुरा दृष्टं मया वै ज्ञानचक्षुषा ।। १०८ ।।
ये ही परब्रह्म हैं। विज्ञानमय नेत्रसे ही इनका दर्शन एवं ज्ञान हो सकता है। पूर्वकालमें मैंने ज्ञानदृष्टिसे ही इनका इस प्रकार साक्षात्कार किया था ।। १०८ ।।
कथितं तच्च वै सर्वं मया पृष्टेन तत्त्वतः ।
क्रियतां मद्वचः शिष्याः सेव्यतां हरिरीश्वरः ।
गीयतां वेदशब्दैश्च पूज्यतां च यथाविधि ।। १०९ ।।
शिष्यो! तुमलोगोंके पूछनेपर मैंने ये सारी बातें यथार्थरूपसे कही हैं। तुम मेरी बात मानो और सर्वेश्वर श्रीहरिका सेवन करो। वेदमन्त्रोंद्वारा उन्हींकी महिमाका गान और उन्हींका विधिपूर्वक पूजन करो ।। १०९ ।।
वैशम्पायन उवाच
इत्युक्तास्तु वयं तेन वेदव्यासेन धीमता ।
सर्वे शिष्याः सुतश्चास्य शुकः परमधर्मवित् ॥ ११० ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! परम बुद्धिमान् वेदव्यासने हम सब शिष्योंको तथा अपने परम धर्मज्ञ पुत्र शुकदेवको ऐसा ही उपदेश दिया ॥ ११० ॥ स चास्माकमुपाध्यायः सहास्माभिर्विशाम्पते । चतुर्वेदोद्गताभिस्तमृग्भिः समभितुष्टुवे ॥ १११ ॥ प्रजानाथ! फिर हमारे उपाध्याय व्यासने हमारे साथ चारों वेदोंकी ऋचाओंद्वारा उन नारायणदेवका स्तवन किया ॥ १११ ॥ एतत् ते सर्वमाख्यातं यन्मां त्वं परिपृच्छसि । एवं मेऽकथयद् राजन् पुरा द्वैपायनो गुरुः ॥ ११२ ॥ राजन्! तुमने मुझसे जो कुछ पूछा था, वह सब मैंने कह सुनाया। पूर्वकालमें मेरे गुरु व्यासजीने मुझे ऐसा ही उपदेश दिया था ॥ ११२ ॥ यश्चेदं शृणुयान्नित्यं यश्चैनं परिकीर्तयेत् । नमो भगवते कृत्वा समाहितमतिर्नरः ॥ ११३ ॥ भवत्यरोगो मतिमान् बलरूपसमन्वितः । आतुरो मुच्यते रोगाद् बद्धो मुच्येत बन्धनात् ॥ ११४ ॥ जो प्रतिदिन इसे सुनता है और जो भगवान्को नमस्कार करके एकाग्रचित्त हो सदा इसका पाठ करता है, वह बुद्धिमान्, बलवान्, रूपवान् तथा रोगरहित होता है। रोगी रोगसे और बँधा हुआ पुरुष बन्धनसे मुक्त हो जाता है ॥ ११३-११४ ॥ कामान् कामी लभेत् कामं दीर्घं चायुरवाप्नुयात् । ब्राह्मणः सर्ववेदी स्यात् क्षत्रियो विजयी भवेत् ॥ ११५ ॥ कामनावाला पुरुष मनोवांछित कामनाओंको पाता है तथा बड़ी भारी आयु प्राप्त कर लेता है। ब्राह्मण सम्पूर्ण वेदोंका ज्ञाता और क्षत्रिय विजयी होता है ॥ ११५ ॥ वैश्यो विपुललाभः स्याच्छूद्रः सुखमवाप्नुयात् । अपुत्रो लभते पुत्रं कन्या चैवेप्सितं पतिम् ॥ ११६ ॥ वैश्य इसको पढ़ने और सुननेसे महान् लाभका भागी होता है। शूद्र सुख पाता है। पुत्रहीनको पुत्र और कन्याको मनोवांछित पतिकी प्राप्ति होती है ॥ ११६ ॥ लग्नगर्भा विमुच्येत गर्भिणी जनयेत् सुतम् । वन्ध्या प्रसवमाप्नोति पुत्रपौत्रसमृद्धिमत् ॥ ११७ ॥ जिसका गर्भ अटक गया हो, वह इसको सुननेसे उस संकटसे छूट जाती है। गर्भवती स्त्री यथासमय पुत्र पैदा करती है। वन्ध्या भी प्रसवको प्राप्त होती है तथा उसका वह प्रसव पुत्र-पौत्र एवं समृद्धिसे सम्पन्न होता है ॥ ११७ ॥ क्षेमेण गच्छेदध्वानमिदं यः पठते पथि । यो यं कामं कामयते स तमाप्नोति च ध्रुवम् ॥ ११८ ॥
जो मार्गमें इसका पाठ करता है, वह कुशलतापूर्वक अपनी यात्रा पूरी करता है। इसे पढ़ने और सुननेवाला पुरुष जिस वस्तुकी इच्छा करता है, वह उसे अवश्य प्राप्त कर लेता है ॥ ११८ ॥
इदं महर्षेर्वचनं विनिश्चितं
महात्मनः पुरुषवरस्य कीर्तितम् ।
समागमं चर्षिदिवौकसामिमं
निशम्य भक्ताः सुसुखं लभन्ते ॥ ११९ ॥
पुरुषप्रवर महात्मा महर्षि व्यासके कहे हुए इस सिद्धान्तभूत वचनको तथा ऋषियों और देवताओंके समागम-सम्बन्धी इस वृत्तान्तको श्रवण करके भक्तजन उत्तम सुख पाते हैं ॥ ११९ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि नारायणीये
चत्वारिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३४० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें नारायणकी महिमाविषयक तीन सौ चालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३४० ॥
* पशुवधसे यहाँ क्या अभिप्राय है, ठीक समझमें नहीं आया।
भगवान् श्रीकृष्णका अर्जुनको अपने प्रभावका वर्णन करते हुए अपने नामोंकी व्युत्पत्ति एवं माहात्म्य बताना
एकचत्वारिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः
भगवान् श्रीकृष्णका अर्जुनको अपने प्रभावका वर्णन करते हुए अपने नामोंकी व्युत्पत्ति एवं माहात्म्य बताना
जनमेजय उवाच
अस्तौषीद् यैरिमं व्यासः सशिष्यो मधुसूदनम् ।
नामभिर्विविधैरेषां निरुक्तं भगवन् मम ॥ १ ॥
वक्तुमर्हसि शुश्रूषोः प्रजापतिपतेर्हरेः ।
श्रुत्वा भवेयं यत् पूतः शरच्चन्द्र इवामलः ॥ २ ॥
**जनमेजयने कहा—**भगवन्! शिष्योंसहित महर्षि व्यासने जिन नाना प्रकारके नामोंद्वारा इन मधुसूदनका स्तवन किया था, उनका निर्वचन (व्युत्पत्ति) मुझे बतानेकी कृपा करें। मैं प्रजापतियोंके पति भगवान् श्रीहरिके नामोंकी व्याख्या सुनना चाहता हूँ; क्योंकि उन्हें सुनकर मैं शरच्चन्द्रके समान निर्मल एवं पवित्र हो जाऊँगा ॥ १-२ ॥
वैशम्पायन उवाच
शृणु राजन् यथाऽऽचष्ट फाल्गुनस्य हरिः प्रभुः ।
प्रसन्नात्माऽऽत्मनो नाम्नां निरुक्तं गुणकर्मजम् ॥ ३ ॥
**वैशम्पायनजीने कहा—**राजन्! भगवान् श्रीहरिने अर्जुनपर प्रसन्न होकर उनसे गुण और कर्मके अनुसार स्वयं अपने नामोंकी जैसी व्याख्या की थी, वही तुम्हें सुना रहा हूँ, सुनो ॥ ३ ॥
नामभिः कीर्तितैस्तस्य केशवस्य महात्मनः ।
पृष्टवान् केशवं राजन् फाल्गुनः परवीरहा ॥ ४ ॥
नरेश्वर! जिन नामोंके द्वारा उन महात्मा केशवका कीर्तन किया जाता है, शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले अर्जुनने श्रीकृष्णसे उनके विषयमें इस प्रकार पूछा ॥ ४ ॥
अर्जुन उवाच
भगवन् भूतभव्येश सर्वभूतसृगव्यय ।
लोकधाम जगन्नाथ लोकानामभयप्रद ॥ ५ ॥
यानि नामानि ते देव कीर्तितानि महर्षिभिः ।
वेदेषु सपुराणेषु यानि गुह्यानि कर्मभिः ॥ ६ ॥
तेषां निरुक्तं त्वत्तोऽहं श्रोतुमिच्छामि केशव ।
न ह्यन्यो वर्ण येन्नाम्नां निरुक्तं त्वामृते प्रभो ॥ ७ ॥
अर्जुन बोले—भूत, वर्तमान और भविष्य—तीनों कालोंके स्वामी, सम्पूर्ण भूतोंके स्रष्टा, अविनाशी, जगदाधार तथा सम्पूर्ण लोकोंको अभय देनेवाले जगन्नाथ, भगवन्, नारायणदेव! महर्षियोंने आपके जो-जो नाम कहे हैं तथा पुराणों और वेदोंमें कर्मानुसार जो-जो गोपनीय नाम पढ़े गये हैं, उन सबकी व्याख्या मैं आपके मुँहसे सुनना चाहता हूँ। प्रभो! केशव! आपके सिवा दूसरा कोई उन नामोंकी व्युत्पत्ति नहीं बता सकता ॥ ५—७ ॥
श्रीभगवानुवाच
ऋग्वेदे सयजुर्वेदे तथैवाथर्वसामसु ।
पुराणे सोपनिषदे तथैव ज्यौतिषेऽर्जुन ॥ ८ ॥
सांख्ये च योगशास्त्रे च आयुर्वेदे तथैव च ।
बहूनि मम नामानि कीर्तितानि महर्षिभिः ॥ ९ ॥
श्रीभगवान्ने कहा—अर्जुन! ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, उपनिषद्, पुराण, ज्योतिष, सांख्यशास्त्र, योगशास्त्र तथा आयुर्वेदमें महर्षियोंने मेरे बहुत-से नाम कहे हैं ॥ ८-९ ॥
गौणानि तत्र नामानि कर्मजानि च कानिचित् ।
निरुक्तं कर्मजानां त्वं शृणुष्व प्रयतोऽनघ ॥ १० ॥
उनमें कुछ नाम तो गुणोंके अनुसार हैं और कुछ कर्मोंसे हुए हैं। निष्पाप अर्जुन! तुम पहले एकाग्रचित होकर मेरे कर्मजनित नामोंकी व्याख्या सुनो ॥ १० ॥
कथ्यमानं मया तात त्वं हि मेऽर्धं स्मृतः पुरा ।
नमोऽतियशसे तस्मै देहिनां परमात्मने ॥ ११ ॥
नारायणाय विश्वाय निर्गुणाय गुणात्मने ।
तात! मैं तुमसे उन नामोंकी व्युत्पत्ति बताता हूँ, क्योंकि पूर्वकालसे ही तुम मेरे आधे शरीर माने गये हो। जो समस्त देहधारियोंके उत्कृष्ट आत्मा हैं, उन महायशस्वी, निर्गुण सगुणरूप विश्वात्मा भगवान् नारायणदेवको नमस्कार है ॥ ११ १/२ ॥
यस्य प्रसादजो ब्रह्मा रुद्रश्च क्रोधसम्भवः ॥ १२ ॥
योऽसौ योनिर्हि सर्वस्य स्थावरस्य चरस्य च ।
जिनके प्रसादसे ब्रह्मा और क्रोधसे रुद्र प्रकट हुए हैं, वे श्रीहरि ही सम्पूर्ण चराचर जगत्की उत्पत्तिके कारण हैं ॥ १२ १/२ ॥
अष्टादशगुणं यत् तत् सत्त्वं सत्त्ववतां वर ॥ १३ ॥
प्रकृतिः सा परा मह्यं रोदसी योगधारिणी ।
ऋता सत्यामराजय्या लोकानामात्मसंज्ञिता ॥ १४ ॥
बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ अर्जुन! अठारह* गुणोंवाला जो सत्त्व है अर्थात् आदिपुरुष है, वही मेरी परा प्रकृति है। पृथ्वी और आकाशकी आत्मस्वरूपा वह योगबलसे समस्त लोकोंको धारण करनेवाली है। वही ऋता (कर्मफलभूत गतिस्वरूपा), सत्या (त्रिकालाबाधित ब्रह्मरूपा) अमर, अजेय तथा सम्पूर्ण लोकोंकी आत्मा है ।। १३-१४ ।। तस्मात् सर्वाः प्रवर्तन्ते सर्गप्रलयविक्रियाः । तपो यज्ञश्च यष्टा च पुराणः पुरुषो विराट् ।। १५ ।। अनिरुद्ध इति प्रोक्तो लोकानां प्रभवाप्ययः । उसीसे सृष्टि और प्रलय आदि सम्पूर्ण विकार प्रकट होते हैं। वही तप, यज्ञ और यजमान है, वही पुरातन विराट् पुरुष है, उसे ही अनिरुद्ध कहा गया है। उसीसे लोकोंकी सृष्टि और प्रलय होते हैं ।। १५ १/२ ।। ब्राह्मे रात्रिक्षये प्राप्ते तस्य ह्यमिततेजसः ।। १६ ।। प्रसादात् प्रादुरभवत् पद्मं पद्मानिभेक्षण । ततो ब्रह्मा समभवत् स तस्यैव प्रसादजः ।। १७ ।। जब प्रलयकी रात व्यतीत हुई थी, उस समय उन अमित तेजस्वी अनिरुद्धकी कृपासे एक कमल प्रकट हुआ। कमलनयन अर्जुन! उसी कमलसे ब्रह्माजीका प्रादुर्भाव हुआ। वे ब्रह्मा भगवान् अनिरुद्धके प्रसादसे ही उत्पन्न हुए हैं ।। १६-१७ ।। अह्नः क्षये ललाटाच्च सुतो देवस्य वै तथा । क्रोधाविष्टस्य संजज्ञे रुद्रः संहारकारकः ।। १८ ।। ब्रह्माका दिन बीतनेपर क्रोधके आवेशमें आये हुए उस देवके ललाटसे उनके पुत्ररूपमें संहारकारी रुद्र प्रकट हुए ।। १८ ।। एतौ द्वौ विबुधश्रेष्ठौ प्रसादक्रोधजावुभौ । तदादेशितपन्थानौ सृष्टिसंहारकारकौ ।। १९ ।। ये दोनों श्रेष्ठ देवता—ब्रह्मा और रुद्र भगवान्के प्रसाद और क्रोधसे प्रकट हुए हैं तथा उन्हींके बताये हुए मार्गका आश्रय ले सृष्टि और संहारका कार्य पूर्ण करते हैं ।। १९ ।। निमित्तमात्रं तावत्र सर्वप्राणिवरप्रदौ । कपर्दी जटिलो मुण्डः श्मशानगृहसेवकः ।। २० ।। उग्रव्रतचरो रुद्रो योगी परमदारुणः । दक्षक्रतुहरश्चैव भगनेत्रहरस्तथा ।। २१ ।। समस्त प्राणियोंको वर देनेवाले वे दोनों देवता सृष्टि और प्रलयके निमित्तमात्र हैं। (वास्तवमें तो वह सब कुछ भगवान्की इच्छासे ही होता है।) इनमेंसे संहारकारी रुद्रके कपर्दी (जटाजूटधारी), जटिल, मुण्ड, श्मशानगृहका सेवन करनेवाले, उग्र व्रतका आचरण
करनेवाले, रुद्र, योगी, परम दारुण, दक्षयज्ञ-विध्वंसक तथा भगनेत्रहारी आदि अनेक नाम हैं ॥ २०-२१ ॥
नारायणात्मको ज्ञेयः पाण्डवेय युगे युगे । तस्मिन् हि पूज्यमाने वै देवदेवे महेश्वरे ॥ २२ ॥ सम्पूजितो भवेत् पार्थ देवो नारायणः प्रभुः । पाण्डुनन्दन! इन भगवान् रुद्रको नारायणस्वरूप ही जानना चाहिये। पार्थ! प्रत्येक युगमें उन देवाधिदेव महेश्वरकी पूजा करनेसे सर्वसमर्थ भगवान् नारायणकी ही पूजा होती है ॥ २२ १/२ ॥
अहमात्मा हि लोकानां विश्वेषां पाण्डुनन्दन ॥ २३ ॥ तस्मादात्मानमेवाग्रे रुद्रं सम्पूजयाम्यहम् । पाण्डुकुमार! मैं सम्पूर्ण जगत्का आत्मा हूँ। इसलिये मैं पहले अपने आत्मारूप रुद्रकी ही पूजा करता हूँ ॥ २३ १/२ ॥
यद्यहं नार्चयेयं वै ईशानं वरदं शिवम् ॥ २४ ॥ आत्मानं नार्चयेत् कश्चिदिति मे भावितात्मनः । यदि मैं वरदाता भगवान् शिवकी पूजा न करूँ तो दूसरा कोई भी उन आत्मारूप शंकरका पूजन नहीं करेगा, ऐसी मेरी धारणा है ॥ २४ १/२ ॥
मया प्रमाणं हि कृतं लोकः समनुवर्तते ॥ २५ ॥ प्रमाणानि हि पूज्यानि ततस्तं पूजयाम्यहम् । यस्तं वेत्ति स मां वेत्ति योऽनुतं स हि मामनु ॥ २६ ॥ मेरे किये हुए कार्यको प्रमाण या आदर्श मानकर सब लोग उसका अनुसरण करते हैं। जिनकी पूजनीयता वेदशास्त्रोंद्वारा प्रमाणित है, उन्हीं देवताओंकी पूजा करनी चाहिये। ऐसा सोचकर ही मैं रुद्रदेवकी पूजा करता हूँ। जो रुद्रको जानता है, वह मुझे जानता है। जो उनका अनुगामी है, वह मेरा भी अनुगामी है ॥
रुद्रो नारायणश्चैव सत्त्वमेकं द्विधाकृतम् । लोके चरति कौन्तेय व्यक्तिस्थं सर्वकर्मसु ॥ २७ ॥ कुन्तीनन्दन! रुद्र और नारायण दोनों एक ही स्वरूप हैं, जो दो स्वरूप धारण करके भिन्न-भिन्न व्यक्तियोंमें स्थित हो संसारमें यज्ञ आदि सब कर्मोंमें प्रवृत्त होते हैं ॥ २७ ॥
न हि मे केनचिद् देयो वरः पाण्डवनन्दन । इति संचिन्त्य मनसा पुराणं रुद्रमीश्वरम् ॥ २८ ॥ पुत्रार्थमाराधितवानहमात्मानमात्मना । पाण्डवोंको आनन्दित करनेवाले अर्जुन! मुझे दूसरा कोई वर नहीं दे सकता; यही सोचकर मैंने पुत्र-प्राप्तिके लिये स्वयं ही अपने आत्मारूप पुराणपुरुष जगदीश्वर रुद्रकी आराधना की थी ॥ २८ १/२ ॥
न हि विष्णुः प्रणमति कस्मैचिद् विबुधाय च ॥ २९ ॥ ऋते आत्मानमेवेति ततो रुद्रं भजाम्यहम्। विष्णु अपने आत्मस्वरूप रुद्रके सिवा किसी दूसरे देवताको प्रणाम नहीं करते; इसलिये मैं रुद्रका भजन करता हूँ॥ २९ १/२ ॥
सब्रह्मकाः सरुद्राश्च सेन्द्रा देवाः सहर्षिभिः ॥ ३० ॥ अर्चयन्ति सुरश्रेष्ठं देवं नारायणं हरिम्। ब्रह्मा, रुद्र, इन्द्र तथा ऋषियोंसहित सम्पूर्ण देवता सुरश्रेष्ठ नारायणदेव श्रीहरिकी अर्चना करते हैं॥ ३० १/२ ॥
भविष्यतां वर्ततां च भूतानां चैव भारत ॥ ३१ ॥ सर्वेषामग्रणीर्विष्णुः सेव्यः पूज्यश्च नित्यशः। भरतनन्दन! भूत, भविष्य और वर्तमान तीनों कालोंमें होनेवाले समस्त पुरुषोंके भगवान् विष्णु ही अग्रगण्य हैं; अतः सबको सदा उन्हींकी सेवा-पूजा करनी चाहिये॥ ३१ १/२ ॥
नमस्व हव्यदं विष्णुं तथा शरणदं नम ॥ ३२ ॥ वरदं नमस्व कौन्तेय हव्यकव्यभुजं नम। कुन्तीकुमार! तुम हव्यदाता विष्णुको नमस्कार करो, शरणदाता श्रीहरिको शीश झुकाओ, वरदाता विष्णुकी वन्दना करो तथा हव्यकव्यभोक्ता भगवान्को प्रणाम करो॥ ३२ १/२ ॥
चतुर्विधा मम जना भक्ता एव हि मे श्रुतम् ॥ ३३ ॥ तेषामेकान्तिनः श्रेष्ठा ये चैवानन्यदेवताः। अहमेव गतिस्तेषां निराशीः कर्मकारिणाम् ॥ ३४ ॥ तुमने मुझसे सुना है कि आर्त, जिज्ञासु, अर्थार्थी और ज्ञानी—ये चार प्रकारके मनुष्य मेरे भक्त हैं। इनमें जो एकान्ततः मेरा ही भजन करते हैं, दूसरे देवताओंको अपना आराध्य नहीं मानते हैं, वे सबसे श्रेष्ठ हैं। निष्कामभावसे समस्त कर्म करनेवाले उन भक्तोंकी परमगति मैं ही हूँ॥
ये च शिष्टास्त्रयो भक्ताः फलकामा हि ते मताः। सर्वे च्यवनधर्माणस्ते प्रतिबुद्धस्तु श्रेष्ठभाक् ॥ ३५ ॥ जो शेष तीन प्रकारके भक्त हैं, वे फलकी इच्छा रखनेवाले माने गये हैं। अतः वे सभी नीचे गिरनेवाले होते हैं—पुण्यभोगके अनन्तर स्वर्गादिलोकोंसे च्युत हो जाते हैं, परंतु ज्ञानी भक्त सर्वश्रेष्ठ फल (भगवत्प्राप्ति)का भागी होता है॥ ३५॥
ब्रह्माणं शितिकण्ठं च याश्चान्या देवताः स्मृताः। प्रबुद्धचर्याः सेवन्तो मामेवैष्यन्ति यत् परम् ॥ ३६ ॥
ज्ञानी भक्त ब्रह्मा, शिव तथा दूसरे देवताओंकी निष्काम भावसे सेवा करते हुए भी अन्तमें मुझ परमात्माको ही प्राप्त होते हैं ।। ३६ ।। भक्तं प्रति विशेषस्ते एष पार्थानुकीर्तितः । त्वं चैवाहं च कौन्तेय नरनारायणौ स्मृतौ ।। ३७ ।। भारावतरणार्थं तु प्रविष्टौ मानुषीं तनुम् । पार्थ! यह मैंने तुमसे भक्तोंका अन्तर बतलाया है। कुन्तीनन्दन! तुम और मैं दोनों ही नर-नारायण नामक ऋषि हैं और पृथ्वीका भार उतारनेके लिये हमने मानव-शरीरमें प्रवेश किया है ।। ३७ १/२ ।। जानाम्यध्यात्मयोगांश्च योऽहं यस्माच्च भारत ।। ३८ ।। निवृत्तिलक्षणो धर्मस्तथाऽऽभ्युदयिकोऽपि च । नराणामयनं ख्यातमहमेकः सनातनः ।। ३९ ।। भारत! मैं अध्यात्मयोगोंको जानता हूँ तथा मैं कौन हूँ और कहाँसे आया हूँ—इस बातका भी मुझे ज्ञान है। लौकिक अभ्युदयका साधक प्रवृत्तिधर्म ओर निःश्रेयस प्रदान करनेवाला निवृत्तिधर्म भी मुझसे अज्ञात नहीं है। एकमात्र मैं सनातन पुरुष ही सम्पूर्ण मनुष्योंका सुविख्यात आश्रयभूत नारायण हूँ ।। ३८-३९ ।। आपो नारा इति प्रोक्ता आपो वै नरसूनवः । अयनं मम तत् पूर्वमतो नारायणो ह्यहम् ।। ४० ।। नरसे उत्पन्न होनेके कारण जलको नार कहा गया है। वह नार (जल) पहले मेरा अयन (निवासस्थान) था; इसलिये ही मैं ‘नारायण’ कहलाता हूँ ।। ४० ।। छादयामि जगद् विश्वं भूत्वा सूर्य इवांशुभिः । सर्वभूताधिवासश्च वासुदेवस्ततो ह्यहम् ।। ४१ ।। (जो सबमें व्याप्त हो अथवा जो किसीका निवासस्थान हो, उसे ‘वासु’ कहते हैं) मैं ही सूर्यरूप धारण करके अपनी किरणोंसे सम्पूर्ण जगत्को व्याप्त करता हूँ तथा मैं ही सम्पूर्ण प्राणियोंका वासस्थान हूँ; इसलिये मेरा नाम ‘वासुदेव’ है ।। ४१ ।। गतिश्च सर्वभूतानां प्रजननश्चापि भारत । व्याप्ता मे रोदसी पार्थ कान्तिश्चाभ्यधिका मम ।। ४२ ।। अधिभूतानि चान्तेषु तदिच्छंश्चास्मि भारत । क्रमणाच्चाप्यहं पार्थ विष्णुरित्यभिसंज्ञितः ।। ४३ ।। भारत! मैं सम्पूर्ण प्राणियोंकी गति और उत्पत्तिका स्थान हूँ। पार्थ! मैंने आकाश और पृथ्वीको व्याप्त कर रखा है। मेरी कान्ति सबसे बढ़कर है। भरतनन्दन! समस्त प्राणी अन्तकालमें जिस ब्रह्मको पानेकी इच्छा करते हैं, वह भी मैं ही हूँ। कुन्तीकुमार! मैं सबका अतिक्रमण करके स्थित हूँ। इन सभी कारणोंसे मेरा नाम ‘विष्णु’ हुआ है* ।। ४२-४३ ।।
दमात् सिद्धिं परीप्सन्तो मां जनाः कामयन्ति ह । दिवं चोर्वीं च मध्यं च तस्माद् दामोदरो ह्यहम् ॥ ४४ ॥ मनुष्य दम (इन्द्रियसंयम) के द्वारा सिद्धि पानेकी इच्छा करते हुए मुझे पाना चाहते हैं तथा दमके द्वारा ही वे पृथ्वी, स्वर्ग एवं मध्यवर्ती लोकोंमें ऊँची स्थिति पानेकी अभिलाषा करते हैं, इसलिये मैं 'दामोदर' कहलाता हूँ ('दम एव दामः तेन उदीर्यति—उन्नतिं प्राप्नोति यस्मात् स दामोदरः'—यह दामोदर शब्दकी व्युत्पत्ति है) ॥ ४४ ॥
पृश्निरित्युच्यते चान्नं वेद आपोऽमृतं तथा । ममैतानि सदा गर्भः पृश्निगर्भस्ततो ह्यहम् ॥ ४५ ॥ अन्न, वेद, जल और अमृतको पृश्नि कहते हैं। ये सदा मेरे गर्भमें रहते हैं; इसलिये मेरा नाम 'पृश्निगर्भ' है ॥
ऋषयः प्राहुरेवं मां त्रितं कूपनिपातितम् । पृश्निगर्भ त्रितं पाहीत्येकतद्वितपातितम् ॥ ४६ ॥ ततः स ब्रह्मणः पुत्र आद्यो ऋषिवरस्त्रितः । उत्ततारोदपानाद् वै पृश्निगर्भानुकीर्तनात् ॥ ४७ ॥ जब त्रितमुनि अपने भाइयोंद्वारा कुएँमें गिरा दिये गये, उस समय ऋषियोंने मुझसे इस प्रकार प्रार्थना की—'पृश्निगर्भ! आप एकत और द्वितके गिराये हुए त्रितको डूबनेसे बचाइये।' उस समय मेरे पृश्निगर्भ नामका बारंबार कीर्तन करनेसे ब्रह्माजीके आदि पुत्र ऋषिप्रवर त्रित उस कुएँसे बाहर हो गये ॥ ४६-४७ ॥
सूर्यस्य तपतो लोकानग्नेः सोमस्य चाप्युत । अंशवो यत् प्रकाशन्ते ममैते केशसंज्ञिताः ॥ ४८ ॥ सर्वज्ञाः केशवं तस्मान्मामाहुर्द्विजसत्तमाः । जगत्को तपानेवाले सूर्यकी तथा अग्नि और चन्द्रमाकी जो किरणें प्रकाशित होती हैं, वे सब मेरा केश कहलाती हैं। उस केशसे युक्त होनेके कारण सर्वज्ञ द्विजश्रेष्ठ मुझे 'केशव' कहते हैं ॥ ४८ ॥
एवं हि वरदं नाम केशवेति ममार्जुन । देवानाम्थ सर्वेषामृषीणां च महात्मनाम् ॥ ४९ ॥ अर्जुन! इस प्रकार मेरा 'केशव' नाम सम्पूर्ण देवताओं और महात्मा ऋषियोंके लिये वरदायक है ॥
अग्निः सोमेन संयुक्त एकयोनित्वमागतः । अग्नीषोममयं तस्माज्जगत् कृत्स्नं चराचरम् ॥ ५० ॥ अग्नि सोमके साथ संयुक्त हो एक योनिको प्राप्त हुए, इसलिये सम्पूर्ण चराचर जगत् अग्नि-सोममय है ॥ ५० ॥
अपि हि पुराणे भवति एकयोन्यात्मकावग्नीषोमौ देवाश्चाग्निमुखा इति एकयोनित्वाच्च परस्परमर्हन्तो लोकान् धारयन्त इति ॥ ५१ ॥
पुराणमें यह कहा गया है कि अग्नि और सोम एकयोनि हैं तथा सम्पूर्ण देवताओंके मुख अग्नि हैं। एकयोनि होनेके कारण ये एक-दूसरेको आनन्द प्रदान करते और समस्त लोकोंको धारण करते हैं ॥ ५१ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि नारायणीये
एकचत्वारिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३४१ ॥
इस प्रकार श्रीमद्भारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें नारायणकी महिमाविषयक तीन सौ इकतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३४१ ॥
* प्रीति, प्रकाश, उत्कर्ष, हलकापन, सुख, कृपणताका अभाव, रोषका अभाव, संतोष, श्रद्धा, क्षमा, धृति, अहिंसा, शौच, अक्रोध, सरलता, समता, सत्य तथा दोषदृष्टिका अभाव—ये सत्त्वके अठारह गुण हैं।
* ‘विच्छ गतौ’ (तुदादि), ‘विच्छ दीप्तौ’ (चुरादि), ‘विषु सेचने’ (भ्वादि), ‘विषॢ व्याप्तौ’ (जुहोत्यादि), ‘विश प्रवेशने’ (तुदादि), ‘ष्णु प्रस्रवणे’ (अदादि)—इन सभी धातुओंसे ‘विष्णु’ शब्दकी सिद्धि होती है, अतः गति, दीप्ति, सेचन, व्याप्ति, प्रवेश तथा प्रस्रवण—ये सभी अर्थ ‘विष्णु’ शब्दमें निहित हैं।
सृष्टिकी प्रारम्भिक अवस्थाका वर्णन, ब्राह्मणोंकी महिमा बतानेवाली अनेक प्रकारकी संक्षिप्त कथाओंका उल्लेख, भगवन्नामोंके हेतु तथा रुद्रके साथ होनेवाले यु
द्विचत्वारिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः
सृष्टिकी प्रारम्भिक अवस्थाका वर्णन, ब्राह्मणोंकी महिमा बतानेवाली अनेक प्रकारकी संक्षिप्त कथाओंका उल्लेख, भगवन्नामोंके हेतु तथा रुद्रके साथ होनेवाले युद्धमें नारायणकी विजय
अर्जुन उवाच
अग्नीषोमौ कथं पूर्वमेकयोनी प्रवर्तितौ ।
एष मे संशयो जातस्तं छिन्धि मधुसूदन ॥ १ ॥
अर्जुनने पूछा—मधुसूदन! अग्नि और सोम पूर्वकालमें एकयोनि कैसे हो गये? मेरे मनमें यह संदेह उत्पन्न हुआ है। आप इसका निवारण कीजिये ॥ १ ॥
श्रीभगवानुवाच
हन्त ते वर्तयिष्यामि पुराणं पाण्डुनन्दन ।
आत्मतेजोद्भवं पार्थ शृणुष्वैकमना मम ॥ २ ॥
श्रीभगवान् बोले—पाण्डुनन्दन! कुन्तीकुमार! अपने तेजके उद्भवका प्राचीन वृत्तान्त मैं तुम्हें हर्षपूर्वक बताऊँगा। तुम एकचित्त होकर मुझसे सुनो ॥ २ ॥
सम्प्राक्षालनकालेऽतिक्रान्ते चतुर्युगसहस्रान्ते अव्यक्ते सर्वभूते प्रलये सर्वभूतस्थावरजङ्गमे ज्योतिर्धरणिवायुरहितेऽन्धे तमसि जलैकार्णवे लोके ॥ ३ ॥
एक सहस्र चतुर्युग बीत जानेपर सम्पूर्ण लोकोंके लिये प्रलयकाल आ पहुँचा था। समस्त भूतोंका अव्यक्तमें लय हो गया था। स्थावर-जंगम सभी प्राणी विलीन हो गये थे। पृथ्वी, तेज और वायुका कहीं पता नहीं था। चारों ओर घोर अन्धकार छा रहा था तथा समस्त संसार एकार्णवके जलमें निमग्न हो चुका था ॥ ३ ॥
आप इत्येवं ब्रह्मभूतसंज्ञकेऽद्वितीये प्रतिष्ठिते ॥ ४ ॥
सब ओर केवल जल-ही-जल स्थित था। दूसरा कोई तत्त्व नहीं दिखायी देता था, मानो एकमात्र अद्वितीय ब्रह्म अपनी ही महिमामें प्रतिष्ठित हो ॥ ४ ॥
न वै रात्र्यां न दिवसे न सति नासति न व्यक्ते न चाप्यव्यक्ते व्यवस्थिते ॥ ५ ॥
उस समय न रात थी, न दिन। न सत् था, न असत्। न व्यक्त था और न अव्यक्तकी ही स्थिति थी ॥ ५ ॥
एवमस्यां व्यवस्थायां नारायणगुणाश्रयादजराम-रादनिन्द्रियादग्राह्यादसम्भवात्
सत्यादहिंसाल्ललामाद् विविधप्रवृत्तिविशेषाद्वैरादक्षयादमरादजरादमूर्तः
सर्वव्यापिनः सर्वकर्तुः शाश्वतस्तस्मात् पुरुषः प्रादुर्भूतो हरिरव्ययः ।। ६ ।।
इस अवस्थामें नारायणके गुणोंका आश्रय लेकर रहनेवाले उस अजर, अमर,
इन्द्रियरहित, अग्राह्य, असम्भव, सत्यस्वरूप, हिंसारहित, सुन्दर, नाना प्रकारकी विशेष
प्रवृत्तियोंके हेतुभूत, वैररहित, अक्षय, अमर, जरारहित, निराकार, सर्वव्यापी तथा सर्वकर्ता
सत्त्वसे अविनाशी सनातन पुरुष हरिका प्रादुर्भाव हुआ ।। ६ ।।
निदर्शनमपि ह्यत्र भवति ।। ७ ।।
इस विषयमें श्रुतिका यह दृष्टान्त भी है ।। ७ ।।
नासीदहो न रात्रिरासीन्न सदासीन्नासदासीत् तम एव पुरस्तादभवद् विश्वरूपम् ।
सा विश्वरूपस्य रजनी हि एवमस्यार्थोऽनुभाष्यः ।। ८ ।।
उस प्रलयकालमें न दिन था न रात थी, न सत् था न असत् था, केवल तम ही सामने
था। वही सर्वरूप हो रहा था। वही विश्वात्माकी रात्रि है। इस प्रकार इस श्रुतिका अर्थ कहना
और समझना चाहिये ।। ८ ।।
तस्येदानीं तमसः सम्भवस्य पुरुषस्य ब्रह्मयोनेर्ब्रह्मणः प्रादुर्भावे स पुरुषः प्रजाः
सिसृक्षमाणो नेत्राभ्यामग्नीषोमौ ससर्ज । ततो भूतसर्गेषु सृष्टेषु प्रजाक्रमवशाद्
ब्रह्मक्षत्रमुपातिष्ठत् । यः सोमस्तद् ब्रह्म यद् ब्रह्म ते ब्राह्मणा योऽग्निस्तत् क्षत्रं क्षत्राद्
ब्रह्म बलवत्तरम् । कस्मादिति लोकप्रत्यक्षगुणमेतत्तद्यथा । ब्राह्मणेभ्यः परं भूतं
नोत्पन्नपूर्वं दीप्यमानेऽग्नौ जुहोति । यो ब्राह्मणमुखे जुहोतीति कृत्वा ब्रवीमि भूतसर्गः
कृतो ब्रह्मणा भूतानि च प्रतिष्ठाप्य त्रैलोक्यं धार्यत इति मन्त्रवादोऽपि हि
भवति ।। ९ ।।
उस समय उस मायाविशिष्ट ईश्वरसे प्रकट हुए उस ब्रह्मयोनि पुरुषसे जब ब्रह्माजीका
प्रादुर्भाव हुआ, तब उस पुरुषने प्रजासृष्टिकी इच्छासे अपने नेत्रोंद्वारा अग्नि और सोमको
उत्पन्न किया। इस प्रकार भौतिक सर्गकी सृष्टि हो जानेपर प्रजाकी उत्पत्तिके समय क्रमशः
ब्रह्म और क्षत्रका प्रादुर्भाव हुआ। जो सोम है, वही ब्रह्म है और जो ब्रह्म है, वही ब्राह्मण। जो
अग्नि है, वही क्षत्र या क्षत्रिय जाति है। क्षत्रियसे ब्राह्मण जाति अधिक प्रबल है। यदि कहो,
कैसे? तो इसका उत्तर यह है कि ब्राह्मणकी यह प्रबलताका गुण सब लोगोंको प्रत्यक्ष है।
यथा ब्राह्मणसे बढ़कर कोई प्राणी पहले कभी उत्पन्न नहीं हुआ। जो ब्राह्मणके मुखमें
भोजन देता है, वह मानो प्रज्वलित अग्निमें आहुति प्रदान करता है। यही सोचकर मैं ऐसा
कहता हूँ। ब्रह्माने भूतोंकी सृष्टि की और सम्पूर्ण भूतोंको यथास्थान स्थापित करके वे तीनों
लोकोंको धारण करते हैं। यह मन्त्रवाक्य भी इसी बातका समर्थक है ।। ९ ।।
त्वमग्ने यज्ञानां होता विश्वेषां हितो देवानां मानुषाणां च जगत इति ।। १० ।।
अग्ने! तुम यज्ञोंके होता तथा सम्पूर्ण देवताओं, मनुष्यों और सारे जगत्के हितैषी
हो ।। १० ।।
निदर्शनं चात्र भवति विश्वेषामग्ने यज्ञानां त्वं होतेति । त्वं हितो देवैर्मनुष्यैर्जगत् इति ॥ ११ ॥ इस विषयमें यह दृष्टान्त भी है—हे अग्निदेव! तुम सम्पूर्ण यज्ञोंके होता हो। समस्त देवताओं तथा मनुष्योंसहित जगत्के हितैषी हो ॥ ११ ॥
अग्निर्हि यज्ञानां होता कर्ता स चाग्निर्ब्रह्म ॥ १२ ॥ अग्निदेव यज्ञोंके होता और कर्ता हैं। वे अग्निदेव ब्राह्मण हैं ॥ १२ ॥
न ह्यृते मन्त्राणां हवनमस्ति न विना पुरुषं तपः सम्भवति । हविर्मन्त्राणां सम्पूजा विद्यते देवमानुष-ऋषीणामनेन त्वं होतेति नियुक्तः । ये च मानुष-होत्राधिकारास्ते च ब्राह्मणस्य हि याजनं विधीयते न क्षत्रवैश्ययोर्द्विजात्योस्तस्माद् ब्राह्मणा ह्यग्निभूता यज्ञानुद्वहन्ति । यज्ञास्ते देवांस्तर्पयन्ति देवाः पृथिवीं भावयन्ति शतपथेऽपि हि ब्राह्मणमुखे भवति ॥ १३ ॥ क्योंकि मन्त्रोंके बिना हवन नहीं होता और पुरुषके बिना तपस्या सम्भव नहीं होती। हविष्ययुक्त मन्त्रोंके सम्बन्धसे देवताओं, मनुष्यों और ऋषियोंकी पूजा होती है; इसलिये हे अग्निदेव! तुम होता नियुक्त किये गये हो। मनुष्योंमें जो होताके अधिकारी हैं, वे ब्राह्मणके ही हैं; क्योंकि उसीके लिये यज्ञ करानेका विधान है। द्विजातियोंमें जो क्षत्रिय और वैश्य हैं, उन्हें यज्ञ करानेका अधिकार नहीं है; इसलिये अग्निस্বরূপ ब्राह्मण ही यज्ञोंका भार वहन करते हैं। वे यज्ञ देवताओंको तृप्त करते हैं और देवता भूमण्डलको धन-धान्यसे सम्पन्न बनाते हैं। शतपथब्राह्मणमें भी ब्राह्मणके मुखमें आहुति देनेकी बात कही गयी है ॥ १३ ॥
अग्नौ समिद्धे स जुहोति यो विद्वान् ब्राह्मण-मुखेनाहुतिं जुहोति ॥ १४ ॥ जो विद्वान् ब्राह्मणके मुखरूपी अग्निमें अन्नकी आहुति देता है, वह मानो प्रज्वलित अग्निमें होम करता है ॥ १४ ॥
एवमप्यग्निभूता ब्राह्मणा विद्वांसोऽग्निं भावयन्ति । अग्निर्विष्णुः सर्वभूतान्यनुप्रविश्य प्राणान् धारयति ॥ १५ ॥ इस प्रकार ब्राह्मण अग्निस্বরূপ हैं। विद्वान् ब्राह्मण अग्निकी आराधना करते हैं। अग्निदेव विष्णु हैं। वे समस्त प्राणियोंके भीतर प्रवेश करके उनके प्राणोंको धारण करते हैं ॥ १५ ॥
अपि चात्र सनत्कुमारगीताः श्लोका भवन्ति—
ब्रह्मा विश्वं सृजत् पूर्वं सर्वादिर्निर्वस्कृतम् ।
ब्रह्मघोषैर्दिवं गच्छन्त्यमरा ब्रह्मयोनयः ॥ १६ ॥
इसके सिवा इस विषयमें सनत्कुमारजीके द्वारा गाये हुए श्लोक भी उपलब्ध होते हैं। सबके आदिकारण ब्रह्माजीने (जो ब्राह्मण ही हैं) पहले निर्मल विश्वकी सृष्टि की थी। ब्रह्म ही जिनकी उत्पत्तिके स्थान हैं, वे अमर देवता ब्राह्मणोंकी वेदध्वनिसे ही स्वर्गलोकको जाते हैं ॥ १६ ॥
ब्राह्मणानां मतिर्वाक्यं कर्म श्रद्धां तपांसि च ।
धारयन्ति महीं द्यां च शैक्यो वागमृतं तथा ॥ १७ ॥
जैसे छींका दूध, दही आदिको धारण करता है, उसी प्रकार ब्राह्मणोंकी बुद्धि, वाक्य, कर्म, श्रद्धा, तप और वचनामृत पृथ्वी और स्वर्गको धारण करते हैं ॥
नास्ति सत्यात् परो धर्मो नास्ति मातृसमो गुरुः ।
ब्राह्मणेभ्यः परं नास्ति प्रेत्य चेह च भूतये ॥ १८ ॥
सत्यसे बढ़कर दूसरा धर्म नहीं है। माताके समान दूसरा कोई गुरु नहीं है तथा ब्राह्मणोंसे बढ़कर इहलोक और परलोकमें कल्याण करनेवाला और कोई नहीं है ॥ १८ ॥
नैषामुक्षा वहति नोत वाहा
न गर्गरो मथ्यति सम्प्रदाने ।
अपध्वस्ता दस्युभूता भवन्ति
येषां राष्ट्रे ब्राह्मणा वृत्तिहीनाः ॥ १९ ॥
जिनके राज्यमें ब्राह्मणोंके लिये कोई आजीविका न हो उन राजाओंकी सवारी, बैल और घोड़े नहीं रहते; दूसरोंको देनेके लिये उनके यहाँ दही-दूधके मटके नहीं मथे जाते हैं तथा वे अपनी मर्यादासे भ्रष्ट होकर लुटेरे हो जाते हैं ॥ १९ ॥
वेदपुराणेतिहासप्रामाण्यान्नारायणमुखोद्गताः सर्वात्मानः सर्वकर्तारः सर्वभावाश्च ब्राह्मणाश्च ॥ २० ॥
वेद, पुराण और इतिहासके प्रमाणसे यह सिद्ध है कि ब्राह्मणोंकी उत्पत्ति भगवान् नारायणके मुखसे हुई है; अतः वे ब्राह्मण सर्वात्मा, सर्वकर्ता और सर्वभावस्वरूप हैं ॥ २० ॥
वाक्संयमकाले हितस्य वरप्रदस्य देवदेवस्य ब्राह्मणाः प्रथमं प्रादुर्भूता ब्राह्मणेभ्यश्च शेषा वर्णाः प्रादुर्भूताः ॥ २१ ॥
वाणीके संयमकालमें सबके हितैषी, वरदाता, देवाधिदेव ब्रह्माजीके द्वारा सबसे पहले ब्राह्मण उत्पन्न हुए। फिर ब्राह्मणोंसे शेष वर्णोंका प्रादुर्भाव हुआ ॥ २१ ॥
इत्थं च सुरासुरविशिष्टा ब्राह्मणा य एव मया ब्रह्मभूतेन पुरा स्वयमेवोत्पादिताः सुरासुरमहर्षयो भूतविशेषाः स्थापिता निगृहीताश्च ॥ २२ ॥
इस प्रकार ब्राह्मण देवताओं और असुरोंसे भी श्रेष्ठ हैं। पूर्वकालमें मैंने स्वयं ही ब्रह्मरूप होकर उन ब्राह्मणोंको उत्पन्न किया था। देवता, असुर और महर्षि आदि जो भूतविशेष हैं, उन्हें ब्राह्मणोंने ही उनके अधिकारपर स्थापित किया और उनके द्वारा अपराध होनेपर उन्हें दण्ड भी दिया ॥ २२ ॥
अहल्याधर्षणनिमित्तं हि गौतमाद्धरिश्मश्रुतामिन्द्रः प्राप्तः कौशिकनिमित्तं चेन्द्रो मुष्कवियोगं मेषवृषणत्वं चावाप ॥ २३ ॥
अहल्यापर बलात्कार करनेके कारण गौतमके शापसे इन्द्रको हरिमश्मश्रु (हरी दाढ़ी-मूंछोंसे युक्त) होना पड़ा तथा विश्वामित्रके शापसे इन्द्रको अपना अण्डकोष खो देना पड़ा और उनके भेंड़ेके अण्डकोष जोड़े गये ॥ २३ ॥
अश्विनोर्ग्रहप्रतिषेधोद्यतवज्रस्य पुरन्दरस्य च्यवनेन स्तम्भितौ बाहू ॥ २४ ॥
अश्विनीकुमारोंके लिये नियत यज्ञभागका निषेध करनेके लिये वज्र उठाये हुए इन्द्रकी दोनों भुजाओंको महर्षि च्यवनने स्तम्भित कर दिया था ॥ २४ ॥
ऋतुवधप्राप्तमन्युना च दक्षेण भूयस्तपसा चात्मानं संयोज्य नेत्राकृतिरन्या ललाटे रुद्रस्योत्पादिता ॥ २५ ॥
इसी प्रकार दक्ष प्रजापतिने रुद्रद्वारा किये गये अपने यज्ञके विध्वंससे कुपित हो बड़ी भारी तपस्या की और रुद्रदेवके ललाटमें एक तीसरा नेत्र-चिह्न प्रकट कर दिया था ॥ २५ ॥
त्रिपुरवधार्थं दीक्षामुपगतस्य रुद्रस्य उशनसा जटाः शिरस उत्कृत्य प्रयुक्तास्ततः प्रादुर्भूता भुजगास्तैरस्य भुजगैः पीड्यमानः कण्ठो नीलतामुपगतः पूर्वे च मन्वन्तरे स्वायम्भुवे नारायणहस्तग्रहणान्नीलकण्ठत्वमेव च ॥ २६ ॥
जिस समय रुद्रने त्रिपुरनिवासी दैत्योंके वधके लिये दीक्षा ली थी, उस समय शुक्राचार्यने अपने मस्तकसे जटाएँ उखाड़कर उन्हींका महादेवजीपर प्रयोग किया। फिर तो उन जटाओंसे बहुतेरे सर्प उत्पन्न हुए, जिन्होंने रुद्रदेवके कण्ठमें डँसना आरम्भ किया। इससे उनका कण्ठ नीला हो गया तथा पहले स्वायम्भुव मन्वन्तरमें नारायणने अपने हाथसे उनका कण्ठ पकड़ा था, इसलिये भी कण्ठका रंग नीला हो जानेसे वे रुद्रदेव नीलकण्ठ हो गये ॥ २६ ॥
अमृतोत्पादने पुरश्चरणतामुपगतस्याङ्गिरसो बृहस्पतेरुपस्पृशतो न प्रसादं गतवत्यः किलापः, अथ बृहस्पतिरपां चुक्रोध यस्मान्ममोपस्पृशतः कलुषीभूता न च प्रसादमुपगतास्तस्मादद्यप्रभृति झषमकरकच्छप-जन्तुभिःकलुषीभवतेति, तदा प्रभृत्यापो यादोभिः संकीर्णाः सम्प्रवृत्ताः ॥ २७ ॥
अंगिराके पुत्र बृहस्पतिने अमृत उत्पन्न करनेके समय पुरश्चरण आरम्भ किया। उस समय जब वे आचमन करने लगे, तब जल स्वच्छ नहीं हुआ। इससे बृहस्पति जलके प्रति कुपित हो उठे और बोले—‘मेरे आचमन करते समय भी तुम स्वच्छ न हुए, मैले ही बने रह गये; इसलिये आजसे मत्स्य, मकर और कछुए आदि जन्तुओं द्वारा तुम कलुषित होते रहो।’ तभीसे सारे जलाशय जल-जन्तुओंसे भरे रहने लगे ॥ २७ ॥
विश्वरूपो हि वै त्वाष्ट्रः पुरोहितो देवानामासीत्, स्वस्रीयोऽसुराणां स प्रत्यक्षं देवेभ्यो भागमदात् परोक्षमसुरेभ्यः ॥ २८ ॥
त्वष्टाके पुत्र विश्वरूप देवताओंके पुरोहित थे। वे असुरोंके भानजे लगते थे; अतः देवताओंको प्रत्यक्ष और असुरोंको परोक्षरूपसे यज्ञोंका भाग दिया करते थे ॥ २८ ॥
अथ हिरण्यकशिपुं पुरस्कृत्य विश्वरूपमातरं स्वसारमसुरा वरमयाचन्त हे स्वसरयं ते पुत्रस्त्वाष्ट्रो विश्वरूपस्त्रिशिरा देवानां पुरोहितः प्रत्यक्षं देवेभ्यो भागमदात् परोक्षमस्माकं ततो देवा वर्धन्ते वयं क्षीयामस्तदेनं त्वं वारयितुमर्हसि तथा यथास्मान् भजेदिति ॥ २९ ॥
कुछ कालके अनन्तर हिरण्यकशिपुको आगे करके सब असुर विश्वरूपकी माताके पास गये और उनसे वर माँगने लगे—'बहिन! यह तुम्हारा पुत्र विश्वरूप, जिसके तीन सिर हैं, देवताओंका पुरोहित बना हुआ है। यह देवताओंको तो प्रत्यक्ष भाग देता है और हमलोगोंको परोक्षरूपसे भाग समर्पित करता है। इससे देवता तो बढ़ते हैं और हमलोग निरन्तर क्षीण होते चले जा रहे हैं। तुम इसे मना कर दो, जिससे यह देवताओंको छोड़कर हमारा पक्ष ग्रहण करे' ॥ २९ ॥
अथ विश्वरूपं नन्दनवनमुपगतं मातोवाच पुत्र किं परपक्षवर्धनस्त्वं मातुलपक्षं नाशयसि नार्हस्येवं कर्तुमिति स विश्वरूपो मातृवाक्यमनतिक्रमणीयमिति मत्वा सम्पूज्य हिरण्यकशिपुमगात् ॥ ३० ॥
तब एक दिन माताने नन्दनवनमें गये हुए विश्वरूपसे कहा—'बेटा! क्यों तुम दूसरे पक्षकी वृद्धि करते हुए मामाके पक्षका नाश कर रहे हो? तुम्हें ऐसा नहीं करना चाहिये।' विश्वरूपने माताकी आज्ञाको अलंघनीय मानकर उसका सम्मान करके विदा कर दिया और वे स्वयं हिरण्यकशिपुके पास चले गये ॥ ३० ॥
हैरण्यगर्भाच्च वसिष्ठाद्धिरण्यकशिपुः शापं प्राप्तवान् यस्मात् त्वयान्यो वृतो होता तस्मादसमाप्त-यज्ञस्त्वमपूर्वात् सत्त्वजाताद् वधं प्राप्स्यसीति तच्छापादानाद्धिरण्यकशिपुः प्राप्तवान् वधम् ॥ ३१ ॥
(हिरण्यकशिपुने उन्हें अपना होता बना लिया) इधर ब्रह्माजीके पुत्र वसिष्ठकी ओरसे हिरण्यकशिपुको शाप प्राप्त हुआ—'तुमने मेरी अवहेलना करके दूसरा होता चुन लिया है; इसलिये इस यज्ञकी समाप्ति होनेसे पहले ही किसी अभूतपूर्व प्राणीके हाथसे तुम्हारा वध हो जायगा।' वसिष्ठजीके वैसा शाप देनेसे हिरण्यकशिपु वधको प्राप्त हुआ ॥ ३१ ॥
अथ विश्वरूपो मातृपक्षवर्धनोऽत्यर्थं तपस्य भवत् तस्य व्रतभङ्गार्थमिन्द्रो बह्वीः श्रीमत्योऽप्सरसो नियोज ताश्च दृष्ट्वा मनः क्षुभितं तस्याभवत् तासु चाप्सरःसु नचिरादेव सक्तोऽभवत् सक्तं चैनं ज्ञात्वा अप्सरस ऊचुर्गच्छामहे वयं यथागतमिति ॥ ३२ ॥
तदनन्तर विश्वरूप मातृपक्षकी वृद्धि करनेके लिये बड़ी भारी तपस्यामें संलग्न हो गये। यह देख उनके व्रतको भंग करनेके लिये इन्द्रने बहुत-सी सुन्दरी अप्सराओंको नियुक्त कर दिया। उन अप्सराओंको देखते ही विश्वरूपका मन चंचल हो गया और वे तुरंत ही उनमें आसक्त हो गये। उन्हें आसक्त जानकर अप्सराओंने कहा—'अब हमलोग जहाँसे आयी हैं, वहीं जा रही हैं' ॥ ३२ ॥