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महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

नृपश्रेष्ठ! ऐसी बातें कहते हुए ब्रह्माजीके मनमें भगवान् श्रीहरिकी स्तुति करनेका विचार उत्पन्न हुआ। बुद्धिमानोंमें अग्रगण्य नरेश! तब भगवान् ब्रह्माने हाथ जोड़कर उत्तम एवं जपने योग्य स्तोत्रका गान आरम्भ किया ।। ३६-३७ ।।

ब्रह्मोवाच

ॐनमस्ते ब्रह्महृदय नमस्ते मम पूर्वज । लोकाद्य भुवनश्रेष्ठ सांख्ययोगनिधे प्रभो ।। ३८ ।। ब्रह्माजी बोले— प्रभो! वेद आपका हृदय है, आपको नमस्कार है। मेरे पूर्वज! आपको प्रणाम है। जगत्के आदि कारण! भुवनश्रेष्ठ! सांख्ययोगनिधे! प्रभो! आपको बारंबार नमस्कार है ।। ३८ ।। व्यक्ताव्यक्तकराचिन्त्य क्षेमं पन्थानमास्थित । विश्वभुक् सर्वभूतानामन्तरात्मन्नयोनिज । अहं प्रसादजस्तुभ्यं लोकधाम स्वयम्भुवः ।। ३९ ।। व्यक्त जगत् और अव्यक्त प्रकृतिको उत्पन्न करनेवाले परमात्मन्! आपका स्वरूप अचिन्त्य है। आप कल्याणमय मार्गमें स्थित हैं। विश्वपालक! आप सम्पूर्ण प्राणियोंके अन्तरात्मा, किसी योनिसे उत्पन्न न होनेवाले, जगत्के आधार और स्वयम्भू हैं। मैं आपकी कृपासे उत्पन्न हुआ हूँ ।। ३९ ।। त्वत्तो मे मानसं जन्म प्रथमं द्विजपूजितम् । चाक्षुषं वै द्वितीयं मे जन्म चासीत् पुरातनम् ।। ४० ।। आपसे मेरा प्रथम बार जो जन्म हुआ था, वह द्विजोंद्वारा सम्मानित मानस-जन्म कहा गया है अर्थात् प्रथम बार मैं आपके मनसे उत्पन्न हुआ। तदनन्तर पूर्वकालमें मैं आपके नेत्रसे उत्पन्न हुआ। वह मेरा दूसरा जन्म था ।। ४० ।। त्वत्प्रसादात् तु मे जन्म तृतीयं वाचिकं महत् । त्वत्तः श्रवणजं चापि चतुर्थं जन्म मे विभो ।। ४१ ।। तत्पश्चात् आपके कृपाप्रसादसे मेरा जो तीसरा महत्त्वपूर्ण जन्म हुआ, वह वाचिक था अर्थात् आपके वचनमात्रसे सुलभ हो गया था। विभो! उसके बाद आपके कानोंसे मेरा चतुर्थ जन्म हुआ था ।। ४१ ।। नासिक्यं चापि मे जन्म त्वत्तः परममुच्यते । अण्डजं चापि मे जन्म त्वत्तः षष्ठं विनिर्मितम् ।। ४२ ।। उसके बाद आपकी नासिकासे मेरा पाँचवाँ उत्तम जन्म बताया जाता है। तदनन्तर मैं आपके द्वारा ब्रह्माण्डसे उत्पन्न किया गया। वह मेरा छठा जन्म था ।। ४२ ।। इदं च सप्तमं जन्म पद्मजन्मेति वै प्रभो । सर्गे सर्गे ह्यहं पुत्रस्तव त्रिगुणवर्जित ।। ४३ ।।

प्रभो! यह मेरा सातवाँ जन्म है, जो कमलसे उत्पन्न हुआ है। त्रिगुणातीत परमेश्वर! मैं प्रत्येक कल्पमें आपका पुत्र होकर प्रकट होता हूँ॥ ४३ ॥

प्रथितः पुण्डरीकाक्ष प्रधानगुणकल्पितः ।
त्वमीश्वरः स्वभावश्च स्वयम्भूः पुरुषोत्तम ॥ ४४ ॥
कमलनयन! आपका पुत्र मैं शुद्ध सत्त्वमय शरीरसे उत्पन्न हुआ हूँ। आप ईश्वर, स्वभाव, स्वयम्भू एवं पुरुषोत्तम हैं॥ ४४ ॥

त्वया विनिर्मितोऽहं वै वेदचक्षुर्वयोतिगः ।
ते मे वेदा हृताश्चक्षुरन्धो जातोऽस्मि जागृहि ॥ ४५ ॥
ददस्व चक्षूंषि मम प्रियोऽहं ते प्रियोऽसि मे ।
आपने मुझे वेदरूपी नेत्रोंसे युक्त बनाया है। आपकी ही कृपासे कालातीत हूँ—मुझपर कालका जोर नहीं चलता। मेरे नेत्ररूप वे वेद दानवोंद्वारा हर लिये गये हैं; अतः मैं अन्धा-सा हो गया हूँ। प्रभो! निद्रा त्यागकर जागिये। मुझे मेरे नेत्र वापस दीजिये; क्योंकि मैं आपका प्रिय भक्त हूँ और आप मेरे प्रियतम स्वामी हैं॥ ४५ १/२ ॥

एवं स्तुतः स भगवान् पुरुषः सर्वतोमुखः ॥ ४६ ॥
जहौ निद्रामथ तदा वेदकार्यार्थमुद्यतः ।
ब्रह्माजीके इस प्रकार स्तुति करनेपर सब ओर मुखवाले सबके अन्तर्यामी आत्मा भगवान्ने उसी क्षण निद्रा त्याग दी और वे वेदोंकी रक्षा करनेके लिये उद्यत हो गये॥ ४६ १/२ ॥

ऐश्वर्येण प्रयोगेण द्वितीयां तनुमास्थितः ॥ ४७ ॥
सुनासिकेन कायेन भूत्वा चन्द्रप्रभस्तदा ।
कृत्वा हयशिरः शुभ्रं वेदानामालयं प्रभुः ॥ ४८ ॥
उन्होंने अपने ऐश्वर्यके योगसे दूसरा शरीर धारण किया, जो चन्द्रमाके समान कान्तिमान् था। सुन्दर नासिकावाले शरीरसे युक्त हो वे प्रभु घोड़ेके समान गर्दन और मुखधारण करके स्थित हुए। उनका वह शुद्ध मुख सम्पूर्ण वेदोंका आलय था॥ ४७-४८ ॥

तस्य मूर्धा समभवद् द्यौः सनक्षत्रतारका ।
केशाश्चास्याभवन् दीर्घा रवेरंशुसमप्रभाः ॥ ४९ ॥
नक्षत्रों और ताराओंसे युक्त स्वर्गलोक उनका सिर था। सूर्यकी किरणोंके समान चमकीले बड़े-बड़े बाल थे॥ ४९ ॥

कर्णावाकाशपाताले ललाटं भूतधारिणी ।
गङ्गा सरस्वती श्रोण्यौ भ्रुवावास्तां महोदधी ॥ ५० ॥
आकाश और पाताल उनके कान थे एवं समस्त भूतोंको धारण करनेवाली पृथ्वी ललाट थी। गंगा और सरस्वती उनके नितम्ब तथा दो समुद्र उनकी दोनों भौंहें थे॥ ५० ॥

चक्षुषी सोमसूर्यौ ते नासा संध्या पुनः स्मृता ।

ॐ कारस्त्वथ संस्कारो विद्युज्जिह्वा च निर्मिता ।। ५१ ।। दन्ताश्च पितरो राजन् सोमपा इति विश्रुताः । गोलोको ब्रह्मलोकश्च ओष्ठावास्तां महात्मनः ।। ५२ ।। चन्द्रमा और सूर्य उनके दोनों नेत्र तथा नासिका संध्या थी। ॐकार संस्कार (आभूषण) और विद्युत् जिह्वा बनी हुई थी। राजन्! सोमपान करनेवाले पितर उनके दाँत सुने गये हैं तथा गोलोक और ब्रह्मलोक उन महात्माके ओष्ठ थे ।। ५१-५२ ।। ग्रीवा चास्याभवद् राजन् कालरात्रिर्गुणोत्तरा । एतद्धयशिरः कृत्वा नानामूर्तिभिरावृतम् ।। ५३ ।। अन्तर्दधौ स विश्वेशो विवेश च रसां प्रभुः । नरेश्वर! तमोमयी कालरात्रि उनकी ग्रीवा थी। इस प्रकार अनेक मूर्तियोंसे आवृत हयग्रीव रूप धारण करके वे जगदीश्वर श्रीहरि वहाँसे अन्तर्धान हो गये और रसातलमें जा पहुँचे ।। ५३ १/२ ।। रसां पुनः प्रविष्टश्च योगं परममास्थितः ।। ५४ ।। शैक्ष्यं स्वरं समास्थाय उद्गीतं प्रासृजत् स्वरम् । रसातलमें प्रवेश करके परम योगका आश्रय ले शिक्षाके नियमानुसार उदात्त आदि स्वरोंसे युक्त उच्च स्वरसे सामवेदका गान करने लगे ।। ५४ १/२ ।। स स्वरः सानुनादी च सर्वशः स्निग्ध एव च ।। ५५ ।। बभूवान्तर्महीभूतः सर्वभूतगुणोदितः । नाद और स्वरसे विशिष्ट सामगानकी वह सर्वथा स्निग्ध एवं मधुर ध्वनि रसातलमें सब ओर फैल गयी, जो समस्त प्राणियोंके लिये गुणकारक थी ।। ५५ १/२ ।। ततस्तावसुरौ कृत्वा वेदान् समयबन्धनान् ।। ५६ ।। रसातले विनिक्षिप्य यतः शब्दस्ततो द्रुतौ । उन दोनों असुरोंने वह शब्द सुनकर वेदोंको कालपाशसे आबद्ध करके रसातलमें फेंक दिया और स्वयं उसी ओर दौड़े जिधरसे वह ध्वनि आ रही थी ।। ५६ १/२ ।। एतस्मिन्नन्तरे राजन् देवो हयशिरोधरः ।। ५७ ।। जग्राह वेदानखिलान् रसातल गतान् हरिः । प्रादाच्च ब्रह्मणे भूयस्ततः स्वां प्रकृतिं गतः ।। ५८ ।। राजन्! इसी बीचमें हयग्रीव रूपधारी भगवान् श्रीहरिने रसातलमें पड़े हुए उन सम्पूर्ण वेदोंको ले लिया तथा ब्रह्माजीको पुनः वापस दे दिया और फिर वे अपने आदि रूपमें आ गये ।। ५७-५८ ।। स्थापयित्वा हयशिर उदक्पूर्वे महोदधौ । वेदानामालयं चापि बभूवाश्वशिरास्ततः ।। ५९ ।।

भगवान्‌ने महासागरके पूर्वोत्तरभागमें वेदोंके आश्रयभूत अपने हयग्रीव रूपकी स्थापना करके पुनः पूर्वरूप धारण कर लिया। तबसे भगवान् हयग्रीव वहीं रहने लगे ॥ ५९ ॥

अथ किंचिदपश्यन्तौ दानवौ मधुकैटभौ ।
पुनराजग्मतुस्तत्र वेगितौ पश्यतां च तौ ॥ ६० ॥
यत्र वेदा विनिक्षिप्तास्तत् स्थानं शून्यमेव च ।
इधर वेदध्वनिके स्थानपर आकर मधु और कैटभ दोनों दानवोंने जब कुछ नहीं देखा, तब वे बड़े वेगसे फिर वहीं लौट आये, जहाँ उन वेदोंको नीचे डाल रखा था। वहाँ देखनेपर उन्हें वह स्थान सूना ही दिखायी दिया ॥ ६०१/२ ॥

तत उत्तममास्थाय वेगं बलवतां वरौ ॥ ६१ ॥
पुनरुत्तस्थतुः शीघ्रं रसानामालयात् तदा ।
ददृशाते च पुरुषं तमेवादिकरं प्रभुम् ॥ ६२ ॥
श्वेतं चन्द्रविशुद्धाभमनिरुद्धतनौ स्थितम् ।
भूयोऽप्यमितविक्रान्तं निद्रायोगमुपागतम् ॥ ६३ ॥
तब वे बलवानोंमें श्रेष्ठ दोनों दानव पुनः उत्तम वेगका आश्रय ले रसातलसे शीघ्र ही ऊपर उठे और ऊपर आकर देखते हैं तो वे ही आदिकर्ता भगवान् पुरुषोत्तम दृष्टिगोचर हुए। जो चन्द्रमाके समान विशुद्ध, उज्ज्वल प्रभासे विभूषित, गौरवर्णके थे। वे उस समय अनिरुद्ध-विग्रहमें स्थित थे और वे अमित पराक्रमी भगवान् योगनिद्राका आश्रय लेकर सो रहे थे ॥

आत्मप्रमाणरचिते अपामुपार कल्पिते ।
शयने नागभोगाढ्ये ज्वालामालासमावृते ॥ ६४ ॥
निष्कल्मषेण सत्त्वेन सम्पन्नं रुचिरप्रभम् ।
तं दृष्ट्वा दानवेन्द्रौ तौ महाहासममुञ्चताम् ॥ ६५ ॥
पानीके ऊपर शेषनागके शरीरकी शय्या निर्मित हुई थी, जिसकी लम्बाई भगवान्‌के श्रीविग्रहके अनुरूप ही थी। वह शय्या ज्वालामालाओंसे आवृत जान पड़ती थी। उसके ऊपर विशुद्ध सत्त्वगुणसे सम्पन्न मनोहर कान्तिवाले भगवान् नारायण सो रहे थे। उन्हें देखकर वे दोनों दानवराज ठहाका मारकर जोर-जोरसे हँसने लगे ॥ ६४-६५ ॥

ऊचतुश्च समाविष्टौ रजसा तमसा च तौ ।
अयं स पुरुषः श्वेतः शेते निद्रामुपागतः ॥ ६६ ॥
अनेन नूनं वेदानां कृतमाहरणं रसात् ।
कस्यैष को नु खल्वेष किं च स्वपिति भोगवान् ॥ ६७ ॥
रजोगुण और तमोगुणसे आविष्ट हुए वे दोनों असुर परस्पर कहने लगे, 'यह जो श्वेतवर्णवाला पुरुष निद्रामें निमग्न होकर सो रहा है, निश्चय ही इसीने रसातलसे वेदोंका

अपहरण किया है। यह किसका पुत्र है? कौन है? और क्यों यहाँ सर्पके शरीरकी शय्यापर सो रहा है?' ।। ६६-६७ ।।

इत्युच्चारितवाक्यौ तौ बोधयामासतुर्हरिम् ।
युद्धार्थिनौ हि विज्ञाय विबुद्धः पुरुषोत्तमः ।। ६८ ।।
निरीक्ष्य चासुरेन्द्रौ तौ ततो युद्धे मनो दधे ।
इस प्रकार बातचीत करके उन दोनोंने भगवान्‌को जगाया। उन्हें युद्धके लिये उत्सुक जान भगवान् पुरुषोत्तम जाग उठे। फिर उन दोनों असुरेन्द्रोंका अच्छी तरह निरीक्षण करके उन्होंने मन-ही-मन उनके साथ युद्ध करनेका निश्चय किया ।। ६८ १/२ ।।

अथ युद्धं समभवत् तयोर्नारायणस्य वै ।। ६९ ।।
रजस्तमोविष्टतनू तावुभौ मधुकैटभौ ।
ब्रह्मणोपचितिं कुर्वन् जघान मधुसूदनः ।। ७० ।।
फिर तो उन दोनों असुरोंका और भगवान् नारायणका युद्ध आरम्भ हो गया। भगवान् मधुसूदनने ब्रह्माजीका मान रखनेके लिये तमोगुण और रजोगुणसे आविष्ट शरीरवाले उन दोनों दैत्यों—मधु और कैटभको मार डाला ।।

ततस्तयोर्वधेनाशु वेदापहरणेन च ।
शोकापनयनं चक्रे ब्रह्मणः पुरुषोत्तमः ।। ७१ ।।

इस प्रकार वेदोंको वापस लाकर और मधु-कैटभका वध करके भगवान् पुरुषोत्तमने ब्रह्माजीका शोक दूर कर दिया ।। ७१ ।। ततः परिवृतो ब्रह्मा हरिणा वेदसत्कृतः । निर्ममे स तदा लोकान् कृत्स्नान् स्थावरजङ्गमान् ॥ ७२ ॥ तत्पश्चात् वेदसे सम्मानित और भगवान्‌से सुरक्षित होकर ब्रह्माजीने समस्त चराचर जगत्की सृष्टि की ।। ७२ ।। दत्त्वा पितामहायाग्र्यां मतिं लोकविसर्गिकाम् । तत्रैवान्तर्दधे देवो यत एवागतो हरिः ॥ ७३ ॥ ब्रह्माजीको लोक-रचनाकी श्रेष्ठ बुद्धि देकर भगवान् नारायणदेव वहीं अन्तर्धान हो गये। वे जहाँसे आये थे, वहीं चले गये ।। ७३ ।। तौ दानवौ हरिर्हत्वा कृत्वा हयशिरस्तनुम् । पुनः प्रवृत्तिधर्मार्थं तामेव विदधे तनुम् ॥ ७४ ॥ श्रीहरिने इस प्रकार हयग्रीवरूप धारण करके उन दोनों दानवोंका वध किया था। उन्होंने पुनः प्रवृत्तिधर्मका प्रचार करनेके लिये ही उस शरीरको प्रकट किया था ।। ७४ ।। एवमेव महाभागो बभूवाश्वशिरा हरिः । पौराणमेतत् प्रख्यातं रूपं वरदमैश्वरम् ॥ ७५ ॥ इस तरह महाभाग श्रीहरिने हयग्रीवरूप धारण किया था। भगवान्‌का यह वरदायक रूप पुरातन एवं पुराण-प्रसिद्ध है ।। ७५ ।। यो ह्येतद् ब्राह्मणो नित्यं शृणुयाद् धारयीत वा । न तस्याध्ययनं नाशमुपगच्छेत् कदाचन ॥ ७६ ॥ जो ब्राह्मण प्रतिदिन इस अवतार-कथाको सुनता या स्मरण करता है, उसका अध्ययन कभी नष्ट (निष्फल) नहीं होता है ।। ७६ ।। आराध्य तपसोग्रेण देवं हयशिरोधरम् । पञ्चालेन क्रमः प्राप्तो देवेन पथि देशिते ॥ ७७ ॥ महादेवजीके बताये हुए मार्गपर चलकर उग्र तपस्याद्वारा भगवान् हयग्रीवकी आराधना करके पांचालदेशीय गालवमुनिने वेदोंका क्रमविभाग प्राप्त किया था ।। ७७ ।। एतद्धयशिरो राजन्नाख्यानं तव कीर्तितम् । पुराणं वेदसमितं यन्मां त्वं परिपृच्छसि ॥ ७८ ॥ राजन्! तुमने जिसके लिये मुझसे पूछा था, यह हयग्रीवावतारकी वेदानुमोदित प्राचीन कथा मैंने तुम्हें सुना दी ।। ७८ ।। यां यामिच्छेत् तनुं देवः कर्तुं कार्यविधौ क्वचित् । तां तां कुर्याद् विकुर्वाणः स्वयमात्मानमात्मना ॥ ७९ ॥

परमात्मा कार्यसाधनके लिये जिस-जिस शरीरको धारण करना चाहते हैं, उसे कार्य करते समय स्वयं ही प्रकट कर लेते हैं ॥ ७९ ॥ एष वेदनिधिः श्रीमानेष वै तपसो निधिः । एष योगश्च सांख्यं च ब्रह्म चाग्र्यं हविर्विभुः ॥ ८० ॥ ये श्रीमान् हरि वेद और तपस्याकी निधि हैं। ये ही योग, सांख्य, ब्रह्म, श्रेष्ठ हविष्य और विभु हैं ॥ ८० ॥ नारायणपरा वेदा यज्ञा नारायणात्मकाः । तपो नारायणपरं नारायणपरा गतिः ॥ ८१ ॥ वेदोंका पर्यवसान भगवान् नारायणमें ही है। यज्ञ नारायणके ही स्वरूप हैं। तपस्याके परम फल भगवान् नारायण ही हैं तथा नारायणकी प्राप्ति ही सर्वोत्तम गति है ॥ ८१ ॥ नारायणपरं सत्यमृतं नारायणात्मकम् । नारायणपरो धर्मः पुनरावृत्तिदुर्लभः ॥ ८२ ॥ सत्यके परम लक्ष्य नारायण ही हैं। ऋत नारायणका ही स्वरूप है। जिसके आचरणसे पुनर्जन्मकी प्राप्ति नहीं होती, उस निवृत्तिप्रधान धर्मके भी चरम लक्ष्य भगवान् नारायण ही हैं ॥ ८२ ॥ प्रवृत्तिलक्षणश्चैव धर्मो नारायणात्मकः । नारायणात्मको गन्धो भूमौ श्रेष्ठतमः स्मृतः ॥ ८३ ॥ प्रवृत्तिरूप धर्म भी नारायणका ही स्वरूप है। भूमिका श्रेष्ठतम गुण गन्ध भी नारायणमय ही है ॥ ८३ ॥ अपां चापि गुणा राजन् रसा नारायणात्मकाः । ज्योतिषां च परं रूपं स्मृतं नारायणात्मकम् ॥ ८४ ॥ राजन्! जलका गुण रस भी नारायणका ही स्वरूप है। तेजका उत्तम गुण रूप भी नारायणमय ही है ॥ ८४ ॥ नारायणात्मकश्चापि स्पर्शो वायुगुणः स्मृतः । नारायणात्मकश्चैव शब्द आकाशसम्भवः ॥ ८५ ॥ वायुका गुण स्पर्श भी नारायणस्वरूप ही है तथा आकाशका गुण शब्द भी नारायणमय ही है ॥ ८५ ॥ मनश्चापि ततो भूतमव्यक्तगुणलक्षणम् । नारायणपरः कालो ज्योतिषामयनं च यत् ॥ ८६ ॥ अव्यक्त गुण एवं लक्षणवाला मन नामक भूत, काल और नक्षत्रमण्डल—ये सब नारायणके ही आश्रित हैं ॥ ८६ ॥ नारायणपरा कीर्तिः श्रीश्च लक्ष्मीश्च देवताः । नारायणपरं सांख्यं योगो नारायणात्मकः ॥ ८७ ॥

कीर्ति, श्री और लक्ष्मी आदि देवियाँ नारायणको ही अपना परम आश्रय मानती हैं। सांख्यका परम तात्पर्य भी नारायण ही हैं और योग भी नारायणका ही स्वरूप है ।। ८७ ।।

कारणं पुरुषो ह्येषां प्रधानं चापि कारणम् ।
स्वभावश्चैव कर्माणि दैवं येषां च कारणम् ।। ८८ ।।
पुरुष, प्रधान, स्वभाव, कर्म तथा दैव—ये जिन वस्तुओंके कारण हैं, वे भी नारायणरूप ही हैं ।। ८८ ।।

अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम् ।
विविधा च तथा चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम् ।। ८९ ।।
पञ्चकारणसंख्यातो निष्ठा सर्वत्र वै हरिः ।
अधिष्ठान, कर्ता, भिन्न-भिन्न प्रकारके करण, नाना प्रकारकी अलग-अलग चेष्टाएँ तथा पाँचवाँ दैव—इन पाँच कारणोंके रूपमें सर्वत्र श्रीहरि ही विराजमान हैं ।। ८९ ½ ।।

तत्त्वं जिज्ञासमानानां हेतुभिः सर्वतोमुखैः ।। ९० ।।
तत्त्वमेको महायोगी हरिनारायणः प्रभुः ।
जो लोग सर्वव्यापक हेतुओंद्वारा तत्त्वको जाननेकी इच्छा रखते हैं, उनके लिये महायोगी भगवान् नारायण हरि ही एकमात्र ज्ञातव्य तत्त्व हैं ।। ९० ½ ।।

ब्रह्मादीनां स लोकानामृषीणां च महात्मनाम् ।। ९१ ।।
सांख्यानां योगिनां चापि यतीनामात्मवेदिनाम् ।
मनीषितं विजानाति केशवो न तु तस्य ते ।। ९२ ।।
भगवान् केशव ब्रह्मा आदि देवताओं, सम्पूर्ण लोकों, महात्मा-ऋषियों, सांख्यवेत्ताओं, योगियों और आत्मज्ञानी यतियोंके मनकी बातें भी जानते हैं; परंतु उनके मनमें क्या है? यह उनमेंसे किसीको पता नहीं है ।।

ये केचित् सर्वलोकेषु दैवं पित्र्यं च कुर्वते ।
दानानि च प्रयच्छन्ति तप्यन्ते च तपो महत् ।। ९३ ।।
सर्वेषामाश्रयो विष्णुरैश्वरं विधिमास्थितः ।
सर्वभूतकृतावासो वासुदेवेति चोच्यते ।। ९४ ।।
समस्त विश्वमें जो कोई देवताओंके लिये यज्ञ और पितरोंके लिये श्राद्ध करते हैं, दान देते हैं और बड़ी भारी तपस्या करते हैं, उन सबके आश्रय भगवान् विष्णु ही हैं। वे अपने ऐश्वर्ययोगमें स्थित रहते हैं। सम्पूर्ण प्राणियोंके आवासस्थान होनेके कारण वे 'वासुदेव' कहे जाते हैं ।। ९३-९४ ।।

अयं हि नित्यः परमो महर्षि-
र्महाविभूतिर्गुणवर्जिताख्यः ।
गुणैश्च संयोगमुपैति शीघ्रं
कालो यथर्तावृतुसम्प्रयुक्तः ।। ९५ ।।

ये परम महर्षि नारायण नित्य, महान् ऐश्वर्यसे युक्त और गुणोंसे रहित हैं तथापि जैसे गुणहीन काल ऋतुके गुणोंसे युक्त होता है, उसी प्रकार वे भी समय-समयपर गुणोंको स्वीकार करके उनसे संयुक्त होते हैं ।। ९५ ।।

नैवास्य विन्दन्ति गतिं महात्मनो
न चागतिं कश्चिदिहानुपश्यति ।
ज्ञानात्मकाः सन्ति हि ये महर्षयः
पश्यन्ति नित्यं पुरुषं गुणाधिकम् ।। ९६ ।।

उन महात्माकी गतिको कोई नहीं जानता। उनके आगमनका भी यहाँ किसीको कुछ पता नहीं चलता। जो ज्ञानस्वरूप महर्षि हैं, वे ही उन नित्य, अन्तर्यामी एवं अनन्तगुणविभूषित परमात्माका साक्षात्कार करते हैं ।।

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि नारायणीये
सप्तचत्वारिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः ।। ३४७ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें नारायणकी महिमाविषयक तीन सौ सैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ३४७ ।।


* वैशम्पायनजीने जनमेजयको महाभारतकी कथा वेदव्यासजीकी आज्ञासे सुनायी थी इस कारण यहाँ ऐसा लिखा है।

सात्वत-धर्मकी उपदेश-परम्परा तथा भगवान्‌के प्रति ऐकान्तिक भावकी महिमा

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अष्टचत्वारिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः

सात्वत-धर्मकी उपदेश-परम्परा तथा भगवान्‌के प्रति ऐकान्तिक भावकी महिमा

जनमेजय उवाच

अहो ह्येकान्तिनः सर्वान् प्रीणाति भगवान् हरिः ।
विधिप्रयुक्तां पूजां च गृह्णाति भगवान् स्वयम् ॥ १ ॥
**जनमेजयने कहा—**ब्रह्मन्! भगवान् अनन्यभावसे भजन करनेवाले सभी भक्तोंको प्रसन्न करते और उनकी विधिवत् की हुई पूजाको स्वयं ग्रहण करते हैं; यह कितने आनन्दकी बात है ॥ १ ॥

ये तु दग्धेन्धना लोके पुण्यपापविवर्जिताः ।
तेषां त्वयाभिनिर्दिष्टा पारम्पर्यगता गतिः ॥ २ ॥
संसारमें जिन लोगोंकी वासनाएँ दग्ध हो गयी हैं और जो पुण्य-पापसे रहित हो गये हैं, उन्हें परम्परासे जो गति प्राप्त होती है, उसका भी आपने वर्णन किया है ॥

चतुर्थ्यां चैव ते गत्यां गच्छन्ति पुरुषोत्तमम् ।
एकान्तिनस्तु पुरुषा गच्छन्ति परमं पदम् ॥ ३ ॥
जो भगवान्‌के अनन्य भक्त हैं, वे साधुपुरुष अनिरुद्ध, प्रद्युम्न और संकर्षणकी अपेक्षा न रखकर वासुदेवसंज्ञक चौथी गतिमें पहुँचकर भगवान् पुरुषोत्तम एवं उनके परमपदको प्राप्त कर लेते हैं ॥ ३ ॥

नूनमेकान्तधर्मोऽयं श्रेष्ठो नारायणप्रियः ।
अगत्वा गतयस्तिस्रो यद् गच्छत्यव्ययं हरिम् ॥ ४ ॥
निश्चय ही यह अनन्यभावसे भगवान्‌का भजनरूप धर्म श्रेष्ठ एवं श्रीनारायणको परम प्रिय है; क्योंकि इसका आश्रय लेनेवाले भक्तजन उक्त तीन गतियोंको प्राप्त न होकर सीधे चौथी गतिमें पहुँचकर अविनाशी श्रीहरिको प्राप्त कर लेते हैं ॥ ४ ॥

सहोपनिषदान् वेदान् ये विप्राः सम्यगास्थिताः ।
पठन्ति विधिमास्थाय ये चापि यतिधर्मिणः ॥ ५ ॥
तेभ्यो विशिष्टां जानामि गतिमेकान्तिनां नृणाम् ।
जो ब्राह्मण उपनिषदोंसहित सम्पूर्ण वेदोंका भलीभाँति आश्रय ले उनका विधिपूर्वक स्वाध्याय करते हैं तथा जो संन्यासधर्मका पालन करनेवाले हैं, इन सबसे उत्तम गति उन्हींको प्राप्त होती है, जो भगवान्‌के अनन्य भक्त होते हैं ॥ ५ १/२ ॥

केनैश धर्मः कथितो देवेन ऋषिणापि वा ।। ६ ।।
एकान्तिनां च का चर्या कदा चोत्पादिता विभो ।
एतन्मे संशयं छिन्धि परं कौतूहलं हि मे ।। ७ ।।
भगवन्! इस भक्तिरूप धर्मका किस देवता अथवा ऋषिने उपदेश किया है? अनन्य भक्तोंकी जीवनचर्या क्या है? और वह कबसे प्रचलित हुई? मेरे इस संशयका निवारण कीजिये। इस विषयको सुननेके लिये मेरे मनमें बड़ी उत्कण्ठा हो रही है ।। ६-७ ।।

वैशम्पायन उवाच

समुपोढेष्वनीकेषु कुरुपाण्डवयोधर्मृधे ।
अर्जुने विमनस्के च गीता भगवता स्वयम् ।। ८ ।।
वैशम्पायनजीने कहा—राजन्! जिस समय कौरव और पाण्डवोंकी सेनाएँ युद्धके लिये आमने-सामने डटी हुई थीं और अर्जुन युद्धसे अनमने हो रहे थे, उस समय स्वयं भगवान्ने उन्हें गीतामें इस धर्मका उपदेश दिया ।। ८ ।।
अगतिश्च गतिश्चैव पूर्वं ते कथिता मया ।
गहनो ह्येष धर्मो वै दुर्विज्ञेयोऽकृतात्मभिः ।। ९ ।।
मैंने पहले तुमसे गति और अगदिका स्वरूप भी बताया था। यह धर्म गहन तथा अजितात्मा पुरुषोंके लिये दुर्गम है ।। ९ ।।
सम्मितः सामवेदेन पुरैवादियुगे कृतः ।
धार्यते स्वयमीशेन राजन् नारायणेन च ।। १० ।।
राजन्! यह धर्म सामवेदके समान है। प्राचीनकालके सत्ययुगसे ही यह प्रचलित हुआ है। स्वयं जगदीश्वर भगवान् नारायण ही इस धर्मको धारण करते हैं ।। १० ।।
एतदर्थं महाराज पृष्टः पार्थेन नारदः ।
ऋषिमध्ये महाभागः शृण्वतोः कृष्णभीष्मयोः ।। ११ ।।
महाराज! कुन्तीपुत्र युधिष्ठिरने ऋषियोंके बीचमें महाभाग नारदजीसे यही विषय पूछा था। उस समय श्रीकृष्ण और भीष्म भी इस विषयको सुन रहे थे ।। ११ ।।
गुरुणा च मयाप्येष कथितो नृपसत्तम ।
यथा तत् कथितं तत्र नारदेन तथा शृणु ।। १२ ।।
नृपश्रेष्ठ! मेरे गुरु व्यासजीने और मैंने भी यह विषय कहा था; परंतु वहाँ नारदजीने उस विषयका जैसा वर्णन किया था, उसे बताता हूँ, सुनो ।। १२ ।।
यदासीन्मानसं जन्म नारायणमुखोद्गतम् ।
ब्रह्मणः पृथिवीपाल तदा नारायणः स्वयम् ।। १३ ।।
तेन धर्मेण कृतवान् दैवं पित्र्यं च भारत ।
फेनपा ऋषयश्चैव तं धर्मं प्रतिपेदिरे ।। १४ ।।

भूपाल! सृष्टिके आदिमें जब भगवान् नारायणके मुखसे ब्रह्माजीका मानसिक जन्म हुआ था, उस समय साक्षात् नारायणने उन्हें इस धर्मका उपदेश किया था। भरतनन्दन! नारायणने उस धर्मसे देवताओं और पितरोंका पूजनादि कर्म किया था। फिर फेनप ऋषियोंने उस धर्मको ग्रहण किया ।। १३-१४ ।।

वैखानसाः फेनपेभ्यो धर्मं तं प्रतिपेदिरे ।
वैखानसेभ्यः सोमस्तु ततः सोऽन्तर्दधे पुनः ।। १५ ।।
फेनपोंसे वैखानसोंने उस धर्मको उपलब्ध किया। उनसे सोमने उसे ग्रहण किया। तदनन्तर वह धर्म फिर लुप्त हो गया ।। १५ ।।

यदासीच्चाक्षुषं जन्म द्वितीयं ब्रह्मणो नृप ।
तदा पितामहेनैव सोमाद् धर्मः परिश्रुतः ।। १६ ।।
नारायणात्मको राजन् रुद्राय प्रददौ च तम् ।
नरेश्वर! जब ब्रह्माजीका नेत्रजनित द्वितीय जन्म हुआ, तब उन्होंने सोमसे उस नारायण-स्वरूप धर्मको सुना था। राजन्! ब्रह्माजीने रुद्रको इसका उपदेश दिया ।। १६ १/२ ।।

ततो योगस्थितो रुद्रः पुरा कृतयुगे नृप ।। १७ ।।
बालखिल्यानृषीन् सर्वान् धर्ममेतदपाठयत् ।
अन्तर्दधे ततो भूयस्तस्य देवस्य मायया ।। १८ ।।
नरेश्वर! तत्पश्चात् योगनिष्ठ रुद्रने पूर्वकालके कृतयुगमें सम्पूर्ण बालखिल्य ऋषियोंको इस धर्मसे अवगत कराया; तदनन्तर भगवान् विष्णुकी मायासे वह धर्म फिर लुप्त हो गया ।। १७-१८ ।।

तृतीयं ब्रह्मणो जन्म यदासीद् वाचिकं महत् ।
तत्रैष धर्मः सम्भूतः स्वयं नारायणान्नृप ।। १९ ।।
राजन्! जब भगवान्‌की वाणीसे ब्रह्माजीका तीसरा महत्त्वपूर्ण जन्म हुआ, तब फिर साक्षात् नारायणसे ही यह धर्म प्रकट हुआ ।। १९ ।।

सुपर्णो नाम तमृषिः प्राप्तवान् पुरुषोत्तमात् ।
तपसा वै सुतप्तेन दमेन नियमेन च ।। २० ।।
सुपर्ण नामक ऋषिने इन्द्रियसंयम और मनोनिग्रह-पूर्वक भलीभाँति तपस्या करके भगवान् पुरुषोत्तमसे इस धर्मको प्राप्त किया ।। २० ।।

त्रिःपरिक्रान्तवानेतत् सुपर्णो धर्ममुत्तमम् ।
यस्मात् तस्माद् व्रतं ह्येतत् त्रिसौपर्णमिहोच्यते ।। २१ ।।
सुपर्णने प्रतिदिन इस उत्तम धर्मकी तीन आवृत्ति की थी, इसलिये इस व्रत या धर्मको यहाँ 'त्रिसौपर्ण' कहते हैं ।। २१ ।।

ऋग्वेदपाठपठितं व्रतमेतद्धि दुश्चरम् ।

सुपर्णाच्चाप्यधिगतो धर्म एष सनातनः ॥ २२ ॥ वायुना द्विपदां श्रेष्ठ कथितो जगदायुषा । यह दुष्कर धर्म ऋग्वेदके पाठमें स्पष्टरूपसे पढ़ा गया है। नरश्रेष्ठ! सुपर्णसे उस सनातन धर्मको इस जगत्के प्राणस्वरूप वायुने प्राप्त किया ॥ २२ १/२ ॥ वायोः सकाशात् प्राप्तश्च ऋषिभिर्विघसाशिभिः ॥ २३ ॥ ततो महोदधिश्चैव प्राप्तवान् धर्ममुत्तमम् । अन्तर्दधे ततो भूयो नारायणसमाहितः ॥ २४ ॥ वायुसे विघसाशी ऋषियोंने इस धर्मका उपदेश ग्रहण किया। उनसे महोदधिको इस उत्तम धर्मकी प्राप्ति हुई। तत्पश्चात् यह धर्म फिर लुप्त होकर भगवान् नारायणमें विलीन हो गया ॥ २३-२४ ॥ यदा भूयः श्रवणजा सृष्टिरासीन्महात्मनः । ब्रह्मणः पुरुषव्याघ्र तत्र कीर्तयतः शृणु ॥ २५ ॥ पुरुषसिंह! जब पुनः भगवान्‌के कानोंसे महात्मा ब्रह्माजीकी चौथी बार उत्पत्ति हुई, तब जिस प्रकार इस धर्मका प्रादुर्भाव हुआ था, वह बताता हूँ, सुनो ॥ २५ ॥ जगत्स्रष्टुमना देवो हरिनारायणः स्वयम् । चिन्तयामास पुरुषं जगत्सर्गकरं प्रभुम् ॥ २६ ॥ साक्षात् भगवान् नारायण हरिने जगत्की सृष्टि करनेकी इच्छासे एक ऐसे पुरुषका चिन्तन किया, जो संसारकी सृष्टि करनेमें पूर्णतः समर्थ हो ॥ २६ ॥ अथ चिन्तयतस्तस्य कर्णाभ्यां पुरुषः स्मृतः । प्रजासर्गकरो ब्रह्मा तमुवाच जगत्पतिः ॥ २७ ॥ सृज प्रजाः पुत्र सर्वा मुखतः पादतस्तथा । कहा जाता है, चिन्तन करते समय भगवान्‌के दोनों कानोंसे एक पुरुषका प्रादुर्भाव हुआ। वही प्रजाकी सृष्टि करनेवाला ब्रह्मा हुआ। जगदीश्वर नारायणने ब्रह्मासे कहा—'बेटा! तुम अपने मुखसे लेकर पैरतकके अंगोंसे समस्त प्रजाकी सृष्टि करो ॥ २७ १/२ ॥ श्रेयस्तव विधास्यामि बलं तेजश्च सुव्रत ॥ २८ ॥ धर्मं च मत्तो गृह्णीष्व सात्वतं नाम नामतः । तेन सृष्टं कृतयुगं स्थापयस्व यथाविधि ॥ २९ ॥ 'उत्तम व्रतका पालन करनेवाले पुत्र! मैं तुम्हारा कल्याण करूँगा और तुम्हारे भीतर तेज एवं बलकी वृद्धि करता रहूँगा। तुम मुझसे इस सात्वत नामक धर्मको ग्रहण करो और उसके द्वारा विधिपूर्वक सत्ययुगकी सृष्टि करके उसकी स्थापना करो' ॥ २८-२९ ॥ ततो ब्रह्मा नमश्चक्रे देवाय हरिमेधसे । धर्मं चाग्र्यं स जग्राह सरहस्यं ससंग्रहम् ॥ ३० ॥ आरण्यकेन सहितं नारायणमुखोद्भवम् ।

तदनन्तर ब्रह्मा‍ने भगवान् श्रीहरिको नमस्कार किया और उन्हीं नारायणदेवके मुखसे प्रकट आरण्यक, रहस्य तथा संग्रहसहित उस श्रेष्ठ धर्मका उपदेश ग्रहण किया ।। ३० १/२ ।। उपदि‍श्य ततो धर्मं ब्रह्मणेऽमिततेजसे ।। ३१ ।। त्वं कर्ता युगधर्माणां निराशीः कर्मसंज्ञितम् । अमिततेजस्वी ब्रह्माको इस धर्मका उपदेश देकर उस समय भगवान्‌ने उनसे कहा—‘तुम निष्कामभावसे सारे कर्म करते हुए युगधर्मोंके प्रवर्तक बनो’ ।। ३१ १/२ ।। जगाम तमसः पारं यत्राव्यक्तं व्यवस्थितम् ।। ३२ ।। ततोऽथ वरदो देवो ब्रह्मा लोकपितामहः । असृजत् स ततो लोकान् कृत्स्नान् स्थावरजङ्गमान् ।। ३३ ।। यह आदेश देकर वे अज्ञानान्धकारसे परे विराजमान अपने परम अव्यक्त धामको चले गये। तदनन्तर वरदायक देवता लोकपितामह ब्रह्मा‍ने सम्पूर्ण चराचर लोकोंकी सृष्टि की ।। ३२-३३ ।। ततः प्रावर्तत तदा आदौ कृतयुगं शुभम् । ततो हि सात्वतो धर्मो व्याप्य लोकानवस्थितः ।। ३४ ।। फिर तो सृष्टिके आरम्भमें कल्याणकारी कृतयुगकी प्रवृत्ति हुई और तबसे सात्वतधर्म सारे संसारमें व्याप्त हो गया ।। ३४ ।। तेनैवाद्येन धर्मेण ब्रह्मा लोकविसर्गकृत् । पूजयामास देवेशं हरिं नारायणं प्रभुम् ।। ३५ ।। लोकस्रष्टा ब्रह्मा‍ने उसी आदिधर्मके द्वारा देवेश्वर भगवान् नारायण हरिकी आराधना की ।। ३५ ।। धर्मप्रतिष्ठाहेतोश्च मनुं स्वारोचिषं ततः । अध्यापयामास तदा लोकानां हितकाम्यया ।। ३६ ।। फिर इस धर्मकी प्रतिष्ठाके लिये समस्त लोकोंके हितकी कामनासे उन्होंने स्वारोचिषमनुको उस समय इस धर्मका उपदेश किया ।। ३६ ।। ततः स्वरोचिषः पुत्रं स्वयं शङ्खपदं नृप । अध्यापयत् पुराव्यग्रः सर्वलोकपतिर्विभुः ।। ३७ ।। नरेश्वर! उन दिनों स्वारोचिष मनु ही सम्पूर्ण लोकोंके अधिपति एवं प्रभु थे। उन्होंने शान्तभावसे पहले अपने पुत्र शंखपदको स्वयं इस धर्मका ज्ञान प्रदान किया ।। ३७ ।। ततः शङ्खपदश्चापि पुत्रमात्मजमौरसम् । दिशां पालं सुवर्णाभमध्यापयत भारत । सोऽन्तर्दधे ततो भूयः प्राप्ते त्रेतायुगे पुनः ।। ३८ ।। भारत! फिर शंखपदने भी अपने औरस पुत्र दिक्पाल सुवर्णाभको इस धर्मका अध्ययन कराया। इसके बाद त्रेतायुग प्राप्त होनेपर वह धर्म फिर लुप्त हो गया ।। ३८ ।।

नासिक्ये जन्मनि पुरा ब्रह्मणः पार्थिवोत्तम । धर्ममेतं स्वयं देवो हरिनारायणः प्रभुः ॥ ३९ ॥ तज्जगादारविन्दाक्षो ब्रह्मणः पश्यतस्तदा । नृपश्रेष्ठ! फिर पूर्वकालमें ब्रह्माजीने नासिकाके द्वारा जब पाँचवाँ जन्म ग्रहण किया, तब स्वयं कमलनयन भगवान् नारायण हरिने ब्रह्माजीके सामने इस धर्मका उपदेश दिया ॥ ३९ १/२ ॥

सनत्कुमारो भगवांस्ततः प्राधीतवान् नृप ॥ ४० ॥ सनत्कुमारादपि च वीरणो वै प्रजापतिः । कृतादौ कुरुशार्दूल धर्ममेतदधीतवान् ॥ ४१ ॥ नरेश्वर! तत्पश्चात् भगवान् सनत्कुमारने उनसे उस सात्वत-धर्मका उपदेश ग्रहण किया। कुरुश्रेष्ठ! सनत्कुमारसे वीरण प्रजापतिने कृतयुगके आदिमें इस धर्मका उपदेश ग्रहण किया ॥ ४०-४१ ॥

वीरणश्चाप्यधीत्यैनं रैभ्याय मुनये ददौ । रैभ्यः पुत्राय शुद्धाय सुव्रताय सुमेधसे ॥ ४२ ॥ कुक्षिनाम्ने स प्रददौ दिशां पालाय धर्मिणे । ततोऽप्यन्तर्दधे भूयो नारायणमुखोद्भवः ॥ ४३ ॥ वीरणने इसका अध्ययन करके रैभ्यमुनिको उपदेश दिया। रैभ्यने उत्तम व्रतका पालन करनेवाले श्रेष्ठ बुद्धिसे युक्त धर्मात्मा एवं शुद्ध आचार-विचारवाले अपने पुत्र दिक्पाल कुक्षिको इसका उपदेश दिया। तदनन्तर नारायणके मुखसे निकला हुआ यह सात्वत धर्म फिर लुप्त हो गया ॥ ४२-४३ ॥

अण्डजे जन्मनि पुनर्ब्रह्मणे हरियोनये । एष धर्मः समुद्भूतो नारायणमुखात् पुनः ॥ ४४ ॥ इसके बाद जब ब्रह्माजीका अण्डसे छठा जन्म हुआ, तब भगवान्‌से उत्पन्न हुए ब्रह्माजीके लिये पुनः भगवान् नारायणके मुखसे यह धर्म प्रकट हुआ ॥ ४४ ॥

गृहीतो ब्रह्मणा राजन् प्रयुक्तश्च यथाविधि । अध्यापिताश्च मुनयो नाम्ना बर्हिषदो नृप ॥ ४५ ॥ राजन्! ब्रह्माजीने इस धर्मको ग्रहण किया और वे विधिपूर्वक उसे अपने उपयोगमें लाये। नरेश्वर! फिर उन्होंने बर्हिषद् नामवाले मुनियोंको इसका अध्ययन कराया ॥ ४५ ॥

बर्हिषद्भ्यश्च सम्प्राप्तः सामवेदान्तगं द्विजम् । ज्येष्ठं नामाभिविख्यातं ज्येष्ठसामव्रतो हरिः ॥ ४६ ॥ बर्हिषद् नामक ऋषियोंसे इस धर्मका उपदेश ज्येष्ठ नामसे प्रसिद्ध एक ब्राह्मणको मिला, जो सामवेदके पारंगत विद्वान् थे। ज्येष्ठसामकी उपासनाका उन्होंने व्रत ले रखा था। इसलिये वे ज्येष्ठसामव्रती हरि कहलाते थे ॥ ४६ ॥

ज्येष्ठाच्चाप्यनुसंक्रान्तो राजानमविकम्पनम् ।
अन्तर्दधे ततो राजन्नेष धर्मः प्रभो हरेः ॥ ४७ ॥
राजन्! ज्येष्ठसे राजा अविकम्पनको इस धर्मका उपदेश प्राप्त हुआ। प्रभो! तदनन्तर यह भागवत-धर्म फिर लुप्त हो गया ॥ ४७ ॥
यदिदं सप्तमं जन्म पद्मजं ब्रह्मणो नृप ।
तत्रैष धर्मः कथितः स्वयं नारायणेन ह ॥ ४८ ॥
पितामहाय शुद्धाय युगादौ लोकधारिणे ।
पितामहश्च दक्षाय धर्ममेतं पुरा ददौ ॥ ४९ ॥
नरेश्वर! यह जो ब्रह्माजीका भगवान्‌के नाभिकमलसे सातवाँ जन्म हुआ है, इसमें स्वयं नारायणने ही कल्पके आरम्भमें जगद्धाता शुद्धस्वरूप ब्रह्माको इस धर्मका उपदेश दिया; फिर ब्रह्माजीने सबसे पहले प्रजापति दक्षको इस धर्मकी शिक्षा दी ॥ ४८-४९ ॥
ततो ज्येष्ठे तु दौहित्रे प्रादाद् दक्षो नृपोत्तम ।
आदित्ये सवितुर्ज्येष्ठे विवस्वाञ्जगृहे ततः ॥ ५० ॥
नृपश्रेष्ठ! इसके बाद दक्षने अपने ज्येष्ठ दौहित्र-अदितिके सवितासे भी बड़े पुत्रको इस धर्मका उपदेश दिया। उन्हींसे विवस्वान् (सूर्य) ने इस धर्मका उपदेश ग्रहण किया ॥ ५० ॥
त्रेतायुगादौ च ततो विवस्वान् मनवे ददौ ।
मनुश्च लोकभूत्यर्थं सुतायेक्ष्वाकवे ददौ ॥ ५१ ॥
फिर त्रेतायुगके आरम्भमें सूर्यने मनुको और मनुने सम्पूर्ण जगत्के कल्याणके लिये अपने पुत्र इक्ष्वाकुको इसका उपदेश दिया ॥ ५१ ॥
इक्ष्वाकुणा च कथितो व्याप्य लोकानवस्थितः ।
गमिष्यति क्षयान्ते च पुनर्नायणं नृप ॥ ५२ ॥
इक्ष्वाकुके उपदेशसे इस सात्वत धर्मका सम्पूर्ण जगत्में प्रचार और प्रसार हो गया। नरेश्वर! कल्पान्तमें यह धर्म फिर भगवान् नारायणको ही प्राप्त हो जायगा ॥
यतीनां चापि यो धर्मः स ते पूर्वं नृपोत्तम ।
कथितो हरिगीतासु समासविधिकल्पितः ॥ ५३ ॥
नृपश्रेष्ठ! यतियोंका जो धर्म है, वह मैंने पहले ही तुम्हें हरिगीतामें संक्षेप शैलीसे बता दिया है ॥ ५३ ॥
नारदेन सुसम्प्राप्तः सरहस्यः ससंग्रहः ।
एष धर्मो जगन्नाथात् साक्षान्नारायणान्नृप ॥ ५४ ॥
महाराज! नारदजीने रहस्य और संग्रहसहित इस धर्मको साक्षात् जगदीश्वर नारायणसे भलीभाँति प्राप्त किया था ॥ ५४ ॥
एवमेष महान् धर्म आद्यो राजन् सनातनः ।
दुर्विज्ञेयो दुष्करश्च सात्वतैर्धार्यते सदा ॥ ५५ ॥

राजन्! इस प्रकार यह आदि एवं महान् धर्म सनातनकालसे चला आ रहा है। यह दूसरोंके लिये दुर्ज्ञेय और दुष्कर है। भगवान्‌के भक्त सदा ही इस धर्मको धारण करते हैं॥ ५५ ॥ धर्मज्ञानेन चैतेन सुप्रयुक्तेन कर्मणा । अहिंसाधर्मयुक्तेन प्रीयते हरिरीश्वरः ॥ ५६ ॥ इस धर्मको जाननेसे और अहिंसाभावसे युक्त इस सात्वतधर्मको क्रियारूपसे आचरणमें लानेसे जगदीश्वर श्रीहरि प्रसन्न होते हैं॥ ५६ ॥ एकव्यूहविभागो वा क्वचिद् द्विव्यूहसंज्ञितः । त्रिव्यूहश्चापि संख्यातश्चतुर्व्यूहश्च दृश्यते ॥ ५७ ॥ भगवान्‌के भक्तोंद्वारा कभी केवल एक व्यूह—भगवान् वासुदेवकी, कभी दो व्यूह—वासुदेव और संकर्षणकी, कभी प्रद्युम्नसहित तीन व्यूहोंकी और कभी अनिरुद्धसहित चार व्यूहोंकी उपासना देखी जाती है॥ हरिरेव हि क्षेत्रज्ञो निर्ममो निष्कलस्तथा । जीवश्च सर्वभूतेषु पञ्चभूतगुणातिगः ॥ ५८ ॥ भगवान् श्रीहरि ही क्षेत्रज्ञ हैं, ममतारहित और निष्कल हैं। ये ही सम्पूर्ण भूतोंमें पाञ्चभौतिक गुणोंसे अतीत जीवात्मारूपसे विराजमान हैं॥ ५८ ॥ मनश्च प्रथितं राजन् पञ्चेन्द्रियसमीरणम् । एष लोकविधिर्धीमानेष लोकविसर्गकृत् ॥ ५९ ॥ राजन्! पाँचों इन्द्रियोंका प्रेरक जो विख्यात मन है, वह भी श्रीहरि ही हैं। ये बुद्धिमान् श्रीहरि ही सम्पूर्ण जगत्‌के प्रेरक और स्रष्टा हैं॥ ५९ ॥ अकर्ता चैव कर्ता च कार्यं कारणमेव च । यथेच्छति तथा राजन् क्रीडते पुरुषोऽव्ययः ॥ ६० ॥ नरेश्वर! ये अविनाशी पुरुष नारायण ही अकर्ता, कर्ता, कार्य तथा कारण हैं। ये जैसा चाहते हैं, वैसे ही क्रीड़ा करते हैं ॥ ६० ॥ एष एकान्तधर्मस्ते कीर्तितो नृपसत्तम । मया गुरुप्रसादेन दुर्विज्ञेयोऽकृतात्मभिः ॥ ६१ ॥ नृपश्रेष्ठ! यह मैंने तुमसे गुरुकृपासे ज्ञात हुए अनन्य भक्तिरूप धर्मका वर्णन किया है। जिनका अन्तःकरण पवित्र नहीं है, ऐसे लोगोंके लिये इस धर्मका ज्ञान होना बहुत ही कठिन है॥ ६१॥ एकान्तिनो हि पुरुषा दुर्लभा बहवो नृप । यद्येकान्तिभिराकीर्णं जगत् स्यात् कुरुनन्दन ॥ ६२ ॥ अहिंसकैरात्मविद्भिः सर्वभूतहिते रतैः । भवेत् कृतयुगप्राप्तिराशीःकर्मविवर्जिता ॥ ६३ ॥

नरेश्वर! भगवान्‌के अनन्य भक्त दुर्लभ हैं, क्योंकि ऐसे पुरुष बहुत नहीं हुआ करते। कुरुनन्दन! यदि सम्पूर्ण भूतोंके हितमें तत्पर रहनेवाले, आत्मज्ञानी, अहिंसक एवं अनन्य भक्तोंसे जगत् भर जाय तो यहाँ सर्वत्र सत्ययुग ही छा जाय और कहीं भी सकाम कर्मोंका अनुष्ठान न हो ।। ६२-६३ ।।

एवं स भगवान् व्यासो गुरुर्मम विशाम्पते ।
कथयामास धर्मज्ञो धर्मराज्ञे द्विजोत्तमः ।। ६४ ।।
ऋषीणां संनिधौ राजन् शृण्वतोः कृष्णभीष्मयोः ।
प्रजानाथ! इस प्रकार मेरे धर्मज्ञ गुरु द्विजश्रेष्ठ भगवान् व्यासने श्रीकृष्ण और भीष्मके सुनते हुए ऋषि-मुनियोंके समीप धर्मराजको इस धर्मका उपदेश किया था ।। ६४ १/२ ।।

तस्याप्यकथयत् पूर्वं नारदः सुमहातपाः ।। ६५ ।।
देवं परमकं ब्रह्म श्वेतं चन्द्राभमच्युतम् ।
यत्र चैकान्तिनो यान्ति नारायणपरायणाः ।। ६६ ।।
राजन्! उनसे भी प्राचीनकालमें महातपस्वी नारदजीने इसका प्रतिपादन किया था। नारायणकी आराधनामें लगे हुए अनन्य भक्त चन्द्रमाके समान गौरवर्णवाले उन्हीं परब्रह्मस्वरूप भगवान् अच्युतको प्राप्त होते हैं ।। ६५-६६ ।।

जनमेजय उवाच

एवं बहुविधं धर्मं प्रतिबुद्धैर्निषेवितम् ।
न कुर्वन्ति कथं विप्रा अन्ये नानाव्रते स्थिताः ।। ६७ ।।
**जनमेजयने पूछा—**मुने! इस प्रकार ज्ञानी पुरुषोंद्वारा सेवित जो यह अनेक सद्गुणोंसे सम्पन्न धर्म है, इसे नाना प्रकारके व्रतोंमें लगे हुए दूसरे ब्राह्मण क्यों आचरणमें नहीं लाते हैं? ।। ६७ ।।

वैशम्पायन उवाच

तिस्रः प्रकृतयो राजन् देहबन्धेषु निर्मिताः ।
सात्त्विकी राजसी चैव तामसी चैव भारत ।। ६८ ।।
**वैशम्पायनजीने कहा—**भरतनन्दन! शरीरके बन्धनमें बँधे हुए जो जीव हैं, उनके लिये ईश्वरने तीन प्रकारकी प्रकृतियाँ बनायी हैं—सात्त्विकी, राजसी और तामसी ।। ६८ ।।

देहबन्धेषु पुरुषः श्रेष्ठः कुरुकुलोद्वह ।
सात्त्विकः पुरुषव्याघ्र भवेन्मोक्षाय निश्चितः ।। ६९ ।।
पुरुषसिंह! कुरुकुलधुरंधर वीर! इन तीन प्रकृतियोंवाले जीवोंमें जो सात्त्विकी प्रकृतिसे युक्त सात्त्विक पुरुष है, वही श्रेष्ठ है; क्योंकि वही मोक्षका निश्चित अधिकारी है ।। ६९ ।।

अत्रापि स विजानाति पुरुषं ब्रह्मवित्तमम् ।
नारायणपरो मोक्षस्ततो वै सात्त्विकः स्मृतः ।। ७० ।।

यहाँ भी वह इस बातको अच्छी तरह जानता है कि परमपुरुष नारायण सर्वोत्तम वेदवेत्ता हैं और मोक्षके परम आश्रय भगवान् नारायण ही हैं, इसीलिये वह मनुष्य सात्त्विक माना गया है ।। ७० ।।

मनीषितं च प्राप्नोति चिन्तयन् पुरुषोत्तमम् ।
एकान्तभक्तिः सततं नारायणपरायणः ।। ७१ ।।
भगवान् नारायणके आश्रित उनका अनन्य भक्त अपने मनके अभीष्ट भगवान् पुरुषोत्तमका निरन्तर चिन्तन करता हुआ उनको प्राप्त कर लेता है ।। ७१ ।।

मनीषिणो हि ये केचिद् यतयो मोक्षधर्मिणः ।
तेषां विच्छिन्नतृष्णानां योगक्षेमवहो हरिः ।। ७२ ।।
मोक्षधर्ममें तत्पर रहनेवाले जो कोई भी मनीषी यति हैं तथा जिनकी तृष्णाका सर्वथा नाश हो गया है, उनके योग-क्षेमका भार स्वयं भगवान् नारायण वहन करते हैं ।। ७२ ।।

जायमानं हि पुरुषं यं पश्येन्मधुसूदनः ।
सात्त्विकस्तु स विज्ञेयो भवेन्मोक्षे च निश्चितः ।। ७३ ।।
जन्म-मरणके चक्करमें पड़े हुए जिस पुरुषको भगवान् मधुसूदन अपनी कृपा-दृष्टिसे देख लेते हैं, उसे सात्त्विक जानना चाहिये। वह मोक्षका सुनिश्चित अधिकारी हो जाता है ।। ७३ ।।

सांख्ययोगेन तुल्यो हि धर्म एकान्तसेवितः ।
नारायणात्मके मोक्षे ततो यान्ति परां गतिम् ।। ७४ ।।
एकान्त भक्तोंद्वारा सेवित धर्म सांख्य और योगके तुल्य है। उसके सेवनसे मनुष्य नारायणस्वरूप मोक्षमें ही परम गतिको प्राप्त होते हैं ।। ७४ ।।

नारायणेन दृष्टस्तु प्रतिबुद्धो भवेत् पुमान् ।
एवमात्मेच्छया राजन् प्रतिबुद्धो न जायते ।। ७५ ।।
राजन्! जिसपर भगवान् नारायणकी कृपादृष्टि हो जाती है, वह पुरुष ही ज्ञानवान् होता है। इस तरह अपनी इच्छामात्रसे कोई ज्ञानी नहीं होता ।। ७५ ।।

राजसी तामसी चैव व्यामिश्रे प्रकृती स्मृते ।
तदात्मकं हि पुरुषं जायमानं विशाम्पते ।। ७६ ।।
प्रवृत्तिलक्षणैर्युक्तं नावेक्षति हरिः स्वयम् ।
प्रजानाथ! राजसी और तामसी—ये दो प्रकृतियाँ दोषोंसे मिश्रित होती हैं। जो पुरुष राजस और तामस प्रकृतिसे युक्त होकर जन्म धारण करता है, वह प्रायः सकाम कर्ममें प्रवृत्तिके लक्षणोंसे युक्त होता है। अतः भगवान् श्रीहरि उसकी ओर नहीं देखते ।। ७६ १/२ ।।

पश्यत्येनं जायमानं ब्रह्मा लोकपितामहः ।। ७७ ।।
रजसा तमसा चैव मानसं समभिप्लुतम् ।

ऐसा पुरुष जब जन्म लेता है, तब उसपर लोकपितामह ब्रह्माकी कृपादृष्टि होती है (और वे उसे प्रवृत्तिमार्गमें नियुक्त कर देते हैं)। उसका मन रजोगुण और तमोगुणके प्रवाहमें डूबा रहता है ।। ७७ १/२ ।।

कामं देवा ऋषयश्च सत्त्वस्था नृपसत्तम ।। ७८ ।।
हीनाः सत्त्वेन शुद्धेन ततो वैकारिकाः स्मृताः ।
नृपश्रेष्ठ! देवता और ऋषि कामनायुक्त सत्त्वगुणमें स्थित होते हैं। उनमें भी शुद्ध सत्त्वगुणकी कमी होती है, इसलिये वे वैकारिक माने जाते हैं ।। ७८ १/२ ।।

जनमेजय उवाच

कथं वैकारिको गच्छेत् पुरुषः पुरुषोत्तमम् ।। ७९ ।।
वद सर्वं यथादृष्टं प्रवृत्तिं च यथाक्रमम् ।
**जनमेजयने पूछा—**मुने! वैकारिक पुरुष भगवान् पुरुषोत्तमको कैसे प्राप्त कर सकता है? यह सब आप अपने अनुभवके अनुसार बताइये और उसकी प्रवृत्तिका भी क्रमशः वर्णन कीजिये ।। ७९ १/२ ।।

वैशम्पायन उवाच

सुसूक्ष्मं सत्त्वसंयुक्तं संयुक्तं त्रिभिरक्षरैः ।। ८० ।।
पुरुषः पुरुषं गच्छेन्निष्क्रियः पञ्चविंशकः ।
**वैशम्पायनजीने कहा—**जो अत्यन्त सूक्ष्म, सत्त्वगुणसे संयुक्त तथा अकार, उकार और मकार—इन तीन अक्षरोंसे युक्त प्रणवस्वरूप है, उस परम पुरुष परमात्माको पचीसवाँ तत्त्वरूप पुरुष (जीवात्मा) कर्तृत्वके अहंकारसे शून्य होनेपर प्राप्त करता है ।। ८० १/२ ।।

एवमेकं सांख्ययोगं वेदारण्यकमेव च ।। ८१ ।।
परस्पराङ्गान्यतानि पाञ्चरात्रं च कथ्यते ।
एष एकान्तिनां धर्मो नारायणपरात्मकः ।। ८२ ।।
इस प्रकार आत्मा और अनात्माका विवेक करानेवाला सांख्य, चित्तवृत्तियोंके निरोधका उपदेश देनेवाला योग, जीव और ब्रह्मके अभेदका बोध करानेवाला वेदोंका आरण्यकभाग (उपनिषद्) तथा भक्तिमार्गका प्रतिपादन करनेवाला पाञ्चरात्र आगम—ये सब शास्त्र एक लक्ष्यके साधक होनेके कारण एक बताये जाते हैं। ये सब एक-दूसरेके अंग हैं। सारे कर्मोंको भगवान् नारायणके चरणारविन्दोंमें समर्पित कर देना यह एकान्त भक्तोंका धर्म है ।। ८१-८२ ।।

यथा समुद्रात् प्रसृता जलौघा-
स्तमेव राजन् पुनराविशन्ति ।
इमे तथा ज्ञानमहाजलौघा
नारायणं वै पुनराविशन्ति ।। ८३ ।।