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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

हंससारसयुक्तं च विमानं लभते नरः । इन्द्रलोके च वसते वरस्त्रीभिः समावृतः ॥ १५ ॥ वह मानव हंस और सारसोंसे जुते हुए विमानको पाता है और इन्द्रलोकमें सुन्दरी स्त्रियोंसे घिरा हुआ निवास करता है ॥ १५ ॥ तृतीये दिवसे यस्तु प्राश्नीयादेकभोजनम् । सदा द्वादशमासांस्तु जुह्वानो जातवेदसम् ॥ १६ ॥ अग्निकार्यपरो नित्यं नित्यं कल्यप्रबोधनः । अतिरात्रस्य यज्ञस्य फलं प्राप्नोत्यनुत्तमम् ॥ १७ ॥ जो बारह महीनोंतक प्रति तीसरे दिन एक समय भोजन करता, नित्य सबेरे उठता और अग्निकी परिचर्यामें तत्पर हो नित्य अग्निमें आहुति देता है, वह अतिरात्र यागका परम उत्तम फल पाता है ॥ १६-१७ ॥ मयूरहंसयुक्तं च विमानं लभते नरः । सप्तर्षीणां सदा लोके सोऽप्सरोभिर्वसेत् सह ॥ १८ ॥ निवर्तनं च तत्रास्य त्रीणि पद्मानि चैव ह । उसे मोरोंसे जुता हुआ विमान प्राप्त होता है और वह सदा सप्तर्षियोंके लोकमें अप्सराओंके साथ निवास करता है। वहाँ तीन पद्म वर्षोंतक वह निवास करता है ॥ १८ १/२ ॥ दिवसे यश्चतुर्थे तु प्राश्नीयादेकभोजनम् ॥ १९ ॥ सदा द्वादशमासान् वै जुह्वानो जातवेदसम् । वाजपेयस्य यज्ञस्य फलं प्राप्नोत्यनुत्तमम् ॥ २० ॥ जो प्रतिदिन अग्निहोत्र करता हुआ बारह महीनोंतक प्रति चौथे दिन एक बार भोजन करता है, वह वाजपेय यज्ञका परम उत्तम फल पाता है ॥ १९-२० ॥ इन्द्रकन्याभिरूढं च विमानं लभते नरः । सागरस्य च पर्यन्ते वासवं लोकमावसेत् ॥ २१ ॥ देवराजस्य च क्रीडां नित्यकालमवेक्षते । उस मनुष्यको देवकन्याओंसे आरूढ़ विमान उपलब्ध होता है और वह पूर्वसागरके तटपर इन्द्रलोकमें निवास करता है तथा वहाँ रहकर वह प्रतिदिन देवराजकी क्रीडाओंको देखा करता है ॥ २१ १/२ ॥ दिवसे पञ्चमे यस्तु प्राश्नीयादेकभोजनम् ॥ २२ ॥ सदा द्वादशमासांस्तु जुह्वानो जातवेदसम् । अलुब्धः सत्यवादी च ब्रह्मण्यश्चाविहिंसकः ॥ २३ ॥ अनसूयुरपापस्थो द्वादशाहफलं लभेत् ।

जो बारह महीनोंतक प्रतिदिन अग्निहोत्र करता हुआ हर पाँचवें दिन एक समय भोजन करता है और लोभहीन, सत्यवादी, ब्राह्मणभक्त, अहिंसक और अदोषदर्शी होकर सदा पापकर्मोंसे दूर रहता है, उसे द्वादशाह यज्ञका फल प्राप्त होता है ।। २२-२३ १/२ ।। जाम्बूनदमयं दिव्यं विमानं हंसलक्षणम् ।। २४ ।। सूर्यमालासभासमारोहेत् पाण्डुरं गृहम् । आवर्तनानि चत्वारि तथा पद्मानि द्वादश ।। २५ ।। शराग्निपरिमाणं च तत्रासौ वसते सुखम् । वह सूर्यकी किरणमालाओंके समान प्रकाशमान तथा जाम्बूनद नामक सुवर्णके बने हुए श्वेतकान्तिवाले हंसलक्षित दिव्य विमानपर आरूढ़ होता तथा चार, बारह एवं पैंतीस (कुल मिलाकर इक्यावन) पद्म वर्षोंतक स्वर्गलोकमें सुखपूर्वक निवास करता है ।। २४-२५ १/२ ।। दिवसे यस्तु षष्ठे वै मुनिः प्राशेत भोजनम् ।। २६ ।। सदा द्वादशमासान् वै जुह्वानो जातवेदसम् । सदा त्रिषवणस्नायी ब्रह्मचार्यनसूयकः ।। २७ ।। गवां मेधस्य यज्ञस्य फलं प्राप्नोत्यनुत्तमम् । जो बारह महीनेतक सदा अग्निहोत्र करता, तीनों संध्याओंके समय स्नान करता, ब्रह्मचर्यका पालन करता, दूसरोंके दोष नहीं देखता तथा मुनिवृत्तिसे रहकर प्रति छठे दिन एक बार भोजन करता है, वह गोमेध यज्ञका सर्वोत्तम फल पाता है ।। २६-२७ १/२ ।। अग्निज्वालासभासं हंसबर्हिणसेवितम् ।। २८ ।। शातकुम्भसमायुक्तं साधयेद् यानमुत्तमम् । तथैवाप्सरसामङ्के प्रतिसुप्तः प्रबोध्यते ।। २९ ।। नूपुराणां निनादेन मेखलानां च निःस्वनैः । उसे अग्निकी ज्वालाके समान प्रकाशमान, हंस और मयूरोंसे सेवित, सुवर्णजटित उत्तम विमान प्राप्त होता है और वह अप्सराओंके अंकमें सोकर उन्हींके कांचीकलाप तथा नूपुरोंकी मधुर ध्वनिसे जगाया जाता है ।। कोटीसहस्रं वर्षाणां त्रीणि कोटिशतानि च ।। ३० ।। पद्मान्यष्टादश तथा पताके द्वे तथैव च । अयुतानि च पञ्चाशदृक्षचर्मशतस्य च ।। ३१ ।। लोम्नां प्रमाणेन समं ब्रह्मलोके महीयते । वह मनुष्य दो पताका (महापद्म), अठारह पद्म, एक हजार तीन सौ करोड़ और पचास अयुत वर्षोंतक तथा सौ रीछोंके चमड़ोंमें जितने रोएँ होते हैं, उतने वर्षोंतक ब्रह्मलोकमें सम्मानित होता है ।। ३०-३१ १/२ ।। दिवसे सप्तमे यस्तु प्राश्नीयादेकभोजनम् ।। ३२ ।।

सदा द्वादशमासान् वै जुह्वानो जातवेदसम् । सरस्वतीं गोपमानो ब्रह्मचर्यं समाचरन् ॥ ३३ ॥ सुमनोवर्णकं चैव मधुमांसं च वर्जयन् । पुरुषो मरुतां लोकमिन्द्रलोकं च गच्छति ॥ ३४ ॥ जो बारह महीनोंतक प्रति सातवें दिन एक समय भोजन करता, प्रतिदिन अग्निमें आहुति देता, वाणीको संयममें रखता और ब्रह्मचर्यका पालन करता एवं फूलोंकी माला, चन्दन, मधु और मांसका सदाके लिये त्याग कर देता है, वह पुरुष मरुद्गणों तथा इन्द्रके लोकमें जाता है ॥ ३२—३४ ॥ तत्र तत्र हि सिद्धार्थो देवकन्याभिरर्च्यते । फलं बहुसुवर्णस्य यज्ञस्य लभते नरः ॥ ३५ ॥ संख्यामतिगुणां चापि तेषु लोकेषु मोदते । उन सभी स्थानोंमें सफलमनोरथ होकर वह देवकन्याओंद्धारा पूजित होता है तथा जिस यज्ञमें बहुत-से सुवर्णकी दक्षिणा दी जाती है, उसके फलको वह प्राप्त कर लेता है और असंख्य वर्षोंतक वह उन लोकोंमें आनन्द भोगता है ॥ ३५ १/२ ॥ यस्तु संवत्सरं क्षान्तो भुङ्क्तेऽहन्यष्टमे नरः ॥ ३६ ॥ देवकार्यपरो निन्यं जुह्वानो जातवेदसम् । पौण्डरीकस्य यज्ञस्य फलं प्राप्नोत्यनुत्तमम् ॥ ३७ ॥ जो एक वर्षतक प्रति आठवें दिन एक बार भोजन करता, सबके प्रति क्षमाभाव रखता, देवताओंके कार्यमें तत्पर रहता और नित्यप्रति अग्निहोत्र करता है, उसे पौण्डरीक यागका सर्वश्रेष्ठ फल मिलता है ॥ ३६-३७ ॥ पद्मवर्णनिभं चैव विमानमधिरोहति । कृष्णाः कनकगौरैश्च नार्यः श्यामास्तथापराः ॥ ३८ ॥ वयोरूपविलासिन्यो लभते नात्र संशयः । वह कमलके समान वर्णवाले विमानपर चढ़ता है और वहाँ उसे श्यामवर्णा, सुवर्णसदृश गौर वर्णवाली, सोलह वर्षकी-सी अवस्थावाली और नूतन यौवन तथा मनोहर रूप-विलाससे सुशोभित देवांगनाएँ प्राप्त होती हैं। इसमें संशय नहीं है ॥ ३८ १/२ ॥ यस्तु संवत्सरं भुङ्क्ते नवमे नवमेऽहनि ॥ ३९ ॥ सदा द्वादशमासान् वै जुह्वानो जातवेदसम् । अश्वमेधसहस्रस्य फलं प्राप्नोत्यनुत्तमम् ॥ ४० ॥ जो एक वर्षतक नौ-नौ दिनपर एक समय भोजन करता है और बारहों महीने प्रतिदिन अग्निमें आहुति देता है, उसे एक हजार अश्वमेध यज्ञका परम उत्तम फल प्राप्त होता है ॥ ३९-४० ॥ पुण्डरीकप्रकाशं च विमानं लभते नरः ।

दीप्तसूर्याग्नितेजोभिर्दिव्यमालाभिरेव च ।। ४१ ।। नीयते रुद्रकन्याभिः सोऽन्तरिक्षं सनातनम् । अष्टादश सहस्राणि वर्षाणां कल्पमेव च ।। ४२ ।। कोटीशतसहस्रं च तेषु लोकेषु मोदते । तथा वह पुण्डरीकके समान श्वेत वर्णोंका विमान पाता है। दीप्तिमान् सूर्य और अग्निके समान तेजस्विनी और दिव्यमालाधारिणी रुद्रकन्याएँ उसे सनातन अन्तरिक्ष-लोकमें ले जाती हैं और वहाँ वह एक कल्प लाख करोड़ एवं अठारह हजार वर्षोंतक सुख भोगता है ।।

यस्तु संवत्सरं भुङ्क्ते दशाहे वै गते गते ।। ४३ ।। सदा द्वादशमासान् वै जुह्वानो जातवेदसम् । ब्रह्मकन्यानिवासे च सर्वभूतमनोहरे ।। ४४ ।। अश्वमेधसहस्रस्य फलं प्राप्नोत्यनुत्तमम् । रूपवत्यश्च तं कन्या रमयन्ति सनातनम् ।। ४५ ।। जो एक वर्षतक दस-दस दिन बीतनेपर एक बार भोजन करता है और बारहों महीने प्रतिदिन अग्निमें आहुति देता है, वह सम्पूर्ण भूतोंके लिये मनोहर ब्रह्मकन्याओंके निवास-स्थानमें जाकर एक हजार अश्व-मेध यज्ञोंका परम उत्तम फल पाता है और उस सनातन पुरुषका वहाँकी रूपवती कन्याएँ मनोरंजन करती हैं ।।

नीलोत्पलनिभैर्वर्णै रक्तोत्पलनिभैस्तथा । विमानं मण्डलावर्तमावर्तगहनाकुलम् ।। ४६ ।। सागरोर्मिप्रतीकाशं लभेद यानमनुत्तमम् । विचित्रमणिमालाभिर्नादितं शंखनिःस्वनैः ।। ४७ ।। वह नीले और लाल कमलके समान अनेक रंगोंसे सुशोभित, मण्डलाकार घूमनेवाला, भँवरके समान गहन चक्कर लगानेवाला, सागरकी लहरोंके समान ऊपर-नीचे होनेवाला, विचित्र मणिमालाओंसे अलंकृत और शंखध्वनिसे परिपूर्ण सर्वोत्तम विमान प्राप्त करता है ।।

स्फाटिकैर्वज्रसारैश्च स्तम्भैः सुकृतवेदिकम् । आरोहति महद् यानं हंससारसनादितम् ।। ४८ ।। उसमें स्फटिक और वज्रसारमणिके खम्भे लगे होते हैं। उसपर सुन्दर ढंगसे बनी हुई वेदी शोभा पाती है तथा वहाँ हंस और सारस पक्षी कलरव करते रहते हैं। ऐसे विशाल विमानपर चढ़ता और स्वच्छन्द घूमता है ।।

एकादशे तु दिवसे यः प्राप्ते प्राश्ते हविः । सदा द्वादशमासांस्तु जुह्वानो जातवेदसम् ।। ४९ ।। परस्त्रियं नाभिलषेद् वाचाथ मनसापि वा ।

अनृतं च न भाषेत मातापित्रोः कृतेपि वा ॥ ५० ॥ अभिगच्छेन्महादेवं विमानस्थं महाबलम् । अश्वमेधसहस्रस्य फलं प्राप्नोत्यनुत्तमम् ॥ ५१ ॥ जो बारह महीनोंतक प्रतिदिन अग्निहोत्र करता हुआ प्रति ग्यारहवें दिन एक बार हविष्यान्न ग्रहण करता है, मन-वाणीसे भी कभी परस्त्रीकी अभिलाषा नहीं करता है और माता-पिताके लिये भी कभी झूठ नहीं बोलता है, वह विमानमें विराजमान परम शक्तिमान् महादेवजीके समीप जाता और हजार अश्वमेध यज्ञोंका सर्वोत्तम फल पाता है ॥ ४९—५१ ॥

स्वायम्भुवं च पश्येत विमानं समुपस्थितम् । कुमार्यः काञ्चनाभासा रूपवत्यो नयन्ति तम् ॥ ५२ ॥ रुद्राणां तमधीवासं दिवि दिव्यं मनोहरम् । वह अपने पास ब्रह्माजीका भेजा हुआ विमान स्वतः उपस्थित देखता है। सुवर्णके समान रंगवाली रूपवती कुमारियाँ उसे उस विमानद्वारा द्युलोकमें दिव्य मनोहर रुद्रलोकमें ले जाती हैं ॥ ५२ १/२ ॥

वर्षाण्यपरिमेयानि युगान्ताग्निसमप्रभः ॥ ५३ ॥ कोटीशतसहस्रं च दशकोटिशतानि च । रुद्रं नित्यं प्रणमते देवदानवसम्मत्तम् ॥ ५४ ॥ स तस्मै दर्शनं प्राप्तो दिवसे दिवसे भवेत् । वहाँ वह प्रलयकालीन अग्निके समान तेजस्वी शरीर धारण करके असंख्य वर्षोंतक एक लाख एक हजार करोड़ वर्षोंतक निवास करता हुआ प्रतिदिन देवदानव-सम्मानित भगवान् रुद्रको प्रणाम करता है। वे भगवान् उसे नित्य-प्रति दर्शन देते रहते हैं ॥

दिवसे द्वादशे यस्तु प्राप्ते वै प्राशते हविः ॥ ५५ ॥ सदा द्वादशमासान् वै सर्वमेधफलं लभेत् । जो बारह महीनोंतक प्रति बारहवें दिन केवल हविष्यान्न ग्रहण करता है, उसे सर्वमेध यज्ञका फल मिलता है ॥ ५५ १/२ ॥

आदित्यद्वादशं तस्य विमानं संविधीयते ॥ ५६ ॥ मणिमुक्ताप्रवालैश्च महार्हैरुपशोभितम् । हंसमालापरिक्षिप्तं नागवीथीसमाकुलम् ॥ ५७ ॥ मयूरैश्चक्रवाकैश्च कूजद्भिरुपशोभितम् । अट्टैर्महद्भिः संयुक्तं ब्रह्मलोके प्रतिष्ठितम् ॥ ५८ ॥ नित्यमावसथं राजन् नरनारीसमावृतम् । ऋषिरेवं महाभागस्त्वङ्गिरा प्राह धर्मवित् ॥ ५९ ॥

उसके लिये बारह सूर्योंके समान तेजस्वी विमान प्रस्तुत किया जाता है। बहुमूल्यमणि, मुक्ता और मूँगे उस विमानकी शोभा बढ़ाते हैं। हंसश्रेणीसे परिवेष्टित और नागवीथीसे परिव्याप्त वह विमान कलरव करते हुए मोरों और चक्रवाकोंसे सुशोभित तथा ब्रह्मलोकमें प्रतिष्ठित है। उसके भीतर बड़ी-बड़ी अट्टालिकाएँ बनी हुई हैं। राजन्! वह नित्य-निवासस्थान अनेक नर-नारियोंसे भरा हुआ होता है। यह बात महाभाग धर्मज्ञ ऋषि अंगिराने कही थी॥ ५६—५९॥
त्रयोदशे तु दिवसे प्राप्ते यः प्राशते हविः।
सदा द्वादशमासान् वै देवसत्रफलं लभेत्॥ ६०॥
जो बारह महीनोंतक सदा तेरहवें दिन हविष्यान्न भोजन करता है, उसे देवसत्रका फल प्राप्त होता है॥
रक्तपद्मोदयं नाम विमानं साधयेन्नरः।
जातरूपप्रयुक्तं च रत्नसंचयभूषितम्॥ ६१॥
देवकन्याभिराकीर्णं दिव्याभरणभूषितम्।
पुण्यगन्धोदयं दिव्यं वायव्यैरुपशोभितम्॥ ६२॥
उस मनुष्यको रक्तपद्मोदय नामक विमान उपलब्ध होता है, जो सुवर्णसे जटिल तथा रत्नसमूहसे विभूषित है। उसमें देवकन्याएँ भरी रहती हैं, दिव्य आभूषणोंसे विभूषित उस विमानकी बड़ी शोभा होती है। उससे पवित्र सुगन्ध प्रकट होती रहती है तथा वह दिव्य विमान वायव्यास्त्रसे शोभायमान होता है॥ ६१-६२॥
तत्र शंखपताके द्वे युगान्तं कल्पमेव च।
अयुतायुतं तथा पद्मं समुद्रं च तथा वसेत्॥ ६३॥
वह व्रतधारी पुरुष दो शंख, दो पताका (महापद्म), एक कल्प एवं एक चतुर्युग तथा दस करोड़ एवं चार पद्म वर्षोंतक ब्रह्मलोकमें निवास करता है॥ ६३॥
गीतगन्धर्वघोषैश्च भेरीपणवनिःस्वनैः।
सदा प्रह्लादितस्ताभिर्देवकन्याभिरिज्यते॥ ६४॥
वहाँ देवकन्याएँ गीत और वाद्योंके घोष तथा भेरी और पणवकी मधुर ध्वनिसे उस पुरुषको आनन्द प्रदान करती हुई सदा उसका पूजन करती हैं॥ ६४॥
चतुर्दशे तु दिवसे यः पूर्णे प्राशते हविः।
सदा द्वादशमासांस्तु महामेधफलं लभेत्॥ ६५॥
जो बारह महीनेतक प्रति चौदहवें दिन हविष्यान्न भोजन करता है, वह महामेध यज्ञका फल पाता है॥
अनिर्देश्यवयोरूपा देवकन्याः स्वलंकृताः।
मृष्टतप्तांगदधरा विमानैरुपयान्ति तम्॥ ६६॥

जिनके यौवन तथा रूपका वर्णन नहीं हो सकता, ऐसी देवकन्याएँ तपाये हुए शुद्ध स्वर्णके अंगद (बाजूबन्द) और अन्यान्य अलंकार धारण करके विमानोंद्वारा उस पुरुषकी सेवामें उपस्थित होती हैं ॥ ६६ ॥

कलहंसविनिर्घोषैर्नूपुराणां च निःस्वनैः ।
काञ्चीनां च समुत्कर्षैस्तत्र तत्र निबोध्यते ॥ ६७ ॥
वह सो जानेपर कलहंसोंके कलरवों, नूपुरोंकी मधुर झनकारों तथा काञ्चीकी मनोहर ध्वनियोंद्वारा जगाया जाता है ॥ ६७ ॥

देवकन्यानिवासे च तस्मिन् वसति मानवः ।
जाह्नवीवालुकाकीर्णं पूर्णं संवत्सरं नरः ॥ ६८ ॥
वह मानव देवकन्याओंके उस निवासस्थानमें उतने वर्षोंतक निवास करता है, जितने कि गंगाजीमें बालूके कण हैं ॥ ६८ ॥

यत्तु पक्षे गते भुङ्क्ते एकभक्तं जितेन्द्रियः ।
सदा द्वादशमासांस्तु जुह्वानो जातवेदसम् ॥ ६९ ॥
राजसूयसहस्रस्य फलं प्राप्नोत्यनुत्तमम् ।
यानमारोहते दिव्यं हंसबर्हिणसेवितम् ॥ ७० ॥
जो जितेन्द्रिय पुरुष बारह महीनोंतक प्रति पंद्रहवें दिन एक बार खाता और प्रतिदिन अग्निहोत्र करता है, वह एक हजार राजसूय यज्ञका सर्वोत्तम फल पाता है और हंस तथा मोरोंसे सेवित दिव्य विमानपर आरूढ़ होता है ॥ ६९-७० ॥

मणिमण्डलकैश्चित्रं जातरूपसमावृतम् ।
दिव्याभरणशोभाभिर्वरस्त्रीभिरलंकृतम् ॥ ७१ ॥
वह विमान सुवर्णपत्रसे जटिल तथा मणिमय मण्डलाकार चिह्नोंसे विचित्र शोभासम्पन्न है। दिव्य वस्त्राभूषणोंसे शोभायमान सुन्दरी रमणियाँ उसे सुशोभित किये रहती है ॥ ७१ ॥

एकस्तम्भं चतुर्द्वारं सप्तभौमं सुमंगलम् ।
वैजयन्तीसहस्रैश्च शोभितं गीतनिःस्वनैः ॥ ७२ ॥
उस विमानमें एक ही खम्भा होता है, चार दरवाजे लगे होते हैं। वह सात तल्लोंसे युक्त एवं परममंगलमय विमान सहस्रों वैजयन्ती पताकाओंसे सुशोभित तथा गीतोंकी मधुर-ध्वनिसे व्याप्त होता है ॥

दिव्यं दिव्यगुणोपेतं विमानमधिरोहति ।
मणिमुक्ताप्रवालैश्च भूषितं वैद्युतप्रभम् ॥ ७३ ॥
वसेद् युगसहस्रं च खड्गकुञ्जरवाहनः ।

मणि, मोती और मूँगोंसे विभूषित वह दिव्य विमान विद्युत्की-सी प्रभासे प्रकाशित तथा दिव्य गुणोंसे सम्पन्न होता है। वह व्रतधारी पुरुष उसी विमानपर आरूढ़ होता है। उसमें गेंडे और हाथी जुते होते हैं तथा वहाँ एक सहस्र युगोंतक वह निवास करता है।। ७३ १/२ ।। षोडशे दिवसे प्राप्ते यः कुर्यादेकभोजनम् ।। ७४ ।। सदा द्वादशमासान् वै सोमयज्ञफलं लभेत् । जो बारह महीनोंतक प्रति सोलहवें दिन एक बार भोजन करता है, उसे सोमयागका फल मिलता है।। सोमकन्यानिवासेषु सोऽध्यावसति नित्यशः ।। ७५ ।। सौम्यगन्धानुलिप्तश्च कामकारगतिर्भवेत् । वह सोम-कन्याओंके महलोंमें नित्य निवास करता है, उसके अंगोंमें सौम्य गन्धयुक्त अनुलेप लगाया जाता है। वह अपनी इच्छाके अनुसार जहाँ चाहता है, घूमता है।। सुदर्शनाभिनारीभिर्मधुराभिस्तथैव च ।। ७६ ।। अर्च्यते वै विमानस्थः कामभोगैश्च सेव्यते । वह विमानपर विराजमान होता है और देखनेमें परम सुन्दरी तथा मधुरभाषिणी दिव्य नारियाँ उसकी पूजा करती तथा उसे काम-भोगका सेवन कराती हैं।। फलं पद्मशतप्रख्यं महाकल्पं दशाधिकम् ।। ७७ ।। आवर्तनानि चत्वारि साधयेच्चाप्यसौ नरः । वह पुरुष सौ पद्म वर्षोंके समान दस महाकल्प तथा चार चतुर्युगीतक अपने पुण्यका फल भोगता है।। ७७ १/२ ।। दिवसे सप्तदशमे यः प्राप्ते प्राश्नाते हविः ।। ७८ ।। सदा द्वादशमासान् वै जुह्वानो जातवेदसम् । स्थानं वारुणमैन्द्रं च रौद्रं वाप्यधिगच्छति ।। ७९ ।। मारुतौशनसे चैव ब्रह्मलोकं स गच्छति । तत्र दैवतकन्याभिरासनेनोपचर्यते ।। ८० ।। जो मनुष्य बारह महीनोंतक प्रतिदिन अग्निहोत्र करता हुआ सोलह दिन उपवास करके सत्रहवें दिन केवल हविष्यान्न भोजन करता है, वह वरुण, इन्द्र, रुद्र, मरुत, शुक्राचार्यजी तथा ब्रह्माजीके लोकमें जाता है और उन लोकोंमें देवताओंकी कन्याएँ आसन देकर उसका पूजन करती हैं।। ७८—८० ।। भूर्भुवं चापि देवर्षिं विश्वरूपमवेक्षते । तत्र देवाधिदेवस्य कुमार्यो रमयन्ति तम् ।। ८१ ।। द्वात्रिंशद् रूपधारिण्यो मधुराः समलंकृताः ।

वह पुरुष भूर्लोक, भुवर्लोक तथा विश्वरूपधारी देवर्षिका वहाँ दर्शन करता है और देवाधिदेवकी कुमारियाँ उसका मनोरंजन करती हैं। उनकी संख्या बत्तीस है। वे मनोहर रूपधारिणी, मधुरभाषिणी तथा दिव्य अलंकारोंसे अलंकृत होती हैं॥ ८१ १/२॥
चन्द्रादित्यावुभौ यावद् गगने चरतः प्रभो॥ ८२॥
तावच्चरत्यसौ धीरः सुधामृतरसाशनः।
प्रभो! जबतक आकाशमें चन्द्रमा और सूर्य विचरते हैं, तबतक वह धीर पुरुष सुधा एवं अमृतरसका भोजन करता हुआ ब्रह्मलोकमें विहार करता है॥ ८२ १/२॥
अष्टादशे यो दिवसे प्राश्नीयादेकभोजनम्॥ ८३॥
सदा द्वादशमासान् वै सप्तलोकान् स पश्यति।
जो लगातार बारह महीनोंतक प्रति अठारहवें दिन एक बार भोजन करता है, वह भू आदि सातों लोकोंका दर्शन करता है॥ ८३ १/२॥
रथैः सनन्दिघोषैश्च पृष्ठतः सोऽनुगम्यते॥ ८४॥
देवकन्याधिरूढैस्तु भ्राजमानैः स्वलंकृतैः।
उसके पीछे आनन्दपूर्वक जयघोष करते हुए बहुत-से तेजस्वी एवं सजे-सजाये रथ चलते हैं। उन रथोंपर देवकन्याएँ बैठी होती हैं॥ ८४ १/२॥
व्याघ्रसिंहप्रयुक्तं च मेघस्वननिनादितम्॥ ८५॥
विमानमुत्तमं दिव्यं सुसुखी ह्याधिरोहति।
उसके सामने व्याघ्र और सिंहोंसे जुता हुआ तथा मेघके समान गम्भीर गर्जना करनेवाला दिव्य एवं उत्तम विमान प्रस्तुत होता है, जिसपर वह अत्यन्त सुखपूर्वक आरोहण करता है॥ ८५ १/२॥
तत्र कल्पसहस्रं स कन्याभिः सह मोदते॥ ८६॥
सुधारयं च भुञ्जीत मृतोपममुत्तमम्।
उस दिव्य लोकमें वह एक हजार कल्पोंतक देवकन्याओंके साथ आनन्द भोगता और अमृतके समान उत्तम सुधारसका पान करता है॥ ८६ १/२॥
एकोनविंशतिदिने यो भुङ्क्ते एकभोजनम्॥ ८७॥
सदा द्वादशमासान् वै सप्तलोकान् स पश्यति।
जो लगातार बारह महीनोंतक उन्नीसवें दिन एक बार भोजन करता है, वह भी भू आदि सातों लोकोंका दर्शन करता है॥ ८७ १/२॥
उत्तमं लभते स्थानमप्सरोगणसेवितम्॥ ८८॥
गन्धर्वरुपगीतं च विमानं सूर्यवर्चसम्।
उसे अप्सराओंद्वारा सेवित उत्तम स्थान—गन्धर्वोंके गीतोंसे गूँजता हुआ सूर्यके समान तेजस्वी विमान प्राप्त होता है॥ ८८ १/२॥

तत्रामरवरस्त्रीभिर्मोदते विगतज्वरः ॥ ८९ ॥ दिव्याम्बरधरः श्रीमानयुतानां शतं शतम् । उस विमानमें वह सुन्दरी देवांगनाओंके साथ आनन्द भोगता है। उसे कोई चिन्ता तथा रोग नहीं सताते। दिव्यवस्त्रधारी और श्रीसम्पन्न रूप धारण करके वह दस करोड़ वर्षोंतक वहाँ निवास करता है ॥ ८९ १/२ ॥

पूर् parse: पूर्णेऽथ विंशे दिवसे यो भुङ्क्ते ह्येकभोजनम् ॥ ९० ॥ सदा द्वादशमासांस्तु सत्यवादी धृतव्रतः । अमांसाशी ब्रह्मचारी सर्वभूतहिते रतः ॥ ९१ ॥ स लोकान् विपुलान् रम्यानादित्यानामुपाश्नुते । जो लगातार बारह महीनेतक पूरे बीस दिनपर एक बार भोजन करता, सत्य बोलता, व्रतका पालन करता, मांस नहीं खाता, ब्रह्मचर्यका पालन करता तथा समस्त प्राणियोंके हितमें तत्पर रहता है, वह सूर्यदेवके विशाल एवं रमणीय लोकोंमें जाता है ॥ ९०-९१ १/२ ॥

गन्धर्वरप्सरोभिश्च दिव्यमाल्यानुलेपनैः ॥ ९२ ॥ विमानैः काञ्चनैर्हृद्यैः पृष्ठतश्चानुगम्यते । उसके पीछे-पीछे दिव्यमाला और अनुलेपन धारण करनेवाले गन्धर्वों तथा अप्सराओंसे सेवित सोनेके मनोरम विमान चलते हैं ॥ ९२ १/२ ॥

एकविंशे तु दिवसे यो भुङ्क्ते ह्येकभोजनम् ॥ ९३ ॥ सदा द्वादशमासान् वै जुह्वानो जातवेदसम् । लोकमौशनसं दिव्यं शक्रलोकं च गच्छति ॥ ९४ ॥ अश्विनोर्मरुतां चैव सुखेष्वभिरतः सदा । अनभिज्ञश्च दुःखानां विमानवरमास्थितः ॥ ९५ ॥ सेव्यमानो वरस्त्रीभिः क्रीडत्यमरवत् प्रभुः । जो लगातार बारह महीनोंतक प्रतिदिन अग्निहोत्र करता हुआ इक्कीसवें दिनपर एक बार भोजन करता है, वह शुक्राचार्य तथा इन्द्रके दिव्यलोकमें जाता है। इतना ही नहीं, उसे अश्विनीकुमारों और मरुद्गणोंके लोकोंकी भी प्राप्ति होती है। उन लोकोंमें वह सदा सुख भोगनेमें ही तत्पर रहता है। दुःखोंका तो वह नाम भी नहीं जानता है और श्रेष्ठ विमानपर विराजमान हो सुन्दरी स्त्रियोंसे सेवित होता हुआ शक्तिशाली देवताके समान क्रीड़ा करता है ॥ ९३—९५ १/२ ॥

द्वाविंशे दिवसे प्राप्ते यो भुङ्क्ते ह्येकभोजनम् ॥ ९६ ॥ सदा द्वादशमासान् वै जुह्वानो जातवेदसम् । अहिंसानिरतो धीमान् सत्यवागनसूयकः ॥ ९७ ॥ लोकान् वसूनामाप्नोति दिवाकरसमप्रभः । कामचारी सुधाहारो विमानवरमास्थितः ॥ ९८ ॥

रमते देवकन्याभिर्दिव्याभरणभूषितः । जो बारह महीनोंतक प्रतिदिन अग्निहोत्र करता हुआ बाईसवाँ दिन प्राप्त होनेपर एक बार भोजन करता है तथा अहिंसामें तत्पर, बुद्धिमान्, सत्यवादी और दोषदृष्टिसे रहित होता है, वह सूर्यके समान तेजस्वी रूप धारण करके श्रेष्ठ विमानपर आरूढ़ हो वसुओंके लोकमें जाता है। वहाँ इच्छानुसार विचरता, अमृत पीकर रहता और दिव्य आभूषणोंसे विभूषित हो देवकन्याओंके साथ रमण करता है ॥ ९६—९८ १/२ ॥ त्रयोविंशे तु दिवसे प्राशेद यस्त्वेकभोजनम् ॥ ९९ ॥ सदा द्वादशमासांस्तु मिताहारो जितेन्द्रियः । वायोरुशनसश्चैव रुद्रलोकं च गच्छति ॥ १०० ॥ जो लगातार बारह महीनोंतक मिताहारी और जितेन्द्रिय होकर तेईसवें दिन एक बार भोजन करता है, वह वायु, शुक्राचार्य तथा रुद्रके लोकमें जाता है ॥ कामचारी कामगमः पूज्यमानोऽप्सरोगणैः । अनेकगुणपर्यन्तं विमानवरमास्थितः ॥ १०१ ॥ रमते देवकन्याभिर्दिव्याभरणभूषितः । वहाँ अनेक गुणोंसे युक्त श्रेष्ठ विमानपर आरूढ़ हो इच्छानुसार विचरता, जहाँ इच्छा होती वहाँ जाता और अप्सराओंद्वारा पूजित होता है। उन लोकोंमें वह दिव्य आभूषणोंसे विभूषित हो देवकन्याओंके साथ रमण करता है ॥ १०१ १/२ ॥ चतुर्विंशे तु दिवसे यः प्राप्ते प्राश्ते हविः ॥ १०२ ॥ सदा द्वादशमासांश्च जुह्वानो जातवेदसम् । आदित्यानामधीवासे मोदमानो वसेच्चिरम् ॥ १०३ ॥ दिव्यमाल्याम्बरधरो दिव्यगन्धानुलेपनः । जो लगातार बारह महीनोंतक अग्निहोत्र करता हुआ चौबीसवें दिन एक बार हविष्यान्न भोजन करता है, वह दिव्यमाला, दिव्यवस्त्र, दिव्यगन्ध तथा दिव्य अनुलेपन धारण करके सुदीर्घकालतक आदित्यलोकमें सानन्द निवास करता है ॥ १०२-१०३ १/२ ॥ विमाने काञ्चने दिव्ये हंसयुक्ते मनोरमे ॥ १०४ ॥ रमते देवकन्यानां सहस्रैरयुतैस्तथा । वहाँ हंसयुक्त मनोरम एवं दिव्य सुवर्णमय विमानपर वह सहस्रों तथा अयुतों देवकन्याओंके साथ रमण करता है ॥ १०४ १/२ ॥ पञ्चविंशे तु दिवसे यः प्राशेदकभोजनम् ॥ १०५ ॥ सदा द्वादशमासांस्तु पुष्कलं यानमारुहेत् । जो लगातार बारह महीनोंतक पचीसवें दिन एक बार भोजन करता है, उसको सवारीके लिये बहुत-से विमान या वाहन प्राप्त होते हैं ॥ १०५ १/२ ॥

सिंहव्याघ्रप्रयुक्तैस्तु मेघनिःस्वननादितैः ॥ १०६ ॥ स रथैर्नन्दिघोषैश्च पृष्ठतो ह्यनुगम्यते । देवकन्यासमारूढैः काञ्चनैर्विमलैः शुभैः ॥ १०७ ॥ उसके पीछे सिंहों और व्याघ्रोंसे जुते हुए तथा मेघोंकी गम्भीर गर्जनासे निनादित बहुसंख्यक रथ सानन्द विजयघोष करते हुए चलते हैं। उन सुवर्णमय, निर्मल एवं मंगलकारी रथोंपर देवकन्याएँ आरूढ़ होती हैं ॥ १०६-१०७ ॥ विमानमुत्तमं दिव्यमास्थाय सुमनोहरम् । तत्र कल्पसहस्रं वै वसते स्त्रीशतावृते ॥ १०८ ॥ सुधारसं चोपजीवन्नमृतोपममुत्तमम् । वह दिव्य, उत्तम एवं मनोहर विमानपर विराजमान हो सैकड़ों सुन्दरियोंसे भरे हुए महलमें सहस्र कल्पोंतक निवास करता है। वहाँ देवताओंके भोज्य अमृतके समान उत्तम सुधारसको पीकर वह जीवन बिताता है ॥ १०८ १/२ ॥ षड्विंशे दिवसे यस्तु प्रकुर्यादेकभोजनम् ॥ १०९ ॥ सदा द्वादशमासांस्तु नियतो नियताशनः । जितेन्द्रियो वीतरागो जुह्वानो जातवेदसम् ॥ ११० ॥ स प्राप्नोति महाभागः पूज्यमानोऽप्सरोगणैः । सप्तानां मरुतां लोकान् वसूनां चापि सोऽश्नुते ॥ १११ ॥ जो लगातार बारह महीनोंतक मन और इन्द्रियोंको संयममें रखकर मिताहारी हो छब्बीसवें दिन एक बार भोजन करता है तथा वीतराग और जितेन्द्रिय हो प्रतिदिन अग्निमें आहुति देता है, वह महाभाग मनुष्य अप्सराओंसे पूजित हो सात मरुद्गणों और आठ वसुओंके लोकोंमें जाता है ॥ १०९—१११ ॥ विमानैः स्फाटिकैर्दिव्यैः सर्वरत्नैरलंकृतैः । गन्धर्वैरप्सरोभिश्च पूज्यमानः प्रमोदते ॥ ११२ ॥ द्वे युगानां सहस्रे तु दिव्ये दिव्येन तेजसा । सम्पूर्ण रत्नोंसे अलंकृत स्फटिक मणिमय दिव्य विमानोंसे सम्पन्न हो गन्धर्वों और अप्सराओं‌द्वारा पूजित होता हुआ दिव्य तेजसे युक्त हो देवताओंके दो हजार दिव्य युगोंतक वह उन लोकोंमें आनन्द भोगता है ॥ ११२ १/२ ॥ सप्तविंशेऽथ दिवसे यः कुर्यादेकभोजनम् ॥ ११३ ॥ सदा द्वादशमासांस्तु जुह्वानो जातवेदसम् । फलं प्राप्नोति विपुलं देवलोके च पूज्यते ॥ ११४ ॥ जो बारह महीनोंतक प्रतिदिन अग्निहोत्र करता हुआ हर सत्ताईसवें दिन एक बार भोजन करता है, वह प्रचुर फलका भागी होता और देवलोकमें सम्मान पाता है ॥ ११३-११४ ॥

अमृताशी वसंस्तत्र स वितृष्णः प्रमोदिते । देवर्षिचरितं राजन् राजर्षिभिरनुष्ठितम् ॥ ११५ ॥ अध्यावसति दिव्यात्मा विमानवरमास्थितः । स्त्रीभिर्मनोभिरामाभी रममाणो मदोत्कटः ॥ ११६ ॥ युगकल्पसहस्राणि त्रीण्यावसति वै सुखम् । वहाँ उसे अमृतका आहार प्राप्त होता है तथा वह तृणारहित हो वहाँ रहकर आनन्द भोगता है। राजन्! वह दिव्यरूपधारी पुरुष राजर्षियोंद्वारा वर्णित देवर्षियोंके चरित्रका श्रवण-मनन करता है और श्रेष्ठ विमानपर आरूढ़ हो मनोरम सुन्दरियोंके साथ मदोन्मत्तभावसे रमण करता हुआ तीन हजार युगों एवं कल्पोंतक वहाँ सुखपूर्वक निवास करता है ॥ ११५-११६ ½ ॥

योऽष्टाविंशे तु दिवसे प्राश्नीयादेकभोजनम् ॥ ११७ ॥ सदा द्वादशमासांस्तु जितात्मा विजितेन्द्रियः । फलं देवर्षिचरितं विपुलं समुपामुते ॥ ११८ ॥ जो बारह महीनोंतक सदा अपने मन और इन्द्रियोंको काबूमें रखकर अट्ठाईसवें दिन एक बार भोजन करता है, वह देवर्षियोंको प्राप्त होनेवाले महान् फलका उपभोग करता है ॥ ११७-११८ ॥

भोगवांस्तेजसा भाति सहस्रांशुरिवामलः । सुकुमार्यश्च नार्यस्तं रममाणाः सुवर्चसः ॥ ११९ ॥ पीनस्तनोरुजघना दिव्याभरणभूषिताः । रमयन्ति मनःकान्ते विमाने सूर्यसंनिभे ॥ १२० ॥ सर्वकामगमे दिव्ये कल्पायुतशतं समाः । वह भोगसे सम्पन्न हो अपने तेजसे निर्मल सूर्यकी भाँति प्रकाशित होता है और सुन्दर कान्तिवाली, पीन उरोज, जाँघ और जघन प्रदेशवाली, दिव्य वस्त्राभूषणोंसे विभूषित सुकुमारी रमणियाँ सूर्यके समान प्रकाशित और सम्पूर्ण कामनाओंकी प्राप्ति करानेवाले मनोरम दिव्य विमानपर बैठकर उस पुण्यात्मा पुरुषका दस लाख कल्पोंके वर्षोंतक मनोरंजन करती हैं ॥ ११९-१२० ½ ॥

एकोनत्रिंशे दिवसे यः प्राशेदकभोजनम् ॥ १२१ ॥ सदा द्वादशमासान् वै सत्यव्रतपरायणः । तस्य लोकाः शुभा दिव्या देवराजर्षिपूजिताः ॥ १२२ ॥ जो बारह महीनोंतक सदा सत्यव्रतके पालनमें तत्पर हो उन्तीसवें दिन एक बार भोजन करता है, उसे देवर्षियों तथा राजर्षियोंद्वारा पूजित दिव्य मंगलमय लोक प्राप्त होते हैं ॥ १२१-१२२ ॥ विमानं सूर्यचन्द्राभं दिव्यं समधिगच्छति ।

जातरूपमयं युक्तं सर्वरत्नसमन्वितम् ॥ १२३ ॥ वह सूर्य और चन्द्रमाके समान प्रकाशित, सम्पूर्ण रत्नोंसे विभूषित तथा आवश्यक सामग्रियोंसे युक्त सुवर्णमय दिव्य विमान प्राप्त करता है ॥ १२३ ॥ अप्सरोगणसम्पूर्णं गन्धर्वैरभिनादितम् । तत्र चैनं शुभा नार्यो दिव्याभरणभूषिताः ॥ १२४ ॥ मनोऽभिरामा मधुरा रमयन्ति मदोत्कटाः । उस विमानमें अप्सराएँ भरी रहती हैं, गन्धर्वोंके गीतोंकी मधुर ध्वनिसे वह विमान गूँजता रहता है। उस विमानमें दिव्य आभूषणोंसे विभूषित, शुभ लक्षणसम्पन्न, मनोभिराम, मदमत्त एवं मधुरभाषिणी रमणियाँ उस पुरुषका मनोरंजन करती हैं ॥ १२४ ½ ॥ भोगवांस्तेजसा युक्तो वैश्वानरसमप्रभः ॥ १२५ ॥ दिव्यो दिव्येन वपुषा भ्राजमान इवामरः । वसूनां मरुतां चैव साध्यानामश्विनोस्तथा ॥ १२६ ॥ रुद्राणां च तथा लोकं ब्रह्मलोकं च गच्छति । वह पुरुष भोगसम्पन्न, तेजस्वी, अग्निके समान दीप्तिमान्, अपने दिव्य शरीरसे देवताकी भाँति प्रकाशमान तथा दिव्यभावसे युक्त हो वसुओं, मरुद्गणों, साध्यगणों, अश्विनीकुमारों, रुद्रों तथा ब्रह्माजीके लोकमें भी जाता है ॥ १२५-१२६ ½ ॥ यस्तु मासे गते भुङ्क्ते एकभक्तं शमात्मकः ॥ १२७ ॥ सदा द्वादशमासान् वै ब्रह्मलोकमवाप्नुयात् । जो बारह महीनोंतक प्रत्येक मास व्यतीत होनेपर तीसवें दिन एक बार भोजन करता और सदा शान्तभावसे रहता है, वह ब्रह्मलोकको प्राप्त होता है ॥ १२७ ½ ॥ सुधारसकृताहारः श्रीमान् सर्वमनोहरः ॥ १२८ ॥ तेजसा वपुषा लक्ष्म्या भ्राजते रश्मिवानिव । वह वहाँ सुधारसका भोजन करता और सबके मनको हर लेनेवाला कान्तिमान् रूप धारण करता है। वह अपने तेज, सुन्दर शरीर तथा अंगकान्तिसे सूर्यकी भाँति प्रकाशित होता है ॥ १२८ ½ ॥ दिव्यमाल्याम्बरधरो दिव्यगन्धानुलेपनः ॥ १२९ ॥ सुखेष्वभिरतो भोगी दुःखानामविजानकः । दिव्यमाला, दिव्यवस्त्र, दिव्यगन्ध और दिव्य अनुलेपन धारण करके वह भोगकी शक्ति और साधनसे सम्पन्न हो सुख-भोगमें ही रत रहता है। दुःखोंका उसे कभी अनुभव नहीं होता है ॥ १२९ ½ ॥ स्वयंप्रभाभिर्नारीभिर्विमानस्थो महीयते ॥ १३० ॥ रुद्रदेवर्षिकन्याभिः सततं चाभिपूज्यते ।

नानारमणरूपाभिर्नानारागाभिरेव च ।। १३१ ।। नानामधुरभाषाभिर्नानारतिभिरेव च । वह विमानपर आरूढ़ हो अपनी ही प्रभासे प्रकाशित होनेवाली दिव्य नारियोंद्वारा सम्मानित होता है। रुद्रों तथा देवर्षियोंकी कन्याएँ सदा उसकी पूजा करती हैं। वे कन्याएँ नाना प्रकारके रमणीय रूप, विभिन्न प्रकारके राग, भाँति-भाँतिकी मधुर भाषणकला तथा अनेक तरहकी रति-क्रीड़ाओंसे सुशोभित होती हैं ।। १३०-१३१ १/२ ।। विमाने गगनाकारे सूर्यवैदूर्यसंनिभे ।। १३२ ।। पृष्ठतः सोमसंकाशे उदर्कै चाभ्रसन्निभे । दक्षिणायां तु रक्ताभे अधस्तान्नीलमण्डले ।। १३३ ।। ऊर्ध्वं विचित्रसंकाशे नैको वसति पूजितः । जिस विमानपर वह विराजमान होता है, वह आकाशके समान विशाल दिखायी देता है। सूर्य और वैदूर्यमणिके समान तेजस्वी जान पड़ता है। उसका पिछला भाग चन्द्रमाके समान, वामभाग मेघके सदृश, दाहिना भाग लाल प्रभासे युक्त, निचला भाग नीलमण्डलके समान तथा ऊपरका भाग अनेक रंगोंके सम्मिश्रणसे विचित्र-सा प्रतीत होता है। उसमें वह अनेक नर-नारियोंके साथ सम्मानित होकर रहता है ।। १३२-१३३ १/२ ।। यावद् वर्षसहस्रं वै जम्बूद्वीपे प्रवर्षति ।। १३४ ।। तावत् संवत्सराः प्रोक्ता ब्रह्मलोकेऽस्य धीमतः । मेघ जम्बूद्वीपमें जितने जलबिन्दुओंकी वर्षा करता है, उतने हजार वर्षोंतक उस बुद्धिमान् पुरुषका ब्रह्मलोकमें निवास बताया गया है ।। १३४ १/२ ।। विप्रुषश्चैव यावन्त्यो निपतन्ति नभस्तलात् ।। १३५ ।। वर्षासु वर्षतस्तावन्निवसत्यमरप्रभः । वर्षा-ऋतुमें आकाशसे धरतीपर जितनी बूँदें गिरती हैं, उतने वर्षोंतक वह देवोपम तेजस्वी पुरुष ब्रह्मलोकमें निवास करता है ।। १३५ १/२ ।। मासोपवासी वर्षैस्तु दशभिः स्वर्गमुत्तमम् ।। १३६ ।। महर्षित्वमथासाद्य सशरीरगतिर्भवेत् । दस वर्षोंतक एक-एक मास उपवास करके इकतीसवें दिन भोजन करनेवाला पुरुष उत्तम स्वर्ग लोकको जाता है। वह महर्षि पदको प्राप्त होकर सशरीर दिव्यलोककी यात्रा करता है ।। १३६ १/२ ।। मुनिर्दान्तो जितक्रोधो जितशिश्वोदरः सदा ।। १३७ ।। जुह्वन्नग्नींश्च नियतः संध्योपासनसेविता । बहुभिर्नियमैरेवं शुचिरश्राति यो नरः ।। १३८ ।। अभ्रावकाशशीलश्च तस्य भानोरिव त्विषः ।

जो मनुष्य सदा मुनि, जितेन्द्रिय, क्रोधको जीतनेवाला, शिश्न और उदरके वेगको सदा काबूमें रखनेवाला, नियमपूर्वक तीनों अग्नियोंमें आहुति देनेवाला और संध्योपासनामें तत्पर रहनेवाला है तथा जो पवित्र होकर इन पहले बताये हुए अनेक प्रकारके नियमोंके पालनपूर्वक भोजन करता है, वह आकाशके समान निर्मल होता है और उसकी कान्ति सूर्यकी प्रभाके समान प्रकाशित होती है॥

दिवं गत्वा शरीरेण स्वेन राजन् यथामरः ॥ १३९ ॥ स्वर्गं पुण्यं यथाकाममुपभुङ्क्ते तथाविधः । राजन्! ऐसे गुणोंसे युक्त पुरुष देवताके समान अपने शरीरके साथ ही देवलोकमें जाकर वहाँ इच्छाके अनुसार स्वर्गके पुण्यफलका उपभोग करता है॥ १३९ १/२॥

एष ते भरतश्रेष्ठ यज्ञानां विधिरुत्तमः ॥ १४० ॥ व्याख्यातो ह्यानुपूर्व्येण उपवासफलात्मकः । दरिद्रैर्मनुजैः पार्थ प्राप्तं यज्ञफलं यथा ॥ १४१ ॥ भरतश्रेष्ठ! यह तुम्हें यज्ञोंका उत्तम विधान क्रमशः विस्तारपूर्वक बताया गया है। इसमें उपवासके फलपर प्रकाश डाला गया है। कुन्तीनन्दन! दरिद्र मनुष्योंने इन उपवासात्मक व्रतोंका अनुष्ठान करके यज्ञोंका फल प्राप्त किया है॥ १४०-१४१ ॥

उपवासानिमान् कृत्वा गच्छेच्च परमां गतिम् । देवद्विजातिपूजायां रतो भरतसत्तम ॥ १४२ ॥ भरतश्रेष्ठ! देवताओं और ब्राह्मणोंकी पूजामें तत्पर रहकर जो इन उपवासोंका पालन करता है, वह परमगतिको प्राप्त होता है॥ १४२ ॥

उपवासविधिस्त्वेष विस्तरेण प्रकीर्तितः । नियतेष्वप्रमत्तेषु शौचवत्सु महात्मसु ॥ १४३ ॥ दम्भद्रोहनिवृत्तेषु कृतबुद्धिषु भारत । अचलेष्वप्रकम्पेषु मा ते भूदत्र संशयः ॥ १४४ ॥ भारत! नियमशील, सावधान, शौचाचारसे सम्पन्न, महामनस्वी, दम्भ और द्रोहसे रहित, विशुद्ध बुद्धि, अचल और स्थिर स्वभाववाले मनुष्योंके लिये मैंने यह उपवासकी विधि विस्तारपूर्वक बतायी है। इस विषयमें तुम्हें संदेह नहीं करना चाहिये॥ १४३-१४४॥

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि उपवासविधिर्नाम सप्ताधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०७ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें उपवासकी विधिनामक एक सौ सातवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १०७॥

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अष्टाधिकशततमोऽध्यायः

मानस तथा पार्थिव तीर्थकी महत्ता

युधिष्ठिर उवाच

यद् वरं सर्वतीर्थानां तन्मे ब्रूहि पितामह ।
यत्र चैव परं शौचं तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**पितामह! जो सब तीर्थोंमें श्रेष्ठ हो तथा जहाँ जानेसे परम शुद्धि हो जाती हो, उस तीर्थको मुझे विस्तारपूर्वक बताइये ॥ १ ॥

भीष्म उवाच

सर्वाणि खलु तीर्थानि गुणवन्ति मनीषिणः ।
यत्तु तीर्थं च शौचं च तन्मे शृणु समाहितः ॥ २ ॥
**भीष्मजीने कहा—**युधिष्ठिर! इस पृथ्वीपर जितने तीर्थ हैं, वे सब मनीषी पुरुषोंके लिए गुणकारी होते हैं; किंतु उन सबमें जो परम पवित्र और प्रधान तीर्थ हैं, उसका वर्णन करता हूँ, एकाग्रचित्त होकर सुनो ॥ २ ॥

अगाधे विमले शुद्धे सत्यतोये धृतिह्रदे ।
स्नातव्यं मानसे तीर्थे सत्त्वमालम्ब्य शाश्वतम् ॥ ३ ॥
जिसमें धैर्यरूप कुण्ड और सत्यरूप जल भरा हुआ है तथा जो अगाध, निर्मल एवं अत्यन्त शुद्ध है, उस मानस तीर्थमें सदा परमात्माका आश्रय लेकर स्नान करना चाहिये ॥ ३ ॥

तीर्थशौचमनर्थित्वमार्जवं सत्यमार्दवम् ।
अहिंसा सर्वभूतानामानृशंस्यं दमः शमः ॥ ४ ॥
कामना और याचनाका अभाव, सरलता, सत्य, मृदुता, अहिंसा, समस्त प्राणियोंके प्रति क्रूरताका अभाव—दया, इन्द्रियसंयम और मनोनिग्रह—ये ही इस मानस तीर्थके सेवनसे प्राप्त होनेवाली पवित्रताके लक्षण हैं ॥ ४ ॥

निर्ममा निरहंकारा निर्द्वन्द्वा निष्परिग्रहाः ।
शुचयस्तीर्थभूतास्ते ये भैक्ष्यमुपभुञ्जते ॥ ५ ॥
जो ममता, अहंकार, राग-द्वेषादि द्वन्द्व और परिग्रहसे रहित एवं भिक्षासे जीवन निर्वाह करते हैं, वे विशुद्ध अन्तःकरणवाले साधु पुरुष तीर्थस्वरूप हैं ॥ ५ ॥

तत्त्ववित्तवनहंबुद्धिस्तीर्थप्रवरमुच्यते ।
(नारायणेऽथ रुद्रे वा भक्तिस्तीर्थं परं मता ।)
शौचलक्षणमेतत् ते सर्वत्रैवान्ववेक्षतः ॥ ६ ॥

किंतु जिसकी बुद्धिमें अहंकारका नाम भी नहीं है, वह तत्त्वज्ञानी पुरुष श्रेष्ठ तीर्थ कहलाता है। भगवान् नारायण अथवा भगवान् शिवमें जो भक्ति होती है, वह भी उत्तम तीर्थ मानी गयी है। पवित्रताका यह लक्षण तुम्हें विचार करनेपर सर्वत्र ही दृष्टिगोचर होगा॥ ६॥

रजस्तमः सत्त्वमथो येषां निर्धौतमात्मनः।
शौचाशौचसमायुक्ताः स्वकार्यपरिमार्गिणः॥ ७॥
सर्वत्यागेष्वभिरताः सर्वज्ञाः समदर्शिनः।
शौचेन वृत्तशौचार्थास्ते तीर्थाः शुचयश्च ये॥ ८॥
जिनके अन्तःकरणसे तमोगुण, रजोगुण और सत्त्वगुण धुल गये हैं अर्थात् जो तीनों गुणोंसे रहित हैं, जो बाह्य पवित्रता और अपवित्रतासे युक्त रहकर भी अपने कर्तव्य (तत्त्वविचार, ध्यान, उपासना आदि) का ही अनुसंधान करते हैं। जो सर्वस्वके त्यागमें ही अभिरुचि रखते हैं, सर्वज्ञ और समदर्शी होकर शौचाचारके पालनद्वारा आत्मशुद्धिका सम्पादन करते हैं, वे सत्पुरुष ही परम पवित्र तीर्थस्वरूप हैं॥ ७-८॥

नोदकक्लिन्नगात्रस्तु स्नात इत्यभिधीयते।
स स्नातो यो दमस्नातः स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः॥ ९॥
शरीरको केवल पानीसे भिगो लेना ही स्नान नहीं कहलाता है। सच्चा स्नान तो उसीने किया है, जिसने मन-इन्द्रियके संयमरूपी जलमें गोता लगाया है। वही बाहर और भीतरसे भी पवित्र माना गया है॥ ९॥

अतीतेष्वनपेक्षा ये प्राप्तेष्वर्थेषु निर्ममाः।
शौचमेव परं तेषां येषां नोत्पद्यते स्पृहा॥ १०॥
जो बीते या नष्ट हुए विषयोंकी अपेक्षा नहीं रखते, प्राप्त हुए पदार्थोंमें ममताशून्य होते हैं तथा जिनके मनमें कोई इच्छा पैदा ही नहीं होती, उन्हींमें परम पवित्रता होती है॥ १०॥

प्रज्ञानं शौचमेवेह शरीरस्य विशेषतः।
तथा निष्किंचनत्वं च मनसश्च प्रसन्नता॥ ११॥
इस जगत्में प्रज्ञान ही शरीर-शुद्धिका विशेष साधन है। इसी प्रकार अकिंचनता और मनकी प्रसन्नता भी शरीरको शुद्ध करनेवाले हैं॥ ११॥

वृत्तशौचं मनःशौचं तीर्थशौचमतः परम्।
ज्ञानोत्पन्नं च यच्छौचं तच्छौचं परमं स्मृतम्॥ १२॥
शुद्धि चार प्रकारकी मानी गयी है—आचारशुद्धि, मनःशुद्धि, तीर्थशुद्धि और ज्ञानशुद्धि; इनमें ज्ञानसे प्राप्त होनेवाली शुद्धि ही सबसे श्रेष्ठ मानी गयी है॥ १२॥

मनसा च प्रदीप्तेन ब्रह्मज्ञानजलेन च।
स्नाति यो मानसे तीर्थे तत्स्नानं तत्त्वदर्शिनः॥ १३॥

जो प्रसन्न एवं शुद्ध मनसे ब्रह्मज्ञानरूपी जलके द्वारा मानसतीर्थमें स्नान करता है, उसका वह स्नान ही तत्त्वदर्शी ज्ञानीका स्नान माना गया है ॥ १३ ॥

समारोपितशौचस्तु नित्यं भावसमाहितः ।
केवलं गुणसम्पन्नः शुचिरेव नरः सदा ॥ १४ ॥
जो सदा शौचाचारसे सम्पन्न, विशुद्ध भावसे युक्त और केवल सद्गुणोंसे विभूषित है, उस मनुष्यको सदा शुद्ध ही समझना चाहिये ॥ १४ ॥

शरीरस्थानि तीर्थानि प्रोक्तान्येतानि भारत ।
पृथिव्यां यानि तीर्थानि पुण्यानि शृणु तान्यपि ॥ १५ ॥
भारत! यह मैंने शरीरमें स्थित तीर्थोंका वर्णन किया; अब पृथ्वीपर जो पुण्यतीर्थ हैं, उनका महत्त्व भी सुनो ॥ १५ ॥

शरीरस्य यथोद्देशाः शुचयः परिकीर्तिताः ।
तथा पृथिव्या भागाश्च पुण्यानि सलिलानि च ॥ १६ ॥
जैसे शरीरके विभिन्न स्थान पवित्र बताये गये हैं, उसी प्रकार पृथ्वीके भिन्न-भिन्न भाग भी पवित्र तीर्थ हैं और वहाँका जल पुण्यदायक है ॥ १६ ॥

कीर्तनाच्चैव तीर्थस्य स्नानाच्च पितृतर्पणात् ।
धुनन्ति पापं तीर्थेषु ते प्रयान्ति सुखं दिवम् ॥ १७ ॥
जो लोग तीर्थोंके नाम लेकर तीर्थोंमें स्नान करके तथा उनमें पितरोंका तर्पण करके अपने पाप धो डालते हैं, वे बड़े सुखसे स्वर्गमें जाते हैं ॥ १७ ॥

परिग्रहाच्च साधूनां पृथिव्याश्चैव तेजसा ।
अतीव पुण्यभागास्ते सलिलस्य च तेजसा ॥ १८ ॥
पृथ्वीके कुछ भाग साधु पुरुषोंके निवाससे तथा स्वयं पृथ्वी और जलके तेजसे अत्यन्त पवित्र माने गये हैं ॥ १८ ॥

मनसश्च पृथिव्याश्च पुण्यास्तीर्थास्तथापरे ।
उभयोरेव यः स्नायात् स सिद्धिं शीघ्रमाप्नुयात् ॥ १९ ॥
इस प्रकार पृथ्वीपर और मनमें भी अनेक पुण्यमय तीर्थ हैं। जो इन दोनों प्रकारके तीर्थोंमें स्नान करता है, वह शीघ्र ही परमात्मप्राप्तिरूप सिद्धि प्राप्त कर लेता है ॥ १९ ॥

यथा बलं क्रियाहीनं क्रिया वा बलवर्जिता ।
नेह साधयते कार्यं समायुक्ता तु सिध्यति ॥ २० ॥
एवं शरीरशौचेन तीर्थशौचेन चान्वितः ।
शुचिः सिद्धिमवाप्नोति द्विविधं शौचमुत्तमम् ॥ २१ ॥
जैसे क्रियाहीन बल अथवा बलरहित क्रिया इस जगत्में कार्यका साधन नहीं कर सकती। बल और क्रिया दोनोंके संयुक्त होनेपर ही कार्यकी सिद्धि होती है, इसी प्रकार

शरीरशुद्धि और तीर्थशुद्धिसे युक्त पुरुष ही पवित्र होकर परमात्मप्राप्तिरूप सिद्धि प्राप्त करता है। अतः दोनों प्रकारकी शुद्धि ही उत्तम मानी गयी है ॥

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि शौचानुपृच्छा नामाष्टाधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०८ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें शुद्धिकी जिज्ञासानाम एक सौ आठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १०८ ॥

(दाक्षिणात्य अधिक पावका १/३ श्लोक मिलाकर कुल २१ १/३ श्लोक हैं)