भारतकोश
संग्रह पर लौटें

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

शोकातुर निमिका पुत्रके निमित्त पिण्डदान तथा श्राद्धके विषयमें निमिको महर्षि अत्रिका उपदेश, विश्वेदेवोंके नाम एवं श्राद्धमें त्याज्य वस्तुओंका वर्णन

⬅ विषय-सूची (TOC)

एकनवतितमोऽध्यायः

शोकातुर निमिका पुत्रके निमित्त पिण्डदान तथा श्राद्धके विषयमें निमिको महर्षि अत्रिका उपदेश, विश्वेदेवोंके नाम एवं श्राद्धमें त्याज्य वस्तुओंका वर्णन

युधिष्ठिर उवाच

केन संकल्पितं श्राद्धं कस्मिन् काले किमात्मकम् ।
भृग्वंगिरसिके काले मुनिना कतरेण वा ॥ १ ॥
कानि श्राद्धानि वर्ज्यानि कानि मूलफलानि च ।
धान्यजात्यश्च का वर्ज्यास्तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ २ ॥

**युधिष्ठिरने पूछा—**पितामह! श्राद्ध कब प्रचलित हुआ? सबसे पहले किस महर्षिने इसका संकल्प किया अर्थात् प्रचार किया? श्राद्धका स्वरूप क्या है? यदि भृगु और अंगिराके समयमें इसका प्रारम्भ हुआ तो किस मुनिने इसको प्रकट किया? श्राद्धमें कौन-कौनसे कर्म, कौन-कौनसे फल-मूल और कौन-कौनसे अन्न त्याग देने योग्य हैं? वह मुझसे कहिये ॥ १-२ ॥

भीष्म उवाच

यथा श्राद्धं सम्प्रवृत्तं यस्मिन् काले यदात्मकम् ।
येन संकल्पितं चैव तन्मे शृणु जनाधिप ॥ ३ ॥

**भीष्मजीने कहा—**राजन्! श्राद्धका जिस समय और जिस प्रकार प्रचलन हुआ, जो इसका स्वरूप है तथा सबसे पहले जिसने इसका संकल्प किया अर्थात् प्रचार किया, वह सब तुम्हें बता रहा हूँ, सुनो ॥ ३ ॥

स्वायम्भुवोऽत्रिः कौरव्य परमर्षिः प्रतापवान् ।
तस्य वंशे महाराज दत्तात्रेय इति स्मृतः ॥ ४ ॥

कुरुनन्दन! महाराज! प्राचीन कालमें ब्रह्माजीसे महर्षि अत्रिकी उत्पत्ति हुई। वे बड़े प्रतापी ऋषि थे। उनके वंशमें दत्तात्रेयजीका प्रादुर्भाव हुआ ॥ ४ ॥

दत्तात्रेयस्य पुत्रोऽभून्निमिर्नाम तपोधनः ।
निमेर्श्चाप्यभवत् पुत्रः श्रीमान्नाम श्रिया वृतः ॥ ५ ॥

दत्तात्रेयके पुत्र निमि हुए, जो बड़े तपस्वी थे। निमिके भी एक पुत्र हुआ, जिसका नाम था श्रीमान्। वह बड़ा कान्तिमान् था ॥ ५ ॥

पूर्णे वर्षसहस्रान्ते स कृत्वा दुष्करं तपः ।
कालधर्मपरीतात्मा निधनं समुपागतः ॥ ६ ॥

उसने पूरे एक हजार वर्षोंतक बड़ी कठोर तपस्या करके अन्तमें काल-धर्मके अधीन होकर प्राण त्याग दिया ॥
निमिस्तु कृत्वा शौचानि विधिदृष्टेन कर्मणा ।
संतापमगमत् तीव्रं पुत्रशोकपरायणः ॥ ७ ॥
फिर निमि शास्त्रोक्त कर्मद्वारा अशौच निवारण करके पुत्र-शोकमें मग्न हो अत्यन्त संतप्त हो उठे ॥ ७ ॥
अथ कृत्वोपहार्याणि चतुर्दश्यां महामतिः ।
तमेव गणयन् शोकं विरात्रे प्रत्यबुध्यत ॥ ८ ॥
तदनन्तर परम बुद्धिमान् निमि चतुर्दशीके दिन श्राद्धमें देने योग्य सब वस्तुएँ एकत्रित करके पुत्रशोकसे ही चिन्तित हो रात बीतनेपर (अमावास्याको श्राद्ध करनेके लिये) प्रातःकाल उठे ॥ ८ ॥
तस्यासीत् प्रतिबुद्धस्य शोकेन व्यथितात्मनः ।
मनः संवृत्य विषये बुद्धिविस्तारगामिनी ॥ ९ ॥
ततः संचिन्तयामास श्राद्धकल्पं समाहितः ।
प्रातःकाल जागनेपर उनका मन पुत्रशोकसे व्यथित होता रहा; किन्तु उनकी बुद्धि बड़ी विस्तृत थी। उसके द्वारा उन्होंने मनको शोककी ओरसे हटाया और एकाग्रचित्त होकर श्राद्धविधिका विचार किया ॥ ९½ ॥
यानि तस्यैव भोज्यानि मूलानि च फलानि च ॥ १० ॥
उक्तानि यानि चान्नानि यानि चेष्टानि तस्य ह ।
तानि सर्वाणि मनसा विनिश्चित्य तपोधनः ॥ ११ ॥
फिर श्राद्धके लिये शास्त्रोंमें जो फल-मूल आदि भोज्य पदार्थ बताये गये हैं तथा उनमेंसे जो-जो पदार्थ उनके पुत्रको प्रिय थे, उन सबका मन-ही-मन निश्चय करके उन तपोधनने संग्रह किया ॥ १०-११ ॥
अमावास्यां महाप्राज्ञो विप्रानानाय्य पूजितान् ।
दक्षिणावर्तिकाः सर्वा बृसीः स्वयमथाकरोत् ॥ १२ ॥
तदनन्तर, उन महान् बुद्धिमान् मुनिने अमावास्याके दिन सात ब्राह्मणोंको बुलाकर उनकी पूजा की और उनके लिये स्वयं ही प्रदक्षिण भावसे मोड़े हुए कुशके आसन बनाकर उन्हें उनपर बिठाया ॥ १२ ॥
सप्त विप्रांस्ततो भोज्ये युगपत् समुपानयत् ।
ऋते च लवणं भोज्यं श्यामाकान्नं ददौ प्रभुः ॥ १३ ॥
प्रभावशाली निमिने उन सातोंको एक ही साथ भोजनके लिये अलोना साँवाँ परोसा ॥ १३ ॥
दक्षिणाग्रास्ततो दर्भा विष्टरेषु निवेशिताः ।

पादयोश्चैव विप्राणां ये त्वन्नमुपभुञ्जते ॥ १४ ॥
कृत्वा च दक्षिणाग्रान् वै दर्भान् स प्रयत: शुचि: ।
प्रददौ श्रीमत: पिण्डान् नामगोत्रमुदाहरन् ॥ १५ ॥
इसके बाद भोजन करनेवाले ब्राह्मणोंके पैरोंके नीचे आसनोंपर उन्होंने दक्षिणाग्र कुश बिछा दिये और (अपने सामने भी) दक्षिणाग्र कुश रखकर पवित्र एवं सावधान हो अपने पुत्र श्रीमान्‌के नाम और गोत्रका उच्चारण करते हुए कुशोंपर पिण्डदान किया ॥ १४-१५ ॥

तत् कृत्वा स मुनिश्रेष्ठो धर्मसंकरमात्मन: ।
पश्चात्तापेन महता तप्यमानोऽभ्यचिन्तयत् ॥ १६ ॥
इस प्रकार श्राद्ध करनेके पश्चात् मुनिश्रेष्ठ निमि अपनेमें धर्मसंकरताका दोष मानकर (अर्थात् वेदमें पिता-पितामह आदिके उद्देश्यसे जिस श्राद्धका विधान है, उसको मैंने स्वेच्छासे पुत्रके निमित्त किया है—यह सोचकर) महान् पश्चात्तापसे संतप्त हो उठे और इस प्रकार चिन्ता करने लगे— ॥ १६ ॥

अकृतं मुनिभि: पूर्वं किं मयेदमनुष्ठितम् ।
कथं नु शापेन न मां दहेयुर्ब्राह्मणा इति ॥ १७ ॥
‘अहो! मुनियोंने जो कार्य पहले कभी नहीं किया, उसे मैंने ही क्यों कर डाला? मेरे इस मनमाने बर्तावको देखकर ब्राह्मणलोग मुझे अपने शापसे क्यों नहीं भस्म कर डालेंगे?’ ॥ १७ ॥

ततः संचिन्तयामास वंशकर्तारमात्मनः ।
ध्यातमात्रस्तथा चात्रिराजगाम तपोधनः ॥ १८ ॥
यह बात ध्यानमें आते ही उन्होंने अपने वंशप्रवर्तक महर्षि अत्रिका स्मरण किया। उनके चिन्तन करते ही तपोधन अत्रि वहाँ आ पहुँचे ॥ १८ ॥

अथात्रिस्तं तथा दृष्ट्वा पुत्रशोकेन कर्षितम् ।
भृशमाश्वासयामास वाग्भिरिष्टाभिरव्ययः ॥ १९ ॥
आनेपर जब अविनाशी अत्रिने निमिको पुत्रशोकसे व्याकुल देखा तब मधुर वाणीद्वारा उन्हें बहुत आश्वासन दिया— ॥ १९ ॥

निमे संकल्पितस्तेऽयं पितृयज्ञस्तपोधन ।
मा ते भूद् भी: पूर्वदृष्टो धर्मोऽयं ब्रह्मणा स्वयम् ॥ २० ॥
‘तपोधन निमे! तुमने जो यह पितृयज्ञ किया है, इससे डरो मत। सबसे पहले स्वयं ब्रह्माजीने इस धर्मका साक्षात्कार किया है ॥ २० ॥

सोऽयं स्वयम्भुविहितो धर्म: संकल्पितस्त्वया ।
ऋते स्वयम्भुव: कोऽन्य: श्राद्धेयं विधिमाहरेत् ॥ २१ ॥
‘अतः तुमने यह ब्रह्माजीके चलाये हुए धर्मका ही अनुष्ठान किया है। ब्रह्माजीके सिवा दूसरा कौन इस श्राद्धविधिका उपदेश कर सकता है ॥ २१ ॥

अथाख्यास्यामि ते पुत्र श्राद्धेयं विधिमुत्तमम् । स्वयम्भुविहितं पुत्र तत् कुरुष्व निबोध मे ।। २२ ।। ‘बेटा! अब मैं तुमसे स्वयम्भू ब्रह्माजीकी बतायी हुई श्राद्धकी उत्तम विधिका वर्णन करता हूँ, इसे सुनो और सुनकर इसी विधिके अनुसार श्राद्धका अनुष्ठान करो ।। २२ ।। कृत्वाग्नौकरणं पूर्वं मन्त्रपूर्वं तपोधन । ततोऽग्नयेऽथ सोमाय वरुणाय च नित्यशः ।। २३ ।। विश्वेदेवाश्च ये नित्यं पितृभिः सह गोचराः । तेभ्यः संकल्पिता भागाः स्वयमेव स्वयम्भुवा ।। २४ ।। ‘तब तपोधन! पहले वेदमन्त्रके उच्चारणपूर्वक अग्नौकरण—अग्निकरणकी क्रिया पूरी करके अग्नि, सोम, वरुण और पितरोंके साथ नित्य रहनेवाले विश्वेदेवोंको उनका भाग सदा अर्पण करे। साक्षात् ब्रह्माजीने इनके भागोंकी कल्पना की है ।। २३-२४ ।। स्तोतव्या चेह पृथिवी निवापस्येह धारिणी । वैष्णवी काश्यपी चेति तथैवेहाक्षयेति च ।। २५ ।। ‘तदनन्तर श्राद्धकी आधारभूता पृथिवीकी वैष्णवी, काश्यपी और अक्षया आदि नामोंसे स्तुति करनी चाहिये ।। उदकानयने चैव स्तोतव्यो वरुणो विभुः । ततोऽग्निश्चैव सोमश्च आप्याय्याविहितेऽनघ ।। २६ ।। ‘अनघ! श्राद्धके लिये जल लानेके लिये भगवान् वरुणका स्तवन करना उचित है। इसके बाद तुम्हें अग्नि और सोमको भी तृप्त करना चाहिये ।। २६ ।। देवास्तु पितरो नाम निर्मिता ये स्वयम्भुवा । उष्मपा ये महाभागास्तेषां भागः प्रकल्पितः ।। २७ ।। ‘ब्रह्माजीके ही उत्पन्न किये हुए कुछ देवता पितरोंके नामसे प्रसिद्ध हैं। उन महाभाग पितरोंको उष्मप भी कहते हैं। स्वयम्भूने श्राद्धमें उनका भाग निश्चित किया है ।। २७ ।। ते श्राद्धेनार्च्यमाना वै विमुच्यन्ते ह किल्बिषात् । सप्तकः पितृवंशस्तु पूर्वदृष्टः स्वयम्भुवा ।। २८ ।। ‘श्राद्धके द्वारा उनकी पूजा करनेसे श्राद्धकर्ताके पितरोंका पापसे उद्धार हो जाता है। ब्रह्माजीने पूर्वकालमें जिन अग्निष्वात्त आदि पितरोंको श्राद्धका अधिकारी बताया है, उनकी संख्या सात है ।। २८ ।। विश्वे चाग्निमुखा देवाः संख्याताः पूर्वमेव ते । तेषां नामानि वक्ष्यामि भागार्हाणां महात्मनाम् ।। २९ ।। ‘विश्वेदेवोंकी चर्चा तो मैंने पहले ही की है, उन सबका मुख अग्नि है। यज्ञमें भाग पानेके अधिकारी उन महात्माओंके नामोंको कहता हूँ ।। २९ ।। बलं धृतिर्विपाप्मा च पुण्यकृत् पावनस्तथा ।

पार्ष्णिंक्षेमा समूहश्च दिव्यसानुस्तथैव च ॥ ३० ॥ विवस्वान् वीर्यवान् ह्रीमान् कीर्तिमान् कृत एव च । जितात्मा मुनिवीर्यश्च दीप्तरोमा भयंकरः ॥ ३१ ॥ अनुकर्मा प्रतीतश्च प्रदाताप्यंशुमांस्तथा । शैलाभः परमक्रोधी धीरोष्णी भूपतिस्तथा ॥ ३२ ॥ स्रजो वज्री वरी चैव विश्वेदेवाः सनातनाः । विद्युद्वर्चाः सोमवर्चाः सूर्यश्रीश्चेति नामतः ॥ ३३ ॥ सोमपः सूर्यसावित्रो दत्तात्मा पुण्डरीयकः । उष्णीनाभो नभोदश्च विश्वायुर्दीप्तिरेव च ॥ ३४ ॥ चमूहूरः सुरेशश्च व्योमारिः शंकरो भवः । ईशः कर्ता कृतिर्दक्षो भुवनो दिव्यकर्मकृत् ॥ ३५ ॥ गणितः पञ्चवीर्यश्च आदित्यो रश्मिवांस्तथा । सप्तकृत् सोमवर्चाश्च विश्वकृत् कविरेव च ॥ ३६ ॥ अनुगोप्ता सुगोप्ता च नप्ता चेश्वर एव च । कीर्तितास्ते महाभागाः कालस्य गतिगोचराः ॥ ३७ ॥

'बल, धृति, विपाप्मा, पुण्यकृत्, पावन, पर्षिक्षेमा, समूह, दिव्यसानु, विवस्वान्, वीर्यवान्, ह्रीमान्, कीर्तिमान्, कृत, जितात्मा, मुनिवीर्य, दीप्तरोमा, भयंकर, अनुकर्मा, प्रतीत, प्रदाता, अंशुमान्, शैलाभ, परमक्रोधी, धीरोष्णी, भूपति, स्रज, वज्री, वरी, विश्वेदेव, विद्युद्वर्चा, सोमवर्चा, सूर्यश्री, सोमप, सूर्यसावित्र, दत्तात्मा, पुण्डरीयक, उष्णीनाभ, नभोद, विश्वायु, दीप्ति, चमूहूर, सुरेश, व्योमारि, शंकर, भव, ईश, कर्ता, कृति, दक्ष, भुवन, दिव्यकर्मकृत्, गणित, पंचवीर्य, आदित्य, रश्मिवान्, सप्तकृत्, सोमवर्चा, विश्वकृत्, कवि, अनुगोप्ता, सुगोप्ता, नप्ता और ईश्वर। इस प्रकार सनातन विश्वेदेवोंके नाम बतलाये गये। ये महाभाग कालकी गतिके जाननेवाले कहे गये हैं ॥

अश्राद्धेयानि धान्यानि कोद्रवाः पुलकास्तथा । हिंगुद्रव्येषु शाकेषु पलाण्डुं लसुनं तथा ॥ ३८ ॥ सौभाञ्जनः कोविदारस्तथा गृञ्जनकादयः । कूष्माण्डजात्यलाबुं च कृष्णं लवणमेव च ॥ ३९ ॥ ग्राम्यवाराहमांसं च यच्चैवाप्रोक्षितं भवेत् । कृष्णाजाजी विडश्चैव शीतपाकी तथैव च । अंकुराद्यास्तथा वर्ज्या इह शृंगाटकानि च ॥ ४० ॥

'अब श्राद्धमें निषिद्ध अन्न आदि वस्तुओंका वर्णन करता हूँ। अनाजमें कोदो और पुलक-सरसो, हिंगुद्रव्य—छौंकनेके काम आनेवाले पदार्थोंमें हींग आदि पदार्थ, शाकोंमें प्याज, लहसुन, सहिजन, कचनार, गाजर, कुम्हडा और लौकी आदि; कालानमक, गाँवमें

पैदा होनेवाले वाराहीकन्दका गूदा, अप्रोक्षित—जिसका प्रोक्षण नहीं किया गया (संस्कार-हीन), काला जीरा, बीरिया सौंचर नमक, शीतपाकी (शाक-विशेष), जिसमें अंकुर उत्पन्न हो गये हों ऐसे मूँग और सिंघाड़ा आदि। ये सब वस्तुएँ श्राद्धमें वर्जित हैं।।

वर्जयेल्लवणं सर्वं तथा जम्बूफलानि च ।
अवक्षुतावरुदितं तथा श्राद्धे च वर्जयेत् ॥ ४१ ॥

‘सब प्रकारका नमक, जामुनका फल तथा छींक या आँसूसे दूषित हुए पदार्थ भी श्राद्धमें त्याग देने चाहिये ॥

निवापे हव्यकव्ये वा गर्हितं च सुदर्शनम् ।
पितरश्च हि देवाश्च नाभिनन्दन्ति तद्धविः ॥ ४२ ॥

‘श्राद्धविषयक हव्य-कव्यमें सुदर्शनसोमलता निन्दित है। उस हविको विश्वेदेव एवं पितृगण पसंद नहीं करते हैं ॥ ४२ ॥

चाण्डालश्वपचौ वर्ज्यौ निवापे समुपस्थिते ।
काषायवासाः कुष्ठी वा पतितो ब्रह्महापि वा ॥ ४३ ॥
संकीर्णयोनिर्विप्रश्च सम्बन्धी पतितश्च यः ।
वर्जनीया बुधैरेते निवापे समुपस्थिते ॥ ४४ ॥

‘पिण्डदानका समय उपस्थित होनेपर उस स्थानसे चाण्डालों और श्वपचोंको हटा देना चाहिये। गेरुआ वस्त्र धारण करनेवाला संन्यासी, कोढ़ी, पतित, ब्रह्महत्यारा, वर्णसंकर ब्राह्मण तथा धर्मभ्रष्ट सम्बन्धी भी श्राद्धकाल उपस्थित होनेपर विद्वानोंद्वारा वहाँसे हटा देने योग्य हैं’ ॥ ४३-४४ ॥

इत्येवमुक्त्वा भगवान् स्ववंशयं तमृषिं पुरा ।
पितामहसभां दिव्यां जगामात्रिस्तपोधनः ॥ ४५ ॥

पूर्वकालमें अपने वंशज निमि ऋषिको श्राद्धके विषयमें यह उपदेश देकर तपस्याके धनी भगवान् अत्रि ब्रह्माजीकी दिव्य सभामें चले गये ॥ ४५ ॥

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि श्राद्धकल्पे एकनवतितमोऽध्यायः ॥ ९१ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें श्राद्धकल्पविषयक इक्यानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९१ ॥

अध्याय (पृष्ठ 785)

⬅ विषय-सूची (TOC)

द्विनवतितमोऽध्यायः

पितर और देवताओंका श्राद्धान्नसे अजीर्ण होकर ब्रह्माजीके पास जाना और अग्निके द्वारा अजीर्णका निवारण, श्राद्धसे तृप्त हुए पितरोंका आशीर्वाद

भीष्म उवाच

तथा निमौ प्रवृत्ते तु सर्व एव महर्षयः ।
पितृयज्ञं तु कुर्वन्ति विधिदृष्टेन कर्मणा ॥ १ ॥
**भीष्मजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! इस प्रकार जब महर्षि निमि पहले-पहल श्राद्धमें प्रवृत्त हुए, उसके बाद सभी महर्षि शास्त्रविधिके अनुसार पितृयज्ञका अनुष्ठान करने लगे ॥ १ ॥

ऋषयो धर्मनित्यास्तु कृत्वा निवपनान्युत ।
तर्पणं चाप्यकुर्वन्त तीर्थाम्भोभिर्यतव्रताः ॥ २ ॥
सदा धर्ममें तत्पर रहनेवाले और नियमपूर्वक व्रत धारण करनेवाले महर्षि पिण्डदान करनेके पश्चात् तीर्थके जलसे पितरोंका तर्पण भी करते थे ॥ २ ॥

निवापैर्दीयमानैश्च चातुर्वर्ण्येन भारत ।
तर्पिताः पितरो देवास्तत्रान्नं जरयन्ति वै ॥ ३ ॥
अजीर्णैस्त्वभिहन्यन्ते ते देवाः पितृभिः सह ।
सोममेवाभ्यपद्यन्त तदा ह्यन्नाभिपीडिताः ॥ ४ ॥
भारत! धीरे-धीरे चारों वर्णोंके लोग श्राद्धमें देवताओं और पितरोंको अन्न देने लगे। लगातार श्राद्धमें भोजन करते-करते वे देवता और पितर पूर्ण तृप्त हो गये। अब वे अन्न पचानेके प्रयत्नमें लगे। अजीर्णसे उन्हें विशेष कष्ट होने लगा। तब वे सोम देवताके पास गये ॥

तेऽब्रुवन् सोममासाद्य पितरोऽजीर्णपीडिताः ।
निवापान्नेन पीड्यामः श्रेयो नोऽत्र विधीयताम् ॥ ५ ॥
सोमके पास जाकर वे अजीर्णसे पीड़ित पितर इस प्रकार बोले—'देव! हम श्राद्धान्नसे बहुत कष्ट पा रहे हैं। अब आप हमारा कल्याण कीजिये' ॥ ५ ॥

तान् सोमः प्रत्युवाचाथ श्रेयश्चेदीप्सितं सुराः ।
स्वयम्भूसदनं यात स वः श्रेयोऽभिधास्यति ॥ ६ ॥
तब सोमने उनसे कहा—'देवताओ! यदि आप कल्याण चाहते हैं तो ब्रह्माजीकी शरणमें जाइये, वही आपलोगोंका कल्याण करेंगे' ॥ ६ ॥

ते सोमवचनाद् देवाः पितृभिः सह भारत ।

मेरुशृङ्गे समासीनं पितामहमुपागमन् ॥ ७ ॥
भरतनन्दन! सोमके कहनेसे वे पितरोंसहित देवता मेरुपर्वतके शिखरपर विराजमान ब्रह्माजीके पास गये ॥ ७ ॥

पितर ऊचुः
निवापान्नेन भगवन् भृशं पीड्यामहे वयम् ।
प्रसादं कुरु नो देव श्रेयो नः संविधीयताम् ॥ ८ ॥
पितरोंने कहा—भगवन्! निरन्तर श्राद्धका अन्न खानेसे हम अजीर्णतावश अत्यन्त कष्ट पा रहे हैं। देव! हमलोगोंपर कृपा कीजिये और हमें कल्याणके भागी बनाइये ॥ ८ ॥
इति तेषां वचः श्रुत्वा स्वयम्भूरिदमब्रवीत् ।
एष मे पार्श्वतो वह्निर्युष्मच्छ्रेयोऽभिधास्यति ॥ ९ ॥
पितरोंकी यह बात सुनकर स्वयम्भू ब्रह्माजीने इस प्रकार कहा—'देवगण! मेरे निकट ये अग्निदेव विराजमान हैं। ये ही तुम्हारे कल्याणकी बात बतायेंगे' ॥ ९ ॥

अग्निरुवाच
सहितास्तात भोक्ष्यामो निवापे समुपस्थिते ।
जरयिष्यथ चाप्यन्नं मया सार्धं न संशयः ॥ १० ॥
अग्नि बोले—देवताओ और पितरो! अबसे श्राद्धका अवसर उपस्थित होनेपर हमलोग साथ ही भोजन किया करेंगे। मेरे साथ रहनेसे आपलोग उस अन्नको पचा सकेंगे, इसमें संशय नहीं है ॥ १० ॥
एतच्छ्रुत्वा तु पितरस्ततस्ते विज्वराऽभवन् ।
एतस्मात् कारणाच्चाग्नेः प्राक् तावद् दीयते नृप ॥ ११ ॥
नरेश्वर! अग्निकी यह बात सुनकर वे पितर निश्चिन्त हो गये; इसीलिये श्राद्धमें पहले अग्निको ही भाग अर्पित किया जाता है ॥ ११ ॥
निवप्ते चाग्निपूर्वं वै निवापे पुरुषर्षभ ।
न ब्रह्मराक्षसास्तं वै निवापं धर्षयन्त्युत ॥ १२ ॥
पुरुषप्रवर! अग्निमें हवन करनेके बाद जो पितरोंके निमित्त पिण्डदान दिया जाता है, उसे ब्रह्मराक्षस दूषित नहीं करते ॥ १२ ॥
रक्षांसि चापवर्तन्ते स्थिते देवे हुताशने ।
पूर्वं पिण्डं पितुर्दद्यात् ततो दद्यात् पितामहे ॥ १३ ॥
अग्निदेवके विराजमान रहनेपर राक्षस वहाँसे भाग जाते हैं। सबसे पहले पिताको पिण्ड देना चाहिये, फिर पितामहको ॥ १३ ॥
प्रपितामहाय च तत एष श्राद्धविधिः स्मृतः ।
ब्रूयाच्छाद्धे च सावित्रीं पिण्डे पिण्डे समाहितः ॥ १४ ॥

तदनन्तर प्रपितामहको पिण्ड देना चाहिये। यह श्राद्धकी विधि बतायी गयी है। श्राद्धमें एकाग्रचित्त हो प्रत्येक पिण्ड देते समय गायत्री-मन्त्रका उच्चारण करना चाहिये ।। १४ ।।
सोमायेति च वक्तव्यं तथा पितृमतेति च ।
रजस्वला च या नारी व्यंगिता कर्णयोश्च या ।
निवापे नोपतिष्ठेत संग्राह्या नान्यवंशजा ।। १५ ।।
पिण्ड-दानके आरम्भमें पहले अग्नि और सोमके लिये जो दो भाग दिये जाते हैं, उनके मन्त्र क्रमशः इस प्रकार हैं—‘अग्नये कव्यवाहनाय स्वाहा’, ‘सोमाय पितृमते स्वाहा।’ जो स्त्री रजस्वला हो अथवा जिसके दोनों कान बहरे हों, उसको श्राद्धमें नहीं ठहरना चाहिये। दूसरे वंशकी स्त्रीको भी श्राद्धकर्ममें नहीं लेना चाहिये ।।
जलं प्रतरमाणश्च कीर्तयेत पितामहान् ।
नदीमासाद्य कुर्वीत पितॄणां पिण्डतर्पणम् ।। १६ ।।
जलको तैरते समय पितामहों (के नामों) का कीर्तन करे। किसी नदीके तटपर जानेके बाद वहाँ पितरोंके लिये पिण्डदान और तर्पण करना चाहिये ।। १६ ।।
पूर्वं स्ववंशजानां तु कृत्वाद्विस्तर्पणं पुनः ।
सुहृत्सम्बन्धिवर्गाणां ततो दद्याज्जलाञ्जलिम् ।। १७ ।।
पहले अपने वंशमें उत्पन्न पितरोंका जलके द्वारा तर्पण करके तत्पश्चात् सुहृद् और सम्बन्धियोंके समुदायको जलांजलि देनी चाहिये ।। १७ ।।
कल्माषगोयुगेनाथ युक्तेन तरतो जलम् ।
पितरोऽभिलषन्ते वै नावं चाप्यधिरोहिताः ।। १८ ।।
जो चितकबरे रंगके बैलोंसे जुती गाड़ीपर बैठकर नदीके जलको पार कर रहा हो, उसके पितर इस समय मानो नावपर बैठकर उससे जलांजलि पानेकी इच्छा रखते हैं ।।
सदा नावि जलं तज्ज्ञाः प्रयच्छन्ति समाहिताः ।
मासार्धे कृष्णपक्षस्य कुर्यान्निर्वपणाणि वै ।। १९ ।।
पुष्टिरायुस्तथा वीर्यं श्रीश्चैव पितृभक्तितः ।
अतः जो इस बातको जानते हैं, वे एकाग्रचित्त हो नावपर बैठनेपर सदा ही पितरोंके लिये जल दिया करते हैं। महीनेका आधा समय बीत जानेपर कृष्णपक्षकी अमावास्या तिथिको अवश्य श्राद्ध करना चाहिये। पितरोंकी भक्तिसे मनुष्यको पुष्टि, आयु, वीर्य और लक्ष्मीकी प्राप्ति होती है ।। १९ १/२ ।।
पितामहः पुलस्त्यश्च वसिष्ठः पुलहस्तथा ।। २० ।।
अंगिराश्च क्रतुश्चैव कश्यपश्च महानृषिः ।
एते कुरुकुलश्रेष्ठ महायोगेश्वराः स्मृताः ।। २१ ।।
एते च पितरो राजन्नेष श्राद्धविधिः परः ।

कुरुकुलश्रेष्ठ! ब्रह्मा, पुलस्त्य, वसिष्ठ, पुलह, अंगिरा, क्रतु और महर्षि कश्यप—ये सात ऋषि महान् योगेश्वर और पितर माने गये हैं। राजन्! इस प्रकार यह श्राद्धकी उत्तम विधि बतायी गयी ।। २०-२१ १/२ ।।

प्रेतास्तु पिण्डसम्बन्धान्मुच्यन्ते तेन कर्मणा ।। २२ ।।
इत्येषा पुरुषश्रेष्ठ श्राद्धोत्पत्तिर्यथागमम् ।
व्याख्याता पूर्वनिर्दिष्टा दानं वक्ष्याम्पतः परम् ।। २३ ।।

प्रेत (मरे हुए पिता आदि) पिण्डके सम्बन्धसे प्रेतत्वके कष्टसे छुटकारा पा जाते हैं। पुरुषश्रेष्ठ! यह मैंने शास्त्रके अनुसार तुम्हें पूर्वमें बताये श्राद्धकी उत्पत्तिका प्रसंग विस्तारपूर्वक बताया है। अब दानके विषयमें बताऊँगा ।। २२-२३ ।।

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि श्राद्धकल्पे द्विनवतितमोऽध्यायः ॥ ९२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें श्राद्धकल्पविषयक बानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९२ ॥

गृहस्थके धर्मोंका रहस्य, प्रतिग्रहके दोष बतानेके लिये वृषादर्भि और सप्तर्षियोंकी कथा, भिक्षुरूपधारी इन्द्रके द्वारा कृत्याका वध करके सप्तर्षियोंकी रक्

⬅ विषय-सूची (TOC)

त्रिनवतितमोऽध्यायः

गृहस्थके धर्मोंका रहस्य, प्रतिग्रहके दोष बतानेके लिये वृषादर्भि और सप्तर्षियोंकी कथा, भिक्षुरूपधारी इन्द्रके द्वारा कृत्याका वध करके सप्तर्षियोंकी रक्षा तथा कमलोंकी चोरीके विषयमें शपथ खानेके बहानेसे धर्मपालनका संकेत

युधिष्ठिर उवाच
द्विजातयो व्रतोपेता हविस्ते यदि भुञ्जते ।
अन्नं ब्राह्मणकामाय कथमेतत् पितामह ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**पितामह! यदि व्रतधारी विप्र किसी ब्राह्मणकी इच्छा पूर्ण करनेके लिये उसके घर श्राद्धका अन्न भोजन कर ले तो इसे आप कैसा मानते हैं? (अपने व्रतका लोप करना उचित है या ब्राह्मणकी प्रार्थना अस्वीकार करना) ॥ १ ॥

भीष्म उवाच
अवेदोक्तव्रताश्चैव भुञ्जानाः कामकारणे ।
वेदोक्तेषु तु भुञ्जाना व्रतलुप्ता युधिष्ठिर ॥ २ ॥
**भीष्मजीने कहा—**युधिष्ठिर! जो वेदोक्त व्रतका पालन नहीं करते, वे ब्राह्मणकी इच्छापूर्तिके लिये श्राद्धमें भोजन कर सकते हैं; किंतु जो वैदिक व्रतका पालन कर रहे हों, वे यदि किसीके अनुरोधसे श्राद्धका अन्न ग्रहण करते हैं तो उनका व्रत भंग हो जाता है ॥ २ ॥

युधिष्ठिर उवाच
यदिदं तप इत्याहुरुपवासं पृथग्जनाः ।
तपः स्यादेतदेवेह तपोऽन्यद् वापि किं भवेत् ॥ ३ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**पितामह! साधारण लोग जो उपवासको ही तप कहा करते हैं, उसके सम्बन्धमें आपकी क्या धारणा है? मैं यह जानना चाहता हूँ कि वास्तवमें उपवास ही तप है या उसका और कोई स्वरूप है ॥ ३ ॥

भीष्म उवाच
मासार्धमासोपवासाद् यत् तपो मन्यते जनः ।
आत्मतन्त्रोपघाती यो न तपस्वी न धर्मवित् ॥ ४ ॥

भीष्मजीने कहा—राजन्! जो लोग पंद्रह दिन या एक महीनेतक उपवास करके उसे तपस्या मानते हैं, वे व्यर्थ ही अपने शरीरको कष्ट देते हैं। वास्तवमें केवल उपवास करनेवाले न तपस्वी हैं, न धर्मज्ञ ।। ४ ।।
त्यागस्य चापि सम्पत्तिः शिष्यते तप उत्तमम् ।
सदोपवासी च भवेद् ब्रह्मचारी तथैव च ।। ५ ।।
मुनिश्च स्यात् सदा विप्रो वेदांश्चैव सदा जपेत् ।
त्यागका सम्पादन ही सबसे उत्तम तपस्या है। ब्राह्मणको सदा उपवासी (व्रतपरायण), ब्रह्मचारी, मुनि और वेदोंका स्वाध्यायी होना चाहिये ।। ५ १/२ ।।
कुटुम्बिको धर्मकामः सदास्वप्रश्च मानवः ।। ६ ।।
अमांसाशी सदा च स्यात् पवित्रं च सदा पठेत् ।
ऋतवादी सदा च स्यान्नियतश्च सदा भवेत् ।। ७ ।।
विघसाशी कथं च स्याद् सदा चैवातिथिप्रियः ।
अमृताशी सदा च स्यात् पवित्री च सदा भवेत् ।। ८ ।।
धर्मपालनकी इच्छासे ही उसको स्त्री आदि कुटुम्बका संग्रह करना चाहिये (विषयभोगके लिये नहीं)। ब्राह्मणको उचित है कि वह सदा जाग्रत् रहे, मांस कभी न खाय, पवित्रभावसे सदा वेदका पाठ करे, सदा सत्य भाषण करे और इन्द्रियोंको संयममें रखे। उसको सदा अमृताशी, विघसाशी और अतिथिप्रिय तथा सदा पवित्र रहना चाहिये ।। ६—८ ।।

युधिष्ठिर उवाच
कथं सदोपवासी स्याद् ब्रह्मचारी च पार्थिव ।
विघसाशी कथं च स्यात् कथं चैवातिथिप्रियः ।। ९ ।।
युधिष्ठिरने पूछा—पृथ्वीनाथ! ब्राह्मण कैसे सदा उपवासी और ब्रह्मचारी होवे? तथा किस प्रकार वह विघसाशी एवं अतिथिप्रिय हो सकता है? ।। ९ ।।

भीष्म उवाच
अन्तरा सायमाशं च प्रातराशं च यो नरः ।
सदोपवासी भवति यो न भुंक्तेऽन्तरा पुनः ।। १० ।।
भीष्मजीने कहा—युधिष्ठिर! जो मनुष्य केवल प्रातःकाल और सायंकाल ही भोजन करता है, बीचमें कुछ नहीं खाता, उसे सदा उपवासी समझना चाहिये ।।
भार्यां गच्छन् ब्रह्मचारी ऋतौ भवति चैव ह ।
ऋतवादी सदा च स्याद् दानशीलस्तु मानवः ।। ११ ।।
जो केवल ऋतुकालमें धर्मपत्नीके साथ सहवास करता है वह ब्रह्मचारी ही माना जाता है। सदा दान देनेवाला पुरुष सत्यवादी ही समझने योग्य है ।। ११ ।।

अभक्षयन् वृथा मांसममांसाशी भवत्युत ।
दानं ददत् पवित्री स्यादस्वप्रश्च दिवास्वपन् ॥ १२ ॥
जो मांस नहीं खाता, वह अमांसाशी होता है और जो सदा दान देनेवाला है, वह पवित्र माना जाता है। जो दिनमें नहीं सोता वह सदा जागनेवाला माना जाता है ॥ १२ ॥

भृत्यातिथिषु यो भुंक्ते भुक्तवत्सु नरः सदा ।
अमृतं केवलं भुंक्ते इति विद्धि युधिष्ठिर ॥ १३ ॥
युधिष्ठिर! जो सदा भृत्यों* और अतिथियोंके भोजन कर लेनेके बाद ही स्वयं भोजन करता है, उसे केवल अमृत भोजन करनेवाला (अमृताशी) समझना चाहिये ॥ १३ ॥

अभुक्तवत्सु नाश्नाति ब्राह्मणेषु तु यो नरः ।
अभोजनेन तेनास्य जितः स्वर्गो भवत्युत ॥ १४ ॥
जबतक ब्राह्मण भोजन नहीं कर लें तबतक जो अन्न ग्रहण नहीं करता, वह मनुष्य अपने उस व्रतके द्वारा स्वर्गलोकपर विजय पाता है ॥ १४ ॥

देवेभ्यश्च पितृभ्यश्च संश्रितेभ्यस्तथैव च ।
अवशिष्टानि यो भुंक्ते तमाहुर्विघसाशिनम् ॥ १५ ॥
तेषां लोका ह्यपर्यन्ताः सदने ब्रह्मणः स्मृताः ।
उपस्थिता ह्यप्सरसो गन्धर्वैश्च जनाधिप ॥ १६ ॥
नरेश्वर! जो देवताओं, पितरों और आश्रितोंको भोजन करानेके बाद बचे हुए अन्नको ही स्वयं भोजन करता है उसे विघसाशी कहते हैं। उन मनुष्योंको ब्रह्मधाममें अक्षय लोकोंकी प्राप्ति होती है तथा गन्धर्वोंसहित अप्सराएँ उनकी सेवामें उपस्थित होती हैं ॥

देवतातिथिभिः सार्धं पितृभ्यश्चोपभुञ्जते ।
रमन्ते पुत्रपौत्रेण तेषां गतिरनुत्तमा ॥ १७ ॥
जो देवताओं और अतिथियोंसहित पितरोंके लिये अन्नका भाग देकर स्वयं भोजन करते हैं, वे इस जगत्में पुत्र-पौत्रोंके साथ रहकर आनन्द भोगते हैं और मृत्युके पश्चात् उन्हें परम उत्तम गति प्राप्त होती है ॥ १७ ॥

युधिष्ठिर उवाच

ब्राह्मणेभ्यः प्रयच्छन्ति दानानि विविधानि च ।
दातृप्रतिग्रहीत्रोर्वै को विशेषः पितामह ॥ १८ ॥
युधिष्ठिरने पूछा—पितामह! लोग ब्राह्मणोंको नाना प्रकारकी वस्तुएँ दान करते हैं। दान देने और दान लेनेवाले पुरुषोंमें क्या विशेषता होती है? ॥ १८ ॥

भीष्म उवाच

साधोर्यः प्रतिगृह्णीयात् तथैवासाधुतो द्विजः ।
गुणवत्यल्पदोषः स्यान्निर्गुणे तु निमज्जति ॥ १९ ॥

भीष्मजीने कहा— राजन्! जो ब्राह्मण साधु अर्थात् उत्तम गुण-आचरणवाले पुरुषसे तथा असाधु अर्थात् दुर्गुण और दुराचारवाले पुरुषसे दान ग्रहण करता है, उनमें सद्गुणी-सदाचारवाले पुरुषसे दान लेना अल्प दोष है। किंतु दुर्गुण और दुराचारवालेसे दान लेनेवाला पापमें डूब जाता है ॥ १९ ॥

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
वृषादर्भेश्च संवादं सप्तर्षीणां च भारत ॥ २० ॥
भारत! इस विषयमें राजा वृषादर्भि और सप्तर्षियोंके संवादरूप एक प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है ॥ २० ॥

कश्यपोऽत्रिर्वसिष्ठश्च भरद्वाजोऽथ गौतमः ।
विश्वामित्रो जमदग्निः साध्वी चैवाप्यरुन्धती ॥ २१ ॥
सर्वेषामथ तेषां तु गण्डाभूत् कर्मकारिका ।
शूद्रः पशुसखश्चैव भर्ता चास्या बभूव ह ॥ २२ ॥
ते च सर्वे तपस्यन्तः पुरा चेरुर्महीमिमाम् ।
समाधिनोपशिक्षन्तो ब्रह्मलोकं सनातनम् ॥ २३ ॥
एक समयकी बात है, कश्यप, अत्रि, वसिष्ठ, भरद्वाज, गौतम, विश्वामित्र, जमदग्नि और पतिव्रता देवी अरुन्धती—ये सब लोग समाधिके द्वारा सनातन ब्रह्मलोकको प्राप्त करनेकी इच्छासे तपस्या करते हुए इस पृथ्वीपर विचर रहे थे। इन सबकी सेवा करनेवाली एक दासी थी, जिसका नाम था 'गण्डा'। वह पशुसख नामक एक शूद्रके साथ व्याही गयी थी (पशुसख भी इन्हीं महर्षियोंके साथ रहकर सबकी सेवा किया करता था) ॥ २१—२३ ॥

अथाभवदनावृष्टिर्महती कुरुनन्दन ।
कृच्छ्रप्राणोऽभवद् यत्र लोकोऽयं वै क्षुधान्वितः ॥ २४ ॥
कुरुनन्दन! एक बार पृथ्वीपर दीर्घकालतक वर्षा नहीं हुई। जिससे अकाल पड़ जानेके कारण यह सारा जगत् भूखसे पीड़ित रहने लगा। लोग बड़ी कठिनाईसे अपने प्राणोंकी रक्षा करते थे ॥ २४ ॥

कस्मिंश्चिच्च पुरा यज्ञे शैब्येन शिबिसूनुना ।
दक्षिणार्थेऽथ ऋत्विग्भ्यो दत्तः पुत्रः पुरा किल ॥ २५ ॥
पूर्वकालमें शिबिके पुत्र शैब्यने किसी यज्ञमें दक्षिणाके रूपमें अपना एक पुत्र ही ऋत्विजोंको दे दिया था ॥ २५ ॥

अस्मिन् कालेऽथ सोऽल्पायुर्दिष्टान्तमगमत् प्रभुः ।
ते तं क्षुधाभिसंतप्ताः परिवार्योपतस्थिरे ॥ २६ ॥
उस दुर्भिक्षके समय वह अल्पायु राजकुमार मृत्युको प्राप्त हो गया। वे सप्तर्षि भूखसे पीड़ित थे, इसलिये उस मरे हुए बालकको चारों ओरसे घेरकर खड़े हो गये ॥ २६ ॥

वृषादर्भिरुवाच

(प्रतिग्रहो ब्राह्मणानां सृष्टा वृत्तिरनिन्दिता ।) प्रतिग्रहस्तारयति पुष्ट्यर्थे प्रतिगृह्यताम् । मयि यद् विद्यते वित्तं तद् वृणुध्वं तपोधनाः ॥ २७ ॥

तब वृषादर्भि बोले—प्रतिग्रह ब्राह्मणोंके लिये उत्तम वृत्ति नियत किया गया है। तपोधन! प्रतिग्रह दुर्भिक्ष और भूखके कष्टसे ब्राह्मणकी रक्षा करता है तथा पुष्टिका उत्तम साधन है। अतः मेरे पास जो धन है उसे आप स्वीकार करें और ले लें ॥ २७ ॥

प्रियो हि मे ब्राह्मणो याचमानो दद्यामहं वोऽश्वतरीसहस्रम् । एकैकशः सवृषाः सम्प्रसूताः सर्वेषां वै शीघ्रगाः श्वेतरोमाः ॥ २८ ॥

क्योंकि जो ब्राह्मण मुझसे याचना करता है, वह मुझे बहुत प्रिय लगता है। मैं आपलोगोंमेंसे प्रत्येकको एक हजार खच्चरियाँ देता हूँ तथा सभीको सफेद रोएँवाली शीघ्रगामिनी एवं ब्यायी हुई गौएँ साँडोंसहित देनेको उद्यत हूँ ॥ २८ ॥

कुलंभराननडुहः शतं शतान् धुर्यान् श्वेतान् सर्वशोऽहं ददामि । प्रष्ठौहीनां पीवराणां च ताव- दग्र्या गृष्ट्यो धेनवः सुव्रताश्च ॥ २९ ॥

साथ ही एक कुलका भार वहन करनेवाले दस हजार भारवाहक सफेद बैल भी आप सब लोगोंको दे रहा हूँ। इतना ही नहीं, मैं आप सब लोगोंको जवान, मोटी-ताजी, पहली बारकी ब्यायी हुई, अच्छे स्वभाववाली श्रेष्ठ एवं दुधारू गौएँ भी देता हूँ ॥ २९ ॥

वरान् ग्रामान् व्रीहिरसं यवांश्च रत्नं चान्यद् दुर्लभं किं ददानि । नास्मिन्नभक्ष्ये भावमेवं कुरुध्वं पुष्ट्यर्थं वः किं प्रयच्छाम्यहं वै ॥ ३० ॥

इनके सिवा अच्छे-अच्छे गाँव, धान, रस, जौ, रत्न तथा और भी अनेक दुर्लभ वस्तुएँ प्रदान कर सकता हूँ। बतलाइये, मैं आपको क्या दूँ? आप इस अभक्ष्य वस्तुके भक्षणमें मन न लगावें। कहिये, आपके शरीरकी पुष्टिके लिये मैं क्या दूँ ॥ ३० ॥

ऋषय ऊचुः

राजन् प्रतिग्रहो राज्ञां मध्वास्वादो विषोपमः । तज्जानमानः कस्मात् त्वं कुरुषे नः प्रलोभनम् ॥ ३१ ॥

ऋषि बोले— राजन्! राजाका दिया हुआ दान ऊपरसे मधुके समान मीठा जान पड़ता है, परंतु परिणाममें विषके समान भयंकर हो जाता है। इस बातको जानते हुए भी आप क्यों हमें प्रलोभनमें डाल रहे हैं ।। ३१ ।।
क्षेत्रं हि दैवतमिदं ब्राह्मणान् समुपाश्रितम् ।
अमलो ह्येष तपसा प्रीतः प्रीणाति देवताः ।। ३२ ।।
ब्राह्मणोंका शरीर देवताओंका निवासस्थान है, उसमें सभी देवता विद्यमान रहते हैं। यदि ब्राह्मण तपस्यासे शुद्ध एवं संतुष्ट हो तो वह सम्पूर्ण देवताओंको प्रसन्न करता है ।। ३२ ।।
अह्नापहि तपो जातु ब्राह्मणस्योपजायते ।
तद् दाव इव निर्दह्यात् प्राप्तो राजप्रतिग्रहः ।। ३३ ।।
ब्राह्मण दिनभरमें जितना तप संग्रह करता है, उसको राजाका दिया हुआ दान वनको दग्ध करनेवाले दावानलकी भाँति नष्ट कर डालता है ।। ३३ ।।
कुशलं सह दानेन राजन्नस्तु सदा तव ।
अर्थिभ्यो दीयतां सर्वमित्युक्त्वान्येन ते ययुः ।। ३४ ।।
राजन्! इस दानके साथ ही आप सदा सकुशल रहें और यह सारा दान आप उन्हींको दें जो आपसे इन वस्तुओंको लेना चाहते हों। ऐसा कहकर वे दूसरे मार्गसे चल दिये ।। ३४ ।।
ततः प्रचोदिता राज्ञा वनं गत्वाश्य मन्त्रिणः ।
प्रचीयोदुम्बराणि स्म दातुं तेषां प्रचक्रिरे ।। ३५ ।।
तब राजाकी प्रेरणासे उनके मन्त्री वनमें गये और गूलरके फल तोड़कर उन्हें देनेकी चेष्टा करने लगे ।। ३५ ।।
उदुम्बराण्यर्थान्यानि हेमगर्भाण्युपाहरन् ।
भृत्यास्तेषां ततस्तानि प्रग्राहितुमुपाद्रवन् ।। ३६ ।।
मन्त्रियोंने गूलर तथा दूसरे-दूसरे वृक्षोंके फल तोड़कर उनमें सुवर्ण-मुद्राएँ भर दीं। फिर उन फलोंको लेकर राजाके सेवक उन्हें ऋषियोंके हवाले करनेके लिये उनके पीछे दौड़े गये ।। ३६ ।।
गुरूणीति विदित्वाथ न ग्राह्याण्यत्रिरब्रवीत् ।
न स्महे मन्दविज्ञाना न स्महे मन्दबुद्धयः ।। ३७ ।।
हैमानीमानि जानीमः प्रतिबुद्धाः स्म जागृम ।
इह ह्येतदुपादत्तं प्रेत्य स्यात् कटुकोदयम् ।
अप्रतिग्राह्यमेवैतत् प्रेत्येह च सुखेप्सुना ।। ३८ ।।
वे सभी फल भारी हो गये थे, इस बातको महर्षि अत्रि ताड़ गये और बोले—ये 'गूलर हमारे लेने योग्य नहीं हैं। हमारी बुद्धि मन्द नहीं हुई है। हमारी ज्ञानशक्ति लुप्त नहीं हुई है। हम सो नहीं रहे हैं, जागते हैं। हमें अच्छी तरह ज्ञात है कि इनके भीतर सुवर्ण भरा पड़ा है।

यदि आज हम इन्हें स्वीकार कर लेते हैं तो परलोकमें हमें इनका कटु परिणाम भोगना पड़ेगा। जो इहलोक और परलोकमें भी सुख चाहता हो उसके लिये यह फल अग्राह्य है' ॥ ३७-३८ ॥

वसिष्ठ उवाच

शतेन निष्कगणितं सहस्रेण च सम्मितम् ।
तथा बहु प्रतीच्छन् वै पापिष्ठां पतते गतिम् ॥ ३९ ॥
**वसिष्ठ बोले—**एक निष्क (स्वर्णमुद्रा) का दान लेनेसे सौ हजार निष्कोंके दान लेनेका दोष लगता है। ऐसी दशामें जो बहुत-से निष्क ग्रहण करता है, उसको तो घोर पापमयी गतिमें गिरना पड़ता है ॥ ३९ ॥

कश्यप उवाच

यत्पृथिव्यां व्रीहियवं हिरण्यं पशवः स्त्रियः ।
सर्वं तन्नालमेकस्य तस्माद् विद्वान् शमं चरेत् ॥ ४० ॥
**कश्यपने कहा—**इस पृथ्वीपर जितने धान, जौ, सुवर्ण, पशु और स्त्रियाँ हैं, वे सब किसी एक पुरुषको मिल जायँ तो भी उसे संतोष न होगा; यह सोचकर विद्वान् पुरुष अपने मनकी तृष्णाको शान्त करे ॥ ४० ॥

भरद्वाज उवाच

उत्पन्नस्य रुरोः शृंगं वर्धमानस्य वर्धते ।
प्रार्थना पुरुषस्येव तस्य मात्रा न विद्यते ॥ ४१ ॥
**भरद्वाज बोले—**जैसे उत्पन्न हुए मृगका सींग उसके बढ़नेके साथ-साथ बढ़ता रहता है, उसी प्रकार मनुष्यकी तृष्णा सदा बढ़ती ही रहती है, उसकी कोई सीमा नहीं है ॥

गौतम उवाच

न तल्लोके द्रव्यमस्ति यल्लोकं प्रतिपूरयेत् ।
समुद्रकल्पः पुरुषो न कदाचन पूर्यते ॥ ४२ ॥
**गौतमने कहा—**संसारमें ऐसा कोई द्रव्य नहीं है, जो मनुष्यकी आशाका पेट भर सके। पुरुषकी आशा समुद्रके समान है, वह कभी भरती ही नहीं ॥ ४२ ॥

विश्वामित्र उवाच

कामं कामयमानस्य यदा कामः समृध्यते ।
अथैनमपरः कामस्तृष्णाविध्यति बाणवत् ॥ ४३ ॥
**विश्वामित्र बोले—**किसी वस्तुकी कामना करनेवाले मनुष्यकी एक इच्छा जब पूरी होती है, तब दूसरी नयी उत्पन्न हो जाती है। इस प्रकार तृष्णा तीरकी तरह मनुष्यके मनपर चोट करती ही रहती है ॥ ४३ ॥

(अत्रिरुवाच

न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति ।
हविषा कृष्णवर्त्मव भूय एवाभिवर्धते ॥)
**अत्रि बोले—**भोगोंकी कामना उनके उपभोगसे कभी नहीं शान्त होती है। अपितु घीकी आहुति पड़नेपर प्रज्वलित होनेवाली आगकी भाँति वह और भी बढ़ती ही जाती है ॥

जमदग्निरुवाच

प्रतिग्रहे संयमो वै तपो धारयते ध्रुवम् ।
तद् धनं ब्राह्मणस्येह लुभ्यमानस्य विस्रवेत् ॥ ४४ ॥
**जमदग्निने कहा—**प्रतिग्रह न लेनेसे ही ब्राह्मण अपनी तपस्याको सुरक्षित रख सकता है। तपस्या ही ब्राह्मणका धन है। जो लौकिक धनके लिये लोभ करता है, उसका तपरूपी धन नष्ट हो जाता है ॥ ४४ ॥

अरुन्धत्युवाच

धर्मार्थं संचयो यो वै द्रव्याणां पक्षसम्मतः ।

तपःसंचय एवेह विशिष्टो द्रव्यसंचयात् ॥ ४५ ॥ **अरुन्धती बोलीं—**संसारमें एक पक्षके लोगोंकी राय है कि धर्मके लिये धनका संग्रह करना चाहिये; किंतु मेरी रायमें धन-संग्रहकी अपेक्षा तपस्याका संचय ही श्रेष्ठ है ॥ ४५ ॥

गण्डोवाच

उग्रादितो भयाद् यस्माद् बिभ्यतीमे ममेश्वराः । बलीयांसो दुर्बलवद् बिभेम्यहमतः परम् ॥ ४६ ॥ **गण्डाने कहा—**मेरे ये मालिक लोग अत्यन्त शक्तिशाली होते हुए भी जब इस भयंकर प्रतिग्रहके भयसे इतना डरते हैं, तब मेरी क्या सामर्थ्य है? मुझे तो दुर्बल प्राणियोंकी भाँति इससे बहुत बड़ा भय लग रहा है ॥

पशुसख उवाच

यद् वै धर्मे परं नास्ति ब्राह्मणास्तद्धनं विदुः । विनयार्थं सुविद्वांसमुपासेयं यथातथम् ॥ ४७ ॥ **पशुसखने कहा—**धर्मका पालन करनेपर जिस धनकी प्राप्ति होती है, उससे बढ़कर कोई धन नहीं है। उस धनको ब्राह्मण ही जानते हैं; अतः मैं भी उसी धर्ममय धनकी प्राप्तिका उपाय सीखनेके लिये विद्वान् ब्राह्मणोंकी सेवामें लगा हूँ ॥ ४७ ॥

ऋषय ऊचुः

कुशलं सह दानेन तस्मै यस्य प्रजा इमाः । फलान्युपधियुक्तानि य एवं नः प्रयच्छति ॥ ४८ ॥ **ऋषियोंने कहा—**जिसकी प्रजा ये कपटयुक्त फल देनेके लिये ले आयी है तथा जो इस प्रकार फलके व्याजसे हमें सुवर्णदान कर रहा है, वह राजा अपने दानके साथ ही कुशलसे रहे ॥ ४८ ॥

भीष्म उवाच

इत्युक्त्वा हेमगर्भाणि हित्वा तानि फलानि वै । ऋषयो जग्मुरन्यत्र सर्व एव धृतव्रताः ॥ ४९ ॥ **भीष्मजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! यह कहकर उन सुवर्णयुक्त फलोंका परित्याग करके वे समस्त व्रतधारी महर्षि वहाँसे अन्यत्र चले गये ॥ ४९ ॥

मन्त्रिण ऊचुः

उपधिं शंकमानास्ते हित्वा तानि फलानि वै । ततोऽन्येनैव गच्छन्ति विदितं तेऽस्तु पार्थिव ॥ ५० ॥

**तब मन्त्रियोंने शैव्यके पास जाकर कहा—**महाराज! आपको विदित हो कि उन फलोंको देखते ही ऋषियोंको यह संदेह हुआ कि हमारे साथ छल किया जा रहा है। इसलिये वे फलोंका परित्याग करके दूसरे मार्गसे चले गये हैं ।। ५० ।।
इत्युक्तः स तु भृत्यैस्तैर्वृषादर्भिश्चुकोप ह ।
तेषां वै प्रतिकर्तुं च सर्वेषामगमद् गृहम् ।। ५१ ।।
सेवकोंके ऐसा कहनेपर राजा वृषादर्भिको बड़ा कोप हुआ और वे उन सप्तर्षियोंसे अपने अपमानका बदला लेनेका विचार करके राजधानीको लौट गये ।। ५१ ।।
स गत्वा हवनीयेऽग्नौ तीव्रं नियममास्थितः ।
जुहाव संस्कृतैर्मन्त्रैरेकैकामाहुतिं नृपः ।। ५२ ।।
वहाँ जाकर अत्यन्त कठोर नियमोंका पालन करते हुए वे आहवनीय अग्निमें आभिचारिक मन्त्र पढ़कर एक-एक आहुति डालने लगे ।। ५२ ।।
तस्मादग्नेः समुत्तस्थौ कृत्या लोकभयंकरी ।
तस्या नाम वृषादर्भिर्यातुधानीत्यथाकरोत् ।। ५३ ।।
आहुति समाप्त होनेपर उस अग्निसे एक लोकभयंकर कृत्या प्रकट हुई। राजा वृषादर्भिने उसका नाम यातुधानी रखा ।। ५३ ।।
सा कृत्या कालरात्रीव कृताञ्जलिरुपस्थिता ।
वृषादर्भिं नरपतिं किं करोमीति चाब्रवीत् ।। ५४ ।।
कालरात्रिके समान विकराल रूप धारण करनेवाली वह कृत्या हाथ जोड़कर राजाके पास उपस्थित हुई और बोली—'महाराज! मैं आपकी किस आज्ञाका पालन करूँ?' ।। ५४ ।।

वृषादर्भिरुवाच

ऋषीणां गच्छ सप्तानामरुन्धत्यास्तथैव च ।
दासीभर्तुश्च दास्याश्च मनसा नाम धारय ।। ५५ ।।
ज्ञात्वा नामानि चैवैषां सर्वनेतान् विनाशय ।
विनष्टेषु तथा स्वैरं गच्छ यत्रेप्सितं तव ।। ५६ ।।
**वृषादर्भिने कहा—**यातुधानी! तुम यहाँसे वनमें जाओ और वहाँ अरुन्धतीसहित सातों ऋषियोंका, उनकी दासीका और उस दासीके पतिका भी नाम पूछकर उसका तात्पर्य अपने मनमें धारण करो। इस प्रकार उन सबके नामोंका अर्थ समझकर उन्हें मार डालो; उसके बाद जहाँ इच्छा हो चली जाना ।। ५५-५६ ।।
सा तथेति प्रतिश्रुत्य यातुधानी स्वरूपिणी ।
जगाम तद् वनं यत्र विचेरुस्ते महर्षयः ।। ५७ ।।