महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
राजाकी यह आज्ञा पाकर यातुधानीने ‘तथास्तु’ कहकर इसे स्वीकार किया और जहाँ वे महर्षि विचरा करते थे, उस वनमें चली गयी ।। ५७ ।।
भीष्म उवाच
अथात्रिप्रमुखा राजन् वने तस्मिन् महर्षयः ।
व्यचरन् भक्षयन्तो वै मूलानि च फलानि च ।। ५८ ।।
भीष्मजी कहते हैं— राजन्! उन दिनों वे अत्रि आदि महर्षि उस वनमें फल-मूलका आहार करते हुए घूमा करते थे ।। ५८ ।।
अथापश्यन् सुपीनांसपाणिपादमुखोदरम् ।
परिव्रजन्तं स्थूलांगं परिव्राजं शुना सह ।। ५९ ।।
एक दिन उन महर्षियोंने देखा, एक संन्यासी कुत्तेके साथ वहाँ इधर-उधर विचर रहा है। उसका शरीर बहुत मोटा था। उसके मोटे कंधे, हाथ, पैर, मुख और पेट आदि सभी अंग सुन्दर और सुडौल थे ।। ५९ ।।
अरुन्धती तु तं दृष्ट्वा सर्वांगोपचितं शुभम् ।
भवितारो भवन्तो वै नैवमित्यब्रवीदृषीन् ।। ६० ।।
अरुन्धतीने सारे अंगोंसे हृष्ट-पुष्ट हुए उस सुन्दर संन्यासीको देखकर ऋषियोंसे कहा—‘क्या आपलोग कभी ऐसे नहीं हो सकेंगे?’ ।। ६० ।।
वसिष्ठ उवाच
नैतस्येह यथास्माकमग्निहोत्रमनिर्वृतम् ।
सायं प्रातश्च होतव्यं तेन पीवाञ्छुना सह ।। ६१ ।।
वसिष्ठजीने कहा— हमलोगोंकी तरह इसको इस बातकी चिन्ता नहीं है कि आज हमारा अग्निहोत्र नहीं हुआ और सबेरे तथा शामको अग्निहोत्र करना है; इसीलिये यह कुत्तेके साथ खूब मोटा-ताजा हो गया है ।। ६१ ।।
अत्रिरुवाच
नैतस्येह यथास्माकं क्षुधा वीर्यं समाहतम् ।
कृच्छ्राधीतं प्रणष्टं च तेन पीवाञ्छुना सह ।। ६२ ।।
अत्रि बोले— हमलोगोंकी तरह भूखके मारे उसकी सारी शक्ति नष्ट नहीं हो गयी है तथा बड़े कष्टसे जो वेदोंका अध्ययन किया गया था, वह भी हमारी तरह इसका नष्ट नहीं हुआ है; इसीलिये यह कुत्तेके साथ मोटा हो गया है ।। ६२ ।।
विश्वामित्र उवाच
नैतस्येह यथास्माकं शश्वच्छास्त्रं जरद्गवः ।
अलसः क्षुत्परो मूर्खस्तेन पीवाञ्छुना सह ।। ६३ ।।
**विश्वामित्रने कहा—**हमलोगोंका भूखके मारे सनातन शास्त्र विस्मृत हो गया है और शास्त्रोक्त धर्म भी क्षीण हो चला है। ऐसी दशा इसकी नहीं है तथा यह आलसी, केवल पेटकी भूख बुझानेमें ही लगा हुआ और मूर्ख है। इसीलिये यह कुत्तेके साथ मोटा हो गया है ॥ ६३ ॥
जमदग्निरुवाच
नैतस्येह यथास्माकं भक्तमिन्धनमेव च ।
संचिन्त्यं वार्षिकं चित्ते तेन पीवाञ्छुना सह ॥ ६४ ॥
**जमदग्नि बोले—**हमारी तरह इसके मनमें वर्षभरके लिये भोजन और ईंधन जुटानेकी चिन्ता नहीं है, इसीलिये कुत्तेके साथ मोटा हो गया है ॥ ६४ ॥
कश्यप उवाच
नैतस्येह यथास्माकं चत्वारश्च सहोदराः ।
देहि देहीति भिक्षन्ति तेन पीवाञ्छुना सह ॥ ६५ ॥
**कश्यपने कहा—**हमलोगोंके चार भाई हमसे प्रतिदिन ‘भोजन दो, भोजन दो’ कहकर अन्न माँगते हैं, अर्थात् हमलोगोंको एक भारी कुटुम्बके भोजन-वस्त्रकी चिन्ता करनी पड़ती है। इस संन्यासीको यह सब चिन्ता नहीं है। अतः यह कुत्तेके साथ मोटा है ॥ ६५ ॥
भरद्वाज उवाच
नैतस्येह यथास्माकं ब्रह्मबन्धोरचेतसः ।
शोको भार्यापवादेन तेन पीवाञ्छुना सह ॥ ६६ ॥
**भरद्वाज बोले—**इस विवेकशून्य ब्राह्मणबन्धुको हमलोगोंकी तरह अपनी स्त्रीके कलंकित होनेका शोक नहीं है। इसीलिये यह कुत्तेके साथ मोटा हो गया है ॥
गौतम उवाच
नैतस्येह यथास्माकं त्रिकौशेयं च रांकवम् ।
एकैकं वै त्रिवर्षीयं तेन पीवाञ्छुना सह ॥ ६७ ॥
**गौतम बोले—**हमलोगोंकी तरह इसे तीन-तीन वर्षोंतक कुशकी रस्सीकी बनी हुई तीन लरवाली मेखला और मृगचर्म धारण करके नहीं रहना पड़ता है। इसीलिये यह कुत्तेके साथ मोटा हो गया है ॥ ६७ ॥
भीष्म उवाच
अथ दृष्ट्वा परिव्राट् स तान् महर्षीन् शुना सह ।
अभिगम्य यथान्यायं पाणिस্পর্শमथाचरत् ॥ ६८ ॥
भीष्मजी कहते हैं— राजन्! कुत्तेसहित आये हुए संन्यासीने जब उन महर्षियोंको देखा, तब उनके पास आकर संन्यासकी मर्यादाके अनुसार उनका हाथसे स्पर्श किया ॥ ६८ ॥
परिचर्यां वने तां तु क्षुत्प्रतीघातकारिकाम् ।
अन्योन्येन निवेद्याथ प्रतिष्ठन्त सहैव ते ॥ ६९ ॥
तदनन्तर वे एक दूसरेको अपना कुशल-समाचार बताते हुए बोले—‘हमलोग अपनी भूख मिटानेके लिये इस वनमें भ्रमण कर रहे हैं’ ऐसा कहकर वे साथ-ही-साथ वहाँसे चल पड़े ॥ ६९ ॥
एकनिश्चयकार्याश्च व्यचरन्त वनानि ते ।
आददानाः समुद्धृत्य मूलानि च फलानि च ॥ ७० ॥
उन सबके निश्चय और कार्य एक-से थे। वे फल-मूलका संग्रह करके उन्हें साथ लिये उस वनमें विचर रहे थे ॥ ७० ॥
कदाचिद् विचरन्तस्ते वृक्षैरविरलैर्वृताम् ।
शुचिवारिप्रसन्नोदां ददृशुः पद्मिनीं शुभाम् ॥ ७१ ॥
एक दिन घूमते-फिरते हुए उन महर्षियोंको एक सुन्दर सरोवर दिखायी पड़ा; जिसका जल बड़ा ही स्वच्छ और पवित्र था। उसके चारों किनारोंपर सघन वृक्षोंकी पंक्ति शोभा पा रही थी ॥ ७१ ॥
बालादित्यवपुःप्रख्यैः पुष्करैरुपशोभिताम् ।
वैदूर्यवर्णसदृशैः पद्मपत्रैरथावृताम् ॥ ७२ ॥
प्रातःकालीन सूर्यके समान अरुण रंगके कमलपुष्प उस सरोवरकी शोभा बढ़ा रहे थे तथा वैदूर्यमणिकी-सी कान्तिवाले कमलिनीके पत्ते उसमें चारों ओर छा रहे थे ॥ ७२ ॥
नानाविधैश्च विहगैर्जलप्रकरसेविभिः ।
एकद्वारामनादेयां सूपतीर्थामकर्दमाम् ॥ ७३ ॥
नाना प्रकारके विहंगम कलरव करते हुए उसकी जलराशिका सेवन करते थे। उसमें प्रवेश करनेके लिये एक ही द्वार था। उसकी कोई वस्तु ली नहीं जा सकती थी। उसमें उतरनेके लिये बहुत सुन्दर सीढ़ियाँ बनी हुई थीं। वहाँ काई और कीचड़का तो नाम भी नहीं था ॥ ७३ ॥
वृषादर्भिप्रयुक्ता तु कृत्या विकृतदर्शना ।
यातुधानीति विख्याता पद्मिनीं तामरक्षत ॥ ७४ ॥
राजा वृषादर्भिकी भेजी हुई भयानक आकारवाली यातुधानी कृत्या उस तालाबकी रक्षा कर रही थी ॥ ७४ ॥
पशुसखसहायास्तु बिसार्थं ते महर्षयः ।
पद्मिनीमभिजग्मुस्ते सर्वे कृत्याभिरक्षिताम् ॥ ७५ ॥
पशुसखके साथ वे सभी महर्षि मृणाल लेनेके लिये उस सरोवरके तटपर गये, जो उस कृत्याके द्वारा सुरक्षित था ।। ७५ ।।
ततस्ते यातुधानीं तां दृष्ट्वा विकृतदर्शनाम् ।
स्थितां कमलिनीतीरे कृत्यामूचुर्महर्षयः ।। ७६ ।।
सरोवरके तटपर खड़ी हुई उस यातुधानी कृत्याको जो बड़ी विकराल दिखायी देती थी, देखकर वे सब महर्षि बोले— ।। ७६ ।।
एका तिष्ठसि का च त्वं कस्यार्थे किं प्रयोजनम् ।
पद्मिनीतीरमाश्रित्य ब्रूहि त्वं किं चिकीर्षसि ।। ७७ ।।
'अरी! तू कौन है और किसलिये यहाँ अकेली खड़ी है? यहाँ तेरे आनेका क्या प्रयोजन है? इस सरोवरके तटपर रहकर तू कौन-सा कार्य सिद्ध करना चाहती है?' ।। ७७ ।।
यातुधान्युवाच
यास्मि सास्म्यनुयोगो मे न कर्तव्यः कथंचन ।
आरक्षिणीं मां पद्मिन्या वित्त सर्वे तपोधनाः ।। ७८ ।।
**यातुधानी बोली—**तपस्वियो! मैं जो कोई भी होऊँ, तुम्हें मेरे विषयमें पूछ-ताछ करनेका किसी प्रकार कोई अधिकार नहीं है। तुम इतना ही जान लो कि मैं इस सरोवरका
संरक्षण करनेवाली हूँ॥ ७८ ॥
ऋषय ऊचुः
सर्व एव क्षुधार्ताः स्म न चान्यत् किंचिदस्ति नः। भवत्याः सम्मते सर्वे गृह्णीयाम बिसान्युत ॥ ७९ ॥ **ऋषि बोले—**भद्रे! इस समय हमलोग भूखसे व्याकुल हैं और हमारे पास खानेके लिये दूसरी कोई वस्तु नहीं है। अतः यदि तुम अनुमति दो तो हम सब लोग इस सरोवरसे कुछ मृणाल ले लें॥ ७९ ॥
यातुधान्युवाच
समयेन बिसानीतो गृह्णीध्वं कामकारतः। एकैको नाम मे प्रोक्त्वा ततो गृह्णीत माचिरम्॥ ८० ॥ **यातुधानीने कहा—**ऋषियो! एक शर्तपर तुम इस सरोवरसे इच्छानुसार मृणाल ले सकते हो। एक-एक करके आओ और मुझे अपना नाम और तात्पर्य बताकर मृणाल ले लो। इसमें विलम्ब करनेकी आवश्यकता नहीं है॥ ८० ॥
भीष्म उवाच
विज्ञाय यातुधानीं तां कृत्यामृषिवधैषिणीम्। अत्रिः क्षुधापरीतात्मा ततो वचनमब्रवीत् ॥ ८१ ॥ **भीष्मजी कहते हैं—**राजन्! उसकी यह बात सुनकर महर्षि अत्रि यह समझ गये कि 'यह राक्षसी कृत्या है और हम सब ऋषियोंका वध करनेकी इच्छासे यहाँ आयी हुई है।' तथापि भूखसे व्याकुल होनेके कारण उन्होंने इस प्रकार उत्तर दिया॥ ८१ ॥
अत्रिरुवाच
अरात्रिरत्रिः सा रात्रिर्या नाधीते त्रिद्य वै। अरात्रिरत्रिरित्येव नाम मे विद्धि शोभने॥ ८२ ॥ **अत्रि बोले—**कल्याणी! काम आदि शत्रुओंसे त्राण करनेवालेको अरात्रि कहते हैं और अत् (मृत्यु) से बचानेवाला अत्रि कहलाता है। इस प्रकार मैं ही अरात्रि होनेके कारण अत्रि हूँ। जबतक जीवको एकमात्र परमात्माका ज्ञान नहीं होता, तबतककी अवस्था रात्रि कहलाती है। उस अज्ञानावस्थासे रहित होनेके कारण भी मैं अरात्रि एवं अत्रि कहलाता हूँ। सम्पूर्ण प्राणियोंके लिये अज्ञात होनेके कारण जो रात्रिके समान है, उस परमात्मतत्त्वमें मैं सदा जाग्रत् रहता हूँ; अतः वह मेरे लिये अरात्रिके समान है, इस व्युत्पत्तिका अनुसार भी मैं अरात्रि और अत्रि (ज्ञानी) नाम धारण करता हूँ। यही मेरे नामका तात्पर्य समझो॥
यातुधान्युवाच
यथोदाहृतमेतत् ते मयि नाम महाद्युते । दुर्धार्यमेतन्मनसा गच्छावतर पद्मिनीम् ॥ ८३ ॥ **यातुधानीने कहा—**तेजस्वी महर्षे! आपने जिस प्रकार अपने नामका तात्पर्य बताया है, उसका मेरी समझमें आना कठिन है। अच्छा, अब आप जाइये और तालाबमें उतरिये ॥ ८३ ॥
वसिष्ठ उवाच वसिष्ठोऽस्मि वरिष्ठोऽस्मि वसे वासगृहेष्वपि । वसिष्ठत्वाच्च वासाच्च वसिष्ठ इति विद्धि माम् ॥ ८४ ॥ **वसिष्ठ बोले—**मेरा नाम वसिष्ठ है, सबसे श्रेष्ठ होनेके कारण लोग मुझे वरिष्ठ भी कहते हैं। मैं गृहस्थ-आश्रममें वास करता हूँ; अतः वसिष्ठता (ऐश्वर्य-सम्पत्ति) और वासके कारण तुम मुझे वसिष्ठ समझो ॥
यातुधान्युवाच नामनैरुक्तमेतत् ते दुःख्याभाषिताक्षरम् । नैतद् धारयितुं शक्यं गच्छावतर पद्मिनीम् ॥ ८५ ॥ **यातुधानी बोली—**मुने! आपने जो अपने नामकी व्याख्या की है उसके तो अक्षरोंका भी उच्चारण करना कठिन है। मैं इस नामको नहीं याद रख सकती। आप जाइये तालाबमें प्रवेश कीजिये ॥ ८५ ॥
कश्यप उवाच कुलं कुलं च कुवमः कुवमः कश्यपो द्विजः । काश्यः काशनिकाशत्वादेतन्मे नाम धारय ॥ ८६ ॥ **कश्यपने कहा—**यातुधानी! कश्य नाम है शरीरका, जो उसका पालन करता है उसे कश्यप कहते हैं। मैं प्रत्येक कुल (शरीर) में अन्तर्यामीरूपसे प्रवेश करके उसकी रक्षा करता हूँ, इसीलिये कश्यप हूँ। कु अर्थात् पृथ्वीपर वम यानी वर्षा करनेवाला सूर्य भी मेरा ही स्वरूप है, इसलिये मुझे 'कुवम' भी कहते हैं। मेरे देहका रंग काशके फूलकी भाँति उज्ज्वल है, अतः मैं काश्य नामसे भी प्रसिद्ध हूँ। यही मेरा नाम है। इसे तुम धारण करो ॥ ८६ ॥
यातुधान्युवाच यथोदाहृतमेतत् ते मयि नाम महाद्युते । दुर्धार्यमेतन्मनसा गच्छावतर पद्मिनीम् ॥ ८७ ॥ **यातुधानी बोली—**महर्षे! आपके नामका तात्पर्य समझना मेरे लिये बहुत कठिन है। आप भी कमलोंसे भरी हुई बावड़ीमें जाइये ॥ ८७ ॥
भरद्वाज उवाच
भरेऽसुतान् भरेऽशिष्यान् भरे देवान् भरे द्विजान् ।
भरे भार्यां भरे द्वाजं भरद्वाजोऽस्मि शोभने ॥ ८८ ॥
**भरद्वाजने कहा—**कल्याणी! जो मेरे पुत्र और शिष्य नहीं हैं, उनका भी मैं पालन करता हूँ, तथा देवता, ब्राह्मण, अपनी धर्मपत्नी तथा द्वाज (वर्णसंकर) मनुष्योंका भी भरण-पोषण करता हूँ, इसलिये भरद्वाज नामसे प्रसिद्ध हूँ ॥ ८८ ॥
यातुधान्युवाच
नामनैरुक्तमेतत् ते दुःखव्याभाषिताक्षरम् ।
नैतद् धारयितुं शक्यं गच्छावतर पद्मिनीम् ॥ ८९ ॥
**यातुधानी बोली—**मुनिवर! आपके नामाक्षरका उच्चारण करनेमें भी मुझे क्लेश जान पड़ता है, इसलिये मैं इसे धारण नहीं कर सकती। जाइये, आप भी इस सरोवरमें उतरिये ॥ ८९ ॥
गौतम उवाच
गोदमो दमतोऽधूमोऽदमस्ते समदर्शनात् ।
विद्धि मां गौतमं कृत्ये यातुधानि निबोध माम् ॥ ९० ॥
**गौतमने कहा—**कृत्ये! मैंने गो नामक इन्द्रियोंका संयम किया है, इसलिये 'गोदम' नाम धारण करता हूँ। मैं धूमरहित अग्निके समान तेजस्वी हूँ, सबमें समान दृष्टि रखनेके कारण तुम्हारे या और किसीके द्वारा मेरा दमन नहीं हो सकता। मेरे शरीरकी कान्ति (गो) अन्धकारको दूर भगानेवाली (अतम) है, अतः तुम मुझे गौतम समझो ॥ ९० ॥
यातुधान्युवाच
यथोदाहृतमेतत् ते मयि नाम महामुने ।
नैतद् धारयितुं शक्यं गच्छावतर पद्मिनीम् ॥ ९१ ॥
**यातुधानी बोली—**महामुने! आपके नामकी व्याख्या भी मैं नहीं समझ सकती। जाइये, पोखरेमें प्रवेश कीजिये ॥ ९१ ॥
विश्वामित्र उवाच
विश्वे देवाश्च मे मित्रं मित्रमस्मि गवां तथा ।
विश्वामित्रमिति ख्यातं यातुधानि निबोध माम् ॥ ९२ ॥
**विश्वामित्रने कहा—**यातुधानी! तू कान खोलकर सुन ले, विश्वेदेव मेरे मित्र हैं, तथा गौओं और सम्पूर्ण विश्वका मैं मित्र हूँ। इसलिये संसारमें विश्वामित्रके नामसे प्रसिद्ध हूँ ॥ ९२ ॥
यातुधान्युवाच नामनैरूक्तमेतत् ते दुःखव्याभाषिताक्षरम्। नैतद् धारयितुं शक्यं गच्छावतर पद्मिनीम्॥ ९३॥ यातुधानी बोली— महर्षे! आपके नामकी व्याख्याके एक अक्षरका भी उच्चारण करना मेरे लिये कठिन है। इसे याद रखना मेरे लिये असम्भव है। अतः जाइये, सरोवरमें प्रवेश कीजिये॥ ९३॥
जमदग्निरुवाच जाजमद्यजजानेऽहं जिजाहीह जिजायिषि। जमदग्निरिति ख्यातस्ततो मां विद्धि शोभने॥ ९४॥ जमदग्निने कहा— कल्याणी! मैं जगत् अर्थात् देवताओंके आहवनीय अग्निसे उत्पन्न हुआ हूँ, इसलिये तुम मुझे जमदग्नि नामसे विख्यात समझो॥ ९४॥
यातुधान्युवाच यथोदाहृतमेतत् ते मयि नाम महामुने। नैतद् धारयितुं शक्यं गच्छावतर पद्मिनीम्॥ ९५॥ यातुधानी बोली— महामुने! आपने जिस प्रकार अपने नामका तात्पर्य बतलाया है, उसको समझना मेरे लिये बहुत कठिन है। अब आप सरोवरमें प्रवेश कीजिये॥ ९५॥
अरुन्धत्युवाच धरान् धरित्रीं वसुधां भर्तुस्तिष्ठाम्यनन्तरम्। मनोऽनुरुन्धती भर्तुरिति मां विद्ध्यारुन्धतीम्॥ ९६॥ अरुन्धतीने कहा— यातुधानी! मैं अरु अर्थात् पर्वत, पृथ्वी और द्युलोकको अपनी शक्तिसे धारण करती हूँ। अपने स्वामीसे कभी दूर नहीं रहती और उनके मनके अनुसार चलती हूँ, इसलिये मेरा नाम अरुन्धती है॥ ९६॥
यातुधान्युवाच नामनैरूक्तमेतत् ते दुःखव्याभाषिताक्षरम्। नैतद् धारयितुं शक्यं गच्छावतर पद्मिनीम्॥ ९७॥ यातुधानी बोली— देवि! आपने जो अपने नामकी व्याख्या की है, उसके एक अक्षरका भी उच्चारण मेरे लिये कठिन है, अतः इसे भी मैं नहीं याद रख सकती। आप तालाबमें प्रवेश कीजिये॥ ९७॥
गण्डोवाच वक्त्रैकदेशे गण्डेति धातुमेतं प्रचक्षते।
तेनोन्नतेन गण्डेति विद्धि मानलसम्भवे ॥ ९८ ॥ **गण्डाने कहा—**अग्निसे उत्पन्न होनेवाली कृत्ये! गडि धातुसे गण्ड शब्दकी सिद्धि होती है, यह मुखके एक देश—कपोलका वाचक है। मेरा कपोल (गण्ड) ऊँचा है, इसलिये लोग मुझे गण्डा कहते हैं ॥ ९८ ॥
यातुधान्युवाच नामनैरुक्तमेतत् ते दुःखव्याभाषिताक्षरम् । नैतद् धारयितुं शक्यं गच्छावतर पद्मिनीम् ॥ ९९ ॥ **यातुधानी बोली—**तुम्हारे नामकी व्याख्याका भी उच्चारण करना मेरे लिये कठिन है। अतः इसको याद रखना असम्भव है। जाओ, तुम भी बावड़ीमें उतरो ॥ ९९ ॥
पशुसख उवाच पशून् रञ्जामि दृष्ट्वाहं पशूनां च सदा सखा । गौणं पशुसखेत्येवं विद्धि मामग्निसम्भवे ॥ १०० ॥ **पशुसखने कहा—**आगसे पैदा हुई कृत्ये! मैं पशुओंको प्रसन्न रखता हूँ और उनका प्रिय सखा हूँ; इस गुणके अनुसार मेरा नाम पशुसख है ॥ १०० ॥
यातुधान्युवाच नामनैरुक्तमेतत् ते दुःखव्याभाषिताक्षरम् । नैतद् धारयितुं शक्यं गच्छावतर पद्मिनीम् ॥ १०१ ॥ **यातुधानी बोली—**तुमने जो अपने नामकी व्याख्या की है, उसके अक्षरोंका उच्चारण करना भी मेरे लिये कष्टप्रद है। अतः इसको याद नहीं रख सकती; अब तुम भी पोखरेमें जाओ ॥ १०१ ॥
शुनःसख उवाच एभिरुक्तं यथा नाम नाहं वक्तुमिहोत्सहे । शुनःसखसखायं मां यातुधान्युपधारय ॥ १०२ ॥ **शुनःसख (संन्यासी) ने कहा—**यातुधानी! इन ऋषियोंने जिस प्रकार अपना नाम बताया है; उस तरह मैं नहीं बता सकता। तू मेरा नाम शुनःसख समझ ॥
यातुधान्युवाच नामनैरुक्तमेतत् ते वाक्यं संदिग्धया गिरा । तस्मात् पुनरिदानीं त्वं ब्रूहि यन्नाम ते द्विज ॥ १०३ ॥ **यातुधानी बोली—**विप्रवर! आपने संदिग्धवाणीमें अपना नाम बताया है। अतः अब फिर स्पष्टरूपसे अपने नामकी व्याख्या कीजिये ॥ १०३ ॥
शुनःसख उवाच
सकृदुक्तं मया नाम न गृहीतं त्वया यदि ।
तस्मात् त्रिदण्डाभिहता गच्छ भस्मेति मा चिरम् ॥ १०४ ॥
**शुनःसखने कहा—**मैंने एक बार अपना नाम बता दिया फिर भी यदि तूने उसे ग्रहण नहीं किया तो इस प्रमादके कारण मेरे इस त्रिदण्डकी मार खाकर अभी भस्म हो जा—इसमें विलम्ब न हो ॥ १०४ ॥
सा ब्रह्मदण्डकल्पेन तेन मूर्ध्नि हता तदा ।
कृत्या पपात मेदिन्यां भस्म सा च जगाम ह ॥ १०५ ॥
यह कहकर उस संन्यासीने ब्रह्मदण्डके समान अपने त्रिदण्डसे उसके मस्तकपर ऐसा हाथ जमाया कि वह यातुधानी पृथ्वीपर गिर पड़ी और तुरंत भस्म हो गयी ॥
शुनःसखा च हत्वा तां यातुधानीं महाबलाम् ।
भुवि त्रिदण्डं विष्टभ्य शाद्वले समुपाविशत् ॥ १०६ ॥
इस प्रकार शुनःसखने उस महाबलवती राक्षसीका वध करके त्रिदण्डको पृथ्वीपर रख दिया और स्वयं भी वे वहीं घाससे ढँकी हुई भूमिपर बैठ गये ॥ १०६ ॥
ततस्ते मुनयः सर्वे पुष्कराणि बिसानि च ।
यथाकाममुपादाय समुत्तस्थुर्मुदान्विताः ॥ १०७ ॥
तदनन्तर वे सभी महर्षि इच्छानुसार कमलके फूल और मृणाल लेकर प्रसन्नतापूर्वक सरोवरसे बाहर निकले ॥ १०७ ॥
श्रमेण महता कृत्वा ते बिसानि कलापशः ।
तीरे निक्षिप्य पद्मिन्यास्तर्पणं चक्रुरम्भसा ॥ १०८ ॥
फिर बहुत परिश्रम करके उन्होंने अलग-अलग बोझे बाँधे। इसके बाद उन्हें किनारेपर ही रखकर वे सरोवरके जलसे तर्पण करने लगे ॥ १०८ ॥
अथोत्थाय जलात् तस्मात् सर्वे ते समुपागमन् ।
नापश्यंश्चापि ते तानि बिसानि पुरुषर्षभाः ॥ १०९ ॥
थोड़ी देर बाद जब वे पुरुषप्रवर पानीसे बाहर निकले तो उन्हें रखे हुए अपने वे मृणाल नहीं दिखायी पड़े ॥ १०९ ॥
ऋषय ऊचुः
केन क्षुधापरीतानामस्माकं पापकर्मणाम् ।
नृशंसेनापनीतानि बिसान्याहारकांक्षिणाम् ॥ ११० ॥
**तब वे ऋषि एक दूसरेसे कहने लगे—**अरे! हम सब लोग भूखसे व्याकुल थे और अब भोजन करना चाहते थे। ऐसे समयमें किस निर्दयीने हम पापियोंके मृणाल चुरा लिये ॥ ११० ॥
ते शंकमानास्त्वन्योन्यं पप्रच्छुर्द्विजसत्तमाः । त ऊचुः समयं सर्वे कुर्म इत्यरिकर्शन ॥ १११ ॥ शत्रुसूदन! वे श्रेष्ठ ब्राह्मण आपसमें ही एक-दूसरेपर संदेह करते हुए पूछ-ताछ करने लगे और अन्तमें बोले—'हम सब लोग मिलकर शपथ करें' ॥ १११ ॥ त उक्त्वा बाढमित्येवं सर्व एव तदा समम् । क्षुधार्ताः सुपरिश्रान्ताः शपथायोपचक्रमुः ॥ ११२ ॥ शपथकी बात सुनकर सब-के-सब बोल उठे—'बहुत अच्छा'। फिर वे भूखसे पीड़ित और परिश्रमसे थके-माँदे ब्राह्मण एक साथ ही शपथ खानेको तैयार हो गये ॥ ११२ ॥
अत्रिरुवाच
स गां स्पृशतु पादेन सूर्यं च प्रतिमेहतु । अनध्यायेष्वधीयीत बिसस्तैन्यं करोति यः ॥ ११३ ॥ **अत्रि बोले—**जो मृणालकी चोरी करता हो उसे गायको लात मारने, सूर्यकी ओर मुँह करके पेशाब करने और अनध्यायके समय अध्ययन करनेका पाप लगे ॥
वसिष्ठ उवाच
अनध्याये पठेल्लोके शुनः सः परिकर्षतु । परिव्राट् कामवृत्तस्तु बिसस्तैन्यं करोति यः ॥ ११४ ॥ शरणागतं हन्तु स वै स्वसुतां चोपजीवतु । अर्थान् कांक्षतु कीनाशाद् बिसस्तैन्यं करोति यः ॥ ११५ ॥ **वसिष्ठ बोले—**जिसने मृणाल चुराये हों उसे निषिद्ध समयमें वेद पढ़ने, कुत्ते लेकर शिकार खेलने, संन्यासी होकर मनमाना बर्ताव करने, शरणागतको मारने, अपनी कन्या बेचकर जीविका चलाने तथा किसानके धन छीन लेनेका पाप लगे ॥ ११४-११५ ॥
कश्यप उवाच
सर्वत्र सर्वं लपतु न्यासलोपं करोतु च । कूटसाक्षित्वमभ्येतु बिसस्तैन्यं करोति यः ॥ ११६ ॥ **कश्यपने कहा—**जिसने मृणालोंकी चोरी की हो उसको सब जगह सब तरहकी बातें कहने, दूसरोंकी धरोहर हड़प लेने और झूठी गवाही देनेका पाप लगे ॥ वृथामांसाशनश्चास्तु वृथादानं करोतु च । यातु स्त्रियं दिवा चैव बिसस्तैन्यं करोति यः ॥ ११७ ॥ जो मृणालोंकी चोरी करता हो उसे मांसाहारका पाप लगे। उसका दान व्यर्थ चला जाय तथा उसे दिनमें स्त्रीके साथ समागम करनेका पाप लगे ॥ ११७ ॥
भरद्वाज उवाच
नृशंसस्त्यक्तधर्मास्तु स्त्रीषु ज्ञातिषु गोषु च । ब्राह्मणं चापि जयतां बिसस्तैन्यं करोति यः ॥ ११८ ॥ भरद्वाज बोले— जिसने मृणाल चुराया हो उस निर्दयीको धर्मके परित्यागका दोष लगे। वह स्त्रियों, कुटुम्बीजनों तथा गौओंके साथ पापपूर्ण बर्ताव करनेका दोषी हो और ब्राह्मणको वाद-विवादमें पराजित करनेका पाप लगे ॥ ११८ ॥
उपाध्यायमधः कृत्वा ऋचोऽध्येतु अजूंषि च । जुहोतु च स कक्षाग्नौ बिसस्तैन्यं करोति यः ॥ ११९ ॥ जो मृणालकी चोरी करता हो, उसे उपाध्याय (अध्यापक या गुरु) को नीचे बैठाकर उनसे ऋग्वेद और यजुर्वेदका अध्ययन करने और घास-फूसकी आगमें आहुति डालनेका पाप लगे ॥ ११९ ॥
जमदग्निरुवाच
पुरीषमुत्सृजत्वप्सु हन्तु गां चैव द्रुह्यतु । अनृतौ मैथुनं यातु बिसस्तैन्यं करोति यः ॥ १२० ॥ जमदग्नि बोले— जिसने मृणालोंका अपहरण किया हो, उसे पानीमें मलत्याग करनेका पाप लगे, गाय मारनेका अथवा उसके साथ द्रोह करनेका तथा ऋतुकाल आये बिना ही स्त्रीके साथ समागम करनेका पाप लगे ॥ १२० ॥
द्वेष्यो भार्योपजीवी स्याद् दूरबन्धुश्च वैरवान् । अन्योन्यस्यातिथिश्चास्तु बिसस्तैन्यं करोति यः ॥ १२१ ॥ जिसने मृणाल चुराये हों उसे सबके साथ द्वेष करनेका, स्त्रीकी कमाईपर जीविका चलानेका, भाई-बन्धुओंसे दूर रहनेका, सबसे वैर करनेका और एक-दूसरेके घर अतिथि होनेका पाप लगे ॥ १२१ ॥
गौतम उवाच
अधीत्य वेदांस्त्यजतु त्रीनग्नीनपविध्यतु । विक्रीणातु तथा सोमं बिसस्तैन्यं करोति यः ॥ १२२ ॥ गौतम बोले— जिसने मृणाल चुराये हों उसे वेदोंको पढ़कर त्यागनेका, तीनों अग्नियोंका परित्याग करनेका और सोमरसका विक्रय करनेका पाप लगे ॥ १२२ ॥
उदपानप्लवे ग्रामे ब्राह्मणो वृषलीपतिः । तस्य सालोक्यतां यातु बिसस्तैन्यं करोति यः ॥ १२३ ॥ जिसने मृणालोंकी चोरी की हो उसे वही लोक मिले, जो एक ही कूपमें पानी भरनेवाले, गाँवमें निवास करनेवाले और शूद्रकी पत्नीसे संसर्ग रखनेवाले ब्राह्मणको मिलता है ॥ १२३ ॥
विश्वामित्र उवाच
जीवतो वै गुरून् भृत्यान् भरन्त्वस्य परे जनाः ।
अगतिर्बहुपुत्रः स्याद् बिसस्तैन्यं करोति यः ॥ १२४ ॥
**विश्वामित्र बोले—**जो इन मृणालोंको चुरा ले गया हो, जिस पुरुषके जीवित रहनेपर उसके गुरु और माता तथा पिताका दूसरे पुरुष पोषण करें उसको और जिसकी कुगति हुई हो तथा जिसके बहुत-से पुत्र हों उसको जो पाप लगता है वह पाप उसे लगे ॥ १२४ ॥
अशुचिर्ब्रह्मकूतोऽस्तु ऋद्ध्या चैवाप्यहंकृतः ।
कर्षको मत्सरी चास्तु बिसस्तैन्यं करोति यः ॥ १२५ ॥
जिसने मृणालोंका अपहरण किया हो, उसे अपवित्र रहनेका, वेदको मिथ्या माननेका, धनका घमंड करनेका, ब्राह्मण होकर खेत जोतनेका और दूसरोंसे डाह रखनेका पाप लगे ॥ १२५ ॥
वर्षाचरोऽस्तु भृतको राज्ञश्चास्तु पुरोहितः ।
अयाज्यस्य भवेद्ऋत्विग् बिसस्तैन्यं करोति यः ॥ १२६ ॥
जिसने मृणाल चुराये हों, उसे वर्षाकालमें परदेशकी यात्रा करनेका, ब्राह्मण होकर वेतन लेकर काम करनेका, राजाके पुरोहित तथा यज्ञके अनधिकारीसे भी यज्ञ करानेका पाप लगे ॥ १२६ ॥
अरुन्धत्युवाच
नित्यं परिभवेच्छ्वश्रूं भर्तुर्भवतु दुर्मनाः ।
एका स्वादु समाश्नातु बिसस्तैन्यं करोति या ॥ १२७ ॥
**अरुन्धती बोलीं—**जो स्त्री मृणालोंकी चोरी करती हो उसे प्रतिदिन सासका तिरस्कार करनेका, अपने पतिका दिल दुखानेका और अकेली ही स्वादिष्ट वस्तुएँ खानेका पाप लगे ॥ १२७ ॥
ज्ञातीनां गृहमध्यस्था सक्तूनत्तु दिनक्षये ।
अभोग्या वीरसूरस्तु बिसस्तैन्यं करोति या ॥ १२८ ॥
जिसने मृणालोंकी चोरी की हो, उस स्त्रीको कुटुम्बीजनोंका अपमान करके घरमें रहनेका, दिन बीत जानेपर सत्तू खानेका, कलंकिनी होनेके कारण पतिके उपभोगमें न आनेका और ब्राह्मणी होकर भी क्षत्राणियोंके समान उग्र स्वभाववाले वीर पुत्रकी जननी होनेका पाप लगे ॥ १२८ ॥
गण्डोवाच
अनृतं भाषतु सदा बन्धुभिश्च विरुध्यतु ।
ददातु कन्यां शुल्केन बिसस्तैन्यं करोति या ॥ १२९ ॥
**गण्डा बोली—**जिस स्त्रीने मृणालकी चोरी की हो उसे सदा झूठ बोलनेका, भाई-बन्धुओंसे लड़ने और विरोध करने और शुल्क लेकर कन्यादान करनेका पाप लगे ॥
साधयित्वा स्वयं प्राशेद दास्ये जीर्यतु चैव ह । विकर्मणा प्रमीयेत बिसस्तैन्यं करोति या ॥ १३० ॥ जिस स्त्रीने मृणाल चुराया हो उसे रसोई बनाकर अकेली भोजन करनेका, दूसरोंकी गुलामी करती-करती ही बूढ़ी होनेका और पापकर्म करके मौतके मुखमें पड़नेका पाप लगे ॥ १३० ॥
पशुसख उवाच
दास एव प्रजायेतामप्रसूतिरकिंचनः । दैवतेष्वनमस्कारो बिसस्तैन्यं करोति यः ॥ १३१ ॥ पशुसख बोला—जिसने मृणालोंकी चोरी की हो उसे दूसरे जन्ममें भी दासीके ही घरमें पैदा होने, संतानहीन और निर्धन होने तथा देवताओंको नमस्कार न करनेका पाप लगे ॥ १३१ ॥
शुनःसख उवाच
अध्वर्यवे दुहितरं वा ददातु च्छन्दोगे वा चरितब्रह्मचर्ये । आथर्वणं वेदमधीत्य विप्रः स्नायीत वा यो हरते बिसानि ॥ १३२ ॥ शुनःसखने कहा—जिसने मृणालोंको चुराया हो वह ब्रह्मचर्यव्रत पूर्ण करके आये हुए यजुर्वेदी अथवा सामवेदी विद्वान्को कन्यादान दे अथवा वह ब्राह्मण अथर्ववेदका अध्ययन पूरा करके शीघ्र ही स्नातक बन जाय ॥ १३२ ॥
ऋषय ऊचुः
इष्टमेतद् द्विजातीनां योऽयं ते शपथः कृतः । त्वया कृतं बिसस्तैन्यं सर्वेषां नः शुनःसख ॥ १३३ ॥ ऋषियोंने कहा—शुनःसख! तुमने जो शपथ की है, वह तो ब्राह्मणोंको अभीष्ट ही है। अतः जान पड़ता है, हमारे मृणालोंकी चोरी तुमने ही की है ॥ १३३ ॥
शुनःसख उवाच
न्यस्तमद्यं न पश्यद्भिर्यदुक्तं कृतकर्मभिः । सत्यमेतन्न मिथ्यैतद् बिसस्तैन्यं कृतं मया ॥ १३४ ॥ शुनःसखने कहा—मुनिवरो! आपका कहना ठीक है। वास्तवमें आपका भोजन मैंने ही रख लिया है। आपलोग जब तर्पण कर रहे थे, उस समय आपकी दृष्टि इधर नहीं थी; तभी मैंने वह सब लेकर रख लिया था। अतः आपका यह कथन कि तुमने ही मृणाल चुराये हैं, ठीक है। मिथ्या नहीं है। वास्तवमें मैंने ही उन मृणालोंकी चोरी की है ॥ १३४ ॥
मया ह्यन्तर्हितानीह बिसानीमानि पश्यत । परीक्षार्थं भगवतां कृतमेवं मयानघाः ॥ १३५ ॥ मैंने उन मृणालोंको यहाँ छिपा दिया था। देखिये, ये रहे आपके मृणाल। निष्पाप मुनियो! मैंने आपलोगोंकी परीक्षाके लिये ही ऐसा किया था ॥ १३५ ॥ रक्षणार्थं च सर्वेषां भवतामहमागतः । यातुधानी ह्यतिक्रूरा कृत्यैषा वो वधैषिणी ॥ १३६ ॥ मैं आप सब लोगोंकी रक्षाके लिये यहाँ आया था यह यातुधानी अत्यन्त क्रूर स्वभाववाली कृत्या थी और आपलोगोंका वध करना चाहती थी ॥ १३६ ॥ वृषादर्भिप्रयुक्तेषा निहता मे तपोधनाः । दुष्टा हिंस्यादियं पापा युष्मान् प्रत्यग्निसम्भवा ॥ १३७ ॥ तस्मादस्म्यागतो विप्रा वासवं मां निबोधत । अलोभादक्षया लोकाः प्राप्ता वै सार्वकामिकाः ॥ १३८ ॥ उत्तिष्ठध्वमितः क्षिप्रं तानवाप्नुत वै द्विजाः ॥ १३९ ॥ तपोधनो! राजा वृषादर्भिने इसे भेजा था, किंतु यह मेरे द्वारा मारी गयी। ब्राह्मणो! मैंने सोचा कि अग्निसे उत्पन्न यह दुष्ट पापिनी कृत्या कहीं आप-लोगोंकी हिंसा न कर डाले; इसलिये मैं यहाँ आ गया। आपलोग मुझे इन्द्र समझें। आपलोगोंने जो लोभका परित्याग किया है, इससे आपको वे अक्षयलोक प्राप्त हुए हैं, जो सम्पूर्ण कामनाओंको देनेवाले हैं। अतः ब्राह्मणो! अब आपलोग यहाँसे उठें और शीघ्र उन लोकोंमें पदार्पण करें ॥ १३७—१३९ ॥
भीष्म उवाच
ततो महर्षयः प्रीतास्तथेत्युक्त्वा पुरंदरम् । सहैव त्रिदशेन्द्रेण सर्वे जग्मुस्त्रिविष्टपम् ॥ १४० ॥ **भीष्मजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! इन्द्रकी बात सुनकर महर्षियोंको बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने देवराजसे ‘तथास्तु’ कहकर उनकी आज्ञा स्वीकार कर ली। फिर वे सब-के-सब देवेन्द्रके साथ ही स्वर्गलोक चले गये ॥ १४० ॥ एवमेते महात्मानो भोगैर्बहुविधैरपि । क्षुधा परमया युक्ताश्छन्द्यमाना महात्मभिः ॥ १४१ ॥ नैव लोभं तदा चक्रुस्ततः स्वर्गमवाप्नुवन् ॥ १४२ ॥ इस प्रकार उन महात्माओंने अत्यन्त भूखे होनेपर और बड़े-बड़े लोगोंके अनेक प्रकारके भोगोंद्वारा लालच देनेपर भी उस समय लोभ नहीं किया। इसीसे उन्हें स्वर्गलोककी प्राप्ति हुई ॥ १४१-१४२ ॥ तस्मात् सर्वास्ववस्थासु नरो लोभं विवर्जयेत् ।
एष धर्मः परो राजंस्तस्माल्लोभं विवर्जयेत् ॥ १४३ ॥ राजन्! इसलिये मनुष्यको चाहिये कि वह सभी दशाओंमें लोभका त्याग करे, क्योंकि यह सबसे बड़ा धर्म है। अतः लोभको अवश्य त्याग देना चाहिये ॥ १४३ ॥
इदं नरः सुचरितं समवायेषु कीर्तयन् । अर्थभागी च भवति न च दुर्गाण्यवाप्नुते ॥ १४४ ॥ जो मनुष्य जनसमुदायमें इस पवित्र चरित्रका कीर्तन करता है, वह धन एवं मनोवांछित वस्तुका भागी होता है और कभी संकटमें नहीं पड़ता है ॥ १४४ ॥
प्रीयन्ते पितरश्चास्य ऋषयो देवतास्तथा । यशोधर्मार्थभागी च भवति प्रेत्य मानवः ॥ १४५ ॥ उसके ऊपर देवता, ऋषि और पितर सभी प्रसन्न होते हैं। वह मनुष्य इहलोकमें यश, धर्म एवं धनका भागी होता है। और मृत्युके पश्चात् उसे स्वर्गलोक सुलभ होता है ॥ १४५ ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि बिसस्तैन्योपाख्याने त्रिनवतितमोऽध्यायः ॥ ९३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें मृणालकी चोरीका उपाख्यानविषयक तिरानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९३ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके १ १/२ श्लोक मिलाकर कुल १४६ १/२ श्लोक हैं)
* पोष्यवर्ग
ब्रह्मसरतीर्थमें अगस्त्यजीके कमलोंकी चोरी होनेपर ब्रह्मर्षियों और राजर्षियोंकी धर्मोपदेशपूर्ण शपथ तथा धर्मज्ञानके उद्देश्यसे चुराये हुए कमलोंका वापस द
चतुर्नवतितमोऽध्यायः
ब्रह्मसरतीर्थमें अगस्त्यजीके कमलोंकी चोरी होनेपर ब्रह्मर्षियों और राजर्षियोंकी धर्मोपदेशपूर्ण शपथ तथा धर्मज्ञानके उद्देश्यसे चुराये हुए कमलोंका वापस देना
भीष्म उवाच
अत्रैवोदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
यद् वृत्तं तीर्थयात्रायां शपथं प्रति तच्छृणु ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं—युधिष्ठिर! इसी विषयमें एक प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है। तीर्थयात्राके प्रसंगमें इसी तरहकी शपथको लेकर जो एक घटना घटित हुई थी, उसे बताता हूँ, सुनो ॥ १ ॥
पुष्करार्थं कृतं स्तैन्यं पुरा भरतसत्तम ।
राजर्षिभिर्महाराज तथैव च द्विजर्षिभिः ॥ २ ॥
भरतवंशशिरोमणे! महाराज! पूर्वकालमें कुछ राजर्षियों और ब्रह्मर्षियोंने भी इसी प्रकार कमलोंके लिये चोरी की थी ॥ २ ॥
ऋषयः समेताः पश्चिमे वै प्रभासे
समागता मन्त्रममन्त्रयन्त ।
चराम सर्वां पृथिवीं पुण्यतीर्थां
तन्नः कामं हन्त गच्छाम सर्वे ॥ ३ ॥
पश्चिम समुद्रके तटपर प्रभास तीर्थमें बहुत-से ऋषि एकत्र हुए थे। उन समागत महर्षियोंने आपसमें यह सलाह की कि हमलोग अनेक पुण्यतीर्थोंसे भरी हुई समूची पृथ्वीकी यात्रा करें। यह हम सभी लोगोंकी अभिलाषा है। अतः सब लोग साथ-ही-साथ यात्रा प्रारम्भ कर दें ॥ ३ ॥
शुक्रोऽङ्गिराश्चैव कविश्च विद्वां-
स्तथा ह्यगस्त्यो नारदपर्वतौ च ।
भृगुर्वसिष्ठः कश्यपो गौतमश्च
विश्वामित्रो जमदग्निश्च राजन् ॥ ४ ॥
ऋषिस्तथा गालवोऽथाष्टकश्च
भरद्वाजोऽरुन्धती वालखिल्याः ।
शिबिर्दिलीपो नहुषोऽम्बरीषो
राजा ययातिर्धुन्धुमारोऽथ पूरुः ॥ ५ ॥
जग्मुः पुरस्कृत्य महानुभावं
शतक्रतुं वृत्रहणं नरेन्द्राः ।
तीर्थानि सर्वाणि परिभ्रमन्तो
माघ्यां ययुः कौशिकीं पुण्यतीर्थाम् ॥ ६ ॥
राजन्! ऐसा निश्चय करके शुक्र, अंगिरा, विद्वान् कवि, अगस्त्य, नारद, पर्वत, भृगु, वसिष्ठ, कश्यप, गौतम, विश्वामित्र, जमदग्नि, गालव मुनि, अष्टक, भरद्वाज, अरुन्धती, वालखिल्यगण, शिबि, दिलीप, नहुष, अम्बरीष, राजा ययाति, धुन्धुमार और पूरु—ये सभी राजर्षि तथा ब्रह्मर्षि वज्रधारी महानुभाव वृत्रहन्ता शतक्रतु इन्द्रको आगे करके यात्राके लिये निकले और सभी तीर्थोंमें घूमते हुए माघ मासकी पूर्णिमा तिथिको पुण्यसलिला कौशिकी नदीके तटपर जा पहुँचे ॥ ४—६ ॥
सर्वेषु तीर्थेष्ववधूतपापा
जग्मुस्ततो ब्रह्मसरः सुपुण्यम् ।
देवस्य तीर्थे जलमग्निकल्पा
विगाह्य ते भुक्तबिसप्रसूनाः ॥ ७ ॥
इस प्रकार वहाँके तीर्थोंमें स्नानके द्वारा अपने पाप धो करके ऋषिगण उस स्थानसे परम पवित्र ब्रह्मसर तीर्थमें गये। उन अग्निके समान तेजस्वी ऋषियोंने वहाँके जलमें स्नान करके कमलके फूलोंका आहार किया ॥ ७ ॥
केचिद् बिसान्यखनंस्तत्र राज-
न्नन्ये मृणालान्यखनंस्तत्र विप्राः ।
अथापश्यन् पुष्करं ते ह्रियन्तं
ह्रदादगस्त्येन समुद्धृतं तत् ॥ ८ ॥
राजन्! कुछ ऋषि वहाँ कमल खोदने लगे। कुछ ब्राह्मण मृणाल उखाड़ने लगे। इसी बीचमें अगस्त्यजीने उस पोखरेसे जितना कमल उखाड़कर रखा था, वह सब सहसा गायब हो गया। इस बातको सबने देखा ॥ ८ ॥
तानाह सर्वानृषिमुख्यानगस्त्यः
केनादत्तं पुष्करं मे सुजातम् ।
युष्मान् शंके पुष्करं दीयतां मे
न वै भवन्तो हर्तुमर्हन्ति पद्मम् ॥ ९ ॥
तब अगस्त्यजीने उन समस्त ऋषियोंसे पूछा—‘किसने मेरे सुन्दर कमल ले लिये। मैं आप सब लोगोंपर संदेह करता हूँ। मेरे कमल लौटा दीजिये। आप-जैसे साधु पुरुषोंको कमलोंकी चोरी करना कदापि उचित नहीं है ॥ ९ ॥
शृणोमि कालो हिंसते धर्मवीर्यं
सोऽयं प्राप्तो वर्तते धर्मपीडा ।
पुराधर्मो वर्तते नेह यावत् तावद् गच्छामः सुरलोकं चिराय ।। १० ।। 'सुनता हूँ कि काल धर्मकी शक्तिको नष्ट कर देता है। वही काल इस समय प्राप्त हुआ है। तभी तो धर्मको हानि पहुँचायी जा रही है—अस्तेय-धर्मका हनन हो रहा है। अतः इस जगत्में अधर्मका विस्तार न हो इसके पहले ही हम चिरकालके लिये स्वर्गलोकमें चले जाएँ ।। १० ।।
पुरा वेदान् ब्राह्मणा ग्राममध्ये धुष्टस्वरा वृषलान् श्रावयन्ति । पुरा राजा व्यवहारेण धर्मान् पश्यत्यहं परलोकं व्रजामि ।। ११ ।। 'ब्राह्मणलोग गाँवके बीचमें उच्चस्वरसे वेदपाठ करके शूद्रोंको सुनाने लगें तथा राजा व्यावसायिक दृष्टिसे धर्मको देखने लगें, इसके पहले ही मैं परलोकमें चला जाऊँ ।। ११ ।।
पुरा वरान् प्रत्यवरान् गरीयसो यावन्नरा नावमंस्यन्ति सर्वे । तमोत्तरं यावदिदं न वर्तते तावद् व्रजामि परलोकं चिराय ।। १२ ।। 'जबतक सभी श्रेष्ठ मनुष्य महान् पुरुषोंकी नीचोंके समान अवहेलना नहीं करते हैं तथा जबतक इस संसारमें अज्ञानजनित तमोगुणका बाहुल्य नहीं हो जाता, इसके पहले ही मैं चिरकालके लिये परलोक चला जाऊँ ।। १२ ।।
पुरा प्रपश्यामि परेण मर्त्यान् बलीयसा दुर्बलान् भुज्यमानान् । तस्माद् यास्यामि परलोकं चिराय न ह्युत्सहे द्रष्टुमिह जीवलोकम् ।। १३ ।। 'भविष्यकालमें बलवान् मनुष्य दुर्बलोंको अपने उपभोगमें लायेंगे, इस बातको मैं अभीसे देख रहा हूँ। इसलिये मैं दीर्घकालके लिये परलोकमें चला जाऊँ। यहाँ रहकर इस जीवजगत्की ऐसी दुरवस्था मैं नहीं देख सकता' ।। १३ ।।
तमाहुरार्ता ऋषयो महर्षि न ते वयं पुष्करं चोरयामः । मिथ्याभिशंगो भवता न कार्यः शपाम तीक्ष्णैः शपथैर्महर्षे ।। १४ ।। यह सुनकर सभी महर्षि घबरा उठे और अगस्त्यजीसे बोले—'महर्षे! हमने आपके कमल नहीं चुराये हैं। आपको झूठा कलंक नहीं लगाना चाहिये। हम अपनी सफाई देनेके लिये कठोर-से-कठोर शपथ खा सकते हैं' ।। १४ ।।
ते निश्चितास्तत्र महर्षयस्तु सम्पश्यन्तो धर्ममेतं नरेन्द्राः । ततोऽशपन्त शपथान् पर्ययेण सहैव ते पार्थिव पुत्रपौत्रैः ॥ १५ ॥ पृथ्वीनाथ! तदनन्तर वे महर्षि तथा नरेशगण वहाँ कुछ निश्चय करके इस धर्मपर दृष्टि रखते हुए पुत्रों और पौत्रोंसहित बारी-बारीसे शपथ खाने लगे ॥ १५ ॥
भृगुरुवाच प्रत्याक्रोशेदिहाक्रुष्टस्ताडितः प्रतिताडयेत् । खादेच्च पृष्ठमांसानि यस्ते हरति पुष्करम् ॥ १६ ॥ भृगु बोले—मुने! जिसने आपके कमलकी चोरी की है, वह गाली सुनकर बदलेमें गाली दे और मार खाकर बदलेमें स्वयं भी मारे तथा दूसरेकी पीठके मांस खाय अर्थात् उपर्युक्त पापोंका भागी हो ॥ १६ ॥
वसिष्ठ उवाच अस्वाध्यायपरो लोके श्वानं च परिकर्षतु । पुरे च भिक्षुर्भवतु यस्ते हरति पुष्करम् ॥ १७ ॥ वसिष्ठने कहा—जिसने आपके कमल चुराये हों, वह स्वाध्यायसे विमुख हो जाय। कुत्ता साथ लेकर शिकार खेले और गाँव-गाँव भीख माँगता फिरे ॥ १७ ॥
कश्यप उवाच सर्वत्र सर्वं पणतु न्यासे लोभं करोतु च । कूटसाक्षित्त्वमभ्येतु यस्ते हरति पुष्करम् ॥ १८ ॥ कश्यपने कहा—जो आपका कमल चुरा ले गया हो, वह सब जगह सब तरहकी वस्तुओंकी खरीद-बिक्री करे। किसीकी धरोहरको हड़प लेनेका लोभ करे और झूठी गवाही दे, अर्थात् उपर्युक्त पापोंका भागी हो ॥ १८ ॥
गौतम उवाच जीवत्वहंकृतो बुद्ध्या विषमेणासमेन सः । कर्षको मत्सरी चास्तु यस्ते हरति पुष्करम् ॥ १९ ॥ गौतम बोले—जिसने आपके कमलकी चोरी की हो, वह अहंकारी, बेईमान और अयोग्यका साथ करनेवाला, खेती करनेवाला और ईर्ष्यायुक्त होकर जीवन व्यतीत करे ॥ १९ ॥
अंगिरा उवाच