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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

न चातिथिं पूजयति वृथा भवति स द्विजः ॥ ‘जो प्रतिदिन सांगोपांग वेदोंका स्वाध्याय करता है, किंतु अतिथिकी पूजा नहीं करता, उस द्विजका जीवन व्यर्थ है ॥

पाकयज्ञमहायज्ञैः सोमसंस्थाभिरेव च। ये यजन्ति न चार्चन्ति गृहेष्वतिथिमागतम् ॥ तेषां यशोऽभिकामानां दत्तमिष्टं च यद् भवेत्। वृथा भवति तत् सर्वमाशया हि तया हतम् ॥ ‘जो लोग पाक-यज्ञ, पञ्चमहायज्ञ तथा सोमयाग आदिके द्वारा यजन करते हैं, परंतु घरपर आये हुए अतिथिका सत्कार नहीं करते, वे यशकी इच्छासे जो कुछ दान या यज्ञ करते हैं, वह सब व्यर्थ हो जाता है। अतिथिकी मारी गयी आशा मनुष्यके समस्त शुभ-कर्मोंका नाश कर देती है ॥

देशं कालं च पात्रं च स्वशक्तिं च निरीक्ष्य च। अल्पं समं महद् वापि कुर्यादातिथ्यमाप्तवान् ॥ ‘इसलिये श्रद्धालु होकर देश, काल, पात्र और अपनी शक्तिका विचार करके अल्प, मध्यम अथवा महान् रूपमें अतिथि-सत्कार अवश्य करना चाहिये ॥’

सुमुखः सुप्रसन्नात्मा धीमानतिथिमागतम्। स्वागतेनासनेनाद्भिर्न्नाद्येन च पूजयेत् ॥ ‘जब अतिथि अपने द्वारपर आवे, तब बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि वह प्रसन्नचित्त होकर हँसते हुए मुखसे अतिथिका स्वागत करे तथा बैठनेको आसन और चरण धोनेके लिये जल देकर अन्न-पान आदिके द्वारा उसकी पूजा करे ॥

हितः प्रियो वा द्वेष्यो वा मूर्खः पण्डित एव वा। प्राप्तो यो वैश्वदेवान्ते सोऽतिथिः स्वर्गसंक्रमः ॥ ‘अपना हितैषी, प्रेमपात्र, द्वेषी, मूर्ख अथवा पण्डित—जो कोई भी बलिवैश्वदेवके बाद आ जाय, वह स्वर्गतक पहुँचानेवाला अतिथि है ॥

क्षुत्पिपासाश्रमार्ताय देशकालागताय च। सत्कृत्यान्नं प्रदातव्यं यज्ञस्य फलमिच्छता ॥ ‘जो यज्ञका फल पाना चाहता हो, वह भूख-प्यास और परिश्रमसे दुःखी तथा देश-कालके अनुसार प्राप्त हुए अतिथिको सत्कारपूर्वक अन्न प्रदान करे ॥

भोजयेदात्मनः श्रेष्ठान् विधिवद् हव्यकव्ययोः। अन्नं प्राणो मनुष्याणामन्नदः प्राणदो भवेत् ॥ तस्मादन्नं विशेषेण दातव्यं भूतिमिच्छता ॥ ‘यज्ञ और श्राद्धमें अपनेसे श्रेष्ठ पुरुषको विधिवत् भोजन कराना चाहिये। अन्न मनुष्योंका प्राण है, अन्न देनेवाला प्राणदाता होता है; इसलिये कल्याणकी इच्छा रखनेवाले

पुरुषको विशेषरूपसे अन्न-दान करना चाहिये ।।
अन्नदः सर्वकामैस्तु सुतृप्तः सुष्ठ्वलंकृतः ।
पूर्णचन्द्रप्रकाशेन विमानेन विराजता ।।
सेव्यमानो वरस्त्रीभिर्देवलोकं स गच्छति ।
'अन्न प्रदान करनेवाला मनुष्य सब भोगोंसे तृप्त होकर भलीभाँति आभूषणोंसे सम्पन्न हुआ पूर्ण चन्द्रमाके प्रकाशसे प्रकाशित विमानद्वारा देवलोकमें जाता है। वहाँ सुन्दर स्त्रियोंद्वारा उसकी सेवा की जाती है ।।
क्रीडित्वा तु ततस्तस्मिन् वर्षकोटिं यथामरः ।।
ततश्चापि च्युतः कालादिह लोके महायशाः ।
वेदशास्त्रार्थतत्त्वज्ञो भोगवान् ब्राह्मणो भवेत् ।।
'वहाँ करोड़ वर्षोंतक देवताओंके समान भोग भोगनेके बाद समयपर वहाँसे गिरकर यहाँ महायशस्वी और वेदशास्त्रोंके अर्थ और तत्त्वको जाननेवाला भोगसम्पन्न ब्राह्मण होता है ।।
यथाश्रद्धं तु यः कुर्यान्मनुष्येषु प्रजायते ।
महाधनपतिः श्रीमान् वेदवेदाङ्गपारगः ।
सर्वशास्त्रार्थतत्त्वज्ञो भोगवान् ब्राह्मणो भवेत् ।।
'जो मनुष्य श्रद्धापूर्वक अतिथि-सत्कार करता है, वह मनुष्योंमें महान् धनवान्, श्रीमान्, वेद-वेदांगका पारदर्शी, सम्पूर्ण शास्त्रोंके अर्थ और तत्त्वका ज्ञाता एवं भोगसम्पन्न ब्राह्मण होता है ।।
सर्वातिथ्यं तु यः कुर्याद् वर्षमेकमकल्मषः ।
धर्मार्जितधनो भूत्वा पाकभेदविवर्जितः ।।
'जो मनुष्य धर्मपूर्वक धनका उपार्जन करके भोजनमें भेद न रखते हुए एक वर्षतक सबका अतिथि-सत्कार करता है, उसके समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं ।।
सर्वातिथ्यं तु यः कुर्याद् यथाश्रद्धं नरेश्वर ।
अकालनियमेनापि सत्यवादी जितेन्द्रियः ।।
सत्यसंधो जितक्रोधः शाखाधर्मविवर्जितः ।
अधर्मभीरुर्धर्मिष्ठो मायामात्सर्यवर्जितः ।।
श्रद्दधानः शुचिर्नित्यं पाकभेदविवर्जितः ।
स विमानेन दिव्येन दिव्यरूपी महायशाः ।।
पुरंदरपुरं याति गीयमानोऽप्सरोगणैः ।
'नरेश्वर! जो सत्यवादी जितेन्द्रिय पुरुष समयका नियम न रखकर सभी अतिथियोंकी श्रद्धापूर्वक सेवा करता है, जो सत्यप्रतिज्ञ है, जिसने क्रोधको जीत लिया है, जो शाखाधर्मसे रहित, अधर्मसे डरनेवाला और धर्मात्मा है, जो माया और मत्सरतासे रहित है,

जो भोजनमें भेद-भाव नहीं करता तथा जो नित्य पवित्र और श्रद्धासम्पन्न रहता है, वह दिव्य विमानके द्वारा इन्द्रलोकमें जाता है। वहाँ वह दिव्यरूपधारी और महायशस्वी होता है। अप्सराएँ उसके यशका गान करती हैं ।।
मन्वन्तरं तु तत्रैव क्रीडित्वा देवपूजितः ।
मानुष्यलोकमागम्य भोगवान् ब्राह्मणो भवेत् ।।
‘वह एक मन्वन्तरतक वहीं देवताओंसे पूजित होता है और क्रीड़ा करता रहता है। उसके बाद मनुष्यलोकमें आकर भोगसम्पन्न ब्राह्मण होता है’ ।।
(दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)

अध्याय (पृष्ठ 2127)

⬅ विषय-सूची (TOC)

[भूमि-दान, तिल-दान और उत्तम ब्राह्मणकी महिमा]
श्रीभगवानुवाच
अतः परं प्रवक्ष्यामि भूमिदानमनुत्तमम् ॥
यः प्रयच्छति विप्राय भूमिं रम्यां सदक्षिणाम् ।
श्रोत्रियाय दरिद्राय साग्निहोत्राय पाण्डव ॥
स सर्वकामतृप्तात्मा सर्वरत्नविभूषितः ।
सर्वपापविनिर्मुक्तो दीप्यमानोऽर्कवत् तदा ॥
**श्रीभगवान्ने कहा—**पाण्डुनन्दन! अब मैं सबसे उत्तम भूमिदानका वर्णन करता हूँ। जो मनुष्य रमणीय भूमिको दक्षिणाके साथ श्रोत्रिय अग्निहोत्री दरिद्र ब्राह्मणको दान देता है, वह उस समय सभी भोगोंसे तृप्त, सम्पूर्ण रत्नोंसे विभूषित एवं सब पापोंसे मुक्त हो सूर्यके समान देदीप्यमान होता है ॥

बालसूर्यप्रकाशेन विचित्रध्वजशोभिना ।
याति यानेन दिव्येन मम लोकं महायशाः ॥
वह महायशस्वी पुरुष प्रातःकालीन सूर्यके समान प्रकाशित, विचित्र ध्वजाओंसे सुशोभित दिव्य विमानके द्वारा मेरे लोकमें जाता है ॥

न हि भूमिप्रदानाद् वै दानमन्यद् विशिष्यते ।
न चापि भूमिहरणात् पापमन्यद् विशिष्यते ॥
क्योंकि भूमिदानसे बढ़कर दूसरा कोई दान नहीं है और भूमि छीन लेनेसे बढ़कर दूसरा कोई पाप नहीं है ॥

दानान्यन्यानि हीयन्ते कालेन कुरुपुङ्गव ।
भूमिदानस्य पुण्यस्य क्षयो नैवोपपद्यते ॥
कुरुश्रेष्ठ! दूसरे दानोंके पुण्य समय पाकर क्षीण हो जाते हैं, किंतु भूमिदानके पुण्यका कभी भी क्षय नहीं होता ॥

सुवर्णमणिरत्नानि धनानि च वसूनि च ।
सर्वदानानि वै राजन् ददाति वसुधां ददत् ॥
राजन्! पृथ्वीका दान करनेवाला मानो सुवर्ण, मणि, रत्न, धन और लक्ष्मी आदि समस्त पदार्थोंका दान करता है ॥

सागरान् सरितः शैलान् समानि विषमाणि च ।
सर्वगन्धरसांश्चैव ददाति वसुधां ददत् ॥
भूमि-दान करनेवाला मनुष्य मानो समस्त समुद्रोंको, सरिताओंको, पर्वतोंको, सम-विषम प्रदेशोंको, सम्पूर्ण गन्ध और रसोंको देता है ॥

ओषधीः फलसम्पन्ना नानापुष्पसमन्विताः ।

कमलोत्पलषण्डांश्च ददाति वसुधां ददत् ।।
पृथ्वीका दान करनेवाला मनुष्य मानो नाना प्रकारके पुष्पों और फलोंसे युक्त वृक्षोंका तथा कमल और उत्पलोंके समूहोंका दान करता है ।।

अग्निष्टोमादिभिर्यज्ञैर्यै यजन्ते सदक्षिणैः ।
न तत् फलं लभन्ते ते भूमिदानस्य यत् फलम् ।।
जो लोग दक्षिणासे युक्त अग्निष्टोम आदि यज्ञोंके द्वारा देवताओंका यजन करते हैं, वे भी उस फलको नहीं पाते, जो भूमि-दानका फल है ।।

सस्यपूर्णां महीं यस्तु श्रोत्रियाय प्रयच्छति ।
पितरस्तस्य तृप्यन्ति यावदाभूतसम्प्लवम् ।।
जो मनुष्य श्रोत्रिय ब्राह्मणको धानसे भरे हुए खेतकी भूमि दान करता है, उसके पितर महाप्रलयकालतक तृप्त रहते हैं ।।

मम रुद्रस्य सवितुस्त्रिदशानां तथैव च ।
प्रीतये विद्धि राजेन्द्र भूमिर्दत्ता द्विजाय वै ।।
राजेन्द्र! ब्राह्मणको भूमि-दान करनेसे सब देवता, सूर्य, शंकर और मैं—ये सभी प्रसन्न होते हैं ऐसा समझो ।।

तेन पुण्येन पूतात्मा दाता भूमेर्युधिष्ठिर ।
मम सालोक्यमाप्नोति नात्र कार्या विचारणा ।।
युधिष्ठिर! भूमि-दानके पुण्यसे पवित्रचित्त हुआ दाता मेरे परम धाममें निवास करता है—इसमें विचार करनेकी कोई बात नहीं है ।।

यत्किंचित् कुरुते पापं पुरुषो वृत्तिकर्शितः ।
स च गोकर्णमात्रेण भूमिदानेन शुद्ध्यति ।।
मनुष्य जीविकाके अभावमें जो कुछ पाप करता है, उससे गोकर्णमात्र भूमि-दान करनेपर भी छुटकारा पा जाता है ।।

मासोपवासे यत् पुण्यं कृच्छ्रे चान्द्रायणेऽपि च ।
भूमिगोकर्णमात्रेण तत् पुण्यं तु विधीयते ।।
एक महीनेतक उपवास, कृच्छ्र और चान्द्रायण-व्रतका अनुष्ठान करनेसे जो पुण्य होता है, वह गोकर्णमात्र भूमि-दान करनेसे हो जाता है ।।

सर्वतीर्थाभिषेके च यत् पुण्यं समुदाहृतम् ।
भूमिगोकर्णमात्रेण तत् पुण्यं तु विधीयते ।।
सम्पूर्ण तीर्थोंमें स्नान करनेसे जो पुण्य होता है, वह सारा पुण्य गोकर्णमात्र भूमिक दान करनेसे प्राप्त हो जाता है ।।

युधिष्ठिर उवाच

देवदेव नमस्तेऽस्तु वासुदेव सुरेश्वर । गोकर्णस्य प्रमाणं वै वक्तुमर्हसि तत्त्वतः ॥ **युधिष्ठिरने कहा—**देवेश्वर कृष्ण! आपको नमस्कार है। सुरेश्वर! मुझे गोकर्णमात्र भूमिकी ठीक-ठीक माप बतलानेकी कृपा कीजिये ॥

श्रीभगवानुवाच शृणु गोकर्णमात्रस्य प्रमाणं पाण्डुनन्दन । त्रिंशद्दण्डप्रमाणेन प्रमितं सर्वतो दिशम् ॥ प्रत्यक् प्रागपि राजेन्द्र तत् तथा दक्षिणोत्तरम् । गोकर्णं तद्विदः प्राहुः प्रमाणं धरणेर्नृप ॥ **श्रीभगवान् बोले—**नृपश्रेष्ठ पाण्डुनन्दन युधिष्ठिर! गोकर्णमात्र भूमिका प्रमाण सुनो। पूर्वसे पश्चिम और उत्तरसे दक्षिण चारों ओर तीस-तीस दण्ड* नापनेसे जितनी भूमि होती है, उसको भूमिके तत्त्वको जाननेवाले पुरुष गोकर्णमात्र भूमिका माप बताते हैं ॥

सवृषं गोशतं यत्र सुख तिष्ठत्ययन्त्रितम् । सवत्सं कुरुशार्दूल तच्च गोकर्णमुच्यते ॥ कुरुश्रेष्ठ! जितनी भूमिमें खुली हुई सौ गौएँ बैलों और बछड़ोंके साथ सुखपूर्वक रह सकें, उतनी भूमिको भी गोकर्ण कहते हैं ॥

किंकरा मृत्युदण्डाश्च कुम्भीपाकाश्च दारुणाः । घोराश्च वारुणाः पाशा नोपसर्पन्ति भूमिदम् ॥ निरया रौरवाद्याश्च तथा वैतरणी नदी । तीव्राश्च यातनाः कष्टा नोपसर्पन्ति भूमिदम् ॥ भूमिका दान करनेवाले पुरुषके पास यमराजके दूत नहीं फटकने पाते। मृत्युके दण्ड, दारुण कुम्भीपाक, भयानक वरुणपाश, रौरव आदि नरक, वैतरणी नदी और कठोर यम-यातनाएँ भी भूमिदान करनेवालोंको नहीं सतातीं ॥

चित्रगुप्तः कलिः कालः कृतान्तो मृत्युरेव च । यमश्च भगवान् साक्षात् पूजयन्ति महीप्रदम् ॥ चित्रगुप्त, कलि, काल, कृतान्त मृत्यु और साक्षात् भगवान् यम भी भूमिदान करनेवालेका आदर करते हैं ॥

रुद्रः प्रजापतिः शक्रः सुरा ऋषिगणास्तथा । अहं च प्रीतिमान् राजन् पूजयामो महीप्रदम् ॥ राजन्! रुद्र, प्रजापति, इन्द्र, देवता, ऋषिगण और स्वयं मैं—ये सभी प्रसन्न होकर भूमिदाताका आदर करते हैं ॥

कृशभृत्यस्य कृशगोः कृशाश्वस्य कृतातिथेः ।

भूमिर्देया नरश्रेष्ठ स निधिः पारलौकिकः ॥ नरश्रेष्ठ! जिसके कुटुम्बके लोग जीविकाके अभावसे दुर्बल हो गये हों, जिसकी गौएँ और घोड़े भी दुबले-पतले दिखायी देते हों तथा जो सदा अतिथि-सत्कार करनेवाला हो, ऐसे ब्राह्मणको भूमि-दान देना चाहिये; क्योंकि वह परलोकके लिये खजाना है ॥

सीदमानकुटुम्बाय श्रोत्रियायाग्निहोत्रिणे । व्रतस्थाय दरिद्राय भूमिर्देया नराधिप ॥ नरेश्वर! जिसके कुटुम्बीजन कष्ट पा रहे हों—ऐसे श्रोत्रिय, अग्निहोत्री, व्रतधारी एवं दरिद्र ब्राह्मणको भूमि देनी चाहिये ॥

यथा हि धात्री क्षीरेण पुत्रं वर्धयति स्वयम् । दातारमनुगृह्णाति दत्ता ह्येवं वसुंधरा ॥ जैसे धाय अपना दूध पिलाकर पुत्रका पालन-पोषण करती है, उसी प्रकार दानमें दी हुई भूमि दातापर अनुग्रह करती है ॥

यथा बिभर्ति गौर्र्वत्सं सृजन्ती क्षीरमात्मनः । तथा सर्वगुणोपेता भूमिर्वहति भूमिदम् ॥ जैसे गौ अपना दूध पिलाकर बछड़ेका पालन करती है, वैसे ही सर्वगुणसम्पन्न भूमि अपने दाताका कल्याण करती है ॥

यथा बीजानि रोहन्ति जलसिक्तानि भूपते । तथा कामाः प्ररोहन्ति भूमिदस्य दिने दिने ॥ भूपाल! जिस प्रकार जलसे सींचे हुए बीज अंकुरित होते हैं, वैसे ही भूमिदाताके मनोरथ प्रतिदिन पूर्ण होते रहते हैं ॥

यथा तेजस्तु सूर्यस्य तमः सर्वं व्यपोहति । तथा पापं नरस्येह भूमिदानं व्यपोहति ॥ जैसे सूर्यका तेज समस्त अन्धकारको दूर कर देता है, उसी प्रकार यहाँ भूमि-दान मनुष्यके सम्पूर्ण पापोंका नाश कर डालता है ॥

आश्रुत्य भूमिदानं तु दत्त्वा यो वा हरेत् पुनः । स बद्धो वारुणैः पाशैः क्षिप्यते पूयशोणिते ॥ कुरुश्रेष्ठ! जो भूमि-दानकी प्रतिज्ञा करके नहीं देता अथवा देकर फिर छीन लेता है, उसे वरुणके पाशसे बाँधकर पीब और रक्तसे भरे हुए नरक-कुण्डमें डाला जाता है ॥

स्वदत्तां परदत्तां वा यो हरेत वसुन्धराम् । न तस्य नरकाद् घोराद् विद्यते निष्कृतिः क्वचित् ॥ जो अपने या दूसरेकी दी हुई भूमिका अपहरण करता है, उसके लिये नरकसे उद्धार पानेका कोई उपाय नहीं है ॥

दत्त्वा भूमिं द्विजेन्द्राणां यस्तामेवोपजीवति ।

स मूढो याति दुष्टात्मा नरकानेकविंशतिम् ।
नरकेभ्यो विनिर्मुक्तः शुनां योनिं स गच्छति ॥
जो श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको भूमिका दान करके उसीसे अपनी जीविका चलाता है, वह दुष्टात्मा मूर्ख इक्कीस नरकोंमें गिरता है। फिर नरकोंसे निकलकर कुत्तोंकी योनिको प्राप्त होता है॥

हलकृष्टा मही देया सबीजा सस्यमालिनी ।
अथवा सोदका देया दरिद्राय द्विजातये ॥
जिसमें हलसे जोतकर बीज बो दिये गये हों तथा जहाँ हरी-भरी खेती लहलहा रही हो, ऐसी भूमि दरिद्र ब्राह्मणको देनी चाहिये अथवा जहाँ जलका सुभीता हो, वह भूमि दानमें देनी चाहिये ॥

एवं दत्ता मही राजन् प्रहृष्टेनान्तरात्मना ।
सर्वान् कामानवाप्नोति मनसा चिन्तितानि च ॥
राजन्! इस प्रकार प्रसन्नचित्त होकर मनुष्य यदि पृथ्वीका दान करे तो वह सम्पूर्ण मनोवांछित कामनाओंको प्राप्त करता है ॥

बहुभिर्वसुधा दत्ता दीयते च नराधिपैः ।
यस्य यस्य यदा भूमिस्तस्य तस्य तदा फलम् ॥
बहुत-से राजाओंने इस पृथ्वीको दानमें दिया है और बहुत-से अभी दे रहे हैं। यह भूमि जब जिसके अधिकारमें रहती है, उस समय वही उसे दानमें देता है और उसके फलका भागी होता है ॥

यश्च रूप्यं प्रयच्छेद् वै दरिद्राय द्विजातये ।
कृशवृत्तेः कृशगवे स मुक्तः सर्वकिल्बिषैः ॥
पूर्णचन्द्रप्रकाशेन विमानेन विराजता ।
कामरूपी यथाकामं स्वर्गलोके महीयते ॥
जिसकी जीविका क्षीण और गौएँ दुर्बल हो गयी हैं, ऐसे दरिद्र ब्राह्मणको जो चाँदी दान करता है, वह सब पापोंसे छूटकर और सुन्दर रूप धारण करके पूर्णिमाके चन्द्रमाके प्रकाशके समान प्रकाशित विमानके द्वारा इच्छानुसार स्वर्गलोकमें महिमान्वित होता है ॥

ततोऽवतीर्णः कालेन लोके चास्मिन् महायशाः ।
सर्वलोकार्चितः श्रीमान् राजा भवति वीर्यवान् ॥
फिर पुण्यका क्षय होनेपर समयानुसार वहाँसे उतरकर इस लोकमें सम्पूर्ण लोगोंसे पूजित, धनवान्, महायशस्वी और महापराक्रमी राजा होता है ॥

तिलपर्वतकं यस्तु श्रोत्रियाय प्रयच्छति ।
विशेषेण दरिद्राय तस्यापि शृणु यत् फलम् ॥

जो श्रोत्रिय ब्राह्मणको—विशेषतः दरिद्रको तिलका पर्वत दान करता है, उसको जो फल मिलता है; वह सुनो॥

पुण्यं वृषायुतोत्सर्गे यत् प्रोक्तं पाण्डुनन्दन।
तत् पुण्यं समनुप्राप्य तत्क्षणाद् विरजा भवेत्॥
पाण्डुनन्दन! दस हजार वृषोत्सर्गका जो पुण्यफल कहा गया है, उस पुण्यको वह प्राप्त करके तत्काल निष्पाप हो जाता है॥

यथा त्वचं भुजङ्गो वै त्यक्त्वा शुद्धतनुर्भवेत्।
तथा तिलप्रदानाद् वै पापं त्यक्त्वा विशुद्धयति॥
जैसे साँप केंचुलको छोड़कर शुद्ध हो जाता है, उसी प्रकार तिल-दान करनेवाला मनुष्य पापोंसे मुक्त हो शुद्ध हो जाता है॥

तिलषण्डं प्रयुञ्जानो जाम्बूनदविभूषितम्।
विमानं दिव्यमारूढः पितृलोके महीयते॥
तिलके ढेरका दान करनेवाला स्वर्णभूषित दिव्य विमानपर आरूढ़ हो पितृलोकमें सम्मानित होता है॥

षष्टिं वर्षसहस्राणि कामरूपी महायशाः।
तिलप्रदाता रमते पितृलोके यथासुखम्॥
वह तिलका दान करनेवाला मनुष्य महान् यश और इच्छानुकूल रूप धारण करनेकी शक्ति पाकर साठ हजार वर्षोंतक पितृलोकमें सुख और आनन्द भोगता है॥

तिलं गावः सुवर्णं चाप्यन्नं कन्या वसुन्धरा।
तारयन्तीह दत्तानि ब्राह्मणेभ्यो महाभुज॥
महाबाहो! तिल, गौ, सोना, अन्न, कन्या और पृथ्वी—इतने पदार्थ यदि ब्राह्मणोंको दिये जायँ तो ये दाताका उद्धार कर देते हैं॥

ब्राह्मणं वृत्तसम्पन्नमाहिताग्निमलोलुपम्।
तर्पयेद् विधिवद् राजन् स निधिः पारलौकिकः॥
सदाचारसम्पन्न, अग्निहोत्री तथा अलोलुप ब्राह्मणकी विधिवत् पूजा करनी चाहिये; क्योंकि वह परलोकमें काम देनेवाला खजाना है॥

आहिताग्निं दरिद्रं च श्रोत्रियं च जितेन्द्रियम्।
शूद्रान्नवर्जितं चैव द्विजं यत्नेन पूजयेत्॥
जो ब्राह्मण वेदका विद्वान्, अग्निहोत्रपरायण, जितेन्द्रिय, शूद्रके अन्नसे दूर रहनेवाला और दरिद्र हो, उसकी यत्नपूर्वक पूजा करनी चाहिये॥

आहिताग्निः सदा पात्रमग्निहोत्री च वेदवित्।
पात्राणामपि तत्पात्रं शूद्रान्नं यस्य नोदरे॥

नित्य अग्निहोत्र करनेवाला वेदवेत्ता ब्राह्मण दानका सदा पात्र है। जिसके पेटमें शूद्रका अन्न नहीं जाता, वह पात्रोंमें भी उत्तम पात्र है॥ यच्च वेदमयं पात्रं यच्च पात्रं तपोमयम्। असंकीर्णं च यत् पात्रं तत् पात्रं तारयिष्यति॥ जो वेदसम्पन्न पात्र है, जो तपोमय पात्र है और जो किसीका भी भोजन न करनेवाला पात्र है, वह पवित्र पात्र दाताका उद्धार कर देता है॥ नित्यस्वाध्यायनिरतास्त्वसंकीर्णेन्द्रियाश्च ये। पञ्चयज्ञपरा नित्यं पूजितास्तारयन्ति ते॥ जो ब्राह्मण नित्य स्वाध्यायमें संलग्न रहते हैं, जिनकी इन्द्रियाँ वशमें हैं, जो सदा ही पञ्च महायज्ञ करनेमें तत्पर रहते हैं, वे पूजा करनेवालेका उद्धार कर देते हैं॥ ये क्षान्तिदान्ताः श्रुतिपूर्णकर्णा जितेन्द्रियाः प्राणिवधे निवृत्ताः। प्रतिग्रहे संकुचिता गृहस्था- स्ते ब्राह्मणास्तारयितुं समर्थाः॥ जो क्षमाशील, संयतचित्त और जितेन्द्रिय हैं, जिनके कान वेदवाणीसे भरे हुए हैं, जो प्राणियोंकी हत्यासे निवृत्त हो चुके हैं और जिनको दान लेनेमें संकोच होता है, ऐसे गृहस्थ ब्राह्मण दाताका उद्धार करनेमें समर्थ हैं॥ नित्योदकी नित्ययज्ञोपवीती नित्यस्वाध्यायी वृषलान्नवर्जी। ऋतौ गच्छन् विधिवच्चापि जुह्वत् स ब्राह्मणस्तारयितुं समर्थः॥ जो प्रतिदिन तर्पण करनेवाला, सदा यज्ञोपवीत धारण किये रहनेवाला, नित्यप्रति स्वाध्यायपरायण, शूद्रका अन्न न खानेवाला, ऋतुकालमें ही अपनी स्त्रीसे समागम करनेवाला और विधिपूर्वक अग्निहोत्र करनेवाला हो, वह ब्राह्मण दूसरोंको तारनेमें समर्थ होता है॥ ब्राह्मणो यस्तु मद्भक्तो मद्रागी मत्परायणः। मयि संन्यस्तकर्मा च स विप्रस्तारयेद् ध्रुवम्॥ जो ब्राह्मण मेरा भक्त, मुझमें अनुराग रखने-वाला, मेरे भजनमें परायण और मुझे ही कर्मफलोंको अर्पण करनेवाला है, वह ब्राह्मण अवश्य संसार-समुद्रसे तार सकता है॥ द्वादशाक्षरतत्त्वज्ञश्चतुर्व्यूहविभागवित्। अच्छिद्रपञ्चकालज्ञः स विप्रस्तारयिष्यति॥ जो द्वादशाक्षर मन्त्र (ॐ नमो भगवते वासुदेवाय)-का तत्त्वज्ञ है, जो चतुर्व्यूहके विभागको जाननेवाला है एवं जो दोषरहित रहकर पाँचों समयकी उपासनाओंका ज्ञाता है,

वह ब्राह्मण दूसरोंका भी उद्धार कर देता है ।। (दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)


* एक पुरुष अर्थात् चार हाथके नापको दण्ड कहते हैं।

अवितृप्तश्च धर्मेषु केशवं पुनरब्रवीत् ॥

⬅ विषय-सूची (TOC)

[अनेक प्रकारके दानोंकी महिमा]
वैशम्पायन उवाच

वासुदेवेन दानेषु कथितेषु यथाक्रमम् ।
अवितृप्तश्च धर्मेषु केशवं पुनरब्रवीत् ॥

**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! भगवान् श्रीकृष्णके द्वारा क्रमसे दान और धर्मकी बात कही जानेपर युधिष्ठिर तृप्त न होकर फिर भगवान् केशवसे कहने लगे— ॥
देव धर्मामृतमिदं शृण्वतोऽपि परंतप ।
न विद्यते सुरश्रेष्ठ मम तृप्तिर्हि माधव ॥

‘सुरश्रेष्ठ! देवेश्वर! परंतप माधव! आपके मुँहसे इस धर्ममय अमृतका श्रवण करते हुए मुझे तृप्ति नहीं होती है ॥
यानि चान्यानि दानानि त्वया नोक्तानि कानिचित् ।
तान्याचक्ष्व सुरश्रेष्ठ तेषां चानुक्रमात् फलम् ॥

‘सुरश्रेष्ठ! जो अन्य प्रकारके दान हैं, जिनको अभीतक आपने नहीं बताया है, उनका वर्णन कीजिये और क्रमशः उनका फल भी बतानेकी कृपा कीजिये’ ॥

श्रीभगवानुवाच

शय्यां प्रस्तरणोपेतां यः प्रयच्छति पाण्डव ।
अर्चयित्वा द्विजं भक्त्या वस्त्रमाल्यानुलेपनैः ।
भोजयित्वा विचित्रान्नं तस्य पुण्यफलं शृणु ॥

**श्रीभगवान्‌ने कहा—**पाण्डुनन्दन! जो मनुष्य भक्तिके साथ वस्त्र, माला और चन्दन चढ़ाकर ब्राह्मणकी पूजा करता है तथा उसे भाँति-भाँतिके अन्नका भोजन कराकर बिछौनेसहित शय्या दान करता है, उसका पुण्यफल सुनो ॥
धेनुदानस्य यत् पुण्यं विधिदत्तस्य पाण्डव ।
तत् पुण्यं समनुप्राप्य पितृलोके महीयते ॥

पाण्डुनन्दन! विधिवत् किये हुए गोदानका जो पुण्य होता है, उस पुण्यको प्राप्त करके वह पितृलोकमें सम्मान पाता है ॥
आहिताग्निसहस्रस्य पूजितस्यैव यत् फलम् ।
तत् पुण्यफलमाप्नोति यस्तु शय्यां प्रयच्छति ॥

तथा एक हजार अग्निहोत्री ब्राह्मणोंका पूजन करनेसे जो फल मिलता है, उसी पुण्य-फलको वह प्राप्त करता है, जो शय्याका दान करता है ॥
शिल्पमध्ययनं वापि विद्यां मन्त्रौषधीनि च ।
यः प्रयच्छति विप्राय तस्य पुण्यफलं शृणु ॥

जो मनुष्य ब्राह्मणको शिल्प, वेद, मन्त्र, ओषधि आदि विद्याओंका दान करता है, उसके पुण्यफलको सुनो ।। छन्दोभिः सम्प्रयुक्तेन विमानेन विराजता । सप्तर्षिलोकान् व्रजति पूज्यते ब्रह्मवादिभिः ।। वह वेदमन्त्रोंके बलसे चलनेवाले सुन्दर विमानपर आरूढ़ हो सप्तर्षियोंके लोकमें जाता और वहाँ ब्रह्मवादी महर्षियोंसे पूजित होता है ।। चतुर्युगानि वै त्रिंशत् क्रीडित्वा तत्र देववत् । इह मानुष्यके लोके विप्रो भवति वेदवित् ।। उस लोकमें तीस चतुर्युगीतक देवताओंकी भाँति क्रीड़ा करके वह मनुष्यलोकमें वेदवेत्ता ब्राह्मण होता है ।। विश्रामयति यो विप्रं श्रान्तमध्वनि कर्शितम् । विनश्यति तदा पापं तस्य वर्षकृतं नृप ।। राजन्! जो रास्तेके थके-माँदे दुर्बल ब्राह्मणको विश्राम देता है, उसका एक वर्षका किया हुआ पाप तत्काल नष्ट हो जाता है ।। अथ प्रक्षालयेत् पादौ तस्य तोयेन भक्तिमान् । दशवर्षकृतं पापं व्यपोहति न संशयः ।। तदनन्तर जब वह भक्तिपूर्वक उस अतिथिके दोनों चरणोंको जलसे पखारता है, उस समय उसके दस वर्षके किये हुए पाप निःसंदेह नष्ट हो जाते हैं ।। घृतेन वाथ तैलेन पादौ तस्य तु पूजयेत् । तद् द्वादशसमारूढं पापमाशु व्यपोहति ।। तथा यदि वह उसके दोनों पैरोंमें घी या तेल मलकर उसकी पूजा करता है तो उसके बारह वर्षोंके पाप तुरंत नष्ट हो जाते हैं ।। स्वागतेन तु यो विप्रं पूजयेदासनेन च । प्रत्युत्थानेन वा राजन् स देवानां प्रियो भवेत् ।। राजन्! जो घरपर आये हुए ब्राह्मणका स्वागत करके उसे आसन और अभ्युत्थान देकर पूजन करता है, वह देवताओंका प्रिय होता है ।। स्वागतेनाग्नयो राजन्नासनेन शतक्रतुः । प्रत्युत्थानेन पितरः प्रीतिं यान्त्यतिथिप्रियाः ।। महाराज! अतिथिके स्वागतसे अग्नि, उसे आसन देनेसे इन्द्र और अगवानी करनेसे अतिथियोंपर प्रेम रखनेवाले पितर प्रसन्न होते हैं ।। अग्निशक्रपितॄणां च तेषां प्रीत्या नराधिप । संवत्सरकृतं पापं तस्य सद्यो विनश्यति ।।

नरेश्वर! इस प्रकार अग्नि, इन्द्र और पितरोंके प्रसन्न होनेपर मनुष्यका एक वर्षका पाप तत्काल नष्ट हो जाता है ।। यः प्रयच्छति विप्राय आसनं माल्यभूषितम् । स याति मणिचित्रेण रथेनेन्द्रनिकेतनम् ।। जो मनुष्य ब्राह्मणको मालाओंसे विभूषित आसन प्रदान करता है, वह मणियोंसे चित्रित रथके द्वारा इन्द्रलोकमें जाता है ।। पुरंदरासने तत्र दिव्यनारीविभूषितः । षष्टिं वर्षसहस्राणि क्रीडत्यप्सरसां गणैः ।। वहाँ इन्द्रासनपर दिव्य स्त्रियोंके साथ शोभा पाता है और साठ हजार वर्षोंतक अप्सरागणोंके साथ क्रीड़ा करता है ।। वाहनं यः प्रयच्छेत ब्राह्मणाय युधिष्ठिर । स याति रत्नचित्रेण वाहनेन सुरालयम् ।। युधिष्ठिर! जो मनुष्य ब्राह्मणको सवारी दान करता है, वह रत्नोंसे चित्रित विमानपर बैठकर स्वर्गलोकको जाता है ।। स तत्र कामं क्रीडित्वा सेव्यमानोऽप्सरोगणैः । इह राजा भवेद् राजन् नात्र कार्या विचारणा ।। राजन्! वहाँ वह अप्सरागणोंके द्वारा सेवित होकर इच्छानुसार क्रीड़ा करता है। फिर इस लोकमें राजा होता है—इसमें कोई विचारकी बात नहीं है ।। पादपं पल्लवाकीर्णं पुष्पितं फलितं तथा । गन्धमाल्यैरथाभ्यर्च्य वस्त्राभरणभूषितम् । यः प्रयच्छति विप्राय श्रोत्रियाय सदक्षिणम् । भोजयित्वा यथाकामं तस्य पुण्यफलं शृणु ।। जो पुरुष पत्ते, फूल और फलोंसे भरे हुए वृक्षोंको वस्त्रों और आभूषणोंसे विभूषित करके चन्दन और फूलोंसे उसकी पूजा करता है तथा वेदवेत्ता ब्राह्मणको भोजन कराकर दक्षिणाके साथ उस वृक्षका दान कर देता है, उसके पुण्यका फल सुनो ।। जाम्बूनदविचित्रेण विमानेन विराजता । पुरंदरपुरं याति जयशब्दरवैर्युतः ।। वह सुवर्णजटित सुन्दर विमानपर बैठकर जय-जयकारके शब्द सुनता हुआ इन्द्रलोकमें जाता है ।। तत्र शक्रपुरे रम्ये तस्य कल्पकपादपः । ददाति चेप्सितं सर्वं मनसा यद् यदिच्छति ।। वहाँ रमणीय इन्द्रनगरीमें उसके मनमें जो-जो इच्छाएँ होती हैं, उन सब अभीष्ट वस्तुओंको कल्पवृक्ष देता है ।।

यावन्ति तस्य पत्राणि पुष्पाणि च फलानि च । तावद् वर्षसहस्राणि शक्रलोके महीयते ॥ दानमें दिये हुए उस वृक्षके जितने पत्ते, फूल और फल होते हैं, उतने ही हजार वर्षोंतक वह इन्द्रलोकमें महिमा पाता है ॥

शक्रलोकावतीर्णश्च मानुष्यं लोकमागतः । रथाश्वगजसम्पूर्णं पुरं राज्यं च रक्षति ॥ इन्द्रलोकसे उतरकर जब वह मनुष्यलोकमें आता है, तब रथ, घोड़े और हाथियोंसे पूर्ण नगरके राज्यकी रक्षा करता है ॥

स्थापयित्वा तु मद्भक्त्या यो मत्प्रतिकृतिं नरः । आलयं विधिवत् कृत्वा पूजाकर्म च कारयेत् । स्वयं वा पूजयेद् भक्त्या तस्य पुण्यफलं शृणु ॥ जो पुरुष भक्तिपूर्वक मन्दिर बनवाकर उसमें मेरी प्रतिमाकी विधिपूर्वक स्थापना करता है और दूसरेसे उसकी पूजा करवाता है या स्वयं भक्तिके साथ पूजा करता है, उसके पुण्यका फल सुनो ॥

अश्वमेधसहस्रस्य यत् पुण्यं समुदाहृतम् । तत् फलं समवाप्नोति मत्सालोक्यं प्रपद्यते । न जाने निर्गमं तस्य मम लोकाद् युधिष्ठिर ॥ एक हजार अश्वमेधयज्ञका जो पुण्य बताया गया है, उस फलको पाकर वह मेरे परमधामको पधारता है। युधिष्ठिर! मैं जानता हूँ, वह वहाँसे कभी लौटकर इस लोकमें नहीं आता ॥

देवालये विप्रगृहे गोवाटे चत्वरेऽपि वा । प्रज्वालयति यो दीपं तस्य पुण्यफलं शृणु ॥ जो मनुष्य देवमन्दिरमें, ब्राह्मणके घरमें, गोशालामें और चौराहेपर दीपक जलाता है, उसके पुण्यफलको सुनो ॥

आरुह्य काञ्चनं यानं द्योतयन् सर्वतो दिशम् । गच्छेदादित्यलोकं स सेव्यमानः सुरोत्तमैः ॥ वह सुवर्णमय विमानपर बैठकर सम्पूर्ण दिशाओंको देदीप्यमान करता हुआ सूर्यलोकको जाता है, उस समय श्रेष्ठ देवता उसकी सेवामें उपस्थित रहते हैं ॥

तत्र प्रकामं क्रीडित्वा वर्षकोटिं महातपाः । इह लोके भवेद् विप्रो वेदवेदाङ्गपारगः ॥ वह महातपस्वी पुरुष करोड़ों वर्षोंतक सूर्यलोकमें यथेष्ट विहार करनेके पश्चात् मर्त्यलोकमें आकर वेद-वेदांगोंमें पारंगत ब्राह्मण होता है ॥

करकां कर्णिकां वापि महद् वा जलभाजनम् ।

यः प्रयच्छति विप्राय तस्य पुण्यफलं शृणु ।।
जो मनुष्य ब्राह्मणको करका (कमण्डलु), कर्णिका (गिलास) अथवा महान् जलपात्र दान करता है, उसका पुण्यफल सुनो ।।
ब्रह्मकूर्चे तु यत् पीते फलं प्रोक्तं नराधिप ।
तत् पुण्यफलमाप्नोति जलभाजनदो नरः ।।
सुतृप्तः सर्वसौगन्धः प्रहृष्टेन्द्रियमानसः ।।
जनेश्वर! पञ्चगव्य पीनेवाले मनुष्यके लिये जो फल बताया गया है, उस फलको वह जलपात्र दान करनेवाला मनुष्य पाता है। वह सदा तृप्त रहता है। उसे सब प्रकारके सुगन्धित पदार्थ सुलभ होते हैं तथा उसकी इन्द्रियाँ और मन सदा प्रसन्न रहते हैं ।।
हंससारसयुक्तेन विमानेन विराजता ।
स याति वारुणं लोकं दिव्यगन्धर्वसेवितम् ।।
इतना ही नहीं, वह हंस और सारसोंसे जुते हुए सुन्दर विमानपर बैठकर दिव्य गन्धर्वोंसे सेवित वरुणलोकमें जाता है ।।
पानीयं यः प्रयच्छेद् वै जीवानां जीवनं परम् ।
ग्रीष्मे च त्रिषु मासेषु तस्य पुण्यफलं शृणु ।।
जो गर्मीके तीन महीनोंमें जीवोंके जीवनभूत जलका दान करता है, उसके पुण्यका फल सुनो ।।
पूर्णचन्द्रप्रकाशेन विमानेन विराजता ।
स गच्छेदिन्द्रभवनं सेव्यमानोऽप्सरोगणैः ।।
वह पूर्ण चन्द्रमाके समान प्रकाशमान सुन्दर विमानपर आरूढ़ होकर अप्सरागणोंसे सेवित हुआ इन्द्रभवनकी यात्रा करता है ।।
शिरोऽभ्यङ्गप्रदानेन तेजस्वी प्रियदर्शनः ।
सुभगो रूपवान् शूरः पण्डितश्च भवेद् द्विजः ।।
सिरमें लगानेके लिये तेल-दान करनेसे मनुष्य तेजस्वी, दर्शनीय, सुन्दर, रूपवान्, शूरवीर और पण्डित ब्राह्मण होता है ।।
वस्त्रदायी तु तेजस्वी सर्वत्र प्रियदर्शनः ।
सुभगो भवति श्रीमान् स्त्रीणां नित्यं मनोरमः ।।
वस्त्र-दान करनेवाला पुरुष भी तेजस्वी, दर्शनीय, सुन्दर, श्रीसम्पन्न और सदा स्त्रियोंके लिये मनोरम होता है ।।
उपानहौ च छत्रं च यो ददाति नरोत्तमः ।
स याति रथमुख्येन काञ्चनेन विराजता ।
शक्रलोकं महातेजाः सेव्यमानोऽप्सरोगणैः ।।

जो उत्तम पुरुष जूता और छाता दान करता है, वह महान् तेजसे सम्पन्न हो सोनेके बने हुए सुन्दर रथपर बैठकर अप्सरागणोंसे सेवित हुआ इन्द्रलोकमें जाता है ।। काष्ठपादुकदा यान्ति विमानैर्वृक्षनिर्मितैः । धर्मराजपुरं रम्यं सेव्यमानाः सुरोत्तमैः ॥ जो काठकी खड़ाऊँ दान करते हैं, वे काष्ठनिर्मित विमानोंपर आरूढ़ होकर श्रेष्ठ देवताओंसे सेवित हो धर्मराजके रमणीय नगरमें प्रवेश करते हैं ।। दन्तकाष्ठप्रदानेन प्रियवाक्यो भवेन्नरः । सुगन्धवदनः श्रीमान् मेधासौभाग्यसंयुतः ॥ दातौनका दान करनेसे मनुष्य मधुरभाषी होता है। उसके मुँहसे सुगन्ध निकलती रहती है तथा वह लक्ष्मीवान् एवं बुद्धि और सौभाग्यसे सम्पन्न होता है ।। अनन्तराशी यश्चापि वर्तते व्रतवत् सदा । सत्यवाक्क्रोधरहितः शुचिः स्नानरतः सदा । स विमानेन दिव्येन याति शक्रपुरं नरः ॥ जो मनुष्य अतिथि और कुटुम्बीजनोंको भोजन करा लेनेके पश्चात् स्वयं भोजन करता है, सदा व्रतका पालन करता है, सत्य बोलता है, क्रोधसे दूर रहता है तथा स्नान आदिके द्वारा सर्वदा पवित्र रहता है, वह दिव्य विमानके द्वारा इन्द्रलोककी यात्रा करता है ।। एकभक्तेन यश्चापि वर्षमेकं तु वर्तते । ब्रह्मचारी जितक्रोधः सत्यशौचसमन्वितः । स विमानेन दिव्येन याति शक्रपुरं नरः ॥ जो एक वर्षतक प्रतिदिन एक वक्त भोजन करता है, ब्रह्मचर्यका पालन करता है, क्रोधको काबूमें रखता है तथा सत्य और शौचका पालन करता है, वह दिव्य विमानमें बैठकर इन्द्रलोकमें पदार्पण करता है ।। चतुर्थकाले यो भुङ्क्ते ब्रह्मचारी जितेन्द्रियः । वर्तते चैकवर्षं तु तस्य पुण्यफलं शृणु ॥ जो एक वर्षतक चौथे वक्त अर्थात् प्रति दूसरे दिन भोजन करता है, ब्रह्मचर्यका पालन करता है और इन्द्रियोंको काबूमें रखता है, उसके पुण्यका फल सुनो ।। चित्रबर्हिणयुक्तेन विचित्रध्वजशोभिना । याति यानेन दिव्येन स महेन्द्रपुरं नरः ॥ वह मनुष्य विचित्र पंखवाले मोरोंसे जुते हुए अद्भुत ध्वजसे शोभायमान दिव्य विमानपर आरूढ़ हो महेन्द्रलोकमें गमन करता है ।। निवेशयति मन्मूर्त्यामात्मानं मद्गतः शुचिः । रुद्रदक्षिणमूर्त्यां वा चतुर्दश्यां विशेषतः ॥ सिद्धैर्ब्रह्मर्षिभिश्चैव देवलोकैश्च पूजितः ।

गन्धर्वैर्भूतसङ्घैश्च गीयमानो महातपाः ।। प्रविशेत् स महातेजा मां वा शङ्करमेव वा । न स्यात् पुनर्भवो राजन् नात्र कार्या विचारणा ।। राजन्! जो मनुष्य पवित्र और मेरे परायण होकर मेरे श्रीविग्रहमें मन लगाता (मेरा ध्यान करता) है तथा विशेषतः चतुर्दशीके दिन रुद्र अथवा दक्षिणामूर्तिमें चित्त एकाग्र करता है, वह महान् तपस्वी पुरुष सिद्धों, ब्रह्मर्षियों और देवताओंसे पूजित होकर गन्धर्वों और भूतोंका गान सुनता हुआ मुझमें या शंकरमें प्रवेश कर जाता है तथा उसका इस संसारमें फिर जन्म नहीं होता—इसमें कोई विचारकी बात नहीं है ।।

गोकृते स्त्रीकृते चैव गुरुविप्रकृतेऽपि वा । हन्यन्ते ये तु राजेन्द्र शक्रलोकं व्रजन्ति ते ।। राजेन्द्र! जो मनुष्य गौ, स्त्री, गुरु और ब्राह्मणकी रक्षाके लिये प्राण दे डालते हैं, वे इन्द्रलोकमें जाते हैं ।।

तत्र जाम्बूनदमये विमाने कामगामिनि । मन्वन्तरं प्रमोदन्ते दिव्यनारीनिषेविताः ।। वहाँ इच्छानुसार विचरनेवाले सुवर्णके बने हुए विमानपर रहकर दिव्य नारियोंसे सेवित हुए एक मन्वन्तरतक आनन्दका अनुभव करते हैं ।।

आश्रुतस्य प्रदानेन दत्तस्य हरणेन च । जन्मप्रभृति यद् दत्तं तत् सर्वं तु विनश्यति ।। देनेकी प्रतिज्ञा की हुई वस्तुको न देनेसे अथवा दी हुई वस्तुको छीन लेनेसे जन्मभरका किया हुआ सारा दान-पुण्य नष्ट हो जाता है ।।

यद् यदिष्टतमं द्रव्यं न्यायेनोपार्जितं च यत् । तत् तद् गुणवते देयं तदेवाक्षय्यमिच्छता ।। अक्षय सुख चाहनेवाले मनुष्यको चाहिये कि जो-जो न्यायसे उपार्जित किया हुआ अत्यन्त अभीष्ट द्रव्य है, वह-वह गुणवान् ब्राह्मणको दानमें दे ।।

(दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)

[पञ्चमहायज्ञ, विधिवत् स्नान और उसके अंगभूत कर्म, भगवान्‌के प्रिय पुष्प तथा भगवद्भक्तोंका वर्णन]

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[पञ्चमहायज्ञ, विधिवत् स्नान और उसके अंगभूत कर्म, भगवान्‌के प्रिय पुष्प तथा भगवद्भक्तोंका वर्णन]

युधिष्ठिर उवाच

पञ्च यज्ञाः कथं देव क्रियन्तेऽत्र द्विजातिभिः ।
तेषां नाम च देवेश वक्तुमर्हस्यशेषतः ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**भगवन्! द्विजातियोंके द्वारा पञ्चमहायज्ञोंका अनुष्ठान यहाँ किस प्रकार किया जाता है? देवेश्वर! उन यज्ञोंके नाम भी पूर्णतया बताने चाहिये ॥

श्रीभगवानुवाच

शृणु पञ्च महायज्ञान् कीर्त्यमानान् युधिष्ठिर ।
यैरेव ब्रह्मसालोक्यं लभ्यते गृहमेधिना ॥
**श्रीभगवान्‌ने कहा—**युधिष्ठिर! जिनके अनुष्ठानसे गृहस्थ पुरुषोंको ब्रह्मलोककी प्राप्ति होती है, उन पञ्चमहायज्ञोंका वर्णन करता हूँ, सुनो ॥
ऋभुयज्ञं ब्रह्मयज्ञं भूतयज्ञं च पाण्डव ।
नृयज्ञं पितृयज्ञं च पञ्च यज्ञान् प्रचक्षते ॥
पाण्डुनन्दन! ऋभुयज्ञ, ब्रह्मयज्ञ, भूतयज्ञ, मनुष्ययज्ञ और पितृयज्ञ—ये पञ्चयज्ञ कहलाते हैं ॥
तर्पणं ऋभुयज्ञः स्यात् स्वाध्यायो ब्रह्मयज्ञकः ।
भूतयज्ञो बलैर्यज्ञो नृयज्ञोऽतिथिपूजनम् ।
पितॄनुद्दिश्य यत् कर्म पितृयज्ञः प्रकीर्तितः ॥
इनमें ‘ऋभुयज्ञ’ तर्पणको कहते हैं, ‘ब्रह्मयज्ञ’ स्वाध्यायका नाम है, समस्त प्राणियोंके लिये अन्नकी बलि देना ‘भूतयज्ञ’ है, अतिथियोंकी पूजाको ‘मनुष्ययज्ञ’ कहते हैं और पितरोंके उद्देश्यसे जो श्राद्ध आदि कर्म किये जाते हैं, उनकी ‘पितृयज्ञ’ संज्ञा है ॥
हुतं चाप्यहुतं चैव तथा प्रहुतमेव च ।
प्राशितं बलिदानं च पाकयज्ञान् प्रचक्षते ॥
हुत, अहुत, प्रहुत, प्राशित और बलिदान—ये पाकयज्ञ कहलाते हैं ॥
वैश्वदेवादयो होमा हुतमित्युच्यते बुधैः ।
अहुतं च भवेद् दत्तं प्रहुतं ब्राह्मणाशितम् ॥
वैश्वदेव आदि कर्मोंमें जो देवताओंके निमित्त हवन किया जाता है, उसे विद्वान् पुरुष ‘हुत’ कहते हैं। दान दी हुई वस्तुको ‘अहुत’ कहते हैं। ब्राह्मणोंको भोजन करानेका नाम ‘प्रहुत’ है ॥

प्राणाग्निहोत्रहोत्रं च प्राशितं विधिवद् विदुः ।
बलिकर्म च राजेन्द्र पाकयज्ञाः प्रकीर्तिताः ॥
राजेन्द्र! प्राणाग्निहोत्रकी विधिसे जो प्राणोंको पाँच ग्रास अर्पण किये जाते हैं, उनकी 'प्राशित' संज्ञा है तथा गौ आदि प्राणियोंकी तृप्तिके लिये जो अन्नकी बलि दी जाती है, उसीका नाम बलिदान है। इन पाँच कर्मोंको पाकयज्ञ कहते हैं ॥

केचित् पञ्च महायज्ञान् पाकयज्ञान् प्रचक्षते ।
अपरे ब्रह्मयज्ञादीन् महायज्ञविदो विदुः ॥
कितने ही विद्वान् इन पाकयज्ञोंको ही पञ्चमहायज्ञ कहते हैं; किन्तु दूसरे लोग, जो महायज्ञके स्वरूपको जाननेवाले हैं, ब्रह्मयज्ञ आदिको ही पञ्चमहायज्ञ मानते हैं ॥

सर्व एते महायज्ञाः सर्वथा परिकीर्तिताः ।
बुभुक्षितान् ब्राह्मणांस्तु यथाशक्ति न हापयेत् ॥
ये सभी सब प्रकारसे महायज्ञ बतलाये गये हैं। घरपर आये हुए भूखे ब्राह्मणोंको यथाशक्ति निराश नहीं लौटाना चाहिये ॥

तस्मात् स्नात्वा द्विजो विद्वान् कुर्यादेतान् दिने दिने ।
अतोऽन्यथा तु भुञ्जन् वै प्रायश्चित्ती भवेद् द्विजः ॥
इसलिये विद्वान् द्विजको चाहिये कि वह प्रतिदिन स्नान करके इन यज्ञोंका अनुष्ठान करे। इन्हें किये बिना भोजन करनेवाला द्विज प्रायश्चित्तका भागी होता है ॥

युधिष्ठिर उवाच
देवदेवेश दैत्यघ्न त्वद्भक्तस्य जनार्दन ।
वक्तुमर्हसि देवेश स्नानस्य च विधिं मम ॥
युधिष्ठिरने कहा—देवदेव! आप दैत्योंके विनाशक और देवताओंके स्वामी हैं। जनार्दन! अपने इस भक्तको स्नान करनेकी विधि बताइये ॥

श्रीभगवानुवाच
शृणु पाण्डव तत् सर्वं पवित्रं पापनाशनम् ।
स्नात्वा येन विधानेन मुच्यन्ते किल्बिषाद् द्विजाः ॥
श्रीभगवान् बोले—पाण्डुनन्दन! जिस विधिके अनुसार स्नान करनेसे द्विजगण समस्त पापोंसे छूट जाते हैं, उस परम पवित्र पापनाशक विधिका पूर्णरूपसे श्रवण करो ॥

मृदं च गोमयं चैव तिलं दर्भांस्तथैव च ।