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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

तुष्टपुष्टजना नित्यं नारी धर्मेण युज्यते ॥ ५० ॥ जो प्रतिदिन प्रातःकाल उठनेमें रुचि रखती है, घरोंके काम-काजमें योग देती है, घरको झाड़-बुहारकर साफ रखती है और गोबरसे लीप-पोतकर पवित्र बनाये रखती है, जो पतिके साथ रहकर प्रतिदिन अग्निहोत्र करती है, देवताओंको पुष्प और बलि अर्पण करती है तथा देवता, अतिथि और पोष्यवर्गको भोजनसे तृप्त करके न्याय और विधिके अनुसार शेष अन्नका स्वयं भोजन करती है तथा घरके लोगोंको हृष्ट-पुष्ट एवं संतुष्ट रखती है, ऐसी ही नारी सती-धर्मके फलसे युक्त होती है ॥ ४८–५० ॥

श्वश्रूश्वशुरयोः पादौ जोषयन्ती गुणान्विता । मातापितृपरा नित्यं या नारी सा तपोधना ॥ ५१ ॥ ब्राह्मणान् दुर्बलानाथान् दीनान्धकृपणांस्तथा । बिभर्त्यन्नेन या नारी सा पतिव्रतभागिनी ॥ ५२ ॥ जो उत्तम गुणोंसे युक्त होकर सदा सास-ससुरके चरणोंकी सेवामें संलग्न रहती है तथा माता-पिताके प्रति भी सदा उत्तम भक्तिभाव रखती है, वह स्त्री तपस्यारूपी धनसे सम्पन्न मानी गयी है। जो नारी ब्राह्मणों, दुर्बलों, अनाथों, दीनों, अन्धों और कृपणों (कंगालों) का अन्नके द्वारा भरण-पोषण करती है, वह पातिव्रतधर्मके पालनका फल पाती है ॥ ५१-५२ ॥

व्रतं चरति या नित्यं दुष्करं लघुसत्त्वया । पतिचित्ता पतिहिता सा पतिव्रतभागिनी ॥ ५३ ॥ जो प्रतिदिन शीघ्रतापूर्वक मर्यादाका बोध करानेवाली बुद्धिके द्वारा दुष्कर व्रतका आचरण करती है, पतिमें ही मन लगाती है और निरन्तर पतिके हित-साधनमें लगी रहती है, उसे पतिव्रत- धर्मके पालनका सुख प्राप्त होता है ॥

पुण्यमेतत् तपश्चैतत् स्वर्गश्चैष सनातनः । या नारी भर्तृपरमा भवेद् भर्तृव्रता सती ॥ ५४ ॥ जो साध्वी नारी पतिव्रत-धर्मका पालन करती हुई पतिकी सेवामें लगी रहती है, उसका यह कार्य महान् पुण्य, बड़ी भारी तपस्या और सनातन स्वर्गका साधन है ॥ ५४ ॥

पतिर्हि देवो नारीणां पतिर्बन्धुः पतिर्गतिः । पत्या समा गतिर्नास्ति दैवतं वा यथा पतिः ॥ ५५ ॥ पति ही नारियोंका देवता, पति ही बन्धु-बान्धव और पति ही उनकी गति है। नारीके लिये पतिके समान न दूसरा कोई सहारा है और न दूसरा कोई देवता ॥ ५५ ॥

पतिप्रसादः स्वर्गो वा तुल्यो नार्या न वा भवेत् । अहं स्वर्गं न हीच्छेयं त्वय्यप्रीते महेश्वरे ॥ ५६ ॥ एक ओर पतिकी प्रसन्नता और दूसरी ओर स्वर्ग—ये दोनों नारीकी दृष्टिमें समान हो सकते हैं या नहीं, इसमें संदेह है। मेरे प्राणनाथ महेश्वर! मैं तो आपको अप्रसन्न रखकर

स्वर्गको नहीं चाहती ।। ५६ ।।

यद्यकार्यमधर्मं वा यदि वा प्राणनाशनम् ।

पतिर्ब्रूयाद् दरिद्रो वा व्याधितो वा कथंचन ।। ५७ ।।

आपन्नो रिपुसंस्थो वा ब्रह्मशापार्दितोऽपि वा ।

आपद्धर्माननुप्रेक्ष्य तत्कार्यमविशङ्कया ।। ५८ ।।

पति दरिद्र हो जाय, किसी रोगसे घिर जाय, आपत्तिमें फँस जाय, शत्रुओंके बीचमें पड़

जाय अथवा ब्राह्मणके शापसे कष्ट पा रहा हो, उस अवस्थामें वह न करनेयोग्य कार्य, अधर्म

अथवा प्राणत्यागकी भी आज्ञा दे दे, तो उसे आपत्तिकालका धर्म समझकर निःशंकभावसे

तुरंत पूरा करना चाहिये ।। ५७-५८ ।।

एष देव मया प्रोक्तः स्त्रीधर्मो वचनात् तव ।

या त्वेवंभाविनी नारी सा पतिव्रतभागिनी ।। ५९ ।।

देव! आपकी आज्ञासे मैंने यह स्त्रीधर्मका वर्णन किया है। जो नारी ऊपर बताये

अनुसार अपना जीवन बनाती है, वह पातिव्रत-धर्मके फलकी भागिनी होती है ।। ५९ ।।

भीष्म उवाच

इत्युक्तः स तु देवेशः प्रतिपूज्य गिरेः सुताम् ।

लोकान् विसर्जयामास सर्वैरनुचरैर्वृतान् ।। ६० ।।

ततो ययुर्भूतगणाः सरितश्च यथागतम् ।

गन्धर्वाप्सरसश्चैव प्रणम्य शिरसा भवम् ।। ६१ ।।

भीष्मजी कहते हैं—युधिष्ठिर! पार्वतीजीके द्वारा इस प्रकार नारीधर्मका वर्णन सुनकर

देवाधिदेव महादेवजीने गिरिराजकुमारीका बड़ा आदर किया और वहाँ समस्त अनुचरोंके

साथ आये हुए लोगोंको जानेकी आज्ञा दी। तब समस्त भूतगण, सरिताएँ गन्धर्व और

अप्सराएँ भगवान् शंकरको सिरसे प्रणाम करके अपने-अपने स्थानको चली

गयीं ।। ६०-६१ ।।

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि उमामहेश्वरसंवादे स्त्रीधर्मकथने

षट्चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ।। १४६ ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें उमा-महेश्वरसंवादके

प्रसङ्गमें स्त्रीधर्मका वर्णनविषयक एक सौ छियालिसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १४६ ।।

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ३ श्लोक मिलाकर कुल ६४ श्लोक हैं)

वंशपरम्पराका कथन और भगवान् श्रीकृष्णके माहात्म्यका वर्णन

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सप्तचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः

वंशपरम्पराका कथन और भगवान् श्रीकृष्णके माहात्म्यका वर्णन

ऋषय ऊचुः
पिनाकिन् भगनेत्रघ्न सर्वलोकनमस्कृत ।
माहात्म्यं वासुदेवस्य श्रोतुमिच्छामि शङ्कर ॥ १ ॥
ऋषियोंने कहा— भगदेवताके नेत्रोंका विनाश करनेवाले पिनाकधारी विश्ववन्दित भगवान् शंकर! अब हम वासुदेव (श्रीकृष्ण)-का माहात्म्य सुनना चाहते हैं ॥ १ ॥

ईश्वर उवाच
पितामहादपि वरः शाश्वतः पुरुषो हरिः ।
कृष्णो जाम्बूनदाभासो व्यभ्रे सूर्य इवोदितः ॥ २ ॥
महेश्वरने कहा— मुनिवरो! भगवान् सनातन पुरुष श्रीकृष्ण ब्रह्माजीसे भी श्रेष्ठ हैं। वे श्रीहरि जाम्बूनद नामक सुवर्णके समान श्याम कान्तिसे युक्त हैं। बिना बादलके आकाशमें उदित सूर्यके समान तेजस्वी हैं ॥ २ ॥

दशबाहुर्महातेजा देवतारिनिषूदनः ।
श्रीवत्साङ्को हृषीकेशः सर्वदैवतपूजितः ॥ ३ ॥
उनकी भुजाएँ दस हैं, वे महान् तेजस्वी हैं, देवद्रोहियोंका नाश करनेवाले श्रीवत्सभूषित भगवान् हृषीकेश सम्पूर्ण देवताओंद्वारा पूजित होते हैं ॥ ३ ॥

ब्रह्मा तस्योदरभवस्तस्याहं च शिरोभवः ।
शिरोरुहेभ्यो ज्योतींषि रोमभ्यश्च सुरसुराः ॥ ४ ॥
ब्रह्माजी उनके उदरसे और मैं उनके मस्तकसे प्रकट हुआ हूँ। उनके सिरके केशोंसे नक्षत्रों और ताराओंका प्रादुर्भाव हुआ है। रोमावलियोंसे देवता और असुर प्रकट हुए हैं ॥ ४ ॥

ऋषयो देहसम्भूतास्तस्य लोकाश्च शाश्वताः ।
पितामहगृहं साक्षात् सर्वदेवगृहं च सः ॥ ५ ॥
समस्त ऋषि और सनातन लोक उनके श्रीविग्रहसे उत्पन्न हुए हैं। वे श्रीहरि स्वयं ही सम्पूर्ण देवताओंके गृह और ब्रह्माजीके भी निवासस्थान हैं ॥ ५ ॥

सोऽस्याः पृथिव्याः कृत्स्नायाः स्रष्टा त्रिभुवनेश्वरः ।
संहर्ता चैव भूतानां स्थावरस्य चरस्य च ॥ ६ ॥

इस सम्पूर्ण पृथ्वीके स्रष्टा और तीनों लोकोंके स्वामी भी वे ही हैं। वे ही चराचर प्राणियोंका संहार भी करते हैं ॥ ६ ॥ स हि देववरः साक्षाद् देवनाथः परंतपः । सर्वज्ञः सर्वसंश्लिष्टः सर्वगः सर्वतोमुखः ॥ ७ ॥ वे देवताओंमें श्रेष्ठ, देवताओंके रक्षक, शत्रुओंको संताप देनेवाले, सर्वज्ञ, सबमें ओतप्रोत, सर्वव्यापक तथा सब ओर मुखवाले हैं ॥ ७ ॥ परमात्मा हृषीकेशः सर्वव्यापी महेश्वरः । न तस्मात् परमं भूतं त्रिषु लोकेषु किंचन ॥ ८ ॥ वे ही परमात्मा, इन्द्रियोंके प्रेरक और सर्वव्यापी महेश्वर हैं। तीनों लोकोंमें उनसे बढ़कर दूसरा कोई नहीं है ॥ ८ ॥ सनातनो वै मधुहा गोविन्द इति विश्रुतः । स सर्वान् पार्थिवान् संख्ये घातयिष्यति मानदः ॥ ९ ॥ वे ही सनातन, मधुसूदन और गोविन्द आदि नामोंसे प्रसिद्ध हैं। सज्जनोंको आदर देनेवाले वे भगवान् श्रीकृष्ण महाभारत-युद्धमें समस्त राजाओंका संहार करायेंगे ॥ ९ ॥ सुरकार्यार्थमुत्पन्नो मानुषं वपुरास्थितः । न हि देवगणाः सक्तास्त्रिविक्रमविनाकृताः ॥ १० ॥ वे देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके लिये पृथ्वीपर मानव-शरीर धारण करके प्रकट हुए हैं। उन भगवान् त्रिविक्रमकी शक्ति और सहायताके बिना सम्पूर्ण देवता भी कोई कार्य नहीं कर सकते ॥ १० ॥ भुवने देवकार्याणि कर्तुं नायकवर्जिताः । नायकः सर्वभूतानां सर्वदेवनमस्कृतः ॥ ११ ॥ संसारमें नेताके बिना देवता अपना कोई भी कार्य करनमें असमर्थ हैं और ये भगवान् श्रीकृष्ण सब प्राणियोंके नेता हैं। इसलिये समस्त देवता उनके चरणोंमें मस्तक झुकाते हैं ॥ ११ ॥ एतस्य देवनाथस्य देवकार्यपरस्य च । ब्रह्मभूतस्य सततं ब्रह्मर्षिशरणस्य च ॥ १२ ॥ ब्रह्मा वसति गर्भस्थः शरीरे सुखसंस्थितः । शर्वः सुखं संश्रितश्च शरीरे सुखसंस्थितः ॥ १३ ॥ देवताओंकी रक्षा और उनके कार्यसाधनमें संलग्न रहनेवाले वे भगवान् वासुदेव ब्रह्मस्वरूप हैं। वे ही ब्रह्मर्षियोंको सदा शरण देते हैं। ब्रह्माजी उनके शरीरके भीतर अर्थात् उनके गर्भमें बड़े सुखके साथ रहते हैं। सदा सुखी रहनेवाला मैं शिव भी उनके श्रीविग्रहके भीतर सुखपूर्वक निवास करता हूँ ॥ १२-१३ ॥ सर्वाः सुखं संश्रिताश्च शरीरे तस्य देवताः ।

स देवः पुण्डरीकाक्षः श्रीगर्भः श्रीसहोषितः ॥ १४ ॥

भगवान् शंकर श्रीकृष्णका माहात्म्य कह रहे हैं

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भगवान् शंकर श्रीकृष्णका माहात्म्य कह रहे हैं

सम्पूर्ण देवता उनके श्रीविग्रहमें सुखपूर्वक निवास करते हैं। वे कमलनयन श्रीहरि अपने गर्भ (वक्षःस्थल)-में लक्ष्मीको निवास देते हैं। लक्ष्मीके साथ ही वे रहते हैं ॥ १४ ॥

शार्ङ्गचक्रायुधः खड्गी सर्वनागरिपुध्वजः । उत्तमेन स शीलेन दमेन च शमेन च ॥ १५ ॥ पराक्रमेण वीर्येण वपुषा दर्शनेन च । आरोहेण प्रमाणेन धैर्येणार्जवसम्पदा ॥ १६ ॥ आनृशंस्येन रूपेण बलेन च समन्वितः । अस्त्रैः समुदितः सर्वैर्दिव्यैरद्भुतदर्शनैः ॥ १७ ॥

शार्ङ्गधनुष, सुदर्शनचक्र और नन्दक नामक खड्ग—उनके आयुध हैं। उनकी ध्वजामें सम्पूर्ण नागोंके शत्रु गरुड़का चिह्न सुशोभित है। वे उत्तम शील, शम, दम, पराक्रम, वीर्य, सुन्दर शरीर, उत्तम दर्शन, सुडौल आकृति, धैर्य, सरलता, कोमलता, रूप और बल आदि सद्गुणोंसे सम्पन्न हैं। सब प्रकारके दिव्य और अद्भुत अस्त्र-शस्त्र उनके पास सदा मौजूद रहते हैं ॥ १५—१७ ॥

योगमायः सहस्राक्षो निरपायो महामनाः । वीरो मित्रजनश्लाघी ज्ञातिबन्धुजनप्रियः ॥ १८ ॥ क्षमावांश्चानहंवादी ब्रह्मण्यो ब्रह्मनायकः । भयहर्ता भयार्तानां मित्राणां नन्दिवर्धनः ॥ १९ ॥

वे योगमायासे सम्पन्न और हजारों नेत्रोंवाले हैं। उनका हृदय विशाल है। वे अविनाशी, वीर, मित्रजनोंके प्रशंसक, ज्ञाति एवं बन्धु-बान्धवोंके प्रिय, क्षमाशील, अहंकाररहित, ब्राह्मणभक्त, वेदोंका उद्धार करनेवाले, भयातुर पुरुषोंका भय दूर करनेवाले और मित्रोंका आनन्द बढ़ानेवाले हैं ॥ १८-१९ ॥

शरण्यः सर्वभूतानां दीनानां पालने रतः । श्रुतवानर्थसम्पन्नः सर्वभूतनमस्कृतः ॥ २० ॥ समाश्रितानां वरदः शत्रूणामपि धर्मवित् । नीतिज्ञो नीतिसम्पन्नो ब्रह्मवादी जितेन्द्रियः ॥ २१ ॥

वे समस्त प्राणियोंको शरण देनेवाले, दीन-दुखियोंके पालनमें तत्पर, शास्त्रज्ञानसम्पन्न, धनवान्, सर्वभूतवन्दित, शरणमें आये हुए शत्रुओंको भी वर देनेवाले, धर्मज्ञ, नीतिज्ञ, नीतिमान्, ब्रह्मवादी और जितेन्द्रिय हैं ॥ २०-२१ ॥

भवार्थमिह देवानां बुद्ध्या परमया युतः । प्राजापत्ये शुभे मार्गे मानवे धर्मसंस्कृते ॥ २२ ॥ समुत्पत्स्यति गोविन्दो मनोर्वंशे महात्मनः । अङ्गो नाम मनोः पुत्रो अन्तर्धामा ततः परः ॥ २३ ॥

परम बुद्धिसे सम्पन्न भगवान् गोविन्द यहाँ देवताओंकी उन्नतिके लिये प्रजापतिके शुभमार्गपर स्थित हो मनुके धर्म-संस्कृत कुलमें अवतार लेंगे। महात्मा मनुके वंशमें मनुपुत्र अंग नामक राजा होंगे। उनसे अन्तर्धामा नामवाले पुत्रका जन्म होगा ॥ २२-२३ ॥

अन्तर्धाम्नो हविर्धामा प्रजापतिरनिन्दितः ।
प्राचीनबर्हिर्भविता हविर्धाम्नः सुतो महान् ॥ २४ ॥
अन्तर्धामासे अनिन्द्य प्रजापति हविर्धामाकी उत्पत्ति होगी। हविर्धामाके पुत्र महाराज प्राचीनबर्हि होंगे ॥ २४ ॥

तस्य प्रचेतःप्रमुखा भविष्यन्ति दशात्मजाः ।
प्राचेतसस्तथा दक्षो भवितेह प्रजापतिः ॥ २५ ॥
प्राचीनबर्हिके प्रचेता आदि दस पुत्र होंगे। उन दसों प्रचेताओंस इस जगत्में प्रजापति दक्षका प्रादुर्भाव होगा ॥ २५ ॥

दाक्षायण्यास्तथाऽऽदित्यो मनुरादित्यतस्तथा ।
मनोश्च वंशज इला सुद्युम्नश्च भविष्यति ॥ २६ ॥
दक्षकन्या अदितिसे आदित्य (सूर्य) उत्पन्न होंगे। सूर्यसे मनु उत्पन्न होंगे। मनुके वंशमें इला नामक कन्या होगी, जो आगे चलकर सुद्युम्न नामक पुत्रके रूपमें परिणत हो जायगी ॥ २६ ॥

बुधात् पुरूरवाश्चापि तस्मादायुर्भविष्यति ।
नहुषो भविता तस्माद् ययातिस्तस्य चात्मजः ॥ २७ ॥
कन्यावस्थामें बुधसे समागम होनेपर उससे पुरूरवाका जन्म होगा। पुरूरवासे आयु नामक पुत्रकी उत्पत्ति होगी। आयुके पुत्र नहुष और नहुषके ययाति होंगे ॥ २७ ॥

यदुस्तस्मान्महासत्त्वः क्रोष्टा तस्माद् भविष्यति ।
क्रोष्टुश्चैव महान् पुत्रो वृजिनीवान् भविष्यति ॥ २८ ॥
ययातिसे महान् बलशाली यदु होंगे। बहुसे क्रोष्टाका जन्म होगा, क्रोष्टासे महान् पुत्र वृजिनीवान् होंगे ॥ २८ ॥

वृजिनीवतश्च भविता उषङ्गुरपराजितः ।
उषङ्गोर्भविता पुत्रः शूरश्चित्ररथस्तथा ॥ २९ ॥
वृजिनीवान्‌से विजय वीर उषंगुका जन्म होगा। उषंगुका पुत्र शूरवीर चित्ररथ होगा ॥ २९ ॥

तस्य त्ववरजः पुत्रः शूरो नाम भविष्यति ।
तेषां विख्यातवीर्याणां चरित्रगुणशालिनाम् ॥ ३० ॥
यज्वनां सुविशुद्धानां वंशे ब्राह्मणसम्मते ।
स शूरः क्षत्रियश्रेष्ठो महावीर्यो महायशाः ।
स्ववंशविस्तरकरं जनयिष्यति मानदः ॥ ३१ ॥

वसुदेव इति ख्यातं पुत्रमानकदुन्दुभिम् ।
तस्य पुत्रश्चतुर्बाहुर्वासुदेवो भविष्यति ॥ ३२ ॥
उसका छोटा पुत्र शूर नामसे विख्यात होगा। वे सभी यदुवंशी विख्यात पराक्रमी, सदाचार और सद्गुणसे सुशोभित, यज्ञशील और विशुद्ध आचार-विचारवाले होंगे। उनका कुल ब्राह्मणोंद्वारा सम्मानित होगा। उस कुलमें महापराक्रमी, महायशस्वी और दूसरोंको सम्मान देनेवाले क्षत्रिय-शिरोमणि शूर अपने वंशका विस्तार करनेवाले वसुदेव नामक पुत्रको जन्म देंगे, जिसका दूसरा नाम आनकदुन्दुभि होगा। उन्हींके पुत्र चार भुजाधारी भगवान् वासुदेव होंगे ॥ ३०—३२ ॥

दाता ब्राह्मणसत्कर्ता ब्रह्मभूतो द्विजप्रियः ।
राज्ञो मागधसंरुद्धान् मोक्षयिष्यति यादवः ॥ ३३ ॥
भगवान् वासुदेव दानी, ब्राह्मणोंका सत्कार करनेवाले, ब्रह्मभूत और ब्राह्मणप्रिय होंगे। वे यदुकुलतिलक श्रीकृष्ण मगधराज जरासंधकी कैदमें पड़े हुए राजाओंको बन्धनसे छुड़ायेंगे ॥ ३३ ॥

जरासंधं तु राजानं निर्जित्य गिरिगह्वरे ।
सर्वपार्थिवरत्नाढ्यो भविष्यति स वीर्यवान् ॥ ३४ ॥
वे पराक्रमी श्रीहरि पर्वतकी कन्दरा (राजगृह)-में राजा जरासंधको जीतकर समस्त राजाओंके द्वारा उपहृत रत्नोंसे सम्पन्न होंगे ॥ ३४ ॥

पृथिव्यामप्रतिहतो वीर्येण च भविष्यति ।
विक्रमेण च सम्पन्नः सर्वपार्थिवपार्थिवः ॥ ३५ ॥
वे इस भूमण्डलमें अपने बल-पराक्रमद्वारा अजेय होंगे। विक्रमसे सम्पन्न तथा समस्त राजाओंके भी राजा होंगे ॥ ३५ ॥

शूरसेनेषु भूत्वा स द्वारकायां वसन् प्रभुः ।
पालयिष्यति गां देवीं विजित्य नयवित् सदा ॥ ३६ ॥
नीतिवेत्ता भगवान् श्रीकृष्ण शूरसेन देश (मथुरा-मण्डल)-में अवतीर्ण होकर वहाँसे द्वारकापुरीमें जाकर रहेंगे और समस्त राजाओंको जीतकर सदा इस पृथ्वीदेवीका पालन करेंगे ॥ ३६ ॥

तं भवन्तः समासाद्य वाङ्माल्यैरर्हणैर्वरैः ।
अर्चयन्तु यथान्यायं ब्रह्माणमिव शाश्वतम् ॥ ३७ ॥
आपलोग उन्हीं भगवान्‌की शरण लेकर अपनी वाङ्मयी मालाओं तथा श्रेष्ठ पूजनोपचारोंसे सनातन ब्रह्माकी भाँति उनका यथोचित पूजन करें ॥ ३७ ॥

यो हि मां द्रष्टुमिच्छेत ब्रह्माणं च पितामहम् ।
द्रष्टव्यस्तेन भगवान् वासुदेवः प्रतापवान् ॥ ३८ ॥

जो मेरा और पितामह ब्रह्माजीका दर्शन करना चाहता हो, उसे प्रतापी भगवान् वासुदेवका दर्शन करना चाहिये ॥ ३८ ॥ दृष्टे तस्मिन्नहं दृष्टो न मेऽत्रास्ति विचारणा । पितामहो वा देवेश इति वित्त तपोधनाः ॥ ३९ ॥ तपोधनो! उनका दर्शन हो जानेपर मेरा ही दर्शन हो गया, अथवा उनके दर्शनसे देवेश्वर ब्रह्माजीका दर्शन हो गया ऐसे समझो, इस विषयमें मुझे कोई विचार नहीं करना है अर्थात् संदेह नहीं है ॥ ३९ ॥ स यस्य पुण्डरीकाक्षः प्रीतियुक्तो भविष्यति । तस्य देवगणः प्रीतो ब्रह्मपूर्वो भविष्यति ॥ ४० ॥ जिसपर कमलनयन भगवान् श्रीकृष्ण प्रसन्न होंगे, उसके ऊपर ब्रह्मा आदि देवताओंका समुदाय प्रसन्न हो जायगा ॥ ४० ॥ यश्च तं मानवे लोके संश्रयिष्यति केशवम् । तस्य कीर्तिर्जयश्चैव स्वर्गश्चैव भविष्यति ॥ ४१ ॥ मानवलोकमें जो भगवान् श्रीकृष्णकी शरण लेगा, उसे कीर्ति, विजय तथा उत्तम स्वर्गकी प्राप्ति होगी ॥ ४१ ॥ धर्माणां देशिकः साक्षात् स भविष्यति धर्मभाक् । धर्मवद्भिः स देवेशो नमस्कार्यः सदोद्यतैः ॥ ४२ ॥ इतना ही नहीं, वह धर्मोंका उपदेश देनेवाला साक्षात् धर्माचार्य एवं धर्मफलका भागी होगा। अतः धर्मात्मा पुरुषोंको चाहिये कि वे सदा उत्साहित रहकर देवेश्वर भगवान् वासुदेवको नमस्कार करें ॥ ४२ ॥ धर्म एव परो हि स्यात् तस्मिन्नभ्यर्चिते विभौ । स हि देवो महातेजाः प्रजाहितचिकीर्षया ॥ ४३ ॥ धर्मार्थं पुरुषव्याघ्र ऋषिकोटीः ससर्ज ह । ताः सृष्टास्तेन विभुना पर्वते गन्धमादने ॥ ४४ ॥ सनत्कुमारप्रमुखास्तिष्ठन्ति तपसान्विताः । तस्मात् स वाग्मी धर्मज्ञो नमस्यो द्विजपुङ्गवाः ॥ ४५ ॥ उन सर्वव्यापी परमेश्वरकी पूजा करनेसे परम धर्मकी सिद्धि होगी। वे महान् तेजस्वी देवता हैं। उन पुरुषसिंह श्रीकृष्णने प्रजाका हित करनेकी इच्छासे धर्मका अनुष्ठान करनेके लिये करोड़ों ऋषियोंकी सृष्टि की है। भगवान्‌के उत्पन्न किये हुए वे सनत्कुमार आदि ऋषि गन्धमादन पर्वतपर सदा तपस्यामें संलग्न रहते हैं। अतः द्विजवरो! उन प्रवचन-कुशल, धर्मज्ञ वासुदेवको सदा प्रणाम करना चाहिये ॥ ४३—४५ ॥ दिवि श्रेष्ठो हि भगवान् हरिनारायणः प्रभुः । वन्दितो हि स वन्देत मानितो मानयीत च ।

अर्हितश्चार्हयेन्नित्यं पूजितः प्रतिपूजयेत् ॥ ४६ ॥ वे भगवान् नारायण हरि देवलोकमें सबसे श्रेष्ठ हैं। जो उनकी वन्दना करता है, उसकी वे भी वन्दना करते हैं। जो उनका आदर करता है, उसका वे भी आदर करते हैं। इसी प्रकार अर्चित होनेपर वे भी अर्चना करते और पूजित या प्रशंसित होनेपर वे भी पूजा या प्रशंसा करते हैं ॥ ४६ ॥

दृष्टः पश्येदहरहः संश्रितः प्रतिसंश्रयेत् । अर्चितश्चार्चयेन्नित्यं स देवो द्विजसत्तमाः ॥ ४७ ॥ श्रेष्ठ ब्राह्मणो! जो प्रतिदिन उनका दर्शन करता है, उसकी ओर वे भी कृपादृष्टि करते हैं। जो उनका आश्रय लेता है, उसके हृदयमें वे भी आश्रय लेते हैं तथा जो उनकी पूजा करता है, उसकी वे भी सदा पूजा करते हैं ॥ ४७ ॥

एतत् तस्यानवद्यस्य विष्णोर्वै परमं व्रतम् । आदिदेवस्य महतः सज्जनाचरितं सदा ॥ ४८ ॥ उन प्रशंसनीय आदि देवता भगवान् महाविष्णुका यह उत्तम व्रत है, जिसका साधु पुरुष सदा आचरण करते आये हैं ॥ ४८ ॥

भुवनेऽभ्यर्चितो नित्यं देवैरपि सनातनः । अभयेनानुरूपेण युज्यन्ते तमनुव्रताः ॥ ४९ ॥ वे सनातन देवता हैं, अतः इस त्रिभुवनमें देवता भी सदा उन्हींकी पूजा करते हैं। जो उनके अनन्य भक्त हैं, वे अपने भजनके अनुरूप ही निर्भय पद प्राप्त करते हैं ॥ ४९ ॥

कर्मणा मनसा वाचा स नमस्यो द्विजैः सदा । यत्नवद्भिरुपस्थाय द्रष्टव्यो देवकीसुतः ॥ ५० ॥ द्विजोंको चाहिये कि वे मन, वाणी और कर्मसे सदा उन भगवान्‌को प्रणाम करें और यत्नपूर्वक उपासना करके उन देवकीनन्दनका दर्शन करें ॥ ५० ॥

एष वोऽभिहितो मार्गो मया वै मुनिसत्तमाः । तं दृष्ट्वा सर्वशो देवं दृष्टाः स्युः सुरसत्तमाः ॥ ५१ ॥ मुनिवरो! यह मैंने आपलोगोंको उत्तम मार्ग बता दिया है। उन भगवान् वासुदेवका सब प्रकारसे दर्शन कर लेनेपर सम्पूर्ण श्रेष्ठ देवताओंका दर्शन करना हो जायगा ॥ ५१ ॥

महावराहं तं देवं सर्वलोकपितामहम् । अहं चैव नमस्यामि नित्यमेव जगत्पतिम् ॥ ५२ ॥ मैं भी महावराहरूप धारण करनेवाले उन सर्वलोक-पितामह जगदीश्वरको नित्य प्रणाम करता हूँ ॥ ५२ ॥

तत्र च त्रितयं दृष्टं भविष्यति न संशयः । समस्ता हि वयं देवास्तस्य देहे वसामहे ॥ ५३ ॥

हम सब देवता उनके श्रीविग्रहमें निवास करते हैं। अतः उनका दर्शन करनेसे तीनों देवताओं (ब्रह्मा, विष्णु और शिव)-का दर्शन हो जाता है, इसमें संशय नहीं है ।। ५३ ।। तस्य चैवाग्रजो भ्राता सिताद्रिनिचयप्रभः । हली बल इति ख्यातो भविष्यति धराधरः ।। ५४ ।। उनके बड़े भाई कैलासकी पर्वतमालाओंके समान श्वेत कान्तिसे प्रकाशित होनेवाले हलधर और बलरामके नामसे विख्यात होंगे। पृथ्वीको धारण करनेवाले शेषनाग ही बलरामके रूपमें अवतीर्ण होंगे ।। ५४ ।। त्रिशिरास्तस्य दिव्यश्च शातकुम्भमयो द्रुमः । ध्वजस्तृणेन्द्रो देवस्य भविष्यति रथाश्रितः ।। ५५ ।। बलदेवजीके रथपर तीन शिखाओंसे युक्त दिव्य सुवर्णमय तालवृक्ष ध्वजके रूपमें सुशोभित होगा ।। ५५ ।। शिरो नागैर्महाभोगैः परिकीर्णं महात्मभिः । भविष्यति महाबाहोः सर्वलोकेश्वरस्य च ।। ५६ ।। सर्वलोकेश्वर महाबाहु बलरामजीका मस्तक बड़े-बड़े फनवाले विशालकाय सर्पोंसे घिरा हुआ होगा ।। ५६ ।। चिन्तितानि समेष्यन्ति शस्त्राण्यस्त्राणि चैव ह । अनन्तश्च स एवोक्तो भगवान् हरिरव्ययः ।। ५७ ।। उनके चिन्तन करते ही सम्पूर्ण दिव्य अस्त्र-शस्त्र उन्हें प्राप्त हो जायँगे। अविनाशी भगवान् श्रीहरि ही अनन्त शेषनाग कहे गये हैं ।। ५७ ।। समादिष्टश्च विबुधैर्दर्शय त्वमिति प्रभो । सुपर्णो यस्य वीर्येण कश्यपस्यात्मजो बली । अन्तं नैवाशकद् द्रष्टुं देवस्य परमात्मनः ।। ५८ ।। पूर्वकालमें देवताओंने गरुड़जीसे यह अनुरोध किया कि 'आप हमें भगवान् शेषका अन्त दिखा दीजिये।' तब कश्यपके बलवान् पुत्र गरुड़ अपनी सारी शक्ति लगाकर भी उन परमात्मदेव अनन्तका अन्त न देख सके ।। ५८ ।। स च शेषो विचरते परया वै मुदा युतः । अन्तर्वसति भोगेन परिरभ्य वसुन्धराम् ।। ५९ ।। वे भगवान् शेष बड़े आनन्दके साथ सर्वत्र विचरते हैं और अपने विशाल शरीरसे पृथिवीको आलिंगनपाशमें बाँधकर पाताललोकमें निवास करते हैं ।। ५९ ।। य एव विष्णुः सोऽनन्तो भगवान् वसुधाधरः । यो रामः स हृषीकेशो योऽच्युतः स धराधरः ।। ६० ।। जो भगवान् विष्णु हैं, वे ही इस पृथिवीको धारण करनेवाले भगवान् अनन्त हैं। जो बलराम हैं वे ही श्रीकृष्ण हैं, जो श्रीकृष्ण हैं वे ही भूमिधर बलराम हैं ।। ६० ।।

तावुभौ पुरुषव्याघ्रौ दिव्यौ दिव्यपराक्रमौ ।
द्रष्टव्यौ माननीयौ च चक्रलाङ्गलधारिणौ ॥ ६१ ॥
वे दोनों दिव्य रूप और दिव्य पराक्रमसे सम्पन्न पुरुषसिंह बलराम और श्रीकृष्ण क्रमशः चक्र एवं हल धारण करनेवाले हैं। तुम्हें उन दोनोंका दर्शन एवं सम्मान करना चाहिये ॥ ६१ ॥

एष वोऽनुग्रहः प्रोक्तो मया पुण्यस्तपोधनाः ।
यद् भवन्तो यदुश्रेष्ठं पूजयेयुः प्रयत्नतः ॥ ६२ ॥
तपोधनो! आपलोगोंपर अनुग्रह करके मैंने भगवान्‌का पवित्र माहात्म्य इसलिये बताया है कि आप प्रयत्नपूर्वक उन यदुकुलतिलक श्रीकृष्णकी पूजा करें ॥ ६२ ॥

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि पुरुषमाहात्म्ये
सप्तचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १४७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें परमपुरुष श्रीकृष्णका माहात्म्यविषयक एक सौ सैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १४७ ॥

भगवान् श्रीकृष्णकी महिमाका वर्णन और भीष्मजीका युधिष्ठिरको राज्य करनेके लिये आदेश देना

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अष्टचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः

भगवान् श्रीकृष्णकी महिमाका वर्णन और भीष्मजीका युधिष्ठिरको राज्य करनेके लिये आदेश देना

नारद उवाच

अथ व्योम्नि महान् शब्दः सविद्युत्स्तनयित्नुमान् ।
मेघैश्च गगनं नीलं संरुद्धमभवद् घनैः ॥ १ ॥

**नारदजी कहते हैं—**तदनन्तर आकाशमें बिजलीकी गड़गड़ाहट और मेघोंकी गम्भीर गर्जनाके साथ महान् शब्द होने लगा। मेघोंकी घनघोर घटासे घिरकर सारा आकाश नीला हो गया ॥ १ ॥

प्रावृषीव च पर्जन्यो ववृषे निर्मलं पयः ।
तमश्चैवाभवद् घोरं दिशश्च न चकाशिरे ॥ २ ॥

वर्षाकालकी भाँति मेघसमूह निर्मल जलकी वर्षा करने लगा। सब ओर घोर अन्धकार छा गया। दिशाएँ नहीं सूझती थीं ॥ २ ॥

ततो देवगिरौ तस्मिन् रम्ये पुण्ये सनातने ।
न शर्वं भूतसंघं वा ददृशुर्मुनयस्तदा ॥ ३ ॥

उस समय उस रमणीय, पवित्र एवं सनातन देवगिरिपर ऋषियोंने जब दृष्टिपात किया, तब उन्हें वहाँ न तो भगवान् शंकर दिखायी दिये और न भूतोंके समुदायका ही दर्शन हुआ ॥ ३ ॥

व्यभ्रं च गगनं सद्यः क्षणेन समपद्यत ।
तीर्थयात्रां ततो विप्रा जग्मुश्चान्ये यथागतम् ॥ ४ ॥

फिर तो तत्काल एक ही क्षणमें सारा आसमान साफ हो गया। कहीं भी बादल नहीं रह गया। तब ब्राह्मणलोग वहाँसे तीर्थयात्राके लिये चल दिये और अन्य लोग भी जैसे आये थे, वैसे ही लौट गये ॥ ४ ॥

तदद्भुतमचिन्त्यं च दृष्ट्वा ते विस्मिताऽभवन् ।
शङ्करस्योमया सार्धं संवादं त्वत्कथाश्रयम् ॥ ५ ॥
स भवान् पुरुषव्याघ्र ब्रह्मभूतः सनातनः ।
यदर्थमनुशिष्टाः स्मो गिरिपृष्ठे महात्मना ॥ ६ ॥

यह अद्भुत और अचिन्त्य घटना देखकर सब लोग आश्चर्यचकित हो उठे। पुरुषसिंह देवकीनन्दन! भगवान् शंकरका पार्वतीजीके साथ जो आपके सम्बन्धमें संवाद हुआ, उसे

सुनकर हम इस निश्चयपर पहुँच गये हैं कि वे ब्रह्मभूत सनातन पुरुष आप ही हैं। जिनके लिये हिमालयके शिखरपर महादेवजीने हमलोगोंको उपदेश दिया था ।। ५-६ ।। द्वितीयं त्वद्भुतमिदं त्वत्तेजः कृतमद्य वै । दृष्ट्वा च विस्मिताः कृष्ण सा च नः स्मृतिरागता ।। ७ ।। श्रीकृष्ण! आपके तेजसे दूसरी अद्भुत घटना आज यह घटित हुई है, जिसे देखकर हम चकित हो गये हैं और हमें पूर्वकालकी वह शंकरजीवाली बात पुनः स्मरण हो रही है ।। ७ ।। एतत् ते देवदेवस्य माहात्म्यं कथितं प्रभो । कपर्दिनो गिरीशस्य महाबाहो जनार्दन ।। ८ ।। प्रभो! महाबाहु जनार्दन! यह मैंने आपके समक्ष जटाजूटधारी देवाधिदेव गिरीशके माहात्म्यका वर्णन किया है ।। ८ ।। इत्युक्तः स तदा कृष्णस्तपोवननिवासिभिः । मानयामास तान् सर्वानृषीन् देवकीनन्दनः ।। ९ ।। तपोवन-निवासी मुनियोंके ऐसा कहनेपर देवकीनन्दन भगवान् श्रीकृष्णने उस समय उन सबका विशेष सत्कार किया ।। ९ ।। अथर्षयः सम्प्रहृष्टाः पुनस्ते कृष्णमब्रुवन् । पुनः पुनः दर्शयास्मान् सदैव मधुसूदन ।। १० ।। तदनन्तर वे महर्षि पुनः हर्षमें भरकर श्रीकृष्णसे बोले—'मधुसूदन! आप सदा ही हमें बारंबार दर्शन देते रहें ।। १० ।। न हि नः सा रतिः स्वर्गे या च त्वद्दर्शने विभो । तदृतं च महाबाहो यदाह भगवान् भवः ।। ११ ।। 'प्रभो! आपके दर्शनमें हमारा जितना अनुराग है, उतना स्वर्गमें भी नहीं है। महाबाहो! भगवान् शिवने जो कहा था, वह सर्वथा सत्य हुआ ।। ११ ।। एतत् ते सर्वमाख्यातं रहस्यमरिकर्शन । त्वमेव ह्यर्थतत्त्वज्ञः पृष्टोऽस्मान् पृच्छसे यदा ।। १२ ।। तदस्माभिरिदं गुह्यं त्वत्प्रियार्थमुदाहृतम् । न च तेऽविदितं किंचित्त्रिषु लोकेषु विद्यते ।। १३ ।। 'शत्रुसूदन! यह सारा रहस्य मैंने आपसे कहा है, आप ही अर्थ-तत्त्वके ज्ञाता हैं। हमने आपसे पूछा था, परंतु आप स्वयं ही जब हमसे प्रश्न करने लगे, तब हमलोगोंने आपकी प्रसन्नताके लिये इस गोपनीय रहस्यका वर्णन किया है। तीनों लोकोंमें कोई ऐसी बात नहीं है, जो आपको ज्ञात न हो ।। १२-१३ ।। जन्म चैव प्रसूतिश्च यच्चान्यत् कारणं विभो । वयं तु बहुचापल्यादशक्ता गुह्यधारणे ।। १४ ।।

'प्रभो! आपका जो यह अवतार अर्थात् मानव-शरीरमें जन्म हुआ है तथा जो इसका गुप्त कारण है, यह सब तथा अन्य बातें आपसे छिपी नहीं हैं। हमलोग तो अपनी अत्यन्त चपलताके कारण इस गूढ़ विषयको अपने मनमें ही छिपाये रखनेमें असमर्थ हो गये हैं॥ १४॥
ततः स्थिते त्वयि विभो लघुत्वात् प्रलपामहे।
न हि किंचित् तदाश्चर्यं यन्न वेत्ति भवानिह॥ १५॥
दिवि वा भुवि वा देव सर्वं हि विदितं तव।
'भगवन्! इसीलिये आपके रहते हुए भी हम अपने ओछेपनके कारण प्रलाप करते हैं—छोटे मुँह बड़ी बात कर रहे हैं। देव! पृथ्वीपर या स्वर्गमें कोई भी ऐसी आश्चर्यकी बात नहीं है, जिसे आप नहीं जानते हों। आपको सब कुछ ज्ञात है॥ १५१/२॥
साधयाम वयं कृष्ण बुद्धिं पुष्टिमवाप्नुहि॥ १६॥
'श्रीकृष्ण! अब आप हमें जानेकी आज्ञा दें, जिससे हम अपना कार्य साधन करें। आपको उत्तम बुद्धि और पुष्टि प्राप्त हो॥ १६॥
पुत्रस्ते सदृशस्तात विशिष्टो वा भविष्यति।
महाप्रभावसंयुक्तो दीप्तिकीर्तिकरः प्रभुः॥ १७॥
तात! आपको आपके समान अथवा आपसे भी बढ़कर पुत्र प्राप्त हो। वह महान् प्रभावसे युक्त, दीप्तिमान्, कीर्तिका विस्तार करनेवाला और सर्वसमर्थ हो'॥ १७॥

भीष्म उवाच

ततः प्रणम्य देवेशं यादवं पुरुषोत्तमम्।
प्रदक्षिणमुपावृत्य प्रजग्मुस्ते महर्षयः॥ १८॥
**भीष्मजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! तदनन्तर वे महर्षि उन यदुकुलरत्न देवेश्वर पुरुषोत्तमको प्रणाम और उनकी परिक्रमा करके चले गये॥ १८॥
सोऽयं नारायणः श्रीमान् दीप्त्या परमया युतः।
व्रतं यथावत् तच्चीर्त्वा द्वारकां पुनरागमत्॥ १९॥
तत्पश्चात् परम कान्तिसे युक्त ये श्रीमान् नारायण अपने व्रतको यथावत्रूपसे पूर्ण करके पुनः द्वारकापुरीमें चले आये॥ १९॥
पूर्णे च दशमे मासि पुत्रोऽस्य परमाद्भुतः।
रुक्मिण्यां सम्मतो जज्ञे शूरो वंशधरः प्रभो॥ २०॥
प्रभो! दसवाँ मास पूर्ण होनेपर इन भगवान्‌के रुक्मिणी देवीके गर्भसे एक परम अद्भुत, मनोरम एवं शूरवीर पुत्र उत्पन्न हुआ, जो इनका वंश चलानेवाला है॥ २०॥
स कामः सर्वभूतानां सर्वभावगतो नृप।
असुराणां सुराणां च चरत्यन्तर्गतः सदा॥ २१॥

नरेश्वर! जो सम्पूर्ण प्राणियोंके मानसिक संकल्पमें व्याप्त रहनेवाला है और देवताओं तथा असुरोंके भी अन्तःकरणमें सदा विचरता रहता है, वह कामदेव ही भगवान् श्रीकृष्णका वंशधर है ॥ २१ ॥

सोऽयं पुरुषशार्दूलो मेघवर्णश्चतुर्भुजः । संश्रितःपाण्डवान् प्रेम्णा भवन्तश्चैनमाश्रिताः ॥ २२ ॥ वे ही ये चार भुजाधारी घनश्याम पुरुषसिंह श्रीकृष्ण प्रेमपूर्वक तुम पाण्डवोंके आश्रित हैं और तुमलोग भी इनके शरणागत हो ॥ २२ ॥

कीर्तिर्लक्ष्मीर्धृतिश्चैव स्वर्गमार्गस्तथैव च । यत्रैष संस्थितस्तत्र देवो विष्णुस्त्रिविक्रमः ॥ २३ ॥ ये त्रिविक्रम विष्णुदेव जहाँ विद्यमान हैं, वहीं कीर्ति, लक्ष्मी, धृति तथा स्वर्गका मार्ग है ॥ २३ ॥

सेन्द्रा देवास्त्रयस्त्रिंशदेष नात्र विचारणा । आदिदेवो महादेवः सर्वभूतप्रतिश्रयः ॥ २४ ॥ इन्द्र आदि तैंतीस देवता इन्हींके स्वरूप हैं, इसमें कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये। ये ही सम्पूर्ण प्राणियोंको आश्रय देनेवाले आदिदेव महादेव हैं ॥ २४ ॥

अनादिनिधनोऽव्यक्तो महात्मा मधुसूदनः । अयं जातो महातेजाः सुराणामर्थसिद्धये ॥ २५ ॥ इनका न आदि है न अन्त। ये अव्यक्तस्वरूप, महातेजस्वी महात्मा मधुसूदन देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके लिये यदुकुलमें उत्पन्न हुए हैं ॥ २५ ॥

सुदुस्तरार्थतत्त्वस्य वक्ता कर्ता च माधवः । तव पार्थ जयः कृत्स्नस्तव कीर्तिस्तथातुला ॥ २६ ॥ तवेयं पृथिवी देवी कृत्स्ना नारायणाश्रयात् । अयं नाथस्तवाचिन्त्यो यस्य नारायणो गतिः ॥ २७ ॥ ये माधव दुर्बोध तत्त्वके वक्ता और कर्ता हैं। कुन्तीनन्दन! तुम्हारी सम्पूर्ण विजय, अनुपम कीर्ति और अखिल भूमण्डलका राज्य—ये सब भगवान् नारायणका आश्रय लेनेसे ही तुम्हें प्राप्त हुए हैं। ये अचिन्त्यस्वरूप नारायण ही तुम्हारे रक्षक और परमगति हैं ॥ २६-२७ ॥

स भवांस्त्वमुपाध्वर्यू रणाग्नौ हुतवान् नृपान् । कृष्णस्रुवेण महता युगान्ताग्निसमेन वै ॥ २८ ॥ तुमने स्वयं होता बनकर प्रलयकालीन अग्निके समान तेजस्वी श्रीकृष्णरूपी विशाल स्रुवाके द्वारा समराग्निकी ज्वालामें सम्पूर्ण राजाओंकी आहुति दे डाली है ॥ २८ ॥

दुर्योधनश्च शोच्योऽसौ सपुत्रभ्रातृबान्धवः । कृतवान् योऽबुद्धिः क्रोधाद्धरिगाण्डीविविग्रहम् ॥ २९ ॥

आज वह दुर्योधन अपने पुत्र, भाई और सम्बन्धियोंसहित शोकका विषय हो गया है; क्योंकि उस मूर्खने क्रोधके आवेशमें आकर श्रीकृष्ण और अर्जुनसे युद्ध ठाना था॥ २९॥ दैतेया दानवेन्द्राश्च महाकाया महाबलाः। चक्राग्नौ क्षयमापन्ना दावाग्नौ शलभा इव ॥ ३० ॥ कितने ही विशाल शरीरवाले महाबली दैत्य और दानव दावानलमें दग्ध होनेवाले पतंगोंकी तरह श्रीकृष्णकी चक्राग्निमें स्वाहा हो चुके हैं॥ ३०॥ प्रतियोद्धुं न शक्यो हि मानुषैरेष संयुगे। विहीनैः पुरुषव्याघ्र सत्त्वशक्तिबलादिभिः ॥ ३१ ॥ पुरुषसिंह! सत्त्व (धैर्य), शक्ति और बल आदिसे स्वभावतः हीन मनुष्य युद्धमें इन श्रीकृष्णका सामना नहीं कर सकते॥ ३१॥ जयो योगी युगान्ताभः सव्यसाची रणाग्रगः। तेजसा हतवान् सर्वं सुयोधनबलं नृप ॥ ३२ ॥ अर्जुन भी योगशक्तिसे सम्पन्न और युगान्तकालकी अग्निके समान तेजस्वी हैं। ये बायें हाथसे भी बाण चलाते हैं और रणभूमिमें सबसे आगे रहते हैं। नरेश्वर! इन्होंने अपने तेजसे दुर्योधनकी सारी सेनाका संहार कर डाला है॥ ३२॥ यत् तु गोवृषभांकेन मुनिभ्यः समुदाहृतम्। पुराणं हिमवत्पृष्ठे तन्मे निगदतः शृणु ॥ ३३ ॥ वृषभध्वज भगवान् शंकरने हिमालयके शिखरपर मुनियोंसे जो पुरातन रहस्य बताया था, वह मेरे मुँहसे सुनो॥ ३३॥ यावत् तस्य भवेत् पुष्टिस्तेजो दीप्तिः पराक्रमः। प्रभावः सन्नतिर्जन्म कृष्णे तन्त्रिगुणं विभो ॥ ३४ ॥ विभो! अर्जुनमें जैसी पुष्टि है, जैसा तेज, दीप्ति, पराक्रम, प्रभाव, विनय और जन्मकी उत्तमता है, वह सब कुछ श्रीकृष्णमें अर्जुनसे तिगुना है॥ ३४॥ कः शक्नोत्यन्यथाकर्तुं तद् यदि स्यात् तथा शृणु। यत्र कृष्णो हि भगवांस्तत्र पुष्टिरनुत्तमा ॥ ३५ ॥ संसारमें कौन ऐसा है जो मेरे इस कथनको अन्यथा सिद्ध कर सके। श्रीकृष्णका जैसा प्रभाव है, उसे सुनो—जहाँ भगवान् श्रीकृष्ण हैं, वहाँ सर्वोत्तम पुष्टि विद्यमान है॥ ३५॥ वयं त्विहाल्पमतयः परतन्त्राः सुविक्कवाः। ज्ञानपूर्वं प्रपन्नाः स्मो मृत्योः पन्थानमव्ययम् ॥ ३६ ॥ हम इस जगत्में मन्दबुद्धि, परतन्त्र और व्याकुलचित्त मनुष्य हैं। हमने जान-बूझकर मृत्युके अटल मार्गपर पैर रखा है॥ ३६॥ भवांश्चाप्यार्जवपरः पूर्वं कृत्वा प्रतिश्रयम्। राजवृत्तं न लभते प्रतिज्ञापालने रतः ॥ ३७ ॥

युधिष्ठिर! तुम अत्यन्त सरल हो, इसीसे तुमने पहले ही भगवान् वासुदेवकी शरण ली और अपनी प्रतिज्ञाके पालनमें तत्पर रहकर राजोचित बर्तावको तुम ग्रहण नहीं कर रहे हो ।। ३७ ।। अप्येवात्मवधं लोके राजंस्त्वं बहु मन्यसे । न हि प्रतिज्ञा या दत्ता तां प्रहातुमरिंदम ॥ ३८ ॥ राजन्! तुम इस संसारमें अपनी हत्या कर लेनेको ही अधिक महत्त्व दे रहे हो। शत्रुदमन! जो प्रतिज्ञा तुमने कर ली है, उसे मिटा देना तुम्हारे लिये उचित नहीं है (तुमने शत्रुओंको जीतकर न्यायपूर्वक प्रजापालनका व्रत लिया है। अब शोकवश आत्महत्याका विचार मनमें लाकर तुम उस व्रतसे गिर रहे हो, यह ठीक नहीं है) ।। ३८ ।। कालेनायं जनः सर्वो निहतो रणमूर्धनि । वयं च कालेन हताः कालो हि परमेश्वरः ॥ ३९ ॥ ये सब राजालोग युद्धके मुहानेपर कालके द्वारा मारे गये हैं, हम भी कालसे ही मारे गये हैं; क्योंकि काल ही परमेश्वर है ।। ३९ ।। न हि कालेन कालज्ञः स्पृष्टः शोचितुमर्हसि । कालो लोहितरक्ताक्षः कृष्णो दण्डी सनातनः ॥ ४० ॥ जो कालके स्वरूपको जानता है, वह कालके थपेड़े खाकर भी शोक नहीं करता। श्रीकृष्ण ही लाल नेत्रोंवाले दण्डधारी सनातन काल हैं ।। ४० ।। तस्मात् कुन्तीसुत ज्ञातीन् नेह शोचितुमर्हसि । व्यपेतमन्युर्नित्यं त्वं भव कौरवनन्दन ॥ ४१ ॥ माधवस्यास्य माहात्म्यं श्रुतं यत् कथितं मया । तदेव तावत् पर्याप्तं सज्जनस्य निदर्शनम् ॥ ४२ ॥ अतः कुन्तीनन्दन! तुम्हें अपने भाई-बन्धुओं और सगे-सम्बन्धियोंके लिये यहाँ शोक नहीं करना चाहिये। कौरव-कुलका आनन्द बढ़ानेवाले युधिष्ठिर! तुम सदा क्रोधहीन एवं शान्त रहो। मैंने इन माधव श्रीकृष्णका माहात्म्य जैसा सुना था, वैसा कह सुनाया। इनकी महिमाको समझनेके लिये इतना ही पर्याप्त है। सज्जनके लिये दिग्दर्शन मात्र उपस्थित होता है ।। ४१-४२ ।। व्यासस्य वचनं श्रुत्वा नारदस्य च धीमतः । स्वयं चैव महाराज कृष्णस्यार्हतमस्य वै ॥ ४३ ॥ प्रभावश्चर्षिपूगस्य कथितः सुमहान् मया । महेश्वरस्य संवादं शैलपुत्र्याश्च भारत ॥ ४४ ॥ महाराज! व्यासजी तथा बुद्धिमान् नारदजीके वचन सुनकर मैंने परम पूज्य श्रीकृष्ण तथा महर्षियोंके महान् प्रभावका वर्णन किया है। भारत! गिरिराजनन्दिनी उमा और महेश्वरका जो संवाद हुआ था, उसका भी मैंने उल्लेख किया है ।। ४३-४४ ।।

धारयिष्यति यश्चैनं महापुरुषसम्भवम् । शृणुयात् कथयेद् वा यः स श्रेयो लभते परम् ।। ४५ ।। जो महापुरुष श्रीकृष्णके इस प्रभावको सुनेगा, कहेगा और याद रखेगा, उसको परम कल्याणकी प्राप्ति होगी ।। ४५ ।।

भवितारश्च तस्याथ सर्वे कामा यथेप्सिताः । प्रेत्य स्वर्गं च लभते नरो नास्त्यत्र संशयः ।। ४६ ।। उसके सारे अभीष्ट मनोरथ पूर्ण होंगे और वह मनुष्य मृत्युके पश्चात् स्वर्गलोक पाता है, इसमें संशय नहीं है ।। ४६ ।।

न्याय्यं श्रेयोऽभिकामेन प्रतिपत्तुं जनार्दनः । एष एवाक्षयो विप्रैः स्तुतो राजन् जनार्दनः ।। ४७ ।। अतः जिसे कल्याणकी इच्छा हो, उस पुरुषको जनार्दनकी शरण लेनी चाहिये। राजन्! इन अविनाशी श्रीकृष्णकी ही ब्राह्मणोंने स्तुति की है ।। ४७ ।।

महेश्वरमुखोत्सृष्टा ये च धर्मगुणाः स्मृताः । ते त्वया मनसा धार्याः कुरुराज दिवानिशम् ।। ४८ ।। कुरुराज! भगवान् शंकरके मुखसे जो धर्म-सम्बन्धी गुण प्रतिपादित हुए हैं, उन सबको तुम्हें दिन-रात अपने हृदयमें धारण करना चाहिये ।। ४८ ।।

एवं ते वर्तमानस्य सम्यग्दण्डधरस्य च । प्रजापालनदक्षस्य स्वर्गलोको भविष्यति ।। ४९ ।। ऐसा बर्ताव करते हुए यदि तुम न्यायोचित रीतिसे दण्ड धारण करके प्रजापालनमें कुशलतापूर्वक लगे रहोगे तो तुम्हें स्वर्गलोक प्राप्त होगा ।। ४९ ।।

धर्मेणापि सदा राजन् प्रजा रक्षितुमर्हसि । यस्तस्य विपुलॊ दण्डः सम्यग्धर्मः स कीर्त्यते ।। ५० ।। राजन्! तुम धर्मपूर्वक सदा प्रजाकी रक्षा करते रहो। प्रजापालनके लिये जो दण्डका उचित उपयोग किया जाता है, वह धर्म ही कहलाता है ।। ५० ।।

य एष कथितो राजन् मया सज्जनसंनिधौ । शङ्करस्योमया सार्धं संवादो धर्मसंहितः ।। ५१ ।। नरेश्वर! भगवान् शंकरका पार्वतीजीके साथ जो धर्मविषयक संवाद हुआ था, उसे इन सत्पुरुषोंके निकट मैंने तुम्हें सुना दिया ।। ५१ ।।

श्रुत्वा वा श्रोतुकामो वाप्यर्चयेद् वृषभध्वजम् । विशुद्धेनेह भावेन य इच्छेद् भूतिमात्मनः ।। ५२ ।। जो अपना कल्याण चाहता हो, वह पुरुष यह संवाद सुनकर अथवा सुननेकी कामना रखकर विशुद्धभावसे भगवान् शंकरकी पूजा करे ।। ५२ ।।

एष तस्यानवद्यस्य नारदस्य महात्मनः ।